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श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

उच्च स्वरसे बारम्बार गर्जते हुए हनुमान्जीका वह महान् सिंहनाद सुनकर लङ्कावासी श्रेष्ठ राक्षस भयके मारे कहीं हिल-डुल भी न सके॥ ४७ ॥

शत्रुओंको संताप देनेवाले भयानक पराक्रमी पवनकुमार हनुमान्जीने समुद्रको नमस्कार करके श्रीरामचन्द्रजीके लिये महान् पुरुषार्थ करनेका निश्चय किया॥ ४८ ॥

वे अपनी सर्पाकार पूँछको ऊपर उठाकर पीठको झुकाकर दोनों कान सिकोड़कर और वडवामुख अग्निके समान अपना मुख फैलाकर प्रचण्डवेगसे आकाशमें उड़े॥

हनुमान्जी अपने तीव्र वेगसे कितने ही वृक्षों, पर्वत-शिखरों, शिलाओं और वहाँ रहनेवाले साधारण वानरोंको भी साथ-साथ उड़ाते गये। उनकी भुजाओं और जाँघोंके वेगसे दूर फेंक दिये जानेके कारण जब उनका वेग शान्त हो गया, तब वे वृक्ष आदि समुद्रके जलमें गिर पड़े॥ ५० ॥

सर्पके शरीरकी भाँति दिखायी देनेवाली अपनी दोनों भुजाओंको फैलाकर गरुड़के समान पराक्रमी पवनपुत्र हनुमान्जी सम्पूर्ण दिशाओंको खींचते हुए-से श्रेष्ठ पर्वत गिरिराज हिमालयकी ओर चले॥ ५१ ॥

जिसकी तरंगमालाएँ झूम रही थीं तथा जिसके जलके द्वारा समस्त जल-जन्तु इधर-उधर घुमाये जा रहे थे, उस महासागरको देखते हुए हनुमान्जी भगवान् विष्णुके हाथसे छूटे हुए चक्रकी भाँति सहसा आगे बढ़ गये॥ ५२ ॥

उनका वेग अपने पिता वायुके ही समान था। वे अनेकानेक पर्वतों, पक्षियों, सरोवरों, नदियों, तालाबों, नगरों तथा समृद्धिशाली जनपदोंको देखते हुए बड़े वेगसे आगे बढ़ने लगे॥ ५३ ॥

वीर हनुमान् अपने पिताके ही तुल्य पराक्रमी और तीव्रगामी थे। वे सूर्यके मार्गका आश्रय ले बिना थके-माँदे शीघ्रतापूर्वक अग्रसर हो रहे थे॥ ५४ ॥

वानरसिंह पवनकुमार हनुमान् महान् वेगसे युक्त थे। वे सम्पूर्ण दिशाओंको शब्दायमान करते हुए वायुके समान वेगसे आगे बढ़े॥ ५५ ॥

महाकपि हनुमान्जीका बल-विक्रम बड़ा भयङ्कर था। उन्होंने जाम्बवान्के वचनोंका स्मरण करते हुए सहसा पहुँचकर हिमालय पर्वतका दर्शन किया॥ ५६ ॥

वहाँ अनेक प्रकारके सोते बह रहे थे। बहुत-सी कन्दराएँ और झरने उसकी शोभा बढ़ा रहे थे। श्वेत बादलोंके समूहकी भाँति मनोहर दिखायी देनेवाले शिखरों और नाना प्रकारके वृक्षोंसे

उस श्रेष्ठ पर्वतकी अद्भुत शोभा हो रही थी। हनुमान्‌जी उस पर्वतपर पहुँच गये॥ ५७ ॥

उस महापर्वतराजका सबसे ऊँचा शिखर सुवर्णमय दिखायी देता था। वहाँ पहुँचकर हनुमान्‌जीने परम पवित्र बड़े-बड़े आश्रम देखे, जिनमें देवर्षियोंका श्रेष्ठ समुदाय निवास करता था॥ ५८ ॥

उस पर्वतपर जिन्हें हिरण्यगर्भ भगवान् ब्रह्माका स्थान, उन्हींके दूसरे स्वरूप रजतनाभिका स्थान, इन्द्रका भवन, जहाँ खड़े होकर रुद्रदेवने त्रिपुरासुरपर बाण छोड़ा था, वह स्थान, भगवान् हयग्रीवका वासस्थान तथा ब्रह्मास्त्र देवताका दीप्तिमान् स्थान—ये सभी दिव्य स्थान दिखायी दिये। साथ ही यमराजके सेवक भी वहाँ दृष्टिगोचर हुए॥ ५९ ॥

इसके सिवा अग्नि, कुबेर और द्वादश सूर्योंके समावेशका भी सूर्यतुल्य तेजस्वी स्थान उन्हें दृष्टिगोचर हुआ। चतुर्मुख ब्रह्मा, शंकरजीके धनुष और वसुन्धराकी नाभिके स्थानोंका भी उन्होंने दर्शन किया॥ ६० ॥

तत्पश्चात् श्रेष्ठ कैलासपर्वत, हिमालय-शिला, शिवजीके वाहन वृषभ तथा सुवर्णमय श्रेष्ठ पर्वत ऋषभको भी देखा। इसके बाद उनकी दृष्टि सम्पूर्ण ओषधियोंके उत्तम पर्वतपर पड़ी, जो सब प्रकारकी दीप्तिमती ओषधियोंसे देदीप्यमान हो रहा था॥ ६१ ॥

अग्निराशिके समान प्रकाशित होनेवाले उस पर्वतको देखकर पवनकुमार हनुमान्‌जीको बड़ा विस्मय हुआ। वे कूदकर ओषधियोंसे भरे हुए उस गिरिराजपर चढ़ गये और वहाँ पूर्वोक्त चारों ओषधियोंकी खोज करने लगे॥

महाकपि पवनपुत्र हनुमान्‌जी सहस्रों योजन लाँघकर वहाँ आये थे और दिव्य ओषधियोंको धारण करनेवाले उस शैल-शिखरपर विचरण कर रहे थे॥ ६३ ॥

उस उत्तम पर्वतपर रहनेवाले सम्पूर्ण महौषधियाँ यह जानकर कि कोऽइ हमें लेनेके लिये आ रहा है, तत्काल अदृश्य हो गयीं॥ ६४ ॥

उन ओषधियोंको न देखकर महात्मा हनुमान्‌जी कुपित हो उठे और रोषके कारण जोर-जोरसे गर्जना करने लगे। ओषधियोंका छिपाना उनके लिये असह्य

हो गया। उनकी आँखें अग्निके समान लाल हो गयीं और वे उस पर्वतराजसे इस प्रकार बोले—॥ ६५ ॥

‘नगेन्द्र! तुम श्रीरघुनाथजीपर भी कृपा नहीं कर सके, ऐसा निश्चय तुमने किस बलपर किया है? आज मेरे बाहुबलसे पराजित होकर तुम अपने-आपको सब ओर बिखरा हुआ देखो’॥ ६६ ॥

ऐसा कहकर उन्होंने वेगसे पकड़कर वृक्षों, हाथियों, सुवर्ण तथा अन्य सहस्रों प्रकारकी धातुओंसे भरे हुए उस पर्वत-शिखरको ही सहसा उखाड़ लिया। वेगसे उखाड़े जानेके कारण उसकी बहुत-सी चोटियाँ बिखरकर गिर पड़ीं। उस पर्वतका ऊपरी भाग अपनी प्रभासे प्रज्वलित-सा हो रहा था॥ ६७ ॥

उसे उखाड़कर साथ ले हनुमान्जी देवेश्वरों और असुरेश्वरोंसहित सम्पूर्ण लोकोंको भयभीत करते हुए गरुड़के समान भयङ्कर वेगसे आकाशमें उड़ चले। उस समय बहुत-से आकाशचारी प्राणी उनकी स्तुति कर रहे थे॥ ६८ ॥

सूर्यके समान चमकते हुए उस पर्वतशिखरको हाथमें लेकर हनुमान्जी सूर्यके ही पथपर जा पहुँचे थे। उस समय सूर्यदेवके समीप रहकर उन्हींके समान तेजस्वी शरीरवाले वे पवनकुमार दूसरे सूर्यकी भाँति प्रतीत होते थे॥ ६९ ॥

वायुदेवताके पुत्र हनुमान्जी पर्वतके समान जान पड़ते थे। उस पर्वतशिखरके साथ उनकी वैसी ही विशेष शोभा हो रही थी, जैसे सहस्रधारोंसे सुशोभित और अग्निकी ज्वालासे युक्त चक्र धारण करनेसे भगवान् विष्णु सुशोभित होते हैं॥ ७० ॥

उस समय उन्हें लौटा देख सब वानर जोर-जोरसे गर्जना करने लगे। उन्होंने भी उन सबको देखकर बड़े हर्षसे सिंहनाद किया। उन सबके उस तुमुलनादको सुनकर लङ्कावासी निशाचर और भी भयानक चीत्कार करने लगे॥ ७१ ॥

तदनन्तर हनुमान्जी उस उत्तम पर्वत त्रिकूटपर कूद पड़े और वानरसेनाके मध्यमें आकर सभी श्रेष्ठ वानरोंको प्रणाम करके विभीषणसे भी उन्हें गले लगाकर मिले॥

इसके बाद वे दोनों राजकुमार श्रीराम और लक्ष्मण उन महौषधियोंकी सुगन्ध लेकर स्वस्थ हो गये। उनके शरीरसे बाण निकल गये और घाव भर गये। इसी प्रकार जो दूसरे-दूसरे प्रमुख वानर वीर वहाँ हताहत हुए थे, वे सब-के-सब उन श्रेष्ठ ओषधियोंकी सुगन्धसे रातके अन्तमें सोकर उठे हुए प्राणियोंकी भाँति क्षणभरमें नीरोग हो उठकर खड़े हो गये। उनके शरीरसे बाण निकल गये और उनकी सारी पीड़ा जाती रही॥

लङ्कामें जबसे वानरों और राक्षसोंकी लड़ाई शुरु हुई, तभीसे वानरवीरोंद्वारा रणभूमिमें जो-जो राक्षस मारे जाते थे, वे सभी रावणकी आज्ञाके अनुसार प्रतिदिन मरते-मरते ही समुद्रमें

फेंक दिये जाते थे। ऐसा इसलिये होता था कि वानरोंको यह मालूम न हो कि बहुत-से राक्षस मार डाले गये॥ ७५-७६ ॥

तत्पश्चात् प्रचण्ड वेगवाले पवनकुमार हनुमान्‌जीने पुनः ओषधियोंके उस पर्वतको वेगपूर्वक हिमालयपर ही पहुँचा दिया और फिर लौटकर वे श्रीरामचन्द्रजीसे आ मिले॥ ७७ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें चौहत्तरवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ७४ ॥

पचहत्तरवाँ सर्ग

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पचहत्तरवाँ सर्ग

लङ्कापुरीका दहन तथा राक्षसों और वानरोंका भयंकर युद्ध

तदनन्तर महातेजस्वी वानरराज सुग्रीवने हनुमान्‌जीसे आगेका कर्तव्य सूचित करनेके लिये कहा— ॥ १ ॥

‘कुम्भकर्ण मारा गया। राक्षसराजके पुत्रोंका भी संहार हो गया; अतः अब रावण लङ्कापुरीकी रक्षाका कोई प्रबन्ध नहीं कर सकता॥ २ ॥

‘इसलिये अपनी सेनामें जो-जो महाबली और शीघ्रगामी वानर हों, वे सब-के-सब मशाल ले-लेकर शीघ्र ही लङ्कापुरीपर धावा करें’॥ ३ ॥

सुग्रीवकी इस आज्ञाके अनुसार सूर्यास्त होनेपर भयङ्कर प्रदोषकालमें वे सभी श्रेष्ठ वानर मशाल हाथमें ले-लेकर लङ्काकी ओर चले॥ ४ ॥

जब उल्काधारी वानरोंने सब ओरसे आक्रमण किया, तब द्वार-रक्षाके काममें नियुक्त हुए राक्षस सहसा भाग खड़े हुए॥ ५ ॥

वे गोपुरों (दरवाजों), अट्टालिकाओं, सड़कों, नाना प्रकारकी गलियों और महलोंमें भी बड़े हर्षके साथ आग लगाने लगे॥ ६ ॥

वानरोंकी लगायी हुई वह आग उस समय सहस्रों घरोंको जलाने लगी। पर्वताकार प्रासाद धराशायी होने लगे॥ ७ ॥

कहीं अगुरु जल रहा था तो कहीं परम उत्तम चन्दन। मोती, स्निग्धमणि, हीरे और मूँगे भी दग्ध हो रहे थे॥ ८ ॥

वहाँ क्षौम (अलसी या सनके रेशोंसे बना हुआ वस्त्र) भी जलता था और सुन्दर रेशमी वस्त्र भी। भेड़के रोएँका कम्बल, नाना प्रकारका ऊनी वस्त्र, सोनेके आभूषण और अस्त्र-शस्त्र भी जल रहे थे॥ ९ ॥

घोड़ोंके गहने, जीन आदि उपकरण जो अनेक प्रकार और विचित्र आकारके थे, दग्ध हो रहे थे। हाथीके गलेका आभूषण, उसे कसनेके लिये रस्से तथा रथोंके उपकरण, जो सुन्दर बने हुए थे, सब-के-सब आगमें जलकर भस्म हो रहे थे॥ १० ॥

योद्धाओंके कवच, हाथी और घोड़ोंके बख्तर, खड्ग, धनुष, प्रत्यञ्चा, बाण, तोमर, अंकुश, शक्ति, रोमज (कम्बल आदि), वालज (चँवर आदि), आसनोपयोगी व्याघ्रचर्म, अण्डज (कस्तूरी आदि), मोती और मणियोंसे जटिल विचित्र महल तथा नाना प्रकारके अस्त्रसमूह— इन सबको सब ओर फैली हुई आग जला रही थी॥

उस समय अग्निदेवने नाना प्रकारके विचित्र गृहोंको दग्ध करना आरम्भ किया। जो घरोंमें आसक्त थे, सोनेके विचित्र कवच धारण किये हुए थे तथा हार, आभूषण और वस्त्रोंसे विभूषित थे, उन सभी राक्षसोंके आवासस्थान आगकी लपटोंमें आ गये॥ १३-१४ ॥

मदिरापानसे जिनके नेत्र चञ्चल हो रहे थे, जो नशेसे विह्वल हो लड़खड़ाते हुए चलते थे, जिनके वस्त्रोंको उनकी प्रेयसी स्त्रियोंने पकड़ रखा था, जो शत्रुओंपर कुपित थे, जिनके हाथोंमें गदा, खड्ग और शूल शोभा पा रहे थे, जो खाने-पीनेमें लगे थे, जो बहुमूल्य शय्याओंपर अपनी प्राणवल्लभाओंके संग शयन कर रहे थे तथा जो आगसे भयभीत हो अपने पुत्रोंको गोदमें लेकर सब ओर तीव्रगतिसे भाग रहे थे, ऐसे लाखों लङ्कानिवासियोंको उस समय अग्निने जलाकर भस्म कर दिया। वह आग वहाँ रह-रहकर पुनः प्रज्वलित हो उठती थी॥ १५—१७ १/२ ॥

जो बहुत मजबूत और बहुमूल्य बने हुए थे, गाम्भीर्य गुणोंसे युक्त थे—अनेकानेक ड्योढ़ियों, परकोटों, आन्तरिक गृहों, द्वारों और उपद्वारोंके कारण दुर्गम प्रतीत होते थे, जो सुवर्णनिर्मित अर्धचन्द्र अथवा पूर्णचन्द्रके आकारमें बने हुए थे, अट्टालिकाओंके कारण बहुत ऊँचे दिखायी देते थे, विचित्र झरोखे जिनकी शोभा बढ़ाते थे, जिनमें सब ओर सोने-बैठनेके लिये शय्या-आसन आदि सुसज्जित थे, मणियों और मूँगोंसे जटिल होनेके कारण जिनकी विचित्र शोभा हो रही थी, जो अपनी ऊँचाईसे सूर्यदेवका स्पर्श-सा कर रहे थे, जिनमें क्रौञ्च और मोरोंके कलरव, वीणाकी मधुर-ध्वनि तथा भूषणोंकी झनकारें गूँज रही थीं और जो पर्वताकार दिखायी देते थे, उन सभी गृहोंको प्रज्वलित आगने जला दिया॥

आगसे घिरे हुए लङ्काके बाहरी दरवाजे ग्रीष्म-ऋतुमें विद्युन्मालामण्डित मेघसमूहोंके समान प्रकाशित होते थे॥ २१ १/२ ॥

अग्निकी लपटोंमें लिपटे हुए लङ्कापुरीके मकान दावाग्निसे दग्ध होते हुए बड़े-बड़े पर्वतोंके शिखरोंके समान जान पड़ते थे॥ २२ १/२ ॥

सतमहले भवनोंमें सोयी हुई सुन्दरियाँ जब आगसे दग्ध होने लगीं, उस समय सारे आभूषणोंको फेंककर हाय-हाय करती हुई उच्च स्वरसे चीत्कार करने लगीं॥

वहाँ आगकी लपेटमें आये हुए कितने ही भवन इन्द्रके वज्रके मारे हुए महान् पर्वतोंके शिखरोंके समान धराशायी हो रहे थे॥ २४ १/२ ॥

वे जलते हुए गगनचुम्बी भवन दूरसे ऐसे जान पड़ते थे, मानो हिमालयके शिखर सब ओरसे दग्ध हो रहे हों॥ २५ १/२ ॥

अट्टालिकाओंके जलते हुए शिखर उठती हुई ज्वालाओंसे आवेष्टित हो रहे थे। रात्रिमें उनसे उपलक्षित हुई लङ्कापुरी खिले हुए पलाश-पुष्पोंसे युक्त-सी दिखायी देती थी॥ २६ १/२ ॥

हाथियोंके अध्यक्षोंने हाथियोंको और अश्वाध्यक्षोंने अश्वोंको भी खोल दिया था। वे वहाँ इधर-उधर भाग रहे थे, इससे लङ्कापुरी प्रलयकालमें भ्रान्त होकर घूमते हुए ग्राहोंसे युक्त महासागरके समान प्रतीत होती थी॥

कहीं खुले हुए घोड़ेको देखकर हाथी भयभीत होकर भागता था और कहीं डरे हुए हाथीको देखकर भी घोड़ा भागने लगता था॥ २८ ॥

लङ्कापुरीके जलते समय समुद्रमें आगकी ज्वालाका प्रतिबिम्ब पड़ रहा था, जिससे वह महासागर लाल पानीसे युक्त लालसागरके समान शोभा पाता था॥ २९ ॥

वानरोंद्वारा जिसमें आग लगायी गयी थी, वह लङ्कापुरी दो ही घड़ीमें संसारके घोर संहारके समय दग्ध हुई पृथ्वीके समान प्रतीत होने लगी॥ ३० ॥

धूँएँसे आच्छादित और आगसे संतप्त होकर उच्च स्वरसे आर्तनाद करती हुई लङ्काकी नारियोंका करुण क्रन्दन सौ योजन दूरतक सुनायी देता था॥ ३१ ॥

जिनके शरीर जल गये थे, ऐसे जो-जो राक्षस नगरसे बाहर निकलते, उनके ऊपर युद्धकी इच्छावाले वानर सहसा टूट पड़ते थे॥ ३२ ॥

वानरोंकी गर्जना और राक्षसोंके आर्तनादसे दसों दिशाएँ, समुद्र और पृथ्वी गूँज उठीं॥ ३३ ॥

इधर बाण निकल जानेसे स्वस्थ हुए दोनों भाई महात्मा श्रीराम और लक्ष्मणने बिना किसी घबराहटके अपने श्रेष्ठ धनुष उठाये॥ ३४ ॥

उस समय श्रीरामने अपने उत्तम धनुषको खींचा, उससे भयंकर टंकार प्रकट हुई, जो राक्षसोंको भयभीत कर देनेवाली थी॥ ३५ ॥

श्रीरामचन्द्रजी अपने विशाल धनुषको खींचते हुए उसी तरह शोभा पा रहे थे, जैसे त्रिपुरासुरपर कुपित हो भगवान् शंकर अपने वेदमय धनुषकी टंकार करते हुए सुशोभित हुए थे॥ ३६॥

वानरोंकी गर्जना तथा राक्षसोंके कोलाहल—इन दोनों प्रकारके शब्दोंसे भी ऊपर उठकर श्रीरामके धनुषकी टंकार सुनायी पड़ती थी॥ ३७॥

वानरोंकी गर्जना, राक्षसोंका कोलाहल और श्रीरामके धनुषकी टंकार—ये तीनों प्रकारके शब्द दसों दिशाओंमें व्याप्त हो रहे थे॥ ३८॥

भगवान् श्रीरामके धनुषसे छूटे हुए बाणोंद्वारा लङ्कापुरीका वह नगरद्वार, जो कैलास-शिखरके समान ऊँचा था, टूट-फूटकर भूतलपर बिखर गया॥ ३९॥

सतमहले मकानों तथा अन्य गृहोंपर गिरते हुए श्रीरामके बाणोंको देखकर राक्षसपतियोंने युद्धके लिये बड़ी भयंकर तैयारी की॥ ४०॥

कमर कसकर और कवच आदि बाँधकर युद्धके लिये तैयार होते तथा सिंहनाद करते हुए उन राक्षसपतियोंके लिये वह रात कालरात्रिके समान प्राप्त हुई थी॥ ४१॥

उस समय महात्मा सुग्रीवने प्रधान-प्रधान वानरोंको यह आज्ञा दी—'वानरवीरो! तुम सब लोग अपने-अपने निकटवर्ती द्वारपर जाकर युद्ध करो॥ ४२॥

'तुमलोगोंमेंसे जो वहाँ-वहाँ युद्धभूमिमें उपस्थित होकर भी मेरे आदेशका पालन न करे—युद्धसे मुँह मोड़कर भाग जाय, उसे तुम सब लोग पकड़कर मार डालना; क्योंकि वह राजाज्ञाका उल्लङ्घन करनेवाला होगा'॥ ४३॥

सुग्रीवकी इस आज्ञाके अनुसार जब मुख्य-मुख्य वानर जलते मशाल हाथमें लिये नगरद्वारपर जाकर डट गये, तब रावणको बड़ा क्रोध हुआ॥ ४४॥

उसने अँगड़ाई लेकर जो अङ्गोंका संचालन किया, उससे दसों दिशाएँ व्याकुल हो उठीं। वह कालरुद्रके अङ्गोंमें प्रकट हुए मूर्तिमान् क्रोधकी भाँति दिखायी देने लगा॥ ४५॥

क्रोधसे भरे हुए रावणने कुम्भकर्णके दो पुत्र कुम्भ और निकुम्भको बहुत-से राक्षसोंके साथ भेजा॥

रावणकी आज्ञासे यूपाक्ष, शोणिताक्ष, प्रजङ्घ और कम्पन भी कुम्भकर्णके दोनों पुत्रोंके साथ-साथ युद्धके लिये निकले॥ ४७॥

उस समय सिंहके समान दहाड़ते हुए रावणने उन समस्त महाबली राक्षसोंको आदेश दिया—‘वीर निशाचरो! इसी रातमें तुमलोग युद्धके लिये जाओ’॥ ४८ ॥

राक्षसराजकी आज्ञा पाकर वे वीर राक्षस हाथोंमें चमकीले अस्त्र-शस्त्र लिये बार-बार गर्जना करते हुए लङ्कापुरीसे बाहर निकले॥ ४९ ॥

राक्षसोंने अपने आभूषणोंकी तथा अपनी प्रभासे और वानरोंने मशालकी आगसे वहाँके आकाशको प्रकाशसे परिपूर्ण कर दिया था॥ ५० ॥

चन्द्रमाकी, नक्षत्रोंकी और उन दोनों सेनाओंके आभूषणोंकी प्रज्वलित प्रभाने आकाशको प्रकाशित कर दिया था॥ ५१ ॥

चन्द्रमाकी चाँदनी, आभूषणोंकी प्रभा तथा प्रकाशमान ग्रहोंकी दीप्तिने सब ओरसे राक्षसों और वानरोंकी सेनाओंको उद्भासित कर रखा था॥ ५२ ॥

लङ्काके अध्जल गृहोंकी प्रभाका जलमें प्रतिबिम्ब पड़नेसे चञ्चल लहरोंवाला समुद्र अधिक शोभा पा रहा था॥ ५३ ॥

राक्षसोंकी वह भयंकर सेना ध्वजा-पताकाओंसे सुशोभित थी। सैनिकोंके हाथोंमें उत्तम खड्ग और फरसे चमक रहे थे। भयानक घोड़े, रथ और हाथियोंसे एवं नाना प्रकारके पैदल सैनिकोंसे वह लैस थी। चमकते हुए शूल, गदा, तलवार, भाले, तोमर और धनुष आदिसे युक्त हुईं वह सेना भयानक विक्रम एवं पुरुषार्थ प्रकट करनेवाली थी॥ ५४-५५ ॥

उस सेनामें भाले चमक रहे थे। सैकड़ों घुँघुरुओंका झंकार सुनायी पड़ता था। सैनिकोंकी भुजाओंमें सोनेके आभूषण बँधे हुए थे। उनके द्वारा फरसे चलाये जा रहे थे, बड़े-बड़े शस्त्र घुमाये जाते थे। धनुषपर बाणोंका संधान किया जाता था। चन्दन, पुष्पमाला और मधुकी अधिकतासे वहाँके महान् वातावरणमें अनुपम गन्ध छा रही थी। वह सेना शूरवीरोंसे व्याप्त तथा महान् मेघोंकी गर्जनाके समान सिंहनादसे निनादित होनेके कारण भयंकर दिखायी देती थी॥ ५६-५७ ^{१}/_२ ॥

राक्षसोंकी उस दुर्जय सेनाको आती देख वानर-सेना आगे बढ़ी और उच्च स्वरसे गर्जना करने लगी॥

राक्षसोंकी विशाल सेना भी बड़े वेगसे उछलकर शत्रुसेनाकी ओर उसी तरह अग्रसर हुईं, जैसे पतङ्ग आगपर टूट पड़ते हैं॥ ५९ ^{१}/_२ ॥

सैनिकोंकी भुजाओंके व्यापारसे जहाँ परिघ और अशनि झूम रहे थे, राक्षसोंकी वह उत्तम सेना बड़ी शोभा पा रही थी॥ ६० १/२ ॥

वहाँ युद्धकी इच्छावाले वानर उन्मत्त-से होकर वृक्षों, पत्थरों और मुक्कोंसे निशाचरोंको मारते हुए उनपर टूट पड़े॥ ६१ १/२ ॥

इसी प्रकार भयानक पराक्रमी निशाचर भी अपने तीखे बाणोंसे सामने आये हुए वानरोंके मस्तक सहसा काट-काटकर गिराने लगे॥ ६२ १/२ ॥

वानरोंने भी दाँतोंसे निशाचरोंके कान काट लिये, मुक्कोंसे मार-मारकर उनके मस्तक विदीर्ण कर दिये और शिलाओंके प्रहारसे उनके अङ्ग-भङ्ग कर दिये। इस अवस्थामें वे राक्षस वहाँ विचर रहे थे॥ ६३ ॥

इसी प्रकार घोर रूपधारी निशाचरोंने भी मुख्य-मुख्य वानरोंको अपनी तीखी तलवारोंसे सर्वथा घायल कर दिया था॥ ६४ ॥

एक वीर जब दूसरे विपक्षी योद्धाको मारने लगता था, तब दूसरा आकर उसे मारने लगता था। इसी प्रकार एकको गिराते हुए योद्धाको दूसरा आकर धराशायी कर देता था। एककी निन्दा करनेवालेकी दूसरा निन्दा करता और एकको दाँतसे काटनेवालेको दूसरा आकर काट लेता था॥ ६५ ॥

एक आकर कहता कि ‘मुझे युद्ध प्रदान करो’ तो दूसरा उसे युद्धका अवसर देता था; फिर तीसरा कहता था कि ‘तुम क्यों क्लेश उठाते हो? मैं इसके साथ युद्ध करता हूँ।’ इस तरह वे एक-दूसरेसे बातें करते थे॥

उस समय वानरों और राक्षसोंमें बड़ा भयंकर युद्ध होने लगा। हथियार गिर जाते, कवच और अस्त्र-शस्त्र छूट जाते, बड़े-बड़े भाले ऊँचे उठे दिखायी देते तथा मुक्कों, शूलों, तलवारों और भालोंकी मार होती थी। उस युद्धस्थलमें राक्षस दस-दस या सात-सात वानरोंको एक साथ मार गिराते थे और वानर भी दस-दस या सात-सात राक्षसोंको एक साथ धराशायी कर देते थे॥ ६७-६८ १/२ ॥

राक्षसोंके वस्त्र खुल गये, कवच और ध्वज टूट गये तथा उस राक्षसी सेनाको रोककर वानरोंने सब ओरसे घेर लिया॥ ६९ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें पचहत्तरवाँ सर्ग पूरा
हुआ॥ ७५ ॥

छिहत्तरवाँ सर्ग

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छिहत्तरवाँ सर्ग

अङ्गदके द्वारा कम्पन और प्रजङ्घका, द्विविदके द्वारा शोणिताक्षका, मैन्दके द्वारा यूपाक्षका और सुग्रीवके द्वारा कुम्भका वध

जब वीरजनोंका विनाश करनेवाला वह घोर घमासान युद्ध चल रहा था, उस समय अङ्गद संग्रामके लिये उत्सुक होकर वीर कम्पनका सामना करनेके लिये आये॥ १ ॥

कम्पनने अङ्गदको क्रोधपूर्वक ललकारकर बड़े वेगसे उनके ऊपर पहले गदाका प्रहार किया। इससे उनको बड़ी चोट पहुँची और वे काँपकर बेहोश हो गये॥

फिर चेत होनेपर तेजस्वी वीर अङ्गदने एक पर्वतका शिखर उठाकर उस राक्षसपर दे मारा। उस प्रहारसे पीड़ित हो कम्पन पृथ्वीपर गिर पड़ा—उसके प्राण-पखेरू उड़ गये॥ ३ ॥

कम्पनको युद्धमें मारा गया देख शोणिताक्षने रथपर बैठकर तुरंत ही निर्भय हो अङ्गदपर धावा किया॥

उसने शरीरको विदीर्ण करनेमें समर्थ और कालाग्निके समान आकारवाले तीखे तथा पैने बाणोंद्वारा बड़े वेगसे उस समय अङ्गदको चोट पहुँचायी॥ ५ ॥

उसके चलाये हुए क्षुर^१, क्षुरप्र^२, नाराच^३, वत्सदन्त^४, शिलीमुख^५, कर्णी^६, शल्य^७ और विपाठ^८ नामक बहुसंख्यक तीखे बाणोंसे जब प्रतापी वालिपुत्र अङ्गदके सारे अङ्ग बिंध गये, तब उन बलवान् वीरने बड़े वेगसे उस राक्षसके भयंकर धनुष, रथ और बाणोंको कुचल डाला॥ ६-७ ॥

तदनन्तर वेगवान् निशाचर शोणिताक्षने कुपित हो तत्काल ही ढाल और तलवार हाथमें ले ली तथा वह बिना सोचे-विचारे रथसे कूद पड़ा॥ ८ ॥

इतनेहीमें बलवान् अङ्गदने शीघ्रतापूर्वक उछलकर उसे पकड़ लिया और अपने हाथसे उसकी उस तलवारको छीनकर बड़े जोरसे सिंहनाद किया॥ ९ ॥

फिर कपिकुञ्जर अङ्गदने उसके कंधेपर तलवारका वार किया और उसके शरीरको इस तरह चीर दिया मानो उसने यज्ञोपवीत पहन रखा हो॥ १० ॥

इसके बाद वालिपुत्रने उस विशाल खड्गको लेकर बारम्बार गर्जना करते हुए युद्धके मुहानेपर दूसरे शत्रुओंपर धावा किया॥ ११ ॥

इतनेहीमें प्रजङ्घको साथ लिये बलवान् वीर यूपाक्षने कुपित हो रथके द्वारा महाबली वालिपुत्रपर आक्रमण किया॥ १२ ॥

इसी बीचमें सोनेके बाजूबंद पहने वीर शोणिताक्षने अपनेको सँभालकर लोहेकी गदा उठायी और अङ्गदका ही पीछा किया॥ १३ ॥

फिर यूपाक्षसहित बलवान् महावीर प्रजङ्घ कुपित हो महाबली वालिपुत्रपर गदा लेकर चढ़ आया॥ १४ ॥

शोणिताक्ष और प्रजङ्घ दोनों राक्षसोंके बीचमें कपिश्रेष्ठ अङ्गद वैसी ही शोभा पा रहे थे, जैसे दोनों विशाखा नक्षत्रोंके बीचमें पूर्ण चन्द्रमा सुशोभित होते हैं॥

उस समय मैन्द और द्विविद अङ्गदकी रक्षा करनेके लिये उनके निकट आकर खड़े हो गये। वे दोनों अपने-अपने योग्य विपक्षी योद्धाकी तलाश भी कर रहे थे॥ १६ ॥

इतनेहीमें तलवार, बाण और गदा धारण किये बहुत-से महाबली विशालकाय राक्षस रोषपूर्वक वानरोंपर टूट पड़े॥ १७ ॥

ये तीन वानर-सेनापति उन तीन प्रमुख राक्षसोंके साथ उलझे हुए थे। उस समय उनमें रोंगटे खड़े कर देनेवाला महान् युद्ध छिड़ गया॥ १८ ॥

उन तीनों वानरोंने रणभूमिमें वृक्ष ले-लेकर युद्धमें निशाचरोंपर चलाये, परंतु महाबली प्रजङ्घने अपनी तलवारसे उन सब वृक्षोंको काट गिराया॥ १९ ॥

तत्पश्चात् उन्होंने रणभूमिमें उन राक्षसोंके रथों और घोड़ोंपर वृक्ष तथा पर्वतशिखर चलाये; परंतु महाबली यूपाक्षने अपने बाणसमूहोंसे उनके टुकड़े-टुकड़े कर डाले॥ २० ॥

मैन्द और द्विविदने जिन-जिन वृक्षोंको उखाड़-उखाड़कर उन राक्षसोंपर चलाया था, उन सबको बल-विक्रमशाली और प्रतापी शोणिताक्षने गदा मारकर बीचमें ही तोड़ डाला॥ २१ ॥

तत्पश्चात् प्रजङ्घने शत्रुओंके मर्मको विदीर्ण करनेवाली एक बहुत बड़ी तलवार उठाकर वालिपुत्र अङ्गदपर वेगपूर्वक आक्रमण किया॥ २२ ॥

उसे निकट आया देख अतिशय शक्तिशाली महाबली वानरराज अङ्गदने अश्वकर्ण नामक वृक्षसे मारा। साथ ही उसकी बाँहपर, जिसमें तलवार थी, उन्होंने एक घूसा मारा। वालिपुत्रके उस आघातसे वह तलवार छूटकर पृथ्वीपर जा गिरी॥ २३-२४ ॥

मूसल-जैसी उस तलवारको पृथ्वीपर पड़ी देख महाबली प्रजङ्घने अपना वज्रके समान भयंकर मुक्का घुमाना आरम्भ किया॥ २५ ॥

उस महातेजस्वी निशाचरने महापराक्रमी वानरशिरोमणि अङ्गदके ललाटमें बड़े जोरसे मुक्का मारा, जिससे अङ्गदको दो घड़ीतक चक्कर आता रहा॥ २६ ॥

इसके बाद होशमें आनेपर तेजस्वी और प्रतापी वालिकुमारने प्रजङ्घको ऐसा घूंसा मारा कि उसका सिर धड़से अलग हो गया॥ २७ ॥

रणभूमिमें अपने चाचा प्रजङ्घके मारे जानेपर यूपाक्षकी आँखोंमें आँसू भर आये। उसके बाण नष्ट हो चुके थे। इसलिये तुरंत ही रथसे उतरकर उसने तलवार हाथमें ले ली॥ २८ ॥

यूपाक्षको आक्रमण करते देख बलवान् वीर द्विविदने कुपित हो बड़ी फुर्तीके साथ उसकी छातीमें चोट की और उसे बलपूर्वक पकड़ लिया॥ २९ ॥

भाऽइको पकड़ा गया देख महातेजस्वी एवं महाबली शोणिताक्षने द्विविदकी छातीमें गदा मारी॥ ३० ॥

शोणिताक्षकी मार खाकर महाबली द्विविद विचलित हो उठे। तत्पश्चात् जब उसने पुनः गदा उठायी, तब द्विविदने झपटकर उसे छीन लिया॥ ३१ ॥

इसी बीचमें पराक्रमी मैन्द भी द्विविदके पास आ गये और उन्होंने यूपाक्षकी छातीमें एक थप्पड़ मारा॥ ३२ ॥

वे दोनों वेगशाली वीर शोणिताक्ष और यूपाक्ष उन दोनों वानर मैन्द और द्विविदके साथ समराङ्गणमें बड़ी तेजीसे छीना-झपटी और पटका-पटकी करने लगे॥ ३३ ॥

पराक्रमी द्विविदने अपने नखोंसे शोणिताक्षका मुँह नोच लिया और उसे बलपूर्वक पृथ्वीपर पटककर पीस डाला॥ ३४ ॥

तत्पश्चात् अत्यन्त क्रोधसे भरे हुए वानरपुङ्गव मैन्दने यूपाक्षको अपनी दोनों बाँहोंसे इस तरह दबाया कि वह निष्प्राण होकर पृथ्वीपर गिर पड़ा॥ ३५ ॥

इन प्रमुख वीरोंके मारे जानेपर राक्षसराजकी सेना व्यथित हो उठी और भागकर उस ओर चली गयी, जहाँ कुम्भकर्णका पुत्र युद्ध कर रहा था॥ ३६ ॥

वेगसे भागकर आती हुऽइ उस सेनाको कुम्भने सान्त्वना दी। दूसरी ओर महापराक्रमी वानर युद्धमें सफल होनेके कारण जोर-जोरसे गर्जना करने लगे॥ ३७ ॥

राक्षससेनाके बड़े-बड़े वीरोंको मारा गया देख तेजस्वी कुम्भने रणभूमिमें अत्यन्त दुष्कर कर्म करना आरम्भ किया॥ ३८ ॥

वह धनुर्धरोंमें श्रेष्ठ था और युद्धमें चित्तको अत्यन्त एकाग्र रखता था। उसने धनुष उठाया और शरीरको विदीर्ण करनेमें समर्थ एवं सर्पके समान विषैले बाणोंको बरसाना आरम्भ किया॥ ३९ ॥

उसका वह बाणसहित उत्तम धनुष विद्युत् और ऐरावतकी प्रभासे युक्त द्वितीय इन्द्रधनुषके समान अधिक शोभा पा रहा था॥ ४० ॥

उसने सोनेके पङ्ख लगे हुए पत्रयुक्त बाणद्वारा, जो धनुषको कानतक खींचकर छोड़ा गया था, द्विविदको घायल कर दिया॥ ४१ ॥

उसके बाणसे सहसा आहत होकर त्रिकूट पर्वतके समान विशालकाय वानरश्रेष्ठ द्विविद व्याकुल हो गये और छटपटाते हुए पाँव फैलाकर पृथ्वीपर गिर पड़े॥ ४२ ॥

उस महासमरमें अपने भाईको घायल होकर गिरा देख मैन्द बहुत बड़ी शिला उठाकर वेगपूर्वक दौड़े॥ ४३ ॥

उन महाबली वीरने वह शिला उस राक्षसपर चला दी; परंतु कुम्भने पाँच चमकीले बाणोंद्वारा उस शिलाको टूक-टूक कर दिया॥ ४४ ॥

फिर विषधर सर्पके समान भयंकर और सुन्दर अग्रभागवाला दूसरा बाण धनुषपर रखा और उसके द्वारा उस महातेजस्वी वीरने द्विविदके बड़े भाईकी छातीमें गहरी चोट पहुँचायी॥ ४५ ॥

उसके उस प्रहारसे वानरयूथपति मैन्दके मर्मस्थानमें भारी आघात पहुँचा और वे मूर्च्छित होकर पृथ्वीपर गिर पड़े॥ ४६ ॥

मैन्द और द्विविद अङ्गदके मामा थे। उन दोनों महाबली वीरोंको घायल हुआ देख अङ्गद धनुष लेकर खड़े हुए कुम्भके ऊपर बड़े वेगसे टूटे॥ ४७ ॥

उन्हें आते देख कुम्भने लोहेके बने हुए पाँच बाणोंसे घायल कर दिया। फिर तीन तीखे बाण और मारे। जैसे महावत अंकुशसे मतवाले हाथीको मारता है, उसी प्रकार पराक्रमी कुम्भने बहुत-से बाणोंद्वारा अङ्गदको बींध डाला॥ ४८ ॥

जिनकी धारें कुण्ठित नहीं हुई थीं तथा जो सुवर्णसे विभूषित थे, ऐसे तेज और तीखे बाणोंसे वालिपुत्र अङ्गदका सारा शरीर छिद गया था तो भी वे कम्पित नहीं हुए॥ ४९ ॥

उन्होंने उस राक्षसके मस्तकपर शिलाओं और वृक्षोंकी वर्षा आरम्भ कर दी; किंतु कुम्भकर्णकुमार श्रीमान् कुम्भने वालिपुत्रके चलाये हुए उन समस्त वृक्षोंको काट दिया और शिलाओंको भी तोड़-फोड़ डाला॥ ५० १/२ ॥

तत्पश्चात् वानरयूथपति अङ्गदको अपनी ओर आते देख कुम्भने दो बाणोंसे उनकी भौंहोंमें प्रहार किया, मानो दो उल्काओंद्वारा किसी हाथीको मारा गया हो॥ ५१ १/२ ॥

अङ्गदकी भौंहोंसे रक्त बहने लगा और उनकी आँखें बंद हो गयीं। तब उन्होंने एक हाथसे खूनसे भीगी हुई अपनी दोनों आँखोंको ढक लिया और दूसरे हाथसे पास ही खड़े हुए एक सालके वृक्षको पकड़ा। फिर छातीसे दबाकर तनेसहित उस वृक्षको कुछ झुका दिया और उस महासमरमें एक ही हाथसे उसे उखाड़ लिया॥

वह वृक्ष इन्द्रध्वज तथा मन्दराचलके समान ऊँचा था। उसे अङ्गदने सब राक्षसोंके देखते-देखते बड़े वेगसे कुम्भपर दे मारा॥ ५५ ॥

किंतु शरीरको विदीर्ण कर देनेवाले सात तीखे बाण मारकर कुम्भने उस सालवृक्षके टुकड़े-टुकड़े कर डाले, इससे अङ्गदको बड़ी व्यथा हुई। वे घायल तो थे ही, गिरे और मूर्च्छित हो गये॥ ५६ ॥

दुर्जय वीर अङ्गदको समुद्रमें डूबते हुए-के समान पृथ्वीपर पड़ा देख श्रेष्ठ वानरोंने श्रीरघुनाथजीको इसकी सूचना दी॥ ५७ ॥

श्रीरामने जब सुना कि वालिपुत्र अङ्गद महासमरमें मूर्च्छित होकर गिरे हैं, तब उन्होंने जाम्बवान् आदि प्रमुख वानरवीरोंको युद्धके लिये जानेकी आज्ञा दी॥ ५८ ॥

श्रीरामचन्द्रजीका आदेश सुनकर श्रेष्ठ वानर वीर अत्यन्त कुपित हो धनुष उठाये खड़े हुए कुम्भपर सब ओरसे टूट पड़े॥ ५९ ॥

वे सभी प्रमुख वानर अङ्गदकी रक्षा करना चाहते थे; अतः क्रोधसे लाल आँखें किये हाथोंमें वृक्ष और शिलाएँ लेकर उस राक्षसकी ओर दौड़े॥ ६० ॥

जाम्बवान्, सुषेण और वेगदर्शीने कुपित हो वीर कुम्भकर्णकुमारपर धावा किया॥ ६१ ॥

उन महाबली वानर-यूथपतियोंको आक्रमण करते देख कुम्भने अपने बाणसमूहोंद्वारा उन सबको उसी तरह रोक दिया, जैसे आगे बढ़ते हुए जल-प्रवाहको मार्गमें खड़ा हुआ पर्वत रोक देता है॥ ६२ ॥

उसके बाणोंके मार्गमें आनेपर वे महामनस्वी वानर-यूथपति आगे बढ़ना तो दूर रहा उसकी ओर आँख उठाकर देख भी नहीं पाते थे। ठीक उसी तरह, जैसे महासागर अपनी तटभूमिको लाँघकर आगे नहीं जा सकता था॥ ६३ ॥

उन सब वानरसमूहोंको कुम्भकी बाणवर्षासे पीड़ित देख वानरराज सुग्रीवने अपने भतीजे अङ्गदको पीछे करके स्वयं ही रणभूमिमें कुम्भकर्णकुमारपर उसी तरह धावा किया, जैसे पर्वतके शिखरपर विचरनेवाले हाथीके ऊपर वेगवान् सिंह आक्रमण करता है॥ ६४-६५ ॥

महाकपि सुग्रीव अश्वकर्ण आदि बड़े-बड़े वृक्ष तथा दूसरे भी नाना प्रकारके वृक्ष उखाड़कर उस राक्षसपर फेंकने लगे॥ ६६ ॥

वृक्षोंकी वह वर्षा आकाशको आच्छादित किये देती थी। उसे टालना अत्यन्त कठिन हो रहा था; किंतु श्रीमान् कुम्भकर्णने अपने तीखे बाणोंसे उन सब वृक्षोंको काट डाला॥ ६७ ॥

लक्ष्य बेधनेमें सफल, तीव्र वेगशाली कुम्भके पैने बाणोंसे व्याप्त हुए वे वृक्ष भयानक शतघ्नियोंके समान सुशोभित होते थे। उस वृक्ष-वृष्टिको कुम्भके द्वारा खण्डित हुईं देख महान् शक्तिशाली पराक्रमी वानरराज सुग्रीव व्यथित नहीं हुए॥ ६८ १/२ ॥

वे उसके बाणोंकी चोट खाते और सहते हुए सहसा उछलकर उसके रथपर चढ़ गये और कुम्भके इन्द्र-धनुषके समान तेजस्वी धनुषको छीनकर उन्होंने उसके टुकड़े-टुकड़े कर डाले। तत्पश्चात् वे शीघ्र ही वहाँसे नीचे कूद पड़े। यह दुष्कर कर्म करनेके पश्चात् उन्होंने टूटे दाँतवाले हाथीके समान कुम्भसे कुपित १२५ होकर कहा— ॥ ६९-७० १/२ ॥

‘निकुम्भके बड़े भाईं कुम्भ! तुम्हारा पराक्रम और तुम्हारे बाणोंका वेग अद्भुत है। राक्षसोंके प्रति विनय अथवा प्रवणता तथा प्रभाव या तो तुममें है या रावणमें। तुम प्रह्लाद, बलि, इन्द्र, कुबेर और वरुणके समान हो॥

‘केवल तुमने ही अपने अत्यन्त बलशाली पिताका अनुसरण किया है। जैसे जितेन्द्रिय पुरुषको मानसिक व्यथाएँ अभिभूत नहीं करती हैं, उसी प्रकार शत्रुओंका दमन करनेवाले एकमात्र शूलधारी तुझ महाबाहु वीरको ही देवतालोग युद्धमें परास्त नहीं कर पाते हैं। महामते! पराक्रम प्रकट करो और अब मेरे बलको भी देखो॥ ७३-७४ ॥

‘तुम्हारा पितृव्य रावण केवल वरदानके प्रभावसे देवताओं और दानवोंका वेग सहन करता है। तुम्हारा पिता कुम्भकर्ण अपने बल-पराक्रमसे देवताओं और असुरोंका सामना करता था (परंतु तुम वरदान और पराक्रम दोनोंसे सम्पन्न हो)॥ ७५ ॥

‘तुम धनुर्विद्यामें इन्द्रजित्के समान और प्रतापमें रावणके तुल्य हो। राक्षसोंके संसारमें अब बल और पराक्रमकी दृष्टिसे केवल तुम्हीं श्रेष्ठ हो॥ ७६ ॥

‘आज सब प्राणी रणभूमिमें इन्द्र और शम्बरासुरकी भाँति मेरे साथ तुम्हारे अद्भुत महायुद्धको देखें॥ ७७ ॥

‘तुमने वह पराक्रम किया है, जिसकी कहीं तुलना नहीं है। तुमने अपना अस्त्र-कौशल दिखा दिया। तुम्हारे साथ युद्ध करके ये भयंकर पराक्रमी वानर वीर धराशायी हो गये॥ ७८ ॥

‘वीर! अबतक जो मैंने तुम्हारा वध नहीं किया है, उसमें कारण है लोगोंके उपालम्भका भय—लोग यह कहकर मेरी निन्दा करते कि कुम्भ बहुत-से वीरोंके साथ युद्ध करके थक गया था, उस दशामें सुग्रीवने उसे मारा है; अतः अब तुम कुछ विश्राम कर लो, फिर मेरा बल देखो’॥ ७९ ॥

सुग्रीवके इस अपमानयुक्त वचनद्वारा सम्मानित हो घीकी आहुति पाये हुए अग्निदेवके समान कुम्भका तेज बढ़ गया॥ ८० ॥

फिर तो कुम्भने सुग्रीवको अपनी दोनों भुजाओंसे पकड़ लिया। तत्पश्चात् वे दोनों वीर मदमत्त गजराजोंकी भाँति बारंबार लंबी साँस खींचते हुए एक-दूसरेसे गुँथ गये। दोनों दोनोंको रगड़ने लगे और दोनों ही अपने मुखसे परिश्रमके कारण धूमयुक्त आगकी ज्वाला-सी उगलने लगे॥ ८१-८२ ॥

उन दोनोंके पैरोंके आघातसे धरती नीचेको धँसने लगी। झूमती हुई तरङ्गोंसे युक्त वरुणालय समुद्रमें ज्वार-सा आ गया॥ ८३ ॥

इतनेहीमें सुग्रीवने कुम्भको उठाकर बड़े वेगसे समुद्रके जलमें फेंक दिया। उसमें गिरते ही कुम्भको समुद्रका निचला तल देखना पड़ा॥ ८४ ॥

कुम्भके गिरनेसे बड़ी भारी जलराशि ऊपरको उठी, जो विन्ध्य और मन्दराचलके समान जान पड़ी और सब ओर फैल गयी॥ ८५ ॥

इसके बाद कुम्भ पुनः उछलकर बाहर आया और क्रोधपूर्वक सुग्रीवको पटककर उनकी छातीपर उसने वज्रके समान मुक्केसे प्रहार किया॥ ८६ ॥

इससे वानरराजका कवच टूट गया और छातीसे खून बहने लगा। उसका महान् वेगशाली मुक्का सुग्रीवकी हड्डियोंपर बड़े वेगसे लगा था॥ ८७ ॥

उसके वेगसे वहाँ बड़ी भारी ज्वाला जल उठी थी, मानो मेरु पर्वतके शिखरपर वज्रके आघातसे आग प्रकट हो गयी हो॥ ८८ ॥

कुम्भके द्वारा इस प्रकार आहत होनेपर वानरराज महाबली परम पराक्रमी सुग्रीवने भी अपना वज्रतुल्य मुक्का सँभाला और कुम्भकी छातीमें बलपूर्वक आघात किया। उस मुक्केका तेज सहस्रों किरणोंसे प्रकाशित सूर्यमण्डलके समान उद्दीप्त हो रहा था॥ ८९-९० ॥

उस प्रहारसे कुम्भको बड़ी पीड़ा हुई। वह व्याकुल हो बुझी हुई आगकी तरह गिर पड़ा॥ ९१ ॥

सुग्रीवके मुक्केकी चोट खाकर वह राक्षस आकाशसे अकस्मात् गिरनेवाले मंगलकी भाँति तत्काल धराशायी हो गया॥ ९२ ॥

मुक्केकी मारसे जिसका वक्षःस्थल चूर-चूर हो गया था, वह कुम्भ जब नीचे गिरने लगा, तब उसका रूप रुद्रदेवसे अभिभूत हुए सूर्यदेवके समान जान पड़ा॥ ९३ ॥

भयंकर पराक्रमी वानरराज सुग्रीवके द्वारा युद्धमें उस निशाचरके मारे जानेपर पर्वत और वनोंसहित सारी पृथ्वी काँपने लगी और राक्षसोंके हृदयमें अत्यन्त भय समा गया॥ ९४ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें छिहत्तरवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ७६ ॥


१. जिसका अग्रभाग नाईके छुरेके समान हो, उसे ‘क्षुर’ कहते हैं।
२. अर्द्धचन्द्राकार बाण।
३. पूर्णतः लोहेके बने हुए बाणका नाम ‘नाराच’ है। उसमें नीचेसे ऊपरतक सब-का-सब लोहा ही होता है।
४. बछड़ेके दाँतके समान जिसका अग्रभाग हो, उसे ‘वत्सदन्र्त’ कहा गया है।
५. जिसका मुखभाग कङ्क (वकविशेष)-की पाँखोंके समान हो, उस बाणको ‘शिलीमुख’ कहते हैं।
६. जिस बाणके दोनों पार्श्वभागोंमें कानका-सा आकार बना हो, वह ‘कर्णी’ कहलाता है।
७. जिसका फाल या अग्रभाग बड़ा हो, वह ‘शल्य’ है। किसी-किसीके मतमें आधे नाराजको ‘शल्य’ कहते हैं। ८. कनेरके पत्तेके अग्रभागके समान आकारवाले बाणका नाम ‘विपाठ’ है। (रामायणतिलकसे)

सतहत्तरवाँ सर्ग

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सतहत्तरवाँ सर्ग

हनुमान्‌के द्वारा निकुम्भका वध

सुग्रीवके द्वारा अपने भाई कुम्भको मारा गया देख निकुम्भने वानरराजकी ओर इस प्रकार देखा, मानो उन्हें अपने क्रोधसे दग्ध कर देगा॥ १ ॥

उस धीर-वीरने महेन्द्र पर्वतके शिखर-जैसा एक सुन्दर एवं विशाल परिघ हाथमें लिया, जो फूलोंकी लड़ियोंसे अलंकृत था और जिसमें पाँच-पाँच अंगुलके चौड़े लोहेके पत्र जड़े गये थे॥ २ ॥

उस परिघमें सोनेके पत्र भी जड़े थे और उसे हीरे तथा मूँगोंसे भी विभूषित किया गया था। वह परिघ यमदण्डके समान भयंकर तथा राक्षसोंके भयका नाश करनेवाला था॥ ३ ॥

उस इन्द्रध्वजके समान तेजस्वी परिघको घुमाता हुआ वह महातेजस्वी भयानक पराक्रमी राक्षस निकुम्भ मुँह फैलाकर जोर-जोरसे गर्जना करने लगा॥ ४ ॥

उसके वक्षःस्थलमें सोनेका पदक था। भुजाओंमें बाजूबंद शोभा देते थे। कानोंमें विचित्र कुण्डल झलमला रहे थे और गलेमें विचित्र माला जगमगा रही थी। इन सब आभूषणोंसे और उस परिघसे भी निकुम्भकी वैसी ही शोभा हो रही थी, जैसे विद्युत् और गर्जनासे युक्त मेघ इन्द्र-धनुषसे सुशोभित होता है॥ ५-६ ॥

उस महाकाय राक्षसके परिघके अग्रभागसे टकराकर प्रवह-आवह आदि सात महावायुओंकी संधि टूट-फूट गयी तथा वह भारी गड़गड़ाहटके साथ धूमरहित अग्निकी भाँति प्रज्वलित हो उठा॥ ७ ॥

निकुम्भके परिघ घुमानेसे विटपावती नगरी (अलकापुरी), गन्धर्वोंके उत्तम भवन, तारे, नक्षत्र, चन्द्रमा तथा बड़े-बड़े ग्रहोंके साथ समस्त आकाशमण्डल घूमता-सा प्रतीत होता था॥ ८ ॥

परिघ और आभूषण ही जिसकी प्रभा थे, क्रोध ही जिसके लिये ईंधनका काम कर रहा था, वह निकुम्भ नामक अग्नि प्रलयकालकी आगके समान उठी और अत्यन्त दुर्जय हो गयी॥ ९ ॥