भारतकोश
संग्रह पर लौटें

साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

Samba Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा

स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)

DevanagariHindipublished424 पृष्ठ

नवमोऽध्यायः ४७

नवमोऽध्यायः ४७

क्योंकि यह सूर्य परिभ्रमण करके लोकत्रय की रक्षा करते हैं। रक्षणार्थ ‘अव’ धातु होता है। रक्षा करने के कारण इनको सविता कहते हैं।।२५।।

देवैरभ्यर्चितो यस्मात्तस्मादर्कः स उच्यते।
अण्डे द्विधा कृते ह्यार्त्तं दृष्ट्वा स्नेहात्पिताऽब्रवीत्।
आर्त्तो मा भव देवेश मार्त्तण्डस्तेन स स्मृतः॥२६॥

देवगण उनकी अर्चना करते हैं, तभी वे अर्क हैं। अण्ड को दो भाग में विभक्त होने पर उन्हें आर्त देखकर पिता ने स्नेह से कहा—हे देवेश! तुम आर्त न हो। तभी उनको मार्तण्ड कहा जाने लगा।।२६।।

यस्माद् धारयते लोकान् भूमिं तेषां ददाति च।
डुधाञ् धारणे धातुस्तस्माद् धाता स उच्यते॥२७॥

क्योंकि लोकों को धारण करते हैं तथा उन्हें भूमिदान करते हैं। धा धातु (डुधाञ्) का अर्थ है—धारण करना। तभी उन्हें धाता कहा जाता है।।२७।।

अचि प्रत्ययपूर्वस्य ऋधातोर्यनिनिपात्यते।
गतौ यस्मात् परो नास्ति तेन सूर्योऽर्यमा स्मृतः॥२८॥

ऋ धातु के गमनार्थक य (ऋ + मन्—कनिन्) प्रत्यय के अर्थ में, जो गमन करते हैं अथवा जिनसे श्रेष्ठ कोई नहीं है। इस अर्थ में सूर्य को अर्यमा कहा गया है।।२८।।

स्नेहेन सर्वभूतानि यस्मात् त्रायति भास्करः।
ञिमिधा स्नेहने धातुस्तस्मान्मित्रः स उच्यते॥२९॥

भास्कर स्नेहवशात् सभी प्राणियों की विपत्ति से रक्षा, त्राण करते हैं। मिद् धातु का अर्थ है—स्नेह, इसलिये इन्हें मित्र कहा गया है।।२९।।

वरान् विवृणवतो देवान् वरदो हि वरार्थिनाम्।
धातुर्वृङ् वरणे प्रोक्तस्तेनासौ वरुणः स्मृतः॥३०॥

वरप्रार्थी देवगण सर्वदा जिनसे वर माँगते रहते हैं, जो उनके लिये वरद हैं, वृ (वृञ्) धातु का अर्थ है—वरण। इसलिये ये वरुण कहे गये हैं।।३०।।

ऐश्वर्यं परमं यस्य पन्नगाश्च सुरासुराः।
ईद्दिश्च परमैश्वर्ये धातुरिन्द्रस्ततस्तु सः॥३१॥

सभी देवता, असुर तथा पन्नगगण जिनके परम ऐश्वर्य हैं, यहाँ इदि धातु का ऐश्वर्य अर्थ है, अतः ये इन्द्र नाम से ख्यात हैं।।३१।।

शक्तोऽयं जगतः कर्तुं सर्गानुग्रहसंग्रहान्।
शक्लृ शक्तौ स्मृतो धातुः शक्रस्तेन स उच्यते॥३२॥

४८ श्रीसाम्बपुराणम्

ये जगत् की सृष्टि-स्थिति-विनाश करने में सक्षम हैं, शक् धातु का अर्थ है—समर्थ; अतः इन्हें शक्र कहा गया है॥३२॥

वसत्यदृष्टः सर्वेषु भूतेष्वन्तर्हितो रविः।
धातुर्वस निवासेति विवस्वांस्तेन तूच्यते ॥३३॥
रवि सभी प्राणियों के अभ्यन्तर में अदृश्य तथा अन्तर्हित होकर वास करते हैं। 'वस' धातु का अर्थ है—निवास। इसलिये इनका नाम विवस्वान् कहा गया है॥३३॥

गर्जशब्दे प्रपूर्वस्य धातोः पर्जन्निपातके।
गर्जत्यतीव यस्माच्च तस्मात् पर्जन्य उच्यते ॥३४॥
प्रपूर्वक गर्ज धातु के निपात से पर्जन शब्द निष्पन्न होता है, क्योंकि वे अत्यन्त गर्जन करते हैं, इसलिये इन्हें पर्जन्य नाम से कहा गया है॥३४॥

यस्मात् सिञ्चति लोकांस्त्रीन् भूर्भुवःस्वोऽमृतादिभिः।
पुष पुष्टौ स्मृतो धातुस्तस्मात् पूषा स उच्यते ॥३५॥
अमृतादि द्वारा भू-भुवः तथा स्वः—इन लोकत्रय का सिञ्चन (पोषण) करते हैं। पुष धातु का अर्थ है—पुष्टि (पोषण करना); इस कारण उनको पूषा कहते हैं॥३५॥

अंशु व्याप्तावयं धातुः प्रियश्चापानुरागतः।
सूर्यो व्याप्तं जगद् यस्मात्तस्मादंशुः स उच्यते ॥३६॥
अंशु धातु का अर्थ है—व्याप्ति एवं प्रीति तथा अनुरागवशात् सूर्य समस्त जगत् को व्याप्त करते हैं; अतः उनको अंशु कहा जाता है॥३६॥

सेव्यते यः सुरैः सर्वैः भांश्चैव भजते यतः।
धातुर्भजेति सेवायां तेनासौ भग उच्यते ॥३७॥
सकल देवगण के द्वारा जो सेवित होते हैं, क्योंकि ये किरणसमूह का भजन करते हैं। भज धातु का अर्थ है—सेवा; अतः यह सूर्य भग नाम से उक्त हैं॥३७॥

तुष तुष्टौ स्मृतो धातुस्तस्मात् त्वष्टा निपात्यते।
सृजत्येष प्रजास्तुष्टस्त्वष्टा तेन स उच्यते ॥३८॥
तुष धातु का अर्थ तुष्टि है। उससे त्वष्टा शब्द का निपातन होता है। ये तुष्ट होकर प्रजागण की सृष्टि करते हैं; अतः इन्हें त्वष्टा कहा गया है॥३८॥

यस्माद्विश्वमिदं सर्वमादित्येनेह रश्मिभिः।
विष्ऌ व्याप्तौ स्मृतो धातुस्तस्माद्विष्णुः स उच्यते ॥३९॥
आदित्य अपनी रश्मि द्वारा इस समस्त विश्व को व्याप्त करते हैं; विष्ऌ धातु का व्याप्ति अर्थ है, तभी वे विष्णु हैं॥३९॥

नवमोऽध्यायः ४९

नवमोऽध्यायः ४९

बृहदस्य शरीरं यदप्रमेयं प्रमाणतः।
बृहद्विस्तीर्णमित्युक्तं ब्रह्मा तेन स उच्यते ॥४०॥

इनका बृहद् शरीर परिमाण में अप्रमेय है; बृहद् का अर्थ है—विस्तीर्ण। अतः वे ब्रह्मा कहे जाते हैं॥४०॥

पूज्यन्ते च सुरैः सर्वैर्महांश्चैव प्रमाणतः।
धातुर्मह तु पूजायां महादेवस्ततः स्मृतः॥४१॥

समस्त देवताओं से जो पूजित होते हैं तथा प्रमाणतः जो महान् हैं। मह धातु का अर्थ है—पूजा; अतः वे महादेव कहे गये हैं॥४१॥

सन्निवर्हति यद्वीक्षेद् यदुग्रो यत् प्रतापवान्।
मांस-शोणित-मज्जादौ यत्ततो रुद्र उच्यते ॥४२॥

जो निर्वाह करते हैं, जो देखते हैं, जो उग्र तथा प्रतापवान हैं, जो मांस, रक्त, मज्जादि में वर्त्तमान हैं, इसलिये वे रुद्र कहे जाते हैं॥४२॥

यस्मात् सृष्ट्यनुगृह्लीते गृह्यते चैव यत् पुनः।
गुणात्मना तु त्रैकाले तस्मादेकः स उच्यते ॥४३॥

जो गुणात्मस्वरूप है (सत्त्व, रज, तमरूप); जो सृष्टि तथा अनुग्रह करते हैं, पुनः ग्रहण करते हैं (लय करते हैं); इसीलिये उनको त्रैकाल कहा जाता है॥४३॥

अयं परमयं नेति ब्रुवन्ते भिन्नदर्शनाः।
तामसान् मूढभावाच्च दृष्ट्वा तान् विब्रुवन्ति च॥४४॥

भिन्न दर्शन वाले इन्हें 'हैं, नहीं हैं'—इत्यादि से कहते हैं। तामस तथा मूढ़ भाव वाले ऐसा कहते हैं॥४४॥

ब्रह्मणः कारणः केचित् केचिदाहुर्दिवाकरम्।
केचिद्भक्तिपरत्वेन त्वाहुः विष्णुं तथापरे ॥४५॥
कारणं तु स्मृता होते नानार्थेषु सुरोत्तमाः।
एकः स तु पृथक्त्वेन स्वयम्भुरिति विश्रुतः॥४६॥

कुछ लोग सूर्य को ही ब्रह्मा की उत्पत्ति में कारण मानते हैं, तो कुछ लोग भक्ति के वशीभूत होकर विष्णु को कारण मानते हैं। ये देवश्रेष्ठगण नाना अर्थ में 'कारण' कहे गये हैं। वे इन सबसे पृथक् रूप से अकेले ही स्वयम्भु हैं॥४५-४६॥

यथानुरुध्यते वर्णैर्विचित्रैः स्फटिको मणिः।
तथा गुणवशात्तस्य स्वयम्भोरनुरञ्जनात् ॥४७॥

जैसे स्फटिक मणि विचित्र वर्णाभा से युक्त होती है, वैसे ही गुणवशतः अनुरञ्जन हेतु वे स्वयम्भु नाना रूप से युक्त होते हैं॥४७॥

५० श्रीसाम्बपुराणम्

एको भूत्वा महामेघः पृथक्त्वेनावतिष्ठते।
वर्णतो रूपतश्चैव यथा गुणवशानुगः॥४८॥

जैसे महामेघ एक होने पर भी गुणवशात् वर्ण तथा रूपभेद से पृथक्-पृथक् रूप से अवस्थित रहता है, वैसे ही एक स्वयम्भु सूर्य गुणवशतः पृथक्-पृथक् रूप से प्रतीत होते हैं॥४८॥

नभसः पतितः तोयं याति तोयान्तरं यथा।
भूमे रसविशेषेण तथा गुणवशात्तु सः॥४९॥

जैसे आकाश से पतित जल भूमि तथा विशेष रस के साथ युक्त होकर अन्न-जलरूप में प्रतीत होता है, वैसे ही वे गुणवशात् पृथक् रूप में प्रतीत होते हैं॥४९॥

यथा दिव्यविशेषाद्वा वायुरेकः पृथग् भवेत्।
दुर्गन्धो वा सुगन्धो वा तथा गुणवशात्तु सः॥५०॥

जैसे आकाश में अविशेष एक वायु दुर्गन्ध अथवा सुगन्धभेद से पृथक् होती है, वैसे ही गुणवशात् वह सूर्य पृथक् रूपेण प्रतिभात होता है॥५०॥

यथा वा गार्हपत्योऽग्निरन्यत्संज्ञान्तरं व्रजेत्।
दक्षिणााहवनीयादि ब्रह्मादिषु तथा ह्यसौ॥५१॥

जैसे एक गार्हपत्य अग्नि दक्षिण, आहवानीयादि भेद से पृथक् संज्ञायुक्त हो जाती है, वैसे ही एक सूर्य ब्रह्मादि विविध नाम से अभिहित होते हैं॥५१॥

एकत्वे च पृथक्त्वे च प्रोक्तमेतन्निदर्शनम्।
तस्माद्भक्तिः परा कार्या देवे ह्यस्मिन् दिवाकरे॥५२॥

एकत्व तथा पृथक्त्व का यही कारण है। अतएव दिवाकर की परम भक्ति करना ही उचित है॥५२॥

एष ब्रह्मा च विष्णुश्च एष एव महेश्वरः।
एष वेदाश्च यज्ञाश्च स्वर्गश्चैव न संशयः॥५३॥

ये ही ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश्वर हैं। ये ही समस्त वेद, यज्ञ तथा स्वर्गलोक हैं, इसमें कोई संदेह नहीं है॥५३॥

सूर्यव्याप्तमिदं विश्वं जगत् स्थावरजङ्गमम्।
अद्यते पीयते चैव अन्नपानात्मको रविः॥५४॥

स्थावर-जङ्गमात्मक यह समस्त विश्व सूर्य से ही व्याप्त है। ये ही भक्षित तथा पीत होते हैं। अन्नपानात्मक रवि यही हैं॥५४॥

नवमोऽध्यायः ५१

नवमोऽध्यायः ५१

सर्वत्र सविता देवस्तनूभिर्नामभिश्च सः। नृक्षेषु चातिथौ वायौ व्योम्नि चाग्नौ च सर्वशः ॥५५॥

नक्षत्र, अतिथि, वायु, आकाश तथा अग्नि सर्वत्र—यह सविता देव विशेष तनु तथा विभिन्न नाम से विद्यमान हैं॥५५॥

एवंविधो ह्ययं सूर्यः सदा पूज्यो विजानता। आदित्यं वेत्ति यत्नेन स तस्मिन्नेव लीयते ॥५६॥

इस प्रकार से विज्ञजन के लिये सूर्य सदा पूज्य हैं। इन आदित्य को जो जानते हैं, वे इन्हीं में लीन हो जाते हैं॥५६॥

अप्येकं वेत्ति यो नाम धात्वर्थनिगमैः रवेः। स रागैर्वर्जितः सर्वैः सद्यः पापात् प्रमुच्यते ॥५७॥ नहि पापकृतः साम्ब भक्तिर्भवति भास्करे। तस्मात्त्वं परया भक्त्या प्रपद्यस्व दिवाकरम् ॥५८॥

इति श्रीसाम्बपुराणे सूर्य-निगमनं नाम नवमोऽध्यायः

रवि के नाम-धात्वर्थ तथा निगमों द्वारा जो एक सूर्य को भी जानते हैं, वे सभी रोगों से आरोग्य प्राप्त करके सद्यः पापमुक्त हो जाते हैं। हे साम्ब! पापकारी लोग कभी भी भास्कर की भक्ति नहीं पाते। अतएव तुम परम भक्ति के साथ दिवाकर के शरणागत हो जाओ॥५७-५८॥

श्रीसाम्ब पुराणान्तर्गत सूर्य के विभिन्न नामों का अर्थ-निरूपण नामक नवम अध्याय समाप्त

दशमोऽध्यायः

(राज्ञी-निक्षुभोत्पत्तिः)

वशिष्ठ उवाच
एवं श्रुत्वा तु कात्स्न्र्येन दृष्टो जाम्बवतीसुतः।
जातकौतूहलो भूयः परिपप्रच्छ नारदम् ॥१॥

वशिष्ठ देव कहते हैं—ऐसा समुदाय वृत्तान्त सुनकर आनन्दित होकर जाम्बवती-पुत्र साम्ब ने कौतूहल-वशात् नारद से पूछा।।१।।

साम्ब उवाच
अहो सूर्यस्य माहात्म्यं वर्णितं हर्षवर्धनम्।
येन मे भक्तिरुत्पन्ना परे देवे विभावसौ ॥२॥
अतो राज्ञीं महाभागां निक्षुभां च महामुने।
दण्डिनं पिङ्गलादींश्च एवमेतद् वदस्व मे ॥३॥

साम्ब कहते हैं—अहो! आनन्दवर्धक सूर्य के माहात्म्य का आपने वर्णन किया; जिससे परमदेव विभावसु में मेरी भक्ति उत्पन्न हो गई है। अतः हे महामुने! महाभाग्यवती राज्ञी तथा निक्षुभा, दण्डी तथा पिङ्गलादि की कथा भी मुझसे कहिये।।२-३।।

नारद उवाच
प्रागुक्तेऽर्कस्य द्वे भार्ये ते राज्ञीनिक्षुभे शुभे।
तयोश्च राज्ञी द्यौर्ज्ञेया निक्षुभा पृथिवी स्मृता ॥४॥
पौषस्य कृष्णसप्तम्यां द्यौरर्केणेह पूज्यते।
माघस्य कृष्णसप्तम्यां मह्या सह भवेद्रविः ॥५॥

नारद कहते हैं—पहले जो सूर्य की दो पत्नियों की बातें कही हैं, (मंगलमयी राज्ञी तथा निक्षुभा) इनमें राज्ञी है—स्वर्ग तथा निक्षुभा हैं—पृथिवी। पौष मास के कृष्णपक्ष की सप्तमी को राज्ञी का पूजन अर्क (सूर्य) के साथ होता है एवं माघ मास की कृष्ण सप्तमी को निक्षुभा के साथ रवि पूजित होते हैं।।४-५।।

भूश्चादित्यश्च भगवान् गच्छतः सङ्गमं तदा।
ऋतुस्नाता मही तत्र गर्भं गृह्णाति भास्करात् ॥६॥
द्यौर्जलं सूर्यतो गर्भं वर्षार्त्तुषु भूतले।
तत्र लौकिकवार्त्तार्थं मही सस्यं प्रसूयते ॥७॥

तब पृथिवी एवं भगवान् आदित्य संगत होते हैं। ऋतुस्नाता पृथिवी वहाँ भास्कर से

दशमोऽध्यायः ५३

दशमोऽध्यायः ५३

गर्भ धारण करती हैं। स्वर्ग लोक में सूर्य से जलरूप गर्भ धारण करके वर्षा ऋतु में भूतल पर जल प्रदान करती है। लौकिक जीविकार्थ शस्य उत्पन्न होता है।।६-७।।

सस्योपयोगसंहृष्टा आहुतिं जुह्वति द्विजाः।
स्वाहाकारैः वषट्कारैर्यजन्ते पितृदेवताः ॥८॥

शस्यलाभ से प्रसन्न होकर ब्राह्मणगण यज्ञ में भूतल पर आहुति देते हैं। स्वाहाकार तथा वषट्कार द्वारा पितृदेवों का यजन करते हैं।।८।।

निक्षुभा कुरुते यस्मादोषधीभिः स्वधामृतैः।
मर्त्यान् पितॄंश्च देवांश्च तेन भूर्निक्षुभा स्मृता ॥९॥

निक्षुभा औषधी ही स्वधा तथा अमृत द्वारा मनुष्य, पितृगण तथा देवताओं को स्वस्थ करती हैं, अतएव पृथिवी को निक्षुभा कहा गया है।।९।।

यथा राज्ञी द्विधा भूता यस्य चेयं सुता स्मृता।
अपत्यानि च यान्यस्यास्तानि वक्ष्यामि तच्छृणु ॥१०॥

जिस प्रकार से राज्ञी ने दो स्वरूप ग्रहण किया है और उन्हें कन्या कहा गया है और उनके जितने सन्तान हैं, उन सबको कहता हूँ; सुनो।।१०।।

मरीचिर्ब्रह्मणः पुत्रो मरीचेः कश्यपः सुतः।
तस्माद्धिरण्यकशिपुः प्रह्लादस्तस्य चात्मजः ॥११॥
प्रह्लादस्य सुतो नाम्ना विश्रुतोऽथ विरोचनः।
विरोचनस्य भगिनी सञ्ज्ञाया जननी तु सा ॥१२॥

मरीचि ब्रह्मा के पुत्र हैं। मरीचि के पुत्र हैं—कश्यप। उनके पुत्र थे—हिरण्यकशिपु एवं इनके पुत्र थे—प्रह्लाद। विरोचन नाम का विख्यात प्रह्लाद का पुत्र हुआ। विरोचन की बहन सञ्ज्ञा को उत्पन्न करने वाली हुई।।११-१२।।

हिरण्यकशिपोः पौत्री दितेः पुत्रस्य सा स्मृता।
सा विश्वकर्मणः पत्नी प्रह्लादी चोच्यते बुधैः ॥१३॥

हिरण्यकश्यप की पौत्री दिति विश्वकर्मा की पत्नी थी। उन्हें प्रह्लादी (प्रह्लाद की पुत्री) भी कहते हैं।।१३।।

अथ नाम्ना सुरूपेति मरीचेर्दुहिता शुभा।
पत्नी त्वङ्गिरसः सा तु जननी च बृहस्पतेः ॥१४॥
बृहस्पतेस्तु भगिनी भुवनी ब्रह्मवादिनी।
प्रभासस्य तु सा पत्नी वसूनामष्टमस्य तु ॥१५॥

तदनन्तर सुरूपा नामक मरीचि की जो कन्या थीं, वे ऋषि अंगिरस की पत्नी तथा बृहस्पति की जननी थीं। बृहस्पति की भगिनी ब्रह्मवादिनी भुवनी अष्टम वसु प्रभास की पत्नी हैं।।१४-१५।।

५४
श्रीसाम्बपुराणम्

प्रसूता विश्वकर्माणं सर्वशिल्पवतां वरम्।
स वै नाम्ना पुनस्त्वष्टा त्रिदशानां स वर्धकिः॥१६॥

उन्होंने सभी शिल्पियों में श्रेष्ठ विश्वकर्मा को जन्म किया। वे पुनः देवताओं के संवर्धक त्वष्टा भी कहे जाते हैं॥१६॥

देवाचार्यस्य तस्यायं दुहिता विश्वकर्मणः।
सरेणुरिति विख्याता त्रिषु लोकेषु भाविनी ॥१७॥

इन देवाचार्य विश्वकर्मा की कन्या सरेणु नाम से प्रख्यात है। ये त्रैलोक्य का उत्पादन करने वाली हैं॥१७॥

राज्ञी संज्ञा च सा स्त्री च प्रभा सैव तु भास्वतः।
तस्या एव सुता छाया निक्षुभा सा महीयसी ॥१८॥

राज्ञी, संज्ञा तथा प्रभा नाम से ख्यात ये सूर्यपत्नी हैं। उनकी कन्या है—छाया, जो पृथ्वीमयी निक्षुभा हैं॥१८॥

विशेष—पुराणों में छाया को सूर्यपत्नी कहा गया है—'छायामार्त्तण्ड सम्भूत'। छाया एवं सूर्यसम्भूत (पुत्र) शनि हैं। परन्तु यहाँ इस श्लोक के अनुसार छाया सूर्यपुत्री हैं। यह संदेहास्पद कथन है। हो सकता है कि यह पाठ की त्रुटि हो। इसका पाठान्तर है—तस्या एषा तु या छाया। विज्ञजन सत्यासत्य का निर्णय स्वयं करें।

सापि भार्या भगवतो मार्तण्डस्य महात्मनः।
साध्वी पतिव्रता देवी रूपयौवनशालिनी।
रन्तुं वै नररूपेण सूर्यो भवति वै पुरा ॥१९॥

वे भी भगवान् मार्तण्ड की भार्या हैं। वे साध्वी, पतिव्रता, रूप-यौवनशालिनी देवी हैं। पूर्व में सूर्य से रमण करने के लिये उन्होंने नररूप धारण किया था॥१९॥

आदित्यस्य तु यद्रूपं महता स्वेन तेजसा।
गात्रेषु प्रतिरुद्धेषु नातिकान्तमिवाभवत् ॥२०॥
अन्विष्यन्नेषु गात्रेषु भगं दृष्ट्वा पिताब्रवीत्।
आर्त्तत्त्वं भव मार्त्तण्ड मार्त्तण्डस्तेन न स्मृतः ॥२१॥

इति साम्बपुराणे राज्ञीनिक्षुभोत्पत्तिर्नाम दशमोऽध्यायः

निज के महान् तेज से आदित्य का जो रूप है, गात्र में प्रतिरुद्ध होकर वह अति कमनीय नहीं है। (उनके शरीर का) गात्र का अन्वेषण करके भग को देखकर (सूर्य को देखकर) पिता ने कहा है—मार्त्तण्ड! तुम आर्त न होओ, अतः उनका नाम मार्त्तण्ड पड़ा॥२०-२१॥

श्री साम्बपुराण में राज्ञी तथा निक्षुभा की उत्पत्ति-नामक दशम अध्याय समाप्त

एकादशोऽध्यायः

(सूर्यपुत्राणां विवरणम्)

नारद उवाच
अतः परं प्रवक्ष्यामि प्रजास्तस्य महात्मनः।
त्रीण्यपत्यानि संज्ञायां जनयामास वै रविः॥१॥
द्वौ पुत्रौ तु महाभागौ कन्यां कालिन्दिमेव च।
मनुर्वैवस्वतो ज्येष्ठः श्राद्धदेवः प्रजापतिः॥२॥
ततो यमो यमी चैव यमलौ सम्बभूवतुः।
तेजस्त्वभ्यधिकं तस्य नित्यमेव विवस्वतः॥३॥

नारद कहते हैं—इसके पश्चात् महात्मा सूर्य के सन्तानों का वर्णन करता हूँ। रवि की संज्ञा नामक भार्या से तीन सन्तानें हुईं। महाभाग्यवान दो पुत्र हुये तथा कन्या कालिन्दी का जन्म हुआ। ज्येष्ठ पुत्र वैवस्वत मनु तथा द्वितीय हैं—प्रजापति श्राद्धदेव। तत्पश्चात् यमज (जुड़वा) सन्तान हुई—यम तथा यमी। इस प्रकार इन सूर्य का तेज नित्य अधिक होने लगा॥१-३॥

तेनातितापयामास त्रींल्लोकान् सचराचरान्।
गोलाकारं तु तद्रूपं दृष्ट्वा संज्ञा विवस्वतः।
असहन्ती तु तत्तेजः स्वां छायां प्रेष्य चाब्रवीत्॥४॥

सूर्य का वह तेज तीनों लोकों को तापित करने लगा। सूर्य का वह गोलाकार रूप देखकर संज्ञा उसे सहन न कर सकी। उन्होंने अपनी छाया से कहा॥४॥

संज्ञोवाच
भव नारीस्वरूपा त्वं लक्षणैः सदृशी मम॥५॥
एवमुक्त्वा समुत्तिष्ठत्तस्याः सदृशलक्षणा।
महीमयी तु सा संज्ञा तस्या च्छाया समुत्थिता॥६॥

संज्ञा कहती है—‘तुम मेरे समान नारीरूपा हो जाओ’। तत्पश्चात् संज्ञा पृथिवीमयी होकर छायारूपेण उत्थित हो गयीं॥५-६॥

प्राञ्जलिः प्रणता भूत्वा छाया संज्ञामभाषत॥७॥
यदर्थमहमुत्पन्ना तदाज्ञापय शोभने।
सर्वमेव करिष्यामि यद्यपि स्यात्तु दुष्करम्॥८॥

५६ | श्रीसाम्बपुराणम्

विनम्रतापूर्वक प्रणाम करके छाया ने संज्ञा से कहा कि मैं जिस कार्य के लिये उत्पन्न हुई हूँ, मुझसे कहें। आप जो भी कहेंगी, वह सब मैं करूँगी, यद्यपि यह बहुत ही दुष्कर है॥७-८॥

संज्ञोवाच

अहं यास्यामि भद्रं ते स्वयमेव गृहं विभुः।
निर्विकारेण वक्तव्यं त्वयेह भवने मम ॥९॥
हेमौ च बालकौ ह्यङ्के कन्या च वरवर्णिनी।
सम्भाव्या नैव चाख्येयमिदं भगवतस्त्वया ॥१०॥

संज्ञा कहती है—तुम्हारा मंगल हो, मैं अपने पिता के घर जाऊँगी। तुम मेरे रूप में स्थिर भाव से अवस्थान करो। इन दो बालकों की तथा वरवर्णिनी गोद की कन्या की तुम देखभाल करो। तुम भगवान् सूर्य से कभी भी यह सब नहीं कहना॥९-१०॥

नाख्यास्यामि मतं तस्मै गच्छ देवि! यथासुखम्।
इत्युक्ता छायया संज्ञा जगाम भवनं पितुः ॥११॥
पितुः समीपे गत्वा तु व्रीड़िता सा तपस्विनी।
वर्षाणां तु सहस्रं वै वसमाना पितुर्गृहे ॥१२॥

छाया ने उत्तर दिया—मैं तुम्हारी बात को सूर्यदेव से कभी प्रकट नहीं करूँगी। हे देवि! तुम यथासुख जाओ। छाया द्वारा ऐसा कहने पर संज्ञा पिता के घर चली गयीं; किन्तु पिता के पास जाकर लज्जित होकर सहस्र वर्ष-पर्यन्त पिता के घर में रहती हुई तपस्या करने लगीं॥११-१२॥

भर्तुः समीपं याहीति पित्रोक्ता सा पुनः पुनः।
आगच्छत् बड़वा भूत्वा त्यक्त्वा रूपं यशस्विनी ॥१३॥

जब पिता ने बार-बार यह कहा कि स्वामी के पास जाओ, तब उन यशस्विनी ने अपना रूप छोड़कर घोड़ी का रूप धारण कर लिया॥१३॥

उत्तरांश्च कुरून् गत्वा तृणान्यथ चचार ह।
ततो गतायां संज्ञायां संज्ञायां वचनेन सा ॥१४॥
संज्ञारूपं ततः कृत्वा छाया सूर्यमुपस्थिता।
द्वितीयायां तु संज्ञायां संज्ञेयमित्यचिन्तयत् ॥१५॥

तदनन्तर संज्ञा उत्तर कुरु में जाकर तृण खाती हुई रहने लगी। इधर संज्ञा के पितृगृह चले जाने पर छाया संज्ञा के कथनानुसार संज्ञा का रूप धारण करके सूर्य के पास गई और उन्हें भगवान् सूर्यदेव ने भी संज्ञा ही समझा॥१४-१५॥

एकादशोऽध्यायः ५७

एकादशोऽध्यायः ५७

भास्करो जनयामास पुत्रौ कन्यां च रूपिणीम् । पूर्वजस्य मनोस्तुल्यौ सादृश्येन च तावुभौ ॥१६॥ छाया को सूर्यदेव से दो पुत्र तथा एक कन्या उत्पन्न हुई। उन पुत्रद्वय ने ज्येष्ठ भ्राता मनु का सादृश्यलाभ किया॥१६॥

श्रुतश्रवा स्वधर्मज्ञ श्रुतकर्मा तथैव च । श्रुतकर्मा मनुस्ताभ्यां सावर्ण्यो भविष्यति ॥१७॥ श्रुतश्रवा स्वधर्मज्ञ एवं श्रुतकर्मा भी उसी प्रकार थे। श्रुतश्रवा तथा मनु से बहुत से सूर्यवंशीगणों का उद्भव हुआ। श्रुतश्रवा भविष्य में सावर्णि मनु होंगे॥१७॥

श्रुतकर्मा स विज्ञेयो ग्रहो यो वै शनैश्चरः । कन्या च तपती नाम्ना रूपेणाप्रतिमा भुवि ॥१८॥ श्रुतकर्मा ग्रहरूप में अत्यन्त प्रसिद्ध हैं। वे शनिग्रह नाम से प्रसिद्ध हैं और कन्या तपती रूप में अत्यन्त अपूर्व थी॥१८॥

संज्ञा तु पार्थिवी तेषामात्मजानां तथाकरोत् । स्नेहेन पूर्वजानां तु तथा कृतवती तु सा ॥१९॥ पृथिवी संज्ञा (अर्थात् छाया) अपने पुत्र से जितना स्नेह करती थी, वैसा पूर्वजात (पहले उत्पन्न हुये) संज्ञा के पुत्रों से नहीं करती थी॥१९॥

मनुस्तु क्षमते तस्या यमस्तस्या न च क्षमेत् । बहुशो शोच्यमानस्तु पितुः पत्न्या सुदुःखितः ॥२०॥ स वै कोपाच्च बाल्याच्च भाविनोऽर्थस्य गौरवात् । पादेन तर्जयामास छायां वैवस्वतो यमः ॥२१॥ वह मनु को जिस प्रकार प्रेम करती थी, उस प्रकार यम को प्रेम नहीं करती थी, इस कारण अत्यधिक शोक करते हुये अपने पिता की पत्नी से दुःखित उन वैवस्वत यम ने क्रोध से बाल्यवशात् तथा भावी दैवावेश के कारण पैर से छाया का तर्जन किया॥२०-२१॥

तं शशाप ततः क्रुद्धा संज्ञा सा पार्थिवी शुभा । यदा तर्जयसे यन्मां पितुर्भार्या गरीयसीम् । तस्मात्तवैष चरणः पतिष्यति न संशयः ॥२२॥ इससे क्रुद्ध होकर पार्थिवी संज्ञा (छाया) ने यम को अभिशाप दिया कि 'पिता की भार्या गरीयसी होती है; क्योंकि तुमने मेरा तर्जन किया है, अतएव तुम्हारा यह पैर (जिससे मुझ पर प्रहार किया है) गिर जायेगा'। यह निःसंदिग्ध है॥२२॥

५८ | श्रीसाम्बपुराणम्

यमस्तु तेन शापेन भृशं पीड़ितमानसः।
मनुना सह धर्मात्मा पृष्टः सर्वं न्यवेदयत्॥२३॥
स्नेहेन तुल्यं महता माता देव! न वर्त्तते॥२४॥

इससे धर्मात्मा यम ने उस शाप से अत्यन्त पीड़ित होकर मनु के साथ पिता के पास जाकर समस्त वृत्तान्त बताया। 'हे देव (पिता)! माँ के समान स्नेह की समता इसमें कहीं नहीं है॥२३-२४॥

सन्त्यज्य प्रायशोऽस्मान् सा कनीयांसो विधित्सति।
तस्यां मयोद्यतः पादो न च देहे निपातितः॥२५॥

प्रायः हमारा परित्याग करके वे छोटे भाइयों का अधिक यत्न करती हैं। मैंने उन्हें पैर दिखलाया था, किन्तु वह उनके शरीर से नहीं लगा॥२५॥

बालाद्वा यदि वा मोहात् तद्भवान् वक्तुमर्हसि।
शप्तोऽहमेव देवेश जनन्या तपसा वर।
तव प्रसादाच्चरणस्त्रायतां महतो भयात्॥२६॥

हे देवेश! बालक-स्वभाव से अथवा मोह से आप जो भी कहें, हे तपश्रेष्ठ! जननी द्वारा मैं अभिशप्त हो गया हूँ। उस महाभय से आपकी कृपा से मेरी रक्षा हो॥२६॥

रविरुवाच
असंशयं मरुत्पुत्र भविष्यत्यत्र कारणम्।
येन त्वामाविशत् क्रोधो धर्मज्ञं धर्मशालिनम्॥२७॥

रवि कहते हैं—हे पुत्र! इस व्यापार में निश्चय ही विशेष कारण है; क्योंकि धर्मज्ञ तथा धर्मशाली तुममें क्रोध ने प्रवेश किया है॥२७॥

सर्वेषामेव शापानां प्रतिघातस्तु विद्यते।
न तु मात्राभिशप्तानां क्वचिन्मोक्षो भवेदिह॥२८॥
न शक्यमेतन्मिथ्या तु कर्तुं मातुर्वचस्तव।
क्वचित्तेऽहं विधास्यामि पुत्रस्नेहादनुग्रहम्॥२९॥
कृमयो मांसमादाय पतिष्यन्ति महीतले।
कृतमस्या वचः सत्यं त्वं च त्राता भविष्यसि॥३०॥

समस्त शाप का प्रतिकार है; किन्तु माता के अभिशाप को मिथ्या कर सकने में मैं भी समर्थ नहीं हूँ। किन्तु पुत्रस्नेह के कारण कुछ कृपा कर सकता हूँ। कृमिगण मांस लेकर भूमि पर पतित होंगे, इससे उनके वाक्य की सत्यता भी होगी और तुम भी त्राण पा जाओगे॥२८-३०॥

एकादशोऽध्यायः ५९

एकादशोऽध्यायः ५९

नारद उवाच

आदित्यस्त्वब्रवीत् छायां किमर्थं तनयेषु वै।
तुल्येष्वभ्यधिकः स्नेह एकत्र क्रियते त्वया ॥३१॥
सा परिहरन्त्यस्मै नाचचक्षे विवस्वतः।
आत्मानं स समाधाय युक्तस्तथ्यमपश्यतः ॥३२॥
तां शप्तुकामो भगवान् नाशाय कुपितः प्रभुः।
ततः छाया यथावृत्तमाचचक्षे विवस्वतः ॥३३॥

नारद कहते हैं—तत्पश्चात् आदित्य भगवान् ने छाया से पूछा कि तुम बराबर के पुत्रों में से एक में अधिक स्नेह करती हो? युक्तियुक्त कोई मार्ग न देखकर स्वयं को संयत करके छाया ने परिहार करने की इच्छा से सूर्य को कोई उत्तर नहीं दिया। इससे क्रुद्ध होकर प्रभु सूर्यदेव छाया के विनाश के लिये शाप देने हेतु कुपित हो गये। तदनन्तर छाया ने सूर्य को सब वृत्तान्त बतलाया॥३१-३३॥

विवस्वांस्तु ततः श्रुत्वा क्रुद्धः श्वशुरमभ्यगात्।
स चापि तं यथान्यायमर्चयित्वा तु रोपितम् ॥३४॥
निर्दग्धुकामं रोषेण सान्त्वयामास तं शनैः ॥३५॥

विवस्वान् छाया के वचन सुनकर क्रोधित हो अपने श्वसुर के पास गये। उन्होंने (विश्वकर्मा ने) भी उनकी यथायोग्य संवर्धना करके उनके कोप से दग्धकाम चित्त को धीरे-धीरे सान्त्वना प्रदान किया॥३४-३५॥

विश्वकर्मोवाच

तवातितेजसाविष्टमिदं रूपं सुदुःसहम्।
असहन्ती तु सा संज्ञा वने वसति शाद्वले ॥३६॥
द्रक्ष्यसे तां भवानद्य स्वां भार्यां शुभचारिणीम्।
रूपार्थं भवतोऽरण्ये चरन्तीं सुमहत्तपः ॥३७॥

तुम्हारा यह तेजोरूप अत्यन्त दुःसह है। वह संज्ञा उसे सहन न कर पाने से तृणाच्छादित वन में तप कर रही है। आज तुम अपनी मंगलचारिणी भार्या को देख सकोगे। तुम्हारे इस तेजोरूप के कारण वह अरण्य में महान् तप कर रही है॥३६-३७॥

मतं मे ब्रह्मणो वाक्यं यदि ते देव! रोचते।
रूपं निवर्त्तयाम्यद्य तव कान्तमरिन्दम ॥३८॥
रूपं विवस्वतश्चासीत्तिर्यगूर्ध्वमधः समम्।
तेनापि पीड़ितो देवो रूपेण ते दिवस्पतिः ॥३९॥

६० श्रीसाम्बपुराणम्

सन्तुष्टस्तस्य तद्वाक्यं बहु मेने महातपाः।
अनुज्ञातस्ततस्त्वष्टा रूपनिर्वर्त्तनस्य तु॥४०॥

हे देव! मेरे समान ब्राह्मण का वाक्य यदि आपको रुचिकर लगे, तब हे अरिन्दम! आपके इस रूप को मैं कमनीय बना दूँ। सूर्य का रूप तब तिर्यक्, ऊर्ध्व, अधः, सम था। उस रूप से सूर्यदेव स्वयं पीड़ित थे। सन्तुष्ट होकर महातपा सूर्य ने उनके वाक्य का सम्मान किया और रूप-परिवर्त्तनार्थ त्वष्टा (विश्वकर्मा) को अनुमति प्रदान किया॥३८-४०॥

विश्वकर्माभ्यनुज्ञातः शकद्वीपे विवस्वतः।
भ्रमिमारोप्य तत्तेजः शान्तयमास तस्य वै॥४१॥
आज्ञया लिखितश्चासौ निपुणं विश्वकर्मणा।
नाभ्यनन्दत्तल्लिखनं ततस्तेनावतारितः॥४२॥
तत्तु निष्पादितं रूपं तेजसापहृतेन तु।
कान्तात् कान्तरं भूत्वा ह्यधिकं शुशुभे ततः॥४३॥

विश्वकर्मा ने अनुज्ञात होकर शकद्वीप में चक्र का आरोपण करके सूर्य के उस तेज को संयत किया। आदेश पाकर विश्वकर्मा ने निपुणता से रेखा बनाया; किन्तु उस अङ्कन को सूर्य ने पसन्द नहीं किया। तब उन्होंने वहाँ से उतर कर तेज का अपहार करके (तेज-संवरण करके) अपना रूप निष्पन्न किया। तदनन्तर सुन्दर से सुन्दर रूप में इनकी आकृति शोभित हो गयी॥४१-४३॥

ददर्श योगमास्थाय स्वां भार्यां बड़वां तदा।
अधृष्यां सर्वभूतानां तेजसा स्वेन संवृताम्॥४४॥
अश्वरूपेण मार्तण्डस्तां मुखे समभावयत्।
मैथुनाय विचेष्टन्ती परपुंसो विशङ्कया॥४५॥
सा तद्विवस्वतः शुक्रं नासिकाभ्यां निरावमत्।
देवौ तस्यामजायेतामश्विनौ भिषजां वरौ॥४६॥

तब सूर्यदेव ने अपने योगबल से अपने तेज को संवृत करके सकल प्राणियों द्वारा अधृष्य घोड़ी रूप से वर्तमान अपनी भार्या को देखा। तब मार्त्तण्ड ने भी अश्वरूप धारण करके उनसे मुख मिलाया। परपुरुष से मैथुन असंगत जानकर संज्ञा ने सूर्य के शुक्र को अपनी नासिका से बाहर निकाल दिया, जिससे चिकित्सकश्रेष्ठ अश्विनीकुमार उत्पन्न हुये॥४४-४६॥

नासत्यश्चैव दस्रश्च स्मृतौ तौ नामतोऽश्विनौ।
ततः कान्तं स्वकं रूपं दर्शयामास भास्करः॥४७॥

एकादशोऽध्यायः ६१

वे अश्विनीकुमार नासत्य (नासिका से तेज त्याग करने से) तथा दस्र (रोग नाशकारी) नाम से अभिहित हो गये। तदनन्तर सूर्यदेव ने संज्ञा के समक्ष अपना रूप प्रदर्शित किया॥४७॥

तं दृष्ट्वा सापि संज्ञा तु तुतोष च मुमोद च।
तस्माच्च शुक्रसंयोगाद् गुणाद् भूमेस्तथैव च ॥४८॥
अश्वारूढ़शरी धन्वी कुमारः समजायत।
यतो यं रेतसो जातस्तेन देवेन भावितः ॥४९॥
रैवतो नामतस्त्वेष ख्यातिं लोके गमिष्यति।
सप्तद्वयादितो लोकात् पूजां प्राप्स्यति नित्यशः ॥५०॥

उन्हें देखकर संज्ञा भी तुष्ट तथा आनन्दित हो गयीं। उस शुक्रसंयोग तथा भूमि के गुण से अश्वारूढ़ कुमार उत्पन्न हुये। सूर्यदेव का जो रेतः जहाँ गिरा था, वह जगत् में रैवत नाम से प्रसिद्ध हो गया तथा वह चतुर्दश भुवन में नित्य पूजित हो गया॥४८-५०॥

प्लवन गच्छन् प्रयन् यस्माद्वसुमतयां यतस्ततः।
मनुर्यमो यमी चैव सावर्णिंश्च शनैश्चरः ॥५१॥
तपती चाश्विनौ चैव रेवन्तश्च रवेः सुताः ॥५२॥

वसुमति से धावन, गमन तथा संयमन के कारण मनु, यम तथा यमी, सावर्णि, शनि-ग्रह, तपती, अश्विनीकुमार-द्वय तथा रेवन्त—ये सब रवि के पुत्रगण हुये॥५१-५२॥

एवमेषा पुरा संज्ञा द्वितीया पार्थिवी स्मृता।
या संज्ञा सा स्मृता राज्ञी छाया या सापि निक्षुभा ॥५३॥

इस प्रकार इनमें पूर्व में जो थीं, वे संज्ञा थीं और जो द्वितीया थीं (छाया थीं) वे पार्थिवी कही जाती हैं। जो संज्ञा हैं, वे राज्ञी हैं और जो छाया है, वे हैं निक्षुभा॥५३॥

राजृ दीप्तौ स्मृतो धातुः राजा राजयते सदा।
अधिकं सर्वभूतेभ्यो राजते च दिवाकरः ॥५४॥
राजपत्नी तु सा यस्मात्तेन राज्ञी प्रकीर्तिता ॥५५॥

राज् धातु का अर्थ है—दीप्ति। जो सदा प्रदीप्त हैं, वे राजा एवं समस्त प्राणिगण के मध्य अधिक दीप्तिलाभ करते हैं। अधिक रूप से दीप्त होने के कारण वे राजा कहलाते हैं। संज्ञा राजपत्नी होने के कारण राज्ञी कहलाती हैं॥५४-५५॥

ते यं सञ्चालिता यस्माद् राज्ञा यत्तदुपाहतम्।
क्षुभ सञ्चलने धातुर्निक्षुभा तेन निश्चला ॥५६॥

राजा द्वारा सञ्चालित होने के कारण उन्हें ऐसा कहा गया है। क्षुभ धातु का अर्थ है—संचालन। अतएव निक्षुभा का अर्थ है—निश्चला॥५६॥

६२ श्रीसाम्बपुराणम्

भवन्त्यतीव यस्माद्वा स्वर्गेऽपि क्षुद्विवर्जिता ।
छायाति विशते दिव्या स्मृता सा तेन निक्षुभा ॥५७॥

जो अत्यन्त रूप से विद्यमान है अथवा स्वर्ग में जो क्षुधा-विवर्जित है, दिव्य छाया में जो प्रवेश करती है, इसी कारण उन्हें निक्षुभा कहा गया है॥५७॥

यमस्तु तेन शापेन भृशं पीड़ितमानसः ।
धर्मेण रक्षयामास धर्मराजस्ततोऽभवत् ॥५८॥

यम उस अभिशाप से अत्यन्त पीड़ित होकर धर्म द्वारा (पिता द्वारा) रक्षित हुये थे; इसीलिये उनको धर्मराज कहा गया॥५८॥

शुभेन कर्मणा चैव संप्राप्तः परमां द्युतिम् ।
पितॄणामाधिपत्यं च लोकपालत्वमेव च ॥५९॥

शुभ कर्म द्वारा (यम ने) परम द्युति प्राप्त किया तथा पितृगण का आधिपत्य एवं लोकपालत्व पाया॥५९॥

यस्तु ज्येष्ठो मनुस्तेषां सर्गस्तस्य तु साम्प्रतम् ।
तस्याप्यैक्ष्वाकवो वंशो यस्मिन् जातो बृहद्बलः ॥६०॥

इनमें से जो ज्येष्ठ मनु थे, उनसे ही सृष्टि हुई है। उनसे इक्ष्वाकु वंश प्रादुर्भूत हुआ। उसी वंश में महाराज बृहद्बल ने जन्म लिया था॥६०॥

कनीयसी तयोर्यातु यमी कन्या यशस्विनी ।
अभवत्सा सरिच्छ्रेष्ठा यमुना लोकपावनी ॥६१॥

उनमें जो कनिष्ठा, यशस्विनी कन्या यमी थी, वे लोकपावनी श्रेष्ठ नदी यमुना हुईं॥६१॥

मनुः प्रजापतिश्चैव सावर्णिः सुमहातपाः ।
भाव्यः सोऽनागते तस्मिन् मनुः सावर्णिकोऽन्तरे ॥६२॥

मनु प्रजापति एवं महातपा सावर्णि भविष्य में सावर्णि मनु होंगे॥६२॥

मेरुपृष्ठे तपो दिव्यमथापि चरति प्रभुः ।
भ्राता शनैश्चरस्तस्य ग्रहत्वं स तु लब्धवान् ॥६३॥

उनके भ्राता शनिश्चर ने मेरुपृष्ठ पर तपस्या करके ग्रहत्व प्राप्त किया था॥६३॥

तपती नाम या भानोस्तयोः कन्या कनीयसी ।
सा बभूव शुभा पत्नी राज्ञः संवरणस्य तु ॥६४॥

एकादशोऽध्यायः ६३

एकादशोऽध्यायः ६३

जो तपती नामक सूर्य की कनीयसी कन्या थी, वे राजा संवरण की मंगलमयी पत्नी हुईं॥६४॥

तपती नाम नद्येवं विन्ध्यपादाद् विनिस्सृता।
नित्यं पुण्यजला स्नानैर्मार्तण्डतनया शुभा॥६५॥

तपती नामक जो नदी विन्ध्य पर्वत के पाददेश से निकलती है, वे मार्तण्डतनया नित्य पुण्यसलिला तथा स्नान द्वारा मङ्गलदात्री हैं॥६५॥

अश्विनौ देववैद्यत्वं लब्धवन्तौ यशस्विनौ।
तयोः कर्मोपजीवन्ति लोकेऽस्मिन् भिषजः शुभाः॥६६॥

अश्विनी कुमारद्वय देववैद्यत्व लाभ करके यशस्वी हो गये। उनका कर्म इस जगत् के कुशल चिकित्सकगण ग्रहण करके जीवन-यापन करते हैं॥६६॥

रेवन्तो नाम योऽर्कस्य रूपेणाप्रतिमः सुतः।
सत्ववान् पावनः सोऽथ शीघ्रमेव प्रसीदति॥६७॥

रेवन्त नामक रूप में अतुलनीय जो सूर्यपुत्र हैं, वे सात्विक तथा पवित्रकारक हैं। वे शीघ्र प्रसन्न होते हैं॥६७॥

क्षेमेण ब्रजते ध्यानं यस्तु पूजयते पथि।
सुखप्रसादो मर्त्यानामाख्यास्यति यथासुखम्॥६८॥

जो मंगलपूर्ण ध्यान करते हैं तथा कहीं जाते समय इनका ध्यान करते हैं, वे मर्त्यगण के (पृथ्वी के) यथेच्छ सुख प्रसन्नता पाते हैं॥६८॥

य इदं जन्म देवानां शृणुयाद्वा पठेत्तथा।
विवर्द्धयतोऽथ पुत्राणां सर्वेषामपि तैजसम्॥६९॥
आपदं प्राप्य मुच्येते प्राप्नुयाच्च महत्फलम्॥७०॥
इति श्रीसाम्बपुराणे सूर्यपुत्राणां विवरणं नामैकादशोऽध्यायः

जो इन देवता के जन्म-वृत्तान्त को सुनते हैं अथवा पाठ करते हैं, वे सभी पुत्रगण की तैजस कृपा (वृद्धि) को प्राप्त करते हैं एवं विपत्ति से मुक्त होकर महान् फल पाते हैं॥६९-७०॥

श्री साम्बपुराण में सूर्यपुत्र-विवरण नामक एकादश अध्याय समाप्त

द्वादशोऽध्यायः

(सूर्यस्य शरीरलिखनम्)

साम्ब उवाच

शरीरलिखनं भानोरुक्तं संक्षेपतस्त्वया ।
विस्तराच्छ्रोतुमिच्छामि तन्ममाचक्ष्व सुव्रत ॥१॥

साम्ब कहते हैं—सूर्य के शरीर के मसृणता-सम्पादन के विषय में आपने संक्षेप में कहा है। मैं विस्तार से सुनना चाहता हूँ। हे सुव्रत! मुझसे कहिये॥१॥

नारद उवाच

पितृगृहे गतायां तु संज्ञायां यदुनन्दन ।
भास्करश्चिन्तयामास संज्ञां मद्रूपकाङ्क्षिणीम् ॥२॥
याता पितृगृहं यच्च तपस्तेपे यशस्विनी ।
तस्मान्मनीषितं तस्याः पूरयामि मनोरथम् ॥३॥

नारद कहते हैं—हे यदुनन्दन साम्ब! संज्ञा के पितृगृह चले जाने पर भास्कर चिन्ता करने लगे ‘संज्ञा मुझे रूपवान् देखना चाहती है। पिता के घर पर वह यशस्विनी तप कर रही है। अतएव मैं उसका मनोरथ पूर्ण करूँगा’॥२-३॥

एतस्मिन्नन्तरे ब्रह्मा तत्रागत्य दिवाकरम् ।
ऊचे मधुरया वाचा रवेः प्रीतिकरं वचः ॥४॥

इस अवसर पर ब्रह्मा वहाँ आकर मधुर भाषा में प्रीतिकर वाक्यों द्वारा सूर्य से इस प्रकार कहने लगे॥४॥

आदिदेवोऽसि देवानां ज्ञातमेतत् स्वयं मया ।
श्वशुरो विश्वकर्मा ते रूपं निर्वर्त्तयिष्यति ॥५॥

तुम देवगण के आदिदेव हो, यह मैं स्वयं जानता हूँ। तुम्हारे श्वसुर विश्वकर्मा तुम्हारे रूप का परिवर्त्तन कर देंगे अर्थात् काट-छाँटकर मसृण तथा सुश्रीक कर देंगे॥५॥

एवमुक्त्वा रविं ब्रह्मा विश्वकर्माणमब्रवीत् ।
निवर्त्तयस्व रूपं तं मार्त्तण्डस्य तु शोभनम् ॥६॥

तदनन्तर ब्रह्मा ने रवि से ऐसा कहने के उपरान्त विश्वकर्मा से कहा—तुम मार्त्तण्ड को शोभन रूप से युक्त कर दो॥६॥

द्वादशोऽध्यायः ६५

ततो ब्रह्मसमादेशाद् भ्रमिमारोप्य भास्करम्।
रूपं निवर्त्तयामास विश्वकर्मा शनैः शनैः॥७॥

तदनन्तर भगवान् ब्रह्मा के आदेशानुसार विश्वकर्मा ने घूर्णचक्र पर भास्कर को स्थापित करके धीरे-धीरे उनके रूप को मसृणता प्रदान किया॥७॥

ततस्तुष्टाव तं ब्रह्मा सर्वैर्देवगणैः सह।
गुह्यैर्नानाविधैः स्तोत्रैर्वेदवेदाङ्गसम्मितैः ॥८॥

तदनन्तर ब्रह्मा सभी देवगण के साथ उनकी वेद-वेदांगसम्मत नानाविध गुह्य स्तोत्रों से स्तुति करने लगे॥८॥

स्वस्ति तेऽस्तु जगन्नाथ वर्षघर्महिमप्रभ।
शान्तिं जुषस्व लोकानां देवदेव दिवाकर! ॥९॥
ततो रुद्रश्च विष्णुश्च भक्त्या तुष्टुवतुस्तदा।
तेजस्ते वर्धतां देव खिल्यमानं दिवस्पते ॥१०॥
इन्द्रस्त्वागत्य तं देवं लिख्यमानमथास्तुवत्।
जय देव जयस्वेति शश्वज्जय जगत्पते ॥११॥
ऋषयश्च ततः सप्त विश्वामित्रपुरोगमाः।
तुष्टुवुर्विविधैः स्तोत्रैः स्वस्तिस्वस्तीति वादिनः ॥१२॥

हे जगन्नाथ! आपका मंगल हो। वर्षा, ताप तथा दिन प्रदान करने वाले हे देवदेव दिवाकर! लोकों का शान्ति-विधान करिये। तदनन्तर रुद्र तथा विष्णु ने उनकी स्तुति किया—हे देव! हे दिवस्पति! आपका मसृण तेजवर्द्धित हो। तदनन्तर इन्द्र ने मसृणता-प्राप्त सूर्य की स्तुति की—जय हो! हे देव! आप जयलाभ करें। हे जगत्पते! आपकी सदा जय हो। तदनन्तर विश्वामित्र आदि सप्तर्षियों ने स्तुति की—'आपका मंगल हो'। यह कहकर वे सभी विविध स्तोत्रों को पढ़ने लगे॥९-१२॥

वेदोक्ताभिस्तथाशीर्भिर्बालखिल्याश्च तुष्टुवुः।
त्वं नाथ मोक्षिणां मोक्षो ध्येयस्त्वं ध्यायिनां सदा ॥१३॥
स्वर्गतिः सर्वसत्त्वानां त्वयि सर्वं प्रतिष्ठितम्।
शं प्रजाभ्योऽस्तु देवेश प्रसन्नोऽस्तु जगत्पते ॥१४॥

बालखिल्यादि वेदोक्त आशीर्वाद द्वारा उनकी स्तुति करने लगे। हे नाथ! आप मोक्षार्थी गण के मोक्ष तथा ध्यानकोविदों के सर्वदा ध्येय हैं। सकल प्राणिगण के आप स्वर्ग-प्रापक हैं। आप ही में सबकुछ प्रतिष्ठित है। हे देवेश! प्रजागण का मंगल हो। जगत्पति आप प्रसन्न होईये॥१३-१४॥

६६ श्रीसाम्बपुराणम्

यथा विद्याधरा नागा यक्षराक्षसपन्नगाः।
कृताञ्जलिपुटाः सर्वे शिरोभिः प्रणता रविम् ॥१५॥
ऊचिरे विविधा वाचो मनःश्रोत्रसुखावहाः।
सह्यं भवतु तेजस्ते भूतानां भूतभावन! ॥१६॥

विद्याधर, नाग, यक्ष, राक्षस, पन्नग सभी अञ्जलिबद्ध होकर रवि का मन तथा कानों को सुखावह लगने वाले विचित्र स्तोत्र पढ़ने लगे। हे भूतभावन! आपका तेज सभी प्राणीगण सहन कर सकें॥१५-१६॥

ततो हाहा हूहूश्चैव तुम्बुरुर्नारदस्तथा।
उपगायितुमारब्धा गन्धर्वकुशला रविम् ॥१७॥
षड्ज-मध्यम-गान्धार-ग्रामत्रय-विशारदाः ।
मूर्च्छनाभिश्च तालैश्च सम्यारितशकैशिकैः ॥१८॥

तदनन्तर हाहा, हूहू, तुम्बुरु तथा नारद स्तुति करने लगे। गन्धर्वकुशल गण रवि-सम्बन्धित गायन गाने लगे। षड्ज, मध्यम, गान्धार, ग्रामत्रय में जो विशारद थे, वे मूर्च्छना तथा ताल के संयोग से गायन करने लगे॥१७-१८॥

विश्वाची च घृताची च ह्युर्वशी च तिलोत्तमा।
मेनका च सुजन्या च रम्भा चाप्सरसां वरा ॥१९॥
उपनर्त्तितुमारब्धा लिख्यमानं विभावसुम्।
हावभावविलासैश्च कुर्वन्त्योऽभिनयान् बहून् ॥२०॥

विश्वाची, घृताची, उर्वशी, तिलोत्तमा, मेनका, सुजन्या तथा अप्सरागण में श्रेष्ठ रम्भा नृत्य आरम्भ करके मसृणता-प्राप्त विभावसु के उद्देश्य से हाव-भाव-विलास के द्वारा अनेक अभिनय करने लगीं॥१९-२०॥

ततः तीब्रलयं गेयं मधुरं चाभ्यवर्त्तत।
सर्वेषामेव देवानां मनःश्रोत्रसुखप्रदम् ॥२१॥

तत्पश्चात् अति मधुर अव्यक्त कलकल ध्वनि उत्थित होने लगी, जो सभी देवताओं के मन तथा कर्ण के लिये सुखप्रद थी॥२१॥

प्रवाद्यन्तः ततस्तन्त्री-वीणा-देवादिदर्दुरा।
पणवाः पुष्कराश्चैव मृदङ्गाः पटहास्तथा ॥२२॥
देवदुन्दुभयः शङ्खः शतशोऽथ सहस्रशः।
गायद्भिश्चैव गन्धर्वैर्नृत्यद्भिश्चाप्सरोगणैः ॥२३॥
तूर्यवादित्रघोषैश्च सर्वं कोलाहलीकृतम् ॥२४॥