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श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

श्लोक १८-१९ ]

  • साधक-संजीवनी *

८५९

वह आसक्तिसे सर्वथा रहित होता है।

अपने अंशी भगवान्से विमुख होकर भूलसे संसारको अपना मान लेनेसे संसारमें राग हो जाता है और राग होनेसे संसारमें आसक्ति हो जाती है। संसारसे माना हुआ अपनापन सर्वथा मिट जानेसे बुद्धि सम हो जाती है। बुद्धिके सम होनेपर स्वयं आसक्ति रहित हो जाता है।

मार्मिक बात

वास्तवमें जीवमात्रकी भगवान्के प्रति स्वाभाविक अनुरक्ति (प्रेम) है। जबतक संसारके साथ भूलसे माना हुआ अपनेपनका सम्बन्ध है, तबतक वह अनुरक्ति प्रकट नहीं होती, प्रत्युत संसारमें आसक्तिके रूपमें प्रतीत होती है। संसारकी आसक्ति रहते हुए भी वस्तुतः भगवान्की अनुरक्ति मिटती नहीं। अनुरक्तिके प्रकट होते ही आसक्ति (सूर्यका उदय होनेपर अंधकारकी तरह) सर्वथा निवृत्त हो जाती है। ज्यों-ज्यों संसारसे विरक्ति होती है, त्यों-ही-त्यों भगवान्में अनुरक्ति प्रकट होती है। यह नियम है कि आसक्तिको समाप्त करके विरक्ति स्वयं भी उसी प्रकार शान्त हो जाती है, जिस प्रकार लकड़ीको जलाकर अग्नि। इस प्रकार आसक्ति और विरक्तिके न रहनेपर स्वतः-स्वाभाविक अनुरक्ति-(भगवत्प्रेम-) का स्रोत प्रवाहित होने लगता है। इसके लिये किंचिन्मात्र भी कोई उद्योग नहीं करना पड़ता। फिर भक्त सब प्रकारसे भगवान्के पूर्ण समर्पित हो जाता है। उसकी सम्पूर्ण क्रियाएँ भगवान्की प्रियताके लिये ही होती हैं। उससे प्रसन्न होकर भगवान् उस भक्तको अपना प्रेम प्रदान करते हैं। भक्त उस प्रेमको भी भगवान्के ही प्रति लगा देता है। इससे भगवान् और आनन्दित होते हैं तथा पुनः उसे प्रेम प्रदान करते हैं। भक्त पुनः उसे भगवान्के प्रति लगा देता है। इस प्रकार भक्त और भगवान्के बीच प्रतिक्षण वर्धमान प्रेमके आदान-प्रदानकी यह लीला चलती रहती है।

‘तुल्यनिन्दास्तुतिः’ —निन्दा-स्तुति मुख्यतः नामकी होती है। यह भी परकृत क्रिया है। लोग अपने स्वभावके अनुसार भक्तकी निन्दा या स्तुति किया करते हैं। भक्तमें अपने कहलानेवाले नाम और शरीरमें लेशमात्र भी अहंता और ममता नहीं होती। इसलिये निन्दा-स्तुतिका उसपर लेशमात्र भी असर नहीं पड़ता। भक्तका न तो अपनी स्तुति या प्रशंसा करनेवालेके प्रति राग होता है और न निन्दा करनेवालेके प्रति द्वेष ही होता है। उसकी दोनोंमें ही समबुद्धि रहती है। साधारण मनुष्योंके भीतर अपनी प्रशंसाकी कामना रहा

करती है, इसलिये वे अपनी निन्दा सुनकर दुःखका और स्तुति सुनकर सुखका अनुभव करते हैं। इसके विपरीत (अपनी प्रशंसा न चाहनेवाले) साधक पुरुष निन्दा सुनकर सावधान होते हैं और स्तुति सुनकर लज्जित होते हैं। परन्तु नाममें किंचिन्मात्र भी अपनापन न होनेके कारण सिद्ध भक्त इन दोनों भावोंसे रहित होता है अर्थात् निन्दा-स्तुतिमें सम होता है। हाँ, वह भी कभी-कभी लोकसंग्रहके लिये साधककी तरह (निन्दामें सावधान तथा स्तुतिमें लज्जित होनेका) व्यवहार कर सकता है।

भक्तकी सर्वत्र भगवदबुद्धि होनेके कारण भी उसका निन्दा-स्तुति करनेवालोंमें भेदभाव नहीं होता। ऐसा भेदभाव न रहनेसे ही यह प्रतीत होता है कि वह निन्दा-स्तुतिमें सम है।

भक्तके द्वारा अशुभ कर्म तो हो ही नहीं सकते और शुभ-कर्मोंके होनेमें वह केवल भगवान्को हेतु मानता है। फिर भी उसकी कोई निन्दा या स्तुति करे, तो उसके चित्तमें कोई विकार पैदा नहीं होता।

‘मौनी’ —सिद्ध भक्तके द्वारा स्वतः-स्वाभाविक भगवत्स्वरूपका मनन होता रहता है, इसलिये उसको ‘मौनी’ अर्थात् मननशील कहा गया है। अन्तःकरणमें आनेवाली प्रत्येक वृत्तिमें उसको ‘वासुदेवः सर्वम्’ (गीता ७।१९) ‘सब कुछ भगवान् ही हैं’—यही दीखता है। इसलिये उसके द्वारा निरन्तर ही भगवान्का मनन होता है।

यहाँ ‘मौनी’ पदका अर्थ ‘वाणीका मौन रखनेवाला’ नहीं माना जा सकता; क्योंकि ऐसा माननेसे वाणीके द्वारा भक्तिका प्रचार करनेवाले भक्त पुरुष भक्त ही नहीं कहलायेंगे। इसके सिवाय अगर वाणीका मौन रखनेमात्रसे भक्त होना सम्भव होता, तो भक्त होना बहुत ही आसान हो जाता और ऐसे भक्त असंख्य बन जाते; किंतु संसारमें भक्तोंकी संख्या अधिक देखनेमें नहीं आती। इसके सिवाय आसुर स्वभाववाला दम्भी व्यक्ति भी हठपूर्वक वाणीका मौन रख सकता है। परन्तु यहाँ भगवत्प्राप्त सिद्ध भक्तके लक्षण बताये जा रहे हैं। इसलिये यहाँ ‘मौनी’ पदका अर्थ ‘भगवत्स्वरूपका मनन करनेवाला’ ही मानना युक्तिसंगत है।

‘सन्तुष्टो येन केनचित्’ —दूसरे लोगोंको भक्त ‘सन्तुष्टो येन केनचित्’ अर्थात् प्रारब्धानुसार शरीर-निर्वाहके लिये जो कुछ मिल जाय, उसीमें संतुष्ट दीखता है; परन्तु वास्तवमें भक्तकी संतुष्टिका कारण कोई सांसारिक पदार्थ, परिस्थिति आदि नहीं होती। एकमात्र

८५२

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १२ ]

भगवान्में ही प्रेम होनेके कारण वह नित्य-निरन्तर भगवान्में ही संतुष्ट रहता है। इस संतुष्टिके कारण वह संसारको प्रत्येक अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितिमें सम रहता है; क्योंकि उसके अनुभवमें प्रत्येक अनुकूल या प्रतिकूल परिस्थिति भगवान्के मंगलमय विधानसे ही आती है। इस प्रकार प्रत्येक परिस्थितिमें नित्य-निरन्तर संतुष्ट रहनेके कारण उसे 'सन्तुष्टो येन केनचित्' कहा गया है।

'अनिकेतः'—जिनका कोई निकेत अर्थात् वास-स्थान नहीं है, वे ही 'अनिकेत' हों—ऐसी बात नहीं है। चाहे गृहस्थ हों या साधु-संन्यासी, जिनकी अपने रहनेके स्थानमें ममता-आसक्ति नहीं है, वे सभी 'अनिकेत' हैं। भक्तका रहनेके स्थानमें और शरीर (स्थूल, सूक्ष्म और कारण-शरीर) में लेशमात्र भी अपनापन एवं आसक्ति नहीं होती। इसलिये उसको 'अनिकेतः' कहा गया है।

'स्थिरमतिः'—भक्तकी बुद्धिमें भगवत्तत्त्वकी सत्ता और स्वरूपके विषयमें कोई संशय अथवा विपर्यय (विपरीत ज्ञान) नहीं होता। अतः उसकी बुद्धि भगवत्तत्त्वके ज्ञानसे कभी किसी अवस्थामें विचलित नहीं होती। इसलिये उसको 'स्थिरमतिः' कहा गया है। भगवत्तत्त्वको जाननेके लिये उसको कभी किसी प्रमाण या शास्त्र-विचार, स्वाध्याय आदिकी जरूरत नहीं रहती; क्योंकि वह स्वाभाविकरूपसे भगवत्तत्त्वमें तल्लीन रहता है।

स्थिरबुद्धि होनेमें कामनाएँ ही बाधक होती हैं (गीता— दूसरे अध्यायका चौवालीसवाँ श्लोक)। अतः कामनाओंके त्यागसे ही स्थिरबुद्धि होना सम्भव है (गीता—दूसरे अध्यायका पचपनवाँ श्लोक)। अन्तःकरणमें सांसारिक (संयोगजन्य) सुखकी कामना रहनेसे संसारमें आसक्ति हो जाती है। यह आसक्ति संसारको असत्य या मिथ्या जान लेनेपर भी मिटती नहीं; जैसे—सिनेमामें दीखनेवाले दृश्य- (प्राणी-पदार्थों- ) को मिथ्या जानते हुए भी उसमें आसक्ति हो जाती है अथवा जैसे भूतकालकी बातोंको याद करते समय मानसिक दृष्टिके सामने आनेवाले दृश्यको मिथ्या जानते हुए भी उसमें आसक्ति हो जाती है। अतः जबतक भीतरमें सांसारिक सुखकी कामना है, तबतक संसारको मिथ्या माननेपर भी संसारकी आसक्ति नहीं मिटती। आसक्तिसे संसारकी स्वतन्त्र सत्ता दूढ़ होती है। सांसारिक सुखकी कामना मिटनेपर आसक्ति स्वतः मिट जाती है। आसक्ति मिटनेपर संसारकी स्वतन्त्र सत्ताका अभाव हो जाता है और एक भगवत्तत्त्वमें बुद्धि स्थिर हो

जाती है।

'भक्तिमान्ने प्रियो नरः'—'भक्तिमान्' पदमें 'भक्ति' शब्दके साथ नित्ययोगके अर्थमें 'मनुष्य' प्रत्यय है। इसका तात्पर्य यह है कि मनुष्यमें स्वाभाविकरूपसे 'भक्ति' (भगवत्प्रेम) रहती है। मनुष्यसे भूल यही होती है कि वह भगवान्को छोड़कर संसारकी भक्ति करने लगता है। इसलिये उसे स्वाभाविक रहनेवाली भगवद्भक्तिका रस नहीं मिलता और उसके जीवनमें नीरसता रहती है। सिद्ध भक्त हरदम भक्ति-रसमें तल्लीन रहता है। इसलिये उसको 'भक्तिमान्' कहा गया है। ऐसा भक्तिमान् मनुष्य भगवान्को प्रिय होता है।

'नरः' पद देनेका तात्पर्य है कि भगवान्को प्राप्त करके जिसने अपना मनुष्यजीवन सफल (सार्थक) कर लिया है, वही वास्तवमें नर (मनुष्य) कहलानेयोग्य है। जो मनुष्य-शरीरको पाकर सांसारिक भोग और संग्रहमें ही लगा हुआ है, वह नर (मनुष्य) कहलानेयोग्य नहीं है।

[इन दो श्लोकोंमें भक्तके सदा-सर्वदा समभावमें स्थित रहनेकी बात कही गयी है। शत्रु-मित्र, मान-अपमान, शीत-उष्ण, सुख-दुःख और निन्दा-स्तुति—इन पाँचों द्वन्द्नोंमें समता होनेसे ही साधक पूर्णतः समभावमें स्थित कहा जा सकता है।]

प्रकरण-सम्बन्धी विशेष बात

भगवान्ने पहले प्रकरणके अन्तर्गत तेरहवें-चौदहवें श्लोकोंमें सिद्ध भक्तोंके लक्षणोंका वर्णन करके अन्तमें 'यो मद्भक्तः स मे प्रियः' कहा, दूसरे प्रकरणके अन्तर्गत पन्द्रहवें श्लोकके अन्तमें 'यः स च मे प्रियः' कहा, तीसरे प्रकरणके अन्तर्गत सोलहवें श्लोकके अन्तमें 'यो मद्भक्तः स मे प्रियः' कहा, चौथे प्रकरणके अन्तर्गत सत्रहवें श्लोकके अन्तमें 'भक्तिमान् यः स मे प्रियः' कहा और अन्तिम पाँचवें प्रकरणके अन्तर्गत अठारहवें-उन्नीसवें श्लोकोंके अन्तमें 'भक्तिमान् मे प्रियो नरः' कहा। इस प्रकार भगवान्ने पाँच बार अलग-अलग 'मे प्रियः' पद देकर सिद्ध भक्तोंके लक्षणोंको पाँच भागोंमें विभक्त किया है। इसलिये सात श्लोकोंमें बताये गये सिद्ध भक्तोंके लक्षणोंको एक ही प्रकरणके अन्तर्गत नहीं समझना चाहिये। इसका मुख्य कारण यह है कि यदि यह एक ही प्रकरण होता, तो एक लक्षणको बार-बार न कहकर एक ही बार कहा जाता, और 'मे प्रियः' पद भी एक ही बार कहे जाते।

श्लोक २० ]

  • साधक-संजीवनी *

८५३

पाँचों प्रकरणोंके अन्तर्गत सिद्ध भक्तोंके लक्षणोंमें राग-द्वेष और हर्ष-शोकका अभाव बताया गया है। जैसे, पहले प्रकरणमें 'निर्ममः' पदसे रागका, 'अद्वेष्टा' पदसे द्वेषका और 'समदुःखमुखः' पदसे हर्ष-शोकका अभाव बताया गया है। दूसरे प्रकरणमें 'हर्षामर्षभयोद्वेगैः' पदसे राग-द्वेष और हर्ष-शोकका अभाव बताया गया है। तीसरे प्रकरणमें 'अनपेक्षः' पदसे रागका, 'उदासीनः' पदसे द्वेषका और 'गतव्यथः' पदसे हर्ष-शोकका अभाव बताया गया है। चौथे प्रकरणमें 'न काङ्क्षति' पदोंसे रागका, 'न द्वेष्टि' पदोंसे द्वेषका और 'न ह्व्यति' तथा 'न शोचति' पदोंसे हर्ष-शोकका अभाव बताया गया है। अन्तिम पाँचवें प्रकरणमें 'संगविवर्जितः' पदसे रागका, 'सन्तुष्टः' पदसे एकमात्र भगवान्में ही सन्तुष्ट रहनेके कारण द्वेषका और 'शीतोष्णमुखदुःखेषु समः' पदोंसे हर्ष-शोकका अभाव बताया गया है।

अगर सिद्ध भक्तोंके लक्षण बतानेवाला (सात श्लोकोंका) एक ही प्रकरण होता, तो सिद्ध भक्तमें राग-द्वेष, हर्ष-शोकादि विकारोंके अभावकी बात कहीं शब्दोंसे और कहीं भावसे बार-बार कहनेकी जरूरत नहीं होती। इसी तरह चौदहवें और उन्नीसवें श्लोकमें 'सन्तुष्टः' पदका तथा तेरहवें श्लोकमें 'समदुःखमुखः' और अठारहवें श्लोकमें 'शीतोष्णमुखदुःखेषु समः' पदोंका भी सिद्ध

परिशिष्ट भाव —इन दो श्लोकोंमें भगवान्ने वे ही स्थल दिये हैं, जहाँ समता होनेमें कठिनता आती है। अगर इनमें समता हो जाय तो अन्य जगह समता होनेमें कठिनता नहीं आयेगी। अपनेपर कोई असर न पड़ना 'समता' है। यद्यपि भक्तकी दृष्टिमें भगवान्के सिवाय दूसरी सत्ता है ही नहीं, तथापि दूसरे लोगोंकी दृष्टिमें वह शत्रु और मित्रमें सम दीखता है। शत्रुता-मित्रताका ज्ञान होनेपर भी वह सम रहता है।

'शीतोष्णमुखदुःखेषु' —भक्त शरीरकी अनुकूलता-प्रतिकूलतामें भी सम रहता है और मन-बुद्धिकी अनुकूलता-प्रतिकूलतामें भी सम रहता है। तात्पर्य है कि भक्त शरीरकी अनुकूलता-प्रतिकूलता, इन्द्रियोंकी अनुकूलता-प्रतिकूलता, मनकी अनुकूलता-प्रतिकूलता, बुद्धिकी अनुकूलता-प्रतिकूलता, सिद्धान्तकी अनुकूलता-प्रतिकूलता आदि सब तरहकी अनुकूलता-प्रतिकूलतामें सम रहता है। उसका न तो अनुकूलतामें राग होता है और न प्रतिकूलतामें द्वेष होता है।

'यो मद्भक्तः स मे प्रियः', 'भक्तिमान्मे प्रियो नरः' आदि पदोंका तात्पर्य है कि वे भक्तिके कारण भगवान्को प्रिय हैं, गुणों-(लक्षणों-के) कारण नहीं। गुण मुख्य नहीं हैं, प्रत्युत भक्ति मुख्य है।

सम्बन्ध —पीछेके सात श्लोकोंमें भगवान्ने सिद्ध भक्तोंके कुल उन्तालीस लक्षण बताये। अब आगेके श्लोकमें भगवान् अर्जुनके प्रश्नका स्पष्ट रीतिसे उत्तर देते हैं।

ये तु धर्म्यामृतमिदं यथोक्तं पर्युपासते।

श्रद्धाना मत्परमा भक्तास्तेऽतीव मे प्रियाः ॥ २० ॥

भक्तोंके लक्षणोंमें दो बार प्रयोग हुआ है, जिससे (सिद्ध भक्तोंके लक्षणोंका एक ही प्रकरण माननेसे) पुनरुक्तिका दोष आता है। भगवान्के वचनोंमें पुनरुक्तिका दोष आना सम्भव ही नहीं। अतः सातों श्लोकोंके विषयको एक प्रकरण न मानकर अलग-अलग पाँच प्रकरण मानना ही युक्तिसंगत है।

इस तरह पाँचों प्रकरण स्वतन्त्र (भिन्न-भिन्न) होनेसे किसी एक प्रकरणके भी सब लक्षण जिसमें हों, वही भगवान्का प्रिय भक्त है। प्रत्येक प्रकरणमें सिद्ध भक्तोंके अलग-अलग लक्षण बतानेका कारण यह है कि साधन-पद्धति, प्रारब्ध, वर्ण, आश्रम, देश, काल, परिस्थिति आदिके भेदसे सब भक्तोंकी प्रकृति-(स्वभाव-) में परस्पर थोड़ा-बहुत भेद रहा करता है। हाँ, राग-द्वेष, हर्ष-शोकादि विकारोंका अत्यन्ताभाव एवं समतामें स्थिति और समस्त प्राणियोंके हितमें रति सबकी समान ही होती है।

साधकको अपनी रुचि, विश्वास, योग्यता, स्वभाव आदिके अनुसार जो प्रकरण अपने अनुकूल दिखायी दे, उसीको आदर्श मानकर उसके अनुसार अपना जीवन बनानेमें लग जाना चाहिये। किसी एक प्रकरणके भी यदि पूरे लक्षण अपनेमें न आयें, तो भी साधकको निराश नहीं होना चाहिये। फिर सफलता अवश्यम्भावी है।

८५४

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १२

तु

= परन्तु

भक्ताः

= भक्त

पर्युपासते

= भलीभाँति सेवन

ये

= जो (मुझमें)

इदम्

= इस

करते हैं,

श्रद्दधानाः

= श्रद्धा रखनेवाले

धर्म्यामृतम्

= धर्ममय

ते

= वे

(और)

अमृतका

मे

= मुझे

मत्परमाः

= मेरे परायण

यथा, उक्तम् = जैसा कहा है,

अतीव

= अत्यन्त

हुए

(वैसा ही)

प्रियाः

= प्रिय हैं।

व्याख्या—'ये तु'—यहाँ 'ये' पदसे भगवान्ने उन

साधक भक्तोंका संकेत किया है, जिनके विषयमें अर्जुनने

पहले श्लोकमें प्रश्न करते हुए 'ये' पदका प्रयोग किया

था। उसी प्रश्नके उत्तरमें भगवान्ने दूसरे श्लोकमें सगुणकी

उपासना करनेवाले साधकोंको अपने मतमें ('ये' और 'ते'

पदोंसे) 'युक्ततमाः' बताया था। फिर उसी सगुण-

उपासनाके साधन बताये और फिर सिद्ध भक्तोंके लक्षण

बताकर अब उसी प्रसंगका उपसंहार करते हैं।

यहाँ 'ये' पद उन परम श्रद्धालु भगवत्परायण

साधकोंके लिये आया है। जो सिद्ध भक्तोंके लक्षणोंको

आदर्श मानकर साधन करते हैं।

'तु' पदका प्रयोग प्रकरणको अलग करनेके लिये

किया जाता है। यहाँ सिद्ध भक्तोंके प्रकरणसे साधक

भक्तोंके प्रकरणको अलग करनेके लिये 'तु' पदका प्रयोग

हुआ है। इस पदसे ऐसा प्रतीत होता है कि सिद्ध भक्तोंकी

अपेक्षा साधक भक्त भगवान्को विशेष प्रिय हैं।

'श्रद्दधानाः'—भगवत्प्राप्ति हो जानेके कारण सिद्ध

भक्तोंके लक्षणोंमें श्रद्धाकी बात नहीं आयी; क्योंकि

जबतक नित्यप्राप्त भगवान्का अनुभव नहीं होता, तबतक

श्रद्धाकी जरूरत रहती है। अतः इस पदको श्रद्धालु साधक

भक्तोंका ही वाचक मानना चाहिये। ऐसे श्रद्धालु भक्त

भगवान्के धर्ममय अमृतरूप उपदेशको (जो भगवान्ने

तेरहवेंसे उन्नीसवें श्लोकतक कहा है) भगवत्प्राप्तिके

उद्देश्यसे अपनेमें उतारनेकी चेष्टा किया करते हैं।

यद्यपि भक्तिके साधनमें श्रद्धा और प्रेमका तथा ज्ञानके

साधनमें विवेकका महत्त्व होता है, तथापि इससे यह नहीं

समझना चाहिये कि भक्तिके साधनमें विवेकका और

ज्ञानके साधनमें श्रद्धाका महत्त्व ही नहीं है। वास्तवमें श्रद्धा

और विवेककी सभी साधनोंमें बड़ी आवश्यकता है।

विवेक होनेसे भक्ति-साधनमें तेजी आती है। इसी प्रकार

शास्त्रोंमें तथा परमात्मतत्त्वमें श्रद्धा होनेसे ही ज्ञान-साधनका

पालन हो सकता है। इसलिये भक्ति और ज्ञान दोनों ही

साधनोंमें श्रद्धा और विवेक सहायक हैं।

'मत्परमाः'—साधक भक्तोंका सिद्ध भक्तोंमें अत्यन्त

पूज्यभाव होता है। उनकी सिद्ध भक्तोंके गुणोंमें श्रेष्ठ बुद्धि

होती है। अतः वे उन गुणोंको आदर्श मानकर आदरपूर्वक

उनका अनुसरण करनेके लिये भगवान्के परायण होते हैं।

इस प्रकार भगवान्का चिन्तन करनेसे और भगवान्पर ही

निर्भर रहनेसे वे सब गुण उनमें स्वतः आ जाते हैं।

भगवान्ने ग्यारहवें अध्यायके पचपनवें श्लोकमें

'मत्परमः' पदसे और इसी (बारहवें) अध्यायके छठे

श्लोकमें 'मत्पराः' पदसे अपने परायण होनेकी बात

विशेषरूपसे कहकर अन्तमें पुनः उसी बातको इस

श्लोकमें 'मत्परमाः' पदसे कहा है। इससे सिद्ध होता है

कि भक्तियोगमें भगवत्परायणता मुख्य है। भगवत्परायण

होनेपर भगवत्कृपासे अपने-आप साधन होता है और

असाधन-(साधनके विघ्नों-) का नाश होता है।

'धर्म्यामृतमिदं यथोक्तम्'—सिद्ध भक्तोंके उनतालीस

लक्षणोंके पाँचों प्रकरण धर्ममय अर्थात् धर्मसे ओतप्रोत हैं।

उनमें किंचिन्मात्र भी अधर्मका अंश नहीं है। जिस साधनमें

साधन-विरोधी अंश सर्वथा नहीं होता, वह साधन अमृत-

तुल्य होता है। पहले कहे हुए लक्षण समुदायके धर्ममय

होनेसे तथा उसमें साधन-विरोधी कोई बात न होनेसे ही

उसे 'धर्म्यामृत' संज्ञा दी गयी है।

साधनमें साधन-विरोधी कोई बात न होते हुए भी

जैसा पहले कहा गया है, ठीक वैसा-का-वैसा धर्ममय

अमृतका सेवन तभी सम्भव है, जब साधकका उद्देश्य

किंचिन्मात्र भी धन, मान, बड़ाई, आदर, सत्कार, संग्रह,

सुखभोग आदि न होकर एकमात्र भगवत्प्राप्ति ही हो।

प्रत्येक प्रकरणके सब लक्षण धर्म्यामृत हैं। अतः

साधक जिस प्रकरणके लक्षणोंको आदर्श मानकर साधन

करता है, उसके लिये वही धर्म्यामृत है।

धर्म्यामृतके जो 'अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः....' आदि

लक्षण बताये गये हैं, वे आंशिकरूपसे साधकमात्रमें रहते

हैं और इनके साथ-साथ कुछ दुर्गुण-दुराचार भी रहते हैं।

प्रत्येक प्राणीमें गुण और अवगुण दोनों ही रहते हैं, फिर भी

श्लोक २० ]

  • साधक-संजीवनी *

८५५

अवगुणोंका तो सर्वथा त्याग हो सकता है, पर गुणोंका सर्वथा त्याग नहीं हो सकता। कारण कि साधन और स्वभावके अनुसार सिद्ध पुरुषमें गुणोंका तारतम्य तो रहता है; परन्तु उनमें गुणोंकी कमिरूप अवगुण किंचित्मात्र भी नहीं रहता। गुणोंमें न्यूनाधिकता रहनेसे उनके पाँच विभाग किये गये हैं; परन्तु अवगुण सर्वथा त्याज्य हैं; अतः उनका विभाग हो ही नहीं सकता।

साधक सत्संग तो करता है, पर साथ-ही-साथ कुसंग भी होता रहता है। वह संयम तो करता है, पर साथ-ही-साथ असंयम भी होता रहता है। वह साधन तो करता है, पर साथ-ही-साथ असाधन भी होता रहता है। जबतक साधनके साथ असाधन अथवा गुणोंके साथ अवगुण रहते हैं, तबतक साधककी साधना पूर्ण नहीं होती। कारण कि असाधनके साथ साधन अथवा अवगुणोंके साथ गुण उनमें भी पाये जाते हैं, जो साधक नहीं है। इसके सिवाय जबतक साधनके साथ असाधन अथवा गुणोंके साथ अवगुण रहते हैं, तबतक साधकमें अपने साधन अथवा गुणोंका अभिमान रहता है, जो आसुरी सम्पत्तिका आधार है। इसलिये धर्माभूतका यथोक्त सेवन करनेके लिये कहा गया है। तात्पर्य यह है कि इसका ठीक वैसा ही पालन होना चाहिये, जैसा वर्णन किया गया है। अगर धर्माभूतके सेवनमें दोष (असाधन) भी साथ रहेंगे तो भगवत्प्राप्ति नहीं होगी। अतः इस विषयमें साधकको विशेष सावधान रहना चाहिये। यदि साधनमें किसी कारणवश आंशिकरूपसे कोई दोषमय वृत्ति उत्पन्न हो जाय, तो उसकी अवहेलना न करके तत्परतासे उसे हटानेकी चेष्टा करनी चाहिये। चेष्टा करनेपर भी न हटे, तो व्याकुलतापूर्वक प्रभुसे प्रार्थना करनी चाहिये।

जितने सदगुण, सदाचार, सद्भाव आदि हैं, वे सब-के-सब 'सत्'- (परमात्मा-) के सम्बन्धसे ही होते हैं। इसी प्रकार दुर्गुण, दुराचार, दुर्भाव आदि सब 'असत्' के सम्बन्धसे ही होते हैं। दुराचारी-से-दुराचारी पुरुषमें भी सदगुण-सदाचारका सर्वथा अभाव नहीं होता; क्योंकि 'सत्'- (परमात्मा-) का अंश होनेके कारण जीवमात्रका 'सत्' से नित्यसिद्ध सम्बन्ध है। परमात्मासे सम्बन्ध रहनेके कारण किसी-न-किसी अंशमें उसमें सदगुण-सदाचार रहेंगे ही। परमात्माकी प्राप्ति होनेपर असत्से सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है और दुर्गुण, दुराचार, दुर्भाव आदि सर्वथा नष्ट हो जाते हैं।

सदगुण-सदाचार-सद्भाव भगवान्की सम्पत्ति है। इसलिये

साधक जितना ही भगवान्के सम्मुख अथवा भगवत्परायण होता जायगा, उतने ही अंशमें स्वतः सदगुण-सदाचार-सद्भाव प्रकट होते जायेंगे और दुर्गुण-दुराचार-दुर्भाव नष्ट होते जायेंगे।

राग-द्वेष, हर्ष-शोक, काम-क्रोध आदि अन्तःकरणके विकार हैं, धर्म नहीं (गीता—तेरहवें अध्यायका छठा श्लोक)। धर्मके साथ धर्मका नित्य-सम्बन्ध रहता है। जैसे, सूर्यरूप धर्मके साथ उष्णतारूप धर्मका नित्य-सम्बन्ध रहता है, जो कभी मिट नहीं सकता। अतः धर्मके बिना धर्म तथा धर्मके बिना धर्म नहीं रह सकता। काम-क्रोधादि विकार साधारण मनुष्यमें भी हर समय नहीं रहते, साधन करनेवालेमें कम होते रहते हैं और सिद्ध पुरुषमें तो सर्वथा ही नहीं रहते। यदि ये विकार अन्तःकरणके धर्म होते, तो हर समय एकरूपसे रहते और अन्तःकरण- (धर्म-) के रहते हुए कभी नष्ट नहीं होते। अतः ये अन्तःकरणके धर्म नहीं, प्रत्युत आगन्तुक (आने-जानेवाले) विकार हैं। साधक जैसे-जैसे अपने एकमात्र लक्ष्य भगवान्की ओर बढ़ता है, वैसे-ही-वैसे राग-द्वेषादि विकार मिटते जाते हैं और भगवान्को प्राप्त होनेपर उन विकारोंका अत्यन्ताभाव हो जाता है।

गीतामें जगह-जगह भगवान्ने 'तयोरनं वशमागच्छेत्' (३।३४), 'रागद्वेषवियुक्तैः' (२।६४), 'रागद्वेषौ व्युदस्य' (१८।५१) आदि पदोंसे साधकोंको इन राग-द्वेषादि विकारोंका सर्वथा त्याग करनेके लिये कहा है। यदि ये (राग-द्वेषादि) अन्तःकरणके धर्म होते तो अन्तःकरणके रहते हुए इनका त्याग असम्भव होता और असम्भवको सम्भव बनानेके लिये भगवान् आज्ञा भी कैसे दे सकते थे?

गीतामें सिद्ध महापुरुषोंको राग-द्वेषादि विकारोंसे सर्वथा मुक्त बताया गया है। जैसे, इसी अध्यायके तेरहवें श्लोकसे उनीसवें श्लोकतक जगह-जगह भगवान्ने सिद्ध भक्तोंको राग-द्वेषादि विकारोंसे सर्वथा मुक्त बताया है। इसलिये भी ये विकार ही सिद्ध होते हैं, अन्तःकरणके धर्म नहीं। असत्से सर्वथा विमुख होनेसे उन सिद्ध महापुरुषोंमें ये विकार लेशमात्र भी नहीं रहते। यदि अन्तःकरणमें ये विकार बने रहते, तो फिर वे मुक्त किससे होते?

जिसमें ये विकार लेशमात्र भी नहीं हैं, ऐसे सिद्ध महापुरुषके अन्तःकरणके लक्षणोंको आदर्श मानकर भगवत्प्राप्तिके लिये उनका अनुसरण करनेके लिये भगवान्ने उन लक्षणोंको यहाँ 'धर्माभूतम्' के नामसे सम्बोधित किया है।

८५६

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १२ ]

‘पर्युपासते’—साधक भक्तोंकी दृष्टिमें भगवान्के प्यारे सिद्ध भक्त अत्यन्त श्रद्धास्पद होते हैं। भगवान्की तरफ स्वाभाविक आकर्षण (प्रियता) होनेके कारण उनमें दैवी सम्पत्ति अर्थात् सदगुण (भगवान्के होनेसे) स्वाभाविक ही आ जाते हैं। फिर भी साधकोंका उन सिद्ध महापुरुषोंके गुणोंके प्रति स्वाभाविक आदरभाव होता है और वे उन गुणोंको अपनेमें उतारनेकी चेष्टा करते हैं। यही साधक भक्तोंद्वारा उन गुणोंका अच्छी तरहसे सेवन करना, उनकी अपनाना है।

इसी अध्यायके तेरहवेंसे उन्नीसवें श्लोकतक, सात श्लोकोंमें ‘धर्म्यामृत’ का जिस रूपमें वर्णन किया गया है, उसका ठीक उसी रूपमें श्रद्धापूर्वक अच्छी तरह सेवन करनेके अर्थमें यहाँ ‘पर्युपासते’ पद प्रयुक्त हुआ है। अच्छी तरह सेवन करनेका तात्पर्य यही है कि साधकमें किंचिन्मात्र भी अवगुण नहीं रहने चाहिये। जैसे, साधकमें सम्पूर्ण प्राणियोंके प्रति करुणाका भाव पूर्णरूपसे भले ही न हो, पर उसमें किसी प्राणीके प्रति अकरुणा—(निर्दयता—) का भाव बिलकुल भी नहीं रहना चाहिये। साधकोंमें ये लक्षण सांगोपांग नहीं होते, इसीलिये उनसे इनका सेवन करनेके लिये कहा गया है। सांगोपांग लक्षण होनेपर वे सिद्धकी कोटिमें आ जायेंगे।

साधकमें भगवत्प्राप्तिकी तीव्र उत्कण्ठा और व्याकुलता होनेपर उसके अवगुण अपने—आप नष्ट हो जाते हैं; क्योंकि उत्कण्ठा और व्याकुलता अवगुणोंको खा जाती है तथा उसके द्वारा साधन भी अपने—आप होने लगता है। इस कारण उसको भगवत्प्राप्ति जल्दी और सुगमतासे हो जाती है।

‘भक्तास्तेऽतीव मे प्रियाः’—भक्तिमार्गपर चलनेवाले भगवदाश्रित साधकोंके लिये यहाँ ‘भक्ताः’ पद प्रयुक्त हुआ है।

भगवान्ने ग्यारहवें अध्यायके तिरपनवें श्लोकमें वेदाध्ययन, तप, दान, यज्ञ आदिसे अपने दर्शनकी दुर्लभता बताकर चौवनवें श्लोकमें अनन्यभक्तिसे अपने दर्शनकी सुलभताका

परिशिष्ट भाव —कर्तव्यको ‘धर्म’ कहते हैं। जो धर्मसे विचलित, इधर—उधर नहीं होता, उसको ‘धर्म्य’ कहते हैं। सब कुछ भगवान् ही हैं—इसके समान दूसरा कोई सिद्धान्त है ही नहीं, इसलिये यह ‘धर्म्य’ है (गीता—नवें अध्यायका दूसरा श्लोक)।

श्रद्धा साधकमें होती है। सिद्धमें श्रद्धा नहीं होती, प्रत्युत अनुभव होता है; क्योंकि उसके अनुभवमें एक परमात्माके सिवाय और कुछ है ही नहीं, सब कुछ परमात्मा ही हैं, फिर वह श्रद्धा क्या करे! साधककी दृष्टिमें दूसरी सत्ता रहती है, इसलिये वह उपासना करता है (पर्युपासते) अर्थात् अपना जीवन वैसा बनाता है; परन्तु उसका भाव यह रहता है कि भगवान्के सिवाय अगर कुछ है तो वह भी भगवान्की ही लीला है।

वर्णन किया। फिर पचपनवें श्लोकमें अपने भक्तके लक्षणोंके रूपमें अनन्यभक्तिके स्वरूपका वर्णन किया। इसपर अर्जुनने इसी (बारहवें) अध्यायके पहले श्लोकमें यह प्रश्न किया कि सगुण—साकारके उपासकों और निर्गुण—निराकारके उपासकोंमें श्रेष्ठ कौन है? भगवान्ने दूसरे श्लोकमें इस प्रश्नके उत्तरमें (सगुण—साकारकी उपासना करनेवाले) उन साधकोंको श्रेष्ठ बताया, जो भगवान्में मन लगाकर अत्यन्त श्रद्धापूर्वक उनकी उपासना करते हैं। यहाँ उपसंहारमें उन्हीं साधकोंके लिये ‘भक्ताः’ पद आया है।

उन साधक भक्तोंको भगवान् अपना ‘अत्यन्त प्रिय’ बताते हैं।

सिद्ध भक्तोंको ‘प्रिय’ और साधकोंको ‘अत्यन्त प्रिय’ बतानेके कारण इस प्रकार हैं—

(१) सिद्ध भक्तोंको तो तत्त्वका अनुभव अर्थात् भगवत्प्राप्ति हो चुकी है; किन्तु साधक भक्त भगवत्प्राप्ति न होनेपर भी श्रद्धापूर्वक भगवान्के परायण होते हैं। इसलिये वे भगवान्को अत्यन्त प्रिय होते हैं।

(२) सिद्ध भक्त भगवान्के बड़े पुत्रके समान हैं।

मोरें प्रौढ़ तनय सम ग्यानी।

परन्तु साधक भक्त भगवान्के छोटे, अबोध बालकके समान हैं—

बालक सुत सम दास अमानी॥

(मानस ३। ४३। ४)

छोटा बालक स्वाभाविक ही सबको प्रिय लगता है। इसलिये भगवान्को भी साधक भक्त अत्यन्त प्रिय हैं।

(३) सिद्ध भक्तको तो भगवान् अपने प्रत्यक्ष दर्शन देकर अपनेको ऋणमुक्त मान लेते हैं, पर साधक भक्त तो (प्रत्यक्ष दर्शन न होनेपर भी) सरल विश्वासपूर्वक एकमात्र भगवान्के आश्रित होकर उनकी भक्ति करते हैं। अतः उनको अभीतक अपने प्रत्यक्ष दर्शन न देनेके कारण भगवान् अपनेको उनका ऋणी मानते हैं और इसीलिये उनको अपना अत्यन्त प्रिय कहते हैं।

श्लोक २० ]

  • साधक-संजीवनी *

८५७

दूसरी सत्ताकी मान्यता होते हुए भी साधक भगवान्‌के परायण रहता है और भगवान्‌के सिवाय दूसरा कोई उसका प्रेमास्पद नहीं होता, इसलिये वह भगवान्‌को अत्यन्त प्यारा होता है। जबतक उसको 'सब कुछ भगवान्‌ ही हैं'—इसका अनुभव नहीं होता, तबतक भगवान्‌ उसके ऋणी रहते हैं!

श्रीमद्भागवतमें भगवान्‌ कहते हैं—

यावत् सर्वेषु भूतेषु मद्भावो नोपजायते। तावदेवमुपासीत वाङ्मनःकायवृत्तिभिः ॥

(११ । २९ । १७)

'जबतक सम्पूर्ण प्राणियोंमें मेरा भाव अर्थात् 'सब कुछ परमात्मा ही हैं'—ऐसा वास्तविक भाव न होने लगे, तबतक इस प्रकार मन, वाणी और शरीरकी सभी वृत्तियों-(बर्ताव-) से मेरी उपासना करता रहे।'

सर्व ब्रह्मात्मकं तस्य विद्याऽऽत्ममनीषया। परिश्यनुपरमेत् सर्वतो मुक्तसंशयः ॥

(११ । २९ । १८)

'पूर्वोक्त साधन करनेवाले भक्तका 'सब कुछ परमात्मास्वरूप ही है'—ऐसा निश्चय हो जाता है। फिर वह इस अध्यात्मविद्या (ब्रह्मविद्या) द्वारा सब प्रकारसे संशयरहित होकर सब जगह परमात्माको भलीभाँति देखता हुआ उपराम हो जाय अर्थात् 'सब कुछ परमात्मा ही हैं'—यह चिन्तन भी न रहे, प्रत्युत साक्षात् परमात्मा ही दीखने लगें।'

ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे भक्तियोगो नाम द्वादशोऽध्यायः ॥ १२ ॥

इस प्रकार ॐ, तत्, सत्—इन भगवान्‌नामोंके उच्चारणपूर्वक ब्रह्मविद्या और योगशास्त्रमय श्रीमद्भगवद्गीताउपनिषद्रूप श्रीकृष्णार्जुनसंवादमें 'भक्तियोग' नामक बारहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १२ ॥

इस (बारहवें) अध्यायमें अनेक प्रकारके साधनों-सहित भगवद्भक्तिका वर्णन करके भक्तोंके लक्षण बताये गये हैं और इस अध्यायका उपक्रम तथा उपसंहार भी भगवद्भक्तिमें ही हुआ है। केवल तीसरे, चौथे और पाँचवें—तीन श्लोकोंमें ज्ञानके साधनका वर्णन है, पर वह भी भक्ति और ज्ञानकी परस्पर तुलना करके भक्तिको श्रेष्ठ बताने लिये ही है। इसीलिये इस अध्यायका नाम 'भक्तियोग' रखा गया है।

बारहवें अध्यायके पद, अक्षर और उवाच

बारहवें अध्यायके पद, अक्षर और उवाच

(१) इस अध्यायमें 'अथ द्वादशोऽध्यायः' के तीन, 'अर्जुन उवाच' आदि पदोंके चार, श्लोकोंके दो सौ चौवालीस और पुष्पिकाके तेरह पद हैं। इस प्रकार सम्पूर्ण पदोंका योग दो सौ चौंसठ है।

(२) 'अथ द्वादशोऽध्यायः' के सात, 'अर्जुन उवाच' आदि पदोंके तेरह, श्लोकोंके छ: सौ चालीस और पुष्पिकाके पैंतालीस अक्षर हैं। इस प्रकार सम्पूर्ण अक्षरोंका योग सात सौ पाँच है। इस अध्यायके सभी श्लोक बत्तीस अक्षरोंके हैं।

(३) इस अध्यायमें दो उवाच हैं—'अर्जुन उवाच' और 'श्रीभगवानुवाच'।

बारहवें अध्यायमें प्रयुक्त छन्द

बारहवें अध्यायमें प्रयुक्त छन्द

इस अध्यायके बीस श्लोकोंमेंसे—नवें श्लोकके तृतीय चरणमें 'भगण' प्रयुक्त होनेसे 'भ-विपुला'; उन्नीसवें श्लोकके तृतीय चरणमें 'नगण' प्रयुक्त होनेसे 'न-विपुला'; और बीसवें श्लोकके प्रथम चरणमें 'नगण' तथा तृतीय चरणमें 'भगण' प्रयुक्त होनेसे 'संकीर्ण-विपुला' संज्ञावाले छन्द हैं। शेष सत्रह श्लोक ठीक 'पथ्यावक्त्र' अनुष्टुप् छन्दके लक्षणोंसे युक्त हैं।

गीता

जगन्नाथ

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥

अथ त्रयोदशोऽध्यायः

अवतरणिका—

बारहवें अध्यायके आरम्भमें अर्जुनने पूछा कि आप (सगुण-साकार-)की उपासना करनेवाले और अव्यक्त अक्षर-(निर्गुण-निराकार) की उपासना करनेवाले—इन दोनोंमें कौन श्रेष्ठ हैं? उत्तरमें भगवान्ने अपनी उपासना करनेवालोंको श्रेष्ठ बताया और आगे कहा कि अव्यक्त अक्षरकी उपासना करनेवाले भी मेरेको ही प्राप्त होते हैं; परन्तु देहाभिमान रहनेके कारण उनको उपासनामें कठिनाता अधिक होती है। ऐसा कहकर भगवान्ने सगुण-साकारकी उपासनाका विस्तारसे वर्णन किया। अब अव्यक्त अक्षरकी उपासनाका विस्तारसे वर्णन करनेके लिये और उसमें देहाभिमानरूप मुख्य बाधाको दूर करनेके लिये भगवान् तरहवें अध्यायका विषय आरम्भ करते हैं। सबसे पहले भगवान् क्षेत्र और क्षेत्रज्ञके विवेकका प्रकरण आरम्भ करते हैं।

श्रीभगवानुवाच

इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते। एतद्यो वेत्ति तं प्राहुः क्षेत्रज्ञ इति तद्विदः ॥ १ ॥

श्रीभगवान् बोले—

कौन्तेय= हे कुन्तीपुत्रक्षेत्रम्= 'क्षेत्र'—वेत्ति= जानता है,
अर्जुन!इति= इसतम्= उसको
इदम्= 'यह'-रूपसेअभिधीयते= नामसे कहते हैंतद्विदः= ज्ञानीलोग
कहे(और)क्षेत्रज्ञः= 'क्षेत्रज्ञ'—
जानेवालेएतत्= इस क्षेत्रकोइति= इस नामसे
शरीरम्= शरीरकोयः= जोप्राहुः= कहते हैं।

व्याख्या— ‘इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते’—मनुष्य ‘यह पशु है, यह पक्षी है, यह वृक्ष है’ आदि-आदि भौतिक चीजोंको इदंतासे अर्थात् ‘यह’-रूपसे कहता है और इस शरीरको कभी ‘मैं’-रूपसे तथा कभी ‘मेरा’-रूपसे कहता है। परन्तु वास्तवमें अपना कहलानेवाला शरीर भी इदंतासे कहलानेवाला ही है। चाहे स्थूलशरीर हो, चाहे सूक्ष्मशरीर हो और चाहे कारणशरीर हो, पर वे हैं सभी इदंतासे कहलानेवाले ही।

जो पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश—इन पाँच तत्त्वोंसे बना हुआ है अर्थात् जो माता-पिताके रज-वीर्यसे पैदा होता है, उसको स्थूलशरीर कहते हैं। इसका दूसरा नाम ‘अन्मयकोश’ भी है; क्योंकि यह अन्नेके विकारसे ही पैदा होता है और अन्नेसे ही जीवित रहता है। अतः यह अन्मय, अन्स्वरूप ही है। इन्द्रियाँका विषय होनेसे

यह शरीर ‘इदम्’ (‘यह’) कहा जाता है।

पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ, पाँच प्राण, मन और बुद्धि—इन सत्रह तत्वोंसे बने हुएको सूक्ष्मशरीर कहते हैं। इन सत्रह तत्वोंमेंसे प्राणोंकी प्रधानताको लेकर यह सूक्ष्मशरीर ‘प्राणमयकोश’, मनकी प्रधानताको लेकर यह ‘मनोमयकोश’ और बुद्धिकी प्रधानताको लेकर यह ‘विज्ञानमयकोश’ कहलाता है। ऐसा यह सूक्ष्मशरीर भी अन्तःकरणका विषय होनेसे ‘इदम्’ कहा जाता है।

अज्ञानको कारणशरीर कहते हैं। मनुष्यको बुद्धितकका तो ज्ञान होता है, पर बुद्धिसे आगेका ज्ञान नहीं होता, इसलिये इसे अज्ञान कहते हैं। यह अज्ञान सम्पूर्ण शरीरोंका कारण होनेसे कारणशरीर कहलाता है—‘अज्ञानमेवास्त्य हि मूलकारणम्’ (अध्यात्म०, उत्तर० ५।९)। इस कारण-शरीरको स्वभाव, आदत और प्रकृति भी कह देते हैं और

८६०

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १३ ]

इसीको 'आनन्दमयकोश' भी कह देते हैं। जाग्रत्-अवस्थामें स्थूलशरीरकी प्रधानता होती है और उसमें सूक्ष्म तथा कारणशरीर भी साथमें रहता है। स्वप्न-अवस्थामें सूक्ष्मशरीरकी प्रधानता होती है और उसमें कारणशरीर भी साथमें रहता है। सुषुप्त-अवस्थामें स्थूलशरीरका ज्ञान नहीं रहता, जो कि अन्नमयकोश है और सूक्ष्मशरीरका भी ज्ञान नहीं रहता, जो कि प्राणमय, मनोमय एवं विज्ञानमयकोश है अर्थात् बुद्धि-अविद्या-(अज्ञान-)-में लीन हो जाती है। अतः सुषुप्त-अवस्था कारणशरीरकी होती है। जाग्रत् और स्वप्न-अवस्थामें तो सुख-दुःखका अनुभव होता है, पर सुषुप्त-अवस्थामें दुःखका अनुभव नहीं होता और सुख रहता है। इसलिये कारणशरीरको 'आनन्दमयकोश' कहते हैं। कारणशरीर भी स्वयंका विषय होनेसे, स्वयंके द्वारा जाननेमें आनेवाला होनेसे 'इदम्' कहा जाता है।

उपर्युक्त तीनों शरीरोंको 'शरीर' कहनेका तात्पर्य है कि इनका प्रतिक्षण नाश होता रहता है। इनको कोश कहनेका तात्पर्य है कि जैसे चमड़ेसे बनी हुई थैलीमें तलवार रखनेसे उसकी म्यान संज्ञा हो जाती है, ऐसे ही जीवात्माके द्वारा इन तीनों शरीरोंको अपना माननेसे, अपनेको इनमें रहनेवाला माननेसे इन तीनों शरीरोंकी 'कोश' संज्ञा हो जाती है।

इस शरीरको 'क्षेत्र' कहनेका तात्पर्य है कि यह प्रतिक्षण नष्ट होता, प्रतिक्षण बदलता है। यह इतना जल्दी बदलता है कि इसको दुबारा कोई देख ही नहीं सकता अर्थात् दृष्टि पड़ते ही जिसको देखा, उसको फिर दुबारा नहीं देख सकते; क्योंकि वह तो बदल गया।

शरीरको क्षेत्र कहनेका दूसरा भाव खेतसे है। जैसे खेतमें तरह-तरहके बीज डालकर खेती की जाती है, ऐसे ही इस मनुष्य-शरीरमें अहंता-ममता करके जीव तरह-तरहके कर्म करता है। उन कर्मोंके संस्कार अन्तःकरणमें पड़ते हैं। वे संस्कार जब फलके रूपमें प्रकट होते हैं, तब दूसरा (देवता, पशु-पक्षी, कीट-पतंग आदिका) शरीर मिलता है। जिस प्रकार खेतमें जैसा बीज बोया जाता है, वैसा ही अनाज पैदा होता है, उसी प्रकार इस शरीरमें जैसे कर्म किये जाते हैं, उनके अनुसार ही दूसरे शरीर, परिस्थिति आदि मिलते हैं। तात्पर्य है कि इस शरीरमें किये गये

कर्मोंके अनुसार ही यह जीव बार-बार जन्म-मरणरूप फल भोगता है। इसी दृष्टिसे इसको क्षेत्र (खेत) कहा गया है।

अपने वास्तविक स्वरूपसे अलग दीखनेवाला यह शरीर प्राकृत पदार्थोंसे, क्रियाओंसे, वर्ण-आश्रम आदिसे 'इदम्' (दृश्य) ही है। यह है तो 'इदम्' पर जीवने भूलसे इसको 'अहम्' मान लिया और फँस गया। स्वयं परमात्माका अंश एवं चेतन है, सबसे महान् है। परन्तु जब वह जड़ (दृश्य) पदार्थोंसे अपनी महत्ता मानने लगाता है (जैसे, 'मैं धनी हूँ', 'मैं विद्वान् हूँ' आदि), तब वास्तवमें वह अपनी महत्ता घटाता ही है। इतना ही नहीं, अपनी महान् बेइज्जती करता है; क्योंकि अगर धन, विद्या आदिसे वह अपनेको बड़ा मानता है, तो धन, विद्या आदि ही बड़े हुए। उसका अपना महत्त्व तो कुछ रहा ही नहीं! वास्तवमें देखा जाय तो महत्त्व स्वयंका ही है, नाशवान् और जड़ धनादि पदार्थोंका नहीं; क्योंकि जब स्वयं उन पदार्थोंको स्वीकार करता है, तभी वे महत्त्वशाली दीखते हैं। इसलिये भगवान् 'इदं शरीरं क्षेत्रम्' पदोंसे शरीरादि पदार्थोंको अपनेसे भिन्न 'इदंता' से देखनेके लिये कह रहे हैं।

'एतद्यो वेति'—जीवात्मा इस शरीरको जानता है अर्थात् यह शरीर मेरा है, इन्द्रियाँ मेरी हैं, मन मेरा है, बुद्धि मेरी है, प्राण मेरे हैं—ऐसा मानता है। यह जीवात्मा इस शरीरको कभी 'मैं' कह देता है और कभी 'यह' कह देता है अर्थात् 'मैं शरीर हूँ'—ऐसा भी मान लेता है और 'यह शरीर मेरा है'—ऐसा भी मान लेता है।

इस श्लोकके पूर्वार्धमें शरीरको 'इदम्' पदसे कहा है और उत्तरार्धमें शरीरको 'एतत्' पदसे कहा है। यद्यपि ये दोनों ही पद नजदीकके वाचक हैं, तथापि 'इदम्' की अपेक्षा 'एतत्' पद अत्यन्त नजदीकका वाचक है। अतः यहाँ 'इदम्' पद अंगुलिनिर्दिष्ट शरीर-समुदायका द्योतन करता है और 'एतत्' पद इस शरीरमें जो 'मैं'-पन है, उस मैं-पनका द्योतन करता है।

'तं प्राहुः क्षेत्रज्ञ' इति तद्विदः'—जैसे दूसरे अध्यायके सोलहवें श्लोकमें सत्-असत्के तत्त्वको जानने-वालोंको तत्त्वदर्शी कहा है, ऐसे ही यहाँ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञके तत्त्वको जाननेवालोंको 'तद्विदः' कहा है। क्षेत्र क्या है और क्षेत्रज्ञ क्या है—इसका जिनको बोध हो चुका है, ऐसे तत्त्वज्ञ

१-'शु हिंसायाम्' धातुसे 'शरीर' शब्द बनता है।

२-'क्षि क्षये' धातुसे 'क्षेत्र' शब्द बनता है।

३-यद्यपि 'प्राहुः' क्रियाका कर्म होनेसे 'क्षेत्रज्ञ' शब्दमें द्वितीया विभक्ति होनी चाहिये थी, तथापि आगे 'इति' पद आनेसे अर्थात् 'इति' पदसे उक्त होनेसे 'क्षेत्रज्ञ' शब्दमें प्रथमा विभक्ति हो गयी है।

श्लोक १ ]

  • साधक-संजीवनी *

८६१

महापुरुष इस जीवात्माको 'क्षेत्रज्ञ' नामसे कहते हैं। तात्पर्य है कि क्षेत्रकी तरफ दृष्टि रहनेसे, क्षेत्रके साथ सम्बन्ध रहनेसे ही इस जीवात्माको वे ज्ञानी महापुरुष 'क्षेत्रज्ञ' कहते हैं। अगर यह जीवात्मा क्षेत्रके साथ सम्बन्ध न रखे, तो फिर इसकी 'क्षेत्रज्ञ' संज्ञा नहीं रहेगी, यह परमात्मस्वरूप हो जायगा (गीता—तेरहवें अध्यायका इकतीसवाँ श्लोक)।

मामिक बात

यह नियम है कि जहाँसे बन्धन होता है, वहाँसे खोलनेपर ही (बन्धनसे) छुटकारा हो सकता है। अतः मनुष्यशरीरसे ही बन्धन होता है और मनुष्यशरीरके द्वारा ही बन्धनसे मुक्ति हो सकती है। अगर मनुष्यका अपने शरीरके साथ किसी प्रकारका भी अहंता-ममतारूप सम्बन्ध न रहे, तो वह मात्र संसारसे मुक्त ही है। अतः भगवान् शरीरके साथ माने हुए अहंता-ममतारूप सम्बन्धका विच्छेद करनेके लिये शरीरको 'क्षेत्र' बताकर उसको इदंता-(पृथक्ता-) से देखनेके लिये कह रहे हैं, जो कि वास्तवमें पृथक् है ही।

शरीरको इदंतासे देखना केवल अपना कल्याण चाहने-वाले साधकोंके लिये ही नहीं, प्रत्युत मनुष्यमात्रके लिये परम आवश्यक है। कारण कि अपना उद्धार करनेका अधिकार और अवसर मनुष्यशरीरमें ही है। यही कारण है कि गीताका उपदेश आरम्भ करते ही भगवान्ने सबसे पहले शरीर और शरीरीकी पृथक्ताका वर्णन किया है।

'इदम्' का अर्थ है—'यह' अर्थात् अपनेसे अलग दीखनेवाला। सबसे पहले देखनेमें आता है—पृथ्वी, जल, तेज, वायु तथा आकाशसे बना यह स्थूलशरीर। यह दृश्य है और परिवर्तनशील है। इसको देखनेवाले हैं—नेत्र। जैसे दृश्यमें रंग, आकृति, अवस्था, उपयोग आदि सभी बदलते रहते हैं, पर उनको देखनेवाले नेत्र एक ही रहते हैं, ऐसे ही शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्धरूप विषय भी बदलते रहते हैं, पर उनको जाननेवाले कान, त्वचा, नेत्र, जिह्वा और नासिका एक ही रहते हैं। जैसे नेत्रोंसे ठीक दीखना, कम दीखना और बिलकुल न दीखना—ये नेत्रमें होनेवाले परिवर्तन मनके द्वारा जाने जाते हैं, ऐसे ही कान, त्वचा, जिह्वा और नासिकामें होनेवाले परिवर्तन भी मनके द्वारा जाने जाते हैं। अतः पाँचों ज्ञानेन्द्रियाँ (कान, त्वचा, नेत्र,

जिह्वा और नासिका) भी दृश्य हैं। कभी क्षुब्ध और कभी शान्त, कभी स्थिर और कभी चंचल—ये मनमें होनेवाले परिवर्तन बुद्धिके द्वारा जाने जाते हैं। अतः मन भी दृश्य है। कभी ठीक समझना, कभी कम समझना और कभी बिलकुल न समझना—ये बुद्धिमें होनेवाले परिवर्तन स्वयं (जीवात्मा-) के द्वारा जाने जाते हैं। अतः बुद्धि भी दृश्य है। बुद्धि आदिके द्रष्टा स्वयं-(जीवात्मा-) में कभी परिवर्तन हुआ नहीं, है नहीं, होगा नहीं और होना सम्भव भी नहीं। वह सदा एकरस रहता है; अतः वह कभी किसीका दृश्य नहीं हो सकता*।

इन्द्रियाँ अपने-अपने विषयको तो जान सकती हैं, पर विषय अपनेसे पर (सूक्ष्म, श्रेष्ठ और प्रकाशक) इन्द्रियोंको नहीं जान सकते। इसी तरह इन्द्रियाँ और विषय मनको नहीं जान सकते; मन, इन्द्रियाँ और विषय बुद्धिको नहीं जान सकते; तथा बुद्धि, मन, इन्द्रियाँ और विषय स्वयंको नहीं जान सकते। न जाननेमें मुख्य कारण यह है कि इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि तो सापेक्ष द्रष्टा हैं अर्थात् एक-दूसरेकी सहायतासे केवल अपनेसे स्थूल रूपको देखनेवाले हैं; किन्तु स्वयं (जीवात्मा) शरीर, इन्द्रियाँ, मन और बुद्धिसे अत्यन्त सूक्ष्म और श्रेष्ठ होनेके कारण निरपेक्ष द्रष्टा है अर्थात् दूसरे किसीकी सहायताके बिना खुद ही देखनेवाला है।

उपर्युक्त विवेचनमें यद्यपि इन्द्रियाँ, मन और बुद्धिको भी द्रष्टा कहा गया है, तथापि वहाँ भी यह समझ लेना चाहिये कि स्वयं-(जीवात्मा-) के साथ रहनेपर ही इनके द्वारा देखा जाना सम्भव होता है। कारण कि मन, बुद्धि आदि जड़ प्रकृतिका कार्य होनेसे स्वतन्त्र द्रष्टा नहीं हो सकते। अतः स्वयं ही वास्तविक द्रष्टा है। दृश्य पदार्थ (शरीर), देखनेकी शक्ति (नेत्र, मन, बुद्धि) और देखनेवाला (जीवात्मा)— इन तीनोंमें गुणोंकी भिन्नता होनेपर भी तात्त्विक एकता है। कारण कि तात्त्विक एकताके बिना देखनेका आकर्षण, देखनेकी सामर्थ्य और देखनेकी प्रवृत्ति सिद्ध ही नहीं होती। यहाँ यह शंका हो सकती है कि स्वयं (जीवात्मा) तो चेतन है, फिर वह जड़ बुद्धि आदिको (जिससे उसकी तात्त्विक एकता नहीं है।) कैसे देखता है? इसका समाधान यह है कि स्वयं जड़से तादात्म्य करके जड़के सहित अपनेको 'मैं'

  • रूप दृश्य लोचन दृक् तददृश्य दृक् तु मानसम्। दृश्या धीवृत्तयः साक्षी दृगेव न तु दृश्यते॥ (वाक्यमुष्ठा १)

'सर्वप्रथम नेत्र द्रष्टा हैं और रूप दृश्य है। फिर मन द्रष्टा है और नेत्रादि इन्द्रियाँ दृश्य हैं। फिर बुद्धि द्रष्टा है और मन दृश्य है। अन्तमें बुद्धिकी वृत्तियोंका भी जो द्रष्टा है, वह साक्षी (स्वयंप्रकाश आत्मा) किसीका भी दृश्य नहीं है।'

८६२

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १३ ]

मान लेता है। यह 'मैं' न तो जड़ है और न चेतन ही है। जड़में विशेषता देखकर यह जड़के साथ एक होकर कहता है कि 'मैं धनवान् हूँ; मैं विद्वान् हूँ' आदि; और चेतनमें विशेषता देखकर यह चेतनके साथ एक होकर कहता है कि 'मैं आत्मा हूँ; मैं ब्रह्म हूँ' आदि। यही प्रकृतिस्थ पुरुष है, जो प्रकृतिजन्य गुणोंके संगसे ऊँच-नीच योनियोंमें बार-बार जन्म लेता रहता है (गीता—तेरहवें अध्यायका इक्कीसवाँ श्लोक)। तात्पर्य यह निकला कि प्रकृतिस्थ पुरुषमें जड़ और चेतन—दोनों अंश विद्यमान हैं। चेतनकी रूचि परमात्माकी तरफ जानेकी है; किन्तु भूलसे उसने जड़के साथ तादात्म्य कर लिया। तादात्म्यमें जो जड़-अंश है, उसका आकर्षण

परिशिष्ट भाव—'इदम्' (क्षेत्र) के अन्तर्गत अनन्त ब्रह्माण्ड हैं। अनन्त ब्रह्माण्डोंमें जितने भी शरीर हैं, उनमें 'परा' (जीव) क्षेत्रज्ञ है और 'अपरा' (जगत्) क्षेत्र है। जीव जगत्को जाननेवाला और परमात्माको माननेवाला है। जाननेवाला व्यापक होता है। अतः क्षेत्रज्ञके एक अंशमें अनन्त ब्रह्माण्ड हैं—'येन सर्वमिदं तत्तम्' (गीता २।१७)। साधकको जानना चाहिये कि मैं क्षेत्र नहीं हूँ, प्रत्युत क्षेत्रको जाननेवाला क्षेत्रज्ञ हूँ।

दृश्य द्रष्टाके किसी अंशमें होता है। जैसे, आँखसे सब कुछ देखनेपर भी आँख नहीं भरती। अतः वास्तवमें आँख दृश्यसे भी बड़ी हुई। बुद्धिसे कितनी ही बातें जान लें, पर बुद्धि कभी भरती नहीं, खाली ही रहती है। ज्यों भरते हैं, त्यों खाली होती है। अतः बुद्धि बड़ी हुई। ब्रह्माजीकी उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय भी हमारी बुद्धिके जाननेके अन्तर्गत हैं। स्थूल, सूक्ष्म और कारण सम्पूर्ण शरीर दृश्य हैं। ऐसे ही स्थूल, सूक्ष्म और कारण सम्पूर्ण सृष्टि भी दृश्य है। यह सम्पूर्ण दृश्य द्रष्टा (क्षेत्रज्ञ)-के किसी अंशमें है।

जैसे धनके सम्बन्धसे मनुष्य 'धनवान्' कहलाता है; किन्तु धनका सम्बन्ध न रहनेपर धनवान् (व्यक्ति) तो रहता है, पर उसकी 'धनवान्' संज्ञा नहीं रहती। ऐसे ही क्षेत्रके सम्बन्धसे स्वयं 'क्षेत्रज्ञ' कहलाता है; किन्तु क्षेत्रका सम्बन्ध न रहनेपर क्षेत्रज्ञ (स्वयं) तो रहता है, पर उसकी 'क्षेत्रज्ञ' संज्ञा नहीं रहती। तात्पर्य है कि एक ही चिन्मय तत्त्व (समझनेकी दृष्टिसे) क्षेत्रके सम्बन्धसे क्षेत्रज्ञ, क्षरके सम्बन्धसे अक्षर, शरीरके सम्बन्धसे शरीरी, दृश्यके सम्बन्धसे द्रष्टा, साक्ष्यके सम्बन्धसे साक्षी और करणके सम्बन्धसे कर्ता कहा जाता है। वास्तवमें उस तत्त्वका कोई नाम नहीं है। वह केवल अनुभवरूप है।

सम्बन्ध—उस क्षेत्रज्ञका स्वरूप क्या है—इसको आगेके श्लोकमें बताते हैं।

क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत। क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोरर्जानं यत्तज्ज्ञानं मतं मम ॥ २ ॥

भारत= हे भरतवंशीन्द्रवअपि= हीज्ञानम्= ज्ञान है,
अर्जुन! (तू)विद्धि= समझतत्= वही
सर्वक्षेत्रेषु= सम्पूर्ण क्षेत्रोंमें= औरमम= मेरे
क्षेत्रज्ञम्= क्षेत्रज्ञक्षेत्रक्षेत्रज्ञयोः= क्षेत्र-क्षेत्रज्ञकामतम्= मतमें
माम्= मुझेयत्= जोज्ञानम्= ज्ञान है।

व्याख्या—'क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत'— सम्पूर्ण क्षेत्रों-(शरीरों-में) 'मैं हूँ'—ऐसा जो अहंभाव है, उसमें 'मैं' तो क्षेत्र है (जिसको पूर्वश्लोकमें 'एतत्' कहा

है) और 'हूँ' मैं-पनका ज्ञाता क्षेत्रज्ञ है (जिसको पूर्वश्लोकमें 'वेत्ति' पदसे जाननेवाला कहा है)। 'मैं' का सम्बन्ध होनेसे ही 'हूँ' है। अगर 'मैं' का सम्बन्ध

श्लोक २ ]

  • साधक-संजीवनी *

८६३

न रहे तो 'हूँ' नहीं रहेगा, प्रत्युत 'है' रहेगा। कारण कि 'है' ही 'मैं' के साथ सम्बन्ध होनेसे 'हूँ' कहा जाता है। अतः वास्तवमें क्षेत्रज्ञ-(‘हूँ’-) की परमात्मा-(‘है’-) के साथ एकता है। इसी बातको भगवान् यहाँ कह रहे हैं कि सम्पूर्ण क्षेत्रोंमें मेरेको ही क्षेत्रज्ञ समझो।

मनुष्य किसी विषयको जानता है, तो वह जाननेमें आनेवाला विषय 'ज्ञेय' कहलाता है। उस ज्ञेयको वह किसी करणके द्वारा ही जानता है। करण दो तरहका होता है—बहिःकरण और अन्तःकरण। मनुष्य विषयोंको बहिःकरण-(श्रोत्र, नेत्र आदि-) से जानता है और बहिःकरणको अन्तःकरण-(मन, बुद्धि आदि-) से जानता है। उस अन्तःकरणकी चार वृत्तियाँ हैं—मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार। इन चारोंमें भी अहंकार सबसे सूक्ष्म है, जो कि एकदेशीय है। यह अहंकार भी जिससे देखा जाता है, जाना जाता है, वह जानेवाला प्रकाशस्वरूप क्षेत्रज्ञ है। उस अहंभावके भी ज्ञाता क्षेत्रज्ञको साक्षात् मेरा स्वरूप समझो।

यहाँ 'विद्धि' पद कहनेका तात्पर्य है कि हे अर्जुन! जैसे तू अपनेको शरीरमें मानता है और शरीरको अपना मानता है, ऐसे ही तू अपनेको मेरेमें जान (मान) और मेरेको अपना मान। कारण कि तुमने शरीरके साथ जो एकता मान रखी है, उसको छोड़नेके लिये मेरे साथ एकता माननी बहुत आवश्यक है।

जैसे यहाँ भगवान्ने 'क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि' पदोंसे क्षेत्रज्ञकी अपने साथ एकता बतायी है, ऐसे ही गीतामें अन्य जगह भी एकता बतायी है; जैसे—दूसरे अध्यायके सत्रहवें श्लोकमें भगवान्ने शरीरी-(क्षेत्रज्ञ-)के लिये कहा कि 'जिससे यह सम्पूर्ण संसार व्याप्त है, उसको तुम अविनाशी समझो'-'अविनाशि तु तद्धिद्धि येन सर्वमिदं ततम्' और नवें अध्यायके चौथे श्लोकमें अपने लिये कहा कि 'मेरसे यह सम्पूर्ण संसार व्याप्त है'-'मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना।' यहाँ तो भगवान्ने क्षेत्रज्ञ-(अंश-) की अपने (अंशीके) साथ एकता बतायी है और आगे इसी अध्यायके चौतीसवें श्लोकमें शरीर-संसार-(कार्य-) की प्रकृति-(कारण-) के साथ एकता बतायेंगे। तात्पर्य है कि शरीर तो प्रकृतिका अंश है, इसलिये तुम इससे सर्वथा विमुख हो जाओ; और तुम मेरे अंश हो, इसलिये तुम मेरे सम्मुख हो जाओ।

शरीरकी संसारके साथ स्वाभाविक एकता है। परन्तु यह जीव शरीरको संसारसे अलग मानकर उसके साथ ही

अपनी एकता मान लेता है। परमात्माके साथ क्षेत्रज्ञकी स्वाभाविक एकता होते हुए भी शरीरके साथ एकता माननेसे यह अपनेको परमात्मासे अलग मानता है। शरीरको संसारसे अलग मानना और अपनेको परमात्मासे अलग मानना—ये दोनों ही गलत मान्यताएँ हैं। अतः भगवान् यहाँ 'विद्धि' पदसे आज्ञा देते हैं कि क्षेत्रज्ञ मेरे साथ एक है, ऐसा समझो। तात्पर्य है कि तुमने जहाँ शरीरके साथ अपनी एकता मान रखी है, वहीं मेरे साथ अपनी एकता मान लो, जो कि वास्तवमें है।

शास्त्रोंमें प्रकृति, जीव और परमात्मा—इन तीनोंका अलग-अलग वर्णन आता है; परन्तु यहाँ 'अपि' पदसे भगवान् एक विलक्षण भावकी ओर लक्ष्य कराते हैं कि शास्त्रोंमें परमात्माके जिस सर्वव्यापक स्वरूपका वर्णन हुआ है, वह तो मैं हूँ ही, इसके साथ ही सम्पूर्ण क्षेत्रोंमें क्षेत्रज्ञरूपसे पृथक्-पृथक् दीखनेवाला भी मैं ही हूँ। अतः प्रस्तुत पदोंका यही भाव है कि क्षेत्रज्ञरूपसे परमात्मा ही है—ऐसा जानकर साधक मेरे साथ अभिन्नताका अनुभव करे।

स्वयं संसारसे भिन्न और परमात्मासे अभिन्न है। इसलिये यह नियम है कि संसारका ज्ञान तभी होता है, जब उससे सर्वथा भिन्नताका अनुभव किया जाय। तात्पर्य है कि संसारसे रागरहित होकर ही संसारके वास्तविक स्वरूपको जाना जा सकता है। परन्तु परमात्माका ज्ञान उनसे अभिन्न होनेसे ही होता है। इसलिये परमात्माका यथार्थ ज्ञान प्राप्त करानेके लिये भगवान् क्षेत्रज्ञके साथ अपनी अभिन्नता बता रहे हैं। इस अभिन्नताको यथार्थरूपसे जाननेपर परमात्माका वास्तविक ज्ञान हो जाता है।

'क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोजनं यतन्ज्ञानं मतं मम'— क्षेत्र-(शरीर-)की सम्पूर्ण संसारके साथ एकता है और क्षेत्रज्ञ-(जीवात्मा-) की मेरे साथ एकता है—ऐसा जो क्षेत्र-क्षेत्रज्ञका ज्ञान है, वही मेरे मतमें यथार्थ 'ज्ञान' है।

'मतं मम' कहनेका तात्पर्य है कि संसारमें अनेक विद्याओंका, अनेक भाषाओंका, अनेक लिपियोंका, अनेक कलाओंका, तीनों लोक और चौदह भुवनोंका जो ज्ञान है, वह वास्तविक ज्ञान नहीं है। कारण कि वह ज्ञान सांसारिक व्यवहारमें काममें आनेवाला होते हुए भी संसारमें फँसाने-वाला होनेसे अज्ञान ही है। वास्तविक ज्ञान तो वही है, जिससे स्वयंका शरीरसे सम्बन्ध-विच्छेद हो जाय और फिर संसारमें जन्म न हो, संसारकी परतन्त्रता न हो। यही ज्ञान भगवान्के मतमें यथार्थ ज्ञान है।

८६४

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १३ ]

परिशिष्ट भाव— क्षेत्रज्ञ (जीव) और ब्रह्म एक ही हैं। एक क्षेत्रके सम्बन्धसे वह 'क्षेत्रज्ञ' है और सम्पूर्ण क्षेत्रोंके सम्बन्धसे रहित होनेपर वह 'ब्रह्म' है।

'इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रम्' पदोंसे यह सिद्ध हुआ कि शरीर (क्षेत्र)-की अनन्त ब्रह्माण्डों (सृष्टिमात्र)-के साथ एकता है और 'क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्वि' पदोंसे यह सिद्ध हुआ कि स्वयं (क्षेत्रज्ञ)-की अनन्त-अपर-असीम परमात्माके साथ एकता है। अतः हमारेसे दूर-से-दूर कोई वस्तु है तो वह शरीर है और नजदीक-से-नजदीक कोई वस्तु है तो वह परमात्मा है। तात्पर्य है कि शरीर और संसार एक हैं तथा स्वयं और परमात्मा एक हैं (गीता—पन्द्रहवें अध्यायका सातवाँ श्लोक)। यही ज्ञान है।

ब्रह्मके लिये 'माम्' कहनेका तात्पर्य है कि ब्रह्म और ईश्वर दो नहीं हैं, प्रत्युत एक ही हैं— 'मया तत्तमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना' (गीता ९।४) 'यह सब संसार मेरे निराकार स्वरूपसे व्याप्त है'। अनन्त ब्रह्माण्डोंमें जो निलिप्तरूपसे सर्वत्र परिपूर्ण चेतन है, वह ब्रह्म है और जो अनन्त ब्रह्माण्डोंका मालिक है, वह ईश्वर है।

सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें क्षेत्र और क्षेत्रज्ञके ज्ञानको ही अपने मतमें ज्ञान बताकर अब भगवान् क्षेत्र और क्षेत्रज्ञके विभागको सुननेकी आज्ञा देते हैं।

तत्क्षेत्रं यच्च यादृक् च यद्विकारि यतश्च यत्। स च यो यत्प्रभावश्च तत्समासेन मे शृणु ॥ ३ ॥

तत्= वह= और= और
क्षेत्रम्= क्षेत्रयतः= जिससेयत्प्रभावः= जिस प्रभाववाला
यत्= जो हैयत्= जोहै,
= और(पैदा हुआ है)तत्= वह सब
यादृक्= जैसा है= तथासमासेन= संक्षेपमें
= तथासः= वह क्षेत्रज्ञ (भी)मे= मुझसे
यद्विकारि= जिन विकारोंवाला हैयः= जो हैशृणु= सुन।

व्याख्या— 'तत्क्षेत्रम्'—'तत्' शब्द दोका वाचक होता है—पहले कहे हुए विषयका और दूरीका। इसी अध्यायके पहले श्लोकमें जिसको 'इदम्' पदसे कहा गया है, उसीको यहाँ 'तत्' पदसे कहा है। क्षेत्र सब देशमें नहीं है, सब कालमें नहीं है और अभी भी प्रतिक्षण अभावमें जा रहा है—यह क्षेत्रकी (स्वयंसे) दूरी है।

'यच्च' —उस क्षेत्रका जो स्वरूप है, जिसका वर्णन इसी अध्यायके पाँचवें श्लोकमें हुआ है।

'यादृक् च' —उस क्षेत्रका जैसा स्वभाव है, जिसका वर्णन इसी अध्यायके छब्बीसवें-सत्ताईसवें श्लोकोंमें उसे उत्पन्न और नष्ट होनेवाला बताकर किया गया है।

'यद्विकारि' —यद्यपि प्रकृतिका कार्य होनेसे इसी अध्यायके पाँचवें श्लोकमें आये तेईस तत्त्वोंको भी विकार कहा गया है, तथापि यहाँ उपर्युक्त पदसे क्षेत्र-क्षेत्रज्ञके माने हुए सम्बन्धके कारण क्षेत्रमें उत्पन्न होनेवाले इच्छा-द्वेषादि

विकारोंको ही विकार कहा गया है, जिनका वर्णन छठे श्लोकमें हुआ है।

'यतश्च यत्' —यह क्षेत्र जिससे पैदा होता है अर्थात् प्रकृतिसे उत्पन्न होनेवाले सात विकार और तीन गुण, जिनका वर्णन इसी अध्यायके उन्नीसवें श्लोकके उत्तरार्धमें हुआ है।

'स च' —पहले श्लोकके उत्तरार्धमें जिस क्षेत्रज्ञका वर्णन हुआ है, उसी क्षेत्रज्ञका वाचक यहाँ 'सः' पद है और उसीके विषयमें यहाँ सुननेके लिये कहा जा रहा है।

'यः' —इस क्षेत्रज्ञका जो स्वरूप है, जिसका वर्णन इसी अध्यायके बीसवें श्लोकके उत्तरार्धमें और बाईसवें श्लोकमें किया गया है।

'यत्प्रभावश्च' —वह क्षेत्रज्ञ जिस प्रभाववाला है; जिसका वर्णन इसी अध्यायके इकतीसवेंसे तैंतीसवें श्लोकतक किया गया है।

'तत्समासेन मे शृणु' —यहाँ 'तत्' पदके अन्तर्गत

श्लोक ४ ]

  • साधक-संजीवनी *

८६५

क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ—दोनोंको लेना चाहिये। तात्पर्य है कि वह क्षेत्र जो है, जैसा है, जिन विकारोंवाला और जिससे पैदा हुआ है—इस तरह क्षेत्रके विषयमें चार बातें और वह क्षेत्रज्ञ जो है और जिस प्रभाववाला है—इस तरह क्षेत्रज्ञके विषयमें दो बातें तू मेरेसे संक्षेपमें सुन।

यद्यपि इस अध्यायके आरम्भमें पहले दो श्लोकोंमें क्षेत्र-क्षेत्रज्ञका सूत्ररूपसे वर्णन हुआ है, जिसको भगवान्ने 'ज्ञान' भी कहा है तथापि क्षेत्र-क्षेत्रज्ञके विभागका स्पष्टरूपसे विवेचन (विकारसहित क्षेत्र और निर्वाकार क्षेत्रज्ञके स्वरूपका प्रभावसहित विवेचन) इस तीसरे श्लोकसे आरम्भ किया गया है। इसलिये भगवान् इसको सावधान होकर सुननेकी आज्ञा देते हैं।

इस श्लोकमें भगवान्ने क्षेत्रके विषयमें तो चार बातें सुननेकी आज्ञा दी है, पर क्षेत्रज्ञके विषयमें केवल दो बातें—स्वरूप और प्रभाव ही सुननेकी आज्ञा दी है। इससे यह शंका हो सकती है कि क्षेत्रका प्रभाव भी क्यों नहीं कहा गया और साथ ही क्षेत्रज्ञके स्वभाव, विकार और

जिससे जो पैदा हुआ—इन विषयोंपर भी क्यों नहीं कहा गया? इसका समाधान यह है कि एक क्षण भी एक रूपमें स्थिर न रहनेवाले क्षेत्रका प्रभाव हो ही क्या सकता है? प्रकृतिस्थ (संसारी) पुरुषके अन्तःकरणमें धनादि जड पदार्थोंका महत्त्व रहता है, इसीलिये उसको संसारमें क्षेत्रका (धनादि जड पदार्थोंका) प्रभाव दीखता है। वास्तवमें स्वतन्त्ररूपसे क्षेत्रका कुछ भी प्रभाव नहीं है। अतः उसके प्रभावका कोई वर्णन नहीं किया गया।

क्षेत्रज्ञका स्वरूप उत्पत्ति-विनाशरहित है, इसलिये उसका स्वभाव भी उत्पत्ति-विनाशरहित है। अतः भगवान्ने उसके स्वभावका अलगसे वर्णन न करके स्वरूपके अन्तर्गत ही कर दिया। क्षेत्रके साथ अपना सम्बन्ध माननेके कारण ही क्षेत्रज्ञमें इच्छा-द्वेषादि विकारोंकी प्रतीति होती है, अन्यथा क्षेत्रज्ञ (स्वरूपतः) सर्वथा निर्वाकार ही है। अतः निर्वाकार क्षेत्रज्ञके विकारोंका वर्णन सम्भव ही नहीं। क्षेत्रज्ञ अद्वितीय, अनादि और नित्य है। अतः इसके विषयमें 'कौन किससे पैदा हुआ'—यह प्रश्न ही नहीं बनता।

परिशिष्ट भाव —भगवान्ने द्वारा 'तत्समासेन मे शृणु' कहनेका तात्पर्य है कि साधकके लिये ज्यादा जाननेकी जरूरत नहीं है। ज्यादा जाननेमें समय तो ज्यादा खर्च होगा, पर साधन कम होगा।

सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें जिसको संक्षेपसे सुननेके लिये कहा गया है, उसका विस्तारसे वर्णन कहाँ हुआ है—इसको आगेके श्लोकमें बताते हैं।

ऋषिभिर्बहुधा गीतं छन्दोभिर्विविधैः पृथक् ।

ब्रह्मसूत्रपदैश्चैव हेतुमद्विर्विनिश्चितैः ॥ ४ ॥

यह क्षेत्र-क्षेत्रज्ञका तत्त्व—

ऋषिभिः = ऋषियोंके द्वारा बहुधा = बहुत विस्तारसे गीतम् = कहा गया है (तथा) छन्दोभिः = वेदोंकी ऋचाओंद्वारा | विविधैः = बहुत प्रकारसे पृथक् = विभागपूर्वक (कहा गया है) = और हेतुमद्विः = युक्तियुक्त (एवं) | विनिश्चितैः = निश्चित किये हुए ब्रह्मसूत्रपदैः = ब्रह्मसूत्रके पदोंद्वारा एव = भी (कहा गया है)। ---|---|---

व्याख्या —'ऋषिभिर्बहुधा गीतम्'—वैदिक मन्त्रोंके द्रष्टा तथा शास्त्रों, स्मृतियों और पुराणोंके रचयिता ऋषियोंने अपने-अपने (शास्त्र, स्मृति आदि) ग्रन्थोंमें जड-चेतन, सत्-असत्, शरीर-शरीरी, देह-देही, नित्य-अनित्य आदि शब्दोंसे क्षेत्र-क्षेत्रज्ञका बहुत विस्तारसे वर्णन किया है।

'छन्दोभिर्विविधैः पृथक्'—यहाँ 'विविधैः' विशेषणसहित 'छन्दोभिः' पद ऋक्, यजुः, साम और अथर्व—इन चारों वेदोंके 'संहिता' और 'ब्राह्मण' भागोंके मन्त्रोंका वाचक है। इन्हींके अन्तर्गत सम्पूर्ण उपनिषद् और भिन्न-भिन्न शाखाओंको भी समझ लेना चाहिये। इनमें क्षेत्र-क्षेत्रज्ञका अलग-अलग वर्णन किया गया है।

'ब्रह्मसूत्रपदैश्चैव हेतुमद्विर्विनिश्चितैः'—अनेक

८६६

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १३ ]

युक्तियोंसे युक्त तथा अच्छी तरहसे निश्चित किये हुए ब्रह्म-सूत्रके पदोंद्वारा भी क्षेत्र-क्षेत्रज्ञके तत्त्वका वर्णन किया गया है। इस श्लोकमें भगवान्का आशय यह मालूम देता है कि

क्षेत्र-क्षेत्रज्ञका जो संक्षेपसे वर्णन मैं कर रहा हूँ, उसे अगर कोई विस्तारसे देखना चाहे तो वह उपर्युक्त ग्रन्थोंमें देख सकता है।

सम्बन्ध—तीसरे श्लोकमें क्षेत्र-क्षेत्रज्ञके विषयमें जिन छः बातोंको संक्षेपसे सुननेकी आज्ञा दी थी, उनमेंसे क्षेत्रकी दो बातोंका अर्थात् उसके स्वरूप और विकारोंका वर्णन आगेके दो श्लोकोंमें करते हैं।

महाभूतान्यहङ्कारो बुद्धिरव्यक्तमेव च।

इन्द्रियाणि दशैकं च पञ्च चैन्द्रियगोचराः ॥ ५ ॥

अव्यक्तम् | = मूल प्रकृति | च | = और | इन्द्रिय- | ---|---|---|---|---|--- च | = और | दश | = दस | गोचराः | = इन्द्रियोंके बुद्धिः | = समष्टि बुद्धि (महतत्त्व), | इन्द्रियाणि | = इन्द्रियाँ, | | पाँच विषय— अहङ्कारः | = समष्टि अहंकार, | एकम् | = एक मन | एव | = यही (चौबीस महाभूतानि | = पाँच महाभूत | च | = तथा | | तत्त्वोंवाला | | पञ्च | = पाँचों | | क्षेत्र है।)

व्याख्या—‘अव्यक्तमेव च’ —अव्यक्त नाम मूल प्रकृतिका है। मूल प्रकृति समष्टि बुद्धिका कारण होनेसे और स्वयं किसीका भी कार्य न होनेसे केवल ‘प्रकृति’ ही है।

‘बुद्धिः’ —यह पद समष्टि बुद्धि अर्थात् महतत्त्वका वाचक है। इस बुद्धिसे अहंकार पैदा होता है, इसलिये यह ‘प्रकृति’ है और मूल प्रकृतिका कार्य होनेसे यह ‘विकृति’ है। तात्पर्य है कि यह बुद्धि ‘प्रकृति-विकृति’ है।

‘अहंकारः’ —यह पद समष्टि अहंकारका वाचक है। इसको अहंभाव भी कहते हैं। पंचमहाभूतका कारण होनेसे यह अहंकार ‘प्रकृति’ है और बुद्धिका कार्य होनेसे यह ‘विकृति’ है। तात्पर्य है कि यह अहंकार ‘प्रकृति-विकृति’ है।

महाभूतानि —पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश—ये पाँच महाभूत हैं। महाभूत दो प्रकारके होते हैं—पंचीकृत और अपंचीकृत। एक-एक महाभूतके पाँच विभाग होकर जो मिश्रण होता है, उसको ‘पंचीकृत महाभूत’ कहते हैं*।

  • आकाशके दो विभाग हैं, जिनमेंसे आधा भाग आकाश अपने स्वरूपसे रहा और दूसरे आधे भागके चार विभाग किये। उनमेंसे उसने एक भाग वायुको, एक भाग तेजको, एक भाग जलको और एक भाग पृथ्वीको दिया। वायुके दो विभाग हैं। उनमेंसे आधा भाग वायु अपने स्वरूपसे रही और दूसरे आधे भागके चार विभाग किये, जिनको क्रमशः आकाश, तेज, जल और पृथ्वीको दिया। तेजके दो विभाग हैं। उनमेंसे आधा भाग तेज अपने स्वरूपसे रहा और दूसरे आधे भागके चार विभाग करके क्रमशः एक-एक भाग आकाश, वायु, जल और पृथ्वीको दिया। जलके दो विभाग हैं। उनमेंसे आधा भाग जल अपने स्वरूपसे रहा और दूसरे आधे भागके चार विभाग करके क्रमशः एक-एक भाग आकाश, वायु, तेज और पृथ्वीको दिया। ऐसे ही पृथ्वीके दो विभाग हैं। उनमेंसे आधा भाग पृथ्वी अपने स्वरूपसे रही और दूसरे आधे भागके चार विभाग करके क्रमशः एक-एक भाग आकाश, वायु, तेज और जलको दिया। इस तरह पाँचों महाभूतोंका पंचीकरण—मिश्रण होनेसे इसको ‘पंचीकृत महाभूत’ कहते हैं।

इन पाँच महाभूतोंके विभाग न होनेपर इनको ‘अपंचीकृत महाभूत’ कहते हैं। यहाँ इन्हीं अपंचीकृत महाभूतोंका वाचक ‘महाभूतानि’ पद है। इन महाभूतोंको ‘पंचतन्मात्राएँ’ तथा ‘सूक्ष्ममहाभूत’ भी कहते हैं।

दस इन्द्रियाँ, एक मन और शब्दादि पाँच विषयोंके कारण होनेसे ये महाभूत ‘प्रकृति’ हैं और अहंकारके कार्य होनेसे ये ‘विकृति’ हैं। तात्पर्य है कि ये पंचमहाभूत ‘प्रकृति-विकृति’ हैं।

‘इन्द्रियाणि दश’ —श्रोत्र, त्वचा, नेत्र, रसना और घ्राण—ये पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ हैं तथा वाक्, पाणि, पाद, उपस्थ और पायु—ये पाँच कर्मनेन्द्रियाँ हैं। ये दसों इन्द्रियाँ अपंचीकृत महाभूतोंसे पैदा होनेसे और स्वयं किसीका भी कारण न होनेसे केवल ‘विकृति’ ही हैं।

‘एकं च’ —अपंचीकृत महाभूतोंसे पैदा होनेसे और स्वयं किसीका भी कारण न होनेसे मन केवल ‘विकृति’ ही है।

श्लोक ६ ]

  • साधक-संजीवनी *

८६७

‘पंच चैन्द्रियगोचराः’—शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध—ये (पाँच ज्ञानेन्द्रियोंके) पाँच विषय हैं। अर्पचीकृत महाभूतोंसे पैदा होनेसे और स्वयं किसीके भी कारण न होनेसे ये पाँचों विषय केवल ‘विकृति’ ही हैं।

इन सबका निष्कर्ष यह निकला कि पाँच महाभूत, एक अहंकार और एक बुद्धि—ये सात ‘प्रकृति-विकृति’

हैं, मूल प्रकृति केवल ‘प्रकृति’ है और दस इन्द्रियाँ, एक मन और पाँच ज्ञानेन्द्रियोंके विषय—ये सोलह केवल ‘विकृति’ हैं। इस तरह इन चौबीस तत्त्वोंके समुदायका नाम ‘क्षेत्र’ है। इसीका एक तुच्छ अंश यह मनुष्य-शरीर है, जिसको भगवान्ने पहले श्लोकमें ‘इदं शरीरम्’ और तीसरे श्लोकमें ‘तत्क्षेत्रम्’ पदसे कहा है।

इच्छा द्वेषः सुखं दुःखं सङ्घातश्चेतना धृतिः ।

एतत्क्षेत्रं समासेन सविकारमुदाहृतम् ॥ ६ ॥

इच्छा= इच्छा,चेतना= चेतना (प्राणशक्ति)एतत्= यह
द्वेषः= द्वेष,(और)क्षेत्रम्= क्षेत्र
सुखम्= सुख,धृतिः= धृति—समासेन= संक्षेपसे
दुःखम्= दुःख,सविकारम्= इन विकारों—उदाहृतम्= कहा
सङ्घातः= संघात (शरीर)सहितगया है।

व्याख्या—‘इच्छा’—अमुक वस्तु, व्यक्ति, परिस्थिति आदि मिले—ऐसी जो मनमें चाहना रहती है, उसको इच्छा कहते हैं। क्षेत्रके विकारोंमें भगवान् सबसे पहले इच्छारूप विकारका नाम लेते हैं। इसका तात्पर्य यह है कि इच्छा मूल विकार है; क्योंकि ऐसा कोई पाप और दुःख नहीं है, जो सांसारिक इच्छाओंसे पैदा न होता हो अर्थात् सम्पूर्ण पाप और दुःख सांसारिक इच्छाओंसे ही पैदा होते हैं।

‘द्वेषः’—कामना और अभिमानमें बाधा लगनेपर क्रोध पैदा होता है। अन्तःकरणमें उस क्रोधका जो सूक्ष्म रूप रहता है, उसको ‘द्वेष’ कहते हैं। यहाँ ‘द्वेषः’ पदके अन्तर्गत क्रोधको भी समझ लेना चाहिये।

‘सुखम्’—अनुकूलताके आनेपर मनमें जो प्रसन्नता होती है अर्थात् अनुकूल परिस्थिति जो मनको सुहाती है, उसको ‘सुख’ कहते हैं।

‘दुःखम्’—प्रतिकूलताके आनेपर मनमें जो हलचल होती है अर्थात् प्रतिकूल परिस्थिति जो मनको सुहाती नहीं है, उसको ‘दुःख’ कहते हैं।

‘सङ्घातः’—चौबीस तत्त्वोंसे बने हुए शरीररूप समूहका नाम ‘संघात’ है। शरीरका उत्पन्न होकर सत्तारूपसे दीखना भी विकार है तथा उसमें प्रतिक्षण परिवर्तन होते रहना भी विकार है।

‘चेतना’—चेतना नाम प्राणशक्तिका है अर्थात् शरीरमें जो प्राण चल रहे हैं, उसका नाम ‘चेतना’ है। इस चेतनामें परिवर्तन होता रहता है, जैसे—सात्त्विक-वृत्ति आनेपर

प्राणशक्ति शान्त रहती है और चिन्ता, शोक, भय, उद्वेग आदि होनेपर प्राणशक्ति वैसी शान्त नहीं रहती, शुब्ध हो जाती है। यह प्राणशक्ति निरन्तर नष्ट होती रहती है। अतः यह भी विकाररूप ही है।

साधारण लोग प्राणवालोंको चेतन और निष्प्राण-वालोंको अचेतन कहते हैं, इस दृष्टिसे यहाँ प्राणशक्तिको ‘चेतना’ कहा गया है।

‘धृतिः’—धृति नाम धारणशक्तिका है। यह धृति भी बदलती रहती है। मनुष्य कभी धैर्यको धारण करता है और कभी (प्रतिकूल परिस्थिति आनेपर) धैर्यको छोड़ देता है। कभी धैर्य ज्यादा रहता है और कभी धैर्य कम रहता है। मनुष्य कभी अच्छी बातको धारण करता है और कभी विपरीत बातको धारण करता है। अतः धृति भी क्षेत्रका विकार है।

[अठारहवें अध्यायके तैंतीसवेंसे पैंतीसवें श्लोकतक धृतिके सात्त्विकी, राजसी और तामसी—इन तीन भेदोंका वर्णन किया गया है। परमात्माकी तरफ चलनेमें सात्त्विकी धृतिकी बड़ी आवश्यकता है।]

‘एतत्क्षेत्रं समासेन सविकारमुदाहृतम्’—जैसे पहले श्लोकमें ‘इदं शरीरम्’ कहकर व्यक्ति शरीरसे अपनेको अलग देखनेके लिये कहा, ऐसे ही दृश्य—(क्षेत्र और उसमें होनेवाले विकार—) से द्रष्टाको अलग दिखानेके लिये यहाँ ‘एतत्’ पद आया है।

पाँचवें श्लोकमें भगवान्ने समष्टि संसारका वर्णन किया और यहाँ छठे श्लोकमें व्यक्ति शरीरके विकारोंका वर्णन

८६८

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १३ ]

क्रिया; क्योंकि समष्टि संसारमें इच्छा-द्वेषादि विकार होते ही नहीं। तात्पर्य यह है कि व्यक्ति शरीर समष्टि संसारसे और समष्टि संसार व्यक्ति शरीरसे अलग नहीं है अर्थात् ये दोनों एक हैं। जैसे इसी अध्यायके दूसरे श्लोकमें भगवान्ने क्षेत्रज्ञके साथ अपनी एकता बतायी, ऐसे ही यहाँ व्यक्ति शरीर और उसमें होनेवाले विकारोंकी समष्टि संसारके साथ एकता बताते हैं। आगे इक्कीसवें श्लोकमें भगवान्ने पुरुषकी स्थिति शरीरमें न बतकर प्रकृतिमें बतायी है—‘पुरुषः प्रकृतिस्थो हि। ’ इससे भी सिद्ध होता है कि पुरुषकी स्थिति (सम्बन्ध) व्यक्ति शरीरमें हो जानेसे उसकी स्थिति समष्टि प्रकृतिमें हो जाती है; क्योंकि व्यक्ति शरीर और समष्टि प्रकृति—दोनों एक ही हैं। वास्तवमें देखा जाय तो व्यक्ति है ही नहीं, केवल समष्टि ही है। व्यक्ति केवल भूलसे मानी हुई है। जैसे समुद्रकी लहरोंको समुद्रसे अलग मानना भूल है, ऐसे ही व्यक्ति शरीरको समष्टि संसारसे अलग (अपना) मानना भूल ही है।

विशेष बात

क्षेत्रज्ञ जब अविवेकसे क्षेत्रके साथ अपना सम्बन्ध मान लेता है, तब क्षेत्रमें इच्छा-द्वेषादि विकार पैदा हो जाते हैं। क्षेत्रज्ञका वास्तविक स्वरूप तो सर्वथा निर्विकार ही है। क्षेत्र-क्षेत्रज्ञके संयोगसे पैदा होनेवाले विकार सर्वथा मिटाये जा सकते हैं; क्योंकि क्षेत्रज्ञका क्षेत्रके साथ संयोग केवल माना हुआ है। इस माने हुए संयोगको मिटानेके लिये भगवान् इस अध्यायके पहले श्लोकमें शरीरको अपनेसे पृथक् देखनेके लिये और फिर दूसरे श्लोकमें परमात्मासे

परिशिष्ट भाव —क्षेत्रके साथ सम्बन्ध रखनेसे ही इच्छा, द्वेष, सुख, दुःख आदि विकार क्षेत्रज्ञमें होते हैं—‘पुरुषः सुखदुःखानां भोक्तृत्वे हेतुरुच्यते ’ (१३।२०)। इच्छा-द्वेषादि सभी विकार तादात्म्य (जड़-चेतनकी ग्रन्थि) में हैं। तादात्म्यमें भी ये विकार जड़-अंशमें रहते हैं।

यहाँ भगवान्ने चौबीस तत्त्वोंवाले शरीरको तथा उसके सात विकारोंको ‘एतत् ’ (यह) कहा है—‘एतक्षेत्रम् ’। इसका तात्पर्य है कि स्वयं क्षेत्रसे मिला हुआ नहीं है, प्रत्युत सर्वथा अलग है। स्थूल, सूक्ष्म और कारण—तीनों ही शरीर ‘एतत् ’ पदके अन्तर्गत होनेसे हमारा स्वरूप नहीं है। यहाँ विशेष ध्यान देनेकी बात है कि जब अहंकारका कारण ‘महतत्त्व’ और ‘मूल प्रकृति’ को भी ‘एतत् ’ शब्दसे कह दिया तो फिर अहंकारके ‘एतत् ’ होनेमें कहना ही क्या है। अहम्से नजदीक महतत्त्व है और महतत्त्वसे नजदीक प्रकृति है, वह प्रकृति भी ‘एतत् क्षेत्रम् ’ में है। तात्पर्य है कि अहम् हमारा स्वरूप है ही नहीं। जो मनुष्य स्वयंको और अहम् (क्षेत्र) को अलग-अलग जान लेता है, उसका फिर कभी जन्म नहीं होता और वह परमात्माको प्राप्त हो जाता है (गीता—तेरहवें अध्यायका तेईसवाँ श्लोक)।

  • ज्ञान किसीका भी दोषी नहीं होता; जैसे— भोजन करते समय जीभमें स्वादका ज्ञान होना दोष नहीं है, प्रत्युत भोजनके पदार्थमें राग या द्वेष होना दोष है।

श्लोक ७ ]

  • साधक-संजीवनी *

८६९

सम्बन्ध—शरीरके साथ तादात्म्य कर लेनेसे ही इच्छा, द्वेष आदि विकार पैदा होते हैं और उन विकारोंका स्वयंपर असर पड़ता है। इसलिये भगवान् शरीरके साथ किये हुए तादात्म्यको मिटानेके लिये आवश्यक बीस साधनोंका 'ज्ञान' के नामसे आगेके पाँच श्लोकोंमें वर्णन करते हैं।

अमानित्वमदभिभत्वमहिंसा क्षान्तिरार्जवम् ।

आचार्योपासनं शौचं स्थैर्यमात्मविनिग्रहः ॥ ७ ॥

अमानित्वम् = अपनेमें श्रेष्ठताका भाव न होना,क्षान्तिः = क्षमा,स्थैर्यम् = स्थिरता (और)
अदभिभत्वम् = दिखावटीपन न होना,आर्जवम् = सरलता,आत्म-विनिग्रहः = मनका वशमें होना।
अहिंसा = अहिंसा,आचार्योपासनम् = गुरुकी सेवा,
शौचम् = बाहर-भीतरकी शुद्धि,

व्याख्या— 'अमानित्वम्'—अपनेमें मानीपनके अभावका नाम 'अमानित्व' है। वर्ण, आश्रम, योग्यता, विद्या, गुण, पद आदिको लेकर अपनेमें श्रेष्ठताका भाव होता है कि 'मैं मान्य हूँ, आदरणीय हूँ,' परन्तु यह भाव उत्पत्ति-विनाशशील शरीरके साथ तादात्म्य होनेसे ही होता है। अतः इसमें जड़ताकी ही मुख्याता रहती है। इस मानीपनके रहनेसे साधकको वास्तविक ज्ञान नहीं होता। यह मानीपन साधकमें जितना कम रहेगा, उतना ही जड़ताका महत्त्व कम होगा। जड़ताका महत्त्व जितना कम होगा, जड़ताको लेकर अपनेमें मानीपनका भाव भी उतना ही कम होगा, और साधक उतना ही चिन्मयताकी तरफ तेजीसे लगेगा।

उपाय— जब साधक खुद बड़ा बन जाता है, तब उसमें मानीपन आ जाता है। अतः साधकको चाहिये कि जो श्रेष्ठ पुरुष हैं, साधनमें अपनेसे बड़े हैं, तत्त्वज्ञ (जीवनमुक्त) हैं, उनका संग करे, उनके पासमें रहे, उनके अनुकूल बन जाय। इससे मानीपन दूर हो जाता है। इतना ही नहीं, उनके संगसे बहुत-से दोष सुगमतापूर्वक दूर हो जाते हैं।

गोस्वामी तुलसीदासजी कहते हैं—'सबहि मानप्रद आपु अमानी ' (मानस ७।३८।२) अर्थात् संत सभीको मान देनेवाले और स्वयं अमानी—मान पानेकी इच्छासे रहित होते हैं। इसी तरह साधकको भी मानीपन दूर करनेके लिये सदा दूसरोंको मान, आदर, सत्कार, बड़ाई आदि देनेका स्वभाव बनाना चाहिये। ऐसा स्वभाव तभी बन सकता है, जब वह दूसरोंको किसी-न-किसी दृष्टिसे अपनेसे श्रेष्ठ माने। यह नियम है कि प्रत्येक मनुष्य भिन्न-भिन्न स्थितिवाला होते हुए भी कोई-न-कोई विशेषता रखता ही है। यह विशेषता वर्ण, आश्रम, गुण, विद्या, बुद्धि, योग्यता, पद, अधिकार आदि किसी भी कारणसे हो

सकती है। अतः साधकको चाहिये कि वह दूसरोंकी विशेषताकी तरफ दृष्टि रखकर उनका सदा सम्मान करे। इस प्रकार दूसरोंको मान देनेका भीतरसे स्वभाव बन जानेसे स्वयं मान पानेकी इच्छाका स्वतः अभाव होता चला जाता है। हाँ, दूसरोंको मान देते समय साधकका उद्देश्य अपनेमें मानीपन मिटानेका होना चाहिये, बदलेमें दूसरोंसे मान पानेका नहीं।

विशेष बात

गीतामें भगवान्ने भक्तिमार्गके साधकमें सबसे पहले भयका अभाव बताया है—'अभयम् ' (१६।१), और अन्तमें मानीपनका अभाव बताया है—'नातिमानिता ' (१६।३)। परन्तु ज्ञानमार्गके साधनमें मानीपनका अभाव सबसे पहले बताया है—'अमानित्वम् ' (१३।७) और भयका अभाव सबसे अन्तमें बताया है—'तत्त्वज्ञानार्थ-दर्शनम् ' (१३।११)। इसका तात्पर्य यह है कि जैसे बालक अपनी माँको देखकर अभय हो जाता है, ऐसे ही भक्तिमार्गमें साधक प्रह्लादजीकी तरह आरम्भसे ही सब जगह अपने प्रभुको ही देखता है, इसलिये वह आरम्भमें ही अभय हो जाता है। भक्तमें स्वयं अमानी रहकर दूसरोंको मान देनेकी आदत शुरूसे ही रहती है। अन्तमें उसका देहाध्यास अर्थात् शरीरसे मानी हुई एकता अपने-आप मिट जाती है, तो वह सर्वथा अमानी हो जाता है। परन्तु ज्ञानमार्गमें साधक आरम्भसे ही शरीरके साथ अपनी एकता नहीं मानता (इसी अध्यायका पहला श्लोक), इसलिये वह आरम्भमें ही अमानी हो जाता है; क्योंकि शरीरसे एकता माननेसे ही मानीपन आता है। अन्तमें वह तत्त्वज्ञानके अर्थरूप परमात्माको सब जगह देखकर अभय हो जाता है।

'अदभिभत्वम्' —दम्भ नाम दिखावटीपनका है। लोग हमारेमें अच्छे गुण देखेंगे तो वे हमारा आदर करेंगे, हमें

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  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १३ ]

माला पहनायेंगे, हमारी पूजा करेंगे, हमें ऊँचे आसनपर बैठायेंगे आदिको लेकर अपनेमें वैसा गुण न होनेपर भी गुण दिखाना, अपनेमें गुण कम होनेपर भी उसे बाहरसे ज्यादा प्रकट करना—यह सब दम्भ है।

अपनेमें सदाचार है, शुद्धि है, पवित्रता है, पर अगर लोगोंके सामने हम पवित्रता रखेंगे तो वे हमारी हँसी उड़ायेंगे, हमारी निन्दा करेंगे—ऐसा सोचकर अपनी पवित्रता छोड़ देना और सामनेवालेकी तरह बन जाना भी दम्भ है। जैसे, आजकल विवाह आदिके अवसरोंपर, क्लबों-होटलोंके स्वागत-समारोहोंमें अथवा वायुयान आदिपर यात्रा करते समय पवित्र आचरणवाले सज्जन भी मान-सत्कार आदिके लिये अपवित्र खाद्य पदार्थ लेते देखे जाते हैं। यह भी दम्भ ही है। इसी तरह दुराचारी पुरुष भी अच्छे लोगोंके समुदायमें आनेपर मान, सत्कार, कीर्ति, प्रतिष्ठा आदिकी प्राप्तिकी इच्छासे अपनेको बाहरसे धर्मात्मा, भक्त, सेवक, दानी आदि प्रकट करने लगते हैं, तो यह भी दम्भ ही है।

कोई साधक एकान्तमें, बंद कमरेमें बैठकर जप, ध्यान, चिन्तन कर रहा है और साथमें आलस्य, नींद भी ले रहा है। परन्तु जब बाहरसे उसपर श्रद्धा, पूज्यभाव रखनेवाले आदमीकी आवाज आती है, तब उस आवाजको सुनते ही वह सावधान होकर जप-ध्यान करने लग जाता है और उसके नींद-आलस्य भाग जाते हैं। यह भी एक सूक्ष्म दम्भ है। इसमें भी देखा जाय तो आवाज सुनकर सावधान हो जाना कोई दोष नहीं है, पर उसमें जो दिखावटीपनका भाव आ जाता है कि यह आदमी मेरेमें अश्रद्धा न कर ले, यह भाव आना दोष है। इस भावके स्थानपर ऐसा भाव आना चाहिये कि भगवान्ने बड़ा अच्छा किया कि मेरेको सावधान करके जप-ध्यानमें लगा दिया। इन सब प्रकारके दम्भोंका अभाव होना 'अदभिभत्व' है।

'उपाय' —साधकको अपना उद्देश्य एकमात्र परमात्म-प्राप्तिका ही रखना चाहिये, लोगोंको दिखानेका किंचिन्मात्र भी नहीं। अगर उसमें दिखावटीपन आ जायगा तो उसके साधनमें शिथिलता आ जायगी, जिससे उद्देश्यकी सिद्धिमें बाधा लग जायगी। अतः उसको कोई अच्छा, बुरा, ऊँच, नीच जो कुछ भी समझे, इसकी तरफ खयाल न करके वह अपने साधनमें लगा रहे। ऐसी सावधानी रखनेसे दम्भ मिट जाता है।

'अहिंसा' —मन, वाणी और शरीरसे कभी किसीको किंचिन्मात्र भी दुःख न देनेका नाम 'अहिंसा' है। कर्ता-भेदसे हिंसा तीन प्रकारकी होती है—कृत (स्वयं हिंसा

करना), कारित (किसीसे हिंसा करवाना) और अनुमोदित (हिंसाका अनुमोदन-समर्थन करना)।

उपर्युक्त तीन प्रकारकी हिंसा तीन भावोंसे होती है—क्रोधसे, लोभसे और मोहसे। तात्पर्य है कि क्रोधसे भी कृत, कारित और अनुमोदित हिंसा होती है; लोभसे भी कृत, कारित और अनुमोदित हिंसा होती है तथा मोहसे भी कृत, कारित और अनुमोदित हिंसा होती है। इस तरह हिंसा नौ प्रकारकी हो जाती है।

उपर्युक्त नौ प्रकारकी हिंसामें तीन मात्राएँ होती हैं—मृदुमात्रा, मध्यमात्रा और अधिमात्रा। किसीको थोड़ा दुःख देना मृदुमात्रामें हिंसा है, मृदुमात्रासे अधिक दुःख देना मध्यमात्रामें हिंसा है और बहुत अधिक घायल कर देना अथवा खत्म कर देना अधिमात्रामें हिंसा है। इस तरह मृदु, मध्य और अधिमात्राके भेदसे हिंसा सत्ताईस प्रकारकी हो जाती है।

उपर्युक्त सत्ताईस प्रकारकी हिंसा तीन करणोंसे होती है—शरीरसे, वाणीसे और मनसे। इस तरह हिंसा इक्यासी प्रकारकी हो जाती है। इनमेंसे किसी भी प्रकारकी हिंसा न करनेका नाम 'अहिंसा' है।

अहिंसा भी चार प्रकारकी होती है—देशगत, कालगत, समयगत और व्यक्तिगत। अमुक तीर्थमें, अमुक मन्दिरमें, अमुक स्थानमें किसीको दुःख नहीं देना है—यह 'देशगत अहिंसा' है। अमावस्या, पूर्णिमा, व्यक्तिपात आदि पर्वोंके दिन किसीको दुःख नहीं देना है—यह 'कालगत अहिंसा' है। सन्तके मिलनेपर, पुत्रके जन्म-दिनपर, पिताके निधन-दिवसपर किसीको दुःख नहीं देना है—यह 'समयगत अहिंसा' है। गाय, हरिण आदिको तथा गुरुजन, माता-पिता, बालक आदिको दुःख नहीं देना है—यह 'व्यक्तिगत अहिंसा' है।

किसी भी देश, काल आदिमें क्रोध-लोभ-मोहपूर्वक किसीको भी शरीर, वाणी और मनसे किसी भी प्रकारसे दुःख न देनेसे यह सार्वभौम अहिंसा 'महाव्रत' कहलाती है।

उपाय —जैसे साधारण प्राणी अपने शरीरका सुख चाहता है, ऐसे ही साधकको सबके सुखमें अपना सुख, सबके हितमें अपना हित और सबकी सेवामें अपनी सेवा माननी चाहिये अर्थात् सबके सुख, हित और सेवासे अपना सुख, हित और सेवा अलग नहीं माननी चाहिये। 'सब अपने ही स्वरूप हैं'—ऐसा विवेक जाग्रत् रहनेसे उसके द्वारा किसीको दुःख देनेकी क्रिया होगी ही नहीं और उसमें अहिंसाभाव स्वतः आ जायगा।