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श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary

गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा

DevanagariHindipublished195 पृष्ठ

२२) (श्री भक्तमाल बोलि नीच जाति बात कही तुम जावो मठ, आवै तहाँ कोऊ मारि डारौ मोहि भाई है। चन्द्रहास जू सौं भाष्यो देवी पूजि आवो आज, मेरी कुल पूज सदा रीति चलि आई है।।६५।। चल्योई करन पूजा देशपति राजा कही, मेरे सुत नाहीं राज वाही को लै दीजिये। सचिव सुवन सौं जु कह्यो तुम लावो जावो, पावो नहीं फेरि समय अब काम कीजिये।। दौर्यौ सुख पाइ चाइ मग ही में लियो जाइ, दियो सो पठाइ नृप रंग माहिं भीजिये। देवी अपमान ते न डरो सनमान करौं, जात मारि डार्यो यासों भाष्यो भूप लीजिये।।६६।। काहू आनि कही सुत तेरो मारो नीचनि ने, सींचन सरीर दृग नीर झरी लागी है। चल्यो ततकाल देखि गिर्यो ह्वै विहाल, सीस पाथर सौं फोरि मर्यो ऐसो ही अभागी है।। सुनि चन्द्रहास चलि वेगि मठ पास आये, ध्याये पग देवता के काटे अंग रागी है। कह्यो तेरो द्वेषी याहि क्रोध करि मार्यो मैं ही, उठैं दोऊ दीजै दान जिये बड़भागी है।।६७।। कर्यो ऐसो राज सब देश भक्तराज कर्यो, ढिंग को समाज ताकी बात कहा भाखिये। हरि-हरि नाम अभिराम धाम-धाम सुने, और काम कामना न सेवा अभिलाखिये।। काम क्रोध लोभ मद आदि लैके दूरि किये, जिये नृप पाइ ऐसो नैननि में राखिये। कही जिती बात आदि अन्त लौं सुहाति हिये, पढ़ें उठि प्रात फल जैमिनि में साखिये।।६८।। श्रीमैत्रेयजी कौषारव नाम सो बखान कियो नाभा जू ने मैत्रेय अभिराम ऋषि जानि लीजै बात में। आज्ञा प्रभु दई जाहु विदुर है भक्त मेरौ करौ उपदेस रूप गुन गान-गात में।। चित्रकेतु प्रेमकेतु भागवत ख्यात जाते पलट्यो जनम प्रतिकूल फल घात में। अक्रूर आदि ध्रुव भये सब भक्तभूप उद्धव से प्यारेन की ख्याति पात-पात में।।६६।। श्रीकुन्तीजी कुन्ती करतूति ऐसी करै कौन भूतप्राणी, माँगति विपत्ति जासों भाजैं सब जन हैं। देख्यो मुख चाहौं लाल ! देखे बिनु हिये शाल, हूजिये कृपाल नहीं दीजै वास वन है।। देखि विकलाई प्रभु आँखि भरि आई फेरि घर ही को लाई कृष्ण प्रान तन धन है। श्रवन वियोग सुनि तनक न रह्यो गयो, भयो वपु न्यारो अहो ! यही साँचो पन है।।७०।। श्रीद्रौपदीजी द्रोपदी सती की बात कहै ऐसो कौन पटु ? खैचत ही पट, पट कोटिगुने भये हैं। 'द्वारका के नाथ!' जब बोली तब साथ हुते द्वारका सौं फेरि आये भक्तवाणी नये हैं।।

श्रीश्रुतिदेवजी) (२३ गये दुर्वासा ऋषि वन में पठाये नीच धर्मपुत्र बोले विनय आवै पन लये हैं। भोजन निवारि तिया आइ कही सोच पर्यो, चाहैं तनु त्याग्यो ‘कह्यो कृष्ण कहूँ गये हैं’॥७१॥ सुन्यो भागवती को वचन भक्तिभाव भर्यो, कर्यो मन आये स्याम पूजे हिये काम है। आवत ही कही मोहि भूख लागी देवो कछु, महा सकुचाये माँगे प्यारो नहीं धाम है॥ विश्व के भरनहार धरे हैं अहार अजू, हमसों दुरावो कही वानी अभिराम है। लग्यो शाक पत्र पात्र जल संग पाइ गये, पूरन त्रिलोकी विप्र गिने कौन नाम है॥७२॥ पद पंकज वन्दौं सदा, जिनके हरि नित उर बसैं॥ योगेश्वर श्रुतिदेव अंग मुचुकुन्द प्रियव्रत जेता। पृथु परीक्षित शेष, सूत शौनक परचेता॥ सतरूपा त्रयसुता सुनीति सती सबही मन्दालस। यज्ञपत्नि ब्रजनारि, किये केशव अपने वश॥ ऐसे नर नारी जिते तिनहीं के गाऊँ जसैं। पद पंकज वन्दौं सदा, जिनके हरि नित उर बसैं॥१०॥ श्रीश्रुतिदेवजी जिनहीं के हरि नित उर बसैं तिनहीं की, पदरेनु चैन-दैन आभरन कीजिये। योगेश्वर आदि रस स्वाद में प्रवीन महा, विप्र श्रुतिदेव ताकी बात कही दीजिये॥ आये हरि घर देखि गयो प्रेम भरि हियो, ऊँचो कर करि पट फेरि मति भीजिये। जिते साधु संग तिन्हें विनय न प्रसंग कियो, कियो उपदेश ‘मोसों बाढ़ पाँव लीजिये’॥७३॥ अंघ्री अम्बुज पांशु को, जनम जनम हौं जाचिहौं॥ प्राचीनबर्हि सत्यव्रत, रहूगण सगर भगीरथ। बाल्मीकि मिथिलेश, गये जे जे गोविन्द पथ॥ रुक्मांगद हरिचन्द, भरत दधीचि उदारा। सुरथ सुधन्वा शिविर, सुमति अति बलि की दारा॥ नील मोरध्वज ताम्रध्वज, अलरक कीरति राचिहौं। अंघ्री अम्बुज पांशु को, जनम जनम हौं जाचिहौं॥११॥

२४) (श्री भक्तमाल महर्षि श्रीबाल्मीकिजी जन्म पुनि जन्म को न मेरे कछु सोच अहो ! सन्तपद कंज रेनु सीस पर धारिये। पराचीनबर्हि आदि कथा परसिद्ध जग, उभै बाल्मीकि बात चित्त तैं न टारिये।। भये भील संग भील ऋषि संग ऋषि भये, भये राम दरसन लीला विसतारिये। जिन्हें जग गाय किहूँ सकै ना अघाय चाय भाय भरि हियो भरि नैन भरि ढारिये।। ७४ ।। मास परायण तीसरा विश्राम श्वपच श्रीबाल्मीकिजी हुतो बालमीकि एक सुपच सुनाम ताको, श्याम लै प्रकट कियो भारत में गाइये। पाण्डवन मध्य मुख्य धर्मपुत्र राजा आप, कीनो यज्ञ भारी ऋषि आये भूमि छाइये।। ताको अनुभाव शुभ शंख सो प्रभाव कहै, जोपै नहीं बाजै तो अपूरनता आइये। सोई बात भई वह बाज्यो नाहिं सोच पर्यौ, पूछैं प्रभु पास याकी न्यूनता बताइये।। ७५ ।। बोले कृष्णदेव याको सुनो सब भेव, ऐपै नीके मानि लेव बात दुरी समुझाइये। भागवत सन्त रसवन्त कोऊ जेंयो नाहिं, ऋषिन समूह भूमि चहुँदिसि छाइये।। जोपै कहौ भक्त नाहीं, नाहीं कैसे कहौँ गहाँ, गाँस एक और कुल जाति सो बहाइये। दासनि को दास अभिमान की न बास कहूँ, पूरन की आस तोपै ऐसो लै जिवाइये।। ७६ ।। ऐसो हरिदासपुर आस-पास दीसै नाहिं, बास बिनु कोऊ लोक लोकन में पाइये। तेरेई नगर माँझ निसिदिन भोर साँझ, आवै जाय ऐपै काहू बात न जनाइये।। सुनि सब चौंकि परे भाव अचरज भरै, हरे मन नैन अजू ! वेगि ही बताइये। कहा नाम? कहाँ ठाम? जहाँ हम जाय देखें, लेखैं करि भाग धाय पाँय लपटाइये।। ७७ ।। जिते मेरे साधु कभूँ चाहैं न प्रकास भयौ, करौ जो प्रकास मानैं महा दुखदाइये। मोको पर्यो सोच यज्ञपूरन की लोच हिये, लिये वाको नाम निजि ग्राम तजि जाइये।। ऐसौ तुम कहौ जामें रहो न्यारे प्यारे ! सदा, हमहीं लिवाइ ल्याइ नीकें कै जिमाइये। जावो बालमीकि घर बड़ो अवलीक साधु, कियो अपराध हम दियो जो बताइये।। ७८ ।। अर्जुन और भीमसेन चलेई निमन्त्रन को, अन्तर उघारि कही भक्तिभाव दूर है। पहुँचे भवन जाइ चहुँदिसि फिरि आइ, परे भूमि झूमि घर देख्यो छबि पूर है।। आये नृपराजनि को देखि तजे काजनि को, लाजनि सौं काँपि-काँपि भयो मन चूर है। पाँयनि को धारिये जू जूठन को दारिये जू, पापग्रह टारिये जू कीजे भाग भूर है।। ७९ ।। जूठनि लै डारौं सदा द्वार को बुहारौं नहीं, और कौं निहारौं अजू ! यही साँचोपन है। कहो कहा? जेंवो कछू पाछे लै जिंवावो हमें, जानी गई रीति भक्तिभाव तुम तन है।

टीका समुदाय की) (२५ तबतौ लजानौ हिये कृष्ण पै रिसानौ नृप, चाहौ सोई ठानौ मेरे संग कोऊ जन है। भोर ही पधारौ अब यही उर धारौ और, भूलि न विचारौ कही भली जोपै मन है॥८०॥ कही सब रीति सुनि धर्मपुत्र प्रीति भई, करी लै रसोई कृष्ण द्रोपदी सिखाई है। जेतिक प्रकार सब व्यंजन सुधारि करो, आजु तेरे हाथनि की होति सफलाई है॥ ल्याये जा लिवाय कहै 'बाहिर जिमाय देवो', कही प्रभु 'आपु ल्यावो अँक भरि भाई है'। आनिकै बैठायो पाकशाल में रसाल ग्रास, लेत बाज्यो शंख हरि दण्ड की लगाई है॥८१॥ 'सीत-सीत प्रति क्यों न बाज्यो? कछु लाज्यो कहा' भक्ति को प्रभाव तैं न जानत यों जानिये। बोल्यो अकुलाय 'जाय पूछिये जू द्रोपदी कौं, मेरो दोष नाहिं यह आपु मन आनिये॥ मानि साँच बात जातिबुद्धि आई देखि याहि, सबही मिलाई मेरी चातुरी बिहानिये। पूँछे ते कही है बालमिकी 'मैं मिलायौं यातें आदि प्रभु पायो पाऊँ स्वाद उन मानिये'॥८२॥ नवाह परायण प्रथम विश्राम श्रीरुक्मांगदजी रुक्मांगद बाग शुभ गन्ध फूल पागि रह्यो, करि अनुराग देवबधू लेन आवहीं। रहि गई एक काँटो चुभ्यो पग बैंगन को, सुनि नृप माली पास आये सुख पावहीं॥ कहौ को उपाय स्वर्गलोक को पठाइ दीजै, 'करै एकादशी जल धरै कर जावहीं'। व्रत को तो नाम यहि ग्राम कोऊ जानै नाहिं, 'कीनो हो अंजान काल्हि लावो गुन गावहीं'॥७३॥ फेरी नृप डाँड़ी सुनि बनिक की लौंड़ी, भूखी रही ही कनौड़ी निसि जागी उन मारियै। राजा ढिंग आनि करि दियो व्रत दान गई, तिया यों उड़ानि निज लोक को पधारियै॥ महिमा अपार देखि भूप ने विचारी याको कोउ अन्न खाय ताको बाँधि मारि डारियै। याही के प्रभाव भावभक्ति विस्तार भयो, नयो चोज सुनो सब पुरी लै उधारियै॥८४॥ श्रीरुक्मांगदजी की पुत्री एकादशी व्रत की सचाई लै दिखाई राजा, सुता की निकाई सुनौ नीके चित लाइकै। पिता घर आयो पति भूख ने सतायो, अति माँगे तिया पास नहीं दियो यह भाइकै॥ आजु हरिवासर सो तासर न पूजै कोऊ, डर कहा मीच को यों मानी सुख पाइकै। तजे उन प्रान पाये वेगि भगवान् वधू, हिये सरसान भई कह्यौं पन गाइकै॥८५॥ टीका समुदाय की सुनौ हरिचन्द कथा व्यथा बिन द्रव्य दियो, तथा नहीं राखी बेचि सुत तिया तन है। सुरथ सुधन्वा जू सौं दोष के करत मरे, शंख औ लिखित विप्र भयो मैलो मन है॥

२६) (श्री भक्तमाल इन्द्र औ अगिन गये शिवि पै परीच्छा लेन, काटि दियो गास रीझि साँचो जान्यो पन है। भरत दधीचि आदि भागवत बीच गाये, सबनि सुहाये जिन दियो तन धन है।। ८६।। श्रीविन्ध्यावलीजी विन्ध्याबली तिया-सी न देखी कहूँ तिया नैन, बाँध्यो प्रभु पिया देखि कियो मन चौगुनौ। करि अभिमान दान देन बैठ्यो तुम्हीं को, कियो अपमान मैं तो मान्यौँ सुख सौगुनौ।। त्रिभुवन छीनि लिये दिये बैरी देवतान, प्रान मात्र रहे हरि आन्यो नहीं औगुनौ। ऐसी भक्ति होय जोपै जागो रहो सोइ अहो ! रहो भव माँझ ऐपै लागै नहीं भौगुनौ।। ८७।। श्रीमोध्वजजी, श्रीताम्रध्वजजी अर्जुन के गर्व भयो कृष्ण प्रभु जानि लियो, दियो रस भरी याहि रोग यों मिटाइयै। मेरो एक भक्त आहि ताकौ लै दिखाऊँ ताहि, भये विप्र वृद्ध संग बाल चलि जाइयै।। पहुँचत भाष्यो जाइ मोरध्वज राजा कहाँ, वेगि सुधि देवो काहू बात जा जनाइयै। सेवा प्रभु करौं नेकु रहौ पाउँ धरौ जाइ, कहौ तुम बैठौ कही आग-सी लगाइयै।। ८८।। चले अनखाय पाँय गहि अटकाय जाय, नृप को सुनाय ततकाल दौरे आये हैं। बड़ी कृपा करी आज फरी चाहबेलि मेरी, निपट नबेल फल पायो याते पाये है।। दीजै आज्ञा मोहिं सोई कीजै सुख लीजै वही, पीजै वानी रस मेरे नैन लै सिराये हैं। सुनि क्रोध गयो मोद भयो सौ परीच्छा हिये, लिये चित चाव ऐसे वचन सुनाये है।। ८६।। ‘देवे की प्रतिज्ञा करो’ ‘करी जू प्रतिज्ञा हमं, जाहि भाँति सुख तुम्हें सोई मोको भाई है’। ‘मिल्यो मग सिंह यहि बालक को खाये जात, कही खावो मोहिं नहीं यही सुखदाई है’। ‘काहू भाँति छोड़ो’ नृप आधो जो सरीर आवै तौहि याहि तजौं कहि बात मो जनाई है। बोलि उठी तिया ‘अरधंगी मोहिं जाइ देवो’ पुत्र कहै ‘मोको लेवो और सुधि आई है’।। ६०।। सुनो एक बात ‘सुत तिया लै करौंत गात चीरैं धीरेँ भीरैं नाहिं’ पीछे उन भाखिये। कीन्ह्यो वाही भाँति अहो नासा लगि आयौ जब, ढर्यो दृग नीर भीर वाकर न चाखिये।। चले अनखाय गहि पाँय सो सुनाये बैन, नैन जल बाँयो अंग काम किहिं नाखिये। सुनि भरि आयो हियो निज तनु श्याम कियो, दियो सुखरूप व्यथा गई अभिलाषिये।। ६१।। मोपै तो दियो न जाइ निपट रिझाय लियो, तऊ रीझि दिये बिना मेरे हिये साल है। माँगौ वर कोटि चोट बदलो न चूकत है, सूकत है मुख सुधि आये वही हाल है।। बोल्यो भक्तराज तुम बड़े महाराज कोऊ, थोरोऊ करत काज मानौँ कृत जाल है। एक मोको दीजै दान दीयो जू बखानौ वेगि, साधु पै परीच्छा जनि करो कलिकाल है।।८२।।

श्री गुह निषादजी) (२७ श्रीअलर्कजी अलरक की कीरति में राँचौ नित साँचौ हिये, किये उपदेसहूँ न छूटै विषै वासना। माता मन्दालसा की बड़ी यह प्रतिज्ञा सुनौ, आवै जो उदर माँझ फेरि गर्भ आस ना।। पति को निहोरो ताते रह्यो छोटो कोरो ताको, लै गये निकालि मिलि काशी नृप शासना। मुद्रिका उघारि और निहारि दत्तात्रेय जू को, भये भवपार करी प्रभु की उपासना।। ६३।। तिन चरण धूरि मो भूरि सिर, जे जे हरिमाया तरे।। रिभु इक्ष्वाकरु ऐल गाधि रघु रै गै शुचि शतधन्वा। अमूरति अरु रन्तिदेव उतंग भूरि देवल वैवस्वत मान्वा।। नहुष जजाति दिलीप, पुरु यदु गुह मान्धाता। पिप्पल निमि भरद्वाज, दक्ष सरभंग संघाता।। संजय समीक उत्तानपाद, याज्ञवल्क्य जस जग भरे। तिन चरण धूरि मो भूरि सिरं, जे जे हरिमाया तरे।। १२।। श्रीरन्तिदेवजी अहो ! रन्तिदेव नृप सन्त दुष्यन्त वंश, अति ही प्रशंस सो अकाशवृत्ति लई है। भूखे को न देखि सकैं आवै सो उठाइ देत, नेति नहिं करें भूखे देह छीन भई है।। चालिस औ आठ दिन पाछे जल-अन्न आयो, दियो विप्र शूद्र नीच श्वान यह नई है। हरि को निहारैं उन माँझ तब आये प्रभु, भाये जग दुख जिते भोगौं भक्ति छई है।। ८४।। श्रीगुह निषादजी भीलन को राजा गुह राम अभिराम प्रीति, भयो वनवास मिल्यो मारग में आइकै। करौ यह राज जू विराजि सुख दीजै मोको, बोले चैनसाज तज्यौं आज्ञा पितु पाइकै।। दारुन वियोग अकुलात दृग अश्रुपात, पाछे लोहू जात तब सकै कौन गाइकै। रहै नैन मूँदि 'रघुनाथ बिन देखौं कहा?' अहा ! प्रेम रीति मेरे हिये रही छाइकै।। ६५।। चौदह बरष पीछे आये रघुनाथ नाथ, साथ के जे भील कहैं आये प्रभु देखिये। बोल्यो 'अब पाऊँ कहाँ होति न प्रतीति क्यो हू' प्रीति करि मिले राम कही मोको पेखिये।। परसि पिछाने लपटाने सुखसागर समाने प्रान पाये मानो भाल भाग लेखिये। प्रेम की जू बात क्यों हू वानी में समात नाहिं, अति अकुलात कह्यौ कैसे कै विशोखिये।। ६६।। मास परायण चौथा विश्राम

२८) (श्री भक्तमाल निमि अरु नव योगेश्वरा पादत्राण की हौं शरण।। कवि हरि करभाजन, भक्ति रतनाकर भारी। अन्तरिक्ष अरु चमस, अनन्यता पधति उधारी।। प्रबुध प्रेम की राशि, भूरिदा आबिर होता। पिप्पल द्रुमिल प्रसिद्ध, भवाब्धि पार के पोता।। जयन्ती नन्दन जगत के, त्रिविध ताप आमय हरण। निमि अरु नव योगेश्वरा पादत्राण की हौं शरण।। १३।। पद पराग करुणा करौ जे, नियन्ता नवधा भगति के।। श्रवण परीक्षित सुमति, व्यास सावक सुकीरतन। सुठि सुमिरन प्रहलाद पृथु पूजा कमला चरनन मन।। वन्दन सुफलकसुवन, दास्य दीपत्ति कपीश्वर। सख्यत्वे पारत्थ, समर्पण आतम बलिधर।। उपजीवी इन नाम के, एते त्राता अगति के। पद पराग करुणा करो, जे नियन्ता नवधा भगति के।। १४।। श्रीपरीक्षितजी श्रवण रसिक कहूँ सुने न परीक्षित से, पानहू करत लागी कोटिगुनी प्यास है। मुनि मन माँझ क्योहूँ आवत न ध्यावत हूँ, वहीं गर्भमध्य देखि आयो रूपरास है।। कही शुकदेव जू सौं टेव मेरी लीजै जानि, प्रान लागे कथा नहीं तक्षक को त्रास है। कीजिये परीच्छ उर आनी मतिसानी अहो ! वानी बिरमानी जहाँ जीवन निरास है।। ६५।। परमहंस श्रीशुकदेवजी गर्भ ते निकसि चले वन ही में कियो वास, व्यास से पिता को नहिं उत्तरहु दियो है। दशम श्लोक सुनि गुनि मति हरि गई, लई नई रीति पढ़ि भागवत लियो है। रूप गुन भरि सह्यो जात कैसे करि आये, सभा नृप ढरि भीज्यो प्रेमरस हियो है। पूछे भक्तभूप ठौर-ठौर परे भौंर जाय, गाय उठे जबैं मानो रँग झर कियो है।। ६८।।

28-1 आत्मनिवेदन सख्य दास्य वन्दन अर्चन पादसेवन स्मरण कीर्तन श्रवण भक्तिदेवी

रां रां श्री सीताराम रां रां रां रां www.malookpeeth.com

श्रीभगवद् प्रसादानिष्ठ भक्त) (२६ श्रीप्रह्लादजी सुमिरन साँचो कियो लियो देखि सबही में, एक भगवान कैसे काटै तरवार है। काटिवो खड्ग जल बोरिवो सकति जाकी, ताहि को निहारै चहुँओर सो अपार है।। पूछे ते बतायो खम्भ तहाँ ही दिखायो रूप, प्रगट अनूप भक्त वानी ही सौं प्यार है। दुष्ट डार्यो मारि गरे आँतै लई डारि तऊ, क्रोध को न पार कहा कियो यों विचार है।।६६।। डरे शिव अज आदि देख्यौ नहीं क्रोध ऐसो, आवत न ढिग कोऊ लछिमीहूँ त्रास है। तबतौ पठायो प्रह्लाद अहलाद महा, अहो ! भक्तिभाव पग्यो आयो प्रभु पास है।। गोद में उठाइ लियो सीस पर हाथ दियो, हियो हुलसायो कही वानी विनयरास है। आई जग दया लगि पर्यो श्रीनृसिंह जू को, अर्यो यों छुटावो कर्यो माया ज्ञान नास है।।१००।। श्रीअक्रूरजी चले अकरूर मधुपुरी ते बिसूर नैन, चली जलधारा कब देखौं छबि पूर को। सगुन मनावैं एक देखिवोई भावै देह, सुधि बिसरावैं लोटै लखि पग धूर को।। वन्दन प्रवीन चाह निपट नवीन भई, दई शुकदेव कहि जीवन की मूर को। मिले राम कृष्ण झिले पाइकै मनोरथ को, हिले दृगरूप कियो हियो चूर-चूर को।।१०१।। श्रीबलिजी दियो सरबसु करि अति अनुराग बलि, पागि गयो हियो प्रह्लाद सुधि आई है। गुरु भरमावैं नीति कहि समुझावैं बोल, उर में न आवै केती भीति उपजाई है।। कह्यो जोई कियो साँचो भावपन लियो, अहो दियो डर हरिहूँ ने मति न चलाई है। रीझे प्रभु रहे द्वार भये वश हारि मानी, श्रीशुक बखानी प्रीति रीति सोई गाई है।।१०२।। सप्ताह परायण प्रथम विश्राम श्रीभगवद् प्रसादानिष्ठ भक्त हरि प्रसाद रस स्वाद के, भक्त इते परमान।। शंकर शुक सनकादि, कपिल नारद हनुमाना। विष्वक्सेन प्रह्लाद बलिर, भीषम जग जाना।। अर्जुन ध्रुव अम्बरीष, विभीषण महिमा भारी। अनुरागी अक्रूर, सदा उद्धव अधिकारी।। भगवन्त भुक्त अवशिष्ट की, कीरति कहत सुजान। हरि प्रसाद रस स्वाद के भक्त इते परमान।।१५।।

३०) (श्री भक्तमाल ध्याननिष्ठ भक्त ध्यान चतुर्भुज चित धर्यो, तिन्हें शरण हौं अनुसरौं ।। अगस्त्य पुलस्त्य पुलह, च्यवन वशिष्ठ सौभरि रिषि। कर्दम अत्रि रिचीक, गर्ग गौतम सुव्यास शिषि ।। लोमश भृगु दालभ्य, अंगिरा शृंगि प्रकासी। माण्डव्य विश्वामित्र, दुर्वासा सहस अठासी ।। जाबालि यमदग्नि मायादर्श कश्यप परवत पराशर पद रज धरौं। ध्यान चतुर्भुज चित धर्यो तिन्हें शरण हौं अनुसरौं ।। १६ ।। अठारह महापुराण साधन साध्य सत्रह पुरान, फलरूपी श्रीभागवत ।। ब्रह्म विष्णु शिव लिंग, पद्म स्कन्द विस्तारा। वामन मीन वाराह अग्नि कूरम ऊदारा ।। गरुड़ नारदी भविष्य, ब्रह्मवैवर्त्त श्रवण शुचि। मार्कण्डेय ब्रह्माण्ड कथा, नाना उपजै रुचि ।। परमधर्म श्रीमुख कथित, चतुःश्लोकी निगम सत। साधन साध्य सत्रह पुरान फलरूपी श्रीभागवत ।। १७ ।। अठारह स्मृतियाँ दश आठ स्मृति जिन उच्चरी, तिन पद सरसिज भाल मो ।। मनुस्मृति अत्रेय वैष्णवी हारीतक यामी। याज्ञवल्क्य अंगिरा शनैश्चर साम्बर्तक नामी ।। कात्यायनि सांख्यल्य, गौतमी वासिष्ठी दाखी। सुरगुरु आतातापि पराशर क्रतु मुनि भाखी ।। आशा पास उदारधी, परलोक लोक साधन सो। दश आठ स्मृति जिन उच्चरी तिन पद सरसिज भाल मो ।। १८ ।।

२. रामानन्द एवं रामानुज सम्प्रदाय के संत (कबीर, रैदास, पीपा, धन्ना)

नवों नन्दजी) (३१ श्रीराम सचिव पावैं भक्ति अनपायिनी जे, राम सचिव सुमिरन करैं। धृष्टी विजय जयन्त, नीति पर शुचि सुविनीता। राष्ट्र विवर्धन निपुण, सुराष्ट्र परम पुनीता।। अशोक सदा आनन्द, धर्मपालक तत्ववेत्ता। मन्त्रीवर्य सुमन्त्र, चतुर्जुग मन्त्री जेता।। अनायास रघुपति प्रसन्न, भवसागर दुस्तर तरैं। पावैं भक्ति अनपायिनी जे, राम सचिव सुमिरन करैं।।१९।। श्रीराम सहचरवर्ग शुभदृष्टि वृष्टि मो पर करौ, जे सहचर रघुवीर के।। दिनकर सुत हरिराज, बालिवछ केसरि औरस। दधिमुख द्विविद मयन्द, रिच्छपति सम को पौरस।। उल्का सुभट सुषेन, दरीमुख कुमुद नील नल। सरभ रु गवय गवांच्छ, पनस गन्धमादन अति बल।। पद्म अठारह यूथपाल, रामकाज भट भीर के। शुभदृष्टि वृष्टि मो पर करौ, जे सहचर रघुवीर के।।२०।। नवों नन्दजी ब्रज बड़े गोप पर्जन्य के, सुत नीके नव नन्द।। धरानन्द ध्रुवनन्द, तृतीय उपनन्द सुनागर। चतुर्थ तहाँ अभिनन्द, नन्द सुखसिन्धु उजागर।। सुठि सुनन्द पशुपाल, निर्मल निश्चय अभिनन्दन। कर्मा धर्मानन्द अनुज, वल्लभ जग वन्दन।। आस पास वा बगर के, जहाँ विहरत पशुप सुछन्द। ब्रज बड़े गोप पर्जन्य के, सुत नीके नव नन्द।। २१।।

३२) (श्री भक्तमाल समस्त ब्रजवासीगण बाल वृद्ध नर नारि गोप, हौं अर्थी उन पाद रज।। नन्द गोप उपनन्द, ध्रुव धरानन्द महरि जसोदा। कीरतिदा वृषभानु, कुँअरि सहचरि मन मोदा।। मधुमंगल सुबल, सुबाहु भोज अर्जुन श्रीदामा। मण्डल ग्वल अनेक, श्याम संगी बहुनामा।। घोष निवासिन की कृपा, सुर नर बांछत आदि अज। बाल वृद्ध नर नारि गोप हौं अर्थी उन पाद रज।। २२।। श्रीकृष्णजी के षोडश सखा ब्रजराज सुवन संग सदन वन, अनुग सदा तत्पर रहें। रक्तक पत्रक और पंत्रि, सबही मन भावैं। मधुकण्ठौ मधुवर्त्त रसाल विशाल सुहावैं।। प्रेमकन्द मकरन्द, सदा आनन्द चन्द्रहासा। पयद बकुल रसंदान, सारदां बुद्धि प्रकासा।। सेवा समय विचारिकै, चारु चतुर चित की लहैं। ब्रजराज सुवन संग सदन बन अनुग सदा तत्पर रहें।। २३।। सप्तद्वीप के भक्त सप्तद्वीप में दास जे, ते मेरे सिरताज।। जम्बू और पलच्छ, सालमलि बहुत राजरिषि। कुश पवित्र पुनि क्रौंच, कौन महिमा जानै लिषि।। साक विपुल विस्तार, प्रसिध नामी अति पुहकर। पर्वत लोकालोक, ओक टापू कंचनधर।। हरिभृत्य बसत जे-जे जहाँ, तिनसौँ नित प्रति काज। सप्तद्वीप में दास जे ते मेरे सिरताज।। २४।।

श्वेतद्वीप के भक्त) (३३ जम्बूद्वीप के भक्त मध्यदीप नवखण्ड में, भक्त जिते मम भूप॥ इलावर्त्त अधीस संकर्षण, अनुग सदाशिव। रमनक मछ मनु दास, हिरण्य कूरम अर्जम इव॥ कुरु वराह भूभृत्य, वर्ष हरि सिंह प्रह्लादा। किंपुरुष राम कपि, भरत नरायन बीना नादा॥ भद्राश्वग्रीवहय भद्रसव केतु काम कमला अनूप। मध्यदीप नवखण्ड में, भक्त जिते मम भूप॥ २५॥ श्वेतद्वीप के भक्त श्वेतदीप में दास जे, श्रवण सुनौ तिनकी कथा॥ श्रीनारायण वदन निरन्तर ताही देखें। पलक परै जो बीच कोटि जमजातन लेखैं॥ तिनके दरशन काज गये तहँ वीणाधारी। श्याम दई कर सैन उलटि अब नहिं अधिकारी॥ नारायण आख्यान दृढ़, तहँ प्रसंग नाहिन तथा। श्वेतदीप में दास जे श्रवण सुनौ तिनकी कथा॥ २६॥ श्वेतदीपवासी सदा रूप के उपासी गये, नारद विलासी उपदेस आसा लागी है। दई प्रभु सैन जिनि आवो इहि ऐन दृग, देखें सदा चैन मति गति अनुरागी है।। फिरे दुख पाइ जाइ कही श्रीवैकुण्ठनाथ, साथ लिये चले लखो भक्ति अँग पागी है। देख्यो एक सर खग रह्यो ध्यान धरि ऋषि, पूछैं कहो हरि कह्यो बड़ो बड़भागी है।। १०३।। बरष हजार बीते भये नहीं चितचीते, प्यासोई रहत ऐपै पानी नहीं पीजिये। पावै जो प्रसाद तब जीभ सौं स्वाद लेत, लेत नहीं और याकी मति रस भीजिये।। लीजै बात मानि जलपान करि डारि दियो, लियो चोंच भरि दृग भरि बुधि धीजिये। अचरज देखि चख लगै न निमेष किहूँ, चहुँदिसि फिर्यो अब सेवा याकी कीजिये।। १०४।।

३४) (श्री भक्तमाल चलो आगे देखौ कोऊ रहै न परेखौ भाव, भक्ति करि लेखौ गये द्वीप हरि गाइये। आयो एकजन धाय आरती समय विहाय, खैचि लिये प्रान फिरि बधू याकी आइये।। वही इन कही पति देख्यो नहीं मही पर्यो, हर्यो याको जीव तन गिर्यो मन भाइये। ऐसे पुत्र आदि आये साँचे हित में दिखाये, फेरिकै जिवाये ऋषि गाये चित लाइये।।१०५।। अष्टकुल नाग भक्त उरग अष्टकुल द्वारपाल, सावधान हरिधाम थिति।। इलापत्र मुख अनन्त, अनन्त कीरति बिसतारत। पद्म शंकु पन प्रकट, ध्यान उर ते नहिं टारत।। अश्वकमल वासुकी, अजित आज्ञा अनुवरती। करकोटक तक्षक सुभट सेवा सिर धरती।। आगमोक्त शिवसंहिता "अगर" एकरस भजन रति। उरग अष्टकुल द्वारपाल सावधान हरिधाम थिति।। २७।। ।। इति पूर्वार्ध।।

श्रीसम्प्रदाय) (३५ अथ श्रीभक्तमाल उत्तरार्द्ध चतुःसम्प्रदायाचार्य चौबीस प्रथम हरि वपु धरे त्यौं चतुर्व्यूह कलियुग प्रगट ।। • श्रीरामानंद उदार, सुधानिधि अवनि कल्पतरु। विष्णुस्वामि बोहित्य, सिन्धु संसार पार करु ।। मध्वाचारज मेघ, भक्ति सर ऊसर भरिया । निम्बादित्य आदित्य, कुहर अज्ञान जु हरिया ।। जनम करम भागवत, धरम सम्प्रदाय थापीं अघट। चौबीस प्रथम हरि वपु धरे त्यौं चतुर्व्यूह कलियुग प्रगट ।। २८ ।। रमा पद्धति रामानंद विष्णुस्वामि त्रिपुरारी । निम्बादित्य सनकादिका मधुकर गुरु मुखचारि ।। २६ ।। श्रीनिम्बार्काचार्यजी निम्बादित्य नाम जाते भयो अभिराम कथा, आयो एक दण्डी ग्राम न्योतो करि आये हैं। पाक को अबार भई सन्ध्या मानि लई जती, 'रतीहूँ न पाऊँ' वेद वचन सुनाये हैं।। आँगन में नींब तापै आदित दिखायौ ताहि, भोजन करायो पाछे निसि चिह्न पाये हैं। प्रगट प्रभाव देखि जान्यो भक्तिभाव जग, दाँव पाइ नाव पर्यो हर्यो मन गाये हैं।। १०६ ।। श्रीसम्प्रदाय सम्प्रदाय शिरोमणि सिन्धुजा, रच्यौ भक्ति वित्तान ।। विष्वक्सेन मुनिवर्य, सु पुनि सठकोप पुनीता। वोपदेव भागवत, लुप्त उधर्यो नवनीता ।। • पाठान्तर - श्रीरामानुज उदार सुधानिधि अवनि कल्पतरु।

३६) (श्री भक्तमाल मंगल मुनि श्रीनाथ, पुण्डरीकाक्ष परम जस। राममिश्र रसरासि, प्रगट परताप परांकुश॥ यामुन मुनि रामानुज, तिमिर हरन उदय भान। सम्प्रदायं शिरोमणि सिन्धुजा, रच्यौ भक्ति वित्त न॥ ३०॥ स्वामी श्रीरामानुजाचार्यजी सहस्त्र आस्य उपदेश करि जगत उधारन जतन कियो॥ गोपुर ह्वै आरूढ़, उच्चस्वर मन्त्र उच्चार्यो। सूते नर परे जागि, बहत्तरि श्रवणनि धार्यो॥ तितनेई गुरुदेव पधति, भई न्यारी न्यारी। कुरुतारक शिष्य प्रथम, भक्ति वपु मंगलकारी॥ कृपणपाल करुणा समुद्र, रामानुज सम नहिं बियो। सहस्त्र आस्य उपदेश करि जगत् उधारन जतन कियो॥३१॥ आस्य सो वदन नाम सहस हजार मुख, शेष अवतार जानो वही सुधि आई है। गुरु उपदेसि मन्त्र कह्यो 'नीके राख्यो' अन्त्र, जपतहिं श्याम जू ने मूरति दिखाई है॥ करुनानिधान कही 'सब भगवान पावें' चढ़ि दरवाजे सो पुकार्यो धुनि छाई है। सुनि सीखि लियो यों बहत्तरहि सिद्ध भये, नयो भक्ति चोज यह रीति लैके गाई है॥१०७॥ गये नीलाचल जगन्नाथ जू के देखिवे कौं, देख्यो अनाचार सब पण्डा दूरि किये है। संग लै हजार शिष्य रंग भरि सेवा करें, धरैं हिये भाव गूढ़ मत दरसाये हैं॥ बोले प्रभु 'वेई आवैं' करे अंगीकार मैं तो, प्यार ही को लेत कँभू औगुन न लिये है। तऊ दृढ़ कीनी फिरि कही नहीं कान दीनी, लीनी वेदवानी विधि कैसे जात छिये हैं॥१०८॥ जोरावर भक्त सौं बसाइ नहीं कही किती, रती हूँ न लावैं मन चोज दरसायौ है। गरुड़ को आज्ञा दई सोई मानि लई उन, शिष्य नि समेत निज देस छोड़ि आयौ है॥ जागिकै निहारे ठौर और ही मगन भये, दिये यों प्रगट करि गूढ़ भाव पायौ है। वेई सब सेवा करैं, श्याम मन सदा हरैं, धरें साँचो प्रेम हिये प्रभू जू दिखायौ है॥१०६॥ मास परायण पांचवा विश्राम

श्रीलालाचार्यजी) (३७ चार दिग्गज महन्त चतुर महन्त दिग्गज चतुर, भक्तिभूमि दाबे रहैं।। श्रुतिप्रज्ञा श्रुतिदेव, ऋषभ पुहकर इभ ऐसे। श्रुतिधामा श्रुतिउदधि, पराजित वामन जैसे।। श्रीरामानुज गुरु बन्धु, विदित जग मंगलकारी। शिवसंहिता प्रणीत, ज्ञान सनकादिक सारी।। इन्दिरा पद्धति उदारधी, सभा साखि सारंग कहैं। चतुर महन्त दिग्गज चतुर भक्तिभूमि दाबे रहैं।। ३२।। श्रीलालाचार्यजी आचारज जामात की, कथा सुनत हरि होइ रति।। कोउ मालाधारी मृतक, बह्यो सरिता में आयो। दाह कृत्य ज्यों बन्धु, न्यौति सब कुटुम्ब बुलायो।। नाक सकोचहिं विप्र, तबहिं हरिपुर जन आये। जेंवत देखे सबनि, जात काहू नहिं पाये।। लालाचारज लक्षधा, प्रचुर भई महिमा जगति। आचारज जामात की, कथा सुनत हरि होइ रति।। ३३।। आचारज को जामात बात ताकी सुनौ नीके, पायो उपदेस 'सन्त बन्धु करि मानियै'। कीजै कोटिगुनी प्रीति ऐपै न बनति रीति तातें इति करौ याते घटती न आनिये।। मालाधारी साधु तनु सरिता में बह्यो आयो, ल्यायो घर फेरिकै विमान सब जानिये। गावत बजावत लै नीर तीर दाह कियो, हियो दुख पायो सुख पायो समाधानिये।। ११०।। कियो सो महोच्छो ज्ञाति विप्रन को न्योतो दियो, लियो आये नहिं कियो शंका दुखदाइये। भये इकठौरे माया कीने सब बौरे कछु, कहैं बात औरे मरी देह बही आइये।। याते नहीं खात वाकी जानत न जाति-पाँति, बड़ौ उतपात घर ल्याइ जाइ दाहिये। मग अवलोकि उत पर्यो सुनि शोक हिये, जिये आइ पूछें गुरु कैसे कै निवाहिये।। १११।। चले श्री आचारज पै बारिज बदन देखि, करि साष्टांग बात कहि सो जनाइयै। जाओ निहशंक, वे प्रसाद को न जानैं रंक, जानैं जे प्रभाव आवैं वेगि सुखदाइयै।।

३८) (श्री भक्तमाल देखे नभ-भूमि-द्वार ऐंहैं निरधारजन, वैकुण्ठ-निवासी पाँति ढिग ह्वै कै आइयै। इन्हें अब जान देवो जनि कछू कहो अहो ! गहो करौ हाँसी जब घर जाय खाइयै।। ११२।। आये देखि पारषद गयो गिरी भूमि सद, हद करी कृपा यह जानि निज जन को। पायौ लै प्रसाद स्वाद कहि अह्लाद भयो, नयो लयो मोद जान्यो साँचो सन्तपन को।। विदा ह्वै पधारे नभ-मग में सिधारे विप्र, देखत विचारे द्वार व्यथा भई मन को। गयौ अभिमान आनि मन्दिर मगन भये, नये दृग लाज बीनि-बीनि लेत कन को।। ११३।। पांइ लपटाय अँग धूरि में लुटाय कहैं, करौ मनभायो और दीन बहु भाख्यौ है। कही भक्तराज तुम कृपा मैं समाज पायो, गायो जो पुरानन में रूप नैन चाख्यौ है।। छाड़ो उपहास अब करो निज दास हमें, पूजै हिये आस मन अति अभिलाख्यौ है। किये परशंस मानो हंस ये परम कोऊ, ऐसे जस लाख भाँति घर-घर राख्यो है।। ११४।। श्रीपादपद्माचार्य जी (गुरु और शिष्य) श्रीमदारग उपदेश कृत, श्रवण सुनौ आख्यान शुचि।। गुरु गमन कियो परदेश, शिष्य सुरधुनी दृढ़ाई। इक मंजन इक पान, हृदय वन्दना कराई।। गुरु गंगा में प्रविशि, शिष्य को वेगि बुलायौ। विष्णुपदी भय मानि, कमल पत्रन पर धायौ।। पादपद्म ता दिन प्रगट, सब प्रसन्न मन परम रुचि। श्रीमदारग उपदेश कृत, श्रवण सुनौ आख्यान शुचि।। ३४।। देवधुनी तीर सो कुटीर बहु साधु रहैं, रहै गुरुभक्त एक न्यारो नहिं ह्वै सकै। चले प्रभु गाँव ‘जिनि तजो बलि जांव’ करौ कही दास सेवा गंगा में ही कैसें छ्वै सकै।। क्रिया सब कूप करै विष्णुपदी ध्यान धरै, रोष भरे सन्तश्रेणी भाव नहीं भ्वै सकै। आये ईश जानि दुखमानि सो बखान कियो, आनि मन जनि बात अंग कैसे ध्वै सकै।। ११५।। चले लैके न्हान संग गंग में प्रवेस कियो, रंग भरि बोले सो अँगोछा वेगि ल्याइयै। करत विचार सोच सागर न पारावर, गंगा जू प्रकट कह्यो कजन पै आइये।। चलेई अधर पग धरै सो मधुर जाइ, प्रभु हाथ दियो लियो तीर भीर छाइये। निकसत धाय चाय पग लपटाय गये, बड़ौ परताप यह निसिदिन गाइये।। ११६।।

श्रीअनन्तानन्दजी) (३६ श्रीसम्प्रदाय • श्रीरामानंद पद्धति प्रताप, अवनि अमृत ह्वै अनुसर्यौ।। देवाचारज द्वितीय, महामहिमा हरियानन्द। तस्य राघवानन्द भये, भक्तन को मानद।। पत्रावलम्ब पृथिवी करी, व काशी स्थाई। चारि वरन आश्रम, सबही को भक्ति दृढ़ाई।। तिनके रामानन्द प्रगट, विश्व मंगल जिन्ह वपु धर्यौ। श्रीरामानंद पद्धति प्रताप, अवनि अमृत ह्वै अनुसर्यौ।। ३५।। स्वामी श्रीरामानन्दाचार्यजी श्रीरामानन्द रघुनाथ ज्यौं, दृतिय सेतु जग तरन कियो।। अनन्तानन्द, कबीर, सुखा, सुरसुरा, पद्मावति नरहरि। पीपा, भावानन्द, रैदास, धना, सेन सुरसुर की घरहरि।। औरौ शिष्य प्रशिष्य, एक ते एक उजागर। जग मंगल आधार, भक्ति दशधा के आगर।। बहुत काल वपु धारिकै, प्रणत जनन कौं पार दियो। श्रीरामानन्द रघुनाथ ज्यौं दृतिय सेतु जग तरन कियो।। ३६।। श्रीअनन्तानन्दजी श्रीअनन्तानन्द पद परसिकै, लोकपाल से ते भये।। योगानन्द, गयेश, करमचन्द, अल्ह, पैहारी। सारी रामदास श्रीरंग, अवधि गुण महिमा भारी।। तिनके नरहरि उदित, मुदित मेहा मंगलतन। रघुवर यदुवर गाइ, विमल कीरति संच्यो धन।। हरिभक्ति सिन्धु बेला रचे, पानि पद्मजा सिर दये। श्रीअनन्तानन्द पद परसिकै, लोकपाल से ते भये।। ३७।। • पाठान्तर - श्रीरामानुज पद्धति प्रताप अवनि अमृत ह्वै अनुसर्यौ।