सामवेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Samaveda Samhita with Hindi Translation
डा. रेखा व्यास द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
उगते ही स्वर्गलोक, पृथ्वीलोक और अंतरिक्षलोक आदि सभी उन के प्रकाश से जगमगा जाते हैं. (३) आयं गौः पृश्निरक्रमीदसदन्मातरं पुरः. पितरं च प्रयन्त्स्वः.. (४) सूर्य गतिशील व तेजस्वी हैं. वे उदित हो कर ऊपर स्थित हो जाते हैं. सब से पहले वे पृथ्वीलोक (माता), फिर स्वर्गलोक (पिता) फिर अंतरिक्षलोक को प्राप्त होते हैं. (४) अन्तश्चरति रोचनास्य प्राणादपानती. व्यख्यन्महिषो दिवम्.. (५) सूर्य का प्रकाश अपनी किरणों से आकाश में घूमता है. सूर्य के उगने पर ये किरणें दिखती हैं और अस्त होने पर गायब हो जाती हैं. सूर्य अंतरिक्षलोक को विशेष रूप से प्रकाशित करते हैं. (५) त्रि ꣳ शद्धाम वि राजति वाक्पतङ्गाय धीयते. प्रति वस्तोरह द्युभिः.. (६) दिन की तीस घड़ियों तक सूर्य अपनी किरणों से प्रकाशित होते हैं. इन सूर्य के लिए हर एक मुख वेदवाणी उचारता है (स्तुति करता है). (६) अप त्ये तायवो यथा नक्षत्रा यन्त्यक्तुभिः. सूराय विश्वचक्षसे.. (७) दिन में जैसे चोर छिप जाते हैं, वैसे ही सूर्य के उगने पर ग्रह, नक्षत्र, तारागण आदि छिप जाते हैं. (७) अदृश्रन्नस्य केतवो वि रश्मयो जनाँ अनु. भ्राजन्तो अग्नयो यथा.. (८) जैसे हम जलती हुई अग्नि की ज्वाला देख सकते हैं, वैसे ही सूर्य की प्रकाशित किरणों को हम देख सकते हैं. वे सब को देख सकती हैं. (८) तरणिर्विश्वदर्शतो ज्योतिष्कृदसि सूर्य. विश्वमाभासि रोचनम्.. (९) हे सूर्य! आप सब को पार लगाने वाले हैं. आप सारे संसार को देख सकते हैं. आप सब को प्रकाशित कर सकते हैं. चंद्रमा, ग्रह, नक्षत्र आदि को आप ही चमकाते हैं. (९) प्रत्यङ् देवानां विशः प्रत्यङ्ङुदेषि मानुषान्. प्रत्यङ् विश्व ꣳ स्वर्द्दशे.. (१०) हे सूर्य! आप मरुद्गणों के देखते हुए उन के सामने उदित होते हैं. आप मनुष्यों के देखते हुए उदित होते हैं. आप सभी के देखते हुए यानी सब के सामने प्रकट होते हैं. (१०) येना पावक चक्षसा भुरण्यन्तं जनाँ अनु. त्वं वरुण पश्यसि.. (११) हे सूर्य! आप सभी को पवित्र व प्रकाशित करने वाले हैं. आप जिस प्रकाश से सब को प्रकाशित करते हैं हम उस की उपासना करते हैं. (११) उद्यामेषि रजः पृथ्वहा मिमानो अक्तुभिः. पश्यञ्जन्मानि सूर्य.. (१२) ebook converter DEMO Watermarks*
हे सूर्य! आप देहधारियों को प्रकाशित करते हैं. आप दिन को रात्रि से नापते हैं. आप स्वर्गलोक और अंतरिक्षलोक को भी अपने प्रकाश से प्रकाशित कर देते हैं. (१२) अयुक्त सप्त शुन्ध्युवः सूरो रथस्य नप्त्र्यः. ताभिर्याति स्वयुक्तिभिः.. (१३) सूर्य ने रथ में घोड़े जोत रखे हैं. वे सातों घोड़े शुद्धकारी हैं. किरण रूपी घोड़ों से सूर्य सर्वत्र जाते हैं. (१३) सप्त त्वा हरितो रथे वहन्ति देव सूर्य. शोचिष्केशं विचक्षण.. (१४) हे सूर्य! आप प्रकाशित करने वाले हैं. सात किरण रूपी घोड़े आप के रथ को ले जाते हैं. ये किरणें शुद्ध करने वाली हैं. (१४)
पहला अध्याय
उत्तरार्चिक पहला अध्याय पहला खंड उपास्मै गायता नरः पवमानायेन्दवे. अभि देवाँ इयक्षते.. (१) हे यजमानो! आप देवताओं के लिए यज्ञ करना चाहते हैं. आप छान कर साफ किए गए सोमरस की स्तुति कीजिए. (१) अभि ते मधुना पयो ऽ थर्वाणो अशिश्रयुः. देवं देवाय देवयु.. (२) सोमरस दिव्य है. यह देवताओं को प्रिय है. इसे देवताओं ने देवताओं के लिए खोजा है. अथर्वा ऋषियों ने गाय का दूध मिला कर इसे यजमान के लिए तैयार किया है. (२) स नः पवस्व शं गवे शं जनाय शमर्वते. शं राजन्नोषधीभ्यः.. (३) हे सोम! आप हितकारी हैं. आप हमारी गौओं को सुख दीजिए. आप हमारे पुत्रपौत्रों (आने वाली पीढ़ियों) व घोड़ों को सुख दीजिए. आप ओषधियों को हमारे लिए कल्याणकारी बनाइए. (३) दविद्युतत्या रुचा परिष्टोभन्त्या कृपा. सोमाः शुक्रा गवाशिरः.. (४) सोमरस बहुत चमकीला है. इस की धारा सब ओर टपकती हुई आवाज करती है. साफ निथारे हुए सोमरस को गाय के दूध में मिलाया जाता है. (४) हिन्वानो हेतुभिर्हित आ वाजं वाज्यक्रमीत्. सीदन्तो वनुषो यथा.. (५) जैसे युद्धों में शूरवीर की प्रशंसा होती है व उसे प्रतिष्ठा मिलती है, वैसे ही यज्ञ में सोमरस की यजमान प्रशंसा करते हैं व यज्ञ भूमि में सोम को प्रतिष्ठा मिलती है. (५) ऋध्वक्सोम स्वस्तये संजग्मानो दिवा कवे. पवस्व सूर्यो दृशे.. (६) हे सोम! आप बुद्धिमान व परमवीर हैं. आप सूर्य की भांति ऊपर चढ़ दिव्य प्रकाशमय हो कर सब का कल्याण कीजिए. (६) पवमानस्य ते कवे वाजिन्सर्गा असृक्षत. अर्वन्तो न श्रवस्यवः.. (७) हे सोम! आप शक्तिवर्धक हैं. छानते समय आप की धार ऐसी गतिशील होती है, जैसे ebook converter DEMO Watermarks*
अस्तबल से निकलते समय घोड़े गतिशील होते हैं। (७) अच्छा कोशं मधुश्रुतमसृग्रं वारे अव्यये. अवावशन्त धीतयः.. (८) मधुर रस से भरे द्रोणकलश में भेड़ के बालों से बनी छलनी से यजमान सोमरस को छानछान कर तैयार करते हैं. यजमान की अंगुलियां बारबार उस सोमरस को शुद्ध करना चाहती हैं. (८) अच्छा समुद्रमिन्दवो ऽ स्तं गावो न धेनवः. अग्मन्नृतस्य योनिमा.. (९) मनुष्यों को अपने दूध से तृप्त करने वाली दुधारू गाएं जैसे अपने बाड़े में जाती हैं, वैसे ही छान कर घड़े में भरे हुए सोम यज्ञ स्थल में जाते हैं. (९) दूसरा खंड अग्न आ याहि वीतये गृणानो हव्यदातये. नि होता सत्सि बर्हिषि.. (१) हे अग्नि! हम आप की स्तुति करते हैं. देवताओं को हवि पहुंचाने के लिए हम आप का आह्वान करते हैं. आप यज्ञ में कुश के आसन पर विराजिए. (१) तं त्वा समिद्भिरङ्गिरो घृतेन वर्धयामसि. बृहच्छोचा यविष्ठ्य.. (२) हे अग्नि! आप सुंदर व तरुण (युवा) हैं. हम समिधा और घी से आप को प्रज्वलित करते हैं. आप प्रज्वलित होइए. (२) स नः पृथु श्रवाय्यमच्छा देव विवाससि. बृहदग्ने सुवीर्यम्.. (३) हे अग्नि! आप हमें यश और यशदायी क्षमता दोनों ही प्रदान कीजिए. लोग उस यश के बारे में सुनने (जानने) के लिए इच्छुक रहें. (३) आ नो मित्रावरुणा घृतैर्गव्यूतिमुक्षतम्. मध्वा रजा ⁑ सि सुक्रतू.. (४) हे मित्र और वरुण! आप श्रेष्ठ कर्म करने वाले हैं. आप हमारे गौ स्थानों को घी, दूध से सींचने की कृपा कीजिए. आप हमारे लिए परलोक के निवास स्थानों को भी श्रेष्ठ, मधुर रसों से सींचने की कृपा कीजिए. (४) उरुश ⁑ सा नमोवृधा मह्ना दक्षस्य राजथः. द्राघिष्ठाभिः शुचिव्रता.. (५) हे मित्रावरुण! आप पवित्र कार्य करने वाले हैं. आप अनेक लोगों से प्रशंसित हैं. हवि के अन्न से आप बढ़ते हैं. आप अपनी शक्ति से सुशोभित होते हैं. (५) गृणाना जमदग्निना योनावृतस्य सीदतम्. पात ⁑ सोममृतावृधा.. (६) हे मित्रावरुण! जमदग्नि ऋषि आप की स्तुति करते हैं. आप यज्ञ स्थान में पधारिए, विराजिए. आप हमारे द्वारा तैयार किए गए सोमरस को ग्रहण कीजिए. आप हमारे यज्ञ के ebook converter DEMO Watermarks*
कर्मफल को बढ़ाने की कृपा कीजिए. (६) आ याहि सुषुमा हि त इन्द्र सोमं पिबा इमम्. इदं बर्हिः सदो मम.. (७) हे इंद्र! आप हमारे यज्ञ में पधारिए. हम ने आप के लिए स्वच्छ सोमरस तैयार किया है. आप इस सोमरस को पीजिए. आप इस कुश के आसन पर विराजमान होइए. (७) आ त्वा ब्रह्मयुजा हरी वहतामिन्द्र केशिना. उप ब्रह्माणि नः शृणु.. (८) हे इंद्र! आप के केश वाले मनोहर घोड़े मंत्र सुनते ही वाहन में जुत जाते हैं. आप के घोड़े आप को यज्ञ में लाने का कष्ट करें. आप हमारे पास यज्ञ में पधार कर भलीभांति हमारी प्रार्थनाओं को सुनने की कृपा कीजिए. (८) ब्रह्माणस्त्वा युजा वय १४ सोमपामिन्द्र सोमिनः. सुतावन्तो हवामहे.. (९) हे इंद्र! यजमान सोमयज्ञ (कर्ता) करने वाले हैं. सोमरस तैयार करने वाले यजमान ब्राह्मण हैं. हम आप के योग्य प्रार्थनाओं से सोमरस पीने वाले आप को आमंत्रित करते हैं. (९) इन्द्राग्नी आ गत १४ सुतं गीर्भिर्नभो वरेण्यम्. अस्य पातं धियेषिता.. (१०) हे अग्नि! हे इंद्र! सोमरस को हम ने अपनी स्तुतियों से पवित्र बनाया है. सोम स्वर्ग से आए हैं. इन्होंने हमारे भक्ति भाव को स्वीकार किया है. आप इस सोमरस को स्वीकार करने की कृपा कीजिए. (१०) इन्द्राग्नी जरितुः सचा यज्ञो जिगाति चेतनः. अया पातमम १४ सुतम्.. (११) हे अग्नि! हे इंद्र! आप यजमान पर कृपा कीजिए. आप उन की मदद कीजिए. सोमरस चेतनादायी है. उस से हम यज्ञ करते हैं. आप उस सोमरस को ग्रहण करने की कृपा कीजिए. (११) इन्द्रमग्निं कविच्छदा यज्ञस्य जूत्या वृणे. ता सोमस्येह तृम्पताम्.. (१२) हे अग्नि! हे इंद्र! सोम यज्ञ के प्रमुख साधन हैं. हम उन की प्रेरणा से प्रेरित होते हैं. आप दोनों देवता यजमान के लिए उपयुक्त फलदाता हैं. आप सोमरस पी कर तृप्त होइए और हमें यज्ञफल प्रदान करने की कृपा कीजिए. (१२) तीसरा खंड उच्चा ते जातमन्धसो दिवि सद्भूम्या ददे. उग्र १४ शर्म महि श्रवः.. (१) हे सोम! स्वर्गलोक में आप ने जन्म पाया है. आप शक्तिवर्द्धक, सुखदायी व यशदायी हैं. यजमान भूमिलोक पर अन्न के रूप में आप को प्राप्त करते हैं. (१) ebook converter DEMO Watermarks*
स न इन्द्राय यज्यवे वरुणाय मरुद्भ्यः. वरिवोवित्परि स्रव.. (२) हे सोम! आप धनदाता हैं. आप इंद्र, वरुण और मरुद्गण के लिए प्रवाहित होने की कृपा कीजिए. (२) एना विश्वान्यर्य आ द्युम्नानि मानुषाणाम्. सिषासन्तो वनामहे.. (३) हे सोम! आप की कृपा से हम ने मनुष्य को प्राप्त होने योग्य सब सुख (वैभव) पाया है. फिर भी हम सेवा भावना से आप की स्तुति करते हैं. (३) पुनानः सोम धारयापो वसानो अर्षसि. आ रत्नधा योनिमृतस्य सीदस्युत्सो देवो हिरण्ययः.. (४) हे सोम! आप सोने की तरह चमकते हैं. आप यज्ञ स्थान में विराजिए. पानी मिला कर छाने जाने पर धारा रूप में आप कलश में पधारते हैं. आप धन देने वाले हैं. (४) दुहान ऊधर्दिव्यं मधु प्रियं प्रत्न ँ सधस्थमासदत्. आपृच्छ्यं धरुणं वाज्यर्षसि नृभिर्धौतो विचक्षणः.. (५) यजमानों ने सोमरस छाना है. यह मधुर और आनंददायी है. यह अपने प्राचीन स्थान पर पहुंचता है. हे सोम! आप खास निरीक्षण करने वाले हैं. जो यजमान अच्छा यज्ञ करने की भावना रखते हैं, आप उस यजमान पर अपनी कृपा दृष्टि रखते हैं. (५) प्र तु द्रव परि कोशं नि षीद नृभिः पुनानो अभि वाजमर्ष. अश्वं न त्वा वाजिनं मर्जयन्ता ऽ च्छा बर्ही रशनाभिर्नयन्ति.. (६) हे सोम! आप जल्दी हमारे यज्ञ में पधारिए. आप जल्दी कलश में स्थापित हो जाइए. यजमान आप को छानते हैं. छन कर आप हवि के रूप में हवि अन्न को प्राप्त कीजिए. शक्तिमान घोड़ों को शुद्ध करने की तरह यजमान आप को शुद्ध करते हैं. लगाम पकड़ कर घोड़े को जैसे ले जाया जाता है, वैसे ही अंगुलियों से यजमान आप को यज्ञ स्थान तक ले जाते हैं. (६) स्वायुधः पवते देव इन्दुश्स्तिहा वृजना रक्षमाणः. पिता देवानां जनिता सुदक्षो विष्टम्भो दिवो धरुणः पृथिव्याः.. (७) हे सोम! आप उत्तम कोटि के अस्त्रशस्त्र वाले शत्रुनाशक, संरक्षक, उपद्रव दूर करने वाले, पालक, संरक्षक, देवताओं को उत्पन्न करने वाले हैं तथा पृथ्वीलोक को धारण करते हैं. आप स्वर्गलोक को विशेष आधार देते हैं. ऐसा दिव्य सोमरस यजमान छानते हैं. (७) ऋषिर्विप्रः पुर एता जनानामभूर्धिर उशना काव्येन. स चिद्विवेद निहितं यदासामपीच्यां ३ गुह्यं नाम गोनाम्.. (८) उशना ऋषि विद्वान्, परमज्ञानी, वैदिक कर्मकांड में दक्ष, धीर, प्रकाशमान और नेतृत्व ebook converter DEMO Watermarks*
करने वाले हैं. उन्हीं उशना ऋषि ने स्तोत्रों के माध्यम से गायों में गुप्त रूप से रहने वाले सोम रस को मेहनत से प्राप्त किया. (८) चौथा खंड अभि त्वा शूर नोनुमो ऽ दुग्धा इव धेनवः. ईशानमस्य जगतः स्वर्दृशमीशानमिन्द्र तस्थुषः.. (१) हे इंद्र! आप शक्तिमान, सर्वज्ञाता व जगत् के स्वामी हैं. जैसे बिना दुही हुई गाएं रंभाती हुई अपने बछड़ों की ओर भागती हैं, वैसे ही हम आप के दर्शन और कृपा के लिए लालायित हैं. (१) न त्वावाँ अन्यो दिव्यो न पार्थिवो न जातो न जनिष्यते. अश्वायन्तो मघवन्निन्द्र वाजिनो गव्यन्तस्त्वा हवामहे.. (२) हे इंद्र! आप धनवान हैं. आप जैसा न कोई स्वर्गलोक और न इस पृथ्वीलोक में हुआ है और न होगा. हम गोधन व धनधान्य के लिए आप की स्तुति करते हैं. (२) कया नश्चित्र आ भुवदूती सदावृधः सखा. कया शचिष्ठया वृता.. (३) इंद्र सदैव बढ़ने वाले हैं. वे विलक्षण, अत्यंत शक्तिमान व हमारे सखा हैं. हम किस बुद्धि और किन संतुष्टिदायी पदार्थों से आप की उपासना करें? किनकिन शक्तियों से आप हमारे सहयोगी होंगे? (३) कस्त्वा सत्यो मदानां म ॐ हिष्ठो मत्सदन्धसः. दृढा चिदारुजे वसु.. (४) सोम आदरणीय व सत्यनिष्ठों के लिए आनंददायी हैं. उन्हें आनंद देने में वे सब से आगे हैं. सोम बलवान शत्रुओं के धन को नष्ट करने के लिए इंद्र को उत्साह और सामर्थ्य प्रदान करते हैं. (४) अभी षु णः सखीनामविता जरितॄणाम्. शतं भवास्यूतये.. (५) हे इंद्र! आप हमारे मित्र व यजमानों के संरक्षक हैं. आप हमारी सैकड़ों प्रकार से रक्षा करने के लिए अच्छी तैयारी कर लीजिए. (५) तं वो दस्ममृतीषहं वसोर्मन्दानमन्धसः. अभि वत्सं न स्वसरेषु धेनव इन्द्रं गीर्भिर्नवामहे.. (६) गोशाला में गाएं जैसे बछड़ों के लिए लालायित हो कर रंभाती हैं, वैसे ही हम इंद्र की स्तुति के लिए लालायित हो कर प्रार्थना करते हैं. वे शत्रुओं से रक्षा करते हैं. वे प्रकाशमान व सोमरस से संतुष्ट होने वाले हैं. (६) द्युक्ष ॐ सुदानुं तविषीभिरावृतं गिरिं न पुरु भोजसम्. ebook converter DEMO Watermarks*
क्षुमन्तं वाज २४ शतिन २४ सहस्रिणं मक्षू गोमन्तममीमहे.. (७) हे इंद्र! आप स्वर्गलोकवासी हैं. आप उत्तम दान के दाता, बहुत क्षमतावान व पालनहार हैं. हम सैकड़ोंहजारों की संख्या में गोधन आप से चाहते हैं. हम प्रचुर अन्न, धन आप से चाहते हैं. (७) तरोभिर्वो विदद्वसुमिन्द्र २४ सबाध ऊतये. बृहद्गायन्तः सुतसोमे अध्वरे हुवे भरं न कारिणम्.. (८) बच्चे अपनी सहायता के लिए जैसे अपने भरणपोषण करने वालों को पुकारते हैं, वैसे ही हम यजमान अपनी सहायता के लिए इंद्र को पुकारते हैं. इंद्र वेगवान घोड़ों वाले व वैभवशाली हैं. हे याजको! आप सोमयज्ञ में अपनी रक्षा के लिए बृहत्साम का गायन करते हुए उन की उपासना कीजिए. (८) न यं दुध्रा वरन्ते न स्थिरा मुरो मदेषु शिप्रमन्धसः. आदृ्त्या शशमानाय सुन्वते दाता जरित्र उक्थ्यम्.. (९) इंद्र सुंदर ठुड्डी वाले हैं. शक्तिशाली राक्षस व मरणधर्मा मनुष्य (कितने ही शक्तिशाली हों) भी उन्हें नहीं हरा सकते. वे सोमरस के आनंद में सोम यज्ञ करने वालों को प्रचुर यशदायी धन देते हैं. हम मन से उन की स्तुति करते हैं. (९) पांचवां खंड स्वादिष्ठया मदिष्ठया पवस्व सोम धारया. इन्द्राय पातवे सुतः.. (१) इंद्र के पीने के लिए स्वादिष्ट और मीठा सोमरस तैयार किया गया है. वह सोमरस अपनी पूर्ण मददायी धाराओं से इंद्र के लिए झरे. (१) रक्षोहा विश्वचर्षणििरभि योनिमयोहत. द्रोणे सधस्थमासदत्.. (२) सोम राक्षसनाशक हैं. जगद्रष्टा हैं. वे सोने के द्रोणकलश में विराजमान हो कर यज्ञस्थल में प्रतिष्ठित हो गए. (२) वरिवोधातमो भुवो म २४ हिष्ठो वृत्रहन्तमः. पर्षि राधो मघोनाम्.. (३) हे सोम! आप धनदाता हैं. आप शत्रुओं के प्रबल नाशक हैं. आप धनवान शत्रुओं के पास मौजूद रहने वाले धन हमें प्रदान कीजिए. (३) पवस्व मधुमत्तम इन्द्राय सोम ऋतुवित्तमो मदः. महि द्युक्षतमो मदः.. (४) हे सोम! आप अत्यंत मधुर हैं. आप यजमान को कर्मों का फल देते हैं. आप प्रकाशमान व तृप्तिदायी हैं. आप इंद्र के लिए पात्र में छन कर तैयार हो जाइए. (४) ebook converter DEMO Watermarks*
यस्य ते पीत्वा वृषभो वृषायते ऽस्य पीत्वा स्वर्विदः. स सुप्रकेतो अभ्यक्रमीदिषो ऽच्छा वाजं नैतशः.. (५) हे सोम! आप बहुत शक्तिमान हैं. आप को पी कर इंद्र और शक्तिमान हो जाते हैं. आप को पी कर बुद्धिमान भी प्रसन्न होते हैं. आप के प्रभाव से इंद्र युद्धों में घोड़े की तरह शत्रुओं के धनों को शीघ्र ही अपने अधीन कर लेते हैं. (५) इन्द्रमच्छ सुता इमे वृषणं यन्तु हरयः. शृष्टे जातास इन्दवः स्वर्विदः.. (६) सोमरस चमकीला और हरा है. वह बहुत जल्दी छन कर पात्र में पहुंच गया है. वह जल्दी से जल्दी इंद्र को प्राप्त हो. (६) अयं भराय सानसिरिन्द्राय पवते सुतः. सोमो जैत्रस्य चेतति यथा विदे.. (७) सभी लोगों को यह पता है कि सोमरस सेवन करने योग्य है. इसे छान कर तैयार किया गया है. इसे इंद्र के लिए मटकों में भरा गया है. सोमरस जीतने की इच्छा रखने वाले इंद्र को युद्धों में बहुत जोश देता है. (७) अस्येदिन्द्रो मदेष्वा ग्राभं गृभ्णाति सानसिम्. वज्रं च वृषणं भरत्समप्सुजित्.. (८) सेवन करने योग्य सोम को पी कर और प्रसन्न हो कर इंद्र धनुष धारण करते हैं. जल प्रवाह को जीतने वाले इंद्र वज्र को धारण करते हैं. (८) पुरोजिती वो अन्धसः सुताय मादयित्नवे. अप श्वान ॐ श्रथिष्टन सखायो दीर्घजिह्वयम्.. (९) हे यजमानो! निस्संदेह यह सोमरस जीत दिलाने वाला है. यह आप पूरी तरह मान लीजिए. यह प्रसन्नतादायी है. आप इस की ओर लपकने वाले लंबीलंबी जीभ वाले कुत्तों (राक्षसों) को इस से दूर भगाइए. (९) यो धारया पावकया परिप्रस्यन्दते सुतः. इन्दुरश्वो न कृत्व्यः.. (१०) यज्ञ में सोमरस यजमान का सहायक है. यह पारदर्शी धाराओं से घोड़े की तरह वेगवान हो कर कलश में जाता है. (१०) तं दुरोषमभी नरः सोमं विश्वाच्या धिया. यज्ञाय सन्वद्रयः.. (११) हे यजमानो! सोम दुष्टों का विनाश करने वाले हैं. आप उन को आमंत्रित कीजिए. आप यज्ञ का आदर करते हुए सब के कल्याण की भावना व्यक्त कीजिए. (११) अभि प्रियाणि पवते चनोहितो नामानि यह्वो अधि येषु वर्धते. आ सूर्यस्य बृहतो बृहन्नधि रथं विष्वञ्चमरुहद्दिविचक्षणः.. (१२) हे सोम! आप कल्याणकारी, अन्न स्वरूप व संसार को तृप्ति देने वाले हैं. आप जल को ebook converter DEMO Watermarks*
सब तरह से पवित्र करने वाले हैं. अंतरिक्षलोक के जल में सोम ज्यादा बढ़ते हैं. सोम सर्वद्रष्टा हैं. ये सूर्य के सब ओर जा सकने में समर्थ रथ पर चढ़ते हैं. (१२) ऋतस्य जिह्वा पवते मधु प्रियं वक्ता पतिर्धियो अस्या अदाभ्यः. दधाति पुत्रः पित्रोरपीच्यं ३ नाम तृतीयमधि रोचनं दिवः.. (१३) सोम तो जैसे यज्ञ की जीभ ही हैं. सोमरस छनते समय आवाज करता है. यह मीठा और प्रिय रस वाला है. सोम यज्ञ संबंधी क्रियाकलापों को जानने वाले व निर्भय हैं. वे अपने मातापिता का नाम नहीं जानते. ये यजमान द्वारा तैयार किए जाते हैं. ये स्वर्गलोक को चमचमाने वाले हैं. ये छन कर तैयार हो जाने पर सोमजयी नामक तीसरे नाम को ग्रहण करते हैं. (१३) अव द्युतानः कलशाँ अचिक्रदन्नृभिर्येमाणः कोश आ हिरण्यये. अभी ऋतस्य दोहना अनूषताधि त्रिपृष्ठ उषसो वि राजसि.. (१४) यजमान सोने के कलश में सोमरस को छानते हैं. कलश में जाते समय सोमरस आवाज करता है. इस सोमरस की यजमान उपासना करते हैं. सोमरस सुबह, दोपहर और शाम—इन तीनों सवनों (संध्याओं) में प्रकाशित होता है. (१४) छठा खंड यज्ञायज्ञा वो अग्नये गिरागिरा च दक्षसे. प्रप्र वयममृतं जातवेदसं प्रियं मित्रं न श ॐ सिषम्.. (१) हे यजमानो! आप उपासना करने वाले हैं. आप को हर यज्ञ में प्रज्वलित हो कर बढ़ने वाले अग्नि की वाणी से स्तुति करनी चाहिए. अग्नि अमर, ज्ञानी व हमारे मित्र हैं. हम उन की उपासना करते हैं. (१) ऊर्जो नपात ॐ स हिनायमस्मयुर्दाशेम हव्यदातये. भुवद्वाजेष्वविता भुवद्वृध उत त्राता तनूनाम्.. (२) अग्नि लगातार अन्न और शक्तिदाता हैं. वे हमारा कल्याण चाहते हैं. हम देवताओं तक हवि पहुंचाने के लिए अग्नि देवता को हवि प्रदान करते हैं. वे युद्धों में हमारे रक्षक और हमारे लिए प्रगतिकारी हैं. वे हमारे पुत्रों के भी रक्षक होने की कृपा करें. हम उन की उपासना करते हैं. (२) एह्यू षु ब्रवाणि ते ऽ ग्न इत्थेतरा गिरः. अभिर्वर्धास इन्दुभिः.. (३) हे अग्नि! आप आइए. हम आप के लिए विधिविधान से स्तोत्र उचारते हैं. आप हमारी और दूसरों की स्तुतियों को सुनिए. सोमरस आप को बढ़ोतरी प्रदान करें. (३) यत्र क्व च ते मनो दक्षं दधस उत्तरम्. तत्र योनिं कृणवसे.. (४) ebook converter DEMO Watermarks*
हे अग्नि! आप का मन जहां कहीं भी, जिस पर भी है, आप उसे श्रेष्ठ बल और श्रेष्ठ आवास प्रदान करने की कृपा करें. (४) न हि ते पूर्तमक्षिपद्वन्नेमानां पते. अथा दुवो वनवसे.. (५) हे अग्नि! आप नियम आदि की रक्षा करने वाले, उन का पालन करने वाले यजमान की रक्षा करते हो. उन का पालन करते हो. आप हमारी सेवा को स्वीकार कीजिए. आप का तेज हमारी आंखों को किसी भी प्रकार की हानि न पहुंचाए. (५) वयमु त्वामपूर्व स्थूरं न कच्चिद्भरन्तो ऽ वस्यव:. वज्रिं चित्र हवामहे.. (६) हे इंद्र! आप अपूर्व, वज्र धारण करने वाले, विलक्षण व सर्वोत्तम हैं. हम आप को सोमरस चढ़ाना चाहते हैं. हम आप से रक्षा का अनुरोध करते हैं. हम आप को उसी तरह पुकारते हैं, जैसे निर्बल व्यक्ति अपनी सहायता के लिए सबल को पुकारता है. (६) उप त्वा कर्मन्नूतये स नो युवोग्रश्चक्राम यो धृषत्. त्वामिध्यवितारं ववृमहे सखाय इन्द्र सानसिम्.. (७) हे इंद्र! हम यज्ञ में अपनी रक्षा के लिए आप की शरण लेते हैं. आप शत्रुनाशक व युवा हैं. आप हमारे पास आइए. हमारी मित्रता स्वीकारिए. आप के बारे में प्रसिद्ध है कि आप सेवा करने योग्य हैं. सब की रक्षा करते हैं. (७) अधा हीन्द्र गिर्वण उप त्वा काम ईमहे ससृग्महे. उदेव ग्मन्त उदभि:.. (८) हे इंद्र! आप उपासना करने योग्य हैं. हम आप से उसी प्रकार अपनी इच्छा पूर्ति की प्रार्थना करते हैं, जैसे पानी ले जाने वाले मनुष्य उस से अपनी इच्छानुसार खेलते हैं. (८) वार्ण त्वा यव्याभिर्वर्धन्ति शूर ब्रह्माणि. वावृध्वा सं चिदद्रिवो दिवेदिवे.. (९) हे इंद्र! आप वज्रधारी व वीर हैं. नदियां जैसे समुद्र तक पहुंच कर उसे बढ़ाती हैं, उसी प्रकार हमारी स्तुतियां आप तक पहुंच कर आप के यश को और बढ़ाती हैं. (९) युञ्जन्ति हरी इषिरस्य गाथयोरौ रथ उरुयुगे वचोयुजा. इन्द्रवाहा स्वर्विदा.. (१०) इंद्र गतिशील हैं. उन के घोड़े उन के बड़े जुए वाले बड़े रथ में कहने मात्र से ही जुत जाते हैं. ये घोड़े गंतव्य स्थान को भी स्वयं ही जानने वाले हैं. ये यजमान की स्तुति सुनते ही निर्धारित जगह के लिए चल पड़ते हैं. (१०) ebook converter DEMO Watermarks*
दूसरा अध्याय
दूसरा अध्याय पहला खंड पान्तमा वो अन्धस इन्द्रमभि प्र गायत. विश्वासाहं १३ शतक्रतुं म १३ हिष्ठं चर्षणीनाम्.. (१) हे यजमानो! आप इंद्र की स्तुति कीजिए. वे आप के द्वारा चढ़ाए गए सोमरूपी अन्न को पीने वाले तथा शत्रुओं का नाश करने वाले हैं. वे सैकड़ों प्रकार के कर्म करने वाले व मनुष्यों को धन देने वाले हैं. (१) पुरुहूतं पुरुष्टुतं गाथान्या ३ १३ सनश्रुतम्. इन्द्र इति ब्रवीतन.. (२) हे यजमानो! आप इंद्र की उपासना कीजिए. वे बहुत प्रसिद्ध हैं. वे यज्ञ में अनेक लोगों द्वारा बुलाए जाते हैं. अनेक लोगों द्वारा उन की उपासना की जाती है. (२) इन्द्र इन्नो महोनां दाता वाजानां नृतुः. महाँ अभिज्ञा यमत्.. (३) हे यजमानो! इंद्र अन्न और धन देने वाले हैं. वे महान देव हैं. वे हमारे सामने प्रकट हो कर हमें अन्नधन आदि देने की कृपा करें. (३) प्र व इन्द्राय मादन १३ हर्यश्वाय गायत. सखायः सोमपाव्ने.. (४) हे यजमानो! इंद्र हरि नाम के घोड़े वाले हैं. वे सोमरस पीने वाले हैं. आप उन इंद्र के लिए मादक स्तोत्र गाइए. (४) श १३ सेदुक्थ १३ सुदानव उत द्युक्षं यथा नरः. यकृमा सत्यराधसे.. (५) हे यजमानो! इंद्र श्रेष्ठ धनदाता और सत्यरूपी धन वाले हैं. हम विधिविधान सहित इंद्र की स्तुति करते हैं. आप भी उन की स्तुति कीजिए. (५) त्वं इन इन्द्र वाजयूस्त्वं गव्युः शतक्रतो. त्व १३ हिरण्ययुर्वसो.. (६) हे इंद्र! आप सैकड़ों प्रकार के कर्म करने वाले हैं. आप हमें अन्न, गाएं व सोना दीजिए. (६) वयमु त्वा तदिदर्था इन्द्र त्वायन्तः सखायः. कण्वा उक्थेभिर्जरन्ते.. (७) हे इंद्र! हम आप को अपना बनाना चाहते हैं. हम मित्र भाव से आप की उपासना करते ebook converter DEMO Watermarks*
हैं. हम कण्वगोत्र के हैं. हमारी संतान भी आप की स्तुति करती है. (७) न घेमन्यदा पपन वज्रिन्नपसो नविष्टौ. तवेदु स्तोमैश्चिकेत.. (८) हे इंद्र! आप वज्र धारण करने वाले हैं. यज्ञ अनुष्ठान में आप के स्तोत्र के अलावा हम और कोई स्तोत्र नहीं पढ़ेंगे. हम आप के ही स्तोत्रों से स्तुति करना जानते हैं. (८) इच्छन्ति देवाः सुन्वन्तं न स्वप्नाय स्पृहयन्ति. यन्ति प्रमादमतन्द्राः.. (९) सोमयज्ञ करने वालों पर देवगण की कृपा रहती है. केवल सपने देखने वालों से वे प्रेम नहीं करते हैं. परिश्रम करने वाले ही आनंददायी सोम को प्राप्त कर सकते हैं. (९) इन्द्राय मद्धने सुतं परि ष्टोभन्तु नो गिरः. अर्कमर्चन्तु कारवः.. (१०) हे यजमानो! आप सराहनीय सोमरस की उपासना कीजिए. वे उपासना के योग्य हैं. इंद्र सोमरस को चाहते हैं. हमारी वाणी को छाने हुए सोमरस की स्तुति करनी चाहिए. (१०) यस्मिन्विश्वा अधि श्रियो रणन्ति सप्त स ☷ सदः. इन्द्र ☷ सुते हवामहे.. (११) इंद्र सारी शोभाओं से शोभित हैं. यज्ञ में सात पुरोहित इंद्र को हवि देने के लिए अनेक मंत्र पढ़ते हैं. हम सोमयज्ञ में उन इंद्र को आमंत्रित करते हैं. (११) त्रिकद्रुकेषु चेतनं देवासो यज्ञमतनत. तमिद्वर्धन्तु नो गिरः.. (१२) यज्ञ उत्साहवर्द्धक है. सभी देव यज्ञ के तीन दिनों में यज्ञ की बढ़ोतरी करते हैं. हमारी स्तुति और वाणियां भी उस यज्ञ की बढ़ोतरी करें. (१२) दूसरा खंड अयं त इन्द्र सोमो निपूतो अधि बर्हिषि. एहीमस्य द्रवा पिब.. (१) हे इंद्र! हम ने आप के लिए छान कर सोमरस तैयार किया है. यज्ञ की वेदी पर बिछे हुए कुश के आसन पर उसे प्रतिष्ठित किया है. आप जल्दी ही उस के निकट पधारिए. उस सोमरस को पीने की कृपा कीजिए. (१) शाचिगो शचिपूजनाय ☷ रणाय ते सुतः. आखण्डल प्र हूयसे.. (२) हे इंद्र! आप सामर्थ्यवान व प्रकाशमान किरणों वाले हैं. आप शक्तिमान, पूजनीय और शत्रुओं का मानमर्दन करने वाले हैं. हम ने आप की तृप्ति के लिए यह सोमरस तैयार किया है. आप पधारिए. इस सोमरस को ग्रहण कीजिए. (२) यस्ते शृङ्गवृषो णपातप्रणपात्कुण्डपाय्यः. न्यस्मिन् दध्र आ मनः.. (३) हे इंद्र! शृंगवृष ऋषि के पुत्र सूर्य को आप ने धुरी पर स्थापित किया है. कुंडपायी यज्ञ, जिस में कुंडियों से सोमरस पिया जाता है, में मन लगाने की कृपा कीजिए. (३) ebook converter DEMO Watermarks*
आ तू न इन्द्र क्षमन्तं चित्रं ग्राभ २४ सं गृभाय. महाहस्ती दक्षिणेन.. (४) हे इंद्र! आप बड़ेबड़े हाथों वाले हैं. आप दाएं हाथ में हमारे लिए यशस्वी, विलक्षण और उपयुक्त धन धारण कीजिए. आप हमें उस धन को प्रदान करने की कृपा कीजिए. (४) विद्मा हि त्वा तुविकूर्मिं तुविदेष्णं तुवीमघम्. तुविमात्रमवोभिः.. (५) हे इंद्र! आप बहुत शक्तिमान व बहुत देने योग्य संपत्ति वाले हैं. आप बहुत धनवान व विशाल आकृति वाले हैं. हम जानते हैं कि आप के पास संरक्षण के बहुत सारे साधन हैं. (५) न हि त्वा शूर देवा न मर्तासो दित्सन्तम्. भीमं न गां वारयन्ते.. (६) हे इंद्र! आप पराक्रमी हैं. आप दाता हैं. जैसे भारी भरकम भयंकर बैल को कोई नहीं हटा सकता है, वैसे ही क्या देव, क्या मनुष्य कोई भी आप को नहीं डिगा सकता. (६) अभि त्वा वृषभा सुते सुत २४ सृजामि पीतये. तृम्पा व्यश्नुही मदम्.. (७) हे इंद्र! आप बलशाली हैं. हम आप के पीने के लिए अच्छी तरह छान कर सोमरस तैयार करते हैं. आप उस मदमस्त बना देने वाले सोमरस को पी कर तृप्त होइए. (७) मा त्वा मूरा अविष्यवो मोपहस्वान आ दभन्. मा कीं ब्रह्मद्विषं वनः.. (८) हे इंद्र! आप ब्राह्मणों से द्वेष रखने वालों की सेवा स्वीकार मत कीजिए. मूर्ख मनुष्य व दूसरों की हंसी उड़ाने वालों पर अपनी कृपा मत कीजिए. ये लोग आप पर किसी तरह अपना प्रभाव न जमा पाएं. (८) इह त्वा गोपरीणसं महे मन्दन्तु राधसे. सरो गौरो यथा पिब.. (९) हे इंद्र! यजमान आप से बहुत धन पाना चाहते हैं. वे गाय के दूध में मिले सोमरस से आप को तृप्त करना चाहते हैं. हिरण जैसे तालाब में जल पीता है, वैसे ही आप इस यज्ञ में (पधार कर) सोमरस पीजिए. (९) इदं वसो सुतमन्धः पिबा सुपूर्णमुदरम्. अनाभयिन्नरिमा ते.. (१०) हे इंद्र! आप सर्वव्यापक हैं. आप पेट भर कर इस सोमरस को पीजिए. हम आप जैसे निर्भय को सोमरस समर्पित करते हैं. (१०) नृभिर्धौतः सुतो अश्वैरव्या वारैः परिपूतः. अश्वो न निक्तो नदीषु.. (११) हे इंद्र! नदी के पानी में धो कर जैसे घोड़े को साफ करते हैं, वैसे ही पानी में पत्थरों से कूट कर इस सोमरस को साफ किया है. पत्थरों से कूट कर इस का रस निचोड़ा है. भेड़ के बालों की छलनी से छानछान कर इसे साफ किया है. (११) तं ते यवं यथा गोभिः स्वादुमकर्म श्रीणन्तः. इन्द्र त्वास्मिन्त्सधमादे.. (१२) ebook converter DEMO Watermarks*
हे इंद्र! जौ से जिस प्रकार पुरोडाश (भोग) बनाया जाता है, उसी प्रकार सोम रस में गाय का दूध मिला कर उसे हम ने तैयार किया है. वह सोमरस स्वादिष्ट है. हम उसी सोमरस को पीने के लिए यज्ञ में आप को आमंत्रित करते हैं. (१२) तीसरा खंड इद ँ१ ह्यन्वोजसा सुत ँ१ राधानां पते. पिबा त्वा ३ स्य गिर्वणः.. (१) हे इंद्र! आप धनपति, उपासना के योग्य व बलशाली हैं. आप नियमपूर्वक संस्कार किए गए इस सोमरस को शीघ्र ग्रहण कीजिए. (१) यस्ते अनु स्वधामसत्सुते नि यच्छ तन्वम्. स त्वा ममत्तु सोम्य.. (२) हे इंद्र! आप सोम के योग्य हैं. यह सोमरस आप के लिए तृप्तिदायी हो. यह सोमरस अन्न स्वरूप है. आप इस सोमरस में सशरीर पधारिए. (२) प्र ते अश्नोतु कुक्ष्योः प्रेन्द्र ब्रह्मणा शिरः. प्र बाहू शूर राधसा.. (३) हे इंद्र! आप शक्तिमान हैं. विशुद्ध सोम प्रार्थनाओं से आप के सिर, दोनों भुजाओं व कांखों तक पहुंचे. हम आप से धन चाहते हैं. (३) आ त्वेता नि षीदतेन्द्रमभि प्र गायत. सखाय स्तोमवाहसः.. (४) हे यजमानो! आप इंद्र को प्रसन्न करने के लिए शीघ्र आइए, बैठिए. उन के लिए प्रार्थना व उपासना कीजिए. (४) पुरूतंमं पुरूणामीशानं वार्याणाम्. इन्द्र ँ१ सोमे सचा सुते.. (५) हे यजमानो! आप इकट्ठे होइए. इंद्र शत्रुओं को हराने की सामर्थ्य रखते हैं. वे ऐश्वर्य के स्वामी हैं. आप सभी उन की उपासना कीजिए. (५) स घा नो योग आ भुवत्स राये स पुरन्ध्या. गमद्वाजेभिरा स नः.. (६) हे इंद्र! आप हमें वीर बनाइए और निखारिए. आप हमें समृद्धि प्रदान कीजिए. आप हमें ज्ञान व पोषकता प्रदान कीजिए. आप हमारे समीप पधारने की कृपा कीजिए. (६) योगेयोगे तवस्तरं वाजेवाजे हवामहे. सखाय इन्द्रमूतये.. (७) हे यजमानो! हम पर बारबार कामों में अपनी रक्षा के लिए अपने मित्र इंद्र का आह्वान करते हैं. (७) अनु प्रत्नस्यौकसो हुवे तुविप्रतिं नरम्. यं ते पूर्वं पिता हुवे.. (८) इंद्र स्वर्गवासी हैं. वे बहुत लोगों की मदद करते हैं. हमारे पिता (पूर्वजों) ने उन का आह्वान किया था. हम भी उन का आह्वान करते हैं. (८) ebook converter DEMO Watermarks*
आ घा गमद्यदि श्रवत्सहस्रिणीभिरूतिभिः. वाजेभिरुप नो हवम्.. (९) हे यजमानो! हमें आशा है कि इंद्र हमारी प्रार्थना से प्रसन्न होंगे. वे अपनी रक्षा और वैभव के साथ हमारे पास अवश्य पधारेंगे. (९) इन्द्र सुतेषु सोमेषु क्रतुं पुनीष उक्थ्यम्. विदे वृधस्य रक्षस्य महाँ हि षः.. (१०) हे इंद्र! आप के पुत्र आप के लिए सोमरस परिष्कृत करते हैं. आप महान हैं. आप उन के यज्ञों तथा उन के स्तोत्रों की बढ़ोतरी करते हैं. (१०) स प्रथमे व्योमनि देवाना २४ सदने वृधः. सुपारः सुश्रवस्तमः समप्सुजित्.. (११) हे यजमानो! इंद्र प्रथम देवता हैं. वे आकाश में देवताओं के आवास में निवास करते हैं. वे भलीभांति हमारी रक्षा करते हैं. वे हमें यश प्रदान करते हैं. वे असुर विजेता हैं. हम उन का आह्वान करते हैं. (११) तमु हुवे वाजसातय इन्द्रं भराय शुष्मिणम्. भवा नः सुम्ने अन्तम् सखा वृधे.. (१२) हे इंद्र! हम अन्नप्राप्ति के लिए आप का आह्वान करते हैं. हम अपने भरणपोषण के लिए आप का आह्वान करते हैं. हम सुमन (अच्छे मन वाले) व आप के सखा बनें. आप हमारी बढ़ोतरी में हमारा सहयोग करने की कृपा कीजिए. (१२) चौथा खंड एना वो अग्निं नमसोजों नपातमा हुवे. प्रियं चेतिष्ठमरतिं २४ स्वध्वरं विश्वस्य दूतममृतम्.. (१) हे अग्नि! आप विश्व के दूत हैं. आप अमर, प्रिय व अक्षय हैं. हम अपने यज्ञ में आप का आह्वान करते हैं. (१) स योजते अरुषा विश्वमोजसा स दुद्रवत्स्वाहुतः. सुब्रह्मा यज्ञः सुशमी वसूनां देव २४ राधो जनानाम्.. (२) अग्नि लोगों के लिए धन स्वरूप, विद्वान्, संयमशील व सब को जोड़ते हैं. आप समस्त विश्व को ओज से पूर्ण करते हैं. हम आप का आह्वान करते हैं. (२) प्रत्यु अदर्श्यायत्यु ३ च्छन्ती दुहिता दिवः. अपो मही वृणुते चक्षुषा तमो ज्योतिष्कृणोति सूनरी.. (३) उषा स्वर्गलोक की पुत्री व अंधकार को दूर करती हैं. वे अपनी किरणों से सभी को प्रकाशित करती हैं. वे आंख की ज्योति हैं. वे अंधकार में ज्योति हैं. वे उत्तम नारी हैं. (३) उदुस्रियाः सृजते सूर्यः सचा उद्यन्नक्षत्रमर्चिवत्. eBook converter DEMO Watermarks*
तवेदुषो व्युषि सूर्यस्य च सं भक्तेन गमेमहि.. (४) सूर्य, नक्षत्र और ग्रह ये तीनों आकाश को प्रकाशमान करते हैं. सूर्य अपनी किरणों का प्रसार करते हैं और प्रकाश से हम भक्तों तक पहुंचते हैं. (४) इमा उ वां दिविष्टय उस्रा हवन्ते अश्विना. अयं वामह्ने ऽ वसे शचीवसू विशंविश 28 हि गच्छथ:.. (५) हे अश्विनीकुमारो! आप स्वर्गलोक के वासी हैं. स्वर्ग प्राप्त करने के इच्छुक लोग अपनी इच्छापूर्ति के लिए आप का आह्वान करते हैं. आप स्तुति करने वालों के पास पहुंचते हैं. हम आप का आह्वान करते हैं. (५) युवं चित्रं ददथुर्भोजनं नरा चोदथा 28 सूनूतावते. अर्वाग्रथ 28 समनसा नि यच्छतं पिबत 28 सोम्यं मधु.. (६) हे अश्विनीकुमारो! आप युवा नेता हैं और श्रेष्ठ आहार देने वाले व स्तुति करने वालों को प्रेरित करते हैं. कृपया आप अपना रथ रोकिए. आप अपना मन लगा कर मधुर सोमरस का पान कीजिए. (६) पांचवां खंड अस्य प्रत्नामनु द्युत 28 शुक्रं दुदुह्वे अहय:. पयः सहस्रामृषिम्.. (१) सोमरस चमकीला, ज्ञान बढ़ाने वाला व मनोकामना पूरी करने वाला है. ऋषियों ने इस के सहस्र स्वरूप का स्मरण कर के इसे तैयार किया है. (१) अय 28 सूर्य इवोपद्गय 28 सरा 28 सि धावति. सप्त प्रवत आ दिवम्.. (२) सोम सात धाराओं से उसी प्रकार दौड़ते हैं (प्रवाहित होते हैं), जिस तरह सूर्य स्वर्गलोक से सात किरणों से धरती पर आने के लिए दौड़ते हैं. (२) अयं विश्वानि तिष्ठति पुनानो भुवनोपरि. सोमो देवो न सूर्य:.. (३) सोम सभी भुवनों के ऊपर प्रतिष्ठित हैं व समस्त संसार पर राज करते हैं. वे हमारे सूर्य हैं. (३) एष प्रत्नेन जन्मना देवो देवेभ्यः सुतः. हरिः पवित्रे अर्षति.. (४) सोमरस दिव्य है. देवता संस्कारपूर्वक उसे परिष्कृत करते हैं. वह हरा है और उसे पवित्र छलनी में परिष्कृत किया जाता है. (४) एष प्रत्नेन मन्मना देवो देवेभ्यस्परि. कविर्विप्रेण वावृधे.. (५) सोम कवि और विद्वानों से प्रशंसा प्राप्त करते हैं. वे सभी देवताओं से ऊपर हैं. उन को ebook converter DEMO Watermarks*
संस्कारपूर्वक अनेक विधियों से परिष्कृत किया जाता है. (५) दुहानः प्रत्नमित्पयः पवित्रे परि षिच्यसे. क्रन्दं देवाँ अजीजनः.. (६) सोमरस को छलनी से परिष्कृत किया जाता है और उसे बरतन (पात्र) में निचोड़ा जाता है. सोम आवाज करते हुए पात्र में जाते हैं तो लगता है मानो वे देवताओं का आह्वान कर रहे हों. (६) उप शिक्षापतस्थुषो भियसमा धेहि शत्रवे. पवमान विदा रयिम्.. (७) हे सोम! आप अकल्याणकारियों को भयभीत कीजिए. आप हमारा मार्गदर्शन कीजिए. आप हमें धनधान्य से परिपूर्ण करने की कृपा कीजिए. (७) उपो षु जातमप्तुरं गोभिर्भङ्गं परिष्कृतम्. इन्दुं देवा अयासिषुः.. (८) सोमरस को निचोड़ा जाता है. तत्पश्चात उस को परिष्कृत किया जाता है. फिर जल में मिलाया जाता है. आप को गाय के दूध में मिलाया जाता है. देवता भी सोम को बुलाते हैं. (८) उपास्मै गायता नरः पवमानायेन्दवे. अभि देवाँ इयक्षते... (९) हे यजमानो! आप देवताओं के गुण गाने की अपेक्षा सोम के गुण गाइए. (९) छठा खंड प्र सोमासो विपश्चितो ऽ पो नयन्त ऊर्मयः. वनानि महिषा इव.. (१) सागर की लहरें सागर में जैसे मिल जाती हैं, वैसे सोमरस जल में मिल जाता है. वन में मिले भैंसों की तरह सोमरस जल में एकमेक हो जाता है. (१) अभि द्रोणानि बभ्रवः शुक्रा ऋतस्य धारया. वाजं गोमन्तमक्षरन्.. (२) सोमरस चमकीला है. वह अपनी ऋत की धारा से भूरा सोम गाय के दूध में झरता है. वह शक्तिमान है. (२) सुता इन्द्राय वायवे वरुणाय मरुद्भ्यः. सोमा अर्षन्तु विष्णवे.. (३) सोम इंद्र, वायु, मरुद्गणों व विष्णु को प्राप्त हों. (३) प्र सोम देववीतये सिन्धुर्न पिप्ये अर्णसा. अ ॐ शोः पयसा मदिरो न जागृविरच्छा कोशं मधुश्रुतम्.. (४) हे सोम! आप को पानी से भरीपूरी नदियों की तरह पानी में मिलाया जाता है. आप मदिर (आनंददायी) व जाग्रत हैं. मधुरता चुआते हुए सोमरस (पात्र में) इकट्ठा होता है. (४) ebook converter DEMO Watermarks*
आ हर्यतो अर्जुनो अत्के अव्यत प्रियः सूनुर्न मर्ज्यः. तमी ॐ हिन्वन्त्यपसो यथा रथं नदीष्वा गभस्त्योः.. (५) सोमरस को बच्चे की तरह साफसुथरा बना लिया है. प्रिय सोमरस को तेज गति से जल में मिलाया जाता है. वह वैसे ही वेग से पानी में मिलता है, जैसे युद्ध में तेज गति से कोई रथ जाता है. (५) प्र सोमासो मदच्युतः श्रवसे नो मघोनाम्. सुता विदथे अक्रमूः.. (६) सोमरस आनंद बरसाने वाला व यशदाता है. वह यज्ञ में निरंतर पहुंच कर इच्छाओं की पूर्ति करता है. (६) आदी ॐ ह ॐ सो यथा गणं विश्वस्यावीवशनमतिम्. अत्यो न गोभिरज्यते.. (७) सोमरस हंस की गति से जाता है. वह संसार के बुद्धिमानों की बुद्धि तक पहुंच रखता है. (७) आदीं त्रितस्य योषणे हरि ॐ हिन्वन्त्यद्रिभिः. इन्दुमिन्द्राय पीतये.. (८) सोमरस हरा है. इसे पत्थरों से कूट कर निचोड़ा जाता है. उस को तीन ऋषियों की अंगुलियों से इंद्र के पीने के लिए निचोड़ा जाता है. (८) अया पवस्व देवयू रेभन्पवित्रं पर्योषि विश्वतः. मधोर्धारा असृक्षत.. (९) हे सोम! आप देवताओं से मिलने के इच्छुक हैं. आप पवित्र और अविरल मीठी धारा से झरते हैं व आवाज करते हुए प्रवाहित होते हैं. (९) पवते हर्यतो हरिरति ह्वरा ॐ सि र ॐ ह्या. अभ्यर्ष स्तोतृभ्यो वीरवद्यशः.. (१०) सोमरस पवित्र और हरा है. वह पराक्रमी संतान और यश प्राप्ति के इच्छुक यजमानों के लिए प्रवाहित होता है. (१०) प्र सुन्वानायान्धसो मर्तो न वष्ट तद्वचः. अप श्वानमराधसं हता मखं न भृगवः.. (११) परिष्कृत किए जाते समय सोमरस आवाज करता है. दुष्ट लोग इस आवाज को न सुनें. भृगुओं ने जैसे मख को दूर किया, उसी तरह पापी और कुत्तों को यज्ञ से दूर किया जाए. (११) ebook converter DEMO Watermarks*
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