सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)
Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा
से प्राप्त शेषित करने पर लब्धि = ३ । गुणांक = १ का वर्ग = १ को प्रकृति ६७ में कम करने से गुण - १, करने से ६७ - १ = ६६ यहाँ अल्प शेष होना चाहिए अधिक शेष होने से क्रिया गौरव होता है । अतः इष्ट = २ की कल्पना से लब्धि ः - ५ + - २ = ७ (७)² = ४९ प्रकृति ६७ में कम करने से ६७ - ४९ = १८, क्षेप = ३ से भाग देने पर लब्धि - ६ = क्षेपक होता है । गुण का वर्ग प्रकृति में घट गया है इसलिए प्र० - गु०² = शेष धनात्मक का मान यहाँ पर धनात्मक - ६ = + ६ और लब्धि - ५ = कनिष्ठ हो जाता है । - ५ का घनत्व और ऋणत्व से कोई विकार नहीं है अतः गुण लब्धि = - ५, गुणक ७ का वर्ग = ४९ को प्रकृति ६७ लब्धि में घटाने से शेष = १८ होता है । शेष में - ३ से भाग देने से + ६, - ५ का वर्ग = २५ से गुणित करने पर १६७५, में क्षेप ६ जोड़ने से १६८१ का मूल = ४१ = ज्येष्ठमूल होता है । अतः पुनः कुट्टक के लिए भाज्य = ५, हार = ६, क्षेप = ४१ बल्ली = १ लब्धि = ११ ° १ गुणक = ५ गुणक का वर्ग (५)² = २५, प्रकृति = ६७ में कम करने से शेष = ४२ में क्षेप से भाग देने पर लब्धफल = ७ प्रकृति में घटने पर व्यस्त चिह्न, धन हो तो ऋण और ऋण हो तो धन हो जाने से फल, ७ ऋण हुआ, अतः कनिष्ठ = ११ ज्येष्ठ = ९०, क्षेप = ७ फिर से कुट्टक करने से— भा० = ११, हा० = - ७, क्षेप = ९० उक्त रीति से गुण = ५ बल्ली विषम है । अतः गुण = ७ - ५ = गुण = २, क्षेप = - ७, को - १ से गुणा करने पर - ७ × - १ = + ७, × + क्षेप = ७ + २ = ९ (९)² = ८१, प्रकृति ही ६७ पर घट रही है, अतः ८१ - ६७, १४ में क्षेप से भाग देने पर = १४ / - ७ = - २, लब्धि, और २७ = कनिष्ठ पुनः कुट्टक से— क = २७, ज्ये० २२१, क्षेप = - २ क = २७, ज्ये० २२१, क्षेप - २ क २७ × २२१ + २२१ × २७ = ११९३४ । क्षेप = + ४ । ज्ये०, प्र० (२७ × २७) ६७ + २२१ × २२१ = ९७६८४ और क्षेप = - २ × - २ = ४ स्पष्टता से कनिष्ठ = ११९३४ ज्येष्ठ = ९७६८४ और क्षेप = ४ । इष्ट कल्पना = २ का वर्ग ४ = से क्षेप में भाग देने से ४ ÷ ४ = १ तथा कनिष्ठ / २ = कनिष्ठ ५९६७, तथा ज्येष्ठ / २ = ज्येष्ठ = ४८८४२ और क्षेप ४ ÷ ४ = १ इस प्रकार ५९६७ के वर्ग को ६७ से गुणा कर १ जोड़ने से उस वर्गाङ्क संख्या का मूल ४८८४२ होगा । और भी अनेक उत्तर होते हैं । विशेष सूत्र—“रूप शुद्धौ खिलोद्दिष्टं वर्गयोगो गुणो न चेत्” ऋण १ क्षेप में गुणक संख्या किन्हीं दो वर्गों के = योग तुल्य होनी चाहिए, यदि प्रकृति दो वर्गों का योग नहीं है तो ऐसा प्रश्न अशुद्ध समझना चाहिए । उदाहरण से—
( २३ ) वह कौन सा वर्ग है जिसे १३ से गुणा कर १ जोड़ देने से प्राप्त अंक का मूल मिल जाता है । प्रकृति १३ है । जो (२)² + (३)² = ४ + ९ दो वर्गाङ्कों को योग तुल्य है अतः प्रश्न सही है । दोनों वर्गाङ्कों ४, ९ के मूलों २, ३ से १ में भाग देने पर ऋण १ में कनिष्ठ पद = १/२, अतः १/२ का वर्ग = १/४ को प्रकृति १३ से गुणा करने पर १/४ × १३ = १३/४ इसमें ऋण १ क्षेप कम करने से १३/४ - १ = ९/४ का मूल ३/२ यह ज्येष्ठ का मान है । इष्ट ३ से १ में भाग देने से १/३ कनिष्ठ, १/३ का वर्ग = १/९ को १३ से गुणा करने पर १३/९ में ऋण १ कम करने से ४/९ का मूल = २/३ यह ज्येष्ठ का मान भी होता है । अथवा कनिष्ठ १ के वर्ग को १३ से गुणा कर ४ कम कर मूल लेने से क० = १, ज्ये० ३, क्षे० ४, यहाँ पर इष्ट = यदि २ का वर्ग = ४ अतः क ३/२ ज्ये० ३/२, क्षे० = - १ । यदि प्रकृति १३ में - ९ = ४ का मूल २ से १ में भाग देने से क० १/२, ज्ये० ३/२, क्षे० - १ कुट्टक रीति से भाज्य = १ हा० = - १, क्षे० = ३/२ तीनों में ३/२ का अपवर्तन देने से भा० = १, हा० - २, क्षे०, ३ अतः कुट्टक से ल० = १, गु० = २, यहाँ पर १ इष्ट मानकर गुण ३ गुणवर्ग (३) अतः १३ - ९ = क्षेप = ४ = कनिष्ठ वर्ग (३)² को प्रकृति १३ से गुणा कर ४ जोड़ने से = १२१ का मूल ११ = ज्ये० । क० ३ ज्ये० ११ क्षे० = ४ भा० = ३ क्षे० ११ और हा० = ४ पूर्ववत् क० = ५ ज्ये० = १८ क्षे० = १ इस प्रकार अनेक अनन्त उत्तर होते हैं । इस प्रकार उक्त कुट्टक, वर्ग प्रकृति और चक्रवाल गणित का यत्र-तत्र सर्वत्र ग्रह गणित में अति आवश्यक उपयोग होता है जिसको संक्षेप से आवश्यक समझ कर यहाँ पर प्रदर्शित किया गया है । इस बीजगणित के उत्तरार्द्ध में भी कुट्टक गणित का उपयोग यथा स्थान आगे भी आ रहा है जो दिखाया जायगा । श्री भास्कराचार्य एवं तत्पूर्ववर्ती आचार्यों ने अव्यक्त पदार्थों की अव्यक्त कल्पना के लिए यावत् = या. तावत् - ता. कालक = का. नीलक = नी. पीतक = पी. लोहितक = लो. श्वेतक = श्वे. हरितक - ह. अभ्रक = अ. इत्यादि संकेत दिये हैं । आधुनिक गणित सागर के गाताखार अव्यक्त मात्र कल्पना के लिए, A, B, C, D, E, F इत्यादि या अ, ब, क, ल, ह, च... इत्यादि वर्णों के मान से अव्यक्त अर्थात् अज्ञात पदार्थों की कल्पना करते हैं ।
( २४ ) सौकर्य के लिए वस्तुतः लिपियों के परिणाम दोनों या अनेकों अव्यक्त कल्पनाओं में बात एक है भी तो प्राचीन आचार्यों की अव्यक्त कल्पना सविशेष महत्त्व की इसलिये है कि प्राचीनों से सप्त सारथिः, सात बार, सात प्रकार के रंग लाल, पीला, हरा, श्वेतादि सम्बन्धित कालक, पीतक, श्वेतक, इत्यादि रंग बोधक कल्पना की गई है । भास्करीय बीजगणित के एक वर्ण समीकरण से प्रश्न का हल एक प्रश्न है कि—एक पुरुष का धन ३०० रु० और ६ घोड़े की पूंजी है तथा दूसरे पुरुष के पास १० घोड़ों के साथ १०० रु० कर्ज (ऋण) देना है दोनों अर्थ विनिमय से तुल्य हैं तो अश्व (घोड़ों) का मूल्य क्या होगा ? घोड़ों का मूल्य अज्ञात होने से अव्यक्त कल्पना करते हैं अश्व (घोड़े) का मूल्य, जैसे, घोड़े का मूल्य = य रुपया है अतः प्रश्न के अनुसार— प्रथम का धन = ६ य + ३०० रु० ⎫ दोनों तुल्य धनी हैं अतः धनात्मक दूसरे का धन - १० य - १०० रु० ⎬ ६ य को धनात्मक १० य में शोधन ६ य - ३०० = १०० य - १०० ⎭ करने से ६ य का मान ऋणात्मक हो जाने से १० य - ६ य, ४ य = ३०० + १०० = ४०० इस प्रकार ४ य = ४०० अतः य = ४००/४ = १०० = अश्व का मूल्य होता है । अतः य का अव्यक्त मान १०० रु० होने से प्रथम पुरुष का धन = ९०० के तुल्य द्वितीय का भी धन ९०० दोनों तुल्य धन हो जाते हैं । और भी प्रश्न है—समतल समान भूमि में ३२ हाथ का एक बाँस खड़ा है वायु वेग से यह एक जगह से टूट कर मूल से अग्रभूमि १६ हाथ की दूरी पर लग गया तो बताओ बाँस अपने मूल से आगे कितने हाथ की दूरी पर टूटा था ।
[चित्र विवरण]
- शीर्ष बिन्दु: ब
- सम्पूर्ण ऊँचाई: ३२ हाथ
- टूटने का स्थान: त्रुटित=त्रु
- टूटा हुआ भाग (कर्ण): २०
- शेष सीधा भाग (लम्ब): य १२
- बाँस का आधार (पाद बिन्दु): मू
- आधार से अग्रभाग की दूरी (भूमि): १६ हाथ
- अग्र बिन्दु: अग्र=अ
यहाँ प्रस्तुत पृष्ठ का पंक्ति-दर-पंक्ति लिप्यन्तरण (transcription) दिया गया है:
( २५ ) कल्पना किया मू बं = ३२ हाथ । त्रु = मू अ त्रिभुज में मू त्रु = य अतः त्रु अ = ३२ - य । अतः भु² + को² = कर्ण² से, भुज² = (१६)² = २५६ होता है । तथा (३२ - य)² = १०२४ - ६४ य + य² + (१६)² नियमतः य² + २५६ = १०२४ - ६४ य + य² अतः ६४ य = ७६८ ∴ य = १२ मू त्रु उत्थापन से ३२ हाथ का बांस मूल से १२ हाथ की दूरी पर टूट कर ३२ - १२ = २० हाथ के तुल्य कर्ण का मान होता है । बीजगणित में वर्गात्मक अव्यक्त राशियों का गणित किसी भ्रमर झुण्ड के आधे का मूल मालती पुष्प में, समग्र भ्रमर झुण्ड का ८/९ अलिनी पुष्प में, शेष एक भ्रमर अपनी भ्रमरी की खोज में रात्रि में कमल पुष्प के निरुद्ध होने पर बारम्बार से रातभर अपनी नायिका का द्वार खटखटाता रहा, और
( २६ ) जैसे प्रथम पक्ष में २ य² है अतः २ × ४ = ८ से दोनों पक्षों को गुणा करने से तथा व्यक्त ( ९ )² = ८१ दोनों पक्षों में जोड़ने से १६ य² + ७२ य = १४४, १६य² - ७२ य + ८१ = ∴ १४४ + ८१ = २२५ अतः १६ य² + ७२ य - ८१ = २२५ मूल = ४ य - ९ = १५ आलाप से ४ य = २४ ७२ ÷ २ = √ ३६ = ६ = मालती पुष्प में ∵ य = ६ ७२ × ८/९ = ६४ = अलिनी " " ∴ य² = ३६ दृश्य = २ = प्रत्यक्ष दृष्टि में ────────────────────────────────── अतः २ य² = ७२ योग = ७२ = भ्रमर कुल होता है । “शून्ये गुणके जाते खं हारश्चेत्पुनस्तदा राशिः । अविकृत एव विचिन्त्यः सर्वत्रैवं विपश्चिद्भिः ॥” यदि किसी समीकरण में गुणक ० और भाजक भी ० है तो
? No, ६ × ० + ९. Denominator: ०. Wait, but look at the second fraction: Numerator: ६ × ०̸ Denominator:०̸ Wait, why does it say:६ × ०̸ / ०̸ + ९ = ९ + ६ = १५? Because ६ × ० + ९divided by०is separated into(६ × ०)/० + ९! Wait, in Bhaskara's Bijaganita: (६ × ० + ९) / ०is not valid, rather(६ × ०)/० + ९ = १५! Wait, look at the image: ६ × ० + ९ ६ × ० अतः ───────── ────── + ९ = ९ + ६ = १५ ठीक हो जाता है । आलाप ० ० Wait, between them there is NO=. It's just a space, or is it an =? Wait, look at the space: there is a smudge, but it looks like =. Wait, no, look at the alignment: अतः ६ × ० + ९ ६ × ० Wait, no,६ × ० + ९is the numerator! Wait, is there a fraction line under६ × ० + ९
( २८ ) कोण से भूमि आधार पर लम्ब गिराने से अ ब क त्रिभुज में अ क = कर्ण = भूमि, ब क और अ ब = भुज तथा कोटि । अतः लीलावती से २० + १५ = ३५ योग तथा अन्तर = ५ — ३५ × ५ / २५ = ७, २५ ± ७ / २ = ३२ / २, १८ / २ = १६ बड़ी आबाधा और २५ - ७ / २ = १८ / २ = ९ = लघु आबाधा । √भु² - आबाधा² = लम्ब = (१५)² - (९)² = २२५ - ८१ = १४४ का मूल = १२ = लम्ब अथवा (२०)² - (१६)² = १४४ का मूल = १२ यह भी पूर्ण तया लम्बमान होता है । भूमि × लम्ब / २ = १२ × ९ / २ + १२ × १६ / २ = ५४ + ९६ = १५० = दोनों प्रकार से एक रूप का उत्तर में क्षेत्रफल आता है । प्रकारान्तर से भी चतुर्भुज के रूप में क्षेत्र रचना निम्न भांति होती है । [चित्र: २०, १५, १५, १५, ५, ५, ५, ५, २०, २०, १५] कल्पना किया कर्णमान = य कोटि = २० भुज = १५ अन्तर = ५ अन्तर वर्ग = (५)² = २५
१. गोल-प्रशंसा एवं भुवन-कोश: पृथ्वी की गोल आकृति, गुरुत्वाकर्षण एवं आधार-विचार
( २९ ) २५ २५ (भु × को) × २ = ४ त्रिभुजों का फल १५ × २० × २ = ६०० इसमें अन्तर वर्ग = (५)² = २५ जोड़ देने से ६२५ = या² अतः २५ = या ऐसी स्थिति में एक सिद्धान्त जिसे सूत्र कहते हैं उपपन्न होता है कि भुज कोटि के अन्तर वर्ग को भुज कोटि के द्विगुणित गुणनफल में जोड़ देने से वह दोनों भुज कोटि का वर्ग हो जाता है। अर्थात् (भु ~ को)² + (भु × को) × २ = भु² + को² = कर्ण² उपपन्न होता है। प्रश्न है कि भुज में ३ कम करने से प्राप्त मूल में १ कम करने से कोटि मान हो जाता है तो एक ही द्वादश भुज में अनेकों कर्णों का मान क्या होगा ? आलाप से — √भु - ३ - १ = कर्ण, कोटि, इष्ट = २ ∴ √भु - ३ = २ + १ = ३, ∴ भु - ३ = ९, भु = ९ + ३ = १२,
- कोटि = १६, कर्ण = २० अतः कर्ण² - कोटि² = १४४ = (कर्ण + को) (कर्ण - कोटि) किन्हीं दो राशियों के योग और अन्तर के गुणनफल के तुल्य होता है । जैसे (२० + १६) (२० - १६) = ३६ × ४ = १४४ = (२०)² - (१६)² = १४४ का मूल = १२ = भुज इत्यादि ।
( ३० ) क्षेत्र दर्शन से और भी स्पष्ट होगा । जैसे— अ ब क ल चतुर्भुज में ७ × ७ = ४९ कोष्ठक हैं । इसमें ५ × ५ = २५ अ च त प को निकाल देने से ४९ - २५ = २४ अर्थात् २४ कोष्ठक निम्न क्षेत्र की तरह १२ × २ = २४ क्षेत्रफलात्मक बन जाते हैं । तात्पर्य से जो (७ - ५) × (७ + ५) = २ × १२ = २४ = (७)² - (५)² = ४९ - २५ = २४ के तुल्य अर्थात् दो राशियों के योगान्तर का गुणनफल उन्हीं दोनों राशियों के वर्गान्तरों के तुल्य क्षेत्र से भी सुस्पष्ट है । और भी सूत्र हैं कि— चतुर्गुणस्य घातस्य युतिवर्गस्य चान्तरम् । राश्यन्तर कृतेस्तुल्यं द्वयोरव्यक्तयोर्यथा ॥ किन्हीं दो राशियों के अन्तर का वर्ग, उन दोनों राशियों के चतुर्गुणित गुणनफल और उन दोनों राशियों के योग के वर्ग के अन्तर तुल्य होता है । क्षेत्र को देखें— जैसे दो राशियाँ = ५ और ३ (५ × ३) × ४ = ६०
( ३१ ) (५ × ३)² = ६४ ६४ - ६० = ४ = (५ - ३) = २ का वर्ग = ४ होता है । एक उदाहरण है कि, भु + को + क = ४० तथा भु ० × को ० = १२० उक्त नियमों से ( भु × को ) × २ = १२० × २ = २४० = ( भु + को )² + कर्ण = योग और अन्तर के गुणनफल के तुल्य । अतः २४०/४० = ६ = अन्तर संक्रमण गणित से ४० ± ६ = ४६, ३४ के आधे = २३ = भु + को, और १७ = कर्ण । अतः (भु + को)² = ५२९ में भु × को × ४ = १२० × ४ = ४८० को घटाने से ५२९ - ४८० = ४९ का मूल = ७ = भु० को० का अन्तर । अतः संक्रमण से २३ ± ७ ३० और १६ दोनों आधे के १५ तुल्य कोटि और ८ के तुल्य भुज हो जाता है । और भी एक प्रश्न है कि, यदि भु + को + कर्ण = ५६ तथा भु × को × क = ४२०० है तो भु, को और कर्ण के मान क्या हैं ? यहाँ पर कर्ण का मान अव्यक्त "य" मानकर गणित करने से कर्ण का वर्ग = य² = भु² + को² = वर्ग योग । भु + को + क = ५६, अतः ५६ - य² = भु + को = ५६ - य, (भु × को × क) / क = भु × को । ४२०० / य पूर्व सूत्र से वर्ग योग = य² । और युति वर्ग = यु० व० - य² - ११२ य + ३१३६ चूंकि वर्ग योग = य² और दो राशियों भु + को = योग का वर्ग = युति² = (५६ - य) ३१३६ - ११२ य + य² । दो राशियों का द्विगुणित घात (४२०० × २) / य = ८४०० / य के तुल्य है । अतः, ३१३६ - ११२ य - य² = ८४०० / य । दोनों पक्षों से ११२ से भाग देने से भी दोनों पक्ष बराबर हैं । अतः २८ - य² = - ७५ दोनों
( ३२ ) पक्षों को - १ से गुणा करने पर य² - २८ = - ७५ दोनों में १४ का वर्ग जोड़ देने से य² - २८ + १९६ = १९६ - ७५ = य² - २८ य + १९६ = १२१ मूल लेने से, य - १४ = ११ अतः य = २५ = कर्ण का मान है । ∴ भु × को = ४२००/२५ = १६८ । चूंकि भु + को + क = ५६, कर्ण = २५ अतः भु + को = ५६ - २५ = ३१ होता है । पूर्व सूत्र से ४ × दो राशियों का गुणन दोनों राशियों का द्विगुणित गुणनफल के तुल्य होता है । भु × को × क = ४२०० । क = २५ अतः ४२००/२५ = १६८ = भु × को तथा (४ × १६८) = ६७२ = (भु × को) × ४ । ५६ - २५ = ३१ = भु + को अतः (३१)² = ९६१ = (भु + को)² अतः ९६१ - ६७२ = २८९ का मूल = १७ = भु और कोटि का अन्तर है । भु + को = ३१ है, संक्रमण गणित से ३१ + १७ = ४८ का आधा = २४ [L
( ३३ ) बीजगणित में अनेक वर्णों की कल्पना— अभी तक अव्यक्त में एक वर्ण से जैसे य, अथवा अ···इत्यादि तथा तदुपरि एक ही वर्ण सम्बन्धेन एक वर्ण वर्ग से बीजगणित क्रिया प्रदर्शित की गई है, इसके आगे अव्यक्तों में अनेक वर्णों अ, क, य, ल इत्यादि के वर्गादि समीकरणों से सम्बन्धित बीजगणितीय क्रिया का प्रदर्शन पाठकों के बुद्धि विवर्द्धन के लिए आवश्यक समझ कर संक्षेप से अनेक वर्ण वर्ग समीकरणीय ( बीजगणितीय ) गणित प्रक्रिया प्रदर्शित की जा रही है। उदाहरण में यदि २, ३, ४ इत्यादि राशियाँ होती हैं तो उनके मानों में य, अ इत्यादि से अनेक अव्यक्तों का मान कल्पना कर दोनों पक्षों का शोधन, समशोधन, गुणन, भजन और योगान्तरादि करते हुए पूर्वकथित विधि के अनुसार दोनों समान पक्ष स्थापित करना चाहिए। इसके आगे दानों पक्षों के समान अव्यक्तों का संशोधनादि से निम्न भाँति गणित क्रिया की जानी चाहिए। उदाहरण है— चार व्यापार प्रवृत्ति के बन्धु हैं जिनकी सम्पत्ति निम्न भाँति है— प्रथम की पशुधन संख्या अश्व = ५ ऊँट = २ खेचर = ८ बैल = ७ द्वितीय ··· ··· = ३ ७ २ १ तृतीय ··· ··· = ६ ४ १ २ चतुर्थ की ··· ··· = ८ १ ३ १ प्रत्येक के उक्त पशुधन के विक्रय से जो द्रव्य आता है वही उतना ही धन सभी के पास है, तो अश्व, ऊँट, खेचर और बैल आदि का मूल्य क्या होगा ? यही समझना है। यहाँ पर अश्वादिकों का मूल्य कल्पित किया जाता है यथा अश्व का मूल्य = य, ऊँट का मूल्य = क अश्वतर-खेचर का मूल्य = न और बैल का मूल्य = प कल्पना कर गणित प्रस्तार किया जाता है । इस प्रकार अव्यक्त कल्पना के अनन्तर— प्रथम धन = ५ य + २ क + ८ न + ७ प द्वितीय धन = ३ य + ७ क + २ न + १ प तृतीय धन = ६ य + ४ क + १ न + २ प चतुर्थ धन = ८ य + १ क + ३ न + १ प उक्त चारों समान धनी हैं, अतः ५ य + २ क + ८ न + ७ प = ३ य + ७ क + २ न + १ प अतः २ य = ५ क - ६ न - ६ प ३
( ३४ ) ५ क - ६ न - ६ प ∴ य = —————————— = ( १ ) २ ३ क + १ न - १ प दूसरे तीसरे से य = —————————— = ( २ ) ३ ३ क - २ न + १ प तृतीय चतुर्थ से य = —————————— = ( ३ ) २ इस प्रकार य के तीन मान होकर इस समीकरण माध्यम से अब क का मान निकालना चाहिए। ५ क - ६ न - ६ प ३ क + १ न - १ प प्रथम द्वितीय से, —————————— = —————————— २ ३ अर्थात् १५ क - १८ न - १८ प = ६ क + २ न - २ प अतः ९ क = २० न - १६ प ८ न - ५ प २० न + १६ प अतः क = —————— = ———————— ३ ९ ∴ ७२ न - ४५ प = ६० न + ४८ प ९३ प ३१ प अतः १२ न = ९३ प ∴ न = ——— = ——— १२ ४ २५५ अतः ७६ × ३ = २२८ + ३१ - ४ = २५९ - ४ = ——— = ८५ = य ३ २० + १६ प ८ न - ५ य ∴ —————— = —————— ९ ३ = ६० न - ४८ प = ७२ न - ४५ प ९३ प ३१ प ∴ १२ न = ९३ प ∴ न = ——— = ——— १२ ४ पूर्व कथित कुट्टक गणित से गुणक मान यदि इष्ट ल मानने से न = लब्धि = ३१ ल प = गुणक = ४ = उत्थापन देने से क - ७६ ल (८ × ३१) = २४८ ल २० ल ———— २२८ ———— = ७६ ल ३
( ३५ ) इस प्रकार यदि ल = १···२···३··· अनन्त । यदि इष्ट = १ तो य = ८५, क = ७६, न = ३१ और प = ४ । यदि इष्ट = २ तो य = १७० क = १५२, न = ६२, प = ८ इष्ट = ३ तो य = २५५, क = २२८, न = ९३, प = १२ इत्यादि अनेक विध मान होते हैं। आलाप मिलाने से— प्रथम का धन अश्व मूल्य = ४२५, ऊँट मूल्य = १५२, खच्चर मूल्य = २४८, बैल मूल्य = २८, सबका योग ८५३ । द्वितीय का धन = २५५ + ५३२ + ६२ + ४ = ८५३ । तृतीय का धन = ५१० + ३०४ + ३१ + ८ = ८५३ । चतुर्थ का धन = ६८० + ७६ + ९३ + ४ = ८५३ । इस प्रकार के पशु धन का मूल्य से सम्बन्ध करने पर सभी समान धनी सिद्ध हो जाते हैं। और भी एक विनोद प्रदर्शन का अर्थात् अंकगणित के साथ बोजगणित से गहन कल्पना सागर के गोताखोर से उपलब्ध रत्नाकर के रत्नात्मक बीज बुद्धि का प्रश्न है कि (मूल ग्रन्थ में द्रम्म द्रव्य की जगह हम यहाँ रुपये का उपयोग कर रहे हैं ।)— ३ रु० में ५ पारावत पक्षी और ५ रु० में ७ सारस और २ रु० में ९ हंस और ९ रु० में ३ मयूर (मोर) आदि पक्षीगण मिलते हैं, तो हे चतुरराजभक्त १०० रु० में ही १०० पूर्ण संख्या के, पारावत + सारस + हंस और + मोर राजा के विनोद के लिए ले आइये । यहाँ पर आचार्य का कल्पना वैचित्र्य है कि पक्षियों की संख्या के तुल्य, य, क, प, न इत्यादि मान मानकर पुनः पक्षी संख्या तुल्य मूल्यों १०० के साथ साम्य कर तथा १०० के साथ उभयतः य - क - प - न मान निकाले हैं। मूल्य सम्बन्ध जैसे ३ प + ५ क + ७ न + ९ य = १०० अतः य = (१०० - ५ क - ७ न - ९ प) / ३ एवं पशु सम्बन्ध से य = (१०० - ७ क - ९ न + ३ प) / ५ इन दोनों से दोनों पक्षों की समानता है । अतः दोनों पक्षों से, ५०० - २५ क - ३५ न - ४५ प = ३०० - २१ क
- २७ न - ९ प । ∴ ४ क = २०० - ८ न - ३६ प, ∴ क = (२०० - ८ न - ३६ प) / ४ = ५० - २ न - ९ प
( ३६ ) यदि प मान इष्ट = ४ तो, क = ५० - २ न - ३६ = (१४ - २ न) / १ अतः कुट्टक से २ ल + १४ = लब्धि, १ ल + ० = गुणक अतः य = ल - २, यदि ल का मान इष्ट कल्पना ३ की जाय तो य = १, क = ८, न = ३ और प = ४ उत्तर होते हैं । इससे मूल्यों और जीवों में उत्थापन देने से—
| पक्षी | पारावत | सारस | हंस | मोर | = १०० पक्षी |
|---|---|---|---|---|---|
| ५ | ५६ | २७ | १२ | ||
| मूल्य | ३ रु० | ४० रु० | २१ रु० | ३६ रु० | = १०० रुपया |
| यदि इष्टमान कल्पना व्यक्त संख्या ५ मानें तो | |||||
| पक्षी | पारावत | सारस | हंस | मोर | पक्षियों की संख्या = १०० |
| :--- | :---: | :---: | :---: | :---: | :--- |
| १५ | २८ | ४५ | १२ | ||
| मूल्य | ९ | २० | ३५ | ३६ | सभी पक्षियों की मूल्य |
| संख्या द्रव्य = १०० | |||||
| आचार्य ने "एवमिष्टवशादनेकधा" ऐसा भी कहते हुए अनेक प्रकार के मान होते हैं, | |||||
| कहा है, किन्तु यहाँ पर पक्षियों की संख्या १०० (एक सौ) और सभी योगात्मक पशु | |||||
| संख्या १०० का मूल्य भी १०० रु० होने से ऐसी स्थिति में उत्तर में मात्र १६ प्रकार की | |||||
| पक्षी संख्या १६ प्रकार का ही पक्षी संख्याओं का मूल्य ··· ···उत्तर हो सकता है । इस | |||||
| अनेक वर्ण समीकरण में बुद्धि विवर्धक अनेक प्रश्नों का हल अनेक वर्णों की अव्यक्त | |||||
| कल्पना से किया गया है । सारा प्रकरण गणितज्ञों के लिए अत्यन्त रोचक एवं गणित | |||||
| ज्ञानवर्धक है, संक्षेप से कुछ महत्त्वपूर्ण प्रश्नों का हल यहाँ पर दे देना आवश्यक है । | |||||
| जैसे— | |||||
| प्रश्न है कि—वह कौन सी राशि जिसमें २ का भाग देते हैं तो शेष = १, लब्धि में | |||||
| भी २ का भाग देने से शेष भी १, ३ से भाग देने पर लब्धि २ तथा लब्धि में ३ का | |||||
| भाग देने पर भी शेष = २, राशि में ५ से भाग देते हैं तो भाग देने से शेष = ३, | |||||
| लब्धि ३ में भी ५ का भाग देने से शेष भी ३ ही होता है तो राशि मान क्या है ? | |||||
| अव्यक्त कल्पना से राशिमान् = य । | |||||
| अतः य / २ लब्धि = य / २ = २ क + १ | |||||
| ∴ यह = ४ क + ३ यहाँ स्वयं एक आलाप घट रहा हैं। फिर य / ३ = ३ न + २ | |||||
| ∴ य = ९ न + ६ + २ = ९ न + ८ |
( ३७ ) अतः ४ क + ३ = ९ न + ८ ∴ क = (९ न + ५) / ४ , कुट्टक गणित से क = ९ य
- ८ । पूर्व में य = ४ क + ३ दिखाया गया है । यहाँ पर क के मान में उत्थापन देने से ९ प + ८ × ४ + ३ = ३६ प + ३५ = य प्रश्न के तीसरे भाग के अनुसार, य = ३६ प + ३५, तथा राशि = ल मानने से ल में ५ सेभाग देने से ३ शेष । क्रिया करने से ५ ल + ३ = ३६ प + ३५ = (५ ल - ३२) / ३६ , कुट्टक गणित से २५ ह + ३ = य से ३६ प + ३५ में उत्थापन देने से ९० ह + १४३ = य यदि ह = ० तो य = राशि = १४३, यदि ह = १ तो राशि = १०४३ यदि ह = २ तो राशि १९४३ इस प्रकार अनन्त उत्तर होते हैं । ऐसी गणित स्थिति में सूत्र कहा भी गया है कि— “निराधारा क्रिया यत्र नियताधारिकाऽपि वा । न तत्र योजयेत् तान्तु कथं सा वा प्रवर्तते” ॥ जिस गणित की क्रिया निराधार (आधार रहित) या नियत आधार इदमित्थम् आधार होता है उस हल में उक्त अनेक गणित की पद्धतियाँ लागू नहीं हो सकती । जैसे- वह कौन सी राशि है जिसे ५ से गुणा करें १३ से भाग दें, भाग देने पर प्राप्त लब्धि को राशि में जोड़ देने से ३० के तुल्य हो जातो है । उस राशि का मान क्या है ? यदि राशिमान = य तो (राशि * ५) / १३ = लब्धि + क अतः य + क = ३० । य = ३० - क, अथवा क = ३० - य ऐसी विचित्र परिस्थिति से कहना पड़ेगा कि यह गणित निराधार है या नियत आधार गणित है जो बीजगणित से भी जिसका साधन नहीं हो रहा है। क्योंकि अन्तर में राशि के मान में फिर भी अव्यक्त ही दृष्टिगोचर होने से राशि का व्यक्त इष्टमान क्या माना जाय ? अतः व्यक्त गणित का ही आश्रय लेकर येन-केन राशिमान निकाला जा रहा है । उपायान्तर का आश्रय लेने से यदि माना राशि + (५ × रा०) / १२ अर्थात् १३ + ५ = १८ अर्थात् राशि और राशिफल के योग में राशिमान - १३ में, फल = ५ तो ३० में क्या त्रैराशिक से (३० × ५) / १८ = २५/३ यह लब्धि हुई । अतः ३० - २५/३ = ६५/३ राशिमान होता है । वस्तुतः आचार्य के कथनानुसार “निराधारा क्रिया” समीचीन सी प्रतीत नहीं हो रही है । जैसे—यदि राशिमान् = य, ५ से गुणा करने पर, ५ य, इसमें १३ का भाग देने से
( ३८ ) लब्धि = क, अतः लब्धि × भाज्य = ५ य = १३ क ∴ य = १३ क / ५ । लब्धफल + राशि = ३० अतः य + क = ३० ∴ य = ३० - क अतः ३० - क = १३ क / ५ = १५० - ५ क = १३ क अतः १८ क = १५० ∴ क = १५० / १८ = २५ / ३ = लब्धि । राशि और लब्धि = ३० है तो ३० - २५ / ३ = ६५ / ३ राशि, पूर्व तुल्य हो जाती है । इसलिए यह क्रिया निराधार नहीं कही जा सकती, जैसे आचार्य ने कहा है— एक और प्रश्न है वह कौन सी राशि है जिसे २०० से गुणा करने से उसमें ६ गुणित राशिवर्ग जोड़ दें तो वह संख्या वर्गांक हो जाती है । इस प्रश्न के समाधान में आचार्य ने वर्ग प्रकृति गणित का उपयोग किया है । यदि राशिमान अव्यक्त = प्रश्ना- नुसार य × २ = २ य इसमें ६ × राशि वर्ग = ६ य² जोड़ देते हैं तो ६ य² + २ य होता है इसका मूल मिलना चाहिए । कल्पना किया इसका मान दूसरे अव्यक्त क वर्ग के तुल्य है तो ६ य² + २ य =
( ३९ ) जहाँ पर उदाहरणों में दो या अनेक वर्णों के गुणनफल से भावित य × क × ल... य, क, ग उत्पन्न होता है। ऐसी स्थिति में किसी अभीष्ट इष्ट वर्ण को छोड़कर शेष अव्यक्त वर्णों का मान व्यक्त मानकर समीकरणों के दोनों पक्षों में उक्त व्यक्तमान का उत्थापन देकर तथा समीकरणों में समान जोड़ घटाओं, गुणा, भागादि कर बीज क्रिया से अव्यक्त मान को व्यक्त किया जाता है। इसी को भावित....अर्थात् भावना से भावित कहा गया है। उदाहरण में जैसे— चतुस्त्रिगुणयो राश्योः संयुतिर्द्वियुता तयोः । राशिघातेन तुल्या स्यात् तौ राशी वेत्सि चेद्वद ॥ अर्थात् कोई दो राशियां हैं जिन्हें क्रमशः ४ और ३ से गुणाकर दोनों के गुणनफल में २ जोड़ देते हैं तो वह अंक संख्या उक्त दोनों राशियों के गुणनफल के तुल्य हो जाती है। कल्पना से राशियाँ = अ और क, प्रश्नानुसार ४ य + ३ क + २ = य० क० भा० (भा० से भावित) यहाँ पर क का मान कोई भी इष्ट मानें जैसे, क = ५, तो ४ य + ३ क + २ = ४ य + १७, य = १७, क = ५ प्रश्नानुसार—१७ × ४ + १५ + २ = ८५ = १७ × ५ यदि क० का मान इष्ट ६ तो ४ य + २० = य ० ६ ∴ २ य = २० ∴ य = १०, क = ६ यहाँ भी १० × ४ + ६ × ३ = ४० + १८ = ५८ + २ = ६० = १० × ६ इस प्रकार किसी भी प्रश्न उत्तरों में गणितार्णव के आनन्त्य का संकेत करते हुए "एवमिष्टवशादानन्त्यम्"—इष्ट कल्पना के आधार अनन्त मानों का सही संकेत मिलता है । इस स्थल पर क का मान ५ ही क्यों, ४ क्यों न माना जाय ? ध्यान देने की बात है कि यदि क = ४ तो, ४ य + ३ क + २, यदि क = ४ तो, ४ य + १४ = ४ य असम्भव है अतः क का मान ५ से अधिक यथेष्ट होता है । पुनः उदाहरण—वह ४ राशियाँ जिनके योग को २० से गुणा करने पर गुणनफल चारों राशियों के गुणनफल के तुल्य हो जाता है वह चार राशियाँ कौन हैं ? प्रथम राशि = य, शेष राशियाँ व्यक्त = ५, ४, २ अतः, ५ + ४ + २ = ११, ∴ य = ११ अतः चारों राशियाँ = ११, ५, ४ और २ होती हैं । २० (य + ११) = य × ५ × ४ × २ = ४० य अतः २० य + २२० = ४० य । २० य = २२० । य = ११ उत्तर उत्थापन से राशियाँ = ११, ५, ४, २ या २८, १०, ३, १ या ५५, ६, ४, ० । इस प्रकार अनन्तमान होते हैं ।
Here is the line-by-line transcription of the text from the image:
( ४० ) प्रश्न है—४ और ३ से गुणित राशियों के योगफल में २ जोड़ देने से वह अंक उन दोनों राशियों के गुणनफल के तुल्य हो जाता है । कल्पना से भुज = य, कोटि = क, ये भावित क्षेत्र की भुज और कोटि होती हैं। अतः भावित क्षेत्र का क्षेत्रफल = य × क इस क्षेत्र से यदि ४ य, ३ (क - ४) इतना कम कर देते हैं तो शेष = य - क - ४ य - ३ (क - ४) = (य - ३) (क - ४) अतः य × क = ४ य + ३ क + २ अतः (४ य + ३ क + २) - ४ य - ३ क + १२ = १४ अतः १४ = ४ × ३ + २ = (वर्गांक × वर्गांक) + २ के तुल्य है । इसीलिए आचार्य ने कहा है— उपपत्तियुतं बीजगणितं गणका जगुः । न चेदेवं विशेषोऽस्ति न पाटीबीजयोर्यतः । १० और १४ से गुणित दो राशियों के योग में ५८ कम कर देने से प्राप्त अंक के तुल्य
( ४१ )
सिद्धान्त शिरोमणि ग्रहगोलाध्याय एवं ग्रहगणिताध्याय
श्रीमद्भास्कराचार्य विरचित सिद्धान्त शिरोमणि ग्रन्थ के अंकगणित (लीलावती) और बीजगणित नामक दोनों भागों के विषयों का पूर्व में संक्षिप्त विवरण हो चुका है। ध्यान देने की बात है कि इन दोनों के महत्त्व को समझकर, मुगलकाल में बादशाह अकबर ने फारसी भाषा में इनका अनुवाद फैजी नामक विद्वान से सन् १५८७ में तथा बादशाह अकबर के पौत्र बादशाह शाहजहाँ ने भी १६३४ ई० में अल्लाहसदी द्वारा बीजगणित का अनुवाद कराया गया। अब तक इन दोनों ग्रन्थों का पश्चिम के गणितज्ञों से आंग्ल भाषा में प्रकाशन, प्रचार और महत्व स्थापित हो चुका है। श्री भास्कराचार्य ने अंकगणित (लीलावती) एवं बीजगणित की रचना के बाद सिद्धान्तशिरोमणि ग्रन्थ के तृतीय भाग ग्रहगोलाध्याय की रचना की एवं इसके पश्चात् अन्तिम भाग ग्रहगणिताध्याय की सफल रचना की इसकी पुष्टि हमें आचार्य भास्कर के ही कथन से मिलती है। जैसे-ग्रहगणिताध्याय के भगणाध्याय के श्लोक ७ में "अत्रोपपत्तिर्गोले" तथा अन्यत्र समग्र ग्रहगणिताध्याय में "समं भसूर्यावुदितौ किलाक्ष्याँ" "एवं सर्वमुपपन्नं तच्च गोले सम्यगभिहिता व्याख्याता च", "तात्कालीकीकरणकारणता गोले कथिता व्याख्याता च" तथा "दर्शाग्रत सङ्क्रमकालतः प्राक् सदैव तिष्ठत्यधिमासशेषम्" इत्यादि "गोले कथितं" आदि से सुस्पष्ट है कि आचार्य भास्कर ने सिद्धान्तशिरोमणि ग्रन्थ के लीलावती (अंक- गणित) बीजगणित भाग के पश्चात् इस ग्रहगोलाध्याय की रचना कर अन्त में ग्रहगणिता- ध्याय की रचना की है। सिद्धान्तशिरोमणि ग्रन्थ के ग्रहगोलाध्याय में ग्रहगोल, भूगोल, खगोल का अत्यन्त रोचक, सरल और स्पष्ट वर्णन करने के पश्चात् आचार्य भास्कर को अनुभव हुआ कि ग्रहगोल, खगोल विषयक ज्योतिष के ग्रहगोलाध्याय में ग्रहगणित की सैद्धान्तिक सोदाहरण उपपत्ति के बावजूद उन्होंने सिद्धान्तशिरोमणि ग्रन्थ के चतुर्थ भाग ग्रह-गणिताध्याय की सफल रचना की। आचार्य भास्कर की सिद्धान्तशिरोमणि ग्रन्थ के ये दोनों भाग ज्योति- र्विद्या (खगोल विद्या) की अद्भुत व आश्चर्यजनक देन हैं। भारतीय ग्रहगोल खगोलशास्त्रियों के एतद्विषयक ज्ञानलाभ के लिए सिद्धान्तशिरो- मणि ग्रन्थ आज तक इकाई है और त्रिश्व के गणितज्ञान गोल पिपासुओं के लिए भी भास्कराचार्य की यह देन अत्यन्त समादरणीय है। अतः ग्रन्थ के दोनों भागों ग्रहगोला- ध्याय व ग्रहगणिताध्याय की समीक्षा जो अतिअ वश्यक भी है संक्षेप से इस स्थल पर यथामति-यथाशक्ति की जा रही है।