सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)
Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary
गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर) द्वारा
सप्त द्वीप तथा सप्त समुद्र अथ सप्तसमुद्राः सप्तद्वीपाश्च कथ्यन्ते । मज्जाया जम्बूद्वीपोऽस्थिषु शाकद्वीपः शिरासु सूक्ष्मद्वीपश्चत्वक्षु क्रौञ्च द्वीपो रोमसु गोमय द्वीपो नखेषु श्वेतद्वीपो मांसे प्लक्षद्वीप एवं सप्तद्वीपाः ॥ ७ ॥ ( जिस तरह ब्रह्माण्ड-शरीर में सात समुद्र तथा सात द्वीप स्थित हैं, उसी तरह हमारे पिण्ड ( शरीर ) में उनकी यथास्थान स्थिति है । ) सात समुद्रों और सातों द्वीपों का वर्णन किया जाता है । हमारे व्यष्टि-पिण्ड में मज्जा में जम्बूद्वीप, हड्डी में शाकद्वीप, प्रवाहिका नाड़ियों में सूक्ष्म द्वीप, त्वचा में क्रौंच द्वीप, रोमों में गोमय द्वीप, नखों में श्वेत द्वीप और मांस में प्लक्ष द्वीप हैं । ( योगसाधक को इन सातों का ध्यान करने से शरीर में ही इनके साक्षात्कार और इनमें गति करने की शक्ति प्राप्त होती है । श्रीमद्भागवत पुराण के पञ्चम स्कन्ध के बीसवें अध्याय में इन द्वीपों के सम्बन्ध में विस्तृत वर्णन उपलब्ध होता है । ) हमारे व्यष्टि-पिण्ड में यही सात द्वीपों की भावना है ॥ ७ ॥ मूत्रे क्षारसमुद्रो लालायां क्षीरसमुद्रः कफे दधिसमुद्रो मेदसि घृतसमुद्रो वसायां मधुसमुद्रो रक्ते इक्षुसमुद्रः शुक्रेऽमृत समुद्र एवं सप्तसमुद्राः ॥ ८ ॥ ( जिस तरह ब्रह्माण्ड में खार ( क्षार ) समुद्र, क्षीर समुद्र, दधि समुद्र, घृत समुद्र, मधु समुद्र, इक्षु समुद्र और अमृत समुद्र स्थित हैं, उसी तरह हमारे शरीर के विभिन्न द्रवों में इन सातों समुद्रों की स्थिति निरूपित की जाती है । ) मूत्र में क्षार समुद्र, लार में क्षीर समुद्र, कफ में दधि समुद्र, मेद-मज्जा में घृत समुद्र चर्बी में मधु समुद्र, रक्त में इक्षु समुद्र और वीर्य-शुक्र में अमृत समुद्र की स्थिति का ध्यान करने से ( शरीर में ही ) इन सातों समुद्रों का साक्षात्कार करने की सामर्थ्य योगसाधक को प्राप्त हो जाती है ॥ ८ ॥ नवखण्ड नवखण्डा नवद्वारेषु वसन्ति । भारतखण्डः कर्परखण्डः काश्मीरखण्डः श्रीखण्ड शङ्खखण्ड एकपादखण्डो गान्धार खण्डः कैवर्त्तखण्डो महामेरुखंड एवं नवखण्डाः ॥ ६ ॥ सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ ६६
हमारे व्यष्टि-पिण्ड के नवद्वारों में नवखण्ड स्थित हैं। (जिस तरह ब्रह्माण्ड-शरीर में नौ खण्ड हैं, उसी तरह हमारे व्यष्टि-पिण्ड के नौ द्वारों में ये खण्ड विद्यमान हैं।) मूल (गुदा) द्वार में भारत खण्ड, उपस्थ (लिङ्ग छिद्र) में काश्मीर खण्ड, मुख में कर्पर खण्ड, नासिका के दाहिने रन्ध्र (छिद्र) में श्रीखण्ड और बायें रन्ध्र में शंखखण्ड, बायें नेत्र में एकपादखण्ड और दायें नेत्र में गान्धार खण्ड तथा वायें कान (के छिद्र) में कैवर्त्त खण्ड और दायें कान (के छिद्र) में महामेरु खण्ड स्थित हैं। यथास्थान इन नौ खण्डों का ध्यान करने से योगसाधक को इनका साक्षात्कार करने की सामर्थ्य प्राप्त होती है ॥ ६ ॥ . अष्टकुल पर्वत मेरुपर्वतो मेरुदण्ड तिष्ठति कैलासो ब्रह्मकपाटे वसति हिमालयः पृष्ठे मलयो वामकन्धे मन्दरो दक्षिणकन्धरे विन्ध्याद्रिर्दक्षिणकर्णे मैनाको वामकर्णे श्रीपर्वतो ललाट एवमष्टकुलपर्वता अन्य उपपर्वताः सर्वाङ्गुलिषु वसन्ति ॥१०॥ (जिस तरह ब्रह्माण्ड में अष्टकुल पर्वत हैं, उसी तरह हमारे व्यष्टि-पिण्ड में भी उनका यथास्थान वर्णन किया जाता है।) शरीर में—मेरुदण्ड में सुमेरु पर्वत, मस्तक में कैलास पर्वत, पीठ में हिमालय पर्वत, बायें कंधे में मलय पर्वत और दायें कंधे में मन्दराचल, दायें कान में विन्ध्याचल, बायें कान में मैनाक पर्वत, ललाट में श्रीशैल तथा सभी अँगुलियों में अन्य उपपर्वतों (छोटे-बड़े पहाड़ों) का ध्यान करने से उनका साक्षात्कार करने में योगसाधक समर्थ होता हैं ॥१०॥ नौ नदी तथा अन्य उपनदियाँ पोनसा, यमुना, गङ्गा, चन्द्रभागा, सरस्वती, पिपासा, शतरुद्रा, श्रोरात्रिश्रोनर्मदा एवं नवनद्यो नवनाडोषु वसन्ति । अन्य . उपनद्यः कुल्योपकुल्या, द्विसप्तति सहस्त्रनाडीषु वसन्ति ॥ ११ ॥ १०० ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति
( जिस तरह ब्रह्माण्ड-पिण्ड में गंगा आदि बड़ी नदियाँ तथा छोटी नदियाँ बहती हैं, उसी तरह हमारे शरीर की प्रधान नाड़ियों में गंगा आदि तथा छोटी- छोटी सूक्ष्म नाड़ियों में अन्य छोटी-पतली नदियाँ बहती हैं । ) गंगा इडा नाड़ी में, यमुना पिंगला नाड़ी में, सरस्वती सुषुम्ना में तथा पीनसा, चन्द्रभागा, पिपासा, शतरुद्रा, श्रीरात्रि और नर्मदा प्रधान नाड़ियों में प्रवाहित हैं और छोटी तथा पतली नदियाँ बहत्तर हजार शेष नाड़ियों में बहती हैं । ( इन्हीं बहत्तर हजार नाड़ियों में पिंगला आदि परिगणित हैं । ) इन नदियों का यथास्थान शरीर में ध्यान करने से तथा इन पर सूक्ष्म दृष्टि एकाग्र करने से योगसाधक इनका साक्षात्कार करने में समर्थ होता है ॥ ११ ॥ नक्षत्रादि सप्तविंशति नक्षत्राणि, द्वादशराशयो, नवग्रहाः, पञ्चदश- तिथय एतेऽन्तर्वलये द्विसप्ततिसहस्र कोष्ठेषु वसन्ति । अनेक तारामण्डलमूर्मिपुञ्जे वसति । त्रयस्त्रिंशत् कोटि देवता बहुरोम- कूपेषु वसन्ति । दानवयक्षराक्षसपिशाचभूतप्रेता अस्थिसन्धिषु वसन्ति । अनेकपीठोपपीठका रोमकूपेषु वसन्ति । अन्ये पर्वता उदरलोमसु वसन्ति । गन्धर्वकिन्नरकिंपुरुषा अप्सरोगणा उदरे वसन्ति । अन्ये खेचरीलीलामातरः शक्तयः उग्रदेवता वायुवेगे वसन्ति । अनेकमेघा अश्रुपाते वसन्ति अनन्तसिद्धा मतिप्रकाशे वसन्ति । चन्द्रसूर्यौ नेत्रद्वये वसतः । अनेकवृक्षलता गुल्मतृणानि जङ्घारोमकस्थाने वसन्ति । अनेककृमिकीट- पतङ्गा पुरोषे वसन्ति ॥ १२ ॥ ( जिस तरह ब्रह्माण्ड में नक्षत्र, ग्रह, राशि तथा किन्नर, गान्धर्वलोक आदि तथा कीट-पतंग—सभी यथास्थान हैं, उसी तरह हमारे पिण्ड-शरीर में ये सब विद्यमान हैं । ) हमारे व्यष्टि-पिण्ड में ( अश्विनी, भरणी, कृत्तिका, रोहिणी, मृगशिरा, आर्द्रा, पुनर्वसु, पुष्य, आश्लेषा, मघा, पूर्वाफाल्गुनी, उत्तराफाल्गुनी, हस्त, चित्रा, स्वाति, विशाखा, अनुराधा, ज्येष्ठा, मूल, पूर्वाषाढ़ा, उत्तराषाढ़ा, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा, पूर्वभाद्रपद, उत्तरभाद्रपदा, रेवती) सत्ताईस नक्षत्र, बारह राशि, सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ १०१
( मेष, वृष, मिथुन, कर्क, सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक, धनु, मकर, कुम्भ, मीन ), नौ ग्रह ( सूर्य, चन्द्र, मंगल, बुध, गुरु ( बृहस्पति ), शुक्र, शनि, राहु, केतु ), पन्द्रह तिथि ( प्रतिपदा आदि )—ये सब शरीरस्थ मांस-पेशियों—बहत्तर हजार कोठों में निवास करते हैं। तारामण्डल हड्डियों में अथवा भूख-प्यास रूपी ऊर्मियों में स्थित है। तैंतीस करोड़ देवता असंख्य रोम-छिद्रों में निवास करते हैं। दानव, यक्ष, राक्षस, पिशाच, भूत-प्रेत हड्डियों के जोड़ों में बसते हैं। अनेक पीठ-उपपीठ रोमछिद्रों में स्थित हैं। पेट के बालों में अनेक दूसरे पर्वत हैं। गन्धर्व, किन्नर, किंपुरुष, अप्सरायें उदर में निवास करते हैं। स्वेच्छा से आकाश में विहार करने वाली उग्रदेवता लीलारूप मातृ-शक्तियाँ वायु के वेग में स्थित हैं तथा मेघ अश्रुपात में निवास करते हैं। अनन्त सिद्ध बुद्धि के प्रकाश में रहते हैं। दोनों नेत्रों में ( बायें में ) चन्द्रमा और सूर्य ( दायें नेत्र में ) निवास करते हैं। अनेक वृक्षलतागुल्मतृण जांघ के रोमों में स्थित हैं। अनेक कृमि-कीट-पतंग विष्ठा में रहते हैं ॥ १२ ॥ स्वर्ग-नरक, मुक्ति यत्सुखं तत्स्वर्गं, यद्दुःखं तन्नरकं, यत्कर्मतद्बन्धनं यन्नि- र्विकल्पं तन्मुक्तिः स्वरूपदशायां निद्रादौ स्वात्मजागरः शान्तिर्भवति। एवं सर्वदेहेषु विश्वरूपपरमेश्वरः परमात्मा- ऽखण्डस्वभावेन घटे घटे चित्स्वरूपो तिष्ठति। एवं पिण्ड- संवित्तिर्भवति ॥ १३ ॥ युक्ताहारविहारयुक्त संयमित जीवन ही शरीर का सुख है—यही स्वर्ग ( की भावना ) है, असंयमित तथा आहारविहारव्यतिक्रमजन्य रोगाक्रान्त अवस्था ही दुःख है, यही नरक ( की भावना ) है। अपने संकल्प की पूर्ति के रूप में फल- प्राप्ति की भावना से किये गये ( सकाम ) कर्म ही बन्धन हैं और संकल्पशून्य इच्छारहित सहज-स्वाभाविक अवस्था ही निर्विकल्पता है, यही मुक्ति अथवा स्वरूपस्थिति एवं कैवल्य है। यद्यपि अज्ञानी की दृष्टि में निद्रादिरूपता ही स्वरूपस्थिति कही गयी है तथापि यह शुद्ध-बुद्ध आत्मबोधरूप प्रपंचातीत अवस्था ही आत्मजागृति है, इससे शान्ति प्राप्त होती है, यही जीवन्मुक्ति है। इस तरह सभी देहों में विश्वरूप परमात्मा—परमेश्वर अखण्डस्वरूप घट-घट में चिद्रूप व्याप्त है—ऐसा जाननेवाला ही पिण्डसंवित्ति योगी होता है ॥ १३ ॥ इतिश्रीगोरक्षरचितसिद्धसिद्धान्तपद्धतौ तृतीयोपदेशः ॥ 卐 १०२ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति
चौथा उपदेश [ पिण्डाधार ] अस्ति काचिदपरंपरा संवित्स्वरूपा सर्वपिण्डाधारत्वेन नित्यप्रबुद्धा निजाशक्तिः प्रसिद्धा कार्यकारणकर्तॄणामुत्थान- दशाङ्कुरोन्मीलनेन कर्त्तारं करोतीत्यनन्तरावाधारशक्तिरिति कथ्यते । अत्यन्तनिजप्रकाशस्वसंवेद्यानुभवैकगम्यमाना शास्त्र- लौकिकसाक्षात्कारसाक्षिणी सा परा चिद्रूपिणी शक्तिर्गीयते । सैव शक्तिर्यदा सहजेन स्वस्मिन्नुन्मीलन्त्यां निरुत्थानदशायां वर्तते तदा शिवः स एव भवति ॥ १ ॥ ( इस चौथे उपदेश में महायोगी गोरखनाथ ने शिवशक्ति के सामरस्य की स्थिति की प्रस्तावना निरूपित की है। निजाशक्तिसंयुक्त परासंवित् का विवेचन किया गया है। जीव का शिवशक्ति में भेदाभाव--अभिन्नता ही सामरस्य है। यही मोक्ष अथवा परमकैवल्य-स्वरूपावस्थान है। किस प्रकार यह समरसता स्थापित होती है--इसी का चौथे उपदेश में वर्णन है। यह शक्ति स्वसंवेद्य, परमशिव से अभिन्न, सम्पूर्ण स्वतन्त्र, कूटस्थ, संवित्स्वरूपा, नित्य प्रबुद्ध निजाशक्ति है। यह विनाशरहित, समस्त जगत् की आधारस्वरूपा आद्या भवानी है, यह बुद्धि आदि के अनित्य प्रकाश से भिन्न नित्य प्रकाशरूपा है, यह शक्ति शरीर आदि कार्य तथा उनके पाँच सूक्ष्म करण और जीव की अभिव्यक्तिरूपी अवस्था के अंकुर के प्रकाश से समस्त विश्व के कर्ता हिरण्यगर्भादि को भी उत्पन्न करती है। यह शक्ति शिवकी अत्यन्त अन्तरंग है, भौतिक प्रपंच की अपेक्षा सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ १०३
आधार कहलाती है, अनुभव से ही गम्य है, यह सबका उपादान कारण है। लोक- सम्बन्धी तथा बुद्धिवृत्ति को देखनेवाली चिद्रूप शक्ति ही पराशक्ति है। जब प्रलयकाल में स्वभाव से यह विकसित-उन्मीलित होती है, तब वह अपने शुद्ध रूप में शिवस्वरूपिणी हो जाती है। इस अवस्था में शिवशक्ति में सम्पूर्ण तादात्म्य रहता है ॥ १ ॥ विशेष—गोरखनाथजी की योगानुभूति है कि स्वतः प्रकाशित, स्वतः सत्, स्वतः पूर्ण, अनन्त और शाश्वत चेतना, काल-दिक्-सापेक्षिता से परे परम सत्ता है। यह स्वयं को काल-दिक्-आश्रित जगत्-व्यवस्था के रूप में प्रकट करती है। स्वयं को इस व्यावहारिक-नानारूपात्मक जगत्-व्यवस्था के रूप में अभिव्यक्त करने पर भी यह चरम सत्ता अपनी पारमार्थिक एकता और पूर्णता में स्वस्थ—लीन अथवा कूटस्थ रहती है। यही परमशिवस्वरूपिणी परासंवित्—निजा शक्ति है। कुलाकुलसामरस्य अतएव कुलाकुलस्वरूपा सामरस्यनिजभूमिका निगद्यते ॥ २ ॥ यह कुलाकुलस्वरूपिणी पराशक्ति कुलाकुल शिवशक्ति की अभेदावस्था ही सामरस्य-प्राप्ति की दिशा में निरूपित की जाती है ॥ २ ॥ कुलशक्ति कुलमिति परा सत्ताऽहंता स्फुरता कलास्वरूपेण सैव पञ्चधा विश्वस्याधारत्वेन तिष्ठति ॥ ३ ॥ कुलशक्ति परा, सत्ता, अहंता, स्फुरता और कला, पाँच रूपों में समस्त विश्व के आधार—आश्रयरूप में अभिव्यक्त है ॥ ३ ॥ अतएव परापरा निराभासावभासकान् प्रकाशस्वरूपा या सा परा ॥ ४ ॥ यह कुलशक्ति समस्त विश्व के आधार के रूप में पराऽपरा—सभी वस्तुओं में विद्यमान है। यह चेतन प्रकाशस्वरूप है। अपनी सत्ता से सबकी प्रकाशिका होने से यह परा शक्ति है ॥ ४ ॥ १०४ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति
विशेष—यह शक्ति निराभासा—सूर्यादि के प्रकाश से प्रकाशित होने वाली नहीं है, स्वयं प्रकाशस्वरूपिणी है। अनादिसंसिद्धं परमाद्वैतपरमेकमेवास्तीति याऽङ्गीकारं करोति सा सत्ता ॥ ५ ॥ (पराशक्ति-कुलशक्ति के सत्ता-स्वरूप का लक्षण कहा जाता है।) यह अनादि-सजातीय-विजातीय स्वगतभेदरहित है, संसिद्ध (स्वप्रकाश) परम अद्वैत (विजातीय भेदरहित) और एक—(सजातीयत्व से परे) है। इस तरह के अस्तित्व को स्वीकार करनेवाली सत्ता कहलाती है ॥ ५ ॥ अनादिनिधनोऽप्रमेयः स्वभावकिरणानन्दोऽहमस्मीत्यहं सूचनशीला या सा पराऽहंता ॥ ६ ॥ कुल-(अवस्था-) शक्ति अपने अहंतारूप में आदि-अन्त से रहित और अप्रमेय (इन्द्रियादि द्वारा अप्रत्यक्ष), स्वप्रकाशस्वरूप तथा सच्चिदानन्द स्वरूपिणी (शिव में सम्पूर्ण कूटस्थ) है। यह अहंतारूप में शिव से अपनी अभेदता प्रकट करती है। यह अहंतारूपी कुलशक्ति पराविद्या भी कही जाती है ॥ ६ ॥ स्वानुभवचिच्चमत्कारनिरुत्थानदशां प्रस्फुटी करोति या सा स्फुरता ॥ ७ ॥ कुलशक्ति अपने स्फुरतारूप में मन-वाणी से अगम अनुभवगम्य चैतन्य- विलास की अद्वैतावस्था (द्वैताभासरहितता) अभिव्यक्त करती है, इसी कारण यह स्फुरतारूपिणी प्रसिद्ध है ॥ ७ ॥ नित्यशुद्धबुद्धस्वरूपस्वयंप्रकाशत्वमाकलयतीति या सा पराकलेत्युच्यते ॥ ८ ॥ कुलअवस्था में पराशक्ति कलरूपिणी कही जाती है। आत्मा शाश्वत- सनातन, नित्य अविनाशी, (निर्विकार त्रिगुणातीत), निरञ्जन और स्वयं प्रकाश है, बोधस्वरूप, स्वसंवेद्य अनुभवैकगम्य है—इस तरह आत्मतत्व की प्रकाशिका शक्ति ही कला है ॥ ८ ॥ सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ १०५
अकुलमिति जातिवर्णगोत्राद्यखिलनिमित्तत्वेनै कमैवास्तीति- प्रसिद्धं तथा चोक्तमुमामहेश्वरसम्वादेनिरुत्तरेऽनन्यत्वादखण्डत्वा- दद्वयत्वादनन्यत्वान्निर्धर्मत्वादनामत्वादकुलस्यनिरुत्तरमिति ॥६॥ अनादि परब्रह्म परमेश्वर आदिनाथ निराकार, निरंजन, स्वसंवेद्य अकुल शिवमें अभिन्न पराशक्ति अकुल अवस्था में निरन्तर विद्यमान अथवा स्वरूपस्थ रहती है । इस अकुल अवस्था में जाति, वर्ण, गोत्र आदि अखिल निमित्त (व्यवहार-कारण) से रहित असंग अकुल शिव में कूटस्थ पराशक्ति ही शेष रहती है—ऐसा उमा- महेश्वरसम्वाद के रूप में रचित निरुत्तर ग्रन्थ में प्रतिपादित है । समस्त भेदोंसे परे होने के नाते यह शक्ति अखण्ड, अद्वय, अनन्य, कार्यकारणरहित, नामातीत, रूपातीत अकुल कही गयी है ॥ ६ ॥ आज्ञावती पराशक्ति एवं कुलाकुलरूपा सामरस्यप्रकाशभूमिकास्फुटीकरण एकैवमर्था या साऽपरंपरा शक्तिरेवावशिष्यते अपरंपरं निखिलविश्वप्रपञ्चजालं परतत्त्वं सम्पादयत्येकीकरोती- त्यपराशक्तिराज्ञावती प्रसिद्धा ॥ १० ॥ इस तरह कुलाकुलरूप यह पराशक्ति सामरस्यरूप अभेदता- तादात्म्य के प्रकाश की स्थिति को स्फुटित करने में सर्वधर्मरहित अखण्ड, नित्य, अद्वय, अनन्त रूप अकुलावस्था से तत्पर रहती है । यही शक्ति अपरंपरा, निजा आदि नाम से प्रसिद्ध समस्त विश्वप्रपञ्च के आधाररूप से महाप्रलय में अवशिष्ट रहती है । यह स्थावर-जंगम सकल विश्वप्रपञ्चजालंको परमेश्वररूप परमतत्त्व में सम्पादित कर एक कर देती है, यही अपरंपरा नामवाली शक्ति है । यह परमेश्वर आदिनाथ की आज्ञावती ( आज्ञाकारिणी - स्वरूपप्रकाशिका ) शक्ति कही जाती है ॥ १० ॥ अकुलंकुलमाधत्ते कुलञ्चाकुलमिच्छति जलबुद्बुद्वन्न्याया- देकाकारः परः शिवः ॥ ११ ॥ १०६ . ] .[ सिद्धसिद्धान्तपद्धति
( भाव, अभाव, शून्य-अशून्य द्वैत-अद्वैत, सृष्टिसृजनलयात्मक विश्वप्रपञ्च आदि समस्त स्थावर-जंगम में एकमात्र परमात्मा—परमेश्वर शिव ही कुल- अकुल रूप में अभिव्यक्त हैं । शिव से अभिन्न शक्ति ही महाप्रलय में अकुला- वस्थायुक्त कहलाती है। उस समय नामरूपात्मक विश्वप्रपंचका उपसंहार कर परमतत्व शिव में अभिन्न हो उठती है। सृष्टि का समय आने पर यही निजा शक्ति प्राणियोंके कर्म के साथ युक्त होकर परा-अपरा-सूक्ष्म आदि भेद से कुलरूप व्यक्त अवस्था धारण करती है । विश्वका सृजन करती है, इस अवस्था में यह कुल कहलाती है। वह एकमात्र परमतत्व शिव की आकृति है—न वह द्वैत ( कुल ) है, न वह अद्वैत ( अकुल ) है । जिस तरह जल के बुलबुले जलस्वरूप ही हैं, उसी न्याय से कुल-अकुल शक्ति . शिव है । द्वैत-अद्वैत से रहित यह अभेद ही सामरस्य है ॥ ११ ॥ विशेष :—यह परा शक्ति प्रापंचिक द्वैतताओंका आधार, कारण और पोषक है, यही अपने मूल स्वतः प्रकाश शिवके पारमार्थिक स्वरूप में विराजने पर शिव में तादात्म्य में प्रतिष्ठित अथवा अभिव्यक्त हो उठती है। इस तरह यह पराशक्ति शिव के व्यक्त ( कुल ) और ( अकुल ) अव्यक्त स्वरूपोंका का सामरस्य प्रतिपादित करती है। यह पराशक्ति ही निजा शक्ति है। कुलरूप में अकुल, मुक्त रूप से स्वयं को प्रापंचिक स्तर पर अभिव्यक्त कर स्वनिर्मित सीमाओं में आनन्द-विहार करता है और अपने अकुल रूप में वह शाश्वत, सत्-आनन्दमय, अभिन्न पारमार्थिक आत्मारूप में प्रकाशित रहता है। लौकिक-प्रापंचिक आत्मा- भिव्यक्तिसे निलिप्त और परे होता है। यह निजा शक्ति शिवकी पारमार्थिक एवं सक्रिय रूप में अभेदता-समरसता स्थापित करती है । अतएवैकाकारोऽनन्तशक्तिमान् निजानन्दतयावस्थितोऽपि नानाकारत्वेन विलसन् स्वप्रतिष्ठां स्वयमेव भजतीति व्यवहारः। अलुप्तशक्तिमान्नित्यं सर्वाकारतया स्फुरन्पुनः स्वेनैव रूपेण एकएवावशिष्यते ॥ १२ ॥ अनन्त शक्तिमान् अतएव द्वैत-अद्वैत रूप में एकाकार परब्रह्म परमेश्वर ( समरसता के फलस्वरूप ) अनन्त शक्तिमान्, परिपूर्ण रूप से अखण्डानन्दस्वरूप अनेक रूपों में सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ १०७
( मायिक दृष्टि से भासमान ) स्वाश्रय में अभिव्यक्त है, यद्यपि लोक-व्यवहार की दृष्टि से वह अनेक रूपों में प्रतीत होता है, तथापि वही सब का आधार है। शिव और शक्ति का नित्य तादात्म्य सम्बन्ध है। उससे शक्ति के तादात्म्य का कभी लोप ही नहीं है। जड़-चेतन-स्थावर, जंगमादि समस्त संसाररूप से भी वह समुद्र के फेन, तरंगादि के समान व्यावहारिक प्रपंचावस्था से भास- मान होता है और फिर अन्त में वही परमेश्वर निज व्यापक, चिद्रूप, अखण्ड स्वरूप में अवशेष ( पूर्ण ) रहता है ॥ १२ ॥ विशेष—अपनी अनन्त शक्ति से युक्त शिव तात्विक रूप में अपने पूर्ण आनन्दमय, अभेद, अपरिवर्तनीय स्वरूप में रहते हुए भी विलासरूप में अपने को विभिन्न रूपों में प्रकट करते हैं और भोगते हैं। इस प्रकार व्यावहारिक रूप में वे भोक्ता और भोग्य, स्रष्टा और सृष्टि, आधार और आधेय, आत्मा और उसकी अभिव्यक्ति आदि दोहरे रूप में भासित होते हैं। न तो वे शक्ति का कभी त्याग करते हैं और न शक्ति उनका त्याग करती है। अलुप्त शक्तिमान् और नित्य कहलाने का स्वारस्य है। यद्यपि शिव शक्ति के द्वारा शाश्वत रूप से अपने आप को समस्त रूपाकारों में व्यक्त करते हैं तथापि वे अनादि काल से आत्मस्वरूप में अद्वैत, परिवर्तनरहित, अभेदसत्ता, निराकार, निरञ्जन परमात्मा के रूप में नित्य अभिव्यक्त रहते हैं। अतएव परमकारणं परमेश्वरः परात्परः शिवः स्वस्वरूपतया सर्वतोमुखः सर्वाकारतया स्फुरितुं शक्नोतीत्यतः शक्तिमान्, शिवोऽपि शक्तिरहितः शक्तः कर्तुं न किञ्चन । स्वशक्त्यासहितः सोऽपि सर्वस्याभासको भवेत् ॥ १३ ॥ अतएव सर्वशक्तिसम्पन्न होने से ही आदिनाथ शिव सूक्ष्म-स्थूल, समस्त भौतिक पदार्थों के परम कारण परमेश्वर हैं। वे अपने स्वरूप में परात्पर हैं, चैतन्यस्वरूप सब में व्यापक हैं, रुद्र-विष्णु आदि रूपों में अवतरित होने में समर्थ हैं। शक्तियुक्त होने पर ही शिव सर्वसमर्थ हैं, शक्तिरहित होने पर वे कुछ भी करने में समर्थ नहीं हैं। अपनी निज शक्ति से युक्त होने पर ही वे विश्व के साक्षी हैं ॥ १३ ॥ विशेष—परात्पर शिव ( उच्चतम प्रापंचिक सत्ताओं एवं काल, दिक् तथा क्रिया से परे ) अपनी अनन्त शक्ति के द्वारा व्यावहारिक जगत् के समस्त १०८ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति
स्तरों के अंतिम कारण परमेश्वर तथा सर्वद्रष्टा हो जाते हैं । उनका पारमार्थिक स्वतः प्रकाश, आत्मपूर्ण स्वरूप इस जगद्व्यवस्था से किसी भी तरह प्रभावित हुए बिना ही समस्त लौकिक सत्ताओं के रूप में विभासित रहता है । अतएवानन्तशक्तिमान् परमेश्वरः स विश्वरूपीविश्वमयो भवतीति प्रसिद्धं सिद्धानां च परापरस्वरूपा कुण्डलिनी वर्तते । अतस्ते पिण्डसिद्धाः प्रसिद्धा सा कुण्डलिनी प्रबुद्धा अप्रबुद्धा चेति द्विधा । अप्रबुद्धेति तत्रपिण्डचेतनरूपा स्वभावेन नानाचिन्ताव्यापारोद्यमप्रपञ्चरूपा कुटिलस्वभावा कुण्डलिनी रव्याता सैव योगिनां तत्तद्विलसित विकाराणां निवारणो- द्यमस्वरूपा कुण्डलिन्यूर्ध्वगामिनी प्रसिद्धा भवति ॥ १४ ॥ परापरशक्ति से युक्त परमेश्वर अनन्त शक्तिमान् कहा जाता है । वह समस्त विश्व का अधिष्ठातारूप आधार होने से विश्वरूप और विश्वमय कहा जाता है । परापरस्वरूपा शक्ति कुण्डलिनी सिद्धों के देहपिण्ड में विद्यमान है, उस कुण्डलिनीके बल अथवा प्रभाव से वे कायसिद्ध के रूप में प्रसिद्ध हैं । यह कुण्डलिनी प्रबुद्ध और अप्रबुद्ध (सुप्त )--दो प्रकार की है । यद्यपि देहपिण्ड में विद्यमान कुण्डलिनी स्वभाव से चेतनस्वरूप है, तथापि जब तक वह जगायी नहीं जाती है, तब तक वह संसारी पुरुषोंके लिये अनेक शोकमोहचिन्ताव्यापार- रूपिणी है--बन्धनकारिणी है, वही मूलाधार में कुटिल--अधोमुखी ( सुप्त ) रहती है, पर वही जगायी जाने पर सहस्रदल तक ऊर्ध्वगामिनी होती है तथा योगियों के मनोविकारों का निवारण करती है ॥ १४ ॥ विशेष—अप्रबुद्ध और प्रबुद्ध कुण्डलिनी के स्वरूप का महायोगी गोरखनाथ ने गोरक्षशतक आदि में विस्तार से विचार किया है। अन्य योगसंहिताओं में इसका विशिष्ट निरूपण उपलब्ध होता है । गोरखनाथजी का कथन है कि मेढ्र के ऊपर और नाभि के नीचे कन्द के समान सभी नाड़ियों का उत्पत्ति-स्थान है । कन्द के ऊपर कुण्डलिनीशक्ति आठ प्रकार की होकर कुण्डलित आकार में सुषुम्ना में स्थित पश्चिमद्वार—ब्रह्मद्वार को अपने मुख से आच्छादित कर स्थित है । इस तरह जिस द्वार से ऊर्ध्व की ओर गति करते हुए योगसाधक द्वारा निर्मल, निर्विकार, ब्रह्मरन्ध्र—ब्रह्मस्थान में प्रवेश किया जाता है, उसी द्वार को रोक, सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ १०६
कर कुण्डलिनी शक्ति सोती है। वह वह्नियोग से जागृत होकर मन और प्राण के साथ डोर में बँधी सूई के समान ऊपर उठती है। यह भुजङ्गाकृति कुण्डलिनी, जो कमलतन्तु के समान विभासित और शुभ दीप्तियुक्त है, सुषुम्नामार्ग से वह्नि के संयोग से ऊपर उठ जाती है और जिस तरह ताली से तालाबन्द दरवाजा खोला जाता है, उसी तरह कुण्डलिनी महाशक्ति से योगी मोक्षद्वार का भेदन करता है। इस कुण्डलिनी के जागरण की विधि का वर्णन है : कृत्वा सम्पुटितौ करौ दृढतरं बद्धवा तु पद्मासनं गाढं वक्षसि सन्निधाय चिबुकं ध्यात्वा च तत्प्रेरितम् । वारंवारमपानमूर्ध्वमनिलं प्रोच्चारयेत्पूरितं मुञ्चन् प्राणमुपैति बोधमतुलं शक्तिप्रबोधान्नरः । ( गोरक्षशतक ५२ ) योगसाधक दोनों हाथों को एक-दूसरे से सटा कर पद्मासन में अच्छी तरह स्थित होकर वक्षःस्थल पर चिबुक को लगा कर कुण्डलिनी का ध्यान करते हुए बार-बार प्राणायाम द्वारा वायु खींच कर उसे अपानवायु से मिलाकर कुम्भक द्वारा वायु को रोक कर श्वास बाहर निकालने से शक्ति के प्रबोधनद्वारा अतुल बोध प्राप्त करता है । शिवसंहिता, घेरण्डसंहिता, हठयोगप्रदीपिका आदि में उपर्युक्त जागरण विधि को शक्तिचालिनी मुद्रा नाम दिया गया है । विहाय निद्रां भुजगी स्वयमूर्ध्वं भवेत्खलु । ( शिवसंहिता ४ । १०७ ) शक्तिचालन मुद्रा के अभ्यास से कुण्डलिनी जाग कर ऊपर की ओर गति करती है । आकाशादि को कुण्डलिनी से उत्पत्ति ऊर्ध्वमिति सर्वतत्त्वान्यपि स्वस्वरूपमेवेत्यूर्ध्वं वर्तते अतएव सा विमर्शरूपिणी योगिनः स्वस्वरूपमवगच्छन्तीति सुप्रसिद्धा ॥ १५ ॥ आकाश आदि समस्त भौतिक पदार्थ कुण्डलिनी शक्ति से ही उत्पन्न होते हैं, ( कार्यों की कारण से भिन्न सत्ता नहीं है ) समस्त प्रपञ्च कुण्डलिनीस्वरूप ही ११० ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति
हैं, वह सभी के ऊपर विराजमान परम सत्ता होने से विमर्शरूपिणी विद्या है । योगियों को ( भगवती कुण्डलिनी की साधना से ) आत्मस्वरूप की प्राप्ति ( अलख निरञ्जन परमात्मा का साक्षात्कार ) सहज ही हो जाती है, यह बात प्रसिद्ध है ॥ १५ ॥ विशेष – हठयोगप्रदीपिका में निर्देश है कि शक्तिबोध से योगी को सहजा- वस्था की प्राप्ति स्वयं हो जाती है । उत्पन्नशक्तिबोधस्य त्यक्तनिःशेषकर्मणः । योगिनः सहजावस्था स्वयमेव प्रजायते ॥ ( हठयोगप्रदीपिका ४ । ११ ) जीवात्मा और परमात्मा का अभेद ज्ञान ही सहज ज्ञान है । यही स्व- विश्रान्तिरूप अद्वैत पद अथवा परम पद है । मध्यशक्तिप्रबोधन मध्यशक्तिप्रबोधेन अधःशक्तिनिकुञ्चनात् । ऊर्ध्वशक्तिनिपातेन प्राप्यते परमं पदम् ॥ १६ ॥ ( नाभिदेशस्थ मणिपुर चक्र में स्थित कुण्डलिनी मध्य शक्ति कही जाती है । मूलाधार में स्थित कुण्डलिनी अधःशक्ति के रूप में प्रसिद्ध है । सहस्रदल में यही शक्ति ऊर्ध्व शक्ति के रूप में विराजमान होती है ।) मध्य शक्ति को जगाने से और अधः शक्ति के ऊपर की ओर आकर्षण से तथा ऊर्ध्व शक्ति ( कुण्डली ) के निपात—संयोजन से परम पद की प्राप्ति होती है ॥ १६ ॥ विशेष — मूलाधार में आधार पद्म है, यह चार दलों वाला है । यह चक्र कुलाभिध कहलाता है, इसमें कुण्डलिनी शक्ति सर्प के समान आकृतिवाली सुप्ता अवस्था में पड़ी रहती है । तत्पद्ममध्यगा योनिस्तत्र कुण्डलिनी स्थिता ॥ ( शिवसंहिता ५ । ८५ ) आधार कमल की कर्णिका में त्रिकोणाकार योनि—कामगिरि पीठ में अधः शक्ति कुण्डलिनी रहती है । इसको अपान वायु के निकुञ्चन—आकर्षण से ऊर्ध्व सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ १११
मुख कर जगाया जाता है। ढके हुए सुषुम्ना द्वार को उद्घाटित कर यह ऊर्ध्व- मुखी होती है। नाभिचक्र—मणिपूरक में आठवलयों वाली मध्य कुण्डलिनी की स्थिति बतायी गयी है। यह बन्धत्रय—मूल, उड्डियान और जालन्धर बन्ध के अभ्यास से समुत्थित होती है। प्राण से अपान का ऐक्य स्थापित होना ऊर्ध्व शक्तिपात कहा गया है। शक्ति—कुण्डलिनी ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र ग्रंथि का भेदन कर षट्चक्र से होती हुई सहस्रार में पहुँच जाती है, उस समय शून्य समाधि की स्थिति में साधक अपने स्वरूप में समाहित हो जाता है। एकैव सा मध्योर्ध्वाधः प्रभेदेन त्रिधा भिन्ना शक्तिरभि- धीयते ॥ १७ ॥ यद्यपि कुण्डलिनी महाशक्ति स्वरूपतः एक ही है, तथापि (स्थान और सूक्ष्मस्थूल भेद से) वह अधः, मध्य और ऊर्ध्व शक्ति के रूप में तीन प्रकार की कही जाती है ॥ १७ ॥ विशेष—मूलाधार में रहनेवाली कुण्डलिनी सूक्ष्म, अबोधरूप और सबका कारण कही जाती है। नाभि में मणिपूर चक्र में स्थित कुण्डलिनी बोधरूपा कही जाती है और यही शक्ति जब ऊर्ध्वमुखी होकर ऊपर की ओर गति करती है, तब बोधजनक कल्याणकारिणी ऊर्ध्व शक्ति के रूप में प्रसिद्ध होती है। बाह्येन्द्रियव्यापारनानाचिन्तामया सैवाधः शक्तिरि- त्युच्यते । अतएव योगिनस्तस्या आकुञ्चने रता यस्या आकुञ्चनं मूलाधारबन्धनात्सिद्धं स्यात् ॥ १८ ॥ बाह्य इन्द्रियजन्य कार्यों की चिन्ता का कारण अधः शक्ति—मूलाधार में सुप्त कुण्डलिनी है। (जब तक इसको जगाया नहीं जाता है तब तक साधक सांसारिक कार्यों की चिन्ता से ग्रस्त रहता है)। योगी मूलाधार में स्थित इस शक्ति के आकुञ्चन—संकोचन में तत्पर रहते हैं। मूलाधार बन्ध के अभ्यास (अपान और प्राण का ऐक्य स्थापित होने पर उड्डियान और जालन्धर बन्ध की सिद्धि) से यह शक्ति ऊर्ध्वमुखी होकर जाग जाती है और साधक को परमानन्द की प्राप्ति करा देती है ॥ १८ ॥ ११२ .| [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति
विशेष --साधक योनिस्थान --गुदा और मेढ्र के मध्य भाग के स्थान को किसी भी पैर की एड़ी से दवा कर गुदा को सिकोड़े और फैलाये तथा अपान वायु को ऊपर की ओर खींचे । यही मूलवन्ध है । जिससे नीचे की ओर गतिशील अपानवायु को साधक सुपुम्ना में प्रवाहित करता है अथवा ऊपर की ओर उठाता है, वही मूलवन्ध है । जिस बन्ध से प्राण उड़कर सुपुम्ना नाड़ी में पहुँच जाता है, वही उड्डियानवन्ध है । नाभि के ऊपर और नीचे उदर में पीछे की ओर इस तरह आकर्षण करे कि दोनों भाग पीठ तक—पीछे पहुँच जाय । कम-से कम इस तरह तीन वार आकर्षण करना चाहिये । कंठ ( गले के विवर ) को सिकोड़ कर साधक को हृदय-देश में-- वक्ष के समीप चार अंगुल की दूरी पर ठोड़ी को दृढ़ता से स्थापित करना चाहिये । यही जालन्धरवन्ध है । इन तीनों वन्धों के अभ्यास से कुण्डलिनी महाशक्ति क्रमशः सहस्रार में पहुँच जाती है । यस्माच्चराचरं जगदिदं चिदचिदात्मकं प्रभवति तदेव मूलाधारं संवित्प्रसरं प्रसिद्धम् ॥ १६ ॥ जिससे चर-अचर, स्थावर-जंगम, चिद्, अचिद् समस्त जगत् की उत्पत्ति होती है, वह मूलाधार है, जिसके संकोच और प्रसरण से कुण्डलिनी का प्रबोधन होने पर ज्ञान की वृद्धि होती है—यह मूलाधार ही संवित्प्रसारण-भूमि है ॥ १९ ॥ सर्वशक्तिप्रसरसंकोचाभ्यां जगत्सृष्टिः संहृतिश्चभवत्येव न सन्देहस्तस्मात्सा मूलमित्युच्यते । अतः प्रायेण सर्वे सिद्धा मूलाधाररता भवन्ति ॥ २० ॥ समष्टिरूप ( सर्वेश्वरी ) महाशक्ति के व्यापार—कार्य से ही ( संकोच और प्रसरण से ही ) जगत् का सृजन और संहार होता है, इसमें संदेह नहीं है ( कि योगी इस मूल शक्ति का ध्यान कर जगत् की सृष्टि और संहार कर सकता है ) । यही कारण है कि मूलाधार में स्थित यह महेश्वरी शक्ति ही मूल शक्ति है । प्रायः सभी सिद्ध, यही कारण है कि मूलोधारशक्ति—कुण्डलिनी को जगाने में तत्पर रहते हैं ॥ २० ॥ तरङ्गितस्वभावं जीवात्मानं वृथाभ्रमन्तमपि स्वप्रकाश मध्ये स्वस्वरूपतया सदा धारयितुं समर्था या सा कुण्डलिनी सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] - [ ११३
मध्याशक्तिर्गीयते स्थूलसूक्ष्मरूपेण महासिद्धानां प्रतीयत इति निश्चयः ॥ २१ ॥ मध्या शक्ति ( कुण्डलिनी ) का वर्णन किया जाता है। यह कुण्डलिनी चिद्रूप होने से जीवात्मा का वास्तविक स्वरूप है। अविद्यावश संसार-बन्धन में विषयादि मृगतृष्णा में आसक्त जीवात्मा को यह मध्या शक्ति अपने चिद्रूप स्वप्रकाश में धारण करने में सदा समर्थ है। यह कुण्डलिनी स्थूल और सूक्ष्म— दो प्रकार की कही गयी है। इसकी महासिद्ध योगियोंको ही अच्छी तरह जानकारी रहती है, इसमें रञ्चमात्र भी सन्देह नहीं है ॥ २१ ॥ विशेष—महासिद्ध योगियों को यह कुण्डलिनी मूलाधार में सूक्ष्मरूपिणी और मणिपुर चक्र में स्थूल प्रतीत होती है। स्थूल-सूक्ष्म कुण्डलिनी स्थूलेति ।निखिलग्राह्याधारविग्राह्य स्वरूपापि पदार्थान्तरे भ्राम्यमाणा चिद्रूपा या वर्तते सा कुण्डलिनी साकारास्थूला- पुनस्त्वयमेव स्वप्रसारचातुर्यतया वर्तमाना योगिनां परमानन्द- तया कुण्डलिनी या निश्चयभूता वर्तते सा सूक्ष्मा निराकारा प्रबुद्धा महासिद्धानां मते प्रसिद्धा ॥ २२ ॥ यद्यपि मूलाधार में स्थित कुण्डलिनी योगसिद्ध पुरुषों के अतिरिक्त संसार में विषयासक्त बँधे जीवमात्र के लिये सूक्ष्म (अज्ञात) है तथापि यह शब्दात्मक स्थूल जगत् की सृष्टि करने के कारण साकार—स्थूल कही जाती है। वह रूपादि विषयों में भ्रमण—संचार करती रहती है, यही निज विस्तार- कौशल से नाभिस्थान—मणिपूर चक्र में अपने उपर्युक्त विषयसम्बन्धों को छोड़ कर अपने चैतन्यस्वरूप से योगियों को अपने आनन्ददायक व्यापक अखण्ड आत्मा का निश्चय कराती है। जागने पर यह सूक्ष्म रूप से, निराकार और सर्वत्र व्यापक रहती है। योगनिपुण महासिद्ध ही इस बात को अच्छी तरह जानते हैं ॥ २२ ॥ विशेष—जो योगसाधक कुण्डली को संचालित कर लेता है, वह सिद्धियों को प्राप्त कर लेता है और मृत्यु को वश में कर अपने अखण्ड परमानन्द स्वरूप में लीन हो जाता है। ११४ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति
सृष्टिकुण्डलिनी ख्याता द्विधा भागवती तु सा । एकधा स्थूलरूपा च लोकानां प्रत्यगात्मिका । अपरा सर्वगा सूक्ष्मा व्याप्ति-व्यापकवर्जिता । तस्या भेदं न जानाति मोहिता प्रत्ययेन तु ॥ २३ ॥ ( प्रत्येक प्राणी के मूलाधार में सूक्ष्म रूप से कुण्डलिनी विद्यमान है, वह प्रत्येक जीवात्मा में व्यापक है । ) यह भगवत्सम्बन्धवाली ( भागवती ) कुण्डलिनी दो प्रकार की है, यह स्थूल और सूक्ष्म है। यह स्थूल जगत् की सृष्टि करती है, इसलिये सृष्टि-कुण्डलिनी के रूप में प्रसिद्ध है । जब यह नाभिचक्र-- मणिपूर में प्रबुद्ध होकर उपाधिसम्बन्ध छोड़कर अखण्ड स्वरूप में ऊर्ध्वमुखी होकर प्रतिष्ठित होती है, तब वह सर्वव्यापक, सूक्ष्म और व्याप्तिव्यापक भाव से रहित होती है । विषयप्रपञ्च में सम्मोहित प्राणी उसके सत्स्वरूप को नहीं जान पाते हैं ॥ २३ ॥ तस्मात् सूक्ष्मापरा संवित्स्वरूपा मध्या शक्ति कुण्डलिनी योगिभिर्देहसिद्ध्यर्थं सद्गुरुमुखाज्ज्ञात्वा स्वस्वरूपदशायां प्रबोधनीया ॥ २४ ॥ इसलिये सूक्ष्म चिद्रूपिणी विषयरहित मध्य कुण्डलिनीशक्ति को देहसिद्धि ( मृत्यु को वश में करने ) के लिये गुरु के सदुपदेश से अपनी आत्मस्वरूप की अभिव्यक्ति के लिये जगाना चाहिये । (गुरु की कृपा से ही उनके मुख से तत्सम्बन्धी प्रबोधन-क्रिया का ज्ञान प्राप्त कर ही योगसाधक मूलाधार में सोयी कुण्डलिनी को जगाकर सहस्रार की ओर ऊर्ध्वमुख करता है । ) यह संवित्स्वरूपा मध्य कुण्डलिनी नितान्त प्रबोधनीय है ॥ २४ ॥ अथ ऊर्ध्वशक्तिनिपातः कथ्यते सर्वेषां तत्त्वानामुपरिवर्त- मानत्वान्निर्नमं परमं पदमेवमूर्ध्वंप्रसिद्धं तस्याः स्वसंवेदन नानासाक्षात्कारसूचनशीलाया सोर्ध्वशक्तिरभिधीयते तस्या निपातनमिति स्वस्वरूपद्विधाभासनिरासः किन्तु स्वस्वरूपा- खण्डत्वेन भवति ॥ २५ ॥ सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ ११५
( मध्य कुण्डलिनी शक्ति का सहस्रार में प्रवेश ही ऊर्ध्व-शक्तिनिपात कहा जाता है । ) ऊर्ध्वशक्ति-निपात का वर्णन किया जाता है । समस्त विषयप्रपञ्च— भौतिक पदार्थों के ऊपर वर्तमान रहने की स्थिति ही ऊर्ध्व है । नाम-रूप से रहित आदिनाथ परमेश्वरस्वरूप ही परमपद है । उस अनन्त अखण्ड परमात्मा की स्वरूपाभिव्यक्ति करनेवाली शक्ति ही ऊर्ध्व शक्ति ( परम जाग्रत् परमेश्वरी कुण्डलिनी ) कही जाती है । मूलाधार से मणिपूर चक्रादि का भेदन करती हुई महाकुण्डलिनी सहस्रार में शिव का ऐक्य प्राप्त कर 'यह, तुम, मैं' आदि के भेदभाव का अन्त कर देती है, किंतु ( साथ-ही-साथ ) परमात्मा और जीवात्मा के अखण्ड-अभिन्न व्यापक स्वरूप का ज्ञान करा देती है ॥ २५ ॥ शिवस्याभ्यन्तरे शक्ति शक्तेराभ्यन्तरः शिवः । अन्तरं नैव जानीयाच्चन्द्रचन्द्रिकयोरिव ॥ २६ ॥ ( शक्ति और शक्तिमान्—स्वरूपतः दोनों एक-दूसरे में अभिन्न हैं । कूटस्थ असंग शिव सर्वत्र व्यापक हैं, शिव को धारण करनेवाली शक्ति भी व्यापक है । ) शिव में शक्ति है, शक्ति में शिव हैं, जिस तरह चन्द्रमा और चाँदनी में स्वरूपतः भेद—भिन्नता नहीं है, उसी तरह शिव और शक्ति में भिन्नता नहीं है । ' दोनों में कूटस्थता और असंगता की दृष्टि से व्यवहार में भेद परिलक्षित होता है और पारमार्थिक सत्ता में वे स्वरूपतः अखण्ड और अभेद हैं । ) शिव-शक्ति एक हैं ॥ २६ ॥ अत ऊर्ध्वशक्तिनिपातेन योगिभिः परमं पदं प्राप्यत इति सिद्धम् ॥ २७ ॥ अतएव योगियों द्वारा ऊर्ध्व शक्ति—भगवती कुण्डलिनी महाशक्ति के निपात से सहस्रार में पूर्ण जाग्रत् कर प्रविष्ट कराने पर परम पद की—स्वरूप-स्थिति की प्राप्ति की जाती है, इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है । सत्त्वे सत्त्वे सकलरचना राजते संविदेका तत्त्वे तत्त्वे परममहिमा संविदेवावभाति । भावे भावे बहुलतरला लम्पटा संविदेषा भासे भासे भजनचतुरा बृंहिता संविदेव ॥२८॥ ११६ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति
अखण्ड शुद्ध चैतन्य सच्चिदानन्दस्वरूप परब्रह्म सर्वत्र विद्यमान है। यह चेतन ही समस्त विश्वप्रपंच का आधार है। प्रकृति, माया आदि तत्वों पर महिमा सहित शक्ति सर्वत्र प्रकाशित हो रही है । समस्त मानसिक व्यापारों में इसी शक्ति की सत्ता अभिव्यक्त है। आशय यह है कि सभी पदार्थों की समस्त व्यवस्थाओं के अंगों और गुणों को एकत्र करने वाला तथा सभी प्रकार की सत्ताओं की व्यवस्थाओं में संवित् ही प्रकाशमान है । वही समस्त व्यावहारिक सत्ताओं के सीमित, परिवर्तनशील तथा अनेक वस्तुरूपों में स्वयं को प्रकट कर रहा है। सभी प्रकार के मानसिक अनुभवों में स्वयं को अनेक आत्मगत रूपों में प्रकट कर कौशल से वह संवित् ही अनेक सीमित विशेषतायें धारण कर लेता है ।। २८ ।। किमुक्तं भवति परापरविमर्शरूपिणी संविन्नानाशक्ति- रूपेण निखिलपिण्डाधारत्वेन वर्त्तते इति सिद्धान्तः ।। २६ ।। इस तरह परासंवित्स्वरूप शिवशक्ति के सामरस्य का स्पष्ट निर्णीत रूप यह है कि व्यष्टि-समष्टिभूत भौतिक समस्त पदार्थों का अनुभवरूप सच्चिदानन्दस्वरूप चेतन ब्रह्म ही निजा, परा सूक्ष्मा शक्ति-रूपों के द्वारा समस्त पिण्डोंका आधार (आश्रय) है ।। २६ ।। इति शिवगोरक्षविरचितसिद्धसिद्धान्तपद्धतौ चतुर्थोपदेशः ।। सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ ११७
पाँचवां उपदेश [ पिण्डपदसामरस्य ] महासिद्धयोगिभिः पूर्वोक्तक्रमेण परपिण्डादिस्वपिण्डान्तं ज्ञात्वा परमपदे समरसं कुर्यात् ॥ १ ॥ परासंवित्स्वरूप शिव-शक्ति को नितान्त अभिन्न समझते हुए योगी को मूलाधार में सोयी कुण्डलिनी महाशक्ति को जगाकर मध्य शक्ति के प्रबोधनपूर्वक ऊर्ध्व शक्ति का सहस्रार में निपात करना चाहिये। अपने व्यष्टि पिण्ड और सच्चिदानन्दपरमात्मस्वरूप परपिण्ड का ज्ञान प्राप्त कर परमपद परमात्मा में सामरस्य ( ऐक्य ) स्थापित करना चाहिये,—ऐसा करने से उन्हें परमात्म असंग शिवस्वरूप की प्राप्ति हो जाती है ॥ १ ॥ परमपद परमपदमिति स्वसंवेद्यमत्यन्तभासाभासकमयम् ॥ २ ॥ ( परम पद द्वैताद्वैतविवर्जित है । ) परम पद स्वानुभवैकगम्य है—स्वसंवेद्य है और स्वप्रकाशस्वरूप अभिव्यक्त है—किसी अन्य प्रकाश के माध्यम से यह बोध- गम्य नहीं है ॥ २ ॥ विशेष—स्वसंवेद्य परमपद का आशय यह है कि परमात्मा ही परमात्मा को जानता है अथवा जब कुण्डलिनी के पूर्ण प्रबोधन से जीवात्मा अखण्ड परमात्म- ११८ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति