शृंगार शतक
Shringar Shatak
भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा
स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)
( च )
( ११ ) स्त्री न होती, तो हिमालयके पवित्र स्थान छोड़ कर कौन अपना मान मर्दन कराता ? ... २१८
( १२ ) सुन्दरीके गालके तिलकी तारीफ ... २३६
( १३ ) स्त्रीके सामने होनेसे सुखी ; पर जुदाईसे अत्यन्त दुःखी पुरुष ... २४६
( १४ ) जवानीमें ही स्त्री सुन्दरी दीखती है ; बुढ़ापेमें तो परमा-सुन्दरी भी महा कुरुपा हो जाती है २७०
( १५ ) मैं पेड़ पर बैठ ही था, कि इतनेमें किसीने आकर बिड़कीके किवाड़ खटखटाये और धरिसे कहा—“कहणा ! किवाड़ खोल” ३१५
( १६ ) उसने कहणाको गोदमें उठा लिया और छाती से लगा लिया । उनकी आवाज़से मालूम होता था, मानो गाना हो रहा है । ... ३१६
( १७ ) कहणा बाहरकी तिदरीमें आकर खड़ी है, उसके सिरके बाल बिखर रहे हैं और धोती बिल्कुल खुली हुई है ... ३१७
( १८ ) मैंने चट्टाने गंडासा चौकीदारकी गर्दन पर मारा । वह सिरपर हाथ रखकर कुछ सोचने लगा ... ३१८
( १९ ) उसने एक टाटकी बोरीमें चौकीदारकी लाश रखी और कुदाल हाथमें लेकर श्मशानको चली । ... ३१९
( १ )
यद्यपि इस वर्ष मैंने अपने सिरसे प्रेसका भँकट हटा दिया है ; तथापि मेरे सिर पर कामोंका बड़ा बोझ रहता है, इससे जो काम दूसरा कोई अच्छे-से-अच्छा लेखक एक सालमें करेगा, बही मुझे, मजबूर होकर, २३ महिनोंमें ही, करना पड़ता है । फिर ; ऐसी भटापटीके काममें गलतियों और त्रुटियोंका रह जाना नितान्त सम्भव है । इसलिए, मैं विद्वानोंसे अत्यन्त विनीत भावसे क्षमा प्रार्थना करता हूँ । आशा है, कि उदारहृदय सज्जन मुझे क्षमा प्रदान करनेमें आना-कानो न करेंगे ।
इस शतकके अनुवादमें भी, मैंने श्रीमान् पण्डितवर ज्वाला-दत्त जी शर्मा, मुगदाबाद, के “महाकवि दाग” “ज्ञौक” और “गालिब” तथा बाबू रघुराजसिंहजी वी० ए०के “महाकवि-नजीर” से बहुत कुछ सहायता ली है ; अतः मैं उक्त दोनों उदार-हृदय सज्जनोंको हार्दिक धन्यवाद देता हूँ । स्माल काज कोर्ट, कलकत्ता, के वकील बाबू छोगमलजी चोपड़ा महोदयने मुझे, इस पुस्तकके अनुवादमें भी, मौक़े-मौक़े पर, बहुत कुछ सहायता दी है ; अतः मैं बाबू साहब मङ्गलका अतीव आभारी हूँ । वकील साहब बड़े ही विनम्र और सुशील सज्जन हैं । आपसे जिस समय जिस काममें सहायता माँगी जाती है, आप अपना हर्ज करके भी, फौरन साहाय्य प्रदान करते हैं ।
विनीत—
हरिदास ।
वर्तमान संस्करण पर वक्तव्य ।
मेरे जैसे अल्पक्षेपकका अनुवाद किया हुआ “भृङ्गार-शतक” भी जनताने उसी बाह से खुरीदा, जिस बाहसे कि उसने “नीति-शतक” और “वैराग्य-शतक” खुरीदे थे। पबलिककी क़दरानीसे ही, अभी इसी मासमें, “वैराग्य-शतक”का तीसरा और “भृङ्गार-शतक”का दूसरा संस्करण हुआ है। मेरे लिखे ग्रन्थोंको हिन्दी-भाषाभाषी इतने बावसे खुरीदते और पढ़ते हैं, इसका कारण मेरी विद्वत्ता या मेरी लेखन-शौलीकी उत्तमता नहीं, किन्तु दयामय रुग्णकी रूपा है।
इस आवृत्तिमें, मैंने “भृङ्गार-शतक”में बहुत कुछ फेरफार किया है। अनेकों बातें बढ़ा दी हैं, तभी तो यह ग्रन्थ २६३ सफोंसे ४२१ सफों पर जा पहुँचा है। चित्र भी दूने कर दिये गये हैं। पहले २५ चित्र थे, अब प्रायः २६ हैं। कागज़ भी पहलेसे बहुत बढ़िया लगाया है। इतने पर भी मूल्य नहीं बढ़ाया, वही पहलेका मूल्य रक्खा है। आशा है, जगदीशकी क्यासे, क़दरदाँ पबलिक “भृङ्गार-शतक”के इस संस्करणको पहलेसे बहुत ज़ियादा पसन्द करेगी।
इस संस्करणमें भी, मैंने बाबू रघुराज किशोर बी० ए० के “महा-कवि अकबर” और परिडित ज्वालादत्तजी शर्माके “मौलाना हाली” से जहाँ-तहाँ मदद ली है, अतएव मैं उन दोनों सज्जनोंका आभारी हूँ।
विनीत—
हरिदास ।
( ३ )
लीन थे। वहीँ वनमें मृत्युलोक-वासिनी चन्द्र सुगलोचनी परम सुन्दरी युवतियाँ, अपनी रूपच्छटासे वनको प्रकाशमान करती हुई, कौड़ा कर रही थीं। उनके अपूर्व रूप-लावण्यको देख कर, शिवजीका शान्त मन अशान्त हो गया—उनके भोगनेके लिये मचल पड़ा। शिवजी, सारा शम-दम भूल, कामके वश हो, उनके पीछे दौड़े। आप अपनी शक्तिसे उन्हें आकाशमें ले गये और उनसे भोग-विलास करने लगे। पीछे गिरिजा महारानीको जब आपकी करतूत मालूम हुई, तो उन्होंने क्रोध में भर खियोंको तो नीचे पटक और मोले भण्डारीको डांट-डपटक केलशमें लाई और ऊँच-नीच समझाकर फिर समाधिमें लगाया।
कई बार आपने चार मुँहवाले, स्तुष्टिके रचयिता, ब्रह्माको भी अपने जालमें फँसा लिया। सुनते हैं, विधाताने एक बार तो अपना निज पुत्री तकके पीछे दौड़कर अपनी घोर बदनामी कराई। इसके सिवा, एक बार ब्रह्माजी शान्तनु नामक ऋषिके पास किसी कामसे गये। उन ऋषिकी खो अमोघा अनुपम सुन्दरी थी; पर थी पतिव्रता। उस समय ऋषि घर पर न थे। अमोघाने आपके बैठनेके लिये एक आसन बिछा दिया और पूछा—“भगवन् आप किस लिये पंघारे हैं?” विधाताने कहा—“कुछ ज़रूरी काम है, पर उहाँसे कहूँगा।” ये बातें करते-करते ही आपका मन अमोघा भर मचल गया। आपको कामदेवने ऐसा व्याकुल किया कि, आपका……वहीँ आसन
:
( ४ )
पर निकल गया। आप शर्मिन्दा होकर चुपचाप चले आये। जरा देर बाद ही शान्तनु ऋषि भी आ गये। उन्होंने आसनको देखकर सारा हाल पूछा। अमोघाने सारा वृत्तान्त ज्योंका त्यों निवेदन कर दिया। सुनते ही ऋषि बोले—“धन्य कामदेव ! तुम्हारी शक्ति-सामर्थ्य की सीमा नहीं, जो तुमने जगत्के रचयितां ब्रह्माजीको भी मोहित कर दिया।”
सुरपति और गौतमनारी अहिल्याकी बातको कौन नहीं जानता? अहिल्या परमा सुन्दरी थी। देवराजका मन उस पर चल गया। आपने उससे मिलनेके बहुत कुछ दाँव-पेच लगाये, पर वह हाथ न आयी। तब आपने एक दिन तीन बार वजे रातको वहाँ जानेका विचार स्थिर किया; क्योंकि उस समय ऋषि गङ्गास्नानको चले जाते थे। आपने चन्द्रमाको साथ लिया; अतः चन्द्रमाने मुर्गा बनकर द्वार पर कुकड् कुँ कुकड् कुँ करना आरम्भ किया। ऋषि समझे कि, अब रातका अवसान हो चला। वे उठकर नहाने चले गये। देवराज उनका रूप धर घरमें घुस गये और बातें बनावकर मनमानी की। इतने में ऋषि भी स्नान करके आ गये। उन्होंने इन्हें और अहिल्या दोनोंको आप दिया। अहिल्या पत्थर की हो गई और इन्द्रके शरीरमें भग-ही-भग हो गई।
पुराणोंमें ऐसी-ऐसी अनेक कथाएँ भरी पड़ी हैं। हमने, नमूनेके तौर पर, तीन-चार यहाँ लिख दी हैं। किसीने ठीक ही कहा है:—
( ५ )
कामेन विजितो ब्रह्मा, कामेन विजितो हरिः ।
कामेन विजितः शम्भु, शक्रः कामेन निजितः ॥
अर्थात् कामदेवने ब्रह्मा, विष्णु, महेश और सुरेश—इन चारोंको जीत लिया। जब भगवान् कामदेवने ऐसों-ऐसोंको हो अपने वशमें करके, मनमाने नाच नवाये, तब और किस की कही जाय ? सार्रांश यह, भगवान् कामदेव सबसे अधिक बलवान् हैं ; इसीसे कवि महोदय, सब देवताओंको छोड़ भगवान् कामदेवको ही नमस्कार करते हैं।
पाश्चात्य विद्वानोंमेंसे एक गोथे नामक महापुरुष कहते हैं :—Cupid is even a rogue, and whoever trusts him is deceived.” कामदेव सदा छल करता है, जो उसका विश्वास करता है, वह धोखा खाता है। कोई कुछ कहे, हम तो यही कहेंगे कि, खूबसूरतोंमें बड़ी क्षमता है। खूबसूरती पुरुष को अपनी ओर उसी तरह खींचती है ; जिस तरह चुम्बक पत्थर लोहेको खींचता है। पोप महोदयने कहा भी है—“Beauty draws us with a single hair.” सुन्दरता एक बालके द्वारा भी हमको अपनी ओर खींच सकती है। चेनिंग महोदय भी कहते हैं—“Beauty is an all-pervading presence.” सौन्दर्य की सर्वत्र सत्ता है। मतलब यह है, कि पुरुष सौन्दर्य का दास है। जिसमें भी, बकौल लाबेल महाशयके “Earth’s noblest thing, a women perfected.” साध्वी की संसारका सर्वोत्तम पदार्थ है ; अतः ऐसे
( ६ )
सर्वोत्तम पदार्थसे प्रेम करना और प्रेमवश उसको गुलामी करना, कोई बुरी बात भी नहीं है। हाँ, प्रेम-क्षेत्रके बाहरकी गुलामी बेशक बुरी है; क्योंकि जे० जी० हाटैण्ड महोदय कहते हैं :—“Duty, especially out of the domain of love, is the veriest slavery in the world.” प्रेम-क्षेत्रके बाहर जो कर्तव्य किये जाते हैं, वे धृणितसे भी धृणित गुलामीसे भी बुरे हैं। तात्पर्य यह है कि, अपनी सती-साध्वी स्त्री या माशूकाकी गुलामीमें दोष नहीं; बशर्तेकि, वह सच्ची पतिव्रता हो। सती स्त्री अपने पतिकी आज्ञापालन करके, उसे हर तरह से सन्तुष्ट करके, उस पर अपना प्रभाव—रॉब जमा लेती है। लेबर महोदय कहते हैं “A chaste wife acquires an influence over her husband by obeying him.”
साध्वी स्त्री अपने पतिकी आज्ञापालन कर, उस पर अपना प्रभाव जमा लेती है। जब एक दूसरेकी हर तरहसे स्नातिर करता है; उसको प्यारकी नज़रसे देखता हुआ, उसके लिये अपना तन-मन न्यौछावर करता है; तो दूसरा ऐसा कौन होगा, जो बदला चुकानेमें घाटा रक्खेगा? बस, हमारे विष्णु भगवान् जो लक्ष्मीके घरका काम-धन्धा करते हैं और शिवजी गिरिजाराानीकी सेवकाई करते हैं, उसमें दोष ही क्या है? क्योंकि लक्ष्मी और पार्वती दोनों ही रूप, यौवन और लावण्य की ज्ञान, प्रथम श्रेणीकी प्रतिपरायणा और तन-मनसे पतितेवा करनेवाली हैं। अब रही उनकी बात; जो पराई खूबमूरत
( ७ )
रमणियोंका दासत्व स्वीकार करते हैं। उनके दासत्वमें सच्चा प्रेम और पवित्रता नहीं, केवल सौन्दर्यका प्रभाव है। सौन्दर्य अपने दर्शकोंको मंदिराकी तरह मतवाला कर देता है और वे उसी नशेके वश हो, अपने होश-हवास खो, अपनी माशूकाओंकी गुलामी करने लगते हैं। कामदेव स्त्रियोंका चाकर है, वह जिसे अपना शिकार चुनती हैं, जिसे अपने अधीन करनेकी आज्ञा देती है, वह उसीको अपने पुष्पागुच्छसे क्राबूमें करके, अपनी स्वामिनियोंके हवाले कर देता है। कामदेव ही नहीं, स्वयं परमात्मा स्त्रियोंकी इच्छानुसार चलता है। अंगरेज़ीमें एक कहावत है :—“What woman wills, God wills.” जो स्त्री चाहती है, वही परमात्मा चाहता है। स्त्री और परमात्मा की एक ही इच्छा है।
दोहा ।
विधि हरि हरहु करत हैं, मृगनेनी की सेव ।
वचन अगोचर चरित गति, नमो कुसुमसर देव ॥१॥
सार—कामदेवने त्रिलोकीको स्त्रियोंका गुलाम बना रक्खा है।
1. I bow to that Lord Kamdeva ( Cupid ) who has flowers for his weapon, whose wonderful actions are beyond the power of speech and by whom Shambhu, the self-born ( Brahma ) and Hari have been rendered constant servants of the deer-eyed women to discharge their house-hold duties.
( ८ )
स्मितेन भावेन च लज्जया भिया ।
प्राङ्मुखैरुर्ध्वकटाक्षीनीक्षणैः ॥
वचोभिरिष्यांकलहेन लीलया ।
समस्तभावेः खलु बन्धनं स्त्रियः ॥२॥
‘मन्द-मन्द मुस्कराना, लजाना, भयभीत होना, मुँह फेर लेना, तिरछी नज़रसे देखना, मीठी-मीठी बातें करना, ईर्षा करना, कलह करना और अनेक तरहके हाव-भाव दिवाना,—ये सब स्त्रियोंमें पुरुषोंके बन्धनमें फँसानेके लिये ही होते हैं, इसमें सन्देह नहीं ॥२॥
स्त्रियोंमें हाव-भाव या नाज़-नख़रे स्वभावसे ही पैदा हो जाते हैं। ये हाव-भाव या नाज़-नख़रे पुरुषोंके मोहित करने या बन्धनमें बाँधनेके लिये उनके ब्रह्माक्ष हैं। पुरुष उनकी रूपच्छटाकी अपेक्षा उनके हाव-भावों पर जल्दी मुग्ध होता है। उनके हाव-भाव उसके दिल पर नक्काश हो जाते हैं। उन्हें वह दिन-रात याद किया करता है। पुरुषको वशीभूत करने के लिये, स्त्रियाँ उसको देखकर, होठोंमें हँसतीं या मुस्कराती हैं; कभी परले सिरकी लाज करती हैं और कभी बेहयाई; कभी किसीसे डरनेका सा नाट्य करती हैं; कभी उसकी ओर नज़र भर देखती हैं और कभी देखकर मुँह फेर लेती हैं; कभी तिरछी नज़रसे देखती हैं और कभी उसको अच्छी तरहसे देख या घूरकर भटसे घूँघट कर लेती हैं; कभी किसी बहानेसे घूँघटको हटाकर अपना चन्द्रानन उसे फिर दिखा देती हैं और
( ६ )
फिर शीघ्र ही वृद्ध कर लेती है ; कभी चलती-चलती राहमें उहर कर, अपने पैरका जेवर बिछुआ प्रभुति ठीक करने लगती है। कभी कहती हैं—“तुम उस स्त्रीके यहाँ क्यों गये ? मैं तुमसे न बोलूँगी।” पुरुष बोलना चाहता है तो कहती हैं—“वहीं जाओ, मुझसे क्या काम है ? वह बड़ी सुन्दरी है, मैं उसके मुकाबलेमें किस कामकी हूँ ?” इत्यादि। पुरुष यदि चूमना चाहता है, तो एक अजीब आन-बान और अदाके साथ उसके मुँहके पाससे अपना मुँह हटा लेती है। अगर वह स्तनों पर हाथ डालता है, तो एक अजीब अदासे उसके हाथको भटक देती है, जिससे बुरा भी न मालूम हो और पुरुष उल्टा मर मिटे। अगर पुरुष किसी दूसरीके यहाँ चढ़ा जाता है या उससे और कोई अपराध हो जाता है, तो भट आँखोंमें आँसू भर लाती है। उन आँसूओंमें कामियोंको जो मज़ा आता है,* उसे लिखकर बता नहीं सकते। बातें करतो हैं, तो निहायत मीठी-मीठी और ऐसी रस-चुली कि, पुरुष उनकी बातों पर ही कुर्बान हो जाता है। कहाँ तक लिखें, स्त्रियोंमें जवानीके समय अनन्त हाव-भाव आप ही पैदा हो जाते हैं। ये उन्हें कोई सिखाने नहीं जाता। जेवर-स्त्रियोंके रूपको हजार गुणा बढ़ा देते हैं, तो नखरे उसे लाख गुणा बढ़ा देते हैं।
- Beauty's tears are lovelier than her smiles :—Campbell. चन्द्री के आँसू उसकी मुसक्यान की अपेक्षा प्यारे लगते हैं।
( १० )
एकबार इतिहास-प्रसिद्ध लोक-विमोहिनी नूरजहाँ,* बचपन में, अपनी माँ के साथ, बादशाही महलों में गई। उस समय नूरजहाँ को मेहरुन्निसा कहते थे। जहाँगीर † भी लड़का हो था। उसे उन दिनों सलीम कहते थे। सलीमको कबूतर उड़ाने का शौक था। शाहज़ादे के हाथ में दो कबूतर थे। वह उन्हें किसी को पकड़ा, और कबूतर दरवे से निकालना चाहता था। पास ही मेहर खड़ी थी। शाहज़ादेने कहा—“मेहर! ज़रा हमारे कबूतरोंको तो अपने हाथोंमें पकड़े रहो।” मेहरने कहा—“बहुत अच्छा, लाइये।” शाहज़ादेने मेहरको कबूतर थमा दिये और आप आगे दरवे की ओर चला गया। इतनेमें एक कबूतर किसी तरह मेहरुन्निसाके हाथसे उड़ गया। शाहज़ादेने आकर पूछा—“हमारा एक कबूतर कहाँ?” मेहरने कहा—“वह तो उड़ गया।” शाहज़ादेने पूछा—“कैसे उड़ गया?” मेहरने उस समय भोली-भाली, पर एक अजीब अदाके साथ हाथका दूसरा कबूतर भी छोड़ते हुए कहा—“शाहज़ादे! ऐसे उड़ गया!” शाहज़ादेका दिल आजके पहले मेहरुन्निसा पर नहीं था; पर इस वक्तकी एक अदाने शाहज़ादेको मेहरुन्निसा का गुलाम बना दिया। आज पीछे वह मेहरको जन्म-भर न भुला। उसने मेहरुन्निसाको अपनी बीवी बनानेके लिये
‡ नूरजहाँ—संसारको प्रकाशित करने वाली ज्योति। सुगल-सम्राट जहाँगीरकी मथहूर वेगमका नाम है।
† जहाँगीर=विश्वविजयी; भारतका एक, सम्राट।
( ११ )
बड़ी कोशिशें कीं, पर उसे कामयाबी न हुई ; क्योंकि बादशाह एक मामूली सरदारकी लड़कीसे हिन्दुस्तानके शाहजहादीकी शादी करना उचित न समझते थे । उन्होंने भगड़ा मिटानेको मेहरकी शादी शेर अफ़ग़ानके साथ कर दी । सलीमका वश न चला ; पर वह मेहरको भूला नहीं । जब वह तख़्तेशाही पर बैठा, उसने मेहरको बंगालसे मँगवा कर, उसके कोमल क़दमोंमें अपना अपना ताज़शाही रख दिया और सदाको उसका गुलाम होना क़बूल किया । देखा पाठक ! खीके एक नज़रने क्या काम किया ?
हम स्त्रियोंके हाव-भाव और नाज़ो-अदाओं पर भर मिटने वालों के चन्द नमूने नीचे देते हैं । एक साहब फरमाते हैं :—
मैं तो उसी भिक्क पै फिदा हूँ, कि कानको ।
शब क्या हटा लिया, मेरे लाकर दहनके पास ॥जौँक॥
मुझे उनका वह हाव कितना अच्छा मालूम हुआ कि, उन्होंने अपने कानको मेरे मुँह के पास लाकर हटा लिया । इस अदा पर मैं फिदा हो गया ।
और भो :—
ऐ जौँक, मैं तो बैठ गया, दिलको थाम कर ।
इस नाज़से खड़े थे वह, रक्खे कमर पै हाथ ॥जौँक॥
जिस अन्दाज़से वंद कमर पर हाथ रक्खे खड़े थे—जौँक !
( १२ )
मैं तो उन्हें देखकर दिल थामकर बैठ गया ; नहीं तो दिल चला ही था ।
महाकवि नज़ीरने नाज़नियोंकी चुलबुलाहटका सीधी-सादी भाषामें कैसा चटकीला चित्र खींचा है । ज़रा उसकी भी वाशनी देखिये :—
ये राह चलने की चुलबुलाहट,
कि दिल कहीं है, नज़र कहीं है ।
कहँ का ऊँचा, कहँ का नीचा,
ख़याल किसको, क़दम की जाका ।
लड़ाये आँखें, वो बेहिजाबी,
कि फिर पलकसे पलक न मारे ।
नज़र जो नीचे करे तो गया,
खुला सरापा चमन हया का ।
ये चन्चलाहट ये चुलबुलाहट,
ख़बर न सरकी, न तनकी सुध-सुध ।
जो चौरा बिखरा, बलासे बिखरा,
न बन्द वँधा, कर्मु क़वाका ।
मैंने एक छोटी उम्रकी नाज़नी देखी, वह अपनी राह-राह चली जाती थी ; पर उसके चलनेमें गुज़बकी चुलबुलाहट थी । उसका दिल कहीं था और उसकी आँखें कहीं थीं । उसे ऊँचे-
( १३ )
नीचे स्थानों तकका झयाल न था। यह भी ध्यान नहीं था कि, पैर कहाँ पड़ते हैं।
वह वेहया जब आँखें लड़ाती थी, तो इस तरह लड़ाती थी कि, पलक-से-पलक न लगाती थी और अगर नज़रको नीची करती थी, तो ऐसा मालूम होता था, मानों हवा और शर्मका चमन ही खुल गया है।
उसमें ऐसी चञ्चलाहट और चुलचुलाहट थी, कि न उसे अपने सर को खबर थी और न शरीरको सुध-बुध थी। सिर से ओढ़नी उतर गई है तो उतर गई, परवा नहीं। कुरती का बन्द खुला पड़ा है, तो खुला ही पड़ा है। *
दोहा।
रसमें ल्यौही रोषमें, दरशत सहज अनूप।
बोलिन चलनि चितौनियें, बनिता बन्धन रूप ॥२॥
सार—स्त्री हर हालतमें मददको प्यारी
ॐ यों तो चञ्चलता और चुलचुलाहट उठती जवानोंको सभी खियोंमें होती है ; पर ऐसी चुलचुलाहट, जिसका मज़ेदार चित्र मियों नज़रिने खींचा है, कुल-बुछ्रोंमें नहीं देखी जाती और वह भी राहमें। हाँ, ऐसी चुल-चुलाहट कुल-बुछ्रोंमें भी देखी जाती है, पर शोढ़ी हो जानेके दो-चार बरस बाद और अपने घरमें—अपने पतिके सामने ; जब कि उनकी लज्जा-शर्ममें और हंकोच-भय प्रभुति दूर हो जाते हैं। हमारी समझमें, यह चित्र किसी कमलिन वारङ्गनाका है।
( १४ )
लगती है । उसका बोलना चालना और देखना प्रभृति प्रत्येक कोम पुरुषको बन्धनमें बाँधता है ।
2. Gentle smile, emotions, bashfulness, timidity, the turning of face, the side-long casting of glances, speech, jealousy, quarrel and gesture ( —these ) are the various qualities by which the women become the chains for men.
श्रूचातुर्याकुञ्चित्ताचाः कटाचाः ।
सिन्ध्या वाचो लज्जिताश्चैव हासाः ॥
लीलामन्दं च स्थितं प्रस्थितं च ।
स्त्रीणांमेतद्भूषणं चायुधं च ॥३॥
चतुराईसे भौंह फेरना, आधी आँखसे कटाक्ष करना, मधु जैसी मोठी-मीठी बातें करना, लज्जाके साथ मुस्कराना, लीलासे मन्द-मन्द चलना और फिर ठहर जाना प्रभृति भाव स्त्रियोंके आभूषण और शस्त्र हैं ॥३॥
स्त्रियाँ कभी अपनी कमान सी भौंहोंको टेढ़ी करती हैं, कभी आँखें चलाती हैं, कभी लज्जाका भाव दिखाती हुई मन्द-मन्द मुस्कराती हैं, कभी शरीर तोड़ती हैं, कभी अंगड़ाई लेती हैं, कभी उंगलियाँ चटखाती हैं, कभी उभक-उभककर देखती हैं, और कभी मुँह फेरकर दूसरी ओर देखने लगती हैं, जिससे पुरुष समझे कि यह मेरी ओर नहीं देखती, कभी घूँघट मार
( १५ )
लेती हैं और कभी उसे खोल देती हैं—ये सब स्त्रियाँ क्यों करती हैं ? केवल अपना सौन्दर्य बढ़ाने और पुरुषोंको अपने ऊपर फिदा करके, उनसे मनमाने नाच नचवानेके लिये । पुरुषोंको अपने अधीन करनेके लिये, अबलाओंके पास तलवार, बन्दूक या वाण नहीं होते । उनको ईश्वर ने ये ही अमोघ अस्त्र दिये हैं । बन्दूक, तलवार और मैशिनगन जो काम नहीं कर सकती, वह काम ये अस्त्र करते हैं । किसीसे भी पराजित न होने वाले और बड़े-बड़े शूरवीर योद्धाओंको बात-की-बातमें धरा-शायी करने वाले बहादुर स्त्रियोंके अस्त्रोंकी मारसे, अपने होश-हवास खोकर, इनके दास बन जाते हैं ।
छप्पय ।
करत चातुरी भौह, नयनहू नचत चितैवो ।
प्रगटत चित्तको चाव, चावसों मृदु सुसकैवो ।
दुरत सुरत सकुचात, गात अरसात जम्हावत ।
उभक्तत इत उत देख, चलत ठिकत छविछावत ।
ए आभूषण तियनके, अंगमाहि शोभा धरन ।
अर येही सब-समानहैं, पुरुष-प्रन-मृग वस करन ॥३॥
सार—स्त्रियोंके हाव-भाव पुरुषोंके मारने के लिये अस्त्र और उनका सौन्दर्य बढ़ानेके लिए आभूषण हैं ।
( १६ )
3. The skilfulness in turning the brows, the casting of oblique glances, sweet talk, smiling with shyness, walking slowly by gestures and stopping at intervals ( these ) are the ornaments as well as the weapons for women.
कचित्सुभ्रभंगैः कचिदपि च लज्जापरिणेतैः कचिद्वातिवस्तैः कचिदपि च लीलाविलसितैः ॥ नवोदानाभैर्भिवदनकमलैर्नैत्रचलितैः
स्फुरन्नीलाञ्जानां प्रकरपरिपूर्णा इव दिशः ॥४॥
कामी पुरुषोंको, कभी सुन्दर भौंहोंसे कटाक्ष करने वाली, कभी शर्मसे सिर नीचा कर लेने वाली, कभी भयसे भीत होने वाली, कभी लीलामय विलास करने वाली, नवीन व्याही हुई कामिनियोंके मुखकमलोंकी खूबसूरती बढाने वाले नीलकमलोंके समान चञ्चल नेत्रोंसे दशों दिशाएँ पूर्ण दीखती हैं ॥४॥
हालकी व्याहो हुई नवबधुओंमें कमान सी भौंहों से कटाक्ष करना, कभी लाजके मारे सिर नीचा कर लेना, कभी भयसे भीत होना, कभी अन्य प्रकारके नखरे करना—ये सब स्वभाव से ही होते हैं । प्रथम तो इस उद्वेगमें सुन्दरता आप ही बढ़ जाती है ; फिर उनके नखरे और नीलकमलसे चञ्चल नेत्र उनकी खूबसूरतीको और भी बढ़ा देते हैं । कामी पुरुषोंको, जिनके मनमें इनके चञ्चल नेत्र अपना घर कर लेते हैं—हर ओर,
( १७ )
इनके चञ्चल नेत्र ही नेत्र दिखाई देते हैं ; अर्थात् उनका मन इनके नीलकमलवत् सुन्दर नेत्रोंमें ही जा बसता है । जिसमें जिसका दिल जा बसता है, उसे वही-वह दीखता है । वृ॒क्ति कामियोंकी आँखोंमें कमसिन अल्पवयस्का नवविवाहिता कामिनियाँ समा जाती हैं ; अतः उन्हें हर ओर, जहाँ तक उनकी दृष्टि जाती है, वही-वह दिखाई देती हैं ।
किसी ऐसी ही उठती जवानीकी कम-उम्र परीकी लुब-सुरती का चित्र महाकवि नज़ीरने क्या ही कारीगरीसे खींचा है :—
पलकों की रूपक, पुतली की फिरत, सुरमे की लगावट वैसी ही । ऐयार नजर, मक्कार अदा, त्योरी की चढ़ावट वैसी ही ॥१॥ वह अँखियाँ मस्त नशीली सौं, कुछ काली सौं, कुछ पीली सौं । चितवन की दगा, नज़रोंकी कपट, सीनोंकी लड़ावट वैसी ही ॥२॥ वह रात अँधेरी बालों सी, वह मँग चमकती बिजली सी । ज़ूलकों की खुलत, पड़ी की जमत, चोटी की गुँवावट वैसी ही ॥३॥ वह छोटी-छोटी सख्त कुँचै, वह कच्चे-कच्चे सेव गजब । अँगिया की भड़क, गोठोंकी चमक, बन्दों की कसावट वैसी ही ॥४॥ वह चन्द्रचल चाल जवानी की, ऊँची ऐड़ी नीचे पन्ने । कफ़शों की खटक, दामनकी भटक, ठोकरकी लगावट वैसी ही ॥५॥ कुछ हाथ हिलें, कुछ पाँव हिलें, फड़कें बाजू थिरकै सब तन । गाली वो बला, ताली वो सिद्धाम, उँगली की नचावट वैसी ही ॥६॥
२
( १८ )
चञ्चल अचपल, मटके चटके, सर खोले टैंके हँस-हँस के । क्रुह क्रुह की हँसावट और गुज्रव, ठठों की उड़ावट बेसी ही ॥७॥ हर वक्त फुन हर आन सजै, दम-दम में बदलै लाख सजै । बाहों की रूपक, घुँघट की अदा, जोबनकी दिखावट बेसी ही ॥८॥
पाठक ! मनचले पाठक ! आप ही बिचारिये, इस आनवान और खूबसूरती वालीकी कौन भूल सकता है ? जो इन स्त्री- रत्नों की कद्र जानने वाले हैं, उनकी नज़रोंसे इनके नीलकमल को आभा रखने वाले नीलमसे नेत्र कभी उतर ही नहीं सकते । उन्हें तो हर ओर नीलम या नील-कमल ही नील-कमल फूले दीखते हैं और वे मन-ही-मन उनकी अनुपम छटा को याद कर- करके प्रसन्न होते हैं ।
छप्पय ।
कबहुँ भौहको भंग, कबहुँ लज्जायुत दरसत ।
कबहुँक ससकत संकि, कबहुँ लीलारस बरषत ।
कबहुँक मुख मृदुहास, कबहुँ हित बचन उषारत ।
कबहुँक लोचन फेर, चपल चहुँ ओर निहारत ।
छिन-छिन सुचरित्र विचित्र करि, भरे कमल जिमि दशहुँदिशि ।
ऐसी अनूप नारी निरख, हरषत रहिये दिवस-निशि ॥४॥
सार—जिस तरह ब्रह्मज्ञानियोंको हर ओर ब्रह्म ही ब्रह्म दीखता है ; उसी तरह कामियों
( १६ )
को हर और नववधुओं के नीलकमलके समान चंचल नेत्र ही नेत्र दोखते हैं । जिसकी आँखों में जा समा जाता है, उसे वही वह दीखता है ।
4. What with the turning of her beautiful brows, what with her gentle bashfulness, what with her fearfulness and what with her playful gestures, the face of a young woman, having moving eyes with all the above qualifications, appears like a lotus ( with black bees hovering on it ).
वक्त्रं चन्द्रविकासि पङ्कजपरीहासत्वे लोचने वर्णः स्वर्णमपाकरिण्युरलिनीजिष्णुः कचानाञ्चयः ॥ वच्चोजाविभक्तुम्भसंश्रमहरीं गुर्वो नितम्बस्थली वाचो हारि च मार्दवं युवतिषु स्वाभाविकं मंडनम् ॥५॥
चन्द्रमाके समान प्रकाशमान मुख, कमलकी मसखरी करनेवाले दोनों नेत्र, सुवर्णकी दमकको फीकी करनेवाली शरीरकी कान्ति, मौरीके पुञ्जको जीतनेवाले केश, गजराजके गण्डस्थलकी शोभाका अपमान करनेवाली दोनों छातियाँ, विशाल नितम्ब—चूतड़, मनोहर वाणी और कोमलता—नजाकत—ये सब स्त्रियोंके स्वाभाविक भूषण हैं ॥५॥
खुलासा—चन्द्रमाके समान पुष्क, कमलको लजाने वाले नेत्र, कनककी आभाको मूढी करने वाली देहकी कान्ति, मौरी