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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

महर्षि शुक्राचार्य द्वारा

स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

पञ्चमोऽध्यायः ।

नीतिशेषं खिले वक्ष्ये ह्यखिलं शास्त्रसंमतम् ।
सप्ताङ्गानां तु राज्यस्य हितं सर्वजनेषु वै ॥ १ ॥
नीति-शेष कहने का निर्देश — इस परिशिष्ट रूप खिल-नीति-निरूपण में राज्य के सात अंगों के एवं सभी लोगों के लिये हितकर शास्त्र-संमत संक्षिप्त रूप से अवशिष्ट नीति का वर्णन करता हूं ।

शतसंवत्सरान्तेऽपि करिष्याम्यात्मसाद्रिपुम् ।
इति सञ्चिन्त्य मनसा रिपोश्छिद्राणि लक्षयेत् ॥ २ ॥
शत्रु के छिद्रों को ढूंढते रहने का निर्देश — मैं सौ वर्ष के बाद भी कदाचित् शत्रु को अपने अधीन कर लूंगा, ऐसा सोचकर सावधान मनसे शत्रु के छिद्रों को ढूंढता रहे ।

राष्ट्रभृत्यविशङ्की स्याद्धीनमन्त्रबलो रिपुः ।
युक्त्या तथा प्रकुर्वीत सुमन्त्रबलयुक् स्वयम् ॥ ३ ॥
शत्रु राजा को हीन-बल बनाने के लिये यत्न करने का निर्देश — स्वयं सुन्दर मन्त्र ( सन्ध्यादि षड्गुण ) तथा सेना से युक्त रहकर ऐसी युक्ति करे कि शत्रु अपनी सेनापर सन्देह करने लगे एवं हीन मन्त्र तथा सेना या बलवाला हो जाय ।

सेवया वा वणिग्वृत्त्या रिपुराष्ट्रं विमृश्य च ।
दत्ताभयं सावधानो व्यसनासक्तचेतसम् ॥ ४ ॥
मार्जारलुब्धकबवत् सन्तिष्ठन्नाशयेदरिम् ।
मौका देख कर शत्रु को नष्ट करने का निर्देश — सावधान होकर राजा ( मनोऽनुकूल आचरण ) या वाणिज्य के ब्याज से शत्रु के राष्ट्र को भली-भांति से देख कर बिडाल और बहेलियों के समान स्थित रहता हुआ पहले निर्भय रहने का विश्वास दिला कर कामादि ( राग-रङ्ग ) में आसक्त चित्तवाले शत्रु को मौका देख कर नष्ट कर दे ।

सेनां युद्धे नियुञ्जीत प्रत्यनीकविनाशिनीम् ॥ ५ ॥
न युञ्ज्याद्रिपुराष्ट्रस्थां मिथः स्वद्वेषिणीं न च ।
युद्ध में नियुक्त करने योग्य का निर्देश — शत्रु-सेना को नष्ट करनेवाली सेना को युद्ध में नियुक्त करे और जो शत्रु के राज्य में रहनेवाली या एकान्त पाकर अपने साथ द्वेष कर सकनेवाली हो ऐसी को न नियुक्त करे ।

न नाशयेत् स्वसेनां तु सहसा युद्धकामुकः ॥ ६ ॥

पञ्चमाध्याये खिलनीतिनिरूपणप्रकरणम् ३६७

पञ्चमाध्याये खिलनीतिनिरूपणप्रकरणम् ३६७

युद्ध का शौक रखनेवाला राजा सहसा अपनी सेना को युद्ध में भेजकर नष्ट कर देवें।

दानमानैर्वियुक्तोऽपि न भृत्यो भूपतिं त्यजेत् ।
समये शत्रुसान्नैव गच्छेज्जीवधनाशया ॥ ७ ॥

दान-मान से रहित भी भृत्य को अपने राजा को न छोड़ने का निर्देश—
भृत्य (सैनिक) भी दान तथा सम्मान न पाने पर भी अपने स्वामी राजा का साथ असमय में न छोड़ देवे। और जीवन-रक्षा तथा धन की आशा से समय आ जाने पर शत्रु के अधीन भी न हो।

मेघोदकैस्तु या पुष्टिः सा किं नद्यादिवारितः ।
प्रजापुष्टिर्नृपद्रव्यैस्तथा किं धनिनां धनात् ॥ ८ ॥

**राजा के द्रव्य को मेघ-जल के समान पुष्टिप्रद होने का निर्देश—**जैसे मेघ के जल (वर्षा) से जैसी पुष्टि धान्यादि की होती है वैसी भला नदी आदि के जल से सींचने से हो सकती है। कदापि नहीं। वैसे ही राजद्वारा प्राप्त धनों से जैसी पुष्टि प्रजा की हो सकती है वैसी क्या धनियों के दिये हुए धन से कभी हो सकती है। कदापि नहीं।

दर्शयन् मार्दवं नित्यं महावीर्यबलोऽपि च ।
रिपुराष्ट्रे प्रविश्यादौ तत्कार्ये साधको भवेत् ॥ ९ ॥

**शत्रु का राज्य हरण करने का उपाय—**वीर्य तथा सेना अधिक रहने पर भी अपनी मृदुता का प्रदर्शन करता हुआ शत्रु के राज्य में घुस कर प्रथम उसके नित्य कार्य को सिद्ध करनेवाला बने।

सञ्जातबद्धमूलस्तु तद्राज्यमखिलं हरेत् ।
अथ तद्द्विष्टदायादान् सेनपानंशदानतः ॥ १० ॥
तद्राज्यस्य वशीकुर्यान्मूलमुन्मूलयन् बलात् ।

उसके बाद जब वहां पर हर तरह से अपनी जड़ दृढ़ हो जाय तब संपूर्ण शत्रु के राज्य को ले ले। वह इस तरह से कि शत्रु के साथ द्वेष रखनेवाले उसके भाई-पट्टीदारों एवं सेनापतियों को उसके राज्य का अंश (कुछ भाग) देने के द्वारा उसके जड़ को बलपूर्वक उखाड़ता हुआ, उन सबों को भी अपने अधीन कर ले।

तरोः संक्षीणमूलस्य शाखाः शुष्यन्ति वै यथा ॥ ११ ॥
सद्यः केचिच्च कालेन सेनपाद्याः पतिं विना ।

**राजा के बिना सेनापति आदि को भी शक्तिहीन होने का निर्देश—**जैसे जड़ कट जाने पर पेड़ की शाखायें सूख जाती हैं, वैसे ही राजा के बिना सेना-

३९८शुक्रनीतिः

पति आदि भी, कोई तत्काल ही और कोई कुछ समय के बाद, शक्तिहीन हो जाते हैं।

राज्यवृक्षस्य नृपतिर्मूलं स्कन्धाश्च मन्त्रिणः ॥ १२ ॥
शाखाः सेनाधिपाः सेनाः पल्लवाः कुसुमानि च ।
प्रजाः फलानि भूभागा बीजं भूमिः प्रकल्पिता ॥ १३ ॥

राज्य को वृक्ष की समता का निर्देश— राज्यरूपी वृक्ष का मूल (जड़) राजा होता है, स्कन्ध (मोटी डालें)—मन्त्री लोग, शाखायें—सेनापति लोग, पल्लव—सेनायें, फूल—प्रजायें, फल—भूमि से प्राप्त होनेवाले कर (मालगुजारी) एवं बीज—राज्य की भूमि ये सब मानी गई हैं।

विश्वस्तान्न्यनृपस्यापि न विश्वासं समाप्नुयात् ।
नैकान्ते न गृहे तस्य गच्छेदल्पसहायवान् ॥ १४ ॥

राजा को अवश्य पालन करने योग्य नियमों का निर्देश— विश्वास के योग्य अपने को व्यवहार द्वारा सिद्ध करनेवाले भी शत्रु राजा का विश्वास नहीं करना चाहिये। अतः उसके साथ एकान्त में अथवा उसके गृह पर थोड़े सहायकों के साथ न जावे।

स्ववेषरूपसदृशान् निकटे रक्षयेत् सदा ।
विशिष्टचिह्नगुप्तः स्यात् समयेऽन्यादृशो भवेत् ॥ १५ ॥

अपने निकट सदा अपने समान वेष तथा स्वरूपवाले अन्य लोगों को रक्खे, जिससे कोई न पहचान सके कि कौन इनमें से राजा है? और स्वयं अपना राजचिह्न गुप्त रखे और समय पर दूसरे के समान बन जाय।

वेश्याभिश्च नटैर्मद्यैर्गायकैर्मोहयेदरिम् ।

और वेश्याओं, नटों, मद्य तथा गायकों द्वारा शत्रु को मुग्ध बना दें (कर्त्तव्याकर्त्तव्य ज्ञानशून्य कर दें)।

सुवस्त्राभरणैर्नैव न कुटुम्बेन संयुतः ॥ १६ ॥
विशिष्टचिह्नितो भीतो युद्धे गच्छेन्न वै क्वचित् ।

किसी भी युद्ध में सुन्दर-वस्त्र तथा आभूषणों से या कुटुम्ब से युक्त होकर या विशिष्ट राजचिह्न धारण किये हुये या डरा हुआ न जाय।

क्षणं नासावधानः स्याद् भृत्यस्त्रीपुत्रशत्रुषु ॥ १७ ॥
जीवन् सन् स्वामिता पुत्रे न देयाप्यखिलं क्वचित् ।

भृत्य, स्त्री तथा पुत्र के विषय में क्षणभर के लिये भी असावधान न रहें। किसी दशा में भी जीवित रहते हुये पुत्र को अपनी सारी प्रमुखशक्ति (अख्तियार) न प्रदान कर दे।

स्वभावसद्गुणे यस्मान्महानर्थमदावहा ॥ १८ ॥

पञ्चमाध्याये खिलनीतिनिरूपणप्रकरणम् १६६

पञ्चमाध्याये खिलनीतिनिरूपणप्रकरणम् १६६

विष्णुब्राह्मौरपि नो दत्ता स्वपुत्रे स्वाधिकारता । स्वभाव से सद्गुणयुक्त पुत्र में भी पूर्ण अधिकार दे देना महान अनर्थ तथा मद पैदा कर देनेवाला हो जाता है, इसीसे विष्णु आदि ने भी अपने पुत्रों को अपना पूर्ण अधिकार नहीं दिया था। स्वायुषः स्वल्पशेषे तु सत्पुत्रे स्वाम्यमादिशेत् ॥ १९ ॥ नाराजकं क्षणमपि राष्ट्रं धर्तुं क्षमाः किल । युवराजादयः स्वाम्यलोभचापलगौरवात् ॥ २० ॥

पुत्र को राज्य देने के समय का निर्देश—यदि अपनी आयु का अन्त अत्यन्त समीप आ गया हो तो उस समय यदि सत्पुत्र हो तो उसे पूर्ण अधिकार प्रदान कर दे, क्योंकि अधिकार-लोभ से होनेवाली चञ्चलता की अधिकता से युवराजादि बिना राजा के राज्य को क्षण भर भी संभालने के लिये नहीं समर्थ हो सकते हैं।

प्राप्योत्तमं पदं पुत्रः सुनीत्या पालयन् प्रजाः । पूर्वामात्येषु पितृवद् गौरवं सम्प्रधारयेत् ॥ २१ ॥ राज्य पाने पर राजपुत्र के आचरणों का निर्देश—पुत्र उत्तम राजपद को प्राप्त कर सुन्दर नीतिपूर्वक प्रजा का पालन करता हुआ, पिता के समय के मन्त्रियों में पिता के तुल्य गौरव रखे।

तस्यापि शासनं तैस्तु प्रधार्यं पूर्वतोऽधिकम् । युक्तं चेदन्यथा कार्ये निषेध्यं काललम्बनैः ॥ २२ ॥ मन्त्रियों का राजपुत्र के साथ करने योग्य व्यवहार का निर्देश—और वे मन्त्री गण भी यदि राजकुमार की आज्ञा उचित हो तो उसे राजा के समय से भी अधिक रूप से माने, यदि अनुचित हो तो 'दूसरे समय में इसका पालन होगा' ऐसा कहकर उस समय टाल देवें।

तदनीत्या न वर्तेयुस्तेन साकं धनाशाया । वर्तन्ति यदनीत्या ते तेन साकं पतन्त्यरात् ॥ २३ ॥ नवीन राजा के साथ मन्त्रियों को भी अनीतिपूर्ण व्यवहार करने का निषेध—और धन की आशा से उस नवीन राजा के साथ स्वयं भी उसकी अनीति के अनुसार व्यवहार न करे। क्योंकि यदि वे (मन्त्रीगण) भी अनीति-पूर्ण व्यवहार करने लगेगें तो उस (नवीन राजा) के साथ स्वयं भी नष्ट हो जावेगें।

कुलभक्तांश्च यो द्वेष्टि नवीनं भजते जनम् । स गच्छेच्छत्रुसाम्राज्ञा धनप्राणैर्वियुज्यते ॥ २४ ॥ नवीन राजा को राजभक्त मन्त्री आदि के मतानुसार न रहने का

४०० | शुक्रनीतिः

दुष्परिणाम—जो नवीन राजा राजकुल के भक्त मन्त्री आदियों के साथ द्वेष करता है और नवीन लोगों के कथनानुसार कार्य करता है वह शत्रु के अधीन हो जाता है और अपने धन तथा प्राणों को भी खो बैठता है।

गुणी सुनीतिर्नवोऽपि परिपाल्यस्तु पूर्ववत्।
प्राचीनैः सह तं कार्ये ह्यनुभूय नियोजयेत् ॥ २५ ॥

नवीन मन्त्री आदि की नियुक्ति की व्यवस्था—और यदि कोई नवीन होता हुआ भी गुणवान तथा सुन्दर नीतिकुशल अधिकारी हो तो उसका पालन प्राचीनों की तरह करना चाहिये। और भली भांति से अनुभव करने के बाद उसे प्राचीनों के साथ राजकार्य में नियुक्त करना चाहिये।

अतिमृदुस्तुतिनतिसेवादानप्रियोक्तिभिः ।
मायिकैः सेव्यते यावत् कार्यं नित्यं तु साधुभिः ॥ २६ ॥
प्रत्यक्षं वा परोक्षं वा सत्यवाग्भिर्नृपोऽपि च ।
याथार्थ्यतस्तयोरिहगन्तरं खभुवोर्यथा ॥ २७ ॥

धूर्त्त तथा साधु जन के अन्तर ज्ञात करने का निर्देश—जो धूर्त्त होते हैं वे जब तक अपना कार्य सिद्ध करना रहता है तभी तक अत्यन्त मृदु व्यवहार, स्तुति (प्रशंसा), नमन, सेवा, दान तथा प्रियवचन आदि से राजा की सेवा करते हैं और जो सज्जन हैं वे सत्यवचनों से प्रत्यक्ष या परोक्ष में सदा राजा की सेवा करते हैं यथार्थ में उन दोनों (धूर्त्त तथा सज्जन) में इतना अधिक अन्तर है जितना कि आकाश तथा पृथ्वी में है।

मायाया जनका धूर्त्ता जारचोरबहुश्रुताः ।
प्रतिष्ठितो यथा धूर्त्तो न तथा तु बहुश्रुताः ॥ २८ ॥

धूर्त्त, जार (व्यभिचारी) और चोर में धूर्त्त की माया करने में श्रेष्ठता का निर्देश—माया के उत्पन्न करनेवाले धूर्त्त, जार और चोर होते हैं, यह बात अत्यन्त प्रसिद्ध है। किन्तु जिस प्रकार से धूर्त्त इसमें श्रेष्ठ माना जाता है। उस प्रकार से जार और चोर नहीं माने जाते हैं।

परस्वहरणं लोके जारचोरौ तु निन्दितौ ।
तावप्रत्यक्षं हरतः प्रत्यक्षं धूर्त एव हि ॥ २९ ॥

धूर्त्तो की धूर्त्तता का वर्णन—दूसरे की वस्तु या धन हरण करने में प्रवृत्त होने से जार और चोर ये दोनों लोक में निन्दित माने जाते हैं। किन्तु वे दोनों तो सामने नहीं धनादि हरते हैं, पर धूर्त तो सामने ही हर लेता है।

हितं स्वहितवच्चान्ते अहितं हितवत् सदा ।
धूर्त्ताः सन्दर्शयित्वाऽज्ञं स्वकार्यं साधयन्ति ते ॥ ३० ॥

वे धूर्त्त लोग मूर्ख लोगों के समक्ष हितकर को अहितकर की भांति पूर्व

पञ्चमाध्याये खलनीतिनिरूपणप्रकरणम् ४०१

पञ्चमाध्याये खलनीतिनिरूपणप्रकरणम् ४०१

अहितकर को हितकर की भांति दिखाकर अन्त में सदा अपने कार्य को सिद्ध करते हैं ।

विस्रम्भयित्वा चात्यर्थं मायया घातयन्ति ते ।

और वे चालाकी से प्रथम अपने ऊपर अत्यन्त विश्वास पैदा कराके अन्त में उसका नाश कर देते हैं ।

यस्य चाप्रियमन्विच्छेत्तस्य कुर्यात् सदा प्रियम् ॥ ३१ ॥
व्याधो मृगवधं कर्तुं गीतं गायति सुस्वरम् ।

और वे जिसका अप्रिय (बुराई) करना चाहते हैं उसका प्रथम सदा प्रिय कार्य करते हैं। जैसे बहेलिया मृग का वध करने के लिये प्रथम सुन्दर स्वर के साथ उसके सामने गाते हैं बाद में मार डालते हैं।

मायां विना महाद्रव्यं द्राङ् न सम्पाद्यते जनैः ॥ ३२ ॥
विना परस्वहरणान्न कश्चित् स्यान्महाधनः ।
मायया तु बिना तद्धि न साध्यं स्याद्यथेप्सितम् ॥ ३३ ॥

बिना धूर्त्तता के अत्यन्त धन न मिलने का निर्देश— बिना धूर्त्तता के लोग बहुत धन शीघ्र नहीं पा सकते हैं। और बिना दूसरे का धन हरण किये कोई बड़ा धनी नहीं हो सकता है। और बिना माया के जो ईप्सित कार्य है वह सिद्ध नहीं हो सकता है।

स्वधर्मं परमं मत्वा परस्वहरणं नृपाः ।
परस्परं महायुद्धं कृत्वा प्राणांस्त्यजन्त्यपि ॥ ३४ ॥

राजा लोगों को दूसरे का धन हरण करने को स्वधर्म समझने का निर्देश— राजा लोग दूसरे का धन हरण करना परम स्वधर्म समझ कर परस्पर महायुद्ध करके प्राण भी दे डालते हैं।

राज्ञो यदि न पापं स्याद्दस्यूनामपि नो भवेत् ।
सर्वं पापं धर्मरूपं स्थितमाश्रयभेदतः ॥ ३५ ॥

आश्रयभेद से सभी पापों का धर्म रूप में स्थित होने का निर्देश— यदि राजा को वैसा करने से पाप नहीं लगता है तो डाकुओं को भी दूसरे का धन हरण करने में पाप नहीं लगे क्योंकि आश्रयभेद से सभी पाप धर्मरूप हो जाते हैं, अर्थात् दूसरे का धन हरण करना डाकुओं के लिये पाप हो जाता है किन्तु राजाओं के लिये वही धर्म हो जाता है।

बहुभिर्यः स्तुतो धर्मो निन्दितोऽधर्म एव सः ।
धर्मेतत्त्वं हि गहनं ज्ञातुं केनापि नोचितम् ॥ ३६ ॥

बहुतों द्वारा प्रशंसित धर्म और निन्दित अधर्म मानने का निर्देश— जो व्यापार बहुतों के द्वारा प्रशंसित होता है, वह धर्म गिना जाता है और जो

२६ शु०

४०२ | शुक्रनीतिः

निन्दित होता है वह अधर्म गिना जाता है। अतः धर्म का तत्त्व गहन है, उसका किसी के द्वारा समझ सकना असंभव है।

अतिदानंतपःसत्ययोगो दारिद्र्यकृत्त्विह ।
धर्मार्थों यत्र न स्यातां तद्वाक् कामं निरर्थकम् ॥ ३७ ॥

अत्यंत दानादि करने की निषिद्धता का निर्देश — संसार में अतिदान, तपस्या तथा सत्य का संसम्बन्ध ये तीनों दरिद्रता उत्पन्न करने वाले होते हैं अर्थात् अतिदान से दरिद्र हो जाना जगतप्रसिद्ध ही है, इसी तरह तपस्या में भी धर्मानुष्ठानुष्ठान के द्वारा धन-व्यय होने से एवं धनप्राप्ति धूसंतता करने से होतो है उसमें यदि सत्य का संबन्ध हो तो धनप्राप्ति के असम्भव होने से दरिद्रता होना उचित ही है। जिस वाणी में धर्म और अर्थ न हों तो वह (वाणी) अत्यन्त निरर्थक समझी जाती है।

अर्थे वा यदि वा धर्मे समर्थो देशकालवित् ।
निःसंशयो नरः पूज्यो नष्टः संशयिता सदा ॥ ३८ ॥

धर्मानुसार अर्थार्जन करने वाले की पूज्यता का निर्देश — यदि कोई मनुष्य धर्म तथा अर्थ में समर्थ है अर्थात् धर्मानुसार अर्थार्जन करने में निपुण है और देश-काल का ज्ञाता अर्थात् तदनुसार कार्य करने वाला एवं संशय-रहित है तो वही सदा पूज्य होता है। और जो संशय करने वाला है वह नहीं माननीय होता है।

अर्थस्य पुरुषो दासो दासस्त्वर्थो न कस्यचित् ।
अतोऽर्थाय यतेतैव सर्वदा यत्नमास्थितः ॥ ३६ ॥
अर्थाद्धर्मश्च कामश्च मोक्षश्चापि भवेन्नृणाम् ।

अर्थ के लिये अवश्य यत्न करने का निर्देश — अर्थ का दास पुरुष ही होता है न कि पुरुष का दास अर्थ होता है। अतः अर्थ के लिये सर्वदा प्रयत्न-पूर्वक यत्नशील रहना चाहिये। और मनुष्यों के अर्थ से ही धर्म, काम और मोक्ष सभी पुरुषार्थ प्राप्त होते हैं।

शस्त्रास्त्राभ्यां बिना शौर्यं गार्हस्थ्यं तु श्रियं विना · ४० ॥
ऐकमत्यं विना युद्धं कौशल्यं ग्राह्यकं विना ।
दुःखाय जायते नित्यं सुसहायं बिना विपत् ॥ ४१ ५
न विद्यते तु विपदि सुसहायं सुहृत्-समम् ।

शौर्यादिकों का शस्त्रास्त्रादि के बिना दुःखदायी होने का निर्देश — शस्त्र और अस्त्र के बिना शूरता, स्त्री के बिना गार्हस्थ्य (गृहस्ती), सैनिकों की एकता के बिना युद्ध, समझने वाले के बिना चतुराई, और सुन्दर सहायक के बिना

पञ्चमाध्याये खिलनीतिनिरूपणप्रकरणम् ४०३

विपत्ति नित्य दुःख देने के लिये ही होती है । और विपत्ति में सुन्दर मित्र के समान अन्य कोई सच्चा सहायक नहीं होता है ।

अविभक्तधनान् मैत्र्या भृत्या भक्तधनान् सदा ॥ ४२ ॥
मित्रं स्वसदृशैर्भोगैः सत्यैश्च परितोषयेत् ।

अविभक्त और विभक्त ज्ञातिवर्ग तथा मित्र के साथ व्यवहार के प्रकार का निर्देश— जिनके साथ धन का बँटवारा नहीं हुआ है अर्थात् एक साथ रहनेवाले जो ज्ञाति-वर्ग के हैं, उन्हें सौहार्द भाव से, और जिनके साथ धन का बटवारा हो चुका है, ऐसे लोगों को मासिक या वार्षिक वृत्ति-प्रदान द्वारा, एवं मित्रों को अपने सदृश भोग ( भोजनादि ) का प्रबन्ध तथा सत्य व्यवहार द्वारा सदा राजा सन्तुष्ट रखे ।

नृपसम्बन्धिस्त्रीपुत्रसुहृद्भृत्याविदस्युभिः ॥ ४३ ॥
अतो विभागं दत्त्वैषां भुङ्क्ते यस्तु स्वकं धनम् ।

अपने सम्बन्धी स्त्री-पुत्रादि को सन्तुष्ट रखते हुये धनोपभोग करने का निर्देश— जो राजा अपने सम्बन्धी, स्त्री, पुत्र, मित्र भृत्य तथा दस्यु गणों को जिस प्रकार से ये संतुष्ट हो सकें वैसा प्रबन्ध करके अपने धन का उपभोग करता है, वस्तुतः वही सुखी होता है ।

त्यक्त्वा तु दर्पकार्पण्यमानोद्वेगभयानि च ॥ ४४ ॥
कुर्वीत नृपतिर्नित्यं स्वार्थसिद्धयै तु नान्यथा ।
विशेषभृतितो भृत्यं प्रेममानाधिकारतः ॥ ४५ ॥

स्वकार्य-सिद्ध्यर्थ भृत्य को सर्वथा संचय रखने का निर्देश— राजा अपने कार्य की सिद्धि के लिये ही दर्प ( अहङ्कार ), कृपणता, मान, उद्वेग और भय को छोड़कर विशिष्ट जीविका का प्रदान, प्रेम तथा संमान-प्रदर्शन एवं अधिकार-प्रदान से भृत्य को नित्य युक्त करता रहे, इससे अन्यथा न करे ।

ब्राह्मणाग्निजलैः सर्वैर्धनवान् भक्ष्यते सदा ।
स सुखी मोदते नित्यमन्यथा दुःखमश्नुते ॥ ४६ ॥

ब्राह्मणादि द्वारा यज्ञादि करने में धन का व्यय करने से ही सुखी होने का निर्देश— दान करने से ब्राह्मण द्वारा, यज्ञ करने से अग्नि द्वारा, पौंसला आदि का प्रबन्ध करने से जल द्वारा जिस धनी का धन व्यय होता रहता है । वह धनी नित्य सुखी होने से प्रसन्न रहता है अन्यथा रीति से व्यय होने पर दुःखी रहता है ।

दर्पस्तु परहासेच्छा मानोऽहं सर्वतोऽधिकः ।
कार्पण्यं तु व्यये दैन्यं भयं स्वोच्छेदशङ्कनम् ॥ ४७ ॥

४०४शुक्रनीतिः

मानसस्यानवस्थानमुद्वेगः परिकीर्तितः ।

दर्पं, मान, कार्पण्य, भय तथा उद्वेग के लक्षण— दूसरे के हास की इच्छा को 'दर्प', मैं सबसे अधिक गुणादि में हूँ इसे 'मान', व्यय में कंजूसी करने को 'कार्पण्य', अपने उच्छेद होने की शङ्का को 'भय' और मन का स्थिर न रहने को 'उद्वेग' कहते हैं ।

लघोरप्यपमानस्तु महावैराय जायते ॥ ४८ ॥
दानमानसत्यशौर्यमार्दवं सुसुहृत्करम् ।

महान वैर तथा मित्रता के कारणों का निर्देश— क्षुद्रजन के लिये भी किया हुआ अपमान महावैर को पैदा करने में समर्थ होता है । किसी को कुछ देना, संमान करना, सत्य व्यवहार करना, शूरता और मृदुता ये सब अत्यन्त मित्रता पैदा करनेवाले होते हैं ।

सर्वानापदि सदसि समाहूय बुधान् गुरून् ॥ ४९ ॥
भ्रातॄन् बन्धूंश्च भृत्यांश्च ज्ञातीन् सभ्यान् पृथक् पृथक् ।
यथार्हं पूज्य विनतः स्वामीष्टं याचयेन्नृपः ॥ ५० ॥

आपत्ति पड़ने पर राजा के कर्त्तव्य का निर्देश— राजा आपत्ति पड़ने पर विनम्र होकर पण्डित, गुरु, भाई, बन्धु, भृत्य, जाति के लोग और सभासद् इन सबों को राज्यसभा में बुलाकर यथायोग्य सम्मान करने के बाद अपना अभीष्ट सिद्ध करने के लिये इस रीति से प्रार्थना करे । अर्थात् उपाय पूछे ।

आपदं प्रतरिष्यामो यूयं युक्त्या वदिष्यथ ।
भवन्तो मम मित्राणि भवत्सु नास्ति भृत्यता ॥ ५१ ॥

मैं आपत्ति को पार कर जाऊं इसके लिये आप लोग युक्ति बतायें । आप लोग मेरे मित्र हैं आप लोगों को मैं अपना केवल भृत्य नहीं मानता हूँ ।

न भवत्सदृशास्त्वन्ये सहायाः सन्ति मे ह्यतः ।
तृतीयांशं भृतेर्माह्यमर्धं वा भोजनार्थकम् ॥ ५२ ॥
दास्याम्यापत्समुत्तीर्णः शेषं प्रत्युपकारवित् ।

आप लोगों के समान मेरा कोई दूसरा सहायक नहीं है । अतः इस समय केवल भोजन के लिये वेतन का तृतीयांश या अर्द्धांशमात्र ही आप लोग ग्रहण करें । क्योंकि इस समय व्यय अधिक होने से मैं समग्र वेतन देने में असमर्थ हूँ और जब मैं आपत्ति को पार कर लूंगा तब आप लोगों के उपकार का बदला चुकाना उचित जानकर शेष भी वेतन चुका दूंगा ।

भृतिं विना स्वामिकार्यं भृत्यः कुर्यात् समाष्टकम् ॥ ५३ ॥
षोडशाब्दं धनी यः स्यादितरोऽर्थानुरूपतः ।

आपत्ति में विना वेतन के भी स्वामि-कार्य करने की कालमर्यादा का

पञ्चमाध्याये खिलनीतिनिरूपणप्रकरणम् ४०५

**निर्देश—**जो भृत्य ऐसा धनी हो कि अपने पास से १५ वर्ष तक बिना वेतन लिये जीविका चला सकता है वह बिना वेतन लिये ८ वर्ष तक स्वामी का कार्य करे, और जो इससे भिन्न हों वे अपनी आर्थिक स्थिति के अनुसार जितना समय तक बिना वेतन के हो सके स्वामिकार्य करें।

निर्धनैरन्नवस्त्रं तु नृपाद् ग्राह्यं न चान्यथा ॥ ५४ ॥
यतो भुक्तं सुखं सम्यक् तद्दुःखैर्दुःखितो न चेत् ।
विनिन्दति कृतघ्नस्तु स्वामी भृत्योऽन्यएव वा ॥ ५५ ॥

और जो निर्धन हों वे राजा से अन्न-वस्त्र मात्र ग्रहण करें। इससे अन्यथा होने पर न ग्रहण करें। जिस स्वामी से आजतक जिसने भलीभांति सुख का उपभोग किया, आज यदि उसके दुःख से वह दुःखी न हो तो वैसे कृतघ्न भृत्य की स्वामी या अन्य कृतज्ञ भृत्य भी निन्दा करते हैं।

सकृत् सुभुक्तं यस्यापि तदर्थं जीवितं त्यजेत् ।
भृत्यः स एव सुश्लोको नापत्तौ स्वामिनं त्यजेत् ॥ ५६ ॥
स्वामी स एव विज्ञेयो भृत्यार्थं जीवितं त्यजेत् ।

**प्रशंसायोग्य भृत्य और स्वामी का वर्णन—**जो भृत्य जिसका सम्मान-पूर्वक दिया हुआ अन्न एक बार भी भोजन करले तो उसके रक्षार्थ समय पड़ने पर जीवन का भी त्याग कर दे। वही भृत्य सुन्दर यश वाला माना जाता है जो आपत्ति पड़ने पर भी स्वामी का साथ नहीं छोड़ता है और वही वस्तुतः स्वामी है जो आवश्यकता पड़ने पर भृत्य के रक्षार्थ अपना जीवन भी त्याग कर देता है।

न रामसदृशो राजा पृथिव्यां नीतिमानभूत् ॥ ५७ ॥
सुभृत्यता तु यन्नीत्या वानरैरपि स्वीकृता ।

**योग्य स्वामी तथा भृत्य का उदाहरण—**इस पृथिवी पर राम के समान कोई दूसरा नीतिमान राजा नहीं हुआ, क्योंकि जिसकी नीति के द्वारा वानरों ने भी भलीभांति से भृत्यता स्वीकार कर ली थी।

अपि राष्ट्रविनाशाय चोराणामेकचित्तता ॥ ५८ ॥
शक्ता भवेन्न किं शत्रुनाशाय नृपभृत्ययोः ।

**एकचित्तता के भाव का वर्णन—**जब चोरों का मिल कर एकचित्त हो जाना राष्ट्र-विनाश करने में समर्थ हो जाता है, तब भला राजा और भृत्य का एकचित्त हो जाना क्या शत्रुविनाश करने के लिये समर्थ नहीं हो सकता है, अपितु अवश्य हो सकता है।

न कूटनीतिरभवच्छ्रीकृष्णसदृशो नृपः ॥ ५६ ॥
अर्जुनाद् ग्राहिता स्वस्य सुभद्रा भगिनी छलात् ।

४०६ | शुक्रनीतिः

श्रीकृष्ण की कूटनीति का वर्णन—श्रीकृष्ण भगवान के समान कोई दूसरा राजा कूटनीति का प्रयोग करनेवाला नहीं हुआ, जिन्होंने कूटनीति द्वारा जबर-दस्ती अपनी बहन सुभद्रा अर्जुन को दिला दी (ब्याह दी)

नीतिमत्तान्तु सा युक्तिर्या हि स्वश्रेयसेऽखिला ॥ ६० ॥

नीतिमानों की वही युक्ति वस्तुतः युक्ति (उपाय) है जो उनके संपूर्ण कल्याण करने में उचित हो।

आदौ तद्धितकृत्स्नेहं कार्यं स्नेहमनन्तरम् ।
कृत्वा सधर्मवादं च मध्यस्थः साधयेद्धितम् ॥ ६१ ॥

हित सिद्ध करने में मध्यस्थ पुरुष के व्यवहार का निर्देश—मध्यस्थ (उदासीन) पुरुष प्रथम किसी के हितैषी मित्र के साथ स्नेह, तदनन्तर कर्त्तव्य कर्म और धर्मकथनपूर्वक स्नेह-प्रदर्शन करके हित सिद्ध करे।

परस्परं भवेत् प्रीतिस्तथा तद्गुणवर्णनम् ।
इष्टान्नधनवसनैर्लोभनं कार्यसिद्धिदम् ॥ ६२ ॥

परस्पर जैसे प्रीति हो वैसे उसके प्रेम के गुणों का वर्णन करे। और अभीष्ट अन्न-वस्त्र का लोभ दिखाये। यह कार्य-सिद्धि करने वाला होता है।

दिव्यावलम्बनं मिथ्या संल्लापं धैर्य्यवर्धनम् ।
इमे उपाया मध्यस्थ-कुट्टिनीकारिणां मताः ॥ ६३ ॥

मध्यस्थ (उदासीन), कुट्टिनी और धूर्त्त लोगों को दिव्य (शपथ) का अवलम्बन, झूठमूठ (मनगढन्त) बात करना और धैर्य बँधाना ये सब उपाय इष्ट होते हैं। इससे वे लोग कार्य सिद्ध करते हैं।

नात्मसङ्गोपने युक्तिं चिन्तयेत् स पशोर्जडः ।
जारसङ्गोपने छद्म संश्रयन्ति स्त्रियोऽपि च ॥ ६४ ॥

अपनी रक्षा की युक्ति का विचार न करनेवाले की निन्दा का निर्देश—जो अपनी रक्षा करने के लिये उपाय नहीं सोचता है वह पशु से भी बढ़कर जड़ है। और स्त्रियां भी अपने जार पति को छिपाने में छल का आश्रय लेती हैं।

युक्तिश्छलात्मिका प्रायस्तथान्या योजनात्मिका ।
यच्छद्माचारी भवति तेन छद्मा समाचरेत् ॥ ६५ ॥
अन्यथा शीलनाशाय महतामपि जायते ।

कार्यसिद्धयर्थ दो प्रकार की युक्तियों का निर्देश—कार्यसिद्धि के लिये युक्ति (उपाय) दो प्रकार की होती है, उसमें प्रायः करके छलरूपा पहली और सत्यरूपा दूसरी होती है। जो छल करनेवाले हैं, उनके लिये छलरूपा युक्ति का प्रयोग करना चाहिये। अन्यथा छल करना बड़े लोगों के चरित्र को बिगाड़ देनेवाली हो जाती है।

पञ्चमाध्याये खलनीतिनिरूपणप्रकरणम् ४०७

अस्ति बुद्धिमतां श्रेणिर्न त्वेको बुद्धिमानतः ॥ ६६ ॥
देशे काले च पुरुषे नीतिं युक्तिमनेकधाम् ।
कल्पयन्ति च तद्विद्या दृष्ट्वा रुद्धां तु प्राक्तनीम् ॥ ६७ ॥

और बुद्धिमानों की श्रेणी होती है न कि सिर्फ एक ही कोई बुद्धिमान होता है अतः चतुर लोग जहां पर सत्यरूपा युक्ति निष्फल देखते हैं वहां पर देश, काल तथा पात्र के अनुसार अनेक प्रकार की नीति तथा युक्ति की कल्पना करते हैं ।

मन्त्रौषधिपृथग्वेष-कालवागर्थसंश्रयात् ।
छद्म सञ्जनयन्तीह तद्विद्याकुशला जनाः ॥ ६८ ॥

छल का वर्णन— इस संसार में माया (छल) करने में निपुण लोग मन्त्र, औषध, नाना प्रकार के वेष, काल, वचन और अर्थ, इन सबों का आश्रय लेकर छल-प्रयोग करते हैं ।

लोकेऽधिकारिप्रत्यक्षं विक्रीतं दत्तमेव वा ।
वस्त्रभाण्डादिकं क्रीतं स्वचिह्नैरङ्कयेच्चिरम् ॥ ६९ ॥

लोक में बेंची हुई (वस्त्र-पात्र आदि), दी हुई (किसी को दान में दे दी गई) तथा खरीदी हुई वस्तुओं पर उनके अधिकारी (बेंचने, देने तथा खरीदनेवाले) लोगों के सामने उनको अपनी २ मुहरों से ऐसा चिह्न बना देना चाहिये, जो बहुत दिन तक न मिट सके ।

स्तेनकूटनिवृत्त्यर्थं राज्ञातं समाचरेत् ।
जडान्धबालद्रव्याणां दद्याद् वृद्धिं नृपः सदा ॥ ७० ॥

चोरों की जालसाजी रोकने के लिये अर्थात् चोरी का माल न बिकने पावे, इसके लिये उन बिकी हुई वस्तुओं की सूचना राजा को दे देनी चाहिये अर्थात् लिखा देनी चाहिये । और जड़, अन्ध तथा लड़कों के जो धन हों, उनको यदि राजा के पास रक्खा जाय तो राजा उसका सूद बराबर उन सबों को दे ।

स्वीया तथा च सामान्या परकीया तु स्त्री यथा ।
त्रिविधो भृतकस्तद्वदुत्तमो मध्यमोऽधमः ॥ ७१ ॥

तीन प्रकार के भृत्यों का निर्देश— जैसे स्त्री स्वीया (अपनी), सामान्या (वेश्या आदि) और परकीया (दूसरे की) भेद से ३ प्रकार की होती है। वैसे भृत्य भी उत्तम, मध्यम तथा तथा अधम भेद से तीन प्रकार का होता है ।

स्वामिन्येवानुरक्तो यो भृतकस्तूत्तमः स्मृतः ।
सेवते पुष्टवृत्तीदं प्रकरं स च मध्यमः ॥ ७२ ॥

४०८ | शुक्रनीतिः

पुष्टोऽपि स्वामिनाऽव्यक्तं भजतेऽन्यं स चाधमः ।

**उत्तमादि भृत्यों के लक्षण—**जो स्वामी में अनुरक्त रहे, वह भृत्य 'उत्तम' और जो पर्याप्त वेतन देनेवाले स्वामी की सेवा अधिक वेतन पाने के लोभ से करता है, वह 'मध्यम' एवं जो स्वामी से भलीभांति पालित होने पर भी छिपे रूप से दूसरे की भी सेवा करता है, वह 'अधम' भृत्य कहलाता है।

उपकरोत्यपकृतो ह्युत्तमोऽप्यन्यथाऽधमः ॥ ७३ ॥
मध्यमः साम्यमन्विच्छेदपरः स्वार्थतत्परः ।

**प्रकारान्तर से उत्तमादि भृत्यों के लक्षण—**जो अपकार करने पर भी स्वामी का उपकार करता है वही 'उत्तम' है इससे अन्यथा अर्थात् उपकार करने पर जो अपकार करता है, वह 'अधम' कहलाता है। और मध्यम 'भृत्य' तुल्य व्यवहार को पसन्द करता है अर्थात् उपकार करनेवाले के प्रति उपकार तथा अपकार करनेवाले के प्रति अपकार करना चाहता है, और इसके बाद का दूसरा जो अधम है वह केवल अपना स्वार्थ साधने में तत्पर रहता है।

नोपदेशं विना सम्यक् प्रमाणैर्ज्ञायतेऽखिलम् ॥ ७४ ॥
बाल्यं वाऽप्यथ तारुण्ये प्रारम्भितसमाप्तिदम् ।

**उपदेश के बिना सबका ज्ञान न होने का तथा बाल्य व युवा अवस्था में प्रारम्भ किये हुये कार्य की समाप्ति का निर्देश—**उपदेश के बिना केवल प्रमाणों से सभी बातें भलीभांति नहीं जानी जा सकती हैं। और बाल्य तथा युवा ये दो अवस्थायें प्रारम्भ किये हुये की समाप्ति देनेवाली अर्थात् इनमें जो आरम्भ किया जाता है उसकी समाप्ति भी हो जाती है।

प्रायो बुद्धिमतो ज्ञेयं न वार्धक्यं कदाचन ॥ ७५ ॥
आरम्भं तस्य कुर्याद्धि यत्समाप्तिं सुखं व्रजेत् ।

**आरम्भ किये हुये की समाप्ति होने में वृद्धावस्था की अयोग्यता का निर्देश—**किन्तु वार्द्धक्य (वृद्धावस्था) को प्रायः बुद्धिमान उक्त भांति का कदापि नहीं मानते हैं। इसमें प्रारम्भ किये हुये कार्य की समाप्ति नहीं हो पाती, क्योंकि उसी कार्य का आरम्भ करना चाहिये। जिसकी समाप्ति बिना क्लेश के हो जाय।

नारम्भो बहुकार्याणामेकदैव सुखावहः ॥ ७६ ॥
नारम्भितसमाप्तिं तु विना चान्यं समाचरेत् ।

**बहुत कार्यों का एक साथ आरम्भ करने का निषेध—**बहुत कार्यों का एक साथ ही आरम्भ करना सुखावह नहीं होता है और आरम्भ किये हुये कार्य की बिना समाप्ति हुये किसी दूसरे कार्य को नहीं करना चाहिये।

पञ्चमाध्याये खिलनीतिनिरूपणप्रकरणम् ४०९

पञ्चमाध्याये खिलनीतिनिरूपणप्रकरणम् ४०९

सम्पाद्यते न पूर्वं हि नापरं लभ्यते यतः ॥ ७७ ॥
कृती तत् कुरुते नित्यं यत् समाप्तिं व्रजेत् सुखम् ।

**समाप्त होने योग्य कार्य का प्रारम्भ करने का निर्देश—**क्योंकि आरम्भ किये हुये कार्य की बिना समाप्ति किये दूसरा कार्य प्रारम्भ करने से पूर्व का कार्य तो संपन्न नहीं हो पाता और दूसरा भी नहीं हो पाता । अतः बुद्धिमान को चाहिये कि—वह सदा उसी कार्य का प्रारम्भ करे जो सुखपूर्वक समाप्त हो जाय ।

यदि सिद्ध्यति येनार्थः कलहेन वरस्तु सः ॥ ७८ ॥
अन्यथाऽऽयुर्धनसुहृद्-यशोधर्महरः सदा ।

**प्रयोजन की सिद्धि होने की संभावना में कलह करने का निर्देश—**जिस कलह के करने से यदि अपना कोई प्रयोजन सिद्ध होता हो तो वह अच्छा होता है अन्यथा वह (कलह) आयु, धन, मित्र, यश और धर्म का सदा केवल हरनेवाला होता है ।

ईर्ष्या लोभो मदः प्रीतिः क्रोधो भीतिश्च साहसम् ॥ ७६ ॥
प्रवृत्तिच्छिद्रहेतूनि कार्ये सप्त बुधा जगुः ।

**कार्ये में प्रवृत्ति तथा छिद्र (दोष) के कारणों का निर्देश—**ईर्ष्या, लोभ, मद, प्रीति, क्रोध, भय तथा साहस ये ७ कार्य में प्रवृत्ति तथा छिद्र (दोष) के हेतु पण्डितों द्वारा कहे हुये हैं ।

यथाच्छिद्रं भवेत् कार्यं तथैव हि समाचरेत् ॥ ८० ॥
अविसंवादि विद्वद्भिः कालेऽतीतेऽपि चापदि ।

**निर्दोष तथा अभिमत ही कार्य करने का निर्देश—**जिस प्रकार से कार्य निर्दोष हो, उसी प्रकार से करना चाहिये । आपत्ति न रहने पर समय बीत जाने पर भी पण्डितों को जो अभिमत हो उसी कार्य को करना चाहिये ।

दशग्रामी शनानीकः कपरीचारकसंयुतौ ॥ ८१ ॥
अश्वस्थौ विचरेयातां ग्रामपो ह्यपि चाश्वगः ।

**दशग्रामाधिपादिकों का विचरण करने के प्रकारों का निर्देश—**दश ग्रामों का स्वामी और १०० सैनिकों का नायक अपने २ भृत्यों के साथ घोड़े पर सवार होकर विचरण करें । और एक ग्राम के स्वामी भी घोड़े पर सवार होकर विचरण करें ।

साहस्रिकः शतग्रामी एकाश्वरथवाहनौ ॥ ८२ ॥
दशशस्त्रास्त्रिभिर्युक्तौ गच्छेतां वाऽश्वसङ्गतौ ।

१००० हजार सैनिकों के अधिपति और १०० ग्रामों के जो अधिपति हों, वे शस्त्र धारण किये हुये १० सैनिकों से युक्त होकर एक घोड़े जुते हुये रथ पर अथवा केवल घोड़े पर सवार हुये विचरण करें ।

४१० | शुक्रनीतिः

सहस्रग्रामपो नित्यं नराश्वद्वयश्वयानगः ॥ ८३ ॥ आयुतिको विंशतिभिः सेवकैर्हस्तिना व्रजेत् । १००० ग्रामों का या १०००० सैनिकों का अधिपति नित्य २० सैनिकों के साथ पालकी, घोड़ा या दो घोड़े जुते हुये रथ या हाथी पर सवार होकर विचरण करें ।

अयुतग्रामपः सर्वयानैश्च चतुरश्वगः ॥ ८४ ॥ पञ्चायुतो सेनपोऽपि सञ्चरेद् बहुसेवकः । १०००० ग्रामों का और ५०००० हजार सैनिकों का अधिपति ये दोनों बहुत से भृत्यों (सैनिकों) से युक्त होकर सभी प्रकार की सवारियों से या चार घोड़े जुते हुये रथ पर सवार होकर विचरण करें ।

यथाधिकाधिपत्यं तु धीट्याधिक्यं प्रकल्पयेत् ॥ ८५ ॥ कल्पयेच्च यथाधिक्यं धनिकेषु गुणिष्वपि । जैसी अधिक संख्या वाले ग्रामों या सैनिकों के ऊपर आधिपत्य हो उसी के अनुसार संमान की अधिकता की कल्पना करनी चाहिये । इसी प्रकार से धनिकों तथा गुणियों में भी उनकी जैसी धन तथा गुण की अधिकता हो उसी के अनुसार उनके सम्मान की कल्पना करनी चाहिये ।

श्रेष्ठो न मानहीनः स्यान्न्यूनो मानाधिकोऽपि न ॥ ८६ ॥ राष्ट्रे नित्यं प्रकुर्वीत श्रेयोऽर्थी नृपतिस्तथा । श्रेष्ठ तथा हीन पुरुष के संमान में न्यूनाधिक्य का निषेध—कल्याण के चाहने वाले राजा को अपने राज्य में इस तरह की व्यवस्था करनी चाहिये कि जिसमें श्रेष्ठ पुरुष—उचित सम्मान से हीन, न्यून पुरुष—उचित सम्मान से अधिक सम्मान न प्राप्त करे, अर्थात् सबका यथोचित सम्मान हो, उसमें न्यूनाधिक्य न होने पावे ।

हीनमध्योत्तमानां तु ग्रामभूमिं प्रकल्पयेत् ॥ ८७ ॥ कुटुम्बिनां गृहाऽर्थं तु पत्तनेऽपि नृपः सदा । उत्तमादि गृह-भूमि के प्रमाणों का निर्देश—राजा ग्राम में हीन, मध्यम तथा उत्तम लोगों के लिये तथा कुटुम्बियों के लिये नगर में घर बनाने के योग्य सदा उचित भूमि की व्यवस्था करे ।

द्वात्रिंशत्प्रमितैर्हस्तैर्दीर्घाऽर्द्धा विस्तृताधमे ॥ ८८ ॥ उत्तमा द्विगुणा मध्या सार्धमाना यथार्हतः । कुटुम्बसंस्थितिसमा न न्यूना वाऽधिकाऽपि न ॥ ८९ ॥ ३२ हाथ लम्बी तथा १६ हाथ चौड़ी अधमा, ६४ हाथ लम्बी तथा ३२ हाथ चौड़ी उत्तमा और ४८ हाथ लम्बी तथा २४ हाथ चौड़ी मध्या-

पञ्चमाध्याये खिलनीतिनिरूपणप्रकरणम् ४११

संज्ञक भूमि वासार्थ देनी चाहिये। और जैसी कुटुम्ब की स्थिति न्यून या अधिक हो उसी के समान भूमि-व्यवस्था करनी चाहिये। उससे न न्यून और न अधिक होनी चाहिये।

ग्रामाद् बहिर्वसेयुस्ते ये ये त्वधिकृता नृपैः ।
नृपकार्ये बिना कश्चिन्न ग्रामं सैनिको विशेत् ॥ ६० ॥

अधिकारी पुरुषों को ग्राम के बाहर रहने एवं सैनिकों को बिना राजकार्य के ग्राम-प्रवेश के निषेध का निर्देश— राजा द्वारा जो २ अधिकारी नियुक्त किये गये हों उन सबों को ग्राम से बाहर की भूमि में निवास करना चाहिये। बिना किसी राज-कार्य के किसी सैनिक को ग्राम के अन्दर नहीं प्रवेश करना चाहिये।

तथा न पीडयेत् कुत्र कदापि ग्रामवासिनः ।
सैनिकैर्न व्यवहरेन्नित्यं ग्राम्यजनोऽपि च ॥ ६१ ॥

सैनिकों को ग्रामवासियों को पीड़ा न पहुँचाने एवं ग्रामवासियों को सैनिक के साथ व्यवहार न करने का निर्देश— और सैनिक कहीं किसी ग्रामवासी को कभी पीड़ा न पहुँचावे और ग्रामवासी भी कभी किसी सैनिक के साथ किसी प्रकार का व्यवहार न रक्खे।

श्रावयेत् सैनिकान्नित्यं धर्मं शौर्यविवर्धनम् ।
सुवाद्यनृत्यगीतानि शौर्यवृद्धिकराण्युपि ॥ ९२ ॥

सैनिकों के शौर्यवर्धक उपायों को करने का निर्देश— राजा सैनिकों को नित्य शूरता को बढ़ानेवाले युद्ध-धर्म सुनवावे और उनके लिये सुन्दर बाजा, नृत्य-गीत आदि का भी प्रबन्ध रखे जो कि शूरता को बढ़ाने वाले हों अर्थात् अश्ली-लता युक्त न हों।

युद्धक्रियां विना सैन्यं योजयेन्नान्यकर्मणि ।

युद्धकार्य से अन्य में सैनिकों की नियुक्ति का निषेध— युद्धकार्य के अतिरिक्त अन्य कार्यों को करने के लिये सेना की नियुक्ति न करे।

सत्याचारास्तु धनिका व्यवहारे हता यदि ॥ ९३ ॥
राजा समुद्धरेत्तांस्तु तथाऽन्यांश्च कृषीबलान् ।

व्यवहार में विपन्न होने पर धनिक या किसान की रक्षा करने का निर्देश— सत्य (ईमानदारी) आचरण रखनेवाला कोई धनिक या किसान यदि व्यवहार (लेन-देन) के नाते बिगड़ गया हो (हीन अवस्था में पड़ गया हो) तो राजा उसकी सहायता कर उद्धार करे।

ये सैन्यधनिकास्तेभ्यो यथार्हा भृतिमावहेत् ॥ ९४ ॥
पारदेश्यं च त्रिंशांशमधिकं तद्धनव्ययात् ।

धनी सैनिक का वेतन व भत्ता के विषय में विचार— जो सेना के अन्दर धनी सैनिक हों उनको योग्यता के अनुसार उचित वेतन दे। और राजधानी

४१२ | शुक्रनीतिः

से बाहर परदेश में जाने पर उनका जो धन-व्यय हो उससे तीसवां भाग अधिक मिलाकर राजा उनको द्रव्य दे ।

धनं संरक्षयेत्तेषां यत्नतः स्वात्मकोशवत् ॥ ६५ ॥
संहरेद्धनिकात् सर्वं मिथ्याचाराद्धनं नृपः ।

**सैनिकों के धन की आत्मवत् रक्षा करने का एवं जालसाज धनिकों का धन हरण करने का निर्देश—**और सैनिकों के धन को अपने खजाने की भांति यत्न-पूर्वक रक्षा करे । यदि कोई धनिक जालसाजी का व्यवहार कर धन पैदा करे तो उसका संपूर्ण धन छीन ले ।

यदा चतुर्गुणा वृद्धिर्गृहीता धनिकेन च ॥ ६६ ॥
अधमर्णान्न दातव्यं धनिने तु धनं तदा ।

इति शुक्रनीतौ खिलनीतिनिरूपणं नाम पञ्चमोऽध्यायः ।
इति शुक्रनीतिः समाप्ता ।

**मूल से चौगुना सूद के चुकने पर धनी को कुछ न देने का निर्देश—**और जब मूल धन से चौगुनी वृद्धि (सूद) धनिक ने ऋण लेनेवाले से ले ली हो तब उससे अधिक धन लेने के लिये धनिक को रोक दे । अर्थात् ऋण पट गया इससे ऋण लेनेवाला धनी को कुछ न दे ।

इति शुक्रनीतिभाषाटीकायां खिलनीतिनिरूपणं नाम पञ्चमोऽध्यायः समाप्तः ।


टीकाकार-परिचयः—

श्रीभार्गवीभर्तुरनुग्रहेण श्रीभार्गवीये ननु नीतिशास्त्रे ।
भर्गप्रियायामथिकाशि टीका समाप्ति राष्ट्रस्य गिराऽभ्युपेता ॥
वेदेन्दुशून्याक्षिमितोऽब्दमध्ये श्रीविक्रमादित्यप्रवर्त्तितेऽत्र ।
पौषे सितावाद्यतिथाविनेऽह्नि श्रीमद्ब्रह्मयुक्-शंकरनामकेन ॥
गोस्वामिदामोदरपादपद्म-सत्प्रमत्तेन च गौतमेन ।
राजेश्वरीताततया ब्रजेश्व-र्यात्मेश्वरत्वेन च विश्रुतेन ॥
'बस्ती' पुरीमध्यगत-प्रसिद्ध 'मिश्रौलिया' ग्रामसमुद्भवेन ।
विद्याविलासाख्यधिया सुधेन द्राक्षपद्यनिर्माणकृतश्रमेण ॥
टीकादिसम्पादनतः सदायूर्वेदागमग्रन्थविचारणायाम् ।
कृतश्रमेण प्रणयेन शश्वच्छब्दद्युनद्यम्ब्ववगाहनेन ॥
समाप्तश्चाऽयं ग्रन्थः

शुक्रनीति-श्लोकानुक्रमणिका

श्लोक/पादपृष्ठश्लोक/पादपृष्ठश्लोक/पादपृष्ठ
अंगानि वेदाश्चत्वारो२४अतिमृदुस्तुतिनति४००अधिकृतो दशग्रामे२९
अंगानां क्रमशो बह्र्ये१०अतोऽन्यथा विनाशाय६१अधीते सुस्वरं गाति२९०
अकर्तुं यद्धितमपि७०अतो यतेत तत्प्राप्त्यै१३८अधोगमा सदा कार्या३३५
अकृष्यबालस्थविर२८५अतो यतेत तत्प्राप्त्यै१५५अनन्यस्वस्वकामत्य१८१
अकृत्वाद्योऽपि शनैः२८६अतो विभागं दत्त्वैषां४०३अनन्याः स्वामिभक्ताश्च८४
अकातरत्वं शस्त्रास्त्र४८अल्पटनं चानशनं१७६अनर्थमप्यभिप्रेतं१४०
अकीर्ति लभते सोऽत्र१७९अत्यन्तविशदं वस्त्रं२०८अनागमं तु यो भुङ्क्ते१०४
अकुटुम्ब्यं कति च७२अत्यन्तविषयासक्तं३६६अनागमादपि या मुक्तिः
अकोपोऽपि सकोपाभः९२अल्पायासो हि विद्यासु१७६अनाचाराद्धर्महानि१६२
अगाधसलिले मग्नो१७अत्यावश्यं त्वसद्वेऽपि११९अनियुक्तो न वै ब्रूयात्१७९
अग्निदो गरदश्चैव१३२अत्युग्रदण्डरूपः स्यात्१९१अनियुक्तो नियुक्तो वा२७३
अग्निदो गरदो वैश्या१९७अथ कोशप्रकरणं२०१अनिषिद्धोपायकार्यः३७२
अग्नारस्यैव गन्धस्य३५९अथ मित्रप्रकरणं१८१अनिष्टवाक् परुषवाग्१९७
अङ्गीकर्तुं योग्यमिति११३अथ मित्रे तृतीयं तु२२१अनीतिरेव सच्छिद्रं
अङ्गीकृतं यथार्थं यद्२१२अथर्वणां चोपवेदः२२७अनीतिस्ते तु मनसि९०
अङ्गीकृतमिति लिखेन्११३अथ साधारणं नीति१२५अनुक्रमेण संयोज्यो७३
अङ्गीकृतापराधेन३८४अदत्तं यश्च गृह्णाति३२१अनुच्छेद्यमनाहार्यं१०३
अचिरात्तं दुरात्मानं२७०अदानेनापमानेन२२अनुनीय यथाशक्ति१६४
अजायाश्च गवांश्चैव स्यान्२१६अदीर्घसूत्रः सत्कार्ये६५अनुभूतस्मारकं तु२९६
अजायाश्चैव शङ्घर्णं२०९अदुष्टऋत्विजं याज्यो३२०अनुयायात्प्रतिपदं१३५
अजाविगोमहिष्यश्च२१९अदेयं यस्य वै नास्ति४७अनुरागं सुस्वरं च८५
अजाविगोमहिष्येन७८अद्रोहसमयं कृत्वा३६५अनूपे तु तृणाधानां३५३
अतः सदानीतिशास्त्रअधमर्णस्थितं चापि१५९अनेकतन्तुसंयोगैः२३५
अतत्परनरस्यैव१८अधमर्णात् दातव्यं४१२अनेकासनसन्धाने२३२
अतिकामक्रोधलोभै३१३अधमा धनमिच्छन्ति१२१अनेन कर्मणा वेते२७७
अतिदण्डाच्च गुणिनि१८४अधरोष्ठोऽनुचिबुकं३३७अन्तःपुरं वासगृहं२८०
अतिदानतपःसत्य४०२अधर्मतः प्रवृत्तं तं३१३अन्तःपुंमविपकार्तं३५८
अतिदानेन दारिद्र्यं१६२अधर्मशीलन्नृपतेः२०२अन्त्यजश्वादिपरिधि३३५
अतिदुष्टाञ्छठमिता३४१अधर्मशीलो नृपतिः१९९अन्त्यौ द्वौ पञ्चमाब्दे तु३५१
अतिमौढ्यमतिदीर्घं२२अधिकान् कृषिकृत्स्यै वा२४३अन्नं न निन्द्यात् सुस्वस्थ१४४
अतिमद्यं हि पिबतो१८अधिकारमदं पीत्वा७३अन्नं मुक्त्वा जलं१४८
अतो नृपः सूचितोऽपि१९२अधिकारिगणैः कार्य५४अन्नसंस्कारदोषेषु३७७
अधिकारिणमेकं वा७४अन्यगृद्धदारविदं३५

२७ शु०

४१४ | शुक्रनीतिः

चरण / प्रतीकपृष्ठचरण / प्रतीकपृष्ठचरण / प्रतीकपृष्ठ
अन्यथा दुःखमाप्नोति१६१अभावे क्षत्रिया योज्या१२३अवाहितो भवेन्मन्दः३४५
अन्यथा दुःखमाप्नोति१७८अभावे वीथिनो माता३१५अविचिन्त्य नृपस्त्वर्यं३१३
अन्यथा मृतिगुह्यन्तं२८७अभिमानाच्च लोभाच्च२९९अविमर्देऽपि विमर्दे१४६
अन्यथाऽऽसुर्धनमुद्धर्४०९अभियुक्तनिरुद्धैर्वा३९अविवेकी यत्र राजा१३३
अन्यथाऽऽसुर्धनमुद्धृद्१४५अभियुक्तस्तथाऽन्येन२८५अविसंवादि विद्वद्भिः४०९
अन्यथाऽऽसुर्धनहरा२४८अभियुक्ताय दातव्यं३०९अव्यक्तमेव क्रीणाति३२०
अन्यथा योजितास्ते तु३९०अभियोगानुरूपेण२८८अभ्यास्यागम्यमित्येतत्२९१
अन्यथा शक्तितान्सन्ध्यान्३०३अभेद्यं व्यूहविद्वीर१२४अभ्याहताशः संतुष्ये५०
अन्यथा शीलनाशाय४०६अमात्यः प्राङ्‌विवाकश्च६७अभ्याहताङ्गस्तेजस्वी२७
अन्यथा स्वप्रजातापो२०५अमात्यः प्राड्विवाको३१४अभ्यङ्क्तिनक्षमो येन४७
अन्यथा ह्यभियोक्तारं३१४अमात्यमपि संवीक्ष्य५४अशक्यो निर्णयो ह्यन्यैः२७१
अन्यद्रजोधिकं तेज१७१अमात्यो दूत इत्येता६७अशिक्षितमसारं वा३६२
अन्यस्यावर्तकस्त्वारम्१०५अमितस्य प्रदातारं२४२अशीतिवत्सरं यावद्३५०
अन्यान् सूनृतया तस्यै१२१अयं सहस्रापराधी१३१अशीत्यश्वान् रथे चैकं३३१
अन्यायकारो कलह१९७अयुक्तं यत् कृतं चोक्तं१३१अशुभं चातिसंलग्न२४२
अन्यायगामिनि पत्न्यौ६५अयोग्यः पुरुषो नास्ति७५अशोधकनृपान्नैव४९
अन्यायवर्तिनां राज्यं५४अरक्षितारं नृपतिं१९अशोधयित्वा पक्षं ये२८३
अन्यायेनाभितो यस्माद्२०२अरिमेदश्च पीतद्रुः२४६अशौचं निर्दया दर्पः१५३
अन्यार्थमर्थहीनं च२८९अरेद्विषत्गुणाम् ज्ञात्वा१७८अश्वः सन्ताड्यते प्राज्ञैः१४६
अन्येषांमन्यधीनाञ्च२३७अर्जने तु महद्दुःखं२०६अश्वत्थो विचरेद्यातां४०९
अन्योदवासहिष्णुश्च१६७अर्जुनाद् ग्राहिता स्वस्य४०५अश्वस्य षट् सिता दन्ता३५१
अन्योदयासहिष्णुश्च१९७अर्थमपहुते वादी३०५अश्वानां च गजानां च३६९
अन्योन्ययोः समक्षं तु२९३अर्थशास्त्रं कामशास्त्रं२२५अश्वे जयो वृषे धैर्यं१६५
अपराधं मातृस्नुषा१५३अर्थस्य पुरुषो दासो४०२अष्टतालप्रमाणस्य२६६
अपशब्दाश्च नो वाच्या१७८अर्थाद् धर्मश्च कामश्च४०२अष्टतालवपुस्त्यैव२१६
अपसृत्याक्षसिद्धयर्थं३७०अर्थानर्थों तु वार्तायां२४अष्टताला द्वापरे तु२५१
अपाणयः पाणिमता३७६अर्थिना लिखितो ह्यर्थः२९२अष्टप्रकृतिभिर्युक्तो६७
अपि ज्ञेयस्करं नृणां२४९अर्थिनः पूरयेद्दीनं२८३अष्टमांशं पारितोष्यं१२०
अपि स्यात्तुमुदासीत९१अर्थिप्रत्यर्थिसाक्षिभ्यो३००अष्टमे पतितोत्पन्नौ३५२
अपृष्टो नैव कथयेद्१३५अर्थो वा यदि वा धर्मे४०२अष्टाङ्गुलं ललाटं स्याद्२५३
अप्रयत्नेन च स्त्रिया२९८अर्धचन्द्रां वर्तुलां वा३२अष्टादशाब्दतस्तो हि३५१
अप्रशस्तं तयोर्नैव२९५अर्धशेनारमभोगश्च४६असंमतं विरुद्धं वा६३
अप्रधानः प्रधानः स्याद्९४अर्धाङ्गुलाधिका वापि३३६असंवलितपद्म्यां तु३४९
अप्रवासी गृही नित्यं१८०अर्ध्य शतधनुः प्रोक्त३४७असत्यं कार्यघातित्वं१६६
अप्रसिद्धं निराधारं२९०अल्पायुर्मूत्रकृच्छ्रार्थंअसाहाय्यं च तत्कार्ये१५९
अप्रेरितहितकरंअस्वीकृतं विभागेन५०असिद्धस्तं परासेध२८६
अडाका मध्यवयसः७७अवश्यंभाविभावानांअसूयकः शत्रुसेवी१९७
अशक्यमक्षणे चैव२८८अवश्यपोष्यभरणा११८अस्तीति न च मिथ्ये२८९
असमर्थं च वरं दद्याद्२५८अवश्यमेव भोक्तव्ये१४अस्त्रं तु द्विविधं ज्ञेयं३५६

श्लोकानुक्रमणिका

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अक्षाद्यैः स्वार्थसिद्धयर्थं३६१आन्वीक्षिक्षात्मविज्ञाना२५
अस्मिन्नर्थे समानेन२१२आपत्कालेऽन्यदुर्गाणा३२५ईर्ष्यास्ते चोपसन्धाने३७७
अस्य क्षिप्यते यत्तु३५६आपत्स्वपि न देयानि३१९ईशता चाधिकतरा२२१
अस्वतन्त्राः प्रजाः सर्वाः३१५आपदं प्रतरिष्यामो४०४ईषत्कुटिलदण्डाग्र२६३
अस्वामिकं कति प्राहुं७२आपद्युन्मार्गगमने९०ईषदूत्प्लुत्य गमन३४९
अहिंसेवासाधुहिंसा१८९आपन्नः सन्धिमन्विच्छेत्३६४
आप्तवाक्यमनादृत्य१९१उक्तं राष्ट्रप्रकरणं३२३
आकुञ्चिताम गदाभ्यां३४९आयः साहसिकः सैव१०७उक्तं संक्षेपतो लक्ष्म२२५
आचारप्रेरको राजाआयव्ययप्रविज्ञाता६९उक्ते तु साक्षिणा साध्ये३०१
आचार्यः सर्वचेष्टासु१३१आयुक्तिको विंशतिभिः४१०उचितं तु व्ययं काले१५८
आज्ञापयामतश्चाहं१६आयुर्बीजहरी राज्ञा२७०उच्चैः पदण्यासगतिः३४४
आशामुलंघयन्ति स्म१००आरम्भं तस्य कुर्याद्धि४०८उच्चैः प्रहसनं कासं८९
आशामग्रस्तु महतां१४५आरामकृत्रिमवन८६उत्फतिंतुं समर्थोपि१७
आशाशुकांश्च भूनकान्८७आर्जकस्यैव दुःखं स्यात्२०६उत्कृती सस्यघाती वा२८२
आशोल्लङ्घनकारित्वं२८२आवर्तकविहीनौ तु११०उत्कृष्टमातिशीतानां२७२
आततायित्वमापन्नो३७८अनुक्तार्थं स्मृतं मान१२१उत्कोचं नैव गृह्णीयात्९८
आत्मनो विपरीतश्च३६२आवर्तौ जायते येषां३३९उत्कोचग्रहणं नैव४३
आत्मपितृभ्रातरश्च१८१आवेदयति यत्कार्यं४८उत्तमा द्विगुणा मध्या४१०
आत्मपितृमातृगुणैः१५९आवेदयति यत्पूर्वं२८०उत्तमाऽधममध्यानां२७४
आत्मवत् सततं पश्ये१२६आशीविषमिव क्रुद्धं८९उत्तमार्थं तदर्धं२१२
आत्मशुद्धिपराणां च३०९आसमन्ताच्चतुर्दिक्षु१८४उत्तमैरननुज्ञातं१४९
आत्मस्त्रीधनगुह्यानां१३आसिंधुनौगमाकूले३२उत्तमो नीचसंसर्गाद्२२३
आत्मस्त्रीधनगुह्यानां१८१आसीनः स्याद्विमुक्ताक्षः३७०उत्तमो मध्यमो नीचो१५९
आत्मस्त्रीपुत्रमित्राणि१५६आसेधकाल आसिद्ध२८४उत्तरे मद्यपा नार्यः२७६
आत्मानं गोपयेत् काले३६५आसेधयेद्विवादार्थी३१उत्थाप्य शयनीयानि२३८
आत्मानं प्रथमं राजा१५आ स्तनात् पृष्ठदेशान्ता२५५उत्थाय पश्चिमे यामे४०
आत्मैव ह्यात्मनः साक्षी३०१उत्पन्नोत्पत्स्यमानानां१९३
आदानमाशुकारित्वं२३६इङ्गितं चेष्टितं यत्नात्४८उत्सगार्थं गुहान्कुर्यां३३
आदौ तद्धितकृत्स्नेहं४०६इङ्गिताकारचेष्टाभ्य९२उत्सृष्टं रिपुणा वापि३२९
आदौ वरं निर्धनत्वं१७३इङ्गिताकारतत्त्वज्ञो६७उत्सृष्टा वृषभाद्या४५
आद्यः पुनस्त्वदन्तिमांशं३९२इच्छ्या ताडितं कृत्वा११५उदग्गृहान् प्रकुर्वीत३४
आधर्यकेभ्यश्चोरेभ्यो८२इच्छया स्थितरः कुर्यात्३०९उदग्गच्छतहस्तां प्राक्३७
आधपणं न कुर्वेन्तु४५इज्याध्ययनदानानि२२३उदरं च तथा बस्ति२६६
आधराधेयरूपौ वा११४इतरः कीर्तितस्तज्ज्ञै१०८उदुम्बराश्वत्थवट२४४
आधिः सीमा बालधनं१०४इति ज्ञेयं निराबाधं२९०उद्धृतेषुमयो शृङ्गा३७८
आनृशंस्यं परो धर्मः२५इति शक्तिमयोगेन३०३उद्धम्य शस्त्रमायान्तं३७८
आन्वीक्षिकी त्रयी वार्ता२४इन्द्रनीलं पुष्परागो२०८उद्वेजते जनः कौर्याद्१६२
आन्वीक्षिक्यां तर्कशास्त्रं२५इन्द्राग्नौ तावुभौ शस्तौ३४०उपदेशो हि मूर्खाणां१८४
इन्द्रानिलयमार्काणा१२