भारतकोश
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शिव पुराण

Shiva Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished850 पृष्ठ

४४० * संक्षिप्त शिवपुराण *

रंगका ही धारण किये हुए था। उस महान् आत्मबलसे सम्पन्न कुमारको देखकर ब्रह्माजी ध्यानस्थ हो गये। जब उन्हें ज्ञात हो गया कि ये वामदेव शिव हैं, तब उन्होंने हाथ जोड़कर उस कुमारको प्रणाम किया। तत्पश्चात् उनके विरजा, विवाह, विशोक और विश्वभावन नामके चार पुत्र उत्पन्न हुए, जो सभी लाल वस्त्र धारण किये हुए थे। तब वामदेवरूपधारी परमेश्वर शम्भुने परम प्रसन्न होकर ब्रह्माको ज्ञान तथा सृष्टिरचनाकी शक्ति प्रदान की। (यह ‘वामदेव’ नामक दूसरा अवतार हुआ।)

इसके बाद इक्कीसवाँ कल्प आया, जो ‘पीतवासा’ नामसे कहा जाता था। उस कल्पमें महाभाग ब्रह्मा पीतवस्त्रधारी हुए। जब वे पुत्रकी कामनासे ध्यान कर रहे थे, उस समय उनसे एक महातेजस्वी कुमार उत्पन्न हुआ। उस प्रौढ़ कुमारकी भुजाएँ विशाल थीं और उसके शरीरपर पीताम्बर झलमला रहा था। उस ध्यानमग्न बालकको देखकर ब्रह्माजीने अपनी बुद्धिके बलसे उसे ‘तत्पुरुष’ शिव समझा। तब उन्होंने ध्यानयुक्त चित्तसे सम्पूर्ण लोकोंद्वारा नमस्कृत महादेवी शांकरी गायत्री (तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि)-का जप करके उन्हें नमस्कार किया, इससे महादेवजी प्रसन्न हो गये। तत्पश्चात् उनके पार्श्वभागसे पीतवस्त्रधारी दिव्यकुमार प्रकट हुए, वे सब-के-सब योगमार्गके प्रवर्तक हुए। (यह ‘तत्पुरुष’ नामक तीसरा अवतार हुआ।)

तत्पश्चात् स्वयम्भू ब्रह्माके उस पीतवर्ण नामक कल्पके बीत जानेपर पुनः दूसरा कल्प प्रवृत्त हुआ। उसका नाम ‘शिव’ था। जब एकार्णवकी दशामें एक सहस्र दिव्य वर्ष व्यतीत हो गये, तब ब्रह्माजी प्रजाओंकी सृष्टि करनेकी इच्छासे दुःखी हो विचार करने लगे। उस समय उन महातेजस्वी ब्रह्माके समक्ष एक कुमार उत्पन्न हुआ। उस महापराक्रमी बालकके शरीरका रंग काला था। वह अपने तेजसे उद्दीप्त हो रहा था तथा काला वस्त्र, काली पगड़ी और काला यज्ञोपवीत धारण किये हुए था। उसका मुकुट भी काला था और स्नानके पश्चात् अनुलेपन—चन्दन भी काले रंगका ही था। उन भयंकरपराक्रमी, महामनस्वी, देवदेवेश्वर, अलौकिक, कृष्णपिंगलवर्णवाले अघोरको देखकर ब्रह्माजीने उनकी वन्दना की। तत्पश्चात् ब्रह्माजी उन भक्तवत्सल अविनाशी अघोरको ब्रह्मरूप समझकर इष्ट वचनोंद्वारा उनकी स्तुति करने लगे। तब उनके पार्श्वभागसे कृष्णवर्णवाले तथा काले रंगका अनुलेपन धारण किये हुए चार महामनस्वी कुमार उत्पन्न हुए। वे सब-के-सब परम तेजस्वी, अव्यक्तनामा तथा शिवसरीखे रूपवाले थे। उनके नाम थे— कृष्ण, कृष्णशिख, कृष्णास्य और कृष्णकण्ठधृक्। इस प्रकार उत्पन्न होकर इन महात्माओंने ब्रह्माजीकी सृष्टिरचनाके निमित्त महान् अद्भुत ‘घोर’ नामक योगका प्रचार किया। (यह ‘अघोर’ नामक चौथा अवतार हुआ।)

मुनीश्वरो! तदनन्तर ब्रह्माका दूसरा कल्प प्रारम्भ हुआ। वह परम अद्भुत था और ‘विश्वरूप’ नामसे विख्यात था। उस कल्पमें जब ब्रह्माजी पुत्रकी कामनासे मन-ही-मन शिवजीका ध्यान कर रहे थे, उसी समय महान् सिंहनाद करनेवाली विश्वरूपा सरस्वती प्रकट हुईं तथा उसी

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प्रकार परमेश्वर भगवान् ईशान प्रादुर्भूत हुए, जिनका वर्ण शुद्ध स्फटिकके समान उज्ज्वल था और जो समस्त आभूषणोंसे विभूषित थे। उन अजन्मा, सर्वव्यापी, सर्वान्तर्यामी, सब कुछ प्रदान करनेवाले, सर्वस्वरूप, सुन्दर रूपवाले तथा अरूप ईशानको देखकर ब्रह्माजीने उन्हें प्रणाम किया। तब शक्तिसहित विभु ईशानने भी ब्रह्माको सन्मार्गका उपदेश देकर चार सुन्दर बालकोंकी कल्पना की। उन उत्पन्न हुए शिशुओंका नाम था—जटी, मुण्डी, शिखण्डी और अर्धमुण्ड। वे योगानुसार सद्धर्मका पालन करके योगगतिको प्राप्त हो गये। (यह 'ईशान' नामक पाँचवाँ अवतार हुआ।)

सर्वज्ञ सनत्कुमारजी! इस प्रकार मैंने जगत्की हितकामनासे सद्योजात आदि अवतारोंका प्राकट्य संक्षेपसे वर्णन किया। उनका वह सारा लोकहितकारी व्यवहार याथातथ्यरूपसे ब्रह्माण्डमें वर्तमान है। महेश्वरकी ईशान, पुरुष, घोर, वामदेव और ब्रह्म—ये पाँच मूर्तियाँ विशेषरूपसे प्रसिद्ध हैं। इनमें ईशान, जो शिवस्वरूप तथा सबसे बड़ा है, पहला कहा जाता है। वह साक्षात् प्रकृतिके भोक्ता क्षेत्रज्ञमें निवास करता है। शिवजीका दूसरा स्वरूप तत्पुरुष नामसे ख्यात है। वह गुणोंके आश्रयरूप तथा भोग्य सर्वज्ञमें अधिष्ठित है। पिनाकधारी शिवका जो अघोर नामक तीसरा स्वरूप है, वह धर्मके लिये अंगोंसहित बुद्धितत्त्वका विस्तार करके अंदर विराजमान रहता है। वामदेव नामवाला शंकरका चौथा स्वरूप अहंकारका अधिष्ठान है। वह सदा अनेकों प्रकारका कार्य करता रहता है। विचारशील बुद्धिमानोंका कथन है कि शंकरका ईशानसंज्ञक स्वरूप सदा कर्ण, वाणी और सर्वव्यापी आकाशका अधीश्वर है तथा महेश्वरका पुरुष नामक रूप त्वक्, पाणि और स्पर्शगुणविशिष्ट वायुका स्वामी है। मनीषीगण अघोर नामवाले रूपको शरीर, रस, रूप और अग्निका अधिष्ठान बतलाते हैं। शंकरजीका वामदेवसंज्ञक स्वरूप रसना, पायु, रस और जलका स्वामी कहा जाता है। प्राण, उपस्थ, गन्ध और पृथ्‌वीका ईश्वर शिवजीका सद्योजात नामक रूप बताया जाता है। कल्याणकामी मनुष्योंको शंकरजीके इन स्वरूपोंकी सदा प्रयत्नपूर्वक वन्दना करनी चाहिये; क्योंकि ये श्रेयःप्राप्तिमें एकमात्र हेतु हैं। जो मनुष्य इन सद्योजात आदि अवतारोंके प्राकट्यको पढ़ता अथवा सुनता है, वह जगत्में समस्त काम्य भोगोंका उपभोग करके अन्तमें परमगतिको प्राप्त होता है। (अध्याय १)


शिवजीकी अष्टमूर्तियोंका तथा अर्धनारीनररूपका सविस्तर वर्णन

नन्दीश्वरजी कहते हैं—ऐश्वर्यशाली मुने! अब तुम महेश्वरके उन श्रेष्ठ अवतारोंका वर्णन श्रवण करो, जो लोकमें सबके सम्पूर्ण कार्योंको पूर्ण करनेवाले अतएव सुखदाता हैं। तात! यह जगत् उन परमेश्वर शम्भुकी आठ मूर्तियोंका स्वरूप ही है। जैसे सूतमें मणियाँ पिरोयी रहती हैं, उसी तरह यह विश्व उन अष्टमूर्तियोंमें व्याप्त होकर

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स्थित है। वे प्रसिद्ध आठ मूर्तियाँ ये हैं—शर्व, भव, रुद्र, उग्र, भीम, पशुपति, ईशान और महादेव। शिवजीके इन शर्व आदि अष्टमूर्तियोंद्वारा पृथिवी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, क्षेत्रज्ञ, सूर्य और चन्द्रमा अधिष्ठित हैं। शास्त्रका ऐसा निश्चय है कि कल्याणकर्ता महेश्वरका विश्वम्भरात्मक रूप ही चराचर विश्वको धारण किये हुए है। परमात्मा शिवका सलिलात्मक रूप जो समस्त जगत्‌को जीवन प्रदान करनेवाला है, ‘भव’ नामसे कहा जाता है। जो जगत्‌के बाहर-भीतर वर्तमान है और स्वयं ही विश्वका भरण-पोषण करता तथा स्पन्दित होता है, उग्ररूपधारी प्रभुके उस रूपको सत्पुरुष 'उग्र' कहते हैं। महादेवका जो सबको अवकाश देनेवाला सर्वव्यापी आकाशात्मक रूप है, उसे ‘भीम’ कहते हैं। वह भूतवृन्दका भेदक है। जो रूप समस्त आत्माओंका अधिष्ठान, सम्पूर्ण क्षेत्रोंमें निवास करनेवाला और जीवोंके भव-पाशका छेदक है, उसे ‘पशुपति' का रूप समझना चाहिये। महेश्वरका सम्पूर्ण जगत्‌को प्रकाशित करनेवाला जो सूर्य नामक रूप है, उसे ‘ईशान’ कहते हैं। वह द्युलोकमें भ्रमण करता है। अमृतमयी रश्मियोंवाला जो चन्द्रमा सम्पूर्ण विश्वको आह्लादित करता है, शिवका वह रूप ‘महादेव' नामसे पुकारा जाता है। ‘आत्मा' परमात्मा शिवका आठवाँ रूप है। यह मूर्ति अन्य मूर्तियोंकी व्यापिका है। इसलिये सारा विश्व शिवमयं है। जिस प्रकार वृक्षके मूलको सींचनेसे उसकी शाखाएँ पुष्पित हो जाती हैं, उसी तरह शिवका पूजन करनेसे शिवस्वरूप विश्व परिपुष्ट होता है। जैसे इस लोकमें पुत्र-पौत्र आदिको प्रसन्न देखकर पिता हर्षित होता है, उसी तरह विश्वको भलीभाँति हर्षित देखकर शंकरको आनन्द मिलता है। इसलिये यदि कोई किसी भी देहधारीको कष्ट देता है तो निस्संदेह मानो उसने अष्टमूर्ति शिवका ही अनिष्ट किया है। सनत्कुमारजी! इस प्रकार भगवान् शिव अपनी अष्टमूर्तियोंद्वारा समस्त विश्वको अधिष्ठित करके विराजमान हैं, अतः तुम पूर्ण भक्तिभावसे उन परम कारण रुद्रका भजन करो।

प्रिय सनत्कुमारजी! अब तुम शिवजीके अनुपम अर्धनारीनररूपका वर्णन सुनो। महाप्राज्ञ! वह रूप ब्रह्माकी कामनाओंको पूर्ण करनेवाला है। (सृष्टिके आदिमें) जब सृष्टिकर्ता ब्रह्माद्वारा रची हुई सारी प्रजाएँ विस्तारको नहीं प्राप्त हुईं, तब ब्रह्मा उस दुःखसे दुःखी हो चिन्ताकुल हो गये। उसी समय यों आकाशवाणी हुई—‘ब्रह्मन्! अब मैथुनी सृष्टिकी रचना करो।' उस व्योमवाणीको सुनकर ब्रह्माने मैथुनी सृष्टि उत्पन्न करनेका विचार किया; परंतु इससे पहले नारियोंका कुल ईशानसे प्रकट ही नहीं हुआ था, इसलिये पद्मयोनि ब्रह्मा मैथुनी सृष्टि रचनेमें समर्थ न हो सके। तब वे यों विचार कर कि शम्भुकी कृपाके बिना मैथुनी प्रजा उत्पन्न नहीं हो सकती, तप करनेको उद्यत हुए। उस समय ब्रह्मा पराशक्ति शिवासहित परमेश्वर शिवका प्रेमपूर्वक हृदयमें ध्यान करके घोर तप करने लगे। तदनन्तर तपोऽनुष्ठानमें लगे हुए ब्रह्माके उस तीव्र तपसे थोड़े ही समयमें शिवजी प्रसन्न हो गये। तब वे कष्टहारी शंकर पूर्णसच्चिदानन्दकी कामदा मूर्तिमें

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प्रविष्ट होकर अर्धनारीनरके रूपसे ब्रह्माके निकट प्रकट हो गये! उन देवाधिदेव शंकरको पराशक्ति शिवाके साथ आया हुआ देख ब्रह्माने दण्डकी भाँति भूमिपर लेटकर उन्हें प्रणाम किया और फिर वे हाथ जोड़कर स्तुति करने लगे। तब विश्वकर्ता देवाधिदेव महादेव महेश्वर परम प्रसन्न होकर ब्रह्मासे मेघकी-सी गम्भीर वाणीमें बोले।

ईश्वरने कहा—महाभाग वत्स! मेरे प्यारे पुत्र पितामह! मुझे तुम्हारा सारा मनोरथ पूर्णतया ज्ञात हो गया है। तुमने जो इस समय प्रजाओंकी वृद्धिके लिये घोर तप किया है, तुम्हारे उस तपसे मैं प्रसन्न हो गया हूँ और तुम्हें तुम्हारा अभीष्ट प्रदान करूँगा। यों स्वभावसे ही मधुर तथा परम उदार वचन कहकर शिवजीने अपने शरीरके अर्धभागसे शिवादेवीको पृथक् कर दिया। तब शिवसे पृथक् होकर प्रकट हुई उन परमा शक्तिको देखकर ब्रह्मा विनम्रभावसे प्रणाम करके उनसे प्रार्थना करने लगे।


ब्रह्माने कहा—शिवे! सृष्टिके प्रारम्भमें तुम्हारे पति देवाधिदेव परमात्मा शम्भुने मेरी सृष्टि की थी और (मेरे द्वारा) सारी प्रजाओंकी रचना की थी। शिवे! तब मैंने देवता आदि समस्त प्रजाओंकी मानसिक सृष्टि की; परंतु बारंबार रचना करनेपर भी उनकी वृद्धि नहीं हो रही है, अतः अब मैं स्त्री-पुरुषके समागमसे उत्पन्न होनेवाली सृष्टिका निर्माण करके अपनी सारी प्रजाओंकी वृद्धि करना चाहता हूँ। किंतु अभीतक तुमसे अक्षय नारीकुलका प्राकट्य नहीं हुआ है, इस कारण नारीकुलकी सृष्टि करना मेरी शक्तिके बाहर है। चूँकि सारी शक्तियोंका उद्गमस्थान तुम्हीं हो, इसलिये मैं तुम अखिलेश्वरी परमा शक्तिसे प्रार्थना करता हूँ। शिवे! मैं तुम्हें नमस्कार करता हूँ, तुम मुझे नारीकुलकी सृष्टि करनेके लिये शक्ति प्रदान करो; क्योंकि शिवप्रिये! इसीको तुम चराचर जगत्की उत्पत्तिका कारण समझो। वरदेश्वरि! मैं तुमसे एक और वरकी याचना करता हूँ, जगन्मातः! कृपा करके उसे भी मुझे दीजिये। मैं तुम्हारे चरणोंमें नमस्कार करता हूँ। (वह वर यह है—) 'सर्वव्यापिनी जगज्जननि! तुम चराचर जगत्की वृद्धिके लिये अपने एक सर्वसमर्थ रूपसे मेरे पुत्र दक्षकी पुत्री हो जाओ।' ब्रह्माद्वारा यों याचना किये जानेपर परमेश्वरी देवी शिवाने ‘तथास्तु—ऐसा ही होगा' कहकर वह शक्ति ब्रह्माको प्रदान कर दी। सुतरां जगन्मयी शिवशक्ति शिवादेवीने अपनी भौंहोंके मध्यभागसे अपने ही समान प्रभाववाली एक शक्तिकी रचना की। उस शक्तिको देखकर देवश्रेष्ठ भगवान् शंकर, जो लीलाकारी, कष्टहारी और कृपाके सागर हैं, हँसते हुए जगदम्बिकासे बोले।

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शिवजीने कहा—'देवि! परमेष्ठी ब्रह्माने तपस्याद्वारा तुम्हारी आराधना की है, अतः अब तुम उनपर प्रसन्न हो जाओ और उनका सारा मनोरथ पूर्ण करो।' तब शिवादेवीने परमेश्वर शिवकी उस आज्ञाको सिर झुकाकर ग्रहण किया और ब्रह्माके कथनानुसार दक्षकी पुत्री होना स्वीकार कर लिया। मुने! इस प्रकार शिवादेवी ब्रह्माको अनुपम शक्ति प्रदान करके शम्भुके शरीरमें प्रविष्ट हो गयीं। तत्पश्चात् भगवान् शंकर भी तुरंत ही अन्तर्धान हो गये। तभीसे इस लोकमें स्त्रीभागकी कल्पना हुई और मैथुनी सृष्टि चल पड़ी; इससे ब्रह्माको महान् आनन्द प्राप्त हुआ। तात! इस प्रकार मैंने तुमसे शिवजीके महान् अनुपम अर्धनारीनरार्धरूपका वर्णन कर दिया, यह सत्पुरुषोंके लिये मंगलदायक है।

(अध्याय २-३)


वाराहकल्पमें होनेवाले शिवजीके प्रथम अवतारसे लेकर नवम ऋषभ अवतारतकका वर्णन

नन्दीश्वरजी कहते हैं—सर्वज्ञ सनत्कुमारजी! एक बार रुद्रने हर्षित होकर ब्रह्माजीसे शंकरके चरित्रका प्रेमपूर्वक वर्णन किया था। वह चरित्र सदा परम सुखदायक है। (उसे तुम श्रवण करो। वह चरित्र इस प्रकार है।)

शिवजीने कहा था—ब्रह्मन्! वाराहकल्पके सातवें मन्वन्तरमें सम्पूर्ण लोकोंको प्रकाशित करनेवाले भगवान् कल्पेश्वर, जो तुम्हारे प्रपौत्र हैं, वैवस्वत मनुके पुत्र होंगे। तब उस मन्वन्तरकी चतुर्युगियोंके किसी द्वापरयुगमें मैं लोकोंपर अनुग्रह करने तथा ब्राह्मणोंका हित करनेके लिये प्रकट हूँगा। ब्रह्मन्! युगप्रवृत्तिके अनुसार उस प्रथम चतुर्युगीके प्रथम द्वापरयुगमें जब प्रभु स्वयं ही व्यास होंगे, तब मैं उस कलियुगके अन्तमें ब्राह्मणोंके हितार्थ शिवासहित श्वेत नामक महामुनि होकर प्रकट हूँगा। उस समय हिमालयके रमणीय शिखर छागल नामक पर्वतश्रेष्ठपर मेरे शिखाधारी चार शिष्य उत्पन्न होंगे। उनके नाम होंगे—श्वेत, श्वेतशिख, श्वेताश्व और श्वेतलोहित। वे चारों ध्यानयोगके आश्रयसे मेरे नगरमें जायँगे। वहाँ वे मुझ अविनाशीको तत्त्वतः जानकर मेरे भक्त हो जायँगे तथा जन्म, जरा और मृत्युसे रहित होकर परब्रह्मकी समाधिमें लीन रहेंगे। वत्स पितामह! उस समय मनुष्य ध्यानके अतिरिक्त दान, धर्म आदि कर्महेतुक साधनोंद्वारा मेरा दर्शन नहीं पा सकेंगे। दूसरे द्वापरमें प्रजापति सत्य व्यास होंगे। उस समय मैं कलियुगमें सुतार नामसे उत्पन्न होऊँगा। वहाँ भी मेरे दुन्दुभि, शतरूप, हृषीक तथा केतुमान् नामक चार वेदवादी द्विज शिष्य होंगे। वे चारों ध्यानयोगके बलसे मेरे नगरको जायँगे और मुझ अविनाशीको तत्त्वतः जानकर मुक्त हो जायँगे। तीसरे द्वापरमें जब भार्गव नामक व्यास होंगे, तब मैं भी नगरके निकट ही दमन नामसे प्रकट होऊँगा। उस समय भी मेरे विशोक, विशेष, विपाप और पापनाशन नामक चार पुत्र होंगे। चतुरानन! उस अवतारमें मैं शिष्योंको साथ ले व्यासकी सहायता

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करूँगा और उस कलियुगमें निवृत्तिमार्गको सुदृढ़ बनाऊँगा। चौथे द्वापरमें जब अंगिरा व्यास कहे जायँगे, उस समय मैं सुहोत्र नामसे अवतार लूँगा। उस समय भी मेरे चार योगसाधक महात्मा पुत्र होंगे। ब्रह्मन्! उनके नाम होंगे—सुमुख, दुर्मुख, दुर्दम और दुरतिक्रम। उस अवसरपर भी इन शिष्योंके साथ मैं व्यासकी सहायतामें लगा रहूँगा। पाँचवें द्वापरमें सविता व्यास नामसे कहे जायँगे। तब मैं कंक नामक महातपस्वी योगी होऊँगा। ब्रह्मन्! वहाँ भी मेरे चार योगसाधक महात्मा पुत्र होंगे। उनके नाम बतलाता हूँ, सुनो—सनक, सनातन, प्रभावशाली सनन्दन और सर्वव्यापक निर्मल तथा अहंकाररहित सनत्कुमार। उस समय भी कंक नामधारी मैं सविता नामक व्यासका सहायक बनूँगा और निवृत्तिमार्गको बढ़ाऊँगा। पुनः छठे द्वापरके प्रवृत्त होनेपर जब मृत्यु लोककारक व्यास होंगे और वेदोंका विभाजन करेंगे, उस समय भी मैं व्यासकी सहायता करनेके लिये लोकाक्षि नामसे प्रकट होऊँगा और निवृत्ति-पथकी उन्नति करूँगा। वहाँ भी मेरे चार दृढ़व्रती शिष्य होंगे। उनके नाम होंगे—सुधामा, विरजा, संजय तथा विजय। विधे! सातवें द्वापरके आरम्भमें जब शतक्रतु नामक व्यास होंगे, उस समय भी मैं योगमार्गमें परम निपुण जैगीषव्य नामसे प्रकट होऊँगा और काशीपुरीमें गुफाके अंदर दिव्यदेशमें कुशासनपर बैठकर योगको सुदृढ़ बनाऊँगा तथा शतक्रतु नामक व्यासकी सहायता और संसारभयसे भक्तोंका उद्धार करूँगा। उस युगमें भी मेरे सारस्वत, योगीश, मेघवाह और सुवाहन नामक चार पुत्र होंगे। आठवें द्वापरके आनेपर मुनिवर वसिष्ठ वेदोंका विभाजन करनेवाले वेदव्यास होंगे। योगवित्तम! उस युगमें भी मैं दधिवाहन नामसे अवतार लूँगा और व्यासकी सहायता करूँगा। उस समय कपिल, आसुरि, पंचशिख और शाल्वल नामवाले मेरे चार योगी पुत्र उत्पन्न होंगे, जो मेरे ही समान होंगे। ब्रह्मन्! नवीं चतुर्युगीके द्वापरयुगमें मुनिश्रेष्ठ सारस्वत व्यास नामसे प्रसिद्ध होंगे। उन व्यासके निवृत्तिमार्गकी वृद्धिके लिये ध्यान करनेपर मैं ऋषभनामसे अवतार लूँगा। उस समय पराशर, गर्ग, भार्गव तथा गिरीश नामके चार महायोगी मेरे शिष्य होंगे। प्रजापते! उनके सहयोगसे मैं योगमार्गको सुदृढ़ बनाऊँगा। सन्मुने! इस प्रकार मैं व्यासका सहायक बनूँगा। ब्रह्मन्! उसी रूपसे मैं बहुत-से दुःखी भक्तोंपर दया करके उनका भवसागरसे उद्धार करूँगा। मेरा वह ऋषभ नामक अवतार योगमार्गका प्रवर्तक, सारस्वत व्यासके मनको संतोष देनेवाला और नाना प्रकारसे रक्षा करनेवाला होगा। उस अवतारमें मैं भद्रायु नामक राजकुमारको, जो विषदोषसे मर जानेके कारण पिताद्वारा त्याग दिया जायगा, जीवन प्रदान करूँगा। तदनन्तर उस राजपुत्रकी आयुके सोलहवें वर्षमें ऋषभ ऋषि, जो मेरे ही अंश हैं, उसके घर पधारेंगे। प्रजापते! उस राजकुमारद्वारा पूजित होनेपर वे सद्रूपधारी कृपालु मुनि उसे राजधर्मका उपदेश करेंगे। तत्पश्चात् वे दीनवत्सल मुनि हर्षित चित्तसे उसे दिव्य कवच, शंख और सम्पूर्ण शत्रुओंका विनाश करनेवाला एक चमकीला खड्ग प्रदान करेंगे। फिर कृपापूर्वक उसके शरीरपर

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भस्म लगाकर उसे बारह हजार हाथियोंका बल भी देंगे। यों मातासहित भद्रायुको भलीभाँति आश्वासन देकर तथा उन दोनोंद्वारा पूजित हो प्रभावशाली ऋषभ मुनि स्वेच्छानुसार चले जायेंगे। ब्रह्मन्! तब राजर्षि भद्रायु भी रिपुगणोंको जीतकर और कीर्तिमालिनीके साथ विवाह करके धर्मपूर्वक राज्य करेगा। मुने! मुझ शंकरका वह ऋषभ नामक नवाँ अवतार ऐसा प्रभाववाला होगा, वह सत्पुरुषोंकी गति तथा दीनोंके लिये बन्धु-सा हितकारी होगा। मैंने उसका वर्णन तुम्हें सुना दिया। यह ऋषभ-चरित्र परम पावन, महान् तथा स्वर्ग, यश और आयुको देनेवाला है; अतः इसे प्रयत्नपूर्वक सुनना चाहिये।
(अध्याय ४)


शिवजीद्वारा दसवेंसे लेकर अट्ठाईसवें योगेश्वरावतारोंका वर्णन

शिवजी कहते हैं—ब्रह्मन्! दसवें द्वापरमें त्रिधामा नामके मुनि व्यास होंगे। वे हिमालयके रमणीय शिखर पर्वतोत्तम भृगुतुंगपर निवास करेंगे। वहाँ भी मेरे श्रुतिविदित चार पुत्र होंगे। उनके नाम होंगे—भृंग, बलबन्धु, नरामित्र और तपोधन केतुशृंग। ग्यारहवें द्वापरमें जब त्रिवृत नामक व्यास होंगे, तब मैं कलियुगमें गंगा-द्वारमें तप नामसे प्रकट होऊँगा। वहाँ भी मेरे लम्बोदर, लम्बाक्ष, केशलम्ब और प्रलम्बक नामक चार दृढ़व्रती पुत्र होंगे। बारहवीं चतुर्युगीके द्वापरयुगमें शततेजा नामके वेदव्यास होंगे। उस समय मैं द्वापरके समाप्त होनेपर कलियुगमें हेमकंचुकमें जाकर अत्रि नामसे अवतार लूँगा और व्यासकी सहायताके लिये निवृत्तिमार्गको प्रतिष्ठित करूँगा। महामुने! वहाँ भी मेरे सर्वज्ञ, समबुद्धि, साध्य और शर्व नामक चार उत्तम योगी पुत्र होंगे। तेरहवें द्वापरयुगमें जब धर्मस्वरूप नारायण व्यास होंगे, तब मैं पर्वतश्रेष्ठ गन्धमादनपर बालखिल्यआश्रममें महामुनि बलि नामसे उत्पन्न हूँगा। वहाँ भी मेरे सुधामा, काश्यप, वसिष्ठ और विरजा नामक चार सुन्दर पुत्र होंगे। चौदहवीं चतुर्युगीके द्वापरयुगमें जब रक्ष नामक व्यास होंगे, उस समय मैं अंगिराके वंशमें गौतम नामसे उत्पन्न होऊँगा। उस कलियुगमें भी अत्रि, वशद, श्रवण और श्नविष्कट मेरे पुत्र होंगे। पंद्रहवें द्वापरमें जब त्रय्यारुणि व्यास होंगे, उस समय मैं हिमालयके पृष्ठ-भागमें स्थित वेदशीर्ष नामक पर्वतपर सरस्वतीके उत्तरतटका आश्रय ले वेदशिरा नामसे अवतार ग्रहण करूँगा। उस समय महापराक्रमी वेदशिर ही मेरा अस्त्र होगा। वहाँ भी मेरे चार दृढ़ पराक्रमी पुत्र होंगे। उनके नाम होंगे—कुणि, कुणिबाहु, कुशरीर और कुनेत्रक।

सोलहवें द्वापरयुगमें जब व्यासका नाम देव होगा, तब मैं योग प्रदान करनेके लिये परम पुण्यमय गोकर्णवनमें गोकर्ण नामसे प्रकट होऊँगा। वहाँ भी मेरे काश्यप, उशना, च्यवन और बृहस्पति नामक चार पुत्र होंगे। वे जलके समान निर्मल और योगी होंगे तथा उसी मार्गके आश्रयसे शिवलोकको प्राप्त हो जायँगे। सत्रहवीं चतुर्युगीके द्वापर-युगमें देवकृतंजय व्यास होंगे, उस समय मैं

* शतरुद्रसंहिता * ४४७

हिमालयके अत्यन्त ऊँचे एवं रमणीय शिखर महालय पर्वतपर गुहावासी नामसे अवतार धारण करूँगा; क्योंकि हिमालय शिवक्षेत्र कहलाता है। वहीं उतथ्य, वामदेव, महायोग और महाबल नामके मेरे पुत्र भी होंगे। अठारहवीं चतुर्युगीके द्वापरयुगमें जब ऋतंजय व्यास होंगे, तब मैं हिमालयके उस सुन्दर शिखरपर, जिसका नाम शिखण्डी पर्वत है और जहाँ महान् पुण्यमय सिद्धक्षेत्र तथा सिद्धोंद्वारा सेवित शिखण्डीवन भी है शिखण्डी नामसे उत्पन्न होऊँगा। वहाँ भी वाचःश्रवा, रुचीक, श्यावास्य और यतीश्वर नामक मेरे चार तपस्वी पुत्र होंगे। उन्नीसवें द्वापरमें महामुनि भरद्वाज व्यास होंगे। उस समय भी मैं हिमालयके शिखरपर माली नामसे उत्पन्न होऊँगा और मेरे सिरपर लंबी-लंबी जटाएँ होंगी। वहाँ भी मेरे सागरके-से गम्भीर स्वभाववाले हिरण्यनामा, कौसल्य, लोकाक्षि और प्रधिमि नामक पुत्र होंगे। बीसवीं चतुर्युगीके द्वापरमें होनेवाले व्यासका नाम गोतम होगा। तब मैं भी हिमवान्‌के पृष्ठभागमें स्थित पर्वतश्रेष्ठ अट्टहासपर, जो सदा देवता, मनुष्य, यक्षेन्द्र, सिद्ध और चारणोंद्वारा अधिष्ठित रहता है, अट्टहास नामसे अवतार धारण करूँगा। उस युगके मनुष्य अट्टहासके प्रेमी होंगे। उस समय भी मेरे उत्तम योगसम्पन्न चार पुत्र होंगे। उनके नाम होंगे—सुमन्त, वर्वरि, विद्वान् कबन्ध और कुणिकन्धर। इक्कीसवें द्वापरयुगमें जब वाचःश्रवा नामके व्यास होंगे, तब मैं दारुक नामसे प्रकट होऊँगा। इसलिये उस शुभ स्थानका नाम ‘दारुवन’ पड़ जायगा। वहाँ भी मेरे प्लक्ष, दार्भायणि, केतुमान् तथा गौतम नामके चार परम योगी पुत्र उत्पन्न होंगे। बाईसवीं चतुर्युगीके द्वापरमें जब शुष्मायण नामक व्यास होंगे, तब मैं भी वाराणसीपुरीमें लांगली भीम नामक महामुनिके रूपमें अवतरित होऊँगा। उस कलियुगमें इन्द्रसहित समस्त देवता मुझ हलायुधधारी शिवका दर्शन करेंगे। उस अवतारमें भी मेरे भल्लवी, मधु, पिंग और श्वेतकेतु नामक चार परम धार्मिक पुत्र होंगे। तेईसवीं चतुर्युगीमें जब तृणबिन्दु मुनि व्यास होंगे, तब मैं सुन्दर कालिंजरगिरिपर श्वेत नामसे प्रकट होऊँगा। वहाँ भी मेरे उशिक, बृहदश्व, देवल और कवि नामसे प्रसिद्ध चार तपस्वी पुत्र होंगे। चौबीसवीं चतुर्युगीमें जब ऐश्वर्यशाली यक्ष व्यास होंगे तब उस युगमें मैं नैमिषक्षेत्रमें शूली नामक महायोगी होकर उत्पन्न हूँगा। उस युगमें भी मेरे चार तपस्वी शिष्य होंगे। उनके नाम होंगे—शालिहोत्र, अग्निवेश, युवनाश्व और शरद्वसु। पचीसवें द्वापरमें जब व्यास शक्ति नामसे प्रसिद्ध होंगे, तब मैं भी प्रभावशाली एवं दण्डधारी महायोगीके रूपमें प्रकट हूँगा। मेरा नाम मुण्डीश्वर होगा। उस अवतारमें भी छगल, कुण्डकर्ण, कुम्भाण्ड और प्रवाहक मेरे तपस्वी शिष्य होंगे। छब्बीसवें द्वापरमें जब व्यासका नाम पराशर होगा, तब मैं भद्रवट नामक नगरमें सहिष्णु नामसे अवतार लूँगा। उस समय भी उलूक, विद्युत्, शम्बूक और आश्वलायन नामवाले चार तपस्वी शिष्य होंगे। सत्ताईसवें द्वापरमें जब जातूकर्ण्य व्यास होंगे, तब मैं भी प्रभासतीर्थमें सोमशर्मा नामसे प्रकट हूँगा। वहाँ भी अक्षपाद, कुमार, उलूक और वत्स नामसे प्रसिद्ध मेरे चार तपस्वी शिष्य होंगे। अट्ठाईसवें द्वापरमें जब भगवान् श्रीहरि

४४८ * संक्षिप्त शिवपुराण *

पराशरके पुत्ररूपमें द्वैपायन नामक व्यास होंगे, तब पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण अपने छठे अंशसे वसुदेवके श्रेष्ठ पुत्रके रूपमें उत्पन्न होकर वासुदेव कहलायेंगे। उसी समय योगात्मा मैं भी लोकोंको आश्चर्यमें डालनेके लिये योगमायाके प्रभावसे ब्रह्मचारीका शरीर धारण करके प्रकट होऊँगा। फिर श्मशानभूमिमें मृतकरूपसे पड़े हुए अविच्छिन्न शरीरको देखकर मैं ब्राह्मणोंके हित-साधनके लिये योगमायाके आश्रयसे उसमें घुस जाऊँगा और फिर तुम्हारे तथा विष्णुके साथ मेरुगिरिकी पुण्यमयी दिव्य गुहामें प्रवेश करूँगा। ब्रह्मन्! वहाँ मेरा नाम लकुली होगा। इस प्रकार मेरा यह कायावतार उत्कृष्ट सिद्धक्षेत्र कहलायेगा और यह जबतक पृथ्वी कायम रहेगी, तबतक लोकमें परम विख्यात रहेगा। उस अवतारमें भी मेरे चार तपस्वी शिष्य होंगे। उनके नाम कुशिक, गर्ग, मित्र और पौरुष्य होंगे। वे वेदोंके पारगामी ऊर्ध्वरेता ब्राह्मण योगी होंगे और माहेश्वर योगको प्राप्त करके शिवलोकको चले जायँगे।

उत्तम व्रतका पालन करनेवाले मुनियो! इस प्रकार परमात्मा शिवने वैवस्वत मन्वन्तरके सभी चतुर्युगियोंके योगेश्वरावतारोंका सम्यक्-रूपसे वर्णन किया था। विभो! अट्ठाईस व्यास क्रमशः एक-एक करके प्रत्येक द्वापरमें होंगे और योगेश्वरावतार प्रत्येक कलियुगके प्रारम्भमें। प्रत्येक योगेश्वरावतारके साथ उनके चार अविनाशी शिष्य भी होंगे, जो महान् शिवभक्त और योगमार्गकी वृद्धि करनेवाले होंगे। इन पशुपतिके शिष्योंके शरीरोंपर भस्म रमी रहेगी, ललाट त्रिपुण्ड्रसे सुशोभित रहेगा और रुद्राक्षकी माला ही इनका आभूषण होगा। ये सभी शिष्य धर्मपरायण, वेद-वेदांगके पारगामी विद्वान् और सदा बाहर-भीतरसे लिंगार्चनमें तत्पर रहनेवाले होंगे। ये शिवजीमें भक्ति रखकर योगपूर्वक ध्यानमें निष्ठा रखनेवाले और जितेन्द्रिय होंगे। विद्वानोंने इनकी संख्या एक सौ बारह बतलायी है। इस प्रकार मैंने अट्ठाईस युगोंके क्रमसे मनुसे लेकर कृष्णावतारपर्यन्त सभी अवतारोंके लक्षणोंका वर्णन कर लिया। जब श्रुतिसमूहोंका वेदान्तके रूपमें प्रयोग होगा, तब उस कल्पमें कृष्णद्वैपायन व्यास होंगे। यों महेश्वरने ब्रह्माजीपर अनुग्रह करके योगेश्वरावतारोंका वर्णन किया और फिर वे देवेश्वर उनकी ओर दृष्टिपात करके वहीं अन्तर्धान हो गये। (अध्याय ५)


### नन्दीश्वरावतारका वर्णन

यहाँतक बयालीस अवतारोंका वर्णन किया गया। अब नन्दीश्वरावतारका वर्णन किया जाता है।

सनत्कुमारजीने पूछा—प्रभो! आप महादेवके अंशसे उत्पन्न होकर पीछे शिवको कैसे प्राप्त हुए थे? वह सारा वृत्तान्त मैं सुनना चाहता हूँ, उसे वर्णन करनेकी कृपा करें।

नन्दीश्वर बोले—सर्वज्ञ सनत्कुमारजी! मैं जिस प्रकार महादेवके अंशसे जन्म लेकर शिवको प्राप्त हुआ, उस प्रसंगका वर्णन करता हूँ; तुम सावधानीपूर्वक श्रवण करो।

* शतरुद्रसंहिता * ४४९

शिलाद नामक एक धर्मात्मा मुनि थे। पितरोंके आदेशसे उन्होंने अयोनिज सुव्रत मृत्युहीन पुत्रकी प्राप्तिके लिये तप करके देवेश्वर इन्द्रको प्रसन्न किया। परंतु देवराज इन्द्रने ऐसा पुत्र प्रदान करनेमें अपनेको असमर्थ बताकर सर्वेश्वर महाशक्तिसम्पन्न महादेवकी आराधना करनेका उपदेश दिया। तब शिलाद भगवान् महादेवको प्रसन्न करनेके लिये तप करने लगे। उनके तपसे प्रसन्न होकर महादेव वहाँ पधारे और महासमाधिमग्न शिलादको थपथपाकर जगाया। तब शिलादने शिवका स्तवन किया और भगवान् शिवके उन्हें वर देनेको प्रस्तुत होनेपर उनसे कहा—'प्रभो! मैं आपके ही समान मृत्युहीन अयोनिज पुत्र चाहता हूँ।' तब शिवजी प्रसन्न होकर मुनिसे बोले।

शिवजीने कहा—तपोधन विप्र! पूर्वकालमें ब्रह्माजीने, मुनियोंने तथा बड़े-बड़े देवताओंने मेरे अवतार धारण करनेके लिये तपस्याद्वारा मेरी आराधना की थी। इसलिये मुने! यद्यपि मैं सारे जगत्‌का पिता हूँ, फिर भी तुम मेरे पिता बनोगे और मैं तुम्हारा अयोनिज पुत्र होऊँगा तथा मेरा नाम नन्दी होगा।

नन्दीश्वरजी कहते हैं—मुने! यों कहकर कृपालु शंकरने अपने चरणोंमें प्रणिपात करके सामने खड़े हुए शिलाद मुनिकी ओर कृपादृष्टिसे देखा और उन्हें ऐसा आदेश दे वे तुरंत ही उमासहित वहीं अन्तर्धान हो गये। महादेवजीके चले जानेके पश्चात् महामुनि शिलादने अपने आश्रममें आकर ऋषियोंसे वह सारा वृत्तान्त कह सुनाया। कुछ समय बीत जानेके बाद जब यज्ञवेत्ताओंमें श्रेष्ठ मेरे पिताजी यज्ञ करनेके लिये यज्ञक्षेत्रको जोत रहे थे, उसी समय मैं शम्भुकी आज्ञासे यज्ञके पूर्व ही उनके शरीरसे उत्पन्न हो गया। उस समय मेरे शरीरकी प्रभा युगान्तकालीन अग्निके समान थी। तब सारी दिशाओंमें प्रसन्नता छा गयी और शिलाद मुनिकी भी बड़ी प्रशंसा हुई। उधर शिलादने भी जब मुझ बालकको प्रलयकालीन सूर्य और अग्निके सदृश प्रभावशाली, त्रिनेत्र, चतुर्भुज, प्रकाशमान, जटामुकुटधारी, त्रिशूल आदि आयुधोंसे युक्त, सर्वथा रुद्ररूपमें देखा, तब वे महान् आनन्दमें निमग्न हो गये और मुझ प्रणम्यको नमस्कार करते हुए कहने लगे।

शिलाद बोले—सुरेश्वर! चूँकि तुमने नन्दी नामसे प्रकट होकर मुझे आनन्दित किया है, इसलिये मैं तुम आनन्दमय जगदीश्वरको नमस्कार करता हूँ।

नन्दीश्वरजी कहते हैं—मुने! तदनन्तर जैसे निर्धनको निधि प्राप्त हो जानेसे प्रसन्नता होती है, उसी प्रकार मेरी प्राप्तिसे हर्षित होकर पिताजीने महेश्वरकी भलीभाँति वन्दना की और फिर मुझे लेकर वे शीघ्र ही अपनी पर्णशालाको चल दिये। महामुने! जब मैं शिलादकी कुटियामें पहुँच गया, तब मैंने अपने उस रूपका परित्याग करके मनुष्यरूप धारण कर लिया। तदनन्तर शालंकायन-नन्दन पुत्रवत्सल शिलादने मेरे जातकर्म आदि सभी संस्कार सम्पन्न किये। फिर पाँचवें वर्षमें पिताजीने मुझे सांगोपांग सम्पूर्ण वेदोंका तथा अन्यान्य शास्त्रोंका भी अध्ययन कराया। सातवाँ वर्ष पूरा होनेपर शिवजीकी आज्ञासे मित्र और वरुण नामके मुनि मुझे देखनेके लिये पिताजीके


789 संक्षिप्त शिवपुराण—15 A

४५० * संक्षिप्त शिवपुराण *

आश्रमपर पधारे। शिलाद मुनिने उनकी पूरी
आवभगत की। जब वे दोनों महात्मा
मुनीश्वर आनन्दपूर्वक आसनपर विराज
गये, तब मेरी ओर बारंबार निहारकर बोले।

मित्र और वरुणने कहा—'तात शिलाद!
यद्यपि तुम्हारा पुत्र नन्दी सम्पूर्ण शास्त्रोंके
अर्थोंका पारगामी विद्वान् है, तथापि इसकी
आयु बहुत थोड़ी है। हमने बहुत तरहसे
विचार करके देखा, परंतु इसकी आयु
एक वर्षसे अधिक नहीं दीखती।' उन
विप्रवरोंके यों कहनेपर पुत्रवत्सल शिलाद
नन्दीको छातीसे लिपटाकर दुःखार्त हो
फूट-फूटकर रोने लगे। तब पिता और
पितामहको मृतककी भाँति भूमिपर पड़ा
हुआ देख नन्दी शिवजीके चरणकमलोंका
स्मरण करके प्रसन्नतापूर्वक पूछने लगा—
'पिताजी! आपको कौन-सा ऐसा दुःख
आ पड़ा है, जिसके कारण आपका शरीर
काँप रहा है और आप रो रहे हैं? आपको
वह दुःख कहाँसे प्राप्त हुआ है, मैं इसे
ठीक-ठीक जानना चाहता हूँ।'

पिताने कहा—बेटा! तुम्हारी अल्पायुके
दुःखसे मैं अत्यन्त दुःखी हो रहा हूँ।
(तुम्हीं बताओ) मेरे इस कष्टको कौन
दूर कर सकता है? मैं उसकी शरण
ग्रहण करूँ।

पुत्र बोला—पिताजी! मैं आपके सामने
शपथ करता हूँ और यह बिलकुल सत्य
बात कह रहा हूँ कि चाहे देवता, दानव,
यम, काल तथा अन्यान्य प्राणी—ये सब-
के-सब मिलकर मुझे मारना चाहें, तो भी
मेरी बाल्यकालमें मृत्यु नहीं होगी, अतः
आप दुःखी मत हों।

पिताने पूछा—मेरे प्यारे लाल! तुमने
ऐसा कौन-सा तप किया है अथवा तुम्हें
कौन-सा ऐसा ज्ञान, योग या ऐश्वर्य प्राप्त
है, जिसके बलपर तुम इस दारुण दुःखको
नष्ट कर दोगे?

पुत्रने कहा—तात! मैं न तो तपसे
मृत्युको हटाऊँगा और न विद्यासे। मैं
महादेवजीके भजनसे मृत्युको जीत लूँगा,
इसके अतिरिक्त अन्य कोई उपाय नहीं है।

नन्दीश्वरजी कहते हैं—मुने! यों कहकर
मैंने सिर झुकाकर पिताजीके चरणोंमें प्रणाम
किया और फिर उनकी प्रदक्षिणा करके
उत्तम वनकी राह ली। (अध्याय ६)


नन्दीश्वरके जन्म, वरप्राप्ति, अभिषेक और विवाहका वर्णन

नन्दिकेश्वर कहते हैं—मुने! वनमें जाकर
मैंने एकान्त स्थानमें अपना आसन लगाया
और उत्तम बुद्धिका आश्रय ले मैं उग्र तपमें
प्रवृत्त हुआ, जो बड़े-बड़े मुनियोंके लिये
भी दुष्कर था। उस समय मैं नदीके पावन
उत्तर तटपर सुदृढ़रूपसे ध्यान लगाकर बैठ
गया और एकाग्र तथा समाहित मनसे
अपने हृदयकमलके मध्यभागमें तीन नेत्र,
दस भुजा तथा पाँच मुखवाले शान्तिस्वरूप
देवाधिदेव सदाशिवका ध्यान करके रुद्र-
मन्त्रका जप करने लगा। तब उस जपमें
मुझे तल्लीन देखकर चन्द्रार्धभूषण परमेश्वर
महादेव प्रसन्न हो गये और उमासहित वहाँ
पधारकर प्रेमपूर्वक बोले।


789 संक्षिप्त शिवपुराण—15 B

* शतरुद्रसंहिता * ४५१

शिवजीने कहा—'शिलादनन्दन! तुमने बड़ा उत्तम तप किया है। तुम्हारी इस तपस्यासे संतुष्ट होकर मैं तुम्हें वर देनेके लिये आया हूँ। तुम्हारे मनमें जो अभीष्ट हो, वह माँग लो।' महादेवजीके यों कहनेपर मैं सिरके बल उनके चरणोंमें लोट गया और फिर बुढ़ापा तथा शोकका विनाश करनेवाले परमेशानकी स्तुति करने लगा। तब परम कष्टहारी वृषभध्वज परमेश्वर शम्भुने मुझ परम भक्तिसम्पन्न नन्दीको जिसके नेत्रोंमें आँसू छलक आये थे और जो सिरके बल चरणोंमें पड़ा था, अपने दोनों हाथोंसे पकड़कर उठा लिया और शरीरपर हाथ फेरने लगे। फिर वे जगदीश्वर गणाध्यक्षों तथा हिमाचलकुमारी पार्वतीदेवीकी ओर दृष्टिपात करके मुझे कृपादृष्टिसे देखते हुए यों कहने लगे—'वत्स नन्दी! उन दोनों विप्रोंको तो मैंने ही भेजा था। महाप्राज्ञ! तुम्हें मृत्युका भय कहाँ; तुम तो मेरे ही समान हो। इसमें तनिक भी संशय नहीं है। तुम अमर, अजर, दुःखरहित, अव्यय और अक्षय होकर सदा गणनायक बने रहोगे तथा पिता और सुहृद्वर्गसहित मेरे प्रियजन होओगे। तुममें मेरे ही समान बल होगा। तुम नित्य मेरे पार्श्वभागमें स्थित रहोगे और तुमपर निरन्तर मेरा प्रेम बना रहेगा। मेरी कृपासे जन्म, जरा और मृत्यु तुमपर अपना प्रभाव नहीं डाल सकेंगे।'

नन्दीश्वरजी कहते हैं—मुने! यों कहकर कृपासागर शम्भुने कमलोंकी बनी हुई अपनी शिरोमालाको उतारकर तुरंत ही मेरे गलेमें डाल दिया। विप्रवर! उस शुभ मालाके गलेमें पड़ते ही मैं तीन नेत्र और दस भुजाओंसे सम्पन्न हो गया तथा द्वितीय शंकर-सा प्रतीत होने लगा। तदनन्तर परमेश्वर शिवने मेरा हाथ पकड़कर पूछा—'बताओ, अब तुम्हें कौन-सा उत्तम वर दूँ?'

फिर उन वृषध्वजने अपनी जटामें स्थित हारके समान निर्मल जलको हाथमें ले 'तुम नदी हो जाओ' यों कहकर उसे छोड़ दिया। तब वह जल उत्तम ढंगसे बहनेवाली, स्वच्छ जलसे परिपूर्ण, महान् वेगशालिनी, दिव्यरूपा पाँच सुन्दर नदियोंके रूपमें परिवर्तित हो गया। उनके नाम हैं—जतोदका, त्रिस्त्रोता, वृषध्वनि, स्वर्णोदका और जम्बूनदी। मुने! यह पंचनद शिवके पृष्ठभागकी भाँति परम शुभ है। महेश्वरके निकट इसका नाम लेनेसे यह परम पावन हो जाता है। जो मनुष्य पंचनदपर जाकर स्नान और जप करके परमेश्वर शिवका पूजन करता है, वह शिवसायुज्यको प्राप्त होता है—इसमें संशय नहीं है। तत्पश्चात् शम्भुने उमासे कहा—'अव्यये! मैं नन्दीका अभिषेक करके इसे गणाध्यक्ष बनाना


789 संक्षिप्त शिवपुराण—15 C

४५२ * संक्षिप्त शिवपुराण *

चाहता हूँ! इस विषयमें तुम्हारी क्या राय है?'

तब उमा बोलीं—देवेश! आप नन्दीको गणाध्यक्षपद प्रदान कर सकते हैं; क्योंकि परमेश्वर! यह शिलादनन्दन मेरे लिये पुत्र-सरीखा है, इसलिये नाथ! यह मुझे बहुत ही प्यारा है। तदनन्तर भक्तवत्सल भगवान् शंकरने अपने अतुलबलशाली गणोंको बुलाकर उनसे कहा।

शिवजी बोले—गणनायको! तुम सब लोग मेरी एक आज्ञाका पालन करो। यह मेरा प्रिय पुत्र नन्दीश्वर सभी गणनायकोंका अध्यक्ष और गणोंका नेता है; इसलिये तुम सब लोग मिलकर इसका मेरे गणोंके अधिपत्तिपदपर प्रेमपूर्वक अभिषेक करो। आजसे यह नन्दीश्वर तुमलोगोंका स्वामी होगा।

नन्दीश्वरजी कहते हैं—मुने! शंकरजीके इस कथनपर सभी गणनायकोंने 'एवमस्तु' कहकर उसे स्वीकार किया और वे सामग्री जुटानेमें लग गये। फिर सब देवताओं और मुनियोंने मिलकर मेरा अभिषेक किया। तदनन्तर मरुतोंकी मनोहारिणी दिव्य कन्या सुयशासे मेरा विवाह करवा दिया। उस समय मुझे बहुत-सी दिव्य वस्तुएँ मिलीं। महामुने! इस प्रकार विवाह करके मैंने अपनी उस पत्नीके साथ शम्भु, शिवा, ब्रह्मा और श्रीहरिके चरणोंमें प्रणाम किया। तब त्रिलोकेश्वर भक्तवत्सल भगवान् शिव पत्नीसहित मुझसे परम प्रेमपूर्वक बोले।

ईश्वरने कहा—सत्पुत्र! यह तुम्हारी प्रिया सुयशा और तुम मेरी बात सुनो। तुम मुझे परम प्रिय हो, अतः मैं स्नेहपूर्वक तुम्हें मनोवांछित वर प्रदान करूँगा। गणेश्वर नन्दीश! देवी पार्वतीसहित मैं तुमपर सदा संतुष्ट हूँ, इसलिये वत्स! तुम मेरा उत्तम वचन श्रवण करो। तुम मेरे अटूट प्रेमी, विशिष्ट, परम ऐश्वर्यसम्पन्न, महायोगी, महान् धनुर्धारी, अजेय, सबको जीतनेवाले, महाबली और सदा पूज्य होओगे। जहाँ मैं रहूँगा, वहाँ तुम्हारी स्थिति होगी और जहाँ तुम रहोगे, वहाँ मैं उपस्थित रहूँगा। यही दशा तुम्हारे पिता और पितामहकी भी होगी। पुत्र! तुम्हारे ये महाबली पिता परम ऐश्वर्यशाली, मेरे भक्त और गणाध्यक्ष होंगे। वत्स! ये ही नियम तुम्हारे पितामहपर भी लागू होंगे। अन्तमें तुम सब लोग मुझसे वरदान प्राप्त करके मेरा सांनिध्य प्राप्त करोगे।

नन्दीश्वरजी कहते हैं—मुने! तत्पश्चात् महाभागा उमादेवी वर देनेके लिये उत्सुक हो मुझ नन्दीसे बोलीं—'बेटा! तू मुझसे भी वर माँग ले, मैं तेरी सारी अभीष्ट कामनाओंको पूर्ण कर दूँगी।' तब देवीके उस वचनको सुनकर मैंने हाथ जोड़कर कहा—'देवि! आपके चरणोंमें मेरी सदा उत्तम भक्ति बनी रहे।' मेरी याचना सुनकर देवीने कहा—'एवमस्तु—ऐसा ही होगा।' फिर शिवा नन्दीकी प्रियतमा पत्नी सुयशासे बोलीं।

देवीने कहा—वत्से! तुम भी अपना अभीष्ट वर ग्रहण करो—तुम्हारे तीन नेत्र होंगे। तुम जन्म-बन्धनसे छूट जाओगी और पुत्र-पौत्रोंसे सम्पन्न रहोगी तथा तुम्हारी मुझमें और अपने स्वामीमें अटल भक्ति बनी रहेगी।

नन्दीश्वरजी कहते हैं—मुने! तदनन्तर शिवजीकी आज्ञासे परम प्रसन्न हुए ब्रह्मा,


789 संक्षिप्त शिवपुराण—15 D

  • शतरुद्रसंहिता * ४५३

विष्णु तथा समस्त देवगणोंने भी प्रेमपूर्वक हम दोनोंको वरदान दिये। तत्पश्चात् परमेश्वर शिव कुटुम्बसहित मुझे अपनाकर तथा उमासहित वृषपर आरूढ़ हो सम्बन्धियों एवं बान्धवोंके साथ अपने निवासस्थानको चले गये। तब वहाँ उपस्थित विष्णु आदि समस्त देवता मेरी प्रशंसा तथा शिव-शिवाकी स्तुति करते हुए अपने-अपने धामको चल दिये। वत्स ! इस प्रकार मैंने तुमसे अपने अवतारका वर्णन कर दिया। महामुने ! यह मनुष्योंके लिये सदा आनन्ददायक और शिवभक्तिका वर्धक है। जो श्रद्धालु मानव भक्तिभावित चित्तसे मुझ नन्दीके इस जन्म, वरप्राप्ति, अभिषेक और विवाहके वृत्तान्तको सुनेगा अथवा दूसरोंको सुनायेगा तथा पढ़ेगा या दूसरेको पढ़ायेगा, वह इस लोकमें सम्पूर्ण सुखोंको भोगकर अन्तमें परमगतिको प्राप्त होगा। (अध्याय ७)


### कालभैरवका माहात्म्य, विश्वानरकी तपस्या और शिवजीका प्रसन्न होकर उनकी पत्नी शुचिष्मतीके गर्भसे उनके पुत्ररूपमें प्रकट होनेका उन्हें वरदान देना

तदनन्तर भगवान् शंकरके भैरवावतारका वर्णन करके नन्दीश्वरने कहा—महामुने ! परमेश्वर शिव उत्तमोत्तम लीलाएँ रचनेवाले तथा सत्पुरुषोंके प्रेमी हैं। उन्होंने मार्गशीर्षमासके कृष्णपक्षकी अष्टमीको भैरवरूपसे अवतार लिया था। इसलिये जो मनुष्य मार्गशीर्ष-मासकी कृष्णाष्टमीको कालभैरवके संनिकट उपवास करके रात्रिमें जागरण करता है, वह समस्त पापोंसे मुक्त हो जाता है। जो मनुष्य अन्यत्र भी भक्तिपूर्वक जागरणसहित इस व्रतका अनुष्ठान करेगा, वह भी महापापोंसे मुक्त होकर सद्गतिको प्राप्त हो जायगा। प्राणियोंके लाखों जन्मोंमें किये हुए जो पाप हैं, वे सब-के-सब कालभैरवके दर्शनसे निर्मल हो जाते हैं। जो मूर्ख कालभैरवके भक्तोंका अनिष्ट करता है, वह इस जन्ममें दुःख भोगकर पुनः दुर्गतिको प्राप्त होता है। जो लोग विश्वनाथके तो भक्त हैं परंतु कालभैरवकी भक्ति नहीं करते, उन्हें महान् दुःखकी प्राप्ति होती है। काशीमें तो इसका विशेष प्रभाव पड़ता है। जो मनुष्य वाराणसीमें निवास करके कालभैरवका भजन नहीं करता, उसके पाप शुक्लपक्षके चन्द्रमाकी भाँति बढ़ते रहते हैं। जो काशीमें प्रत्येक भौमवारकी कृष्णाष्टमीके दिन कालराजका भजन-पूजन नहीं करता, उसका पुण्य कृष्णपक्षके चन्द्रमाके समान क्षीण हो जाता है।

तदनन्तर नन्दीश्वरने वीरभद्र तथा शरभावतारका वृत्तान्त सुनाकर कहा—ब्रह्मपुत्र ! भगवान् शिव जिस प्रकार प्रसन्न होकर विश्वानर मुनिके घर अवतीर्ण हुए थे, शशिमौलिके उस चरितको तुम प्रेमपूर्वक श्रवण करो। उस समय वे तेजकी निधि अग्निरूप सर्वात्मा परम प्रभु शिव अग्निलोकके अधिपतिरूपसे गृहपति नामसे अवतीर्ण हुए थे। पूर्वकालकी बात है, नर्मदाके रमणीय तटपर नर्मपुर नामका एक नगर था। उसी नगरमें विश्वानर नामके एक मुनि निवास करते थे। उनका जन्म शाण्डिल्य गोत्रमें हुआ था। वे परम पावन,

४५४ * संक्षिप्त शिवपुराण *

पुण्यात्मा, शिवभक्त, ब्रह्मतेजके निधि और जितेन्द्रिय थे। ब्रह्मचर्याश्रममें उनकी बड़ी निष्ठा थी। वे सदा ब्रह्मयज्ञमें तत्पर रहते थे। फिर उन्होंने शुचिष्मती नामकी एक सद्गुणवती कन्यासे विवाह कर लिया और वे ब्राह्मणोचित कर्म करते हुए देवता तथा पितरोंको प्रिय लगनेवाला जीवन बिताने लगे। इस प्रकार जब बहुत-सा समय व्यतीत हो गया, तब उन ब्राह्मणकी भार्या शुचिष्मती, जो उत्तम व्रतका पालन करनेवाली थी, अपने पतिसे बोली— 'प्राणनाथ ! स्त्रियोंके योग्य जितने आनन्दप्रद भोग हैं, उन सबको मैंने आपकी कृपासे आपके साथ रहकर भोग लिया; परंतु नाथ ! मेरे हृदयमें एक लालसा चिरकालसे वर्तमान है और वह गृहस्थोंके लिये उचित भी है, उसे आप पूर्ण करनेकी कृपा करें। स्वामिन् ! यदि मैं वर पानेके योग्य हूँ और आप मुझे वर देना चाहते हैं तो मुझे महेश्वर-सरीखा पुत्र प्रदान कीजिये। इसके अतिरिक्त मैं दूसरा वर नहीं चाहती।'

नन्दीश्वरजी कहते हैं—मुने ! पत्नीकी बात सुनकर पवित्र व्रतपरायण ब्राह्मण विश्वानर क्षणभरके लिये समाधिस्थ हो गये और हृदयमें यों विचार करने लगे—'अहो ! मेरी इस सूक्ष्मांगी पत्नीने कैसा अत्यन्त दुर्लभ वर माँगा है। यह तो मेरे मनोरथ-पथसे बहुत दूर है। अच्छा, शिवजी तो सब कुछ करनेमें समर्थ हैं। ऐसा प्रतीत होता है, मानो उन शम्भुने ही इसके मुखमें बैठकर वाणीरूपसे ऐसी बात कही है, अन्यथा दूसरा कौन ऐसा करनेमें समर्थ हो सकता है। तदनन्तर वे एकपत्नीव्रती मुनि विश्वानर पत्नीको आश्वासन देकर वाराणसीमें गये और घोर तपके द्वारा भगवान् शिवके वीरेश लिंगकी आराधना करने लगे। इस प्रकार उन्होंने एक वर्षपर्यन्त भक्तिपूर्वक उत्तम वीरेश लिंगकी त्रिकाल अर्चना करते हुए अद्भुत तप किया। तेरहवाँ मास आनेपर एक दिन वे द्विजवर प्रातःकाल त्रिपथगामिनी गंगाके जलमें स्नान करके ज्यों ही वीरेशके निकट पहुँचे, त्यों ही उन तपोधनको उस लिंगके मध्य एक अष्टवर्षीय विभूतिभूषित बालक दिखायी दिया। उस नग्न शिशुके नेत्र कानोंतक फैले हुए थे, होठोंपर गहरी लालिमा छायी हुई थी, मस्तकपर पीले रंगकी सुन्दर जटा सुशोभित थी और मुखपर हँसी खेल रही थी। वह शैशवोचित अलंकार और चिताभस्म धारण किये हुए था तथा अपनी लीलासे हँसता हुआ श्रुतिसूक्तोंका पाठ कर रहा था। उस बालकको देखकर विश्वानर मुनि कृतार्थ हो गये और आनन्दके कारण उनका शरीर रोमांचित हो उठा तथा बारंबार 'नमस्कार है, नमस्कार है' यों उनका हृदयोद्गार फूट पड़ा। फिर वे अभिलाषा पूर्ण करनेवाले आठ पद्योंद्वारा बालरूपधारी परमानन्दस्वरूप शम्भुका स्तवन करते हुए बोले।

विश्वानरने कहा—भगवान् ! आप ही एकमात्र अद्वितीय ब्रह्म हैं, यह सारा जगत् आपका ही स्वरूप है, यहाँ अनेक कुछ भी नहीं है। यह बिलकुल सत्य है कि एकमात्र रुद्रके अतिरिक्त दूसरे किसीकी सत्ता नहीं है, इसलिये मैं आप महेशकी शरण ग्रहण करता हूँ। शम्भो ! आप ही सबके कर्ता-हर्ता हैं, तथा जैसे आत्मधर्म एक होते हुए भी अनेक रूपसे दीखता है, उसी प्रकार आप भी एकरूप होकर नाना रूपोंमें व्याप्त हैं।

* शतरुद्रसंहिता * ४५५

फिर भी आप रूपरहित हैं। इसलिये आप ईश्वरके अतिरिक्त मैं किसी दूसरेकी शरण नहीं ले सकता। जैसे रज्जुमें सर्प, सीपीमें चाँदी और मृगमरीचिकामें जलप्रवाहका भान मिथ्या है, उसी प्रकार, जिसे जान लेनेपर यह विश्वप्रपंच मिथ्या भासित होता है, उन महेश्वरकी मैं शरण लेता हूँ। शम्भो! जलमें जो शीतलता, अग्निमें दाहकता, सूर्यमें गरमी, चन्द्रमामें आह्लादकारिता, पुष्पमें गन्ध और दुग्धमें घी वर्तमान है, वह आपका ही स्वरूप है, अतः मैं आपके शरण हूँ। आप कानरहित होकर शब्द सुनते हैं; नासिकाविहीन होकर सूँघते हैं। पैर न होनेपर भी दूरतक चले जाते हैं, नेत्रहीन होकर सब कुछ देखते हैं और जिह्वारहित होकर भी समस्त रसोंके ज्ञाता हैं। भला, आपको सम्यक्-रूपसे कौन जान सकता है। इसलिये मैं आपकी शरणमें जाता हूँ। ईश! आपके रहस्यको न तो साक्षात् वेद ही जानता है न विष्णु, न अखिल विश्वके विधाता ब्रह्मा, न योगीन्द्र और न इन्द्र आदि प्रधान देवताओंको ही इसका पता है; परंतु आपका भक्त उसे जान लेता है, अतः मैं आपकी शरण ग्रहण करता हूँ। ईश ! न तो आपका कोई गोत्र है, न जन्म है, न नाम है न रूप है, न शील है और न देश है; ऐसा होनेपर भी आप त्रिलोकीके अधीश्वर तथा सम्पूर्ण कामनाओंको पूर्ण करनेवाले हैं, इसलिये मैं आपका भजन करता हूँ। स्मरारे! आप सर्वस्वरूप हैं, यह सारा विश्वप्रपंच आपसे ही प्रकट हुआ है। आप गौरीके प्राणनाथ, दिगम्बर और परम शान्त हैं। बाल, युवा और वृद्धरूपमें आप ही वर्तमान हैं। ऐसी कौन-सी वस्तु है, जिसमें आप व्याप्त न हों; अतः मैं आपके चरणोंमें नतमस्तक हूँ।*

नन्दीश्वर कहते हैं—मुने! यों स्तुति करके विप्रवर विश्वानर हाथ जोड़कर भूमिपर गिरना ही चाहते थे, तबतक सम्पूर्ण वृद्धोंके भी वृद्ध बालरूपधारी शिव परम हर्षित होकर उन भूदेवसे बोले।

बालरूपी शिवने कहा—मुनिश्रेष्ठ विश्वानर! तुमने आज मुझे संतुष्ट कर दिया है। भूदेव! मेरा मन परम प्रसन्न हो गया है, अतः अब तुम उत्तम वर माँग लो। यह सुनकर मुनिश्रेष्ठ विश्वानर कृतकृत्य हो गये


* विश्वानर उवाच—
एकं ब्रह्मैवाद्वितीयं समस्तं सत्यं सत्यं नेह नानास्ति किंचित्। एको रुद्रो न द्वितीयोऽवतस्थे तस्मादेकं त्वां प्रपद्ये महेशम्॥
कर्ता हर्ता त्वं हि सर्वस्य शम्भो नानारूपेष्वेकरूपोऽप्यरूपः। यद्वत्प्रत्यग्धर्म एकोऽप्यनेकस्तस्मान्नान्यं त्वां विनेशं प्रपद्ये॥
रज्जौ सर्पः शुक्तिकायां च रौप्यं नरैः पूरस्तन्मृगाख्ये मरीचौ। यद्वत्तद्वद्विश्वमेष प्रपञ्चो यस्मिन् ज्ञाते तं प्रपद्ये महेशम्॥
तोये शैत्यं दाहकत्वं च वह्नौ तापो भानौ शीतभानौ प्रसादः। पुष्पे गन्धो दुग्धमध्येऽपि सर्पिर्यत्तच्छम्भो त्वं ततस्त्वां प्रपद्ये॥
शब्दं गृह्णास्यश्रवास्त्वं हि जिघ्रस्यघ्राणस्त्वं व्यङ्घ्रिरायासि दूरात्। व्यक्षः पश्येस्त्वं रसज्ञोऽप्यजिह्वः कस्त्वां सम्यग्वेत्त्यतस्त्वां प्रपद्ये॥
नो वेदस्त्वामीश साक्षाद्धि वेद नो वा विष्णुर्नों विधाताखिलस्य। नो योगीन्द्रा नेन्द्रमुख्याश्च देवा भक्तो वेद त्वामतस्त्वां प्रपद्ये॥
नो ते गोत्रं नेश जन्मापि नाख्या नो वा रूपं नैव शीलं न देशः। इत्थम्भूतोऽपीश्वरस्त्वं त्रिलोक्याः सर्वान् कामान् पूरयेस्तद् भजे त्वाम्॥
त्वतः सर्वं त्वं हि सर्वं स्मरारे त्वं गौरीशस्त्वं च नग्नोऽतिशान्तः। त्वं वै वृद्धस्त्वं युवा त्वं च बालस्तत्त्वं यत् किं नास्यतस्त्वां नतोऽहम्॥
(शि० पु० शतरुद्रसंहिता १३। ४२—४९)

४५६ * संक्षिप्त शिवपुराण *

और उनका मन हर्षमग्न हो गया। तब वे उठकर बालरूपधारी शंकरजीसे बोले।

विश्वानरने कहा—प्रभावशाली महेश्वर! आप तो सर्वान्तर्यामी, ऐश्वर्यसम्पन्न, शर्व तथा भक्तोंको सब कुछ दे डालनेवाले हैं। भला, आप सर्वज्ञसे कौन-सी बात छिपी है। फिर भी आप मुझे दीनता प्रकट करनेवाली यांचाके प्रति आकृष्ट होनेके लिये क्यों कह रहे हैं। महेशान! ऐसा जानकर आपकी जैसी इच्छा हो, वैसा कीजिये।

नन्दीश्वरजी कहते हैं—मुने! पवित्र व्रतमें तत्पर विश्वानरके उस वचनको सुनकर पावन शिशुरूपधारी महादेव हँसकर शुचि (विश्वानर)-से बोले—'शुचे! तुमने अपने हृदयमें अपनी पत्नी शुचिष्मतीके प्रति जो अभिलाषा कर रखी है, वह निस्संदेह थोड़े ही समयमें पूर्ण हो जायगी। महामते! मैं शुचिष्मतीके गर्भसे तुम्हारा पुत्र होकर प्रकट होऊँगा। मेरा नाम गृहपति होगा। मैं परम पावन तथा समस्त देवताओंके लिये प्रिय होऊँगा। जो मनुष्य एक वर्षतक शिवजीके संनिकट तुम्हारे द्वारा कथित इस पुण्यमय अभिलाषाष्टक स्तोत्रका तीनों काल पाठ करेगा, उसकी सारी अभिलाषाएँ यह पूर्ण कर देगा। इस स्तोत्रका पाठ पुत्र, पौत्र और धनका प्रदाता, सर्वथा शान्तिकारक, सारी विपत्तियोंका विनाशक, स्वर्ग और मोक्षरूप सम्पत्तिका कर्ता तथा समस्त कामनाओंको पूर्ण करनेवाला है। निस्संदेह यह अकेला ही समस्त स्तोत्रोंके समान है।'

नन्दीश्वरजी कहते हैं—मुने! इतना कहकर बालरूपधारी शम्भु, जो सत्पुरुषोंकी गति हैं, अन्तर्धान हो गये। तब विप्रवर विश्वानर भी प्रसन्न मनसे अपने घरको लौट गये। (अध्याय ८–१३)

~~ ० ~~

शिवजीका शुचिष्मतीके गर्भसे प्राकट्य, ब्रह्माद्वारा बालकका संस्कार करके 'गृहपति' नाम रखा जाना, नारदजीद्वारा उसका भविष्य-कथन, पिताकी आज्ञासे गृहपतिका काशीमें जाकर तप करना, इन्द्रका वर देनेके लिये प्रकट होना, गृहपतिका उन्हें ठुकराना, शिवजीका प्रकट होकर उन्हें वरदान देकर दिक्पालपद प्रदान करना तथा अग्नीश्वरलिंग और अग्निका माहात्म्य

नन्दीश्वरजी कहते हैं—मुने! घर आकर उस ब्राह्मणने बड़े हर्षके साथ अपनी पत्नीसे वह सारा वृत्तान्त कह सुनाया। उसे सुनकर विप्रपत्नी शुचिष्मतीको महान् आनन्द प्राप्त हुआ। वह अत्यन्त प्रेमपूर्वक अपने भाग्यकी सराहना करने लगी। तदनन्तर समय आनेपर ब्राह्मणद्वारा विधिपूर्वक गर्भाधान कर्म सम्पन्न किये जानेपर वह नारी गर्भवती हुई। फिर उन विद्वान् मुनिने गर्भके स्पन्दन करनेसे पूर्व ही पुंस्त्वकी वृद्धिके लिये गृह्यसूत्रमें वर्णित विधिके अनुसार सम्यक्-रूपसे पुंसवन-संस्कार किया। तत्पश्चात् आठवाँ महीना आनेपर कृपालु विश्वानरने सुखपूर्वक प्रसव

* शतरुद्रसंहिता * ४५७

होनेके अभिप्रायसे गर्भके रूपकी समृद्धि करनेवाला सीमन्त-संस्कार सम्पन्न कराया। तदुपरान्त ताराओंके अनुकूल होनेपर जब बृहस्पति केन्द्रवर्ती हुए और शुभ ग्रहोंका योग आया, तब शुभ लग्नमें भगवान् शंकर, जिनके मुखकी कान्ति पूर्णिमाके चन्द्रमाके समान है तथा जो अरिष्टरूपी दीपकको बुझानेवाले, समस्त अरिष्टोंके विनाशक और भूः, भुवः, स्वः—तीनों लोकोंके निवासियोंको सब तरहसे सुख देनेवाले हैं, उस शुचिष्मतीके गर्भसे पुत्ररूपमें प्रकट हुए। उस समय गन्धको वहन करनेवाले वायुके वाहन मेघ दिशारूपी वधुओंके मुखपर वस्त्र-से बन गये अर्थात् चारों ओर काली घटा उमड़ आयी। वे घनघोर बादल उत्तम गन्धवाले पुष्पसमूहोंकी वर्षा करने लगे। देवताओंकी दुन्दुभियाँ बजने लगीं। चारों ओर दिशाएँ निर्मल हो गयीं। प्राणियोंके मनोंके साथ-साथ सरिताओंका जल निर्मल हो गया। प्राणियोंकी वाणी सर्वथा कल्याणी और प्रियभाषिणी हो उठी। सम्पूर्ण प्रसिद्ध ऋषि-मुनि तथा देवता, यक्ष, किंनर, विद्याधर आदि मंगल द्रव्य ले-लेकर पधारे। स्वयं ब्रह्माजीने नम्रतापूर्वक उसका जातकर्म-संस्कार किया और उस बालकके रूप तथा वेदका विचार करके यह निश्चय किया कि इसका नाम गृहपति होना चाहिये। फिर ग्यारहवें दिन उन्होंने नामकरणकी विधिके अनुसार वेदमन्त्रोंका उच्चारण करते हुए उसका 'गृहपति' ऐसा नामकरण किया। तत्पश्चात् सबके पितामह ब्रह्मा चारों वेदोंमें कथित आशीर्वादात्मक मन्त्रोंद्वारा उसका अभिनन्दन करके हंसपर आरूढ़ हो अपने लोकको चले गये। तदुपरान्त शंकर भी लौकिकी गतिका आश्रय ले उस बालककी उचित रक्षाका विधान करके अपने वाहनपर चढ़कर अपने धामको पधार गये। इसी प्रकार श्रीहरिने भी अपने लोककी राह ली। इस प्रकार सभी देवता, ऋषि-मुनि आदि भी प्रशंसा करते हुए अपने-अपने स्थानको पधार गये। तदनन्तर ब्राह्मण देवताने यथासमय सब संस्कार करते हुए बालकको वेदाध्ययन कराया। तत्पश्चात् नवाँ वर्ष आनेपर माता-पिताकी सेवामें तत्पर रहनेवाले विश्वानर-नन्दन गृहपतिको देखनेके लिये वहाँ नारदजी पधारे। बालकने माता-पितासहित नारदजीको प्रणाम किया। फिर नारदजीने बालककी हस्तरेखा, जिह्वा, तालु आदि देखकर कहा—'मुनि विश्वानर ! मैं तुम्हारे पुत्रके लक्षणोंका वर्णन करता हूँ, तुम आदरपूर्वक उसे श्रवण करो। तुम्हारा यह पुत्र परम भाग्यवान् है, इसके सम्पूर्ण अंगोंके लक्षण शुभ हैं। किंतु इसके सर्वगुणसम्पन्न, सम्पूर्ण शुभलक्षणोंसे समन्वित और चन्द्रमाके समान सम्पूर्ण निर्मल कलाओंसे सुशोभित होनेपर भी विधाता ही इसकी रक्षा करें। इसलिये सब तरहके उपायोंद्वारा इस शिशुकी रक्षा करनी चाहिये; क्योंकि विधाताके विपरीत होनेपर गुण भी दोष हो जाता है। मुझे शंका है कि इसके बारहवें वर्षमें इसपर बिजली अथवा अग्निद्वारा विघ्न आयेगा।' यों कहकर नारदजी जैसे आये थे, वैसे ही देवलोकको चले गये।

सनत्कुमारजी ! नारदजीका कथन सुनकर पत्नीसहित विश्वानरने समझ लिया कि यह तो बड़ा भयंकर वज्रपात हुआ। फिर वे 'हाय ! मैं मारा गया' यों कहकर छाती पीटने लगे और पुत्रशोकसे व्याकुल होकर

४५८ * संक्षिप्त शिवपुराण *

गहरी मूर्च्छाके वशीभूत हो गये। उधर शुचिष्मती भी दुःखसे पीड़ित हो अत्यन्त ऊँचे स्वरसे हाहाकार करती हुई ढाढ़ मारकर रो पड़ी, उसकी सारी इन्द्रियाँ अत्यन्त व्याकुल हो उठीं। तब पत्नीके आर्तनादको सुनकर विश्वानर भी मूर्च्छा त्यागकर उठ बैठे और 'ऐं! यह क्या है? क्या हुआ?' यों उच्चस्वरसे बोलते हुए कहने लगे—'गृहपति! जो मेरा बाहर विचरनेवाला प्राण, मेरी सारी इन्द्रियोंका स्वामी तथा मेरे अन्तरात्मामें निवास करनेवाला है, कहाँ है?' तब माता-पिताको इस प्रकार अत्यन्त शोकग्रस्त देखकर शंकरके अंशसे उत्पन्न हुआ वह बालक गृहपति मुसकराकर बोला।

गृहपतिने कहा—माताजी तथा पिताजी! बताइये इस समय आपलोगोंके रोनेका क्या कारण है? किसलिये आपलोग फूट-फूटकर रो रहे हैं? कहाँसे ऐसा भय आपलोगोंको प्राप्त हुआ है? यदि मैं आपकी चरणरेणुओंसे अपने शरीरकी रक्षा कर लूँ तो मुझपर काल भी अपना प्रभाव नहीं डाल सकता; फिर इस तुच्छ, चंचल एवं अल्प बलवाली मृत्युकी तो बात ही क्या है। माता-पिताजी! अब आपलोग मेरी प्रतिज्ञा सुनिये—'यदि मैं आपलोगोंका पुत्र हूँ तो ऐसा प्रयत्न करूँगा जिससे मृत्यु भी भयभीत हो जायगी। मैं सत्पुरुषोंको सब कुछ दे डालनेवाले सर्वज्ञ मृत्युंजयकी भलीभाँति आराधना करके महाकालको भी जीत लूँगा—यह मैं आप लोगोंसे बिलकुल सत्य कह रहा हूँ।'

नन्दीश्वरजी कहते हैं—मुने! तब वे द्विजदम्पति, जो शोकसे संतप्त हो रहे थे, गृहपतिके ऐसे वचन, जो अकालमें हुई अमृतकी घनघोर वृष्टिके समान थे, सुनकर संतापरहित हो कहने लगे—'बेटा! तू उन शिवकी शरणमें जा, जो ब्रह्मा आदिके भी कर्ता, मेघवाहन, अपनी महिमासे कभी च्युत न होनेवाले और विश्वकी रक्षामणि हैं।'

नन्दीश्वरजी कहते हैं—मुने! माता-पिताकी आज्ञा पाकर गृहपतिने उनके चरणोंमें प्रणाम किया। फिर उनकी प्रदक्षिणा करके और उन्हें बहुत तरहसे आश्वासन दे वे वहाँसे चल पड़े और उस काशीपुरीमें जा पहुँचे, जो ब्रह्मा और नारायण आदि देवोंके लिये ( भी ) दुष्प्राप्य, महाप्रलयके संतापका विनाश करनेवाली और विश्वनाथद्वारा सुरक्षित थी तथा जो कण्ठप्रदेशमें हारकी तरह पड़ी हुई गंगासे सुशोभित तथा विचित्र गुणशालिनी हरपत्नी गिरिजासे विभूषित थी। वहाँ पहुँचकर वे विप्रवर पहले मणिकर्णिकापर गये। वहाँ उन्होंने विधिपूर्वक स्नान करके भगवान् विश्वनाथका दर्शन किया। फिर बुद्धिमान् गृहपतिने परमानन्दमग्न हो त्रिलोकीके प्राणियोंकी प्राणरक्षा करनेवाले शिवको प्रणाम किया। उस समय उनकी अंजलि बँधी थी और सिर झुका हुआ था। वे बारंबार उस शिवलिंगकी ओर देखकर हृदयमें हर्षित हो रहे थे ( और यह सोच रहे थे कि ) यह लिंग निस्संदेह स्पष्टरूपसे आनन्दकन्द ही है। ( वे कहने लगे— ) अहो! आज मुझे जो सर्वव्यापी श्रीमान् विश्वनाथका दर्शन प्राप्त हुआ, इसलिये इस चराचर त्रिलोकीमें मुझसे बढ़कर धन्यवादका पात्र दूसरा कोई नहीं है। जान पड़ता है, मेरा भाग्योदय होनेसे ही उन दिनोंमें

* शतरुद्रसंहिता * ४५९

महर्षि नारदने आकर वैसी बात कही थी, जिसके कारण आज मैं कृतकृत्य हो रहा हूँ।

नन्दीश्वरजी कहते हैं—मुने ! इस प्रकार आनन्दामृतरूपी रसोंद्वारा पारण करके गृहपतिने शुभ दिनमें सर्वहितकारी शिवलिंगकी स्थापना की और पवित्र गंगाजलसे भरे हुए एक सौ आठ कलशोंद्वारा शिवजीको स्नान कराकर ऐसे घोर नियमोंको स्वीकार किया, जो अकृतात्मा पुरुषोंके लिये दुष्कर थे। नारदजी! इस प्रकार एकमात्र शिवमें मन लगाकर तपस्या करते हुए उस महात्मा गृहपतिकी आयुका एक वर्ष व्यतीत हो गया। तब जन्मसे बारहवाँ वर्ष आनेपर नारदजीके कहे हुए उस वचनको सत्य-सा करते हुए वज्रधारी इन्द्र उनके निकट पधारे और बोले—'विप्रवर! मैं इन्द्र हूँ और तुम्हारे शुभ व्रतसे प्रसन्न होकर आया हूँ। अब तुम वर माँगो, मैं तुम्हारी मनोवांछा पूर्ण कर दूँगा।'

तब गृहपतिने कहा—मघवन् ! मैं जानता हूँ, आप वज्रधारी इन्द्र हैं; परंतु वृत्रशत्रो ! मैं आपसे वर याचना करना नहीं चाहता, मेरे वरदायक तो शंकरजी ही होंगे।

इन्द्र बोले—शिशो ! शंकर मुझसे भिन्न थोड़े ही हैं। अरे ! मैं देवराज हूँ, अतः तुम अपनी मूर्खताका परित्याग करके वर माँग लो, देर मत करो।

गृहपतिने कहा—पाकशासन! आप अहल्याका सतीत्व नष्ट करनेवाले दुराचारी पर्वतशत्रु ही हैं न। आप जाइये; क्योंकि मैं पशुपतिके अतिरिक्त किसी अन्य देवके सामने स्पष्टरूपसे प्रार्थना करना नहीं चाहता।

नन्दीश्वरजी कहते हैं—मुने! गृहपतिके उस वचनको सुनकर इन्द्रके नेत्र क्रोधसे लाल हो गये। वे अपने भयंकर वज्रको उठाकर उस बालकको डराने-धमकाने लगे। तब बिजलीकी ज्वालाओंसे व्याप्त उस वज्रको देखकर बालक गृहपतिको नारदजीके वाक्य स्मरण हो आये। फिर तो वे भयसे व्याकुल होकर मूर्च्छित हो गये। तदनन्तर अज्ञानान्धकारको दूर भगानेवाले गौरीपति शम्भु वहाँ प्रकट हो गये और अपने हस्तस्पर्शसे उसे जीवनदान देते हुए-से बोले—'वत्स ! उठ, उठ। तेरा कल्याण हो।' तब रात्रिके समय मूँदे हुए कमलकी तरह उसके नेत्रकमल खुल गये और उसने उठकर अपने सामने सैकड़ों सूर्योंसे भी अधिक प्रकाशमान शम्भुको उपस्थित देखा। उनके ललाटमें तीसरा नेत्र चमक रहा था, गलेमें नीला चिह्न था, ध्वजापर वृषभका स्वरूप दीख रहा था, वामांगमें गिरिजादेवी विराजमान थीं। मस्तकपर चन्द्रमा सुशोभित था। बड़ी-बड़ी जटाओंसे उनकी अद्भुत शोभा हो रही थी। वे अपने आयुध त्रिशूल और आजगव धनुष धारण किये हुए थे। कपूरके समान गौरवर्णका शरीर अपनी प्रभा बिखेर रहा था, वे गजचर्म लपेटे हुए थे। उन्हें देखकर शास्त्रकथित लक्षणों तथा गुरु-वचनोंसे जब गृहपतिने समझ लिया कि ये महादेव ही हैं, तब हर्षके मारे उनके नेत्रोंमें आँसू छलक आये, गला रुँध गया और शरीर रोमांचित हो उठा। वे क्षणभरतक अपने-आपको भूलकर चित्रकूट एवं त्रिपुत्रक पर्वतकी भाँति निश्चल खड़े रह गये। जब वे स्तवन करने, नमस्कार करने अथवा कुछ भी