शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
महर्षि शुक्राचार्य द्वारा
स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)
३७० | शुक्रनीतिः
शीघ्रता के साथ धनुषादि पर चढ़ाना, फिर छोड़ना, फिर ग्रहण करना और फिर छोड़ना ऐसा बार-बार करना, अपने को छिपाना, शस्त्र तथा अस्त्रों का योग्यतानुसार पैंतरा बदलते हुये प्रहार करना, इन सबों को करना चाहिये।
द्वाभ्यां त्रिभिश्चतुर्भिर्वा पङ्क्तितो गमनं ततः।
तथा प्राग् भवनं चापसरणं तूपसर्जनम् ॥ २७५ ॥
**संकेतानुसार गमनादि करने का निर्देश—**कभी दो, तीन या चार की संख्या में पंक्ति बांधकर गमन करना, आगे हो जाना, पीछे हट जाना, यथा-स्थान पर पूर्ववत् स्थित हो जाना इन सबों को संकेतानुसार करे।
अपसृत्यास्त्रासद्ध्यर्थमुपसृत्य विमोक्षणे।
प्राग् भूत्वा मोचयेदस्त्रं व्यूहस्थः सैनिकः सदा ॥ २७६ ॥
**सदा व्यूहबद्ध होकर अस्त्रादि चलाने का निर्देश—**अस्त्र चलाने की सुविधा के लिये पीछे हटकर तथा छोड़ने के लिये समीप जाकर तथा सम्मुख रहकर व्यूहबद्ध सैनिक को सदा अस्त्र चलाना चाहिये।
आसीनः स्याद्विमुक्तास्त्रः प्राग्वा चापसरेत् पुनः।
प्रागासीनं तूपसृतो दृष्ट्वा स्वास्त्रं विमोचयेत् ॥ २७७ ॥
**अस्त्र-प्रयोगादि के समय सैनिकों की स्थिति का निर्देश—**सैनिक अस्त्र छोड़ चुकने के बाद बैठ जावे अथवा आगे की ओर सरक जावे। और आगे बैठे हुये शत्रु को देखकर उसके समीप जाकर अपने अस्त्र का प्रयोग करे।
एकैकशो द्विशो वाऽपि सङ्घशो बोधितो यथा।
क्रौञ्चानां खे गतिर्यादृक् पाङ्क्तः संप्रजायते ॥ २७८ ॥
तादृक् संचारयेत् क्रौञ्चव्यूहं देशबलं यथा।
सूक्ष्मग्रीवं मध्यपुच्छं स्थूलपक्षं तु पङ्क्तितः ॥ २७९ ॥
**क्रौञ्चव्यूह के लक्षण—**संकेत किये जाने पर जैसे आकाश में उड़ने पर क्रौञ्च पक्षियों की पंक्तिबद्ध स्थिति होती है वैसी एक १, दो २ या संघरूप से पंक्तिबद्ध स्थिति में रहने के द्वारा क्रौञ्चव्यूह की रचना देश तथा सैन्य के अनुसार करे। इसमें ग्रीवा भाग पतला, पुच्छभाग मध्यम तथा दोनों पक्षों के भाग मोटे रहते हैं। इसमें ऐसी सैनिकों की पंक्ति स्थिति रहती है।
बृहत्पक्षं मध्यगलपुच्छं श्येनं मुखे तनु।
**श्येनव्यूह के लक्षण—**जिसके दोनों पक्षभाग विशाल हों और गला तथा पुच्छभाग मध्यम हो एवं मुखभाग पतला हो, ऐसी यदि सैनिकों की पंक्ति हो तो उसे 'श्येनव्यूह' कहते हैं।
चतुष्पान्मकरो दीर्घस्थूलवक्त्रद्विरोष्ठकः ॥ २८० ॥
**मकरव्यूह के लक्षण—**जिसके ४ भाग में ४ पैर हों तथा दीर्घ और मोटा
चतुर्थाध्याये सेनानिरूपणप्रकरणम् ३७१
मुख भाग हो और उसमें दो ओष्ठ भाग हों। ऐसी पंक्ति में स्थित सेना को 'मकरव्यूह' कहते हैं।
सूचीसूक्ष्ममुखो दीर्घ-समदण्डान्तरन्ध्रयुक् ।
**सूचीमुख तथा चक्रव्यूह के लक्षण—**जिसका मुखभाग सूची के समान पतला हो और मध्यभाग समान भाव से दण्डाकार लम्बा हो, तथा अन्त में स्थित मुखभाग में छिद्रयुक्त हो ऐसी सेना की पंक्ति को 'सूचीमुख' व्यूह कहते हैं।
चक्रव्यूहश्चैकमार्गो ह्यष्टधा कुण्डलीकृतः ॥ २८१ ॥
जो चक्राकार गोल हो एवं मध्य में आठ भागों में विभक्त कुंडली आकार के मार्ग बने हों एवं उसके अन्दर घुसने के लिये एक ही मार्ग हो तो ऐसी सेनापंक्ति को 'चक्रव्यूह' कहते हैं।
चतुर्दिक्ष्वष्टपरिधिः सर्वतोभद्रसंज्ञकः ।
अमार्गश्चाष्टवलयी गोलकः सर्वतोमुखः ॥ २८२ ॥
**सर्वतोभद्र व्यूह के लक्षण—**जिसके चारों दिशाओं में ८-८ रेखाकार परिधि-रूप में सेना की पंक्ति हो उसे 'सर्वतोभद्र' व्यूह कहते हैं, अथवा सभी ओर जिसके मुख हों और जो आठ वलयाकार गोल पंक्तियों से युक्त एवं घुसने के मार्ग से रहित हो उसे भी 'सर्वतोभद्र' व्यूह कहते हैं।
शकटः शकटाकारो व्यालो व्यालाकृतिः सदा ।
**शकट व व्यालव्यूह के लक्षण—**शकटाकार सेनापंक्ति को 'शकटव्यूह' एवं व्याल (सर्प) के आकार की सेनापंक्ति को 'व्यालव्यूह' कहते हैं।
सैन्यमल्पं बृहद्वाऽपि दृष्ट्वा मार्गं रणस्थलम् ॥ २८३ ॥
व्यूहैर्व्यूहेन व्यूहाभ्यां सङ्करेणापि कल्पयेत् ।
**सैन्य की न्यूनता व अधिकतानुसार एवं युद्धभूमि के अनुसार १ या २ व्यूहरचना का निर्देश—**सैन्य की न्यूनता तथा अधिकता एवं मार्ग तथा रणस्थल भूमि को देखकर तदनुसार एक व्यूह अथवा दो या दो से अधिक व्यूहों से मिश्रित व्यूह-रचना की भी कल्पना की जा सकती है।
यन्त्रास्त्रैः शत्रुसेनाया भेदो येभ्यः प्रजायते ॥ २८४ ॥
स्थलेभ्यस्तेषु सन्तिष्ठेत् ससैन्यो ह्यासनं हि तत् ।
**आसन के लक्षण व उस समय के कर्तव्य—**जिन स्थलों से शत्रुसेना के ऊपर यन्त्रयुक्त अस्त्रों (तोप आदि) के द्वारा प्रहार करके उसका भेदन किया जा सके उन स्थलों में सेना के सहित राजा के ठहरने को 'आसन' कहते हैं।
तृणान्नजलसम्भारा ये चान्ये शत्रुपोषकाः ॥ २८५ ॥
सम्यङ् निरुध्य तान् यत्नात् परितश्चिरमासनात् ।
और तृण अन्न, जल आदि सामग्री तथा और भी जो वस्तुयें शत्रु की
३७२ | शुक्रनीतिः
सेना को आराम देनेवाली हों, उन सबों को आसन में (घेरा डालकर) स्थित राजा यत्नपूर्वक बहुत दिनों तक चारो ओर से रोकता रहे अर्थात् उन्हें शत्रु तक न जाने देवे।
विच्छिन्नविविधासारं प्रक्षीणयवसेन्धनम् ॥ २८६ ॥
विगृह्यमाणप्रकृति कालेनैव वशं नयेत् ।
सन्ध्याय आसन के लक्षण— शत्रु की सेना में जाने-आने के मार्ग को रोक देने पर एवं घास तथा जलाने की लकड़ी समाप्त होने पर तथा मन्त्री आदि अधिकारी वर्गों में आपस में विग्रह उपस्थित करा दे। हो जाने या करा देने पर थोड़े ही समय में शत्रु को वश में किया जा सकता है।
अरेश्च विजिगीषोश्च विग्रहे हीयमानयोः ॥ २८७ ॥
सन्धाय यदवस्थानं सन्धायासनमुच्यते ।
जब विजयार्थी आक्रमणकारी एवं शत्रु (जिसके ऊपर आक्रमण किया जाय) दोनों लड़ते २ क्षीण बल हो जाते हैं तब उन दोनों के सन्धि करके अपने २ स्थान पर स्थित रहने को ‘सन्ध्याय आसन’ कहते हैं।
उच्छिद्यमानो बलिना निरुपायप्रतिक्रियः ॥ २८८ ॥
कुलोद्भवं सत्यमार्यमाश्रयेत बलोत्कटम् ।
आश्रय के लक्षण— जब किसी बलवान् शत्रु द्वारा राज्य उच्छिन्न कर दिया जाय या उसका अवसर आ जाय और उसके प्रतीकार का कोई उपाय न दिखाई पड़े तो राजा अत्यन्त बलवान्, कुलीन, सत्यप्रतिज्ञावाले एवं श्रेष्ठ आचरण से युक्त किसी दूसरे राजा का आश्रय लेकर शत्रु को परास्त करे।
विजिगीषोस्तु साह्यार्थाः सुहृत्सम्बन्धिबान्धवाः ॥ २८६ ॥
प्रदत्तभृतिका ह्यन्ये भूपा अंशप्रकल्पिताः ।
सैवाश्रयस्तु कथितो दुर्गाणि च महात्मभिः ॥ २६० ॥
विजय के लिये चढ़ाई करनेवाले राजा के सहायता के लिये उसके मित्र, सम्बन्धी, बान्धव तथा इनसे अन्य जीविकार्थ जागीर प्राप्त किये हुये लोग किंवा ऐसे राजा जिनके लिये विजित राज्य में से नियत भाग दे देने का निश्चय किया गया हो, ये सब उचित होते हैं अतः इनके आश्रय में चला जाना किंवा किसी सुदृढ़ दुर्ग का आश्रय लेना, इसी को विद्वानों ने 'आश्रय' कहा है।
अनिश्चितोपायकार्यः समयानुचरो नृपः ।
द्वैधीभावेन वर्तेत काकाक्षिवदलक्षितम् ॥ २६१ ॥
प्रदर्शयेदन्यत्कार्यमन्यमालम्बयेच्च वा ।
द्वैधीभाव के लक्षण— समय के अनुसार बर्त्ताव करनेवाला राजा जब तक
चतुर्थोऽध्याये सेनानिरूपणप्रकरणम् ३७३
शत्रुसंकट से बचने का कोई उपाय निश्चित न कर सके तब तक किसी को पता न चल सके ऐसा कौवे के आंख की पुतळी की तरह दोनों ओर का व्यवहार रक्खे। दिखावे में दूसरा कार्य और करने में दूसरा कार्य रक्खे। इसी को 'द्वैधीभाव' कहते हैं।
सदुपायैश्च सन्मन्त्रैः कार्यसिद्धिरथोद्यमैः ॥ २६२ ॥ भवेदल्पजनस्यापि किं पुनर्नृपतेर्नहि ।
उपाय करने से कार्य सिद्ध होने का निर्देश— जब कि तुच्छ व्यक्ति के भी अच्छे उपायों, अच्छी सलाह एवं उद्यमों के द्वारा कार्य सिद्ध होते हैं तब क्या राजाओं के कार्य उन सबों के करने से नहीं हो सकते हैं अपितु अवश्य हो सकते हैं।
उद्योगेनैव सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः ॥ २९३ ॥ न हि सुप्तमृगेन्द्रस्य . निपतन्ति गजा मुखे ।
उद्योग की अवश्य कर्त्तव्यता का निर्देश— उद्योग करने से ही संपूर्ण कार्य सिद्ध होते हैं न कि केवल मनोरथ करने से क्योंकि देखा भी जाता है कि—सोये हुये व्याघ्र के मुख में बिना उद्यम के स्वयं हाथी नहीं गिर पड़ता है, अपितु उसके लिये प्रबल उद्योग करना पड़ता है तभी कार्यसिद्धि होती है।
अयोऽभेद्यमुपायेन द्रवतामुपनीयते ॥ २९४ ॥ लोकप्रसिद्धमेवैतद् वारि वह्नेर्नियामकम् । उपायोपगृहीतेन तेनैतत् परिशोष्यते ॥ २९५ ॥ उपायेन पदं मूर्ध्नि न्यस्यते मत्तहस्तिनाम् ।
अभेद्य (कठिन से कठिन) लोहा भी उपाय करने से पिघलाया जाता है। और लोक में यह प्रसिद्ध ही है कि जल अग्नि को बुझा देनेवाला होता है परन्तु यदि उपाय का अवलम्बन किया जाय तो वही अग्नि उल्टे जल को सुखा देनेवाली हो जाती है। उपाय से ही मतवाले हाथी के भी मस्तक पर पैर रक्खा जाता है।
उपायेषूत्तमो भेदः षड्गुणेषु समाश्रयः ॥ २६६ ॥ कार्यौ द्वौ सर्वदा तौ तु नृपेण विजिगीषुणा । ताभ्यां विना नैव कुर्याद् युद्धं राजा कदाचन ॥ २९७ ॥
भेद और समाश्रय की श्रेष्ठता का निर्देश— शत्रु को जीतने के लिये उपायों में सर्वोत्तम उपाय 'भेद' (फूट डालना) है तथा सन्धि आदि षड्गुणों में श्रेष्ठ 'समाश्रय' (बलवान का आश्रय) माना गया है। अतः विजय चाहने-वाला राजा सर्वदा इन दोनों को करे। इन दोनों का बिना सहारा लिये राजा किसी शत्रु के साथ कभी युद्ध न करे।
३७४ | शुक्रनीतिः
परस्परं प्रातिकूल्यं रिपुसेनपमन्त्रिणाम्।
भवेद् यथा तथा कुर्यात् तत्प्रजायाश्च तत्स्त्रियाः ॥ २९८ ॥
जिस रीति से शत्रु के सेनापति और मन्त्रियों में परस्पर अनबन हो जाय एवं शत्रु की प्रजा के साथ और रानियों के साथ किंवा सेनापति और मन्त्रियों का अपनी २ सन्तान या स्त्रियों के साथ परस्पर अनबन हो जाय उस रीति का अनुसरण राजा को करना चाहिये ।
उपायान् षड्गुणान् वीक्ष्य शत्रोः स्वस्यापि सर्वदा।
युद्धं प्राणात्यये कुर्यात् सर्वस्वहरणे सति ॥ २९९ ॥
लाचारी होने पर युद्ध करने का निर्देश— प्रथम शत्रु के तथा अपने बीच में खूब विचार कर सामादि उपायों तथा सन्धि आदि षड्गुणों में जो उचित हो उनका प्रयोग करे किन्तु जब प्राण संकट अथवा सर्वस्व का हरण उपस्थित हो जाय तब लाचारी से युद्ध करे ।
स्त्रीविप्राभ्युपपत्तौ च गोविनाशेऽपि ब्राह्मणैः ।
प्राप्ते युद्धे क्वचिन्नैव भवेदपि पराङ्मुखः ॥ ३०० ॥
स्त्री, गौ, ब्राह्मण के रक्षार्थ युद्ध न करने से हानि— स्त्री तथा ब्राह्मण के ऊपर अनुग्रह करने के लिये किंवा गौ या ब्राह्मण का विनाश उपस्थित होने पर रक्षार्थ युद्ध करने में कभी भी नहीं मुख मोड़ना चाहिये ।
युद्धमुत्सृज्य यो याति स देवैर्हन्यते भृशम्।
यदि कोई ऐसे समय में युद्ध छोड़ कर भाग जाता है तो उसका देवगण अधिक विनाश करते हैं ।
समोत्तमाधमै राजा त्वाहूतः पालयन् प्रजाः ॥ ३०१ ॥
न निवर्तेत संग्रामात् क्षात्रधर्ममनुस्मरन्।
किसी के ललकारने पर क्षत्रिय को अवश्य युद्ध करने का निर्देश— प्रजा का पालन करता हुआ राजा अपने समान या अपने से उत्तम किंवा हीन-बलवाले किसी शत्रु के ललकारने पर क्षत्रिय-धर्म का ख्याल करता हुआ उसके साथ युद्ध करने से न हटे ।
राजानं चावियोद्धारं ब्राह्मणं चाप्रवासिनम् ॥ ३०२ ॥
भूमिरेतौ निगिलति सर्पो बिलशयानिव ।
युद्ध से पीछे हटनेवाला राजा एवं प्रवास करने से मुख मोड़नेवाला ब्राह्मण इन दोनों को पृथ्वी उस भांति निगल जाती है जिस भांति से सर्प बिल में रहनेवाले मूसे आदि को निगल जाता है ।
ब्राह्मणस्यापि चापत्तौ क्षत्त्रधर्मेण वर्ततः ॥ ३०३ ॥
प्रशस्तं जीवितं लोके क्षत्त्रं हि ब्रह्मसंभवम्।
चतुर्थाध्याये सेनानिरूपणप्रकरणम् ३७५
आपत्काल में ब्राह्मण का क्षत्रिय धर्म करने का निर्देश— आपत्ति पड़ने पर (जीविका का अभाव होने पर) क्षत्रियोचित जीविका द्वारा जीवन धारण करते हुये ब्राह्मण का जीवित रहना भी लोक में उत्तम माना जाता है क्योंकि क्षत्रिय की उत्पत्ति ब्राह्मण से हुई है अतः ब्राह्मण के लिये क्षत्रिय कर्म करना विरुद्ध नहीं है।
अधर्मः क्षत्रियस्यैष यच्छय्यामरणं भवेत् ॥ ३०४ ॥
विसृजञ्श्लेष्मपित्तानि कृपणं परिदेवयन् ।
शय्या पर पड़े २ क्षत्रिय को मरने का निषेध— क्षत्रिय के लिये तो यही अधर्म की बात है कि— शय्या पर पड़े २ कफ तथा पित्त को शरीर से अलग करते २ और दीनों की भांति विलाप करते २ मर जाना।
अविक्षतेन देहेन प्रलयं योऽधिगच्छति ॥ ३०५ ॥
क्षत्रियो नास्य तत् कर्म प्रशंसन्ति पुराविदः ।
उक्त प्रकार से बिना छत-विक्षत हुये शरीर से जो प्राण छोड़ता है उस क्षत्रिय के इस कर्म की प्रशंसा इतिहासवेत्ता लोग नहीं करते हैं।
न गेहे मरणं शस्तं क्षत्रियाणां विना रणात् ॥ ३०६ ॥
शौण्डीराणामशौण्डीरमघमं कृपणं च यत् ।
रण छोड़ कर घर में क्षत्रिय को मरने का निषेध— रण को छोड़ कर घर में मरना क्षत्रियों के लिये अच्छा नहीं है। गर्वशाली क्षत्रियों के लिये उक्त प्रकार से दीन-हीन अवस्था में (घर पर) मरना उनके गर्व को नष्ट करनेवाला और पापजनक होता है।
रणेऽशक्नुवन् कृत्वा ज्ञातिभिः परिवारितः ॥ ३०७ ॥
शस्त्रास्त्रैः सुविनिर्भिन्नः क्षत्रियो वधमर्हति ।
युद्ध में शत्रु को न मार सकने पर बन्धुओं के साथ युद्ध में लड़ते २ मर जाने से क्षत्रियों की परम कर्त्तव्यता का निर्देश— युद्ध में शत्रुओं को यदि न मार सका तो अपने ज्ञाति-वर्ग से युक्त होकर शस्त्रास्त्रों से छत-विक्षत होकर वध को प्राप्त हो जाना क्षत्रियों के लिये उचित है।
आहवेषु मिथोऽन्योऽन्यं जिघांसन्तो महीक्षितः ॥ ३०८ ॥
युध्यमानाः परं शक्त्या स्वर्गं यान्त्यपराङ्मुखाः ।
युद्ध में पीछे पैर न हटाने तथा लड़कर मर जाने की प्रशंसा— जो क्षत्रिय राजा लोग युद्ध में परस्पर एक दूसरे पर घातक प्रहार करते हुये पूरी शक्ति से अन्त तक लड़ते हैं और पीछे पैर नहीं हटाते हुये मर जाते हैं वे सीधे स्वर्ग को जाते हैं।
भर्तुरर्थे च यः शूरो विक्रमेद्वाहिनीमुखे ॥ ३०९ ॥
३७६ | शुक्रनीतिः
भयान्न विनिवर्तेत तस्य स्वर्गो ह्यनन्तकः।
**स्वामी के निमित्त करने का फल—**जो शूर-वीर स्वामी के निमित्त सेना के आगे रहकर लड़ता हुआ पराक्रम दिखलाता है और डरकर लड़ाई से भाग नहीं जाता है बल्कि वहीं मर जाता है, उसको अनन्तकाल तक स्वर्ग मिलता है।
आहवे निहतं शूरं न शोचेत कदाचन ॥ ३१० ॥
निर्मुक्तः सर्वपापेभ्यः पूतो याति सुलोकताम् ।
**युद्ध में वीरगति पाये हुये के लिये शोक करने का निषेध—**युद्ध में मरे हुये शूर के लिये कभी शोक नहीं करना चाहिये। क्योंकि वह सब पापों से छूटकर पवित्र होने से सुन्दर लोक को चला जाता है।
वराप्सरःसहस्राणि । शूरमायोधने हतम् ॥ ३११ ॥
त्वरमाणाः प्रधावन्ति मम भर्ता भवेदिति ।
**युद्ध में शूरतापूर्वक मरने का फल—**युद्ध में शूरता के साथ लड़कर मरे हुये योद्धा के तरफ उत्तम १ हजारों अप्सरायें तेजी से दौड़ पड़ती हैं और चाहती हैं कि यह हमारा ही प्रिय स्वामी बने दूसरी का नहीं।
मुनिभिर्दीर्घतपसा प्राप्यते यत् पदं महत् ॥ ३१२ ॥
युद्धाभिमुखनिहतैः शूरैस्तद् द्रागवाप्यते ।
**युद्ध में वीरगति पाने पर मुनिदुर्लभ लोक की सुगमता से प्राप्ति का निर्देश—**मुनि लोग दीर्घकाल तक भी तपस्या के द्वारा जिस बड़े पद (लोक) को प्राप्त करते हैं, युद्ध में सम्मुख होकर लड़ने से मारे गये शूर-वीर लोग शीघ्रता से उसी (पद) को प्राप्त कर लेते हैं।
एतत्पञ्च पुण्यं च धर्मश्चैव सनातनः ॥ ३१३ ।
चत्वार आश्रमास्तस्य यो युद्धे न पलायते ।
जो युद्ध में नहीं भागता है, उसके लिये वही तप, पुण्य, सनातनधर्म तथा चारों आश्रमों के अनुकूल धर्माचरण करना होता है।
न हि शौर्यात् परं किंचित् त्रिषु लोकेषु विद्यते ॥ ३१४ ॥
शूरः सर्वं पालयति शूरे सर्वं प्रतिष्ठितम् ।
**शूरता की प्रशंसा सर्वोत्तमता का निर्देश—**शूरता से बढ़कर कोई वस्तु उत्तम नहीं है, क्योंकि शूर व्यक्ति ही सब लोगों का पालन कर सकता है, और शूर में ही सब कुछ प्रतिष्ठित रहता है।
चराणामचरा अन्नमदंष्ट्रा दंष्ट्रिणामपि ॥ ३१५ ॥
अपाणयः पाणिमतामन्नं शूरस्य कातराः।
**प्राणियों के अन्न का विचार—**चर जीवों के लिये अचर (स्थावर) पदार्थ, बड़े २ दाढ़वाले जीवों के लिये बिना दाढ़वाले जीव, हाथ-पैरवाले जीवों के
चतुर्थोऽध्याये सेनानिरूपणप्रकरणम् ३७७
किये बिना हाथ का जीव और शूरों के लिये कायर पुरुष अन्न ( भक्षणीय या नाश करने योग्य) होते हैं ।
द्वाविमौ पुरुषौ लोके सूर्यमण्डलभेदिनौ ॥ ३१६ ॥
परिव्राड् योगयुक्तो यो रणे चाभिमुखं हतः ।
सूर्यमण्डल भेदन करनेवाले दो पुरुषों का निर्देश— संसार में दो ही पुरुष मरकर सूर्यमण्डल का भेदन करनेवाले कहे जाते हैं, एक योगसाधन-सम्पन्न संन्यासी दूसरा रण में संमुख लड़कर मरनेवाला शूर-वीर ।
आत्मानं गोपयेच्छक्तो वधेनाप्यात्ततायिनः ॥ ३१७ ॥
सुविप्राद्ब्राह्मणगुरोर्युद्धे श्रुतिनिदर्शनात् ।
आततायी ब्राह्मण के गुरु को मारने का निर्देश— समर्थ पुरुष युद्ध में मारने के लिये उद्यत सुन्दर विद्वान ब्राह्मण तथा गुरु का भी वध करके अपनी रक्षा करनी चाहिये क्योंकि ऐसा वेद का वचन मन्वादि स्मृतियों में मिलता है ।
आचार्या वै कारुणिकाः प्राज्ञाश्चापापदर्शिनः ॥ ३१८ ॥
नैते महाभये प्राप्ते सम्प्रष्टव्याः कथंचन ।
शत्रु द्वारा संकट आ पड़ने पर आचार्य धर्मशास्त्रियों द्वारा उपाय पूछने की निरर्थकता का निर्देश— शत्रु से महान भय उपस्थित होने पर जो दयालु, निष्पाप, पण्डित और आचार्य हैं, इन सबों से प्रतीकार का उपाय कभी नहीं पूछना चाहिये । क्योंकि इनके द्वारा उचित उपाय बताना असम्भव है ।
प्रासादेषु विचित्रेषु गोष्ठीषूपवनेषु च ॥ ३१९ ॥
कथा विचित्राः कुर्वाणाः पण्डितास्तत्र शोभना ।
चित्र-विचित्र बने हुये राजभवनों में तथा गोष्ठियों ( सभाओं ) में और उपवनों में बैठकर विचित्र २ कथाओं का वर्णन करते हुये पण्डितगण सुशोभित होते हैं ।
बहून्याश्चर्यरूपाणि कुर्वाणा जनसंसदि ॥ ३२० ॥
ईड्यास्ते चोपसन्धाने पण्डितास्तत्र शोभनाः ।
जनों की सभा में बहुत से आश्चर्यजनक कार्यों को करते हुये और तत्त्व के निर्णय करने में प्रशंसित होनेवाले जो पण्डित हैं वे वहाँ-पर शोभा प्राप्त करते हैं ।
परेषां विवरज्ञाने मनुष्यचरितेषु च ॥ ३२१ ॥
हस्त्यश्वरथचर्यासु खरोष्ट्राजाविकर्मणि ।
गोधनेषु प्रतोलीषु स्वयंवर मुखेषु च ॥ ३२२ ॥
अन्नसंस्कारदोषेषु पण्डितास्तत्र शोभनाः ।
शत्रुओं के छिद्र जानने में और मनुष्यों के चरित्र, हाथी, घोड़े और रथ के
३७८ | शुक्रनीतिः
सम्बन्धी एवं गदहा, ऊँट, बकरा, भेड़ा के सम्बन्धी कार्यों को जानने में, किला शोधन, गली, स्वयंवर आदि तथा अन्न पकाने के सम्बन्धी दोषों के जानने में जो पण्डित हैं, उनकी उन-उन विषयों में शोभा होती है । अतः इन्हीं सब बातों में पंडितों से राय लेनी चाहिये ।
पण्डितान् पृष्ठतः कृत्वा परेषां गुणवादिनः ॥ ३२३ ॥
अरेर्निश्चितगुणाञ् ज्ञात्वा न सैन्ये भङ्गशङ्कया ।
विधीयतां तथा नीतिर्यथा वध्यो भवेत् परः ॥ ३२४ ॥
जिससे शत्रु मारा जा सके ऐसी नीति पर चलने का निर्देश—शत्रुओं के गुण की प्रशंसा करनेवाले पण्डितों को पीछे करके (अर्थात् उनकी बातों पर ध्यान न देकर के) शत्रु के मनोभावों को समझकर और युद्ध में सेना नष्ट हो जायगी इसकी आशङ्का छोड़कर वैसी नीति से कार्य करना चाहिये जिससे शत्रु मारा जा सके ।
आततायित्वमापन्नो ब्राह्मणः शूद्रवत् स्मृतः ।
नाततायिवधे दोषो हन्तुर्भवति कश्चन ॥ ३२५ ॥
आततायी ब्राह्मण को शूद्रवत् जानकर मारने में दोषाभाव का निर्देश—आततायी के भाव को प्राप्त किया हुआ ब्राह्मण 'शूद्रवत्' समझा जाता है। अतः वैसे आततायी ब्राह्मण के मारने में मारनेवाले को कोई दोष नहीं होता है ।
उद्यम्य शस्त्रमायान्तं भ्रूणमप्याततायिनम् ।
निहत्य भ्रूणहा न स्यादहत्वा भ्रूणहा भवेत् ॥ ३२६ ॥
आततायी बालक को भी मारने में दोषाभाव का निर्देश—मारने के लिये शस्त्र को उठाकर आते हुये आततायी बालक को भी मारकर भ्रूणहा नहीं कहा जा सकता है बल्कि उसे नहीं मारने से वह भ्रूणहत्या का पापभागी समझा जाता है ।
उद्यतेषुमथो दृष्ट्वा ब्राह्मणं क्षत्रबन्धुवत् ।
यो हन्यात् समरे क्रुद्धं युध्यन्तमपलायितम् ॥ ३२७ ॥
ब्रह्महत्या न तस्य स्यादिति धर्मेषु निश्चयः ।
युद्ध में क्षत्रिय की भांति लड़ते हुये ब्राह्मण को मारने में दोषाभाव का निर्देश—जो युद्ध में बाणादि लिए क्रुद्ध होकर क्षत्रिय की भांति युद्ध करते हुये और पीठ न दिखाते हुये (लड़ाई से मुख नहीं मोड़ते हुए) ब्राह्मण को देख कर मार डालता है । तो उसे ब्रह्महत्या का पाप नहीं लगता है । यह धर्मशास्त्रों में निर्णीत हो चुका है ।
अपसरति यो युद्धाज्जीवितार्थी नराधमः ॥ ३२८ ॥
चतुर्थाध्याये सेनानिरूपणप्रकरणम् ३७६
चतुर्थाध्याये सेनानिरूपणप्रकरणम् ३७६
जीवन्नेव मृतः सोऽपि भुङ्क्ते राष्ट्रकृतं त्वघम् ।
जीवन-रक्षार्थ युद्ध से भाग जाने पर दोष का निर्देश— जो नराधम जीवन को रक्षार्थी होकर युद्ध से भाग जाता है वह जीता हुआ भी मृत्यु तुल्य ही रहता है और राज्य भर का किया हुआ सभी पाप अकेला भोगता है ।
मित्रं वा स्वामिनं त्यक्त्वा निर्गच्छति रणाच्च यः ॥ ३२९ ॥
सोऽन्ते नरकमाप्नोति सजीवो निन्द्यतेऽखिलैः ।
मित्र तथा स्वामी को छोड़ कर युद्धक्षेत्र से भाग आने पर दोष का निर्देश— और जो मित्र तथा स्वामी को छोड़कर लड़ाई से निवृत्त होकर भाग जाता है, वह जब तक जीवित रहता है तब तक सभी लोगों की निन्दा का पात्र बना रहता है तथा मरने पर नरक को प्राप्त होता है ।
मित्रमापद्गतं दृष्ट्वा सहायं न करोति यः ॥ ३३० ॥
अकीर्तिं लभते सोऽत्र मृतो नरकमृच्छति ।
मित्र की सहायता न करने से दोषभागी होने का निर्देश— जो अपने मित्र को आपत्ति में पड़ा हुआ देखकर भी सहायता नहीं करता है, वह इस लोक में अपयश को प्राप्त करता है और मरने के बाद नरक को प्राप्त करता है ।
विस्रम्भाच्छरणं प्राप्तं संत्यजति दुर्मतिः ॥ ३३१ ॥
स याति नरके घोरे यावदिन्द्राश्चतुर्दश ।
शरणागत को लौटा देने में घोर नरक-प्राप्ति का निर्देश— विश्वास करके शरण में रक्षार्थ आये हुये को जो दुष्टबुद्धि वाला मनुष्य लौटा देता है, वह १४ इन्द्र के बदलने तक घोर नरक में निवास करता है ।
सुदुर्वृत्तं यदा क्षत्रं नाशयेयुस्तु ब्राह्मणाः ॥ ३३२ ॥
युद्धं कृत्वापि शस्त्रास्त्रैर्न तदा पापभाजिनः ।
दुराचारी क्षत्रिय को मार डालने का निर्देश— यदि किसी अत्यन्त दुराचारी क्षत्रिय को ब्राह्मण लोग शस्त्रास्त्रों से युद्ध करके मार डालें तो वे पाप-भागी नहीं हो सकते हैं ।
हीनं यदा क्षत्रकुलं नीचैर्लोकैः प्रपीड्यते ॥ ३३३ ॥
तदापि ब्राह्मणा युद्धे नाशयेयुस्तु तान् द्रुतम् ।
जब क्षत्रिय-समाज को हीनबलवाला समझ कर नीच लोग पीडित करने करें तब भी ब्राह्मण लोग युद्ध में लड़कर उन सबों को शीघ्र नष्ट कर देवें ।
उत्तमं मान्त्रिकास्त्रेण नालिकास्त्रेण मध्यमम् ॥ ३३४ ॥
शस्त्रैः कनिष्ठं युद्धन्तु बाहुयुद्धं ततोऽधमम् ।
उत्तम, मध्यम, कनिष्ठ तथा अधम युद्ध के लक्षण— मन्त्र द्वारा प्रयुक्त अस्त्रों से होने वाले युद्ध को उत्तम, नालिकास्त्रों ( बन्दूक-तोप ) से होने वाले को
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मध्यम, शस्त्रों से होने वाले को कनिष्ठ और बाहु से होनेवाले युद्ध को अधम कहते हैं।
मन्त्रेरितमहाशक्तिबाणाद्यैः शत्रुनाशनम् ॥ ३३५ ॥
मान्त्रिकास्त्रेण तद्युद्धं सर्वयुद्धोत्तमं स्मृतम् ।
**सर्वोत्तम युद्ध के लक्षण—**जिस में मन्त्र से अभिमन्त्रित करके छोड़े हुये महाशक्तिशाली बाणादि द्वारा शत्रु का नाश किया जाता है, ऐसे मान्त्रिकास्त्र से होने वाले युद्ध को सब युद्धों में उत्तम कहा जाता है।
नालाग्निक्षूर्णसंयोगाल्लक्ष्ये गोलनिपातनम् ॥ ३३६ ॥
नालिकास्त्रेण तद्युद्धं महाह्रासकरं रिपोः ।
**नालिकास्त्र युद्ध का लक्षण—**जिसमें तोप या बन्दूक की नाल में बारूद भर कर आग लगाने के द्वारा लक्ष्यस्थान पर गोली या गोला छोड़ा जाता है, ऐसे नालिकास्त्र द्वारा होने वाले युद्ध को शत्रुओं के लिये महाह्रास (हानि) करने वाला माना जाता है।
कुन्तादिशस्त्रसङ्घातै रिपूणां नाशनं च यत् ॥ ३३७ ॥
शस्त्रयुद्धं तु तज्ज्ञेयं नालास्त्राऽभावतः सदा ।
**शस्त्रयुद्ध का लक्षण—**जिसमें सदा नालास्त्र का अभाव होने से केवल भाला आदि शस्त्र-समूहों के द्वारा शत्रुओं का नाश किया जाता है उसे शस्त्र-युद्ध समझना चाहिये।
कर्षणैः सन्धिमर्म्णां प्रतिलोमानुलोमतः ॥ ३३८ ॥
बन्धनैर्घातनं शत्रोर्युक्त्या तद् बाहुयुद्धकम् ।
**बाहुयुद्ध का लक्षण—**कौशल के साथ शत्रु के सन्धिस्थान तथा मर्म-स्थानों को पीड़ित करने से तथा उलटा तथा सीधे ढङ्ग से बाहुओं द्वारा बांधने से जहां पर आघात पहुँचाया जाता है, उसे 'बाहुयुद्ध' कहते हैं।
वामपाणिकचोत्पीडा भूमौ निष्पेषणं बलात् ॥ ३३९ ॥
मूर्ध्नि पादप्रहरणं जानुनोदरपीडनम् ।
मालूराकारया मुष्ट्या कपोले दृढताडनम् ॥ ३४० ॥
कफोणिपातोऽप्यसकृत्सर्वतस्तलताडनम् ।
जालेन युद्धे भ्रमणं नियुद्धं स्मृतमष्टधा ॥ ३४१ ॥
**बाहुयुद्ध के ८ प्रकारों का निर्देश—**बाहुयुद्ध आठ प्रकार का होता है। जैसे १-बायें हाथ से बालों को पकड़ना, २-जबरदस्ती भूमि में पटक कर रगड़ना, ३-सिर में पैर से प्रहार करना, ४-घुटने से पेट को दबाना, ५-बेल के समान दृढ मुष्ठी से कपोल में कठिन प्रहार करना, ६-बारंबार केहुनी को बलपूर्वक भूमि पर गिराना, ७-सभी प्रकार से चपेटा द्वारा प्रहार करना,
चतुर्थाध्याये सेनानिरूपणप्रकरणम् ३८१
चतुर्थाध्याये सेनानिरूपणप्रकरणम् ३८१
८-व्यूह के साथ शत्रुओं के छिद्र देखने की इच्छा से बाहुयुद्ध में घूमना।
चतुर्भिः क्षत्रियं हन्यात् पञ्चभिः क्षत्रियाधमम्।
षड्भिर्वैश्यं सप्तभिस्तु शूद्रं सङ्करमष्टभिः ॥ ३४२ ॥
शत्रुष्वेतानि युञ्जीत न मित्रेषु कदाचन।
**बाहुयुद्ध के ८ प्रकारों को मित्रों के लिये प्रयोग का निषेध—**उक्त बाहु-युद्ध के प्रहारों में से ४ से क्षत्रिय को, ५ से क्षत्रियों में अधम को, ६ से वैश्य को ७ से शूद्र को, ८ से संकीर्ण जाति वालों को मारे। उक्त ८ प्रकार के प्रहारों का प्रयोग शत्रुओं के लिये करे मित्रों के लिये कभी न करे।
नालास्त्राणि पुरस्कृत्य लघूनि च महान्ति च ॥ ३४३ ॥
तत्पृष्ठगांश्च पादातान् गजाश्वान् पार्श्वयोः स्थितान्।
कृत्वा युद्धं प्रारभेत भिन्नामात्यबलारिणा ॥ ३४४ ॥
**युद्ध के समय सेना की रचना—**छोटे-बड़े नालास्त्रों (तोप-बन्दूकों) को सेना के आगे रखकर तथा पैदल सेना को पीछे और घोड़ों तथा हाथियों की सेना को दोनों बगलों में रख कर जिसके मन्त्रियों तथा सेनाओं के बीच में फूट करा दिया गया हो ऐसे शत्रु के साथ राजा को युद्ध प्रारम्भ करना चाहिये।
साम्मुख्येन प्रपातेन पार्श्वाभ्यामपयानतः।
युद्धानुकूलभूमेस्तु यावल्लाभस्तथाविधम् ॥ ३४५ ॥
सैन्यार्द्धशेन प्रथमं सेनपर्युद्धमीरितम्
युद्ध के अनुकूल जैसी भूमि जहां पर मिले वहां पर उसके अनुसार कभी सामने से और कभी अगल-बगल से हमला करके या कभी हट करके सर्वप्रथम सेना के आधे भाग के साथ सेनापतियों का सेनापतियों के साथ सेना के अर्द्धांश को लेकर युद्ध करना कहा है।
अमात्यगोपितैः पश्चादमात्यैः सह तद्भवेत् ॥ ३४६ ॥
नृपसङ्गोपितैः पश्चात् स्वतः प्राणात्यये च तत्।
**युद्ध होने का क्रम—**उसके पश्चात् मंत्रियों के अधीन रहनेवाली सेनाओं का शत्रु के मंत्रियों के साथ युद्ध होना तत्पश्चात् राजा के अधीन में रहनेवाली सेना के साथ युद्ध होना और अन्त में प्राणसंकट होने पर स्वयं राजा का युद्ध में प्रवृत्त होना उचित कहा गया है।
दीर्घाध्वनि परिश्रान्तं क्षुत्पिपासाहितश्रमम् ॥ ३४७ ॥
व्याधिदुर्भिक्षकरकैः पीडितं दस्युभिर्द्रुतम्।
पङ्कपांसुजलस्फन्नं व्यस्तं श्वासातुरं तथा। ३४८ ॥
प्रसुप्तं भोजने व्यग्रमभूयिष्ठमसंस्थितम्।
| १८२ | शुक्रनीतिः |
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घोराग्निभयवित्रस्तं वृष्टिवातसमाहतम् ॥ ३४९ ॥
एवमादिषु जातेषु व्यसनैश्च समाकुलम् ।
स्वसैन्यं साधु रक्षेत्तु परसैन्यं विनाशयेत् ॥ ३५० ॥
**सेना के उपद्रुत होने पर लड़ने का निर्देश—**बहुत दूर से चलकर आने से थकी हुई, भूख-प्यास के मारे परेशान हुई, रोग, दुर्भिक्ष तथा बर्फ के ओलों की मार से पीडित, डाकुओं से लूटी-मारी गई, कीचड़, धूल तथा बाढ़ से छथपथ हुई, व्याकुल तथा हांफती हुई, सोई हुई, भोजन करने में व्यग्र, स्वल्प संख्यावाली (सेना की छोटी टुकड़ी), दुर्गतिग्रस्त, भयंकर आग की लपटों से डरी हुई, वर्षा तथा आंधी से घबराई हुई, इत्यादि दुर्घटनाओं के उत्पन्न होने से अत्यन्त व्याकुल हुई अपनी सेना की तो भलीभांति से रक्षा करे किन्तु यदि शत्रु की ऐसी सेना हो तो उसे नष्ट कर दे।
बलस्य व्यसनानीह यान्युक्तानि मनीषिभिः ।
मुख्यो भेदो हि तेषां तु पापिष्ठो विदुषां मतः ॥ ३५१ ॥
**सेना में फूट डालने में पाप का निर्देश—**इस शास्त्र में विद्वानों ने जितने सेना के विषय में दुःखदायक उपायों को कहा है, उनमें भेद (परस्पर फूट डालना) को ही मुख्य एवं अत्यन्त पापपूर्ण सबों ने माना है।
भिन्ना हि सेना नृपतेर्दुःखसंदेह। भवत्युत ।
मौला हि पुरुषव्याघ्र ! किमु नानासमुत्थिता ॥ ३५२ ॥
**फूट जानेवाली सेना के दुःखदायिनी होने का निर्देश—**हे पुरुष-श्रेष्ठ ! नाना प्रकार के नवीन सैनिकों से भरी हुई भी सेना जब फूट पड़ जाने से इस संसार में राजा के लिये दुःखदायिनी हो जाती है तब भला पुरानी खास सेना में फूट पड़ने पर क्या कहना है, वह तो अत्यन्त दुःखदायिनी हो जाती है।
उपायान् षड्गुणं मन्त्रं शत्रोः स्वस्यापि चिन्तयेत् ।
धर्मयुद्धैः कूटयुद्धैर्हन्यादेव रिपुं सदा ॥ ३५३ ॥
**सामादि का ध्यान रखते हुये युद्ध करने का निर्देश—**राजा सदा शत्रु के तथा अपने द्वारा कृत सामादि उपायों की एवं सन्ध्यादि षड्गुणों तथा मन्त्रणा का ध्यान रखता हुआ धर्मयुद्ध या कूटयुद्ध के द्वारा जैसे भी हो शत्रु का विनाश करे।
याने सपादभृत्या तु स्वभृत्यान् वर्धयन्नृपः ।
स्वदेहं गोपयेद् युद्धे चर्मणा कवचेन च ॥ ३५४ ॥
**शत्रु पर चढ़ाई करते समय सेना को तनख्वाह बढ़ाने का निर्देश—**शत्रु के ऊपर चढ़ाई करने के समय अपने नौकरों या सैनिकों की तनख्वाह में सवाई
चतुर्थाध्याये सेनानिरूपणप्रकरणम् ३८३
चतुर्थाध्याये सेनानिरूपणप्रकरणम् ३८३
वृद्धि करके उन्हें खुश करता हुआ युद्ध में ढाल तथा कवच से अपने शरीर की रक्षा करता रहे।
पाययित्वा मदं सम्यक् सैनिकाञ्छौर्यवर्धनम् ।
उत्तेजितांश्च निर्द्वैधान् मन्त्रान् युद्धे नियोजयेत् ॥ ३५५ ॥
और अपने सैनिकों को शूरता बढ़ानेवाले मद (शराब) को अच्छी तरह से पिलाकर उत्तेजित करने के बाद मरने का सन्देह नहीं करनेवाले उन वीरों को युद्ध में नियुक्त करे।
नालिकास्त्रेण खड्गाद्यैः सैनिकैः पातयेदरीन् ।
कुन्तेन सादी बाणेन रथगो गजगोऽपि च ॥ ३५६ ॥
युद्ध में नालास्त्र (बन्दूक-तोप) आदियों की योजना—पैदल सैनिक बन्दूक या खङ्ग आदि से, घुड़सवार भाले से, रथ और हाथी पर सवार हुये सैनिक बाण से शत्रुओं पर प्रहार करें।
गजो गजेन यातव्यस्तुरगेण तुरङ्गमः ।
रथेन च रथो योज्यः पत््तिना पत््तिरेव च ॥ ३५७ ॥
एकेनैकश्च शस्त्रेण शस्त्रमस्त्रेण वाऽस्त्रकम् ।
हाथी पर सवार सैनिक-हाथीवालों से, घुड़सवार-घुड़सवारों से, रथ पर चढ़े हुये रथवालों से एवं पैदल सैनिक-पैदल सैनिकों से युद्ध करें और अकेला-अकेले से, शस्त्रवाला-शस्त्रवालों से एवं अस्त्रवाला सैनिक अस्त्रवालों से लड़े।
न च हन्यात् स्थलारूढं न क्लीबं न कृताञ्जलिम् ॥ ३५८ ॥
न मुक्तकेशमासीनं न तवास्मीतिवादिनम् ।
न सुप्तं न विसन्नाहं न नग्नं न निरायुधम् ॥ ३५६ ॥
न युध्यमानं पश्यन्तं युध्यमानं परेण च ।
पिबन्तं न च भुञ्जानमन्यकार्याकुलं न च ॥ ३६० ॥
न भीतं न परावृत्तं सतां धर्ममनुस्मरन् ।
युद्ध में प्रहार करने के अयोग्य सैनिकों के लक्षण—सज्जन पुरुषों के युद्धधर्म का ध्यान रखनेवाला सैनिक अपने से नीचे किसी जगह खड़े हुये को, एवं नपुंसक, हाथ जोड़े हुये, शिर के बाल बिखरे हुये, बैठे हुये 'मैं तुम्हारे अधीन हूँ' ऐसा कहते हुये, सोये हुये, लड़ाई के योग्य वेष नहीं धारण किये हुये, नग्न, शस्त्ररहित, नहीं लड़ते हुये, दूसरे के साथ होते हुये युद्ध को देखते हुये, जलपानादि करते हुये, भोजन करते हुये, युद्ध के अतिरिक्त अन्य कार्यों में व्यस्त हुये, डरे हुये एवं युद्ध से विमुख हुये, ऐसे सैनिकों के ऊपर प्रहार नहीं करे।
| ३८४ | शुक्रनीतिः |
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वृद्धो बालो न हन्तव्यो नैव स्त्री केवलो नृपः ॥ ३६१ ॥
यथायोग्यं हि संयोज्य निघ्नन् धर्मो न हीयते ।
**वृद्ध-बालकादि राजा को मारने का निषेध—**जो वृद्ध, बालक, स्त्री या केवल अकेला बचा हुआ राजा हो इन सबों को नहीं मारना चाहिये बल्कि उनके साथ यथायोग्य व्यवहार करके उन्हें केवल अपने अधीन करता हुआ राजा धर्म से च्युत नहीं कहा जाता है ।
धर्मयुद्धे तु कूटे वै न सन्ति नियमा अमी ॥ ३६२ ॥
न युद्धं कूटसदृशं नाशनं बलवद्रिपोः ।
**बलवान् शत्रु के नाशार्थ कूटयुद्ध की महत्ता—**ये सब नियम केवल धर्म-युद्ध के लिये कहे हुये हैं, कूटयुद्ध के लिये नहीं । बलवान् शत्रु को नष्ट करने के लिये कूटयुद्ध के समान कोई दूसरा युद्ध नहीं है ।
रामकृष्णेन्द्रत्रिदिवैः कूटमेवाहृतं पुरा ॥ ३६३ ॥
कूटेन निहतो बालिर्यवनो नमुचिस्तथा ।
क्योंकि प्राचीनकाल में राम, कृष्ण तथा इन्द्रादि देवताओं ने भी बलवान् असुरों के साथ लड़ने में कूटयुद्ध का ही आश्रय लिया था, और कूटयुद्ध के द्वारा ही उन सबों ने क्रम से बालि, कालयवन तथा नमुचि दैत्य का संहार किया था ।
प्रफुल्लवदनेनैव तथा कोमलया गिरा ॥ ३६४ ॥
अङ्गीकृतापराधेन सेवादाननतिस्तवैः ।
उपकारैः स्वाशयेन दिव्यैर्विश्वासयेत् परम् ॥ ३६५ ॥
क्षुरधारेण मनसा रिपोरिश्छिद्रं सुलक्षयेत् ।
**शत्रु के छिद्र को भली प्रकार देखने का निर्देश—**प्रफुल्ल वदन होकर, कोमल वाणी से, अपराध को स्वीकार करने से, सेवा से, दान से, नमस्कार करने से, गुणों की प्रशंसा करने से, उपकार करने से, अच्छा भाव-प्रदर्शन करने से एवं दिव्य शपथ खाकर ऊपर से शत्रु का विश्वास अपने ऊपर जमावे किन्तु मन में छुरे के समान धार रखकर (नाश का उपाय करता हुआ) शत्रु के छिद्र (नाश करने का अवसर) को ढूंढता रहे । अर्थात् जब अवसर मिले तब मार गिरावे ।
अवमानं पुरस्कृत्य मानं कृत्वा तु पृष्ठतः ॥ ३६६ ॥
स्वकार्यं साधयेत् प्राज्ञः कार्यध्वंसो हि मूर्खता ।
कार्य को नष्ट न करने का निर्देश— बुद्धिमान मनुष्य अपमान को आगे रखकर और सम्मान को पीछे रखकर (मानापमान का ख्याल न करके जिस भांति से हो सके) अपने कार्य को सिद्ध करे। क्योंकि कार्य को नष्ट करना ही मूर्खता है ।
चतुर्थाध्याये सेनानिरूपणप्रकरणम् ३८५
मञ्चासीनः शतानीकः सेनाकार्यं विचिन्तयन् ॥ ३६७ ॥
सदैव व्यूहसङ्केतवाद्यशब्दान्तवर्तिनः ।
सञ्चरेयुः सैनिकाश्च राजराष्ट्रहितैषिणः ॥ ३६८ ॥
भेदितां शत्रुना दृष्ट्वा स्वसेनां घातयेच्च ताम् ।
सेनापति के नित्य-कृत्यों का निर्देश— जो सैकड़ों सेना का स्वामी हो वह राजा किसी उच्च आसन पर बैठ कर अपनी सेना के कार्यों को सोचता रहे। और सदैव व्यूह के संकेतानुसार बाजों के बजने के अन्दर रहकर कार्य करते हुये, राजा तथा राष्ट्र के हित चाहनेवाले सैनिक युद्ध में इधर-उधर संचार करते रहें । तथा राजा शत्रु के द्वारा यदि अपनी सेना को फूटी हुई (खिलाफ) समझे तो उसे नष्ट कर दे ।
प्रत्यग्रे कर्मणि कृते योधैर्दद्याद्धनं च तान् ॥ ३६९ ॥
पारितोष्यं चाधिकारं क्रमतोऽर्हं नृपः सदा ।
भारी कार्य करनेवाले को पारितोषिक देने का निर्देश— और राजा सैनिकों द्वारा कोई नवीन उत्तम पराक्रम कार्य किये जाने पर उनको योग्य पारितोषिक रूप में धन-प्रदान तथा अधिकार की वृद्धि सदा कर देवे ।
जलान्नतृणसंरोधे शत्रून् संपीड्य यत्नतः ॥ ३७० ॥
पुरस्ताद्विषमे देशे पश्चाद्धन्यात्तु वेगवान् ।
शत्रु को नष्ट करने का उपाय— प्रथम जल, अन्न तथा तृण आदि को शत्रु-सेना के पास जाने से रोक कर यत्नपूर्वक पीड़ा पहुँचावे तत्पश्चात् विषम (संकटपूर्ण) स्थान में प्राप्त हुये शत्रु के ऊपर बड़े वेग से हमला करके उसे मार डाले ।
कूटस्वर्णमहादानैर्भेदयित्वा द्विषद्वलम् ॥ ३७१ ॥
नित्यविस्त्रम्भसंसुप्तं प्रजागरकृतश्रमम् ।
विलोभ्यापि परानीकमप्रमत्तो विनाशयेत् ॥ ३७२ ॥
शत्रु की सेना में भेद करने का प्रकार— शत्रु की सेना को बनावटी सोने की राशि देकर फोड़ लेने (मिला लेने) के बाद अथवा शत्रु की सेना को नित्य शत्रु के द्वारा भय की शङ्का न मानकर बेखबर सोई हुई अथवा ज्यादा जागते रहने से क्लान्त हुई देखकर स्वयं बड़ी सावधानी के साथ उसका विनाश कर देवे ।
तत्सहायबलं नैव व्यसनाप्तमपि क्वचित् ।
विपत्ति में पड़ी हुई शत्रु की मित्र-सेना की रक्षा करने का निर्देश— और शत्रु की सहायता करने के लिये आई हुई किसी मित्र-सेना को कहीं
२५ शु०
| ३८६ | शुक्रनीतिः |
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व्यसन में पड़ी हुई देखकर भी नष्ट न करे, बल्कि उसकी रक्षा करके अपनी ओर मिला ले ।
स्वसमीपतरं राज्यं नान्यस्माद् ग्राहयेत् क्वचित् ॥ ३७३ ॥
**राज्य के समीपवर्ती राज्य की रक्षा करने का निर्देश—**और अपने अत्यन्त समीपवर्ती राज्य को किसी दूसरे के द्वारा हड़प न करने दे, बल्कि उसकी रक्षा करके अपनी ओर मिला रहने दे ।
क्षणं युद्धाय सज्जेत क्षणं चापसरेत् पुनः ।
अकस्मान्निपतेद् दूराद्दस्युवत् परितः सदा ॥ ३७४ ॥
क्षणभर में अचानक युद्ध के लिये उद्यत हो जाय फिर क्षणभर में युद्ध से विरत हो जाय और पुनः दूर से एकाएक डाकुओं की भांति आकर चारो तरफ से धावा बोल दे !
रूप्यं हेम च कुप्यं च यो यज्जयति तस्य तत् ।
दद्यात् कार्यानुरूपं च हृष्टो योधान् प्रहर्षयन् ॥ ३७५ ॥
और यदि कोई सैनिक कभी चाँदी, सोना और इनके अतिरिक्त तांबा आदि जो भी जीत कर लावे तो अन्य सैनिकों को प्रसन्न करता हुआ प्रसन्न चित्त से कार्यानुरूप उसी (सैनिक) को उक्त धन को देवे ।
विजित्य च रिपूनेवं समादद्यात् करं तथा ।
राज्यांशं वा सर्वराज्यं नन्दयीत ततः प्रजाः ॥ ३७६ ॥
**शत्रु को जीतने पर शत्रु की प्रजा को प्रसन्न रखने का निर्देश—**इस प्रकार से राजा शत्रु को जीत कर योग्यतानुसार उससे कर (मालगुजारी) ग्रहण करे । और कभी २ योग्यतानुसार शत्रु के राज्य का आधा अंश या संपूर्ण राज्य का ही अपहरण कर ले फिर शत्रु की प्रजा को हर प्रकार से प्रसन्न रक्खे ।
तूर्यमङ्गलघोषेण स्वकीयं पुरमाविशेत् ।
तत्प्रजाः पुत्रवत् सर्वाः पालयीतात्मसात्कृताः ॥ ३७७ ॥
नियोजयेन्मन्त्रिगणमपरे मन्त्रचिन्तने ।
**विजित राज्य के मन्त्रिमण्डल को बदलने का निर्देश—**उसके बाद तुरही आदि बाजों के मङ्गलमय घोष (शब्द) के साथ अपनी राजधानी में विजय से लौट कर पुनः प्रवेश करे । और अपने अधीन बना ली गई शत्रु की सारी प्रजा को पुत्र की भांति पालन करे । और वहां पर (जीते हुये राज्य में) मन्त्रचिन्तन (सलाह देने) के लिये प्राचीन मन्त्रिमण्डल को हटाकर नया मन्त्रिमण्डल की नियुक्ति कर देवे ।
देशे काले च पात्रे च ह्यादिमध्यावसानतः ॥ ३७८ ॥
चतुर्थाध्याये सेनानिरूपणप्रकरणम् ३८७
भवेन्मन्त्रफलं कीदृगुपायेन कथं त्विति ।
मन्त्र्याद्यधिकृतः कार्यं युवराजाय बोधयेत् ॥ ३७९ ॥
**मन्त्री आदियों के कृत्यों का निर्देश—**देश, काल तथा पात्र में एवं आदि, मध्य तथा अन्त में, किस उपाय से मन्त्र का कैसा फल होगा, इन सबों के विचार करने के लिये नियुक्त मन्त्री आदि अधिकारी पुरुष किसी कार्य को प्रथम युवराज के समक्ष ले जाकर उपस्थित करें ।
पश्चाद्राज्ञे तु तैः सार्कं युवराजो निवेदयेत् ।
राजा संशासयेदादौ युवराजं तवस्तु सः ॥ ३८० ॥
युवराजो मन्त्रिगणान् राजाग्रे तेऽधिकारिणः ।
सदसत् कर्म राजानं बोधयेद्धि पुरोहितः ॥ ३८१ ॥
तत्पश्चात् उन सबों को साथ में लेकर युवराज उसी कार्य के विषय में राजा से निवेदन करे । और राजा उस पर प्रथम युवराज के पास अपना आदेश लिखकर भेजे, उसके बाद युवराज मन्त्रिगणों को उक्त राजा का आदेश बतावें । और उक्त सभी अधिकारी वर्ग जो कुछ भला या बुरा कार्य हो उसको राजा के आगे उपस्थित होकर समझावें एवं पुरोहित भी इसी भांति राजा को समझावे ।
ग्रामाद्बहिः समीपे तु सैनिकान् धारयेत् सदा ।
ग्राम्यसैनिकयोर्न स्यादुत्तमर्णाधमर्णता ॥ ३८२ ॥
**ग्राम से बाहर समीप में सैनिकों के ठिकाने का तथा उनके निषिद्ध कार्यों का निर्देश—**ग्राम (बस्ती) के बाहर किन्तु समीप में ही राजा सदा सैनिकों को रक्खे । किन्तु ग्रामीण तथा सैनिकों का परस्पर लेन-देन का व्यवहार नहीं होना चाहिये ।
सैनिकार्थं तु पण्यानि सैन्ये सन्धारयेत् पृथक् ।
नैकत्र वासयेत् सैन्यं वत्सरं तु कदाचन ॥ ३८३ ॥
सैनिकों के लिये सेना की छावनी के अन्दर सामान खरीदने के लिये पृथक् दूकान लगवानी चाहिये । और एक ही स्थान पर सालभर तक कभी भी किसी सेना को नहीं रहने देना चाहिये ।
सेनासहस्रं सज्जं स्यात् क्षणात् संशासयेत्तथा ।
संशासयेत् स्वनियमान् सैनिकानष्टमे दिने ॥ ३८४ ॥
**१००० सैनिकों को शिक्षा देने के नियमों का निर्देश—**१०३० एक हजार सैनिकों वाली भी सेना को इस भांति से शिक्षा देनी चाहिये कि जिससे आदेश पाने पर वह एक क्षण में ही युद्ध के लिये अपने को सुसज्जित कर लें । अर्थात् इतनी सेना हर वक्त तैयार खड़ी रहें । और हर आठवें दिन (सप्ताह) आने
३८८ शुक्रनीतिः
पर अथवा दिन के आठवें भाग में (शाम को ४ बजे के लगभग) सैनिकों को उनके लिये नियत नियमों की शिक्षा देनी चाहिये।
चण्डत्वमाततायित्वं राजकार्ये विलम्बनम्। अनिष्टोपेक्षणं राज्ञः स्वधर्मपरिवर्जनम् ॥ ३८५ ॥ त्यजन्तु सैनिका नित्यं संल्लापमपि वाऽपरैः। नृपाज्ञया बिना ग्रामं न विशेयुः कदाचन ॥ ३८६ ॥
**सैनिकों के लिये त्याज्य कर्म—**जैसे अत्यन्त कोप करना, आततायीपन का कार्य करना, राज-कार्य करने में देरी करना, राजा के अनिष्ट होने की उपेक्षा करना, अपने धर्म का त्याग करना, और दूसरों के साथ बातचीत करना, इन सबों को सैनिक नित्य ही छोड़ दिया करें। और बिना राजा की आज्ञा के कभी भी किसी ग्राम के अन्दर प्रवेश न करें।
स्वाधिकारिगणस्यापि ह्यपराधं दिशन्तु नः। मित्रभावेन वर्तेध्वं स्वामिकृत्ये सदाऽखिलैः ॥ ३८७ ॥
**सैनिकों के लिये कर्त्तव्य कर्म—**और अपने २ अधिकारी गणों द्वारा किये गये अपराधों को मुझ (राजा) से कहें। स्वामी (राजा) के किसी कार्य के उपस्थित होने पर उसे सब लोग मित्र भाव से परस्पर मिलकर सदा किया करें।
सूज्ज्वलानि च रक्षन्तु शस्त्रास्त्रवसनानि च। अन्नं जलं प्रस्थमात्रं पात्रं बह्वन्नसाधकम् ॥ ३८८ ॥
और अपने २ शस्त्र, अस्त्र तथा पात्रों को खूब साफ रक्खें, एवं अपने पास अन्न तथा जल एक-एक प्रस्थ (सेर १) भर और अन्न पकाने का पात्र बड़ा रक्खें, जिसमें प्रस्थ भर से अधिक अन्न पकाया जा सके।
शासनादन्यथाचारान् विनेष्यामि यमालयम्। भेदायिता रिपुधनं गृहीत्वा दर्शयन्तु माम् ॥ ३८९ ॥
**आज्ञा के विरुद्ध आचरण करने पर दण्ड देने का निर्देश—**मेरी इन आज्ञाओं के विरुद्ध आचरण करनेवालों को मैं यमपुरी पहुँचा दूंगा (मार डालूंगा)। और जो शत्रु से धन लेकर मुझसे फूट कर उससे मिल गये हों, उन सैनिकों को पकड़ लाकर मुझे दिखायें, मैं उन्हें मृत्यु दण्ड दूंगा।
सैनिकैरभ्यसेन्नित्यं व्यूहाद्यनुकृतिं नृपः। तथाऽयनेऽयने लक्ष्यमस्त्रापातैर्विभेदयेत् ॥ ३९० ॥
**सैनिकों के साथ प्रतिदिन व्यूहों का अभ्यास करने का निर्देश—**राजा प्रतिदिन सैनिकों द्वारा व्यूह-रचना करने का अभ्यास करावे, तथा प्रत्येक
चतुर्थाध्याये सेनानिरूपणप्रकरणम् ३८६
अयनपर ( ६-६ महीने पर ) अथवा प्रत्येक मार्ग से बाणादि अस्त्र प्रहार द्वारा लक्ष्य का भेदन ( चाँद मारी ) करावें ।
सायं प्रातः सैनिकानां कुर्यात् सङ्गणनं नृपः।
जात्याकृतिवयोदेशग्राममावासान् विमृश्य च ॥ ३९१ ॥
प्रातःसायं सैनिकों की गणना करने का निर्देश— राजा प्रतिदिन सायं-प्रातः सैनिकों की गणना भली भाँति करे, जिसमें साथ २ प्रत्येक सैनिकों की जाति, आकार, अवस्था, देश तथा ग्राम में निवास का पूर्ण विचार भी हो ।
कालं भृत्यवधिं देयं दत्तं भृत्यस्य लेखयेत् ।
और नौकरी की सीमा रूप काल ( नौकरी कब प्रारम्भ की ), देय ( मासिक या वार्षिक वेतन पाने का प्रमाण ), दत्त ( दिया हुआ वेतन का प्रमाण ) इन सबों को विचार कर लिख ले ।
कति दत्तं हि भृत्येभ्यो वेतनं पारितोषिकम् ॥ ३९२ ॥
तत्प्राप्तिपत्रं गृह्णीयाद् दद्याद् वेतनपत्रकम् ।
भृत्यों के प्राप्ति-पत्र को ग्रहण कर वेतन-पत्र देने का निर्देश— और नौकरों के लिये कितनी तनखाह या इनाम दिया गया है, इसको पाने के लिये लिखे हुये आप्तपत्र को लेकर उसको वेतन या पारितोषिक चुकताकर देने की रसीद दे देवें ।
सैनिकाः शिक्षिता ये ये तेषु पूर्णा भृतिः स्मृता ॥ ३९३ ॥
व्यूहाभ्यासे नियुक्ता ये तेष्वर्धां भृतिमावहेत् ।
शिक्षित सैनिकों को पूर्ण वेतन देने का निर्देश— जो २ सैनिक शिक्षित हो चुके हों उनको पूरा वेतन देना चाहिये । और जो अभी व्यूह ( कवायद ) के अभ्यास करने में लगे हुये ( सीख रहे ) हैं उनको आधा वेतन देना चाहिये ।
असत्कर्त्राश्रितं सैन्यं नाशयेच्छत्रुयोगतः ॥ ३९४ ॥
शत्रु से मिलकर सेना को नष्ट करने का निर्देश— शत्रु से मिलकर जो सेना बुराई कर रही है, उसे नष्ट कर दे ।
नृपस्यासद्गुणरताः के गुणद्वेषिणो नराः।
असद्गुणोदासीनाः के हन्यात्तान् विमृशन्नृपः ॥ ३९५ ॥
सुखासक्तांस्त्यजेद् भृत्यान् गुणिनोपि नृपः सदा ।
मार डालने या त्याज्य नौकरों के लक्षण— नौकरों में कौन राजा के असद्गुणों में प्रवृत्ति रखने वाले हैं और कौन उनके सद्गुणों से द्वेष रखनेवाले हैं एवं कौन राजा के असद्गुणों में प्रवृत्ति रखने पर उपेक्षा रखते हैं, इन सबों