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सचित्र ज्योतिष शिक्षा (प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड) भाग १

Sachitra Jyotisha Shiksha (Prarambhika Gyan Khand) Vol 1

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished288 पृष्ठ

(शेष)

मित्र शत्र स्थान सम

६ ३+% १०१ ७

उच्च

दस्थात

मित्र स्थान

स्थान २ १२ ९५ ४

मूल ण

त्रिको क्रम गह

राशि ६

सिह

१ सूय

FX

S °

स्वामी ब.

मेष मंगल ३

मं. ग,

ए? छ?

ग्रहमैत्री : १४१

का र

Crop

७” पर?

स्वामी मं.

राशि शुक्र कुम्भ

चं. र.

शनि के । समान राहु कुम्भ ८

१४२ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड

इस चक्र में मित्र और उच्च स्थान के सम्बन्ध में ध्यान देने योग्य बात यह है कि इन दोनों स्थानों में से किसी स्थान में रवि या चंद्र १ ही बार आ जावे तो मित्र होते हैं, परन्तु दूसरे ग्रह इन स्थानों में २ बार आवे तब मित्र होते हैं, १ बार आने से सम होते हैं, शेष शत्रु होते हैं। जैसे मंगल का विचारना है, गुरु २ स्थान (१२-६) में आया है तो मित्र हुआ, परन्तु रवि, चंद्र १ ही बार, ५ रवि, ४ चंद्र आने से मित्र हुआ। शुक्र १ बार आया है, इसी प्रकार शनि उच्च में १ ही बार आया है तो शत्रु। शं. सम हुए। शेष बुध वषा वह शत्रु हुआ। इसी प्रकार सबकी मैत्री विचारना।

तात्कालिक मैत्री Temporal friendship

जिस प्रकार कोई किसी का मित्र होने पर भी तात्कालिक परिस्थिति के कारण विरोध या समता का भाव दिखाता है या शत्रु रहने पर भी तात्कालिक अवस्था के अनुसार कभी मित्रता कभी समता दर्शाता है, इसी प्रकार ग्रहों की नैसर्गिक मैत्री रहने पर भी परिस्थिति के अनुसार मैत्री में परिवर्तन हो जाता है। इसको तात्कालिक मैत्री कहते हैं, अर्थात् तात्कालिक अवस्था के अनुसार जो मैत्री होती है उसे तात्कालिक मैत्री कहते हैं। मित्र=२, ३, ४ और १२, ११, १० वें स्थान के ग्रह शत्रु=१, ५, ६, ७, ८, और ९ वें स्थान के ग्रह जन्म कुंडली या किसी कुंडली में कोई ग्रह जहाँ पर भी हो उस स्थान को छोड़

कर आगे के ३ स्थान और पीछे के ३ स्थानों में रहने वाले ग्रह उस ग्रह के तात्कालिक मित्र हो जाते हैं। शेष स्थान में रहने वाले ग्रह उसके शत्रु हो जाते हैं।

अर्थात् किसी विशेष स्थान से दूसरे, तीसरे और चौथे स्थान में और दशम, ग्यारहवें और बारहवें स्थान में रहने वाले ग्रह मित्र हो जाते हैं, शेष स्थान के ग्रह शत्रु होते हैं। जैसे यहाँ पर शनि सप्तम स्थान में है, उससे कौन-कौन स्थान के ग्रह मित्र शत्रु होंगे अगर कुण्डली में बताया है।

यहाँ इसको और भी उदाहरण देकर तात्कालिक मैत्री समझाते हैं।

शहमीनी : १४३

लगन कुण्डली

(१) सूर्य—सूर्य से दूसरे घर में शनि बुध, तीसरे में गुरु चंद्र शुक्र, चौथे में राहु है, बारहवें में कोई ग्रह नहीं है, ग्यारहवें स्थान में मंगल और दशवें में केतु है ये सब सूर्य के मित्र हुए। शेष कोई नहीं बचे तो शत्रु कोई नहीं है।

(२) चन्द्र के—रा० बु० श० सू० मित्र हैं, क्योंकि राहु दूसरे घर में है, तीसरे

चौथे में कोई ग्रह नहीं है। बारहवें श० बु०, ग्यारहवें सूर्य, दशवें कोई ग्रह नहीं है। ये सब मित्र हुए, शेष शत्रु हुए। चंद्र के पहिले घर में जहाँ गुरु शुक्र हैं, आठवें में केतु नवम मंगल है। इस कारण गु० शु० के और मंगल शत्रु हुए। इसी प्रकार सब का निकालना।

(३) मंगल के—सू० श० बु० के० मित्र हैं, क्योंकि केतु बारहवें, तीसरे सूर्य, चौथे में शनि बुध हैं, दूसरे दशवें और ग्यारहवें स्थान में कोई ग्रह नहीं है। शेष ग्रह गुरु चन्द्र शुक्र राहु शत्रु हुए।

(४) बुध के—गु० चं० शु० रा० सू० और मं० मित्र, शेष श० और के० शत्रु हैं।

(५) गुरु के—रा० श० बु० सू० मित्र, शेष चं० शु० मं० और के० शत्रु हैं।

(६) शुक्र के—रा० श० बु० सू० मित्र, शेष गु० चं० मं० और के० शत्रु हैं।

(७) शनि के—गु० चं० शु० रा० सू० मं० मित्र, शेष बुध और केतु शत्रु हैं।

(८) राहु के—गु० चं० शु० श० बु० सू० मित्र, शेष मं० और के० शत्रु हैं।

पंचधा मैत्री Average friendship

पंचधा मैत्री = नैसर्गिक मैत्री + तात्कालिक मैत्री।

मित्र + मित्र = अघि मित्रशत्रु + शत्रु = अविशत्रु
मित्र + सम = शत्रुशत्रु + सम = शत्रु
मित्र + शत्रु = समशत्रु + मित्र = सम

नैसर्गिक और तात्कालिक मैत्री मिलाकर पंचधा मैत्री होती है। यदि दोनों में मित्र हो तो अघिमित्र, दोनों में शत्रु हो तो अविशत्रु होते हैं। एक में मित्र दूसरे में शत्रु हो तो सम हो जाता है। एक में मित्र और दूसरे में सम हो तो मित्र और एक में शत्रु और दूसरे में सम हो तो शत्रु होता है।

इसी प्रकार विचार कर पंचधा मैत्री निकालने का उदाहरण नीचे दिया है। पहिले जो तात्कालिक मैत्री निकाले हैं उसी पर से पंचधा मैत्री निकालते हैं।

१४४ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड

(१) नैसर्गिक मैत्री (स्थायी मैत्री)

(२) तात्कालिक मैत्री (जो पहिले निकोल चुके हैं)

ग्रहमित्रशत्रुसमग्रहमित्रशत्रु
१ रविचं. मं. गुशु. श.रा. बु.१ रविचं. बु. गु. शु. श. मं. रा.×
२ चन्द्रर. बु.रा.मं. गु. शु. श.२ चंद्रसू. बु. श. रा.मं. गु. शु.
३ मंगलर. चं. गु.बु. राशु. श.३ मंगलसू. बु. श.चं. गु. शु. रा.
४ बुधर. शु. रा.चं.मं. गु. श.४ बुधसू. चं. गु. शु. रा.शा.
५ गुरुर. चं. मं.बु. शु.श. रा.५ गुरुसू. बु. श. रा.चं. मं. शु.
६ शुक्रबु. श. रा.र. चं.मं. गु.६ शुक्रसू. बु. श. रा.चं. मं. गु.
७ शनिबु. श. रा.र. चं. मं. गु.७ शनिसू. चं. मं. गु. शु. रा.बु.
८ राहुबु. शु. श. र.चं. मं. गु.८ राहुसू. चं. बु. गु. शु. श.मं.

(३) पंचधा मैत्री (उपयुक्त दोनों को मिलाकर यहाँ रखा है)

ग्रहअधिमित्रमित्रसमशत्रुअधिशत्रु
१ रविचं मं गुंबुंशं शु रां
२ चंद्ररं बुंशंरांमं गुं शुं
३ मंगलरंशंचं गुं बुंशुं
४ बुधरं शुं रांमं गुं चंशं
५ गुरुरंशं रां चं मं बुंशुं
६ शुक्रबुं शं रांरंमं रांचं
७ शनिशुं रांगुंरं चं मं बुंरां
८ राहुबुं शुं शंगुंरं चंमं

यहाँ तात्कालिक में सूर्य का शनि मित्र है, परन्तु नैसर्गिक में शत्रु है तो मित्र शत्रु मिलकर पंचधा मैत्री में सम हो गया। बुध तात्कालिक में मित्र और नैसर्गिक में सम है तो मित्र+सम=मित्र हुआ। रवि का चंद्र और मंगल दोनों प्रकार से मित्र है तो दोनों अधिमित्र हुए। इसी प्रकार प्रत्येक ग्रहों की मित्रता मिलान करके पंचधा मैत्री चक्र में स्थापित किया है।

ग्रहमैत्री : १४५

सम्पूर्ण ग्रहों का फल विचारते समय इसी पंचधा मैत्री चक्र के अनुसार ग्रहमैत्री का विचार होता है। जैसे लग्नकुंडली में लग्न में वृश्चिक राशि है। इसका स्वामी

लग्नकुंडली

मंगल हुआ, यह मंगल चतुर्थ भाव में शनि के घर (कुंभ) में बैठता है। पंचधा मैत्री में मंगल का शनि मित्र है। इस कारण मंगल मित्रस्थानी हुआ। वृष का शनि सप्तम में है वृषेश्वर (वृष का स्वामी) गुरु है, शनि का यह गुरु पंचधा मैत्री से अधिक मित्र है तो कहेंगे कि शनि अधिमित्र क्षेत्री है। इसी प्रकार सब ग्रहों की मैत्री का

विचार करना पड़ता है। मित्र क्षेत्र में ग्रह होने से उसका बल बढ़ेगा और शत्रु क्षेत्र में बल घटेगा। यह सब विचार के लिए मैत्री का उपयोग होता है।

जो ग्रह मित्रक्षेत्री, स्वक्षेत्री, अधिमित्रक्षेत्री या उच्च का हो वह शुभ फल देगा। शत्रुक्षेत्री, अधिशत्रुक्षेत्री या नीच में ग्रह हो तो अनिष्ट (बुरा) फल देगा। इस कारण यह का क्षेत्र जानने के लिए इस लग्नकुंडली से ग्रह क्षेत्र विचार कर नीचे देते हैं।

उपयुक्त लग्नकुंडली के ग्रहों का क्षेत्र विचार

ग्रहसूर्यचंद्रमंगलवृषगुरुशुक्रशनिराहु
क्षेत्रअधि-अधि-मित्रअधि-समअधि-अधि-सम
मित्रगृहीमित्रस्थानीक्षेत्रीमित्रक्षेत्रीगृहीमित्रगृहीमित्रक्षेत्रीक्षेत्री

अध्याय १२

ग्रहों की दृष्टि Aspects of the planets

प्रत्येक भाव राशि या ग्रह पर किस-किस ग्रह की किस प्रकार की दृष्टि है, इसका विचार भी, ग्रहों के फल निर्णय करने के लिए करना पड़ता है, इस कारण ग्रहों की दृष्टि का जानना आवश्यक है।

दृष्टि का स्पष्टीकरण—

जब सूर्य चंद्र होता है तो उसकी किरण तिरछी होने के कारण गर्मी इस जगह पड़ती है। ज्यों-ज्यों सूर्य का अंश बढ़ता है त्यों-त्यों सूर्य का तेज बढ़ता है। जब सूर्य ९०° पर अर्थात् क्षिर पर आजाता है तो उसकी किरणें सामने पड़ने से सूर्य का प्रकाश

१०

१४६ : राशिच ज्योतिष शिक्षा प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड

अधिक बढ़ जाता है अर्थात् उस समय गर्मी बहुत बढ़ जाती है। जब दिन ठलने लगता है तो उसकी किरणें तिरछी पड़ती हैं और प्रभाव कम होते-होते अन्त में लुप्त हो जाता है। उसी प्रकार सब ही ग्रहों का प्रभाव होता है। जिस ग्रह के सामने दूसरा ग्रह होगा उस पर, उस ग्रह पर पूरा प्रभाव पड़ेगा, जब वाजू से होगा तो कम प्रभाव पड़ेगा।

जिस राशि पर कोई ग्रह हो उसके ठीक सामने सातवीं राशि होती है और उस समय दोनों ग्रहों का अन्तर १८०° का रहता है। इस कारण सातवें स्थान पर ग्रह का पूरा प्रभाव पड़ता है, इसी का नाम पूर्ण दृष्टि है। इसी प्रकार शेष दृष्टि में किरणें तिरछी पड़ती हैं। इस कारण उनका प्रभाव कम हो जाता है।

जो ग्रह देखता है उसे ब्रह्मा ग्रह कहते हैं। जिस ग्रह या भाव पर किसी दूसरे ग्रह की दृष्टि पड़ती है उसे दृश्य कहते हैं।

दृष्टि ४ प्रकार की होती है—(१) एक पाद दृष्टि या चौथाई दृष्टि, (२) द्विपाद दृष्टि या अर्द्ध दृष्टि, (३) त्रिपाद दृष्टि या तीन दृष्टि और (४) पूर्ण दृष्टि।

चित्र संख्या ७३ ग्रह की दृष्टि

चित्र संख्या ७३ में बताया है कि किसी ग्रह की अपने स्थान से किसी भाव पर या कितने अन्तर पर किस प्रकार की दृष्टि पड़ रही है। जहाँ दृष्टि नहीं है वहाँ बताया है। इस चित्र में ग्रहों की दृष्टि के प्रकार बतला कर उनकी किरणों का प्रभाव बताया गया है। इस चक्र में भीतर किनारे पर ३०-३०° की एक-एक राशियाँ दी हैं और ग्रह स्थान से अन्तर अंगों में बताया है। चक्र के ऊपर भी १२ भाव या स्थान दिये हैं। इससे प्रगट होगा कि ग्रह स्थान से कौन से स्थान पर या कितने राशि अन्तर पर किस प्रकार की दृष्टि होती है।

ग्रहों की दृष्टि : १४७

ग्रहों के पहिले, दूसरे, छठवें, ग्यारहवें और बारहवें स्थान पर कोई दृष्टि नहीं होती।

मंगल गुरु और शनि क्रमशः पृथ्वी की परिक्रमा मार्ग की परिधि के बाहर एवं सूर्य से दूर होने के कारण इनकी विशेष दृष्टि का विचार किया गया है।

ग्रह की चार प्रकार की दृष्टि होती हैं—

(१) पूर्ण दृष्टि=१° पुरी=६० कला दृष्टि

(२) त्रिपाद, =पौन दृष्टि=०°-४५' "

(३) द्विपाद, =अर्द्ध, =०-३० "

(४) एकपाद, =पाद, =०-१५ "

(१) पूर्ण दृष्टि—सम्पूर्ण ग्रह अपने स्थान से ( उस समय जिस राशि में वे हैं उस राशि से ) सातवीं राशि या सातवें स्थान पर पूर्ण दृष्टि से देखते हैं। परन्तु मंगल गुरु और शनि की विशेष दृष्टि होने के कारण इनकी अतिरिक्त पूर्ण दृष्टि इस प्रकार भी है। ये अपने स्थान से इन स्थान या राशियों पर भी पूर्ण दृष्टि से देखते हैं—

(१) मंगल ४ और ८ स्थान या राशि पर

(२) गुरु ५ और ९ " " "

(३) शनि ३ और १० " " "

(२) त्रिपाद दृष्टि=मंगल को छोड़कर सब ग्रह अपने स्थान से ४ और ८ स्थान या राशि पर त्रिपाद दृष्टि से देखते हैं। मंगल की त्रिपाद दृष्टि नहीं होती, क्योंकि यही दृष्टि मंगल की पूर्ण दृष्टि हो जाती है।

(३) द्विपाद दृष्टि=गुरु को छोड़ कर शेष सब ग्रह अपने स्थान से ५ और ९ स्थान या राशि पर द्विपाद दृष्टि से देखते हैं। गुरु की द्विपाद दृष्टि नहीं होती, क्योंकि यही गुरु की पूर्ण दृष्टि है।

(४) एकपाद दृष्टि=शनि के सिवाय सब ग्रह अपने स्थान या राशि से ३ और १० स्थान या राशि को एकपाद दृष्टि से देखते हैं। शनि की एकपाद दृष्टि नहीं होती, क्योंकि यह शनि की पूर्ण दृष्टि है।

दृष्टिचक्र

दृष्टिसू. च. बु. श. रा.मंगलगुरुशनिभरतार राहुशुभ्य दृष्टि
पूर्ण दृष्टि७ वां स्थान७,४,८७,५,५७,३,१०५,७,९,१२१,२,६,११,१२
त्रिपाद "४,८४,८४,८
द्विपाद "५,९५,९५,९३,९
एकपाद "३,१०३,१०३,१०२,१०कन्या का=
अन्धा होता है।

चारों प्रकार की दृष्टि में पूर्ण दृष्टि का ही विशेष प्रभाव पड़ता है, केतु की दृष्टि नहीं होती।

१४८ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड

• ग्रह जिस स्थान में पूर्ण दृष्टि से देखता है वह स्थान पूर्ण फल देता है। उदाहरण देकर ग्रहों की दृष्टि विचारना आगे समझाते हैं।

इस कुण्डली में मंगल चतुर्थ भाव में है ७, ४, ८, ९ स्थान पर इसकी पूर्ण दृष्टि होती है। मंगल में सातवें स्थान पर सिंह राशि दशम भाव पर है, चौथे स्थान में वृष

राशि सप्तम भाव में है जहाँ बुध शनि बैठे हैं। मंगल से अष्टम में कन्या राशि एकादश भाव में है। इस कारण सप्तम दशम और एकादश भाव पर और बुध शनि ग्रहों पर मंगल की पूर्ण दृष्टि पड़ रही है। इसी प्रकार सब ग्रहों की दृष्टि का विचार करना। दृष्टि का स्थान गिनते

समय जिस स्थान पर ग्रह हो उस स्थान को एक गिनना चाहिये। जैसे सूर्य की एकपाद दृष्टि तीसरे स्थान पर विचारना है तो सूर्य के स्थान मेघ को १ गिना तो तीसरे स्थान में अष्टम भाव आया जहाँ चं. गु. श. हैं, जिन पर सूर्य की एकपाद दृष्टि पड़ रही है।

आगे इसी कुण्डली का दृष्टिचक्र अभ्यास के लिए दिया है। इस चक्र में पूर्ण दृष्टि १° की अर्थात् ६० कला की बताई गई है। इसी प्रकार पौन दृष्टि ४५', अर्द्ध दृष्टि ३०' और पाव दृष्टि १५' की दी गई है, इस पर से दृष्टि समझ लेना।

इस चक्र के देखने से समझ में आ जायेगा कि सूर्य की पूर्ण दृष्टि बारहवें भाव और तुला राशि पर है, पौन दृष्टि लगन व वृषिचक राशि और नवम स्थान की कर्क राशि पर है, अर्द्ध दृष्टि द्वितीय स्थान की धनु राशि और दशम भाव की सिंह राशि पर है, पाव दृष्टि तृतीय स्थान की मकर राशि और अष्टम स्थान की मियुन राशि पर है शेष राशियों पर कोई दृष्टि नहीं है। सूर्य की एकपाद दृष्टि श. चं. गु. पर भी पड़ती है जो सप्तम स्थान में वृष राशि पर बैठे हैं और अष्टम भाव में हैं। राहु पर पौन दृष्टि है जो नवम भाव में कर्क राशि पर है। केतु पर सूर्य की पाव दृष्टि है जो तृतीय भाव में मकर राशि पर बैठे हैं और किसी ग्रह पर सूर्य की दृष्टि नहीं पड़ती। इसी प्रकार चक्र के अनुसार शेष ग्रहों की दृष्टि का विचार करना। यहाँ पर देखने वाला सूर्य ग्रह ब्रह्मा है और शु. चं. गु. जिनपर सूर्य की दृष्टि पड़ती है वे दृश्य हैं। कोई ग्रह किसी भाव या दूसरे भाव को देखता है तो कहते हैं कि उस ग्रह की दृष्टि अमुक ग्रह या भाव पर है।

ग्रन्थों की दृष्टि : १४९

कुण्डली का दृष्टि चक्र—

ग्रह व भाव जिन पर ग्रहों की दृष्टि पड़ती है ।

कुण्डलीग्रह व भाव जिन पर ग्रहों की दृष्टि पड़ती है ।
भावलग्न
राशि
ग्रह
द्रष्टा ग्रह
१—सूर्यकला
२—चन्द्र"
३—मंगल"
४—बुध"
५—गुरु"
६—शुक्र"
७—शनि"
८—यादु"

१५० : संचित्र ज्योतिष शिक्षा. प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड

कालात्मक दृष्टि=६०' = १° पूर्ण, ४५' = ३/४, ३०' = ३/४, १५' = ३/४ दृष्टि ।

इन चारों प्रकार की दृष्टि में केवल पूर्ण दृष्टि का ही विचार होता है, क्योंकि उसका फल पूर्ण रूप से अनुभव में आता है । शेष दृष्टि उपयोगी नहीं हैं, क्योंकि उनका फल निश्चित नहीं होता । प्रहों का दृष्टिवल निकालने में चारों प्रकार की दृष्टि का काम पड़ता है ।

दीप्तांश Orbs of the planets

जब ब्रह्मा ग्रह ( देखने-वाला ) और दृश्यग्रह ( जिसपर दृष्टि पड़ रही हो ) इन दोनों में थोड़ा ही अंश का अन्तर हो या अंश साम्य हो तो उनकी दृष्टि होना समझी जायगी । जैसे वृष के २ अंश पर कोई ग्रह हो और दूसरा ग्रह उससे सातवें घर में वृश्चिक राशि के २° पर हो, अर्थात् दोनों में पू०=६०° का अन्तर हो तो कहेंगे कि वह ग्रह पूर्ण दृष्टि से देखता है । परन्तु दूसरा ग्रह वृश्चिक के २८° पर हो तो पूर्ण दृष्टि है ऐसा कहना ठीक नहीं, क्योंकि दोनों में २०६° का अन्तर पड़ जाता है । वृष राशि के किसी भी अंश पर ब्रह्मा ग्रह हो और दृश्य ग्रह सप्तम स्थान में जहाँ वृश्चिक राशि है उसके कितने ही अंश पर हो तो भी पूर्ण दृष्टि से देखता है ऐसा कहना ठीक नहीं है । किसी भाव या ग्रह पर दृष्टि करने वाला ग्रह उसी अंश साम्य पर देखना चाहिए तब पूर्ण दृष्टि समझी जायेगी चाहे वह ब्रह्मा ग्रह भाव के बीच में क्यों न हो । आगे पीछे दृष्टि हुई तो निष्फल होती है ।

इस कारण दोनों ब्रह्मा और दृश्य ग्रह की दृष्टि किसी विशेष अंश के भीतर होना चाहिए जिससे वह दृष्टि प्रभावशाली होती है । प्रत्येक ग्रह की दृष्टि का कुछ विशेषअन्तर नियुक्त है जिसके भीतर दृष्टि रहने से वह दृष्टि प्रभावशाली समझी जाती है और इस अन्तर का विचार अंशों में होता है । इन अंशों के अन्तर को दीप्तांश कहते हैं । अर्थात् दो या अधिक ग्रह जो एक दूसरे पर दृष्टि योग करते हैं तब वे ग्रह, दृष्टि योग करने के पूर्व किसी विशेष अंशों के भीतर एक दूसरे पर प्रभाव डालने में समर्थ होते हैं उस अन्तर को दीप्तांश कहते हैं । दीप्तांश चक्र—

ग्रहसूर्यचंद्रमंगलबुधशुक्रशुक्रशनि
दीप्तांश१५१२

ब्रह्मा ग्रह की दृष्टि इन दीप्तांशों के भीतर ही दृश्य ग्रह पर उसके आगे पीछे हो तो कहेंगे कि दृष्टि दीप्तांश के भीतर है । ऐसी दृष्टि का विशेष फल होता है । यदि इन दीप्तांशों के अधिक आगे या पीछे दृश्य ग्रह हो तो फल मध्यम होगा । इसका उदाहरण देकर समझाते हैं ।

ग्रहों की दृष्टि : १५१

मान लो सूर्य वृष के १५° पर है और चन्द्र तुला के २८° पर है। वृष से तुला ६ राशि अन्तर पर अर्थात् सातवें स्थान पर होने से सूर्य की पूर्ण दृष्टि हो जाती है। अब देखना है कि इनकी दृष्टि दीर्घांश के भीतर है या नहीं। इसके लिए दोनों के अंश देखा। दोनों के अंशों में (२८-१५)=१३° का अन्तर है। सूर्य का दीर्घांश १५ है तो यह अन्तर १३ दीर्घांश के भीतर है, तो कहेंगे कि सूर्य की दृष्टि चन्द्र पर दीर्घांश के भीतर है। इसका कारण पूर्ण दृष्टि का पूरा फल होगा। ऊपर जो दृष्टि कोण के दीर्घांश बताये गये हैं वे इसी प्रकार विचारे जाते हैं।

युति Conjunction=जब-जब यह एक ही राशि पर और एक ही अंश पर हो तो वह युति दृष्टि योग कहलाता है। यदि दीर्घांश के अनुसार उसमें ८-१० अंश से अधिक अन्तर पड़ जायगा तो वह युति योग प्रभाव पूर्ण नहीं होगा।

पाश्चात्य पद्धति से दृष्टि विचार

जिस ग्रह या भाव की दृष्टि निकालना है तो दोनों का अंशों में अन्तर निकालो और उस अन्तर के अनुसार दृष्टि का फल विचार करो। द्रष्टा और दृश्य इन दोनों के बीच में अंशों का न्यूनाधिक अन्त होने पर उस अन्तर के अनुसार दृष्टि का विशेष नाम होता है और दृष्टि योग से फल का अनुभव उसी के अनुसार होता है। यह दृष्टि का शुभाशुभ फल उसी दृष्टि के अनुसार होगा।

यह विचार नहीं रखना चाहिए कि देखने वाला ग्रह शुभ होगा तो सदा शुभ फल देगा या पाप ग्रह होगा तो सदा अशुभ फल देगा। कभी-कभी अशुभ दृष्टि योग से शुभ ग्रह भी अशुभ फल देते हैं और अशुभ ग्रह शुभ फल देते हैं।

पाश्चात्य लोग कोई ग्रह बिलकुल शुभ या अशुभ है ऐसा नहीं मानते, परन्तु दृष्टि योग से शुभाशुभ फल देना मानते हैं। जैसा गुरु यह शुभ ग्रह है उसका सम्बन्ध चंद्र के साथ होने से अति शुभ फल देगा, इसके विरुद्ध शनि ये पाप ग्रह है सूर्य या चंद्र के साथ शुभ दृष्टि योग करने से शुभ फल देता है। इस कारण योररोपीय जातक ग्रंथों के आधार पर यहाँ दृष्टि योग समझाते हैं, जिसमें यह भी बताया है कि कौन दृष्टि योग शुभ या अशुभ है। दृष्टि योग सूचक संकेत के चिह्न भी दिये हैं, क्योंकि अंग्रेजी पंचाङ्कों में केवल दृष्टि योग के चिह्न ही दिये रहते हैं।

१५२ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड

दृष्टियोगग्रहों का अन्तरफलचिह्नदीर्घांश
दृष्टियोग नामराशि या अंश
१-साई केन्द्रयोग
Semi Square or
Semi Quartile१३=४५अशुभ∠ या
S □२-३ अंश
२-द्विरेकादश (द्विराश्यंतर)
Sextile२=६०शुभ* या
  • | २-३ ३-केन्द्र (वर्तुलपाद) Square | ३=९० | अति शुभ | □ | ४-५ ४-त्रिकोण (नवम-पंचम) Trine | ४=१२० | अति शुभ | △ | ४-५ ५-साई चतुष्टय राश्यंतर Sesqui quadrate | ४३=१३५ | अशुभ | ⊥ या ⊠ | २-३ ६-षड्स्क Quincunx | ५=१५० | अशुभ | ∇ या ∟ | २-३ ७-पूर्ण दृष्टियोग ( प्रतियोग ) प्रतियुति (सप्तम दृष्टि) Opposition | ६=१८० | अशुभ | ⊙ या ⊗ | ८-१० ८-युति दृष्टियोग ( युति योग ) Conjunction | ० राशि अंश | युति करने वाले ग्रह के शुभाशुभ | ⊙ | ८-१० | समान | धर्म पर अवल- म्बित है | | ९-एक राश्यंतर युति Semi Sextile | १=३० | सदा अच्छा | ∨ या S * | २-३ Semi Quintile | | | | १०-चक्र दशमांश Quintile | १३=३३ | | ⊥ | २-३ ११-चक्र पंचमांश Biquintile | २३=७२ | कुछ अच्छा | Q | २-३ १२-चक्र साई द्वितीयंश | ४३=१४४ | " | ± | २-३ १३-समकांति दृष्टियोग Parallel or Declination | जब नाईवृत्त युति से बराबर कांति समान अन्तर पर हो | | P | २

ग्रहों की दृष्टि : १५१

इन ग्रहों का योग अच्छा है—

(१) गुरु का—नेप. हर्षल. श. सृ. बु. या चं. के साथ अच्छा है।

(२) शुक्र का—बुध या चंद्र से योग अच्छा है।

(३) वृष—चंद्र का भी योग अच्छा है।

(४) शेष ग्रहों का योग कम या अधिक, स्थिति के अनुसार हानि कारक है।

युति योग—रवि-गुरु, गुरु-चंद्र, चंद्र-बुध, चंद्र-शुक्र, रवि-शुक्र इनकी युति अच्छी मानी जाती है।

जब २ या अधिक ग्रह एक राशि में जितने पास-पास हों उतना ही अधिक युति का प्रभाव होता है। जैसे वृष के ४° पर गुरु है और मेष के २६° पर सूर्य है। यहाँ सूर्य गुरु के पास जा रहा है उस समय वह संयोगी applying or approaching कहलायेगा। जब सूर्य गुरु के पास मिलकर उसके आगे बढ़ेगा अर्थात् गुरु के अंश से सूर्य के अंश अधिक बढ़ने लगे तब सूर्यवियोगी Separating ग्रह कहलायेगा। जब ग्रह वियोगी होता है तो वह संयोगी अवस्था से अधिक शक्तिशाली होता है। मान लो गुरु वृष के ४ अंश पर है और सूर्य वृष से १२° पर है तो गुरु और सूर्य का युत योग का अधिक प्रभाव पड़ेगा, क्योंकि वह वियोगी (उससे दूर हटने की) अवस्था है।

क्रांतिसाम्य दृष्टियोग

जब दोनों ग्रहों की स्पष्ट क्रांति (चाहे दोनों की क्रांति एक दिशा में या भिन्न दिशा में हो) अंशादि में समान आ जावे, उस समय क्रांति साम्य दृष्टियोग होता है। इसका परिणाम युति के परिणाम से भी अधिक महत्व का समझा जाता है।

प्रति योग—जयुष ग्रह की अयुष दृष्टि हो तो विशेष अयुष दायक होती है। ग्रहों का योग इस प्रकार विचार किया जाता है :—

(१) चंद्र का—सब ग्रहों के साथ, क्योंकि यह शक्तिशाली है।

(२) वृष का—शु. सृ. मं. गु. श. हर्षल और नेपच्यून के साथ।

(३) शुक्र का—सृ. मं. गु. श. ह. और ने. के साथ

(४) सूर्य का—मं. गु. श. ह. और ने. "

(५) मंगल का—गु. श. ह. और ने. "

(६) गुरु का—श. ह. और ने. "

(७) शनि का—ह. और ने. "

(८) हर्षल का—ने. "

(९) नेपच्यून का किसी भी ग्रह के साथ योग नहीं होता क्योंकि वह सबसे कम चलने वाला है।

१४४ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड

अपवाद— वक्की ग्रह का दूसरे ग्रहों के साथ योग हो सकता है। हर्षल जब वक्की होता है तब उसका योग किसी भी ग्रह के साथ या चन्द्र के साथ भी हो सकता है।

पाश्वत्या मत्त से ग्रहों के दीप्तांश।

( १ ) बु. गु. शु. श. ह.—जब संयोगी हों=६°, वियोगी में ८° दीप्तांश। मान लो शुक्र शनि का युति योग है। यह योग संयोगी है, जब शुक्र शनि से ६° अन्तर पर होगा तो उस दृष्टि का प्रभाव होगा और दोनों का योग होकर शुक्र ८° चला जायगा तब तक इसका प्रभाव रहेगा। इसी प्रकार सब ग्रहों का विचारना।

( २ ) सूर्य का दीप्तांश अधिक है, संयोगी में १२° और वियोगी में १७° है। ये दीप्तांश केवल युतियोग, द्विराशि अन्तर योग, त्रिकोण योग और प्रतियोग में विचारना।

( ३ ) छोटे-छोटे दृष्टि योगों के दीप्तांश।

( १ ) एक राशि अन्तरयोग, ७२° अन्तरयोग, १४४° अन्तरयोग में संयोगी में २° और वियोगी में ३°

( २ ) साढ़े केन्द्रयोग, साढ़े चतुष्टयराश्यंतरयोग में, संयोगी ३°, वियोगी ४°

( ३ ) सूर्य और चन्द्र के दृष्टि योग में इन दीप्तांशों से १° और अधिक लेना।

( ४ ) सम क्रान्तियोग में २° से अधिक नहीं लेना। मान लो मंगल की क्रान्ति १३° उत्तर और शनि की ११° दक्षिण है तो इन दोनों का सम क्रान्तियोग हुआ। इसी प्रकार भाव के भी दीप्तांश होते हैं।

ग्रहों का परिचय : १५५

अध्याय २६

ग्रहों का परिचय

क्रम ग्रह सूर्यं से सूयंकी अपनी पृथ्वी से पृथ्वी से कितने मध्यम

अन्तर परिक्रमा धुरी पर कितने लाख मील दूर है व्यास

मील का समय घूमने का गुना मील में

लाख में समय बड़ा है बड़ा अन्तर छोटा

अन्तर

१ सूयं ० ० २५३ दिन ३००० ९३- ९.८ ८६००००

२ बुध ३५७ ८७.९७ दिन २४ घं. ६ मि. बे, १३६९ ४७० २९९२

३ शुक्र ६६८ २२४.७० दि. २३३ घं. ०.९ १६१० २३६ ७६६०

४ पृथ्वी ९२३ ३६५.९८ दि. २४ घं. १ ० ० ७९१८

घं. मि. से.

५ मंगल १४७ ६८६.९८ दि. २४-३७-२२ ०.१५ २४७६ ३३८ ४२११

६ गुरु ४८२२ ११८६ वर्ष १० घं. १२८१ ५९७२ ३६३२ ८६०००

७ शनि ८८५० २९.४६ वर्ष १०३ घं. ७०६ १०२३६ ७३७३ ७०५००

८ हर्शल १७७१० ८४.२ वर्षे १० घं. ३८ मि. ६४ १९४६६ १५९५४ ३१७००

९ नेप. २७७५० १६४.७८ १० घं ४९ मिः 5३ २८९२८ २६५७३ ३४५००

वषं

१० चंद्र ० पृथ्वी की २७३ दिन डँ २४० २२१ २०००मील

परिक्रमा हजार

२९-५३ दि.

ग्रहों का आकार और परिक्रमा मार्ग एक दूसरे से मिलान करने के लिए सूयं का

व्यास २ फुट मान कर उसी अनुपात से प्रत्येक ग्रहों का आकार और परिक्रमा मार्ग

का व्यास नौचे चक्र में समझाया है । चित्र संख्या ३ भी देखो ।

ग्रह बुध शुक्र पृथ्वी मंगल गुरु शनि हर्शल नेपच्यून

वृत्त (मार्ग) का १६४ २८४ ४३० ६५४ ३ मील € मील १॥ मील २॥ मील

व्यास फुट फ़ुट फुट फुट आकार राई का मटर बडा बड़े मामूली छोटी मामूली बड़ा

दाना बटांना अल्पीन सन्तरा नारंगी बेर बेर

का सिर

पृथ्वी की सूर्य से दूरी वास्तव में ९ करोड़ से कुछ अधिक है। यह लम्बाई ऊपर

बताये क्रम से अनुमान करने पर ४३० फुट का आधा २१५ फुट हुआ । सूयं की दूरी

१५६ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड

इस प्रकार अनुमान कर सकते हैं कि १ रेलागाड़ी प्रति घण्टे ३० मील के हिसाब से पृथ्वी से चले तो ३३६ वर्ष में वह सूर्य के पास पहुँचेगी।

मंगल और गुरु के बीच सूर्य की परिक्रमा करते हुए और भी कई छोटे-छोटे ग्रह हैं। यदि उन को भी उपर्युक्त अनुपात से लघु आकार में समझने के लिए विचार करो तो व्यास १००० से १२०० फुट के भीतर लगभग ४० दाने रेत के बराबर हैं। छोटे-छोटे तो और भी अधिक हैं।

सूर्य से इतर ग्रहों की दूरी आदि का अनुमान करने से प्रगट हो जायगा कि जिस ग्रह का छोटा चेरा है वह भी ग्रह परिक्रमा पूरी कर लेता है और जिसका परिक्रमा-मार्ग बड़ा है उसे परिक्रमा पूरी करने में अधिक समय लगता है।

किसी ग्रह का परिक्रमा-मार्ग कितना ही छोटा या बड़ा हो परन्तु ३६०° में हँ मार्ग बटा रहता है जिसमें १२ राशियाँ होती हैं।

ग्रहों के भिन्न-भिन्न नाम—

यहाँ ग्रहों के मुख्य-मुख्य नाम संक्षेप में दिये हैं।

१ सूर्य=रवि, भानु, भास्कर, हेलि, भानुकर, भानुमान्, दीप्तरेषम, चंडाशु, अहस्कर

२ चन्द्र=सोम, शीतरषिम, मन्त्र, शीताशु, मृगांक, ग्ली, कलेश, चन्द्रमा।

३ मंगल=कुज, शोम, शूर, वक्र, लोहितान्, पापी, आर, आवनेय।

४ बुध=चन्द्रपुत्र, ज्ञ, चित्तु, सौम्य, चान्द्र, बोधन, शान्त, श्यामयात्र, अतिदीर्घ।

५ गुरु=बृहस्पति, जीव, अंगिरा, देवगुरु, वाचस्पति, ईज्य, प्रशान्त, निर्वेशशर्वध।

६ शुक्र=भृगु, सित, वैश्यगुरु, उत्तान, भार्गवसूनु, काण, कवि, अचल।

७ शनि=अर्कपुत्र, छायात्मज, यम, सौरि, असित, नील, पंगु, कोण।

८ राहु=कूर, कृष्णांग, तम, अशुर, संहिकेय, कपिलाक्ष, दीर्घ, अगु, स्वर्मानु, विद्युदुद।

९ केतु=शिशि, ध्वज, शनिसुत, यमाल्मज, प्राणहर, अतिपापी, गुलिक, मादि।

१० दृष्टल=यूरनेत्र, वारुणी, प्रजापति।

११ नेपच्यून=वरुण।

अध्याय ३०

ग्रह-गुणधर्म

जिस प्रकार राशियों के गुणधर्म बता चुके हैं उसी प्रकार प्रत्येक ग्रह के गुणधर्म हैं। इनके अध्ययन करने से प्रगट होगा कि इन ग्रहों से क्या-क्या गुण प्रगट होते हैं, और ये ग्रह किस प्रकार प्रभाव उत्पन्न करते हैं और उनसे क्या-क्या विचारा जा

ग्रह गुणधर्म : १४७

सकता है। ये ग्रह किस धातु से सम्बन्ध रखते हैं, उनका तत्व क्या है, गुण कैसा है किस प्रकार की पीड़ा करते हैं, कहीं पीड़ा करते हैं, कौन ग्रह किस कुटुम्बी का सूचक है, किस दशा में विशेष प्रभाव करते हैं, इत्यादि बातें आगे दिए हुए चक्र से प्रगट होंगी।

इन सब बातों का विचार कर फल अनुमान करना होता है। जैसे चोरी के प्रश्न में विचार करना है, तो चोर की कौन जाति होगी, क्या अवस्था होगी, माल किस प्रकार के स्थान में रखा होगा इत्यादि बातें राशि और ग्रह गुणधर्म के अनुसार विचार करना पड़ता है। ग्रह शरीर के किस स्थान पर, किस तत्व का प्रभाव, किस धातु द्वारा करता है या आजीविका किसके द्वारा मिलेगी। वह ग्रह कैसे दोष उत्पन्न करेगा, किस अंग में पीड़ा करेगा इत्यादि बातें ग्रह की स्थिति के अनुसार बुद्धि से विचारना पड़ता है।

ग्रह के गुणधर्म का उपयोग फल विचारने में काम आता है। फलित विषय में समय-समय पर इसका उपयोग होगा। इस कारण ग्रहों के गुणधर्म ध्यान में रखना चाहिए।

इनकी शैली आदि के सम्बन्ध में इस प्रकार भी विचार होता है—तत्व का योग—वायु ( शनि ), अग्नि ( मंगल ) और पृथ्वी तत्व ( बुध ) ये एक ही राशि के होने से आधी ( तूफान ) आदि उत्पन्न करते हैं। अग्नि ( मंगल ) और आकाश ( गुरु ) से भूकम्प अग्नि ( सूर्य या मंगल ) और जल तत्व ( चन्द्र या शुक्र ) से वर्षा।

ग्रह गुण धर्मचक्र—

गुणधर्मसूर्यचंद्रमंगलबुधगुरुशुक्रशनिराहुकेतु
शरीरआत्मामनशारीरिकवाणीज्ञानकामदेवदुःखदुःख
(चित्त)शक्ति(विद्या)बुद्धि(सांसा-)(विपत्ति)
(पराक्रम)रिक्मुख
पदवीराजारानीसेनापतियुवराजमन्त्रीमन्त्रीप्यादा(सेवक)

३ | धातु | हड्डी | रक्त | पर्वा | त्वचा | भस्तिष्क | वीर्य | नसं | ---|---|---|---|---|---|---|---|---|--- ४ | तत्व | अग्नि | जल | अग्नि | पृथ्वी | आकाश | जल | वायु | ५ | त्रिदोष | पित्त | कफ | पित्त | सम | सम | कफ | वात | वात | | (प्रकृति) | | | | | | |

वर्ण(रंग)रक्तशुक्लरक्तहरापीतध्वेतकृष्णकृष्णधूम्र
जातिक्षत्रियवैश्यक्षत्रियशूद्रविप्रविप्रशूद्रस्नेहकस्नेहक
अवस्थाबृद्धयुवायुवाबालबृद्धयुवाबृद्धबृद्धबृद्ध
लिंगपुरुषस्त्रीपुरुषनपुंसकपुरुषस्त्रीनपुंसकस्त्रीपुरुष
१०दिशापूर्ववायव्यदक्षिणउत्तरईशानआग्नेयपश्चिमनैऋत्यनक्षत्र

५८ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा- प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड

गुणघमं सूयं चंद्र मंगल बुध गुरु शुक्र शनि राहु केतु

११ गुण सत्त्वगुण सत्त्त० तमो० रजो० सत्त्व? रजो० तमो० तमो०

१२ धातु सुवर्ण कांसा गेर सुवर्ण रत्न रूपा लोह लोह लोह

१३ रस तिक्त लवण कटु कदु मधुर अम्ल तिक्त तिक्त तिक्त

(सबरस) (कषाय)

१४ काल मध्याह्व अपरात्त मध्याह्न पूर्वाह्न पूर्वाह्न अपराह्न संध्या संध्या संध्या

(बली) बली : (रातः) (प्रातः)

१५ स्वभाव स्थिर चर उग्र मिश्र मृदु लघु तीक्ष्ण तीक्ष्ण

१६ भुमि पशुभूमि आद्रेंभू, दग्ध० शमशान ग्राम जल० ऊषर ऊषर ऊषर

१७ पाद चतुष्पद सपं चौपाया पक्षी द्विपद द्विपद पक्षी सपं पक्षौ

(अपद) (मनुष्य)

१८ आकार चौकोन स्थूल चौकोन गोल गोल खंड(अद्धं- दीर्घ दीघं पुच्छ

१९ मणि

चन्द्राकार)

माणिक मोती प्रवाळ पन्ना पुष्पराग हीरा नीलम पिरोजा लसण

२० स्वभाव उम्र सौम्य उग्र शुभ शुभ शुभ पाप पाप पाप

२१ चर

आदि

स्थिर चर चर द्विस्वभाव स्थिर चर पक्षी चर पक्षी

(स्थिर) (स्थिर)

२२ स्थान वन जल वन ग्राम ग्राम ग्राम संधि विवर विवर

२३ „» देव- जल°o अग्नि क्रीड़ा भण्डार शय्या गंज ढेर) विल बिल

स्थान

२४ ग्रहभेद मूलग्रह धातुग्रह धातु जीव० जीव० मूल धातु धातु धातु

२५ ऋतु ग्रीष्म वर्षा ग्रीष्म शरद हेमन्त बसंत शिशिर शिशिर शिशिर

२६ जरू

२७ पीड़ा-

स्थान

शुष्क सजल शुष्क जलराशि जलराशि सजल शुष्क शुष्क शुष्क

में सजल में सजल

सिर या छाती या पीठ हाथ पैर कमर गुप्त घुटना

मुख गला पेट स्थान जांघ

२८ फल अयन में मुहूत॑ दिन ऋतु महीना पक्ष वर्ष

समय

२९ कारक पिता माता भाई मामा संतति स्त्री खच मृत्यु

३० दृष्टि ऊर्ध्वं सम ऊध्वं तिरछी सम तिरछीअधो अधो अघो

ग्रह गुणधर्म : १५९

ग्रहों के कल्पित स्वरूप के चित्र

चित्र संख्या ७४

चित्र संख्या ७५

चित्र संख्या ७६

चित्र संख्या ७७

चित्र संख्या ७८

चित्र संख्या ७९

चित्र संख्या ८०

चित्र संख्या ८१

चित्र संख्या ८२

किस ग्रह से क्या विचारना (संक्षेप में)

१ सूर्य से—आत्मा, पिता, स्वभाव, नीरोगता, सामर्थ्य और लक्ष्मी का विचार ।

२ चन्द्र से—चित्त, माता, प्रसन्नता, बुद्धि, राजा, सर्पति का विचार ।

३ मंगल से—पराक्रम, माई पुत्र, भाई बिरादर, रोग गूण, पृथ्वी ।

४ बुध से—विद्या, विवेक, वाणी, मामा, मित्र दांध्य ।

५ गुरु से—बुद्धि, ज्ञान, पुत्र, धन, शरीर की पुष्टि ।

१६० : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड

६ शुक्र से—कामदेव, स्त्री, वाहन, भूषण, सुख

७ शनि से—आयु, जीवन, मृत्यु का कारण विपत्ति !

८ राहु से—पितामह ( दादा ) का विचार ।

९ केतु से— मातामह ( नाना ) ।

अध्याय ३१

ग्रहों का प्रभाव

१ सूर्य—यह सब ग्रहों से बलवान ग्रह है, क्योंकि यह सब ग्रहों का चालक है और इसी में सब ग्रहों को तेज मिलता है । यह बहुत पद दर्शक, दैवी शक्ति, आत्मा, अर्पन देवता, सरकार राज्य दरबार आदि कार्य का कारक ग्रह है । सब राशियों में बलवान सिंह राशि का स्वामी है । यह कुण्डली में बलवान होता है तो ऐश्वर्य शौर्य, मान, कीर्ति, दैवी व नैसिक सदगुण आरोम्य, अधिकार ये सब प्राप्त होते हैं । रवि के प्रभाव से मनुष्य उदार, सत्य काम की अभिलाषा करने वाला, प्रतिभा सम्पन्न, गरीबों पर दया करने वाला होता है ।

रवि निर्बल होता है तो अभिमानी, अपनी बढ़ाई करने वाला अधिकार का दुश्-पयोग करने वाला होता है । मनुष्य शरीर में हृदय, रक्त का अभिसरण, जीवन शक्ति, हृदय का विकार, पित्त विकार, नेत्र रोग, पेट के नीचे विकार प्रगट करता है ।

२ चन्द्र—यह पृथ्वी का उपग्रह है । इसका प्रभाव कुण्डली में बहुत महत्व का है । जिस प्रमाण से यह बलवान होता है उसी अनुसार दैहिक और मानसिक बल देता है । कर्क राशि का स्वामी है । राशिचक्र में प्रमण करते समय जन्म समय या प्रसन्न काल में यह जिस राशि पर हो उसके अनुसार फल उत्पन्न करता है । जन्म समय जिस राशि पर चन्द्र हो उस राशि के अनुसार स्वभाव मानसिक प्रगल्भता आदि उत्पन्न करता है जिसका जन्म कर्क लगन में हो, लगन में चन्द्र हो तो उस पर अधिक प्रभाव करता है । वह मनोविकार के आधीन रहता है और नवीनता उसे प्रिय होती है, अर्थात् उसकी आयुष्य भर में मनोविकार को प्रधानता रहती है और उसके सम्बन्ध से अच्छे बुरे कार्य का सम्बन्ध जन्म समय के चन्द्र की स्थिति पर अवलम्बित है । चन्द्र का प्रभाव शरीर के पेट स्तन, मेढा, लाला, लालोत्पादक पिंड आदि पर होता है और उस सम्बन्धी विकार उत्पन्न करता है । पूर्ण चन्द्र शुभ होने से अच्छा है शुभ फल देता है, परन्तु क्षीण चन्द्र अशुभ ग्रह समझा जाता है ।