सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)
Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary
गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर) द्वारा
परम पद की प्राप्ति में गुरु ही ठीक-ठीक सन्मार्गदर्शन कराने वाला होता है, सन्मार्ग ही योगमार्ग है ( जिसके द्वारा समस्त चित्तवृत्तियों का निरोध होने पर सहज समाधि में साधक को परम पद का साक्षात्कार होता है । योगमार्ग (श्रुतिस्मृतिप्रतिपादित सम्यक् स्वरूपप्राप्ति-मार्ग) के अतिरिक्त दूसरा मार्ग पाखंड मार्ग है ( जिस पर अनात्मवादी चलकर सन्मार्ग की निन्दा और खण्डन करता है) । आदिनाथ शिव का कथन है—जो योगमार्ग और उसके उपायभूत (सहायक) तन्त्र ( दक्षिण मार्ग ) में दीक्षित और गुरुमुख हैं, उनकी निन्दा करने वाले और उन ( निन्दकों ) के सहायक पाखण्डी हैं, क्योंकि वे सत्स्वरूप की प्राप्ति में बाधक और अनभिज्ञ हैं ॥ ५ ॥ विशेष—यह योगमार्ग ही सिद्धमार्ग है, कैवल्यपद—परमपद की प्राप्ति इसों मार्ग के अनुशीलन से सम्भव है । नानामार्गैस्तु दुष्प्राप्यं कैवल्यं परमं पदम् । सिद्धमार्गेण लभ्यन्ते नान्यथा शिवभाषितम् ॥ ( योगबीज-८ ) योग से बड़ा परमपद की प्राप्ति की दिशा में कोई दूसरा बल ही नहीं है । यस्मिन् दर्शिते सति तत् क्षणात् स्वसंवेद्यसाक्षात्कारः समुत्पद्यते ततो गुरुरेवात्र कारणमुच्यते ॥ ६ ॥ जिस समय ( सिद्ध गुरु द्वारा ) परमपद की प्राप्ति के उपायभूत योगमार्ग के उपदेश से परमात्मबोध कराया जाता है, तत्काल ही ( उसी समय ) स्वसंवेद्य अलख-निरञ्जन परमेश्वर का साक्षात्कार हो जाता है । ( यह निर्वि- वाद है कि ) परमपद की प्राप्ति में गुरु ( की कृपा ) ही एकमात्र कारण है ॥ ६ ॥ गुरु और सामरस्य तस्माद् गुरुकटाक्षपातात् स्वसंवेद्यतया च महासिद्ध- योगिभिः स्वकीयपिण्डनिरुत्थानानुभवेन समरसं क्रियत इति सिद्धान्तः ॥ ७ ॥ सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ १२१
यही कारण है कि बड़े-बड़े सिद्धयोगी गुरु के कृपाकटाक्ष और अपने ( मनोनिग्रहादि योगसाधना के ) अनुभव से स्वरूप-बोध में समर्थ होकर अपने व्यष्टिशरीर का निरुत्थानानुभव ( व्यापक पर-पिण्ड में अभेदता ) के समाश्रय में सामरस्य करते हैं—परमात्मस्वरूप परमपद की प्राप्ति के द्वारा सच्चिदानन्द स्वरूप हो जाते हैं—जीवात्मा-परमात्मा में पूर्ण अभेदता की प्रतिष्ठा ही यह व्यष्टि पिण्ड से परपिण्ड का सामरस्य है ॥ ७ ॥ विशेष—गुरु की वन्दना में महायोगी गोरखनाथ ने गोरक्षशतक के मांगलिक श्लोक में इसी सामरस्य को परिलक्षित किया है । श्रीगुरुं परमानन्दं वन्दे स्वानन्दविग्रहम् । यस्य सान्निध्यमात्रेण चिदानन्दायते तनुः ॥ ( गोरक्षशतक-१ ) गोरखनाथ का कथन है कि मैं अपने गुरुदेव की वन्दना करता हूँ, जो साक्षात् परमानन्द हैं, जो सच्चिदानन्दस्वरूप—आनन्दविग्रह अथवा मूर्तिमान् आनन्द हैं, जिनके सान्निध्यमात्र से ही—कृपाकटाक्ष से ही यह शरीर चिदानन्द, चिन्मय, परमानन्द, परमात्मस्वरूप हो जाता है । निरुत्थान-प्राप्ति का उपाय निरुत्थानप्राप्त्युपायः कथ्यते । महासिद्धयोगिनः स्वस्व- रूपतथ्यानुसन्धानेन निजावेशो भवति निजावेशान्निःपीडित निरुत्थानदशामहोदयः कश्चिज्जायते ततः सच्चिदानन्दचम- त्काराद्भुताकारप्रकाशप्रबोधो जायते, प्रबोधादखिलमेतद् द्वयाद्वयप्रकटतया चैतन्यभासाभासकं परात्परपरमपदमेव प्रस्फुटं भवतीति सत्यम् ॥ ८ ॥ निरुत्थान ( जीवात्मा-परमात्मा के अभिन्नत्व, एकत्वं अथवा सामरस्य ) की प्राप्ति के उपाय का वर्णन किया जाता है । अभेद रूप परमपद को चाहनेवाले योगी का अपने स्वरूप के अनुसन्धान से ( स्व-परपिण्ड की अभेदता के द्वारा ) निजावेश होता है—वह परमेश्वर को अपने ही स्वरूप में प्रतिष्ठित देखता है । १२२ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति
स्वपिण्ड-परपिण्ड की अभेदता के अनुभव से उसे सर्वेश्वर परमात्मा के पिण्ड में आत्माभिव्यक्ति-निजावेश होता है और इस निजावेश के परिणामस्वरूप ही निरुत्थान अथवा सामरस्य का उदय होता है, उसे स्वाभिव्यक्तिपूर्वक इसका अनुभव होता है कि यह परपिण्ड-परमात्मपिण्ड मेरा ही (व्यष्टि-) पिण्ड है। सच्चिदानन्दस्वरूप आत्मा के स्वसंवेद्य अनुभव के चमत्कार से अद्भुत प्रकाश- स्वरूप आत्मबोध होता है। इस बोध से द्वन्द्व-परमात्म पिण्ड और स्वपिण्ड में भेद भाव का अन्त हो जाता है और अखण्ड परमात्मस्वरूप परमपद प्रत्यक्ष हस्तामलक के समान प्रस्फुटित-स्वप्रकाशित अथवा स्वाभिव्यक्त हो जाता है। इसमें तनिक भी संशय नहीं है-यह सत्य है ॥ ८ ॥ अतएव महासिद्धयोगिभिः सम्यग् गुरुप्रसादं लब्ध्वावधान- बलेनैक्यं भजमानैस्तत्क्षणात् परं पदमेवानुभूयते ॥ ६ ॥ व्यष्टि-पिण्ड और परपिण्ड (परमात्मपिण्ड) में सामरस्य की प्राप्ति गुरु के अनुग्रह से ही होती है। सिद्धयोगियों को इसके लिये सबसे पहले गुरु के चरण में शरणागत होकर उसकी प्रसन्नता से चित्तवृत्तियों के निरोधपूर्वक स्वरूप-ध्यान और समाधि से उपासना में-योगसाधना में तत्पर होकर स्वपिण्ड से परपिण्ड पर्यन्त ऐक्य का अनुभव करना चाहिये, इस तरह की साधना से ही तत्क्षण परम- पद-द्वैताद्वैतविवर्जित परमात्म पद का अनुभव होता है ॥ ६ ॥ तदनुभवबलेन स्वकीयं सिद्धं सम्यङ् निजपिण्डं ज्ञात्वा तमेव परमपद एकीकृत्य तस्मिन्प्रत्यावृत्त्या रूढैवाभ्यन्तरे स्वपिण्डसिद्धयर्थे महत्वमनुभूयते ॥ १० ॥ इस तरह अपने योगसाधनापरक अनुभव के प्रकाश में अपने व्यष्टिपिण्ड (परमात्मस्वरूप से अभेदता) का ज्ञान प्राप्त कर उसे परमपद में एकीकृत कर तथा उस परमपद को अपने व्यष्टि-पिण्ड में एकात्मस्वरूप कर अपने पिण्ड को सच्चिदानन्दस्वरूप में अभिव्यक्त कर परपिण्ड की उसमें अभिन्नता-अभेदता का महत्व योगी अनुभव करता है ॥ १० ॥ निजपिण्डपरीक्षा च स्वस्वरूपकिरणानन्दोन्मेषमात्रं यस्योन्मेषस्य प्रत्याहरणमेव समरसकरणं भवति ॥ ११ ॥ सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ १२३
निज पिण्डपरीक्षा ( से आशय ) यह है कि अपने शरीर में भी परमात्म- स्वरूपकिरणरूप आनन्द का ही विकास है और इस प्रकाश के उन्मेष को अपने ही ( व्यष्टिपिण्ड के ) भीतर समेट कर परमात्मा से अभिन्न अथवा अभेद अनुभव करना ही सामरस्य है ॥ ११ ॥ अतएव स्वकीयं पिण्डं महद्रश्मिपुञ्जं स्वेनैवाकारेण प्रतीयमानं स्वानुसन्धानेन स्वस्मिन्तुरीकृत्य महासिद्धयोगिनः पिण्डसिद्ध्यर्थं तिष्ठन्तोति प्रसिद्धम् ॥ १२ ॥ परमात्मप्रकाश के अपने व्यष्टि-पिण्ड में प्रत्याहरण के परिणामस्वरूप यह शरीर महाप्रकाशपुञ्जरूप में आकारित ( सच्चिदानन्दस्वरूप ) हो उठता है । इस तरह अपने व्यष्टि-पिण्ड में परमात्म-प्रकाश के प्रत्याहरण—सामरस्यकरण द्वारा सिद्धयोगी देहसिद्धि — चिन्मय स्वरूप-स्वानन्दविग्रह की प्राप्ति से चिरकाल तक अजर-अमर रहते हैं ॥ १२ ॥ पिण्डसिद्धि का वेष अथ पिण्डसिद्धौ वेषः कथ्यते— शङ्खमुद्राधारणं च केशरोमप्रधारण ममरीपानममलं तथा मर्दनमुत्तमम् ॥ १३ ॥ एकान्तवासो दीक्षा च संध्याजपममायया । ज्ञानं भैरवमूर्त्तंस्तु तत्पूजा च यथाविधि ॥ १४ ॥ शङ्खध्मातं सिंहनादं कौपीनं पादुके तथा । अङ्गवस्त्रं बहिर्वस्त्रं कम्बलं छत्रमद्भुतम् ॥ १५ ॥ वेत्रं कमण्डलुञ्चैव भस्मना च त्रिपुण्ड्रकम् । कुर्यादेतान् प्रयत्नेन गुरुवन्दनपूर्वकम् । । १६ । पिण्ड ( देह )-सिद्धि हो जाने पर योगी—योगसिद्ध ( परमात्मपदप्राप्त ) के वेषधारण का वर्णन किया जाता है । उसे ( गले और हाथ में ) शंख और (दोनों कानों में) मुद्रा को धारण करना चाहिये, केश और रोम धारण करना चाहिये १२४ । [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति
तथा अमरी की क्रिया के द्वारा उसे सहस्रार से द्रवित अमृत का पान करना चाहिये, प्राणायाम और आसनों के अभ्यास से उत्पन्न पसीने का अंग में लेप करना चाहिये । एकान्तवास का सेवन करते हुए गुरु की दीक्षा के अनुरूप निर्मल चित्त से संध्या-जप आदि के अनुष्ठान में तत्पर रहना चाहिये और योगसाधना मे विघ्नों के निवारण के लिये शास्त्रविधि से भैरव देव का पूजन करना चाहिये । शंखनाद करना चाहिये, वस्त्र के रूप में कौपीन धारण करना चाहिये, पैरों में खड़ाऊँ पहनना चाहिये तथा ओढ़ने-बिछाने के लिये कम्बल तथा पहनने के लिये अँचला अथवा धोती के रूप में वस्त्र रखना चाहिये, पानी के लिये कमण्डलु और जलवृष्टि से बचने के लिये पास में छाता रखना चाहिये । शरीर को स्नान के उपरान्त भस्म से अलंकृत कर ललाट में त्रिपुण्ड्र धारण करना चाहिये । नित्यप्रति गुरु के चरण का ध्यान करते हुए प्रणाम समर्पित कर साधना में तत्पर रहना चाहिये ॥ १३-१६ .। विशेष—अमरीपान (अमरोली) के अभ्यास द्वारा शरीर में साधक वीर्य की अखण्डता सुरक्षित रखता है । हठयोग-प्रदीपिका में अमरीपान पर प्रकाश डाला गया है । पित्तोल्वणत्वात्प्रथमाम्बुधारां विहाय निःसारतयान्त्यधाराम् । निषेव्यते शीतलमध्यधारा कापालिके खण्डमतेऽमरोली ॥ अमरीं यः पिबेन्नित्यं नस्यं कुर्वन् दिने दिने । वज्रोलीमभ्यसेत् सम्यगमरोलीति कथ्यते ॥ अभ्यासान्निःसृतां चान्द्रीं विभूत्या सह मिश्रयेत् । धारयेदुत्तमाङ्गेषु दिव्यदृष्टिः प्रजायते ॥ ( हठयोगप्रदीपिका ३ । ६६-६८ ) अधिक पित्तवाली ( प्रारम्भिक ) बिन्दु-धारा और सार-अंश से रहित अन्तकी धारा को छोड़कर शीतल मध्यधारा ( चन्द्रामृत ) का ही (इस मुद्रा में) पान किया जाता है, खण्डकापालिकमत में यही अमरोली है । साधक नासिका द्वारा अमरी का नित्य पान करते हुए वज्रोली मुद्रा द्वारा वीर्य के ऊर्ध्वाकर्षण का अभ्यास करता है । यही अमरोली है । अमरोली के अभ्यास से निकलती सुधा सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ १२५
से अंग में लेप करने से दिव्य दृष्टि प्राप्त होती है। सुधा को भस्म से मिश्रित कर लेप करना चाहिये। परमपद की प्राप्ति तेषां पिण्डसिद्धौ सत्यां सर्वसिद्धय. संनिधाना भवन्ति ॥ १७ ॥ यस्मिञ्ज्ञाते जगत्सर्वसिद्धं भवति लीलया । सिद्धयः स्वयमायान्ति तस्माज्ज्ञेयं परं पदम् ॥ १८ ॥ परं पदं न वेषेण प्राप्यते परमार्थतः । देहमूलं हि वेषः स्याल्लोकप्रत्ययहेतुकः ॥ १६ ॥ इस प्रकार योगसाधना में तत्पर होने पर पिण्डसिद्धि--शरीर में ही परपिण्डस्थ परमात्मा की व्यापकता की अनुभूति होती है और इस सत्स्वरूप में समस्त अणिमादि सिद्धियां प्रत्यक्ष हो जाती हैं ॥ १७ ॥ इस परमपद--परमात्म- तत्व का बोध होने पर जगत् परमात्मस्वरूप में सहज--अनायास अभिव्यक्त हो उठता है। सिद्धियाँ बिना चाहे ही स्वतः उपस्थित हो जाती हैं। साधक को इन सिद्धियों में न उलझ कर परमपद का ही बोध प्राप्त करना चाहिये ॥ १८ ॥ यह परम पद वेष धारण करने से नहीं सिद्ध होता है। वस्तुतः वेषधारण का तात्पर्य तो यह है कि लोकमात्र को—संसार में निवास करने वाले प्राणियों को संन्यासवेष धारण के महत्व का पता चल जाय। यही कारण है कि देह को इस प्रकार वेषादि-चिह्नों से अलंकृत किया जाता है। साधनसहित वेष धारण कर परमपद का बोध प्राप्त करना चाहिये । योगमार्ग लोके निकृष्टमुत्कृष्टं परिगृह्य पृथक्कृतम् । तत्स्वधर्म इति प्रोक्तो योगमार्गे विशेषतः ।.२०।। योगामार्गात्परो मार्गो नास्ति नास्ति श्रुतौ स्मृतौ । शास्त्रेष्वन्येषु सर्वेषु शिवेन कथितः पुरा ॥२१॥ १२६ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति
लोक में ऐहिक फलजनक ( सेवादि ) कर्म तथा यज्ञ, दानादि उत्कृष्ट पुण्यकर्म--दोनों ही सकाम बुद्धि से किये जाते हैं और जब भगवत्प्रीत्यर्थ कर्म के सम्पादन द्वारा साधक कर्मफल की लिप्सा का त्याग कर देता है, तब यही विशेष रूप से योगमार्ग में स्वधर्म कहा जाता है ॥ २० ॥ भगवान् शिव ने श्रुति, स्मृति, तन्त्र और पुराण तथा आगमों में यही कहा है कि योगमार्ग से श्रेष्ठ मोक्षप्रद-- परमात्मवोधप्रदायक अन्य कोई मार्ग नहीं है ॥ २१ ॥ महायोगी गोरखनाथजी ने योग को वेदकल्पतरु का परम फल कहा है— द्विजसेवितशाखस्य श्रुतिकल्पतरोः फलम् । शमनं भवतापस्य योगं भजत सत्तमाः ॥ ( गोरक्षशतक-६ ) वेद कल्पतरु हैं। जिस तरह कल्पतरु की शाखायें पक्षियों के आश्रयस्थान हैं, ठीक इसी तरह द्विजों ( पण्डितों, विद्वानों ) द्वारा वेद की शाखाओं, प्रति- शाखाओं का परिशीलन किया जाता है। वेदरूपी कल्पतरु का फल योग है। हे सत्पुरुषो ! इसका सेवन ( साधन ) करो। यह योग संसार के त्रय—आधिदैहिक आधिभौतिक और आधिदैविक ताप का शमन ( नाश ) कर देता है। इस अभ्यास अथवा साधन से सांसारिक दुःख अथवा भववन्धन समाप्त हो जाता है, स्वरूपबोध प्राप्त होता है। योगः संहननोपायो ज्ञानसङ्गतियुक्तिषु ॥ २२ ॥ लोके निकृष्टं सततं यं वा यं वा प्रकुर्वते । तं वा तं वा वर्जयन्ति लोका ज्ञानबलेन तु ॥ २३ ॥ मनुष्याणां च सर्वेषां प्राक् संस्कारवशादिह । शास्त्रयुक्तिसमाचारः क्रमेण भवति स्फुटम् ॥ २४ ॥ दो वस्तुओं को मिलाना ही योग है। लोक में अनित्य फल देने वाली वस्तुओं के योग का जो अर्थ किया जाता है, वह गौण है। यह योग तो ज्ञान- साधनपरक मोक्षप्रदायक है। ( यही योग का मुख्य अर्थ है । ) ज्ञानी लोक में व्यवहृत निकृष्ट अर्थ का परित्याग कर—अनित्य फलदायक गौण अर्थ के स्थान पर मुख्य अर्थ का ग्रहण करते हैं। सभी मनुष्यों की पूर्वजन्म के संस्कार सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ १२७
और वासना के अनुरूप इस दिशा में प्रवृत्ति होती है । अतएव क्रमपूर्वक शास्त्र- युक्ति व्यवहार के प्रकट होने पर ही किन्ही-किन्हीं भाग्यशाली प्राणी की प्रवृत्ति योगसाधना में होती है ॥ २२–२४ ॥ एवं पिण्डे संसिद्धे ज्ञानप्राप्त्यर्थं तच्च परमं पद महा- सिद्धानां मतं परिज्ञाय च तस्मिन्नहं भावे जीवात्मा च सहजसंयमसोपायाद्वैतक्रमेणोपलक्ष्यते ॥ २५ ॥ इस तरह योगसाधना के द्वारा पिण्ड के सिद्ध होने पर अखण्ड ज्ञान की प्राप्ति के लिये महासिद्धों के मत में चिद्रूप शक्ति सहित अखण्ड शिवतत्त्व ही परम पद कहा जाता है । उस आत्मस्वरूप अखण्ड शिवतत्त्व में यह भाव स्थापित करे कि मैं ही शिव हूँ, मुझमें और शिव में सम्पूर्ण तादात्म्य है । परम शिव से अभिन्न जीवात्मा — जीव का वास्तविक आत्मस्वरूप ही सहज, संयम, सोपाय और अद्वैत क्रम से लक्षित होता है ॥ २५ ॥ सहजसंयमसोपायाद्वैतज्ञान तत्र सहजमिति विश्वातीतं परमेश्वरं विश्वरूपेणाव- भासमानमिति ज्ञात्वैकमेवास्तीति स्वस्वभावेन यज्ज्ञानं तत्सहजं प्रसिद्धम् ॥ २६ ॥ सहज ज्ञान का वर्णन किया जाता है । यद्यपि ( अलखनिरञ्जन ) परमेश्वर विश्वातींत निराकार और निर्गुण है तथापि वह मायाउपाधिसहित विश्वरूप में अवभासित, प्रतिभासित होता है । ऐसा समझ कर तत्वदृष्टि से परमेश्वर और मुझ ( जीवात्मा ) में पूर्ण अभेदता है । अपने आपको साधक परमात्मस्वरूप, असंग और व्यापक अनुभव करता है । इस तरह का स्वाभाविकं यथार्थ ( तत्व ) ज्ञान ही सहज ज्ञान है ॥ २६ ॥ संयम इति सावधानानां प्रस्फुरद्व्यापाराणां निजवर्तिनां संयमं कृत्वाऽऽत्मनि धीयत इति संयमः ॥ २७ ॥ १२८ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति
४. पञ्चम-षष्ठ उपदेश: पिण्ड-ब्रह्माण्ड समरसता, अवधूत-लक्षण एवं ग्रन्थ उपसंहार
सहज ज्ञान के उपरान्त संयम के क्रम का वर्णन किया जाता है । इन्द्रियाँ हमारे शरीर के कार्यों में अपने विषयों के ग्रहण में तत्पर रहती हैं । ( इन्द्रियों की विषयों में प्रवृत्ति स्वाभाविक है । ) निरन्तर विषय-ग्रहण-व्यापार में तत्पर इन्द्रियों तथा मन को विषयाभिमुख होने से निरुद्ध कर उन्हें आत्मा में—अखण्ड परमात्म स्वरूप में लगाना ही संयम कहा जाता है ॥ २७ ॥ सोपायमिति स्वयमेव प्रकाशमयं स्वेनैव स्वात्मन्येकीकृत्य सदा तत्त्वेन स्थातव्यम् ॥ २८ ॥ अब सोपाय का वर्णन किया जाता है । मैं स्वयमेव स्वप्रकाशस्वरूप ( द्वैताद्वैतविवर्जित अखण्ड परमात्मरूप ) हूँ—इस तरह परमात्मा में अपनी आत्मा को तत्त्वतः अभेद कर साधक को आत्मस्वरूप में स्थित रहना चाहिये । जिस ज्ञान से इस अखण्डस्वरूपता का बोध होता है, वही सोपाय ज्ञान है ॥ २८ ॥ अद्वैतमित्यकर्तृत्वेनैव योगी नित्यतृप्तो निर्विकल्पः सदा निरुत्थानत्वेन तिष्ठति ॥ २९ ॥ अब अद्वैत स्वरूपस्थितिका निरूपण किया जाता है । आत्मा न कर्ता है, न भोक्ता है, वह असंग, शून्य, निर्विकल्प है । इस तरह आत्मा की परमात्मा में —अखण्ड निरञ्जन परमेश्वर में अभेदता का स्थापन कर—निरुत्थान भाव से परमात्मस्वरूप में स्थित योगी नित्यतृप्त होता है; उस परमात्मस्वरूप में सदा अच्युत रहता है ॥ २६ ॥ सहजं स्वात्मसंवित्तिः संयमः स्वस्वनिग्रहः सोपायं स्वस्वविश्रान्तिरद्वैतं परमं पदम् ॥ ३० ॥ जीवात्मा और परमात्मा में सम्पूर्ण अभेदता है—इस तरह का ज्ञान ही सहज कहलाता है । इन्द्रियों सहित मन को आत्मा में प्रवृत्त करना—निग्रहीत करना ही संयम है । अपने सत्स्वरूप में स्थिति-—विश्रान्ति ही सोपाय है और अद्वैत स्वरूप ही परम पद है ॥ ३० ॥ सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ १२६
सद्गुरुका सेवन तज्ज्ञेयं सद्गुरोर्वक्त्रान्नान्यथा शास्त्रकोटिभिः । न तर्कशब्दविज्ञानान्नाचाराद्वेदपारगात् ।३१।। वेदान्तश्रवणान्नैव तत्वमस्यादिबोधनात् । न हंसोच्चारणाज्जीवब्रह्मणोरैक्यभावनातू ।३२।। न ध्यानान्नजपाल्लीनः सर्वज्ञः सिद्धिपारगः । स्वेच्छो योगी स्वयं कर्ता लीलया चाजरामरः ।।३३।। अवध्यो देवदैत्यानां क्रोडति भैरवो यथा । इत्येवं निश्चलो योऽसौ क्रमेणाप्नोति लीलया ।।३४।। असाध्याः सिद्धयः सर्वाः सद्गुरोः करुणां विना । अतस्तु गुरुरासेव्यः सत्यमीश्वरभाषितम् ।।३५।। इस परम पद का ज्ञान सद्गुरु (योगानुष्ठान में तत्पर मार्गदर्शक) के श्रीमुख से सदुपदेशामृत ग्रहण से ही प्राप्त होता है, चाहे करोड़ों शास्त्रों का अध्ययन किया जाय, चाहे साधक विज्ञान प्राप्त करे, चाहे अनेक तर्कों में निपुण हो, चाहे आचार में तत्पर हो, चाहे चारों वेदों में पारंगत हो, चाहे वेदान्तश्रवण में ज्ञाननिष्ठ हो, चाहे तत्वमसि आदि वाक्यों से आत्मतत्त्व में प्रबुद्ध हो, चाहे सोऽहं-सोऽहं-हंस मन्त्र (अजपा गायत्री) को सिद्ध कर ले, जीवात्मा-परमात्मा में अभेदता की अनुभूति करे, चाहे ध्यान लगाये, चाहे जप करे पर गुरु के उपदेश से ही योगी सिद्ध होता है, सर्वज्ञ होता है, सभी सिद्धियाँ उसके करतलगत हो जाती हैं, वह स्वयं कर्ता हो जाता है, अनायास अजर और अमर हो जाता है, वह सर्वत्र अभय हो जाता है, देवताओं और दैत्यों द्वारा वह अवध्य होता है। वह सर्वत्र भैरव- (साक्षात् भगवान् शिव-) रूप होकर विहार करता है । वह संशयरहित होता है और असाध्य सिद्धियों को अपने वश में कर लेता है । यह सब कुछ गुरु की कृपा के बिना असम्भव है, इसलिये (आदरपूर्वक प्रीतिपूर्वक) अच्छी तरह गुरु की शरण प्राप्त कर श्रद्धावान् होना चाहिये, ईश्वर (शिव) का यह कथन सत्य है, सत्य है ।। ३१-३५ ।। १३० ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति
प्रथमेत्वरोगतासिद्धिः सर्वलोकप्रियो भवेत् । कांक्षन्ति दर्शनं तस्य स्वात्मारूढ़स्य नित्यशः ॥३६॥ कृतार्थः स्याद् द्वितीये वै कुरुते सर्वभाषणम् । तृतीये दिव्यदेहस्तु व्यालैर्व्याघ्रैर्न बाध्यते ॥३७॥ चतुर्थे क्षुतृषानिद्राशीतातपविवर्जितः । जायते दिव्य योगीशो दूरश्रावी न संशयः ॥३८॥ वाक्सिद्धिः पञ्चमे वर्षे परकायप्रवेशनम् । षष्ठे न च्छिद्यते शस्त्रैर्वज्रपातैर्न भिद्यते ॥३६॥ वायुवेगो क्षितित्यागी दूरदर्शी स सप्तमे । अणिमादिगुणोपेतस्त्वष्टमे वत्सरे भवेत् ॥४०॥ नवमे वज्रकायः स्यात् खेचरो दिक्चरो भवेत् । दशमे पवनाद् वेगी यत्रेच्छा तत्र धावति ॥४१॥ सम्यगेकादशे वर्षे सर्वज्ञः सिद्धिभाग्भवेत् । द्वादशे शिवतुल्योऽसौ कर्त्ता हर्त्ता स्वयं भवेत् ॥४२॥ त्रैलोक्ये पूज्यते सिद्धः सत्यं श्रीभैरवो यथा ॥४३॥ सद्गुरु से दीक्षित होकर सदुपदेशग्रहणपूर्वक योगसाधना में तत्पर होने पर साधक पहले वर्ष में शरीर के मलादि दोषों से निर्मल होकर नीरोग हो जाता है और सभी लोगों के लिये समानरुप से प्रिय होता है । योग-साधना में तत्पर उस साधक के दर्शन की सब लोग इच्छा करते हैं । वह दूसरे वर्ष में (संकल्प- रहित होकर ) सफलमनोरथ हो जाता है और उसे सभी भाषाओं में बातचीत करने की शक्ति प्राप्त हो जाती है । तीसरे वर्ष में वह देहसिद्ध हो जाता हैं, उसका शरीर दिव्यतेज से सम्पन्न हो जाता है, और सर्प-व्याघ्र आदि पशु उसके समक्ष अहिंसक हो जाते हैं, उसे किसी भी तरह की बाधा नहीं पहुँचाते हैं । चौथे वर्ष में वह योगसाधक भूख-प्यास, जाड़ा-गरमी आदि द्वन्द्वों से ऊपर उठ जाता है और दूर स्थान पर होने वाले शब्दों को सुनने लगता है, इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है । पाँचवें वर्ष में वह वाक्सिद्ध हो जाता है—वह जो कुछ भी कहता है, वह सत्य होता है और वह दूसरे के शरीर में प्रवेश करने की सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ १३१
सामर्थ्य प्राप्त कर लेता है—दूसरे के मृतशरीर में प्रवेश कर उसे प्राणान्वित कर देता है। छठें वर्ष में उसका शरीर इतना पुष्ट हो जाता है कि किसी भी प्रकार के शस्त्र तथा वज्रपात आदि से प्रभावित नहीं होता है। वह आसन पर बैठे-बैठे पृथ्वीतल से ऊपर उठ जाता है और वायुके समान वेग धारण कर इस तरह सातवें वर्ष में आसमान में उड़ने लगता है। आठवें वर्ष में वह अणिमा आदि सभी सिद्धियों से सम्पन्न हो उठता है और नौवें वर्ष में उसका शरीर वज्र के समान हो जाता है, वह आकाश और अनेक दिशाओं में भ्रमण करने में समर्थ होता है। दशवें वर्ष में वह स्वेच्छा से पवन के वेग के समान अभीष्ट स्थान में शीघ्रातिशीघ्र पहुँच जाता है। ग्यारहवें वर्ष में वह सर्वज्ञ और समस्त सिद्धियों का स्वामी हो जाता है। बारहवें वर्ष में वह साक्षात् शिव के समान जगत् को रचने और उसका संहार करने की सामर्थ्य से युक्त होता है। वह योगसिद्ध पुरुष भैरव के समान तीनो लोकों में पूज्य होता है ॥ ३६-४३ ॥ एवं द्वादशवर्षैस्तु सिद्धयोगी महाबलः । जायते सद्गुरोः पादप्रभावान्नात्र संशयः ॥४४॥ बारह वर्षों में सद्गुरु के शरणापन्न होकर योगाभ्यास करने से साधक सिद्धयोगी होकर शिवस्वरूप हो जाता है, इसमें संशय नहीं है ॥ ४४ ॥ अनुबुभूषितयोनिजविश्रमं स गुरुपादसरोरुहमाश्रयेत् । तदनुससरणात्परमं पदं, समरसोकरणं न च दूरतः ॥४५॥ जो योगसाधक शान्ति-मुक्ति चाहता है, जो मोक्ष का अनुभव करना चाहता है, उसे गुरु के चरण-कमल का आश्रय ग्रहण करना चाहिये । सद्गुरु के अनुग्रह से योगसाधन में तत्पर होने से उसे पिण्डसिद्धि ( अपने पिण्ड में परपिण्ड-परमात्मरूप की अखण्ड व्यापकता की अनुभूति ) और परम पद की प्राप्ति सहज सुलभ हो जाती है ॥ ४५ ॥ गुरुकुलसन्तान गुरुकुलसन्तानं पञ्चधा प्रोक्तम् । आईसन्तानं विलेश्वर सन्तानं, विभूतिसन्तानं, नाथसन्तानं. योगेश्वरसन्तानञ्चे त्येषामपि सन्तानानां पृथक् पृथक् वैशिष्ट्यं वर्तते ॥ ४६ ॥ १३२ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति
योगमहाज्ञान के उपदेष्टा सिद्धगुरुओं की सन्तान ( वंश ) -परम्परा का वर्णन किया जाता है । यह पाँच प्रकार का वर्णन किया जाता है । यह पांच प्रकार की है । आई नाम विमला शक्ति का है, यह आईनाथ या उदयनाथ से सम्बद्ध है, आई शिष्य को ही आईसन्तान-परम्परा से अभिहित किया जाना है । दूसरी परम्परा विलेश्वर गुरु की है । ( यद्यपि इस परम्परा में दीक्षित शिष्य दिगम्बर होते हैं—वस्त्र तक नहीं धारण करते तथापि अपने उपदेशामृत से श्रद्धालु अधिकारी व्यक्तियों को दीक्षित करते हैं । तीसरी परम्परा उन सिद्ध गुरुओं की है, जो विभूति धारण करते हैं, उनके द्वारा दीक्षित शिष्य विभूति- सन्तान कहे जाते हैं । चौथी परम्परा नाथयोग के सिद्ध गुरुओं की है, समस्त प्रपंचों से अतीत नाथतत्व की दीक्षा से दीक्षित शिष्य नाथसन्तान कहे जाते हैं । पाँचवीं परम्परा योगीश्वर सन्तान के रूप में विख्यात है । व्यापक, असंग अलख-निरञ्जन तत्वस्वरूप में लय को प्राप्त योगीगुरु शिष्यों की योग्यता के अनुरूप सदुपदेश प्रदान करते हैं । ऐसे शिष्य योगीश्वर-सन्तान के रूप में प्रसिद्ध हैं । इन पाँचों परम्पराओं की पृथक्-पृथक् विशेषताएं हैं ॥ ४६ ॥ परमार्थतः सर्वं पाञ्चभौतिकं न जाताः पुरुषाः सम्बोधमात्रैकरूपः शिवस्तदितरत्सर्वमज्ञानमव्यक्तं भवति तत्र शिवस्तु ज्ञानम् ॥ ४७ ॥ परमार्थ के स्तर पर विचार करने से पता चलता हैं कि संसार की समस्त वस्तुएँ पाञ्चभौतिक हैं, पाँच तत्वों से उत्पन्न हैं । ( इस तरह गुरुप्रणाली भी पाँच रूपों में विभक्त है । ) जीवात्मा—पुरुष आत्मा की उत्पत्ति नहीं होती ( क्योंकि जिसकी उत्पत्ति होती है, उसका नाश भी होता है ), यह आत्मा सद्ज्ञानस्वरूप शिव है, शिव से इतर सब कुछ अज्ञान है, अज्ञान-अव्यक्त माया से बोधित यह जगत् प्रपञ्च मात्र है । एक मात्र शिव ही अखण्ड ज्ञानस्वरूप व्यापक परमात्मा हैं ॥ ४७ ॥ एतेषामपि सन्तानानां केचित्स्वपराङ्मुखा वेशमात्रसम्पन्नाः क्रयविक्रयादिकं कुर्वन्ति सन्तानभेदं प्रत्यन्योन्यमधः कुर्वन्ति योगमार्गं द्वेषयन्ति ॥ ४८ ॥ सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ १३३
इन योगी-सन्तानों में अनेक आत्मविमुख होकर जगत् के व्यापार ( लेन- देन, संग्रह, त्याग आदि प्रपंच ) में तत्पर रहते हैं, केवल वेशमात्र धारण कर योगी कहलाते हैं। इस तरह परस्पर एक-दूसरे को नीचा दिखाते हैं और योगमार्ग से द्वेष करते हैं ॥ ४८ ॥ रजसा घोरसंकल्पाः कामुका अतिमन्यवः । दाम्भिका मानिनः पापाधिककुर्वन्तीश्वरप्रियान् ॥ ४६ ॥ साधुसङ्गमसच्छास्त्रपरमानन्दलक्षितान् । स्वेच्छाचारविहारैकज्ञानविज्ञानसंयुतान् ॥ ५० ॥ यूयं शिष्टा वयं दुष्टा दुष्टा यूयं वयं तथा । एव वदन्ति चान्योन्यं प्रमोहेन निरन्तरम् ॥ ५१ ॥ इस तरह सन्मार्ग—योगमार्ग से भ्रष्ट योगी रजोगुणी होते हैं और भयानक से-भयानक संकल्पों की पूर्ति और कामनाओं की सिद्धि में लगे रहते हैं, वे बड़े क्रोधी, दाम्भिक और अभिमानी होते हैं, ऐसे पापात्मा परमात्मा के शरणागत, संत के संग और सच्छास्त्रों के अध्ययन में आनन्द लेने वाले, अखण्ड आत्मस्वरूप में रमण करने वाले आत्मज्ञानी और परमात्मतत्त्व के विज्ञानियों की निन्दा करते हैं कि आप अपने को शिष्ट और हमें दुष्ट समझते हैं, पर वास्तव में ( सज्जन के वेष में ) आप ही दुष्ट और हम लोग शिष्ट हैं; इस तरह अज्ञानी की तरह वे आपस में एक-दूसरे की निन्दा करते रहते हैं ॥ ४६-५१ ॥ पृथ्विजलं तथा वह्निर्वायुराकाशमेव च । एते सन्तानोदयास्तु सम्यगेव प्रकीर्तिताः ॥ ५२ ॥ शक्तिसम्वलित शिव की स्वप्रकृति से पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश- रूप में पाँच सन्तानों की उत्पत्ति का ही वर्णन उपलब्ध होता है ॥ ५२ ॥ काठिन्यं चार्द्रता तेजो धावनं स्थिरता खलु । गुणा एते च पञ्चैव सन्तानानां क्रमात्स्मृताः ॥ ५३ ॥ ब्रह्माविष्णुश्चरुद्रश्च ईश्वरश्च सदाशिवः । एताश्च देवताः प्रोक्ता सन्तानानां क्रमेणु तु ॥ ५४ ॥ १३४ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति
पृथ्वी का गुण कठोरता है, जल का गुण आर्द्रता है, अग्नि का गुण तेज है, वायु का गुण सञ्चरण है और आकाश का गुण अचलता स्थिरता है। ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, ईश्वर और सदाशिव ही इनके पाँच अधिष्ठातृ देवता हैं । ये पाँच गुरुसन्तान के रूप में यथाक्रम ( उपास्यरूप में ) वर्णित हैं । ( आदिनाथ शिव ही परम गुरु हैं, उन्हीं की सन्तान के रूप में इन पाँच गुरुवंश-परम्परा का वर्णन किया गया है । ) यही पाँचों गुरुसन्तानों का यथार्थ रूप में अवस्थाभेद से वर्णन है ॥ ५४ ॥ स्थूलसूक्ष्मकारणतुर्यं तुर्यातीतमिति पञ्चावस्थाः क्रमेण लक्ष्यन्ते । एतेषामपि सर्वेषां विज्ञाता यः स योगी सिद्ध पुरुषः स योगीश्वरेश्वर इति परमरहस्यं प्रकाशितम् ॥ ५५ ॥ स्थूल, सूक्ष्म, कारण, तुर्य और तुर्यातीत पाँच अवस्थायें हैं । ( इन्हें योग की सात भूमिकाएँ कही गयी हैं, नित्यानित्य वस्तु के विवेकपूर्वक तीव्र मुमुक्षारूप शुभेच्छा पहली भूमिका है । गुरुमन्त्र प्राप्त कर उपनिषद् तथा योगशास्त्र के अध्ययन में प्रवृत्तिमूलक विचारणा दूसरी अवस्था है । आसन, प्राणायाम तथा निदिध्यासनपूर्वक आत्मस्वरूप में प्रवृत्ति तनुमानसा नाम की तीसरी अवस्था है । समस्त जगत् में आत्मरूपता का ग्रहण सत्त्वापत्ति नाम की चौथी अवस्था है । विश्वप्रपञ्च में सम्पूर्ण अनासक्ति और अद्वैत स्वरूप में स्थिति असंसक्ति नाम की पाँचवीं अवस्था है । स्वरूपानन्द की प्राप्ति पदार्थाभाविनी नाम की छठी भूमिका है, कैवल्यावस्था की प्राप्ति तुर्यगा नाम की सातवीं भूमिका है । ) इन पाँचों अवस्थाओं का मर्मज्ञ योगी, सिद्धपुरुष, योगीश्वरेश्वर कहलाता है । इस तरह परम रहस्य का प्रकाशन किया गया ॥ ५५ ॥ अतएव सम्यग् निजविश्रान्तिकारकं महासिद्धयोगिनं सद्गुरुं सेवयित्वा सम्यक् सावधानेन परं पदं सम्पाद्य तस्मिन्निजपिण्डे च समरसभावं कृत्वात्यन्तनिरुत्थानेन सर्वानन्दत्वे निश्चलं स्थातव्यं ततः स्वयमेव महासिद्धो भवतीति सत्यम् ॥ ५६ ॥ योगसाधक को चाहिये कि वह मोक्षस्वरूप-प्रदान करने वाले महासिद्धयोगी सद्गुरु से सदुपदेश ग्रहण कर अत्यन्त सावधान होकर परमपद का ज्ञान प्राप्त करे सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ १३५
और उस परमपदरूप में अपने व्यष्टि-पिण्ड में व्याप्त आत्मा का सामरस्य— ऐक्य स्थापित कर उस अद्वैत स्वरूप में सच्चिदानन्दघन अखण्ड परमात्मा में स्थित हो जाय । इस तरह परमपद में स्वरूपावस्था की प्रतिष्ठा से वह स्वयं महासिद्ध—परमतत्वज्ञ योगी हो जाता है ।। ५६ ।। न विधिर्नैव वर्णश्च न वर्ज्यावर्ज्यकल्पना । न भेदौनिधनं किञ्चिन्नाशौचं नोदकक्रिया ।। ५७ ।। योगीश्वरेश्वरस्यैव नित्यतृप्तस्य योगिनः । वित्स्वात्मसुखविश्रान्तिभावलब्धस्य पुण्यतः ।। ५८ ।। सम्यक्स्वभावविज्ञानात् क्रमाभ्यासान्नचासनात् ! न वैराग्यान्ननैराश्यान्नाहारात्प्राणधारणात् ।। ५६ ।। न मुद्राधारणाद्योगान्मौनकर्मसमाश्रयात् । न विरक्तौ वृथायासान्न कायक्लेशधारणात् ।। ६० ।। न देवार्चनाश्रयाद् भक्त्यानाश्रमाणाञ्च पालनात् । न षड्दर्शनकेशादिधारणान्न च मुण्डनात् ।। ६१ ।। न जपान्न तपोध्यानान्न यज्ञतीर्थसेवनात् । नानन्तोपाययत्नेभ्यः प्राप्यते परम पदम् ।। ६२ ।। योगीश्वर, आत्मस्वरूपानन्द में स्वस्थ योगी को मोक्षरूप स्वरूपावस्थिति विश्रान्ति के पुण्य से आत्मस्वभावपरक सूक्ष्म ज्ञान से परमपद की प्राप्ति होती है, उसके लिये विधि—शास्त्रनिर्दिष्ट नियमपालन, वर्ण की मर्यादा और संकल्प (यह करना चाहिये, यह नहीं करना चाहिये ) अशौच, तर्पण-क्रिया, जन्म- मरण के संस्कार आदि की आवश्यकता नहीं होती है । क्रमपूर्वक योगाभ्यास, आसन, वैराग्य, अनासक्तिभाव (नैराश्य), आहार, प्राणायाम, मुद्रा-धारणा- योग, मौन के अभ्यास, विशेष कर्म के आचरण, वैराग्य, व्यर्थ परिश्रम, शरीर को उपवास आदि से संयमित करने, इष्ट देव की अर्चना, भक्ति और आश्रम धर्म के पालन, छः दर्शन, केशादिधारण, मुण्डन, जप, तप, ध्यान, यज्ञ, तीर्थसेवन, अनन्त-असंख्य उपायों से भी परमपद की प्राप्ति नहीं होती है ।। ५७-६२ ।। एतानि साधनानि सर्वाणि दैहिकानि परित्यज्य परम- पदेऽदैहिके स्थीयते सिद्धपुरुषैरिति ।। ६३ ।। १३६ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति
( उपर्युक्त ) ये सभी सधान देह से साध्य हैं । इनमें आसक्त न होकर सिद्ध पुरुष आत्मस्वरूप परम पद में ही स्थित रहते हैं ॥ ६३ ॥ विशेष—स्वरूपावस्थिति के लिये इन दैहिक साधनों का अभ्यास सार्थक है अन्यथा ये सब-के-सब निरर्थक हो जाते हैं । गुरु की प्रसन्नता और परमपद तत् कथं गुरुदृक्पातात् प्रायो दृढानां सत्यवादिनां सा स्थितिर्जायते ॥ ६४ ॥ कथनाच्छक्तिपाताद्वा यद्वापादावलोकनात् प्रसादात्स्वगुरोः सम्यक् प्राप्यते परमं पदम् ॥ ६५ ॥ उस अखण्ड आत्मस्वरूप परम पद की प्राप्ति किस तरह होती है । सत्योन्मुख--सत्स्वरूप के इच्छुक दृढ़—योगाभ्यासमें विधिपूर्वक स्थित योगसाधकों में—प्रायः योग्यपात्रों में परम पद की स्थिति उत्पन्न होती है । गुरु के उपदेशामृत से, गुरुद्वारा सूक्ष्म धरातल पर शिष्य में शक्ति के संचार ( शक्तिपात ) से तथा शिष्य के प्रति गुरुकी सर्वांग में करुणामयी दृष्टि ( अवलोकन ) से उन्हीं के प्रसाद ( अनुग्रह ) से परमपद की प्राप्ति होती है ६४-६५ अतएव शिवेनोक्तम् । न गुरोरधिकं न गुरोरधिकं न गुरोरधिकं न गुरोरधिकं शिवशासनतः शिवशासनतः शिवशासनतः शिवशासनतः ॥ ६६ ॥ शिवका कथन है कि परम पद की प्राप्ति में गुरु के अनुग्रह से बढ़ कर दूसरा कोई उपाय नहीं है, नहीं है । यह साक्षात् शिवका आदेश है, शिवका-आदेश है, शिवका आदेश है, शिवका आदेश है ॥ ६६ ॥ वाङ्मात्राद्वाथदृक्पाताद् य करोतिच तत्क्षणात् । प्रस्फुटं शाम्भवं वेद्यं स्वसंवेद्यं परं पदम् ॥ ६७ ॥ सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ १३७
करुणाखण्डपातेनच्छित्त्वा पाशाष्टकं शिशोः । सम्यगानन्दजनकः सद्गुरुः सोऽभिधीयते ॥ ६८ ॥ जो केवल उपदेश मात्र से अथवा.कृपामयी दृष्टि से करुणा की अखण्ड वृष्टि करते हुए शिवस्वरूप ( शाम्भव ) स्वसंवेद्य परम पद को प्रकाशित कर शिष्य के आठ पाशों ( जरा, जन्म, मृत्यु, व्याधि, काम, क्रोध, मोह, अविद्या—अहंकार ) का नाश कर देता है और स्वरूपानन्द में प्रतिष्ठित कर देता है, वही सद्गुरु कहा जाता है ॥ ६७-६८ ॥ निमिषार्धार्धपाताद् वा यद्वापादावलोकनात् । स्वात्मानं स्थिरमाधत्ते तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥ ६९ ॥ जो केवल निमिष के लेशमात्र से ही शक्तिपात के द्वारा अथवा करुणापूर्वक अवलोकन कर शिष्य को आत्मस्वरूप—परमपद में स्थिर (अधिष्ठित) कर देता है, उस गुरु को नमस्कार है ॥ ६६ ॥ नानाविकल्पविश्रान्ति - कथया कुरुते तु यः । सद्गुरुः स तु विज्ञेयो न तु मिथ्याविडम्बकः ॥ अतएव परमपदप्राप्त्यर्थं स सद्गुरुः सदा वन्दनीयः ॥ ७० ॥ जो अपने सद्ज्ञानामृत से ( साधक के अथवा शिष्यके हृदय में स्थित ) विश्वप्रपंचरूपविश्रान्ति—सांसारिक मोहजालका नाश कर देता है, वही सद्गुरु है । संसारके रमणीय विषयभोग में शिष्य को व्यामोहित कर असत्स्वरूप में स्थित करने वाला गुरु नहीं हो सकता है । अतएव परमपद को प्राप्त करानेवाले सद्गुरु की ही वन्दना करनी चाहिये ॥ ७० ॥ गुरुरिति गृणाति शं सम्यक् चैतन्यविश्रान्तिमुपदिशति विश्रान्त्या स्वयमेव परात्परं परमपदमेव प्रस्फुटं भवति तत्क्षणात् साक्षात्कारो भवति ॥ ७१ ॥ गुरु ( शिष्य के अज्ञान-अन्धकार का नाश कर उसे ) कल्याण प्रदान करता है । चैतन्यस्वरूप में प्रतिष्ठित होने का, परमपद में स्थित होने का १३८ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति
सदुपदेश प्रदान करता है। इस तरह चैतन्यस्वरूप में विश्रान्ति के फलस्वरूप परमपद प्रस्फुटित प्रकाशित—होता है और शिष्य ( गुरु के अनुग्रहसे ) अखण्ड अनन्त, अलख-निरञ्जन परमशिव का साक्षात्कार करता है ॥ ७१ ॥ अतएव महासिद्धानां मते प्रोक्तं वाङ्मात्रेण सम्यगवलोकनेन वा तत्क्षणान्मुहुर्विश्रान्तियुक्तं करोतीति यः स सद्गुरुर्भवति । नोचेन्निजविश्रान्ति विना पिण्डपदयोः समरसकरणं न भवतोति सिद्धान्तस्तस्मान्निजविश्रान्तिकारकः सद्गुरुरभिधीयते नान्यः । पुनर्वागादिशास्त्रदृष्ट्यनुमानतर्क मुद्रया भ्रामको गुरुस्त्याज्यः ॥ ७२ ॥ योगज्ञान में सन्निष्ठ महासिद्धों के मत में कहा गया है कि केवल सदुपदेशमात्र से अथवा कृपामय कटाक्षपात से तत्काल ही सद्गुरु अपने शिष्य को स्वरूपावस्थिति—परमात्मनिष्ठा से संयुक्त कर देता है, अन्यथा बिना परमात्मनिष्ठा के पिण्डपद ( व्यष्टिशरीर में व्याप्त अखण्ड ज्ञानस्वरूप आत्मा और सकल ब्रह्माण्ड में व्याप्त परमात्मा ) से सामरस्य—अभेदतानुभूति सम्भव ही नहीं है, यह सिद्धान्त है । अतएव जो स्वरूपावस्थिति--परमात्मनिष्ठा ( निजविश्रान्ति ) से शिष्य को कृतार्थ कर देता है, वही सद्गुरु कहलाता है । वाग्जाल—शास्त्र की दृष्टि से तर्क, अनुमान आदि मुद्रा से भ्रमित कर शिष्य को सांसारिक विषय-प्रपञ्च में व्यामोहित करनेवाले गुरु का त्याग कर देना चाहिये, ऐसा गुरु निजस्वरूपस्थिति नहीं प्रदान कर सकता है ॥ ७२ ॥ ज्ञानहीनो गुरुस्त्याज्यो मिथ्यावादीविडम्बकः । स्वविश्रान्तिं न जानाति परेषां स करोति किम् ॥ ७३ ॥ जिसे योगविषयक ज्ञान नहीं है, जो शिष्यों को वाग्जाल में उलझा कर उन्हें दिग्भ्रमित करता है, जो आत्मप्रवञ्चक ( विडम्बनायुक्त ) है, वह गुरु नहीं है, वह त्याज्य है ( उससे दीक्षा नहीं ग्रहण करनी चाहिये ) । वह स्वयं जब अपनी स्वरूपस्थिति—परमात्म निष्ठा से अनभिज्ञ है तो दूसरों को किस तरह सन्मार्ग-दर्शन करा सकता है—आत्मज्ञान प्रदान कर सकता है ॥ ७३ ॥ सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ १३६
शिलया किं परं पारं शिलासंघः प्रतार्यते । स्वयंतीर्णो भवेद्योऽसौ परान्निस्तारयत्यलम् ॥ ७४ ॥ जिस तरह (नदी के प्रवाह में) पड़ी शिला (धारामें प्रवाहित) अन्य शिलाओं को वहाकर उस पार उन्हें नहीं उतार सकती, उसी तरह जो स्वयं पार होने में , असमर्थ है, वह दूसरों को पार नहीं कर सकता है अथवा तारने में असमर्थ है । जो स्वयं तर जाने में समर्थ है, वही दूसरों को भी पार उतार सकता है ॥ ७४ ॥ विकल्पसागराद् घोराच्चिन्ताकल्लोलदुस्तरात् । प्रपञ्चवासन!दुष्टग्रहजालसमाकुलात् ॥ ७५ ॥ वासनालहरीवेगान्न स्वं तारयितुं क्षमः । स्वस्थेनैवोपदेशेन निरुत्थानेन तत्क्षणात् ॥ ७६ ॥ तारयत्येवदृक्पातात् कथनाद्वा विलोकनात् । तारिते स्वपदं धत्ते स्वस्वमध्ये स्थिरो भवेत् ॥ ७७ ॥ यह संसार एक दुस्तर सागर है, विषयवासनारूप संकल्प-विकल्पस्वरूप चञ्चलता से उद्वेलित है, यह बड़ा भीषण है, चिन्ता की लहरियाँ इसमें निरन्तर उठती रहती हैं, यह दुष्ट ग्राहों से पूर्ण जालरूप ममता-मोह आदि से आकुल है, विषय-वासनायें ही इसमें लहरियाँ हैं । इस संसार-सागर को जो तैर कर पार उतरने में समर्थ नहीं है, वह किस तरह दूसरों को पार उतार सकता है । जो अपने अखण्ड आत्मस्वरूपमें स्थित है, वही निरुत्थान ( जीवात्मा—परमात्मा में सामरस्य ) स्थापित कर शिष्य को सदुपदेश प्रदान कर कृपामयी दृष्टिपात कर अथवा ज्ञान प्रदान कर तारने में--भवसागर से पार उतारने में समर्थ है । वह स्वरूपस्थिति से परम पद में अपने अखण्ड आत्मस्वरूप में स्थिर हो जाता है, शिष्यको भवसागर से पार उतार देता है ॥ ७७ ॥ ततः स मुच्यते शिष्यो जन्मसंसारबन्धनात् । परानन्दमयोभूत्वा निष्कलः शिवतां व्रजेत् । ७८ ॥ कुलानां कोटिकोटीनां तारयत्येव तत्क्षणात् । अतस्तु सद्गुरुं साक्षात् त्रिकालमभिवन्दयेत् ॥ ७६ ॥ १४० ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति