भारतकोश
संग्रह पर लौटें

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

महर्षि शुक्राचार्य द्वारा

स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

२०६ | शुक्रनीतिः

विषवह्निहिमव्याप्तं कीटजुष्टं न धारयेत् ॥ २८ ॥ निःसारतां न हि प्राप्तं व्यये तावन्नियोजयेत् ।

जो विष, अग्नि तथा पाला से खराब हो गया हो एवं जिसमें कीड़ा पड़ा हो ऐसे धान्यों का संग्रह नहीं करना चाहिये और जब तक निःसार नहीं हो तभी तक धान्यों का व्यय करना चाहिये अर्थात् निःसार होने पर उसे फेंक देना चाहिये ।

व्ययीभूतं तु यद् दृष्ट्वा तत्तुल्यं तु नवीनकम् ॥ २९ ॥ गृह्णीयात् सुप्रयत्नेन वत्सरे वत्सरे नृपः ।

राजा प्रति वर्ष जो धान्य व्यय करने से चुक जाय उनके स्थान पर उसी जाति के दूसरे नये धान्य यत्नपूर्वक लाकर रख दे ।

ओषधीनां च धातूनां तृणकाष्ठादिकस्य च ॥ ३० ॥ यन्त्रशस्त्राग्नचूर्णभाण्डादेर्वाससां तथा । यद्यच्च साधकं द्रव्यं यद्यत्कार्ये भवेत् सदा ॥ ३१ ॥ संग्रहस्तस्य तस्यापि कर्तव्यः कार्यसिद्धयेः ।

ओषधि आदि सब वस्तुओं को संचय करने का निर्देश—ओषधि ( धान्यादि ), धातु ( खान से उत्पन्न पदार्थ ), तृणकाष्ठ आदि, यन्त्र ( मशीन ), अस्त्र, शस्त्र, बारूद, बर्तन, वस्त्र इन सबों के मध्य में जिन २ कार्यों के लिये जो २ द्रव्य उपयोगी हों उनका संग्रह करना राजा के लिये उचित है क्योंकि उनसे समय पर कार्य की सिद्धि होती है ।

संरक्षयेत् प्रयत्नेन संगृहीतं धनादिकम् ॥ ३२ ॥ अर्जने तु महद् दुःखं रक्षणे तच्चतुर्गुणम् ।

संगृहीत धन की यत्न से रक्षा करने का निर्देश—संग्रह किये हुये धान्यादि की प्रयत्नपूर्वक रक्षा करनी चाहिये । क्योंकि इनके संग्रह करने में बहुत दुःख उठाना पड़ता है और उससे चौगुना दुःख उनकी रक्षा करने में उठाना पड़ता है ।

क्षणं चोपेक्षितं यत्तद्विनाशं द्राक् समाप्नुयात् ॥ ३३ ॥

क्षणभर भी रक्षा करने में जिसकी उपेक्षा की जाती है वह शीघ्र नष्ट हो जाता है ।

आर्जकस्यैव दुःखं स्यात्तथाऽर्जितविनाशने । स्त्रीपुत्राणामपि तथा नान्येषां तु कथं भवेत् ॥ ३४ ॥

और अर्जित ( संगृहीत ) वस्तु के नष्ट हो जाने पर उपार्जन ( संग्रह ) करनेवाले को ही दुःख होता है स्त्री-पुत्रादिकों को वैसा नहीं होता है फिर अन्य लोगों को क्यों दुःख होगा ?

चतुर्थोऽध्याये कोशनिरूपणप्रकरणम् २०७

स्वकार्ये शिथिलो यः स्यात् किमन्ये न भवन्ति हि ।
जागरूकः स्वकार्ये यस्तत्सहायाश्च तत्समाः ॥ ३५ ॥

स्वकार्य में सदा सजग रहने का निर्देश— जो अपने ही कार्य में स्वयं शिथिल (पूर्ण रूप से नहीं तत्पर) रहता है तो उसके सहायक अन्य लोग उस कार्य में क्यों नहीं शिथिल होंगे ? अर्थात् अवश्य होंगे। क्योंकि अपने कार्य में जो जागरूक (दृढ़ तत्पर) रहता है तो उसके सहायक भी उसी के समान उस कार्य में जागरूक रहते हैं।

यो जानात्यर्जितुं सम्यगर्जितं न हि रक्षितुम् ।
नातः परतरो मूर्खो वृथा तस्यार्जनश्रमः ॥ ३६ ॥

संचय की रक्षा न कर सकने पर मूर्खता होने का निर्देश— जो उपार्जन करना तो अच्छी तरह से जानता है किन्तु उसकी अच्छी तरह रक्षा करना नहीं जानता है। उससे बढ़कर मूर्ख कोई दूसरा नहीं है क्योंकि उसका उपार्जन करने का श्रम वृथा हो जाता है।

एकस्मिन्नधिकारे तु यो द्वावधिकरोति सः ।
मूर्खो जीवद्-द्विभार्यश्च ह्यतिविश्रम्भवांस्तथा ॥ ३७ ॥
महाधनाशो रचलसः स्त्रीभिनिर्जित एव हि ।
तथा यः साक्षितां पृच्छेच्चौरजाराततायिषु ॥ ३८ ॥

मूर्ख के लक्षण— जो एक अधिकार (कार्यभार) रहने हुये भी दो अधिकारों पर अधिकार रखता है, जो स्त्री के जीते रहते दूसरी शादी करता है, जो अत्यन्त दूसरे पर विश्वास रखता है, जो महान् धन की आशा रखते हुये आलसी रहता है, जो स्त्री के अधीन रहता है, तथा जो चोर, परस्त्रीगामी, आततायी के विषय में साक्षी (गवाही) मानता है अथवा उनसे गवाह मांगता है वह मूर्ख है।

संरक्षयेत् कृपणवत् काले दद्याद्विरक्तवत् ।
मूर्खत्वमन्यथा याति स्वधनव्ययतोऽपि च ॥ ३९ ॥

कृपण की भांति धन की रक्षा करे और समय आने पर विरक्त की भांति उसे दे देवे, अन्यथा (इससे विपरीत होने पर) अपने धन के व्यय करने पर मूर्खता को प्राप्त होता है।

वस्तुयाथात्म्यविज्ञाने स्वयमेव यतेत् सदा ।
परीक्षकैः स्वयं राजा रत्नादीन् वीक्ष्य रक्षयेत् ॥ ४० ॥

राजा को परीक्षकों से स्वयं रत्न की परीक्षा कराने का निर्देश— प्रत्येक वस्तुओं के यथार्थ स्वरूप जानने के लिये स्वयं सदा यत्न करना चाहिये।

२०८ | शुक्रनीतिः

अतः राजा स्वयं परीक्षकों (रत्नपारखियों) के द्वारा परीक्षा करके रत्नों का संग्रह करे।

वज्रं मुक्ता प्रबालं च गोमेदश्चेन्द्रनीलकः ।
वैदूर्यः पुष्परागश्च पाचिर्माणिक्यमेव च ॥ ४१ ॥
महारत्नानि चैतानि नव प्रोक्तानि सूरिभिः ।

हीरा आदि नव महारत्नों का निर्देश— हीरा, मोती, मूंगा, गोमेद (लहसुनिया), नीलम, वैदूर्य, पुखराज, पन्ना, लाल (मानिक), ये ९ महारत्न विद्वानों द्वारा कहे गये हैं।

रवेः प्रियं रक्तवर्णं माणिक्यं त्विन्द्रगोपरुक् ॥ ४२ ॥
रक्तपीतसितश्यामच्छविर्मुक्ता प्रिया विधोः ।
सपीतरक्तरुग्भौमप्रियं विद्रुममुत्तमम् ॥ ४३ ॥
मयूरचाषपत्राभा पाचिर्बुधहिता हरित् ।

नवरत्नों के वर्ण और नवग्रहों का निर्देश— बीरबहूटी कीड़े की भांति लाल रंग का माणिक (लाल) होता है जो सूर्य को प्रिय है। लाल, पीली, श्वेत तथा श्याम वर्ण की कान्तिवाली मोती होती है जो चन्द्रमा को प्रिय है। पीली तथा लालकान्ति से युक्त उत्तम मूंगा होता है जो मंगलग्रह को प्रिय है। मयूर तथा चास पक्षी के पंख के समान कान्तिवाला पन्ना हरा रङ्ग का होता है जो बुधग्रह को प्रिय होता है।

स्वर्णच्छविः पुष्परागः पीतवर्णो गुरुप्रियः ॥ ४४ ॥
अत्यन्तविशदं वज्रं तारकाभं कवेः प्रियम् ।
हितः शनेरिन्द्रनीलो ह्यसितो घनमेघरुक् ॥ ४५ ॥
गोमेदः प्रियकृद्राहोरीषत्पीतारुणप्रभः ।
ओतवद्याभश्चलत्तन्तुर्वैदूर्यः केतुप्रीतिकृत् ॥ ४६ ॥

सोना के समान कान्तिवाला पीले वर्ण का पुखराज होता है जो गुरुग्रह को प्रिय होता है। अत्यन्त स्वच्छ तारा की भांति चमकनेवाला हीरा होता है जो शुक्रग्रह को प्रिय है। घने बादल के समान कान्तिवाला नीले रङ्ग का नीलम होता है जो शनिग्रह को प्रिय है। कुछ पीली तथा लाल कान्ति से युक्त लहसुनिया होता है जो राहु को प्रिय है। बिलाव की आंखों के समान जिसकी कान्ति हो तथा जो किरणों से युक्त हो उसे वैदूर्य कहते हैं। यह केतु को प्रिय है।

रत्नश्रेष्ठतरं वज्रं नीचे गोमेदविद्रुमम् ।
गारुत्मतं च माणिक्यं मौक्तिकं श्रेष्ठमेव हि ॥ ४७ ॥
इन्द्रनीलं पुष्परागो वैदूर्यं मध्यमं स्मृतम् ।

चतुर्थाध्याये कोशानिरूपणप्रकरणम् २०६.

सम्पूर्ण रत्नों में वज्र (हीरा) रत्न की श्रेष्ठता का निर्देश—रत्नों में अत्यन्त श्रेष्ठ हीरा होता है, और लहसुनिया तथा मूंगा रत्नों में नीच (निकृष्ट) होते हैं। पन्ना, माणिक तथा मोती रत्नों में श्रेष्ठ हैं। नीलम, पुखराज और वैदूर्य रत्नों में मध्यम हैं।

रत्नश्रेष्ठो दुर्लभश्च महाद्युतिरहेर्मणिः ॥ ४८ ॥

सर्पमणि—रत्नों में श्रेष्ठ, दुर्लभ एवं अत्यन्त उज्ज्वल कान्तिवाला होता है।

अजालगर्भं सद्रूपं रेखाबिन्दुविवर्जितम् ।
सत्कोणं सुप्रभं रत्नं श्रेष्ठं रत्नविदो विदुः ॥ ४९ ॥

श्रेष्ठ रत्नों के लक्षण—'जिसके भीतर जाली न हो और वर्ण अच्छा हो एवं रेखा तथा बिन्दु से रहित, अच्छे कोणों से युक्त तथा अच्छी कान्तिवाला रत्न श्रेष्ठ होता है'—ऐसा रत्नपारखी लोग कहते हैं।

शर्कराभं दलाभं च चिपिटं वर्तुलं हि तत् ।
वर्णाः प्रभाः सिता रक्ताः पीतकृष्णास्तु रत्नजाः ॥ ५० ॥

और वह रत्न कोई बालू और कोई पत्तों के समान कान्ति का तथा कोई चिपटा या कोई गोल आकार का होता है। और रत्नों के वर्ण की कान्ति श्वेत, रक्त, पीत या कृष्ण होती है।

यथावर्णं यथाच्छायं रत्नं यद्दोषवर्जितम् ।
श्रीपुष्टिकीर्तिशौर्यायुःकरमन्यदसत् स्मृतम् ॥ ५१ ॥

असत् रत्न के लक्षण—अपने २ वर्ण तथा कान्ति से युक्त और दोषों से रहित जो रत्न होता है वह लक्ष्मी, पुष्टि, कीर्ति, शूरता तथा आयु को करनेवाला होता है इससे अन्य प्रकार का रत्न बुरा फल देनेवाला होने से बुरा कहलाता है।

वर्णमाक्रमते छाया प्रभा वर्णप्रकाशिनी ।
कान्ति वर्ण को उज्ज्वल करती है, और प्रभा उसे प्रकाशित करती है।

पद्मरागस्तु माणिक्यभेदः कोकनदच्छविः ॥ ५२ ॥
न धारयेत् पुत्रकामा नारी वज्रं कदाचन ।
कालेन हीनं भवति मौक्तिकं विद्रुमं घृतम् ॥ ५३ ॥

पुत्रार्थिनी को वज्र धारण करने का निषेध तथा बहुत दिन धारण किये मोती और मूंगा के हीन होने का निर्देश—पद्मरागमणि माणिक्य (माणिक) का ही भेद है। यह रक्तकमल के समान कान्तियुक्त होता है। और पुत्रार्थिनी स्त्री को कभी भी हीरा धारण नहीं करना चाहिये। मूंगा और मोती बहुत दिन तक धारण करने पर (खराब) हो जाता है।

गुरुत्वात् प्रभया वर्णाद्विस्तारादाश्रयादपि ।

१४ शु०

२१० : शुक्रनीतिः

आकृत्या चाधिमूल्यं स्याद्रत्नं यद्दोषवर्जितम् ॥ ५४ ॥
दोष वर्जित रत्न के लक्षण— जो रत्न दोषरहित होता है उसका वजन, कान्ति, रङ्ग, आकार का विस्तार, उत्पत्तिस्थान तथा आकार के आधार पर मूल्य अधिक हो जाता है ।

नायसोल्लिख्यते रत्नं विना मौक्तिकविद्रुमात् ।
पाषाणेनापि च प्राय इति रत्नविदो विदुः ॥ ५५ ॥
'मूंगा और मोती को छोड़कर अन्य रत्नों पर लोहे और पत्थर से घिसने पर प्रायः लकीर नहीं पड़ती है' ऐसा रत्न के पारखी लोग कहते हैं ।

मूल्याधिक्याय भवति यद्रत्नं लघु विस्तृतम् ।
गुर्वल्पं हीनमौल्याय स्याद्रत्नं त्वपि सद्गुणम् ॥ ५६ ॥
मूल्य अधिक और कम होने के कारण— जो रत्न दोष से रहित उत्तम होते हुये भी तौल में हल्के किन्तु आकार में बड़े हों तो वे अधिक मूल्य के होते हैं । और जो तौल में भारी किन्तु आकार में छोटे होते हैं वे मूल्य में हीन होते हैं ।

शर्कराभं हीनमौल्यं चिपिटं मध्यमं स्मृतम् ।
दलाभं श्रेष्ठमूल्यं स्याद्यथाकामात्तु वर्तुलम् ॥ ५७ ॥
बालू के समान आकारवाला रत्न हीन मूल्य का होता है । चिपटा रत्न मध्यम मूल्य का और टुकड़ेवाला श्रेष्ठ मूल्य का होता है, और गोल रत्न लेने और बेचनेवाले की आवश्यकता के अनुसार कम या अधिक मूल्यवाले हो जाते हैं ।

न जरां यान्ति रत्नानि विद्रुमं मौक्तिकं विना ।
राजद्रौष्ट्याश्च रत्नानां मूल्यं हीनाधिकं भवेत् ॥ ५८ ॥
मूंगा और मोती को छोड़कर शेष रत्नों के ऊपर पुराना होने का दोष नहीं होता है । राजा की दुष्टता से रत्नों के मूल्य कम या अधिक हो जाते हैं ।

मत्स्या-ऽहि-शङ्ख-वाराह-वेणु-जीमूत-शुक्तितः ।
जायते मौक्तिकं तेषु भूरि शुक्त्युद्भवं स्मृतम् ॥ ५६ ॥
मौक्तिक की उत्पत्ति के स्थानों का निर्देश— मछली, सर्प, शङ्ख, सूअर, बांस, मेघ तथा सीप से मोती उत्पन्न होती है, किन्तु अधिकतर सीप से ही मोती निकलती है ।

कृष्णं सितं पीतरक्तं द्विचतुःसप्तकञ्चुकम् ।
त्रि-पञ्च-सप्तावरण-मुत्तरोत्तरमुत्तमम् ॥ ६० ॥
मोती के रंग और भेद का निर्देश— मोती कृष्ण, श्वेत, पीतयुक्त रक्तवर्ण तथा क्रम से २ कञ्चुक ( परत ), ४ कञ्चुक, ७ कञ्चुकवाली उत्तरोत्तर उत्तम समझी जाती है ।

चतुर्थाध्याये कोशानिरूपणप्रकरणम् २११

कृष्णं सितं क्रमाद् रक्तं पीतन्तु जरठं विदुः।
कनिष्ठं मध्यमं श्रेष्ठं क्रमाच्छुक्त्युद्भवं विदुः ॥ ६१ ॥

'कृष्ण वर्ण की मोती कनिष्ठ, श्वेतवर्ण की मध्यम, रक्तवर्ण की श्रेष्ठ तथा पीतवर्ण की पुरानी होती है' ऐसा सीप की मोती के विषय में समझना चाहिये।

तदेव हि भवेद् वेध्यमवेध्यानीतराणि तु।
कुर्वन्ति कृत्रिमं तद्वत्सिंहलद्वीपवासिनः ॥ ६२ ॥

**कृत्रिम मोती के निर्माण का स्थान—**सीप की मोती ही वेधी जा सकती है अन्य मोती नहीं वेधी जा सकती। सिंहल (सीलोन) देशवासी असली मोती के समान नकली मोती बनाते हैं।

तत्सन्देहविनाशार्थं मौक्तिकं सुपरीक्षयेत्।
उष्णे सलवणस्नेहे जले निश्युषितं हि तत् ॥ ६३ ॥
व्रीहिभिर्मर्दितं नेयाद्वैवर्ण्यं तदकृत्रिमम्।
श्रेष्ठाभं शुक्तिजं विद्यान्मध्यभां त्वितरद्विदुः ॥ ६४ ॥

**मोती की परीक्षाविधि-निर्देश—**अतः सन्देह दूर करने के लिये मोती की भलीभांति परीक्षा करनी चाहिये। परीक्षा विधि यह है कि—गर्म जल में नमक तथा तेल मिलाकर उसी में मोती को डालकर रातभर पड़ा रहने दे पश्चात् प्रातः मोती को निकाल कर धानों के बीच रख कर खूब रगड़े, इसके बाद यदि उसका रंग बदल जाय तो मोती को नकली यदि न बदले तो असली समझना चाहिये। उत्तम आभा (कान्ति) की मोती असली और मध्यम आभा की नकली समझी जाती है।

तुलाकल्पितमूल्यं स्याद्रत्नं गोमेदकं बिना।
क्षुर्माविंशतिभी रक्ती रत्नानां मौक्तिकं बिना ॥ ६५ ॥

गोमेदक रत्न को छोड़ कर शेष रत्नों का मूल्य तौल के अनुसार होता है। मोती को छोड़कर शेष रत्नों के लिये एक रत्ती २० अलसियों की मानी गई है।

रक्तित्रयं तु मुक्तायाश्चतुःकृष्णलकंर्भवेत्।
चतुर्विंशतिभिस्ताभी रत्नटङ्कस्तु रक्तिभिः ॥ ६६ ॥
टङ्कैश्चतुर्भिस्तोलः स्यात् स्वर्णविद्रुमयोः सदा।

**रत्नों का तुलामान निर्देश—**मोती के लिये ४ कृष्णलों (तौल विशेष) की ३ रत्ती, २४ रत्तियों का रत्नों के लिये १ टङ्क होता है। स्वर्ण तथा मूंगा तौलने के लिये ४ टङ्कों का १ तोला होता है।

एकस्यैव हि वज्रस्य त्वेकरक्तिमितस्य च ॥ ६७ ॥
सुविस्तृतदलस्यैव मूल्यं पञ्चसुवर्णकम्।

२१२शुक्रनीतिः

वज्र का मूल्य-विचार—यदि एक ही हीरा विस्तृत दलवाला तथा १ रत्ती तौल का हो तो उसका मूल्य ५ सुवर्ण (१० माशे तौल की १ स्वर्ण मुद्रा अशर्फी) होता है।

रक्तिकादलविस्ताराच्छ्रेष्ठं पञ्चगुणं यदि ॥ ६८ ॥
यथा यथा भवेन्न्यूनं हीनमौल्यं तथा तथा ।

जैसे २ रत्ती की संख्या एवं दल का विस्तार अधिक होता जायगा वैसे २ हीरे की श्रेष्ठता बढ़ती है, और प्रति रत्ती के अनुसार पूर्वोक्त मूल्य से पंचगुना अधिक होता जायगा। और जैसे २ रत्ती तथा दल के विस्तार में न्यूनता होगी वैसे २ मूल्य में कमी होगी।

अत्राष्टरक्तिको माषो दशमाषैः सुवर्णकः ॥ ६९ ॥
स्वर्णस्य तत् पञ्चमूल्यं राजताशीतिकर्षकम् ।

रत्न के तौलने में १ माशा ८ रत्ती का होता है। १० माशे का १ सुवर्ण होता है। ५ सुवर्णों का मूल्य ८० चांदी के कर्ष (१ रुपये) भर होते हैं।

यथा गुरुतरं वज्रं तन्मूल्यं रक्तिकवर्गः ॥ ७० ॥
तृतीयांशविहीनं तु चिपिटस्य प्रकीर्तितम् ।

हीरा चाहे जितना भारी हो किन्तु उसका मूल्य उसके रत्ती-समूह के अनुसार ही होगा, चिपटे हीरे का मूल्य तृतीयांश कम होता है।

अर्धं तु शर्कराभस्य चोत्तमं मूल्यमेरितम् ॥ ७१ ॥
रक्तिकायाश्च द्वे वज्रे तदर्धं मूल्यमर्हतः ।

उत्तम हीरे के मूल्य से आधा मूल्य शर्करा (बालू) के आकारवाले हीरे का होता है। २ हीरे यदि १ रत्ती के हों तो दोनों का मूल्य उत्तम हीरे का आधा होता है।

तदर्धं बहवोऽर्हन्ति मध्या हीना यथा गुणैः ॥ ७२ ॥
उत्तमार्धं तदर्धं हीरका गुणहीनतः ।

यदि गुणों के अनुसार मध्यम और हीन बहुत से हीरे १ रत्ती के बराबर हों तो उसके मूल्य उस से भी आधे हो जायेंगे। इसी प्रकार से हीरों के गुण की हीनता के अनुसार उसके मूल्य के आधे या उससे भी आधे होते हैं।

शतादूर्ध्वं रक्तिकवर्गाद्ध्रसेद् विंशतिरक्तिकाः ॥ ७३ ॥
प्रतिशतात्तु वज्रस्य सुविस्तृतदलस्य च ।
तथैव चिपिटस्यापि विस्तृतस्य च ह्रासयेत् ॥ ७४ ॥
शर्कराभस्य पञ्चाशच्चत्वारिंशच्च वैकतः ।

जो हीरा सुविस्तृत दलवाला या चिपटा होते हुये भी विस्तृत दलवाला हो और यदि १०० रत्ती से ऊपर तौलवाला हो तो प्रति सैकड़े २० रत्ती का

चतुर्थाध्याये कोशनिरूपणप्रकरणम् २१३

चतुर्थाध्याये कोशनिरूपणप्रकरणम् २१३

मूल्य घटाकर उसका मूल्य होगा। और शर्करा के समान हीरों के लिये प्रति सैकड़े ५० या ४० रत्ती का मूल्य घटाकर मूल्य होगा।

रत्नं न धारयेत् कृष्णं रक्तबिन्दुयुतं सदा ॥ ७५ ॥

**काले और रक्त बिन्दुवाले रत्न के न धारण का निर्देश—**और कृष्ण वर्ण के रत्नों पर यदि लाल रंग के बिन्दु हों तो उन्हें नहीं धारण करना चाहिये।

गारुत्मतं तूत्तमं चेन्माणिक्यं मूल्यमर्हतिः । सुवर्णं रक्तिमात्रं चेद् यथा रक्तिस्ततो गुरुः ॥ ७६ ॥

**माणिक्यादिकों का मूल्य-विचार—**यदि पन्ना और माणिक्य दोनों उत्तम हों तो उन दोनों के मूल्य समान होंगे अतः वे १ रत्ती के तौल के हों तो उनका १ सुवर्ण (१० माशे सोना) मूल्य होता है। और रत्ती के अनुसार मूल्य बढ़ता है।

रक्तिमात्रः पुष्परागो नीलः स्वर्णार्धमर्हतिः । चलत्रिसूत्रो वैदूर्यश्चोत्तमं मूल्यमर्हति ॥ ७७ ॥

१ रत्ती का पुखराज या नीलम का मूल्य आधा सुवर्ण (५ माशे सोना) होता है। और जिसमें चलते हुये ३ सूत्र दिखाई पड़े ऐसा वैदूर्यमणि उत्तम मूल्य का होता है।

प्रवालं तोलकमितं स्वर्णार्धं मूल्यमर्हति ।

१ तोले भर तौल के मूंगे का मूल्य आधा सुवर्ण (५ माशे सोना) होता है।

अत्यल्पमूल्यो गोमेदो नोन्मानं तु यतोऽर्हति ॥ ७८ ॥

**गोमेद के उन्मान के योग्य न होने का निर्देश—**गोमेद मणि अत्यन्त कम मूल्य का होता है। अतः उसका मूल्य तौल के ऊपर नहीं होता है।

संख्यातः स्वल्परत्नानां मूल्यं स्याद्धीरकाद्विना । अत्यन्तरमणीयानां दुर्लभानां च कामतः ॥ ७९ ॥ भवेन्मूल्यं मानेन तथातिगुणशालिनाम् ।

**अत्यन्त गुण वालों का मान से मूल्य न होने का निर्देश—**हीरे को छोड़कर क्षुद्र रत्नों का मूल्य संख्या से होता है। जो अत्यन्त सुन्दर तथा दुर्लभ हों उनका मूल्य आवश्यकतानुसार कम या अधिक होता है। और अत्यन्त गुण-शाली रत्नों का मूल्य तौल के अनुसार नहीं होता है।

व्यङ्घ्रिश्चतुर्दशहतो वर्गो मौक्तिकरक्तिजः ॥ ८० ॥ चतुर्विंशतिभिर्भक्तो लब्धान्मूल्यं प्रकल्पेत् । उत्तमं तु सुवर्णार्धमूनमूनं यथागुणम् ॥ ८१ ॥

**मोतियों की मूल्य-कल्पना—**मोती तौल में जितनी रत्तियों का हो,

२१४ | शुक्रनीतिः

उनकी संख्या को परस्पर गुणा करके वर्ग निकाल ले अर्थात् यदि ४ है, तो ४, ही से गुणा करके १६ वर्ग हुआ, इसे चौथाई से हीन करने पर १२ हुआ पुनः १४ से गुणा करने पर १६८ हुआ, इसको २१ से भाग देने पर लब्धि ८ हुई, इससे मूल्य की कल्पना करे। उत्तम मुक्ता का मूल्य आधा सुवर्ण होता है, उसके बाद गुणानुसार मध्यम तथा अधम होने से उत्तरोत्तर कम होता जाता है।

मुक्ताया रक्तिकौघस्य प्रतिरक्तौ कला नव ।
कल्पयेत्पञ्चभागान् हि त्रिंशद्भिः प्राग्भजेच्च तान् ॥ ८२ ॥
लब्धं कलासु संयोज्य कलाः षोडशभिर्भजेत् ।
मूल्यं तज्ज्ञन्विधीतो योज्यं मुक्ताया वा यथागुणम् ॥ ८३ ॥

मोती की रत्तियों के वर्ग में प्रत्येक रत्ती को नौ ९ कला समझनी चाहिये। फिर उन रत्तियों को पचगुना करके ३० से भाग दे। और जो लब्धि हो उसे कलाओं में जोड़ दे। फिर १६ का भाग दे, जो लब्धि हो उससे मोती का मूल्य समझना चाहिये। अथवा गुणानुसार मोती का मूल्य निश्चित करना चाहिये।

रक्तं पीतं वर्तुलं चेन्मौक्तिकं चोत्तमं सितम् ।
अधमं चिपिटं शर्कराभमन्यत्तु मध्यमम् ॥ ८४ ॥

मोती के भेद और लक्षण—लाल, पीला और श्वेत रंग की गोल मोती उत्तम होती है। और जो चिपटी तथा शर्करा के समान होती है वह अधम और इससे अन्य मोती मध्यम कहलाती है।

रत्ने स्वभाविका दोषाः सन्ति धातुषु कृत्रिमाः ।
अतो धातून् सम्परीक्ष्य तन्मूल्यं कल्पयेद् बुधः ॥ ८५ ॥

रत्नों में स्वाभाविक (स्वयम्) दोष उत्पन्न होते हैं। किन्तु धातुओं में (सुवर्णादि में) मिलाने से कृत्रिम दोष होते हैं। अतः धातुओं की भलीभांति परीक्षा करके बुद्धिमान को उनके मूल्य की कल्पना करनी चाहिये।

सुवर्णं रजतं ताम्रं वङ्गं सीसं च रङ्गकम् ।
लोहं च धातवः सप्त ह्येषामन्ये तु संकराः ॥ ८६ ॥

सुवर्णादि सात धातुओं का निर्देश—सोना, चांदी, तांबा, वंग, सीसा, रांगा, लोहा ये ७ शुद्ध धातुयें हैं, इनसे अन्य धातुयें इन सबों के मेल से बनती हैं अतः वे संकर (मिलावटी) धातु कहलाती हैं।

यथापूर्वं तु श्रेष्ठं स्यात्स्वर्णं श्रेष्ठतरं मतम् ।
वङ्गताम्रभवं कांस्यं पित्तलं ताम्ररङ्गजम् ॥ ८७ ॥

सुवर्णादि ७ धातुओं के तरतम भाव—उक्त ७ धातुओं में अन्तिम लोह से

चतुर्थाध्याये कोशनिरूपणप्रकरणम् २१५

पूर्व-पूर्व की धातुयें श्रेष्ठ होती हैं। अतः सोना सर्वश्रेष्ठ धातु माना जाता है। वङ्ग तथा तामा के मेल से 'कांसा' बनता है, तामा तथा रांगा के मेल से 'पीतल' बनता है।

मानसममपि स्वर्णं तनु स्यात् पृथुलाः परे ।

स्वर्णादि धातुओं के गुण—तौल में बराबर सोना पतला बनाया जाता है किन्तु अन्य धातुयें स्वर्ण के बराबर तौल में होती हुई भी मोटी ही बनती हैं सोने के समान पतली नहीं।

एकच्छिद्रसमाकृष्टे समखण्डे द्वयोर्यदा ॥ ८८ ॥
धातोः सूत्रं मानसमं निर्दुष्टस्य भवेत्तदा ।

अब दो धातुओं के समान दो टुकड़ों को एक छिद्र में डालकर सूत्राकार खींचकर तार बनाया जाय तो यदि धातु शुद्ध होगी तब उसका सूत्र मान में बराबर ही होगा।

यन्त्र-शस्त्रास्त्ररूपं यन्महामूल्यं भवेदयः ॥ ८९ ॥
रजतं षोडशगुणं भवेत् स्वर्णस्य मूल्यकम् ।

धातुओं के मूल्य का प्रमाण—यन्त्र तथा शस्त्र रूप होने पर, लोहे का मूल्य अत्यधिक बढ़ जाता है। चांदी से सोलह गुना अधिक मूल्य सोने का होता है।

ताम्रं रजतमूल्यं स्यात् प्रायोऽशीतिगुणं तथा ॥ ९० ॥
ताम्राधिकं सार्धगुणं वङ्गं वङ्गात्तथा परे ।
रङ्गसीसे द्विर्त्रिगुणे ताम्राल्लोहं तु षड्गुणम् ॥ ९१ ॥
मूल्यमेतद्विशिष्टं तु ह्युक्तं प्राङ्मूल्यकल्पनम् ।

प्रायः तांबे से अस्सी गुना अधिक मूल्य चांदी का होता है। वंग से डेढ़ गुना अधिक तांबे का मूल्य होता है। और वङ्ग से अन्य रांगा तथा सीसा क्रम से ताम्र से द्विगुण तथा त्रिगुण मिलते हैं। और लोह षड्गुने मिलते हैं। यह विशिष्ट रूप से मूल्य कहा गया है, क्योंकि पूर्व से ही मूल्य का वर्णन किया गया है।

सुशृङ्गवर्णा सुदुघा बहुदुग्धा सुवत्सका ॥ ९२ ॥
तरुण्यल्पा वा महती मूल्याधिक्याय गौर्भवेत् ।
पीतवत्सा प्रस्थदुग्धा तन्मूल्यं रजतं पलम् ॥ ९३ ॥

अधिक मूल्य गौ के लक्षण—सुन्दर सींग तथा वर्णवाली, दुहने में क्लेश नहीं पहुँचानेवाली, अधिक दूध देनेवाली, सुन्दर बछड़ेवाली, जवान ऐसी गौ चाहे वह छोटी हो या बड़ी हो तो उसका मूल्य अधिक होता है। पीले वर्ण

२१६शुक्रनीतिः

की बछुरुवेवाली गौ यदि अच्छा दूध देनेवाली हो तो उसका मूल्य १ पल (४ तोला) चांदी है।

अजायाश्च गवाद्धं स्यान्मेष्या मूल्यमजार्धकम् ।
**बकरी आदि के मूल्य का प्रमाण—**और बकरी का मूल्य गौ के मूल्य से आधा होता है तथा भेड़ी का मूल्य बकरी से आधा होता है।

दृढस्य युद्धशीलस्य पलं मेषस्य राजतम् ॥ ६४ ॥
दृढ़ शरीरवाला एवं लड़ने में निपुण भेड़े का मूल्य एक पल चांदी है।

दश वाऽष्टौ पलं मूल्यं राजतं तूत्तमं गवाम् ।
पलं मेष्या अवेर्वापि राजतं मूल्यमुत्तमम् ॥ ९५ ॥
गवां समं सार्धगुणं महिष्या मूल्यमुत्तमम् ।
**गौ आदि के उत्तम मूल्यों का निर्देश—**और गौ का उत्तम मूल्य १० या ८ पल चांदी है। भेड़ी या भेड़ का उत्तम मूल्य १ पल चांदी है। भैंस का उत्तम मूल्य गौ के बराबर या डेढ़गुना अधिक होता है।

सुशृङ्गवर्णबलिनो वोढुः शीघ्रगमस्य च ॥ ९६ ॥
अष्टतालवृषस्यैव मूल्यं षष्टिपलं स्मृतम् ।
सुन्दर सींग तथा वर्ण एवं बल से युक्त, बोझा ढोनेवाला तथा जल्दी २ चलनेवाला तथा आठ ताल (अंगूठा तथा मध्यमा अंगुली फैलाकर नापने से जितनी लम्बाई होती है, उसे 'ताल' कहते हैं) के बराबर ऊँचे बैल का ६० पल चांदी मूल्य होता है।

महिषस्योत्तमं मूल्यं सप्त चाष्टौ पलानि च ॥ ९७ ॥
भैंस का उत्तम मूल्य १० या ८ पल चांदी होता है।

द्वित्रिचतुःसहस्रं वा मूल्यं श्रेष्ठं गजाश्वयोः ।
उष्ट्रस्य माहिषसमं मूल्यमुत्तममीरितम् ॥ ९८ ॥
**हाथी आदि के उत्तम मूल्यों का निर्देश—**हाथी और घोड़े का श्रेष्ठ मूल्य गुणानुसार २, ३ या ४ हजार मुद्रा या पल चांदी होता है। ऊंट का उत्तम मूल्य महिष के समान ही होता है।

योजनानां शतं गन्ता चैकेनाह्नाऽश्व उत्तमः ।
मूल्यं तस्य सुवर्णानां श्रेष्ठं पञ्चशतानि हि ॥ ९६ li
**उत्तम अश्व आदि के लक्षण और मूल्य का निर्देश—**एक दिन में १०० योजन (४०० कोश) जानेवाले घोड़े उत्तम कहलाते हैं। उनका श्रेष्ठ मूल्य ५०० सुवर्ण (स्वर्णमुद्रा) होता है।

त्रिंशद्योजनगन्ता वै उष्ट्रः श्रेष्ठस्तु तस्य वै ।
पलानां तु शतं मूल्यं राजतं परिकीर्तितम् ॥ १०० ॥

चतुर्थाऽध्याये कोशनिरूपणप्रकरणम् २१७

चतुर्थाऽध्याये कोशनिरूपणप्रकरणम् २१७

तीस योजन जानेवाला ऊँट श्रेष्ठ कहलाता है उसका मूल्य १०० पल चांदी है।

चतुर्माषमितं स्वर्णं निष्क इत्यभिधीयते । पञ्चरक्तिमितो माषो गजमौल्ये प्रकीर्तितः ॥ १०१ ॥ ४ माशे सोने का १ निष्क होता है। हाथी का मूल्य निश्चय करने में ५ रत्ती का १ माशा माना जाता है।

रत्नभूतं तु तत्तत्स्याद्यद्यदप्रतिमं भुवि । यथादेशं यथाकालं मूल्यं सर्वस्य कल्पयेत् ॥ १०२ ॥ देश-कालानुसार सर्वो की मूल्य-कल्पना करने का निर्देश—जो-जो वस्तुयें संसार में अनुपम ( बेजोड़ ) होती हैं वे सभी रत्नस्वरूप मानी जाती हैं। अत :एव उन सबों का मूल्य देश तथा काल के अनुसार निश्चित करना चाहिये।

न मूल्यं गुणहीनस्य व्यवहाराक्षमस्य च । नीचमध्योत्तमत्वं च सर्वस्मिन्मूल्यकल्पने ॥ १०३ ॥ चिन्तनीयं बुधैर्लोकाद्दृष्टुजातस्य सर्वदा । जो वस्तु गुणों से हीन तथा व्यवहार करने के लिये अयोग्य होती है, उसका मूल्य कुछ भी नहीं होता है। और बुद्धिमान व्यक्ति को लोक-परम्परा द्वारा सर्वत्र मूल्य निश्चय करने में समस्त वस्तुओं के नीच, मध्यम तथा उत्तम भेदों को सदा समझकर तदनुसार विचार करना चाहिये ।

विक्रेतृक्रेतृतो राजभागः शुल्कमुदाहृतम् ॥ १०४ ॥ शुल्क के लक्षण—बेचने तथा खरीदनेवाले से राजा जो अपना अंश लेता है उसे 'शुल्क' कहते हैं ।

शुल्कदेशा हट्टमार्गाः करसीमाः प्रकीर्तिताः । वस्तुजातस्यैकवारं शुल्कं ग्राह्यं प्रयत्नतः ॥ १०५ ॥ वस्तुओं के शुल्क को एक बार ही ग्रहण करने का निर्देश—शुल्क ( चुंगी ) लेनेवाला स्थान बाजार के मार्ग (खरीदनेवालों से लेने के लिये ) तथा करसीमा ( चुंगी लगाने के स्थान की सीमा पर बना चुंगी घर ) जहां पर व्यापारियों ( बेचनेवालों ) से चुंगी ली जाती है । समस्त वस्तुओं का प्रयत्नपूर्वक एक बार ही चुंगी लेनी चाहिये ।

क्वचिन्नैवासकृच्छुल्कं राष्ट्रे ग्राह्यं नृपैश्छलात् । द्वात्रिंशांशं हरेद्राजा विक्रेतुः क्रेतुरेव वा ॥ १०६ ॥ विंशांशं वा षोडशांशं शुल्कं मूल्याविरोधकम् । न हीनसममूल्याद्धि शुल्कं विक्रेतुतो हरेत् ॥ १०७ ॥ लाभं दृष्ट्वा हरेच्छुल्कं क्रेतृतश्च सदा नृपः ।

२१८ | शुक्रनीतिः

अपने राज्य में राजा कभी भी छल से बारंबार किसी वस्तु की चुंगी न लेवे। और राजा बेचने या खरीदनेवालों से वस्तु के मूल्य का ३२ वां अंश चुंगी के रूप में ग्रहण करे अथवा मूल धन को छोड़कर लाभ में से बीसवां या सोलहवां अंश चुंगी लेवे। जिस विक्रेता (बेचनेवाले) को मूल धन से कम या बराबर मूल्य वस्तु का मिले, उससे चुंगी न लेवे। और राजा थोड़े मूल्य से अधिक द्रव्य का लाभ देखकर तदनुसार ही खरीदनेवाले से चुंगी सदा लेवे।

बहुमध्याल्पफलितां भुवं मानमितां सदा ॥ १०८ ॥
ज्ञात्वा पूर्वं भागमिच्छुः पश्चाद्भागं विकल्पयेत् ।
हरेच्च कर्षकाद्भागं यथा नष्टो भवेन्न सः ॥ १०६ ॥

किसान से भाग (मालगुजारी) लेने का प्रमाण— सदा करग्रहण का अभिलाषी राजा प्रथम भूमि को नाप कर और उसके बहुत, मध्यम वा कम पैदावार को समझ कर पश्चात तदनुसार कर का निश्चय करे। और कृषक से उतना ही कर लेवे जितने से वह नष्ट (क्षतिग्रस्त) न होवे।

मालाकार इव ग्राह्यो भागो नाङ्गारकारवत् ।
बहुमध्याल्पफलतस्तारतम्यं विमृश्य च ॥ ११० ॥

माली जैसे लता आदि से थोड़ा २ फूल चुनता है उसी भांति राजा भी थोड़ा कर लेवे किन्तु जैसे कोयला बनानेवाला संपूर्ण वृक्षों के जड़ को जलाकर कोयला बनाता है वैसा संपूर्ण कर रूप में न ले लेवे। और बहुत, मध्यम तथा कम पैदावार के तारतम्य को समझ कर तदनुसार ही कर लेवे।

राजभागादि व्ययतो द्विगुणं लभ्यते यतः ।
कृषिकृत्यं तु तच्छ्रेष्ठं तन्न्यूनं दुःखदं नृणाम् ॥ १११ ॥

उत्तम कृषिकृत्य के लक्षण— राजा का कर (मालगुजारी) आदि संपूर्ण व्यय को काट-कर जिस खेती से दुगुना लाभ हो, वह उत्तम खेती कहलाती है इससे कम लाभ होने पर कृषकों को दुःख देनेवाली खेती हो जाती है।

तडागवापिकाकूपमातृकाद्देवमातृकात् ।
देशान्नदीमातृकात्तु राजाऽनुक्रमतः सदा ॥ ११२ ॥
तृतीयांशं चतुर्थांशमर्धांशं तु हरेत्फलम् ।
षष्ठांशमूषरात्तद्वत्पाषाणादिसमाकुलात् ॥ ११३ ॥

तडागादिकों से संपन्न भूमि से ग्राह्य राजभाग का तारतम्य-निर्देश— राजा क्रमानुसार सदा तडाग (तालाब), बावली या कूप के जल से सींचे जानेवाले खेतों से तृतीयांश, वर्षा के द्वारा सिंचाई होनेवाले खेतों से चतुर्थांश तथा नदी से सिंचाई होनेवाले खेतों से उपज का आधा अंश एवं बंजर तथा पथरीली जमीन से होनेवाले आय का छठा अंश कर रूप में ग्रहण करे।

चतुर्थाध्याये कोशानिरूपणप्रकरणम् २१६

राजभागस्तु रजतशतकर्षमितो यतः ।
कर्षकाल्लभ्यते तस्मै विंशांशमुत्सृजेन्नृपः ॥ ११४ ॥

जिस कृषक से राजा को १०० रूपये भर चांदी (चांदी का रुपया) कर रूप में मिलता हो तो उस (कृषक) के लिये राजा अपने कर में से बीसवां भाग (५ रुपये) अपनी ओर से दे देवे ।

स्वर्णार्धं च रजतात्तृतीयांशं च ताम्रतः ।
चतुर्थांशं तु षष्ठांशं लोहाद्वङ्गाच्च सीसकात् ॥ ११५ ॥
रत्नार्धं चैव क्षारार्धं खनिजाद्व्ययशेषतः ।
लाभाधिक्यं कर्षकादेर्यथा दृष्ट्वा हरेत्फलम् ॥ ११६ ॥
त्रिधा वा पञ्चधा कृत्वा सप्तधा दशधाऽपि वा ।

रजतादियुक्त भूमि के लिये राजभाग-नियम— व्यय को काटकर खान से उत्पन्न होनेवाले सोना से आधा अंश, चांदी से तृतीयांश, तामा से चतुर्थांश, लोहा, वंग तथा सीसा से षष्ठांश, रत्नों से तथा क्षार पदार्थ नमक आदि से आधा अंश एवं कृषक आदि के लाभ की अधिकता देखकर तदनुसार तृतीयांश, पञ्चमांश, सप्तमांश या दशमांश कर ग्रहण राजा को करना चाहिये ।

तृणकाष्ठादिहरकाद्विंशांशं हरेत्फलम् ॥ ११७ ॥

तृणकाष्ठादिविक्रेता आदि से २० वाँ भाग कर लेने का निर्देश— और तृण-काष्ठ आदि लाकर बेचनेवालों से २० वाँ अंश कर लेना चाहिये ।

अजाविगोमहिष्यश्ववृद्धितोऽष्टांशमाहरेत् ।
महिष्यजाविगोदुग्धात्षोडशांशं हरेन्नृपः ॥ ११८ ॥

बकरी आदि की वृद्धि से ८ वां भाग लेने का निर्देश— बकरी, भेड़, गौ, भैंस और घोड़ों की वृद्धि में से अष्टमांश कर राजा ग्रहण करे। भैंस, बकरी, भेड़, तथा गाय के दूध में से १६ वां भाग कर ग्रहण करे ।

कारुशिल्पिगणात्पक्षे दैनिकं कर्मकारयेत् ।
तस्य वृद्ध्यै तडागं वा वापिकां कृत्रिमां नदीम् ॥ ११९ ॥
कुर्वन्त्यन्यत् तद्विधं वा कर्षन्त्यभिनवां भुवम् ।
यद्व्ययद्विगुणं यावन्न तेभ्यो भागमाहरेत् ॥ १२० ॥

कारु आदि से कर लेने के प्रकार का निर्देश— कारु (बढ़ई आदि) तथा शिल्पी (चित्रकार आदि) आदि के वर्गों से हर एक पक्ष (१५ दिन) में एक दिन कर रूप में उनसे मुफ्त में काम करा लेवे । और जो राज्य की उन्नति के लिये तालाब, बावली, या कृत्रिम नदी (नहर) या इसी के समान और किसी दूसरे कार्य का निर्माण करते हैं उन लोगों से तथा जो नवीन भूमि को जोत कर खेती के योग्य बनाते हैं, उन लोगों से जब तक व्यय काटकर दूना

२२०शुक्रनीतिः

लाभ न होने लगे तब तक कर नहीं लेना चाहिये उसके बाद अधिक लाभ होने पर लेना चाहिये ।

भूविभागं भृतिं शुल्कं वृद्धिमुत्कोचकं करम्।
सद्य एव हरेत्सर्वं न तु कालविलम्बनैः ॥ १२१ ॥

भूमिभागादि को तत्काल लेने का निर्देश— अपनी जमीन का हिस्सा, अलग कराना, वेतन, चुंगी, ब्याज, घूस या दलाली, कर (मालगुजारी), इन सबों को तत्काल ले लेना चाहिये, इनमें विलम्ब करना अनुचित है।

दद्यात्प्रतिकर्षकाय भागपत्रं सचिह्नितम्।
नियम्य ग्रामभूभागमेकस्माद्धनिकाद्धरेत् ॥ १२२ ॥
गृहीत्वा तत्प्रतिमुखं धनं प्राक् तत्समं तु वा।
विभागशो गृहीत्वाऽपि मासि मासि ऋतावृत्तौ ॥ १२३ ॥
षोडशाद्वादशदशाष्टांशतो वाऽधिकारिणः।
स्वांशात् षष्ठांशभागेन ग्रामपान् संनियोजयेत् ॥ १२४ ॥

किसान को भागपत्र ः लिख देने का एवं ग्राम के किसी धनी को प्रतिभू बनाकर उसी से कर लेने का निर्देश— राजा हर एक किसान को मालगुजारी की रसीद लिखकर उसपर अपनी मुहर भी लगाकर दे देवे। अथवा ग्राम की सभी भूमि का कर नियत कर किसी एक धनिक से सभी कर ले लेवे। और उस धनिक को किसानों का जामिनदार मान ले। जो कि राजकर को प्रति-मास या प्रति ऋतु सबसे अलग-अलग २ लेकर राजा को दिया करे। और योग्यतानुसार सोलहवां, बारहवां, दसवां या आठवां अंश जो राजा को मिलनेवाला कर हो उसका छठवां भाग वेतन रूप में देकर राजा ग्रामपाल (मुखिया) या अधिकारी की नियुक्ति करे।

गवादिदुग्धान्नफलं कुटुम्बार्थाद्धरेन्नृपः।
उपभोगे धान्यवस्त्रं क्रेतुर्तो नाहरेत् फलम् ॥ १२५ ॥

क्वचित् कर लेने के निषेध का निर्देश— राजा कुटुम्बपालनार्थ रखी हुई गो आदि के दुग्ध के ऊपर कर न लेवे, और अपने उपभोग के लिये धान्य तथा वस्त्र खरीदनेवाले से भी कर न ग्रहण करे।

वार्धुषिकाच्च कौसीदाद् द्वात्रिंशांशं हरेन्नृपः।
गृहाद्याधारभूशुल्कं कृष्टभूमिरिवाहरेत् ॥ १२६ ॥

व्यापारी आदि से लाभ का ३२ वां भाग लेने का निर्देश— व्यापार करनेवालों और। ब्याज पर रुपया देनेवालों से लाभांश का ३२ वां अंश (रुपये में दो पैसा) कर राजा ग्रहण करे। और गृह बनाने के लिये दी हुई भूमि का कर बोने के लिये दी हुई भूमि के समान ही लेवे।

चतुर्थोऽध्याये राष्ट्रप्रकरणम् २२१

तथा चापणिकेभ्यस्तु पण्यभूशुल्कमाहरेत् ।
मार्गसंस्काररक्षार्थं मार्गगेभ्यो हरेत् फलम् ॥ १२७ ॥
दुकानदार आदि से भूमि का कर लेने का निर्देश— राजा दूकानदारों से दूकान की भूमि का कर ग्रहण करे। और यात्रियों से मार्ग की सफाई तथा रक्षा के लिये भी कर ग्रहण करे।

सर्वतः फलभुग् भूत्वा दासवत् स्यात्तु रक्षणे ।
इति कोशप्रकरणं समासात् कथितं किल ॥ १२८ ॥
इति शुक्रनीतौ चतुर्थाध्यायस्य कोशनिरूपणं नाम द्वितीयं प्रकरणम् ॥ २ ॥

राजा सबों से कर ग्रहण कर नौकर की भांति उनकी रक्षा करे। इस प्रकार से संक्षेप में कोश-प्रकरण का वर्णन किया गया।
इस प्रकार शुक्रनीति भाषा टीका में चतुर्थाध्याय का कोशनिरूपण नाम का द्वितीय प्रकरण समाप्त ॥


अथ चतुर्थाध्यायस्य तृतीयं राष्ट्रप्रकरणम् ।

अथ मिश्रे तृतीयं तु राष्ट्रं वक्ष्ये समासतः ।
स्थावरं जङ्गमं वापि राष्ट्रशब्देन गीयते ॥ १ ॥
राष्ट्र के दो प्रकारों का निर्देश— अब इस मिश्र अध्याय में तीसरा राष्ट्र प्रकरण का संक्षेप में वर्णन करूंगा। यहां पर 'राष्ट्र' शब्द से स्थावर (वृक्ष-पर्वतादि) तथा जङ्गम (गो-मनुष्यादि) का बोध करना चाहिये।

यस्याधीनं भवेद्यावत्तद्राष्ट्रं तस्य वै भवेत् ।
कुबेरता शतगुणाधिका सर्वगुणात्ततः ॥ २ ॥
ईशता चाधिकतरा सा नाल्पतपसः फलम् ।
स दीव्यति पृथिव्यां तु नान्यो देवो यतः स्मृतः ॥ ३ ॥
राज्य तथा राजा की सर्वश्रेष्ठता एवं देवतुल्यता का निर्देश— जिस राजा के अधीन जितना राष्ट्र होता है उतना उसका वह 'राज्य' कहलाता है। सर्व-गुण-सम्पन्न होने की अपेक्षा सौ गुना अधिक श्रेष्ठ धन-कुबेर होना है, उसके बाद राजा होना सबसे अधिक श्रेष्ठ है जो कि साधारण तपस्या का फल नहीं है, क्योंकि वह संसार में देवता के समान विहार करता है अतः उसके अतिरिक्त अन्य कोई देवता के समान नहीं माना जाता है।

यस्याश्रितो भवेल्लोकस्तद्वदाचरति प्रजा।

२२२शुक्रनीतिः

भुङ्क्ते राष्ट्रफलं सम्यगतो राष्ट्रकृतं त्वघम् ॥ ४ ॥

**राजा को देश के पुण्य और पाप का भोक्ता होने का निर्देश—**जैसे राजा के आश्रय में लोग रहते हैं और वह जैसा आचरण करता है उसकी प्रजावें भी वैसा ही आचरण करती हैं। इसी से वह राजा भी राष्ट्र (राज्यवर्ती प्रजा) के किये हुये पाप-पुण्य का फल दुःख-सुख का भली भांति भोग करता है।

स्वस्वधर्मपरो लोको यस्य राष्ट्रे प्रवर्तते ।
धर्मनीतिपरो राजा चिरं कीर्तिं स चाश्नुते ॥ ५ ॥
भूमौ यावद्यस्य कीर्तिस्तावत्स्वर्गे स तिष्ठति ।

जिस राजा के राज्य में प्रजाजन अपने २ धर्म में तत्पर रहते हैं, धर्म तथा नीति में तत्पर रहनेवाला वह राजा चिरस्थायी कीर्ति को प्राप्त करता है। पृथ्वी पर जिसकी कीर्ति जब तक विद्यमान रहती है, तब तक वह स्वर्ग में रहता है।

अकीर्तिरेव नरको नान्योऽस्ति नरको दिवि ॥ ६ ॥
नरदेहाद्विना त्वन्यो देहो नरक एव सः ।
महत्पापफलं विद्यादाधिव्याधिस्त्र रूपकम् ॥ ७ ॥

**नरक के लक्षण का निर्देश—**अपकीर्ति ही नरक है, परलोक में अन्य कोई नरक नहीं है। मनुष्य देह को छोड़कर अन्य देह नरक ही हैं। और आधि व्याधि का होना बड़े पाप का फल ही समझना चाहिये।

स्वयं धर्मपरो भूत्वा धर्मे संस्थापयेत् प्रजाः ।
प्रमाणभूतं धर्मिष्ठमुपसर्पन्त्यतः प्रजाः ॥ ८ ॥

**राजा के धर्मिष्ठ बनने का निर्देश—**राजा स्वयं धर्म में तत्पर होकर प्रजाओं को धर्म में स्थापित रक्खे। इससे प्रजायें भी प्रामाणिक तथा धर्मिष्ठ राजा की अनुगामिनी बनी रहती हैं।

देशधर्मा जातिधर्माः कुलधर्माः सनातनाः ।
मुनिप्रोक्ताश्च ये धर्माः प्राचीना नूतनाश्च ये ॥ ९ ॥
ते राष्ट्रगुप्त्यै सन्धार्या ज्ञात्वा यत्नेन सन्नृपैः ।
धर्मसंस्थापनाद्राजा श्रियं कीर्तिं प्रविन्दति ॥ १० ॥

**सर्वधर्म-रक्षण से देश-रक्षा होने का निर्देश—**बहुत दिनों से प्रचलित देश-धर्म, जाति-धर्म, तथा कुल-धर्म एवं मुनियों द्वारा कहे हुये धर्म, तथा प्राचीन और नवीन धर्म, इन सबों का ज्ञान प्राप्त कर राष्ट्र की रक्षा के लिये यत्नपूर्वक अच्छे राजाओं को इनकी रक्षा करनी चाहिये। क्योंकि धर्म की संस्थापना करने से राजा लक्ष्मी तथा कीर्ति को प्राप्त करता है।

चतुर्धा भेदिता जातिर्ब्राह्मणा कर्मभिः पुरा ।

चतुर्थाध्याये राष्ट्रप्रकरणम् २२३

तत्तत्सांकर्यासांकर्यात् प्रतिलोमानुलोमतः ॥ ११ ॥
जात्यानन्त्यं तु सम्प्राप्तं तद्वक्तुं नैव शक्यते ।

**मुख्य जाति के ४ प्रकारों का तथा संकरता से जाति की अनन्तता का निर्देश—**पूर्वकाल में ब्रह्मा जी ने कर्म के अनुसार मानव की ४ जातियां बनाईं। उनमें प्रत्येक जातियों का सांकर्य (मिलावट) होने पर उन संकीर्ण (मिश्रित) जातियों का भी सांकर्य अनुलोम (पिता उच्च वर्ण-माता नीच वर्ण) और प्रतिलोम (पिता नीच वर्ण-माता उच्च वर्ण) रूप से होने से असंख्य जातियां हो गई जिनका वर्णन करना अशक्य है ।

मन्यन्ते जातिभेदं ये मनुष्याणां तु जन्मना ॥ १२ ॥
त एव हि विजानन्ति पार्थक्यं नामकर्मभिः ।

जो लोग पूर्व कर्मानुसार जिस जाति में मनुष्य जन्म ले उसकी वही जाति मानते हैं, वे ही लोग नाम तथा कर्म से जाति-भेद मानते हैं, अन्य लोग नहीं मानते हैं ।

जरायुजाण्डजाः स्वेदोज्भिज्जा जातिः सुसंग्रहात् ॥ १३ ॥

**जरायुजादि चार प्राणियों की जाति का निर्देश—**जरायुज (मनुष्यादि), अण्डज (पक्षी आदि), स्वेदज (जूंआ आदि), उद्भिज्ज (वृक्षादि) ये ४ प्रकार के प्राणियों की जातियां हैं ।

उत्तमो नीचसंसर्गाद्भवेन्नीचस्तु जन्मना ।
नीचो भवेन्नोत्तमस्तु संसर्गाद्वाऽपि जन्मना ॥ १४ ॥

जन्म से उत्तम वर्ण का मनुष्य संसर्गवश नीच हो जाता है किन्तु जन्म से नीच वर्ण का मनुष्य संसर्गवश उत्तम नहीं हो सकता है ।

कर्मणोत्तमनीचत्वं कालतस्तु भवेद् गुणैः ।
विद्याकलाश्रयेणैव तन्नाम्ना जातिरुच्यते ॥ १५ ॥

कर्म के द्वारा मनुष्य तत्काल उत्तम तथा नीच कहलाने लगता है । किन्तु गुणों के द्वारा कुछ काल के बाद उत्तम या नीच माना जाता है और विद्या तथा कला के आश्रय से भी उसके नामानुसार अनेक जातियों की कल्पना की गई है ।

इज्याध्ययनदानानि कर्माणि तु द्विजन्मनाम् ।
प्रतिग्रहोऽध्यापनं च याजनं ब्राह्मणेऽधिकम् ॥ १६ ॥

**द्विजों तथा ब्राह्मणों के कर्मों का निर्देश—**यज्ञ करना, वेद पढ़ना, दान देना ये ३ कर्म द्विजाति (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य) मात्र के हैं किन्तु ब्राह्मणों के लिये यज्ञ कराना, वेद पढ़ाना, दान लेना ये ३ कर्म जीविका के लिये अधिक हैं ।

२२४शुक्रनीतिः

सद्रक्षणं दुष्टनाशः स्वांशादानं तु क्षत्रिये ।
कृषिगोगुप्तिवाणिज्यमधिकं तु विशां स्मृतम् ॥ १७ ॥

**क्षत्रिय और वैश्य के कर्मों का निर्देश—**सज्जनों की रक्षा करना, दुष्टों का नाश करना, अपने अंश (कर) को ग्रहण करना ये ३ कर्म क्षत्रियों के जीविका के लिये अधिक हैं। खेती करना, गोपालन तथा वाणिज्य करना ये ३ कर्म जीविकार्थ वैश्यों के लिये अधिक हैं।

दानं सेवैव शूद्रादेर्नीचकर्म प्रकीर्तितम् ।
क्रियाभेदैस्तु सर्वेषां भृतिवृत्तिरनिन्दिता ॥ १८ ॥

**शूद्रादि के कर्मों का निर्देश—**दान देना, जीविकार्थ नौकरी करना तथा नीच कर्म (चौका-बर्त्तन आदि) करना शूद्रादि के ये कर्म हैं। क्रियाओं में भेद द्वारा सभी वर्णों की भरण-पोषणार्थ वृत्ति अनिन्दित मानी गई है।

सीरभेदैः कृषिः प्रोक्ता मन्वाद्यैर्ब्राह्मणादिषु ।
ब्राह्मणैः षोडशगवं चतुरूनं यथा परैः ॥ १६ ॥
द्विगवं वाऽन्त्यजैः सीरं दृष्ट्वा भूमार्दवं तथा ।

**ब्राह्मणादि के लिये कृषि-भेद का निर्देश—**जैसे मनु आदि स्मृतिकारों ने हलसम्बन्धी भेदों के द्वारा ब्राह्मणादि के लिये भी कृषि करने का विधान बताया है। उसमें ब्राह्मणों को १६ बैल १ हल पर रख कर खेत जुतवाना चाहिये, और उत्तरोत्तर ४-४ कम बैलों से अर्थात् क्षत्रियों को १२ बैल, वैश्यों को ८ बैल तथा शूद्रों को ४ बैल १ हल पर रखते हुये खेत जुतवाना चाहिये। और अन्त्यजों (अस्पृश्य जातियों) को २ बैल १ हल पर रखना चाहिये। यह नियम भूमि की मृदुता को देखकर किया गया है अतः यदि कठिन भूमि हो तो बैलों की संख्या २ से ४ भी हो सकती है।

ब्राह्मणेन विनाऽन्येषां भिक्षावृत्तिर्विगर्हिता ॥ २० ॥

**ब्राह्मण के अतिरिक्त अन्य को भिक्षा निन्दित होने का निर्देश—**ब्राह्मणों को छोड़ कर अन्य वर्णों के लिये भिक्षा मांग कर जीविका चलाना विशेष रूप से निन्दित है।

तपोविशेषैर्विविधैर्व्रतैश्च विधिचोदितैः ।
वेदः कृत्स्नोऽधिगन्तव्यः सरहस्यो द्विजन्मना ॥ २१ ॥

**द्विजाति को साङ्गवेद पढ़ने का निर्देश—**द्विजों को वेद-विहित नाना प्रकार की तपस्यायें तथा व्रत करते हुये उपनिषदों के सहित सम्पूर्ण वेदों का अध्ययन करना चाहिये।

योऽधीतविद्यः सकलः स सर्वेषां गुरुर्भवेत् ।
न च जात्याऽनधीती यो गुरुर्भवितुमर्हति ॥ २२ ॥

चतुर्थाऽध्याये विद्याकलानिरूपणप्रकरणम् २२५

गुरु का लक्षण—जिस द्विज ने संपूर्ण विद्याओं तथा कलाओं का अध्ययन किया है वही सबों का गुरु (श्रेष्ठ या उपदेष्टा) होने योग्य होता है, बिना इसके केवल जातिमात्र से वह गुरु नहीं हो सकता है।

विद्या ह्यनन्ताश्च कलाः संख्यातुं नैव शक्यते ।
विद्यामुख्याश्च द्वात्रिंशच्चतुःषष्टिकलाः स्मृताः ॥ २३ ॥

मुख्य विद्या ३२ और कला ६४ होने का निर्देश—यद्यपि विद्यायें तथा कलायें अनन्त हैं अतः उनकी गणना नहीं की जा सकती है, तथापि उनमें से मुख्य रूप से ३२ विद्यायें तथा ६४ कलायें मानी गई हैं।

यद्यत्स्याद्वाचिकं सम्यक्कर्मविद्याभिसंज्ञकम् ।
शक्तो मूकोऽपि यत्कर्तुं कलासंज्ञं तु तत्स्मृतम् ॥ २४ ॥

विद्या और कला के लक्षण—जो २ कर्म वाणी द्वारा भलीभांति संपन्न किया जा सकता है वह 'विद्या' नाम से प्रसिद्ध है और जिसे गूंगा भी हाथ से कर सकता है उसे 'कला' कहते हैं ।

उक्तं संक्षेपतो लक्ष्म विशिष्टं पृथगुच्यते ।
विद्यानां च कलानां च नामानि तु पृथक् पृथक् ॥ २५ ॥

इस प्रकार से संक्षेप में लक्षण कहा गया, अब विशेष रूप से पृथक् २ लक्षण कहते हैं । उनमें विद्याओं तथा कलाओं के नाम पृथक् २ ये सब हैं।

ऋग्यजुः साम चाथर्वं वेदा आयुर्धनुः क्रमात् ।
गान्धर्व्वंश्चैव तन्त्राणि उपवेदाः प्रकीर्तिताः ॥ २६ ॥

विद्याओं में वेद तथा उपवेद के नामों का निर्देश—जैसे विद्यायें १. ऋग्वेद, २. यजुर्वेद, ३. सामवेद, ४. अथर्ववेद ये ४ वेद हैं और क्रम से ५. आयुर्वेद, ६. धनुर्वेद, ७. गान्धर्ववेद, ८. तन्त्र ये ४ उपवेद हैं ।

शिक्षा व्याकरणं कल्पो निरुक्तं ज्यौतिषं तथा ।
छन्दः षडङ्गानीमानि वेदानां कीर्तितानि हि ॥ २७ ॥

वेदों के ६ अंगों का निर्देश—९. शिक्षा, १०. व्याकरण, ११. कल्प, १२. निरुक्त, १३. ज्योतिष, १४. छन्द ये वेदों के ६ अङ्ग माने गये हैं ।

मीमांसातर्कसांख्यानि वेदान्तो योग एव च ।
इतिहासाः पुराणानि स्मृतयो नास्तिकं मतम् ॥ २८ ॥
अर्थशास्त्रं कामशास्त्रं तथा शिल्पंमलङ्कृतिः ।
काव्यानि देशभाषाऽव-सरोक्त्योर्ब्वनं मतम् ॥ २९ ॥
देशादिधर्मा द्वात्रिंशदेता विद्याभिसंज्ञिताः ।

मीमांसादि विद्याओं के नामों का निर्देश—१५. मीमांसा, १६. तर्क (न्याय वैशेषिक), १७. सांख्य, १८. वेदान्त, १९. योग, २०. इतिहास,