शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
ॐ शारदा तिलक सरल हिन्दी अनुवाद सहित जनोपयोगी संस्करण ❊ सम्पादक : डॉ चमनलाल गौतम रचयिता : मन्त्र महाविज्ञान, तन्त्र महाविज्ञान, मन्त्रयोग, वैदिक मन्त्र विद्या, ओंकर सिद्धि, प्राणायाम के असाधारण प्रयोग, मन्त्र शक्ति से रोग निवारण, कामना सिद्धि, विपत्ती निवारण विष्णु रहस्य, शिव रहस्य आदि । ❊ प्रकाशक : संस्कृति संस्थान ख्वाजा कुतुब (वेदनगर) बरेली-२४३००३ (उ०प्र०) फोन नं० ४२४२
प्रकाशक :
प्रकाशक : डॉ० चमन लाल गौतम संस्कृति संस्थान ख्वाजा कुतुब (वेद नगर) बरेली २४३००३ (उ० प्र०) फोन : ४२४२ ★ सम्पादक : डॉ० चमनलाल गौतम सर्वाधिकार प्रकाशकाधीन ★ तृतीय संस्करण सन् १६८१ ★ मुद्रक : शैलेन्द्र वी० माहेश्वरी नवज्योति प्रेस, सेठ भीकचन्द मार्ग, मथुरा ★ मूल्य : बारह रुपये मात्र ।
विषय प्रवेश भारतवर्ष का प्राचीन धार्मिक साहित्य निगम और आगम दो श्रेणियों में विभाजित है। इनमें से “निगम” वेदमूलक साहित्य को कहते हैं, जिसमें उपनिषद्, स्मृतियाँ, दर्शन आदि की गणना की जाती है। इसके दो मुख्य लक्षण “विद्यास्थान” और “धर्मस्थान” कहे गये हैं- पुराण न्याय मीमांसा धर्मशास्त्राङ्गमिश्रत। वेदाः स्थानानि 'विद्यानां धर्मस्य' च चतुर्दश ॥ (याज्ञवल्क्य) यह वैदिक साहित्य भावना की दृष्टि से परा और अपरा—ऐसे दो नामों से भी प्रसिद्ध हैं। “अपरा” भाग में धर्म का वर्णन लौकिक व्यवहार की दृष्टि से किया गया हैं और “परा” का उद्देश्य ब्रह्म का ज्ञान और उसकी प्राप्ति का मार्ग माना गया है। यद्यपि वेदमूलक अपरा विद्या में लौकिक अभ्युदय का ध्यान रखा गया है, पर उसका स्वरूप धर्मशास्त्रानुकूल और शिष्ट-समाज द्वारा मान्य होना आवश्यक है। इस श्रेणी के वैदिक साहित्य का मूल भारतीय मनीषियों के मतानुसार अनादि और नित्य माना गया है। आगम-शास्त्र को स्रोत शिवजी को बतलाया जाता है। इस मार्ग की अधिकांश रचनायें शिव-पार्वती के संवाद रूप में मिलती हैं। जिस प्रकार प्रत्येक पुराण, चाहे वह विषय के विवेचन तथा भाषा-शैली की दृष्टि से कितना ही बढ़िया अथवा घटिया हो, व्यासजी द्वारा रचित बतलाया गया है, उसी प्रकार आगम ग्रन्थों का कर्तृत्व शिवजी के नाम पर मान लिया गया है । इसका आशय यह समझा जा सकता है, कि चाहे विभिन्न आगम ग्रन्थ अलग-अलग काल में अनेक विद्वानों द्वारा लिखे गये हैं, पर उनका मूल आधार वही सिद्धान्त है, जिसे भगवान शिव ने सर्वप्रथम लोक हितार्थ प्रकट किया था। यद्यपि इस “शारदातिलक” को भी शिवजी के ज्ञान का ही प्रसाद माना गया है, तो भी इसके लेखक श्री लक्ष्मण देशिकेन्द्र ने रचना का उत्तरादायित्व अपना रखा है, जैसा कि ग्रन्थ के आरम्भ में ही कह दिया गया है—
( ४ ) सारं वक्ष्यामि तन्त्राणां शारदातिलकं शुभम् । धर्मार्थकाममोक्षाणां प्राप्ते प्रथम कारणम् ॥ अर्थात्—"मैं समस्त तंत्र ग्रन्थों के साररूप इस "शारदा तिलक" को कथन करता हूँ। यह चारों पुरुषार्थों—धर्म अर्थ, काम, मोक्ष की प्राप्ति का प्रथम (प्रमुख) साधन है।" आगे चलकर उन्होंने यह भी कह दिया है कि "भगवान् शिव ही निर्गुण और सगुण स्वरूप हैं। प्रकृति से भिन्न तत्त्व निर्गुण होता है और कलायुक्त को सगुण कहा जाता है। सत्, चित्, आनन्द से युक्त कला सहित परमेश्वर से शक्ति हुई, उससे नाद प्रकट हुआ और फिर बिन्दु का उद्भव हुआ। परा-शक्ति से परिपूर्ण यह साक्षात् तत्त्व इस प्रकार बिन्दु, नाद और बीज—इन तीन भेदों में बंट गया । बिन्दु शिव के स्वरूप वाला है, वीज, नाद और शक्ति उसी की होती है । इसी को आगम शास्त्र के ज्ञाताओं ने 'समवाय' कहा है। संज्ञान, इच्छा और क्रिया के स्वरूप वाले अग्नि, चन्द्र और सूर्य के स्वरूप से युक्त विद्यमान "पर-बिन्दु" से एक अव्यक्त स्वरूप वाला रव ( ध्वनि ) उत्पन्न हुआ। उसी को सब आगम-विशारदों ने "शब्द ब्रह्म" कहा है।" इसमें सन्देह नहीं कि तांत्रिक क्रियाएँ और उनमें साधारण जनता का विश्वास बहुत प्राचीन प्रवृत्ति है। यदि यह कहा जाय कि वह उत्कृष्ट श्रेणी के श्रुतिमूलक ज्ञान तथा धार्मिक सिद्धान्तों से भी पूर्वकाल की चीज है, तो इसमें कोई अत्युक्ति नहीं । उच्चकोटि के आध्यात्मिक और ज्ञान तदनुकूल व्यवहार का विकास तो क्रमशः ही होता है। पर टोना-टोटका और जादू-मन्त्र आदि का प्रचार घोर अशिक्षित और ज्ञान शून्य जनता में भी हो सकता है। यह हम आज भी अपनी ग्रामीण और निम्न जातियों की जनता में देख रहे हैं, जो सब प्रकार के रोगों और कष्टों का कारण किसी दुष्ट अथवा असन्तुष्ट प्रेतात्मा को मानकर ओझा अथवा स्थानों द्वारा उसे हटाये जा सकने में पक्का विश्वास रखते हैं। ये सब क्रिया कलाप तन्त्र-शास्त्र के ही बिगड़े हुए या बदले हुए रूप हैं इसमें सन्देह नहीं। यह बात प्रमुख तन्त्र ग्रन्थों में स्पष्ट रूप से
( ५ ) कही गई है । "महानिर्वाण तंत्र" में शिवजी के मुख से कहलाया है— कलौ तन्त्रोदिता मन्त्राः सिद्धास्तूर्ण फलप्रदाः । शस्ताः कर्मसु सर्वेषु जप यज्ञ क्रियादिषु ।। निर्वीर्याः श्रौत जातीया विषहीनोरगाइव ।। अर्थात्— 'कलियुग में तन्त्र-शास्त्र द्वारा प्रतिपादित मन्त्र ही सिद्ध होकर शीघ्र फल दे सकते हैं । इसलिये सब प्रकार के धार्मिक कृत्यों में जप, यज्ञ आदि में वे ही श्रेष्ठ और विहित हैं । इस युग में वैदिक कर्म- काण्ड तो विषहीन सर्प की भाँति अशक्त हो जाते हैं ।" तंत्र-ग्रन्थों में इस प्रकार के सैकड़ों वचनों के होते हुए भी विद्वान् लोग इस सिद्धांत को सहज में स्वीकार नहीं कर सकते । जिस प्रकार "महानिर्वाण" के रचयिता ने तंत्रोक्त क्रियाओं को फलवती बताया है, उसी प्रकार भक्तिमार्ग के प्रधान आचार्य गोस्वामी तुलसीदास जी की अमरवाणी भी हमको "रामायण" में सुनाई पड़ती है—'कलियुग केवल नाम अधारा ।" इस अद्वितीय घोषणा पर विश्वास करके आज लाखों- करोड़ों नर-नारी 'नाम संकीर्तन' में तल्लीन हैं और उसी को आत्मा की सद्गति का सर्वोत्कृष्ट मार्ग मान रहे हैं । फिर भी तन्त्र-शास्त्र उपेक्षा का विषय नहीं है । किसी समय इस शास्त्र की अभूतपूर्व उन्नति हुई थी और लाखों नर-नारी इससे लौकिक और पारलौकिक सत्परिणाम प्राप्त करते थे । उस समय इतना अधिक तन्त्र-साहित्य रचा गया है जिससे आज भी एक पूरा पुस्तकालय भर सकता है । उन हजारों छोटे-बड़े ग्रन्थों में 'शारदा तिलक' एक महत्व पूर्ण रचना है । तन्त्रोक्त धर्म और आचार-विचार, व्यावहार का प्रति- पादन करने वाला यह एक प्रसिद्ध और मान्य ग्रन्थ है । इसमें तन्त्र-शास्त्र के मतानुसार सृष्टि और विश्व-रचना का उचित विवेचन करते हुए इसके व्यावहारिक पक्ष का विस्तार पूर्वक वर्णन किया है । मनुष्य किस प्रकार दीक्षा ग्रहण करके तांत्रिक-साधना का अधिकारी बन सकता है, इसके प्रत्येक विधि-विधान का ऐसा स्पष्ट रूप से समझा कर वर्णन किया गया है कि नया व्यक्ति भी उससे बहुत लाभ उठा सकता है । तन्त्र मार्ग के रचयिताओं से अपने विधि विधानों और क्रियाओं को बहुत शक्ति
अध्यायों अथवा वर्णनों में हमको उपयुक्त ढंग की आक्षेप योग्य बातें
( ६ ) शाली बताया है और संभव है कि पूरा विधि-विधान करने पर तात्का- -लिक लाभ की दृष्टि से उनका कथन सही हो । फिर भी समय के प्रभाव से तन्त्र मार्ग में कुछ ऐसी बातें शामिल हो गई हैं जिनको अन्य लोग शंका की दृष्टि से देखते हैं और आक्षेप करते हैं। पंचमकार और मारण-मोहन-उच्चाटन, वशीकरण आदि क्रियायें ऐसी ही हैं, जिन पर आधुनिक युग के विचारक और विद्वान् पुरुष कभी सहमत नहीं हो सकते और न उनकी नैतिकता और धामि- कता को स्वीकार कर सकते हैं। आध्यात्मिकता अथवा दैवी शक्तियों का नाम लेकर किसी को नष्ट अथवा भ्रष्ट करने का प्रयत्न करना अथवा ऐसा इरादा ही करना घृणित और हेय कर्म ही माना जायगा। इसी प्रकार किसी देवी या देवता की आराधना इस विचार से करना कि वे हमारे विरोधियों का सर्वनाश कर डालें उन देवी-देवताओं के प्रति भी कोई अच्छा काम नहीं है। किसी देव शक्ति का प्रतिपादन इस रूप में करना कि वह पूजा अथवा बलिदान के लोभ से चाहे जिस व्यक्ति का अकल्याण कर सकती है, उसके प्रति आदरणीय भावना को मिटाने वाला ही सिद्ध होगा। नासमझ, दुष्ट और बाल बुद्धि वालों की बात तो छोड़ दीजिये, पर कोई विद्या-बुद्धि से सम्पन्न सज्जन पुरुष इस प्रकार के कृत्यों को 'धर्म' का अङ्ग नहीं मान सकता। इसलिए हमने 'शारदा तिलक' के उपयोगी और आध्यात्मिक भाव को बढ़ाने वाले विधि विधान और धर्म क्रियाओं को स्थिर रखते हुए जिन अध्यायों अथवा वर्णनों में हमको उपयुक्त ढंग की आक्षेप योग्य बातें दिखाई पड़ीं उनको अधिकांश छोड़ दिया है। साथ ही जहाँ कहीं विषय का बहुत अधिक विस्तार देखा वहाँ भी संक्षेप कर दिया है। वर्तमान समय में लोगों की जीवन निर्वाह सम्बन्धी विभिन्न प्रवृत्तियाँ इतनी विस्तार युक्त और जटिल हो गई हैं कि उन्हे बहुत लम्बे चौड़े विवेचन हमने उपयोगिता और जानकारी की रक्षा करते हुए कहीं-कहीं ग्रन्थ को इस प्रकार संक्षेप किया है कि पाठक उसको पढ़कर आशय को अधिक अच्छी तरह ग्रहण कर सकेंगे। २५-३-७३ -प्रकाशक
विषय-सूची १—प्रथम पटल (प्राणियों की उत्पत्ति और देहान्तर्गत विशेषतायें) ६ २—द्वितीय पटल (वैखरी सृष्टि एवं साधना सम्बन्धी सूचनायें) २७ ३—तृतीय पटल (दीक्षाङ्ग निर्णय) ५१ ४—चतुर्थ पटल (दीक्षा विधान एवं नियमोपनियम) ७४ ५—पञ्चम पटल (हवन विधि) ९६ ६—षष्ठ पटल (न्यास की विधि और ध्यान के भेद) १२२ ७—सप्तम पटल (भूत लिपि और मन्त्र विज्ञान) १४३ ८—अष्टम पटल (लक्ष्मी मन्त्र प्रकरण) १६५ ९—नवम पटल (भुवनेश्वरी प्रकरण) १८४ १०—दशम पटल (दुर्गा प्रकरण) २१४ ११—एकादश पटल (गणपति प्रकरण) २३६ १२—द्वादश पटल (चन्द्र प्रकरण) २६४ १३—त्रयोदश पटल (विष्णु प्रकरण) २८६ १४—चतुर्दश पटल (नारसिंह प्रकरण) ३१६ १५—पञ्चदश पटल (पुरुषोत्तम प्रकरण) ३४१
( ८ ) १६—षोडश पटल (महेश प्रकरण) ३६६ १७—सप्तदश पटल (पुरुषार्थ मन्त्र) ३८२ १८—अष्टादश पटल (अघोरास्त्र वर्णन) ४१७ १६—एकोनविंश पटल (यन्त्र प्रकरण) ४४६ २०—विंश पटल (योग प्रकरण) ४७५ २१—एकविंश पटल (गायत्री महिमा) ४९२
श्री शारदा तिलक प्रथम पटल शब्दब्रह्म यदूचिरे सुकृतिनश्चैतन्यतर्गतम् । तद्बोऽव्यादर्निशं शशाङ्कसदनं वाचामधीशं महः । १ अन्तःस्मितोल्लसितमिन्दुकलावतंस-मिन्दीवरोदरसहोदरनेत्रशोभि। हेतुस्त्रिलोकविभवस्य नवेन्दुमौले-रन्तःपुरं दिशतुमंगलमादराद्वः ।२ संसारसिन्धोस्तरणैकहेतून्दधे गुरून्मूर्द्धिन शिवस्वभावान् । रजांसि येषां पदपङ्कजानां तीर्थाभिषेकश्रियमावहन्ति ।३ सारं वक्ष्यामि तन्त्राणां शारदातिलकं शुभम् । धर्मार्थकाममोक्षाणां प्राप्तेः प्रथमकारणम् ।४ शब्दार्थसृष्टिर्मुनिभिश्चन्दोभिर्देवैतैः सह । विधिश्च यन्त्रमन्त्राणां तन्त्रेऽस्मिन्नभिधीयते ।५ जिसको सुकृती गण अन्तर्गत चैतन्य को शब्द ब्रह्म कहते थे वह शशांक सदन-वाणियों का अधीस तेज आपकी निरन्तर रक्षा करे ।१। अन्तर में स्मित से उल्लासित-इन्दु (चन्द्र) की कला के भूषण वाले- इन्हीं वरके उदर के सहोदर नेत्रों की शोभा से समन्वित-तीनों लोकों के वैभव के कारण ऐसे भवेन्दु मौलि (शिव) का अन्तःपुर आदर से आपका मङ्गल करे ।२। संसार रूपी सागर से सन्तरण करने के एक हेतुभूत-शिव के स्वभाव वाले गुरुओं को मस्तक में धारण किया था। जिनके चरणों कमलोंकी रजतीर्थों द्वारा हुए अभिषेक की श्री का आवा- हन किया करते हैं ।३। उन तन्त्रों के सारस्वरूप इस परम शुभ
१० ] [ प्रथम पटल शारदा तिलक को बतलाऊँगा जो धर्म-अर्थ काम और मोक्ष की प्राप्ति का प्रथम कारण है ।४। छन्दों और देवताओं के साथ मुनियों से शब्दार्थ की सृष्टि और मन्त्रों तथा यन्त्रों की विधि इस तन्त्र में निहित की जाती है ।५। निर्गुणः सगुणश्चेति शिवो ज्ञेयः सनातनः । निर्गुणः प्रकृतेरेन्यः सगुणः सकलः स्मृतः ।६ सच्चिदानन्दविभात्सकलात्परमेश्वरात् । आसीच्छक्तिस्ततोनादो नादाद्बिन्दुसमुद्भवः ।७ परशक्तिमयः साक्षात्त्रियाऽसौ भिद्यते पुनः । बिन्दुनादो बीजमिति तस्य भेदाः समीरिताः ।८ ब्रिन्दुः शिवात्मको बीजं शक्तिर्नादस्मयोर्मिथः । समवायः समाख्यातः सर्वागमविशारदैः ।६ रौद्री विन्दोस्ततो नादाज् ज्येष्ठा बीजादजायत । वा - ा, ताभ्यः समुत्पन्ना रुद्रब्रह्मरमाधिपाः ।१० भगवान् सनातन शिव निर्गुण और सगुण जानना चाहिए । प्रकृति ा अन्य निर्गुण होते हैं और सकल सगुण कहे गये हैं । ६ । सत्-चित् ज्ञान ) और आनन्द के विभव से सकल परमेश्वर से शक्ति हुई थी फिर उससे , नाद हुआ और नाद से बिन्दु का समुद्भव हुआ था । ७ । पर शक्ति से परिपूर्ण यह साक्षात् फिर तीन प्रकार से भेद को प्राप्त होता है । बिन्दु-नाद और बीज में उसके भेद कहे गये हैं ।८। बिन्दु शिव के स्वरूप वाला है । बीज-नाद और शक्ति परस्पर में उन दोनों का है । समस्त आगमों के महामनीषियों के द्वारा यह समवाय कहा गया है । ६ । बिन्दु रौद्री फिर नाद बीज से ज्येष्ठा समुत्पन्न हुई थी यह वामा थी । फिर उनसे रुद्र ब्रह्मा और रमापति समुत्पन्न हुए थे । ।१०। सज्ञानेच्छाक्रियात्मानो वह्नीन्द्वर्कस्वरूपिणः । भिद्यमानात्पराद्बिन्दोरव्यक्तात्मा रवोऽभवत् ।११ भो
श्री शारदा तिलक ] [ ११ शब्दब्रह्मेति तं प्राहुः सर्वागमविशारदाः । शब्दब्रह्मेति शब्दार्थ शब्दमित्यपरे विदुः (जगुः) ।१२ न हि तेषां तयोः सिद्धि र्जडत्वादुभयोरपि । चैतन्यं सर्वभूतानां शब्दब्रह्मेति मे मतिः ।१३ तत्प्राप्य कुण्डलीरूपं प्राणिनां देहमध्यगम् । वर्णात्मनाऽऽविर्भवति गद्यपद्यादिभेदतः ।१४ अथ विन्दात्मनः शम्भोः कालबन्धोः कलात्मनः । अजायत जगत्साक्षी सर्वव्यापो सदाशिवः ।१५ संज्ञान-इच्छा और क्रिया के स्वरूप वाले अग्नि, चन्द्र और सूर्य के स्वरूप से युक्त भिद्यमान पर विन्दु से एक अव्यक्त स्वरूप वाला 'ख' हुआ था । ११ । उनको ही सब आगमों के विशारदों ने शब्द ब्रह्म कहा था । शब्द ब्रह्म-यह शब्दार्थ है । दूसरों ने इसको शब्द यही समझा था । १२ । उनकी सिद्धि उन दोनों के ही जड़ होने से नहीं हुई थी । मेरी मति तो यही है कि समस्त प्राणियों का चैतन्य ही शब्द ब्रह्म है । १३ । वह प्राणियों के देह के मध्य में स्थित कुण्डली के रूप को प्राप्त करके वर्णों के स्वरूप से गद्यों और पद्यों के भेद से आविर्भूत हुआ करती है । १४ । इसके अनन्तर काल के बन्धु कला के स्वरूप से युक्त विन्दु स्वरूप शम्भु से जगत् के साक्षी-सबमें व्याप्त रहने वाले सदाशिव समुत्पन्न हुये थे । १५। सदाशिवाद् भवेदीशस्ततो रुद्रसमुद्भवः । ततो विष्णुस्ततो ब्रह्मा तेषामेवं समुद्भवः । १६ मूलभूतात्ततोऽव्यक्ताद्विकृतात्परवस्तुनः । आसीत्किल महत्तत्वं गुणान्तः करणात्मकम् । १७ अभूत्तस्मादहङ्कारस्त्रिगुणः (विधिः) वृष्टिभेदतः । वैकारिकादहङ्काराद्देवा वैकारिका दश । १८ दिग् वातार्कप्रचेतोविश्ववह्वीन्द्रोपेन्द्रमित्रकाः । तैजसादिन्द्रियाण्येव तन्मात्राक्रमयोगतः । १६
१२ ] [ प्रथम पटल भूतादिकादहङ्कारात्पञ्च भूतानि जज्ञिरे । शब्दात्पूर्वं वितत्स्पर्शाद्वायूरूपादधुताशनः ।२० उन सदाशिव से ईश होते हैं और फिर उनसे रुद्र का समुद्भव हुआ करता है। उनसे भगवान् विष्णु होते हैं और फिर ब्रह्मा होते हैं । इनका इसी रीति से समुद्भव हुआ करता है । १६ । फिर मूलभूत अव्यक्त जो पर भूत है विक्रत से गुणान्तःकारण स्वरूप वाला महत्तत्व हुआ था । उस महत्तत्व से विधि भेद से तीन गुणो वाला अर्थात् सत्व- रजः — तमोगुणों वाला अहंकार हुआ था । वैकारिक अहङ्कार से दश वैकारिक देव हुये थे । १७ । १८ । दिक्, वायु-सूर्य-प्रचेता-अश्विनी- कुमार — वहिन इन्द्र — उपेन्द्र — मित्रक हुये । तेज से तन्मात्राओं के क्रम के योग से इन्द्रियाँ हुई हैं । १६। भूतादिक अहङ्कार से पाँच भूतों ने जन्म धारण किया था। पहिले शब्द से आकाश — स्पर्श से वायु — रूप से हुताशन हुआ था । २० । रसादम्भः क्षमा गन्धादिति तेषां समुद्भवः । स्वच्छंवियन्मरुत्कृष्णोरक्तोऽग्निर्विशदं पयः ।२१ पीता भूमिः पञ्च भूतान्येकैकाधारतोविदुः । शब्दस्पर्शरूपरसगन्धा भूतगुणाः स्मृताः ।२२ वृत्तं दिवस्तत्षड् बिन्दुलाञ्छितं मातरिश्वनः । त्रिकोणं स्वस्तिकोपेतं वह्ने रद्धेन्दुसंयुक्तम् । २३ अम्भोजमम्भसो भूमेश्चतुरस्रं सवज्रकम् । तत्तद्भूतसमाभानि विदुर्बुधाः ।२४ वर्णैः स्वैरञ्चितान्याहुः स्वस्वनामावृतान्यपि । धरादिपञ्चभूतानां निवृत्त्याद्याः कलाः स्मृताः ।२५ रस से जल, गन्ध से भूमि, इस रीति से उनकी उत्पत्ति होती है । आकाश स्वच्छ है—मरुत् का कृष्ण वर्णहोता है—अग्नि रक्तवर्ण वाला है, पय विशद होता है। भूमि पीतवर्ण वाली होती है । ये पाँच भूत हैं जो एक एक के आधार से समझे जाते हैं । शब्द — स्पर्श — रूप —
श्री शारदा तिलक ] [ १३ रस और गन्ध भूतों के गुण होते हैं—ऐसा कहा गया है। २१। २२। दिव वृत्त है, उससे षड्विन्दुओ से लाञ्छित वायु है-यह स्वस्तिक से युक्त त्रिकोण है—वह्नि अर्ध चन्द्र से संयुक्त होता है। २३। भूमि के अम्भ से चतुरस्र वज्र सहित अम्भोज होता है। बुध गण उस भूत के समान आभा वाले मन्डलों को जानते हैं। २४। इनको अपने वर्णों से अञ्चित और अपने-अपने नामों से आकृत भी है। धरा आदि पाँच भूतों को निवृत्ति आदि कलाएं कही गयी हैं। २५। निवृत्तिः सुप्रतिष्ठा स्याद्विद्या शान्तिरनन्तरम् । शान्त्यतीतेति विज्ञेया नाददेहसमुद्भवाः ।२६ पञ्चभूतात्मकं सर्वं चराचरमिदं जगत् । अचरा बहुधा भिन्ना गिरिवृक्षादिभेदतः ।२७ चरास्तु त्रिविधाः प्रोक्ता स्वेदाण्डजजरायुजाः । स्वेदजाः क्रिमिकीटाद्या अण्डजाः पन्नगादयः ।२८ जरायुजा मनुष्याद्यास्तेषु नृणां निगद्यते । उद्भवः पुंस्त्रियोयोगात् (१) शुक्रशोणितसंयुतान् ।२६ बिन्दुरेको भवेद्गर्भमुभयात्म क्रमादसौ । रजोऽधिके भवेन्नारी भवेद्र्रेतोऽधिके पुमान् । ३० निवृत्ति-सुप्रतिष्ठा-विद्या-शान्ति-शान्त्यतीता ये नायदेह से समुद्भव वाली कलाएं जाननी चाहिये । २६। यह स्थावर-जङ्गम चराचर जगत् सम्पूर्ण पांचों भूतों के ही स्वरूप वाला है। अचर पर्वत और वृक्ष आदि के भेदोंसे बहुत प्रकारके भिन्न-भिन्न होते हैं। २७। चर अर्थात् जङ्गम तीन प्रकार के होते हैं-कुछ स्वेदज हैं कुछ अण्डज होते हैं-और कुछ जरायुज हुआ करते हैं । स्वेद अर्थात् पसीने से समुत्पन्न होने वाले कृमि और कीट आदि होते हैं। अण्डों से उत्पन्न होने वाले पन्नग आदि हैं। २८। जरायुज मनुष्य आदि हैं उनमें नर-नारी कहे जाया करते हैं । इनकी उत्पत्ति पुरुषों और स्त्रियोंके योगसे हुआ करती है, अर्थात् पुरुषके वीर्य और स्त्री के रज के संयोग होने से होती है । २६। वह एक बिन्दु क्रम
१४ ] [ प्रथम पटल से उभय स्वरूप वाला गर्भ होता है । रज के अधिक हो जाने पर नारी की उत्पत्ति होती है और वीर्य के अधिक होने पर पुमान् होता है ॥३०॥ उभयोः समतायां तु नपुंसकमिति स्थितिः। पूर्वकर्मा नुरूपेण मोहपाशेन यन्त्रितः ।३१ कश्चिदात्मा तदा तस्मिन् जीवभावं प्रपद्यते । अथ मात्राहृतैरन्नपानाद्यैः पोषितः क्रमात् ।३२ दिनात् पक्षात् ततो मासात् वर्द्धते तत्वदेहवान् । दोषैर्दूष्यैः सुखं प्राप्तो व्यक्ति याति निजेन्द्रियैः ।३३ वातपित्तकफा दोषाः दूष्याः स्युः सप्त धातवः । त्वगसृङ् मांसमेदोऽस्थिमज्जाशुक्राणि तान्विदुः ।३४ ज्ञानेन्द्रियाणि श्रोत्रत्वग् दृग्जिह्वानासिका विदुः । ज्ञानेन्द्रियार्थाश्शब्दाद्याः स्मृताः कर्मेन्द्रियाण्यपि ।३५ वाक्पाणिपादपाय्वन्धुसंज्ञान्याहुर्मनीषिणः । वचनानादानगतयो विसर्गानन्दसंयुताः ।३६ यदि रज और वीर्य दोनोंकी समता होती है अर्थात् दोनो ही परि- माण में समान होते हैं तो नपुंसक की उत्पत्ति हुआ करती है। जो पूर्व जन्म के किये हुए कर्मों के अनुसार मोह के पाश से यन्त्रित होकर ही जन्म का ग्रहण किया जाता है। ३१। कोई भी आत्मा उस समय में उसमें जीव के भाव को प्राप्त किया करता है। इसके अनन्तर मात्रा के द्वारा समाहृत अन्न-पानादि से क्रम से वह पोषित हुआ करता है। ३२। वह तत्व देहधारी दिन पक्ष-मास के क्रम से बड़ा हो जाया करता है। दोषों से दूष्य अपनी इन्द्रियों के द्वारा सुख को प्राप्त होकर व्यक्तित्व को प्राप्त हुआ करता है, अर्थात् प्रकट होता है। वात-पित्त- कफ में दोष दूष्य हैं। सात धातुएं होती हैं अर्थात् शरीरमें रहने वाली सात धातुएं कहलाती हैं । त्वचा-रुधिर-मांस-मेद-अस्थि-मज्जा और शुक्र ये सात धातुएं हैं ।३३-३४। ज्ञानेन्द्रियाँ-श्रोत्र-त्वचा-नेत्र-जिह्वा-
श्री शारदा तिलक ] [ १५ नासिका ये पाँच हैं । ज्ञानेन्द्रियों के शब्द आदि अर्थ अर्थात् विषय होते हैं। ऐसा बताया गया है। पाँच ही कर्मेन्द्रियाँ होती हैं, कर्मेन्द्रियों के नाम ये हैं-वाक्-पाणि (हाथ)-पाद-पायु और अन्धु अर्थात् लिङ्ग । मनीषियोंने इनको विषय अर्थात् कर्मभी बतलाये जातेहैं-वचन, आदान, गमन, विसर्ग और आनन्द ये पाँचों क्रम से कर्म हैं ।३५-३६। कर्मेन्द्रियार्थाः संप्रोक्ता अन्तःकरण मात्मनः । मनोबुद्धिरहङ्कारश्चित्तं च परिकीर्तितम् ।३७ दशेन्द्रियाणि भूतानि मनसा सह षोडश । विकाराः स्युः प्रकृतयः पञ्चभूतान्यहङ्कृतिः ।३८ अव्यक्तं महदित्यष्टौ तन्मात्राश्च महानपि ।४ साहङ्कारा विकृतयः सप्त तत्त्वविदोविदुः ।३६ अग्नीषोमात्मकोदेहो बिन्दुर्यदुभयात्मकः । दक्षिणांशः स्मृतः सूर्यो वामभागो निशाकरः ।४० नाडीदेश विदुस्तासु मुख्यास्तिस्रः प्रकीर्त्तिताः । इडा वामे तयोर्मध्ये सुषुम्णा पिङ्गला परे ।४१ मध्या भास्वपि नाडीस्यादग्नीषोमस्वरूपिणी । गान्धारी हस्तिजिह्वाख्यासुपूषाऽलम्बुषा मता ।४२ यशस्विनी शंखिनी च कुहूः स्युः सप्त नाडयः (डिकाः) । नाड्योऽनन्ताः समुत्पन्नः सुषुम्णा पञ्चपर्वसु ।४३ मूलाधारोद्गतप्राणस्ताभिर्व्याप्नोति तत्तनुम् । वायवोऽत्र दश प्रोक्ता वह्नयश्च दश स्मृताः ।४४ प्राणाद्या मरुतः पञ्चः नागः कूर्मो धनञ्जयः । कृकलः स्याद्देवदत्त इति नामभिरीरिताः ।४५ ये कर्मेन्द्रियाँ बतला दी गयी हैं। अब आत्मा के अन्तकरण अर्थात् अन्दर में रहने वाली इन्द्रियाँ मन-बुद्धि-अहङ्कार-और चित ये कही गयी हैं ।३७। दश ज्ञानेन्द्रियाँ और कर्मेन्द्रियाँ तथा पाँचभूत और सोल- हवाँ मन ये विकार हैं जो प्रकृतियों के हैं । पाँचभूत-अहङ्कार-अव्यक्त
१६ ] [ प्रथम पटल और महतत्व ये आठ हैं। तन्मात्राएँ-महान् अहङ्कार के सहित सात विकृतियाँ हैं ऐसा तत्वों के ज्ञाता कहते हैं। ३८-३६। यह देह अग्नि और सोम के स्वरूप वाला होता है क्योंकि बिन्दु उभयात्मक ही होता है। दाहिना अंश सूर्य कहा गया है और वाँया भाग सोम होता है। दश नाड़ियाँ होती है उनमें भी तीन नाड़ियाँ मुख्य कही गयी हैं-शरीर के मध्य में नवाभाग में इडा नाड़ी है। दूसरी सुषुम्ना और पिङ्गला है। उनमें भी मध्य में रहने वाली नाड़ी अग्नि और सोम के स्वरूप वाली होती है। गान्धारी-हस्तिजिह्वा-सुपूषा-अलम्बुषा-यशस्वनी-शंखिनी और कुहू ये सात नाड़ियाँ होती हैं। इन से अनन्त नाड़ियाँ समुत्पन्न हुई हैं। सुषुम्णा पाँच पर्वों में से सब में सब ओर बलवान् प्राण वायु है जो मूलाधार से उद्गत होता है और उसके शरीर में व्याप्त रहता है। इसमें दश वायु कही गयी हैं और वह्नियां भी दश हैं।४०-४४। प्राण- अपान-उदान-ज्ञान और समान ये पाँच हैं और नाग-कूर्म-धनञ्जय- कृकल और देवदत्त ये पाँच इनके नाम कहे गये हैं।४५। अग्नयो दोषदूष्येषु संलीना दश देहिनः । बुभुक्षा च पिपासा च प्राणस्य, मनसः स्मृतौ ।४६ शोकमोहौ, शरीरस्य जरामृत्यू षडूर्मयः । स्वाय्वस्थिमज्जानः शुक्रात् त्वङ् मांसास्रोणि शोणितात् ।४७ षाट्कौशिकमिद प्रोक्तं सर्वदेहेषु देहिनाम् । इत्थभूतस्तदा गर्भे पूर्वजन्मशुभाशुभम् ।४८ स्मरंस्तिष्ठति दुःखात्मा च्छन्नदेहो जरायुजा। कालक्रमेण स शिशुर्मातरं क्लेशयन्नपि ।४६ स पिण्डितशरीरोऽथ जायतेऽयमवाङ्मुखः । क्षणन्मिषते निश्चेष्टी मीत्या रोदितु (दन) मिच्छति ।५० देहधारियों के दोष दूष्यों में दश अग्नियां संलीन रहती हैं। उनके नाम ये हैं-कल्माष-कुसुम-दहन-शोषण-महाबल-पीडर-पतङ्ग-स्वर्ण-
श्री शारदा तिलक ] १७ अगाध हैं। भूख और पिपासा प्राण के-शोक और मोहमन के-जरा और मृत्यु शरीर की-ये छँ ऊर्मियाँ कही गयी हैं । स्नायु-मज्जा और अस्थि शुक्रसे त्वक्-मांस शोणित से-वह देहधारियोंके देहों में षाट्कौशिककहा गया है । इस प्रकारसे स्थित यह गर्भमें आता है और उस समयमेंअपने पूर्व जन्म में किये हुए शुभ-अशुभ कर्मों का स्मरण करता है । यह बहुत ही दुःखित रहतेहुये स्थित रहता है, इसकासब शरीर जरायुसे ढकाहुआ होता है । काल स क्रमसे वह शिशु अपनी माता को क्लेशित करताहुआ भी गर्भ में रहता है । उसका शरीर पिण्डित रहता है और वह नीचेकी ओर मुख वाला जन्म लिया करता है । क्षण में ही यह विस्मृति वाला- निश्चेष्ठ होता हुआ अपने रुदन करनेकी इच्छा किया करता है।६ ५०। ततश्चैतन्यरूपा सा सर्वगा विश्वरूपिणी । शिवसन्निधिमासाद्य नित्यानन्दगुणोदया ॥५१ दिक्कालाद्यनवच्छिन्ना सर्वदेहानु (वेदार्थ) गा शुभा । परापरविभागेन पराशक्तिरियं स्मृता ॥५२ योगिनां हृदयाऽम्भोजे नृत्यन्ती नित्यमञ्जुला । आधारे सर्वभूतानां स्फुरन्ती विद्युदाकृति ॥५३ शंखवर्त्तक्रमाद्देवी सर्वमावृत्य तिष्ठति । कुण्डलीभूतसर्पाणामङ्गश्रियमुपेयुषी ॥५४ सर्वदेवमयी देवी सर्वमन्त्र (वर्ण) मयी शिवा । सर्वतत्त्वमयी साक्षात् सूक्ष्मात्सूक्ष्मतरा विभुः ॥५५ इसके अनन्तर वह चैतन्यरूप वाली-सबमें स्थित-विश्व रूपिणी- शिव के सान्निध्य को प्राप्त करके नित्यानन्द गुणों के उदययुता-दिशा और काल आदि से अनवच्छिन्ना-सबके देहों में अनुगमन करने वाली शुभा पर और अपर के विभागसे यह पराशक्ति कहीं गयी है ।५१-५२। योगियों के हृदय कमल में नित्य ही सहसा नृत्य करती हुई-समस्त प्राणियों के आधार में विद्युत की आकृति वाली यह स्फुरण करती हुई ।५३। शंख के आवर्त के क्रम से यह देवी सबकी आवृत्त करके स्थित रहा करती है । यह कुण्डलीभूत सर्पों की अङ्गश्री को प्राप्त होने
१८ [ प्रथम पटल वाली है ।५३-५४। यह देवी सब देवों से परिपूर्ण है और सब मन्त्रों से पूर्ण शिवा है। सब तत्त्वों से परिपूर्ण साक्षात् सूक्ष्म से भी सूक्ष्मतरा और विभु है ।५५। त्रिधामजननी देवी शब्दब्रह्मस्वरूपिणी । द्विचत्वारिंशद्वर्णा मा पञ्चाशद्वर्णरूपिणी । ५६ गुणिता सर्वगात्रेषु (ण) कुण्डली परदेवता । विश्वात्मना प्रबुद्धा सा सूते मन्त्रमय जगत् ।५७ एकधा गुणिता शक्तिः सर्वविश्वप्रवर्त्तिनी । वेदादिबीजं श्रीबीजं शक्तिबीजं मनोभवम् ।' ८ प्रासादं तुम्बुरु पिण्डं (बीज) चिन्तारत्नं गणेश्वरम् । मार्त्तण्डभैरवं दौर्गं नारसिंहं वराहजम् ।।५६ वासुदेवं हयग्रीवं बीजं श्रीपुरुषोत्तमम् । अन्यान्यपि च बीजानि तदात्पादयति ध्रुवम् ।।६० यह त्रिधाम जननी है और यही देवी शब्द ब्रह्म के स्वरूप वाली है। बयालीस वर्णों के रूप वाली तथा पचास वर्णों के स्वरूप में रहने वाली है। सब गात्रों में गुणिता यह कुण्डली पर देवता है। विश्वात्मा के द्वारा प्रबुद्ध की गयी वह मन्त्रमय जगत् को प्रसूत किया करती है ।५६। ५७। एक प्रकार से गुणिता शक्ति सम्पूर्ण विश्व के प्रवर्त्तन करने वाली है। वेदादि बीज को-श्री बीज को-शक्ति बीज को-मनोभव को-प्रसाद- तुम्बुरुपिण्ड को-चिन्तारत्न को-गणेश्वर को-मार्त्तण्ड भैरव, दौर्ग, नारा- सिंह-वराहज वासुदेव-हयग्रीव बीज को-श्रीपुरुषोत्तम को और अन्यान्य बीजों को भी उस समय वे उत्पादित निश्चित रूप से किया करती है ।५८-६०। यदा भवति सा संवित् द्विगुणीकृतविग्रहा । हंसवर्णौ परात्मानौ शब्दार्थौ वासरक्षये ।।६१ सृजत्येषा परा देवी तदा प्रकृतिपूरुषौ । यद्यदन्यज्जगत्यस्यः युग्मं तत्तदजायत ।।६२
श्री शारदा तिलक ] २६ त्रिगुणीकृतसर्वाङ्गी चिद्रूपा शिवगेहिनी । प्रसूते त्रैपुरं मन्त्रं शक्तिविनायकम् । ६३ पाशाद्यं त्र्यक्षरं मन्त्रं त्रैपुरं चण्डनायकम् । सौरं मृत्युञ्जयं शक्ति शाम्भवं विनतासुतम् । ६४ वागीशीत्र्यक्षरं मन्त्रं नीलकण्ठं विषापहम् । यन्त्रं त्रिगुणितं देव्या लोकत्रयगुणत्रयम् ६५ जिस समय में वह संवित् द्विगुणी कृत विग्रह वाली होती है तो वासर के क्षय में हसवर्ण परात्मा शब्दार्थोका यह सृजन करती है। यह परा देवी उस समय में प्रकृति और पुरुष का सृजन किया करती है । जो-जो भी इस जगत् मे है वह युग्म उत्पन्न होता है ।६१-६२। यह चिद्रूपा अर्थात् चैतन्यके स्वरूप वाली शिवकी गृहिणी त्रिगुणी कृत सब अङ्गो वाली होकर त्रैपुर मन्त्रों और शक्ति विनायक मन्त्र को प्रसूत किया करती है ।६३। पाशाद्य तीन अक्षरों वाला मन्त्र है और त्रिपुर चण्डनायक मन्त्र है । सौर-मृत्युञ्जय शक्ति-शाम्भव-विनतासुत वागीशी-ये तीन अक्षरों वाला मन्त्र है। नीलकण्ठ विष के अपहरण करने वाला होता है । देवी का त्रिगुणित मन्त्र होता है। लोक तीन हैं और गुण तीन हैं ।६४-६५। धामत्रयं सा वेदानां त्रयं वर्णत्रयं शुभा । त्रिपुष्करं स्वरान्देवी ब्रह्मादीनां त्रयं त्रयम् । ६६ वह्नेः कालत्रयं शक्तित्रयं वृत्तित्रयं मतम् । नाडीत्रयं त्रिवर्गं सा यद्यदन्यत् त्रिधा मतम् । ६७ चतुःप्रकारगुणिता शाम्भवी शर्मदायिनी । तदानीं पद्मिनीबन्धोः करोति चतुरक्षरम् । ६८ चतुर्वर्णं महादेव्या देवीतत्त्वचतुष्टयम् । चतुरः सागरात्तन्तःकरणानां चतुष्टयम् । ६६ सूक्ष्मादींश्चतुरो भावान् विष्णोर्मूर्त्तिचतुष्टयम् । चतुष्टयं गणेशानामात्मादीना चतुष्टयम् । ७०
२० [ प्रथम पटल वह शुभा तीन धाम है तीन वेद हैं और तीन वर्ण है। देवी तीन पुष्कर-स्वर और ब्रह्मादिक का भी त्रय है ।६६। तीन अग्नियां हैं- तीन काल हैं, शक्तिका भी त्रय है और तीन वृत्तियाँ हैं। तीन नाड़ियां हैं तीन वर्ग हैं, वह ऐसी है और जो जोभी अन्य है वह सब तीनप्रकार का ही है ।६७। चार प्रकार से गुणित शाम्भवी कल्याण देने वाली है । उस समय में पद्मिनी-बन्धु का चार अक्षर वाला करती है। यह मन्त्रान्तर में कथित प्रणव-माया और हंस वर्णोंके स्वरूप वाला है ।६८। महादेवी के चार वर्ण है और रवी के तत्व भी चार होते हैं। चार ही सागर हैं और अन्तःकरण भी मन, बुद्धि, अहंकार और चित्त चार होते हैं । सूक्ष्म आदि चार भाव है और भगवान् विष्णु की मूर्तियाँ भी चार ही होती हैं। गणेश आदि का चतुष्टय होता है और आत्मादि भी चार हैं ।६६-७०। तथापूजादिकं पीठं धर्मादीनां चतुष्टयम् । दमकादीन् गजान् देवा यद्यदन्यच्चतुष्टयम् ।७१ पञ्चधा गुणिता पत्नी शम्भोः सर्वार्थदायिनी । त्रिपुरा पञ्चकूटं सा तस्याः पञ्चाक्षरद्वयम् ।७२ पञ्चरत्नं महादेव्याः सर्वकामफलप्रदम् । पञ्चाक्षरं महेशस्य पञ्चवर्णं गरुत्मनः ।७३ सम्मोहनान्पञ्चकामान्बाणान्पञ्च सुरद्र मान् । पञ्चप्राणादिकान् वायून् पंच वर्णान् महेशितुः ।७४ मूर्त्तीः पंच, कलाः पंच पंच ब्रह्म ऋचः क्रमात् । सृजत्येषा परा शक्तिर्वेदवेदार्थरूपिणी ।७५ उसी प्रकार से पूजादिक पीठ और धर्मादिका भी चतुष्टय होता है । दमकादि-गज और देव जो जो भी अन्य हैं सबका चतुष्टय ही होता है। ।७१। सब अर्थों की देने वाली शम्भु की पत्नी पाँच प्रकार से गुणित होती हैं। वह त्रिपुरा पञ्चकूट है और उसके पञ्चाक्षर द्वय है। महा- देवी के पाँच रत्न हैं जो सब कामनाओं के फल के प्रदाता हैं। महेश