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श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary

गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा

DevanagariHindipublished195 पृष्ठ

सूची पत्र) विषय पृष्ठ विषय पृष्ठ विषय पृष्ठ श्री मीरा जी १२० श्री नारायणदास जी नृतक १४४ श्री हरिदास जी १६३ श्री पृथ्वीराजजी आमेर नरेश १२२ श्री भूरिदा भक्तजन १४५ श्री गोविन्ददास जी १६४ श्री जयमल जी १२४ संसार से निवृत भक्तजन १४५ श्री कृष्णदास जी १६५ श्री मधुकर शाह जी १२४ श्री जयतारन विदुर जी १४६ परमधर्म पोषक सन्यासी भक्त १६५ श्री खेमाल रत्न जी १२४ स्वामी चतुरोनगन जी १४६ श्री प्रबोधानन्द जी १६६ श्री रामरयन जी १२५ भक्तसेवी मधुकरिया भक्तजी १४७ श्री द्वारकादास जी १६६ श्री रामरयन जी की धर्मपत्नी १२५ श्री कूबा (केवलदासजी) १४७ श्री पूर्ण जी १६६ श्री किशोर सिंह जी १२६ श्री अग्रदेवजी के शिष्य १४६ श्री लक्ष्मण भट्ट जी १६६ श्री हरीदास जी १२६ श्री टीलाजी का वंश १४६ श्री कृष्णदास जी पयहारी १६७ श्री चतुर्भुजदास जी कीर्तननिष्ठ १२७ श्री कान्हरदास जी १४६ श्री गदाधरदास जी १६७ श्री कृष्णदास जी चालक १२७ श्री नीवाँ जी १५० श्री नारायणदास जी १६८ श्री सन्तदास जी १२८ श्री तूँवर भगवान जी १५० श्री भगवानदास जी १६६ श्री सूरदासजी मदनमोहन १२८ श्री जसवन्त जी १५१ श्री कल्याणदास जी १६६ श्री कात्यायिनीजी १२६ श्री हरिदास जी १५१ श्री सन्तदास जी १७० श्री मुरारिदास जी १३० श्री गोपालदास जी १५२ श्री माधवदास जी १७० गोस्वामी श्री तुलसीदारा जी १३१ श्री विष्णुदास जी १५२ श्री जरावन्त जी १७० श्री मानदास जी १३३ श्री कील्हदेवजी के शिष्यजन १५३ श्री गोविन्ददास जी 'भक्तमाली' १७० श्री गिरिधर जी १३३ श्री नाथभट्ट जी १५३ श्री जगतसिंह जी १७१ श्री गोकुलनाथ जी १३३ श्री करमैती जी १५३ श्री गिरिधर ग्वाल जी १७१ श्री वनवारीदास जी १३४ श्री खंगसेन जी कायस्थ १५५ श्री गोपाली जी १७२ श्री नारायण मिश्र जी १३५ श्री गंगग्वाल जी १५५ श्री रामदास जी १७२ श्री राघवदास जी १३५ श्री सोती जी १५६ श्री रामराय जी १७३ श्री बावन जी १३५ श्री लालदास जी १५६ श्री भगवन्तमुदित जी १७३ श्री परशुराम जी १३६ श्री माधवग्वाल जी १५६ श्री लालमती जी १७४ श्री गदाधर भट्ट जी १३६ श्री प्रयागदास जी १५७ भक्त-परत्व १७५ श्री चारण भक्त १३८ श्री प्रेमनिधि जी १५७ सन्त-उत्कर्ष १७५ श्री करमानन्द जी १३८ श्री राघवदास जी दूबलो १५८ अन्तिम मंगलाचरण १७६ श्री कोल्ह जी, श्री अल्ह जी १३८ श्री कान्हरदास जी १५६ कथन-श्रवण की महिमा १७७ श्री नारायणदास जी १३६ श्री केशवजी लटेरा १६० टीकाकार के श्रीगुरुदेव १७८ श्री पृथीराज जी १३६ श्री केवलराम जी १६० टीका का उपसंहार १७८ श्री सींवा जी १४० श्री आशकरण जी १६१ टीकाकार की विज्ञप्ति १७८ श्री रत्नावतीजी १४१ श्री हरिवंश जी १६२ नमामि भक्तमाल को १७६ श्री जगन्नाथ जी पारीष १४३ श्री कल्याण जी १६२ श्रीनामा जी की प्रार्थना १७६ श्री मथुरादास जी १४४ श्री बीठलदास जी १६२ श्री भक्तमाल जी की आरती १८०

१) (श्री भक्तमाल श्रीभगवतरसिकजी महाराज कृत – श्रीभक्त-नामावली हम सौं इन साधुन सौं पंगति। जिनको नाम लेत दुख छूटत, सुख लूटत तिन संगति।। मुख्य महन्त काम रति गणपति, अज महेश नारायण। सुर नर असुर मुनी पक्षी पशु, जे हरि भक्त परायन।। बाल्मिकी नारद अगस्त्य शुक, व्यास सूत कुल हीना। शबरी स्वपच वशिष्ठ विदुर, विदुरानी प्रेम प्रबीना।। गोपी गोप द्रोपदी कुन्ती, आदि पण्डवा ऊधो। विष्णु स्वामी निम्बारक माधो, रामानुज मग सूधो।। लालाचारज धनुर्दास, कुरेश भाव रस भीजे। ज्ञानदेव गुरु शिष्य त्रिलोचन, पटतर को कहि दीजे।। पद्मावती चरन को चारन, कवि जयदेव जसीलो। चिन्तामनि चिद्रूप लखायो, विल्वमंगलहिं रसीलो।। केशव भट्ट श्रीभट्ट नरायन, भट्ट गदाधर भट्टा। विट्ठलनाथ वल्लभाचारज, ब्रज के गूजर जट्टा।। नित्यानन्द अद्वैत महाप्रभु, शची सुवन चैतन्या। भट्ट गुपाल रघुनाथ जीव, अरु मधू गुसाँई धन्या।। रूप सनातन भज वृन्दावन, तजि दारा सुत सम्पति। व्यास दास हरिवंश गुसाँईं, दिन दुलराई दम्पति।। श्रीस्वामी हरिदास हमारे, विपुल विहारिनि दासी। नागरि नवल माधुरी वल्लभ, नित्य विहार उपासी।। तानसेन अकबर करमैती, मीरा करमाबाई। रत्नावती मीर माधव, रसखानि रीति रस गाई।। अग्रदास नाभादि सखी ये, सबै राम सीता की। सूर मदनमोहन नरसी अलि, तस्कर नवनीता की।।

(श्री भक्तमाल नामावली २) माधोदास गुसाँई तुलसी, कृष्णदास परमानन्द। विष्णुपुरी श्रीधर मधुसूदन, पीपा गुरु रामानन्द॥ अलि भगवान मुरारि रसिक, श्यामानन्द रंका बंका। रामदास चीधर निष्किंचन, सम्हन भक्त निशंका॥ लाखा अंगद भक्त महाजन, गोविन्द नन्द प्रबोधा। दास मुरारि प्रेमनिधि विट्ठल, दास मथुरिया योधा॥ लालमती सीता प्रभुता झाली, गोपाली बाई। सुत विष दियौ पूजि सिलपिल्ले, भक्ति रसीली पाई॥ पृथीराज खेमाल चतुर्भुज, राम रसिक रस रासा। आशकरन जयमल मधुकर नृप हरीदास जन दासा॥ सेना धना कबीरा नामा, कूबा सदन कसाई। वारमुखी रैदास सभा में, सही न श्याम हँसाई॥ चित्रकेतु प्रह्लाद विभीषण, बलि ग्रह बाजैं बावन। जामवन्त हनुमन्त गीध गुह, किये राम जे पावन॥ प्रीति प्रतीति प्रसाद साधु सौं, इन्हें इष्ट गुरु जानौं। तजि ऐश्वर्य मरजाद वेद की, इनके हाथ बिकानौं॥ भूत भविष्य लोक चौदह में, भये होहिं हरि प्यारे। तिन तिन सौं व्यवहार हमारो, अभिमानिन ते न्यारे॥ ‘भगवतरसिक’ रसिक परिकर कर, सादर भोजन पावैं। ऊँचो कुल आचार अनादर, देखि ध्यान नहिं लावैं। प्रसाद-महिमा यह दिव्य प्रसाद प्रिया-प्रिय को। दरसत ही मन मोद बढ़ावत परसत पाप हरत हिय को॥ पावत परम प्रेम उपजावत भुलवत भाव पुरुष तिय को। ‘भगवतरसिक’ भावतो भूषण तिहि क्षण होत युगल जिय को॥

३) (श्री भक्तमाल अथ श्रीवैष्णवदासजी कृत श्रीभक्तमाल-माहात्म्य -दोहा- श्रीनारायनदास जी कृत भक्तन्ह की माल। पुनि ताकी टीका करी प्रियादास सु रसाल॥ ताकौ साधुन के कहे कहौं महातम बानि। लै ग्रन्थनि मत आधुनिक परिचै रस की खानि॥ भक्तन की महिमा कही कपिलदेव भगवान। नारायण आधीन हैं मैं कह कहौं बखान॥ सब संसार सुआरसी जन महिमा प्रतिबिम्ब। रति दृग बिन सूझै नहीं अन्धे को वह बिम्ब॥ वेद शास्त्र के श्रवण को अति फल हरि निरधार। सो याके श्रोता अहैं महिमा अगम अपार॥ भयौ चहै हरि पाँति को सुनै सोइ हरषाय। तहाँ दोय इतिहास हैं सुनिये चित्त लगाय॥ -चौपाई- प्रियादास जू के सुमित्र वर। श्रीगोवर्धननाथ नाम कर॥ ते श्रीभक्तमाल रंग छाये। पढ़ि साँभरि की रमति आये॥ मग में श्रीगोविन्ददेव जो। तिनके दर्शन को गमने सो॥ तहँ श्रीराधारमन पुजारी। हरिप्रिय रसिक अनन्य सु भारी॥ तिन तिनकौं राखो अटकाई। भक्तमाल सुनिवे के ताईं॥ होन लगी तहँ भक्त सुमाला। जहाँ विराजत गोविन्द लाला॥ जयपुर वासी सुनिवे आवैं। प्रेम मुदित ह्वै अश्रु बहावैं॥ कछु दिन बाँचि बन्द करि दीनी। श्रोतन ते निश्चय यह कीनी॥ साँभरि की रमति करि आऊँ। तब ही पूरी कथा सुनाऊँ॥ रमति गये बगदि फिरि आये। कथा कहन को फिरि बैठाये॥

(श्री भक्तमाल-माहात्म्य ४) कहँ तक भई सँभार सु नाहीं। श्रोता अरु वक्ता भ्रम माहीं॥ श्रीगोविन्ददेव विख्याता। कही पुजारी सौं यह बाता॥ श्रीरैदास भक्त की गाथा। भई कहो आगे अब नाथा॥ -दोहा- सुनि सु पुजारी के दृगन पानी बह्यौ अपार। याके श्रोता आप हैं यह कीनी निरधार॥ -चौपाई- पुनि दूजौ इतिहास सुनौ अब। प्रियादास टीका कीनी जब॥ तब ब्रज परिकरमा महँ आये। फिरत फिरत होड़ल जा छाये॥ लालदास तहँ रहे महन्ता। जनसेवी अनन्य रसवन्ता॥ सब समाज तिन रोकि सु लीनो। बाँचो भक्तमाल हठ कीनो॥ भक्तमाल तहँ होन सु लागी। सुनन लगे सब लोग सुभागी॥ इक दिन निसि तहँ आये चोरा। सबै वस्तु लीनी टकटोरा॥ ठाकुर हू को ते लै गये। हरि ही के ये कौतुक नये॥ प्रात भये सबही दुख छाये। प्रियादास हू अति अकुलाये॥ कही कथा न रसोई कीनी। महादुक्ख में मति अति भीनी॥ ठाकुर को ये चरित न प्यारे। ताते चोरन संग पधारे॥ श्रीमहन्त बोले कर जोरी। हम कहँ तजि ठाकुर गे चोरी॥ तुमहू त्याग करोगे जोपै। मेरी कुगति होयगी तोपै॥ ताते हरि इच्छा मन दीजै। कहिये कथा रसोई कीजै॥ प्रियादास बोले यों सुनहू। अब मैं कथा न कहिहौं कबहू॥ श्रीनाभा यों वचन उचारे। हरि को जन चरित्र ये प्यारे॥ सो. झूठी अब भई यहाँ ई। कथा त्याग हरि गये पराई॥ -दोहा- यों कहिकै भूखे रहे काहुहिं परी न चैन। सुपने चोरन ते कहें ठाकुर जू यों बैन॥ -चौपाई- मोहि जहाँ को तहँ करि आवौ। ना तर तुम बहुतै दुख पावौ॥ इक दुख भक्त रहे दुख माही। भक्तमाल पुनि सुनी सु नाहीं॥

(५ (श्री भक्तमाल दुहरे दुख परे हैं हम पर। चौहर दुख डारूँगो तुम पर॥ सुनिकै चोर उठे अधराता। ठाकुर को लै हरषित गाता॥ गावत बजवत नाचत आये। संग सकल सामग्री लाये॥ प्रातःकाल होन नहिं पायो। समाचार द्विज एक सुनायो॥ चोर तिहारे ठाकुर ल्यावत। नाचत गावत बजवत आवत॥ सुनि सब साधु निपट हरषाये। करत कीरतन सनमुख धाये॥ सुधि-बुधि गई प्रेम में छाये। जाय परस्पर लपटत भाये॥ चोरहु कुछ कहि सकै न बतियाँ। दृग भरि आवत फाटत छतियाँ॥ आँसू पोंछत गद्गद बानी। सपने की सब कथा बखानी॥ सुनि सबने अति ही सुख पायौ। प्रेम मग्न मन दुख नसायौ॥ मन्दिर में प्रभु को पधरायौ। बहु मंगल उच्छव करवायौ॥ भक्तमाल की कथा सुहाई। नाम कीरतन सहित कहाई॥ याके श्रोता श्रीहरि अहहीं। पुनि-पुनि साधु प्रेमवश कहहीं॥ -दोहा- हाथ कंकनहिं आरसी कहा दिखाये माहि। हरि श्रोता बिन सबन के यों मन अटकत नाहिं॥ -चौपाई- श्रोता वक्ता को फल जोई। कापै कहि आवत है सोई॥ जो लिखाय राखै उर मोहिं। अन्त समै हरि प्राप्ति कराहीं॥ तहाँ एक सुनिये इतिहासा। क्वौ जन प्रियदासा के पासा॥ आय कही मोहि देहु लिखाई। भक्तमाल सुन्दर सुखदाई॥ प्रियादास पूछी सुखरासा। कहन सुनन कछु है अभ्यासा॥ तिन कह मैं कछु कहि नहिंजानौ। सुनिवे हू की गति न पिछानौं॥ आपु कही तब करिहौं काहा। बात सुनाय दिखाई चाहा॥ महाराज मैं जग व्यौहारी। गृह कामन में अटक्यौ भारी॥ साधु संग को अवसर नाहीं। ताते मैं सोची मन माही॥ मरती बार हिये पर धरिहौं। इतने साधु संग उबरिहौं॥ सुनि यह बात नेत्र भरि आये। बहुत बड़ाई करि सुख छाये॥ ताको पोथी दई लिखाई। सो लै घर गवन्यौ सुख पाई॥

(श्री भक्तमाल महात्मय ६) घर कारज में अटक्यौ भारी। आई ताहि मीच भयकारी॥ यम के दूतन आय दबायौ। दई त्रास अरु कण्ठ रुकायो॥ बेटा पोते ढिंग बिललाता। नैन सैन दै कही सुबाता॥ भक्तमाल की पोथी लाई। मम छाती ते देहु लगाई॥ ते उठाये पोथी लै आये। धरि छाती पर अचरज छाये॥ धरतहिं यम के दूत भजे यों। सूरन के आगे कायर ज्यों॥ कण्ठ खुल्यौ नैननि जल ढार्यौ। हरे कृष्ण गोविन्द उचार्यौ॥ बहु भक्तन के दर्शन पायौ। हिये माँझ आनन्द समायौ॥ सुत हरषित सब पूछत बाता। कहा भयौ सो कहिये ताता॥ तिन कह यमदूतन दुख दीनौ। भक्तनि अब उबार मैं लीनो॥ नामदेव रैदास कबीरा। सेन धना पीपा अति धीरा॥ ठाढ़े सकल कहत है बाता। हमरे संग चलो अब ताता॥ सो मैं अब इनके संग जैहौं। यमदूतन के मुख न चितैहौं॥ यह कहि राम-कृष्ण उच्चारत। नैन मूँदि हरि को उर धारत॥ प्रान त्यागि हरि धाम सिधायौ। बेटन के उर अति सुख छायौ॥ तबते तिनने नेम करे हैं। अन्त समय उर ग्रन्थ धरे हैं॥ तिनको कुटुम वनहिं को आयौ। तिननि सबै यह चरित सुनायौ॥ सो हम लिखन कियो है सही। सब दिन भक्तनि महिमा रही॥ शेष महेश जासु गुन गावैं। तेऊ चरण रेणु मन लावैं॥ आपु ते अधिक दास को गावै। जन की महिमा कहि नहिं आवै॥ प्रियादास अति ही सुखकारी। भक्तमाल टीका विस्तारी॥ तिनकौ पौत्र परम रँग भीनौ। वैष्णवदास महात्म् कीनौ॥ -दोहा- श्री भक्तमाल की गंध को लेत भक्त अलि आय। भेक विमुख ढिंगहीं बसैं रहे कीच लपटाय॥ ।। इति भक्तमाल-माहात्मय सम्पूर्णम् ।। मिति माह वदी ६ संवत् १८८६ वृन्दावन

१. प्राचीन भक्त-चरित्र (ध्रुव, प्रह्लाद, अम्बरीष, जनक, विभीषण)

(७ (श्री भक्तमाल भक्त चतुष्टय लक्षण भक्त भक्ति भगवन्त गुरु चतुर नाम वपु एक। इनके पद वन्दन किये नाशहिं विघ्न अनेक॥ -भक्त- तितिक्षवः कारुणिकाः सुहृदः सर्वदेहिनाम्। अजातशत्रवः शान्ताः साधवः साधुभूषणाः॥ १॥ मय्यनन्येन भावेन भक्तिं कुर्वन्ति ये दृढाम्। मत्कृते त्यक्तकर्माणस्त्यक्तस्वजनबान्धवाः॥ २॥ मदाश्रयाः कथा मृष्टाः शृण्वन्ति कथयन्ति च। तपन्ति विविधास्तापा नैतान्मद्गतचेतसः ॥ ३॥ -भक्ति- अन्याभिलाषिता शून्यं ज्ञान कर्माद्यनावृतम्। आनुकूल्येन कृष्णानुशीलनं भक्तिरुत्तमा॥ ४॥ द्रुतस्य भगवद् धर्माद्धारा वाहिकतां गता। सर्वेशे मनसो वृत्तिर्भक्तिरित्यभि धीयते॥ ५॥ अनिमित्ता भागवती भक्तिः सिद्धेर्गरीयसी। जरयत्याशु या कोशं निगीर्णमनलो यथा॥ ६॥ -भगवन्त- ऐश्वर्यस्य समग्रस्य धर्मस्य यशसः श्रियः। ज्ञान वैराग्ययोश्चैव षण्णां भग इतीरणा॥ ७॥ उत्पत्तिं प्रलयञ्चैव भूतानामागतिं गतिम्। वेत्तिविद्यामविद्यांच स वाच्यो भगवानिति॥ ८॥ पोषणं भरणाधारं शरणं सर्वव्यापकम्। कारुण्यं षड्भिः पूर्णो रामस्तु भगवान् स्वयम्॥ ६॥ -गुरु- आचार्य मां विजानीयात् नावमन्येत् कर्हिचित्। न मर्त्यबुद्ध्यासूयेत सर्वदेवमयो गुरूः॥१०॥ गु शब्दस्त्वन्धकारोऽस्ति रु शब्दस्तन्निरोधकः। अन्धकार निरोधित्वात् गुरुरित्यभिधीयते॥११॥ तस्माद् गुरुं प्रपद्येत जिज्ञासु श्रेय उत्तमम्। शाब्दे परे च निष्णातं ब्रह्मण्युपशमाश्रयम्॥१२॥

(श्री भक्तमाल वन्दना (८ श्रीभक्तमाल-वन्दना नमो नमो श्रीभक्त सुमाल। जाके सुनत महातम नाशत, उर झलकत राधा नँदलाल।। गद्गद स्वर पुलकत अंग अंगनि, लोचन बरषत अँसुवन जाल। उतरि जात अभिमान व्याल विष, लेत जिवाय सुरस तिहिं काल।। होत प्रीति हरि भक्तजनन सौं, लेत शीघ्र हठि चरण प्रछाल। तजत कुसंग लेत सत् संगति, भाग जगत कोउ अद्भुत भाल।। निसि वासर सोवत अरु जागत, रोम-रोम ह्वै करत निहाल। श्रीअग्र-नारायणदास प्रिया प्रिय, प्रगटी जीवन रसिक रसाल।। सन्त-वन्दना वांछाकल्पतरुभ्यश्च, कृपासिन्धुभ्य एव च। पतितानां पावनेभ्यो, वैष्णवेभ्यो नमो नमः ।। प्रह्लादनारदपराशरपुण्डरीक, व्यासाम्बरीषशुकशौनकभीष्मदाल्भ्यान्। रुक्मांगदार्जुनवशिष्ठविभीषणादीन्, एतानहं परमभागवत्तान्नमामि।। सन्त सरल चित जगत हित, जानि सुभाउ सनेहु। बाल विनय सुनि करि कृपा, राम चरण रति देहु।। वन्दौं सन्त समाज चित, हित अनहित नहिं कोय। अंजलिगत शुभ सुमन जिमि, सम सुगन्ध कर दोय।। बार बार पद वन्दौं, (श्री) नाभा आभा ऐन। (जिन) काढ्यौ गाथा वेद को, भक्तमाल रस दैन।। प्रियादास के पद कमल वन्दौं बारम्बार। कीनि भक्तिरसबोधिनी टीका अति सुखसार।। सन्त है अनन्त गुन अन्त कौन पावै जाकौ, जानै रतिवन्त कोऊ रीझै पहिचानिकै। औगुन न दीठि परै देखत ही नैन भरै, ढरै पग ओर उर प्रेम भर आनिकै।। जोपै घटि क्रिया कछु देखियत इन माँझ, करिलै विचार हरि ही की इच्छा मानिकै। बालक सिंगारिकै निहारि नेहवती माता, देत जो दिठौना कारौ दीठि डर जानिकै।। -(श्रीप्रियादास कृत अनन्यमोदिनी से)

8-1 प्रह्लाद विभीषण नारद वशिष्ठ पराशर अर्जुन पुण्डरीक रुक्माङ्गद व्यास दाल्भ्य अम्बरीष भीष्म शुकदेव शौनक पुण्यानिमान् परमभागवतान् स्मरामि

8-2 श्रीनाभाजी एवं सद्गुरुदेव श्रीअग्रदेवाचार्य जी महाराज

६) (श्री भक्तमाल ॥ श्रीहरिः॥ ॥ श्रीमद्भगवद्भक्तेभ्यो नमः॥ श्रीभक्तमाल ॥ श्रीप्रियादासजी कृत आज्ञानिरूपण मंगलाचरण॥ ॥ भक्तिरसबोधिनी टीका॥ मनहरण कवित्त महाप्रभु श्रीकृष्ण-चैतन्य मनहरन जू के चरन कौ ध्यान मेरे नाम मुख गाइयै। ताही समय नाभा जू ने आज्ञा दई, लई धारि, टीका विस्तारि भक्तमाल की सुनाइयै ।। कीजिये कवित्त वन्द छन्द अति प्यारो लगै, जगै जग माँहि कहि वाणी बिरमाइयै। जानौं निज मति, ऐपै सुन्यौं भागवत शुक द्रुमनि प्रवेश कियौ, ऐसेई कहाइयै ॥१॥ टीका का नाम स्वरूप वर्णन रची कविताई सुखदाई लागै निपट सुहाई औ सचाई पुनरुक्ति लै मिटाई है। अक्षर मधुरताई अनुप्रास जमकाई, अति छबि छाई मोद झरी-सी लगाई है।। काव्य की बड़ाई निज मुख न भलाई होति नाभा जू कहाई याते प्रौढ़िकै सुनाई है। हृदै सरसाई जोपै सुनिये सदाई, यह 'भक्तिरसबोधिनी' सुनाम टीका गाई है॥२॥ श्रीभक्ति स्वरूप वर्णन श्रद्धा ई फुलेल औ उबटनौ श्रवन कथा मैल अभिमान अंग-अंगनि छुड़ाइये। मनन सुनीर अन्हवाइ 'अँगु छाइ' दया नवनि वसन पन सौंधो लै लगाइये ।। आभरन नाम हरि साधुसेवा कर्णफूल मानसी सुनथ संग अंजन बनाइये। भक्ति महारानी कौ सिंगार चारु बीरी चाह रहै जो निहारि लहै लाल प्यारी गाइये ।।३।। श्रीभक्ति पंचरस वर्णन शान्त दास्य सख्य वात्सल्य औ श्रृंगार चारु, पाँचौ रस सार विस्तार नीके गाये हैं। टीका को चमत्कार जानौगे विचारि मन, इनके स्वरूप मैं अनूप लै दिखाये हैं।। जिनके न अश्रुपात पुलकित गात कभूँ, तिनहूँ को भावसिन्धु बोरिकै छकाये हैं। जोलौं रहैं दूर रहैं विमुखता पूर हियो, होय चूर-चूर नेकु श्रवण लगाये हैं ॥४॥

(श्री भक्तमाल स्वरूप वर्णन १०) भगवद् प्रियता पंचरस सोई पंचरंग फूल थाके नीके, पीके पहिराइवे को रुचिकै बनाई है। वैजयन्ती दाम, भाववती अलि 'नाभा' नाम, लाई अभिराम स्याम मति ललचाई है।। धारी उर प्यारी किहूँ करत न न्यारी, अहो ! देखौ गति न्यारी ढरि पायन कौं आई है। भक्ति छबि भार ताते नमित श्रृंगार होत, होत वश लखै जोई याते जानि पाई है।।५।। सत्संग प्रभाव वर्णन भक्तितरु पौधा ताहि विघ्न डर छेरी हू, कौ, वारि दै विचार वारि सींच्यो सत्संग सौं। लाग्योई बढ़न गोदा चहुँदिसि कढ़न सो, चढ़न आकाश यश फैल्यो बहुरंग सौं।। सन्त उर आलवाल सोभित विसाल छाया, जियें जीव जाल ताप गये यों प्रसंग सौं। देखौ बढ़वारि जाहि अजाहू की शंका हुती ताहि पेड़ बाँधे झूमैं हाथी जीते जंग सौ ।। ६ ।। श्रीनाभाजी का वर्णन जाको जो स्वरूप सो अनूप लै दिखाय दियो, कियो यों कवित्त पट मिहीं मध्य लाल है। गुण पै अपार साधु कहैं आँक चारि ही में अर्थ विस्तार कविराज टकसाल है।। सुनि सन्त सभा झूमि रही अलि श्रेणी मानो घूमि रही कहैं यह कहा धौं रसाल है। सुने हे "अगर" अब जाने मैं अगर सही चोवा भये नाभा सो सुगन्ध भक्तमाल है।।७।। श्रीभक्तमाल स्वरूप वर्णन बड़े भक्तिमान निसिदिन गुनगान करें, हरैं जग पाप जाप हियो परिपूर है। जानि सुखमानि हरि सन्त सनमान सचे, बचेऊ जगत रीति प्रीति जानी मूर है।। तऊ दुराराध्य कोऊ कैसे कै अराधि सकै समझो न जात, मन कम्प भयो चूर है। शोभित तिलक भाल, माल उर राजै ऐपै, बिना भक्तमाल भक्तिरूप अति दूर है।। ८।।

—=मूल-मंगलाचरण=— —दोहा— भक्त भक्ति भगवन्त गुरु चतुर नाम वपु एक। इनके पद वन्दन किये नाशहिं विघ्न अनेक।।१।। हरि गुरु दासनि सौं साँचो सोई भक्त सही, गही एक टेक फेरि उर ते न टरी है। भक्तिरसरूप कौ स्वरूप यहै छवि सार चारु हरिनाम लेत अँसुवन झरी है।। वही भगवन्त सन्त प्रीति को विचार करै, धरै दूरि ईशता हू पाण्डुन सौं करी है। गुरु गुरुताई की सचाई लै दिखाई जहाँ गई श्री पैहारी जू की रीति रँग भरी है।।६।। मंगल आदि विचारि रह, वस्तु न और अनूप। हरिजन को यश गावते, हरिजन मंगल रूप।।२।। सन्तन् निर्णय कियो मथि, श्रुति पुराण इतिहास। भजिवे को दोई सुघर, कै हरि कै हरिदास।।३।। श्रीगुरु अग्रदेव आज्ञा दई, हरि भक्तन को यश गाव। भवसागर के तरन कौ, नाहिन और उपाव।।४।। आज्ञा-निरुपण मानसी स्वरूप में लगे हैं अग्रदास जबै, करत ब्यार नाभा मधुर सँभार सौं। चढ़्यो हो जहाज पै जु शिष्य एक, आपदा में कर्यो ध्यान, खिंच्यो मन, छुट्यो रूपसार सौं।। कहत समर्थ 'गयो वोहित बहुत दूरि, आओ छबि पूरि, फिर ढरौ ताही ढार सौं।' लोचन उघारिकै निहारि, कह्यो 'बोल्यो कौन?' वही जौन पाल्यो सीथ दै-दै सकुँवार सौं।। अचरज दयो नयो यहाँ लौं प्रवेश भयो, मन सुख छयो जान्यो सन्तन प्रभाव को। आज्ञा तब दई यह भई तोपै साधु कृपा, उन्हीं को रूप गुन कहो हिये भाव को।। बोल्यो कर जोरि याको पावत न ओर छोर, गाऊँ राम कृष्ण नहीं पाऊँ भक्तदाव को। कही समझाय वोइ हृदय आइ कहैं सब, जिन लै दिखाय दई सागर में नाव को।।११।।

१२) (श्री भक्तमाल ━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━ श्रीनाभाजी की आदि अवस्था का वर्णन हनुमान वंश ही में जनम प्रसिद्ध जाकों भयो, दृगहीन सो नवीन बात धारिये। उमरि बरष पाँच मानिकै अकाल आँच, माता वन छोड़ि गई विपत्ति विचारिये।। 'कील्ह' औ 'अगर' ताहि डगर दरस दियौ, लियो यों अनाथ जानि पूछी सो उचारिये। बड़े सिद्ध जल लै कमण्डलु सौं सींचे नैन, चैन भयो खुले चख जोरी को निहारिये।। १२ ।। पाँय परि आँसू आये कृपा करि संग लाये, कील्ह आज्ञा पाइ मन्त्र अगर सुनायो है। गलते प्रकट साधुसेवा सो विराजमान, जानि उनमानि ताही टहल लगायो है।। चरन प्रछाल सन्त-सीथ सौं अनन्त प्रीति, जानी रसरीति ताते हृदय रँग छायो है। भई बढ़वारि ताकौ पावै कौन पारावार, जैसो भक्तिरूप सो अनूप गिरा गायो है।। १३ ।। ।। छप्पय ।। चौबीस अवतार चौबीस रूप लीला रुचिर श्रीअग्रदास उर पद धरौ।। जय जय मीन बराह कमठ नरहरि बलि बावन। परशुराम रघुवीर कृष्ण कीरति जगपावन।। बुद्ध कल्कि अरु व्यास पृथु हरि हंस मन्वन्तर। यज्ञ रिषभ हयग्रीव ध्रुववरदैन धनवन्तर।। बद्रीपति दत्त कपिलदेव सनकादिक करुणा करौ। चौबीस रूप लीला रुचिर श्रीअग्रदास उर पद धरौ ।। ५ ।। जिते अवतार सुखसागर न पारावार करें विस्तार लीला जीवन उधार कौं। जाही रूप माँझ मन लागै जाको पागै तहीं, जागै हिय भाव वही पावै कौन पार कौं।। सबही हैं नित्त ध्यान करत प्रकाशैं चित्त, जैसे रंक पावै वित्त जोपै जानै सार कौं। केशनि कुटिलताई ऐसे मीन सुखदाई, अगर सुरीति भाई बसौ उर हार कौं ।। १४ ।। श्रीचरण-चिह्न चरण-चिह्न रघुवीर के सन्तनि सदा सहायका।। अंकुश, अम्बर, कुलिश, कमल, जव, धुजा, धेनुपद। शंख, चक्र, स्वस्तीक, जम्बुफल, कलश, सुधाह्रद।।

12-1

12-2 (जप के समय ध्यान योग्य) ── श्रीसीताराम चरण-चिह्नानि ── दायाँ बायाँ भगवती श्री सीता जी के चरण चिह्न दायाँ बायाँ भगवान् श्रीराम जी के चरण चिह्न

द्वादश महाभागवत ) (१३ अर्द्धचन्द्र, षट्कोन, मीन, बिन्दु, ऊरधरेखा। अष्टकोन, त्रैकोन, इन्द्रधनु, पुरुषविशेखा।। सीतापत्ति पद नित बसत एते मंगलदायका। चरण-चिह्न रघुवीर के सन्तनि सदा सहायका।। ६।। सन्तनि सहाय काज धारे नृपराज राम, चरन सरोजन में चिह्न सुखदाइये। मन ही मतंग मतवारो हाथ आवै नाहिं, ताके लिये 'अंकुश' लै धार्यो हिये ध्याइये।। शठता सतावै सीत ताही तें 'अम्बर' धर्यो, हर्यो जन सोक ध्यान कीन्हे सुख पाइये। ऐसे ही कुलिश पाप पर्वत के फोरिवे को, भक्तिनिधि जोरिवे को 'कंज' मन ल्याइये।। १५।। 'जव' हेतु सुनो सदा दाता सिद्धि विद्या ही को, सुमति सुगति सुख सम्पति निवास है। छिन्नु में सभीत होत कलि की कुचाल लखि 'ध्वजा' सो विशेष जानौ अभै को विसवास है।। गोपद सो ह्वै हैं भवसागर सो नागर नर जोपै नैन हिय के लगावै, मिटै त्रास है। कपट कुचाल माया बल सबै जीतिवे को, 'दर' को दरस कर जीत्यो अनायास है।। १६।। कामहू निसाचर के मारिवे को 'चक्र' धार्यौ, मंगल कल्याण हेतु 'स्वस्तिक' हूँ मानिये। मंगलीक 'जम्बूफल' फल चारिहूँ को फल कामना अनेक विधिपूर्ण नित ध्यानिये।। 'कलस' सुधा को सर भर्यो हरिभक्ति रस, नैनपुट पान कीजै जीजै मन आनिये। भक्ति को बढ़ावै औ घटावै तीन तापहूँ को, 'अर्धचन्द्र' धारण ये कारण हूँ जानिये।। १७।। विषया भुजंग बलमीक तन मांहि बसे, दास को न डसै याते यत्न अनुसर्यो है। 'अष्टकोन' 'षट्कोन' औ 'त्रिकोन' जन्त्र किये जिये जोई जानि जाके ध्यान उर भर्यो है।। मीन बिन्दु रामचन्द्र कीन्ह्यो वशीकर्ण पायँ ताहि ते निकाय जन मन जात हर्यो है। सागर संसार ताको पारावार पावै, नाहिं 'उर्ध्वरेखा' दासन को सेतुबन्ध कर्यो है।। १८।। ध्नु पद मांहि धर्यो हर्यो सोक ध्यानिन को, मानिन को मार्यो मान रावणादि साखिये। 'पुरुष विशेष' पदकमल बसायो राम, हेतु सुनो अभिराम स्याम अभिलाखिये।। सूधो मन सूधी बैन सूधी करतूति सब ऐसो जन होय मेरो, याही के ज्यों राखिये। जोपै बुधिवन्त रसवन्त रूप सम्पति में, करिले विचार निसिदिन मुख भाखिये।। १९।। द्वादश महाभागवत इनकी कृपा और पुनि समझें द्वादश भक्त प्रधान।। विधि नारद शंकर सनकादिक कपिलदेव मनुभूप। नरहरिदास जनक भीषम बलि शुकमुनि धर्मस्वरूप।।

१४) (श्री भक्तमाल

अन्तरंग अनुचर हरि जू के जो इनकौ यश गावैं। आदि अन्त लौं मंगल तिनके श्रोता वक्ता पावैं।। अजामेल परसंग यह निर्णय परमधर्म के जान। इनकी कृपा और पुनि समझैं द्वादश भक्त प्रधान ।। ७ ।। श्रीशंकरजी द्वादश प्रसिद्ध भक्तराज कथा भागवत, अति सुखदाई नानाविधि करि गाये है। शिवजी की बात एक बहुधा न जानै कोऊ, सुनि रस सानै हियो भाव उरझाये है।। सीता के वियोग राम विकल विपिन देखि, शंकर निपुन सती वचन सुनाये है। कैसे ये प्रवीन ईश कौतुक नवीन देखौ, मनेहूँ करत अंग वैसे ही बनाये हैं।।२०।। सीता ही सो रूप वेश लेश हू न फेर फार, रामजी निहारि नेकु मन में न आई है। तब फिरि आयकै सुनाय दई शंकर को, अति दुख पाय बहुविधि समुझाई है।। इष्ट को स्वरूप धर्यो ताते तनु परिहर्यो, पर्यो बड़ो सोच मति अति भरमाई है। ऐसे प्रभु भाव पगे पोथिन में जगमगे, लगे मोको प्यारे यह बात रीझि गाई है।।२१।। चले जात मग उभै खरे शिव दीठि परे, करे परनाम हिये भक्ति लागी प्यारी है। पार्वती पूछें 'किये कौन को? जू ! कहौ मोसों दीखत न जन कोऊ' तब सो उचारी है।। बरष हजार दस बीते तहाँ भक्त भयो, नयो और ह्वैहैं दूजी ठौर बीते धारी है। सुनिकै प्रभाव हरिदासनि सौं भाव बढ़्यो, चढ़्यो कैसे जात चढ़्यो रँग अति भारी है।।२२।। अजामिलजी धर्यौ पितु मातु नाम अजामेल साँचो भयो, भयो अजामेल तिया छूटी शुभ जात की। कियो मदपान सो सयान गहि दूरि डार्यो, गार्यो तनु वाहीं सौं जो कीन्हौं लैके पातकी।। करि परिहास काहू दुष्ट ने पठाये साधु, आये घर देखि बुद्धि आई गई सातकी। सेवा करि सावधान सन्तन रिझाय लियो, नारायन नाम धरो गर्भ बाल बातकी ।। २३ ।। आइ गयो काल मोहजाल में लपटि रह्यो, महा विकराल यमदूत सो दिखाइये। वही सुत नारायन नाम जो कृपा कै दियो, लियो सो पुकारि सुर आरत सुनाइये।। सुनत ही पार्षद आये ताही ठौर दौर, तोरि डारे पाश कह्यो धर्म समुझाइये। हारे लै बिडारे जाइ पति पै पुकारे कही, 'सुनो वजमारे ! मति जावो हरि गाइये' ।। २४ ।। मास परायण प्रथम विश्राम

श्रीहरिवल्लभ जी) (१५ षोडश पार्षद मो चित्तवृत्ति नित तहँ रहौ जहँ नारायण पार्षद।। विष्वक्सेन जय विजय प्रबल, बल मंगलकारी। नन्द सुनन्द सुभद्र, भद्र जग आमयहारी।। चण्ड प्रचण्ड विनीत, कुमुद कुमुदाक्ष करुणालय। शील सुशील सुषेन, भावभक्तन प्रतिपालय।। लक्ष्मीपति प्रीणन प्रवीन भजनानन्द भक्तनि सुहृद। मो चित्तवृत्ति नित तहँ रहौ जहँ नारायण पार्षद।। ८।। पार्षद मुख्य कहे सोरह सुभाव सिद्ध, सेवा ही की ऋद्धि हिये राखी बहु जोरिकै। श्रीपति नारायन के प्रीनन प्रवीन महा, ध्यान करै जन पालैं भाव दृग कोरिकै।। सनकादि दियो शाप प्रेरिकै दिवायो आप प्रगट ह्वै कह्यो पियो सुधा जिमि घोरिकै। गही प्रतिकूलताई जोपै यही मन भाई याते रीति हद गाई धरी रंग बोरिकै।। २५।। श्रीहरिवल्लभजी हरिवल्लभ सब प्रार्थौं जिन चरणरेणु आसा धरी।। कमला गरुड़ सुनन्द, आदि षोडश प्रभु पद रति। हनुमन्त जामवन्त सुग्रीव विभीषण शबरी खगपति।। ध्रुव उद्धव अम्बरीष, विदुर अक्रूर सुदामा। चन्द्रहास चित्रकेतु ग्राह, गज पाण्डव नामा।। कौषारव कुन्ती बधू पट ऐंचत लज्जा हरी। हरिवल्लभ सब प्रार्थौं जिन चरणरेणु आसा धरी।। ६।। हरि के जे वल्लभ हैं दुर्लभ भुवन माँझ, तिनही की पदरेणु आसा जिय करी है। योगी यती तपी तासौं मेरो कछु काज नाहिं, प्रीति परतीति रीति मेरी मति हरी है।। कमला गरुड़ जाम्बवान सुग्रीव आदि, सबै स्वादरूप कथा पोथिन में धरी है। प्रभु सौं सचाई जग कीरति चलाई अति, मेरे मन भाई सुखदाई रस भरी है।। २६।।