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शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)

Shiva Samhita with Hindi Commentary

भगवान् शिव / पं. मिहिरचन्द्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished216 पृष्ठ

द्वितीयपटलः । ( ४७ ) धिवत्सुधीः ॥ तस्मिन्नन्नं हुनेद्योगी प्रत्य- हं गुरुशिक्षया ॥ ३६ ॥ टीका-इस वैश्वानर अग्निको गुरुके शिक्षापूर्वक प्रज्वलित करके नित्य उसमें अन्नका होम करै अर्थात् भोजन करै ॥ ३६ ॥ मूलम्-ब्रह्माण्डसंज्ञके देहे स्थानानि स्युर्ब- हूनि च ॥ मयोक्तानि प्रधानानि ज्ञात- व्यानीह शास्त्रके ॥३७॥ नानाप्रकारना- मानि स्थानानि विविधानि च ॥ वर्तन्ते विग्रहे तानि कथितुं नैव शक्यते ॥ ३८॥ टीका-यह शरीर ब्रह्माण्डसंज्ञक है इसमें बहुत स्थान हैं हमने प्रधान प्रधान स्थान कहे हैं ये शास्त्रसे जाने जाते हैं बहुत प्रकारके स्थान और नाम उन स्थानोंके हैं जो इस शरीरमें वर्तमानहैं उनके वर्णन करनेको हम शक्य नहींहै अर्थात् बहुत विस्तारहै उसके कहनेमें व्यर्थ परिश्रम है ॥ ३७ ॥ ३८ ॥ मूलम्-इत्थं प्रकल्पिते देहे जीवो वसति सर्व्वगः ॥ अनादिवासनामालाऽलंकृतः कर्मशृङ्गलः ॥ ३९ ॥ टीका-इसी तरह शरीर कल्पित है और जीव पूर्व-

( ४८ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । वासनारूपी बेडीमें फँसके मालाके तरह घूमा करता है ॥ ३९ ॥ मूलम्--नानाविधगुणोपेतः सर्वव्यापारका- रकः ॥ पूर्वार्जितानि कर्माणि भुनक्ति विविधानि च ॥ ४० ॥ टीका-सोई जीव नानाप्रकारके गुण ग्रहण करताहै और संसारमें बहुत प्रकारके व्यापार करताहै यह सब पूर्वार्जित शुभाशुभ कर्मके फल भोगताहै ॥ ४० ॥ मूलम्--यद्यत्संदृश्यते लोके सर्वं तत्कर्मस- म्भवम् ॥ सर्वः कर्मानुसारेण जन्तुर्भोगा- न्भुनक्ति वै ॥ ४१ ॥ टीका-जो जो शुभाशुभ कर्म संसारमें देखपड- ताहै वह सबका आदिकारण कर्मही है प्राणीमात्र अपने कर्मके अनुसार भोग भोगता है ॥ ४१ ॥ मूलम्--ये ये कामादयो दोषाः सुखदुःख- प्रदायकाः॥ ते ते सर्वे प्रवर्तन्ते जीवकर्मा- नुसारतः ॥ ४२ ॥ टीका-जो जो काम क्रोध आदिसे सुख दुःख होताहै सो सब जीवके कर्महीके अनुसार वर्तताहै ॥ ४२ ॥

द्वितीयपटलः । ( ४९ ) मूलम्--पुण्योपरक्तचैतन्ये प्राणान्प्रीणाति केवलम् ॥ बाह्ये पुण्यमयं प्राप्य भोज्यव- स्तु स्वयम्भवेत् ॥ ४३ ॥ टीका-पुण्यकर्मके अनुष्ठान करनेसे प्राणीको सुख होता है और बाह्य वस्तु श्रेष्ठ भोजनआदि नानाप्र- कारकी वस्तु आपही मिल जातीहै ॥ ४३ ॥ मूलम्--ततः कर्मबलात्पुंसः सुखं वा दुःखमे- व च ॥ पापोपरक्तचैतन्यं नैव तिष्ठति नि- श्रितम् ॥४४॥ न तद्भिन्नो भवेत्सोऽपि त- द्भिन्नो न तु किञ्चन ॥ मायोपहितचैत- न्यात्सर्वं वस्तु प्रजायते ॥ ४५ ॥ टीका-यह प्राणी अपने कर्मके बलसे सुख वा दुःख भोगताहै, जीव जब पापमें आसक्त होताहै तब दुःख भोगताहै, फिर उसको सुखलाभ नहीं होता. जीव अपने कर्मके अनुसार सुख वा दुःख भोगताहै इसमें भिन्नता नहीं है अर्थात् कर्त्ता भोक्तामें भेद नहीं. चैतन्य आत्मा जब मायोपहित होताहै तब सब वस्तु-उत्पन्न होताहै ॥ ४४ ॥ ४५ ॥ मूलम्--यथाकालेपि भोगाय जन्तूनां विवि-

( ५० ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । धोद्भवः ॥ यथा दोषवशाच्छुक्तौ रजता- रोपणं भवेत् ॥ तथा स्वकर्मदोषार्द्धै ब्रह्म- ण्यारोप्यते जगत् ॥ ४६ ॥ टीका-जैसा काल भोगके हेतु निश्चय रहता है उसमें प्राणी नानाप्रकारसे भोग भोगनेके लिये उत्पन्न होताहै जैसे नेत्रके विकारके कारणसे सीपीमें चाँदीका आरोप होताहै वैसेही अपने कर्मके दोषसे प्राणी ब्र- ह्ममें मिथ्या जगत्का आरोप करताहै ॥ ४६ ॥ मूलम्-सवासनाभ्रमोत्पन्नोन्मूलनातिस- मर्थनम् ॥ उत्पन्नञ्चेदीदृशं स्याज्ज्ञानं मोक्षप्रसाधनम् ॥ ४७ ॥ टीका-वासनासे भ्रम उत्पन्न होताहै जबतक वासनाकी जड नहीं जाती तबतक कदापि भ्रम दूर नहीं होता इसी तरह जब ज्ञान उत्पन्न होताहै तब कुछ नहीं रह जाता इस हेतुसे ज्ञानही मोक्षका साधन है ॥ ४७ ॥ मूलम्-साक्षाद्वैशेषदृष्टिस्तु साक्षात्कारिणि विभ्रमे ॥ करणं नान्यथा युक्त्या सत्यं सत्यं मयोदितम् ॥ ४८ ॥ टीका-विशेष करके दृष्टिसे साक्षात् जो देखपड-

द्वितीयपटलः । ( ५१ ) ताहै वही साक्षात् भ्रमका कारणहै अर्थात् इसी साक्षा- त्में मनुष्य फँसाहै मायाके आवरणसे बुद्धि आगे नहीं जाती और दूसरा कारण कुछ नहीं है यह हम सत्य कहते हैं ॥ ४८ ॥ मूलम्-साक्षात्कारिभ्रमे साक्षात्साक्षा- त्कारिणि नाशयेत् ॥ सो हि नास्तीति संसारे भ्रमो नैव निवर्तते ॥ ४९ ॥ टीका-यह साक्षात् घटपट आदिका भ्रम ब्रह्मके प्रत्यक्ष होनेसे नाश होताहै बिना आत्माके प्रत्यक्ष भये ब्रह्म संसारमें नहीं है यह भ्रम निवृत्त नहीं होता ॥ ४९ ॥ मूलम्-मिथ्याज्ञाननिवृत्तिस्तु विशेषदर्शना- द्भवेत् ॥ अन्यथा न निवृत्तिः स्याद्दृश्य- ते रजतभ्रमः ॥ ५० ॥ टीका-यह मिथ्या संसारका ज्ञान आत्माका विशे- ष दर्शन होनेसे निवृत्त होता है और किसीप्रकार इस अज्ञानकी निवृत्ति नहीं होती. जैसे सीपीमें चाँदीका भ्रम विना सीपीके निश्चय भये दूर नहीं होता ॥ ५० ॥ मूलम्-यावन्नोत्पद्यते ज्ञानं साक्षात्कारे निरञ्जने ॥ तावत्सर्वाणि भूतानि दृश्य- न्ते विविधानि च ॥ ५१ ॥

(५२) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । टीका-जबतक आत्माका साक्षात्कार ज्ञान नहीं होता तबतक सब प्राणी संसार आदि नाना प्रकारके देखपडते हैं ॥ ५१ ॥ मूलम्-यदा कर्मार्जितं देहं निर्वाणे साधनं भवेत् ॥ तदा शरीरवहनं सफलं स्यान्न चान्यथा ॥ ५२ ॥ टीका-जो यह कर्मार्जित शरीर है इससे निर्वाण अर्थात् आत्मज्ञानका साधन होयतब इसका जन्म और स्थिति सुफल है नहीं तो व्यर्थ है. तात्पर्य यह है कि, जिस मनुष्यको आत्मज्ञान नहीं हुआ या इस वि- षयका उसने साधन नहीं किया उसका जन्म केवल माताके दुःख देने और पृथ्वीपर भारके हेतु भया॥५२॥ मूलम्-यादृशी वासना मूला वर्त्तते जीवसं- गिनी ॥ तादृशं वहते जन्तुः कृत्याकृत्य- विधौ भ्रमम् ॥ ५३ ॥ टीका-जैसी वासना जीवके संग रहती है वैसेही प्राणी शुभाशुभ कर्म भ्रमके वश होके करताहै और उ- सी वासनासे उत्पन्न और नाश होता रहताहै ॥ ५३ ॥ मूलम्-संसारसागरं तर्तुं यदीच्छेद्योगसा- धकः ॥ कृत्वा वर्णाश्रमं कर्म फलवर्जं तदाचरेत् ॥ ५४ ॥

द्वितीयपटलः। (५३) टीका-योगसाधक यदि संसारसे तरनेकी इच्छा करे तो यावत् वर्णाश्रमका कर्म फलरहित करना उचित है ॥ ५४ ॥ मूलम्-विषयासक्तपुरुषा विषयेषु सुखेप्स- वः ॥ वाचामिरुद्धनिर्वाणा वर्तन्ते पापक- र्मणि ॥ ५५ ॥ टीका-विषयासक्त पुरुष सुख और विषयकी इच्छा में सर्वदा रहते हैं और पापकर्ममें ऐसे तत्पर रहते हैं कि, वाक्यभी उनका परमार्थ विषयमें रुद्ध रहता है अर्थात् मोक्षका साधन तो बहुत दूर है परन्तु परमार्थकी चर्चासेभी उनको ज्वर चढ़ताहै ॥ ५५ ॥ मूलम्-आत्मानमात्मना पश्यन्न किञ्चिदि- ह पश्यति॥ तदा कर्मपरित्यागे न दोषोऽ- स्ति मतं मम ॥ ५६ ॥ टीका-जब ज्ञानी आत्मासे आत्माको देखे और सब वस्तुका अभाव जानपड़े तब कर्मको त्यागदेनेमें कुछ दोष नहीं है यह हमारा मतहै ऐसा श्रीशिवजी जगन्माता पार्वतीजीसे कहते हैं ॥ ५६ ॥ मूलम्-कामादयो विलीयन्ते ज्ञानादेव न चान्यथा ॥ अभावे सर्वतत्त्वानां स्वयं त- त्त्वं प्रकाशते ॥ ५७ ॥:

( ५४ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । टीका-ज्ञानमें काम क्रोधादि सकल पदार्थ लय होजाते हैं इसमें अन्यथा नहीं है, जब स्वयंतत्त्व' अ- र्थात् आत्मज्ञान प्रकाश होताहै तब सब तत्त्वोंका अभाव होजाताहै ॥ ५७ ॥ इति श्रीशिवसंहितायां हरगौरीसंवादे योगप्रकथने तत्त्वज्ञानोपदेशो नाम द्वितीयः पटलः ॥ २ ॥ अथ तृतीयपटलः । मूलम्-हृद्यस्ति पङ्कजं दिव्यं दिव्यलिङ्गेन भूषितम् ॥ कादिठान्ताक्षरोपेतं द्वादशार्ण विभूषितम् ॥ १ ॥ टीका-प्राणीके हृदयस्थानमें एक पद्म सुन्दर दि- व्यलिङ्गसे शोभायमानहै यह पद्म क-से-ठ-तक द्वादश वर्ण करके शोभित है अर्थात् क-ख-ग-घ-ङ-च-छ-ज- झ-ञ-ट-ठ ॥ १ ॥ मूलम्-प्राणो वसति तत्रैव वासनाभिरलंकृ- तः ॥ अनादिकर्मसंश्लिष्टः प्राप्याहङ्कार- संयुतः ॥ २ ॥ टीका-उसी पद्ममें प्राणकी स्थितिहै और अनादि कर्म अहंकारसंयुक्त वासनासे अलंकृतहै ॥ २ ॥

तृतीयपटलः । (५५) मूलम्--प्राणस्य वृत्तिभेदेन नामानि विवि- धानि च ।। वर्तन्ते तानि सर्वाणि कथितुं नैव शक्यते ॥ ३ ॥ टीका--प्राणके वृत्तिभेदसे जो इस शरीरमें वायु व- र्तमान हैं उनके बहुतप्रकारके नाम हैं जिनके वर्णन करनेको हम शक्य नहीं हैं अर्थात् यहां उनके वर्णन का प्रयोजन नहीं है ॥ ३ ॥ मूलम्-प्राणोऽपानः समानश्चोदानो व्यान- श्च पञ्चमः ॥ नागः कूर्मश्चकृकरो देवदत्तो धनञ्जयः॥ ४ ॥दशनामानिमुख्यानि म- योक्तानीह शास्त्रके ।। कुर्वन्तित्तेऽत्रकार्या- णि प्रेरितानि स्वकर्मभिः ॥ ५ ॥ टीका--प्राणके मुख्य भेदोंका नाम प्राण, अपान, समान, उदान, पांचवां व्यान और नाग, कूर्म, कृकर, देवदत्त, धनञ्जय, यह दश वायु मुख्य हैं हम शास्त्रप्र- माणसे कहते हैं शरीरमें यह वायु अपने कर्मसे प्रेरित होके कार्य करते हैं ॥ ४ ॥ ५ ॥ मूलम्-अत्रापि वायवः पञ्च मुख्याः स्युर्द- शतः पुनः ॥ तत्रापि श्रेष्ठकर्त्तारौ प्राणा- पानौ मयोदितौ ॥ ६ ॥

( ५६ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । टीका-वह दश वायुमें पांच मुख्य हैं फिर उनमेंभी निश्चय करके श्रेष्ठ करता श्रीमहादेवजी कहते हैं कि, हमने प्राण और अपानको कहाहै ॥ ६ ॥ मूलम्-हृदि प्राणोगुदेऽपानः समानोनाभि- मण्डले ॥ उदानः कण्ठदेशस्थो व्यानः सर्वशरीरगः ॥ ७ ॥ नागादिवायवः पञ्च कुर्वन्ति ते च विग्रहे ॥ उद्गारोन्मीलनंक्षु- त्तृड्जृम्भा हिक्का च पञ्चमः ॥ ८ ॥ टीका-हृदयस्थानमें प्राणकी स्थिति है और गु- दामें अपान और नाभिमण्डलमें समान और कण्ठ- में उदान और व्यान सब शरीरमें व्याप्तहै और नाग आदि जो पांच वायु हैं वह शरीरमें डकार, हिचकी, जँभाई, क्षुधा, पिपासा, उन्मीलन अर्थात् निद्रासे जाग्रत् होनेके समय जो नेत्रके खुलनेका हेतु है यह सब कार्य करते हैं ॥ ७ ॥ ८ ॥ मूलम्-अनेन विधिना यो वै ब्रह्माण्डं वेत्ति विग्रहम् ॥ सर्वपापविनिर्मुक्तः स याति परमां गतिम् ॥ ९ ॥ टीका-इस विधानसे जो पहिले कहा है शरीरको जो मनुष्य ब्रह्माण्ड जानता है वह.सर्व पापोंसे मुक्त होके

तृतीयपटलः । ( ५७ ) परमगतिको प्राप्त होताहै अर्थात् मोक्ष होताहै ॥ ९ ॥ मूलम्--अधुना कथयिष्यामि क्षिप्रं योगस्य सिद्धये ॥ यज्ज्ञात्वा नावसीदन्ति योगि- नो योगसाधने ॥ १० ॥ टीका-अब जो हम कहते हैं इस विधिसे बहुत शीघ्र योग सिद्ध होता है और इसके जान लेनेसे योगीको योगसाधनमें कष्ट नहीं होता ॥ १० ॥ मूलम्-भवेद्वीर्यवती विद्या गुरुवक्त्रसमुद्भ- वा॥ अन्यथा फलहीना स्यान्निर्व्वीर्याप्य- तिदुःखदा ॥ ११ ॥ टीका-जो विद्या गुरुके मुखसे सुनी वा जानी जाती है वह वीर्यवती होतीहै और अन्य प्रकारसे विद्या फलहीन निर्वीर्या और अतिदुःखकी देनेवाली होती है. तात्पर्य यह है कि, योगविद्या वा अन्यविद्या भलेप्रकार गुरुसे जानकरके करना उचित है जो लोक पुस्तकसे वा किसीको करते देखते योगादिक क्रिया आरम्भ करदे- ते हैं उनका कल्याण नहीं होता यथार्थ न जाननेसे कष्टही होताहै ॥ ११ ॥ मूलम्-गुरुं सन्तोष्य यत्नेन ये वै विद्यामु- पासते ॥ अवलम्बेन विद्यायास्तस्याः फलमवाप्नुयुः ॥ १२ ॥

( ५८ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । टीका-गुरुको सब तरहसे प्रसन्न करके जो विद्या मिलतीहै उस विद्याका फल शीघ्र होताहै अर्थात् थोडे कालमें सिद्ध होजातीहै ॥ १२ ॥ मूलम्--गुरुः पितागुरुर्माता गुरुर्देवो नसंश- यः ॥ कर्मणा मनसा वाचा तस्मात्सर्वैः प्रसेव्यते ॥१३॥ गुरुप्रसादतः सर्वं लभ्य- ते शुभमात्मनः ॥ तस्मात्सेव्यो गुरुर्नि- त्यमन्यथा न शुभं भवेत् ॥ १४॥ प्रदक्षि- णत्रयं कृत्वा स्पृष्ट्वा सव्येन पाणिना ॥ अष्टांगेननमस्कुर्याद्गुरुपादसरोरुहम् ॥१५॥ टीका-गुरु पिता और गुरु माता और गुरु देवता है इसमें संशय नहीं है इस हेतुसे गुरुको कर्मसे मनसे वाक्यसे सब प्रकारसे सेवा करना उचितहै गुरुके प्र- सादसे आत्माका सब शुभ होजाता है इसलिये गुरु- की नित्य सेवा करना उचित है दूसरी तरह शुभ नहीं है गुरुको तीन प्रदक्षिणा करके दक्षिण हाथसे स्पर्श करके गुरुके चरणकमलमें साष्टांग नमस्कार करना उचित है ॥ १३ ॥ १४ ॥ १५ ॥ मूलम्-श्रद्धयात्मवतां पुंसां सिद्धिर्भवति नान्यथा ॥ अन्यथाश्च न सिद्धिः स्यात्त- स्माद्यत्नेन साधयेत् ॥ १६ ॥

तृतीयपटलः । ( ५९ ) टीका-जिस पुरुषको श्रद्धा है उसको निश्चय कर- के विद्या सिद्ध होती है दूसरेको नहीं होती. इस हेतुसे साधकको उचित है कि यत्नसे साधन करे ॥ १६ ॥ मूलम्--न भवेत्सङ्गयुक्तानां तथाऽविश्वासि- नामपि ॥ गुरुपूजाविहीनानां तथा च ब- हुसंगिनाम् ॥१७॥ मिथ्यावादरतानां च तथा निष्ठुरभाषिणाम् ॥ गुरुसन्तोषहीना- नां न सिद्धिः स्यात्कदाचन ॥ १८ ॥ टीका-जिस पुरुषका किसी व्यवहारी मनुष्यसे अतिसङ्ग है उसको योगविद्या सिद्ध नहीं होती ऐसेही अविश्वासी और जो गुरुपूजासे हीन हैं और जिनका बहुत लोगोंसे संग है और वह लोग जो झूठ और कठोर वचन बोला करते हैं और वह लोग जो गुरुको प्रसन्न नहीं करते इन लोगोंको, कदापि सिद्धि नहीं होती ॥ १७ ॥ १८ ॥ मूलम्--फलिष्यतीति विश्वासः सिद्धेः प्रथम- लक्षणम्॥ द्वितीयं श्रद्धया युक्तं तृतीयं गु- रुपूजनम्॥१९॥चतुर्थं समताभावं पञ्चमे- न्द्रियनिग्रहम् ॥ षष्ठं च प्रमिताहारं सप्त- मं नैव विद्यते ॥ २० ॥

(६०) शिवसंहिता भाषाटीकासमेत । टीका-योगसिद्धि होनेका प्रथम लक्षण यह है कि, उसके सिद्धिमें विश्वास हो दूसरे श्रद्धायुक्त तीसरे गुरु- पूजारत हो चौथे प्राणीमात्रमें समताभाव रक्खे पांचवें इन्द्रियोंका निग्रह रहे छठवें परिमित भोजन करै यह छः लक्षण योगसिद्धिके हैं और सातवाँ नहीं है ॥१९॥२०॥ मूलम्-योगोपदेशं संप्राप्य लब्ध्वा योग विदं गुरुम् ॥ गुरूपदिष्टविधिना धिया निश्चित्य साधयेत् ॥ २१ ॥ टीका-योगवेत्ता गुरुसे योग उपदेश लेके जिस विधिसे गुरु उपदेश करे उस विधिसे बुद्धि निश्चय क रके साधन करे ॥ २१ ॥ मूलम्-सुशोभने मठे योगी पद्मासनसम- न्वितः ॥ आसनोपरि संविश्य पवनाभ्या- समाचरेत् ॥ २२ ॥ टीका-उपद्रवरहित सुन्दर स्वच्छ और उसका सू- क्ष्म रन्ध्र होय उस मठमें पद्मासनसंयुक्त आसनपर बैठके योगी पवनका अभ्यास करे ॥ २२ ॥ मूलम्-समकायः प्राञ्जलिंश्च प्रणम्य च गुरून् सुधीः॥दक्षे वामे च विघ्नेशं क्षेत्रपा- लांबिकां पुनः ॥ २३ ॥

तृतीयपटलः । ( ६१ ) टीका-समकायः अर्थात् सीधा शरीर करके हाथ जोडके गुरुको प्रणाम करे और दक्षिण वामभागमें गणेशजीको प्रणाम करे और क्षेत्रपाल और जगन्माता देवीको प्रणाम करना उचित है ॥ २३ ॥ मूलम्--ततश्च दक्षाङ्गुष्ठेन निरुद्ध्य पिंगलां सुधीः ॥ इडया पूरयेद्वायुं यथाशक्त्या तु कुम्भयेत् ॥ २४ ॥ ततस्त्यक्त्वा पिंगलया शनैरेव न वेगतः ॥ पुनः पिंगलयाऽऽपूर्य यथाशक्त्या तु कुम्भयेत्॥२५॥इडया रे- चयेद्वायुं न वेगेन शनैःशनैः॥इदं योगवि- धानेन कुर्याद्विंशतिकुम्भकान् ॥ सर्वद्व- न्द्रविनिर्मुक्तः प्रत्यहं विगतालसः ॥२६॥ टीका-इसके पश्चात् दहिने हाथके अंगुष्ठसे पिंग- लाको रोककरके इडासे वायुपूरक करे अर्थात् ग्राह्य करे और यथाशक्ति वायुको रोके फिर पिंगलासे शनैः शनैः रेचक अर्थात् वायुको बाहरकरे इसीप्रकार फिर पिंगलासे पूरक करके यथाशक्ति कुम्भक करे फिर इडा से धीरे धीरे रेचक करे वेगसे कदापि न करे इस योगविधा- नसे· बीस कुम्भक करे और सर्वद्वन्द्वसे रहित होजाय अर्थात् एकाकार वृत्ति रक्खे,और नित्य आलस्यको त्याग करके अभ्यास करे ॥ २४ ॥ २५ ॥ २६ ॥

२. द्वितीय पटल: पिण्ड-ब्रह्माण्ड, नाड़ी-चक्र व प्राण-स्थान

( ६२ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता। मूलम्-प्रातःकाले च मध्याह्ने सूर्यास्ते चार्द्धरात्रके ॥ कुर्यादेवं चतुर्वारं कालेष्वे- तेषु कुम्भकान् ॥ २७ ॥ टीका-पूर्वोक्त विधिसे प्रातःकाल और मध्याह्नमें और सायंकालमें और अर्द्धरात्रिमें इसीतरह चार बार नित्य कुम्भक करना उचित है ॥ २७ ॥ मूलम्-इत्थं मासत्रयं कुर्यादनालस्योदिने दिने ॥ ततो नाडीविशुद्धिः स्यादविल- म्बेन निश्चितम् ॥ २८ ॥ टीका-इसीप्रकार आलस्यको छोडकरके तीन मास नित्यकरे तो उस पुरुषकी नाडी बहुत शीघ्र शुद्ध होजाय यह निश्चय है ॥ २८ ॥ मूलम्-यदा तु नाडीशुद्धिः स्याद्योगिन- स्तत्त्वदर्शिनः ॥ तदा विध्वस्तदोषश्च भवेदारम्भसम्भवः ॥ २९ ॥ टीका-तत्त्वदर्शी योगीकी जब नाडी शुद्ध होगी तब सर्व दोषका नाश होगा और आरम्भका सम्भव होगा ॥ २९ ॥ मूलम्-चिह्नानि योगिनो देहे दृश्यन्ते ना- डिशुद्धितः ॥ कथ्यन्ते तु समस्तान्यङ्गा- नि संक्षेपतो मया ॥ ३० ॥

तृतीयपटलः। ( ६३ ) टीका-नाडी शुद्ध होनेपर जो योगीके शरीरमें चिह्न देखपडतेहैं उन सबको हम संक्षेपसे वर्णन करते हैं ॥ ३० ॥ मूलम्-समकायःसुगन्धिश्चसुकान्तिःस्वर- साधकः॥३१॥ आरम्भघटकश्चैव यथा परिचयस्तदा ॥ निष्पत्तिः सर्वयोगेषु योगावस्था भवन्ति ताः ॥ ३२ ॥ टीका-जब योगीकी नाडी शुद्ध होगी तब समकाय होजायगा अर्थात् न स्थूल न कृश न वक्र रहेगा और शरीरमें सुगंधिसंयुक्त अच्छी कान्ति अर्थात् तेज रहेगा और वायुस्वरका साधन होजायगा और आरम्भका लक्षण जान पडेगा और सब योगका ज्ञान होजायगा इसको योगावस्था कहते हैं ॥ ३१ ॥ ३२ ॥ मूलम्-आरम्भःकथितोऽस्माभिरधुना वा- युसिद्धये ॥ अपरः कथ्यते पश्चात्सर्वदुः- खौघनाशनः ॥ ३३ ॥ टीका-अभी जो हमने कहा है सो प्राणवायु सिद्ध होनेके आरम्भमें यह चिह्न होता है और इसके पीछे जो सर्व दुःखका नाश होता है सो कहते हैं ॥ ३३ ॥ मूलम्-प्रौढवह्निःसुभोगी च सुखीसर्वाङ्गसु-

(६४) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता। न्दरः ॥ संपूर्णहृदयो योगी सर्वोत्साहब- लान्वितः ॥ जायते योगिनोऽवश्यमेत- त्सर्वं कलेवरे ॥ ३४ ॥ टीका-साधकके शरीरमें जठराग्नि विशेष प्रज्वलित होगी और सर्व अङ्ग सुन्दर सुखपूर्वक सुन्दर भोजन करेगा और बलसंयुक्त सर्व उत्साहसे हृदय योगीका प्रसन्न रहेगा इतने गुण योगीके शरीरमें अवश्य होंगे॥३४ मूलम्-अथ वर्ज्यं प्रवक्ष्यामि योगविघ्नकरं परम् ॥ येन संसारदुःखाब्धिं तीर्त्वा या- स्यन्ति योगिनः॥ ३५ ॥ टीका-अब जो योगमें विघ्न हैं उनको हम कहते हैं जिनको त्यागके यह संसाररूपी जो दुःखका समुद्र है योगी उसके पार होजाताहै ॥ ३५ ॥ मूलम्-आम्लं रूक्षं तथा तीक्ष्णंलवणंसार्प- पं कटुम्॥बहुलं भ्रमणं प्रातः स्नानं तैल- विदाहकम्॥३६॥स्तेयं हिंसां जनद्वेषञ्चा- हङ्कार मनार्जवम्॥उपवासमसत्यञ्च मोह- ञ्च प्राणिपीडनम्॥३७॥ स्त्रीसङ्गमग्निसेवां च बह्वालापं प्रियाप्रियम्॥अतीव भोजनं योगी त्यजेदेतानि निश्चित ॥ ३८ ॥

तृतीयपटलः । (६५) टीका-खट्टा रूखा तीक्षण लोन सरसों कडुभा बहुत भ्रमण करना प्रातःकाल स्नान शरीरमें तेल म- र्दन करना ॥ ३६ ॥ स्वर्णआदिककी चोरी हिंसा म- नुष्यसे द्वेष व अहंकार अनार्यव अर्थात् मनुष्यसे प्रेम न रखना, उपवास, झूठ, ममता, प्राणीको पीडा देना॥३७॥ स्त्रीका सङ्ग, अग्निसेवन, प्रिय, अप्रिय, बहुत बोलना, बहुत भोजन करना योगीको उचित है कि, यह सब अवश्य त्यागदे ॥ ३८॥ मूलम्-उपायं च प्रवक्ष्यामि क्षिप्रं योगस्य सिद्धये ॥ गोपनीयं साधकानां येन सि- द्धिर्भवेत्खलु ॥ ३९ ॥ टीका-अब हम बहुत शीघ्र योग सिद्ध होनेका उपा- य कहते हैं इसको गोप्य रखनेसे साधकको योग निश्च- य सिद्ध होजायगा ॥ ३९ ॥ मूलम्-घृतं क्षीरं च मिष्टान्नं ताम्बूलं चूर्णव- र्जितम्॥कर्पूरं निष्ठुरं मिष्टं सुमठं सूक्ष्मव- स्त्रकम् ॥४०॥ सिद्धान्तश्रवणं नित्यं वैरा- ग्यगृहसेवनम् ॥ नामसङ्कीर्तनं विष्णोः सु- नादश्रवणं परम् ॥४१॥ धृतिः क्षमा तपः शौचं ह्रीर्मतिर्गुरुसेवनम् ॥ सदैवतानि परं योगी नियमेन समाचरेत् ॥ ४२ ॥

( ६६ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । टीका-घृत दूध मधुर पदार्थ ताम्बूल कर्पूरवासित चूर्णरहित, कठोर शब्दरहित मधुर बोलना, सुन्दर सू- क्ष्मरन्ध्रके स्थानमें रहना, सूक्ष्म वस्त्र अर्थात् महीन और थोडा वस्त्र धारण करे नित्य सिद्धांत अर्थात् वेदान्त श्रवण करे और वैराग्यसे गृहमें रहे ईश्वरका स्मरण करे अच्छा शब्द श्रवण करे धैर्य क्षमा तप शौच लज्जा गुरु- की सेवा योगी सदैव इसप्रकार नियमसंयुक्त रहे तो कल्याण होगा ॥ ४० ॥ ४१ ॥ ४२ ॥ मूलम्-अनिलेऽर्कप्रवेशे च भोक्तव्यं योगि- भिः सदा ॥ वायौ प्रविष्टे शशिनि शयनं साधकोत्तमैः ॥ ४३ ॥ टीका-जब सूर्यनाडी अर्थात् पिंगलानाडीका प्रवाह रहे तब योगी सदैव भोजन करे और जब चन्द्र अर्थात् इडानाडीसे वायुका प्रवाह रहे तब साधकके प्रति शयन करना उचित है ॥ ४३ ॥ मूलम्-सद्यो भुक्तेऽपि क्षुधिते नाभ्यासः क्रियते बुधैः ॥ अभ्यासकाले प्रथमं कुर्या- त्क्षीराज्यभोजनम् ॥ ४४ ॥ टीका-भोजन करके तुरंत उसी समय अथवा जब क्षुधित होय तब साधक कदापि अभ्यास न करे और अभ्यास कालमें प्रथम दूध घृत भोजन करे ॥ ४४ ॥