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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

महर्षि शुक्राचार्य द्वारा

स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

( १२ )

कौटिल्य चार विद्याओं को मानते हैं—आन्वीक्षिकी,^१ त्रयी (ऋग्, यजुः, साम) वार्त्ता तथा दण्ड-नीति। कामन्दक^२ तथा महाभारत^३ के आधार पर भी यह मत प्रमाणित है। मानव-सम्प्रदाय के अनुसार त्रयी,^४ वार्त्ता तथा दण्ड-नीति ये तीन ही विद्याएँ हैं। इस परम्परा का संकेत रामायण^५ में भी मिलता है। वृहस्पति-सम्प्रदाय का कथन है कि केवल दो ही विद्याएँ हैं वार्त्ता तथा^६ दण्ड-नीति। परन्तु शुक्राचार्य के अनुसार एक ही^७ विद्या है—दण्ड-नीति। (यह दण्ड-नीति नीति-विद्या का ही पर्याय है—यह बात आगे बतलाई जायगी।) इस सम्प्रदाय का कहना है कि दण्ड-नीति के बिना किसी भी विद्या की सुरक्षा नहीं हो सकती है। अतः सभी विद्याओं में प्रधान यही है। यह विद्या स्वतः पूर्ण है जब कि अन्यान्य विद्याएँ अपूर्ण अर्थात् आंशिक^८ हैं। यही कारण है कि चार विद्याओं के समर्थक कौटिल्य ने भी इसे सर्वोच्च स्थान^९ दिया है। छान्दोग्य उपनिषद् में प्रयुक्त 'एकायन' शब्द की व्याख्या शंकराचार्य ने की है—एकायनम्^१० = नीति-शास्त्रम्। इस एकायन शब्द से भी यही सिद्ध होता है कि यह नीति-विद्या सभी विद्याओं में श्रेष्ठ है। महाभारत आदि ग्रन्थों में इसी कारण से इस विद्या की भूयो-भूयः प्रशंसा की गई है। अतः यह स्पष्ट है कि नीति-विद्या सभी विद्याओं का मूल अतएव सर्व-श्रेष्ठ विद्या है।


१. आन्वीक्षिकी त्रयी वार्त्ता दण्ड-नीतिश्चेति......चतस्रः एव विद्याः इति कौटिल्यः। अ० शा०, पृ० १० (चौखम्बा)
२. आन्वीक्षिकी त्रयी वार्त्ता दण्ड-नीतिश्च शाश्वती।
विद्याश्चतस्र एवैताः लोक-संस्थिति-हेतवः ॥ का० नी० २।२ ॥
३. चातुर्विद्यञ्च कीर्तितम्—म० भा० (शान्ति-पर्व) ५१।४० ॥
४. त्रयी वार्त्ता दण्ड-नीतिश्चेति मानवाः। अ० शा०, पृ० १० ॥
५. विद्याः तिस्रश्च राघव। वाल्मीकि रामायण (अयो०का०) १००।६८ ॥
६. वार्त्ता दण्ड-नीतिश्चेति बार्हस्पत्याः। अ० शा०, पृ० १० ॥
७. दण्ड-नीतिरेका विद्या इत्यौशनसाः। तस्यां हि सर्व-विद्यारम्भाः प्रतिबद्धाः। अर्थ-शास्त्र, पृ० १० ॥
८. क्रियैक-देश-बोधीनि शास्त्राण्यन्यानि सन्ति हि।
सर्वोपजीवकं लोक-स्थितिकृन्नीति-शास्त्रकम्।
धर्मार्थ-काम-मूलं हि स्मृतं मोक्ष-प्रदं यतः ॥ शु० नी० सा० १।४-५ ॥
९. तस्यामायत्ता लोक-यात्रा। अ० शा०, पृ० १६ ॥
१०. छा० उ० ७।१।२ पर शा० भा० ॥

( १३ )

नीति-विद्या तथा इसके पर्याय

'नीति' शब्द प्रापण के अर्थ में प्रयुज्यमान नी (णीञ् प्रापणे) धातु से 'स्त्रियां क्तिन्' प्रत्यय के द्वारा व्युत्पन्न होता है। अतः इसका अर्थ है 'प्रापण'। परन्तु प्रापण एक सकर्मक क्रिया है अतः इसकी पूर्णता के लिए संक्षेप में चार तत्त्वों की आवश्यकता है—कर्त्ता, कर्म, अपादान तथा स्वयम् क्रिया। साथ ही प्रापण एक प्रेरणार्थक क्रिया है अतः इसके दो कर्म होंगे, एक तो अप्रेरणावस्था का कर्त्ता (प्रयोज्य कर्त्ता) तथा एक अप्रेरणावस्था का कर्म। एवञ्च 'नीति' शब्द का स्पष्ट अर्थ है एक मार्ग (अपादान कारक) से किसी व्यक्ति-विशेष (अप्रेरणावस्था का कर्त्ता तथा प्रापण-क्रिया का कर्म) को दूसरे मार्ग (अप्रेरणावस्था तथा प्रेरणावस्था का कर्म) पर ले जाना या पहुंचाना। पहुंचाने वाला (अर्थात् इस क्रिया का कर्त्ता) कौन हो सकता है इसका विवेचन आगे किया जायगा। यह तो विचार करने पर स्पष्ट ही हो जाता है कि यदि कोई व्यक्ति उचित मार्ग पर स्वयम् बर्त्तमान है तो उसे दूसरे मार्ग पर ले जाना निरर्थक है। मार्गान्तर पर ले जाने की आवश्यकता तो तब होती है यदि कोई व्यक्ति मार्ग-च्युत, अर्थात् अनुचित मार्ग, पर हो। अत एव यह सिद्ध है कि अनुचित मार्ग से किसी व्यक्ति को उचित मार्ग पर ले आने की क्रिया ही परमार्थतः 'नीति' है। अत एव यह कहा गया है—

'नयनात्' नीतिरुच्यते' ॥

अब हमें यह देखना चाहिए कि इस नीति का कर्त्ता या स्वाभाविक अधिकारी कौन है। नीति-विद्या के अद्वितीय परिष्कारक भीष्म का कथन है कि चातुर्वर्ण्य के धर्म के विप्लव का प्रतिरोध राजा का ही कर्त्तव्य है।$^२$ 'राजनीति-प्रकाश' में उद्धृत 'मत्स्य-पुराण' के कथन से यह अर्थ और भी$^३$ स्पष्टतर हो जाता है। महर्षि याज्ञवल्क्य$^४$ का भी यही मत है। अन्यान्य


१. शु० नी० सा० १।५६ ॥
२. चातुर्वर्ण्यस्य धर्माश्च रक्षितव्या महीक्षिता ।
धर्म-सङ्कर-रक्षा च राज्ञां धर्मः सनातनः ॥ म० भा० (शा० प०) ५७।१५ ॥
३. स्वे स्वे धर्मे व्यवस्थानम् वर्णानां पृथिवीपतेः ।
परो धर्मः सदा प्रोक्तः तत्र यत्नपरो भवेत् ॥
स्वं-धर्म-प्रच्युतान् राजा स्वे स्वे धर्मे नियोजयेत् ।
व्यवस्थानम् = व्यवस्थापनम् । रा० नी० प्र०, पृ० १२१ (चौखम्बा) ॥
४. कुलानि जातीः श्रेणीश्च गणान् जानपदानपि ।
स्व-धर्मात् चलितान् राजा विनीय स्थापयेत्पथि ॥ या०स्मृ० १।३६१ ॥

( १४ )

ग्रन्थों में भी इसी का समर्थन किया गया है। अतः यह स्पष्ट है कि प्रापणार्थक नीति का कर्त्ता है (प्रधानतः) राजा।

उपर्युक्त विवरण से यह सिद्ध होता है कि यतः राजा का ही यह 'नीति' कर्त्तव्य है अतः इस 'नीति' को 'राज-नीति' या 'राज-धर्म' भी कहा जा सकता है। इस प्रसङ्ग में 'धर्म' शब्द का अर्थ है 'कर्त्तव्य'¹।

यहाँ यह भी विचारणीय है कि 'नीति' शब्द के अर्थ के प्रसङ्ग में कहे गए अनुचित मार्ग में अनौचित्य का क्या अर्थ है। एक अनुचित तो वह है जो जिसके लिए विहित नहीं है पर अन्य के लिए विहित है। उदाहरणार्थ, हम तपस्या को ले सकते हैं। यह बहुत ही प्रशस्त आचरण है परन्तु शूद्र के लिए अनुचित है। दूसरे प्रकार का अनुचित उसे कहा जा सकता है जो सर्वथा प्रतिषिद्ध है, जैसे—चौर्य, परदाराभिगमन आदि। अनुचित मार्ग के अनुसरण के भी साधारणतः दो कारण होते हैं—अज्ञान तथा आसक्ति। सज्जन तथा दुर्जन दोनों ही कुमार्ग का अवलम्बन कर सकते हैं पर दोनों के अवलम्बन के आधार भिन्न-भिन्न होते हैं। सज्जन के अनुचित मार्गावलम्बन का आधार है 'अज्ञान' जब कि दुर्जन के प्रसङ्ग में यह आधार है 'आसक्ति'। यदि 'आसक्ति' से किसी भी व्यक्ति की प्रवृत्ति अनुचित मार्ग पर होती है तो उसे सज्जन कथमपि नहीं कहा जा सकता है और इसी तरह यदि 'अज्ञान' से किसी की प्रवृत्ति अनुचित मार्ग की ओर हो जाती है तो उस प्रवृत्ति के आधार पर उसे दुर्जन भी नहीं कहा जा सकता। संक्षेप में अनौचित्य का विवरण यही है।

उपर्युक्त अनौचित्य के अवरोध के लिए राजा को उपायों का आश्रयण करना पड़ता है। मनु,² याज्ञवल्क्य³ आदि के अनुसार ये उपाय चार हैं—साम, दान, भेद तथा दण्ड। मत्स्य-पुराण⁴ के अनुसार इन चार उपायों के अतिरिक्त भी तीन उपाय हैं—उपेक्षा, माया तथा इन्द्रजाल। यद्यपि ये उपाय प्रधानतः शत्रु-राजाओं के वशीकरण के लिए उपयोगी बतलाए गये हैं तथापि


१. धर्म-शब्दश्च कर्त्तव्यता-वचनः—मेधातिथि,
धर्म-शब्दोऽत्र दृष्टाऽदृष्टार्थानुष्ठेय-परः—कुल्लूकभट्ट । म० स्मृ० ७।१ ॥
२. सामादीनामुपायानां चतुर्णाम्—म० स्मृ० ७।१०९ ॥
३. उपायाः साम दानं च भेदो दण्डस्तथैव च ॥ या० स्मृ० १।३४६ ॥
४. साम भेदः तथा दानम् दण्डश्च मनुजेश्वर ।
उपेक्षा च तथा माया इन्द्रजालं तथैव च ॥ म० पु० २२१।२ ॥

( १५ )

व्यवहार-निर्वाह के लिए भी इनका महत्त्व¹ साधारण नहीं है। वस्तुतः यदि शत्रु का अर्थ अपकारक है तो अपकारक व्यक्ति-मात्र—चाहे वह पर राजा हो या अपना पुत्र—शत्रु है। अतः अपकारक व्यक्ति-मात्र के लिए इन उपायों का यथा-योग्य प्रयोग आवश्यक तथा उचित है।

उपर्युक्त उपायों में भी व्यवस्था बनी हुई है। सब के लिए सभी उपायों का प्रयोग उचित नहीं है। अपराध तथा अपराधी आदि के अनुसार तत्तत् उपाय का प्रयोग करना होता है। इस प्रसङ्ग में इतना तो सरलता से ही अवगमनीय है कि यदि कोई सज्जन अज्ञान-वश कुमार्ग या मार्गान्तर पर आश्रित है तो उसे साम² मात्र से उचित मार्ग पर लाया जा सकता है। इसी प्रकार दान तथा भेद के प्रयोग का भी यथावसर प्रयोग विहित है। परन्तु आसक्ति-पूर्वक अनुचिताचरण करने वाले दुष्ट को सन्मार्ग पर साम आदि उपायों से नहीं³ लाया जा सकता है, उसके लिए तो एक-मात्र समर्थोपाय है 'दण्ड' । यह तथ्य दण्ड-शब्द के अर्थ⁴ पर ध्यान देने से भी स्पष्ट हो जाता है। हाँ, इतना तो आवश्यक है कि दण्ड-प्रयोग में अत्यन्त विवेक होना चाहिए। अनुचित, अर्थात् तीक्ष्ण, दण्ड से प्रजा में आतङ्क⁵ फैल जाता है और इससे


१. एते सामादयः न केवलं राज्य-व्यवहार-विषयाः अपितु सकल-लोक-व्यवहार-विषयाः। मिताक्षरा, या० स्मृ० १।३४६ ॥ २. तत्र साधुः प्रयत्नेन साम-साध्यो नरोत्तम ॥ मत्स्य-पुराण २२१।४ ॥ ३. साम्ना यद्यपि रक्षांसि गृह्णन्तीति परा श्रुतिः । तथाप्येतदसाधूनाम् प्रयुक्तं नोपकारकम् ॥ म० पु० २२१।८ ॥ ४. यदि ते तु न तिष्ठेयुः उपायैः प्रथमैः त्रिभिः । दण्डेनैव प्रसह्यैतान् शनकैः वशमानयेत् ॥ म० स्मृ० ७।१०८ ॥ दण्डः पूज्य-प्रहीणके—शु० नी० सा० ४।३५ ॥ न शक्या ये वशे कर्तुमुपायत्रितयेन तु। दण्डेन तान् वशीकुर्यात् दण्डो हि वशकृन्नृणाम् ॥ म० पु० २२४।१ ॥ ५. दण्डो दमनादित्याहुः तेनादान्तान्दमयेत् । गौतम-धर्म-शास्त्र ११।१२८ ॥ यस्माददान्तान्दमयत्यशिष्टान्दण्डयत्यपि । दमनाद्दण्डनाच्चैव तस्माद्दण्डं विदुर्बुधाः ॥ म० भा० (शा० प०) १५।८ ॥ यस्माद्दण्डो दमयति अदण्ड्यान् दण्डयत्यपि । दमनाद्दण्डषनाच्चैव तस्माद्दण्डं विदुर्बुधाः ॥ मत्स्य-पुराण २२४।१७ ॥ ६. तीक्ष्ण-दण्डो हि भूतानामुद्वेजनीयः......दुष्प्रणीतः कामक्रोधाभ्यामज्ञानात् वानप्रस्थ-परिव्राजकानपि कोपयति किमङ्ग पुनर्गृहस्थान् । अ० शा०, पृ० १६ ( चौखम्बा ) ॥

( १६ )

राज्य का मूल शिथिल होने लग जाता है। परन्तु यह समझना चाहिए कि कोई भी दण्ड स्वभावतः तीक्ष्ण या उचित नहीं होता। अपराध तथा देश-काल आदि के साथ सामञ्जस्य रखने वाला कोई भी दण्ड उचित कहला सकता है और इसके विपरीत होने पर अनुचित या तीक्ष्ण। जैसे—एक हत्यारे के लिए प्राण-दण्ड को तीक्ष्ण नहीं कहा जा सकता पर यदि एक साधारण चोर को वही दण्ड दिया जाय तो वह अवश्य ही तीक्ष्ण-दण्ड कहलाएगा। अतः राजा को दण्ड-प्रयोग के प्रसङ्ग में अत्यन्त विवेक-पूर्ण होना चाहिए। यद्यपि शुक्र-नीति-सार में यत्र-तत्र¹ अपने राज्य में दण्ड के प्रयोग का प्रतिषेध किया गया है तथापि उसका तात्पर्य अनुचित दण्ड के प्रतिषेध तथा उपायान्तर के सार्थक होने पर दण्ड के प्रतिषेध से है। जहाँ तक उचित दण्ड का प्रश्न है उसका क्षेत्र संकुचित नहीं है। चाहे मित्र हो या शत्रु, अपराध के अनुसार नियमतः दण्ड-भागी होता है। अत एव महाभारत² तथा मनु-स्मृति आदि ग्रन्थों में प्रजा-मात्र के प्रति दण्ड का अनुविधान किया गया है। दण्ड के क्षेत्र का निर्देश हमारे महाकवि भारवि के निम्न-लिखित श्लोक में बहुत ही स्पष्ट रूप में किया गया है :—

वसूनि वाञ्छन्न वशी न मन्युना स्व-धर्म इत्येव निवृत्त-कारणः।
गुरुपदिष्टेन रिपौ सुतेऽपि वा निहन्ति दण्डेन स धर्म-विप्लवम् ॥³


समीक्ष्य सं धृतः सम्यक् सर्वाः रञ्जयति प्रजाः।
असमीक्ष्य प्रणीतस्तु विनाशयति सर्वतः ॥ म० स्मृ० ७।१९ ॥
त्रिवर्गं वर्धयत्याशु राज्ञो दण्डो यथा-विधि।
प्रणीतोऽन्याञ्ज (र) मञ्जस्यात् वनस्थानपि कोपयेत् ॥ का० नी० २।३७ ॥

१. स्व-प्रजानां न भेदेन नैव दण्डेन पालनम्।
कुर्वीत साम-दानाभ्याम् सर्वदा यत्नमास्थितः ॥
स्व-प्रजा-दण्ड-भेदैश्च भवेद्राज्य-विनाशनम्।
स्व-प्रजा-दण्डनाच्छ्रेयः कथं राज्ञो भविष्यति ॥
— शु० नी० सा० ४।३८, ३९, ५२ ॥

२. दण्डः शास्ति प्रजाः सर्वाः दण्ड एवाभिरक्षति।
दण्डः सुप्तेषु जागर्ति दण्डं धर्मं विदुर्बुधाः ॥
— म० भा० (शा० प०) १५।२; मत्स्य-पुराण २२४।१४-१५; तथा म० स्मृ० ७।१८ ॥
स्व-देशे पर-देशे वा धर्म-शास्त्र-विशारदान्।
समीक्ष्य प्रणयेद्दण्डं सर्वं दण्डे प्रतिष्ठितम् ॥ मत्स्य-पुराण २२४।४ ॥

३. किराताजुर्नीय—१।१३ ॥

( १७ )

किसी स्मृत्यन्तर के प्रामाण्य के आधार पर विज्ञानेश्वर¹ ने माता, पिता, स्नातक, पुरोहित, परिव्राजक तथा वानप्रस्थ को दण्ड के क्षेत्र से बहिर्भूत माना है। परन्तु उस स्मृत्यन्तर में ‘श्रुत-शील-शौचाचारवन्तः’ इस हेतु-गर्भ विशेषण से और मनु² आदि के कथन से यह सिद्ध होता है कि उपर्युक्त विशेषण से हीन होने पर महान् अपराधी कोई भी व्यक्ति दण्डनीय हो सकता है—चाहे वह स्नातक हो या परिव्राजक। वस्तुतः यदि उक्त विशेषण से सम्पन्न कोई अन्य व्यक्ति भी होगा तो उसे दण्ड देने का प्रश्न ही नहीं उठता है। इस प्रसंग में माता पिता आदि को साधारण अपराध का दण्ड नहीं देना चाहिए—इतना माना जा सकता है।

हाँ, इस प्रसङ्ग में इतना तो विचारणीय है ही कि शत्रु राजा के विषय में दण्ड-प्रयोग की कटुता का औचित्य कहाँ तक है। विष्णुधर्मोत्तर³ में वर्णित ‘स्व-विषय-दण्ड’ तथा ‘पर-विषय-दण्ड’ की विधि में स्पष्ट तारतम्य दीख पड़ता है। अन्यत्र⁴ भी शत्रु-विषयक-दण्ड की तीक्ष्णता बतलाई गई है। सम्भवतः


१. एतच्च माता-पित्रादि-व्यतिरेकेण। तथा च स्मृत्यन्तरम्—"अदण्ड्यौ माता-पितरौ स्नातक-पुरोहित-परिव्राजक-वानप्रस्थाः श्रुत-शील-शौचाचारवन्तः ते हि धर्माधिकारिणः" इति। मिताक्षरा १।३५८।

२. पिताऽऽचार्यः सुहृन्माता भार्या पुत्रः पुरोहितः।
नादण्ड्यो नाम राज्ञोऽस्ति यः स्वधर्मे न तिष्ठति॥ म० स्मृ० ८।३३५॥
ब्रह्मचारी गृहस्थश्च वानप्रस्थश्च भिक्षुकः।
दण्डस्यैव भयादेते मनुष्याः वर्त्मनि स्थिताः॥
महाभारत (शा० प०) १५।१२॥
गुरोरप्यवलिप्तस्य कार्याकार्यमजानतः।
उत्पथ-प्रतिपन्नस्य कार्यं भवति शासनम्॥ शु० नी० सा० ४।४७॥
अपि भ्राता सुतोऽप्यो वा श्वशुरो मातुलोजपि वा।
नादण्ड्यो नाम राज्ञोऽस्ति धर्माद्विचलितः स्वकात्॥
या० स्मृ० १।३५८॥
आश्रमी यदि वा वर्णी पूज्यो वाप्य गुरुर्महान्।
नादण्ड्यो नाम राज्ञोऽस्ति यः स्वधर्मे न तिष्ठति॥
मत्स्य-पुराण—२२४।५॥

३. रा० नी० प्र०, पृ० २९६—३०४॥
४. भृश-दण्डश्च शत्रुपु—म० स्मृ० ७।३२;
रिपोः प्रजानां सम्भेदः पीडनं स्व-जयाय वै॥ शु० नी० सा० ४।३६॥

२ शु० मू०

( १८ )

मानव-स्वभावगत द्वेष आदि के कारण हुए वैषम्य का ही यथावत् वर्णन शास्त्रों में किया गया है ?

उपर्युक्त चार प्रधान उपायों में भी मनु¹ के अनुसार 'साम' तथा 'दण्ड' प्रधान हैं। कुल्लूकभट्ट का कहना है कि² धन-सैन्यादि-प्रक्षय-हीन होने के कारण साम प्रशस्त है और दण्ड में धनादि-क्षय होने पर भी फलाधिक्य है अतः दण्ड भी प्रशस्त है। परन्तु कुल्लूकभट्ट के फलातिशय से यह संकेत मिलता है कि दण्ड ही प्रशस्ततर है क्योंकि प्रवृत्ति में उत्कर्ष फलोत्कर्ष-प्रयुक्त ही होना चाहिए। अत एव स्वयम् मनु ने भी अन्यत्र³ दण्ड को ही सर्वाधिक महत्त्व दिया है। इसके विपरीत मत्स्य-पुराण⁴ का कथन है कि 'दान' ही सर्वोत्कृष्ट उपाय है। परन्तु यह बहुत उचित नहीं प्रतीत होता है। मेरी दृष्टि से राजनीति से सम्बद्ध 'दान' में उत्कोच ( Bribe ) का भी समावेश है, यह यज्ञादि-गत विशुद्ध दान नहीं है। दूसरी बात यह है कि दान का क्षेत्र संकुचित है जब कि दण्ड का क्षेत्र असंकुचित। अतः दान की अपेक्षा राजनीति में दण्ड का महत्त्व अधिक है। अत एव स्वयम् मत्स्य-पुराण⁵ ने भी अन्य उपायों के असामर्थ्य में दण्ड के सामर्थ्य का उल्लेख किया है। महाभारत⁶ में भी


१. सामादीनामुपायानां चतुर्णामपि पण्डिताः ।
साम-दण्डौ प्रशंसन्ति नित्यं राष्ट्राभिवृद्धये ॥ म० स्मृ० ७।१०९ ॥
२. साम्नि प्रयास-धन-व्यय-सैन्य-प्रक्षयादि-दोषाभावात् दण्डे तु तत्सद्भावेऽपि कार्य-सिद्धयतिशयात् ॥ कुल्लूकभट्ट—म० स्मृ० ७।१०९ ॥
३. स राजा पुरुषो दण्डः स नेता शासिता च सः ।
चतुर्णामाश्रमाणां च धर्मस्य प्रतिभूः स्मृतः ॥ म० स्मृ० ७।१७ ॥
सर्वो दण्ड-जितो लोको दुर्लभो हि शुचिर्नरः ।
दण्डस्य हि भयात्सर्वम् जगद् भोगाय कल्पते ॥ म० स्मृ० ७।२२ ॥
दण्डे वैनयिकी क्रिया—म० स्मृ० ७।६५ इत्यादि ।
४ सर्वेषामप्युपायानां दानं श्रेष्ठ-तमं मतम् ।
सुदत्तेनेह भवति दानेनोभय-लोकजित् । म० पु० २२३।१ ॥
इस प्रसङ्ग में यह सम्पूर्ण अध्याय द्रष्टव्य है।
५. न शक्या ये वशे कर्तुम् उपाय-त्रितयेन तु ।
दण्डेन तान् वशीकुर्यात् दण्डो हि वशकृन्नृणाम् ॥ वही २२४।१ ॥
म० पु० का यह २२४ अध्याय दण्ड की प्रशंसा में ही पर्यवसन्न है।
६. समस्त पञ्चदश अध्याय (शान्ति-पर्व) दण्ड-प्रशंसा में ही लिखा गया है तथा अन्यत्र भी दण्ड की अत्यधिक प्रशंसा मिलती है।

( १६ )

दण्ड का अत्यधिक माहात्म्य बतलाया गया है। अतः सभी उपायों में दण्ड श्रेष्ठ है।

उपर्युक्त दण्ड-प्राधान्य की दृष्टि से ही इस 'नीति' को 'दण्ड-नीति' (दण्डेन नीतिः) कहा जाता है।

नीति को दण्ड-नीति कहने का दूसरा आधार यह है कि दण्ड-शब्द उपाय-विशेष-वाचक होने के साथ-साथ उपाय-सामान्य का¹ भी वाचक है। अतः 'नीति' के साधन सामादि को दण्ड कहा जा सकता है और उससे साध्य, नीति, को 'दण्ड-नीति' (दण्डेन नीतिः) कहा जा सकता है।

अथवा उपाय तथा उपेय-नीति में अभेदोपचार के आधार पर भी 'नीति' को दण्ड-नीति (दण्ड एव नीतिः) कहा जा सकता है।

चतुर्थ दृष्टि यह है कि दण्ड-प्रयोजक राजा भी² औपचारिक रूप में दण्ड-पद-वाच्य हो सकता है इस लिए राजा की नीति को दण्ड-नीति (दण्डस्य = राज्ञः नीतिः) कहा जा सकता है।

इस प्रसंग में यह ज्ञातव्य है कि कुछ आचार्यों की दृष्टि में 'नीति' शब्द का अर्थ सन्मार्ग-प्रापण नहीं है अपितु दण्ड-प्रापण। अतः नीति शब्द दण्ड-नीति का ही लुप्त-पूर्वपद रूप है। इस मत में दण्ड-नीति शब्द में षष्ठी-तत्पुरुष समास है। सम्भवतः आचार्य कौटिल्य³ का समर्थन इसी पक्ष को मिलता है। यह दण्ड-नीति हमारे दण्ड के स्थान में ही आता है।⁴ परन्तु दण्ड एक


१. येन सन्दम्यते जन्तुः उपायो दण्ड एव सः ॥ शु० नी० सा० ४।४० ॥
अथवा दण्ड-शब्दोऽत्र दमन-मात्र-वृत्तिः स्व-पर-पक्षदमनोपायाऽशेष-सामाद्युपग्राही द्रष्टव्यः । का० नी० सा० जय-मङ्गला—पृ० ५२ (पूना)

२. दमो दण्ड इति ख्यातः तात्स्थ्याद्दण्डो महीपतिः ।
तस्य नीतिर्दण्ड-नीतिः—का० नी० सा० २।१२ ॥
दमो दण्ड इति ख्यातस्तस्माद्दण्डो महीपतिः ।
तस्य नीतिर्दण्ड-नीतिर्नयनान्नीतिरुच्यते ॥ शु० नी० सा० १।५६ ॥
स राजा पुरुषो दण्डः—म० स्मृ० ७।१७ ॥
दण्डः शास्ति प्रजाः सर्वाः—म० भा० (शान्ति-पर्व) १५।२ ॥

३. आन्वीक्षिकी-त्रयी-वार्तानां योग-क्षेम-साधनो दण्डः, तस्य नीतिः ।
अ० शा०, पृ० १५ ॥

४. दण्ड-नीतिः स्वधर्मेभ्यश्चातुर्वर्ण्यं नियच्छति ।
म० भा० (शा० प०) ६९।७६ ॥
यहाँ दण्ड-नीति शब्द शास्त्र का वाचक नहीं है।

( २० )

उपाय है, अतः उसे या उसके प्रापण को राजा का साक्षात् कर्त्तव्य नहीं माना जा सकता। राजा का कर्त्तव्य तो है 'स्व-स्व-'धर्म-प्रापण' ( सन्मार्ग-प्रापण ) ही, उसके उपाय के रूप में दण्ड का प्रापण भले ही आता हो। अतः इस अर्थ को अभिव्यक्त करने वाले 'दण्ड-नीति' शब्द को 'नीति' ( सन्मार्ग-प्रापण ) का पर्याय नहीं माना जा सकता। साध्य-साधन में अभेदोपचार के आधार पर कहना तो प्रकारान्तर है।

अस्तु, प्रकृत 'नीति' ( सन्मार्ग-प्रापण ) का उद्देश्य है 'अभ्युदय'। किन्तु आत्माभ्युदय तब तक सर्वाङ्गीण नहीं हो पाता है जब तक पर का अवसाद न हो जाय। इसलिए पर-विनाश-पूर्वक आत्माभ्युदय को 'नीति' का लक्ष्य माना जा सकता है।

इस सन्दर्भ में महाकवि माघ का निम्न-लिखित कथन द्रष्टव्य है— आत्मोदयः परग्लानिः द्वयं नीतिरितीयती।$^१$ तदूरीकृत्य कृतिभिः वाचस्पत्यं प्रतायते ॥

अतः यह सिद्ध होता है कि दण्ड अथवा दण्डनीति ( दण्ड-प्रापण ) से 'नीति' ( सन्मार्ग-प्रापण ) और 'नीति' से 'अभ्युदय' होता है। अतः अभ्युदय को दण्ड या दण्ड-नीति ( दण्ड-प्रापण ) का भी फल कहा जा सकता है। अत एव सन्मार्गावलम्बन के द्वारा आत्माभ्युदय के प्रसाधक किसी भी तत्त्व को औपचारिक रूप में दण्ड या दण्ड-नीति ( दण्ड-प्रापण ) माना जा सकता है।

उपर्युक्त आत्माभ्युदय के भी दो रूप हैं—ऐहलौकिक तथा पारलौकिक। ऐहलौकिक अभ्युदय पारलौकिक अभ्युदय की भूमिका है। अत एव उचित रीति के द्वारा ऐहलौकिक अभ्युदय—अर्थागम—के प्रयोजक 'वार्ता' को भी उपचारतः दण्ड-नीति ( दण्ड-प्रापण ) और संक्षेप में 'नीति' कहा जा सकता


१. कुलानि जातीः श्रेणीश्च गणान् जानपदानपि। स्व-धर्मात् प्रच्युतान् राजा विनीय स्थापयेत् पथि॥ या० स्मृ० १।३६१॥

स्वेषु धर्मेष्ववस्थाप्य प्रजाः सर्वा महीपतिः। म० भा० ( शा०प० ) ६०।१०॥ इसके स्पष्टी-करण के लिए उद्धरण सं० १७ भी द्रष्टव्य है।

२. शिशुपाल-वध—२।३०॥

तुलना कीजिए— नृपस्य परमो धर्मः प्रजानां परिपालनम्। दुष्ट-निग्रहणं नित्यं न नीत्या ते विना ह्युभे ॥ शु० नी० सा० १।१४॥

( २१ )

है । इसी लिए याज्ञवल्क्य ने वार्त्ता¹—पशुपाल्य, वाणिज्य आदि—के लिए 'नीति' शब्द का प्रयोग किया है। इसी से यह भी सिद्ध है कि वार्त्ता के फल को हम दण्ड-नीति (दण्ड-प्रापण) का भी फल कह सकते हैं। इस स्थिति के ध्यान से हमें कौटिल्य के द्वारा 'रक्षित-सम्वर्धन' के दण्ड-नीति-फल-प्रसङ्ग में सन्निवेश का अर्थ लग जाता है।

अर्थ-शास्त्र में दण्ड-नीति (दण्ड-प्रापण) के चार प्रयोजन बतलाए गए हैं—'अलब्ध-लाभ, लब्ध-परिरक्षण, रक्षित-सम्वर्धन तथा सम्वर्धित सम्पत्ति का पात्र में समर्पण। उचित दण्ड-प्रयोग से मूर्त्त धन-धान्यादि तथा अमूर्त्त यश की सम्प्राप्ति होती है। अतः प्रथम फल तो दण्ड-नीति (दण्ड-प्रापण) का ही है। द्वितीय फल—लब्ध-परिरक्षण—भी दण्ड-प्रापण का ही फल है—यह भी सत्य है। अत एव महाकवि कालिदास का भी कथन है :—

यस्मिन् महीं शासति वाणिनीनां निद्रां विहारार्ध-पथे गतानाम् ।
वातोऽपि नास्रंसयदंशुकानि को लम्भयेदाहरणाय हस्तम्³ ॥

अतः प्रथम दो को तो हम असन्दिग्ध रूप में दण्ड-नीति (दण्ड-प्रापण) का फल⁴ मान सकते हैं। यद्यपि ये दोनों फल भी 'नीति' (सन्मार्ग-प्रापण) के ही हैं तथापि औपचारिक रूप में इन्हें दण्ड-नीति (दण्ड-प्रापण) के फल कहे गए हैं। ये दोनों ही तत्त्व—अलब्ध-लाभ तथा लब्ध-परिरक्षण—ऐहलौकिक अभ्युदय तो हैं ही, यदि इन्हें पारलौकिक अभ्युदय भी मान लिया जाय तो कोई अनुचित न होगा। अत एव गीता में भगवान् श्रीकृष्ण की उक्ति है—

अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते ।
तेषां नित्याभियुक्तानां योग-क्षेमं वहाम्यहम् ॥⁵

तृतीय फल है तो 'वार्त्ता' का परन्तु पूर्व-निर्देशानुसार इसका भी दण्ड-नीति (दण्ड-प्रापण) के फल के अन्तर्गत निर्देश किया गया है। चतुर्थ-फल का


१. पालितं वर्धयेन्नीत्या—या० स्मृ० १।३१७ ॥
नीत्या = वणिज्यादिकया—मिताक्षरा ।
तुलना कीजिए—
रक्षितं वर्धयेद्वृद्ध्या—म० स्मृ० ७।१०१ ॥
२. अलब्ध-लाभार्था लब्ध-परिरक्षणी रक्षित-विवर्धनी वृद्धस्य तीर्थेषु प्रतिपादनी च ॥ अर्थ-शास्त्र, पृ० १५ ।
३. रघुवंश—६।७५ ॥
४. दण्ड-नीत्याम् = अर्थ-योग-क्षेमोपयोगिन्याम् । मिता० या० स्मृ० १।३११ ।
५. गीता—९।२२ ।

( २२ )

सम्बन्ध इस दण्ड-नीति ( दण्ड-प्रापण ) से जोड़ना कुछ अधिक अस्पष्ट है। अतः कौटिल्य का फलनिर्देश बहुत उचित नहीं प्रतीत होता है। प्रायः इसी लिए महाभारत¹ मनुस्मृति² तथा याज्ञवल्क्य³ स्मृति आदि में दण्ड-नीति (दण्ड-प्रापण) के दो ही फल—अलब्ध-लाभ तथा लब्ध-संरक्षण—बतलाए गए हैं। दण्ड में प्रयास⁴ का भी समावेश है, अतएव मनुस्मृति तथा याज्ञवल्क्य स्मृति में द्वितीय फल के प्रसंग में क्रमशः 'अवेक्षया' तथा 'यत्नेन' जोड़ दिया गया है। परन्तु है तो यह दण्ड-नीति ( दण्ड-प्रापण ) का ही फल।

इस 'नीति' (सन्मार्ग-प्रापण) का एक और नामान्तर है 'अर्थ⁵-विद्या'। इसकी पुष्टि इस तथ्य से भी होती है कि इस दण्ड-नीति-शास्त्र को अर्थ-शास्त्र⁶ भी कहा गया है, जिसकी चर्चा आगे की जाएगी। इसके अतिरिक्त 'नय'⁷ शब्द का भी प्रयोग 'नीति-विद्या' के अर्थ में होता है।

उपर्युक्त कथन के आधार पर यह सिद्ध है कि इस नीति-विद्या के नामान्तर हैं :—राज-नीति, राज-धर्म, राज-विद्या, दण्ड-नीति (दण्डेन-नीतिः अथवा दण्डस्य=राज्ञः नीतिः), अर्थ-विद्या तथा नय। इसी आधार पर इस विद्या के प्रतिपादक ग्रन्थों के नाम हैं :—नीति-शास्त्र, राज-नीति-शास्त्र, राज-धर्म-शास्त्र (राज-धर्मानुशासन), राज-शास्त्र, दण्ड-नीति, दण्ड-नीति-शास्त्र, अर्थ-शास्त्र एवम् नय-शास्त्र। इनमें से हम दण्ड-नीति अर्थ-शास्त्र तथा राज-शास्त्र इन नामकरणों का संक्षिप्त विवेचन प्रस्तुत कर रहे हैं :—


१. दण्ड-नीतिं पुरस्कृत्य विजानन् क्षत्रियः सदा । अनवाप्तं च लिप्सेत लब्धं च परिपालयेत् ॥ म० भा० (शा० प०) ६९।१०३ ॥

२. अलब्धमीहेद्दण्डेन लब्धं रक्षेद्बवेक्षया । रक्षितं वर्धयेद्वृद्ध्या वृद्धं पात्रेषु निक्षिपेत् ॥ म० स्मृ० ७।१०१ ॥

३. अलब्धमीहेद्धर्मेण लब्धं यत्नेन पालयेत् । पालितं वर्धयेन्नीत्या वृद्धं पात्रेषु निक्षिपेत् ॥ या० स्मृ० १।३१७ ॥

४. साम्नि प्रयास-धन-व्यय-सैन्य-प्रक्षयादि-दोषाभावात् दण्डे तु तत्सद्भावेऽपि कार्य-सिद्धयतिशयात् ॥ कुल्लूक भट्ट, म० स्मृ० ७।१०९ ॥

५. महाभारत (द्रोण-पर्व) ६।१ ॥

६. आन्वीक्षिकी दण्ड-नीतिः तर्क-विद्यार्थशास्त्रयोः ॥ अमर-कोश (शब्दादि वर्ग)

७. रघुवंश-४।१०, किरातार्जुनीय-१।७, ९ आदि।

( २३ )

(क) दण्ड-नीति—इस प्रसंग में नीति शब्द का अर्थ सन्मार्ग-प्रापण या दण्ड-प्रापण नहीं है अपितु प्रख्यापन अथवा¹ उपदेश। जिनकी दृष्टि से दण्ड-नीति में प्रयुक्त नीति शब्द प्रापण (दण्ड-प्रापण) अर्थ का अभिधायक है उनके मत में इस शास्त्र का नाम होना चाहिए—दण्ड-नीति-शास्त्र।

(ख) अर्थशास्त्र—हम पहले देख चुके हैं कि दण्ड या दण्ड-नीति के दो फल हैं—अलब्ध-लाभ तथा लब्ध-संरक्षण। अर्थ-शास्त्र के भी ये ही दो फल बतलाए² गए हैं। अतएव दण्ड-नीति (नीति-शास्त्र) को अर्थ-शास्त्र कहा जाता है। यद्यपि नीति-शास्त्र तथा अर्थ-शास्त्र के पर्यायत्व का स्पष्ट संकेत शुक्र-नीति-सार में नहीं है तथापि इसमें किए गए विद्या-परिगणन³ में नीति-शास्त्र के पृथक् अनुल्लेख तथा अर्थ-शास्त्र के⁴ लक्षण पर ध्यान देने से इनका पर्यायत्व प्रतीत हो जाता है। यतः दण्ड-प्रयोग में धर्म का अनुसन्धान⁵ परमावश्यक बतलाया गया है अतएव महाभारत⁶ में धर्म-शास्त्र से अननुमोदित अर्थ-शास्त्र की निन्दा भी की गई है। परन्तु इसका तात्पर्य उपर्युक्त ही है। परन्तु 'बार्हस्पत्य-अर्थ-शास्त्र' में प्रयुक्त अर्थ-शब्द का अर्थ व्यापक है और इस दृष्टि से उस अर्थ-शास्त्र का यह अर्थ-शास्त्र या नीति-शास्त्र एक अंश है न कि पर्याय। अतएव कामन्दक⁷ ने कौटिल्य के अर्थ-शास्त्रापरपर्याय नीति-शास्त्र को बार्हस्पत्य अर्थ-शास्त्र का एक अंश माना है।


१. दण्डनीत्याम् = अर्थ-शास्त्रे—विज्ञानेश्वर—या० स्मृ० २।२१ ॥
राजनीतिलक्षणमर्थ-शास्त्रमिह विवक्षितम्—
विज्ञानेश्वर—या० स्मृ० १।३१३ ॥
दण्डेन नीयते चेदं दण्डं नयति वा पुनः।
दण्ड-नीतिरिति ख्याता त्रींल्लोकानभिवर्तते ॥
म० भा० (शा० प०) ५९।७८ ॥
२. पृथिव्या लाभे पालने च यावन्त्यर्थ-शास्त्राणि पूर्वाचार्यैः प्रस्थापितानि ......। कौ० शा०, पृ० १।
३. शु० नी० सा० ४।२६७–२७१ ॥
४. श्रुति-स्मृत्यनुरोधेन राज-वृत्तं हि शासनम् ।
सुयुक्त्यार्थार्जनं यत्र ह्यर्थ-शास्त्रं तदुच्यते ॥ शु० नी० सा० २९६–९७ ॥
५. इस प्रसङ्ग में या० स्मृ० २।२१ की मिताक्षरा द्रष्टव्य है।
६. अर्थ-शास्त्र-परो राजा धर्मार्थान्नाधिगच्छति ।
अस्थाने चास्य तद्वित्तं सर्वमेव विनश्यति ॥
म० भा० (शा० प०) ७१।१४ ॥
७. का० नी० सा० १।६ ॥

( २४ )

(ग) राज-शास्त्र—म० म० काणे¹ महाशय का कथन है कि इस शास्त्र का सबसे उचित नाम है 'राज-शास्त्र'। इसका तात्पर्य यही है कि दण्ड अपने प्राधान्य के कारण 'राजा' या 'शासक' शब्द से अभिहित होने लगा है। अतएव दण्ड-प्रख्यापक शास्त्र को राज-शास्त्र कहना उचित ही है। इस दृष्टि के समर्थन में अन्यान्य युक्तियाँ भी स्पष्ट हैं।

राजा

ऊपर यह बतलाया जा चुका है कि 'नीति' का अधिकारी है 'राजा'। अब हमें राजा शब्द के अर्थ का अनुसन्धान करना चाहिए। राजा शब्द की निष्पत्ति बतलाते हुए यास्क² ने कहा है कि 'राजू दीप्तौ' धातु से राजा की निष्पत्ति हुई है। इसकी उपपत्ति में निरुक्त के अद्वितीय व्याख्याकार³ दुर्गाचार्य का कहना है कि यह राजा आठ लोक-पालों की मात्रा से निर्मित शरीर से प्रदीप्त होते रहता है। पाणिनि-व्याकरण की दृष्टि से भी 'राजू' धातु से ही 'कनिन्' प्रत्यय करने से 'राजन्' शब्द की निष्पत्ति होती है। महाभारत⁴ में 'रञ्ज्' धातु से राजा की निष्पत्ति मानी गई है। महाकवि कालिदास⁵ ने भी इसीका अनुसरण किया है। इसकी व्याख्या में मल्लिनाथ⁶ का कथन है कि यद्यपि राजन् शब्द की निष्पत्ति 'राजू' धातु से ही होती है तथापि धातुओं की नानार्थकता की दृष्टि से 'रञ्ज्' धातु से इस शब्द की निष्पत्ति मानी गई है। म० म० काणे के द्वारा राज-धर्म-काण्ड से⁷ उद्धृत एक वचन के अनुसार


१. हिस्ट्री ऑफ धर्मशास्त्र, पृ० ४, (भाग-३)
२. राजा राजतेः—या० निरुक्त २।३।
३. दीप्यते ह्यसौ पञ्चानां (अष्टानाम्) लोकपालानाम् वपुषा। दुर्गाचार्य।
४. रञ्जिताश्च प्रजाः सर्वास्तेन राजेति शब्द्यते।
म० भा० (शा० प०) ५९।१२५।
लोक-रञ्जनमेवात्र राज्ञां धर्मः सनातनः।
म० भा० (शा० प०) ५७।११॥
५. राजा प्रकृति-रञ्जनात्। रघुवंश ४।१२॥
६. यद्यपि राज-शब्दो राजतेः दीप्यर्थात् कनिन्-प्रत्ययान्तः न तु रञ्जेः तथापि धातूनाम् अनेकार्थत्वाद् रञ्जनात् राजा इत्युक्तम्। मल्लिनाथ रघु० ४।१२॥
७. बलेन चतुरङ्गेन यतो रञ्जयति प्रजाः।
दीप्यमानः स वपुषा तेन राजारभिधीयते॥
हिस्ट्री ऑफ धर्मशास्त्र, भाग-३, पृ० २८॥

( २५ )

'राज्' तथा 'रञ्ज्' इन दोनों ही धातुओं से राजा की निष्पत्ति होती है। यह तो राजन् शब्द की व्युत्पत्ति की स्थिति हुई। इस व्युत्पत्ति के आधार पर राजन् शब्द का प्रयोग किसी भी लोकरञ्जक या दीप्तिमान् पुरुष के लिए किया जा सकता है। अब हमें इसके प्रवृत्ति-निमित्त की ओर ध्यान देना चाहिए।

शास्त्र में शब्द के तीन—यौगिक, रूढ तथा योग-रूढ़—अथवा चार—यौगिक, रूढ़, योग-रूढ़ तथा यौगिक-रूढ़—प्रकार माने गए हैं। यौगिक शब्द पूर्णतः व्युत्पत्ति-निमित्त तथा प्रवृत्ति-निमित्त में सामञ्जस्य रखता है। अन्य प्रकार के शब्दों में न्यूनाधिक-भाव से व्युत्पत्ति-निमित्त के साथ प्रवृत्ति-निमित्त का सम्बन्ध¹ रहता भी है और नहीं भी। साधारणतः राजन् शब्द का प्रयोग चार अर्थों में प्रसिद्ध है। ये चार अर्थ हैं—प्रजा-पालक मनुष्य-मात्र, क्षत्रिय-जातीय, अभिषिक्त क्षत्रिय तथा प्रशस्त व्यक्ति।

मीमांसा दर्शन के अवेष्ट्यधिकरण² में 'राजा राज-सूयेन स्वाराज्य-कामो यजेत' इस वैदिक विधि में प्रयुक्त 'राजा' शब्द के अर्थ के विवेचन-प्रसङ्ग में कुमारिल भट्ट³ ने प्रथम अर्थ में राजन् शब्द की लौकिक प्रसिद्धि का उल्लेख किया है। मनु की व्याख्या में कुल्लूक भट्ट आदि ने भी राजन् शब्द का यही अर्थ बतलाया है।

अवेष्ट्यधिकरण में ही शबरस्वामी⁴ ने क्षत्रिय-जाति के प्रसङ्ग में राजन् शब्द-प्रयोग की आन्ध्र-प्रसिद्धि का उल्लेख किया है। मीमांसा के सिद्धान्त के अनुसार भी 'राजा राजसूयेन यजेत' इस विधि-वाक्य में प्रयुक्त राजन् शब्द क्षत्रिय-जाति का ही वाचक प्रतीत होता है। अत एव महाकवि माघ ने इसी सिद्धान्त के आधार पर युधिष्ठिर के द्वारा, राज-सूय यज्ञ के अनुष्ठान⁵ का समर्थन किया


१. अन्यद्धि शब्दानां व्युत्पत्तिनिमित्तम् अन्यच्च प्रवृत्ति-निमित्तम्—विश्वनाथ।
२. अवेष्टौ यज्ञ-संयोगात् क्रतु-प्रधानमुच्यते। पू० मी० द० २।३।३ ॥
३. राज्यस्य कर्त्ता राजेति त्रिषु लोकेषु गीयते।
महा-विषयता चैवं शास्त्रस्यापि भविष्यति। तन्त्र-वार्त्तिक ॥
४. जन-पद-पुर-परिरक्षणवृत्तिमनुपजीवत्यपि क्षत्रिये राज-शब्दमान्ध्राः प्रयुञ्जते—शाबर-भाष्य २।३।३।
५. तत्सुराज्ञि भवति स्थिते पुनः कः क्रतुं यजतु राज-लक्षणम् ।
उद्धृतौ भवति कस्य वा भुवः श्रीवराहमपहाय योग्यता ?
शि० व० १४।१४ ।
सुराज्ञि = विजय-प्रजा-रक्षणादि-गुण-योगात् शुद्धक्षत्रिये, .......राज-लक्षणम् = राज्ञः क्षत्रियस्य, चिह्नम् असाधारणं लक्षणम्—मल्लिनाथ।

( २६ )

है। महाभारत में सहस्रशः राजन् शब्द¹ को क्षत्रिय का पर्याय बतलाया गया है। पाणिनीय² अष्टाध्यायी के व्याख्यान के प्रसंग में भी राजन् शब्द का प्रयोग क्षत्रिय जाति के लिए किया गया है। इसका समर्थन वार्त्तिककार³ के कथन से भी होता है।

तृतीय मत के अनुसार राज्याभिषिक्त क्षत्रिय ही राजा है। अत एव मनुस्मृति में क्षत्रियों⁴ का ही यह कर्त्तव्य बतलाया गया है। विज्ञानेश्वर भी इसी मत के समर्थक⁵ हैं। मत्स्य-पुराण⁶ की भी यही सम्मति है।

चतुर्थ अर्थ में राजन् शब्द के प्रयोग का निर्देश हमें पाणिनि-सूत्र⁷ में तथा आधुनिक व्यवहार में भी मिलता है।

उपर्युक्त चार पक्षों में प्रथम पक्ष तो अत्यन्त स्थूल है। राज्य शब्द की व्युत्पत्ति जातिवाची राजन् शब्द से होती है। एवञ्च क्षत्रिय के कर्म से अतिरिक्त जाति के कर्म को राज्य कहना ही जब गौण है तब उस राज्य के अधिकारी क्षत्रियेतर जाति के लिए 'राजा' शब्द का प्रयोग मुख्य कैसे हो सकता है? प्रजा-पालनादि-स्वरूप राज्य क्षत्रिय का ही कर्म है—यह तो निर्विवाद है। अत एव मनु,⁸ याज्ञवल्क्य⁹, महाभारत¹⁰ आदि ग्रन्थों में अप्रजा- पालन को क्षत्रिय का कृत्य बतलाया गया है। महाभारत में तो एक जगह यह भी बतलाया गया है कि अपने राज्य-काल की समाप्ति के बाद भी क्षत्रिय को


१. शान्ति-पर्व—६०।२४; ६४।१९; ६३, ६४ तथा ६५ अध्यायों में तो क्षात्र-धर्म तथा राज-धर्म को बारम्बार पर्याय के रूप में निर्दिष्ट किया गया है।
२. पा० सू० ५।१।१२४, ४।१।१३७ ।
३. पा० सू० ४।१।१३७ पर वार्त्तिक—"राज्ञो जातावेवेति वक्तव्यम्" ।
४. ब्राह्मं प्राप्तेन संस्कारं क्षत्रियेण यथाविधि ।
सर्वस्यास्य यथा-न्यायं कर्त्तव्यं परिरक्षणम् ॥ म० स्मृ०.७।२ ॥
५. अभिषेकादि-गुण-युक्तस्य राज्ञः प्रजापालनं परमो धर्मः—मिताक्षरा-या० स्मृ० २।१ ॥
६. राज्ञोऽभिषिक्त-मात्रस्य किं नु कृत्यतमं भवेत् । म० पु० २१४।१
७. राजा च प्रशंसायाम्—पा० सू० ६।२।६३ ॥
८. प्रजानां रक्षणं दानमिज्याऽध्ययनमेव च ।
विषयेष्वप्रसक्तिश्च क्षत्रियस्य समासतः । म० स्मृ० १।८९ ॥
९. प्रधानं क्षत्रिये कर्म प्रजानां परिपालनम् । या० स्मृ० १।११९ ॥
१० प्रजाश्च परिपालयेत् । म० भा० (शान्ति-पर्व) ६०।१४ ॥

( २७ )

ही राज्य-पद पर प्रतिष्ठित¹ करना चाहिए। अतः यह निश्चित है कि यह राज्याधिकार क्षत्रिय का स्वाभाविक है और और अन्य का गौण।

अब यहाँ एक प्रश्न उपस्थित होता है कि यदि क्षत्रिय का ही स्वाभाविक अधिकार है राज्य-कृत्य तब महाभारत में जो² कहा गया है कि ब्राह्मण तथा क्षत्रिय को प्रजापति ने प्रजा का समर्पण कर दिया इसका क्या तात्पर्य है ? शान्ति-पर्वान्तर्गत राज-धर्मानुशासन पर्व के बहत्तरवें अध्याय में निर्दिष्ट ऐलवायु-सम्वाद से यह प्रतीत होता है कि अग्रजन्मा होने के कारण इस पृथिवी पर ब्राह्मण का प्रथम अधिकार³ है, परन्तु यतः प्रशस्त ब्राह्मण के लिए पृथिवीपालनाथं अत्यावश्यक शस्त्रादि-ग्रहण⁴ अनुचित है अतः ब्राह्मण-प्रमुख के द्वारा उपेक्षित पृथिवी का अधिकार अनन्तरागत क्षत्रिय पर⁵ आता है। यही बात ऐलकाश्यप-सम्वाद⁶ से भी स्पष्ट होती है। अतः यह प्रतीत होता है कि राज्य-कृत्य का व्यावहारिक अधिकार क्षत्रिय पर ही है। अतएव भीष्म ने उपर्युक्त सम्वाद-द्वय के अन्त में युधिष्ठिर से कहा है कि राष्ट्र का योग-क्षेम राजन्य के ऊपर और राजन्य का योग-क्षेम पुरोहित के ऊपर है⁷। इतना


१. स्थापयित्वा प्रजा-पालं पुत्रं राज्ये च पाण्डव।
अन्य-गोत्रं प्रशस्तं वा क्षत्रियं क्षत्रियर्षभः। म०भा० (शा०प०) ६४।१९॥
और भी देखिए —
राजा भोजो विराट् सम्राट् क्षत्रियो भूपतिर्नृपः।
य एभिः स्तूयते शब्दैः कस्तं नार्चितुमर्हति। वही ६८।५४॥
प्रजापतिर्हि भगवान् सर्वं चैवासृजज्जगत्।
स प्रवृत्ति-निवृत्यर्थं धर्माणां क्षत्रमिच्छति। वही ६५।३०॥
इस प्रसङ्ग में शु० नी० सा० १।३०,४१ आदि भी द्रष्टव्य हैं।

२. प्रजापतिर्हि वैश्याय सृष्ट्वा परिददौ पशून्।
ब्राह्मणाय च राज्ञे च सर्वाः परिददे प्रजाः। शान्ति पर्व ६०।३३-३४॥

३. विप्रस्य सर्वमेवैतत् यत्कञ्चिज्जगती-गतम्।
ज्यैष्ठेनाभिजनेनेह तद्धर्म-कुशला विदुः। म० भा० (शा० प०) ७२।१०॥

४. ज्या-कर्षणं शत्रु-निबर्हणं च कृषिर्वणिज्या पशु-पालनं च।
शुश्रूषणं चापि तथार्थ-हेतोः अकार्यमेतत् परमं द्विजस्य। वही ६३।१॥

५. पत्यभावे यथैव स्त्री देवरं वृणुते पतिम्।
एष ते प्रथमः कल्पः आपद्यन्यो भवेदतः। वही ७२।१२॥

६. वही ७३।२९-३२॥

७. योग-क्षेमो हि राष्ट्रस्य राजन्यायत्त उच्यते।
योग-क्षेमो हि राज्ञो हि समायत्तः पुरोहिते॥ वही ७४।१॥

( २८ )

होने पर भी राज-धर्म का सम्बन्ध जो अन्यान्य जातीय लोगों से जोड़ा¹ जाता है उसका कारण इतना ही है कि मध्यम ब्राह्मण आदि अपने कृत्य के सम्पादन में असफल होकर जब क्षत्रिय आदि के कृत्य से² अपनी जीविका चलाने लगते हैं तो उनके लिए क्षत्रिय आदि के धर्म का अवलम्बन आवश्यक ही है³।

वस्तुतः प्रजा-पालन का भार ब्राह्मण तथा क्षत्रिय इन दोनों पर है, अत एव दोनों ही राज्य-कृत्य के अधिकारी हैं। परन्तु दोनों का क्षेत्र व्यवस्थित है— ब्राह्मण को मन्त्र-बल से⁴ तथा राजन्य को बाहु-बल एवम् अस्त्र-बल से प्रजा


१. यद्यपि राजानमधिकृत्य अयं धर्म-कलाप उक्तः तथापि वर्णान्तरस्यापि विषय-मण्डलादि-परिपालनाधिकृतस्यायं धर्मो वेदितव्यः। विज्ञानेश्वर—या० स्मृ० १।३६८ ॥
नृप इति न क्षत्रिय-मात्रस्यायं धर्मः किन्तु प्रजा-पालनाधिकृतस्यान्यस्यपीति दर्शयति। वही २।१ ॥
राज-शब्दोऽपि नात्र क्षत्रिय-जाति-वचनः किन्तु अभिषिक्त-जनपद-पुर-पालयितृ-वचनः। कुल्लूक भट्ट—म० स्मृ० ७। १ ॥
इस श्लोक पर मेधातिथि-भाष्य भी द्रष्टव्य है।

२. युधिष्ठिर उवाच—
व्याख्याता राज-धर्मेण वृत्तिरापत्सु भारत ?
कथंस्विद्वैश्य-धर्मेण सञ्जीवेद् ब्राह्मणो न वा ?
भीष्म उवाच—
अशक्तः क्षत्र-धर्मेण वैश्य-धर्मेण वर्त्तयेत्।
म० भा० (शा० प०) ७८।१,२ ॥
ब्राह्मण के लिए शूद्र-कर्म का परिग्रहण सर्वथा प्रतिषिद्ध है।
"ब्राह्मणस्य हि आपदि जीवेत् क्षत्रिय-धर्मेण इत्यभिधास्यति. वैश्यस्यापि क्षत्रिय-धर्मं शूद्रस्य च क्षत्रिय-वैश्य-कर्मणी जीवनार्थमापदि जगाद नारदः"—
कुल्लूक भट्ट—म० स्मृ० ७।२ ॥
इस विषय में या० स्मृ० ३।३५ की मिताक्षरा भी द्रष्टव्य है।

३. एतत्सर्वं क्षत्रियस्य राज्यं कुर्वतः प्रविहितम्। यदा पुनः अक्षत्रियः क्षत्रियः कार्यं कुर्यात् तदा अनेनाऽपि एतत्सर्वम् अनुष्ठेयम्, "तत्तार्यापत्तया तद्धर्म-लाभः" इति न्यायात्। अपरार्क—या० स्मृ० १।३६६ ॥

४. ब्रह्म-क्षत्रमिदं सृष्टमेक-योनि स्वयम्भुवा।
पृथग्बल-विधानं तद् न लोकं परिपालयेत् ॥

( २६ )

का संरक्षण करना पड़ता है। राज-नीति के प्रसङ्ग में वर्णित राज-धर्म में केवल बाहु-बल आदि का विनिर्णय है। इसीलिए इसका सम्बन्ध राजन्य से मुख्य है। और यही धर्म ब्राह्मण से गौणतः सम्बद्ध है न कि मन्त्र-बल से क्रियमाण प्रजा-पालनात्मक धर्म। अत एव राजन् शब्द का प्रकृत प्रसङ्ग में मुख्य अर्थ क्षत्रिय ही है। यह भी क्षत्रिय-मात्र का नहीं अपितु अभिषिक्त क्षत्रिय का ही धर्म है। अत एव महाभारत¹ में भी चातुर्वर्ण्य के धर्म से अतिरिक्त राज-धर्म का उल्लेख किया गया है। अन्यान्य धर्म-शास्त्रकारों² का भी मत यही है। शुक्र-नीति-सार.में जो अनभिषिक्त³ को राजा कहा गया है उसका तात्पर्य इतना ही है कि उसका अभिषेक वैदिक-विधि से न होकर यदि लौकिक रूप में भी हुआ हो तब भी वह राजा कहला सकता है। अतः अभिषिक्त क्षत्रिय ही प्रधानतः राज्याधिकारी है और अन्यजातीय व्यक्ति गौण-रूप में 'राजा' कहला सकता है।

राजा का मूल

यह तो स्पष्ट है कि जब कुमार्ग पर लोग चलने लगे होंगे तभी 'नीति' की और उसके उपाय के रूप में प्रधानतया 'दण्ड' और उस 'दण्ड' के निर्वाहक के रूप में राजा की आवश्यकता हुई होगी। अतएव सर्वत्र 'दण्ड' की आवश्यकता बतलाते समय 'मात्स्य न्याय'⁴ का उल्लेख किया गया है। इसी


तपो-मन्त्र-बलं नित्यं ब्राह्मणेषु प्रतिष्ठितम् ।
अस्त्र-बाहु-बलं नित्यं क्षत्रियेषु प्रतिष्ठितम् ॥
ताभ्यां सम्भूय कर्तव्यं प्रजानाम्परिपालनम् ।
म० भा० (शा० प०) ७४।१३-१५ ॥

१. के धर्माः सर्व-वर्णानां चातुर्वर्ण्यस्य के पृथक् ।
चातुर्वर्ण्याश्रमाणां च राज-धर्माश्च के मताः ?
म० भा० (शा० प०) ६०।२ ॥

२. राजा अभिषिक्तः क्षत्रियः । हरदत्त-गौ० ध० शा० ११।१ ॥
विज्ञानेश्वर—या० स्मृ० २।१ ॥

३. अभिषिक्तो नाभिषिक्तो नृपत्वं तु यदाप्नुयात् ॥ शु० नी० सा० १।२६ ॥

४. 'अप्रणीतो हि मात्स्य-न्यायमुद्भावयति । बलीयानबलं हि ग्रसते दण्डधराभावे' अर्थ-शास्त्र-पृ० १६ ॥
दण्डाभावे परिध्वंसी मात्स्यन्यायः प्रवर्त्तते ॥ का० नी० सा० २।४० ॥
दण्डश्चेन्न भवेल्लोके विनश्येयुरिमाः प्रजाः ।
जले मत्स्यानिवाभक्ष्यन् दुर्बलं बलवत्तराः ॥ म०भा० (शा०प०) १५।३० ॥

( ३० )

लिए यह भी कहा गया है कि राजा के अभाव में प्रजा की¹ रक्षा नहीं हो सकती है। सारांश यही है कि जब अनाचार या अधर्म का संचार हुआ तभी राजा की आवश्यकता हुई। अतः विचारणीय यही है कि अनाचार का संचार कब हुआ।

युधिष्ठिर के प्रश्न का उत्तर देते हुए महाभारत में भीष्म ने² कहा है कि कृत-युग में धर्म के ही प्रसार से अधर्म-निरोधक दण्ड या दण्ड-धर राजा की स्थिति थी ही नहीं, पर जब लोगों में अनाचार का संचार हुआ तब देवताओं की प्रार्थना से ब्रह्मा तथा विष्णु के द्वारा क्रमशः दण्ड-प्रकार आदि के उपदेश के लिए नीति-शास्त्र तथा राजा का आविष्कार किया गया। मनुस्मृति में किए गए कृत-युग³ के वर्णन तथा राजा की सृष्टि⁴ की एकवाक्यता से भी


यदि न प्रणयेद्राजा दण्डं दण्डेष्वतन्द्रितः ।
शूले मत्स्यानिवापक्ष्यन् दुर्बलान् बलवत्तराः ॥ म० स्मृ० ७।२० ॥
१. रक्षार्थमस्य लोकस्य राजानमसृजत् प्रभुः ॥ म० स्मृ० ७।२ ॥
यदि न स्यान्नरपतिः सम्यङ्नेता ततः प्रजाः ।
अकर्ण-धारा जलधौ विप्लवेतेह नौरिव ॥ शु० नी० सा० १।६५ ॥
२. नियतस्त्वं नर-व्याघ्र शृणु सर्वानशेषतः ।
यथा राज्यं समुत्पन्नमादौ कृत-युगेऽभवत् ॥ शा० प० ५९।१३ ॥
न वै राज्यं न राजाऽसीत् न दण्डो न च दाण्डिकः ।
धर्मेणैव प्रजाः सर्वा रक्षन्ति स्म परस्परम् ॥ शा० प० ५९।१४ ॥
ते मोह-वशमापन्ना मनुजा भरतर्षभ ॥ शा० प० ५९।१६ ॥

$$\times \quad\quad\quad \times \quad\quad\quad \times$$

नष्टे ब्रह्मणि धर्मे च देवांस्त्रासः समाविशत् ।
ते त्रस्ता नर-शार्दूल ब्रह्माणं शरणं ययुः ॥ शा० प० ५९।२२ ॥

$$\times \quad\quad\quad \times \quad\quad\quad \times$$

ततोऽध्यायः सहस्राणां शतं चक्रे स्व-बुद्धिजम् ॥ शा० प० ५९।२९ ॥

$$\times \quad\quad\quad \times \quad\quad\quad \times$$

अथ देवाः समागम्य विष्णुमूचुः प्रजापतिम् ।
एको योऽर्हति मर्त्येभ्यः श्रैष्ठ्यं वै तं समादिश ॥ शा० प० ५९।८७ ॥
ततः सञ्चिन्त्य भगवान् देवो नारायणः प्रभुः ।
तैजसं वै विरजसं सोऽसृजद् मानसं सुतम् ॥ शा० प० ५९।८८ ॥
३. चतुष्पात् सकलो धर्मः सत्यं चैव कृते युगे ।
नाधर्मेणागमः कश्चिन्मनुष्यान् प्रति वर्तते ॥ म० स्मृ० १।८१ ॥
४. म० स्मृ० ७।३ ॥

( ३१ )

साधारणतः यही प्रतीत होता है कि कृत-युग में राजा की कोई आवश्यकता न थी। इसी प्रकार का मत कई ग्रन्थों में पाया जाता है।

परन्तु आधुनिक विचारक—जिनकी दृष्टि में कृत-युग, त्रेता आदि का कोई महत्त्व नहीं है—इस मत को मानने में पूर्णतः सपक्ष नहीं हो सकते। इन लोगों की दृष्टि में राजा भी एक मनुष्य ही होता है और मानव-जाति की उत्पत्ति के साथ-साथ ही राजा की भी एक मानव के रूप में उत्पत्ति हुई है यद्यपि उसके राज्य-पद पर नियोजन के प्रकार समय-समय पर परिवर्तित होते रहे हैं। न्याय्य तथा अन्याय्य आचरण की अवधि कुछ निश्चित नहीं हो सकती है, जिसे कृत-युग या कलि-युग कहा जा सके। देश-काल आदि के अनुसार कभी न्याय्य आचरण का प्राधान्य हो सकता है और कभी अन्याय्य आचरण का। इस लिए यह कहना उचित नहीं है कि कृत-युग की कोई निश्चित अवधि रही और उसमें किसी राजा की आवश्यकता थी ही नहीं, अपितु यही मानना उचित है कि सब दिन लोगों में अत्यधिक रूप में अशान्ति रही और उसके प्रतीकार के लिए एक व्यवस्थापक या शासक की भी स्थिति अवश्य ही, अधिकार-तारतम्य के साथ-साथ, रही होगी।

इस प्रसङ्ग में यह विचारणीय है कि इस आधुनिक मत का समर्थन हमारे प्राचीन ग्रन्थों से भी होता है। जिन महा-भारत या मनुस्मृति आदि ग्रन्थों को पूर्वोक्त प्रथम-पक्ष का समर्थक बतलाया गया है उन्हीं से यह आधुनिक मत भी सिद्ध होता है। हमें तो ऐसा प्रतीत हो रहा है कि इन ग्रन्थों के पूर्वोक्त मत का भी वस्तुतः तात्पर्य यही है जो आधुनिक मत का तात्पर्य है। महाभारत में युधिष्ठिर के प्रति भीष्म का कथन है कि सत्ययुग, त्रेता, द्वापर तथा कलि-युग का अर्थ है 'दण्ड' के प्रयोग में राजा के अवधान का आधिक्य और अल्पत्व'। इससे यही सार निकलता है कि राजा की कुशलता तथा


१. दण्ड-नीत्यां यदा राजा सम्यक्कात्स्न्र्येन वर्त्तते ।
तदा कृत-युगं नाम कालसृष्टं प्रवर्त्तते ॥
दण्ड-नीत्यां यदा राजा त्रीनंशाननुवर्त्तते ।
चतुर्थमंशमुत्सृज्य तदा त्रेता प्रवर्त्तते ॥
अर्धं त्यक्त्वा यदा राजा नीत्यर्धमनुवर्त्तते ।
ततस्तु द्वापरं नाम स कालः सम्प्रवर्त्तते ॥
दण्ड-नीतिं परित्यज्य यदा कात्स्न्र्येन भूमिपः ।
प्रजाः क्लिश्नात्ययोगेन प्रवर्त्तेत तदा कलिः ॥