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शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished699 पृष्ठ

४१२ शतपथ ब्राह्मण

त्रिरथ॒ यदु॑त्तरेण तद्वि॒श्चरे॒तद्वै परि॒प्लवमानꣳ सं॑वत्स॒रं करोति ॥ १५॥ सं॑वत्स॒रो वज्रः॑ । ए॒तेन॒ वै दे॒वाः सं॑वत्स॒रेण॒ वज्रे॑ण पुरः॒ प्रभिन्द॒न्त्रिमांल्लो॒कान्प्राज॑यंस्तथो ऽ॒ह्यै॑ष ए॒तेन सं॑वत्स॒रेण॒ वज्रे॑णे॒मांल्लो॒कान्प्र॒भिनत्तीमांल्लो॒कान्प्र॒जयति॒ तस्मा॑दे॒ता दे॒वता॒ यज॑ति ॥ १६॥ स वै॑ ति॒स्र उप॒सद॒ उपे॑यात् । त्रयो वाऽऋ॒तवः॑ संवत्स॒रस्य॑ संवत्स॒रस्यै॒वैतद्रू॒पं क्रि॑यते संवत्स॒रमे॒वैतत्स॒ꣳस्करोति द्विरे॒कया प्रचरति द्विरे॒कया ॥ १७॥ ताः षट्स॒म्पद्य॑न्ते । षड्वाऽऋ॒तवः॑ संवत्स॒रस्य॑ संवत्स॒रस्यै॒वैतद्रू॒पं क्रि॑यते सं- वत्स॒रमे॒वैतत्स॒ꣳस्करोति ॥१८॥ यद्यु॑ द्वाद॒शोप॒सद॒ उपे॑यात् । द्वाद॑श॒ वै मासाः॑ सं- वत्स॒रस्य॑ संवत्स॒रस्यै॒वैतद्रू॒पं क्रि॑यते संवत्स॒रमे॒वैतत्स॒ꣳस्करोति द्विरे॒कया प्रचर॑ति द्विरे॒कया ॥ १९॥ ताश्चतुर्वि॑ꣳशतिः सम्पद्य॑न्ते । चतुर्वि॑ꣳशति॒र्वै सं॑वत्स॒रस्यार्ध॑मासाः संवत्स॒रस्यै॒वैतद्रू॒पं क्रि॑यते संवत्स॒रमे॒वैतत्स॒ꣳस्करोति ॥२०॥ स य॒त्सायम्प्रा॒तः प्रच॑- रति । त॒या ह्ये॑व॒ सम्प॑त्सम्पद्य॑ते स यत्पूर्वाह्णे॒ प्रचर॑ति तद्यु॒ध्यत्यथ॒ यद॑पराह्णे॒ प्र- चर॑ति सु॒जितमसदित्यथ॒ यज्जु॒होतीदं वै पुरं॑ यु॒ध्यन्ति॒ तां जि॒त्वा स्वाꣳ सतीं॑ प्रप- द्यन्ते ॥ २१॥ स यत्प्रचर॑ति । तद्यु॒ध्यत्यथ॒ यत्सन्ति॑ष्ठते तज्जयत्यथ॒ यज्जु॒होति स्वा- मे॒वैतत्स॒तों॑ प्रपद्यते ॥ २२॥ स जु॒होति । य॒या द्विरे॒कस्या॒ह्नः प्रच॑रिष्य॒न्भव॑ति॒ या ते॑ऽअग्नेऽयःशया॒ तनूर्व॑र्षिष्ठा गह्वरे॒ष्ठा । उग्रं वचो॒ऽअपा॑वधीत्त्वेषं॒ वचो॒ऽअपा॑व- धी॒त्स्वाहेत्ये॒वꣳरू॑पा हि सासीद॒यस्मयी हि सासी॑त् ॥ २३॥ अथ॑ जुहोति । य॒या द्विरे॒कस्या॒ह्नः प्रच॑रिष्य॒न्भव॑ति या ते॑ऽअग्ने॒ रजः॑शया तनूर्व॑र्षिष्ठा गह्वरे॒ष्ठा । उग्रं॑ वचो॒ऽअपा॑वधीत्त्वेषं॒ वचो॒ऽअपा॑वधी॒त्स्वाहेत्ये॒वꣳरू॑पा हि सासीद्रज॒ता हि सासी॑त् ॥ २४॥ अथ॑ जुहोति । य॒याद्विरे॒कस्या॒ह्नः प्रच॑रिष्य॒न्भव॑ति॒ या ते॑ऽअग्ने॒ हरिशया तनूर्व॑र्षिष्ठा गह्वरे॒ष्ठा । उग्रं वचो॒ऽअपा॑वधीत्त्वेषं॒ वचो॒ऽअपा॑वधी॒त्स्वाहेत्ये॒वꣳरू॑पा हि सासीद्ध॑रिणी हि सासीद्यद्यु द्वादशोप॒सद॒ उपे॑याच्च॒तुर॒ह्नेकया प्रच॑रेच्चतु॒रहू- न्नेकया ॥ २५॥ अथातो व्रतोपसदामेव । परोऽव॑र्त्ति॒र्वाऽअ॒न्या उप॒सदः॑ प॒रोऽक्षीर-

कां० ३, अ० ४, ब्रा० ४, कं० १५-२६ शतपथब्राह्मण / ४१३ प्रकार वह वर्ष के चक्र को बनाता है ॥१५॥ संवत्सर वज्र है। इसी संवत्सर वज्र के द्वारा दोनों देवों ने किलों को तोड़ा और इन लोकों को जीता। इसी प्रकार यह भी इसी संवत्सर वज्र की सहायता से इन लोकों को तोड़ता और इन लोकों को जीतता है। इसीलिए वह इन देवतों का यजन करता है ॥१६॥ तीन उपसदों को करे। संवत्सर में तीन ऋतुएँ होती हैं। इस प्रकार संवत्सर का तद्रूप आ जाता है। इस प्रकार वह संवत्सर को बनाता है। वह प्रत्येक क्रिया को दो बार करता है ॥१७॥ यह छः के बराबर हो जाते हैं। वर्ष में छः ऋतुएं होती हैं। इस प्रकार वर्ष का तद्रूप हो जाता है। वह इस प्रकार वर्ष को बनाता है ॥१८॥ या बारह उपसदों को करे। वर्ष में बारह मास होते हैं। इस प्रकार वर्ष का तद्रूप हो जाता है। वह इस प्रकार वर्ष बनाता है। वह प्रत्येक क्रिया को दो बार करता है ॥१९॥ इस प्रकार चौबीस हो जाते हैं। वर्ष में चौबीस अर्द्धमास होते हैं। यह संवत्सर का रूप हो जाता है। इस प्रकार वह संवत्सर को बनाता है ॥२०॥ वह सायं-प्रातः इसलिए करता है कि इसी से सम्पूर्णता आती है। प्रातःकाल की क्रिया का अर्थ है जय, सायंकाल की क्रिया का 'सुजय' और आहुति का अर्थ है कि जीतकर किले को अपना समझकर भीतर घुस जाना ॥२१॥ उपसदों के करने का अर्थ है युद्ध करना, क्रिया के पूर्ण होने का अर्थ है विजय पाना, और आहुति देने का अर्थ है किले को अपना करके उसमें घुस जाना ॥२२॥ वह दिन में दो बार इस मन्त्र से आहुति देता है— "या ते ऽ अग्नेऽयःशया तनूर्वर्षिष्ठा गह्नरेष्ठा । उग्रं वचोऽपावधीत् त्वेषं वचोऽपावधीत् स्वाहा" (यजु० ५।८)-"हे अग्नि, यह जो तेरा लोहे का शरीर है, गहरे में बैठा हुआ, इसने (शत्रु की) उग्र वाणी को मार डाला, तीक्ष्ण वाणी को मार डाला।" वह ऐसी ही थी। वह लोहे के समान थी ॥२३॥ अब दिन में दो बार इस मन्त्र से आहुति देता है— "या ते ऽ अग्ने रजःशया तनूर्वर्षिष्ठा गह्नरेष्ठा । उग्रं वचोऽपावधीत् त्वेषं वचोऽपावधीत् स्वाहा" (यजु० ५।८)-"हे अग्नि, यह जो तेरा चांद का शरीर है, गहरे में पैठा हुआ, इसने उग्र वाणी को मार डाला, तीक्ष्ण वाणी को मार डाला।" इसका ऐसा ही रूप था। चांदी का रूप था ॥२४॥ अब दिन में दो बार इस मन्त्र से आहुति देता है— "या तेऽग्ने हरिशया तनूर्वर्षिष्ठा गह्नरेष्ठा । उग्रं वचो अपावधीत् त्वेषं वचो अपावधीत् स्वाहा" (यजु० ५।८) - "हे अग्नि, यह जो तेरा सोने का शरीर है, गहरे में पैठा हुआ, इसने उग्र वाणी को मार डाला, तीक्ष्ण वाणी को मार डाला।" इसका ऐसा ही रूप था। सोने का रूप था। अगर वह बारह उपसदों को करे तो हर एक को चार दिन करना चाहिए ॥२५॥ अब व्रत-उपसदों को लीजिये। कुछ उपसद चौड़े होते जाते हैं और कुछ तंग, जिनमें

अध्याय-५, ब्राह्मण-१

न्याः स या॒सामेकं॑ प्रथ॒माह॑न्दो॒ग्ध्यथ॒ द्वावथ॒ त्रीꣳस्ताः प॒राञ्ची॑र्य्य य॒ासां त्रीन्प्रथ॒मा- ह॑न्दो॒ग्ध्यथ॒ द्वावथै॒कं ताः पु॒रोऽञ्ची॑र्या वै पु॒रोऽञ्ची॑स्ताः प॒राञ्ची॑र्याः प॒राञ्ची॑स्ताः पु॒रोऽञ्चीः ॥ २६॥ तप॑सा॒ वै लो॒कं ज॑यति । तद्य॒स्यैतत्प॒रः-पर॑ एव॒ वरी॑यस्तपो॑ भव॑ति प॒रः-परः॒ श्रेयाꣳसं॑ लो॒कं ज॑यति वसी॑यानु॒ हैवा॒स्मिँल्लो॒के भ॑वति॒ य ए॒वं वि॒द्वान्यु॒रोऽञ्ची॑रुप॒सद॒ उपै॑ति॒ तस्मा॑डु पु॒रोऽञ्ची॑रि॒वोप॒सद॒ उपे॑याद्य॒द्यु द्वाद॑शोप॒सद॒ उपे॒यात्तीꣳश्चतुरो॒हं दो॑हयेद्द्वौ॑ चतुर॒हमेकं॑ चतुर॒हम् ॥ २७॥ ब्राह्मणम् ॥ ५ [३.४] ॥ तृतीयः प्रपाठकः ॥ कण्डिकासंख्या १२१ ॥ ॥ चतुर्थोऽध्यायः [११] ॥ ॥ तद्य॒ ए॒ष पू॒र्वार्द्धे व॒र्षिष्ठ स्थूणा॒राजो भ॑वति । तस्मात्प्रा॒ङ् प्रक्रा॑मति॒ त्रीन्वि- क्रमाꣳस्तच्छु॒ङ्कं निह॑न्ति॒ सोऽन्तःपातः ॥ १॥ तस्मान्मध्यमाच्छु॒ङ्कोः । दक्षि॑णा पञ्चदश विक्रमा॒न्प्रक्रा॑मति॒ तच्छु॒ङ्कं निह॑न्ति सा दक्षि॑णा श्रोणिः ॥ २॥ तस्मान्मध्यमाच्छु॒ङ्कोः । उदङ् पञ्चदश विक्रमा॒न्प्रक्रा॑मति॒ तच्छु॒ङ्कं निह॑न्ति सोत्तरा श्रोणिः ॥ ३॥ तस्मान्म- ध्यमाच्छु॒ङ्कोः । प्राङ् षट्त्रिꣳश॑तं विक्रमा॒न्प्रक्रा॑मति॒ तच्छु॒ङ्कं निह॑न्ति॒ स पू॒र्वार्धः ॥ ४॥ तस्मान्मध्यमाच्छु॒ङ्कोः । दक्षि॑णा द्वादश विक्रमा॒न्प्रक्रा॑मति॒ तच्छु॒ङ्कं निह॑न्ति॒ स दक्षि॑- णा॒ꣳसः ॥ ५॥ तस्मान्मध्यमाच्छु॒ङ्कोः । उदङ् द्वादश विक्रमा॒न्प्रक्रा॑मति॒ तच्छु॒ङ्कं नि॒- हन्ति॒ स उत्त॒रो॒ꣳस ए॒षा मा॒त्रा वेदेः ॥ ६॥ अथ यत्ति॒ꣳश॑त्प्रक्रमा प॒श्चाद्भव॑ति । त्रि॒ꣳशद॑क्षरा॒ वै वि॒राड्वि॒राजा॒ वै दे॒वा अ॒स्मिँल्लो॒के प्रत्य॑तिष्ठꣳस्तथो॒ ऽए॒वैष ए॒तद्वि॒- राजा॒वास्मिँल्लो॒के प्रति॑तिष्ठति ॥ ७॥ अथोऽअपि॒ त्रय॑स्त्रिꣳशत्स्युः । त्रय॑स्त्रिꣳशदक्षरा वै वि॒राड्वि॒रा॒ज्या॑वास्मिँल्लोके प्रति॑तिष्ठति ॥ ८॥ अथ यत्षट्त्रिꣳश॑त्प्रक्रमा प्राची भ॒- वति । षट्त्रिꣳशद॑क्षरा॒ वै बृ॑ह॒ती बृ॑ह॒त्या वै दे॒वाः स्व॒र्गं लो॒कं स॒माश्नु॑वत त॒- थो॒ऽए॒वैष ए॒तद्बृ॑ह॒त्यैव स्व॒र्गं लो॒कं स॑मश्नु॒ते सो॒ऽस्य दि॒व्याह॑वनी॒यो भ॑वति ॥ ९॥ अथ यच्चतुर्विꣳश॑तिविक्रमा पुर॒स्ताद्भव॑ति । चतु॑र्विꣳशत्यक्षरा॒ वै गा॑य॒त्री पू॒- र्वार्धो वै य॒ज्ञस्य॑ गायत्री पू॒र्वार्ध॑ ए॒ष य॒ज्ञस्य॒ तस्माच्चतुर्विꣳश॑तिविक्रमा पुर॒स्ताद्भव॑-

का० ३, अ० ४-५, ब्रा० ४-१, कं० २६-२७ व १-१० शतपथब्राह्मण / ४१५ पहले दिन एक थन दुहता है, दूसरे दिन दो, तीसरे दिन तीन, वे चौड़े होते जाते हैं। और जिनमें पहले दिन तीन थन दुहता है, दूसरे दिन दो, तीसरे दिन एक, वे तंग हो जाते हैं। जो तंग होते जाते हैं वह ऐसे ही हैं जैसे चौड़े । और जो चौड़े होते जाते हैं ऐसे ही हैं जैसे तंग ॥२६॥ लोकों को तप से जीतते हैं। जो इस रहस्य को समझकर उन उपसदों को लेता है जो तंग होते जाते हैं, उसका तप बढ़ता जाता है और उसका श्रेय बढ़ता है और वह लोक में अच्छा हो जाता है । इसलिए उन उपसदों को लेना चाहिए जो तंग होते जाते हैं। अगर बारह उपसदों को लेवे तो चार दिन तक तीन थन दुहने चाहिएँ, चार दिन तक फिर दो थन, और फिर चार दिन तक एक थन ॥२७॥ अध्याय ५—ब्राह्मण १ शाला के पूर्व की ओर का जो सबसे बड़ा खम्भा होता है उससे पूर्व की ओर तीन पग चलता है । और वहाँ एक कील गाड़ देता है जिसको 'अन्तः-पात' कहते हैं ॥१॥ इस बीच की कील से दक्षिण की ओर पन्द्रह पग चलता है और वहाँ एक कील गाड़ता है। उसको 'दक्षिणा श्रोणि' (दाहिना कूल्हा) कहते हैं ॥२॥ इस बीच की कीली से उत्तर की ओर पन्द्रह पग चलता है और वहाँ एक कील गाड़ता है । उसको 'उत्तरा-श्रोणि' (बायाँ कूल्हा) कहते हैं ॥३॥ इस बीच की कील से पूर्व की ओर छत्तीस पग चलता है और वहाँ एक कील गाड़ता है। उसको 'पूर्वार्ध' कहते हैं ॥४॥ इस बीच की कील से दक्षिण की ओर बारह पग चलता है और वहाँ एक कील गाड़ता है । उसको 'दक्षिणोऽसः' (दायाँ कंधा) कहते हैं ॥५॥ इस बीच की कील से बारह पग उत्तर की ओर चलता है और वहाँ एक कील गाड़ता है । उसको 'उत्तरोऽसः' (बायाँ कंधा) कहते हैं। यही वेदी की मात्रा (प्रमाण) है ॥६॥ यह पीछे तीस पग इसलिए होती है कि विराट् छन्द में तीस अक्षर होते हैं। और विराट् छन्द के द्वारा ही देवों ने इस लोक में प्रतिष्ठा पाई । इसी प्रकार यह भी विराट् छन्द द्वारा इस लोक में प्रतिष्ठा प्राप्त कर लेता है ॥७॥ तैंतीस पग भी हो सकते हैं। क्योंकि विराट् में तैंतीस अक्षर भी होते हैं और विराट् के द्वारा ही वह इस लोक में प्रतिष्ठा प्राप्त करता है ॥८॥ पूर्व में छत्तीस पग क्यों होते हैं ? बृहती छन्द छत्तीस अक्षर का होता है। बृहती के द्वारा ही देव लोग स्वर्गलोक को प्राप्त हुए । इसी प्रकार यह भी बृहती छन्द द्वारा स्वर्गलोक को प्राप्त करता है । उसकी आहवनीय अग्नि द्यौलोक में होती है ॥९॥ वेदी आगे की ओर २४ पग की क्यों होती है ? गायत्री चौबीस अक्षर की होती है । गायत्री यज्ञ का पूर्वार्ध है। इसलिए वह आगे को चौबीस पग चौड़ी होती है। वेदी की यही मात्रा

त्‍वे॒षा मा॒त्रा वे॒देः ॥१०॥ अथ॒ यत्प॒श्चाद्वरी॑यसी भवति । प॒श्चाद्वरी॑यसी पृ॒थुश्रोणि- रिति॒ वै योषां॑ प्रशंसन्ति॒ यद्वै॒व प॒श्चाद्वरी॑यसी भवति प॒श्चाद्देवैतद्वीर्यं॑ प्र॒जननं॑ क- रोति॒ तस्मा॑त्पश्चाद्वरी॑यसः प्र॒जननादि॒माः प्र॒जाः प्र॒जाय॑न्ते ॥११॥ नासिका ह वा॒ ऽए॒षा य॒ज्ञस्य यदु॑त्तर॒वेदिः॑ । अथ॒ यदे॑नामुत्तरां॒ वेदे॑रुपकिर॑ति॒ तस्मा॑दुत्तरवेदिर्नाम॑ ॥१२॥ द्वय्यो ह वाऽइ॒दमग्रे॑ प्र॒जा आ॑सुः । आ॒दि॒त्याश्चैवाङ्गि॑रसश्च॒ ततो॒ऽङ्गि॑रसः पूर्व्वे॑ य॒ज्ञꣳ स॑म॒भरं॒स्ते य॒ज्ञꣳ सं॑भृत्योचु॑र॒ग्निमि॒मां नः श्वःसु॒त्यामा॑दि॒त्येभ्यः॒ प्रब्रू॑ह्यनेन॑ नो य॒ज्ञेन या॑जय॒तेति॑ ॥१३॥ ते ह॒ादित्या॑ ऊचुः । उप॑जानत यथा॒स्मानि॒वाङ्गि॑रसो याज॒यान् वयमङ्गि॑रस॒ इति॑ ॥१४॥ ते होचुः । न वाऽअन्येन य॒ज्ञादप॑क्रम॒णम॒स्त्य- त्रा॒मेव॑ सु॒त्यां क्रि॑यामहा॒ऽइति॑ ते य॒ज्ञꣳ सं॑ज॒ह्रुस्ते य॒ज्ञꣳ सं॑भृत्योचुः श्वःसु॒त्यां॑ वै त्वम॒स्मभ्य॒मग्रे॒ प्रावो॑चो॒ऽथ व॒यम॒द्यसु॒त्या॑मेव॒ तुभ्यं॒ प्रब्रू॒मोऽङ्गि॑रोभ्यश्च तेषां॑ नस्त्वꣳ होतासीति॑ ॥१५॥ ते॒ऽन्यमे॒व प्र॑तिप्रनि॒न्युः । अ॒ङ्गिर॑सो॒ऽह ते ह्वाप्यङ्गिरसो॒ऽग्नये ऽन्वाग॑त्य चुक्रुधुरिव क॒थं नु नो दूतश्च॒रन् प्रत्या॑द॒था इति॑ ॥१६॥ स होवाच । अनि॑न्द्या वै माव॑दूत॒ सो॒ऽनिन्द्यैर्वृ॒तो नाश॑कमप॒क्रमितु॒मिति॒ तस्मा॑ड ह्नानिन्द्य- स्य वृ॒तो नाप॑क्रामेत्स॒द्येन सद्यःक्रिया॒ङ्गिर॑स आ॒दि॒त्यानया॑जय॒त्स स॒द्यःक्रीः॑ ॥१७॥ तेभ्यो वाचं॒ दक्षि॑णामानयन् । तां न प्रत्य॑गृह्ण॒न्हास्यामहे॒ यदि॑ प्रतिग्रही॒ष्याम इति॒ तद्व तद्य॒ज्ञस्य॒ कर्म॒ न व्य॑मुच्यत॒ यद्वा॒क्षिणामासी॑त् ॥१८॥ अथैभ्यः॒ सूर्यं॒ दक्षि॑- णामानयन् । तं प्रत्य॑गृह्णं॒स्तस्मा॑डु ह् स्माहुर॒ङ्गिर॑सो वयं वाऽअ॒र्वाञ्चो॒ऽनाः स्मो वयं॒ दक्षि॑णीया॒ ऋषि वाऽअ॒स्माभि॑रिश प्रति॒गृही॑तो य॒ एष तप॑तीति॒ तस्मा॑त्स॒द्यः- क्रियो॒ऽश्वः श्वेतो दक्षि॑णा ॥१९॥ तस्य रु॒क्मः पु॒रस्ता॑द्भवति । तदे॒तस्य रू॒पं क्रि॑- यते॒ य एष तप॑ति॒ यद्यश्वं॑ श्वे॒तं न वि॒न्देदपि गौरै॒व श्वेतः॑ स्यात्तस्य रु॒क्मः पु॒र- स्ता॑द्भवति तदे॒तस्य रू॒पं क्रि॑यते॒ य एष तप॑ति ॥२०॥ तेभ्यो ह वा॒चुक्रोध । के- न मदैष॒ श्रेया॒न्बन्धु॑ना॒३ केना३ यदे॒तं प्रत्य॑ग्रहीष्ट॒ न मामि॑ति॒ सा हैभ्यो॒ऽपचक्रा-

कां० ३, अ० ५, ब्रा० १, कं० १०-२१ शतपथब्राह्मण / ४१७ है ॥१०॥ यह पीछे चौड़ी क्यों होती है ? स्त्रियों की प्रशंसा करते हैं कि इनकी श्रोणी (पिछला भाग) चौड़ी है । पिछले भाग के चौड़े होने से कोख बड़ी हो जाती है । कोख से ही सब प्रजा उत्पन्न होती है ॥११॥ उत्तर वेदी यज्ञ की नाक है। यह ऊपर को उठी होती है इसीलिए इसका नाम 'उत्तर वेदी' है ॥१२॥ पहले दो प्रकार की प्रजा थी—आदित्य और अंगिरा । सबसे पहले अंगिरों ने यज्ञ का आरम्भ किया और अग्नि से बोले, 'आदित्यों से कह दो कि कल हमारे सोम-भाग में शामिल हों' ॥१३॥ आदित्य बोले, 'ऐसी तरकीब करो कि अंगिरा लोग हमारे यज्ञ में आवें, न कि हम उनके में' ॥१४॥ उन्होंने कहा, 'इसकी तरकीब केवल यज्ञ ही हैं। हम दूसरा सोम-यज्ञ करें।' उन्होंने यज्ञ की सामग्री इकट्ठी की, "हे अग्नि, तूने तो हमको कल के सोम-याग का बुलावा दिया है, हम तो तुझको और अंगिरों को आज के ही सोम-याग का न्योता देते हैं। तू हमारे लिए होता बन' ॥१५॥ उन्होंने किसी को अंगिरों के पास भेजा । परन्तु अंगिरों ने अग्नि का पीछा किया और इस पर क्रुद्ध होकर बोले कि जब तू हमारा दूत थी तो तूने हमारा आदर क्यों नहीं किया ॥१६॥ उसने कहा कि 'अनिन्द्य' अर्थात् निर्दोष लोगों ने मेरा वरण किया । निर्दोषों से वरी जाकर मैं उनका कहना टाल न सकी।' इसलिए अगर कोई निर्दोष मनुष्य किसी (होता) का वरण कर ले तो उसको इनकार नहीं करना चाहिए। तब अंगिरों ने आदित्यों के सोमयाग को उसी दिन कराया । उसका नाम है 'सद्यः-क्री' ॥१७॥ उन्होंने उनको वाणी की दक्षिणा दी। उन्होंने उस (वाणी) को स्वीकार नहीं किया, क्योंकि यदि इसे स्वीकार करेंगे तो हमको हानि होगी। इसलिए यज्ञ पूर्ण नहीं हुआ क्योंकि उसमें दक्षिणा की कमी रह गई ॥१८॥ इस पर वे दक्षिणा के लिए उनके पास सूर्य को लाये । उन्होंने सूर्य को स्वीकार कर लिया । इसीलिए अंगिरा लोग कहते हैं, 'हम याज्ञिक होने के योग्य हैं; हम दक्षिणा लेने के योग्य हैं। यह जो तपता है अर्थात् सूर्य, उसका हमने ग्रहण किया है।' इसलिए 'सद्यः-क्री' यज्ञ की दक्षिणा सफेद घोड़ा होता है ॥१९॥ इस घोड़े के आगे एक सोने का आभूषण होता है। इस प्रकार वह उसका प्रतिरूप हो जाता है जो ऊपर तपता है (अर्थात् सूर्य) ॥२०॥ अब वाणी उनसे नाराज हो गई—'वह मुझसे किस बात में अच्छा है ? उन्होंने उसको क्यों स्वीकार किया, मुझे क्यों न स्वीकार किया ?' ऐसा कहकर वह वहाँ से चली गई। और

४१८ शतपथ ब्राह्मण

म्॒ सो॒भया॒नन्त॒रेण॑ दे॒वासु॒रात्स॑य॒त्ताꣳत्सि॒ꣳही भू॒त्वाऽद॑दाना चचार॒ तामुपै॑व दे॒वा अ॑- मन्त्र॑यन्तो॒पासु॑रा अ॒ग्निरे॒व दे॒वानां॑ दू॒त आस॒ सह्र॑क्षा इ॒त्यसु॑ररक्षस॒मसु॑राणाꣳ ॥२१॥ सा दे॒वानु॒पाव॑र्त्ते॒त्यु॑वाच । यद्व॑ उपा॒ब्रवै॑यं॒ किं मे॒ ततः॑ स्या॒दिति॒ पूर्व्व॑मेव॒ त्वयि॑- राहु॑तिः॒ प्राप्स्यती॒त्यथ॒ हैषा॑ दे॒वानु॑वाच॒ यां मया॒ कां चाशि॑ष॒माशा॑सि॒ष्यध्वे॒ सा वः॑ सर्व्वा॒ समृ॑धिष्यत॒ऽइति॒ सैवं दे॒वानु॒पाव॑वर्त्त ॥२२॥ स य॒द्धार्य्य॑माणे॒ऽग्नौ॑ । उत्त॑रवे- दिं॒ व्याधा॑रयति॒ यद्वै॒वैना॑म॒दो दे॒वा अ॑ब्रुवन्पूर्व्वी॒ त्वय्ये॒राहु॑तिः॒ प्राप्स्यतीति॒ तद्द्॒वै- नामे॒तत्पूर्व्वा॑मग्रे॒राहु॑तिः प्राप्नोति॒ वाग्ये॒षा नि॒दाने॒नाथ॒ यदु॑त्तरवे॒दिमु॑प॒किर॑ति य॒- ज्ञस्यै॒व सर्व॑त्वाय॒ वाग्धि य॒ज्ञो वाग् ध्येषा॒ ॥२३॥ तां वै यु॒गश॒म्येन॒ विमि॑मीते । यु॒गेन॒ यत्र॒ हर॑न्ति॒ शम्य॑या॒ यतो॒ हर॑न्ति यु॒गश॒म्येन॒ वै यो॒ग्यं यु॑ञ्जन्ति॒ सा यद्दे॒वाद्ः सिꣳही॒ भूत्वा॒शान्ताव॑चर॒त्तद्द्॒वैना॑मे॒तद्य॒ज्ञे यु॑नक्ति ॥२४॥ तस्मा॑न्निवृ॒त्तद॑क्षिणां॒ न प्र॒तिगृ॑ह्णीयात् । सिꣳही॒ ह्येनं॒ भूत्वा॒ क्षिणो॑ति॒ नो हा॑माकुर्व्विति सिꣳही॒ ह्यै॒वैनं॒ भू- त्वा॒ क्षिणो॑ति॒ नो हान्य॑स्मै दद्याद्य॒शं तद॒न्यत्रा॒त्मनः॑ कुर्व्विति॒ तस्मा॒द्योऽस्यापि॑ पा- प॒-इव॑ समा॒नबन्धुः॑ स्या॒त्तस्मा॒ऽएनां॑ दद्या॒त्स यद्ददा॑ति॒ तदेनꣳ॑ सिꣳही॒ भूत्वा॒ न क्षिणो॑ति॒ यड्ड॑ समा॒नब॑न्धवे॒ ददा॑ति॒ तडु॒ नान्यत्रा॒त्मनः॑ कुरुत॒ऽएषो॑ निवृ॒त्तद॑क्षि- णा॒यै प्रति॑ष्ठा ॥२५॥ अथ॒ शम्यां॑ च॒ स्फ्यं चा॑दत्ते । तय्य॒ एष पूर्व्वार्धः॑ उत्तरा॒र्धः॑ शङ्कु॒र्भव॑ति॒ तस्मा॒त्प्रत्य॑ङ् प्र॒क्राम॑ति॒ त्रीन्वि॑क्र॒मांस्तच्चा॑त्वालं॒ परि॑लिखति॒ सा चा॑वा- लस्य॒ मात्रा॒ नात्र॒ मात्रा॑स्ति॒ यत्रै॒व स्वय॑म् मनसा॒ मन्ये॒ताग्रे॑णोत्क॒रं तच्चा॑त्वालं॒ प- रि॒लिखे॑त् ॥२६॥ स वे॒द्यन्ता॑त् । उ॒दीचीꣳ॑ श॒म्यां निद॑धाति॒ स परि॑लिखति त- प्तायनी मेऽसीतीमामे॒वैतदा॑हास्यान हि तप्त इति॒ ॥२७॥ अथ॑ पु॒रस्ता॑त् । उ॒दीचीꣳ॑ श॒म्यां निद॑धाति॒ स परि॑लिखति वित्तायनी मेऽसीतीमामे॒वैतदा॑हास्यान हि वि- विदान॒ इति॑ ॥२८॥ अथा॑नुवे॒द्यन्त॑म् । प्राचीꣳ॑ श॒म्यां निद॑धाति॒ स परि॑लिखत्य- वतान्मा नाथितेतीमामे॒वैतदा॑ह॒ यत्र॒ नायेत॑न्मावता॒दिति॑ ॥२९॥ अथो॑त्त॒रतः॑ ।

कां० ३, अ० ५, ब्रा० १, कं० २१-३० शतपथब्राह्मण / ४१६ सिंहिनी बनकर उन दोनों देव और असुरों के बीच में जो कुछ मिला उसको खाने लगी। देवों ने उसको बुलाया और असुरों ने भी। देवों का दूत 'अग्नि' था और असुर-राक्षसों का 'सह- रक्षा' ॥२१॥ देवों के पास आने की इच्छा करती हुई वह बोली, 'यदि मैं तुम्हारी ओर आ जाऊँ तो मुझे क्या मिलेगा ?' 'तेरे लिए अग्नि से भी पूर्व आहुति मिलेगी।' तब उसने देवों से कहा, 'तुम मेरे आशीर्वाद द्वारा जो चाहोगे वह तुमको प्राप्त होगा।' अतः वह देवों के पास चली गई ॥२२॥ इसलिए उत्तर वेदी में अग्नि का आधान करके जब वह आहुति देता है तो वह आहुति वाणी को अग्नि से भी पूर्व पहुँच जाती है, क्योंकि देवों ने कहा था कि तुझे अग्नि से पहले ही आहुति पहुँच जाया करेगी, क्योंकि जो उत्तर वेदी है वह वस्तुतः वाणी ही है। यह जो उत्तर वेदी को बनाता है वह यज्ञ की पूर्णता के लिए ही बनाता है। वाणी ही यज्ञ है। वाणी ही यह उत्तर वेदी है ॥२३॥ वह उस वेदी को युग और शम्या से नापता है—युग से उस स्थान को जहाँ मिट्टी लाते हैं, और शम्या से उस स्थान को जहाँ से मिट्टी लाते हैं। (शायद युग का अर्थ है डण्डा या जुआ और शम्या का कील ?) क्योंकि बैलों को जुए और कील से जोता जाता है। चूँकि वह सिंहिनी बनकर अशान्ति से विचरती रही, इसलिए वह उसको यज्ञ में जोतता (बांधता) है ॥२४॥ इसलिए तिरस्कृत दक्षिणा को न ग्रहण करना चाहिए (अर्थात् यदि एक ऋत्विज् दक्षिणा न ले तो उस दक्षिणा को दूसरा ऋत्विज न ले), नहीं तो वह सिंहिनी बनकर हानि पहुँचाती है। न (यजमान) उसे घर वापस ले जाये, क्योंकि सिंहिनी होकर वह उसे हानि पहुँचाती है। वह न किसी दूसरे को दे, नहीं तो अपने यज्ञ को दूसरे का बना देगा। यदि उसका कोई पापी रिश्तेदार हो उसे दे दे। तब वह सिंहिनी होकर हानि न पहुँचायेगी। और चूँकि वह अपने ही रिश्तेदार को देता है इसलिए यज्ञ को अपने से अलग नहीं करता। तिरस्कृत दक्षिणा का यही निर्णय है ॥२५॥ अब वह शम्या और स्फ्या को लेता है। जहाँ पूर्वार्ध की उत्तरी कील (शंकु) होती है वहाँ से तीन पग पीछे की ओर भरता है और वहाँ 'चात्वाल' का चिह्न बना देता है। चात्वाल की मात्रा वही होती है जो उत्तर वेदी की। और कोई मात्रा नहीं है। जहाँ उसका मन चाहे उत्कट अर्थात् कूड़े के चात्वाल बना दे ॥२६॥ वह वेदी के अन्त से उत्तर की ओर शम्या को रखता है और रेखा खींच देता है इस मन्त्र को पढ़कर—"तप्तायनी मेऽसि" (यजु० ५।६)—"मेरे लिए तू वह स्थान है जहाँ पीड़ित लोग सहारा पाते हैं।" इससे तात्पर्य इस भूमि से है जिस पर वह पीड़ित होकर चलता है ॥२७॥ अब वह आगे की ओर उत्तर को शम्या रखता है और रेखा खींचता है, यह पढ़कर— "वित्तायनी मेऽसि" (यजु० ५।६)—"तू मेरा धन का स्थान है।" इससे तात्पर्य इस भूमि से है क्योंकि यहीं वह धन प्राप्त करके चलता है ॥२८॥ अब वह वेदी के किनारे पर पूर्व की ओर शम्या रखता और रेखा खींचता है, यह पढ़- कर—"अवतान् मा नाथितात्" (यजु० ५।६)—"मुझे दरिद्रता से बचा।" इससे भूमि से तात्पर्य है अर्थात् जहाँ-जहाँ दरिद्रता हो वहाँ से मुझे बचा ॥२९॥ अब वह उत्तर की ओर पूर्व को शम्या रखता है और रेखा खींचता है यह मन्त्र पढ़कर-

४२० शतपथ ब्राह्मण प्राचीᳵ शम्यां नि॒दधा॑ति स प॒रिलि॑ख्य॒त्रतान्मा व्यथि॑ता॒दिती॒मामे॒वैतदा॑ह॒ यत्र॑ व्यथे॒तन्मावता॒दिति॑ ॥ ३०॥ अथ हरति । यत्र॒ हर॑ति॒ तद॒ग्नीडुप॑सीदति॒ स वा॒ऽअ॒- ग्नीनामेव॒ नामा॑नि गृ॒ह्वन्हर॑ति यान्वा॒ऽअ॒मून्ये॒वा अग्रे॒ऽग्नीन्होत्राय॒ प्रावृ॑णत ते प्राध॑न्वंस्त॒ऽइमा॒ एव॒ पृथिवीमुप॑सर्पन्न्नि॒मामिव॒ ह्ये॒ऽअस्याः पू॒रे तेनै॒वैता॒न्निदा॑नेन हर॑ति ॥ ३१॥ स प्रहरति । वि॒देद॒ग्निर्नभो॒ नामाग्ने॑ऽअङ्गिर॒ आयु॑ना॒ नाम्नेति॑ स यत्प्राध॑न्वंस्तदायुर॑धाति॒ तत्स॒मीर॑यति॒ यो॒ऽस्यां पृ॑थिव्या॒मसीति॒ यो॒ऽस्यां पृ॑थिव्या- मसी॑ति कृत्वा नि॒दधा॑ति प॒त्तेऽना॑धृष्टं॒ नाम॑ य॒ज्ञियं॒ तेन॑ वाध॒ध्वेति प॒त्तेऽना॑धृष्टᳵ ॒रक्षोभिर्नाम॑ य॒ज्ञियं॒ तेन॑ वाध॒ध्वेत्ये॒वैतदा॑हा॒नु वा देव॒वीतय॒ऽइति चतु॒र्थᳵ हर- ति दे॒वेभ्य॑स्त्वा जु॒ष्टाᳵ हरामीत्ये॒वैतदा॑ह॒ तां वै च॑तुःस्र॒क्तिंश्वा॑वालाद्धरति च॒तस्रो वै दिश॑ः सर्वाᳵभ्य ए॒वैनमेतद्दि॒ग्भ्यो हर॑ति ॥ ३२॥ अथानु॒व्यूह॑ति । सि॒ꣳह्य॑सि स- प॒त्नसाही॑ दे॒वेभ्य॑ः कल्प॒स्वेति सा यद्देवा॒दः सि॒ꣳही॑ भू॒त्वाशा॑न्तेवाचर॒त्तद्धै॒वैनामेत- दा॑ह सि॒ꣳह्य॑सीति सपत्नसाहीति॒ वया॒ वयꣳ स॑प॒त्नान्यापो॑यसः क्रि॒यास्मेत्ये॒वैतदा॑ह दे॒वेभ्य॑ः कल्प॒स्वेति योषा वा॒ऽउत्तर॑वेदि॒स्तामे॒वैतद्दे॒वेभ्य॑ः कल्पयति ॥ ३३॥ तां वै यु॑गमा॒त्रीं वा स॑र्व॒तः करो॑ति । यज॑मानस्य वा द॒श-द॑श प॒दानि॑ दशाक्षरा॒ वै वि॒राड्वै वि॒राड्य॒ज्ञो म॑ध्ये नाभिकामिव करोति समा॒नन्नासीनो॒ व्याधा॑रया- णीति॑ ॥ ३४॥ तामद्भि॒रभ्यु॑क्षति । सा॒ यद्देवा॒दः सिꣳही भू॒त्वाशा॑न्तेवाचर॒त्तन्नि॒राप- स्ताम॒द्भिः श॑मयति॒ योषा वा॒ऽउत्तर॑वेदि॒स्तामे॒वैतद्दे॒वेभ्यो॑ हिन॒द्मि तस्मा॑दद्भि॒रभ्यु॑- क्षति ॥ ३५॥ सोᳵऽभ्यु॑क्षति । सि॒ꣳह्य॑सि स॒पत्नसाही॑ दे॒वेभ्य॑ः शुन्ध॒स्वेत्य॑थ सि॒कता- भिरनु॑वि॒किर॒त्यल॑ङ्कारो॒ न्वेव सि॑कता भ्रातृव्य॒ऽइव हि सि॑कता अ॒ग्नेर्वाऽए॒तद्वैश्या- नर॒स्य भस्म॒ यत्सि॑कता अ॒ग्निं वा॒ऽअस्यामाधास्यन्भव॑ति॒ तथो है॑नाम॒ग्निर्न॑ हिन॒स्ति त॒स्मात्सि॑कताभि॒रनु॑वि॒किर॑ति॒ सोᳵनु॑वि॒किर॑ति सि॒ꣳह्य॑सि सपत्नसाही दे॒वेभ्य॑ः शु- म्भस्वेत्यथेनां छादयति सा हूनैताᳵ रात्रिं वसति ॥ ३६॥ ब्राह्मणम् ॥ १[५.१] ॥ ॥

कां० ३, अ० ५, ब्रा० १, कं० ३०-३६ शतपथब्राह्मण / ४२१ “अवतान् मा व्यथि॒तात्” (यजु० ५।६) – “मुझे व्यथा से बचा ।” इससे भी भूमि से तात्पर्य है अर्थात् 'जहाँ कहीं व्यथा हो वहाँ से बचा' ॥३०॥ अब वह स्फ्या को फेंकता है। जहाँ स्फ्या को फेंकता है वहाँ आग्नीध्र बैठता है। जब वह फेंकता है तो अग्नियों के नाम लेता जाता है। देवों ने जिन अग्नियों को पहले होत्र के लिए चुना था वे चली गईं और पृथिवी में घुस गईं-एक इस पृथिवी में और दो उनमें जो इससे परे हैं। वह उस अग्नि के साथ फेंकता है जो इस (पृथिवी) में घुसी थी ॥३१॥ वह इस मन्त्र को पढ़कर फेंकता है- “वि॒देद॒ग्निर्नभो॒ नामाग्नेऽअ॒ङ्गिर॒ऽआयु॑ना नाम्ना एहि” (यजु० ५।६) – “नभ नामवाली अग्नि तुझे जाने, हे अङ्गिरा अग्नि, आयु नाम के साथ जा ।” जिस आयु से वे गुजर गये उस आयु को दिलाता है। फिर प्राणों से सम्पन्न करता है। नीचे लिखे मन्त्रांश से मिट्टी उठाता है - “योऽस्यां पृथिव्यामसि” (यजु० ५।६) – और नीचे के मन्त्रांश से उस मिट्टी को उत्तर वेदी में रखता है - “यत्ते॒ऽनाधृ॑ष्टं नाम॑ य॒ज्ञियं॒ तेन॑ त्वा दधे” (यजु० ५।६) – “जो तेरा आदर का नाम हो उससे तुझको रखता हूँ ।” इससे उसका तात्पर्य यह है कि मैं तुझको उस नाम से रखता हूँ जिसे राक्षसों ने अपमानित नहीं किया। इस मन्त्रांश से चौथी बार लेता है—"अनु॑ त्वा दे॒ववी॑तये” (यजु० ५।६) – “देवों की प्रसन्नता के लिए तुझको ।” इससे तात्पर्य है कि तुझसे देव प्रसन्न हैं। इसको वह चौकोर चत्वाल से लेता है। चार दिशाएँ हैं। अर्थात् वह चारों दिशाओं से लेता है ॥३२॥ अब वह मिट्टी को इस मन्त्रांश से अलग करता है - “सिँ॒ह्यसि सपत्नसाही देवेभ्यः कल्पस्व” (यजु० ५।१०) – “तू सिंहिनी है। शत्रुओं पर विजयिनी। देवों के योग्य बन ।” चूंकि वह पहले सिंहिनी बन गई और अशान्त विचरती रही, इसलिए वह उसको कहता है, 'तू सिंहिनी है।' 'शत्रुओं पर विजयिनी' से तात्पर्य है कि 'तेरे द्वारा हम अपने शत्रुओं पर विजय पावें।' 'देवों के योग्य बन' अर्थात् उत्तर वेदी स्त्री है, उसको देवों के योग्य बनाता है ॥३३॥ वे इसको चारों ओर से या तो 'युग' के बराबर बनाता है या यजमान के दस-दस पद के बराबर । विराट् छन्द दश अक्षर का होता है। विराट् वाणी है और वाणी यज्ञ है। बीच में नाभि के समान है कि एक ही स्थान पर बैठा-बैठा आहुति दे सकूँ ॥३४॥ वह इसे जल से सींचता है। चूंकि वह सिंहिनी होकर अशान्त विचरती रही, अतः जल शान्ति है, इसलिए वह उसको जल से शान्त करता है। उत्तर वेदी स्त्री है। वह इसको देवों के योग्य बनाता है, इसलिए वह उसको जल से सींचता है ॥३५॥ वह यह मन्त्रांश पढ़कर जल सिंचन करता है— “सिँ॒ह्यसि सपत्नसाही देवेभ्यः शुन्धस्व” (यजु० ५।१०) – “तू सिंहिनी है, शत्रुओं पर विजयिनी, देवों के लिए पवित्र बन ।” अब वह रेत डालता है। रेत अलंकार है क्योंकि रेत चमकता है। रेत अग्नि वैश्वानर की भस्म है। अब वह इस पर अग्नि रखेगा, इसलिए अग्नि उसको हानि नहीं पहुँचाता। इसलिए वह उस पर रेत डालता है। इस मन्त्रांश को पढ़कर - “सिँ॒ह्यसि सपत्नसाही देवेभ्यः शुम्भस्व” (यजु० ५।१०) “तू सिंहिनी है, शत्रुओं पर विजयिनी, देवों के लिए सज ।” अब वह उसे ढक देता है। वह रात- भर ढकी रहती है ॥३६॥

अध्याय-५, ब्राह्मण-२

इ॒ध्मम॒भ्याद॑धाति । उप॒यमनी॒रुप॑कल्पयन्त्या॒ज्यम॒धिश्रयति स्रुवं च॒ स्रुचं॑ च संमा॒- र्ष्ट्योत्यू॒र्ध्व्याभ्यं॑ पञ्चगृहीतं गृ॑ह्णीते यदा प्रदी॑प्त इध्मो भव॑ति ॥ १॥ अथो॒द्यच्छ॑ती- ध्मम् । उप॒यम॒न्युप॑यमन॒ीरथाह्वाग्नये॒ प्रह्रिय॑माणाय॒ानुब्रू॒ह्येक॑स्फ्यया॒नूदे॑हीत्यनूदे॑ति प्रतिप्रस्थातैक॑स्फ्ययतस्मान्मध्यमाद्गोर्य एष वेदे॑र॒र्धनार्थे भव॑ति तद्यद्देवा॒त्रातः॑पा- तेन गार्हपत्यस्य॒ वेदेर्व्यव॑च्छिन्नं॒ भव॑ति तद्द्वैवैतद॒नुसंत॑नोति ॥ २॥ तद्वैके॑ । श्रोत्त- रवेदे॒रनूद्याय॑न्ति तदु॒ तथा न कुर्या॒द्धैवैतस्मान्मध्यमाद्गोरनू॑द्याया॒त्प्रायस्या॒गच्छ॑त्यु- त्त॒रवेदिम् ॥ ३॥ ॥ शतम् १८०० ॥ ॥ प्रोक्षणी॑र॒ध्वर्युराद॑त्ते । स पु॒रस्ता॑देवाग्रे प्रो- क्षत्युदङ् तिष्ठ॑न्निन्द्रघोष॒स्त्वा वसु॑भिः पुरस्तात्पात्वितीन्द्रघोष॒स्त्वा वसु॑भिः पुर॒स्ता- द्गोपायत्वित्ये॒वैतदाह ॥ ४॥ अथ पश्चात्प्रोक्ष॑ति । प्रचेतास्त्वा रु॒द्रैः प॒श्चात्पात्विति प्रचेतास्त्वा रु॒द्रैः पश्चा॑द्गोपायत्वित्ये॒वैतदाह ॥ ५॥ अथ दक्षिण॒तः प्रोक्ष॑ति । मनो॑- जवास्त्वा पितृभि॑र्दक्षिण॒तः पात्विति मनोजवास्त्वा पितृभि॑र्दक्षिण॒तो गोपायत्वित्ये- वैतदाह ॥ ६॥ अथोत्तर॒तः प्रोक्ष॑ति । विश्व॑कर्मा त्वादि॒त्यैरुत्तर॒तः पात्विति विश्व॑- कर्मा त्वादि॒त्यैरुत्तर॒तो गोपायत्वित्ये॒वैतदाह ॥ ७॥ अथ याः प्रोक्षण्यः परिशिष्य॑- न्ते । तद्येऽएते पूर्व्वे सक्ती तयो॑र्या द॑क्षिणा ता मन्तेन बहिर्वेदि निनयतीदम॒हं ततं॒ वार्बल्बि॑थीं य॒ज्ञात्रिःसृ॑जामीति सा यद्वैवाहुः सिञ्ची भूवाशान्तेवा॒चरत्ता॒मेवा- स्या एतच्छं॑ ब॒हिर्धा य॒ज्ञात्रिःसृ॑जति य॒द्वि नाभिचरे॒द्यद्यु॑ऽअभिचरे॒दादिशे॑दिदम॒हं ततं॒ वारमुम॑भि निःसृ॑जामीति तमेतया॑ शु॒चा विध्यति स शौचंन्नेवामं लोकमेति ॥ ८॥ स य॒द्धार्य॑माणेऽग्नौ । उत्तरवेदिं॒ व्याघा॑रयति य॒द्वैवैनामदो देवा अब्रुवन्पूर्वा त्वयि॒राहु॑तिः प्राप्स्यतीति तद्द्वैवैनामितत्पूर्वाम॒ग्नेराहु॑तिः प्राप्नोति यद्देषा देवा॒नब्र- वोद्यां मया कां चाशिषमाशासिष्यध्वे सा वः सर्वा सम॑र्धिष्यत॒ऽइति तस्मि॒न्यत्रा ऽर्त्विजो यज॑मानायाशिष॒माशा॑सते सास्मै सर्वा समृ॑ध्यते ॥ ९॥ तद्द्वाऽए॒तदेकं कुर्व- न्द्वयं॑ करोति । यदु॑त्तरवेदिं व्याघा॒रयत्यथ यैषां म॒ध्ये नाभि॑केव भव॑ति तस्यै ये

कां० ३, अ० ५, ब्रा० २, क० १-१० शतपथब्राह्मण / ४२३ अध्याय ५-ब्राह्मण २ वे (आहवनीय अग्नि पर) समिधाएँ रखते हैं। और उपयमनी (नीचे की तह जो बालू डालकर बनाई जाती है) बनाते हैं। (अध्वर्यु) [गार्हपत्य अग्नि पर] घी रखता है। स्रुवा और स्रुक् दोनों को माँजता है, और घी को छानकर उसमें से पाँच चम्मच (स्रुक् में) लेता है। जब अग्नि प्रज्वलित हो जाती है तो—॥१॥ जलती समिधा को उठाकर उपयमनी पर रखते हैं। अब वह (होता से) कहता है, 'अग्नि को लिये जाते हैं, इसके लिए स्तुति कर।' और (प्रतिप्रस्थाता से) कहता है कि 'एक स्फ्या को लेकर उसके पीछे-पीछे आ।' प्रतिप्रस्थाता एक स्फ्या को लेकर उसके पीछे-पीछे चलता है, वेदी के निचले भाग की बीच की कील तक। उस बीच की कील ने गार्हपत्य का जितना भाग वेदी से अलग कर दिया उसको जोड़ देता है ॥२॥ कुछ लोग उत्तर वेदी तक पीछे-पीछे जाने के पक्ष में हैं, परन्तु ऐसा न करना चाहिए, केवल मध्य की कील तक जाना चाहिए। वे आते हैं और उत्तर वेदी तक पहुँच जाते हैं॥३॥ [शतम् १८००] अध्वर्यु प्रोक्षणी ले लेता है। वह आगे उत्तर की वेदी को सींचता है, दक्षिण की ओर उत्तराभिमुख खड़ा होकर और यह मन्त्र बोलकर—"इन्द्रघोषस्त्वा वसुभिः पुरस्तात् पातु” (यजु० ५।११)—"इन्द्र का शोर वसुओं के साथ तेरी रक्षा करे।" यही उसका तात्पर्य है ॥४॥ अब वह पीछे की ओर जल सींचता है इस मन्त्र को पढ़कर—"प्रचेतास्त्वा रुद्रैः पश्चात्पातु" (यजु० ५।११)—"बुद्धिमान् लोग रुद्रों के साथ पीछे की ओर तेरी रक्षा करें।" इसका तात्पर्य यह है कि बुद्धिमान् लोग रुद्रों के साथ पीछे से तेरी रक्षा करें ॥५॥ अब दक्षिण की ओर जल-सिंचन करता है इस मन्त्र को पढ़कर—"मनोजवास्त्वा पितृ- भिर्दक्षिणतः पातु" (यजु० ५।११)—"तीव्र मनवाले पितरों के साथ दक्षिण की ओर तेरी रक्षा करें।" इसका तात्पर्य यह है कि तीव्र मनवाले पितरों के साथ दक्षिण की ओर तेरी रक्षा करें ॥६॥ अब उत्तर की ओर जल-सिंचन करता है इस मन्त्र को पढ़कर—"विश्वकर्मा त्वादित्यै- रुत्तरतः पातु" (यजु० ५।११)—"विश्वकर्मा आदित्यों के साथ उत्तर की ओर तेरी रक्षा करें।" इसका तात्पर्य है कि विश्वकर्मा उत्तर की ओर आदित्यों के साथ तेरी रक्षा करें ॥७॥ प्रोक्षणी पात्र में जो पानी बच रहता है उसको वह वेदी के बाहर जहाँ उत्तर वेदी के दो पूर्व कोने हैं उनमें से दक्षिणी कोने के पास फेंक देता है यह मन्त्र पढ़कर—"इदमहं तप्तं वार्बहिर्धा यज्ञान्निःसृजामि" (यजु० ५।११)—"इस गर्म जल को मैं यज्ञ के बाहर निकालता हूँ।" चूंकि वह वाणी सिंहिनी बनकर अशान्त फिरती रही, उसके उस शोक को इस प्रकार यज्ञ से निकालता है। यदि किसी के विरुद्ध शाप न देना चाहे तो इतना ही कहे, परन्तु यदि शाप देना चाहे तो इतना कहे कि 'अमुक पुरुष के विरुद्ध इस जल को मैं यज्ञ के बाहर निकालता हूँ।' इस प्रकार वह उस पुरुष को उस शोक से बाँधता है और वह शोक से पीड़ित उस लोक को जाता है ॥८॥ वह अग्नि को लेते हुए उत्तर वेदी पर घी क्यों छोड़ता है? इसलिए कि देवों ने पहले ही वाणी से कह दिया था कि अग्नि से पूर्व तुझको आहुति मिलेगी। इसलिए आहुति अग्नि से पूर्व ही उस तक पहुँच जाती है। और वाणी ने देवों से जो यह कहा था कि जो कुछ मेरा आशीर्वाद होगा वह सब तुमको प्राप्त होगा, इसीलिए ऋत्विज यजमान के लिए वह सब आशीर्वाद प्राप्त कराते हैं, और उसके लिए इस सब की पूर्ति होती है ॥९॥ यह जो उत्तर वेदी पर घी छोड़ता है वह एक बार छोड़ता हुआ मानो दो बार छोड़ता

अध्याय-५, ब्राह्मण-३

पूर्वे॒ सक्ती॒ तयो॒र्या दक्षि॑णा ॥१०॥ तस्या॒माघा॑रयति । सि॒ञ्च॒न्नसि॒ स्वाहेत्य॑था॒पर॑- योरु॒त्तरस्या॑ꣳ सि॒ञ्चा॒स्यादि॑त्यवनिः स्वाहेत्य॑था॒पर॑यो॒र्दक्षि॑णस्याꣳ सि॒ञ्च॒न्नसि॒ ब्रह्म॑- व॒निः क्ष॒त्रव॑निः स्वाहेति॑ ब॒ह्वी वै य॒ज्ञस्या॑शी॒स्तद्ब्रह्म॑ च क्ष॒त्रं चा॑शास्तऽउ॒भे वी॒- र्ये॑ ॥११॥ अथ॒ पूर्व॑योरु॒त्तरस्या॑म् । सि॒ञ्च॒न्नसि॑ सुप्र॒जाव॑नी रायस्पोष॒वनिः॒ स्वाहे॒- ति॒ तत्प्र॒जामा॑शास्ते॒ यदा॑ह सुप्र॒जाव॑निरिति रायस्पोष॒वनि॒रिति॒ भूमा॒ वै रा॒यस्पो॒- षस्तद्भूमा॑नमा॒शास्ते॑ ॥१२॥ अथ॒ मध्य॒ऽआघा॑रयति । सि॒ञ्च॒न्नस्याव॑ङ् दे॒वान्यज॑मा- नाय॒ स्वाहेति॒ तद्दे॒वान्यज॑मानायावा॒हय॑त्यथ स्रुच॒मुद्य॑च्छति भू॒तेभ्य॒स्त्वेति॑ प्र॒जा वै भू॒तानि॑ प्र॒जाभ्य॒स्त्वेत्ये॒वैतदा॑ह ॥१३॥ अथ॒ परि॑धीन्परि॒दधा॑ति । ध्रुवो॒ऽसि पृ॑थि॒वीं दृꣳहेति॒ मध्य॑मं ध्रुव॒क्षिद॒स्यन्तरि॑क्षं दृꣳहेति॒ दक्षि॑णमच्युत॒क्षिद॑सि॒ दिवं॑ दृꣳहेत्युत्त॑- रम॒ग्नेः पुरी॑षमसीति सम्भा॒रानुप॑निवप॑ति॒ तद्यत्सम्भा॒रा भव॑न्त्ये॒वमे॒वैष सर्व॑वाय ॥१४॥ शरी॑रꣳ है॒वास्य॑ पीतुदा॒रु । तद्यत्पी॑तुदा॒रवाः॑ परि॒धयो॒ भव॑न्ति॒ शरी॑रेणै॒वैन॑मेतत्स- म॒र्धय॑ति कृ॒त्स्नं क॑रोति ॥१५॥ माꣳसं॒ है॒वास्य॑ गुल्गु॒लु । तद्यद्गुल्गु॒लु भव॑ति माꣳसे॑नै॒वैन॑मेतत्स॒मर्ध॑यति कृ॒त्स्नं क॑रोति ॥१६॥ गन्धो॑ ह॒वास्य॑ सुगन्धितेज॒नम् । तद्यत्सु॑गन्धितेज॒नं भव॑ति ग॒न्धेनै॒वैन॑मेतत्स॒मर्ध॑यति कृ॒त्स्नं क॑रोति ॥१७॥ अथ॑ यद्वृ॒क्षे स्तु॒का भव॑ति । वृ॒क्षैर्ह॒ वै वि॒षाणै॑ऽअन्तरेणा॒ग्न्यैरे॑काꣳ रा॒त्रिमु॑वास॒ तद्यद्देवा॑- न्न॒ग्न्यैर्नक्तं॒ तद्दि॒ह्वाय्यस॑द्विति॒ तस्मा॑द्वृ॒क्षे स्तु॒का भव॑ति॒ तस्मा॒द्या शृ॑ङ्गि॒ नेदि॑ष्ठꣳ स्या- त्तामाहि॒द्यादा॑हरे॒युर्य्यु तां न वि॒न्देदु॑पि यामे॒व कां चाह॑रे॒त्तद्यत्परि॑धयो॒ भव॑न्ति गु॒- प्त्यै॒ऽथ॒ यद् दूर॒ऽइव॒ ह्येन॑मुत्तरे परि॒धय॒ आग॒च्छन्ति॑ ॥१८॥ ब्राह्म॒णम् ॥२[५.२]॥ ॥ पु॒रुषो॑ वै य॒ज्ञः । पु॒रुष॒स्तेन॑ य॒ज्ञो यदे॑नं पु॒रुषस्तनु॒तऽए॒ष वै ता॒यमा॑नो या- वाने॑व पु॒रुष॒स्ताव्ा॑न्विधीयते॒ तस्मात्पु॒रुषो॑ य॒ज्ञः ॥१॥ शिर॑ ए॒वास्य॑ हविर्द्धा॒नम् । वैष्णवं दे॑वत॒याथ॒ यद॒स्मिन्त्सोमो॒ भव॑ति ह॒विर्वै दे॒वानाꣳ॒ सोम॒स्तस्मा॑द्धविर्द्धा॒नं नाम॑ ॥२॥ मुख॑मे॒वास्या॑हव॒नीयः॑ । स यदा॑हव॒नीये॒ जुहो॑ति॒ यथा॒ मुख॒ऽआसि-

काँ० ३ अ० ५, ब्रा० २-३, कं० १०-१८ व १-३ शतपथब्राह्मण / ४२५ है। अब जो मध्य में नाभि है उसके जो सामने कोने हैं उनमें जो दक्षिणी कोना है—॥१०॥ उस पर घी छोड़ता है यह पढ़कर—"सिँ॒ह्यसि॒ स्वाहा॑'' (यजु० ५।१२)—"तू सिंहिनी है। स्वाहा।” अब पिछले कोनों में से उत्तरी कोने पर यह पढ़कर—"सिँ॒ह्यस्या॑दित्य॒वनि॑: स्वाहा॑" (यजु० ५।१२)—"तू सिंहिनी है आदित्यों को जीतनेवाली। स्वाहा।” पिछले दो कोनों से दक्षिणी कोने पर यह पढ़कर—"सिँ॒ह्यसि ब्रह्मवनि॑: क्षत्र॒वनि॑: स्वाहा॑'' (यजु० ५।१२)— "तू सिंहिनी है ब्रह्म-तेज को जीतनेवाली, क्षत्र-तेज को जीतनेवाली, स्वाहा।” आशीर्वाद-सम्बन्धी यजुर्वेद के मन्त्र बहुत-से हैं। वह इन दो से ब्राह्मण और क्षत्रिय के लिए आशीर्वाद देता है, क्योंकि यही दोनों पराक्रम हैं ॥११॥ अब आगे के कोनों में से जो उत्तर का है उस पर—"सिँ॒ह्यसि सुप्रजावनी रायस्पोषवनि॑: स्वाहा॑'' (यजु० ५।१२)—"तू सिंहिनी है अच्छी प्रजा को प्राप्त करनेवाली और धन को प्राप्त करनेवाली। स्वाहा।” 'सुप्रजावनी' का अर्थ है कि सन्तान अधिक हो, 'रायस्पोष' का अर्थ है कि धन का बाहुल्य हो ॥१२॥ अब वह मध्य में घी डालता है यह पढ़कर—"सिँ॒ह्यस्याव॑ह दे॒वान् यज॑मानाय॒ स्वाहा॑'' (यजु० ५।१२)—"तू सिंहिनी है, देवों को यजमान के लिए ला। स्वाहा।” इससे वह देवों को यजमान के पास बुलाता है। अब वह स्रुच को उठाता है यह पढ़कर—"भूतेभ्यस्त्वा॑" (यजु० ५।१२)—"भूतों के लिए तुझको।” 'भूत' का अर्थ है प्रजा। 'प्रजा के लिए' यह तात्पर्य है ॥१३॥ अब वह परिधियों को रखता है, बीच की परिधि को यह मन्त्र पढ़कर—"ध्रु॒वोऽसि॑ पृथि॒वी दृ॑ह” (यजु० ५।१३)—"तू दृढ़ है, पृथिवी को दृढ़ कर।” दक्षिण की परिधि को यह मन्त्र पढ़कर—"ध्रु॒वक्षि॑दस्यन्तरि॑क्षं दृँह" (यजु० ५।१३)—"तू दृढ़ है, अन्तरिक्ष को दृढ़ कर।” उत्तर की परिधि को यह मन्त्र पढ़कर—"अच्यु॑तक्षिदसि॒ दिवं॑ दृँह” (यजु० ५।१३)— "तू दृढ़ है, द्यौलोक को दृढ़ कर।” और इस मन्त्र के सब सामान को उत्तर वेदी में फेंक देता है— "अग्ने॑: पुरी॑षमसि” (यजु० ५।१३)—"तू अग्नि का भोजन (शरीर को पूरा करनेवाला) है।” वह सामान किसलिए है? अग्नि की पूर्ति के लिए ॥१४॥ यह जो पीतु दारु है वह इसका शरीर है। ये जो पीतु दारु की लकड़ियां परिधियां होती हैं, इसलिए वह इन परिधियों के द्वारा उसको शरीर देता है, अर्थात् उसकी पूर्ति करता है ॥१५॥ यह जो गुल्गुल (उसका गोंद) है वह उस (अग्नि) का मांस है। यह जो गुल्गुलु है वह मानो उसको मांस देता है अर्थात् उसकी पूर्ति करता है। (शायद पीतु दारु के गोंद को गुल्गुलु कहते हैं) ॥१६॥ सुगन्धि-तेज उसकी गन्ध है। सुगन्धि-तेज से मानो वह उसे सुगन्धि से सम्पन्न करता है। उसकी पूर्ति करता है ॥१७॥ मेंढे की पूंछ के बाल क्यों होते हैं? (?) अग्नि एक बार एक रात को मेंढे के दो सींगों के बीच में रहा था। वह सोचता है कि अग्नि का जो अंश उसमें था वही यहाँ भी हो, इसलिए मेंढे के बाल होते हैं। इसलिए बालों के उस गुच्छे को काटना चाहिए जो सिर के बिल्कुल पास हो और यदि वह न मिले तो जो मिले वही लावे। परिधियां क्यों होती हैं? अग्नि की रक्षा के लिए। क्योंकि अभी वह समय दूर है जब अगली परिधियां आवेंगी ॥१८॥ अध्याय ५—ब्राह्मण ३ यज्ञ पुरुष है। पुरुष इसलिए है कि इसको पुरुष ही तानता है। तनकर यह उतना ही हो जाता है जितना पुरुष होता है। इसीलिए यज्ञ पुरुष है ॥१॥ हविर्धान अर्थात् सोम ले-जानेवाली गाड़ी का घर सिर है। विष्णु इसका देवता है। और चूंकि इसमें सोम होता है और सोम देवताओं का हवि है, इसलिए इस गाड़ी को हविर्धान कहते हैं ॥२॥ आहवनीय मुख है। इसलिए जब वह आहवनीय में आहुति देता है तो मानो मुख के

४२६ शतपथ ब्राह्मण चे॒दे॒वं तत् ॥ ३॥ स्तूप॒ उ॒वास्य यूपः । बा॒हूऽए॒वास्याग्नीध्री॒यश्च मा॒र्ज्जाली॒यश्च ॥४॥ उ॒दर॒मेवास्य॒ सद॑ः । तस्मात्स॒दसि॑ भक्षयन्ति य॒द्धीदं किं चा॒श्नन्त्यु॒दर॑ऽए॒वैदꣳ सर्वं॑ प्र॒तिति॑ष्ठत्यथ॒ यद॑स्मिन्विश्वे॑ दे॒वा असी॑दंस्तस्मात्स॒दो नाम॒ तऽउ॒ऽए॒वास्मिन्नेते ब्रा॑- ह्म॒णा वि॒श्वगो॑त्राः सीदन्ति ॥५॥ अथ॒ यावे॒तौ ज॒घनेना॒ग्नी । पादा॑वे॒वास्ये॑ता॒वेष वै ता॒यमा॑नो यावा॑नेव पुरु॑षस्तावा॒न्विधी॑यते॒ तस्मा॑त्पुरु॒षो य॒ज्ञः ॥६॥ उ॒भयतो॑- द्वारꣳ हविर्द्धानं॑ भवति । उ॒भयतो॑द्वारꣳ सद॒स्तस्मा॑द॒यं पुरु॑ष श्रा॒त्तꣳ सर्व॑तः प्र॒शा- न्ते हविर्द्धानेऽउप॑तिष्ठते ॥७॥ ते स॒मव॑वर्त्तयति । दक्षि॑णेनैव॒ दक्षि॑णमुत्त॒रेणो

कां० ३, अ० ५, ब्रा० ३, कं० ३-१३ शतपथब्राह्मणं / ४२७ भीतर डालता है ॥३॥ यूप उसके सिर की चोटी है। अग्नीध्रीय और मार्जालीय उसके बाहू हैं ॥४॥ सदः (ऋत्विजों का स्थान) उसका उदर है। इसलिए सदः में ही भोजन करते हैं। इस संसार में जो कुछ खाया जाता है वह सब उदर में ही रखा जाता है। इसको 'सदस्' इसलिए कहते हैं कि इसमें सब देव बैठे थे (आसीदन्), और सब गोत्रों के ब्राह्मण इसी में बैठते हैं ॥५॥ और पिछली जो दो अग्नियां हैं वे पैर हैं। तानने से यज्ञ उतना ही हो जाता है जितना पुरुष है। इसलिए कहा है कि यज्ञ पुरुष है ॥६॥ हविर्धान-गृह के दोनों ओर द्वार होते हैं। सदस् के भी दोनों ओर द्वार होते हैं। इसी प्रकार पुरुष के भी दोनों ओर छिद्र होते हैं। जब हविर्धान धुल जाते हैं तो वह उनमें प्रवेश करता है ॥७॥ वे उनको घुमा देते हैं, दाहिना दक्षिण की ओर और बायां उत्तर की ओर। जो बड़ा होता है वह दाहिना होता है ॥८॥ घुमाये हुए उन पर एक चटाई रखते हैं। यदि चटाई न मिले तो बेत को चीरकर चटाई के समान बना लें ! आगे के द्वार में टट्टी लगाते हैं। दो सीधी टट्टियां खड़ी करके गाड़ियों को उनके बीच में रखते हैं और उनके ऊपर चटाई या बेत का पाल-सा डाल देते हैं ॥६॥ अब वह शाला में जाकर और चार चम्मच घी लेकर सविता की प्रेरणा के लिए आहुति देता है, क्योंकि सविता देवों का प्रेरक है। वह सोचता है कि सविता की प्रेरणा के लिए मैं यज्ञ करूँगा। इसलिए वह सविता के लिए आहुतियां देता है ॥१०॥ वह इस मन्त्र से आहुति देता है—"युञ्जते मनऽउत युञ्जते धियः" (यजु० ५।१४)— "मन को लगाते हैं और बुद्धियों को लगाते हैं।" मन और वाणी से यज्ञ किया जाता है। जब कहता है 'युञ्जते मन' तब मन को लगाता है। जब कहता है 'युञ्जते धियः' तो वाणी को लगाता है, क्योंकि इसी वाणी के द्वारा मनुष्य अपनी-अपनी बुद्धि के अनुसार जीविका कमाते हैं, वेदपाठ द्वारा या बातचीत द्वारा, या गीत गाकर। उन दोनों (मन और बुद्धि) को लगाकर यज्ञ किया जाता है ॥११॥ "विप्रा विप्रस्य बृहतो विपश्चितः" (यजु० ५।१४)—"बड़े ज्ञानी, विप्र के विप्र।" ये जो वेदपाठी विद्वान् ब्राह्मण हैं उनका नाम विप्र है। उन्हीं के विषय में यह कथन है। 'बृहतो विपश्चितः' यह यज्ञ के विषय में है। "वि होत्रा दधे वयुना विदेकऽइत्" (यजु० ५।१४)—"एक वयुनावित् अर्थात् सर्वज्ञ ने ही होताओं का काम निश्चित किया है" [नोट—'वयुनं वेत्तेः कान्तिर्वा प्रज्ञा वा'—यास्क, निरुक्तं ५।१५]—"मही देवस्य सवितुः परिष्टुतिः स्वाहा" (यजु० ५।१४)—"देव सविता की स्तुति बड़ी है।" यह कहकर प्रेरक सविता के लिए आहुति देता है ॥१२॥ अब फिर चार चम्मच घी लेकर शाला के बाहर निकलता है। दक्षिण द्वार से पत्नी को निकालते हैं। दायें हविर्धान के दायें पहिये के मार्ग में सोना रखकर आहुति देता है, यह मन्त्र पढ़कर—"इदं विष्णुर्विचक्रमे त्रेधा निदधे पदम्। समूढमस्य पाँसुरे स्वाहा" (यजु० ५।१५ तथा ऋ० १।२२।१७)—"विष्णु ने इस संसार को पार किया। उसने तीन बार पग रक्खा। यह

स꣡स्रवं पत्न्ये॑ पाणावानय॑ति साक्ष॑स्य संताप॑मुपानक्ति॑ देवश्रुतौ॑ देवेष्वा॒घोष॑तम॒मि- ति॒ प्रह॑रति प्रतिप्रस्थात्रे॑ स्रुचं चाज्य॑विलापनीं च पर्याणय॑ति पत्नीमुभौ॑ जघनेना- ग्नी ॥ १३॥ चतु॑र्गृहीतमा॒ज्यं गृ॑हीत्वा॒ । प्रतिप्रस्थातोत्तरस्य॑ हविर्धान॑स्य दक्षि॑णायां वर्तन्या꣡ हिर॑ण्यं नि॒धाय॑ जुहोतीराव॑ती धेनु॒मती॒ हि भूतं꣡ सूयवसि॑नी॒ मन॑वे दशस्या । व्य॑स्कभ्ना रोद॑सी विष्ण॑वेते दाध॒र्थ पृ॑थि॒वीम॒भितो॑ मयूखैः॒ स्वाहेति स꣡- स्रवं पत्न्ये॑ पाणावानय॑ति साक्ष॑स्य संताप॑मुपानक्ति॑ देवश्रुतौ॑ देवेष्वा॒घोष॑तमिति॒ तद्यु॒देवं॑ जु॒होति॑ ॥ १४॥ दे॒वा ह॒ वै य॒ज्ञं त॑न्वानाः । तेऽसुररक्षसेभ्य आसङ्गाद्वि- भयां चक्रुर्वज्रो वाऽआ॒ज्यं त॒द्य॑देतेन॒ वज्रे॒णाज्ये॑न दक्षिणातो॒ नाष्ट्रा॒ रक्षां꣡स्यवाधं- स्तथैवैषां नियानं नान्व॒वायंस्तथो॑ऽए॒वैष ए॒तेन॒ वज्रे॒णाज्ये॑न दक्षिणातो॒ नाष्ट्रा॒ र- क्षां꣡स्यवधूतै तथैवास्य नियानं नान्व॒वयन्ति तद्यद्वैष्णवीभ्यामृग्भ्यां जुहोति वैष्ण- व꣡ हि ह॒विर्धान॑म् ॥ १५॥ अथ पत्न्यक्षा॑स्य संताप॑मुपा॒नक्ति॑ । प्र॒जनन॑मे॒वैत- त्क्रियते यदा वै स्त्रियै॑ च पुंस॑श्च सं॒तप्य॑तेऽथ रेतः॑ सिच्यते॒ तत्ततः॑ प्र॒जाय॑ते परा॒- गुपा॑नक्ति परा॒ञ्च्ये॑व रेतः॑ सिच्यतेऽथाह ह॒विर्धानाभ्यां॑ प्रवर्त्यमानाभ्या॒मनु॑ब्रूहीति॑ ॥ १६॥ अथ वाच॑यति । प्राची प्रेत॑मध्व॒रं क॑ल्पयन्ती॒ऽइत्य॒धरो॒ वै य॒ज्ञः प्राची॒ प्रेतं य॒ज्ञं क॑ल्पयन्ती॒ऽइत्ये॒वैतदा॒होर्ध्वं य॒ज्ञं न॑यतं॒ मा जि॑ह्वरतमित्यूर्ध्वमिमं य॒ज्ञं दे॑वलो- कं न॑यतमित्ये॒वैतदा॒ह मा जि॑ह्वरतमिति॒ तदे॑तस्मा॒ऽअह्वलामाशाम॑स्ते समुद्गुह्येव॑ प्र॒वर्तेयेयु॒र्यथा॒ नोत्सृ॑र्जेतामस॒र्या वाऽए॑षा वाग्व्यात्तै नेद्दि॒हासु॑री वाग्वदा॒दिति॒ य- द्युत्सृ॑र्जेताम् ॥ १७॥ एतदाच॑क्षीत । स्वं गोष्ठमाव॑दतं देवी दुर्यै॒ आयु॑र्मा निर्वादिष्टं प्रजां मा निर्वादिष्ट॒मिति॒ तस्यो॑ ह्येषा प्रायश्चित्तिः ॥ १८॥ तदाहुः । उ॒त्तरवेदेः प्र- त्यङ् प्रक्रा॑मेत्तीन्विक्रमांस्तद्ध॒विर्धाने॑ स्थापयेत्सा ह॒विर्धा॑नयोर्मात्रेति॒ नात्र मात्रा॑- स्ति यत्रेव॑ स्व॒यं मन॑सा मन्येत नाति॑व सत्रात्यन्ति॑के नो दूरे॒ तत्स्था॑पयेत् ॥ १९॥ तेऽअ॑भिमृशते । अत्र रमथां वर्ष्मन्पृ॑थिव्याऽइति वर्ष्म॑ ह्येतत्पृथिव्यै भवति दि-

कां० ३, अ० ५, ब्रा० ३, कं० १३-२० शतपथब्राह्मण / ४२६ उसकी धूल में लिपटा है। स्वाहा।” जो घी बच रहा उसको पत्नी के हाथ में डाल देता है। पत्नी उसको पहिये के गर्म भाग में मल देती है, यह मन्त्र पढ़कर—“देवश्रुतौ देवेष्वाघोषतम्” (यजु० ५।१७) - “देवों से सुने गये तुम देवों के प्रति घोषणा करो।” अब वह स्रुच और आज्य- पात्र को प्रतिप्रस्थाता को दे देता है। वे पत्नी को दोनों अग्नियों के पीछे होकर ले जाते हैं ॥१३॥ चार चम्मच घी लेकर प्रतिप्रस्थाता उत्तरी हविर्धान के बायें मार्ग में सोना रखकर इस मन्त्र से आहुति देता है— “इरावती धेनुमती हि भूतं॒ सूयवसिनी मनवे दशस्या। व्यस्कम्ना

  • रोदसी विष्णवेते दाधर्त्य पृथिवीमभितो मयूखैः स्वाहा” (यजु० ५।१६, ऋ० ७।६६।३)—“मनुष्य के कल्याण के लिए तुम दोनों अन्नवाले, गायवाले, धान्यवाले हो। हे विष्णु, तूने इन दोनों द्यौ और पृथिवी को अलग-अलग कर और पृथिवी को चारों ओर से किरणों से घेर लिया। स्वाहा।” शेष घी को पत्नी के हाथ में छोड़ता है, और वह उसको गर्म पहिये से मल देती है। यह मन्त्रांश पढ़कर—“देवश्रुतौ देवेष्वाघोषतम्’ (यजु० ५।१७) यह आहुति क्यों देता है? (इसका उत्तर आगे आयेगा) ॥१४॥ एक बार देवों ने यज्ञ का आरम्भ किया। और उनको असुर-राक्षसों के आक्रमण का भय हुआ। घी वज्र है। उस वज्र-घी की सहायता से उन्होंने दक्षिण की ओर से असुरों को हटा दिया, और वे उनके मार्ग में उनके पीछे न आये। इसी प्रकार यह भी असुर-राक्षसों को दक्षिण की ओर से घीरूपी वज्र से हटा देता है। वह इन आहुतियों को विष्णु की दो ऋचाओं से (ऋ० १।२२।१७ और ७।६६।३) क्यों देता है? इसलिए कि हविर्धान विष्णु का है ॥१५॥ पत्नी पहिये को घी क्यों लगाती है? इससे सन्तानोत्पत्ति होती है। जब स्त्री और पुरुष गर्म होते हैं तो वीर्य बहता है। तब उत्पत्ति होती है। वह पहिये को गाड़ी से दूर दूसरी ओर चुपड़ती है। क्योंकि वीर्य दूर ही सींचा जाता है। अब वह होता से कहता है, ‘आगे चलते हुए हविर्धानों के लिए मन्त्र बोल’ ॥१६॥ अब वह (यजमान से) कहलवाता है-“प्राची प्रेतमध्वरं कल्पयन्ती” (यजु० ५।१७)— “तुम दोनों आगे को चलो, अध्वर को बढ़ाते हुए।” ‘अध्वर’ नाम है यज्ञ का। इसका तात्पर्य यह है कि यज्ञ को बढ़ाते हुए आगे चलो। “ऊर्ध्वं यज्ञं नयतं मा जिह्वरतम्” (यजु० ५।१७) - “यज्ञ को ऊपर उठाओ। विचलित मत होने दो।” इससे तात्पर्य है कि यज्ञ को ऊपर देवों के लोक तक उठाओ। ‘इसको विचलित न होने दो’ से तात्पर्य है कि यजमान विचलित न होवें। गाड़ी को ऐसे चलावें कि मानो उठाकर चलाते हैं। पहियों की आवाज न हो, क्योंकि पहियों की आवाज आसुरी होती है। उसका तात्पर्य यह है कि कहीं आसुरी शब्द न हो जाय। और यदि पहियों की आवाज हो तो—॥१७॥ (यजमान से) कहलवावें — “स्वं गोष्ठमावदतं देवी दुर्येऽआयुर्मा निर्वार्दिष्टं प्रजां मा निर्वार्दिष्टम्” (यजु० ५।१७) – “हे गृह-समान दोनों गाड़ियो, अपने गोष्ठ से बात करो। मेरी आयु को मत नष्ट करो, मेरी प्रजा को मत नष्ट करो।” यही इसका प्रायश्चित्त है ॥१८॥ इसके विषय में कहते हैं कि उत्तर वेदी से पश्चिम की ओर तीन पग चले और वहाँ हविर्धान को ठहरा दें। यही उसकी मात्रा है। परन्तु कोई नियत मात्रा नहीं है। जहाँ समझे कि न तो बहुत दूर है न बहुत निकट, वहीं ठहरा दें ॥१९॥ नीचे के मन्त्र से नमस्कार करे— “अत्र रमेथां वर्ष्मन् पृथिव्याः” (यजु० ५।१७)-“तुम

४३० शतपथ ब्राह्मण वि॒ क्वास्याहवनी॑यो भवति॒ नभ्य॑स्ये करोति॒ तद्धि ने॑मस्य रू॒पम् ॥२०॥ अथोत॑- रेण॒ पर्ये॑त्याध॒र्युः । द॒क्षिण॑ꣳ ह॒विर्धान॒मुप॑स्तम्भाति॒ विष्णो॒र्नु कं॑ वी॒र्या॑णि॒ प्र वो॑चं॒ यः पार्थि॑वानि विम॒मे रजा॑ꣳसि । योऽअस्क॑भायदुत्त॒रंꣳ स॒धस्थं॑ विचक्रमा॒णस्त्रेधो- रुगा॒यो विष्ण॑वे त्वेति॒ मेथी॑मुप॑नि॒हन्ती॑त॒रत॑स्त॒तो यद् व॒ मानु॑षे ॥२१॥ अथ प्र- तिप्रस्थाता॑ । उत्त॑रꣳ ह॒विर्धान॒मुप॑स्तम्भाति दि॒वो वा॑ विष्ण॒ऽउ॒त वा॑ पृथि॒व्या म॒- हो वा॑ विष्ण॒ऽउ॒रोर॒न्तरि॑क्षात् । उ॒भा हि ह॑स्ता॒ वसु॑ना पृ॒णस्वा प्र यच्छ॒ दक्षि॑णा॒- दोत् स॒व्याद्विष्ण॑वे त्वेति॒ मेथी॑मुप॑नि॒हन्ती॑त॒रत॑स्त॒तो यद् व॒ मानु॑षे तमृ॒द्वेह्व॑वै॒र्यङ्गु- र्भिरुप॑चरन्ति वैष्ण॒वꣳ हि ह॒विर्धान॑म् ॥ २२॥ अथ मध्य॒मं छ॒दिरुप॑स्पृ॒श्य वा॑चयति । प्र तद्विष्णु॑ स्तवते वी॒र्ये॑ण मृ॒गो न भी॒मः कु॑च॒रो गि॑रि॒ष्ठाः । यस्यो॒रुषु॑ त्रि॒षु वि॒क्र- मणेष्वधिक्षिय॑न्ति॒ भुव॑नानि॒ विश्वेति॒ीदꣳ है॒वास्यैतच्छीर्ष॑कपालं॒ यदि॒दमु॑प॒रिष्टा॒च्छदि॒र- थ्येत॒त्क्षिय॒न्त्यन्या॑नि शीर्ष॑कपाला॒नि तस्मा॑दाहाधिक्षि॒यन्तीति॑ ॥२३॥ अथ रा॒राच्या॒- मुप॑स्पृ॒श्य वा॑चयति । विष्णो॒ रराट॑मसीति लला॒टꣳ है॒वास्यैतदथो॒श्राच्या॒ऽउप॑स्पृ- श्य वा॑चयति विष्णोः॒ श्नप्त्रे॑ स्थ॒ इति॒ सृक्वे॑ है॒वास्यैते॒ऽथ य॒दिदं प॒श्चाच्छ॑दिर्भव- तीदꣳ॑ है॒वास्यैतच्छीर्ष॑कपालं॒ यदि॒दं प॒श्चात् ॥२४॥ अथ ल॒स्यूर्ज॒न्या स्यून्त्यया प्रसी॑- व्यति । विष्णोः॒ स्यूर॑सीत्यथ ग्रन्थिं करोति विष्णोर्ध्रु॒वोऽसी॑ति नेह्य॑वप॒द्याता॒ऽइति॑ तं प्र॒कृते कर्म॒न्विष्य॑ति तथो॒ ह्वाध॒र्युर् वा यज॑मानं वा या॒हो न॑ विन्दति तम॒भिष्ठि- तम॒भिमृ॑शति वैष्ण॒वम॑सीति वैष्ण॒वꣳ हि ह॒विर्धान॑म् ॥२५॥ ब्राह्मणम् ॥ ३ [५.३] ॥ ॥ द्वयं वाऽइदमुपर॑वाः खायन्ते । शिरो॒ वै य॒ज्ञस्य ह॒विर्धानं॒ तद्य॒ऽइमे शी॒र्षन्स॒- ञ्चारः॒ कूपा इ॒माव॑ह॒ द्वाविमौ द्वौ ताने॒वैतत्क॑रोति॒ तस्मा॑दुपर॒वान्खन॑न्ति ॥१॥ दे॒- वाश्च॒ वाऽअसु॑राश्च । उभ॑ये प्राजाप॒त्याः प॑स्पृधिरे । ततो॒ऽसु॑रा ए॒षु लो॒केषु कृ॒त्यां व॒ल्गामभिच॑खु॒रुते॑वं चिद्दे॒वानभिभ॑वे॒मेति॑ ॥२॥ तद्धै दे॒वा अ॑शृण्वत । तऽए॒तैः कृत्या॒ वलगानुद॑खनन्यदा वै कृत्यामुत्खनन्त्यथ सालसा मोघा भवति तथोऽए-

कां० ३, अ० ५, ब्रा० ३-४, कं० २०-२५ व १-३ शतपथब्राह्मण / ४३१ दोनों यहाँ पृथिवी की ऊँचाई पर ठहरो।" यह (उत्तर वेदी ही) ऊँचाई है। आहवनीय द्यौलोक में है। वह उनके नाभि में खड़ी करता है, शान्ति का यही रूप है ॥२०॥ उत्तर की ओर चलकर अध्वर्यु दक्षिणी हविर्धान को ठहराता है यह मन्त्र पढ़कर— “विष्णोर्नु॒ कं वीर्या॑णि॒ प्रवो॑चं॒ यः पार्थि॑वानि विम॒मे रजां॑१॑सि। योऽअस्क॑भाय॒दुत्त॑र॒ स॒धस्थं॑ विचक्रमाणस्त्रेधोरुगायो विष्णवे त्वा” (यजु० ५।१८) - "मैं अब विष्णु के पराक्रम कहता हूँ जिसने पृथिवी के देशों को नापा, जिसने उत्तर के (ऊपरी) स्थान को स्थापित किया, तीन बड़े पग चलकर। विष्णु के लिए मैं तुझे स्थापित करता हूँ।" जहाँ खड़ा किया करते हैं वहाँ से हटकर दूसरी जगह खड़ा करता है ॥२१॥ प्रतिप्रस्थाता उत्तरी हविर्धान को खड़ा करता है यह मन्त्र पढ़कर - "दिवो वा विष्णऽउत वा पृथिव्या महो वा विष्णऽउरोरन्तरिक्षात् । उभा हि हस्ता वसुना पृणस्वा प्रयच्छ दक्षिणादोत सव्यादा विष्णवे त्वा" (यजु० ५।१६)--"हे विष्णु, या तो द्यौलोक से या पृथिवी से या बड़े विस्तृत अन्तरिक्ष से दोनों हाथों से धन को भर और दाईं और बाईं दोनों ओर से दे । विष्णु के लिए तुझको।" वहाँ नियत स्थान से अन्य स्थान पर खड़ा करता है। विष्णु-सम्बन्धी यजुओं को इस- लिए पढ़ता है कि हविर्धान विष्णु की है ॥२२॥ बीच की चटाई को छूकर (यजमान से) कहलवाता है - "प्र तद् विष्णु स्तवते वीर्येण मृगो न भीमः कुचरो गिरिष्ठाः। यस्योरुषु त्रिषु विक्रमणेष्बधिक्षियन्ति भुवनानि विश्वा" (यजु० ५।२०) - "उस विष्णु के पराक्रम के लिए स्तुति करो जो भयानक जन्तु के समान भयानक और पहाड़ी जानवरों के समान भयानक है। जिसके तीन पदों पर सब संसार स्थित है।" यह चटाई उस (छप्पर) की मुख्य शीर्ष कपाल है, क्योंकि इसी पर अन्य कपाल ठहरते हैं। इसीलिए कहा, 'अधिक्षियन्ति' ॥२३॥ अब रराट (टट्टी) को छूकर (यजमान से) कहलवाता है - "विष्णोः रराटमसि" (यजु० ५।२१) - "तू विष्णु का ललाट है।" क्योंकि यह उसका ललाट है। अब दो टट्टियों को छूकर कहलवाता है, "विष्णोः श्नप्त्रे स्थः” (यजु० ५।२१) - "तुम विष्णु के मुंह के किनारे हो।" अब जो पीछे की चटाई है वह इसके पीछे का शीर्ष-कपाल है ॥२४॥ अब लकड़ी की कील से सीता है, यह कहकर - "विष्णोः स्यूरसि" (यजु० ५।२१) - "तू विष्णु की सुई है।" अब गाँठ देता है पढ़कर - "विष्णोर्ध्रुवोऽसि” (यजु० ५।२१)- "तू विष्णु का ध्रुव है।" यह गाँठ इसलिए देता है कि छूट न जाय। जब काम समाप्त हो जाता है तो गाँठ खोल देता है। इस प्रकार न अध्वर्यु को रोग लगता है न यजमान को। जब छप्पर बन जाता है तो कहता है 'वैष्णवमसि' (यजु० ५।२१) - "तू विष्णु का है।" क्योंकि हविर्धान विष्णु का है ॥२५॥ अध्याय ५— ब्राह्मण ४ दो कारण हैं कि छिद्र बनाये जाते हैं। हविर्धान यज्ञ का सिर है। सिर में भी तो चार छिद्र होते हैं, दो यह और दो यह (नाक और कान) । उसी प्रकार से वह भी बनाता है, इसी- लिए छिद्र (उपरव) खोदता है ॥१॥ प्रजापति की दोनों सन्तान देव और असुर लड़ पड़े। असुरों ने इन लोकों में वलग अर्थात् जादू-टोने को गाड़ दिया कि देवों पर विजय पा जावें ॥२॥ अब देव जीत गये । उन्होंने इन्हीं उपरवों की सहायता से टोनों को खोद डाला। जो टोना खोद लिया जाय उसका प्रभाव नहीं रहता । यहाँ भी अगर किसी शत्रु ने टोना गाड़ दिया