श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
- अयोध्याकाण्ड *
५०९
सूर्यकुलके सूर्य राजा दशरथजी जिनके ससुर हैं, जिनको अमरावतीके स्वामी इन्द्र भी सिहाते थे (ईर्ष्यापूर्वक उनके-जैसा ऐश्वर्य और प्रताप पाना चाहते थे); और प्रभु श्रीरघुनाथजी जिनके प्राणनाथ हैं, जो इतने बड़े हैं कि जो कोई भी बड़ा होता है, वह श्रीरामचन्द्रजीकी [दी हुई] बड़ाईसे ही होता है; ॥ ४ ॥
दो०—पति देवता सुतीय मनि सीय साँथरी देखि।
बिहरत हृदउ न हहरि हर पबि तें कठिन बिसेषि ॥ १९९ ॥
उन श्रेष्ठ पतिव्रता स्त्रियोंमें शिरोमणि सीताजीकी साथरी (कुशशय्या) देखकर मेरा हृदय हहराकर (दहलकर) फट नहीं जाता; हे शङ्कर! यह वज्रसे भी अधिक कठोर है! ॥ १९९ ॥
लालन जोगु लखन लघु लोने। भे न भाइ अस अहंहि न होने ॥
पुरजन प्रिय पितु मातु दुलारे। सिय रघुबीरहि प्रानपिआरे ॥
मेरे छोटे भाई लक्ष्मण बहुत ही सुन्दर और प्यार करनेयोग्य हैं। ऐसे भाई न तो किसीके हुए, न हैं, न होनेके ही हैं। जो लक्ष्मण अवधके लोगोंको प्यारे, माता-पिताके दुलारे और श्रीसीतारामजीके प्राणप्यारे हैं; ॥ १ ॥
मृदु मूर्ति सुकुमार सुभाऊ। तात बाउ तन लाग न काऊ ॥
ते बन सहंहि विपति सब भाँती। निदरे कोटि कुलिस एंहि छाती ॥
जिनकी कोमल मूर्ति और सुकुमार स्वभाव है, जिनके शरीरमें कभी गरम हवा भी नहीं लगी, वे वनमें सब प्रकारकी विपत्तियाँ सह रहे हैं। [हाय!] इस मेरी छातीने [कठोरतामें] करोड़ों वज्रोंका भी निरादर कर दिया [नहीं तो यह कभीकी फट गयी होती] ॥ २ ॥
राम जनमि जगु कीन्ह उजागर। रूप सील सुख सब गुन सागर ॥
पुरजन परिजन गुर पितु माता। राम सुभाउ सबहि सुखदाता ॥
श्रीरामचन्द्रजीने जन्म (अवतार) लेकर जगत्को प्रकाशित (परम सुशोभित) कर दिया। वे रूप, शील, सुख और समस्त गुणोंके समुद्र हैं। पुरवासी, कुटुम्बी, गुरु, पिता-माता सभीको श्रीरामजीका स्वभाव सुख देनेवाला है ॥ ३ ॥
बैरिउ राम बड़ाई करहीं। बोलनि मिलनि बिनय मन हरहीं ॥
सारद कोटि कोटि सत सेषा। करि न सकंहि प्रभु गुन गन लेखा ॥
शत्रु भी श्रीरामजीकी बड़ाई करते हैं। बोल-चाल, मिलनेके ढंग और विनयसे वे मनको हर लेते हैं। करोड़ों सरस्वती और अरबों शेषजी भी प्रभु श्रीरामचन्द्रजीके गुणसमूहोंकी गिनती नहीं कर सकते ॥ ४ ॥
५१०
- रामचरितमानस *
दो०—सुखस्वरूप रघुबंसमनि मंगल मोद निधान। तेसोवत कुस डासि महि बिधि गति अति बलवान ॥ २०० ॥
जो सुखस्वरूप रघुवंशशिरोमणि श्रीरामचन्द्रजी मङ्गल और आनन्दके भण्डार हैं, वे पृथ्वीपर कुशा बिछाकर सोते हैं। विधाताकी गति बड़ी ही बलवान् है ॥ २०० ॥
राम सुना दुखु कान न काऊ । जीवनतरु जिमि जोगवड़ राऊ ॥ पलक नयन फनि मनि जेहि भाँती । जोगवहिं जननि सकल दिन राती ॥
श्रीरामचन्द्रजीने कानोंसे भी कभी दुःखका नाम नहीं सुना। महाराज स्वयं जीवन-वृक्षकी तरह उनकी सार-सँभाल किया करते थे। सब माताएँ भी रात-दिन उनकी ऐसी सार-सँभाल करती थीं, जैसे पलक नेत्रोंकी और साँप अपनी मणिकी करते हैं ॥ १ ॥
ते अब फिरत बिपिन पदचारी । कंद मूल फल फूल अहारी ॥ धिग कैकई अमंगल मूला । भड़सि प्रान प्रियतम प्रतिकूला ॥
वही श्रीरामचन्द्रजी अब जंगलोंमें पैदल फिरते हैं और कन्द-मूल तथा फल-फूलोंका भोजन करते हैं। अमङ्गलकी मूल कैकेयीको धिक्कार है, जो अपने प्राणप्रियतम पतिसे भी प्रतिकूल हो गयी ॥ २ ॥
मैं धिग धिग अघ उदधि अभागी । सबु उत्पातु भयउ जेहि लागी ॥ कुल कलंकु करि सृजेउ बिधाताँ । साईंदोह मोहि कीन्ह कुमाताँ ॥
मुझ पापोंके समुद्र और अभागेको धिक्कार है, धिक्कार है, जिसके कारण ये सब उत्पात हुए। विधाताने मुझे कुलका कलंक बनाकर पैदा किया और कुमाताने मुझे स्वामिद्रोही बना दिया ॥ ३ ॥
सुनि सप्रेम समुझाव निषादू । नाथ करिअ कत बादि बिषादू ॥ राम तुम्हहि प्रिय तुम्ह प्रिय रामहि । यह निरजोसु दोसु बिधि बामहि ॥
यह सुनकर निषादराज प्रेमपूर्वक समझाने लगा—हे नाथ! आप व्यर्थ विषाद किसलिये करते हैं? श्रीरामचन्द्रजी आपको प्यारे हैं और आप श्रीरामचन्द्रजीको प्यारे हैं। यही निचोड़ (निश्चित सिद्धान्त) है, दोष तो प्रतिकूल विधाताको है ॥ ४ ॥
छं०—बिधि बाम की करनी कठिन जेहिं मातु कीन्ही बावरी । तेहि राति पुनि पुनि करहिं प्रभु सादर सरहना रावरी ॥ तुलसी न तुम्ह सो राम प्रीतमु कहतु हौं सौहैं किऐँ । परिनाम मंगल जानि अपने आनिऐ धीरजु हिऐँ ॥
- अयोध्याकाण्ड *
५११
प्रतिकूल विधाताकी करनी बड़ी कठोर है, जिसने माता कैकेयीको बावली बना दिया (उसकी मति फेर दी)। उस रातको प्रभु श्रीरामचन्द्रजी बार-बार आदरपूर्वक आपकी बड़ी सराहना करते थे। तुलसीदासजी कहते हैं—[निषादराज कहता है कि—]श्रीरामचन्द्रजीको आपके समान अतिशय प्रिय और कोई नहीं है, मैं सौगंध खाकर कहता हूँ। परिणाममें मङ्गल होगा, यह जानकर आप अपने हृदयमें धैर्य धारण कीजिये।
सो०—अंतरजामी रामु सकुच सप्रेम कृपायतन।
चलिअ करिअ विश्रामु यह बिचारि दृढ़ आनि मन ॥ २०१ ॥
श्रीरामचन्द्रजी अन्तर्यामी तथा संकोच, प्रेम और कृपाके धाम हैं, यह विचारकर और मनमें दृढ़ता लाकर चलिये और विश्राम कीजिये ॥ २०१ ॥
सखा बचन सुनि उर धरि धीरा । बास चले सुमिरत रघुबीरा ॥ यह सुधि पाइ नगर नर नारी । चले बिलोकन आरत भारी ॥
सखाके वचन सुनकर, हृदयमें धीरज धरकर श्रीरामचन्द्रजीका स्मरण करते हुए भरतजी डेरेको चले। नगरके सारे स्त्री-पुरुष यह (श्रीरामजीके ठहरनेके स्थानका) समाचार पाकर बड़े आतुर होकर उस स्थानको देखने चले ॥ १ ॥
परदखिना करि करहिं प्रनामा । देहिं कैकइहि खोरि निकामा ॥ भरि भरि बारि बिलोचन लेहीं । बाम बिधातहि दूषन देहीं ॥
वे उस स्थानकी परिक्रमा करके प्रणाम करते हैं और कैकेयीको बहुत दोष देते हैं। नेत्रोंमें जल भर-भर लेते हैं और प्रतिकूल विधाताको दूषण देते हैं ॥ २ ॥
एक सराहहिं भरत सनेहू । कोउ कह नृपति निबाहेउ नेहू ॥ निंदहिं आपु सराहि निषादहि । को कहि सकइ बिमोह विषादहि ॥
कोई भरतजीके स्नेहकी सराहना करते हैं और कोई कहते हैं कि राजाने अपना प्रेम खूब निबाहा। सब अपनी निन्दा करके निषादकी प्रशंसा करते हैं। उस समयके विमोह और विषादको कौन कह सकता है? ॥ ३ ॥
एहि बिधि राति लोगु सबु जागा । भा भिनुसार गुदारा लागा ॥ गुरहि सुनावँ चढ़ाइ सुहाई । नई नाव सब मातु चढ़ाई ॥
इस प्रकार रातभर सब लोग जागते रहे। सबेरा होते ही खेवा लगा। सुन्दर नावपर गुरुजीको चढ़ाकर फिर नयी नावपर सब माताओंको चढ़ाया ॥ ४ ॥
दंड चारि महँ भा सबु पारा । उतरि भरत तब सबहि सँभारा ॥
५१२
- रामचरितमानस *
चार घड़ीमें सब गङ्गाजीके पार उतर गये। तब भरतजीने उतरकर सबको सँभाला ॥ ५ ॥
दो०— प्रातक्रिया करि मातु पद बंदि गुरहि सिरु नाइ।
आगें किए निषाद गन दीन्हेउ कटकु चलाइ ॥ २०२ ॥
प्रातःकालकी क्रियाओंको करके माताके चरणोंकी वन्दना कर और गुरुजीको सिर नवाकर भरतजीने निषादगणोंको [रास्ता दिखलानेके लिये] आगे कर लिया और सेना चला दी ॥ २०२ ॥
कियउ निषादनाथु अगुआई। मातु पालकीं सकल चलाई ॥
साथ बोलाइ भाइ लघु दीन्हा। बिप्रन्ह सहित गवनु गुर कीन्हा ॥
निषादराजको आगे करके पीछे सब माताओंकी पालकियाँ चलायीं। छोटे भाई शत्रुघ्णजीको बुलाकर उनके साथ कर दिया। फिर ब्राह्मणोंसहित गुरुजीने गमन किया ॥ १ ॥
आपु सुरसरिहि कीन्ह प्रनामू। सुमिरे लखन सहित सिय रामू ॥
गवने भरत पयादेहिं पाए। कोतल संग जाहिं डोरिआए ॥
तदनन्तर आप (भरतजी) ने गङ्गाजीको प्रणाम किया और लक्ष्मणसहित श्रीसीतारामजीका स्मरण किया। भरतजी पैदल ही चले। उनके साथ कोतल (बिना सवारके) घोड़े बागडोरसे बँधे हुए चले जा रहे हैं ॥ २ ॥
कहहिं सुसेवक बारहिं बारा। होइअ नाथ अस्व असवारा ॥
रामु पयादेहि पायँ सिधाए। हम कहँ रथ गज बाजि बनाए ॥
उत्तम सेवक बार-बार कहते हैं कि हे नाथ! आप घोड़ेपर सवार हो लीजिये। [भरतजी जवाब देते हैं कि] श्रीरामचन्द्रजी तो पैदल ही गये और हमारे लिये रथ, हाथी और घोड़े बनाये गये हैं ॥ ३ ॥
सिर भर जाउँ उचित अस मोरा। सब तें सेवक धरमु कठोरा ॥
देखि भरत गति सुनि मृदु बानी। सब सेवक गन गरहिं गलानी ॥
मुझे उचित तो ऐसा है कि मैं सिरके बल चलकर जाऊँ। सेवकका धर्म सबसे कठिन होता है। भरतजीकी दशा देखकर और कोमल वाणी सुनकर सब सेवकगण ग्लानिके मारे गले जा रहे हैं ॥ ४ ॥
दो०— भरत तीसरे पहर कहँ कीन्ह प्रबेसु प्रयाग।
कहत राम सिय राम सिय उमगि उमगि अनुराग ॥ २०३ ॥
प्रेममें उमँग-उमँगकर सीताराम-सीताराम कहते हुए भरतजीने तीसरे पहर प्रयागमें प्रवेश किया ॥ २०३ ॥
झलका झलकत पायन्ह कैसें। पंकज कोस ओस कन जैसें ॥
भरत पयादेहिं आए आजू। भयउ दुखित सुनि सकल समाजू ॥
- अयोध्याकाण्ड *
५१३
उनके चरणोंमें छाले कैसे चमकते हैं, जैसे कमलकी कलीपर ओसकी बूँदे चमकती हों। भरतजी आज पैदल ही चलकर आये हैं, यह समाचार सुनकर सारा समाज दुःखी हो गया ॥ १ ॥
खबरि लीन्ह सब लोग नहाए । कीन्ह प्रनामु त्रिबेनिहिं आए ॥ सबिधि सित्तासित नीर नहाने । दिए दान महिसुर सनमाने ॥
जब भरतजीने यह पता पा लिया कि सब लोग स्नान कर चुके, तब त्रिवेणीपर आकर उन्हें प्रणाम किया। फिर विधिपूर्वक [गङ्गा-यमुनाके] श्वेत और श्याम जलमें स्नान किया और दान देकर ब्राह्मणोंका सम्मान किया ॥ २ ॥
देखत स्यामल धवल हलोरै । पुलकि सरीर भरत कर जोरै ॥ सकल कामप्रद तीरथराऊ । बेद बिदित जग प्रगट प्रभाऊ ॥
श्याम और सफेद (यमुनाजी और गङ्गाजीकी) लहरोंको देखकर भरतजीका शरीर पुलकित हो उठा और उन्होंने हाथ जोड़कर कहा—हे तीर्थराज! आप समस्त कामनाओंको पूर्ण करनेवाले हैं। आपका प्रभाव वेदोंमें प्रसिद्ध और संसारमें प्रकट है ॥ ३ ॥
मागउँ भीख त्यागि निज धरमू । आरत काह न करइ कुकरमू ॥ अस जियँ जानि सुजान सुदानी । सफल करहिं जग जाचक बानी ॥
मैं अपना धर्म (न माँगनेका क्षत्रियधर्म) त्यागकर आपसे भीख माँगता हूँ। आर्त मनुष्य कौन-सा कुकर्म नहीं करता? ऐसा हृदयमें जानकर सुजान उत्तम दानी जगत्में माँगनेवालेकी वाणीको सफल किया करते हैं (अर्थात् वह जो माँगता है, सो दे देते हैं) ॥ ४ ॥
दो०—अरथ न धरम न काम रुचि गति न चहउँ निरबान ।
जनम जनम रति राम पद यह बरदानु न आन ॥ २०४ ॥
मुझे न अर्थकी रुचि (इच्छा) है, न धर्मकी, न कामकी और न मैं मोक्ष ही चाहता हूँ। जन्म-जन्ममें मेरा श्रीरामजीके चरणोंमें प्रेम हो, बस, यही वरदान माँगता हूँ, दूसरा कुछ नहीं ॥ २०४ ॥
जानहुँ रामु कुटिल करि मोही । लोग कहउ गुर साहिब द्रोही ॥ सीता राम चरन रति मोरें । अनुदिन बढउ अनुग्रह तोरें ॥
स्वयं श्रीरामचन्द्रजी भी भले ही मुझे कुटिल समझें और लोग मुझे गुरुद्रोही तथा स्वामिद्रोही भले ही कहें; पर श्रीसीतारामजीके चरणोंमें मेरा प्रेम आपकी कृपासे दिन-दिन बढ़ता ही रहे ॥ १ ॥
जलदु जनम भरि सुरति बिसारउ । जाचत जलु पबि पाहन डारउ ॥ चातकु रटनि घटें घटि जाई । बढें प्रेम सब भाँति भलाई ॥
५१४
- रामचरितमानस *
मेघ चाहे जन्मभर चातककी सुधि भुला दे और जल माँगनेपर वह चाहे वज्र और पत्थर (ओले) ही गिरावे, पर चातककी रटन घटनेसे तो उसकी बात ही घट जायगी (प्रतिष्ठा ही नष्ट हो जायगी)। उसकी तो प्रेम बढ़नेमें ही सब तरहसे भलाई हैं ॥ २ ॥
कनकहिं बान चढ़इ जिमि दाहें । तिमि प्रियतम पद नेम निबाहें ॥ भरत बचन सुनि माझ त्रिबेनी । भइ मृदु बानि सुमंगल देनी ॥
जैसे तपानेसे सोनेपर आब (चमक) आ जाती है, वैसे ही प्रियतमके चरणोंमें प्रेमका नियम निबाहनेसे प्रेमी सेवकका गौरव बढ़ जाता है। भरतजीके वचन सुनकर बीच त्रिवेणीमेंसे सुन्दर मङ्गल देनेवाली कोमल वाणी हुई ॥ ३ ॥
तात भरत तुम्ह सब बिधि साधू । राम चरन अनुराग अगाधू ॥ बादि गलानि करहु मन माहीं । तुम्ह सम रामहि कोउ प्रिय नाहीं ॥
हे तात भरत! तुम सब प्रकारसे साधु हो। श्रीरामचन्द्रजीके चरणोंमें तुम्हारा अथाह प्रेम है। तुम व्यर्थ ही मनमें ग्लानि कर रहे हो। श्रीरामचन्द्रको तुम्हारे समान प्रिय कोई नहीं है ॥ ४ ॥
दो०—तनु पुलकेउ हियँ हरषु सुनि बेनि बचन अनुकूल ।
भरत धन्य कहि धन्य सुर हरषित बरषहिं फूल ॥ २०५ ॥
त्रिवेणीजीके अनुकूल वचन सुनकर भरतजीका शरीर पुलकित हो गया, हृदयमें हर्ष छा गया। भरतजी धन्य हैं, धन्य हैं, कहकर देवता हर्षित होकर फूल बरसाने लगे ॥ २०५ ॥
प्रमुदित तीरथराज निवासी । बैखानस बटु गृही उदासी ॥ कहहिं परसपर मिलि दस पाँचा । भरत सनेहु सीलु सुचि साँचा ॥
तीर्थराज प्रयागमें रहनेवाले वानप्रस्थ, ब्रह्मचारी, गृहस्थ और उदासीन (संन्यासी) सब बहुत ही आनन्दित हैं और दस-पाँच मिलकर आपसमें कहते हैं कि भरतजीका प्रेम और शील पवित्र और सच्चा है ॥ १ ॥
सुनत राम गुन ग्राम सुहाए । भरद्वाज मुनिबर पहिं आए ॥ दंड प्रनामु करत मुनि देखे । मूरतिमंत भाग्य निज लेखे ॥
श्रीरामचन्द्रजीके सुन्दर गुणसमूहोंको सुनते हुए वे मुनिश्रेष्ठ भरद्वाजजीके पास आये। मुनिने भरतजीको दण्डवत्-प्रणाम करते देखा और उन्हें अपना मूर्तिमान् सौभाग्य समझा ॥ २ ॥
धाइ उठाइ लाइ उर लीन्हे । दीन्हि असीस कृतारथ कीन्हे ॥ आसनु दीन्ह नाइ सिरु बैठे । चहत सकुच गृहं जनु भजि पैठे ॥
उन्होंने दौड़कर भरतजीको उठाकर हृदयसे लगा लिया और आशीर्वाद देकर कृतार्थ किया। मुनिने उन्हें आसन दिया। वे सिर नवाकर इस तरह बैठे मानो भागकर संकोचके घरमें घुस जाना चाहते हैं ॥ ३ ॥
- अयोध्याकाण्ड *
५१५
मुनि पूँछब कछु यह बड़ सोचू । बोले रिषि लिखि सीलु सँकोचू ॥ सुनहु भरत हम सब सुधि पाई । बिधि करतब पर किछु न बसाई ॥
उनके मनमें यह बड़ा सोच है कि मुनि कुछ पूछेंगे [तो मैं क्या उत्तर दूँगा] । भरतजीके शील और संकोचको देखकर ऋषि बोले—भरत! सुनो, हम सब खबर पा चुके हैं । विधाताके कर्तव्यपर कुछ वश नहीं चलता ॥ ४ ॥
दो०— तुम्ह ग्लानि जियँ जनि करहु समुझि मातु करतूति ।
तात कैकइहि दोसु नहिं गई गिरा मति धूति ॥ २०६ ॥
माताकी करतूतको समझकर (याद करके) तुम हृदयमें ग्लानि मत करो । हे तात! कैकेयीका कोई दोष नहीं है, उसकी बुद्धि तो सरस्वती बिगाड़ गयी थी ॥ २०६ ॥
यहउ कहत भल कहिहि न कोऊ । लोकु बेदु बुध संमत दोऊ ॥
तात तुम्हार बिमल जसु गाई । पाइहि लोकउ बेदु बड़ाई ॥
यह कहते भी कोई भला न कहेगा, क्योंकि लोक और वेद दोनों ही विद्वानोंको मान्य है । किन्तु हे तात! तुम्हारा निर्मल यश गाकर तो लोक और वेद दोनों बड़ाई पावेंगे ॥ १ ॥
लोक बेद संमत सबु कहई । जेहि पितु देइ राजु सो लहई ॥
राउ सत्यव्रत तुम्हहि बोलाई । देत राजु सुखु धरमु बड़ाई ॥
यह लोक और वेद दोनोंको मान्य है और सब यही कहते हैं कि पिता जिसको राज्य दे वही पाता है । राजा सत्यव्रती थे; तुमको बुलाकर राज्य देते, तो सुख मिलता, धर्म रहता और बड़ाई होती ॥ २ ॥
राम गवनु बन अनरथ मूला । जो सुनि सकल बिस्व भइ सूला ॥
सो भावी बस रानि अयानी । करि कुचालि अंतहुँ पछितानी ॥
सारे अनर्थकी जड़ तो श्रीरामचन्द्रजीका वनगमन है, जिसे सुनकर समस्त संसारको पीड़ा हुई । वह श्रीरामका वनगमन भी भावीवश हुआ । बेसमझ रानी तो भावीवश कुचाल करके अन्तमें पछतायी ॥ ३ ॥
तहँउँ तुम्हार अलप अपराधू । कहै सो अधम अयान असाधू ॥
करतेहु राजु त तुम्हहि न दोषू । रामहि होत सुनत संतोषू ॥
उसमें भी तुम्हारा कोई तनिक-सा भी अपराध कहे, तो वह अधम, अज्ञानी और असाधु है । यदि तुम राज्य करते तो भी तुम्हें दोष न होता । सुनकर श्रीरामचन्द्रजीको भी सन्तोष ही होता ॥ ४ ॥
दो०— अब अति कीन्हेहु भरत भल तुम्हहि उचित मत एहु ।
सकल सुमंगल मूल जग रघुबर चरन सनेहु ॥ २०७ ॥
५१६
- रामचरितमानस *
हे भरत! अब तो तुमने बहुत ही अच्छा किया; यही मत तुम्हारे लिये उचित था। श्रीरामचन्द्रजीके चरणोंमें प्रेम होना ही संसारमें समस्त सुन्दर मङ्गलोंका मूल है॥ २०७॥
सो तुम्हार धनु जीवनु प्राना। भूरिभाग को तुम्हहि समाना॥ यह तुम्हार आचरजु न ताता। दसरथ सुअन राम प्रिय भ्राता॥
सो वह (श्रीरामचन्द्रजीके चरणोंका प्रेम) तो तुम्हारा धन, जीवन और प्राण ही है; तुम्हारे समान बड़भागी कौन है? हे तात! तुम्हारे लिये यह आश्चर्यकी बात नहीं है। क्योंकि तुम दशरथजीके पुत्र और श्रीरामचन्द्रजीके प्यारे भाई हो॥ १॥
सुनहु भरत रघुबर मन माहीं। पेम पात्रु तुम्ह सम कोउ नाहीं॥ लखन राम सीतहि अति प्रीती। निसि सब तुम्हहि सराहत बीती॥
हे भरत! सुनो, श्रीरामचन्द्रजीके मनमें तुम्हारे समान प्रेमपात्र दूसरा कोई नहीं है। लक्ष्मणजी, श्रीरामजी और सीताजी तीनोंको सारी रात उस दिन अत्यन्त प्रेमके साथ तुम्हारी सराहना करते ही बीती॥ २॥
जाना मरमु नहात प्रयागा। मगन होहिं तुम्हरे अनुरागा॥ तुम्ह पर अस सनेहु रघुबर केँ। सुख जीवन जग जस जड़ नर केँ॥
प्रयागराजमें जब वे स्नान कर रहे थे, उस समय मैंने उनका यह मर्म जाना। वे तुम्हारे प्रेममें मग्न हो रहे थे। तुमपर श्रीरामचन्द्रजीका ऐसा ही (अगाध) स्नेह है जैसा मूर्ख (विषयासक्त) मनुष्यका संसारमें सुखमय जीवनपर होता है॥ ३॥
यह न अधिक रघुबीर बड़ाई। प्रनत कुटुंब पाल रघुराई॥ तुम्ह तौ भरत मोर मत एहू। धरेँ देह जनु राम सनेहू॥
यह श्रीरघुनाथजीकी बहुत बड़ाई नहीं है। क्योंकि श्रीरघुनाथजी तो शरणागतके कुटुम्बभरको पालनेवाले हैं। हे भरत! मेरा यह मत है कि तुम तो मानो शरीरधारी श्रीरामजीके प्रेम ही हो॥ ४॥
दो०— तुम्ह कहैं भरत कलंक यह हम सब कहैं उपदेशु।
राम भगति रस सिद्धि हित भा यह समउ गनेसु॥ २०८॥
हे भरत! तुम्हारे लिये (तुम्हारी समझमें) यह कलङ्क है, पर हम सबके लिये तो उपदेश है। श्रीरामभक्तिरूपी रसकी सिद्धिके लिये यह समय गणेश (बड़ा शुभ) हुआ है॥ २०८॥
नव बिधु बिमल तात जसु तोरा। रघुबर किंकर कुमुद चकोरा॥ उदित सदा अँथइहि कबहूँ ना। घटिहि न जग नभ दिन दिन दूना॥
- अयोध्याकाण्ड *
५१७
हे तात! तुम्हारा यश निर्मल नवीन चन्द्रमा है और श्रीरामचन्द्रजीके दास कुमुद और चकोर हैं [वह चन्द्रमा तो प्रतिदिन अस्त होता और घटता है, जिससे कुमुद और चकोरको दुःख होता है]; परन्तु यह तुम्हारा यशरूपी चन्द्रमा सदा उदय रहेगा; कभी अस्त होगा ही नहीं। जगद्दूषी आकाशमें यह घटेगा नहीं, वरं दिन-दिन दूना होगा॥ १ ॥
कोक तिलोक प्रीति अति करिही । प्रभु प्रताप रबि छबिहि न हरिही ॥ निसि दिन सुखद सदा सब काहू । ग्रसिहि न कैकइ करतबु राहू ॥
त्रैलोक्यरूपी चकवा इस यशरूपी चन्द्रमापर अत्यन्त प्रेम करेगा और प्रभु श्रीरामचन्द्रजीका प्रतापरूपी सूर्य इसकी छविको हरण नहीं करेगा। यह चन्द्रमा रात-दिन सदा सब किसीको सुख देनेवाला होगा। कैकेयीका कुकर्मरूपी राहु इसे ग्रास नहीं करेगा॥ २ ॥
पूरन राम सुपेम पियूषा । गुर अवमान दोष नहीं दूषा ॥ रामभगत अब अमिअँ अघाहूँ । कीन्हेहु सुलभ सुधा बसुधाहूँ ॥
यह चन्द्रमा श्रीरामचन्द्रजीके सुन्दर प्रेमरूपी अमृतसे पूर्ण है। यह गुरुके अपमानरूपी दोषसे दूषित नहीं है। तुमने इस यशरूपी चन्द्रमाकी सृष्टि करके पृथ्वीपर भी अमृतको सुलभ कर दिया। अब श्रीरामजीके भक्त इस अमृतसे तृप्त हो लें॥ ३ ॥
भूप भगीरथ सुरसरि आनी । सुमिरत सकल सुमंगल खानी ॥ दसरथ गुन गन बरनि न जाहीं । अधिकु कहा जेहि सम जग नाहीं ॥
राजा भगीरथ गङ्गाजीको लाये, जिन (गङ्गाजी) का स्मरण ही सम्पूर्ण सुन्दर मङ्गलोंकी खान है। दशरथजीके गुणसमूहोंका तो वर्णन ही नहीं किया जा सकता; अधिक क्या, जिनकी बराबरीका जगत्में कोई नहीं है॥ ४ ॥
दो०—जासु सनेह सकोच बस राम प्रगट भए आइ। जे हर हिय नयननि कबहूँ निरखे नहीं अघाइ ॥ २०९ ॥
जिनके प्रेम और संकोच (शील) के वशमें होकर स्वयं [सच्चिदानन्दधन] भगवान् श्रीराम आकर प्रकट हुए, जिन्हें श्रीमहादेवजी अपने हृदयके नेत्रोंसे कभी अघाकर नहीं देख पाये (अर्थात् जिनका स्वरूप हृदयमें देखते-देखते शिवजी कभी तुम नहीं हुए)॥ २०९ ॥
कीरति बिधु तुम्ह कीन्ह अनूपा । जहाँ बस राम पेम मृगरूपा ॥ तात गलानि करहु जियँ जाएँ । डरहु दरिद्रहि पारसु पाएँ ॥
[परन्तु उनसे भी बढकर] तुमने कीर्तिरूपी अनुपम चन्द्रमाको उत्पन्न किया, जिसमें श्रीरामप्रेम ही हिरनके [चिह्नेके] रूपमें बसता है। हे तात! तुम व्यर्थ ही हृदयमें ग्लानि कर रहे हो। पारस पाकर भी तुम दरिद्रतासे डर रहे हो!॥ १ ॥
५१८
- रामचरितमानस *
सुनहु भरत हम झूठ न कहहीं। उदासीन तापस बन रहहीं॥ सब साधन कर सुफल सुहावा। लखन राम सिय दरसनु पावा॥
हे भरत! सुनो, हम झूठ नहीं कहते। हम उदासीन हैं (किसीका पक्ष नहीं करते), तपस्वी हैं (किसीकी मुँहदेखी नहीं कहते) और बनमें रहते हैं (किसीसे कुछ प्रयोजन नहीं रखते)। सब साधनोंका उत्तम फल हमें लक्ष्मणजी, श्रीरामजी और सीताजीका दर्शन प्राप्त हुआ॥ २॥
तेहि फल कर फलु दरस तुम्हारा। सहित पयाग सुभाग हमारा॥ भरत धन्य तुम्ह जसु जगु जयऊ। कहि अस पेम मगन मुनि भयऊ॥
[सीता-लक्ष्मणसहित श्रीरामदर्शनरूप] उस महान् फलका परम फल यह तुम्हारा दर्शन है। प्रयागराजसमेत हमारा बड़ा भाग्य है। हे भरत! तुम धन्य हो, तुमने अपने यशसे जगत्को जीत लिया है। ऐसा कहकर मुनि प्रेममें मग्न हो गये॥ ३॥
सुनि मुनि बचन सभासद हरषे। साधु सराहि सुमन सुर बरषे॥ धन्य धन्य धुनि गगन पयागा। सुनि सुनि भरतु मगन अनुरागा॥
भरद्वाज मुनिके वचन सुनकर सभासद हर्षित हो गये। 'साधु-साधु' कहकर सराहना करते हुए देवताओंने फूल बरसाये। आकाशमें और प्रयागराजमें 'धन्य, धन्य' की ध्वनि सुन-सुनकर भरतजी प्रेममें मग्न हो रहे हैं॥ ४॥
दो०—पुलक गात हिर्यँ रामु सिय सजल सरोरुह नैन। करि प्रनामु मुनि मंडलिहि बोले गदगद बैन॥ २१०॥
भरतजीका शरीर पुलकित है, हृदयमें श्रीसीतारामजी हैं और कमलके समान नेत्र [प्रेमाश्रुके] जलसे भरे हैं। वे मुनियोंकी मण्डलीको प्रणाम करके गद्गद वचन बोले—॥ २१०॥
मुनि समाजु अरु तीरथराजू। साँचिहुँ सपथ अघाइ अकाजू॥ एहि थल जौं किछु कहिअ बनाई। एहि सम अधिक न अघ अधमाई॥
मुनियोंका समाज है और फिर तीर्थराज है। यहाँ सच्ची सौगंध खानेसे भी भरपूर हानि होती है। इस स्थानमें यदि कुछ बनाकर कहा जाय, तो इसके समान कोई बड़ा पाप और नीचता न होगी॥ १॥
तुम्ह सर्बग्य कहउँ सतिभाऊ। उर अंतरजामी रघुराऊ॥ मोहि न मातु करतब कर सोचू। नहिं दुखु जियँ जगु जानिहि पोचू॥
मैं सच्चे भावसे कहता हूँ। आप सर्वज्ञ हैं, और श्रीरघुनाथजी हृदयके भीतरकी जाननेवाले हैं (मैं कुछ भी असत्य कहूँगा तो आपसे और उनसे छिपा नहीं रह सकता)। मुझे माता कैकेयीकी करनीका कुछ भी सोच नहीं है। और न मेरे मनमें इसी बातका दुःख है कि जगत् मुझे नीच समझेगा॥ २॥
- अयोध्याकाण्ड *
५११
नाहिन डरु बिगिरिहि परलोकू । पितहु मरन कर मोहि न सोकू ॥ सुकृत सुजस भरि भुअन सुहाए । लछिमन राम सरिस सुत पाए ॥
न यही डर है कि मेरा परलोक बिगड़ जायगा और न पिताजीके मरनेका ही मुझे शोक है। क्योंकि उनका सुन्दर पुण्य और सुयश विश्वभरमें सुशोभित है। उन्होंने श्रीराम-लक्ष्मण-सरीखे पुत्र पाये ॥ ३ ॥
राम बिरहँ तजि तनु छनभंगू । भूप सोच कर कवन प्रसंगू ॥ राम लखन सिय बिनु पग पनहीं । करि मुनि बेष फिरिहँ बन बनहीं ॥
फिर जिन्होंने श्रीरामचन्द्रजीके विरहमें अपने क्षणभङ्गुर शरीरको त्याग दिया, ऐसे राजाके लिये सोच करनेका कौन प्रसंग है? [सोच इसी बातका है कि] श्रीरामजी, लक्ष्मणजी और सीताजी पैरोंमें बिना जूतीके मुनियोंका वेष बनाये वन-वनमें फिरते हैं ॥ ४ ॥
दो०— अजिन बसन फल असन महि सयन डासि कुस पात ।
बसि तरु तर नित सहत हिम आतप बरषा बात ॥ २११ ॥
वे वल्कल वस्त्र पहनते हैं, फलोंका भोजन करते हैं, पृथ्वीपर कुश और पत्ते बिछाकर सोते हैं और वृक्षोंके नीचे निवास करके नित्य सदी, गर्मी, वर्षा और हवा सहते हैं ॥ २११ ॥
एहि दुख दाहँ दहड़ दिन छाती । भूख न बासर नीद न राती ॥ एहि कुरोग कर औषधु नाहीं । सोधेउँ सकल बिस्व मन माहीं ॥
इसी दुःखकी जलनसे निरन्तर मेरी छाती जलती रहती है। मुझे न दिनमें भूख लगती है, न रातको नीद आती है। मैंने मन-ही-मन समस्त विश्वको खोज डाला, पर इस कुरोगकी औषध कहीं नहीं है ॥ १ ॥
मातु कुमत बढ़ई अघ मूला । तेहिँ हमार हित कीन्ह बँसूला ॥ कलि कुकाठ कर कीन्ह कुजंत्र । गाड़ि अवधि पढ़ि कठिन कुमंत्र ॥
माताका कुमत (बुरा विचार) पापोंका मूल बढ़ई है। उसने हमारे हितका बसूला बनाया। उससे कलहरूपी कुकाठका कुयन्त्र बनाया और चौदह वर्षकी अवधिरूपी कठिन कुमन्त्र पढ़कर उस यन्त्रको गाड़ दिया। [यहाँ माताका कुविचार बढ़ई है, भरतको राज्य बसूला है, रामका वनवास कुयन्त्र है और चौदह वर्षकी अवधि कुमन्त्र है] ॥ २ ॥
मोहि लगि यहु कुठाटु तेहिँ ठाटा । घालेसि सब जगु बारहबाटा ॥ मिटइ कुजोगु राम फिरि आएँ । बसइ अवध नहिँ आन उपाएँ ॥
५२०
- रामचरितमानस *
मेरे लिये उसने यह सारा कुठाट (बुरा साज) रचा और सारे जगत्को बारहबाट (छिन्न-भिन्न) करके नष्ट कर डाला। यह कुयोग श्रीरामचन्द्रजीके लौट आनेपर ही मिट सकता है और तभी अयोध्या बस सकती है, दूसरे किसी उपायसे नहीं ॥ ३ ॥
भरत बचन सुनि मुनि सुखु पाई । सबहिं कीन्हि बहु भाँति बड़ाई ॥ तात करहु जनि सोचु बिसेषी । सब दुखु मिटिहि राम पग देखी ॥
भरतजीके वचन सुनकर मुनिने सुख पाया और सभीने उनकी बहुत प्रकारसे बड़ाई की। [मुनिने कहा—] हे तात! अधिक सोच मत करो। श्रीरामचन्द्रजीके चरणोंका दर्शन करते ही सारा दुःख मिट जायगा ॥ ४ ॥
दो०— करि प्रबोधु मुनिबर कहेउ अतिथि पेमप्रिय होहु ।
कंद मूल फल फूल हम देहिं लेहु करि छोहु ॥ २१२ ॥
इस प्रकार मुनिश्रेष्ठ भरद्वाजजीने उनका समाधान करके कहा—अब आपलोग हमारे प्रेमप्रिय अतिथि बनिये और कृपा करके कन्द-मूल, फल-फूल जो कुछ हम दें, स्वीकार कीजिये ॥ २१२ ॥
सुनि मुनि बचन भरत हियँ सोचू । भयउ कुअवसर कठिन सँकोचू ॥ जानि गुरुइ गुर गिरा बहोरी । चरन बंदि बोले कर जोरी ॥
मुनिके वचन सुनकर भरतके हृदयमें सोच हुआ कि यह बेमौके बड़ा बेदब संकोच आ पड़ा! फिर गुरुजनोंकी वाणीको महत्त्वपूर्ण (आदरणीय) समझकर, चरणोंकी वन्दना करके हाथ जोड़कर बोले— ॥ १ ॥
सिर धरि आयसु करिअ तुम्हारा । परम धरम यहु नाथ हमारा ॥ भरत बचन मुनिबर मन भाए । सुचि सेवक सिष निकट बोलाए ॥
हे नाथ! आपकी आज्ञाको सिर चढ़ाकर उसका पालन करना, यह हमारा परम धर्म है। भरतजीके ये वचन मुनिश्रेष्ठके मनको अच्छे लगे। उन्होंने विश्वासपात्र सेवकों और शिष्योंको पास बुलाया ॥ २ ॥
चाहिअ कीन्हि भरत पहुनाई । कंद मूल फल आनहु जाई ॥ भलेहिं नाथ कहि तिन्ह सिर नाए । प्रमुदित निज निज काज सिधाए ॥
[और कहा कि] भरतकी पहुनाई करनी चाहिये। जाकर कन्द, मूल और फल लाओ। उन्होंने 'हे नाथ! बहुत अच्छा' कहकर सिर नवाया और तब वे बड़े आनन्दित होकर अपने-अपने कामको चल दिये ॥ ३ ॥
मुनिहि सोच पाहुन बड़ नेवता । तसि पूजा चाहिअ जस देवता ॥ सुनि रिधि सिधि अनिमादिक आई । आयसु होइ सो करहिं गोसाई ॥
- अयोध्याकाण्ड *
५२१
मुनिको चिन्ता हुई कि हमने बहुत बड़े मेहमानको न्योता है। अब जैसा देवता हो, वैसी ही उसकी पूजा भी होनी चाहिये। यह सुनकर ऋद्धियाँ और अणिमादि सिद्धियाँ आ गयीं [और बोलीं—] हे गोसाई! जो आपकी आज्ञा हो सो हम करें ॥ ४ ॥
दो०— राम बिरह व्याकुल भरतु सानुज सहित समाज।
पहुनाई करि हरहु श्रम कहा मुदित मुनिराज ॥ २१३ ॥
मुनिराजने प्रसन्न होकर कहा—छोटे भाई शत्रुघ्न और समाजसहित भरतजी श्रीरामचन्द्रजीके विरहमें व्याकुल हैं, इनकी पहुनाई (आतिथ्य-सत्कार) करके इनके श्रमको दूर करो ॥ २१३ ॥
रिधि सिधि सिर धरि मुनिबर बानी । बड़भागिनि आपुहि अनुमानी ॥
कहहिं परसपर सिधि समुदाई । अतुलित अतिथि राम लघु भाई ॥
ऋद्धि-सिद्धिने मुनिराजकी आज्ञाको सिर चढ़ाकर अपनेको बड़भागिनी समझा। सब सिद्धियाँ आपसमें कहने लगीं—श्रीरामचन्द्रजीके छोटे भाई भरत ऐसे अतिथि हैं, जिनकी तुलनामें कोई नहीं आ सकता ॥ १ ॥
मुनि पद बंदि करिअ सोड़ आजू । होइ सुखी सब राज समाजू ॥
अस कहि रचेउ रुचिर गृह नाना । जेहि बिलोकि बिलखाहिं बिमाना ॥
अतः मुनिके चरणोंकी वन्दना करके आज वही करना चाहिये जिससे सारा राज-समाज सुखी हो। ऐसा कहकर उन्होंने बहुत-से सुन्दर घर बनाये, जिन्हें देखकर विमान भी विलखते हैं (लजा जाते हैं) ॥ २ ॥
भोग बिभूति भूरि भरि राखे । देखत जिन्हहि अमर अभिलाषे ॥
दासीं दास साजु सब लीन्हें । जोगवत रहहिं मनहि मनु दीन्हें ॥
उन घरोंमें बहुत-से भोग (इन्द्रियोंके विषय) और ऐश्वर्य (टाट-बाट) का सामान भरकर रख दिया, जिन्हें देखकर देवता भी ललचा गये। दासी-दास सब प्रकारकी सामग्री लिये हुए मन लगाकर उनके मनोंको देखते रहते हैं (अर्थात् उनके मनकी रुचिके अनुसार करते रहते हैं) ॥ ३ ॥
सब समाजु सजि सिधि पल माहीं । जे सुख सुरपुर सपनेहूँ नाहीं ॥
प्रथमहिं बास दिए सब केही । सुंदर सुखद जथा रुचि जेही ॥
जो सुखके सामान स्वर्गमें भी स्वप्नमें भी नहीं हैं ऐसे सब सामान सिद्धियोंने पलभरमें सज दिये। पहले तो उन्होंने सब किसीको, जिसकी जैसी रुचि थी वैसे ही, सुन्दर सुखदायक निवासस्थान दिये ॥ ४ ॥
दो०— बहुरि सपरिजन भरत कहँ रिषि अस आयसु दीन्ह।
बिधि बिसमय दायकु बिभव मुनिबर तपबल कीन्ह ॥ २१४ ॥
५२२
- रामचरितमानस *
और फिर कुटुम्बसहित भरतजीको दिये, क्योंकि ऋषि भरद्वाजजीने ऐसी ही आज्ञा दे रखी थी। [भरतजी चाहते थे कि उनके सब संगियोंको आराम मिले, इसलिये उनके मनकी बात जानकर मुनिने पहले उन लोगोंको स्थान देकर पीछे सपरिवार भरतजीको स्थान देनेके लिये आज्ञा दी थी।] मुनिश्रेष्ठने तपोबलसे ब्रह्माको भी चकित कर देनेवाला वैभव रच दिया ॥ २१४ ॥
मुनि प्रभाउ जब भरत बिलोका । सब लघु लगे लोकपति लोका ॥ सुख समाजु नहीं जाइ बखानी । देखत बिरति बिसारहिं ग्यानी ॥
जब भरतजीने मुनिके प्रभावको देखा तो उसके सामने उन्हें [इन्द्र, वरुण, यम, कुबेर आदि] सभी लोकपालोंके लोक तुच्छ जान पड़े। सुखकी सामग्रीका वर्णन नहीं हो सकता, जिसे देखकर ज्ञानीलोग भी वैराग्य भूल जाते हैं ॥ १ ॥
आसन सयन सुबसन बिताना । बन बाटिका बिहग मृग नाना ॥ सुरभि फूल फल अमिअ समाना । बिमल जलासय बिबिध बिधाना ॥
आसन, सेज, सुन्दर वस्त्र, चंदोवे, वन, बगीचे, भाँति-भाँतिके पक्षी और पशु, सुगन्धित फूल और अमृतके समान स्वादिष्ट फल, अनेकों प्रकारके (तालाब, कुएँ, बावली आदि) निर्मल जलाशय, ॥ २ ॥
असन पान सुचि अमिअ अमी से । देखि लोग सकुचात जमी से ॥ सुर सुरभी सुरतरु सबही कें । लिखि अभिलाषु सुरेस सची कें ॥
तथा अमृतके भी अमृत-सरीखे पवित्र खान-पानके पदार्थ थे, जिन्हें देखकर सब लोग संयमी पुरुषों (विरक्त मुनियों) की भाँति सकुचा रहे हैं। सभीके डेरोंमें [मनोवाञ्छित वस्तु देनेवाले] कामधेनु और कल्पवृक्ष हैं, जिन्हें देखकर इन्द्र और इन्द्राणीको भी अभिलाषा होती है (उनका भी मन ललचा जाता है) ॥ ३ ॥
रितु बसंत बह त्रिबिध बयारी । सब कहैं सुलभ पदारथ चारी ॥ स्वरक चंदन बनितादिक भोगा । देखि हरष बिसमय बस लोगा ॥
वसन्त-ऋतु है। शीतल, मन्द, सुगन्ध तीन प्रकारकी हवा बह रही है। सभीको [धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष] चारों पदार्थ सुलभ हैं। माला, चन्दन, स्त्री आदिक भोगोंको देखकर सब लोग हर्ष और विषादके वश हो रहे हैं। [हर्ष तो भोग-सामग्रियोंको और मुनिके तपःप्रभावको देखकर होता है और विषाद इस बातसे होता है कि श्रीरामके वियोगमें नियम-व्रतसे रहनेवाले हमलोग भोग-विलासमें क्यों आ फँसे; कहीं इनमें आसक्त होकर हमारा मन नियम-व्रतोंको न त्याग दे] ॥ ४ ॥
दो०—संपति चकई भरतु चक मुनि आयस खेलवार । तेहि निसि आश्रम पिंजराँ राखे भा भिनुसार ॥ २१५ ॥
- अयोध्याकाण्ड *
५२३
सम्पत्ति ( भोग-विलासकी सामग्री) चकवी है और भरतजी चकवा हैं और मुनिकी आज्ञा खेल है, जिसने उस रातको आश्रमरूपी पिंजड़ेमें दोनोंको बंद कर रखा और ऐसे ही सबेरा हो गया। [जैसे किसी बहेलियेके द्वारा एक पिंजड़ेमें रखे जानेपर भी चकवी-चकवेका रातको संयोग नहीं होता, वैसे ही भरद्वाजजीकी आज्ञासे रातभर भोग-सामग्रियोंके साथ रहनेपर भी भरतजीने मनसे भी उनका स्पर्शतक नहीं किया।] ॥ २१५ ॥
मासपारायण, उन्नीसवाँ विश्राम
कीन्ह निमज्जनु तीरथराजा । नाइ मुनिहि सिरु सहित समाजा ॥ रिषि आयसु असीस सिर राखी । करि दंडवत बिनय बहु भाषी ॥
[प्रातःकाल] भरतजीने तीर्थराजमें स्नान किया और समाजसहित मुनिको सिर नवाकर और ऋषिकी आज्ञा तथा आशीर्वादको सिर चढ़ाकर दण्डवत् करके बहुत विनती की ॥ १ ॥
पथ गति कुसल साथ सब लीन्हें । चले चित्रकूटहिं चितु दीन्हें ॥ रामसखा कर दीन्हें लागू । चलत देह धरि जनु अनुरागू ॥
तदनन्तर रास्तेकी पहचान रखनेवाले लोगों (कुशल पथप्रदर्शकों) के साथ सब लोगोंको लिये हुए भरतजी चित्रकूटमें चित लगाये चले। भरतजी रामसखा गुहके हाथमें हाथ दिये हुए ऐसे जा रहे हैं, मानो साक्षात् प्रेम ही शरीर धारण किये हुए हो ॥ २ ॥
नहिं पद त्रान सीस नहिं छाया । पेमु नेमु ब्रतु धरमु अमाया ॥ लखन राम सिय पंथ कहानी । पूँछत सखहि कहत मृदु बानी ॥
न तो उनके पैरोंमें जूते हैं और न सिरपर छाया है। उनका प्रेम, नियम, व्रत और धर्म निष्कपट (सच्चा) है। वे सखा निषादराजसे लक्ष्मणजी, श्रीरामचन्द्रजी और सीताजीके रास्तेकी बातें पूछते हैं, और वह कोमल वाणीसे कहता है ॥ ३ ॥
राम बास थल बिटप बिलोकेँ । उर अनुराग रहत नहिं रोकेँ ॥ देखि दसा सुर बरिसहिं फूला । भइ मृदु महि मगु मंगल मूला ॥
श्रीरामचन्द्रजीके ठहरनेकी जगहों और वृक्षोंको देखकर उनके हृदयमें प्रेम रोके नहीं रुकता। भरतजीकी यह दशा देखकर देवता फूल बरसाने लगे। पृथ्वी कोमल हो गयी और मार्ग मङ्गलका मूल बन गया ॥ ४ ॥
दो०—किऐं जाहिं छाया जलद सुखद बहइ बर बात ।
तस मगु भयउ न राम कहँ जस भा भरतहि जात ॥ २१६ ॥
बादल छाया किये जा रहे हैं, सुख देनेवाली सुन्दर हवा बह रही है। भरतजीके जाते समय मार्ग जैसा सुखदायक हुआ, वैसा श्रीरामचन्द्रजीको भी नहीं हुआ था ॥ २१६ ॥
५२४
- रामचरितमानस *
जड़ चेतन मग जीव घनरे । जे चितए प्रभु जिन्ह प्रभु हेरे ॥ ते सब भए परम पद जोगू । भरत दरस मेटा भव रोगू ॥
रास्तेमें असंख्य जड़-चेतन जीव थे । उनमेंसे जिनको प्रभु श्रीरामचन्द्रजीने देखा, अथवा जिन्होंने प्रभु श्रीरामचन्द्रजीको देखा वे सब [उसी समय] परमपदके अधिकारी हो गये । परन्तु अब भरतजीके दर्शनने तो उनका भव (जन्म-मरण)-रूपी रोग मिया ही दिया । [श्रीरामदर्शनसे तो वे परमपदके अधिकारी ही हुए थे, परन्तु भरतदर्शनसे उन्हें वह परमपद प्राप्त हो गया] ॥ १ ॥
यह बड़ि बात भरत कड़ नाहीं । सुमिरत जिनहि रामु मन माहीं ॥ बारक राम कहत जग जेऊ । होत तरन तारन नर तेऊ ॥
भरतजीके लिये यह कोई बड़ी बात नहीं है, जिन्हें श्रीरामजी स्वयं अपने मनमें स्मरण करते रहते हैं । जगत्में जो भी मनुष्य एक बार 'राम' कह लेते हैं, वे भी तरने-तारनेवाले हो जाते हैं ! ॥ २ ॥
भरतु राम प्रिय पुनि लघु भ्राता । कस न होइ मगु मंगलदाता ॥ सिद्ध साधु मुनिबर अस कहहीं । भरतहि निरखि हरषु हियँ लहहीं ॥
फिर भरतजी तो श्रीरामचन्द्रजीके प्यारे तथा उनके छोटे भाई ठहरे । तब भला उनके लिये मार्ग मङ्गल (सुख) दायक कैसे न हो? सिद्ध, साधु और श्रेष्ठ मुनि ऐसा कह रहे हैं और भरतजीको देखकर हृदयमें हर्ष-लाभ करते हैं ॥ ३ ॥
देखि प्रभाउ सुरेसहि सोचू । जगु भल भलेहि पोच कहूँ पोचू ॥ गुर सन कहेउ करिअ प्रभु सोई । रामहि भरतहि भेट न होई ॥
भरतजीके [इस प्रेमके] प्रभावको देखकर देवराज इन्द्रको सोच हो गया [कि कहीं इनके प्रेमवश श्रीरामजी लौट न जायँ और हमारा बना-बनाया काम बिगड़ जाय] । संसार भलेके लिये भला और बुरेके लिये बुरा है (मनुष्य जैसा आप होता है जगत् उसे वैसा ही दीखता है) । उसने गुरु बृहस्पतिजीसे कहा—हे प्रभो! वही उपाय कीजिये जिससे श्रीरामचन्द्रजी और भरतजीकी भेंट ही न हो ॥ ४ ॥
दो०—रामु सँकोची प्रेम बस भरत सपेम पयोधि ।
बनी बात बेगरन चहति करिअ जतनु छलु सोधि ॥ २१७ ॥
श्रीरामचन्द्रजी संकोची और प्रेमके वश हैं और भरतजी प्रेमके समुद्र हैं । बनी-बनायी बात बिगड़ना चाहती है, इसलिये कुछ छल ढूँढ़कर इसका उपाय कीजिये ॥ २१७ ॥
बचन सुनत सुरगुरु मुसुकाने । सहसनयन बिनु लोचन जाने ॥
मायापति सेवक सन माया । करड़ त उलटि परड़ सुरराया ॥
- अयोध्याकाण्ड *
५२५
इन्द्रके वचन सुनते ही देवगुरु बृहस्पतिजी मुसकराये। उन्होंने हजार नेत्रोंवाले इन्द्रको [ज्ञानरूपी] नेत्रोंसे रहित (मूर्ख) समझा और कहा—हे देवराज! मायाके स्वामी श्रीरामचन्द्रजीके सेवकके साथ कोई माया करता है तो वह उलटकर अपने ही ऊपर आ पड़ती है ॥ १ ॥
तब किछु कीन्ह राम रुख जानी । अब कुचालि करि होइहि हानी ॥ सुनु सुरेस रघुनाथ सुभाऊ । निज अपराध रिसाहिं न काऊ ॥
उस समय (पिछली बार) तो श्रीरामचन्द्रजीका रुख जानकर कुछ किया था। परन्तु इस समय कुचाल करनेसे हानि ही होगी। हे देवराज! श्रीरघुनाथजीका स्वभाव सुनो, वे अपने प्रति किये हुए अपराधसे कभी रुष्ट नहीं होते ॥ २ ॥
जो अपराधु भगत कर करई । राम रोष पावक सो जरई ॥ लोकहुँ बेद बिदित इतिहासा । यह महिमा जानहिं दुरबासा ॥
पर जो कोई उनके भक्तका अपराध करता है, वह श्रीरामकी क्रोधगिर्में जल जाता है। लोक और वेद दोनोंमें इतिहास (कथा) प्रसिद्ध है। इस महिमाको दुर्वासाजी जानते हैं ॥ ३ ॥
भरत सरिस को राम सनेही । जगु जप राम रामु जप जेही ॥
सारा जगत् श्रीरामको जपता है, वे श्रीरामजी जिनको जपते हैं उन भरतजीके समान श्रीरामचन्द्रजीका प्रेमी कौन होगा? ॥ ४ ॥
दो०—मनहुँ न आनिअ अमरपति रघुबर भगत अकाजु ।
अजसु लोक परलोक दुख दिन दिन सोक समाजु ॥ २१८ ॥
हे देवराज! रघुकुलश्रेष्ठ श्रीरामचन्द्रजीके भक्तका काम बिगाड़नेकी बात मनमें भी न लाइये। ऐसा करनेसे लोकमें अपयश और परलोकमें दुःख होगा और शोकका सामान दिनोंदिन बढ़ता ही चला जायगा ॥ २१८ ॥
सुनु सुरेस उपदेसु हमारा । रामहि सेवकु परम पिआरा ॥ मानत सुखु सेवक सेवकाई । सेवक बैर बैरु अधिकाई ॥
हे देवराज! हमारा उपदेश सुनो। श्रीरामजीको अपना सेवक परम प्रिय है। वे अपने सेवककी सेवासे सुख मानते हैं और सेवकके साथ वैर करनेसे बड़ा भारी वैर मानते हैं ॥ १ ॥
जद्यपि सम नहिं राग न रोषु । गहहिं न पाप पूनु गुन दोषु ॥ करम प्रधान बिस्व करि राखा । जो जस करइ सो तस फलु चाखा ॥
यद्यपि वे सम हैं—उनमें न राग है, न रोष है। और न वे किसीका पाप-पुण्य और गुण-दोष ही ग्रहण करते हैं। उन्होंने विश्वमें कर्मको ही प्रधान कर रखा है। जो जैसा करता है, वह वैसा ही फल भोगता है ॥ २ ॥
५२६
- रामचरितमानस *
तदपि करहिं सम बिषम बिहारा । भगत अभगत हृदय अनुसार ॥ अगुन अलेप अमान एकरस । रामु सगुन भए भगत पेम बस ॥
तथापि वे भक्त और अभक्तके हृदयके अनुसार सम और विषम व्यवहार करते हैं (भक्तको प्रेमसे गले लगा लेते हैं और अभक्तको मारकर तार देते हैं)। गुणरहित, निलैप, मानरहित और सदा एकरस भगवान् श्रीराम भक्तके प्रेमवश ही सगुण हुए हैं ॥ ३ ॥
राम सदा सेवक रुचि राखी । बेद पुरान साधु सुर सारखी ॥ अस जियँ जानि तजहु कुटिलाई । करहु भरत पद प्रीति सुहाई ॥
श्रीरामजी सदा अपने सेवकों (भक्तों) की रुचि रखते आये हैं। वेद, पुराण, साधु और देवता इसके साक्षी हैं। ऐसा हृदयमें जानकर कुटिलता छोड़ दो और भरतजीके चरणोंमें सुन्दर प्रीति करो ॥ ४ ॥
दो०—राम भगत परहित निरत पर दुख दुखी दयाल।
भगत सिरोमनि भरत तें जनि डरपहु सुरपाल ॥ २१९ ॥
हे देवराज इन्द्र ! श्रीरामचन्द्रजीके भक्त सदा दूसरोंके हितमें लगे रहते हैं, वे दूसरोंके दुःखसे दुःखी और दयालु होते हैं। फिर, भरतजी तो भक्तोंके शिरोमणि हैं, उनसे बिलकुल न डरो ॥ २१९ ॥
सत्यसंध प्रभु सुर हितकारी । भरत राम आयस अनुसारी ॥ स्वारथ बिबस बिकल तुम्ह होहू । भरत दोसु नहिं राउर मोहू ॥
प्रभु श्रीरामचन्द्रजी सत्यप्रतिज्ञ और देवताओंका हित करनेवाले हैं। और भरतजी श्रीरामजीकी आज्ञाके अनुसार चलनेवाले हैं। तुम व्यर्थ ही स्वार्थके विशेष वश होकर व्याकुल हो रहे हो। इसमें भरतजीका कोई दोष नहीं, तुम्हारा ही मोह है ॥ १ ॥
सुनि सुरबर सुगुर बर बानी । भा प्रमोदु मन मिटी गलानी ॥ बरषि प्रसून हरषि सुरराऊ । लगे सराहन भरत सुभाऊ ॥
देवगुर बृहस्पतिजीकी श्रेष्ठ वाणी सुनकर इन्द्रके मनमें बड़ा आनन्द हुआ और उनकी चिन्ता मिट गयी। तब हर्षित होकर देवराज फूल बरसाकर भरतजीके स्वभावकी सराहना करने लगे ॥ २ ॥
एहि बिधि भरत चले मग जाहीं । दसा देखि मुनि सिद्ध सिहाहीं ॥ जबहिं रामु कहि लेहिं उसासा । उमगत पेमु मनहुँ चहु पासा ॥
इस प्रकार भरतजी मार्गमें चले जा रहे हैं। उनकी [प्रेममयी] दशा देखकर मुनि और सिद्ध लोग भी सिहाते हैं। भरतजी जभी 'राम' कहकर लंबी साँस लेते हैं, तभी मानो चारों ओर प्रेम उमड़ पड़ता है ॥ ३ ॥
द्रवहिं बचन सुनि कुलिस पषाना । पुरजन पेमु न जाइ बखाना ॥ बीच बास करि जमुनहिं आए । निरखि नीरु लोचन जल छाए ॥
- अयोध्याकाण्ड *
५२७
उनके [प्रेम और दीनतासे पूर्ण] वचनोंको सुनकर वज्र और पत्थर भी पिघल जाते हैं। अयोध्यावासियोंका प्रेम कहते नहीं बनता। बीचमें निवास (मुकाम) करके भरतजी यमुनाजीके तटपर आये। यमुनाजीका जल देखकर उनके नेत्रोंमें जल भर आया॥४॥
दो०—रघुबर बरन बिलोकि बर बारि समेत समाज।
होत मगन बारिधि बिरह चढ़े बिबेक जहाज॥ २२०॥
श्रीरघुनाथजीके (श्याम) रंगका सुन्दर जल देखकर सारे समाजसहित भरतजी [प्रेमविह्वल होकर] श्रीरामजीके विरहरूपी समुद्रमें डूबते-डूबते विवेकरूपी जहाजपर चढ़ गये (अर्थात् यमुनाजीका श्यामवर्ण जल देखकर सब लोग श्यामवर्ण भगवान्के प्रेममें विह्वल हो गये और उन्हें न पाकर विरहव्यथासे पीड़ित हो गये; तब भरतजीको यह ध्यान आया कि जल्दी चलकर उनके साक्षात् दर्शन करेंगे, इस विवेकसे वे फिर उत्साहित हो गये) ॥ २२०॥
जमुन तीर तेहि दिन करि बासू। भयउ समय सम सबहि सुपासू॥ रातिहिं घाट घाट की तरनी। आई अगनित जाहिं न बरनी॥
उस दिन यमुनाजीके किनारे निवास किया। समयानुसार सबके लिये [खान-पान आदिकी] सुन्दर व्यवस्था हुई। [निषादराजका सङ्केत पाकर] रात-ही-रातमें घाट-घाटकी अगणित नावें वहाँ आ गयीं, जिनका वर्णन नहीं किया जा सकता॥ १॥
प्रात पार भए एकहि खेवाँ। तोषे रामसखा की सेवाँ॥ चले नहाइ नदिहि सिर नाई। साथ निषादनाथ दोउ भाई॥
सबेर एक ही खेवेमें सब लोग पार हो गये और श्रीरामचन्द्रजीके सखा निषादराजकी इस सेवासे सन्तुष्ट हुए। फिर स्नान करके और नदीको सिर नवाकर निषादराजके साथ दोनों भाई चले ॥ २॥
आगें मुनिबर बाहन आछें। राजसमाज जाइ सबु पाछें॥ तेहि पाछें दोउ बंधु पयादें। भूषन बसन बेष सुठि सादें॥
आगे अच्छी-अच्छी सवारियोंपर श्रेष्ठ मुनि हैं, उनके पीछे सारा राजसमाज जा रहा है। उसके पीछे दोनों भाई बहुत सादे भूषण-वस्त्र और वेषसे पैदल चल रहे हैं ॥ ३॥
सेवक सुहृद सचिवसुत साथा। सुमिरत लखनु सीय रघुनाथा॥ जहँ जहँ राम बास बिश्रामा। तहँ तहँ करहिं सप्रेम प्रनामा॥
सेवक, मित्र और मन्त्रीके पुत्र उनके साथ हैं। लक्ष्मण, सीताजी और श्रीरघुनाथजीका स्मरण करते जा रहे हैं। जहाँ-जहाँ श्रीरामजीने निवास और विश्राम किया था, वहाँ-वहाँ वे प्रेमसहित प्रणाम करते हैं ॥ ४॥
५२८
- रामचरितमानस *
दो०— मगबासी नर नारि सुनि धाम काम तजि धाइ।
देखि सरूप सनेह सब मुदित जनम फलु पाइ ॥ २२१ ॥
मार्गमें रहनेवाले स्त्री-पुरुष यह सुनकर घर और काम-काज छोड़कर दौड़ पड़ते हैं और उनके रूप (सौन्दर्य) और प्रेमको देखकर वे सब जन्म लेनेका फल पाकर आनन्दित होते हैं ॥ २२१ ॥
कहहिं सपेम एक एक पाहीं । रामु लखनु सरिख होहिं कि नाहीं ॥
बय बपु बरन रूपु सोइ आली । सीलु सनेहु सरिस सम चाली ॥
गाँवोंकी स्त्रियाँ एक-दूसरीसे प्रेमपूर्वक कहती हैं—सखी ! ये राम-लक्ष्मण हैं कि नहीं ? हे सखी ! इनकी अवस्था, शरीर और रंग-रूप तो वही है। शील, स्नेह उन्हींके सदृश है और चाल भी उन्हींके समान है ॥ १ ॥
बेषु न सो सरिख सीय न संगा । आगें अनी चली चतुरंगा ॥
नहिं प्रसन्न मुख मानस खेदा । सरिख संदेहु होइ एहिं भेदा ॥
परन्तु हे सखी ! इनका न तो वह वेष (बल्लकवस्त्रधारी मुनिवेष) है, न सीताजी ही संग हैं। और इनके आगे चतुरङ्गिणी सेना चली जा रही है। फिर इनके मुख प्रसन्न नहीं हैं, इनके मनमें खेद है। हे सखी ! इसी भेदके कारण सन्देह होता है ॥ २ ॥
तासु तरक तियगन मन मानी । कहहिं सकल तेहि सम न सयानी ॥
तेहि सराहि बानी फुरि पूजी । बोली मधुर बचन तिय दूजी ॥
उसका तर्क (युक्ति) अन्य स्त्रियोंके मन भाया। सब कहती हैं कि इसके समान सयानी (चतुर) कोई नहीं है। उसकी सराहना करके और 'तेरी वाणी सत्य है' इस प्रकार उसका सम्मान करके दूसरी स्त्री मीठे वचन बोली ॥ ३ ॥
कहि सपेम सब कथाप्रसंगू । जेहि बिधि राम राज रस भंगू ॥
भरतहि बहुरि सराहन लागी । सील सनेह सुभाय सुभागी ॥
श्रीरामजीके राजतिलकका आनन्द जिस प्रकारसे भंग हुआ था वह सब कथाप्रसंग प्रेमपूर्वक कहकर फिर वह भाग्यवती स्त्री श्रीभरतजीके शील, स्नेह और स्वभावकी सराहना करने लगी ॥ ४ ॥
दो०— चलत पयादें खात फल पिता दीन्ह तजि राजु।
जात मनावन रघुबरहि भरत सरिस को आजु ॥ २२२ ॥
[वह बोली—] देखो, ये भरतजी पिताके दिये हुए राज्यको त्यागकर पैदल चलते और फलाहार करते हुए श्रीरामजीको मनानेके लिये जा रहे हैं। इनके समान आज कौन है ? ॥ २२२ ॥