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शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

द्वितीयोऽध्यायः ] भैषज्याख्यान 19 --- [बायाँ स्तम्भ] --- पर विविध प्रकार के रुचिकर, किन्तु पथ्य भोजनों में मिलाकर औषध-सेवन करना चाहिये। समान वायु की विकृति से होने वाले (पक्वाशय सम्बन्धी) रोगों में, मन्दाग्नि (जठराग्नि के मन्द पड़ जाने) में, अग्नि की शक्ति को बढ़ाने वाले औषधयोग को भोजन के बीच में कुशल चिकित्सक दे। व्यानवायु के प्रकोप से होने वाले (अर्दित = मुखप्रदेश का लकवा तथा पक्षाघात आदि) रोगों में भोजन के अन्त में औषध-सेवन करना चाहिये। हिचकी, आक्षेपक (वातव्याधि-विशेष देखें- मा० नि०) तथा कम्पवात आदि रोगों में भोजन के तथा भोजन करने के बाद औषध-सेवन करना चाहिये। इस प्रकार यह औषध-सेवन करने के दूसरे काल का वर्णन कर दिया गया है। औषध-सेवन का तृतीय काल उदाने कुपिते वाते स्वरभङ्गादिकारिणि।।8।। ग्रासे ग्रासान्तरे देयं भैषज्यं सान्ध्यभोजने। प्राणे प्रदुष्टे सान्ध्यस्य भुक्तस्यान्ते च दीयते।।9।। औषधं प्रायशो धीरैः कालोऽयं स्यात् तृतीयकः। स्वरभंग (स्वरभेद) आदि (कास, श्वास, तथा हिक्का जैसे) रोगों को उत्पन्न करने वाले उदान नामक वायु (जो कंठ, श्वासमार्ग में निवास करता है, उस) के प्रकुपित हो जाने पर सायंकालीन भोजन के समय प्रत्येक ग्रास के साथ औषध देना चाहिये और हृदयगति का संचालन करने वाली प्राणवायु के कुपित होने पर सायंकालीन भोजन के अन्त में विद्वान् चिकित्सक को औषध प्रयोग कराना चाहिये। इस प्रकार यह औषध-सेवन करने का तीसरा काल है। औषध-सेवन का चतुर्थ काल मुहुर्मुहुश्च तृट्छर्दिहिक्काश्वासगरेषु च।।10।। सान्नं च भेषजं दद्यादिति कालश्चतुर्थकः। तृट् (प्यास), छर्दि (वमन, उल्टी या कै), हिचकी, श्वास (दमा) तथा विविध गरों (दूषीविषों के प्रयोग के कारण उत्पन्न रोगों) में बार-बार (अनेक बार) भोजन में मिलाकर औषध का सेवन कराना चाहिये। यह औषध-सेवन का चौथा काल कहा गया है। औषध-सेवन का पञ्चम काल ऊर्ध्वजत्रुविकारेषु लेखने बृंहणे तथा।।11।। पाचनं शमनं देयमनन्नं भेषजं निशि। इति पञ्चमकालश्च प्रोक्तो भेषज्यकर्मणि।।12।। --- [दायाँ स्तम्भ] --- जत्रु (Collar bone = ग्रीवा के सामने उभरी हुई अस्थि) के ऊपरी भाग में होने वाले अवयवों (गला, मुख, नाक, कान, आँख तथा सिर) के रोगों में लेखन (कर्षण = खुरचकर निकालने या कृश करने) में, बृंहण (स्थूल करने) में पाचन तथा शमन औषधयोगों का प्रयोग रात में भोजन के पहले ही कराना चाहिये। यह औषध सेवन का पाँचवाँ काल कह दिया गया है। वक्तव्य-प्रायः देखा जाता है कि रोगी चिकित्सक से पूछा करते हैं-यह औषध कब-कब खानी है, इसके उत्तर के लिए इन श्लोकों में कहे गये विषयों का अभ्यास करें। विशेष जानकारी प्राप्त करने के लिए चरक चि० अ० 30, श्लोक 296 से 312 का भी अवलोकन कर लेना चाहिये। उपर्युक्त श्लोक में प्रयुक्त 'निशि' शब्द का अर्थ सामान्य स्थिति में 'रात्रि का प्रथम प्रहर' है। द्रव्य की पाँच अवस्थाएँ द्रव्ये रसो गुणो वीर्यं विपाकः शक्तिरेव च। संवेदनक्रमादेताः पञ्चावस्थाः प्रकीर्तिताः।।13।। द्रव्य का सेवन करने पर उसमें अनुभवी-क्रम से रस, गुण, वीर्य, विपाक तथा शक्ति (प्रभाव) ये पाँच अवस्थाएँ कही गयी हैं। वक्तव्य-रस आदि का परिचय-जीभ द्वारा जिसका परिचय प्राप्त होता है उसे 'रस' कहते हैं। इसकी उत्पत्ति मूल रूप से जल द्वारा मानी गयी है। रसों की संख्या छः है। यथा- मधुर, अम्ल, लवण, कटु, तिक्त, तथा कषाय। गुण-इनकी संख्या बीस है-गुरु, मन्द, हिम, स्निग्ध, श्लक्ष्ण, सान्द्र, मृदु, स्थिर, सूक्ष्म, विशद (इन गुणों के विपरीत क्रमशः ये दस गुण हैं) लघु, तीक्ष्ण, उष्ण, रूक्ष, खर, द्रव, कठिन, सर, स्थूल, तथा पिच्छिल। वीर्य-यह दो प्रकार का होता है-उष्ण और शीतल। विपाक-इसकी परिभाषा इसी अध्याय के 33वें श्लोक में देखें। यह रसभेद से तीन प्रकार का होता है-मधुर, अम्ल, तथा कटु। शक्ति-द्रव्यों की शक्ति अचिन्त्य होती है। द्रव्य-यह स्थावर, जंगम तथा पार्थिव भेद से तीन प्रकार का होता है। स्थावर द्रव्य-जड़, छाल, सार, गोंद, नाल, स्वरस, पत्र, पुष्प, फल, दूध, क्षार, भस्म, तथा तेल आदि। जङ्गम द्रव्य-दूध, मधु, पित्त, स्नेह (वसा), मज्जा, रक्त, मांस, हड्डी, चर्म, मल, मूत्र, स्नायु, नख, लोम, खुर, तथा सींग आदि। पार्थिव द्रव्य-सोना, चाँदी, ताँबा, सीसा,

20 शार्ङ्गधरसंहिता [ पूर्वखण्डे राँगा, लोहा, अभ्रक तथा इनके यौगिक अन्य खनिज द्रव्य। इस दृष्टि से संसार की सम्पूर्ण वस्तुएँ 'द्रव्य' हैं। मधुररस के लक्षण (स्नेहन-प्रीणनाह्लाद मार्दवैरुपलभ्यते। मुखस्थो मधुरश्चास्यं व्याप्युर्वल्लिम्पतीव च।। 17।।) जिस रस से स्नेहन, प्रीणन (तृप्ति), आह्लाद (आनन्द) तथा मृदुता की प्राप्ति हो और जो मुख में रखा हुआ मुख के चारों ओर फैलकर लिपट जाये, उसे मधुर रस कहते हैं। वक्तव्य-मधुर आदि छः रसों के वर्णन का विशद विवेचन चरकसंहिता सू० अ० 26 श्लोक 74 से 79 तक में देखें। अम्लरस के लक्षण (दन्तहर्षान्मुखस्रावात् स्वेदनानमुखबोधनात्। विदाहाच्चास्य कण्ठस्य प्राश्यैवाम्लरसं वदेत्।। 18।।) जिसको चखने मात्र से दाँत खट्टे हों, मुख से पानी का स्राव होने लगे, पसीना होने लगे, मुख का बोधन हो, अर्थात् मुख का फीकापन दूर हो जाये, जिसका अधिक सेवन कर लेने से मुख तथा गले में विदाह (जलन) होने लगे, उसे 'अम्लरस' कहना चाहिये। वक्तव्य-अंग्रेजी में अम्ल तथा क्षार का एक पर्याय Acid भी है। इसमें विदाहक गुण होता है। अतएव गीता में ऐसे पदार्थों के अधिक सेवन का निषेध किया गया है। देखें-'कट्वम्ललवणात्युष्णतीक्ष्णरूक्षविदाहिनः'। गीता अ० 17.9। लवणरस के लक्षण (प्रलीयन् क्लेदविष्यन्दमार्दवं कुरुते मुखे। यः शीघ्रं लवणो ज्ञेयः स विदाहान्मुखस्य च।। 19।।) जो मुख में रखा हुआ शीघ्र ही घुल जाये, सूखे हुये मुख के भीतरी भाग को गीला कर दे, लालास्राव को पैदा करे और अधिक सेवन करने पर मुख के भीतर जलन पैदा करे, उसे लवणरस समझें। वक्तव्य-'प्रलीयन्' के स्थान पर श्रीगणनाथसेन 'प्रीणयन्' पाठभेद को स्वीकार करते हैं। 'स विदाहान्मुखस्य च' यह स्थिति मात्रा से अधिक लवणरस के सेवन से उत्पन्न होती है। कटुरस के लक्षण (संवेजयेद् यो रसनां निपाते तुदतीव च। विर्दहन् मुखनासाक्षि संस्रावी स कटुः स्मृतः।। 20।।) द्रव्य का लक्षण (द्रव्यमेव रसादीनां श्रेष्ठं ते हि तदाश्रयाः। पञ्चभूतात्मकं तत्तु क्ष्मामधिष्ठाय जायते।। 14।। अम्बुयोन्यग्निपवननभसां समवायतः। तन्निर्वृत्तिर्विशेषश्च व्यपदेशस्तु भूयसा।। 15।।) रस, गुण, वीर्य, विपाक तथा प्रभाव की अपेक्षा द्रव्य को ही श्रेष्ठ माना जाता है, क्योंकि उपर्युक्त रस आदि गुण द्रव्य के ही आश्रित होते हैं। द्रव्य के बिना उक्त रस आदि की सत्ता कहीं नहीं देखी जाती। इस प्रकार का वह द्रव्य पञ्चभूतात्मक होता है। वह द्रव्य पृथ्वी तत्त्व का आश्रय (सहारा) लेकर व्यक्त (प्रकट) होता है, उसकी जल योनि (उत्पन्न करने वाली) है। अग्नि, वायु तथा आकाशतत्त्व के योग से उसकी उत्पत्ति और विशेष (स्वरूप-भेद) होता है। इन द्रव्यों में उक्त पंचभूतों की तर-तम भाव से अधिकता होने से ये द्रव्य पार्थिव, आप्य, तथा तैजस आदि संज्ञा वाले हो जाते हैं। वक्तव्य-प्राचीन तन्त्रकारों ने भी एकमत से द्रव्य को पाञ्चभौतिक स्वीकारा है। इसके विशेष विवेचन के लिए देखें-अ० हृ० सू० अ० 9.1-2। रसों के छः भेद मधुरोऽम्लः पटुश्चैव कटुतिक्तकषायकाः। इत्येते षड्रसाः ख्याता नानाद्रव्यसमाश्रिताः।। 16।।

  1. मधुर (मीठा-गुड़ आदि), 2. अम्ल (खट्टा-नींबू आदि), 3. पटु (नमकीन-लवण आदि), 4. कटु (कडुआ- सोंठ, मरिच, पीपल, तथा (लालमिर्च आदि), 5. तिक्त (तीता-नीम, चिरायता, तथा कुटज आदि) और 6. कषाय (कसैला-आँवला आदि)। इस प्रकार ये छः रस कहे गये हैं, जो भिन्न-भिन्न द्रव्यों में पाये जाते हैं। वक्तव्य-जीभ द्वारा स्पर्श होने पर उक्त रसों का ठीक- ठीक निर्णय हो जाता है, अतएव जीभ का एक नाम 'रसना' भी है। रसना के अकर्मण्य हो जाने पर रसों का ज्ञान नहीं हो पाता है। इसी प्रकरण में आगे इन रसों के परिचायक पद्य दिये गये हैं। आप देखेंगे कि कटु और तिक्त रसों के सम्बन्ध में भ्रान्त-धारणाएँ किस प्रकार समाज में फैली हैं।

द्वितीयोऽध्यायः ] भैषज्यव्याख्यान 21 जो जीभ पर रखने मात्र से घबराहट उत्पन्न करे, जीभ में चुभे या कष्ट पहुँचाये, दाह उत्पन्न करता हुआ मुख, नासिका तथा आँखों से स्राव कराने वाला हो, वह कटुरस कहा जाता है। वक्तव्य-कटुत्रय में सोंठ, मरिच एवं पिप्पली का ग्रहण होता है। इन्हीं गुणों से भरपूर लालमिर्च भी होता है। इनमें से किसी एक को खाकर उक्त लक्षणों से मिलान करें। तिक्त (तीता) रस इससे सर्वथा भिन्न होता है। तिक्तरस के लक्षण (प्रतिहन्ति निपाते यो रसनां स्वदते न च। स तित्तो मुखवैशद्यशोषप्रह्लादकारकः ॥ 21 ॥) जो जीभ पर पड़ने से उसे कष्ट दे, अर्थात् अप्रिय लगे और जो अन्य रसों का स्वाद प्रतीत न होने दे, उसे 'तिक्तरस' कहते हैं। यह मुख की तिक्तता को दूर करके, लार को सुखाकर मन को प्रसन्न कर देता है। वक्तव्य-तिक्तरस-प्रधान द्रव्यों में 'नीम' का ग्रहण किया जाता है। इसकी दातून करने से उक्त सभी गुणों की प्राप्ति होती है। कुटकी भी अत्यन्त तिक्त रस वाली होती है। इसका सेवन करने से मुख का तीतापन दूर हो जाता है। देखें-'मम द्वयं विस्मयमातनोति, तिक्ताकषायो मुखतिक्तताघ्नः ।'- वैद्यजीवनम् । कषायरस के लक्षण (वैशद्यस्तम्भजाड्यैर्यो रसनां योजयेद् रसः। बध्नातीव च यः कण्ठं कषायः स विकास्यपि ॥ 22 ॥) जिसके खाने पर जीभ की चिपचिपाहट तो दूर हो जाये, किन्तु जीभ स्तब्ध तथा जड़ अर्थात् दूसरे रसों का अनुभव करने में असमर्थ हो जाये, कण्ठ (गला) बँधता या रुकता हुआ-सा प्रतीत हो तथा जो विकासी (पिच्छिल) गुण का नाशक हो, वह कषाय (कसैला) रस कहा जाता है। रसों का उत्पत्ति-क्रम धराम्बुक्ष्मानलजलज्वलनैनाकाशमारुतैः । वावग्निक्ष्मानिलैर्भूतद्वयै रसभवः क्रमात् ॥ 23 ॥ प्रस्तुत क्रम से दो-दो महाभूतों के परस्पर मिलने से निम्न प्रकार रसों की उत्पत्ति होती है-धरा (भूमि) तत्त्व, जलतत्त्व से मधुररस; क्ष्मा (भूमि) तत्त्व, अनल (अग्नि) तत्त्व से अम्ल (खट्टा) रस; जलतत्त्व, ज्वलन (अग्नि) तत्त्व से लवणरस; आकाशतत्त्व, मरुत् (वायु) तत्त्व से कटुरस; वायुतत्त्व, अग्नितत्त्व से तिक्तरस तथा क्ष्मा (भूमि) तत्त्व, अनिल (वायु) तत्त्व से कषाय रस की। वक्तव्य-सामान्य दृष्टि से रसों का क्रम यह है-1. मधुर, 2. अम्ल, 3. लवण, 4. कटु, 5. तिक्त, तथा 6. कषाय। इस दृष्टि से जब हम ऊपर के श्लोकोक्त क्रम को देखते हैं, तो उसका अनुवाद जैसा ऊपर दिया गया है, उसी प्रकार का होगा, किन्तु वास्तविकता इससे भिन्न है। अतः हम ग्रन्थकार की उक्ति का सम्मान करने के लिए उक्त रसादि क्रम में 'तिक्तरस' को प्रथम स्थान देकर उसके बाद 'कटुरस' का स्थान स्वीकार कर लेंगे, क्योंकि आप देखें कि चरक तथा सुश्रुत दोनों ही संहिताकारों ने वायु तथा अग्निगुण की अधिकता से 'कटुरस' और वायु एवं आकाशगुण की अधिकता से 'तिक्तरस' की उत्पत्ति को स्वीकार किया है। विशेष विवेचन के लिए देखें-च० सू० अ० 36 तथा सु० सू० अ० 42। पञ्चमहाभूतों के गुण गुरुः स्निग्धश्च तीक्ष्णश्च रूक्षो लघुरिति क्रमात्। धराम्बुवह्विपवनव्योम्नां प्रायो गुणाः स्मृताः ॥ 24 ॥ एष्वेवान्तर्भवन्त्यन्ये गुणेषु गुणसञ्चयाः। गुरु, स्निग्ध, तीक्ष्ण, रूक्ष, तथा लघु ये पाँच गुण क्रमशः (पृथिवी), अम्बु (जल), वह्नि (अग्नि), पवन (वायु) तथा व्योमन् (आकाश) नामक महाभूतों के माने गये हैं। अन्य सभी प्राचीन संहिताकारों द्वारा अपनी-अपनी संहिताओं में वर्णित गुण-समूह का अन्तर्भाव इन्हीं पाँच गुणों में हो जाता है। वक्तव्य-चरक आदि संहिताओं में गुणों की संख्या बीस है। ये गुण परस्पर विरोधी अथवा विपरीत स्वभाव वाले होते हैं। आप इन्हें ध्यान से देखें-'गुरु, लघु, मन्द, तीक्ष्ण, शीत, उष्ण, स्निग्ध, रूक्ष, श्लक्ष्ण, खर, सान्द्र, द्रव, मृदु, कठिन, स्थिर, तथा चल। शीत तथा उष्ण गुणों के द्रव्य-विवेचन प्रसंग में 'वीर्य' की संज्ञा दी गयी है। इन उपर्युक्त गुणों से युक्त द्रव्यों का अधिक सेवन करने से उस-उस द्रव्य का प्रभाव शरीर पर स्पष्ट दिखलायी देता है। जैसे-घी-तेल स्निग्ध गुण वाले होते हैं। इनका सेवन करने से शरीर में स्निग्धता आ जाती है और रूक्ष द्रव्यों के सेवन से रूक्षता आ जाती है। शार्ङ्गधराचार्य ने जिन पाँच गुणों का चयन किया है, उनमें उक्त सभी गुणों का समावेश किया जा सकता है।

22 शार्ङ्गधरसंहिता [पूर्वखण्डे गुरु गुण के लक्षण ( गुरु वातहरं पुष्टिश्लेष्मकृच्चिरपाकि च ॥ २५ ॥ ) गुरु नामक गुण वात दोष का नाश करता है, शरीर को पुष्ट करता है, कफ को बढ़ाता है और चिरपाकी (देर में पचने वाला) होता है। स्निग्ध गुण के लक्षण ( स्निग्धं वातहरं श्लेष्मकारि वृष्यं बलावहम् । ) स्निग्ध नामक गुण वातदोष का नाश करता है, कफदोष को बढ़ाता है, वृष्य (वीर्य को बढ़ाने वाला) है तथा बल की वृद्धि करने वाला होता है। तीक्ष्ण गुण के लक्षण (तीक्ष्णं पित्तकरं प्रायो लेखनं कफवातहृत् ॥ २६ ॥) तीक्ष्ण नामक गुण पित्तकारक (पित्त के बढ़ाने वाला), प्रायः लेखन (आँतों में सटे हुये कफदोष को खुरचकर निकालने वाला), कफ एवं वात दोष का विनाशक होता है। रूक्ष गुण के लक्षण ( रूक्षं समीरणकरं परं कफहरं मतम् । ) रूक्ष नामक गुण वातदोष को बढ़ाने वाला और कफदोष को दूर करने वाले द्रव्यों में सर्वश्रेष्ठ माना गया है। लघु गुण के लक्षण ( लघु पथ्यं परं प्रोक्तं कफघ्नं शीघ्रपाकि च ॥ २७ ॥ ) लघु नामक गुण अत्यन्त पथ्य (हित करने वाला), कफदोष का विनाशक तथा शीघ्र पच जाने वाला होता है। **वक्तव्य—**उक्त गुरु, स्निग्ध आदि पाँच गुण जिन-जिन द्रव्यों में रहते हैं, ये सभी वर्णन उन-उन द्रव्यों के हैं। पृथिवी, जल आदि भूतों के रूप में इन गुणों का प्रयोग नहीं देखा जाता। आप इस प्रसंग का प्रयोग आहार-विहार तथा पथ्यापथ्य के क्षेत्र में करके स्वयं अनुभव करें। वीर्य का वर्णन वीर्यमुष्णं तथा शीतं प्रायशो द्रव्यसंश्रयम्। तत्सर्वमग्नीषोमीयं दृश्यते भुवनत्रये ॥ २८ ॥ अत्रैवान्तर्भविष्यन्ति वीर्याण्यन्यानि यान्यपि। उष्ण तथा शीत भेद से प्रायः वीर्य दो प्रकार का होता है। ये दो भिन्न-भिन्न प्रकार के द्रव्यों में रहते हैं। इसीलिए संसार के सभी द्रव्य अग्नि (आग्नेय = उष्ण) तथा सोम (सौम्य = शीत) वीर्य प्रधान तीनों लोकों में देखे जाते हैं। अन्य वीर्यों (स्निग्ध, रूक्ष आदि) का भी अन्तर्भाव इन्हीं के अन्तर्गत कर लिया जाता है या कर लिया जाना चाहिये। **वक्तव्य—**आचार्य शार्ङ्गधर के सामने प्राचीन आयुर्वेदीय संहिताएँ रहीं, अतएव उन्होंने अपना 'द्विविध वीर्य सम्बन्धी' मत पहले देकर मतभेद युक्त दूसरों के मतों को 'अन्यानि यानि अपि' कहकर किसी को छोड़ा नहीं। इस प्रसंग में हम अन्य आचार्यों द्वारा स्वीकृत अष्टविध वीर्यों को यहाँ उद्धृत कर रहे हैं। चरक के अनुसार वीर्य के भेद—'मृदु, तीक्ष्ण, गुरु, लघु, स्निग्ध, रूक्ष, उष्ण, तथा शीतल'। सुश्रुत के अनुसार वीर्य के भेद—शीत, उष्ण, स्निग्ध, रूक्ष, मृदु, तीक्ष्ण, पिच्छिल, तथा विशद। इन प्रसंगों को आप क्रमशः च० सू० अ० 26. 64-65 में तथा सु० सू० अ० 42.5 एवं 11 में देखें। वास्तव में द्रव्य में रहने वाली 'वीर्य' वह शक्ति है, जिसके बल पर वह समस्त कार्य करता है। देखें—'एतानि वीर्याणि स्वबल-गुणोत्कर्षाद् रसमभिभूयात्मकर्म कुर्वन्ति'। सु०सू०अ० 40.5। उष्ण, शीत वीर्य के लक्षण ( शीतं तु ह्लादनं स्तम्भि मूर्च्छातृट्स्वेददाहनुत् ॥ २९ ॥ उष्णं भवति शीतस्य विपरीतं च पाचनम् । ) शीत नामक वीर्य आह्लाद (प्रसन्नता)कारक, रक्त, मल, तथा मूत्र आदि की अतिप्रवृत्ति (अधिक निकलने) को रोकने वाला, मूर्च्छा, तृट् (प्यास), स्वेद (पसीना) तथा दाह (जलन) को दूर करने वाला होता है। उष्ण नामक वीर्य शीतवीर्य से विपरीत गुणों वाला तथा पाचनकारक होता है। **वक्तव्य—**जिस प्रकार संहिताकार आचार्यों ने द्रव्य-प्रकरण में द्रव्य की प्रधानता का वर्णन किया था, उसी प्रकार प्रस्तुत वीर्य के प्रकरण में इसकी प्रधानता स्वीकार की गयी है, क्योंकि वीर्य के क्षेत्र में द्रव्य में रहने वाले अन्य गुणों को महत्त्व देना क्रम प्राप्त नहीं है। यहाँ उष्ण तथा शीत दो प्रकार के वीर्यों का उल्लेख किया गया है। अतः उक्त दो वीर्यों का सोदाहरण परिचय प्रस्तुत है—

  1. **कुलथी—**यह कषाय तथा कटु रस होने पर भी वातदोष की वृद्धि नहीं करती है, क्योंकि यह 'उष्णवीर्य' है। उष्णवीर्य होने के कारण यह वातनाशक है।
  2. **ईख का रस—**यह रस में मधुर होता है, फिर भी वातदोष का शमन नहीं करता है, क्योंकि यह 'शीतवीर्य' होता है। शीतवीर्य होने के कारण ही यह वातदोष को बढ़ाता है। यहाँ उदाहरण के लिए ऐसे दो द्रव्यों का उल्लेख किया है,

द्वितीयोऽध्यायः] भैषज्यव्याख्यान 23 जो अन्य गुणों के कारण नहीं, अपितु अपने 'वीर्य' के कारण कार्य करते हैं। ऐसा विचार अन्यत्र भी कर लेना चाहिये। विपाक-परिचय त्रिधा विपाको द्रव्यस्य स्वाद्वम्लकटुकात्मकः ।। ३० ।। मिष्टः पटुश्च मधुरमम्लोऽम्लं पच्यते रसः । कषायकटुतिक्तानां पाकः स्यात् प्रायशः कटुः ।। ३१ ।। मधुराज्जायते श्लेष्मा पित्तमम्लाच्च जायते । कटुकाज्जायते वायुः कर्माणीति विपाकतः ।। ३२ ।। भिन्न-भिन्न रस वाले द्रव्य का विपाक तीन प्रकार का होता है- 1. मधुर, 2. अम्ल एवं 3. कटु। मधुर तथा लवण रस का विपाक 'मधुर' होता है; अम्ल (खट्टा) रस का विपाक अम्ल ही होता है; कषाय, कटु (सोंठ, मरिच, एवं पिप्पली आदि) तथा तिक्त (नीम, चिरायता जैसे द्रव्यों के रसों) का विपाक प्रायः 'कटु' होता है। मधुर विपाक से कफदोष की, अम्ल विपाक से पित्तदोष की और कटु विपाक से वातदोष की उत्पत्ति होती है। ये विपाकों के कार्य कहे गये हैं। वक्तव्य- अपने-अपने स्थान पर सब का महत्त्व होता है। यही स्थिति द्रव्य एवं उसमें रहने वाले रस, गुण, वीर्य, विपाक तथा प्रभाव की भी होती है। अर्थात् जिस प्रकार ऊपर द्रव्य, रस, गुण, वीर्य के महत्त्व का वर्णन किया जा चुका है, ठीक उसी प्रकार यहाँ 'विपाक' की प्रधानता स्वीकार की गयी है, क्योंकि इस दृष्टि से द्रव्य में स्थित उसका मूल रस तथा विपाक के बाद उत्पन्न होने वाला रस अपने-अपने समय में प्रभावोत्पादक होता ही है। इस विषय के विशेष विवेचन के लिए आप सुश्रुतसंहिता सू० अ० 40 का अध्ययन करें। विपाक-परिचय (जाठरेणाग्निना योगाद् यदुदेति रसान्तरम्। रसानां परिणामान्ते स विपाक इति स्मृतः ।। ३३ ।।) मधुर आदि रसों का शरीर पर तात्कालिक प्रभाव पड़ जाने के बाद, जठराग्नि के साथ संयोग होने के अनन्तर जो दूसरे रस की उत्पत्ति होती है वह 'विपाक' कहा जाता है। वक्तव्य- प्रारम्भिक स्थिति में द्रव्य में स्थित रस रसना (जीभ) द्वारा ग्रहण किये जाते हैं। ये प्रारम्भ में पुरुष की प्रकृति के अनुसार अपने सद्गुणों का प्रभाव दिखलाते ही हैं, किन्तु भोजन के रूप में उन-उन द्रव्यों का सेवन कर लेने के बाद जब उनका जठराग्नि से संयोग होता है, तब जिस एक नये रस की उत्पत्ति होती है, उसका रस स्वरूप विपाक के परिणाम से विदित होता है। इस दृष्टि से 'विपाक' की प्रधानता स्वीकार की गयी है। प्रभाव का वर्णन प्रभावस्तु यथा धात्री लकुचस्य रसादिभिः। समापि कुरुते दोषत्रितयस्य विनाशनम् ।। ३४ ।। क्वचित्तु केवलं द्रव्यं कर्म कुर्यात् प्रभावतः। ज्वरं हन्ति शिरोबद्धा सहदेवीजटा यथा ।। ३५ ।। जिस प्रकार रस, गुण, वीर्य, विपाक में बड़हल नामक फल 'आँवला' जैसा ही होता है, किन्तु आँवला त्रिदोषनाशक होता है और उसी के समान कहा गया बड़हल वैसा नहीं होता। यह आँवले का अपना 'प्रभाव' है। कहीं यह भी देखा जाता है, कि केवल द्रव्य अपने प्रभाव से ही कार्य कर डालता है। जैसे 'सहदेवी' की जड़ को सिर पर बाँध देने मात्र से ही वह ज्वर का नाश कर देती है। यह केवल प्रभाव का वर्णन है। वक्तव्य- यह 'प्रभाव' जिसकी चर्चा ऊपर की गयी है, केवल औषधद्रव्यों में ही नहीं पाया जाता, अपितु मणि, मन्त्र आदि को धारण करने से देव, गुरु, माता, पिता के आशीर्वचनों में भी आस्तिक बुद्धि से देखा तथा पाया जाता है। यह 'प्रभाव' प्रयोगशाला में परीक्षा का विषय नहीं है। इसकी विशेष जानकारी के लिए च० सू० अ० 26 श्लोक 67 से 72 तक तथा सु० सू० अ० 40 श्लोक 19 से 21 तक देखें। प्रभाव का लक्षण (रस-वीर्य विपाकानां सामान्यं यत्र लक्ष्यते। विशेषः कर्मणां चैव प्रभावस्तस्य स स्मृतः ।। ३६ ।। मणीनां धारणीयानां कर्म यद् विविधात्मकम्। तत् प्रभावकृतं तेषां प्रभावोऽचिन्त्य उच्यते ।। ३७ ।।) जहाँ दो या उससे अधिक द्रव्यों में रस (गुण), वीर्य, विपाक की समानता देखी जाये, (जैसा ऊपर श्लोक 34 में कहा गया है) किन्तु उनके कर्मों में विशेषता (भिन्नता) हो, वह उस-उस द्रव्य का 'प्रभाव' ही माना जाता है। धारण करने योग्य (हीरा, नीलम, तथा पुखराज आदि) मणियों को धारण करने पर जो विविध प्रकार का शुभ-अशुभ कर्म (फल) देखा जाता है, वह उन मणियों का प्रभाव ही है। अतः प्रभाव को अचिन्त्य (अविज्ञेय) कहा जाता है। वक्तव्य- वीर्य, विपाक एवं प्रभाव का ऊपर जो वर्णन किया गया है, यह शास्त्र की दृष्टि से प्रामाणिक है और

24 | शार्ङ्गधरसंहिता | [पूर्वखण्डे

24 | शार्ङ्गधरसंहिता | [पूर्वखण्डे प्रयोगावस्था में शास्त्रोक्त फल को देता है। यह अन्धविश्वास का क्षेत्र नहीं है। उक्त 36 तथा 37 दोनों पद्य च० सू० अ० 26 के श्लोक संख्या 67 तथा 70 से लिये गये हैं। रस आदि के कर्म क्वचिद् रसो गुणो वीर्यं विपाकः शक्तिरेव च। कर्म स्वं स्वं प्रकुर्वन्ति द्रव्यमाश्रित्य ये स्थिताः॥३८॥ द्रव्य का आश्रय लेकर रहने वाले ऊपर कहे गये रस, गुण, वीर्य, विपाक तथा प्रभाव स्वतन्त्र रूप से कहीं-कहीं अपना-अपना कार्य करते हैं। अर्थात् द्रव्याश्रित रस आदि सामूहिक रूप से कार्य नहीं करते, अपितु वे स्वतन्त्र रूप से ही कार्य करते हैं। वक्तव्य—इसी आशय का एक पद्य च० सू० अ० 26.71 में है, किन्तु उसकी भाषा स्वतन्त्र है। आप निघण्टु ग्रन्थों का अध्ययन करते समय इस विषय पर विशेष ध्यान दें, कि जो-जो द्रव्य रस तथा गुण में समान होते हैं, उन-उन में परस्पर समान वीर्य, विपाक तथा शक्ति (प्रभाव) नहीं देखे जाते। यही स्थिति मणियों के प्रभाव की भी है। ऋतु-भेद से दोषों का चय, कोप, शम चयकोपशमा यस्मिन् दोषाणां सम्भवन्ति हि। ऋतुषट्कं तदाख्यातं रवे राशिषु सङ्क्रमात्॥३९॥ जिसमें प्राकृतिक रूप से वात, पित्त, कफ दोषों का चय (संचय), कोप (प्रकोप) तथा शम (शमन या उपशम) होता है, उसे 'ऋतुषट्क' अर्थात् छः ऋतुओं का समूह कहते हैं। यह एक वर्ष में सूर्य के मेष, वृष आदि बारह राशियों में संक्रमण (गति) करने के कारण होता है। राशियों के क्रम से छः ऋतुएँ ग्रीष्मो मेषवृषौ प्रोक्तो प्रावृङ्मिथुनकर्कयोः। सिंहकन्ये स्मृता वर्षास्तुलावृश्चिकयोः शरत्॥४०॥ धनुर्ग्राहौ च हेमन्तो वसन्तः कुम्भमीनयोः। मेष तथा वृष राशि में जब सूर्य रहता है, तब ग्रीष्म ऋतु होती है। मिथुन तथा कर्क राशि में जब सूर्य रहता है, तब प्रावृट् ऋतु होती है। सिंह एवं कन्या राशि में जब सूर्य रहता है, तब वर्षा ऋतु होती है। तुला और वृश्चिक राशि में जब सूर्य रहता है, तब शरद् ऋतु होती है। धनुः तथा ग्राह (मकर) राशि में जब सूर्य रहता है, तब हेमन्त ऋतु होती है और कुम्भ तथा मीन राशि में जब सूर्य रहता है, तब वसन्त ऋतु होती है। वक्तव्य—ऊपर जिस ऋतु-क्रम का वर्णन किया गया है, वह आयुर्वेदीय दृष्टि से दोष-संशोधन के लिए कहा गया है। इस विषय के विस्तृत विवेचन के लिए आप देखें—च० सू० अ० 6.4-8 तथा सु० सू० अ० 6.6 एवं 10। लोक- व्यवहार की दृष्टि से ऋतुओं का क्रम इस प्रकार है— संशोधनार्थ ऋतुक्रम

क्रममासराशिऋतु
1.वैशाख, ज्येष्ठमेष, वृषग्रीष्म
2.आषाढ़, श्रावणमिथुन, कर्कप्रावृट्
3.भाद्रपद, आश्विनसिंह, कन्यावर्षा
4.कार्तिक, मार्गशीर्षतुला, वृश्चिकशरत्
5.पौष, माघधनुः, मकरहेमन्त
6.फाल्गुन, चैत्रकुम्भ, मीनवसन्त
व्यवहारार्थ ऋतुक्रम
क्रममासराशिऋतु
:---:---:---:---
1.चैत्र, वैशाखमीन, मेषवसन्त
2.ज्येष्ठ, आषाढ़वृष, मिथुनग्रीष्म
3.श्रावण, भाद्रपदकर्क, सिंहवर्षा
4.आश्विन, कार्तिककन्या, तुलाशरत्
5.मार्गशीर्ष, पौषवृश्चिक, धनुहेमन्त
6.माघ, फाल्गुनमकर, कुम्भशिशिर
दोषों का चय, कोप, शम काल
ग्रीष्मे सञ्चीयते वायुः प्रावृट्काले प्रकुप्यति॥४१॥
वर्षासु चीयते पित्तं शरत्काले प्रकुप्यति।
हेमन्ते चीयते श्लेष्मा वसन्ते च प्रकुप्यति॥४२॥
प्रायेण प्रशमं याति च्चयमेव समीरणः।
शरत्काले वसन्ते च पित्तं प्रावृड् ऋतौ कफः॥४३॥
ग्रीष्म ऋतु (वैशाख, ज्येष्ठ) में वायु (वातदोष) का
संचय होता है और प्रावृट् ऋतु (आषाढ़, सावन) में उस
(वातदोष) का प्रकोप होता है, अर्थात् वह रोगकारक होता
है। वर्षा ऋतु (भाद्रपद, आश्विन) में पित्तदोष का संचय होता
है और शरद् ऋतु (कार्तिक, मार्गशीर्ष) में उस पित्तदोष का
प्रकोप होता है। हेमन्त ऋतु (पौष, माघ) में कफदोष का
संचय होता है और वह कफदोष वसन्त ऋतु (फाल्गुन, चैत्र)
में प्रकुपित होता है। प्रायः शरद् ऋतु में किसी प्रकार की
चिकित्सा किये बिना ही वातदोष की शान्ति हो जाती है। इसी
प्रकार वसन्त ऋतु में पित्तदोष और प्रावृड् ऋतु में कफदोष
भी शान्त हो जाते हैं।

द्वितीयोऽध्यायः] भैषज्याख्यान 25 वातादि दोषों की चय, प्रकोप, प्रशम तालिका

दोषवातपित्तकफ
संचयग्रीष्म ऋतु <br> मेष, वृष <br> (वैशाख, ज्येष्ठ) <br> मध्याह्न कालवर्षा ऋतु <br> सिंह, कन्या <br> (भाद्रपद, आश्विन) <br> दिन का चौथा प्रहरहेमन्त ऋतु <br> धनु, मकर <br> (पौष, माघ) <br> उषःकाल
प्रकोपप्रावृड् ऋतु <br> मिथुन, कर्क <br> (आषाढ़, श्रावण) <br> अपराह्न कालशरद् ऋतु <br> तुला, वृश्चिक <br> (कार्तिक, मार्गशीर्ष) <br> अर्धरात्रि कालवसन्त ऋतु <br> कुम्भ, मीन <br> (फाल्गुन, चैत्र) <br> पूर्वाह्न काल
प्रशमशरद् ऋतु <br> तुला, वृश्चिक <br> (कार्तिक, मार्गशीर्ष) <br> अर्धरात्रि कालवसन्त ऋतु <br> कुम्भ, मीन <br> (फाल्गुन, चैत्र) <br> पूर्वाह्न कालप्रावृड् ऋतु <br> मिथुन, कर्क <br> (आषाढ़, श्रावण) <br> अपराह्न काल
वक्तव्य-यह भारतवर्ष का ही सौभाग्य है कि यहाँ बारह
महीने, छः ऋतुएँ और दो अयन (उत्तरायण और दक्षिणायन)
होते हैं। यह व्यवस्था अन्यत्र नहीं है। इन परिवर्तनशील ऋतुओं
तथा काल का प्रभाव प्राणिमात्र पर पड़ता है। कालप्रभाव के
लिए देखें-सु० सू० अ० 6.14। इन्हीं ऋतुओं में वातादि दोषों
का संचय, प्रकोप तथा प्रशम होता है, जैसा कि ऊपर वर्णन
किया गया है। चिकित्सा की दृष्टि से इस प्रकार होने वाले
दोषों के संचय, प्रकोप आदि का ज्ञान परम आवश्यक होता
है। इसे जानने वाला व्यक्ति अपने स्वास्थ्य की सुरक्षा भी कर
सकता है। विशेष विवेचन के लिए देखें-सु० सू० अ० 6।
यमदंष्ट्रा काल-परिचय
कार्तिकस्य दिनान्यष्टावष्टावाग्रयणस्य च।
यमदंष्ट्रा समाख्याता स्वल्पभुक्तो हि जीवति।।44।।
कार्तिक मास के अन्तिम आठ दिन तथा अगहन
(मार्गशीर्ष) मास में प्रारम्भ के आठ दिन, (कुल मिलाकर ये
सोलह दिन), यमदंष्ट्रा (यमराज की दाढ़) कहे जाते हैं। इन
दिनों कम खाने वाला ही जीवित (सुखपूर्वक) रह सकता है।
चय आदि पर आहार-विहार का प्रभाव
चयकोपशमा दोषा विहाराऽऽहारसेवनैः।
समानैर्यान्त्यकालेऽपि विपरीतैर्विपर्ययम् ।। 45 ।।
ऊपर वात आदि दोषों के संचय, कोप, प्रशम के
स्वाभाविक कालों (ऋतुओं) का वर्णन किया गया है, किन्तु
उपर्युक्त कालों के विपरीत काल में भी समान गुण वाले
(वात, पित्त, एवं कफकारक) आहारों तथा विहारों (रहन-
सहन) का सेवन करने से भी उक्त दोषों का संचय तथा
प्रकोप हो जाता है और इन दोषों के विपरीत गुण वाले आहार-
विहारों का सेवन करने से उन दोषों का शमन हो जाता है।
वक्तव्य-उक्त श्लोक प्रायः सभी संस्करणों में इसी प्रकार
का देखा जाता है। हमारे विचार से इसका प्रथम पाद इस
प्रकार होना चाहिये-'चयकोपौ समा दोषाः'। ऐसा पाठ
स्वीकार कर लेने पर इसका अन्वय इस प्रकार होगा-'समाः
दोषाः समानैः विहाराहारसेवनैः अकाले अपि चयकोपौ यान्ति'।
क्या इतना सुस्पष्ट भाव उक्त पाठ से प्राप्त हो सकता है? कभी
नहीं। 'विपरीतैर्विपर्ययम्' इस पद्यांश में पठित 'विपर्यय'
शब्द 'चय-कोप' के विपरीत 'शम' शब्द की अभिव्यक्ति
कराने में स्वयं समर्थ है। इस प्रसंग को विस्तृत रूप से
समझने के लिए आप च० सू० अ० 1.43, च० वि० अ०
1.7 तथा च० शा० अ० 6.10 का अवलोकन करें। आपको
स्वयं प्रसंगोचित तथ्यों की प्रतीति होने लगेगी।
यदि हम समान गुण वाले आहार-विहार का सेवन करने
से यह चाहें कि उस दोष का शम (शमन या शान्ति) हो जाये
तो क्या यह कभी सम्भव हो सकता है? जैसे-रूक्षताकारक
आहार-विहारों से वायु की वृद्धि तो होती है, क्या कोई
विचारशील पुरुष यह भी स्वीकार कर सकता है कि ऐसे
आहार-विहारों से वातदोष का शमन भी हो सकता है? फिर
'शम' शब्द का यहाँ क्या तात्पर्य है? आप ध्यान दें! वातदोष
का संचय-काल ग्रीष्म ऋतु तथा इसका प्रकोप-काल प्रावृड्
ऋतु है। इन दिनों यदि आप रोगी को वातनाशक आहार-विहारों
का सेवन करायेंगे, तो वातदोष का संचय तथा प्रकोप नहीं हो
पायेगा। इसी प्रकार अन्य दोषों के सम्बन्ध में भी समझ लेना
चाहिये।
वातदोष का प्रकोप तथा प्रशम
लघुरूक्षमिताहारादतिशीताच्छ्रमात् तथा।
प्रदोषे कामशोकाभ्यां भीचिन्तारात्रिजागरैः ।। 46 ।।
अभिघातादपां गाहाज्जीर्णेऽन्ने धातुसङ्क्षयात्।
वायुः प्रकोपं यात्येभिः प्रत्यनीकैश्च शाम्यति ।। 47 ।।
लघु (भार में हल्के या शीघ्र पचने वाले) तथा रूक्ष
(स्नेहरहित) आहार द्रव्यों का सेवन करने से, मिताहार (थोड़ा
अर्थात् मात्रा से कम भोजन) करने से, अत्यन्त शीतल पदार्थों
का सेवन करने से, शक्ति से अधिक परिश्रम करने से,
कामवासना की पूर्ति न होने से, शोक से, भय से, चिन्ता से,

26 शार्ङ्गधरसंहिता [पूर्वखण्डे रात्रि में जागते रहने (समुचित नींद के न आने) से, चोट लगने से, शीतल जल में देर तक डुबकी लगाये रहने या स्नान करने से, रस आदि धातुओं का क्षय हो जाने से, भोजन के पच जाने पर, इन कारणों से प्रदोष (सायंकाल) में वातदोष का प्रकोप होता है और इनके विपरीत आहार-विहारों का सेवन करने से वातदोष का शमन हो जाता है। पित्तदोष का प्रकोप तथा प्रशम विदाहिकटुकाम्लोष्णभोज्यैरत्युष्णसेवनात् । मध्याह्ने क्षुत्तृषो रोधाज्जीर्यत्यत्रेऽर्धरात्रके ।। ४८ ।। पित्तं प्रकोपं यात्येभिः प्रत्यनीकैश्च शाम्यति। दाहकारक, कटु (चरपरे, मिर्च आदि), खट्टे तथा उष्ण भोज्य पदार्थों का सेवन करने से अत्यन्त उष्ण (गर्मी, धूप, तथा पञ्चाग्नि आदि) का सेवन करने से, भूख तथा प्यास को रोकने से मध्याह्न काल (दोपहर) में, भोजन के पचते समय एवं आधी रात में, इन कारणों से तथा उक्त कालों में पित्तदोष प्रकुपित होता है और इनके विपरीत आहार-विहारों का सेवन करने से शान्त हो जाता है। कफदोष का प्रकोप तथा प्रशम मधुरस्निग्धशीतादिभोज्यैर्दिवसनिद्रया ।। ४९ ।। मन्देऽग्नौ च प्रभाते च भुक्तमात्रे तथाऽश्रमात्। श्लेष्मा प्रकोपं यात्येभिः प्रत्यनीकैश्च शाम्यति।। ५० ।। इति श्रीदामोदरसूनुना शार्ङ्गधरेण विरचितायां शार्ङ्गधरसंहितायां पूर्वखण्डे भेषजव्याख्यानकं नाम द्वितीयोऽध्यायः ।। २ ।। मीठे, चिकने, तथा शीतल, आदि (गुरु, पिच्छिल, गुण वाले) आहार द्रव्यों का सेवन करने से, दिन में सोने से, जठराग्नि के मन्द पड़ जाने से, प्रातःकाल, भोजन कर लेने के तत्काल बाद तथा परिश्रम न करने से कफदोष प्रकुपित हो जाता है और इनके विपरीत आहार-विहारों का सेवन करने से उसकी शान्ति हो जाती है। इस प्रकार वैद्यरत्न पण्डित तारादत्त त्रिपाठी के पुत्र डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी विरचित दीपिका व्याख्या, विशेष वक्तव्यादि से संवलित शार्ङ्गधरसंहिता पूर्वखण्ड का दूसरा अध्याय समाप्त ।। २ ।। ⁓⁓⁓⁓⁓⁓ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

नाड़ी-परीक्षा का स्थान

तृतीयोऽध्यायः नाडीपरीक्षादिविधिः नाड़ी-परीक्षा का स्थान करस्याङ्गुष्ठमूले या धमनी जीवसाक्षिणी। तच्चेष्टया सुखं दुःखं ज्ञेयं कायस्य पण्डितैः ॥ 1 ॥ हाथ के अँगूठे के मूल में जो धमनी (स्पर्श द्वारा देखी जाती) है, वह जीव (जीवात्मा) की साक्षिणी (गवाही देने वाली) है, अर्थात् इसके माध्यम से जीव की सत्ता का ज्ञान किया जा सकता है। इसकी चेष्टा (गति-विशेष) से नाड़ी- विशेषज्ञ शरीर के सुख तथा दुःख का ज्ञान कर सकता है। वक्तव्य-आयुर्वेदीय चिकित्सा में नाड़ी-परीक्षा का बहुत बड़ा महत्त्व है, जिसे चिरकाल से विद्वत्समाज स्वीकार करता चला आ रहा है। चरक, सुश्रुत आदि प्राचीन संहिताओं में नाड़ी-परीक्षा का कोई स्वतन्त्र प्रकरण उपलब्ध नहीं होता है। किन्तु दूतनाड़ी-विशेषज्ञ 108 श्री सत्यदेव वासिष्ठ (भिवानी- निवासी) उक्त संहिताओं में नाड़ीज्ञान समर्थक सूत्रों की सत्ता को स्वीकार करते हैं। करस्याङ्गुष्ठमूले-हाथ दो होते हैं। आचार्य ने किस हाथ के अँगूठे के मूल वाली धमनी की ओर संकेत किया है, इसका यहाँ कोई स्पष्ट निर्देश नहीं किया है। अतः इस प्रश्न का समाधान इस प्रकार किया जा रहा है-पुरुषों के दाहिने हाथ की और स्त्रियों के बाँयें हाथ की धमनी देखनी चाहिये। इस प्रकार के उल्लेख प्राचीन ग्रन्थों में भी पाये जाते हैं। नाड़ी सम्बन्धी विशेष परिचय के लिए देखें-1. नाड़ीविज्ञान- महर्षिकणाद प्रणीत, 2. नाड़ीपरीक्षा-रावणकृत, 3. नाड़ी- परीक्षा-अग्निवेश लिखित तथा 4. नाड़ीतत्त्वदर्शन-श्रीसत्यदेव वासिष्ठ रचित। नाड़ी की उपयोगिता-नाड़ीज्ञान गुरु-परम्परा के उपदेशों तथा अभ्यास से प्राप्त किया जा सकता है। इसके प्राप्त हो जाने पर वह चिकित्सक अत्यन्त यशस्वी कहा एवं माना जाता है, क्योंकि नाड़ी द्वारा वात, पित्त, कफ, द्वन्द्व, सन्निपात, रस, रक्त आदि का तथा साध्य-असाध्य का ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है। निदान का यही एक आयुर्वेदीय अनुपम साधन है, जिससे मूक तथा बेहोश आदमी की वास्तविक शारीरिक स्थिति को भी समझा जा सकता है। धमनी द्वारा दोषों का ज्ञान-हृदय धमनियों द्वारा सम्पूर्ण शरीर में रक्त को सदैव प्रवाहित करता रहता है। इन धमनियों का फैलाव सम्पूर्ण शरीरावयवों में रहता है; केवल मांसपेशियों से ढँकी हुई धमनियों का स्पर्शज्ञान स्पष्ट रूप से नहीं होता। नाड़ी के अतिरिक्त ग्रीवा के दोनों ओर तथा गुल्फ के समीप भी नाड़ी का स्पर्श करके वही ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है, जो अँगूठे के मूल में रहने वाली धमनी के स्पर्श से करने के लिए कहा गया है। जीवित पुरुष में ही इस नाड़ी की धमन- क्रिया को देखा जा सकता है, क्योंकि इसका एक विशेषण है-'जीवसाक्षिणी' और यही सुख (स्वस्थता) तथा दुःख (रुग्णता) की सूचना अपनी विशेष गति द्वारा 'नाड़ी-विशेषज्ञ' को प्रदान करती है। वातदोष में नाड़ी की गतियाँ नाडी धत्ते मरुत्कोपे जलौका-सर्पयोगतिम्। वातदोष के प्रकुपित होने पर नाड़ी जलौका (जोंक) तथा साँप की भाँति चलती है, अर्थात् इन गति-विशेषों पर चिकित्सक को निरन्तर ध्यान देना चाहिये, क्योंकि इन प्राणियों की गतियाँ अनेक प्रकार की देखी जाती हैं। पित्तदोष में नाड़ी की गतियाँ कुलिङ्ग-काक-मण्डूकगतिं पित्तस्य कोपतः ॥ 2 ॥ पित्तदोष का प्रकोप होने पर नाड़ी की गति कलिंग (गृहचटक, गौरैया), कौआ तथा मण्डूक (मेंढक) के समान होती है। ये सभी प्राणी फुदक-फुदक कर चलते हैं।

28 शार्ङ्गधरसंहिता [ पूर्वखण्डे


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### [बायाँ स्तम्भ]

**कफदोष में नाड़ी की गतियाँ**
हंस-पारावतगतिं धत्ते श्लेष्मप्रकोपतः ।
कफदोष का प्रकोप होने पर नाड़ी की गति हंस तथा पारावत (परेवा, कबूतर) के समान होती है। ये पक्षी स्वभावतः मन्दगामी होते हैं।

**सन्निपात में नाड़ी की गतियाँ**
लाव-तित्तिर-वर्त्तीनां गमनं सन्निपाततः ॥ ३ ॥
सन्निपात (तीनों दोषों का मिश्रण) होने पर नाड़ी कभी लाव (लवा नामक) पक्षी की भाँति तिरछी गति वाली, कभी तित्तिर (तीतर) की भाँति शीघ्र गति वाली और कभी वर्ती (बत्तख) के समान धीर गति वाली देखी जाती है।
**वक्तव्य-** आप इनकी गतियों पर ध्यान देंगे, तो आपको वात, पित्त तथा कफ दोषों के लक्षण स्वतन्त्र क्रम से देखने को मिलेंगे।

**द्विदोषज तथा असाध्य नाड़ी की गतियाँ**
कदाचिन्मन्दगमना कदाचिद् वेगवाहिनी।
द्विदोषकोपतो ज्ञेया, हन्ति च स्थानविच्युता ॥ ४ ॥
द्विदोष (दो-दो दोषों) के प्रकोप से प्रभावित नाड़ी कभी धीरे और कभी वेग से चलने (फड़कने) लगती है। जब कभी वह अपने स्थान से विच्युत हो जाती है, अर्थात् उसका स्पन्दन प्रतीत नहीं होता है, तो वह रोगी को मार डालती है। इसका तात्पर्य है कि वह रोगी के असाध्य होने की सूचना दे रही है।
**वक्तव्य-** 'स्थानविच्युता' अर्थात् अपने स्थान से हट जाना। यह लक्षण दस्तों के अधिक हो जाने पर या विसूचिका (हैजा) आदि रोगों में भी देखा जाता है। ऐसे रोगियों की यदि तत्काल चिकित्सा कर ली जाती है तो नाड़ी पुनः अपने स्थान पर आ जाती है, नहीं तो असाध्य तो वह हो ही गया है।

**प्राणनाशिनी नाड़ी**
स्थित्वा स्थित्वा चलति या सा स्मृता प्राणनाशिनी ।
अतिक्षीणा च शीता च जीवितं हन्त्यसंशयम् ॥ ५ ॥
जो धमनी रुक-रुककर अर्थात् दो-दो, तीन-तीन, सेकेण्ड तक रुक कर चलती है, वह मारने वाली होती है और अत्यन्त क्षीण (जो स्पर्श करने पर बहुत ही धीमी ज्ञात होती है) तथा शीत स्पर्श वाली धमनी भी जीवन को अवश्य नष्ट कर देती है। (इन सभी अवस्थाओं में उचित चिकित्सा करने पर कभी-कभी रोगी बच भी जाया करते हैं।)

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### [दायाँ स्तम्भ]

**वक्तव्य-** अर्श या बवासीर, आमवात तथा वातज प्रमेह आदि रोगों के लक्षणों में 'हद्ग्रह' नामक लक्षण कहा है। इसलिये उक्त रोगों के रोगियों की नाड़ी ठहर-ठहर कर चला करती है, परन्तु यह प्राणनाशिनी नहीं होती। जिन रोगों में 'हृदयस्तम्भ' नामक लक्षण कहा है, उन रोगों में हृदय-स्तम्भ या हार्टफेल से मृत्यु हो जाती है और जिनमें 'हृद्द्रव' नामक लक्षण कहा है, उन रोगों में नाड़ी की गति-संख्या बढ़ जाती है।

**ज्वर आदि में नाड़ी की गति**
ज्वरकोपे तु धमनी सोष्णा वेगवती भवेत्।
कामक्रोधाद् वेगवहा क्षीणा चिन्ताभयप्लुता ॥ ६ ॥
ज्वर का प्रकोप होने पर धमनी कुछ उष्ण तथा शीघ्रगामिनी हो जाती है। काम (मैथुन की इच्छा) से तथा क्रोध से वह जल्दी-जल्दी चलती है और चिन्ता तथा भय से क्षीण (पतली या हीनवेग) हो जाती है।

**मन्दाग्नि आदि में नाड़ी की गति**
मन्दाग्नेः क्षीणधातोश्च नाडी मन्दतरा भवेत् ।
असृक्पूर्णा भवेत् कोष्णा गुर्वी सामा गरीयसी ॥ ७ ॥
मन्दाग्नि (जिसकी पाचनशक्ति घट गयी है) तथा क्षीणधातु (जिसके धातु घट गये हैं) मनुष्य की धमनी अत्यन्त मन्द (वेगहीन) हो जाती है, रक्तविकार से कुछ उष्ण एवं भारी होती है और आमदोष (गठिया, आमवात, ऊरुस्तम्भ आदि रोगों) से धमनी अत्यन्त भारी प्रतीत होती है।
**वक्तव्य-** 'आहारस्य रसः शेषो यो न पक्वोऽग्निलाघवात्।
स मूलं सर्वरोगाणाम् 'आम' इत्यभिधीयते' ।। अर्थात् जो आहार रस अग्नि की दुर्बलता के कारण नहीं पका या पच सका वही सब रोगों का कारण होता है और उसे 'आम' कहते हैं।

**स्वस्थ आदि पुरुषों की नाड़ी**
लघ्वी वहति दीप्ताग्नेस्तथा वेगवती मता।
सुखितस्य स्थिरा ज्ञेया तथा बलवती स्मृता ॥ ८ ॥
चपला क्षुधितस्य स्यात् तृप्तस्य वहति स्थिरा।
दीप्ताग्नि (जिसकी पाचनशक्ति अत्यन्त बढ़ जाती है) जैसे भस्मक रोग में मनुष्य की धमनी हल्की एवं शीघ्र-शीघ्र चलती है। सुखी या नीरोग मनुष्य की धमनी स्थिर या उचित गतियुक्त एवं बलवान् होती है तथा भूखे मनुष्य की चञ्चल और तृप्त (भोजन किये हुये) मनुष्य की धमनी धीरतायुक्त होती है।
**वक्तव्य-** मनुष्य की विभिन्न अवस्थाओं में धमनी की

तृतीयोऽध्यायः ] नाडीपरीक्षादिविधिः 29 गति या धमन भी भिन्न-भिन्न होता है, जैसा कि उपर्युक्त श्लोकों द्वारा कहा गया है। वस्तुतः धमनी का धड़कना हृदय की धड़कन का सूचक है अर्थात् जितनी बार हृदय रक्त को शरीर की ओर प्रेरित करता है, उतनी ही बार धमनी उभरती हुई मालूम होती है। स्वस्थ एवं आराम से बैठे हुये मनुष्य की धमनी प्रति मिनट (एक मिनट में) निम्न प्रकार फड़कती है। जन्म से 5 मास तक प्रति मिनट 115 से 140 बार फड़कती है।

आयु एक मिनट में

6 मास से 1 वर्ष 115 से 105 बार 2 वर्ष से 6 वर्ष 105 से 90 बार 7 वर्ष से 10 वर्ष 90 से 80 बार 11 वर्ष से 14 वर्ष 80 से 75 बार 15 वर्ष से 60-70 वर्ष प्रायः 75 से 70 बार 70 वर्ष के पश्चात् 85 से 80 बार

आप किसी की धमनी के मन्द, स्थिर अथवा वेगवती होने का निर्धारण इन आँकड़ों को मन में रखकर ही कर सकेंगे। अतः इन्हें स्मरण रखना चाहिये और घड़ी देखते हुये सावधान होकर धमनी की गतियों को गिन लेना चाहिये। अधिकांश चिकित्सक नाड़ी देखकर रोग को पूर्णरूप से जान लेने का प्रयत्न करते हैं और रोगी भी चाहते हैं, कि वैद्य केवल नाड़ी देखकर सर्वथा रोग को जान लें और उनका खाया-पिया भी बतला दें; यह कहाँ तक सम्भव है? इस बात को बुद्धिमान् चिकित्सक तथा रोगी स्वयं समझ सकते हैं। महर्षियों ने रोग-विनिश्चय के लिए अपनी सम्मति इस प्रकार दी है- 'विदितवेदितव्यास्तु, भिषजः सर्वं सर्वथा यथासम्भवं परीक्ष्यं परीक्ष्य अध्यवस्यन्तो, न क्वचिदपि विप्रतिपद्यन्ते यथेष्टमर्थमभिनिर्वर्त्तयन्ति चेति'। अर्थात् विद्वान् वैद्य सम्पूर्ण रोग को यथाशक्ति भली-भाँति निश्चित करते हुये कहीं भी धोखा नहीं खाते और सफलता प्राप्त कर लेते हैं (च० चि० अ० 7)। 'प्रत्यक्षतस्तु खलु रोगतत्त्वं बुभुत्सुः सर्वैरिन्द्रियैः सर्वान् इन्द्रियार्थान् आतुरशरीरगतान् परीक्षेतऽन्यत्र रसज्ञानात्'। (च० चि० अ० 4)। 'तस्योपलब्धिर्निदानपूर्वरूपलिङ्गोपश- यसम्प्रातितः।' (च० नि० अ० 1) अर्थात् रोग को निदान, पूर्वरूप, लक्षण, उपशय एवं सम्प्राप्ति से जानना चाहिये। यही बात सु० सू० अ० 10 में तथा वाग्भट सू० अ० 1 में भी कही गयी है। वस्तुतः कुशल चिकित्सक का कर्तव्य है कि वह पाँचों ज्ञानेन्द्रियों तथा विविध प्रकार के तत्सम्बन्धित प्रश्नों द्वारा रोग का निश्चय करे। नेत्र-परीक्षा (नेत्रं स्यात् पवनादूक्षं धूम्रवर्णं तथाऽरुणम् ।। 9 ।। कोणं गतं प्रविष्टं च तथा स्तब्धविलोकनम्। हरिद्राखण्डवर्णं वा रक्तं वा हरितं तथा ।। 10 ।। दीपद्वेषि सदाहं च नेत्रं स्यात् पित्तकोषतः । चक्षुर्वलासबाहुल्यात् स्निग्धं स्यात् सलिलप्लुतम् ।। 11 ।। तथा धवलवर्णं च ज्योतिर्हीनं मलान्वितम्। नेत्रं द्विदोषबाहुल्यात् स्याद् दोषद्वयलक्षणम् ।। 12 ।। त्रिदोषदूषितं नेत्रमन्तर्मग्नं भृशं भवेत् । त्रिलिङ्गं सलिलस्रावि प्रान्तेनोन्मीलयत्यपि ।। 13 ।। इति नेत्रं परीक्षेत शेषं रोगानुरूपतः ।) नाड़ी के समान नेत्र की भी परीक्षा करे। वायु की वृद्धि से नेत्र रूक्ष, धूमिल तथा अरुण (कालापन लिये लाल) होता है, कोने में गया हुआ तथा धँसा हुआ और स्तब्ध प्रतीत होता है। पित्त के कोप से नेत्र हल्दी के वर्ण वाला, लाल अथवा हरा दीप तथा प्रकाश का द्वेषी और दाहयुक्त होता है। कफ की अधिकता से नेत्र चिकना, जल से भीगा हुआ श्वेत, ज्योति से हीन तथा मैला होता है। दो दोषों की अधिकता से दो दोषों के लक्षणों से युक्त होता है और तीनों दोषों से दूषित नेत्र अत्यन्त धँसा हुआ एवं तीनों दोषों के लक्षणों से युक्त होता है और नेत्रों से पानी जाता है तथा नेत्र खुले ही रहते हैं। यह दोषानुसार नेत्र-परीक्षा कही गयी है। शेष भिन्न-भिन्न रोगों के लक्षणों पर ध्यान देना उचित है। जिह्वा-परीक्षा (शाकपत्रप्रभा रूक्षा स्फुटिता रसनाऽनिलात् ।। 14 ।। रक्ता श्यावा भवेत् पित्ताल्लिप्ताऽऽर्द्रा धवला कफात् । सैव दोषद्वयाधिक्ये दोषद्वितय लक्षणा ।। 15 ।। परिदग्धा खरस्पर्शा कृष्णा दोषत्रयाधिकैः ।) वायु के कोप से जीभ सागवान के पत्ते के समान खुरदरी या सूखी एवं फटी हुई होती है। पित्त के कोप से लाल एवं कुछ काली और कफ के कोप से चिपचिपाहट से युक्त, गीली एवं सफेद होती है। दो-दो दोषों के कोप से दो-दो दोषों के उपर्युक्त लक्षणों से युक्त और तीनों दोषों के कोप से चारों ओर से जली हुई-सी, खुरदरी तथा काली होती है। मूत्र-परीक्षा (वातेन पाण्डुरं मूत्रं पीतं नीलं च पित्ततः ।। 16 ।। रक्तमेवं भवेद् रक्ताद् बहलं फेनिलं कफाद् ।)

30 शार्ङ्गधरसंहिता [पूर्वखण्डे [बायाँ स्तम्भ] वायु की अधिकता से मूत्र कुछ पीला, पित्त की अधिकता से अत्यन्त पीला एवं नीला रक्त की अधिकता से लाल एवं कफ की अधिकता से श्वेत और झाग से युक्त होता है। वक्तव्य— रोगी के शरीर पर वायु आदि दोषों का प्रभाव पड़ने से भिन्न-भिन्न प्रकार के परिवर्तन होते हैं। अतः चिकित्सक का कर्तव्य है कि वह उन परिवर्तनों पर विशेष रूप से ध्यान दे। रोग का निदान करते समय वह रोगी के आँख, जीभ, तथा मल-मूत्र आदि को ध्यानपूर्वक देखकर दोषों के बलाबल का निश्चय करे। दूत-परीक्षा दूताः स्वजातयोऽव्यङ्गाः पटवो निर्मलाम्बराः ।। 17 ।। सुखिनोऽश्ववृषारूढाः शुभ्रपुष्पफलैर्युताः । सुजातयः सुचेष्टाश्च सजीवदिशि संश्रिताः ।। 18 ।। भिषजं समये प्राप्ता रोगिणः सुखहेतवे । (यस्यां प्राणमरुद्वाति सा नाडी जीवसंयुता ।। 19 ।।) जो दूत (रोगी का समाचार लेकर अथवा वैद्य को बुलाने के लिए जो मनुष्य वैद्य के पास जाता है वह 'दूत' कहा जाता है) रोगी के स्वजाति के हों, अंगहीन (काने, लंगड़े आदि) न हों, चतुर हों, निर्मल वस्त्र धारण किये हों, घोड़े अथवा बैल (भारतवर्ष में बैल पर सवारी नहीं की जाती, किन्तु भूटान और तिब्बत आदि देशों में की जाती है) पर चढ़कर आये हों स्वयं सुखी या स्वस्थ हों, वैद्यजी को अर्पण करने के लिए श्वेत पुष्प अथवा फल साथ लिये हों, अच्छी जाति (रोगी की अपेक्षा) के हों, अच्छी चेष्टा (व्यवहार) वाले हों, सजीव दिशा में (सजीव दिशा वह होती है, जिस दिशा या ओर का नासा-स्वर चल रहा हो) आकर बैठे हों और उचित समय (जब वैद्य जी दूसरे कार्य में न लगे हों) पर वैद्य जी के पास आये हों, वे रोगी के लिए सुखदायक होते हैं। वक्तव्य— नासिका द्वारा जो श्वास वायु आता-जाता है वह एक नासापुट से खुलासा और दूसरे से रुककर आता-जाता है, एक समय दाएँ से खुलासा और बाएँ से रुककर, दूसरे समय बाएँ से खुलासा और दाएँ से रुककर आता है; इसे ध्यानपूर्वक देखें। दूत से सम्बन्धित अन्य बातें सु० सू० अ० 29 में तथा च० इ० अ० 12 में देखें। दूत के शकुन वैद्याह्वानाय दूतस्य गच्छतो रोगिणः कृते। न शुभं सौम्यशकुनं प्रदीप्तं च सुखावहम् ।। 20 ।। [दायाँ स्तम्भ] वैद्य जी को बुलाने के लिए जाते हुये दूत को मार्ग में यदि अच्छे सगुन दिखलायी दें तो वे रोगी के लिए अशुभ होते हैं और बुरे सगुन हों तो रोगी के लिए अच्छे होते हैं। वैद्य के शकुन चिकित्सां रोगिणः कर्तुं गच्छतो भिषजः शुभम्। यात्रेयं सौम्यशकुनं प्रोक्तं दीप्तं न शोभनम् ।। 21 ।। रोगी को चिकित्सा करने के लिए जाते हुये वैद्य को मार्ग में यदि शुभ शकुन प्रतीत हों तो (रोगी के लिए और वैद्य जी के लिए भी) अच्छे होते हैं और अशुभ हों तो बुरे होते हैं। चिकित्सा-योग्य रोगी के लक्षण निजप्रकृतिवर्णाभ्यां युक्तः सत्त्वेन संयुतः। चिकित्स्यो भिषजा रोगी वैद्यभक्तो जितेन्द्रियः ।। 22 ।। जो रोगी अपने स्वभाव एवं वर्ण से युक्त हो, सत्त्व (शारीरिक एवं मानसिक बल) से युक्त हो, वैद्य जी का भक्त (आज्ञाकारी और श्रद्धालु) और जितेन्द्रिय (पथ्य रखने वाला) हो, उसकी चिकित्सा करनी चाहिये। वक्तव्य— उक्त श्लोक द्वारा रोगी की साध्यता का वर्णन किया गया है। इसके विपरीत रोगी को असाध्य समझना चाहिये। विशेष जानकारी के लिए-सु० सू० अ० 24, 30, 31, 32 और चरक-इन्द्रियस्थान देखें। वैद्य का लक्षण (तत्त्वाधिगतशास्त्रार्थो दृष्टकर्मा स्वयं कृती। लघुहस्तः शुचिः शूरः सज्जोपस्करभेषजः ।। 23 ।। प्रत्युत्पन्नमतिर्धीमान् व्यवसायी प्रियंवदः। सत्यधर्मपरो यश्च वैद्य ईदृक् प्रशस्यते ।। 24 ।।) जो शास्त्र के अर्थ एवं तात्पर्य को समझता हो, जिसने औषध निर्माण आदि देखा हो, जो स्वयं कार्य करता हो, शीघ्रकारी, पवित्र एवं उत्साही हो, जिसके पास औषधियाँ तैयार हों, जिसको समय पर कार्यप्रणाली सूझ जाये, बुद्धिमान्, लगन वाला, प्रियवादी, सत्यवादी तथा जो धर्मात्मा हो वह वैद्य प्रशंसा के योग्य होता है। परिचारक का लक्षण (स्निग्धोऽजुगुप्सुर्बलवान् युक्तो व्याधितरक्षणे। वैद्यवाक्यकृदश्रान्तो युज्यते परिचारकः ।। 25 ।।) जो रोगी का स्नेही या प्रेमी हो, निन्दक न हो, बलवान् हो, रोगी की सेवा में तत्पर हो, वैद्य के कथनानुसार कार्य करे और थके नहीं, ऐसा 'परिचारक' योग्य होता है।

तृतीयोऽध्यायः ] नाडीपरीक्षादिविधिः 31 भेषज का लक्षण (प्रशस्तदेशे सञ्जातं प्रशस्तेऽहनि चोद्धृतम्। अल्पमात्रं बहुगुणं गन्धवर्णरसान्वितम् ॥ 26 ॥ दोषघ्नमग्लानिकरमधिकं न विकारि यत्। समीक्ष्य काले दत्तं च भेषजं स्याद् गुणावहम् ॥ 27 ॥) उत्तम स्थान में उत्पन्न हुआ हो, उत्तम दिन में उखाड़ा गया हो, मात्रा थोड़ी और गुण बहुत हों, उचित गन्ध, वर्ण तथा रस से युक्त हो, दोषनाशक हो, ग्लानि न करे, अधिक खा लेने पर भी विकारकारी न हो और उचित समय पर दिया गया हो-ऐसी औषधि (दवा) गुणदायक होती है। चिकित्सा के चार पाद (भिषग् द्रव्याण्युपस्थाता रोगी पादचतुष्टयम्। गुणवत्कारणं ज्ञेयं विकारव्युपशान्तये ॥ 28 ॥) भिषक् अर्थात् चिकित्सक, द्रव्य अर्थात् भेषज या औषधियाँ, उपस्थाता अर्थात् परिचारक तथा रोगी-ये चारों चिकित्सा के पाद कहे जाते हैं। यदि ये अपने-अपने उचित गुणों से युक्त हों तो विकार की शान्ति में कारण होते हैं। विविध प्रकार के दुःस्वप्न स्वप्नेषु नग्नान् मुण्डांश्च रक्तकृष्णाम्बरावृतान्। व्यङ्गांश्च विकृतान् कृष्णान्सपाशान्सायुधानपि ॥ 29 ॥ बध्नतो निघ्नतश्चापि दक्षिणां दिशमाश्रितान्। महिषोष्ट्रखरारूढान् स्त्रीपुंसो यस्तु पश्यति ॥ 30 ॥ स स्वस्थो लभते व्याधिं रोगी यात्येव पञ्चताम्। अधो यो निपत्तत्युच्चाज्जलेऽग्नौ वा विलीयते ॥ 31 ॥ श्वापदैर्हन्यते योऽपि मत्स्याद्यैर्गिलितो भवेत्। यस्य नेत्रे विलीयेते दीपो निर्वाणतां व्रजेत् ॥ 32 ॥ तैलं सुरां पिबेद् वापि लोहं वा लभते तिलान्। पक्वान्नं लभतेऽश्नाति विशेत् कूपं रसातलम् ॥ 33 ॥ स स्वस्थो लभते रोगं रोगी यात्येव पञ्चताम्। जो मनुष्य स्वप्न में नंगे, मूँड़े हुये, लाल तथा काले कपड़ों वाले, अंगहीन, विकृत (कोढ़ी आदि), काले, हथकड़ी या जाल लिये हुये, शस्त्रधारी, किसी को बाँधते हुये या मारते हुये दक्षिण दिशा की ओर खड़े हुये भैंसे, ऊँट एवं गधे पर चढ़े हुये स्त्री-पुरुषों को देखता है, वह स्वस्थ हो तो रोग को प्राप्त होता है और यदि रोगी है तो मृत्यु को प्राप्त होता है। जो मनुष्य स्वप्न में ऊँचे स्थान से गिरता है, जल अथवा आग में विलीन हो जाता है, श्वापद (कुत्ते के समान पाँच पाँव वाले सिंह, चीता आदि) जन्तुओं द्वारा मारा या घायल किया जाता है, मत्स्य (मगर, घड़ियाल) एवं अजगर आदि द्वारा निगला जाता है, जिसकी आँखें नष्ट हो जाती हैं, जलाया हुआ दीपक बुझ जाता है, तैल अथवा शराब पीता है, लोहा अथवा तिलों को प्राप्त करता है, पक्वान्न (पूरी, कचौड़ी आदि) खाता है और कुएँ अथवा पृथ्वी के भीतर (दरार आदि में) प्रवेश करता है; वह यदि स्वस्थ है तो रोग को प्राप्त हो जाता है और रोगी है तो मर जाता है। दुःस्वप्नों के प्रायश्चित्त दुःस्वप्नानेवमादींश्च दृष्ट्वा ब्रूयान्न कस्यचित् ॥ 34 ॥ स्नानं कुर्यादुषस्येव दद्याद्धेमतिलानथ। पठेत् स्तोत्राणि देवानां रात्रौ देवालये वसेत् ॥ 35 ॥ कृत्वैवं त्रिदिनं मर्त्यो दुःस्वप्नात् परिमुच्यते। उपर्युक्त बुरे स्वप्नों को देखकर किसी से न कहे (किन्तु वैद्य जी तथा आचार्य के पास तो कहना ही पड़ेगा और कहना भी चाहिये) और प्रातःकाल स्नान (यदि किसी ज्वर आदि रोग से पीड़ित न हो तो उस दशा में मानसिक स्नान कर लेना चाहिये) तथा सोना अथवा तिलों का दान करे। देवताओं के स्तोत्र (विष्णुसहस्रनाम आदि) पढ़े (अनपढ़ मनुष्य केवल ईश्वर का स्मरण ही करे) और रात्रि को देव-मन्दिर में निवास करे। इस प्रकार तीन दिन पर्यन्त करने से दुःस्वप्नों के दोषों से मुक्त हो जाता है। शुभ स्वप्न स्वप्नेषु यः सुरान् भूपाञ्जीवतः सुहृदो द्विजान् ॥ 36 ॥ गोसमिद्धाग्निटीर्थानि पश्येत् सुखमवाप्नुयात्। जो मनुष्य स्वप्न में देवताओं को, राजाओं को, जीवित मित्रों को, ब्राह्मण, क्षत्रिय एवं वैश्यों को, गौओं को, हवनकुण्ड में जलती हुई आग को तथा तीर्थ (काशी आदि अथवा नदियों के घाटों) स्थानों को देखता है, वह सुख को प्राप्त होता है। तीर्त्वा कलुषनीराणि जित्वा शत्रुगणानपि ॥ 37 ॥ आरुह्य सौधगोशैलकरिवाहान् सुखी भवेत्। जो मनुष्य स्वप्न में मैले जलों (नालों या गन्दी नालियों) को तैरकर पार कर जाता है, शत्रुओं के झुण्डों या जत्थों को जीत लेता है और सौध (चूने से पुते हुये घर या हवेली) पर, गाय या बैल, पहाड़, हाथी और घोड़े पर चढ़ता है वह सुखी होता है।

32 शार्ङ्गधरसंहिता [ पूर्वखण्डे शुभ्रपुष्पाणि वासांसि मांसमत्स्यफलानि च।।३८।। प्राप्यातुरः सुखी भूयात् स्वस्थो धनमवाप्नुयात् । सपने में सफेद फूलों, सफेद कपड़ों, मांस, मछली तथा फलों को प्राप्त कर रोगी नीरोग हो जाता है और स्वस्थ मनुष्य धन को प्राप्त करता है। अगम्यागमनं लेपो विष्ठया रुदितं मृतिः।।३९।। आममांसाशनं स्वप्ने धनारोग्याप्तये विदुः । स्वप्न में जो अगम्या (माता, बहिन और पुत्री आदि) से गमन (मैथुन), पुरीष (मल) का लेप, रोना, मृत्यु तथा कच्चे मांस का भक्षण करता है तो वह धन और आरोग्य की प्राप्ति के लिए होता है। जलौका भ्रमरी सर्पो मक्षिका वापि यं दशेत् ।।४०।। रोगी स भूयादुल्लाघः स्वस्थो धनमवाप्नुयात् ।।४१।। इति श्रीदामोदरसूनुना शार्ङ्गधरेण विरचितायां शार्ङ्गधरसंहितायां पूर्वखण्डे नाडीपरीक्षादिविधिर्नाम तृतीयोऽध्यायः ।।३।। स्वप्न में जिस मनुष्य को जोंक, भौंरा, साँप और मक्खियाँ काटती हैं, वह यदि रोगी है तो स्वस्थ हो जाता है और यदि स्वस्थ है तो उसे धन की प्राप्ति होती है। इस प्रकार वैद्यरत्न पण्डित तारादत्त त्रिपाठी के पुत्र डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी विरचित दीपिका व्याख्या, विशेष वक्तव्य आदि से संवलित शार्ङ्गधरसंहिता पूर्वखण्ड का तीसरा अध्याय समाप्त ।। ३ ।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

चतुर्थोऽध्यायः दीपनपाचनादिकथनम् दीपन-पाचन द्रव्यों के लक्षण पचेन्नामं वह्निकृच्च दीपनं तद्यथा मिशिः। पचत्यामं न वह्निं च कुर्याद् यत्तद्धि पाचनम्।।1।। नागकेशरवद् विद्याच्चित्रो दीपन-पाचनः। जो द्रव्य (पदार्थ) आम को नहीं पकाता है, किन्तु अग्नि (पाचनशक्ति या पाचक रसों को) बढ़ाता है, वह 'दीपन' कहा जाता है, जैसे-सौंफ। और जो द्रव्य आम को पकाता है, किन्तु अग्नि को नहीं बढ़ाता है वह 'पाचन' कहा जाता है, जैसे-नागकेसर। जो द्रव्य दोनों कार्य करता है वह 'दीपन- पाचन' कहा जाता है, जैसे-चित्रक। वक्तव्य-जरा विचार कीजिये-जो द्रव्य दीपन अर्थात् अग्निवर्द्धक है, वह आम को अवश्य पकायेगा फिर उसे 'पाचन' क्यों न माना जाये और इसी प्रकार जो द्रव्य 'पाचन' कहा जाता है, वह अग्नि को बढ़ाए बिना कैसे आम को पका सकेगा? ध्यान दें-जो द्रव्य केवल अग्नि को बढ़ाता है, वह भले ही अग्नि को बढ़ाकर उसके द्वारा पाचन करता हुआ 'पाचन' कहा जा सकता है, किन्तु वह 'दीपन' ही कहा जायेगा 'पाचन' नहीं, क्योंकि यदि कोई किसी से किसी काम को करवाता है, तो वह सीधा 'कर्ता' नहीं कहा जा सकता। वह 'कर्ता' तभी कहा जा सकेगा, जब वह स्वयं उस काम को करेगा। अथवा इसे इस प्रकार समझें-चूल्हे में जो लकड़ी डाली जाती है, वह 'दीपन' या 'अग्निवर्धक' कही जा सकती है, वह पाचन नहीं, क्योंकि वह बादाम या सुपाड़ी आदि द्रव्यों को तब तक नहीं पका सकती, जब तक उनमें कोई क्षार न डाला जाये। इसी प्रकार लकड़ी 'दीपन' और क्षार 'पाचन' कहा जायेगा। शमन द्रव्य का लक्षण न शोधयति यद्दोषान् समान्नोदीरयत्यपि।।2।। समीकरोति विषमाञ्छमनं तद्यथाऽमृता। जो द्रव्य सम (प्रकृतिस्थ) दोषों को न तो शरीर से बाहर ही निकालता और न कुपित ही करता है, किन्तु बढ़े हुये अथवा घटे हुये दोषों को जो सम या प्रकृतिस्थ कर देता है, उसे 'शमन' कहते हैं, जैसे-'गुरुच'। वक्तव्य-दोष का शमन सात प्रकार से होता है-1. पाचन, 2. दीपन, 3. लंघन, 4. प्यासा रहने, 5. व्यायाम करने, 5. आतप (धूप) सेवन एवं 7. वायु सेवन से। अनुलोमन द्रव्य का लक्षण कृत्वा पाकं मलानां यद्भित्त्वा बन्धमथो नयेत्।।3।। तच्चानुलोमनं ज्ञेयं यथा प्रोक्ता हरीतकी। जो द्रव्य मलों को पकाकर और उनके बन्ध (गाँठों) को तोड़कर नीचे (गुदमार्ग से अथवा अपने मार्ग से) बाहर निकाल देता है, उसे 'अनुलोमन' कहते हैं, जैसे-हरड़। वक्तव्य-उलटे मार्ग में जाते हुये वातादि दोषों को स्वमार्गगामी बनाने वाला द्रव्य भी 'अनुलोमन' कहा जाता है। संस्रन द्रव्य का लक्षण पक्तव्यं यदपक्त्वैव श्लिष्टं कोष्ठे मलादिकम्।।4।। नयत्यधः संस्रनं तद् यथा स्यात् कृतमालकम्। जो द्रव्य उदर में चिपके हुये पकाने योग्य (आम) मलादि तो पकाये बिना (अपक्व को) ही गुदमार्ग से निकाल देता है, उसे 'संस्रन' (सरकाने वाला) द्रव्य कहा जाता है, जैसे- अमलतास की गुद्दी। भेदन द्रव्य का लक्षण मलादिकमबद्धं यद् बद्धं वा पिण्डितं मलैः ।।5।। भित्त्वाधः पातयति तद् भेदनं कटुकी यथा। जो द्रव्य ढीले अथवा बँधे हुये अथवा वात आदि दोषों द्वारा पिण्डित (गाँठ बने हुये) मल को तोड़-फोड़कर नीचे

34 शार्ङ्गधरसंहिता [पूर्वखण्डे गिरा देता है, उसे 'भेदन' या फोड़ने वाला कहा जाता है, जैसे-कुटकी। रेचन द्रव्य का लक्षण विपक्वं यदपक्वं वा मलादि द्रवतां नयेत् ।। ६ ।। रेचयत्यपि तज्ज्ञेयं रेचनं त्रिवृता यथा। जो द्रव्य पके हुये अथवा न पके हुये, मलादि को पतला कर देता है और उसे निकाल भी देता है, उस द्रव्य को 'रेचन' कहते हैं, जैसे-निसोत। वक्तव्य-अनुलोमक, स्रंसक, भेदक और रेचक ये चारों द्रव्य विरेचन (दस्त) कराते हैं। अतः इस प्रकार के सभी द्रव्य 'दस्तावर' कहे जाते हैं। वमन द्रव्य का लक्षण अपक्वपित्तश्लेष्माणौ बलादूर्ध्वं नयेत् तु यत् ।। ७ ।। वमनं तद्धि विज्ञेयं मदनस्य फलं यथा। जो द्रव्य अपक्व (आमाशय स्थित आम आहार को भी) या न पके हुये पित्त एवं कफ को बलपूर्वक ऊपर (मुखमार्ग) से बाहर निकाल देता है। वह वमन कहा जाता है, जैसे-मैनफल। वक्तव्य-वमन द्रव्य उलटी या कै कराते हैं। शोधन द्रव्य का लक्षण स्थानाद् बहिर्नयेदूर्ध्वमधो वा मलसञ्चयम् ।। ८ ।। देहसंशोधनं तत् स्याद् देवदाली फलं यथा। जो द्रव्य मलों को उनके स्थान से मुखमार्ग अथवा गुदमार्ग द्वारा बाहर निकाल देता है, वह देहसंशोधन या 'शोधन' कहा जाता है, जैसे-देवदाली फल। वक्तव्य-यह द्रव्य उलटी और दस्त दोनों कराता है। शोधन पाँच प्रकार से होता है-1. निरूहण वस्ति से, 2. वमन से, 3. विरेचन से, 4. शिरोविरेचन से तथा 5. सिरावेध आदि विधियों द्वारा रक्त निकालने से। छेदन द्रव्य का लक्षण श्लिष्टान् कफादिकान् दोषानुन्मूलयति यद् बलात् ।। ९ ।। छेदनं तद्यथा क्षारा मरिचानि शिलाजतु। जो द्रव्य सटे या चिपके हुये कफ आदि दोषों को बलपूर्वक उखाड़ देता है, वह 'छेदन' या काटने वाला कहा जाता है, जैसे-जौखार आदि क्षार, काली मिर्च और शिलाजीत। लेखन द्रव्य का लक्षण धातून् मलान् वा देहस्य विशोष्योल्लेखयेच्च यत् ।। १० ।। लेखनं तद्यथा क्षौद्रं नीरमुष्णं वचा यवाः। जो द्रव्य सम्पूर्ण शरीर की धातुओं और मलों को सुखाकर उखाड़ या छील कर निकाल देता है, वह 'लेखन' कहा जाता है, जैसे-शहद, गरम जल, वच और जौ। वक्तव्य-छेदन तथा लेखन ये दोनों द्रव्य शरीर के भीतर जमे हुये दोषों को निकाल कर बाहर कर देते हैं। ग्राही द्रव्य का लक्षण दीपनं पाचनं यत् स्यादुष्णत्वाद् द्रवशोषकम् ।। ११ ।। ग्राहि तच्च यथा शुण्ठी जीरकं गजपिप्पली। जो द्रव्य दीपन (अग्निवर्द्धक) हो, पाचक हो तथा उष्ण होने से द्रव (मल के पतलेपन) को सुखाने वाला हो, उसे 'ग्राही' कहते हैं जैसे-सोंठ, जीरा और गजपीपल। स्तम्भन द्रव्य का लक्षण रौक्ष्याच्छैत्यात् कषायत्वाल्लघुपाकाच्च यद्भवेत् ।। १२ ।। वातकृत् स्तम्भनं तत् स्याद् यथा वत्सकटुण्डुकौ। जो द्रव्य रूक्ष, शीत, कसैला और शीघ्रपाकी होने के कारण वातवर्द्धक होता है, उसे 'स्तम्भन' कहते हैं, जैसे-कुरैया की छाल और सोनापाठा। वक्तव्य-ग्राही तथा स्तम्भन ये दोनों द्रव्य शरीर से बाहर निकलने वाली वस्तुओं को भीतर ही रोक देते हैं। रसायन द्रव्य का लक्षण रसायनं च तज्ज्ञेयं यज्जराव्याधिनाशनम् ।। १३ ।। यथाऽमृता रुदन्ती च गुग्गुलुश्च हरीतकी। जो द्रव्य जरा (बुढ़ापा) और रोगों को नष्ट करता है, वह 'रसायन' कहा जाता है, जैसे-गिलोय, रुद्रवन्ती, गूगल और हरड़। वक्तव्य-कुछ लोगों में युवावस्था में ही बाल सफेद होना, मुख या शरीर पर झुर्रियाँ पड़ना और इन्द्रियों का दुर्बल होना आदि बुढ़ापे के लक्षण उत्पन्न हो जाते हैं। रसायन औषधियों के सेवन से इसी प्रकार का जरा (बुढ़ापा) भी नष्ट होता है और स्वाभाविक जरा तो स्वाभाविक ही होता है और आकर ही रहता है तथा जाता भी नहीं। 'लाभोपायो हि शस्तानां रसादीनां रसायनम्'। च० चि० अ० 1.8।

चतुर्थोऽध्यायः ] दीपनपाचनादिकथनम् 35 वाजीकरण द्रव्य का लक्षण यस्माद् द्रव्याद्भवेत् स्त्रीषु हर्षो वाजीकरं च तत् ।। 14 ।। यथा नागबलाद्याः स्युर्बीजं च कपिकच्छुजम्। जिस द्रव्य (के सेवन) से स्त्रियों के सहवास (मैथुन-क्रिया) में अधिक हर्ष की प्राप्ति या उत्साह होता है, उसे 'वाजीकर' कहते हैं; जैसे-नागबला (खिरैंटी) तथा किवाँच आदि के बीज। वक्तव्य-ये द्रव्य नपुंसकता को दूर कर वीर्य की वृद्धि भी कर सकते हैं। शुक्रल द्रव्य का लक्षण यस्माच्छुक्रस्य वृद्धिः स्याच्छुक्रलं हि तदुच्यते ।। 15 ।। यथाऽश्वगन्धा मुसली शर्करा च शतावरी। जिस द्रव्य से वीर्य (शुक्रधातु) की वृद्धि होती है, वह 'शुक्रल' कहा जाता है; जैसे-नागौरी असगन्ध, सफेद एवं काली मुसली, खाँड़ या चीनी और शतावर। शुक्र के प्रवर्तक तथा जनक द्रव्यों के लक्षण दुग्धं माषाश्च भल्लातफलमज्जामलानि च ।। 16 ।। प्रवर्तकानि कथ्यन्ते जनकानि च रेतसः। दूध, उड़द, भिलावा (शुद्ध), फलों (बादाम, अखरोट आदि) की मज्जा या गिरी तथा आँवले, ये द्रव्य वीर्य के प्रवर्तक (प्रवृत्त करने वाले) और उत्पन्न करने वाले होते हैं। वक्तव्य-उक्त द्रव्यों के सेवन से मैथुन में शीघ्र तथा अधिक वीर्य निकलता है। प्रवर्तक आदि द्रव्यों के लक्षण प्रवर्तनी स्त्री शुक्रस्य रेचनं बृहतीफलम् ।। 17 ।। जातीफलं स्तम्भकं च शोषणी च हरीतकी। स्त्री (अभीष्ट स्त्री के दर्शन, स्पर्शन आदि) शुक्र को प्रवृत्त या चलित करती है। वनभंटा का फल शुक्र को रिक्त या च्युत करता (गिरा देता) है, जायफल उसे रोकता (स्तम्भन-शक्ति बढ़ाता) है और हरड़ शुक्र को सुखाती है। वक्तव्य-उक्त द्रव्यों के सेवन से शुक्र पर पड़ने वाले ये भिन्न-भिन्न प्रकार के प्रभाव कहे गये हैं। इन्हें भली-भाँति समझ लेना चाहिये। आवश्यकता पड़ने पर उन-उन द्रव्यों का प्रयोग करना चाहिये। कुछ ऐसे मनुष्य देखे गये हैं, जो अपने आपको नपुंसक समझते थे, किन्तु जब उन्हें अभीष्ट स्त्री मिली तो पूर्ण पुरुष सिद्ध हुये। एक ऐसे मनुष्य भी देखे जो परस्त्री में सफल नहीं होता था, किन्तु वह घर में पूर्ण पुरुष था। बहुत से तो प्रथम प्रसंग में असफल, किन्तु स्नेह बढ़ने पर सफल होते हैं, इत्यादि अनेक प्रकार की बातें देखी जाती हैं। बहुतों को प्रयत्न करने पर भी वीर्यपात नहीं होता, बहुत से शीघ्रपतन के कारण स्तम्भन की खोज में लगे रहते हैं और बहुतों का वीर्य पतला होता है। इन तीनों को क्रमशः रेचन, स्तम्भन और शोषण द्रव्यों की आवश्यकता होती है। सूक्ष्म द्रव्य का लक्षण देहस्य सूक्ष्मच्छिद्रेषु विशेद् यत्सूक्ष्ममुच्यते ।। 18 ।। तद्यथा सैन्धवं क्षौद्रं निम्बतैलं रुबूद्भवम्। जो द्रव्य शरीर के सूक्ष्म से सूक्ष्म स्रोतों में प्रवेश करता है, उसे 'सूक्ष्म' कहते हैं। जैसे-सेंधानमक, मधु, नीम और एरण्ड का तैल। वक्तव्य-यों तो सभी द्रव्य पचने पर शरीर में व्याप्त होते ही हैं, परन्तु जो द्रव्य शीघ्र अपना प्रभाव दिखलाता है, वह 'सूक्ष्म' कहा जाता है। नमक खाते ही व्रण आदि में खुजली होने लगती है। एरण्ड के तैल को पेट पर लगाने मात्र से दस्त हो जाता है, इत्यादि। व्यवायी द्रव्य का लक्षण पूर्वं व्याप्याखिलं कायं ततः पाकं च गच्छति ।। 19 ।। व्यवायि तद् यथा भङ्गा फेनं चाहिसमुद्भवम्। जो द्रव्य पहले सम्पूर्ण शरीर में व्याप्त होकर (अपना प्रभाव दिखलाकर) फिर पाक को प्राप्त होता (पचता) है, उसे 'व्यवायी' कहते हैं; जैसे-भाँग तथा अफीम। वक्तव्य-भाँग आदि के सेवन करने पर पहले ही नशा हो जाता है और पचने पर उतर जाता है। बस यही इनका 'व्यवायी' नामक प्रभाव है। विकासी द्रव्य का लक्षण सन्धिवन्धांस्तु शिथिलान् यत्करोति विकासि तत् ।। 20 ।। विश्लेष्यौजश्च धातुभ्यो यथा क्रमुककोद्रवाः। जो द्रव्य धातुओं से ओज (क्रियाशक्ति) को पृथक् करके सन्धियों के बन्धनों को शिथिल (दुर्बल या ढीले) कर देता है, वह 'विकाशी' कहा जाता है; जैसे-सुपारी एवं कोदों के चावल। वक्तव्य-उक्त द्रव्यों के सेवन से शरीर में शिथिलता और कृशता आती है।

३६ शार्ङ्गधरसंहिता [पूर्वखण्डे मदकारी द्रव्य का लक्षण बुद्धिं लुम्पति यद् द्रव्यं मदकारि तदुच्यते ।। २१ ।। तमोगुणप्रधानं च यथा मद्यं सुरादिकम् । जो द्रव्य तमोगुण की अधिकता के कारण बुद्धि (कर्तव्य- अकर्तव्य के ज्ञान) का लोप कर देता है, वह 'मदकारी' कहा जाता है; जैसे-सुरा, वारुणी आदि अनेक प्रकार के मद्य। वक्तव्य- मद्य के बुद्धिवर्द्धन आदि जो गुण लिखे गये हैं और देखे जाते हैं, वे उचित मात्रा में बहुत दिनों तक मद्यपान का अभ्यास करने पर ही पाये जाते हैं। प्रारम्भ में सब की बुद्धि पर बुरा प्रभाव पड़ता ही है। इसलिये मद्य कभी भी बुद्धिवर्द्धक नहीं कहा जा सकता। विष का लक्षण व्यवायि च विकाशि स्यात् सूक्ष्मं छेदि मदावहम् ।। २२ ।। आग्नेयं जीवितहरं योगवाहि स्मृतं विषम्। जो द्रव्य व्यवायी (कामोद्दीपक), विकाशी, सूक्ष्म (ऊपर २०वाँ श्लोक देखें), छेदी, मदकारी, आग्नेय (अग्निगुणयुक्त या उष्ण), प्राणनाशक और योगवाही (संयोगी द्रव्यों के समान गुण करने वाला) हो, वह 'विष' या 'जहर' कहा जाता है; जैसे-वत्सनाभ और संखिया आदि। वक्तव्य- जिस एक द्रव्य में उक्त सभी गुण हों, वह 'विष' होता है। प्रमाथी द्रव्य का लक्षण निजवीर्येण यद् द्रव्यं स्रोतोभ्यो दोषसञ्चयम् ।। २३ ।। निरस्यति प्रमाथि स्यात् तद्यथा मरिचं वचा। जो द्रव्य अपनी शक्ति से शरीर में से दोषों के सञ्चय को निकाल देता है, वह 'प्रमाथी' कहा जाता है; जैसे-मरिच और वच। अभिष्यन्दी द्रव्य का लक्षण पैच्छिल्याद् गौरवाद् द्रव्यं रुद्ध्वा रसवहाः शिराः ।। २४ ।। धत्ते यद् गौरवं तत् स्यादभिष्यन्दि यथा दधि। जो द्रव्य अपनी पिच्छिलता (चिप-चिपाहट) से तथा गुरुता (भारीपन) से रसवाहिनी शिराओं को रोककर शरीर में भारीपन उत्पन्न करता है, वह 'अभिष्यन्दी' कहा जाता है; जैसे-दही। विदाही द्रव्य का लक्षण (विदाहि द्रव्यमुद्गारमम्लं कुर्यात् तथा तृषाम् ।। २५ ।। हृदि दाहञ्च जनयेत् पाकं गच्छति तच्चिरात्।) जो उद्गार (डकार) को खट्टा करे, प्यास एवं हृदय में दाह को उत्पन्न करे और देर से पचे, वह 'विदाही' द्रव्य होता है। लंघन द्रव्य का लक्षण (लघूष्णतीक्ष्णविशदं रूक्षं सूक्ष्मं खरं द्रवम् ।। २६ ।। कठिनं चैव यद् द्रव्यं प्रायस्तल्लङ्घनं स्मृतम् ।) जो लघु, उष्ण, तीक्ष्ण, विशद, रूक्ष, सूक्ष्म, खर, द्रव एवं कठिन हो, वह द्रव्य लंघन अर्थात् शरीर में लघुता या हल्कापन उत्पन्न करने वाला होता है। देखें-च० सू० अ० 22.12-15। बृंहण द्रव्य का लक्षण (गुरु शीतं मृदु स्निग्धं बहलस्थूलपिच्छिलम् ।। २७ ।। प्रायो मन्दस्थिरं श्लक्ष्णं द्रव्यं बृंहणमुच्यते ।) जो गुरु, शीत, मृदु, स्निग्ध, बहल अर्थात् घन, स्थूल, पिच्छिल, मन्द (चिरकारी), स्थिर एवं श्लक्ष्ण होता है, वह द्रव्य 'बृंहण' (शरीर को बड़ा बनाने वाला) होता है। रूक्षण द्रव्य का लक्षण (रूक्षं लघु खरं तीक्ष्णमुष्णं स्थिरमपिच्छिलम् ।। २८ ।। प्रायशः कठिनं चैव यद् द्रव्यं तद्विद् रूक्षणम्।) रूक्ष, लघु, खर, तीक्ष्ण, उष्ण, स्थिर, अपिच्छिल तथा जो द्रव्य प्रायः कठोर होता है, वह द्रव्य रूक्षण (रूखापन उत्पन्न करने वाला) होता है। स्नेहन द्रव्य का लक्षण (द्रवं सूक्ष्मं सरं स्निग्धं पिच्छिलं गुरु शीतलम् ।। २९ ।। मन्दं मृदु च यत् प्रायस्तद् द्रव्यं स्नेहनं मतम्।) द्रव, सूक्ष्म, सर, स्निग्ध, पिच्छिल, गुरु, शीतल, मन्द तथा जो द्रव्य प्रायः मृदु होता है, वह स्नेहन कहा जाता है। स्वेदन द्रव्य का लक्षण (उष्णं तीक्ष्णं सरं स्निग्धं रूक्षं सूक्ष्मं द्रवं स्थिरम् ।। ३० ।। द्रव्यं गुरु च यत् प्रायः तद्धि स्वेदनमुच्यते।) उष्ण, तीक्ष्ण, सर, स्निग्ध, रूक्ष, सूक्ष्म, द्रव, स्थिर तथा जो द्रव्य प्रायः गुरु गुणों से युक्त होता है, वह द्रव्य 'स्वेदन' या पसीना लाने वाला होता है। श्लक्ष्ण द्रव्य का लक्षण (श्लक्ष्णः स्नेहं विनापि स्यात् कठिनोऽपि हि चिक्कणः ।। ३१ ।।) जो स्निग्धता से रहित तथा कठोर होते हुये भी चिकना होता है, वह 'श्लक्ष्ण' होता है।

चतुर्थोऽध्यायः] दीपनपाचनादिकथनम् 37

स्थिर, सर, पिच्छिल द्रव्य का लक्षण (स्थिरो वातमलस्तम्भी सरस्तेषां प्रवर्त्तकः। पिच्छिलस्तन्तुलो बल्यः सन्धानः श्लेष्मलो गुरुः ।। 32 ।।) 'स्थिर' वायु एवं मल का निरोधक तथा 'सर' उनका प्रवर्त्तक होता है और 'पिच्छिल' चिपचिपा, बलकारक, जोड़ने वाला, कफकारक और गुरु होता है। विशद द्रव्य का लक्षण (क्लेदच्छेदकरः ख्यातो विशदो व्रणरोपणः।) जो क्लेद या आर्द्रता का विनाश करे और व्रण या घाव को भरे वह 'विशद' होता है। स्थूल द्रव्य का लक्षण (स्थूलः स्थौल्यकरो देहे स्रोतसामवरोधकृत् ।। 33 ।।) जो देह में स्थूलता या मोटापा पैदा करे और स्रोतों में रुकावट पैदा करे, वह 'स्थूल' कहा जाता है। द्रव एवं सान्द्र द्रव्य का लक्षण (द्रवः क्लेदकरो व्यापी सान्द्रस्तद् विपरीततः।) जो क्लेदकारक एवं व्याप्तिशील हो, वह 'द्रव' कहा जाता है और जो इसके विपरीत गुणों वाला हो, वह 'सान्द्र' होता है।

तीक्ष्ण एवं मन्द द्रव्य का लक्षण (तीक्ष्णश्चाशुकरी देहे धावत्यम्भसि तैलवत् ।। 34 ।। मन्दः सकलकार्याणि शैथिल्येन करोति हि।) जो शीघ्रकारी हो और जल पर तैल के समान शरीर में फैल जाता हो, वह 'तीक्ष्ण' होता है। जो सब कामों को विलम्ब से करता है, वह 'मन्द' होता है।

मृदु एवं कर्कश द्रव्य का लक्षण (मृदु मार्दवकृद्देहे कर्कशः कर्कशत्वकृत् ।। 35 ।।) इति श्रीदामोदरसूनुना शार्ङ्गधरेण विरचितायां शार्ङ्गधरसंहितायां पूर्वखण्डे दीपनपाचनादिकथनं नाम चतुर्थोऽध्यायः ।। 4 ।। जो देह में मृदुता या कोमलता उत्पन्न करे, वह 'मृदु' कहा जाता है और जो कर्कशता (खुरदरापन) पैदा करे, वह 'कर्कश' होता है।


इस प्रकार वैद्यरत्न पण्डित तारादत्त त्रिपाठी के पुत्र डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी विरचित दीपिका व्याख्या, विशेष वक्तव्य आदि से संवलित शार्ङ्गधरसंहिता पूर्वखण्ड का चौथा अध्याय समाप्त ।। 4 ।।

पञ्चमोऽध्यायः कलादिकाख्यानम्

शरीर-परिचय कलाः सप्ताशयाः सप्त धातवः सप्त तन्मलाः। सप्तोपधातवः सप्त त्वचः सप्त प्रकीर्तिताः ।। 1 ।। त्रयो दोषा नवशतं स्नायूनां सन्ध्यस्तथा। दशाऽधिकं च द्विशतमस्थ्नां च त्रिशतं तथा ।। 2 ।। सप्तोत्तरं मर्मशतं शिराः सप्तशतं तथा। चतुर्विंशतिराख्याता धमन्यो रसवाहिकाः ।। 3 ।। मांसपेश्यः समाख्याता नृणां पञ्चशतं बुधैः। स्त्रीणां च विंशत्यधिकाः कण्डराश्चैव षोडश ।। 4 ।। नृदेहे दश रन्ध्राणि नारीदेहे त्रयोदश। ( असङ्ख्येयानि स्रोतांसि जालानि चैव षोडश ।। 5 ।। षट् च कूर्चा समाख्याताश्चतस्रो रज्जवः स्मृताः। सेवन्यः सप्त सङ्ख्याताः सङ्घाताश्च चतुर्दश ।। 6 ।। चतुर्दशैव सीमन्ता एका जिह्वा प्रकीर्तिता।) एतत् समासतः प्रोक्तं विस्तरेणाधुनोच्यते ।। 7 ।।

मानव-शरीर में कलाएँ सात, आशय सात, धातुएँ सात, धातुओं के मल सात, उप-धातुएँ सात और त्वचाएँ भी सात कही गयी हैं। दोष तीन, स्नायु नौ सौ (900), सन्धियाँ दो सौ दश (210), हड्डियाँ तीन सौ (300), मर्म एक सौ सात (107), सिराएँ सात सौ (700) और रसवाहिनी धमनियाँ चौबीस (24) कही गयी हैं। मांसपेशियाँ पुरुष के शरीर में पाँच सौ (500) तथा स्त्री के शरीर में पाँच सौ बीस (520) कही जाती हैं और कण्डराएँ सोलह (16) (स्त्री-पुरुष दोनों)। रन्ध्र या छिद्र (बहिर्मुखी स्रोत) पुरुष के शरीर में दस (10) और स्त्री के शरीर में तेरह (13) होते हैं। शरीर के भीतरी स्रोतस् असंख्य या अगणित हैं। जाल सोलह हैं, कूर्च छः हैं, रज्जु चार हैं, सेवनी सात हैं, संघात चौदह हैं, सीमन्त भी चौदह हैं और जीभ एक है। यह संक्षेप में (अर्थात् अवयवों की संख्या मात्र) कहा गया है और विस्तार में आगे कहा जायेगा। देखें-सु० शा० अ० 5 सम्पूर्ण ।

कला का वर्णन मांसासृङ्मेदसां तिस्रो यकृत्प्लीह्नोश्चतुर्थिका। पञ्चमी च तथाऽन्त्राणां षष्ठी चाग्निधरा मता ।। 8 ।। रेतोधरा सप्तमी स्यादिति सप्त कलाः स्मृताः।

मांस, रक्त और मेदा की तीन, यकृत् और प्लीहा को चौथी, अँतड़ियों की पाँचवीं, अग्नि, धरा या पित्त को धारण करने वाली छठी और शुक्र को धारण करने वाली सातवीं, इस प्रकार कलाएँ सात कही गयी हैं।

वक्तव्य- माड़ी लगाकर पालिश किये हुये रेशमी कपड़े के जैसी जो झिल्लियाँ शरीर के भीतर पायी जाती हैं, उन्हें 'कला' कहते हैं। मांसधरा कला वह है, जो प्रत्येक मांसपेशी के ऊपर चढ़ी रहती है। उसी प्रकार रक्तवाही स्रोतों की भीतरी दीवार पर रहने वाली कला रक्तधरा कही जाती है। मेदा को धारण करने वाली 'मेदोधरा', यकृत् और प्लीहा की आवरणभूत 'यकृत्प्लीहाधरा', आमाशय से मलाशय तक के स्रोत के भीतर अन्नधरा, अग्निरस या पित्तरस की थैली में 'अग्निधरा' तथा शुक्र स्रोतों में 'शुक्रधरा' कला है। देखें-सु० शा० अ० 4।

कला-परिचय (धात्वाशयान्तरस्थस्तु यः क्लेदस्त्वधितिष्ठति ।। 9 ।। देहोष्मणा विपक्वश्च सा कलेत्यभिधीयते। स्नायुभिश्च प्रतिच्छन्नान् सन्ततांश्र्च जरायुणा ।। 10 ।। श्लेष्मणा वेष्टितांश्चापि कलाभागांस्तु तान् विदुः ।)

धातु एवं आशयों के भीतर जो क्लेद (गीलापन, शरीरोपयोगी होकर) रहता है और शरीरव्यापी ऊष्मा (उष्णता)