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श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished276 पृष्ठ

१०२ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १

१०२ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १

नीशः संबध्यते जीवः; अपि तु | करता है तथा मायाधीन जीव उसमें ज्ञाज्ञौ द्वौ ज्ञ ईश्वरोऽज्ञो जीवस्ता- | बँध जाता है—केवल इतना ही नहीं, वजाै जन्मादिरहितौ । ब्रह्मण | अपि तु वे दोनों क्रमशः ज्ञ और अज्ञ एवाविकृतस्य जीवेश्वरात्मना- | हैं—ईश्वर ज्ञ (सर्वज्ञ) है और जीव वस्थानात् । तथा च श्रुतिः— | अज्ञ है। तथा वे दोनों ही अज— “पुरश्चक्रे द्विपदः | जन्मादिरहित हैं; क्योंकि एकमात्र पुरश्चक्रे चतुष्पदः । | अविकारी ब्रह्म ही जीव और ईश्वर- पुरः स पक्षी भूत्वा | भावसे स्थित है। ऐसा ही श्रुति भी पुरः पुरुष आविशत्॥” | कहती है—“पुरुषने दो पैरोंवाला (बृ० उ० २।५।१८) | शरीर बनाया और चार पैरोंवाला इति । | शरीर बनाया और वह पक्षी होकर “एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा रूपं | उन पुरोंमें प्रवेश कर गया,” “इसी रूपं प्रतिरूपो बहिश्च” (कठ० उ० | प्रकार सम्पूर्ण भूतोंका वह एक ही २।२।९) इति च । ईश- | अन्तरात्मा प्रत्येक रूपमें उसके अनु- नीशौ, छान्दसं ह्रस्वत्वम् । | रूप हो रहा है तथा उनके बाहर भी नन्वद्वैतवादिनो यदि भोक्तृ- | है।” ‘ईशनीशौ’ इस समस्त पदमें [जीवेश्वरयो-बैलक्षण्यभाव-शङ्कनम्] भोग्यलक्षणप्रपञ्च- | शकारकी ह्रस्वता वैदिक है। सिद्धिः स्यात्तदा सर्वेशः परमेश्वरः, | किन्तु अद्वैतवादीके सिद्धान्तमें अनीशो जीवः, सर्वज्ञः परमे- | यदि प्रपञ्चकी सिद्धि हो सकती हो श्वरः, असर्वज्ञो जीवः, सर्व- | तभी परमेश्वर सर्वेश्वर है, जीव कृत्परमेश्वरः, असर्वकृज्जीवः, | अनीश्वर है, परमेश्वर सर्वज्ञ है, जीव सर्वभृत्परमेश्वरः, देहादिभृ- | असर्वज्ञ है, परमेश्वर सब कुछ करने- ज्जीवः, सर्वात्मा परमेश्वरः, | वाला है, जीव कुछ भी नहीं कर | सकता, परमेश्वर सबका पोषण | करनेवाला है, जीव देहादिका ही | पोषक है, परमेश्वर सबका आत्मा है,

अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०३

अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०३


[वाम भाग / संस्कृत]

असर्वात्मा जीवः, विश्वैश्वर्य आप्तकामः परमेश्वरः, अल्पै- श्वर्योऽनाप्तकामो जीवः, “सर्वतः- पाणि०” (श्वेता० उ० ३।१६) “सहस्रशीर्षा” (श्वेता० उ० ३। १४) । “नित्यो नित्यानाम्” (श्वेता० उ० ६।१३) इत्या- दिना जीवेश्वरयोर्विलक्षणव्यव- हारसिद्धिः स्यात् । न तु भोक्त्रा- दिप्रपञ्चसिद्धिरस्ति स्वतः कूटस्था- परिणाम्यद्वितीयस्य वस्तुनोऽभो- क्त्रादिरूपत्वात् । नापि परतो ब्रह्मव्यतिरिक्तस्य भोक्त्रादि- प्रपञ्चहेतुभूतस्य वस्त्वन्तरस्याभा- वात् । वस्त्वन्तरसद्भावेऽद्वैत- हानिरित्याशङ्क्याह—अजा ह्येका भोक्तृभोग्यार्थयुक्तेति ।

भवेदयमीश्वराद्यविभागः यदि (पार्श्व-टिप्पणी: मायया वैलक्षण्य-साधनम्) प्रपञ्चासिद्धिरेव स्यात् । सिध्यत्येव प्रपञ्चः । हि यस्मदर्थे। यस्मदजा प्रकृतिर्न जायत इत्यजा सिद्धा प्रसव-


[दक्षिण भाग / हिन्दी भाष्यार्थ]

जीव सबका आत्मा नहीं है, परमेश्वर सर्वैश्वर्यसम्पन्न और पूर्ण- काम है, जीव अल्पैश्वर्यवान् है और वह पूर्णकाम नहीं है, तथा “उसके सब ओर हाथ हैं” “वह सहस्र मस्तकों- वाला है” “वह नित्योंका नित्य है” इत्यादि वाक्योंसे जीव और ईश्वरके भेदव्यवहारकी सिद्धि हो सकती है। किन्तु भोक्तादि प्रपञ्चकी सिद्धि स्वतः तो हो नहीं सकती, क्योंकि कूटस्थ, अपरिणामी, अद्वितीय वस्तु अभोक्तादिरूप है तथा परतः (किसी अन्यसे) भी उसकी सिद्धि नहीं हो सकती है, क्योंकि ब्रह्मसे अतिरिक्त भोक्तादि प्रपञ्चकी हेतुभूत किसी अन्य वस्तुकी सत्ता ही नहीं है। कारण, किसी अन्य वस्तुकी सत्ता स्वीकार करनेपर तो अद्वैत ही सिद्ध नहीं हो सकता। ऐसी शंका होनेपर श्रुति कहती है—‘भोक्ताके भोग्य- सम्पादनमें एकमात्र अजा (प्रकृति) ही नियुक्त है।’

यदि प्रपञ्च सिद्ध न होता तो यह ईश्वरादिका विभाग न होना सम्भव था, किन्तु प्रपञ्च तो सिद्ध होता है। मूलमें 'हि' शब्द 'क्योंकि' के अर्थमें है। क्योंकि अजा-प्रकृति, जो उत्पन्न होनेके कारण अजा है, प्रसवधर्मिणी सिद्ध है।

१०४ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १

धर्मिणी। “अजामेकाम्” (श्वेता० | अर्थात् “एक अजाको”, “मायाको उ० ४। ५)। “मायां तु | तो प्रकृति जानो”, “इन्द्र मायासे प्रकृतिं विद्यात्” (श्वेता० उ० | अनेकरूप होकर चेष्टा कर रहा ४। १०)। “इन्द्रो मायाभिः | है”, “माया परा प्रकृति है”, पुरुरूप ईयते” (वृ० उ० २। | “मैं अपनी मायासे जन्म लेता ५। १९)। “माया परा | हूँ” इत्यादि श्रुति-स्मृतियोंसे सिद्ध प्रकृतिः” “संभवाम्यात्ममायया” | होनेवाली भगवान्‌की आत्मशक्तिरूपा (गीता ४। ६)। इत्यादि- | जगज्जननी एक माया अपने विकार- श्रुतिस्मृतिसिद्धा विश्वजननी | भूत भोक्ता, भोग और भोग्यके देवात्मशक्तिरूपैका स्वविकार- | सम्पादनमें नियुक्त होकर ईश्वरकी भूतभोक्तृभोगभोग्यार्थप्रयुक्तेश्वर- | निकटवर्तिनी किंकरीरूपसे विद्यमान निकटवर्तिनी किंकुर्वाणावतिष्ठते । | है। अतः वह मायी परमेश्वर भी तस्मात्सोऽपि मायी परमेश्वरो | मायारूप उपाधिकी सन्निधिसे माया- मायोपाधिसंनिधेस्तद्वानिव कार्य- | युक्त-सा हो अपने कार्यभूत देहादि भूतैर्देहादिभिस्तद्वदेव विभक्तैर्वा | विभक्त पदार्थोंके कारण उन्हींके विभक्त ईश्वरादिरूपेणावतिष्ठते । | समान ईश्वरादिरूपसे विभक्त हुआ- तस्मादेकस्मिन्नेकरसे परमात्मन्य- | सा स्थित है । अतः परमात्माको भ्युपगम्यमानेऽपि जीवेश्वरादि- | एक और एकरस स्वीकार करनेपर सर्वलौकिकवैदिकसर्वभेदव्यवहार- | भी जीवेश्वरादि भेदरूप समस्त सिद्धिः। न च तयोर्वस्त्वन्तरस्य | लौकिक और वैदिक व्यवहार सिद्ध सद्भावाद्वैतवादप्रसक्तिः । मा- | हो सकता है और उन अन्य वस्तुओं- याया अनिर्वाच्यत्वेन वस्तुत्वा- | के रहनेसे द्वैतवादकी भी प्राप्ति योगात् । तथाह—“एषा हि | नहीं हो सकती, क्योंकि अनिर्वचनीय भगवन्माया सदसद्व्यक्तिवर्जिता” | होनेके कारण माया कोई वस्तु नहीं इति । | है । ऐसा ही कहा भी है—“यह | भगवान्‌की माया सदसद्भावसे रहित | है” इत्यादि ।

अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०५

अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०५ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ यस्मादजैव भोक्त्रादिरूपा | क्योंकि अजा—प्रकृति ही तस्मात्तत्स्वीकृतस्य मिथ्यासिद्ध- | भोक्तादिरूप है इसलिये उसका | कल्पना किया हुआ प्रपञ्च मिथ्या वस्तुत्वसंभवादनन्तश्चात्मा । च- | और असत् वस्तु होनेसे आत्मा तो | अनन्त ही है । मूलमें 'च' शब्द शब्दोऽवधारणे । अनन्त एवा- | निश्चयार्थक है; अर्थात् आत्मा अनन्त त्मा । अस्यान्तः परिच्छेदो | ही है, यानी देश, काल या वस्तु | किसीसे भी इसका अन्त—परिच्छेद देशतः कालतो वस्तुतो वा न | नहीं है । विश्वरूप अर्थात् विश्व विद्यत इति । विश्वरूपो विश्व- | इसीका रूप है, क्योंकि परमात्मा | स्वयं तो विश्वरूप है नहीं [अर्थात् मस्यैव रूपमिति; परस्याविश्व- | विश्वरूपमें उसका परिणाम नहीं रूपत्वात् । "वाचारम्भणं विकारो | होता ] । "विकार वाणीसे आरम्भ | होनेवाला नाममात्र है" इस श्रुतिके नामधेयम्" इति रूपस्य रूपि- | अनुसार रूप रूपवान्‌से भिन्न नहीं व्यतिरेकेणाभावाद्द्विश्वरूपत्वाद- | होता, इसलिये विश्वरूप होनेसे भी | इसकी अनन्तता ही सिद्ध होती है ।* प्यानन्त्यं सिद्धमित्यर्थः। हिशब्दो | यहाँ 'हि' शब्द 'क्योंकि' अर्थमें है, यस्मादर्थे। यस्माद्विश्वरूपवैश्वरूप्यं | क्योंकि विश्वरूप बहुरूपता परमात्मा- | का ही लक्षण है, इसलिये तात्पर्य यह लक्षणं परमात्मन इत्येवमादिभि- | है कि इन सब हेतुओंसे भी आत्माका रात्मनो विश्वरूपत्वमित्यर्थः। यत | विश्वरूपत्व सिद्ध होता है । क्योंकि

  • तात्पर्य यह है कि यद्यपि आत्मा परमार्थतः विश्वरूप नहीं है, क्योंकि ऐसा माननेसे तो वह सावयव और परिणामी सिद्ध होगा; तथापि विश्व उससे भिन्न भी नहीं है। अघटनघटनापटीयसी मायाकी महिमासे विशुद्ध आत्मतत्त्वमें ही विश्वरूपभ्रान्ति होती है। अतः आत्मासे पृथक् विश्वकी सत्ता न होनेसे उसकी अनन्ततामें कोई अन्तर नहीं आता।

१०६ | श्वेताश्वतरोपनिषद् | [ अध्याय १

१०६ | श्वेताश्वतरोपनिषद् | [ अध्याय १


[बायाँ स्तम्भ / Left Column]

एवानन्तो विश्वरूप आत्मात एवा- कर्ता कर्तृत्वादिसंसारधर्मरहित इत्यर्थः । कदैवमनन्तो विश्वरूपः कर्तृ- त्वादिसकलसंसारधर्मवर्जितो मुक्तः पूर्णानन्दाद्वितीयब्रह्मरूपेणैवाव- तिष्ठते ? इत्यत्राह—त्रयं यदा विन्दते ब्रह्ममेतदिति । त्रयं भोक्तृभोगभोग्यरूपम् । मायात्म- कत्वादधिष्ठानभूतब्रह्मव्यतिरेकेण नास्ति किन्तु ब्रह्मैवेति यदा विन्दते तदा निवृत्त निखिलविकल्पपूर्णान- न्दाद्वितीयब्रह्मभाकर्तृत्वादिसकल- संसारधर्मवर्जितो वीतशोकः कृत- कृत्योऽवतिष्ठत इत्यर्थः । अथवा ज्ञाज्ञात्मकजीवेश्वरप्रकृतिरूप- त्रयं ब्रह्म यदा विन्दते लभते तदा मुच्यत इति । ब्रह्ममिति मका- रान्तं ब्रह्ममेतु मां मधुमेतु माम् इतिवच्छान्दसम् ॥ ९ ॥


[दायाँ स्तम्भ / Right Column]

आत्मा अनन्त और विश्वरूप है इसी- लिये वह अकर्ता अर्थात् कर्तृत्वादि संसारके धर्मोंसे रहित है । आत्मा इस प्रकार अनन्त, विश्वरूप, कर्तृत्वादि सम्पूर्ण सांसारिक धर्मोंसे रहित, मुक्त और पूर्णानन्द अद्वितीय ब्रह्मरूपसे ही कब स्थित होता है ? ऐसा प्रश्न होनेपर श्रुति कहती है—'त्रयं यदा विन्दते ब्रह्म- मेतत्' त्रय अर्थात् भोक्ता, भोग और भोग्यरूप मायामय होनेसे अपने अधिष्ठान ब्रह्मसे भिन्न नहीं है, किन्तु ब्रह्म ही है—ऐसा जिस समय अनुभव करता है उस समय जीवात्मा सम्पूर्ण विकल्पोंके निवृत्त हो जानेसे पूर्णानन्द अद्वितीय ब्रह्मस्वरूप होकर कर्तृत्वादि सकल संसारधर्मोंसे रहित, शोकहीन और कृतकृत्य होकर स्थित होता है—ऐसा इसका तात्पर्य समझना चाहिये । अथवा ऐसा जानो कि क्रमशः यह ज्ञ, अज्ञ और अजारूप ईश्वर, जीव एवं प्रकृति इन तीनोंको यह ब्रह्मरूपसे प्राप्त (अनुभव) कर लेता है उस समय यह मुक्त हो जाता है। मूलमें 'ब्रह्मम्' यह मकारान्त प्रयोग 'ब्रह्ममेतु माम्' 'मधुमेतु माम्' इत्यादिके समान वैदिक है ॥ ९ ॥

अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०७

अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०७ प्रधान और परमेश्वरकी विलक्षणता तथा उनके तत्त्वज्ञानसे मोक्षका कथन जीवेश्वरयोर्विभागं दर्शयित्वा | जीव और ईश्वरका भेद दिखाकर तद्विज्ञानादमृतत्वं दर्शितम् । | उनके विज्ञानसे अमृतत्व दिखला इदानीं प्रधानेश्वरयोर्वैलक्षण्यं | दिया । अब श्रुति प्रधान और दर्शयित्वा तद्विज्ञानादमृतत्वं | ईश्वरकी विलक्षणता दिखलाकर उनके दर्शयति— | विज्ञानसे अमृतत्व प्रदर्शित करती | है— क्षरं प्रधानममृताक्षरं हरः क्षरात्मानावीशते देव एकः । तस्याभिध्यानाद्योजनात्तत्त्वभावा- द्भूयश्चान्ते विश्वमायानिवृत्तिः ॥१०॥ विनाशशील प्रधान और अविनाशी जीवात्माको हरसंज्ञक एक देव नियमित करता है । उसके चिन्तनसे, उसमें मनोयोग करनेसे और उसके तत्त्वकी भावना करनेसे प्रारब्धकी समाप्ति होनेपर विश्वरूप मायाकी निवृत्ति हो जाती है ॥ १० ॥ क्षरं प्रधानममृताक्षरं हर इति । | ‘क्षरं प्रधानममृताक्षरं हरः’ अविद्यादेर्हरणात्परमेश्वरो हरः । | इत्यादि । अविद्यादिको हरनेके कारण अमृतं च तदक्षरं चामृताक्षरममृतं | परमेश्वर हर हैं । जो अमृत और ब्रह्मैवेश्वर इत्यर्थः । स ईश्वरः | अक्षर है उसे अमृताक्षर कहा है, क्षरात्मानौ प्रधानपुरुषावीशत इष्टे | वह अमृत ब्रह्म ही ईश्वर है । वह देव एकश्चित्सदानन्दाद्वितीयः | एक देव ईश्वर अर्थात् सच्चिदानन्दा- परमात्मा । तस्य परमात्मनो- | द्वितीय परमात्मा क्षर और आत्मा— ऽभिध्यानात्,कथम्?योजनाज्जीवानां | प्रधान और पुरुषका नियमन करता | है । उस परमात्माके अभिध्यानसे, | किस प्रकारके अभिध्यानसे ?— | योजनासे अर्थात् परमात्माके साथ

१०८ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १

१०८ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १

परमात्मसंयोजनात्तत्त्वभावात् 'अहं | जीवका योग करानेसे तथा तत्त्वभाव- ब्रह्मास्मि' इति भूयश्चासकृदन्ते | से यानी 'मैं ब्रह्म हूँ' ऐसी भावनासे प्रारब्धकर्मान्ते यद्वा स्वात्मज्ञानानि- | भूयः-पुनः-पुनः ऐसा होनेपर ष्पत्तिरन्तस्तस्मिन्स्वात्मज्ञानोदय- | अन्तमें अर्थात् प्रारब्धकर्मकी समाप्ति वेलायां विश्वमायानिवृत्तिः । सुख- | होनेपर अथवा आत्मज्ञानकी प्राप्ति दुःखमोहात्मकाशेषप्रपञ्चरूप- | ही अन्त है उसके होनेपर अर्थात् मायानिवृत्तिः ॥ १०॥ | आत्मज्ञानके उदयकालमें विश्वमायाकी निवृत्ति होती है । यानी सुख, दुःख एवं मोहमय सम्पूर्ण प्रपञ्चरूप मायाकी निवृत्ति हो जाती है ॥ १० ॥

ब्रह्मके ज्ञान और ध्यान-जन्य फलोंमें भेद इदानीं तद्विदस्तद्ध्यायिनश्च | अब श्रुति ब्रह्मवेत्ता और ब्रह्म- तज्ज्ञानध्यानकृतं फलभेदं | ध्यानीको ब्रह्मज्ञान और ब्रह्मध्यानसे दर्शयति— | होनेवाले फलोंका भेद दिखलाती है— ज्ञात्वा देवं सर्वपाशापहानिः क्षीणैः क्लेशैर्जन्ममृत्युप्रहाणिः । तस्याभिध्यानात्तृतीयं देहभेदे विश्वैश्वर्यं केवल आप्तकामः ॥११॥ परमात्माका ज्ञान होनेपर अविद्यादि सम्पूर्ण क्लेशोंका नाश हो जाता है और क्लेशोंका क्षय हो जानेपर जन्म-मृत्युकी निवृत्ति हो जाती है। तथा उसका ध्यान करनेसे शरीरपातके अनन्तर [ विराट् और हिरण्यगर्भकी अपेक्षा कारणब्रह्मरूप ] सर्वैश्वर्यमयी तृतीय अवस्थाकी प्राप्ति होती है और फिर आप्तकाम होकर कैवल्यपदको प्राप्त हो जाता है ॥ ११ ॥

अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०९

अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०९ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ज्ञात्वेति । ज्ञात्वा देवम् 'अय- | 'ज्ञात्वा देवम्' इत्यादि । महमस्मि' इति, सर्वपाशापहानिः | परमात्माको जानकर अर्थात् 'यह मैं पाशरूपाणां सर्वेषामविद्यादीना- | हूँ' ऐसा अनुभव करके सम्पूर्ण मपहानिः । क्षीणैरविद्यादिभिः | पाशोंका नाश यानी पाशरूप सम्पूर्ण क्लेशैस्तत्कार्यभूतजन्ममृत्युप्रहाणि- | अविद्यादि क्लेशोंका नाश हो जाता र्जननमरणादिदुःखहेतुविनाशः । | है। तथा क्षीण हुए अविद्यादि क्लेशों- ज्ञानफलं प्रदर्शितम् । | के साथ ही उनके कार्यभूत जन्म- | मृत्यु आदिका नाश हो जाता है; | अर्थात् जन्म-मृत्यु आदि दुःखके | हेतुओंका अन्त हो जाता है। यह | ज्ञानका फल दिखाया गया । ध्याने किञ्चित्क्रममुक्तिरूपं | अब ध्यानमें क्रममुक्तिरूप कुछ विशेषमाह—तस्य परमेश्वरस्या- | विलक्षणता बतलायी जाती है— भिध्यानाद्देहभेदे शरीरपातोत्तर- | उस परमेश्वरके ध्यानसे देहभेद कालमर्चिरादिना देवयानपथा | यानी शरीरपातके अनन्तर अर्चिरादि गत्वा परमेश्वरसायुज्यं गतस्य | देवयानमार्गसे जाकर परमात्माके तृतीयं विराड्रूपापेक्षयाव्याकृत- | साथ सायुज्यको प्राप्त हुए पुरुषको परमव्योमकारणेश्वरावस्थं विश्वै- | विराट्रूपकी अपेक्षा अव्याकृत परम- श्वर्यलक्षणं फलं भवति । स | व्योमरूप कारणब्रह्ममें स्थित सम्पूर्ण तदनुभूय तत्रैव निर्विशेषमात्मानं | ऐश्वर्यरूप तृतीय फल प्राप्त होता ज्ञात्वा केवलो निरस्तसमस्तैश्वर्य- | है। उसका अनुभव कर वह उसी तदुपाधिसिद्धिरव्याकृतपरमव्योम- | जगह अपनेको निर्विशेष जानकर, कारणेश्वरात्मकतृतीयावस्थं वि- | केवल हो जाता है; अर्थात् सम्पूर्ण | ऐश्वर्य और उसके साथ रहनेवाली | सिद्धिको त्यागकर, यानी अव्याकृत | परमव्योममय कारण ईश्वररूप

११० श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १

११० श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १

श्वैश्वर्यं हित्वाप्तकाम आत्मकामः | तृतीय अवस्थाके सम्पूर्ण ऐश्वर्यको पूर्णानन्दाद्वितीयब्रह्मरूपोऽवति- | छोड़कर आप्तकाम और आत्मकाम ष्ठते । | हो पूर्णानन्द अद्वितीय ब्रह्मरूपसे | स्थित हो जाता है । एतदुक्तं भवति—सम्यग्दर्श- | यहाँ यह कहा गया है कि नस्य तथाभूतवस्तुविषयत्वेन नि- | सम्यग्दर्शन तो यथार्थ वस्तुको विषय र्विषयपूर्णानन्दाद्वितीयब्रह्मविषय- | करनेके कारण निर्विशेष पूर्णानन्दा- त्वाद्विज्ञानानन्तरमविद्यातत्कार्य- | द्वितीय ब्रह्मविषयक होता है; अतः प्रहाणेन पूर्णानन्दाद्वितीयब्रह्मस्व- | ब्रह्मज्ञानके अनन्तर अविद्या और रूपोऽवतिष्ठते । ध्यानस्य पुनः | उसके कार्यकी निवृत्ति हो जानेसे सहसा न निराकारे बुद्धिः प्रवर्तत | विद्वान् पूर्णानन्दाद्वितीय ब्रह्मस्वरूपसे इति सविशेषब्रह्मविषयत्वात् “तं | ही स्थित हो जाता है । किन्तु यथा यथोपासते…” इति न्यायेन | ध्यानजनित बुद्धि सहसा निराकार सविशेषविश्वैश्वर्यलक्षणब्रह्मप्राप्त्या | ब्रह्ममें प्रवृत्त नहीं होती, अतः वह विश्वैश्वर्यमनुभूय निर्विशेषपूर्णा- | सविशेष ब्रह्मविषयक होनेसे “उसकी नन्दब्रह्मात्मानं ज्ञात्वा केवलात्म- | जिस-जिस प्रकार उपासना करता कामोऽवाप्ताशेषपुमर्थो मुक्तो | है उसी प्रकार फल मिलता है” इस भवति । | न्यायसे सर्वैश्वर्यरूप सविशेष ब्रह्मकी | प्राप्तिसे वह सम्पूर्ण ऐश्वर्यका अनुभव | कर फिर निर्विशेष पूर्णानन्दस्वरूप | ब्रह्मको आत्मभावसे जानकर केवल | आत्मकामी हो सम्पूर्ण पुरुषार्थको | प्राप्त करके मुक्त हो जाता है । तथा शिवधर्मोत्तरे ध्यानज्ञान- | इसी प्रकार शिवधर्मोत्तरमें भी योर्विश्वैश्वर्यलक्षणं केवलात्मकामा- | ध्यान और ज्ञानके क्रमशः विश्वैश्वर्य- प्तकामलक्षणं च फलं दर्शयति— | रूप और केवल आत्मकाम एवं | आप्तकामरूप फल दिखाये हैं—

अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १११

अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १११ “ध्यानादैश्वर्यमतुल- | “ध्यानसे अतुलित ऐश्वर्य मिलता है मैश्वर्यात्सुखमुत्तमम् । | और ऐश्वर्यसे उत्कृष्ट सुखकी प्राप्ति होती ज्ञानेन तत्परित्यज्य | है । ज्ञानसे उनका त्याग करके देहा- विदेहो मुक्तिमाप्नुयात्” इति । | भिमानसे रहित हो मोक्ष प्राप्त करे ।” तथा च दहरादिसविशेष- | इसी प्रकार दहरादि सविशेष सगुणोपासकानां “स यदि पितृ- | और सगुण ब्रह्मकी उपासना करने- लोककामो भवति संकल्पादेवास्य | वालोंको श्रुति “वह यदि पितृलोक- पितरः समुत्तिष्ठन्ति” (छा० उ० | की कामना करता है तो उसके ८।२।१) इत्यादिना विश्वैश्वर्य- | संकल्पसे ही पितृगण उपस्थित हो लक्षणं फलं दर्शयति । तथा च | जाते हैं” इत्यादि वाक्यसे विश्वैश्वर्य- प्रश्नोपनिषदि “यः पुनरेतं त्रिमात्रे- | रूप फल ही दिखलाती है । तथा णोमित्येतेनैवाक्षरेण परं पुरुष- | प्रश्नोपनिषद्में “जो तीन मात्रावाले मभिध्यायीत स तेजसि सूर्ये | ॐ इस अक्षरसे परम पुरुषका ध्यान संपन्नः” (प्र० उ० ५।५) इत्यादिना | करता है वह तेजोमय सूर्यमण्डलको परं पुरुषमभिध्यायतोऽर्चिरादिमा- | प्राप्त होकर” इत्यादि वाक्यसे परम र्गोपदेशपूर्वकं “स एतस्माज्जीव- | पुरुषका ध्यान करनेवाले पुरुषको घनात्परात्परं पुरिशयं पुरुष- | अर्चिरादिमार्गका उपदेश करके मीक्षते” (प्र० उ० ५।५) इति ब्रह्म- | “वह इस जीवघन (हिरण्यगर्भ) लोकं गतस्य तत्रैव सम्यग्दर्शन- | से उत्कृष्टतर सम्पूर्ण शरीरोंमें स्थित लाभं दर्शयित्वा “तमोङ्कारेणैवाय- | परम पुरुषको देखता है” इस प्रकार तनेनान्वेति विद्वान्यत्तच्छान्तमजर- | ब्रह्मलोकमें गये हुए पुरुषको उसी मममृतमभयं परं चेति” ( प्र० उ० | जगह सम्यग्दर्शनकी प्राप्ति दिखला- ५। ७) इति सम्यग्दर्शनेन मोक्ष | कर “विद्वान् उस ओंकाररूप | अवलम्बनके द्वारा ही उस शान्त, | अजर, अमृत और अभयरूप | परब्रह्मको प्राप्त हो जाता है” इस | वाक्यसे सम्यग्दर्शनके द्वारा मोक्षका

११२ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १

११२ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १

संस्कृत (मूल एवं टीका)हिन्दी अनुवाद
उपदिष्टः । “तमेवं विद्वानमृतउपदेश किया है । तथा “उसे
इह भवति” ( नृ० पू० ता० १ ।इस प्रकार जाननेवाला यहाँ अमर हो
६) इति विदुषोऽर्चिरादिगमनंजाता है” इस वाक्यसे विद्वान्‌को
विनेहैवामृतत्वप्राप्तिं दर्शयति ।अर्चिरादिमार्गसे बिना गये यहीं
“अथाकामयमानः” इत्यारभ्य “नअमृतत्वकी प्राप्ति दिखलायी है ।
तस्य प्राणा उत्क्रामन्ति ब्रह्मैवऔर “जो कामनारहित है” यहाँसे
सन्ब्रह्माप्येति” (बृ० उ० ४।४।६)लेकर “उसके प्राण उत्क्रमण नहीं
इत्यादिना विनैवोक्रान्तिं विदुषोकरते, वह ब्रह्मस्वरूप हुआ ही
मोक्ष उपदिष्टः । “उदस्मात्प्राणाःब्रह्ममें लीन हो जाता है” यहाँतक
क्रामन्त्यहो नेति नेति होवाचउत्क्रमणके बिना ही विद्वान्‌के मोक्ष-
याज्ञवल्क्यः” (बृ० उ० ३ । २ ।का उपदेश किया है । तथा “इसके
११) इति प्रश्नपूर्वकमुत्क्रान्त्य-प्राण उत्क्रमण करते हैं या नहीं ?
भावो दर्शितः ।इसपर याज्ञवल्क्यने कहा, नहीं” इस
प्रकार बृहदारण्यक श्रुतिने प्रश्नपूर्वक
विद्वान्‌के उत्क्रमणका अभाव
दिखलाया है ।
तथा च ब्राह्मे पुराणे जीव-इसी प्रकार ब्राह्मपुराणमें भी
न्मुक्तिं गत्यभावं च दर्शयति—जीवन्मुक्ति और उत्क्रान्तिका अभाव
“यस्मिन्काले स्वमात्मानंये दोनों दिखलाये गये हैं--“जिस
योगी जानाति केवलम् ।समय योगी आत्माको शुद्धस्वरूप
तस्मात्कालात्समारभ्यजान लेता है उसी समयसे वह
जीवन्मुक्तो भवेदसौ ॥जीवन्मुक्त हो जाता है। जिस परार्द्ध-
मोक्षस्य नैव किञ्चित्स्या-स्थायी [ ब्रह्मलोकरूप ] अन्य
दन्यत्र गमनं क्वचित् ।स्थानपर ध्यानयोगी जाते हैं, उसके
स्थानं परार्ध्यमपरंमोक्षके लिये ऐसे किसी स्थानपर
यत्र गच्छन्ति योगिनः ॥जानेकी आवश्यकता नहीं होती ।

अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११३

अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११३

अज्ञानवन्धभेदस्तु | अज्ञानरूप बन्धनकी निवृत्ति और मोक्षो ब्रह्मलयस्त्विति ॥” | ब्रह्ममें लीन हो जाना-यही उसका मोक्ष है।” तथा लैङ्गे विदुषो जीवन्मुक्तिं दर्शयति— | तथा लिङ्गपुराणमें भी ज्ञानीकी जीवित रहते हुए ही मुक्ति दिखायी “इह लोके परे चैव | है—“क्योंकि ब्रह्मवेत्ता परमार्थतः कर्तव्यं नास्ति तस्य वै। | जीवित रहते हुए ही मुक्त हो जाता जीवन्मुक्तो यतस्तस्माद् | है, इसलिये उसके लिये इस लोक ब्रह्मवित्तपरमार्थतः॥” | और परलोकमें कुछ भी कर्तव्य नहीं रहता।” शिवधर्मोत्तरे— | शिवधर्मोत्तरमें कहा है—“ज्ञानीकी “वाञ्छात्ययेऽपि कर्तव्यं | समस्त कामनाएँ निवृत्त हो जाती किञ्चिदस्य न विद्यते। | हैं, इसलिये उसका कुछ भी कर्तव्य इहैव स विमुक्तः | नहीं रहता। वह पूर्णकाम और सम- स्यात्संपूर्‍णः समदर्शनः॥” | दर्शी होनेसे इसी लोकमें मुक्त हो जाता है।” तस्मादुपासको देहादुत्क्रम्या- | अतः उपासक तो देहसे उत्क्रमण [उपासक-विदुषोर्गंत्युप-संहारः] र्चिरादिना देवया- | कर अर्चिरादि देवयानमार्गसे सर्वै- नेन विश्वैश्वर्यं ब्रह्म | श्वर्यपूर्ण कारणब्रह्मको प्राप्त हो सब प्राप्य विश्वैश्वर्यमनु- | प्रकारका ऐश्वर्य भोगनेके अनन्तर भूय तत्रैव केवलं प्रत्यस्तमित- | वहीं सम्पूर्ण भेदसे रहित पूर्णानन्द- भेदपूर्णानन्दाद्वितीयब्रह्मात्मानं | स्वरूप अद्वितीय केवल शुद्ध ब्रह्मको ज्ञात्वा केवलात्मकामो मुक्तो | आत्मभावसे जानकर केवल आत्म- भवति। विद्वान्निर्विरोषपूर्णानन्दा- | कामी होकर मुक्त हो जाता है। द्वितीयब्रह्मविज्ञानादशेषगन्तृगन्त- | तथा विद्वान् निर्विशेष पूर्णानन्दा-द्वितीय ब्रह्मका ज्ञान हो जानेसे गन्ता,

११४ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १

११४ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १ व्यगमनादिभेदप्रत्यस्तमयाद्विनैवो- | गन्तव्य और गमनादि सम्पूर्ण भेदकी त्क्रान्तिं देवयानं च ब्रह्म- | निवृत्ति हो जानेसे उत्क्रान्ति और ज्ञानसमनन्तरं जीवन्मुक्तो ब्रह्म- | देवयानमार्गके बिना ही ब्रह्मज्ञानके ज्ञानसमनन्तरं ब्रह्मानन्दमनुभूय | अनन्तर जीवन्मुक्त हो जाता है। आत्मरतिरात्मतृप्त आत्मनैवान्तः- | वह ब्रह्मज्ञानके पश्चात् ब्रह्मानन्दका सुखोऽन्तरारामोऽन्तर्ज्योतिरात्म- | अनुभव कर आत्मरति और आत्मतृप्त क्रीड आत्मरतिरात्ममिथुन | हो अपने आत्मामें ही आन्तरिक आत्मानन्द इहैव स्वाराज्ये | सुख, रमण एवं प्रकाशका अनुभव भूम्नि स्वे महिम्न्यमृतोऽवतिष्ठते । | करता हुआ आत्मक्रीड, आत्मरति, तद्धेतुत्वाद्वाह्यविषयपरित्यागेन | आत्ममिथुन और आत्मानन्द होकर ब्रह्मण्याधाय वाङ्मनःकायनिष्पाद्यं | इसी लोकमें स्वाराज्य अर्थात् अपनी श्रौतस्मार्तलक्षणं कर्म कृत्वा | सार्वभौम महिमामें अमृतरूपसे स्थित विशुद्धसत्त्वो योगारूढो भूत्वा | हो जाता है। वह बाह्य विषयोंको शमादिसाधनसंपन्नः । | त्यागकर मन, वाणी और शरीरसे “योगी युञ्जीत सतत- | होनेवाले सम्पूर्ण श्रौत-स्मार्त कर्मोंको मात्मानं रहसि स्थितः । | ब्रह्मार्पण करके अनुष्ठान करता हुआ एकाकी यतचित्तात्मा | शुद्धचित्त और योगारूढ होकर निराशीरपरिग्रहः ॥ | शमादि साधनोंसे सम्पन्न हो जाता एवं युञ्जन्सदात्मानं | है, क्योंकि ये ही साधन ब्रह्मज्ञानकी योगी विगतकल्मषः । | प्राप्तिके हेतु हैं। सुखेन ब्रह्मसंस्पर्श- | “ध्यानयोगीको एकान्तमें अकेले मत्यन्तं सुखमश्नुते ॥ | ही स्थित हो सब प्रकारकी आशा और | परिग्रहका त्याग कर शरीर और मनका | निग्रह करते हुए निरन्तर योगका | अभ्यास करना चाहिये । इस प्रकार | सर्वदा योगसाधनमें लगा हुआ वह | पापहीन योगी सुगमतासे ही ब्रह्म- | साक्षात्काररूप अत्यन्त उत्कृष्ट सुख

अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११५

अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११५ सर्वभूतस्थमात्मानं प्राप्त कर लेता है। जिसकी सर्वत्र सर्वभूतानि चात्मनि । समदृष्टि है वह योगयुक्त पुरुष ईक्षते योगयुक्तात्मा अपने आत्माको सम्पूर्ण भूतोंमें और सर्वत्र समदर्शनः ॥” सम्पूर्ण भूतोंको अपने आत्मामें स्थित (गीता ६ । १०, २८, २९) देखता है।” “इस प्रकार सर्वत्र समान “समं पश्यन्हि सर्वत्र भावसे स्थित ईश्वरको समानरूपसे समवस्थितमीश्वरम् । देखता हुआ वह स्वयं अपना घात न हिनस्त्यात्मनात्मानं नहीं करता, और फिर परमगतिको ततो याति परां गतिम्॥” प्राप्त होता है।” इत्यादि स्मृतिवाक्य (गीता १३ । २८) इसमें प्रमाण हैं ॥११॥ इति स्मृतेः ॥ ११ ॥ ब्रह्मकी ज्ञातव्यता यस्माज्ज्ञानानन्तरं परमपुरुषा- क्योंकि ज्ञानके पश्चात् परम र्थसिद्धिस्तस्मात्— पुरुषार्थकी सिद्धि होती है, इसलिये— एतज्ज्ञेयं नित्यमेवात्मसंस्थं नातः परं वेदितव्यं हि किञ्चित् । भोक्ता भोग्यं प्रेरितारं च मत्वा सर्वं प्रोक्तं त्रिविधं ब्रह्ममेतत् ॥१२॥ अपने आत्मामें स्थित इस ब्रह्मको सर्वदा ही जानना चाहिये । इससे बढ़कर और कोई ज्ञातव्य पदार्थ नहीं है। भोक्ता (जीव), भोग्य (जगत्) और प्रेरक (ईश्वर)—यह तीन प्रकारसे कहा हुआ पूर्ण ब्रह्म ही है--ऐसा जानना चाहिये ॥ १२ ॥ एतत्प्रकृतं केवलात्माकाश- इस प्रकृत विशुद्ध आत्माकाशस्वरूप ब्रह्मरूपं नित्यं नियमेन ज्ञेयम् । ब्रह्मको नित्य—नियमसे जानना

११६ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १

११६ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १ किमन्यान्यसंस्थं न स्वात्मसंस्थं | चाहिये। क्या यह किसी अन्यमें ज्ञेयं नानात्मनि बाह्ये। श्रूयते | स्थित है ? नहीं, इसे अपने आत्मामें च—"तमात्मस्थं येऽनुपश्यन्ति | ही स्थित जानना चाहिये, किसी धीरास्तेषां शान्तिः शाश्वती | बाह्य अनात्मामें नहीं। श्रुति भी नेतरेषाम्” (क० उ० २।२। | कहती है—"जो बुद्धिमान् आत्मामें १२) इति। | स्थित उस परब्रह्मको देखते हैं उन्हें | ही नित्य शान्ति प्राप्त होती है, | दूसरोंको नहीं।" तथा च शिवधर्मोत्तरे योगि- | तथा शिवधर्मोत्तरमें भी योगियों- नामात्मनि स्थितिः— | की आत्मामें ही स्थिति दिखलायी है— "शिवमात्मनि पश्यन्ति | "योगिजन शिवका आत्मामें ही प्रतिमासु न योगिनः। | दर्शन करते हैं, प्रतिमाओंमें नहीं। आत्मस्थं यः परित्यज्य | जो पुरुष आत्मामें स्थित शिवका बहिःस्थं यजते शिवम्॥ | परित्याग कर बाह्य शिवका पूजन हस्तस्थं पिण्डमुत्सृज्य | करता है वह मानो हाथका ग्रास लिह्यात्कूर्परमात्मनः । | गिराकर केवल अपनी हथेली चाटता सर्वत्रावस्थितं शान्तं | है। जिस प्रकार अन्धा आदमी उदय न पश्यन्तीह शङ्करम्॥ | हुए सूर्यको नहीं देख सकता उसी ज्ञानचक्षुर्विहीनत्वा- | प्रकार ज्ञाननेत्रोंसे रहित होनेके दन्धः सूर्यं यथोदितम् । | कारण लोग सर्वत्र विद्यमान शान्त- यः पश्येत्सर्वगं शान्तं | स्वरूप शिवका दर्शन नहीं कर तस्याध्यात्मस्थितः शिवः॥ | पाते। जो पुरुष सर्वगत शान्तमूर्ति आत्मस्थं ये न पश्यन्ति | शिवका दर्शन करता है उसके तो तीर्थे मार्गन्ति ते शिवम्। | अन्तःकरणमें ही शिव विराजमान | हैं, किन्तु जो आत्मस्थ शिवको नहीं | देख सकते वे ही उन्हें तीर्थस्थानमें

अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११७

अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११७

आत्मस्थं तीर्थमुत्सृज्य | खोजते हैं । जो पुरुष आत्मस्थ बहिस्तीर्थादि यो व्रजेत् ॥ | तीर्थको त्यागकर बाह्य तीर्थादिमें करस्थं स महारत्नं | जाता है वह मानो अपने हाथका त्यक्त्वा काचं विमार्गति । | महारत्न गिराकर काँच ढूँढ़ता | फिरता है ।" अथवैतद्यदपरोक्षं प्रत्यगात्म- | अथवा [ इसका यह भी तात्पर्य त्वं तन्नित्यमविनाशि स्वे महिम्नि | हो सकता है कि ] यह जो अपरोक्ष स्थितं ब्रह्मैव ज्ञेयम् । कस्मात् ? | प्रत्यगात्मा है उसे अपनी महिमामें हिशब्दो यस्मादर्थे । यस्मान्नातः | स्थित नित्य और अविनाशी ब्रह्म ही परं वेदितव्यमस्ति किञ्चिदपि । | जानना चाहिये । क्यों?—यहाँ 'हि' श्रूयते च बृहदारण्यके—"तदे- | शब्द 'यस्मात् ( क्योंकि )' अर्थमें तत्पदनीयमस्य सर्वस्य यदयमा- | है—क्योंकि इससे बढ़कर और त्मा" (बृ० उ० १।४।७) इति । | कुछ भी जाननेयोग्य नहीं है । | बृहदारण्यकश्रुतिमें भी ऐसा ही है— | "यह जो आत्मा है वही समस्त | जीवोंका गन्तव्य स्थान है ।" कथमेतज्ज्ञेयम् ? इत्याह—भोक्ता | इसे किस प्रकार जानना चाहिये ? जीवो भोग्यमितरत्सर्वं प्रेरितान्त- | सो श्रुति बतलाती है—जीव भोक्ता र्यामी परमेश्वरः । तदेतत्त्रिविधं | है, भोक्ता और अन्तर्यामीसे प्रोक्तं ब्रह्मैवेति । भोक्त्राद्यशेष- | अतिरिक्त और सब भोग्य है तथा भेदप्रपञ्चविलापनेनैव निर्विशेषं | अन्तर्यामी परमेश्वर प्रेरिता है—यह तीन ब्रह्मात्मानं जानीयादित्यर्थः । | प्रकारसे कहा हुआ ब्रह्म ही है इस | प्रकार [ जानना चाहिये ] । तात्पर्य यह | है कि भोक्तादि सम्पूर्ण भेदरूप प्रपञ्च- | का लय करके ही निर्विशेष ब्रह्मको | आत्मस्वरूपसे जानना चाहिये ।

११८ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १

११८ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १ तथा चोक्तं कावषेयगीतायाम्— “त्यक्त्वा सर्वविकल्पांश्च स्वात्मस्थं निश्चलं मनः । कृत्वाऽशान्तो भवेद्योगी दग्धेन्धन इवानलः ॥” तथा च श्रीविष्णुपुराणे— “तस्यैव कल्पनाहीन- स्वरूपग्रहणं हि यत् । मनसा ध्याननिष्पाद्यं समाधिः सोऽभिधीयते ॥” (६ । ६ । ९२) इति ॥ १२ ॥ ऐसा ही कावषेय गीतामें भी कहा है—“योगी सम्पूर्ण विकल्पों- को त्यागकर मनको अपने आत्मामें निश्चलरूपसे स्थिर कर जिसका ईँधन जल चुका है उस अग्निके समान शान्त हो जाता है ।” तथा श्रीविष्णुपुराणमें कहा है— “उस ध्येय परमेश्वरका ही जो मनके द्वारा ध्यानसे सिद्ध होनेयोग्य कल्पनाहीन ( ध्याता, ध्यान और ध्येयके भेदसे रहित ) स्वरूप ग्रहण किया जाता है उसे ही समाधि कहते हैं ॥१२॥ प्रणव-चिन्तनसे ब्रह्म-साक्षात्कारका दृष्टान्तोंद्वारा समर्थन इदानीम् “ओमित्येतेनैवाक्ष- रेण परं पुरुषमभिध्यायीत” (प्र० उ० ५ । ५) । “ओमित्यात्मानं युञ्जीत” (महानारा० २४ । १)। “ओमित्यात्मानं ध्यायीत” इति श्रुतेरात्मानमन्विष्य पराभिध्याने प्रणवस्य नियमादभिध्यानाङ्गत्वेन प्रणवं दर्शयति— अब “ॐ इस अक्षरसे ही परम पुरुषका ध्यान करना चाहिये” “ॐ इस अक्षरके द्वारा ही आत्मचिन्तन करना चाहिये” “ॐ इस अक्षरके द्वारा ही आत्माका ध्यान करना चाहिये” इत्यादि श्रुतियोंसे आत्मा- न्वेषण करके उसका ध्यान करनेमें प्रणवचिन्तनका नियम होनेसे श्रुति प्रणवको आत्मचिन्तनके अंगरूपसे प्रदर्शित करती है— वह्नेर्यथा योनिगतस्य मूर्ति- र्नदृश्यते नैव च लिङ्गनाशः ।

अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११९

अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११९ ᠆᠆᠆᠆᠆᠆᠆᠆᠆᠆᠆᠆᠆᠆᠆᠆᠆᠆᠆᠆᠆᠆᠆᠆᠆᠆᠆᠆᠆᠆᠆᠆᠆᠆᠆᠆᠆᠆᠆᠆᠆᠆᠆᠆᠆᠆᠆᠆᠆᠆᠆᠆᠆᠆

स भूय एवेन्धनयोनिगृह्य- स्तद्वोभयं वै प्रणवेन देहे ॥१३॥

जिस प्रकार अपने आश्रय [ काष्ठ ] में स्थित अग्निका रूप दिखायी नहीं देता और न उसके लिङ्ग ( सूक्ष्मस्वरूप ) का ही नाश होता है और फिर ईंधनरूप कारणके द्वारा ही उसका ग्रहण हो सकता है उसी प्रकार अग्नि और अग्निलिङ्गके समान ही इस देहमें प्रणवके द्वारा आत्माका ग्रहण किया जा सकता है ॥ १३ ॥

वह्नेर्यथेति। वह्नेर्यथा योनि- | 'वह्नेर्यथा' इत्यादि । जिस प्रकार गतस्यारणिगतस्य मूर्तिः स्वरूपं | योनि अर्थात् अरणिमें स्थित अग्निकी न दृश्यते मथनात्प्राङ्नैव च | मूर्ति–स्वरूपको मन्थनसे पूर्व देखा लिङ्गस्य सूक्ष्मदेहस्य विनाशः। | नहीं जा सकता और न उसके लिंग स एवारणिगतोऽग्निर्भूयः पुनः | यानी सूक्ष्म रूपका नाश ही होता पुनरिन्धनयोनिना मथनेन गृह्यः। | है । तथा अरणिमें स्थित वह अग्नि योनिशब्दोऽत्र कारणवचनः । | फिर ईंधनयोनिसे पुनः-पुनः मन्थन इन्धनेन कारणेन पुनः पुनर्मथ- | करनेपर प्रकट देखा भी जा नाद्गृह्यः। 'तद्वोभयम्' इवार्थो | सकता है। यहाँ 'योनि' शब्द वाशब्दः। तच्चोभयं तदुभयमिव | कारणका वाचक है; अर्थात् ईंधनरूप मथनात्प्राङ् न गृह्यते। मथनेन | कारणके द्वारा पुनः-पुनः मन्थन च गृह्यते । तद्वदात्मा वह्निस्था- | करनेपर वह ग्रहण किया जा सकता | है । 'तद्वा उभयम्' यहाँ वा शब्द | इव ( सादृश्य ) अर्थमें है । अर्थात् | उन दोनों (अग्नि और अग्नि-लिंग) के | समान, जैसे मन्थनसे पूर्व उनका | ग्रहण नहीं होता था किन्तु मन्थन | करनेपर वे दिखायी देने लगते हैं, | उसी प्रकार अग्निस्थानीय आत्मा

१२० श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १

१२० श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ नीयः प्रणवेनोत्तरारणिस्थानीयेन । उत्तरारणिस्थानीय प्रणवके द्वारा मनन- मननाद्गृह्यते देहेऽधरारणिस्था- । से अधरारणिस्थानीय देहमें ग्रहण नीये ॥ १३ ॥ । किया जा सकता है ॥१३॥ तदेव प्रपञ्चयति— । अब श्रुति उस ( मन्थन ) का । ही विस्तारसे वर्णन करती है--- स्वदेहमरणिं कृत्वा प्रणवं चोत्तरारणिम् । ध्याननिर्मथनाभ्यासाद्देवं पश्येन्निगूढवत् ॥ १४॥ अपने देहको अरणि और प्रणवको उत्तरारणि करके ध्यानरूप मन्थनके अभ्याससे स्वप्रकाश परमात्माको छिपे हुए [ अग्नि ] के समान देखे ॥ १४ ॥ स्वदेहमिति । स्वदेहमरणिं । ‘स्वदेहम्’ इत्यादि । अपने देहको । अरणि—नीचेका काष्ठ करके, तथा कृत्वाधरारणिं ध्यानमेव निर्मथनं । ध्यान ही निर्मन्थन है, उस निर्मन्थन- तस्य निर्मथनस्याभ्यासाद्देवं ज्यो- । के अभ्याससे देव—ज्योतिस्वरूप । परमात्माको छिपे हुए अग्निके समान तीरूपं प्रपश्येन्निगूढाग्निवत् ॥१४॥ । देखे ॥ १४ ॥ उक्तस्यार्थस्य द्रढिम्ने दृष्टान्तान् । उपर्युक्त अर्थकी पुष्टिके लिये बहून्दर्शयति— । श्रुति बहुत-से दृष्टान्त दिखाती है— तिलेषु तैलं दधनीव सर्पि- रापः स्रोतःस्वरणीषु चाग्निः । एवमात्मात्मनि गृह्यतेऽसौ सत्येनैनं तपसा योऽनुपश्यति ॥१५॥

अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२१

अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२१ जिस प्रकार तिलोंमें तैल, दहीमें घी, स्रोतोंमें जल और काष्ठोंमें अग्नि देखे जाते हैं उसी प्रकार जो पुरुष सत्य और तपके द्वारा इसे वारम्बार देखनेका प्रयत्न करता है उसे यह आत्मा आत्मामें ही दिखायी देता है ॥१५॥ तिलेष्विति । यन्त्रपीडनेन | 'तिलेषु' इत्यादि । जिस प्रकार | यन्त्रसे पेरनेपर तिलोंमें तैल दिखायी तैलं गृह्यते । दधिनि मथनेन | देता है, मन्थन करनेपर दहीमें घी सर्पिरिव । आपः स्रोतःसु नदीषु | देखा जाता है, पृथिवी खोदनेपर | स्रोत—अन्तःस्रोता नदियोंमें जल भूखननेन । अरणीषु चाग्निर्मथ- | दिखायी देता है और मन्थन करनेपर | काष्ठोंमें अग्निकी उपलब्धि होती है नेन । एवमात्मात्मनि स्वात्मनि | उसी प्रकार मननसे आत्मामें अपने गृह्यतेऽसौ मननेनात्मभूतदेहादि- | अन्तरात्मामें ही इस आत्माकी | उपलब्धि होती है, अर्थात् आत्मभूत ष्वन्नमयाद्यशेषोपाधिप्रविलापनेन | देहादिमें जो अन्नमयादि सम्पूर्ण | उपाधियाँ हैं उनका लय करनेपर निर्विशेषे पूर्णानन्दे स्वात्मन्येवा- | अपने निर्विशेष पूर्णानन्दस्वरूप | आत्मामें ही इस ( परमात्मा ) का वगम्यत इत्यर्थः । | अनुभव होता है । केन तर्हि पुरुषेणात्मन्येव | अच्छा तो किस पुरुषको आत्मा- | में ही इस आत्माकी उपलब्धि होती गृह्यते ? इत्यत आह—सत्येन | है, सो अब बतलाते हैं—सत्यसे | अर्थात् यथार्थ और प्राणिमात्रके लिये यथाभूतहितार्थवचनेन भूत- | हितकर सम्भाषणसे, क्योंकि “जो हितेन । “सत्यं भूतहितं प्रोक्तम्” | प्राणियोंके लिये हितकर हो उसे सत्य | कहते हैं” ऐसी स्मृति है तथा मन इति स्मरणात् । तपसेन्द्रियमन- | और इन्द्रियोंकी एकाग्रतारूप तपसे, सामैकाग्र्यलक्षणेन । “मनसश्चे- | क्योंकि स्मृति कहती है “मन और