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श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ
  • लङ्काकाण्ड *

७१३

फिर [तूने सुना ही होगा कि] आकाशरूपी तालाबमें मेरी भुजाओंरूपी कमलोंपर बसकर शिवजीसहित कैलास हंसके समान शोभाको प्राप्त हुआ था! ॥ २२ (ख) ॥

तुम्हरे कटक माझ सुनु अंगद । मो सन भिरिहि कवन जोधा बद ॥ तव प्रभु नारि बिरहं बलहीना । अनुज तासु दुख दुखी मलीना ॥

अरे अंगद! सुन; तेरी सेनामें बता, ऐसा कौन योद्धा है जो मुझसे भिड़ सकेगा। तेरा मालिक तो स्त्रीके वियोगमें बलहीन हो रहा है। और उसका छोटा भाई उसीके दुःखसे दुःखी और उदास है ॥ १ ॥

तुम्ह सुग्रीव कूलद्रुम दोऊ । अनुज हमार भीरु अति सोऊ ॥ जामवंत मंत्री अति बूढ़ा । सो कि होइ अब समरारूढ़ा ॥

तुम और सुग्रीव, दोनों [नदी] तटके वृक्ष हो। [रहा] मेरा छोटा भाई विभीषण, [सो] वह भी बड़ा डरपोक है। मन्त्री जाम्बवान् बहुत बूढ़ा है। वह अब लड़ाईमें क्या चढ़ (उद्यत हो) सकता है? ॥ २ ॥

सिलिपकर्म जानहिं नल नीला । है कपि एक महा बलसीला ॥ आवा प्रथम नगरु जेहिं जारा । सुनत बचन कह बालिकुमारा ॥

नल-नील तो शिल्प-कर्म जानते हैं (वे लड़ना क्या जानें?)। हाँ, एक वानर जरूर महान् बलवान् है, जो पहले आया था, और जिसने लङ्का जलायी थी। यह वचन सुनते ही बालिपुत्र अंगदने कहा— ॥ ३ ॥

सत्य बचन कहु निमिचर नाहा । साँचेहुँ कीस कीन्ह पुर दाहा ॥ रावन नगर अल्प कपि दहई । सुनि अस बचन सत्य को कहई ॥

हे राक्षसराज! सच्ची बात कहो! क्या उस वानरने सचमुच तुम्हारा नगर जला दिया? रावण [जैसे जगद्विजयी योद्धा] का नगर एक छोटे-से वानरने जला दिया। ऐसे वचन सुनकर उन्हें सत्य कौन कहेगा? ॥ ४ ॥

जो अति सुभट सराहेहु रावन । सो सुग्रीव केर लघु धावन ॥ चलइ बहुत सो बीर न होई । पठवा खबरि लेन हम सोई ॥

हे रावण! जिसको तुमने बहुत बड़ा योद्धा कहकर सराहा है, वह तो सुग्रीवका एक छोटा-सा दौड़कर चलनेवाला हरकारा है। वह बहुत चलता है, वीर नहीं है। उसको तो हमने [केवल] खबर लेनेके लिये भेजा था ॥ ५ ॥

दो०— सत्य नगरु कपि जारेउ बिनु प्रभु आयसु पाइ।

फिरि न गयउ सुग्रीव पहिं तेहिं भय रहा लुकाइ ॥ २३ (क) ॥

७१४

  • रामचरितमानस *

क्या सचमुच ही उस वानरने प्रभुकी आज्ञा पाये बिना ही तुम्हारा नगर जला डाला? मालूम होता है, इसी डरसे वह लौटकर सुग्रीवके पास नहीं गया और कहीं छिप रहा! ॥ २३ (क) ॥

सत्य कहहि दसकंठ सब मोहि न सुनि कछु कोह।

कोउ न हमारें कटक अस तो सन लरत जो सोह ॥ २३ (ख) ॥

हे रावण! तुम सब सत्य ही कहते हो, मुझे सुनकर कुछ भी क्रोध नहीं है। सचमुच हमारी सेनामें कोई भी ऐसा नहीं है जो तुमसे लड़नेमें शोभा पाये ॥ २३ (ख) ॥

प्रीति बिरोध समान सन करिअ नीति असि आहि।

जौं मृगपति बध मेडुकन्हि भल कि कहइ कोउताहि ॥ २३ (ग) ॥

प्रीति और वैर बराबरीवालेसे ही करना चाहिये, नीति ऐसी ही है। सिंह यदि मेढकोंको मारे, तो क्या उसे कोई भला कहेगा? ॥ २३ (ग) ॥

जद्यपि लघुता राम कहैं तोहि बधें बड़ दोष।

तदपि कठिन दसकंठ सुनु छत्र जाति कर रोष ॥ २३ (घ) ॥

यद्यपि तुम्हें मारनेमें श्रीरामजीकी लघुता है और बड़ा दोष भी है, तथापि हे रावण! सुनो, क्षत्रियजातिका क्रोध बड़ा कठिन होता है ॥ २३ (घ) ॥

बक्र उक्ति धनु बचन सर हृदय देहेउ रिपु कीस।

प्रतिउत्तर सड़सिन्ह मनहैं काढ़त भट दससीस ॥ २३ (ङ) ॥

वक्रोक्तिरूपी धनुषसे वचनरूपी बाण मारकर अंगदने शत्रुका हृदय जला दिया। वीर रावण उन बाणोंको मानो प्रत्युत्तररूपी सड़सियोंसे निकाल रहा है ॥ २३ (ङ) ॥

हँसि बोलेउ दसमौलि तब कपि कर बड़ गुन एक।

जो प्रतिपालइ तासु हित करइ उपाय अनेक ॥ २३ (च) ॥

तब रावण हँसकर बोला—बंदरमें यह एक बड़ा गुण है कि जो उसे पालता है, उसका वह अनेकों उपायोंसे भला करनेकी चेष्टा करता है ॥ २३ (च) ॥

धन्य कीस जो निज प्रभु काजा। जहाँ तहाँ नाचइ परिहरि लाजा ॥

नाचि कूदि करि लोग रिझाई। पति हित करइ धर्म निपुनाई ॥

बंदरको धन्य है, जो अपने मालिकके लिये लाज छोड़कर जहाँ-तहाँ नाचता है। नाच-कूदकर, लोगोंको रिझाकर, मालिकका हित करता है। यह उसके धर्मकी निपुणता है ॥ १ ॥

अंगद स्वामिभक्त तव जाती। प्रभु गुन कस न कहसि एहि भाँती ॥

मैं गुन गाहक परम सुजाना। तव कटु रटनि करउँ नहिं काना ॥

  • लङ्काकाण्ड *

७१५

हे अंगद! तेरी जाति स्वामिभक्त है। [फिर भला] तू अपने मालिकके गुण इस प्रकार कैसे न बखानेगा? मैं गुणग्राहक (गुणोंका आदर करनेवाला) और परम सुजान (समझदार) हूँ, इसीसे तेरी जली-कटी बक-बकपर कान (ध्यान) नहीं देता ॥ २ ॥

कह कपि तव गुन गाहकताई । सत्य पवनसुत मोहि सुनाई ॥ बन बिधंसि सुत बधि पुर जारा । तदपि न तेहिं कछु कृत अपकारा ॥

अंगदने कहा—तुम्हारी सच्ची गुणग्राहकता तो मुझे हनुमान्ने सुनायी थी। उसने अशोकवनको विध्वंस (तहस-नहस) करके, तुम्हारे पुत्रको मारकर नगरको जला दिया था। तो भी [तुमने अपनी गुणग्राहकताके कारण यही समझा कि] उसने तुम्हारा कुछ भी अपकार नहीं किया ॥ ३ ॥

सोड़ बिचारि तव प्रकृति सुहाई । दसकंधर मैं कीन्हि ढिठाई ॥ देखेउँ आइ जो कछु कपि भाषा । तुम्हरें लाज न रोष न मारखा ॥

तुम्हारा वही सुन्दर स्वभाव विचारकर, हे दशग्रीव! मैंने कुछ धृष्टता की है। हनुमान्ने जो कुछ कहा था, उसे आकर मैंने प्रत्यक्ष देख लिया कि तुम्हें न लज्जा है, न क्रोध है और न चिढ़ है ॥ ४ ॥

जौँ असि मति पितु खाए कीसा । कहि अस बचन हँसा दससीसा ॥ पितहि खाड़ खातेउँ पुनि तोही । अबहीं समुझि परा कछु मोही ॥

[रावण बोला—] अरे वानर! जब तेरी ऐसी बुद्धि है तभी तो तू बापको खा गया। ऐसा वचन कहकर रावण हँसा। अंगदने कहा—पिताको खाकर फिर तुमको भी खा डालता। परन्तु अभी तुरंत कुछ और ही बात मेरी समझमें आ गयी!! ॥ ५ ॥

बालि बिमल जस भाजन जानी । हतउँ न तोहि अधम अभिमानी ॥ कहु रावन रावन जग केते । मैं निज श्रवन सुने सुनु जेते ॥

अरे नीच अभिमानी! बालिके निर्मल यशका पात्र (कारण) जानकर तुम्हें मैं नहीं मारता। रावण! यह तो बता कि जगत्में कितने रावण हैं? मैंने जितने रावण अपने कानोंसे सुन रखे हैं, उन्हें सुन— ॥ ६ ॥

बलिहि जितन एक गयउ पताला । राखेउ बाँधि सिसुन्ह हयसाला ॥ खेलहिं बालक मारहिं जाई । दया लागि बलि दीन्ह छोड़ाई ॥

एक रावण तो बलिको जीतने पातालमें गया था, तब बच्चोंने उसे घुड़सालमें बाँध रखा। बालक खेलते थे और जा-जाकर उसे मारते थे। बलिको दया लगी, तब उन्होंने उसे छुड़ा दिया ॥ ७ ॥

एक बहोरि सहसभुज देखा । धाइ धरा जिमि जंतु बिसेषा ॥ कौतुक लागि भवन लै आवा । सो पुलस्ति मुनि जाइ छोड़ावा ॥

७१६

  • रामचरितमानस *

फिर एक रावणको सहस्रबाहुने देखा, और उसने दौड़कर उसको एक विशेष प्रकारके (विचित्र) जन्तुकी तरह [समझकर] पकड़ लिया। तमाशेके लिये वह उसे घर ले आया। तब पुलस्त्य मुनिने जाकर उसे छुड़ाया ॥ ८ ॥

दो०— एक कहत मोहि सकुच अति रहा बालि कीं काँख।

इन्ह महुँ रावन तैं कवन सत्य बदहि तजि माख ॥ २४ ॥

एक रावणकी बात कहनेमें तो मुझे बड़ा संकोच हो रहा है—वह [बहुत दिनोंतक] बालिकी काँखमें रहा था। इनमेंसे तुम कौन-से रावण हो? खीझना छोड़कर सच-सच बताओ ॥ २४ ॥

सुनु सठ सोड़ रावन बलसीला । हरगिरि जान जासु भुज लीला ॥ जान उमापति जासु सुराई । पूजेउँ जेहि सिर सुमन चढ़ाई ॥

[रावणने कहा—] अरे मूर्ख! सुन, मैं वही बलवान् रावण हूँ जिसकी भुजाओंकी लीला (करामात) कैलास पर्वत जानता है। जिसकी शूरता उमापति महादेवजी जानते हैं, जिन्हें अपने सिररूपी पुष्प चढ़ा-चढ़ाकर मैंने पूजा था ॥ १ ॥

सिर सरोज निज करन्हि उतारी । पूजेउँ अमित बार त्रिपुरारी ॥ भुज बिक्रम जानहिं दिगपाला । सठ अजहूँ जिन्ह केँ उर साला ॥

सिररूपी कमलोंको अपने हाथोंसे उतार-उतारकर मैंने अगणित बार त्रिपुरारि शिवजीकी पूजा की है। अरे मूर्ख! मेरी भुजाओंका पराक्रम दिग्पाल जानते हैं, जिनके हृदयमें वह आज भी चुभ रहा है ॥ २ ॥

जानहिं दिगज उर कठिनाई । जब जब भिरउँ जाड़ बरिआई ॥ जिन्ह केँ दसन कराल न फूटे । उर लागत मूलक इव टूटे ॥

दिगज (दिशाओंके हाथी) मेरी छातीकी कठोरताको जानते हैं। जिनके भयानक दाँत, जब-जब जाकर मैं उनसे जबरदस्ती भिड़ा, मेरी छातीमें कभी नहीं फूटे (अपना चिह्न भी नहीं बना सके), बल्कि मेरी छातीसे लगते ही वे मूलीकी तरह टूट गये ॥ ३ ॥

जासु चलत डोलति इमि धरनी । चढ़त मत्त गज जिमि लघु तरनी ॥ सोड़ रावन जग बिदित प्रतापी । सुनेहि न श्रवन अलीक प्रलापी ॥

जिसके चलते समय पृथ्वी इस प्रकार हिलती है जैसे मतवाले हाथीके चढ़ते समय छोटी नाव! मैं वही जगत्प्रसिद्ध प्रतापी रावण हूँ। अरे झूठी बकवाद करनेवाले! क्या तूने मुझको कानोंसे कभी नहीं सुना? ॥ ४ ॥

दो०— तेहि रावन कहँ लघु कहसि नर कर करसि बखान।

रे कपि बर्बर खर्ब खल अब जाना तव ग्यान ॥ २५ ॥

  • लङ्काकाण्ड *

७१७

उस (महान् प्रतापी और जगत्प्रसिद्ध) रावणको (मुझे) तू छोटा कहता है और मनुष्यकी बड़ाई करता है? अरे दुष्ट, असभ्य, तुच्छ बंदर! अब मैंने तेरा ज्ञान जान लिया ॥ २५ ॥

सुनि अंगद सकोप कह बानी । बोलु सँभारि अधम अभिमानी ॥ सहसबाहु भुज गहन अपारा । दहन अनल सम जासु कुठारा ॥

रावणके ये वचन सुनकर अंगद क्रोधसहित वचन बोले—अरे नीच अभिमानी! सँभालकर (सोच-समझकर) बोल। जिनका फरसा सहसबाहुकी भुजाओंरूपी अपार वनको जलानेके लिये अग्निके समान था, ॥ १ ॥

जासु परसु सागर खर धारा । बूड़े नृप अगनिनत बहु बारा ॥ तासु गर्ब जेहि देखत भागा । सो नर क्यों दससीस अभागा ॥

जिनके फरसारूपी समुद्रकी तीव्र धारामें अनगिनत राजा अनेकों बार डूब गये, उन परशुरामजीका गर्व जिन्हें देखते ही भाग गया, अरे अभागे दशशीश! वे मनुष्य क्योंकर हैं? ॥ २ ॥

राम मनुज कस रे सठ बंगा । धन्वी कामु नदी पुनि गंगा ॥ पसु सुरधेनु कल्पतरु रूखा । अन्न दान अरु रस पीयूषा ॥

क्यों रे मूर्ख उद्दण्ड! श्रीरामचन्द्रजी मनुष्य हैं? कामदेव भी क्या धनुर्धारी है? और गङ्गाजी क्या नदी है? कामधेनु क्या पशु है? और कल्पवृक्ष क्या पेड़ है? अन्न भी क्या दान है? और अमृत क्या रस है? ॥ ३ ॥

बैनतेय खग अहि सहसानन । चिंतामनि पुनि उपल दसानन ॥ सुनु मतिमंद लोक बैकुंठा । लाभ कि रघुपति भगति अकुंठा ॥

गरुड़जी क्या पक्षी हैं? शेषजी क्या सर्प हैं? अरे रावण! चिन्तामणि भी क्या पत्थर है? अरे ओ मूर्ख! सुनु, बैकुण्ठ भी क्या लोक है? और श्रीरघुनाथजीकी अखण्ड भक्ति क्या [और लाभों-जैसा ही] लाभ है? ॥ ४ ॥

दो०— सेन सहित तव मान मथि बन उजारि पुर जारि ।

कस रे सठ हनुमान कपि गयउ जो तव सुत मारि ॥ २६ ॥

सेनासमेत तेरा मान मथकर, अशोकवनको उजाड़कर, नगरको जलाकर और तेरे पुत्रको मारकर जो लौट गये [तू उनका कुछ भी न बिगाड़ सका], क्यों रे दुष्ट! वे हनुमानजी क्या वानर हैं? ॥ २६ ॥

सुनु रावन परिहरि चतुराई । भजसि न कृपासिंधु रघुराई ॥ जौं खल भएसि राम कर द्रोही । ब्रह्म रुद्र सक राखि न तोही ॥

७१८

  • रामचरितमानस *

अरे रावण! चतुराई (कपट) छोड़कर सुन। कृपाके समुद्र श्रीरघुनाथजीका तू भजन क्यों नहीं करता? अरे दुष्ट! यदि तू श्रीरामजीका वैरो हुआ तो तुझे ब्रह्मा और रुद्र भी नहीं बचा सकेंगे ॥ १ ॥

मूह बूथा जनि मारसि गाला। राम बयर अस होइहि हाला ॥ तव सिर निकर कपिन्ह के आगें। परिहहिं धरनि राम सर लागें ॥

हे मूह! व्यर्थ गाल न मार (डींग न हाँक)। श्रीरामजीसे वैर करनेपर तेरा ऐसा हाल होगा कि तेरे सिर-समूह श्रीरामजीके बाण लगते ही वानरोंके आगे पृथ्वीपर पड़ेंगे, ॥ २ ॥

ते तव सिर कंदुक सम नाना। खेलिहहिं भालु कीस चौगाना ॥ जबहिं समर कोपिहि रघुनायक। छुटिहहिं अति कराल बहु सायक ॥

और रीछ-वानर तेरे उन गेंदके समान अनेकों सिरोंसे चौगान खेलेंगे। जब श्रीरघुनाथजी युद्धमें कोप करेंगे और उनके अत्यन्त तीक्ष्ण बहुत-से बाण छूटेंगे, ॥ ३ ॥

तब कि चलिहि अस गाल तुम्हारा। अस बिचारि भजु राम उदारा ॥ सुनत बचन रावन परजरा। जरत महानल जनु घृत परा ॥

तब क्या तेरा ऐसा गाल चलेगा? ऐसा विचारकर उदार (कृपालु) श्रीरामजीको भज। अंगदके ये वचन सुनकर रावण बहुत अधिक जल उठा। मानो जलती हुई प्रचण्ड अग्निमें घी पड़ गया हो ॥ ४ ॥

दो०—कुंभकरण अस बंधु मम सुत प्रसिद्ध सक्रारि।

मोर पराक्रम नहीं सुनेहि जितेउँ चराचर झारि ॥ २७ ॥

[वह बोला—अरे मूर्ख!] कुम्भकर्ण-ऐसा मेरा भाई है, इन्द्रका शत्रु सुप्रसिद्ध मेघनाद मेरा पुत्र है! और मेरा पराक्रम तो तूने सुना ही नहीं कि मैंने सम्पूर्ण जड-चेतन जगत्को जीत लिया है! ॥ २७ ॥

सठ सारखामृग जोरि सहाई। बाँधा सिंधु इहइ प्रभुताई ॥ नाघहिं खग अनेक बारीसा। सूर न होहिं ते सुनु सब कीसा ॥

रे दुष्ट! वानरोंकी सहायता जोड़कर रामने समुद्र बाँध लिया; बस, यही उसकी प्रभुता है। समुद्रको तो अनेकों पक्षी भी लाँघ जाते हैं। पर इसीसे वे सभी शूरवीर नहीं हो जाते। अरे मूर्ख बंदर! सुन— ॥ १ ॥

मम भुज सागर बल जल पूरा। जहाँ बूड़े बहु सुर नर सूर ॥ बीस पयोधि अगाध अपारा। को अस बीर जो पाइहि पारा ॥

मेरी एक-एक भुजारूपी समुद्र बलरूपी जलसे पूर्ण है, जिसमें बहुत-से शूरवीर देवता और मनुष्य डूब चुके हैं। [बता,] कौन ऐसा शूरवीर है जो मेरे इन अथाह और अपार बीस समुद्रोंका पार पा जायगा? ॥ २ ॥

  • लङ्काकाण्ड *

७११

दिगपालन्ह मैं नीर भरावा । भूप सुजस खल मोहि सुनावा ॥ जौं पै समर सुभट तव नाथा । पुनि पुनि कहसि जासु गुन गाथा ॥

अरे दुष्ट! मैंने दिक्पालोंतकसे जल भरवाया और तू एक राजाका मुझे सुयश सुनाता है! यदि तेरा मालिक, जिसकी गुणगाथा तू बार-बार कह रहा है, संग्राममें लड़नेवाला योद्धा है— ॥ ३ ॥

तौ बसीठ पठवत केहि काजा । रिपु सन प्रीति करत नहिं लाजा ॥ हरगिरि मथन निरखु मम बाहू । पुनि सठ कपि निज प्रभुहि सराहू ॥

तो [फिर] वह दूत किसलिये भेजता है? शत्रुसे प्रीति (सन्धि) करते उसे लाज नहीं आती? [पहले] कैलासका मथन करनेवाली मेरी भुजाओंको देख। फिर अरे मूर्ख वानर! अपने मालिककी सराहना करना ॥ ४ ॥

दो०— सूर कवन रावन सरिस स्वकर काटि जेहिं सीस ।

हुने अनल अति हरष बहु बार साखि गौरीस ॥ २८ ॥

रावणके समान शूरवीर कौन है? जिसने अपने ही हाथोंसे सिर काट-काटकर अत्यन्त हर्षके साथ बहुत बार उन्हें अग्रिममें होम दिया! स्वयं गौरीपति शिवजी इस बातके साक्षी हैं ॥ २८ ॥

जरत बिलोकेउँ जबहिं कपाला । बिधि के लिखे अंक निज भाला ॥

नर कें कर आपन बध बाँची । हसेउँ जानि बिधि गिरा असाँची ॥

मस्तकोंके जलते समय जब मैंने अपने ललाटोंपर लिखे हुए विधाताके अक्षर देखे, तब मनुष्यके हाथसे अपनी मृत्यु होना बाँचकर, विधाताकी वाणी (लेखको) असत्य जानकर मैं हँसा ॥ १ ॥

सोउ मन समुझि त्रास नहिं मोरें । लिखा बिरंचि जरठ मति भोरें ॥

आन बीर बल सठ मम आगें । पुनि पुनि कहसि लाज पति त्यागें ॥

उस बातको समझकर (स्मरण करके) भी मेरे मनमें डर नहीं है। [क्योंकि मैं समझता हूँ कि] बूढ़े ब्रह्मणे बुद्धिभ्रमसे ऐसा लिख दिया है। अरे मूर्ख! तू लज्जा और मर्यादा छोड़कर मेरे आगे बार-बार दूसरे वीरका बल कहता है!! ॥ २ ॥

कह अंगद सलज्ज जग माहीं । रावन तोहि समान कोउ नाहीं ॥

लाजवंत तव सहज सुभाऊ । निज मुख निज गुन कहसि न काऊ ॥

अंगदने कहा—अरे रावण! तेरे समान लज्जावान् जगत्में कोई नहीं है। लज्जाशीलता तो तेरा सहज स्वभाव ही है। तू अपने मुँहसे अपने गुण कभी नहीं कहता ॥ ३ ॥

सिर अरु सैल कथा चित रही । ताते बार बीस तैं कही ॥

सो भुजबल राखेहु उर घाली । जीतेहु सहसबाहु बलि बाली ॥

८००

  • रामचरितमानस *

सिर काटने और कैलास उठानेकी कथा चित्तमें चढ़ी हुई थी, इससे तूने उसे बीसों बार कहा। भुजाओंके उस बलको तो तूने हृदयमें ही टाल (छिपा) रखा है, जिससे तूने सहस्रबाहु, बलि और बालिको जीता था ॥ ४ ॥

सुनु मतिमंद देहि अब पूरा। काटें सीस कि होइअ सूर। इंद्रजालि कहूं कहिअ न बीरा। काटइ निज कर सकल सरीरा ॥

अरे मन्दबुद्धि! सुन, अब बस कर। सिर काटनेसे भी क्या कोई शूरवीर हो जाता है? इंद्रजाल रचनेवालेको वीर नहीं कहा जाता, यद्यपि वह अपने ही हाथों अपना सारा शरीर काट डालता है! ॥ ५ ॥

दो०—जरहिं पतंग मोह बस भार बहहिं खर बृंद।

ते नहिं सूर कहावहिं समुझि देखु मतिमंद ॥ २९ ॥

अरे मन्दबुद्धि! समझकर देख। पतंगे मोहवश आगमें जल मरते हैं, गदहोंके झुंड बोझ लादकर चलते हैं; पर इस कारण वे शूरवीर नहीं कहलाते ॥ २९ ॥

अब जनि बतबढ़ाव खल करही। सुनु मम बचन मान परिहरही ॥

दसमुख मैं न बसीठीं आयउँ। अस बिचारि रघुबीर पठायउँ ॥

अरे दुष्ट! अब बतबढ़ाव मत कर; मेरा वचन सुन और अभिमान त्याग दे! हे दशमुख! मैं दूतकी तरह [सन्धि करने] नहीं आया हूँ। श्रीरघुवीरने ऐसा विचारकर मुझे भेजा है— ॥ १ ॥

बार बार अस कहइ कृपाला। नहिं गजारि जसु बधें सूकाला ॥

मन महुं समुझि बचन प्रभु केरे। सहेउँ कठोर बचन सठ तेरे ॥

कृपालु श्रीरामजी बार-बार ऐसा कहते हैं कि स्यारके मारनेसे सिंहको यश नहीं मिलता। अरे मूर्ख! प्रभुके [उन] वचनोंको मनमें समझकर (याद करके) ही मैंने तेरे कठोर वचन सहे हैं ॥ २ ॥

नाहिं त करि मुख भंजन तोरा। लै जातेउँ सीतहि बरजोरा ॥

जानेउँ तव बल अधम सुरारी। सूनें हरि आनिहि परनारी ॥

नहीं तो तेरे मुँह तोड़कर मैं सीताजीको जबरदस्ती ले जाता। अरे अधम! देवताओंके शत्रु! तेरा बल तो मैंने तभी जान लिया जब तू सूनेमें परायी स्त्रीको हर (चुरा) लाया ॥ ३ ॥

तैं निसिचरपति गर्ब बहूता। मैं रघुपति सेवक कर दूता ॥

जौं न राम अपमानहि डरऊँ। तोहि देखत अस कौतुक करऊँ ॥

तू राक्षसोंका राजा और बड़ा अभिमानी है। परन्तु मैं तो श्रीरघुनाथजीके सेवक (सुग्रीव) का दूत (सेवकका भी सेवक) हूँ। यदि मैं श्रीरामजीके अपमानसे न डरूँ तो तेरे देखते-देखते ऐसा तमाशा करूँ कि— ॥ ४ ॥

  • लङ्काकाण्ड *

८०१

दो०—तोहि पटक महि सेन हति चौपट करि तव गाउँ। तव जुबतिन्ह समेत सठ जनकसुतहि लै जाऊँ॥ ३० ॥

तुझे जमीनपर पटककर, तेरी सेनाका संहारकर और तेरे गाँवको चौपट [नष्ट-भ्रष्ट] करके, अरे मूर्ख! तेरी युवती स्त्रियोंसहित जानकीजीको ले जाऊँ॥ ३० ॥

जौँ अस करौँ तदपि न बड़ाई। मुएहि बधें नहिं कछु मनुसाई॥ कौल कामबस कृपिन बिमूढ़ा। अति दरिद्र अजसी अति बूढ़ा॥

यदि ऐसा करूँ, तो भी इसमें कोई बढ़ाई नहीं है। मेरे हुएको मारनेमें कुछ भी पुरुषत्व (बहादुरी) नहीं है। वाममागी, कामी, कंजूस, अत्यन्त मूढ़, अति दरिद्र, बदनाम, बहुत बूढ़ा, ॥ १ ॥

सदा रोगबस संतत क्रोधी। बिष्णु बिमुख श्रुति संत विरोधी॥ तनु पोषक निंदक अघ खानी। जीवत सब सम चौदह प्रानी॥

नित्यका रोगी, निरन्तर क्रोधयुक्त रहनेवाला, भगवान् विष्णुसे विमुख, वेद और संतोंका विरोधी, अपना ही शरीर पोषण करनेवाला, परायी निन्दा करनेवाला और पापकी खान (महान् पापी)—ये चौदह प्राणी जीते ही मुरदेके समान हैं॥ २ ॥

अस बिचारि खल बधउँ न तोही। अब जनि रिस उपजावसि मोही॥ सुनि सकोप कह निसिचर नाथा। अधर दसन दसि मीजत हाथा॥

अरे दुष्ट! ऐसा विचारकर मैं तुझे नहीं मारता। अब तू मुझमें क्रोध न पैदा कर (मुझे गुस्सा न दिला)। अङ्गदके वचन सुनकर राक्षसराज रावण दाँतोंसे होठ काटकर, क्रोधित होकर हाथ मलता हुआ बोला— ॥ ३ ॥

रे कपि अधम मरन अब चहसी। छोटे बदन बात बड़ि कहसी॥ कटु जल्पसि जड़ कपि बल जाकें। बल प्रताप बुधि तेज न ताकें॥

अरे नीच बंदर! अब तू मरना ही चाहता है! इसीसे छोटे मुँह बड़ी बात कहता है। अरे मूर्ख बंदर! तू जिसके बलपर कड़ुए वचन बक रहा है, उसमें बल, प्रताप, बुद्धि अथवा तेज कुछ भी नहीं है ॥ ४ ॥

दो०—अगुन अमान जानि तेहि दीन्ह पिता बनबास।

सो दुख अरु जुबती बिरह पुनि निसि दिन मम त्रास ॥ ३१ ( क ) ॥

उसे गुणहीन और मानहीन समझकर ही तो पिताने वनवास दे दिया। उसे एक तो वह (उसका) दुःख, उसपर युवती स्त्रीका विरह और फिर रात-दिन मेरा डर बना रहता है ॥ ३१ ( क ) ॥

जिन्ह के बल कर गर्ब तोहि अइसे मनुज अनेक।

खाहिं निसाचर दिवस निसि मूढ़ समुझु तजि टेक ॥ ३१ ( ख ) ॥

८०२

  • रामचरितमानस *

जिनके बलका तुझे गर्व है, ऐसे अनेकों मनुष्योंको तो राक्षस रात-दिन खाया करते हैं। अरे मूह! जिद छोड़कर समझ (विचार कर) ॥ ३१ (ख) ॥

जब तेहिं कीन्हि राम कै निंदा । क्रोधवंत अति भयउ कर्पिंदा ॥ हरि हर निंदा सुनइ जो काना । होइ पाप गोघात समाना ॥

जब उसने श्रीरामजीकी निन्दा की, तब तो कपिश्रेष्ठ अंगद अत्यन्त क्रोधित हुए। क्योंकि [शास्त्र ऐसा कहते हैं कि] जो अपने कानोंसे भगवान् विष्णु और शिवकी निन्दा सुनता है, उसे गोवधके समान पाप होता है ॥ १ ॥

कटकटान कपिकुंजर भारी । दुहु भुजदंड तमकि महि मारी ॥ डोलत धरनि सभासद खसे । चले भाजि भय मारुत ग्रसे ॥

वानरश्रेष्ठ अंगद बहुत जोरसे कटकटाये (शब्द किया) और उन्होंने तमककर (जोरसे) अपने दोनों भुजदण्डोंको पृथ्वीपर दे मारा। पृथ्वी हिलने लगी, [जिससे बैठे हुए] सभासद् गिर पड़े और भयरूपी पवन (भूत) से ग्रस्त होकर भाग चले ॥ २ ॥

गिरत सँभारि उठा दसकंधर । भूतल परे मुकुट अति सुंदर ॥ कछु तेहिं लै निज सिरन्हि सँवारे । कछु अंगद प्रभु पास पबारे ॥

रावण गिरते-गिरते सँभलकर उठा। उसके अत्यन्त सुन्दर मुकुट पृथ्वीपर गिर पड़े। कुछ तो उसने उठाकर अपने सिरोंपर सुधारकर रख लिया और कुछ अंगदने उठाकर प्रभु श्रीरामचन्द्रजीके पास फेंक दिये ॥ ३ ॥

आवत मुकुट देखि कपि भागे । दिनहीं लूक परन बिधि लागे ॥ की रावन करि कोप चलाए । कुलिस चारि आवत अति धाए ॥

मुकुटोंको आते देखकर वानर भागे। [सोचने लगे] विधाता! क्या दिनमें ही उल्कापात होने लगा (तारे टूटकर गिरने लगे)? अथवा क्या रावणने क्रोध करके चार वज्र चलाये हैं, जो बड़े धायेके साथ (वेगसे) आ रहे हैं? ॥ ४ ॥

कह प्रभु हँसि जनि हृदयें डेराहू । लूक न असनि केतु नहिं राहू ॥ ए किरीट दसकंधर केरे । आवत बालितनय के प्रेरे ॥

प्रभुने [उनसे] हँसकर कहा—मनमें डरो नहीं। ये न उल्का हैं, न वज्र हैं और न केतु या राहु ही हैं। अरे भाई! ये तो रावणके मुकुट हैं; जो बालिपुत्र अंगदके फेंके हुए आ रहे हैं ॥ ५ ॥

दो०— तरकि पवनसुत कर गहे आनि धरे प्रभु पास ।

कौतुक देखहिं भालु कपि दिनकर सरिस प्रकास ॥ ३२ ( क ) ॥

  • लङ्काकाण्ड *

८०३

पवनपुत्र श्रीहनुमान्जीने उछलकर उनको हाथसे पकड़ लिया और लाकर प्रभुके पास रख दिया। रीछ और वानर तमाशा देखने लगे। उनका प्रकाश सूर्यके समान था ॥ ३२ (क) ॥

उहाँ सकोपि दसानन सब सन कहत रिसाइ।

धरहु कपिहि धरि मारहु सुनि अंगद मुसुकाइ ॥ ३२ (ख) ॥

वहाँ (सभामें) क्रोधयुक्त रावण सबसे क्रोधित होकर कहने लगा कि—बंदरको पकड़ लो और पकड़कर मार डालो। अंगद यह सुनकर मुसकराने लगे ॥ ३२ (ख) ॥

एहि बधि बेगि सुभट सब धावहु । खाहु भालु कपि जहाँ जहाँ पावहु ॥

मर्कटहीन करहु महि जाई । जिअत धरहु तापस द्वौ भाई ॥

[रावण फिर बोला—] इसे मारकर सब योद्धा तुरंत दौड़ो और जहाँ-कहीं रीछ-वानरोंको पाओ, वहीं खा डालो। पृथ्वीको बंदरोंसे रहित कर दो और जाकर दोनों तपस्वी भाइयों (राम-लक्ष्मण) को जीते-जी पकड़ लो ॥ १ ॥

पुनि सकोप बोलेउ जुबराजा । गाल बजावत तोहि न लाजा ॥

मरु गर काटि निलज कुलधाती । बल बिलोकि बिहरति नहिं छाती ॥

[रावणके ये कोपभरे वचन सुनकर] तब युवराज अंगद क्रोधित होकर बोले—तुझे गाल बजाते लाज नहीं आती! अरे निर्लज! अरे कुलनाशक! गला काटकर (आत्महत्या करके) मर जा! मेरा बल देखकर भी क्या तेरी छाती नहीं फटती! ॥ २ ॥

रे त्रिय चोर कुमारग गामी । खल मल रासि मंदमति कामी ॥

सन्यपात जल्पसि दुर्बादा । भएसि कालबस खल मनुजादा ॥

अरे स्त्रीके चोर! अरे कुमारगपर चलनेवाले! अरे दुष्ट, पापकी राशि, मन्दबुद्धि और कामी! तू सन्निपातमें क्या दुर्वचन बक रहा है? अरे दुष्ट राक्षस! तू कालके वश हो गया है! ॥ ३ ॥

याको फलु पावहिगो आगें । बानर भालु चपेटन्हि लागें ॥

रामु मनुज बोलत असि बानी । गिरहिं न तव रसना अभिमानी ॥

इसका फल तू आगे वानर और भालुओंके चपेटे लगनेपर पावेगा। राम मनुष्य हैं, ऐसा वचन बोलते ही, अरे अभिमानी! तेरी जीभें नहीं गिर पड़ती? ॥ ४ ॥

गिरिहिं रसना संसय नाही । सिरन्हि समेत समर महि माहीं ॥

इसमें सन्देह नहीं है कि तेरी जीभें [अकेले नहीं वरं] सिरोंके साथ रणभूमिमें गिरेगी ॥ ५ ॥

सो०—सो नर क्यों दसकंध बालि बध्यो जेहिं एक सर।

बीसहुं लोचन अंध धिग तव जन्म कुजाति जड़ ॥ ३३ (क) ॥

८०४

  • रामचरितमानस *

रे दशकन्ध! जिसने एक ही बाणसे बालिको मार डाला, वह मनुष्य कैसे है? अरे कुजाति, अरे जड़! बीस आँखें होनेपर भी तू अन्धा है। तेरे जन्मको धिक्कार है ॥ ३३ (क) ॥

तव सोनित कौँ प्यास तृषित राम सायक निकर।

तजउँ तोहि तेहि त्रास कटु जल्पक निसिचर अधम ॥ ३३ (ख) ॥

श्रीरामचन्द्रजीके बाणसमूह तेरे रक्तकी प्याससे प्यासे हैं। [वे प्यासे ही रह जायँगे] इस डरसे, अरे कड़वी बकवाद करनेवाले नीच राक्षस! मैं तुझे छोड़ता हूँ ॥ ३३ (ख) ॥

मैं तव दसन तोरिबे लायक। आयसु मोहि न दीन्ह रघुनायक ॥

असि रिस होति दसउ मुख तोरौं। लंका गहि समुद्र महँ बोरौं ॥

मैं तेरे दाँत तोड़नेमें समर्थ हूँ। पर क्या करूँ? श्रीरघुनाथजीने मुझे आज्ञा नहीं दी। ऐसा क्रोध आता है कि तेरे दसों मुँह तोड़ डालूँ और [तेरी] लङ्काको पकड़कर समुद्रमें डुबा दूँ ॥ १ ॥

गूलरि फल समान तव लंका। बसहु मध्य तुम्ह जंतु असंका ॥

मैं बानर फल खात न बारा। आयसु दीन्ह न राम उदारा ॥

तेरी लङ्का गूलरके फलके समान है। तुम सब कीड़े उसके भीतर [अज्ञानवश] निडर होकर बस रहे हो। मैं बंदर हूँ, मुझे इस फलको खाते क्या देर थी? पर उदार (कृपालु) श्रीरामचन्द्रजीने वैसी आज्ञा नहीं दी ॥ २ ॥

जुगुति सुनत रावन मुसुकाई। मूढ़ सिखिहि कहँ बहुत झुठाई ॥

बालि न कबहुँ गाल अस मारा। मिलि तपसिन्ह तैं भएसि लबारा ॥

अंगदकी युक्ति सुनकर रावण मुसकराया [और बोला—] अरे मूर्ख! बहुत झूठ बोलना तूने कहाँ सीखा? बालिने तो कभी ऐसा गाल नहीं मारा। जान पड़ता है तू तपस्वियोंसे मिलकर लबार हो गया है ॥ ३ ॥

साँचेहुँ मैं लबार भुज बीहा। जौँ न उपारिउँ तव दस जीहा ॥

समुझि राम प्रताप कपि कोपा। सभा माझ पन करि पद रोपा ॥

[अंगदने कहा—] अरे बीस भुजावाले! यदि तेरी दसों जीभें मैंने नहीं उखाड़ लीं तो सचमुच मैं लबार ही हूँ। श्रीरामचन्द्रजीके प्रतापको समझकर (स्मरण करके) अंगद क्रोधित हो उठे और उन्होंने रावणकी सभामें प्रण करके (दृढ़ताके साथ) पैर रोप दिया ॥ ४ ॥

जौँ मम चरन सकसि सठ टारी। फिरहिं रामु सीता मैं हारी ॥

सुनहु सुभट सब कह दससीसा। पद गहि धरनि पछारहु कीसा ॥

  • लङ्काकाण्ड *

८०५

[और कहा—] अरे मूर्ख! यदि तू मेरा चरण हटा सके तो श्रीरामजी लौट जायेंगे, मैं सीताजीको हार गया। रावणने कहा—हे सब वीरो! सुनो, पैर पकड़कर बंदरको पृथ्वीपर पछाड़ दो ॥५॥

इंद्रजीत आदिक बलवाना । हरषि उठे जहाँ तहाँ भट नाना ॥ झपटहिं करि बल बिपुल उपाई । पद न टरइ बैठहिं सिरु नाई ॥

इन्द्रजीत (मेघनाद) आदि अनेकों बलवान् योद्धा जहाँ-तहाँसे हर्षित होकर उठे। वे पूरे बलसे बहुत-से उपाय करके झपटते हैं। पर पैर टलता नहीं, तब सिर नीचा करके फिर अपने-अपने स्थानपर जा बैठ जाते हैं ॥६॥

पुनि उठि झपटहिं सुर आराती । टरइ न कीस चरन एहि भाँती ॥ पुरुष कुजोगी जिमि उरगारी । मोह बिटप नहिं सकहिं उपारी ॥

[काकभुशुण्डिजी कहते हैं—] वे देवताओंके शत्रु (राक्षस) फिर उठकर झपटते हैं। परन्तु हे सर्पोंके शत्रु गरुड़जी! अङ्गदका चरण उनसे वैसे ही नहीं टलता जैसे कुजोगी (विषयी) पुरुष मोहरूपी वृक्षको नहीं उखाड़ सकते ॥७॥

दो०—कोटिन्ह मेघनाद सम सुभट उठे हरषाइ।

झपटहिं टैर न कपि चरन पुनि बैठहिं सिर नाइ ॥ ३४ ( क ) ॥

करोड़ों वीर योद्धा जो बलमें मेघनादके समान थे, हर्षित होकर उठे। वे बार-बार झपटते हैं, पर वानरका चरण नहीं उठता, तब लज्जाके मारे सिर नवाकर बैठ जाते हैं ॥३४ (क)॥

भूमि न छोड़ित कपि चरन देखत रिपु मद भाग ।

कोटि बिघ्न ते संत कर मन जिमि नीति न त्याग ॥ ३४ ( ख ) ॥

जैसे करोड़ों विघ्न आनेपर भी संतका मन नीतिको नहीं छोड़ता, वैसे ही वानर (अंगद)-का चरण पृथ्वीको नहीं छोड़ता। यह देखकर शत्रु (रावण)-का मद दूर हो गया! ॥३४ (ख)॥

कपि बल देखि सकल हियँ हारे । उठा आपु कपि कें परचारे ॥ गहत चरन कह बालिकुमारा । मम पद गहें न तोर उबारा ॥

अङ्गदका बल देखकर सब हृदयमें हार गये। तब अङ्गदके ललकारनेपर रावण स्वयं उठा। जब वह अङ्गदका चरण पकड़ने लगा, तब बालिकुमार अङ्गदने कहा—मेरा चरण पकड़नेसे तेरा बचाव नहीं होगा! ॥१॥

गहसि न राम चरन सठ जाई । सुनत फिरा मन अति सकुचाई ॥ भयउ तेजहत श्री सब गई । मध्य दिवस जिमि ससि सोहई ॥

८०६

  • रामचरितमानस *

अरे मूर्ख! तू जाकर श्रीरामजीके चरण क्यों नहीं पकड़ता? यह सुनकर वह मनमें बहुत ही सकुचाकर लौट गया। उसकी सारी श्री जाती रही। वह ऐसा तेजहीन हो गया जैसे मध्याह्नमें चन्द्रमा दिखायी देता है ॥ २ ॥

सिंघासन बैठेउ सिर नाई। मानहुँ संपति सकल गँवाई॥ जगदातमा प्रानपति रामा। तासु बिमुख किमि लह बिश्रामा॥

वह सिर नीचा करके सिंहासनपर जा बैठा। मानो सारी सम्पति गँवाकर बैठा हो। श्रीरामचन्द्रजी जगत्भरके आत्मा और प्राणोंके स्वामी हैं। उनसे विमुख रहनेवाला शान्ति कैसे पा सकता है? ॥ ३ ॥

उमा राम की भूकुटि बिलासा। होड़ बिस्व पुनि पावड़ नासा॥ तून ते कुलिस कुलिस तून करई। तासु दूत पन कहु किमि टरई॥

[शिवजी कहते हैं—] हे उमा! जिन श्रीरामचन्द्रजीके भूविलास (भौंहके इशारे) से विश्व उत्पन्न होता है और फिर नाशको प्राप्त होता है; जो तृणको वज्र और वज्रको तृण बना देते हैं (अत्यन्त निर्बलको महान् प्रबल और महान् प्रबलको अत्यन्त निर्बल कर देते हैं), उनके दूतका प्रण, कहो, कैसे टल सकता है? ॥ ४ ॥

पुनि कपि कही नीति बिधि नाना। मान न ताहि कालु निअराना॥ रिपु मद मधि प्रभु सुजसु सुनायो। यह कहि चल्यो बालि नृप जायो॥

फिर अंगदने अनेकों प्रकारसे नीति कही। पर रावणने नहीं माना; क्योंकि उसका काल निकट आ गया था। शत्रुके गर्वको चूर करके अंगदने उसको प्रभु श्रीरामचन्द्रजीका सुयश सुनाया और फिर वह राजा बालिका पुत्र यह कहकर चल दिया— ॥ ५ ॥

हतौं न खेत खेलाइ खेलाई। तोहि अबहिं का करौं बड़ाई॥ प्रथमहिं तासु तनय कपि मारा। सो सुनि रावन भयउ दुखारा॥

रणभूमिमें तुझे खेला-खेलाकर न मारूँ तबतक अभी [पहलेसे] क्या बड़ाई करूँ। अंगदने पहले ही (सभामें आनेसे पूर्व ही) उसके पुत्रको मार डाला था। वह संवाद सुनकर रावण दुखी हो गया ॥ ६ ॥

जातुधान अंगद पन देखी। भय व्याकुल सब भए बिसेषी॥

अंगदका प्रण [सफल] देखकर सब राक्षस भयसे अत्यन्त ही व्याकुल हो गये ॥ ७ ॥

दो०—रिपु बल धरषि हरषि कपि बालितनय बल पुंज।

पुलक सरीर नयन जल गहे राम पद कंज॥ ३५ (क)॥

शत्रुके बलका मर्दन कर, बलकी राशि बालिपुत्र अंगदजीने हर्षित होकर आकर श्रीरामचन्द्रजीके चरणकमल पकड़ लिये। उनका शरीर पुलकित है और नेत्रोंमें [आनन्दाश्रुओंका] जल भरा है ॥ ३५ (क) ॥

  • लङ्काकाण्ड *

८०७

साँझ जानि दसकंधर भवन गयउ बिलखाइ।

मन्दोदरीं रावनहि बहुरि कहा समुझाइ ॥ ३५ (ख) ॥

सन्ध्या हो गयी जानकर दशग्रीव विलखता हुआ (उदास होकर) महलमें गया। मन्दोदरीने रावणको समझाकर फिर कहा— ॥ ३५ (ख) ॥

कंत समुझि मन तजहु कुमतिही। सोह न समर तुम्हि रिघुपतिही ॥ रामानुज लघु रेख खचाई। सोउ नहिं नाधेहु असि मनुसाई ॥

हे कान्त! मनमें समझकर (विचारकर) कुबुद्धिको छोड़ दो। आपसे और श्रीरघुनाथजीसे युद्ध शोभा नहीं देता। उनके छोटे भाईने एक जरा-सी रेखा खींच दी थी, उसे भी आप नहीं लाँघ सके, ऐसा तो आपका पुरुषत्व है ॥ १ ॥

पिय तुम्ह ताहि जितब संग्रामा। जाके दूत केर यह कामा ॥ कौतुक सिंधु नाधि तव लंका। आयउ कपि केहरी असंका ॥

हे प्रियतम! आप उन्हें संग्राममें जीत पायेंगे, जिनके दूतका ऐसा काम है? खेलसे ही समुद्र लाँघकर वह वानरोंमें सिंह (हनुमान्) आपकी लंकामें निर्भय चला आया! ॥ २ ॥

रखवारे हति बिपिन उजारा। देखत तोहि अच्छ तेहिं मारा ॥ जारि सकल पुर कीन्हैसि छारा। कहाँ रहा बल गर्ब तुम्हारा ॥

रखवालोंको मारकर उसने अशोकवन उजाड़ डाला। आपके देखते-देखते उसने अक्षयकुमारको मार डाला और सम्पूर्ण नगरको जलाकर राख कर दिया। उस समय आपके बलका गर्व कहाँ चला गया था? ॥ ३ ॥

अब पति मूषा गाल जनि मारहु। मोर कहा कछु हृदयँ बिचारहु ॥ पति रघुपतिहि नृपति जनि मानहु। अग जग नाथ अतुलबल जानहु ॥

अब हे स्वामी! झूठ (व्यर्थ) गाल न मारिये (डींग न हॉकिये) मेरे कहनेपर हृदयमें कुछ विचार कीजिये। हे पति! आप श्रीरघुपतिको [निरा] राजा मत समझिये, बल्कि अग-जगनाथ (चराचरके स्वामी) और अतुलनीय बलवान् जानिये ॥ ४ ॥

बान प्रताप जान मारीचा। तासु कहा नहिं मानेहि नीचा ॥ जनक सभाँ अगनि त भूपाला। रहे तुम्हुउ बल अतुल बिसाला ॥

श्रीरामजीके बाणका प्रताप तो नीच मारीच भी जानता था। परन्तु आपने उसका कहना भी नहीं माना। जनककी सभामें अगनि राजागण थे। वहाँ विशाल और अतुलनीय बलवाले आप भी थे ॥ ५ ॥

८०८

  • रामचरितमानस *

भंजि धनुष जानकी बिआही । तब संग्राम जितेहु किन ताही ॥ सुरपति सुत जानड़ बल थोरा । राखा जिअत आँखि गहि फोरा ॥

वहाँ शिवजीका धनुष तोड़कर श्रीरामजीने जानकीको ब्याहा, तब आपने उनको संग्राममें क्यों नहीं जीता ? इन्द्रपुत्र जयन्त उनके बलको कुछ-कुछ जानता है । श्रीरामजीने पकड़कर, केवल उसकी एक आँख ही फोड़ दी और उसे जीवित ही छोड़ दिया ॥ ६ ॥

सूपनखा कै गति तुम्ह देखी । तदपि हृदयँ नहिं लाज बिसेषी ॥

शूर्पणखाकी दशा तो आपने देख ही ली । तो भी आपके हृदयमें [उनसे लड़नेकी बात सोचते] विशेष (कुछ भी) लज्जा नहीं आती ! ॥ ७ ॥

दो०— बधि विराध खर दूषनहि लीलाँ हत्यो कबंध ।

बालि एक सर मार्यो तेहि जानहु दसकंध ॥ ३६ ॥

जिन्होंने विराध और खर-दूषणको मारकर लीलासे ही कबन्धको भी मार डाला; और जिन्होंने बालिको एक ही बाणसे मार दिया, हे दशकन्ध ! आप उन्हें (उनके महत्त्वको) समझिये ! ॥ ३६ ॥

जेहिं जलनाथ बँधायउ हेला । उतरे प्रभु दल सहित सुबेला ॥

कारुनीक दिनकर कुल केतू । दूत पठायउ तव हित हेतू ॥

जिन्होंने खेलसे ही समुद्रको बँधा लिया और जो प्रभु सेनासहित सुबेल पर्वतपर उतर पड़े, उन सूर्यकुलके ध्वजास्वरूप (कीर्तिको बढ़ानेवाले) करुणामय भगवान्ने आपहीके हितके लिये दूत भेजा ॥ १ ॥

सभा माझ जेहिं तव बल मथा । करि बरुथ महुँ मृगपति जथा ॥

अंगद हनुमत अनुचर जाके । रन बाँकुरे बीर अति बाँके ॥

जिसने बीच सभामें आकर आपके बलको उसी प्रकार मथ डाला जैसे हाथियोंके झुंडमें आकर सिंह [उसे छिन्न-भिन्न कर डालता है] । रणमें बाँके अत्यन्त विकट वीर अंगद और हनुमान् जिनके सेवक हैं, ॥ २ ॥

तेहि कहँ पिय पुनि पुनि नर कहहू । मुधा मान ममता मद बहहू ॥

अहह कंत कृत राम विरोधा । काल बिबस मन उपज न बोधा ॥

हे पति ! उन्हें आप बार-बार मनुष्य कहते हैं । आप व्यर्थ ही मान, ममता और मदका बोझा ढो रहे हैं ! हा प्रियतम ! आपने श्रीरामजीसे विरोध कर लिया और कालके विशेष वश होनेसे आपके मनमें अब भी ज्ञान नहीं उत्पन्न होता ॥ ३ ॥

काल दंड गहि काहु न मारा । हरइ धर्म बल बुद्धि बिचारा ॥

निकट काल जेहि आवत साई । तेहि भ्रम होइ तुम्हारिहि नाई ॥

  • लङ्काकाण्ड *

८०९

काल दण्ड (लाठी) लेकर किसीको नहीं मारता। वह धर्म, बल, बुद्धि और विचारको हर लेता है। हे स्वामी! जिसका काल (मरण-समय) निकट आ जाता है, उसे आपहीकी तरह भ्रम हो जाता है ॥ ४ ॥

दो०—दुइ सुत मरे देहेउ पुर अजहूँ पूर पिय देहु।

कृपासिंधु रघुनाथ भजि नाथ बिमल जसु लेहु ॥ ३७ ॥

आपके दो पुत्र मारे गये और नगर जल गया। [जो हुआ सो हुआ] हे प्रियतम! अब भी [इस भूलकी] पूर्ति (समाप्ति) कर दीजिये (श्रीरामजीसे वैर त्याग दीजिये), और हे नाथ! कृपाके समुद्र श्रीरघुनाथजीको भजकर निर्मल यश लीजिये ॥ ३७ ॥

नारि बचन सुनि बिसिख समाना । सभाँ गयउ उठि होत बिहाना ॥

बैठ जाइ सिंधासन फूली । अति अभिमान त्रास सब भूली ॥

स्त्रीके बाणके समान वचन सुनकर वह सबेरा होते ही उठकर सभामें चला गया और सारा भय भुलाकर अत्यन्त अभिमानमें फूलकर सिंहासनपर जा बैठा ॥ १ ॥

इहाँ राम अंगदहि बोलावा । आइ चरन पंकज सिरु नावा ॥

अति आदर समीप बैठारी । बोले बिहँसि कृपाल खरारी ॥

यहाँ (सुबेल पर्वतपर) श्रीरामजीने अंगदको बुलाया। उन्होंने आकर चरण-कमलोंमें सिर नवाया। बड़े आदरसे उन्हें पास बैठाकर खरके शत्रु कृपालु श्रीरामजी हँसकर बोले ॥ २ ॥

बालितनय कौतुक अति मोही । तात सत्य कहु पूछउँ तोही ॥

रावनु जातुधान कुल टीका । भुज बल अतुल जासु जग लीका ॥

हे बालिके पुत्र! मुझे बड़ा कौतूहल है। हे तात! इसीसे मैं तुमसे पूछता हूँ, सत्य कहना। जो रावण राक्षसोंके कुलका तिलक है और जिसके अतुलनीय बाहुबलकी जगत्भरमें धाक है, ॥ ३ ॥

तासु मुकुट तुम्ह चारि चलाए । कहहु तात कवनी बिधि पाए ॥

सुनु सर्बंगय प्रनत सुखकारी । मुकुट न होहिं भूप गुन चारी ॥

उसके चार मुकुट तुमने फेंके। हे तात! बताओ, तुमने उनको किस प्रकारसे पाया! [अंगदने कहा] हे सर्वज्ञ! हे शरणागतको सुख देनेवाले! सुनिये। वे मुकुट नहीं हैं। वे तो राजाके चार गुण हैं ॥ ४ ॥

साम दान अरु दंड बिभेदा । नृप उर बसहिं नाथ कह बेदा ॥

नीति धर्म के चरन सुहाए । अस जियँ जानि नाथ पहिं आए ॥

हे नाथ! वेद कहते हैं कि साम, दान, दण्ड और भेद—ये चारों राजाके हृदयमें बसते हैं। ये नीति-धर्मके चार सुन्दर चरण हैं। [किन्तु रावणमें धर्मका अभाव है] ऐसा जीमें जानकर ये नाथके पास आ गये हैं ॥ ५ ॥

८१०

  • रामचरितमानस *

दो०—धर्महीन प्रभु पद बिमुख काल बिबस दससीस।

तेहि परिहरि गुन आए सुनहु कोसलाधीस ॥ ३८ ( क ) ॥

दशशीश रावण धर्महीन, प्रभुके पदसे विमुख और कालके वशमें है। इसलिये हे कोसलराज! सुनिये, वे गुण रावणको छोड़कर आपके पास आ गये हैं ॥ ३८ ( क ) ॥

परम चतुरता श्रवन सुनि बिहँसे रामु उदार।

समाचार पुनि सब कहे गढ़ के बालिकुमार ॥ ३८ ( ख ) ॥

अंगदकी परम चतुरता [पूर्ण उक्ति] कानोंसे सुनकर उदार श्रीरामचन्द्रजी हँसने लगे। फिर बालिपुत्रने किलेके (लङ्काके) सब समाचार कहे ॥ ३८ (ख) ॥

रिपु के समाचार जब पाए। राम सचिव सब निकट बोलाए ॥

लंका बाँके चारि दुआरा। केहि बिधि लागिअ करहु बिचारा ॥

जब शत्रुके समाचार प्राप्त हो गये, तब श्रीरामचन्द्रजीने सब मन्त्रियोंको पास बुलाया [और कहा—] लङ्काके चार बड़े विकट दरवाजे हैं। उनपर किस तरह आक्रमण किया जाय, इसपर विचार करो ॥ १ ॥

तब कपीस रिच्छेस बिभीषण। सुमिरि हृदयँ दिनकर कुल भूषण ॥

करि बिचार तिन्ह मंत्र दृढ़ावा। चारि अनी कपि कटकु बनावा ॥

तब वानरराज सुग्रीव, ऋक्षपति जाम्बवान् और विभीषणने हृदयमें सूर्यकुलके भूषण श्रीरघुनाथजीका स्मरण किया और विचार करके उन्होंने कर्तव्य निश्चित किया। वानरोंकी सेनाके चार दल बनाये ॥ २ ॥

जथाजोग सेनापति कीन्है। जूथप सकल बोलि तब लीन्है ॥

प्रभु प्रताप कहि सब समुझाए। सुनि कपि सिंधनाद करि धाए ॥

और उनके लिये यथायोग्य (जैसे चाहिये वैसे) सेनापति नियुक्त किये। फिर सब यूथपतियोंको बुला लिया और प्रभुका प्रताप कहकर सबको समझाया, जिसे सुनकर वानर सिंहके समान गर्जना करके दौड़े ॥ ३ ॥

हरषित राम चरण सिर नावहिं। गहि गिरि सिखर बीर सब धावहिं ॥

गर्जहिं तर्जहिं भालु कपीसा। जय रघुबीर कोसलाधीसा ॥

वे हर्षित होकर श्रीरामजीके चरणोंमें सिर नवाते हैं और पर्वतोंके शिखर ले-लेकर सब वीर दौड़ते हैं। 'कोसलराज श्रीरघुवीरजीकी जय हो' पुकारते हुए भालू और वानर गरजते और ललकारते हैं ॥ ४ ॥

  • लङ्काकाण्ड *

८११

जानत परम दुर्ग अति लंका । प्रभु प्रताप कपि चले असंका ॥ घटाटोप करि चहुँ दिसि घेरी । मुखहिं निसान बजावहिं भेरी ॥

लङ्काको अत्यन्त श्रेष्ठ (अजेय) किला जानते हुए भी वानर प्रभु श्रीरामचन्द्रजीके प्रतापसे निडर होकर चले। चारों ओरसे घिरी हुई बादलोंकी घटाकी तरह लङ्काको चारों दिशाओंसे घेरकर वे मुँहसे ही डंके और भेरी बजाने लगे ॥ ५ ॥

दो०—जयति राम जय लछिमन जय कपीस सुग्रीव ।

गर्जहिं सिंहनाद कपि भालु महा बल सींव ॥ ३९ ॥

महान् बलकी सीमा वे वानर-भालू सिंहके समान ऊँचे स्वरसे 'श्रीरामजीकी जय', 'लक्ष्मणजीकी जय', 'वानरराज सुग्रीवकी जय' ऐसी गर्जना करने लगे ॥ ३९ ॥

लंकाँ भयउ कोलाहल भारी । सुना दसानन अति अहँकारी ॥ देखहु बनरन्ह केरि ढिठाई । बिहँसि निसाचर सेन बोलाई ॥

लङ्कामें बड़ा भारी कोलाहल (कोहराम) मच गया। अत्यन्त अहङ्कारी रावणने उसे सुनकर कहा—वानरोंकी ढिठाई तो देखो ! यह कहते हुए हँसकर उसने राक्षसोंकी सेना बुलाई ॥ १ ॥

आए कीस काल के प्रेरे । छुधवांत सब निसिचर मेरे ॥ अस कहि अट्टहास सठ कीन्हा । गृह बैठें अहार बिधि दीन्हा ॥

बंदर कालकी प्रेरणासे चले आये हैं। मेरे राक्षस सभी भूखे हैं। विध्याताने इन्हें घर बैठे भोजन भेज दिया। ऐसा कहकर उस मूर्खने अट्टहास किया (वह बड़े जोरसे ठहाका मारकर हँसा) ॥ २ ॥

सुभट सकल चारिहुँ दिसि जाहू । धरि धरि भालु कीस सब खाहू ॥ उमा रावनहि अस अभिमाना । जिमि टिट्ठिभ खग सूत उताना ॥

[और बोला—] हे वीरो ! सब लोग चारों दिशाओंमें जाओ और रीछ-वानर सबको पकड़-पकड़कर खाओ। [शिवजी कहते हैं—] हे उमा! रावणको ऐसा अभिमान था जैसे टिटिहिरी पक्षी पैर ऊपरकी ओर करके सोता है [मानो आकाशको थाम लेगा] ॥ ३ ॥

चले निसाचर आयसु मागी । गहि कर भिंडिपाल बर साँगी ॥ तोमर मुद्रर परसु प्रचंडा । सूल कूपान परिघ गिरिखंडा ॥

आज्ञा माँगकर और हाथोंमें उत्तम भिंडिपाल, साँगी (बरछी), तोमर, मुद्रर, प्रचण्ड फरसे, शूल, दुधारी तलवार, परिघ और पहाड़ोंके टुकड़े लेकर राक्षस चले ॥ ४ ॥

८१२

  • रामचरितमानस *

जिमि अरुनोपल निकर निहारी । धावहिं सठ खग मांस अहारी ॥ चोंच भंग दुख तिन्हहि न सूझा । तिमि धाए मनुजाद अबूझा ॥

जैसे मूर्ख मांसाहारी पक्षी लाल पत्थरोंका समूह देखकर उसपर टूट पड़ते हैं, [पत्थरोंपर लगनेसे] चोंच टूटनेका दुःख उन्हें नहीं सूझता, वैसे ही ये बेसमझ राक्षस दौड़े ॥ ५ ॥

दो०—नानायुध सर चाप धर जातुधान बल बीर। कोट कँगूरन्हि चढ़ि गए कोटि कोटि रनधीर ॥ ४० ॥

अनेकों प्रकारके अस्त्र-शस्त्र और धनुष-बाण धारण किये करोड़ों बलवान् और रणधीर राक्षस वीर परकोटेके कँगूरोंपर चढ़ गये ॥ ४० ॥

कोट कँगूरन्हि सोहहिं कैसे । मेरु के सुंगनि जनु घन बैसे ॥ बाजहिं ढोल निसान जुझाऊ । सुनि धुनि होइ भटन्हि मन चाऊ ॥

वे परकोटेके कँगूरोंपर कैसे शोभित हो रहे हैं, मानो सुमेरुके शिखरोंपर बादल बैठे हों। जुझाऊ ढोल और डंके आदि बज रहे हैं, [जिनकी] ध्वनि सुनकर योद्धाओंके मनमें [लड़नेका] चाव होता है ॥ १ ॥

बाजहिं भेरि नफीरि अपारा । सुनि कादर उर जाहिं दरारा ॥ देखिन्ह जाइ कपिन्ह के ठट्टा । अति बिसाल तनु भालु सुभट्टा ॥

अगणित नफीरी और भेरी बज रही है, [जिन्हें] सुनकर कायरोंके हृदयमें दगरे पड़ जाती हैं। उन्होंने जाकर अत्यन्त विशाल शरीरवाले महान् योद्धा वानर और भालुओंके ठट्ट (समूह) देखे ॥ २ ॥

धावहिं गनहिं न अवघट घाटा । पर्वत फोरि करहिं गहि बाटा ॥ कटकटाहिं कोटिन्ह भट गर्जहिं । दसन ओठ काटहिं अति तर्जहिं ॥

[देखा कि] वे रीछ-वानर दौड़ते हैं; औघट (ऊँची-नीची, विकट) घाटियोंको कुछ नहीं गिनते। पकड़कर पहाड़ोंको फोड़कर रास्ता बना लेते हैं। करोड़ों योद्धा कटकटाते और गर्जते हैं। दाँतोंसे ओठ काटते और खूब डपटते हैं ॥ ३ ॥

उत रावन इत राम दोहाई । जयति जयति जय परी लराई ॥ निसिचर सिखर समूह ढहावहिं । कूदि धरहिं कपि फेरि चलावहिं ॥

उधर रावणकी और इधर श्रीरामजीकी दोहाई बोली जा रही है। 'जय' 'जय' 'जय' की ध्वनि होते ही लड़ाई छिड़ गयी। राक्षस पहाड़ोंके ढेर-के-ढेर शिखरोंको फेंकते हैं। वानर कूदकर उन्हें पकड़ लेते हैं और वापस उन्हींकी ओर चलाते हैं ॥ ४ ॥