शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
४५६ ] [ श्रीशारदा तिलक प्रभृति लिखे और श्लोक से संवेष्टित करके कृपालु वायु बीजों से आवृत्त इस यन्त्रों को बनाना चाहिये ।३०। निशा-विष मषी ब्रह्म दण्डी और मर्कटी अर्थात् कपि कच्छु से नीचे की ओर मुख करके जहाँ पर भी निखनन करे वहाँ मनुष्योंका सदा उच्चाटन होता है। यह सस्य अर्थात् फसल की हानि-वर्षा का न होना तथा गौओं का नाश किया करता है ।३१। कर्म के साथ ही साध्य और साधक का नाम होना चाहिये । कर्णिका में स्थित तुम्बुरु मन्त्र में कहे गये चार बीजक और नायक ने सहित स्मर को दिग्देशों में लिखे । तुम्बुरु के मध्य में स्मरगत जम्प- दक लिखें और दिग्गत दलों में विद्या लिखे तथा देवी दलों में स्मर को लिखे । कोणस्थों में नाम सहित लिखे । बाहर पाशङ्कज में रत लिखे । यह मन्त्र वश्य करने वाला और ब्रह्मादि के भय के हरने वाला तथा ग्रह अभिचार को हरण करने वाला है। इसका तात्पर्य यह है किदेवी बीज के मध्य में काम बीज और उसका नाम होना चाहिये । इस प्रकार से कोण चतु.दलों में लिखे में तुम्बुरुदेवता है ।३२-३३। हित्वा कामं लिखंत्शास्तिः यन्त्रेऽस्मिम् नृकपालके । सन्ध्यासु तापयेतेतदुच्चैः साध्य वशं नयेत् ।३४ हित्वा शान्ति लिखेद्धर्मं पटे वा नरचर्मणि । वह्नि वायुगृहावोतं स्मशानस्थंपूर्त्ति हरेत् ।३५ त्यक्त्वा वर्म लिखेद्स्त्र' फलकेऽक्षतरूद्भवे । वह्नि वायुयुतं नाम विषाढ्यरुधिरेण तत् ।३६ चत्वरे निखनेद्यन्त्रं विद्वेषं कुरुते मिथः । हित्वा रं ध्यकारौद्वौ लकार मध्यतो लिखेत् ।३७ धरापुरेण बीजं तदिष्टकान्तर्निवेशितम् । सर्वेषां स्तम्भनं कुर्यान्नात्र कार्या विचारणा । अब वश्य प्रयोग बतलाते हैं-काम के पाँच बीजकों का त्याग करके दीर्घ इकार अर्थात् विन्दु के सहित शान्ति को लिखे और शान्ति के स्थान में वर्म अर्थात् हूँ लिखे । मनुष्य के कपाल में इस मन्त्र में लिखना
एकोनविंश पटल ] [ ४५७ चाहिये तथा संध्याओं में अतिशय से इसको तापे तो साध्य जो भी हो उसको वश्य लेता है ।३४। अथवा शान्ति का त्याग करके पट में अथवा नरचर्म में वायु गृहातीत वह्नि की श्मशान में स्थित पूरि का हरण करे । वर्म का त्याग करके विभीतक के पदे अस्त्र को लिख और विश से युक्त रुधिर से वायुसे युक्त वह नाम तुम्बुरु बीज मिलकर वहाँ पर लकार लिखे । इस यन्त्र को चत्वर में लिखना कर देवे तो परस्पर में विशेष कर देता है । रेफ और मकार दोनों को त्याग करके मध्य में लकार लिखना चाहिये । धरापुर से अर्थात् काम में तुम्बुरु के मध्य में वायुबीज को लिखे और दो ईंटों के मध्य में निवेशित कर देवे । यह सब का स्तम्भन करता है इसमें कुछ भी संशय नहीं है ।२५-३८। हित्वा लकारं तन्मध्ये वायुबीजं समालिखेत् । विषरक्तमषीकाकपुरीषैर्ध्वजवाससि । ३६ श्मशाने निहितं कुर्यात् कुलोच्छेदं स्ववैरिणाम् । मुक्त्वावायुमयं बीजं तत्र फट्कारमालिखेत् ।४० प्रेतवस्त्रे काकस्य रुधिरेण यथाविधि । ईप्सिते निक्षिपेत्स्थाने विद्वेषं कुरुते नृणाम् ।४१ मेस्त्रबीजमपास्यास्मिन् लकारं सार्णसंयतम् । विलिखत्पत्रमेतस्यात् लोहत्रयसमावृतम् ।४२ सर्वरोगप्रशमन कृत्याद्रोहादिशान्तिदम् । विहाय बीजं लृङ्कारं ग्लौं कारं तत्र संलिखेत् ।४३ क्षकारणावृतं वाह्ये पाशाङ्कुशवृतं पुनः । ठपरेणवृतं भूयो भूमिमण्डलमध्यगम् ।४४ लकारैर्बिन्दुसंयुक्तैर्वेष्टितं तद्वहिः क्रमात् । सर्गान्तमातृकाबीज सर्वं वृत्तेन वेष्टितम् ।४५ कौशेयकर्प्पटे कॢप्तमिष्टकाद्वयमध्यगम् । सेनाग्रे निखनेद्यन्त्र स्तम्भेनं कुरुते ध्रुवम् ।४६
४५८ ] [ श्रीशारदा तिलक ल्कार को त्याग करके उसके मध्य में वायु बीज को लिखे तथा उसे वि-रक्त-मषी तथा कौए के मल से ध्वज वस्त्र पर लिखना चाहिए। फिर उसे श्मशानसे निहित कर देवे तो अपने शत्रुओं का कुलो च्छेद कर दिया करता है। वायुमय बीज का त्याग करके वहां पर फट्कार लिखे । शव के वस्त्र पर कौए के रुधिरसे विधि के सहित लिखे और उसको अभीष्ट स्थान में निखनन कर देवे तो मनुष्योंमें विद्वेष कर दिया करता है। इसका तात्पर्य यह है कि जिनमें विद्वेषण करना होवे दोनों उस स्थान का उल्लघन करे ऐसे ही स्थान में गाड़ना चाहिए । । ३६-४१। इसमें स्त्र बीज का त्याग कर सार्ण से युक्त लकार को विशेष रूप से लिखे । यह मन्त्र लोहत्रय समावृत होना चाहिए। यह समस्त रोगों का शमन करने वाला और कृत्या द्रोह आदि की शान्ति करने वाला है। लृकार बीज का त्याग करके वहाँ पर ग्लौंकार लेखन करे ।४२।४३। बाह्य में क्षकार से आवृत और फिर पाशांकु से वृत होवें । फिर ठ पर से वृत हो और भूमि मण्डल के मध्य में जाने वाला हो। उसके बाहिर क्रम से बिन्दु से युक्त लकारोंसे वेष्टित होवे । सर्गान्त मातृ का बीज सब वृत से वेष्ठित होवे ।४४-४६। मध्ये श्रीनरसिंहबीजमथ तद्बाह्ये स्वरान् केसरे । वारीट् चन्द्रयमेन्द्रदिक्षु विखिलेन्मध्ये मनुङ्गारुडम् । अन्तस्थाम् मरुदग्निनिऋ तिशैवेष्वालिख्य वर्णावृतम्। यन्त्र मर्गिभिरष्टाभिः परिवृतं संवर्तकैङ्गारुडम् ।४७। सवर्तकोनेत्रयुतः पार्श्वस्तारोग्निसुन्दरी । गारुडो मनुराख्यातो विषद्वयविनाशनः ।४८ स्मरन् गरुडमात्मानं मन्त्रमेनं जपेन्नरः । विषमालोकनेनैव हन्यान्नागकुलोद्भवम् । ६ मध्ये वार्ण भृगुस्थ विलिखतु विधिवत्साध्यनाम्ना समेतम् किञ्जल्केषु स्वराः स्युर्व्वसुदलविवरेष्वालिखेन्मध्यबीजम् ।
एकोनविंश पटल ] [ ४५६ काद्यार्णान् केमरेषु द्विगुणवसुदलेष्वर्पयेन्मध्यबीजम् । यन्त्रं संजीवनारूयं सोललपुणत क्षुद्ररोगापहारि ।५० मध्ये पिण्डमघोदलाद्विषु लिखेद्धारीशताराधिप प्रताधीशवरशक्रदिक्षु विमतेर्मध्ये चवर्णां लिखेत् । यादोन्मारुतवह्निरराक्षसशिवेष्वर्णान् बहिर्वेष्टयेत् । काद्यै वर्मविलोचनन कलितं पिण्डाख्ययन्त्रं परम् ।५१ अब गारुड़ यन्त्र बताया जाता है कौशेयवस्त्रमें क्लप्त और दो ईंटों के मध्य में रहने वाला यन्त्र को सेनाग्र में गाड़ देवे तो निश्चय ही स्तम्भन किया करता है। कर्णिकाके मध्य में श्री से युक्त नरसिंह बीज लिखे। यहाँ श्री शब्द से एक देश रेफ का ग्रहण किया गया है। उसके बाह्य में केसर स्वरों को लिखे तथा मध्य में गारुड़ मन्त्र को लिखना चाहिए। इनको वारीट चन्द्र यम और इन्द्र दिशाओं में लिखे । बिन्दु सहित अन्तस्थ वर्णों को मरुद्अग्नि निऋं ति और शिव दिशाओं में लिखकर वर्णों वृत्त करे । विसर्ग युक्त आठ संवर्तकों से परिवृत गारुढ़ यन्त्र होता है ।४७। अब गारुड़ मन्त्र बतलाते हैं--नेत्रयुक्त सम्वर्तक अर्थात् इकारसे संयुत क्षकार और पार्श्व अर्थात् पकार, प्रणव तथा अग्नि सुन्दरी-स्वाहा-इस प्रकार का गारुड़ मन्त्र कहा गया है, जो कि स्थावर और जङ्गम दोनों विषों का विनाश करने वाला होता है। इस गारुड़ मन्त्र का स्मरण करता हुआ जो मनुष्य जाप किया करता है वह वलो- कन मात्रसे ही नागकुलसे समुत्पन्न विष का हनन कर देता है ।४८-४६। अब सञ्जीवन मन्त्र बताया जाता है-आठ दलों वाली कर्णिका में सकार में स्थित वकार से युक्त बीज को लिखे तथा विधि के सहित साध्य का नाम लिखना चाहिए। किञ्जल्कों में स्वर होने चाहिए । द्विगुण वसु दलों में मध्य बीज को लिखे तथा केसरों में कादि शान्त वर्णों का लेखन करे । द्विगुण वसुदल का अभिप्राय षोड़श दलों से होता है यह प्रथम पटल में कथित सञ्जीवन नामक यन्त्र है जो क्षुद्र रोगों का अपहरण करने वाला है, इसका मृत्यु जप देवता है ।५०। अब पिण्ड
४६० ] [ श्रीशारदा तिलक मन्त्र बतलाते हैं—अष्ट दलों वाली कर्णिका के मध्य में उन-उन बीजों से संयुत विदर्भित नाम लिखना चाहिये । वश्य प्रयोग में पाश बीज, शांति प्रयोग में वरुण बीज, उच्चाटन में क्रोधाग्नि बीज लिखे । मध्य में पिणु और नीचे दलादिल में पश्चिम में—उत्तर दिशा में दक्षिण दिशा में और पूर्व दिशा में गरुड़ मन्त्र के मध्य में कर्णिकान्तर अन्त्य अक्षर लिखे अर्थात् चवर्णों को लिखना चाहिए । बाहर वदि अर्थात् परवल आदि को लिख । पश्चिम उत्तर तथा पूर्व दिशाओं में बाहिर अर्णों को वेष्टित करे । दक्षिण नाम विलोचन अर्थात् दीर्घ इकार से संयुत क-आद्यों से कल्पित पिण्ड नामक परम यन्त्र होता है । यहाँ पर पिण्डान्या देवता है ॥५१॥ मनुस्वरॆन्दुजेशोग्निंसंयुतश्चपुराननः । पिण्डवीजमिदं प्रोक्त पुंसां सर्वार्थसाधकम् ।५२ बीजेनानेन सञ्जप्तं मन्त्रं रक्षाकरं परम् । आयुरारोग्यजननं लक्ष्मीसौभाग्यवश्यदम् ।५३ चौरसर्पमृगव्यालभूतामयंनिकृन्तनम् । गर्भरक्षाकर स्त्रीणां पुत्रदं क्षुद्रनाशनम् ॥ धृतं मूर्ध्नि करोत्येतल्लोकवश्यमणत्तमम् ।५४ मध्ये तोयगृहे लकारविवरे साण्णाढ्यसाध्यं । पत्रेष्वष्टसु हंसमन्त्रमभितोह्मार्णसंवेष्टितम् । यन्त्रं भूमिगृहेण वेष्टितमिदं मूर्द्धना सदा धारितम् । हन्यात् क्षुद्रमहाज्वरामयरिपून् दद्यात् यशः सम्पदः ।५५ ईकारमध्ये विलिखेत्ससाध्यं तमष्टपत्रेषु पुनर्विलिख्य । संवेष्टयेत् तेन धरापुरस्थं यन्त्रं भवेद्वश्यकं नराणाम् ।५६ ताम्रपात्रे समालिख्य यन्त्रमेतत्प्रपूजयेत् । वशयेत्सकलान्मर्त्यान्नात्र कार्या विचारणा ।५७
एकोनविंश पटल ] [ ४६१ मध्ये भान्तं भृगुविनिहितं नामवर्णैः प्रवीतम् । टान्तं लान्तोन्वितमथलिखेदष्टपत्रेषु भूयः । भूविम्बस्थं निगदितमिदं साधुसञ्जीवनाख्यम् । शस्त्रोद्भूतं भयमपहरेत् धार्यमाण भुजेन ।५८ वार्णावृतं साध्ययुत सकार टान्ते लिखेदिष्टदलेषु हंसम् । आवेष्टयेदम्बुगृहेण बाह्यं लान्तावृत्तं यन्त्रमिदं ज्वरघ्नम् ।५६ अब पिण्ड बीज का उद्धार कहते हैं-मनुस्वर का अर्थ है 'औ' - इन्दु अर्थात् विन्दु, अजेश, जकार, अग्नि, रेफ यह चतुरानन वकार है । यह पिण्ड बीज मनुष्यों के समस्त अर्थों का साधक कहा गया है । ।५२। इस बीज के द्वारा जाप किया हुआ मन्त्र परम रक्षा करने वाला होता है यह आयु और आरोग्य को उत्पन्न करने वाला तथा लक्ष्मी और सौभाग्य एवं वश्य करने वाला होता है ।५६। चोर, सर्प, मृग, व्याल और भूत योनि द्वारा होने वाले भय को दूर करता है। स्त्रियों के गर्भ की रक्षा करने वाला और पुत्र सन्तति प्रदान किया करता है तथा क्षुद्रों का नाशक है । इसको मस्तक पर धारण करने पर अत्युत्तम लोगों को वश्य किया करता है ।५४। अब अन्य मन्त्र के विषय में बतलाते हैं - कर्णिका के मध्य में लकारन्त यकार के सहित साध्य और साधक का नाम लिखना चाहिए । आठों दलों में हंसार्ण से संवेष्टित सब ओर हंस मन्त्र लिखे । इस मन्त्र को भूमिगृह से वेष्टित कर सदा मस्तक पर धारण करना चाहिये । इसका फल यह होता है कि क्षुद्र-महा ज्वर की पीड़ा का तथा शत्रुओं का हनन कर देता है और यश तथा सम्पत्ति प्रदायक होता है । अब वश्य करने वाला बताया जाता है-ईकार के मध्य में साध्य को लिखकर उसको फिर अष्ट दलों में लिखना चाहिये । उससे धरा पुरस्थ को संवेष्ठित करेतो यह मन्त्र मनुष्यों को वश्य करने वाला होता है। ताम्र पात्र में इस मन्त्र को लिखकर फिर इसकी अर्चना करनी चाहिए तो यह सभी मनुष्यों को वशीभूत कर लिया करता है- इसमें तनिक भी सन्देह नहीं करना चाहिये ।५७। अब अन्य के भय को
४६२ । [ श्रीशारदातिलक दूर करने वाला बताते हैं-आठ दलों वाली कर्णिका में साध्य और साधक के नामों के वर्णों से वेष्टित लकार स्थमकार लिखे । टकार लान्तान्वित लिखें और आठ दलोंमें पुनः लिखना चाहिए । इसको भूमि के अन्दर विवर में गाड़ देवे तो बहुत उत्तम सञ्जीवन नाम वाला मन्त्र होता है । यह शस्त्रों से होने वाले भय को भुजा में धारण करने पर दूर भगा दिया करता है ।५८। अब ज्वर का हनन करने वाला मन्त्र बताया जाता है—टान्त में वकार से आवृत्त और वाह्य में लान्तावृत्त को तथा आठों दलों में हंस को लिखे । वाह्य में अम्बु गृह से आवेष्टित करे तो लान्तावृत्त यह मन्त्र ज्वर को नाश करने वाला होता है ।५६। टान्ते नाम लिखेत्क्षकारविवरे मृत्युञ्जयत्र्यक्षरी रुद्धं तद्बहि ष्टपत्रविवरे साध्याह्वयं पूर्ववत् । अचूकिन्सलकयुते वसुद्वयदले पद्मे तथैवाह्वयम् । द्वात्रिंशद्दलपङ्कजेऽपि च तथा काहणप्रुक्केसरे ।६० ईकारेण समावीतं यन्त्रं मृत्युञ्जयाह्वयम् । सर्वरोगाभिचारघ्नं सर्वसौभाग्यसिद्धिदम् ।६१ ग्लौं रुद्धं प्रणवद्वयं परिलिखेत्साध्यस्य नामान्वितम् । बाह्ये भूपुरमष्टवज्रविलसत्तार लिखिन्वापुनः । क्षं कोणेषु दिशासु लं प्रविलिखेत् पाशांकुशन्त्यपरी वीतं स्तम्भनयन्त्रमावृतिलसज्जृम्भादिविद्याष्टकम् ।६२ जम्भे वह्निवधूः पूर्वं पश्चाज्जृम्भिनि ठद्वयम् । मोहे पावकजाया स्यात्ततो मोहिनि ठद्वयम् ।६३ अन्धे हुतभुजी जाया ततोऽन्धिनि ठयुग्मकम् । रुन्धे कृशानुपत्नी स्यात् रुन्धिनि द्वित्ठसयुतम् ।६४ अब रोगों के अभिचार के हनन करने वाला मन्त्र लिखा जाता है--टान्त में अर्थात् क्षकार विवर में मृत्युञ्जय तीन अक्षरों वाले मन्त्र से रुद्ध नाम लिखना चाहिये । पूर्व की ही भाँति मृत्युञ्जय मन्त्र से सम्पुटित नाम का लेखन करे । षोडश दलों में पूर्व की भांति नाम
एकोनविंश पटल ] ! ४६३ लिखो। कादि वर्णों से युक्त केसर में अर्थात् बत्तीस दलों वाले पंकज में पहिले की तरह नाम लिखना चाहिये। इसका मृत्युञ्जय देवता है। ।६०।६१। अब स्तम्भन करने वाला मन्त्र बताते हैं--दो प्रणवों (ओंकारों) से साध्य के नाम से युक्त ‘ग्लौ’--यह लिखे। फिर बाहर में अष्ट वज्र से युक्त तार लिखना चाहिये ।--क्षं इसको कोणों में और दिशाओं में ल--लिखकर तीन अक्षरों वाले पाशांकुश लिखे। यह जृम्भादि विद्या अष्टक स्तम्भन मन्त्र हैं ।६२। पूर्व में भुक् में वह्नि वधू और पीछे जृम्भी में दो ठकार लिखे। अन्ध मे हुत भक की जाया और इसके पश्चात् अन्धी मे दो ठकार लिखे। रुन्ध में अग्नि की पत्नी और रुन्धी में दो ठकार से संयुत लिखना चाहिये ।६३।६४। लान्ते नाम विलिख्य दिक्षु विलिखेदूभ्यस्तमेवाष्टसु क्षोणीबिम्बमथोरगेन्द्रभुजगावन्त्योन्यबद्धौ लिखेत् । आख्यां तन्मुच्चयोषिभोतफलके यन्त्रं समापादितम् । निर्माल्ये निहितं सदा वितनुते वाचां द्विषां स्तम्भन् ।६५ साध्याख्यां कवचं लखेत् बहिरथोटिकपत्रमध्येपु नन् । ग्लौमन्येषु महीपुरस्य विलिखेत्कोणेषु गं लान्वितम् । वज्रैष्वष्टसु वर्म तोयपुरगं भूपिन्त्वमध्ये स्थितं । यन्त्रं रात्रिविनायकान्तमगतं न्यस्येच्छरावद्वये ।६६ रहस्यस्थाननिःक्षिप्त पूजित प्रतिवासरम् । स्तम्भनं कुरुते वाचां सेनादीनां च वैरिणाम् ६७ कृत्वा रेखाष्टकमृजुपूनस्तिर्यगालिख्य षट्कं ब्राह्मावृत्यालिखतु विधिवद् बिन्दुयुक्त लकारम् । अन्तः पङ्क्तौ लिखतु धरणी शिष्टकोष्ठत्रयाणाम् कृत्वा नामप्रथितमुदितं यन्त्रमेतज् ज्वघ्नम् ।६८ यन्त्रमेतत्सम्भ्यर्च्य दत्वा भूतबलिं ततः । साध्यस्य मूर्द्धनि बध्नीयात्सर्वज्वणविमुक्तये ।६६
४६४ ] [ श्रीशारदा तिलक तारं लिखेद्वह्निपुरस्य युग्मे तत्पार्श्वयोर्लर्णमथाग्निबीजम् । कोणेषु पूर्वापरयोश्च मन्त्रं पाशांकुशावीतमिदं ज्वरघ्नम् ॥७० यन्त्रमभ्यर्च्य मन्त्रेण तारपाशाङ्कुशांत्मना ! निवधनीयाज्ज्वरातं स्य हस्तादौ ज्वरशान्तये ॥७१ अब वाणी के स्तम्भन करने वाला यन्त्र लिखा जाता है-लान्त में अर्थात् क्षकारमें नाम लिखकर पुनः नाम लिखे । कणिकामें ही लाष्टक लिखना चाहिए । फिर उसी को आठों दिशाओं में लिखना चाहिये । यह शत्रुओ की वाणी का स्तम्भन किया करता है ।६५। दूसरा भी वाणी का स्तम्भन करने वाला है-साध्य का नाम आठ दलों वाली किणका में लिखे । विदिक पत्रों में भूपुर के कोणों में 'हुम्' लिखना चाहिये । हरिद्रा की गणपति की मूर्त्ति बनाकर उन के उद्धर में मन्त्र की स्थापना करे । कतिपय विद्वानों का मत है कि हरिद्रा गणपति यन्त्र से सवेष्टित करे ।६६। एकान्त स्थान में इसको निक्षिप्त करके प्रतिदिन पूजन करे तो सेनादि शत्रुओं की वाणी का स्तम्भन किया करता है ।६६।६७। अब ज्वर का हनन करने वाला यन्त्र बतलाया जाता है । ऋजु रेखा लिखकर ऋजु ओर तिर्यक षटक लिखना चाहिये । विशति कोष्ठों में बाहिर सनिवधि बिन्दु से युक्त लकार लिखे । द्वादश कोणोंमें काष्ठत्रय को एकत्रित करके वहाँ पर नाम लिखना चाहिए । इस प्रकार से नाम से ग्रथित यह मन्त्र ज्वर का हनन किया करता है । ।६८। इस मन्त्र को पूजित करके फिर भूत बलि देवे और साध्य के मस्तक में बाँध देवे तो समस्त ज्वर का नाशक होता है ।६६। अब एक अन्य ज्वर नाशक मन्त्र बताया जाता है-वह्निपुर के मध्य में तार अर्थात् प्रणव लिखे । उनके दोनों ओर लवर्ण से युक्त अग्नि बीज को लिखना चाहिए । दिशाओं के वह्निर्यगों में प्रत्येक में अंकुशत्र को लिखे तो यह मन्त्र ज्वरघ्न होता है ।७०। इस मन्त्र को तार पाशांकुश स्वरूप मन्त्र के द्वारा अभ्यर्चित करके ज्वर से आतं व्यक्ति के हाथ आदि में बाँध देवे तो ज्वर की शान्ति हो जाया करती है ।७१।
एकोनविंश पटल ] [ ४६५ पिण्डे लिखेद् नाम ससर्गटान्तविदर्भितं सस्वरकेसराढ्यम् । टान्ताष्टपत्रं वसुधापुरस्थं कान्तिप्रदं यन्त्रमिदं ज्वरघ्नम् ।७२ तारादि लद्वयजलद्विठवर्णं वीता टान्तान्तरे विलिखिता विधिनेव माया । साध्याऽऽवृता वाहिरथोवदनार्द्धचन्द्रैर्यन्त्रं शिशोरुरुदियां निनिहन्ति सद्यः ।७३ व्योमार्णमालिख्य सबिन्दुमाख्याविदर्भितं लत्रययुक्तकॊणे । वसुन्धरागेहयुगे निवद्धं यन्त्रं समस्तज्वरनाशन स्यात् ।७४ और दूसरा ज्वर नाशक मन्त्र यह होता है कि पूर्व में कथित पिण्ड में विसर्ग सहित ठकार से युक्त नाम लिखे जो सस्वर केसर से आढ्य हो । भूपुर में स्थित आठ पत्रों में टान्त लिखे तो कान्ति प्रदाता यह मन्त्र ज्वर नाशक होता है ।७२। अब शिशुओं के रुदन का हरण करने वाला मन्त्र बताते हैं-'जल' वं हि ठः स्वाहा'-इस मात्रावृत्ता माया को लिखकर बाहर वृत द्वय करके वहाँ अधोमुख अर्धचन्द्रों से संवेष्टित करके बाँधने से शिशु के रोदनेच्छा का विनाशक होता है और तुरन्त ही रुदन रोक दिया करता है । व्योमार्ण हकार जो बिन्दु और भकार से युक्त हों तथा मध्य में साध्य-साधक के नामों को लिखे और एक कोण में तीन लकार लिखे । ऐसा वसुन्धरा गेह युग में निवद्ध मन्त्र सब प्रकार के ज्वरों का विनाश करता है ।७२-७४। सार्ण नाम विदर्भितं परिलिखेद् वाह्येऽष्टपत्रे भृगुं । पद्मं स्यादथ कादिशान्तलिविमत् त्रिंशद्दलम्बाह्यतः । वीतं तोयपुरेण यन्त्रमुदितं भूर्जोदरे कल्पितम् । भूतव्याधिमपाज्वरप्रशमनं कृत्यापह श्रीपदम् ।७५ चक्र चतुःषष्ठिपदे सबिन्दूनन्तस्थवर्णान् क्रमशो विलिख्य । रेखाशिरः कल्पितशूलयुक्तैं यन्त्रेऽथशातज्वरशान्तिहेतोः।७६ पुटितभूमिपुरद्वयमध्यतः प्रविलिखेद्वनितां गिरिजापतेः । प्रणवमस्य लिखेद्वसुकाणगं ज्वरहर परमेतदुदीरितम् ।७७
४६६ ] [ श्रीशारदा तिलक अब अन्य यन्त्र बताया जाता है-आठ दलों वाली कर्णिका में अष्ट पत्रों से वहिर्भाग में सकार लिखना चाहिए । पत्रों के मूल में अर्थात् केसरों के स्थान में हो दो क्रम से स्वर लिखे । तोयतुर से बीत यह मन्त्र भोज पत्र पर लिखे तो भूतादि का प्रकोप-व्याधि और महान ज्वर का शान्त करने वाला तथा कृत्या आहरण कारक श्रीपद् मन्त्र होता है ।७५। चौंसठ पद वाले चक्र में बिन्दु से युक्त अन्तस्थ वर्णों को क्रमशः लिखना चाहिये । अर्थात् प्रथम आवृत्ति में अट्ठाईस कोष्ठों में बिन्दु युक्त प्रकार लिखें दूसरी आवृत्ति में बीस कोष्ठोंमें बिन्दु से युक्त लकार लिखे—तीसरी आवृत्ति में बारह कोष्ठों में बिन्दु युक्त लकार लिखे । अन्तःकोष्ठ चतुष्टय में सबिन्दु वकार लिखे । फिर चक्र की पूजा करे तो यह शीत ज्वर को शान्त किया करता है ।७७। पुटित दोनों भूपुर के मध्य में गिरिजापति अर्थात् शिव को वनिता गौरी को लिखे । आठों कोणों में इसके प्रणव लिखना चाहिये । यह मन्त्र सर्वोत्तम है और ज्वर में हरण करने वाला है ।७७। वाणे लिखेत् नाम शशाङ्कमध्ये टान्तं वहिर्भुमिपुरं पुरस्तात् । वृत्तावृतं यन्त्रमिदं समुक्तं वश्याय नृणां सकलार्तिशान्ते ।७८ सस्वस्तिके दहनगेहयुगे ससाध्यां मायां लिखेन्नागलतादलान्तः । पाशाङ्कुशावृतमिदं निशि तापयेद्योमन्त्रं जपन् व्रजति तं स्वयमेव साध्यः ।७६ षट्कोणेषु विजसाध्यनामसहितां मायां लिखेन्मध्यत- स्तत्कोणेषु विदभितामभिलिखेच्छक्तिं ससाध्याह्वया । वाह्ये भूमिपुरं सकोणमदनं ताम्बूलपत्रे कृतम् । जप्तं खादयितुः प्रिया निशि भवेत् सा तस्य वश्या चिरम् ।८० शक्तौ नाम लिखेच्चतुर्भिरभितोबोजैः समावेष्टयेत् । वीतं शक्तिमनोभवांकुशमनु प्रो बीजकैः पिष्टजे ।
एकोनविंश पटल ] [ ४६७ रूपे साध्यनरस्य जप्तपवनं त्रिस्वादुना भर्ज्य त- त्खादेत् तस्य वेश प्रयाति नियति साध्यः सदा दासवत् ।८१ कामं लिखेत्साध्ययुतं सरोजे स्वरोल्लसत् केसरवर्गपत्रे । उदीरित मन्मथयन्त्रमेतत्सौभाग्यलक्ष्मीविजयप्रदायि ।८२ काश्मीररोचना लाक्षा मृगेममदचन्दनैः । विलिखेत् हेमलेखन्या यन्त्राण्येतानि देशिकः ।८३ शशांक के मध्य में गण में बाण में नाम लिखे जो टान्त हो और बाहिर भूपुर के आगे हों । वृत्त से आवृत्त यह मन्त्र कहा गया है । यह सकल प्रकार की आर्तिकी शान्तिके लिये और मनुष्यों के वश्य के लिये होता है ।७८। नागलता दल के अन्दर स्वास्तिक से युक्त दहनदेह युगमें साध्य से युक्त माया को लिखना चाहिये । पाश अंकुश से आवृत इस यन्त्र को रात्रि के समय में तपावे । जो मन्त्र का जाप करता हुआ गमन करता हुआ होता है वह स्वयं ही साध्य होता है ।७९। षट्कोण में अपने साध्य के नाम के सहित मध्य में माया को लिखे । साध्य के नाम से युक्त उसके कोणों में विदर्भित शक्ति को लिखना चाहिये । बाहर भूमिपुर कोण मदन सहित ताम्बूल पत्र में करे । इस यन्त्र को खाने वाले की प्रिया रात्रि में चिरकाल तक वश्य हो जाती है ।८०। जो मनुष्य साध्य हो उसकी आकृति पिष्ट बनावे और उसके हृदय में शक्ति को लिखकर वहाँ पर कर्म के सहित साध्य का नाम लिखना चाहिये । उसको शक्ति के चार बीजों से समवेष्टित करे । पुनः श्लोकोक्त चार बीजों से बीत करे । उसको खा लेवे तो साध्य नियत रूपसे उसका दास की भाँति सदा वश्य होता है ।८१। अब दूसरा यन्त्र बतलाया जाता है । सरोज में केसर वर्ग पत्र में स्वरों में उल्लसित साध्यसे युक्त काम को लिखे । यह मन्मथ यन्त्र कहा गया है जो सौभाग्य और लक्ष्मी का प्रदान करने वाला तथा विजय प्रदान करने वाला यन्त्र है ।८२। आचार्य को चाहिये इन यन्त्रों को सुवर्ण की लेखनी से काश्मीर रोचना, लाख, मृग के मद तथा चन्दन से लिखना चाहिये ।८३।
४६८ ] [ श्रीशारदा तिलक भूमिस्पृष्टं शवस्पृष्टं दग्धं निर्माल्यसंगतम् । विशीर्णलङ्घितं मन्त्री यन्त्रं आतु न धारयेत् ।८४ अथानन्दमयीं देवां शब्दब्रह्मस्वरूपारिणीम् । ईडे सकलसंपत्यै नगत्कारणमम्बिकाम् ।८५ आद्यामशेषजननीमरविन्दयोनेर्विष्णोः शिवस्य च वपुः प्रतिपादयन्तीम् । सृष्टिस्थितिक्षयकरीं जगतां त्रयाणां स्तुत्वागिरं विमलयाम्यहमम्बिके त्वाम् ।८६ पृथ्व्या जलेन शिखिना मरुताम्बरेण होत्रेन्दुना दिनकरेण च मूर्तिभाजः । देवस्य मन्मथरिपोरपि शक्तिमत्ताहेतु स्त्वमेव खलु पर्वतराजपुत्रि ! ।८७ त्रिःस्रोतसः सकललोकसमर्चिताया वशिष्टकारणमवैभि तदेव मात ! । त्वत्पादपङ्कजपरागपवित्रितासु शम्भोजर्- टासु सततं परिवर्तनं यत् ।८८ मन्त्री को भूमि से स्पर्श किया हुआ शव मुर्दा से स्पर्श किया, दधि, निर्माल्य से संगत, विशीर्ण और लाँघा हुआ यन्त्र कर्म भी धारण नहीं करना चाहिये ।८४। इसके अनन्तर आनन्द से परिपूर्ण तथा शब्द ब्रह्म स्वरूपिणी जगत्कारण अम्बिकाका सकल सम्पत्तिकी प्राप्तिके लिये स्तवन करता हूँ ।८५। हे अम्बिके ! मैं अपनी स्तुति करके वाणी को विमल करता हूँ । आप सबकी जननी है, देव समूह की योनि भगवान् विष्णु और शिव के वपु का प्रतिपादन करने वाली हैं । तीनों लोकों के सृजन, स्थिति और विनाशके करने वाली है । ऐसी आपका स्तवनकरके मैं अपनी वाणी को विमल करता हूं ।८३। हे पर्वत राजपुत्रि ! पृथ्वी, जल—अग्नि—वायु—आकाश—होता—इन्दु—दिनकर की मूर्ति
एकोनविंश पटल ] [ ४६६ धारण करने वाले काम देव के शत्रु देव की शक्तिमत्ता की हेतु निश्चय ही आप हैं ।८७। हे माता ! समस्त लोकों के द्वारा पूजित गङ्गा के वैशिष्ट्य का कारण मैं उसी को जानता हूँ । आपके चरण कमल के पराग से पवित्र भगवान् शम्भु की जटाओं में जो निरन्तर परिवर्तन होता है ।८८। आनन्दयेत् कुमुदिनीमधिपः कलानां नान्यामिनः कमलिनीमथनेतरां या । एकस्य मोदनविधौ परमकं इष्टे त्वत्तुप्रपञ्चमभिनन्दयसि स्वदृष्टया ।८६ आद्याप्यशेषजगतां नवयौवनासि । शैलादिराजतनयाण्याति कोमलासि । त्रय्या प्रसूरपि तया न समीक्षितासि । ध्येयासि गौरि ! मनसो न पथि स्थितासि ।६० त्तासाद्य जन्म मनुजेषु चिराद् दुरापं तत्रापि पाटवमवाप्य मिजेन्द्रियाणाम् । नाभ्यर्चयन्ति जगतां जनयित्र ! ये त्वां निःश्रेणिकाग्रमविरुह्य पुनः पतन्ति ।६१ कर्पूरचूर्णहिमबारिविलोलितेन ये चन्दनेन कुसुमैश्च सुजातगन्धः । आराधयन्ति हि भवानि ! समुत्सुकात्वां ते खल्वशेषभुवनाधिभुवः प्रथन्ते ।६२ आविश्य मध्यपदवीं प्रथमे सराजे सुप्तहिराजसदृशी विरचय्य विश्वम् । विद्युल्लतावलयविभ्रममुद्वहन्ती पद्मानि पञ्च विदलय्य समश्नुवाना ।६३ तन्निर्गतामृतरसैरभिषिक्तगात्री मार्गेण तेन निलय पुनरप्यवाप्त ।
४७० ] [ श्रीशारदा तिलक येषां हृदि स्फुरसि जातु न ते भवेयुर्मातर्महेश्वरकुटुम्बिनि ! गर्भभाजः । ६४ आलम्बिकुन्तलभरामभिरामवक्त्रा- मापीवरस्तनतटीं तनुवृत्तमध्याम् । चिन्ताक्षसूत्रकलशालिखिताढ्य- हस्तामावर्तयामि मनसा तव गौरि ! मूर्तिम् । ६५ आस्थाय योगमविजित्य च वैरिशट्- कमावध्य चेन्द्रियगणं मनसि प्रसन्ने । पाशांकुशाभयवराढ्यकरां सुरक्तामा- लोकयन्ति भुवनेश्वरियागिनस्त्वाम् ।६६ कलाओं का अधिप चन्द्रमा कुमुदिनीको आनन्दित करता है । कम- लिनी मध्यने तर को नहीं करता है । एक के मोदन विधि में उसका स्तवन किया जाता है फिर आप तो समस्त प्रप'च को अपने ! दृष्टिपात के द्वारा आनन्दित किया करती है ।७६। समस्त जगतों की आप आद्या हैं अर्थात सब जगतोंसे प्रथम हुई हैं तो भी आप नवयौवन धारण करने वाली हैं। आप पर्वतराज हिमालय की पुत्री हैं तो भी अत्यधिक कोमल हैं, त्रयी को उत्पन्न करने वाली हैं तो भी उस त्रयी के द्वारा समीक्षिता नहीं है। हे गौरि ! आप ध्यान करने के योग्य हैं तो भी मन के मार्ग में स्थित नहीं होती हैं अर्थात मनके द्वारा अचिन्तनीय हैं ।६०। अत्यन्त दुर्लभ मनुष्यों में चिरकाल में दुर्लभ जन्म पाकर भी इन्द्रियों को पटुता प्राप्त किया करता है। हे जगतों के जनन करने वाली ! जो मनुष्य आपका अर्चन नहीं किया करते हैं वे मनुष्य निःश्रेणिका पर अधिरोहण करके भी पुनः अधः पतित हो जाया करते हैं ।६१। हे भवानी ! जो मनुष्य कपूर के चूर्णसे शीतल जल से लोलित चन्दन से और सुन्दर गंध वाले पुष्पों से समुत्सुक होते हुए अशेषभुवनों के अधिभू के प्राप्त करने का प्रयत्न किया करते हैं ।६१। प्रथम सरोज में मध्य पदवी में आविष्ट होकर ! सुप्ताहि राज सदृश विश्व को विरचित करके विद्युल्लता के
एकोनविंश पटल ] [ ४७१ वलय के विभ्रम का उद्वहन करती हुई पाँच पद्मों का विदलन कर समुद्भवत है ।६३। हे माता ! महेश्वर देव की कुटुम्बिनी । उससे निर्गत अमृत रस से अभिविक्त गात्रीं वाली उस मार्ग से पुनः निलय को प्राप्त हुई आप जिनके हृदय में स्फुरण किया करती है वे मनुष्य मुक्त होकर पुनः गर्भ में नहीं आया करते हैं ।६४। लम्बमान कुन्तलों के भार से अभिराम मुख वाली तथा पीवर स्तनों वाली और शरीर के कृश मध्य भाग वाली, चिन्ताक्ष सूत्र से कलश से लिखित हस्तों वाली हे गौरी ! मैं मन से बारम्बार आपकी मूत्ति का आवर्त्तन किया करता हूँ ।६५। योग में समाधिस्थ होकर छं शत्रुओं पर विजय प्राप्त करके प्रसन्न मन से इन्द्रियों के गण को आवृद्ध करके पाश-अंकुश-अभय और वरदान से सुशोभित दोनों करों वाली हे भुवनेश्वरि! सुरक्त वर्ण वाली आपको योगीगण देखा करते हैं ।६६ उत्तप्तहाटकनिभैः करिभिश्चतुर्भीरा- वर्जिताऽमृतघटैरभिषिच्यमाना । हस्तद्वयेन रुचिरे नलिने वहन्ती- पद्मापि साभयवरा भवति त्वमेव ।६७ अष्टाभिरुग्रविविधायुधवाहिनीभि- र्दोर्वल्लरीभिरधिरुह्य मृगाधिराजम् । दूर्वादलद्युतिरमर्त्यविपक्षपक्षांन् न्यक्कर्वतो त्वमसि देवि ! भवानि ! दुर्गा ।६८ आविन्निदाघजयशीकरशोभिवक्त्रां गुञ्जागुणेन परिकल्पितहारयष्टिम् । पत्रांशुकामसितकान्तिमसङ्गतन्त्रमाद्यां पुलिन्दतरुणामसकृत्स्मरामि ।६६ हंसैर्गतिक्कणितनूपुरद्रकृष्टै- मूर्त्तिरिवाथंवचनैरनुगम्यमानौ !
४७२ ] { श्रीशारदा तिलक पद्माविवोर्ध्वमुखरूढसुजातनालौ श्रीकण्ठपत्नि ! शिरसैव दधे तवाङ्घ्री ।१०० द्वाभ्यां समीक्षितुमतृप्तिमतेव। दृग्भ्यामुत्पाट्य भालनयनं वृषकेतनेन । सान्द्रानुरागतरालेन निरीक्षमाणे जङ्घे उभे अपि भवानि ! तवानतोऽस्मि ।१०१ ऊरू स्मरामि जितहस्तिकरावलेपौ स्थौल्येन पाण्डुरतया परिभूतरम्भौ । श्रोणीभरस्य सहनौ परिकल्प्य दत्तौ स्तम्भाविवाम्ब ! वयसातव मध्यमेन ।१०२ श्रोण्यौ स्तनौ च युगपत्प्रथयिष्यतो- च्चैर्बाल्यात्परेण वयसा परिकृष्णसारः । रोमावलिविलसितेन विभाव्यमूर्ति- र्मध्यस्तव स्फुरतु मे हृदयस्य मध्ये ।१०३ तपे हुए सुवर्ण के सदृश चार हाथियोंके द्वारा आवर्जित अमृतके कलशों से अभिषिक्त होते हुए दोनों हाथों से सुन्दर कमलों को वहन करती हुई पद्मा ! अभयदान और वरदान वाली होती है ।६७। आठों भुजाओं से अत्यन्त उग्र और अनेक आयुधों को वहन करती हुई वल्लरियों के द्वारा मृगाधिराज पर अधिरोहण करके दूर्वादल की द्युति के समान द्युति वाली देवों के विपक्ष में रहने वाले असुरों को करती हुई हे भवानी ! आप ही दुर्गा देवी है ।६८। आवी निदाघ जल के कणों से शोभायुक्त मुख वाली, गुञ्जा गुण से परिकल्पित हार यष्ठि वाली, पत्रांशु काम से-सित कान्ति युक्त, अनङ्ग तन्त्रा पुलिन्द तरुओंकी आद्या आपका मैं वारम्बार स्मरण करता हूँ ।६६। गति अर्थात् गमन से क्वणित नूपुरों द्वारा दूर समाकृष्ट मूर्तों की भाँति हंसों से अर्थ वचनों के द्वारा अनुगम्यमान, ऊर्ध्वमुख सुजात नाल वाले पद्मों के समान हे श्री कण्ठ पत्नि ! मैं शिर से आपके चरणों को धारण करता हूँ ।१००।
एकोनविंश पटल ] [ ४७३ दों नेत्रों से देखते हुए भी अतृप्ति वाले की भाँति वृषकेतन शिव ने भाल में तीसरा नेत्र उत्पन्न करके हे भवानी ! मान्द्र अनुराग से तरल भाव द्वारा निरीक्षमाण दोनों जंघाओं को देखने वाले हैं ऐसी आपको मैं प्रणाम करता हूँ ।१०१। स्थूलता से हस्ती के कर (सूँड) के गर्व को जीत लेने वाले तथा पाण्डुरता से रम्भा (कदली) की तिरस्कृत कर देने वाले ऊरुओं का मै स्मरण करता हूँ । हे अम्ब ! आपकी अवस्था ने मध्यम भाग श्रोणियों के भार को सहन करने वाले परिकल्पित करके स्तम्भों की भांति दिये हैं ।१०२। हे माता ! बाल्य काल से आगे श्रोणी और स्तनों को एक साथ प्रथित करता हुआ आपका मध्य भाग रोमा- वली से विलसित विभाव्य मूर्त्ति वाला मेरे हृदय के मध्य में स्फुरण करे ।१०३। सख्युः स्मरस्य हरनेत्रहुताशमी- रोलावण्यवारिभरितं मवयौवनेन । आपाद्य दत्तमिव पल्वलमप्रधृष्यं नाभिं कदापि तव देवि ! न विस्मरेयम् ।१०४ ईशोपगृह्यसमुनं भसित दधाने काश्मीरकर्द्दममनुस्तनपङ्कजेते । स्नानोत्थितस्य करिणः क्षणलब्धफेनौ सिन्दूरितौ स्मरयतःसमदस्य कुम्भौ ।१०५ कण्ठातिरिक्तगलदुज्ज्वलकान्ति- धाराशोभौ भुजौ निजरिपोर्मकरध्वजे न । कण्ठग्रहाय रचितौ किल दीर्घपाशौ मातर्मम स्मृतिपथं नविंलघयेताम् ।१०६ नात्यायतं रुचिरकम्बुविलासचौर्यं भूषाभरेण विविधेन विराजमानम् । कण्ठं मनोहरगुणं गिरिराजकन्ये! संचिन्त्य तृप्तिमुपयामि कदापि नाहम् ।१०७
४७४ ] [ श्रीशारदा तिलक अत्यायताक्षमभिजातललाटपट्टं मग्दस्मितेन दरफुल्लकपोलरेखम् । विम्बाधरं वदनमुन्नतदीर्घनास यस्ते स्मरत्यसकृदेव स एव जातः ।१०८ आविस्तुषारकरलेखमनल्पगन्ध पुष्पोपरिभ्रमदलिब्रजनिविशेषम् । यश्चेतसा कलयते तव केशपाशं तस्य स्वयं पलति देवि ! पुराणपाशः ।१०६ श्रुतिसुचरितपाकं धोमतां स्तोत्रमेतत् पठति य इह मर्त्योनित्यमार्द्रान्तरात्मा । स भवति पदमुच्चैः संपदां पादनम्रम्रक्षिति- पमुकुटलक्ष्मीलक्षणनां चिराय ।११० हे देवि ! हरके नेत्रकी अग्नि से डरे हुए स्मर के सखा नूतन यौवन ावण्य भरित अप्रधृष्य पल्लवल को दत्त की भाँति अपादित करके आपकी नाभि कभी भी विस्मृत नहीं होती है ।१०४। भसित ईशोप गृह का पिशुन (सूचक) काश्मीर के कर्दम मनुस्तव आपके पकज स्नान करके उत्थित करोंके क्षण भर लब्ध फेनों वाले मदयुक्त हस्तीके सिन्दू- रित कुम्भोंका स्मरण कराते हैं ।१०५। मकरध्वजके शत्रु भगवान शिव की दोनों भुजायें कण्ठ से अतिरिक्त बहते हुए उज्ज्वल कान्ति की धारा से शोभित है । हे माता ! कण्ठ ग्रह के लिये रचित दीर्घ पाश मेरी स्मृति के मार्ग का विलंघन न करे ।१०५। हे गिरिराज कन्ये ! न अत्या यत और रुचिर कम्बु के विलास चुराने वाला तथा अनेक प्रकार के भूषणों के भारसे विराज मान एवं मनोहर गुणसे युक्त कण्ठ का संचि- न्तन करके मैं कभी भी तृप्ति को प्राप्त नहीं हूँ ।१०७। विशाल नेत्रों से युक्त ऐसे अभिजात ललाट यह जो मन्द स्मित से फुल्ल कपोल रेखाओं वाला है । बिम्ब फलके समान अधरोंसे युक्त-उन्नत ओर दीर्घ नासिका वाला मुख है । ऐसे मुख का जो स्मरण करता है वही वास्तव में संसार
विंश पटल ] [ ४७५ में समुत्पन्न हुआ है अर्थात् उसी का जन्म धारण करना सफल होता है । १०७। हे देवि ! आविस्तुषार कर लेखा वाले - अत्यधिक गन्ध से युक्त पुष्पोंके ऊपर भ्रमण करते हुए भौरों के समूहसे संयुक्त ऐसे आपके केशपाश का जो दर्शन किया करता है उसका पुराण पाश स्वयं विनष्ट हो जाया करताहै । १०८। श्रुति सुचरित पाक युक्त मत्याँनित्य धीमानों के इस स्तोत्र को जो आर्द्रान्तरात्मा इस संसार में पाठ किया करता है वह पाठ् नम्र क्षितियों के मुकुट लक्ष्मी के लक्षण वाले सम्पदाओं के उच्च पद को चिरकाल तक प्राप्त किया करता है ।११०।
विंश पटल ॥ योग प्रकरण ॥ अथ योगं प्रवक्ष्यामि साङ्गं संवित्प्रदायकम् । ऐक्यं जीवात्मनोराहुर्यागं योगविशारदाः ।१ जीवत्मनोरभेदेन प्रतिपत्ति परे विदुः । शिवशक्त्यात्मकं ज्ञानं जगुरागमवेदिनः ।२ पुराणपुरुषस्यान्ये ज्ञानमाहुर्विशारदाः । जित्वाऽऽदावात्मनः शत्रून्कामीन्द्योगमभ्यसेत् ।३ कामक्रोधौ लोभमोहौ तत्परं मदमत्सरी । आहुर्दुःखदानेतानरिषड्वर्ग मात्मनः ॥४ योगाष्टाङ्गैरिमञ्जित्वा योगिनोयामाप्नुयुः । यमनियमावासनप्राणायामौ ततः परम् ।५ प्रत्याहारं धारणाख्यं ध्यान सार्द्धं समाधिना । अष्टाङ्गायाहुरेतानि योगिनो योगसाधने ।६