सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)
Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा
ज्योत्पत्तिवासना २२१ गात्तद्गर्भजनत्यागः स्वत्र्यंश २९७९१ युक्तः ११११६४ । अयं त्र्यंशे १ योजितो जातः १५९४३२३ १५९४३२३ ३ ६५०६०५ । अस्मात्पुनर्धनादिकरणेनासकृत्साध्यं गणितक्रियादक्षगणके यत्रापवर्तः संभवति १५९४३२३ तत्र भाज्यहरावपवर्तनीयावेवं परिवर्तन्तरे गणितक्रियासमाप्त्याऽऽसन्नभाज्यहरयोरपवर्तने सिद्धमिदमर्धं १ । एतस्य दृढत्वज्ञानार्थमस्य घनः १ स्वत्र्यंश १ युक्तः ४ । अपवर्तनेन २ ८ २४ २४ षष्ठांशः सिद्धः । अनेन त्र्यंशः सिद्धः १ । अनेन त्र्यंशः १ समच्छेदतया योजितोऽपवर्तनेन ६ ३ जातमर्धं स्थिरमितीति सकलभूपालमौलिमणिमयूखमालामिलच्चरणनखनीहारकिरणकर- निकरनिर्वासिताखिललोकस्वान्तध्वान्तसंतानसंतापसंततिचतुरुदधितीरचञ्चत्तरङ्गसमालिङ्गि- तकीर्तिलतावितनो गणितवेधाद्युपायसमासादितालौकिकगणितागमाता(त्ता)व(?)च(च्च)क्षुः साक्षात्कृतसान्तरखण्डब्रह्माण्डमण्डलपारसीकसार्वभौमो,मिरजोलकबेगः स्वनिर्मिते जीवनामनि ग्रन्थे निपुणं निरूपयांचक्रे । एवं ज्यासाधनप्रकारेण चतुर्विंशतिज्यासाधन उक्तत्रिज्यानुरोधेन प्रथमजीवा सावयवेयं २२४ । ५१।१० । १५ । कोटिज्यात्रयोविंशी सावयवा ३४३० । ३८ । १७ । १२ । पूर्वरीत्या कोटिज्यया गणितागतप्रथमज्यामितगुणा २२४ । ५१ । १० । १५ त्रिज्या ३४३८ मितहरौ किंचिदूनसपादद्वयेनानेन २ । १४ । ५४ । ४२ । ९ अपवर्तितौ गुणस्थाने शतं १०० हरस्थाने नन्दाश्वितिथयः १५२९ । भुजज्यायाश्च सावय- वत्रयोविंशज्या ३४३० । ३८ । १७ । १२ ऊनितत्रिज्यामितगुण ७ । ११ । ४२ । ४८ त्रिज्या ३४३८ मितहरौ गुणेनापवर्तितौ गुणस्थाने रूपं हरस्थाने सप्तषष्ट्यधिकचतुःशत- ४६७मित्युपपन्नं कोटिजीवाशताभ्यस्तेत्यादिसार्धानुष्टुभोक्तम् । अनेनाऽऽनयनेन प्रथमज्या- पादोनचतुष्टयांशानामुक्तत्रिज्यानुरोधेनैव सप्तांशोनास्तत्त्वाश्विनस्तदितरत्रिज्यायास्तूक्त- प्रकारेणैव प्रथमज्या तदितरा । शेषं पूर्वं प्रतिपादितमेव । अथ प्रसङ्गाज्ज्यान्तरभावनया दोर्ज्याकृतिर्व्यासदलार्धभक्तेत्यादिनोक्तभुजकोटि- भागान्तरज्यासाधनस्योपपत्तिः । भुजकोटिज्ये चापयोर्भुजज्ये । कोटिभुजज्ये तयोः क्रमेण कोटिज्ये । तथा च चापयोरिष्टयोरित्यादिना भुजकोटिज्ययोर्वर्गौ त्रिज्याभक्ताविति सिद्ध- मनयोरन्तरं भुजकोटिभागान्तरांशानां ज्या । तत्र कोटिज्यावर्गस्य भुजज्यावर्गोनायास्त्रिज्या- कृतेस्तुल्यत्वात्तदन्तरे भुजद्विगुणप(भ)वर्गत्रिज्यावर्गयोरन्तरं त्रिज्याभक्तमिति संजातमत्रापि त्रिज्याभक्तयोरन्तरं कृतम् । तत्र भुजवर्गो द्विगुणे त्रिज्याभक्ते ह्यपवर्तनेन दोर्ज्याकृतिर्व्या- सदलार्धभक्ता सिद्धा त्रिज्यावर्गे त्रिज्याभक्ते त्रिज्या जाता । तयोरन्तरे लब्धस्त्रिमौर्व्योर्वि- वरेणेत्युपपन्नमित्यलं प्रसङ्गागतविचारेण । नन्वेवं गजगुणवेदराममितत्रिज्यावशादग्र पूर्वज्यासाधने गुणहरयोरुत्पादितत्वादन्यत्रिज्या- नुरुद्धभुजकोटिज्याभ्यामुक्तप्रकारेण स्वत्रिज्यानुरुद्धतत्पूर्वाग्रिमज्ययोः सिद्धिर्भवतीति कथम-
ऽवगतं तद्युक्त्यभावादित्यनवबोधाशङ्काया उत्तरमाह-आद्यज्याचापभागानामिति । आद्याः प्रथमा ये ज्यासंबन्ध्यर्धधनुषो भागास्तेषां प्रकृते नवतिसंख्याकज्यानां साधन एकोंऽशश्च- तुर्विंशतिज्यानां साधने पादोनाश्चत्वारस्तेषां प्रतिभागज्यकाविधिः प्रतिभाग ज्यान्तरांशाः । त्रिभमध्ये यत्संख्याका ज्याः कल्पितास्तत्संख्यया नवत्यंशा भक्तास्तत्फलतुल्यास्तदन्तरेण ज्यानयनं पूर्वार्ययारूपमुक्तं तद्विधिस्तत्प्रकारः कार्यस्तेन तेषां या यन्मिता ज्या भवति । प्रकृते नवतिज्यासाधने गजरामयुगाग्निमितकोटिज्याग्रहणेन कोटिज्या दशभिः क्षुण्णेत्यादि- प्रकारात्षष्टिमता । चतुर्विंशतिज्यासाधन उक्तत्रिज्यामितकोटिज्याग्रहणेन कोटिजीवा शताभ्यस्तेत्यादिप्रकारात्सप्तांशोनतत्त्वश्विमिति(ता) वा । अत्र प्रतिभागज्यकाविधेरिति पाठश्चेत्साधुरिति ध्येयम् । सा प्रथम
८७४८०००० पञ्चाहतः परिधिवर्गचतुर्थभागः ५८३२००००० प्रथमेन ८७४८०००० हरो जातः ४९५७२०००० द्विघ्नव्यास १३७५२ गुणितः प्रथमो १२०३०२४९६०००० हरभक्तः फलं सार्धराशिज्या प्रसिद्धमिता २४२७ सूक्ष्मा तु कुरामसिद्धमिता त्रिज्या वर्गार्धपदरूपेति गुणनादौ बह्वन्तरपात इति प्रत्यक्षम् । अथोपपत्त्या स्थूलत्वबोधार्थं तदुपपत्तिः । वृत्तेऽभीष्टचापस्य संपूर्णस्य संपूर्णज्या भुजो व्यासरेखा तदग्रगता कर्णस्तद्वर्गान्तरपदं भुजाग्रकर्णाग्रान्तरस्थितोर्ध्वरेखाकोटिरिति त्र्यस्रं प्रत्यक्षम् । तत्राभीष्टज्याया अज्ञानात्कोटिकर्णवर्गान्तरपदेन तस्या ज्ञानम् । तत्रापि कोटेर- ज्ञानादशक्यमेतत्तथाऽपि कोटिरेखासंबन्धेन यच्चापं परिध्यन्तर्गतं तदेव स्थूलत्वेन कोट्या- कारत्वाभावेऽपि कोटिः कल्पिता । व्यासरूपकर्णरेखासंबन्धेन परिध्य
२२४ गोलाध्याये त्वात् । हराधिक्येन फलन्यूनत्वसंभवात् । यथोक्तप्रकारेण षड्भागज्यासिद्धावपि परिध्यर्ध- चापस्य व्यासभितसिद्धज्याया असिद्धिः । तथा हि—अत्र प्रथमस्य परिधिवर्गचतुर्थांशरूप- त्वात्परिधिवर्गहरेण हरो नवांशाधिकः कृतः । यथा परिधिवर्गः स्वपादयुक्तो जातः पञ्चा- हतः परिधिवर्गचतुर्थभागः पव ५/४ । अयं परिधिषड्भागजनितप्रथमेनानेन पव ५/३६ समच्छेद- तया हीनो जातः परिधिवर्गश्चत्वारिंशद्गुणितः षट्त्रिंशद्भक्तस्तत्र गुणहरौ चतुर्भिरपवर्तितौ जातौ परिधिवर्गस्य गुणहरो दशनवमितौ । तेनोक्तप्रकारेण नवांशाधिकः कृतः । परिध्यर्ध- चापे तु प्रथमस्य परिधिवर्गचतुर्थांशरूपत्वात्तदूने पञ्चाहते परिधिवर्गचतुर्थभागे परिधिवर्ग- तुल्यत्वान्न हराधिक्यमित्युक्तप्रकारेण षड्भागपरिध्यर्धयोः सूक्ष्मज्यासिद्धिरितदितरज्यास्तु स्वसंबन्धिहराभावाल्लाघवाद्वैतीयवगतहरग्रहणेने साधिताः स्थूला एव भवन्ति । स्वस्वह- राणामनुगतैकप्रकाराभावात् । पृथक्पृथक् तद्दानयनकथने च गौरवादिति पाट्योक्तज्या- साधनस्य स्थूलत्वं स्फुटमेवेत्यलं पल्लवितेन ॥२१॥२२॥२३॥२४॥२५॥ अथ प्रतिज्ञाता ज्योत्पत्तिर्निरूपितेत्युपसंहारं ज्याविचाराणां कांक्षासिद्ध्यर्थं फक्कि- कायाऽऽह—इति ज्योत्पत्तिरिति ! स्पष्टम् ॥ केदारदत्तः—इस गोलाध्याय ग्रन्थ के मध्यगति वासना अधिकार के अनन्तर छेद्यकाधिकार के श्लोक ६ तक ज्या चाप विषयक जीवा क्षेत्र संस्थान के ६ श्लोकों में, किसी वृत्त के चतुर्थांश ३६०/४ = ९० अंशों के चाप के १....१५....३०....४५.... ६०....७५....९० के चाप अंशों का चापीय मानों का सरल रेखात्मक मान ज्ञात किया गया है । किसी वृत्त के केन्द्रगत वृत्त परिधि तक जाने वाली पूरी रेखा का नाम व्यास और अर्द्धव्यास का नाम त्रिज्या अर्थात् तीन राशियों की ज्या कहा गया है । भूगर्भ केन्द्राभिप्रायिक इञ्च, फीट, गज, मील (किलोमीटर) आदि से लेकर अनन्त दूरी तक के वृत्तों में इष्ट वृत्त दूरी की कल्पित दूरी के अभीष्ट वृत्त की व्यासार्ध रेखा का प्रसिद्ध रेखाकार नाम त्रिज्या होता है और यह त्रिज्या अभीष्ट वृत्त की चतुर्थांश चाप की ज्या कही जाती है । यदि वृत्त का परमाधिक चाप ९० अंश है तो ९० × ६० = ५४०० कला इस चाप की रेखाकार परम ज्या त्रिज्या का मान = ३४३८ कला प्राचीन आचार्यों ने (प्रारम्भ सूर्य सिद्धान्त से सिद्धान्त ज्योतिष काल ने) माना है । आचार्य ने ज्या चाप गणित के इस विषय में अपनी "लीलावती" (अङ्कगणित) नामक पाटी गणित के वृत्तक्षेत्र व्यवहार में सविस्तार बता दिया है । जैसे आचार्य के प्रश्नानुसार उत्तर में आचार्य की बताई गई गणित प्रक्रिया के उदाहरण से— जिस वृत्त का व्यास मान, (हाथों, मीलों, किलोमीटर....आदि) ७ है उस व्यास की परिधि क्या होगी ?
ज्योत्पत्तिवासना २२५ व्यासे भनन्दाग्निहते विभक्ते खबाणसूर्यैरित्यादि से— ७ × ३९२७ २७४८९ १२३९ ―――――― = ―――――― = २१ ――――― । यहाँ पर लब्धि पूर्ण २१ और शेष . १२५० १२५० १२५० १२३९ ―――― को स्वल्पान्तर से १ मान लेने पर परिधि मान = २२ होता है। १२५० फलतः ७ व्यास में परिधि = २२ होती है, अतः अनुपात से इष्ट व्यास में २२ × इष्टव्यास २२ १ ――――――― = परिधि होती है। ―― का तात्पर्य ३ ―― भी होता है। ७ ७ ७ २२ आधुनिक गणित से भी सिद्ध दशमलवकीय पद्धति से ―― = ३.१४ ५९२६, ७ ३९२७ जो भास्कराचार्य के सूक्ष्म मान = ―――― इससे भी ३.१४१६••••आधुनिक मान के १२५० आसन्न हो जाता है। फलतः किसी भी वृत की वृत्तपालियों से केन्द्र तक गई रेखा का नाम व्यास और उसका मान जिस माप में जितना हो उसे २२ से गुणा कर ७ से भाग देने से उस वृत्त [चित्र: वृत्त, केन्द्र 'के.', ऊर्ध्व बिन्दु 'अ', अधो बिन्दु 'च', क्षैतिज व्यास 'य ल', अन्य व्यास 'र प', 'ह क'। लम्ब 'क द' (अ-के पर) तथा 'क म' (य-ल पर)] की परिधि का मान स्पष्ट हो जाता है। वृत्त केन्द्र और परिधि के दोनों बिन्दु तक गत रेखा का परम्त्व मान व्यास होता है। जैसे, अ च = कह = लय, = पर = चअ, इत्यादि। यह सभी व्यास रेखा है। इससे बड़ी रेखा वृत्त में हो नहीं सकतीं। यहाँ पर वृत्त व्यास और वृत्त परिधि के गणितीय सम्बन्ध स्पष्ट हैं। किन्तु वृत्त के अनेकों विभागों की चापात्मक वक्र रेखा की जो सरला- कार रेखा होती है उसका मान ज्ञात करना इस प्रकरण का आवश्यक गणित अचार्य ने बताया है। जैसे चाप = अ क इसकी सरलाकार रेखा का नाम क द = अ क चाप की ज्या से, एवं ९० - चाप अ क = चाप क ल भी ज्या का नाम फ़म को कोटिचाप कहा गया १५
२२६ गोलाध्याये है। अथवा यदि कल चाप है तो कल चाप की ज्या = कम, तथा ९०—क ल = अ क की ज्या = क द यह कोटिज्या होतो है । इस प्रकार १ अंश से ९० अंश तक के चाप की ज्या का गणित मान अंकों में साधित किया गया है। इस प्रकार का ज्या गणित ८ प्रकार का जगह-जगह जहाँ जिसकी आवश्यकता होती है, होता है। जैसे— १. ज्या २. कोटिज्या ३. स्पर्श ज्या ४. कोटिस्पर्श ज्या ५. छेदन ज्या ६. कोटि छेदन रेखा (ज्या) ७. उत्क्रम ज्या या उत्क्रम रेखा और (८) उत्क्रम चाप कोटि चाप की सरल रेखा का नाम कोट्युत्क्रम ज्या होता है । वक्राकार अभीष्ट चाप का सरलाकार रेखा का मान कितना होगा ? और यह साधनिका गणित से क्या आवेगी ? इस प्रकार के प्रश्न और समाधान पर इस ज्योत्पत्ति प्रकरण में आचार्य ने, मूल सही सिद्धान्तों का गणित स्पष्ट कर दिया है । इसी आधार से आधुनिक प्रकाशित एवं विकसित गणित में यह विषय अत्यधिक अधिक सूक्ष्म रीति से गणित संसार में यत्र तत्र सर्वत्र उपलब्ध हैं और ग्रन्थों में जो सरल त्रिकोणमिति एवं चापीय त्रिकोणमिति नाम से प्रसिद्ध हैं तथा सिद्धान्त शिरोमणि गोलाध्याय की प्राचीन उपलब्ध पुस्तकों में इस छेदकाधिकार में ज्योत्पत्ति के मात्र ६ श्लोकों का उल्लेख करते हुये ग्रन्थ समाप्ति के अनन्तर आचार्य ने "ज्योत्पत्ति" नाम का एक स्वतन्त्र प्रकरण पृथक दिया है। अनेक प्राचीन पुस्तकों में भी पूरा ज्योत्पत्ति प्रकरण समाप्ति पर न देकर कुछ आचार्यों ने यहीं पर यह प्रकरण देकर समापन के अनन्तर .... छेदकाधिकार का ७ वाँ श्लोक "भूमेर्मध्ये खलु भवलयस्यापि मध्यं यतः स्यादिति" दिया है। तदनुसार मैंने भी उक्त ज्योत्पत्ति प्रकरण को प्रसङ्गानुसार यहाँ पर ही देना उचित समझ कर प्रकरण प्रसंग का समन्वय उचित समझा है। तथा मरीचि भाष्य पर इस विषय में अत्यन्त अधिक गहन विचार, उपपत्ति, ज्यागणित उपस्थित हुआ है जो तत्काल में आवश्यक था । आज के युग में इस ज्या चाप गणित सम्बन्ध के अनेक स्वतन्त्र ग्रन्थ सरलत्रिकोण- मिति चापीय त्रिकोणमिति नाम से प्रसिद्ध हैं अत एव यहाँ पर ग्रन्थ गौरव भय से इसका श्रम साध्य "केदारदत्तः" व्याख्यान अनावश्यक ही है सुविधा से उपलब्ध ग्रन्थान्तरों में इस व्याख्यान की अपेक्षा सम्बन्धित ग्रन्थों में और अच्छी व्याख्या की समुपलब्धि से विषय के अध्येता वर्ग को क्लेश नहीं अपि च ऐच्छिक सहायता मिलेगी । ●
अथ गोलबन्धाधिकारः इदानीं गोलबन्धाधिकारमाह— सुसरलवंशशलाकावलयैः श्लक्ष्णैःसचक्रभागाङ्कैः । रचयेद्गोलं गोले शिल्पे चानल्पनैपुणो गणकः ॥१॥ वा० भा०—स्पष्टम् ॥१॥ मरीचिः—अथोत्तमश्लोकस्य गोलान्तर्गतत्वावगमार्थं गोलस्वरूपप्रतिपादकोऽधिकारः पूर्वं स्वतन्त्रतया प्रतिज्ञातो ग्रहगणितजातवासनानिर्णायको दृष्टान्तरूपगोलबन्ध आरब्धो व्याख्यायते । तत्र ग्रहगणितसंस्थातिरूपकदृष्टान्तगोलः कथं सिद्धो भवतीत्यतो गीत्याऽऽह— सुसरलेति । सुसरला अवक्राः । गोलाकारसिद्ध्यर्थमेव ये वंशास्तेषामूर्ध्वाधरच्छेदेन याः शलाका निर्मिता अनतिस्थूलपृष्ठाः समास्तासां यानि वलयानि कृतानि । वंशानां वृत्तासंभवात्तच्छ- लाकात्तादोक्तमुक्तम् । एतदुपलक्षणाद्यथाभाग्यं धात्वादिभिर्निर्मितानि तैरित्यर्थः । श्लक्ष्णैः स्निग्धैः । अन्यथा तद्बन्धनादावङ्गुलिषु तदंशाणुकादिलघुशलाकाभेदनसंभावनया दुःख- हेतुत्वादुपेक्षणीयत्वापत्तेः । गणको ग्रहगणितवासनानिरूपणप्रदर्शकः । गोलं बुद्धिकृता- काशविभागगोलकल्पितपरिधिरूपानकवृत्तानुकल्पवंशजनितवृत्तानां बन्धनं गोलाकारेण गोलबन्धस्तमित्यर्थः । रचयेच्छिष्यबोधार्थं वक्ष्यमाणप्रकारेण कुर्यादित्यर्थः । ननु दृष्टान्त- रूपैतद्गोले ग्रहगणितपदार्थस्वरूपावगमेऽपि तत्संख्याज्ञानं न स्यादित्यतो वृत्तविशेषणमाह— सचक्रभागाङ्कैरिति । चक्रं द्वादश राशयस्तेषां भागाः प्रदेशास्तेषामङ्काश्चिह्नानि तैः सहितै- र्वृत्तैरित्यर्थः । तथा च वृत्ते द्वादश राशिविभागाः समाः कार्यास्तत्रैकैकस्मिन् विभागे त्रिंशद्भागा अङ्क्यास्तत एकैकस्मिन्भागे षष्टिकला अङ्क्यास्तत एकैककलाप्रदेशे षष्टि- विकला अङ्क्याः । एवं वृत्तानि सर्वाण्यङ्कितानि । ततो ग्रहगणितपदार्थसंख्यावगमोऽप्येतद्- गोले सुशकय इति भावः । गोलबन्धोऽभ्रान्ततया कार्योऽन्यथाऽऽकाशस्थितिविरुद्धतया सिद्धाद्- गोलबन्धाच्छिष्याणामयथार्थज्ञानं स्यादिति गणकविशेषणेनाऽऽह—गोल इति । आकाश- स्थितौ शिल्पकर्तव्यतायाम् । चः समुच्चये । अनल्पमत्यन्तं नैपुणं निपुणता तदभिज्ञत्वं यस्यासावित्यर्थः । तादृशनिर्मितगोलस्य तत्स्थितिविरुद्धत्वमसंभवीति भावः । विना शिल्पा- भिज्ञतां समभागाङ्कनाद्यशक्यमिति तदावश्यकत्वमिति ध्येयम् ॥१॥ केदारदत्तः—गोलाकृतिक बाँस या अन्य उपकरणों से गोल रचना की युक्ति कही जा रही है। सुन्दर सरल चिक्कन बाँस के छेदित लकड़ियों से जिनमें १२ राशियों, उन के कला विकलाओं आदि के स्थान अङ्कित किये गये हों ऐसी लकड़ी या अन्य उपकरणों से, शिल्प-
२२८ गोलाध्याये शास्त्र में दक्ष एवं गोलशास्त्र में अत्यन्त बुद्धि सम्पन्न गणक जो ग्रहगोलीय और भगो- लीय वृत्तों के सम्बन्धों से सुपरिचित भी हो, ऐसे गणक से भौतिक गोल की रचना करनी चाहिए ॥१॥ अथ गोलबन्धमाह— कृत्वाऽदौ ध्रुवयष्टिमिष्टतरुजामृज्वीं सुवृत्तां ततो यष्टीमध्यगतां विधाय शिथिलां पृथ्वीमपृथ्वीं बहिः । बध्नीयाच्छशिसौम्यशुक्रतपनारेज्याकिभानां दृढान् गोलांस्तत्परितः श्लथौ च नलिकासंस्थौ खदृग्गोलकौ ॥२॥ वा० भा०—आदौ सारदारुमयीं कृत्वा तदर्धस्थाने तत्र प्रोतां पृथ्वीं सूक्ष्मां शिथिलां च विधाय तस्या बहिश्चन्द्रादीनां गोलान्यष्टया सह दृढान्बध्नीयात् । तेषां बहिर्नलिकासंस्थौ खदृग्गोलाविति साधारण्येनोक्तम् ॥२॥ मरीचिः—अथगोलबन्धक्रमितिकर्तव्यताकथनद्वारा तदुद्देशं शार्दूलविक्रीडितेनाऽऽह— कृत्वेति। आदौ प्रथममिष्टतरुजामभीष्टसारवृक्षकाष्ठसंभूतामन्यथा चिरकालावस्थायित्वानुप- पत्तेः । ध्रुवयष्टिं ध्रुवौ दक्षिणोत्तरदिक्स्थौ गोलवृत्तार्धान्तरितौ तयोरन्तरसूत्रं याम्योत्तर- सूत्रं बुद्धिकृतं सूक्ष्मं तदनुकल्पा यष्टिर्ध्रुवयष्टिस्तामृज्वीं सरलाग्रभागाम् । अन्यथा वृत्तार्धा- न्तरत्वं तदग्ररूपध्रुवानुकल्पयोर्न स्यात् । सुवृत्तां निरस्ताम् । अन्यथाऽनवरतभ्रमणानुपपत्तेः ।
गोलबन्धाधिकारः २२९ त्मकाग्रभागतुल्यौ नलिकयोः प्रक्षिप्य यथाशिथिलौ तन्नलिकाद्वयसंबद्धावित्यर्थः। खदृग्गोलकौ खगोलदृग्गोलो वक्ष्यमाणौ श्लथौ परस्परमसंस्पृष्टौ । एतेन तयोरूर्ध्वाधरान्तरमल्पं भेदार्थं कार्यमन्यथा भगोलस्थान एव खगोलदृग्गोलयोः सत्त्वान्न तदूर्ध्वोर्ध्वमित्युक्तानुपत्तेः । चः समुच्चये । वक्ष्यमाणरीत्या बध्नीयात् । खगोलदृग्गोलयोः स्थिरत्वादभगोलस्थाने तन्नि- बन्धनमशक्यमन्यथा तद्भ्रमापत्तेः । अतो नलिकासंस्थतया शिष्यबोधार्थं भिन्नौ दर्शितौ । न वस्तुत इति भावः ॥२॥ केदारदत्तः—गोल बन्धन कैसा होता है ? स्पष्ट (गोल रचना) बताया जा रहा है— सारगर्भित वृक्ष के अथवा बांस के छेदित दीर्घाकार वृत्ताकार लकड़ी के टुकड़ों से (जो दीर्घ समय तक अविकृत रह सकती हैं) ध्रुव यष्टि नामक यष्टि का निर्माण करना चाहिए जिससे ध्रुव तारा वेधेन पृथ्वी में ध्रुव स्थान निश्चित किया जा सकता है । ध्रुव- यष्टि के अर्ध बिन्दु पर भू केन्द्र कल्पना पूर्वक अतिलघु भूपिण्ड की रचना के साथ, तदु- परि और उपरि उपरि चन्द्र-बुध-शुक्र-सूर्य-मंगल-बृहस्पति-शनि और अन्त में नक्षत्र गोल को भूगर्भ से यथेष्ट त्रिज्या दूरी पर दृढ़ मजबूती से बाँधकर (जिनका परस्पर विच्छेद न हो जो दीर्घ काल तक बँधे रह सकें) उक्त यष्टि के आधार पर एक खगोलान्तरगत दृग्गोल का निर्माण करना चाहिए ॥२॥ इदानीं सविशेषमाह— पूर्वापरं विरचयेत्सममण्डलाख्यं याम्योत्तरं च विदिशोर्वलयद्वयं च । ऊर्ध्वाध एवमिह वृत्तचतुष्कमेतदावेष्ट्य तिर्यगपरं क्षितिजं तदर्धे ॥३॥ वा० भा०—एकं पूर्वापरमन्यद्याम्योत्तरं तथा कोणवृत्तद्वयमेवं वृत्तचतुष्ट्य- मूर्ध्वाधोरूपमावेष्ट्य तदर्धे क्षितिजाख्यं निवेशयेत् । अत्र याम्योत्तरवृत्त उत्तर- क्षितिजादुपरि पलांशान्तर एकं ध्रुवचिह्नं कार्यम् । दक्षिणक्षितिजादधोऽन्यत् ॥३॥ मरीचिः—अथ खगोलस्य स्थिरत्वात्प्रथमोद्दिष्टत्वाच्च तं विवक्षुरादौ पञ्चवृत्तनिबन्धनं वसन्ततिलकयाऽऽह—पूर्वापरमिति । इह खगोलबन्धे कर्तव्ये प्रथमं पूर्वापरं सममण्डलसंज्ञं वृत्तम् । स्वस्थानसंबन्धिवृत्तानु- रोधेनाऽऽकाशविभागगोलसंबन्धि महद्वृत्तमतिसूक्ष्मं तदनुकल्पमेकं वंशादिवृत्तं तदुभयसंज्ञं द्वितीयं ध्रुवद्वयोपरिस्थितसूक्ष्मवृत्तानुकल्पं याम्योत्तरवृत्तम् । चः समुच्चये । तेनेदं वृत्त- द्वयम् । विदिशोः पूर्वादिदिक्चतुष्टयसंबन्धिरूपचतुर्विदिशां मध्ये विदिशोर्नैरृत्यैशान्यो- राग्नेयवायव्ययोः संबन्धि वृत्तद्वयम् । चकारोऽन्ययोगव्यवच्छेदार्थकवकारपरस्तेनाग्नेयनै- ऋत्योरैशानीयवायव्योरेकं वृत्तमिति वृत्तद्वयकरणनिरासः । गोले तयोः संनिवेशायोगात् । तथा च कोणवृत्तद्वयम् । एवं वृत्तयुग्माभ्यां युक्तं वृत्तचतुष्कमेतत्स्वस्वमार्गागोचरधर्मार्थे ऊर्ध्वाध आवेष्ट्य निबन्धनेनैतदावृत्त्य । अत्र याम्योत्तरवृत्तं यष्ट्यग्रभागद्वयान्तर्गतनलिका-
२३० गोलाध्याये द्वयभेदनपूर्वकं कार्यमन्यथा खगोलस्य गोलानुकारत्वानुपपत्तिरिति ध्येयम् । तदर्थं तेषा- मुक्तवृत्तानां संपाताभ्यामर्धभागे । अपरमुक्तातिरिक्तं तिर्यग्वृत्तं स्वस्थानाद्दृश्यभूगोलार्ध- संधिस्यवृत्तानुसृताकाशगोलसूक्ष्मवृत्तानुकल्पवृत्तं क्षितिजम् । भूगर्भोदयास्तोपजीव्यं विरच- येद् बध्नीयात् ॥३॥ केदारदत्तः—पूर्वापर वृत्त (जिसे सममण्डल भी कहते हैं) पर लम्ब रूप याम्योत्तर वृत्त की रचना के साथ पूर्वापर याम्योत्तर वृत्त सम्पातद्वय ऊर्ध्वाधर खमध्यगत दो कोण- वृत्तों की रचना करनी चाहिए । इन चारों वृत्तों में प्रत्येक वृत्त के अर्द्ध भाग पर क्षितिज संज्ञक वृत्त की रचना (सम्पात) करनी चाहिए ॥३॥ इदानीमुन्मण्डलमाह— पूर्वापरक्षितिजसंगमयोर्विलग्नं याम्ये ध्रुवे पललवैः क्षितिजादधःस्थे । सौम्ये कुजादुपरि
गोलबन्धाधिकारः २३१ इदानीं विषुवन्मण्डलमाह— पूर्वापरस्वस्तिकयोर्विलग्नं खस्वस्तिकाद्दक्षिणतोऽक्षभागैः । अधश्च तैरत्तरतोऽङ्कितं च षष्ट्याऽत्र नाडीवलयं विदध्यात् ॥५॥ वा० भा०—तयोरेव पूर्वापरसंपातयोर्विलग्नं तथा याम्योत्तरवृत्ते खस्वस्ति- काद्दक्षिणतोऽधः स्वस्तिकादुत्तरतोऽक्षांशान्तरे यद्वृत्तं निबध्यते तद्विषुवद्वृत्तम् ॥५॥ मरीचिः—ननु दिननिशोर्घटिकात्मकत्वान्न्यूनाधिकत्वं गोले ज्ञातुमशक्यमत्र कस्मि- न्नपि वृत्ते घटिकाङ्कनाभावात्सर्वत्र राश्यंशानामङ्कनादित्यत उपजातिकयाऽऽह—पूर्वा- परेति । अत्र खगोले । पूर्ववृत्ततुल्यमेकं वंशशलाकावृत्तं नाडीवृत्तसंज्ञं विदध्यान्निबध्नीयादि- त्यर्थः । निबन्धनप्रकारमाह—पूर्वा
गोले" doesn't make sense. Wait, what about "दृक्गोले"? What about "दृष्टगोले"? Wait, look at line 28: दृ ष्ट Let's zoom in on the last word of line 28: It has: Letter 1: दृ Letter 2: ष्ट (looks like ष with ट at bottom, wait, does it have a loop? It has a vertical and an anusvara: 'ष्टा' or 'ष्टान्'?) Wait, look at the two characters at the end: There is a hyphen at the end: '-' Before the hyphen is 'त' (ta)? Wait: "दृष्टान्त-"? But why would it hyphenate before 'गोले'? Could it be "दृष्टान्तगोले"? There is no such thing as dṛṣṭāntagola. Wait! Could it be "दृष्टान्ते"? But why "गोले" on next line? Wait! Could the word be: "...कत्वाक्षतेः । दृष्टान्त-" Wait, is the next line "गोले"? Look at line 29: "गोले ग्रहबिम्बाद्यभावाच्च ।" Wait, could line 28 end with: "दृष्टान्त-"? No, look at line 28: "दृष्टान्-त" -> wait, does it say "दृष्टान्" at end of 28 and "त" is somewhere? No, line 28
गोलबन्धाधिकारः २३३ भ्रमद्गोलाना मष्टसंख्यामितत्वात् । रचयेत्कुर्यात् । तथा च खगोलोर्ध्वाधरस्वस्तिकसम- कसमसूत्रेण नक्षत्रग्रहगोले यत्स्थानं तदन्तः कीलयुग्मप्रोतं श्लथं दृग्वृत्तं तत्र तत्र भ्रमत्येवेति तेषां सुबोधम् । याम्योत्तरवृत्ते च यष्टिप्रतिबन्धात्तदाकारं सम्यङ्न भवत्यपि तदाकारं दृग्वृत्तं ज्ञेयम् । विशेषमाह—दृङ्मण्डलमिति । वित्रिभलग्नस्थानस्य दृग्वृत्तम् । इदं परिभ्रमानीतं दृक्क्षेपवृत्तसंज्ञम् । पूर्वाचार्या वदन्ति । न दृग्वृत्तमिति । अत एव वित्रिभल- ग्नशङ्कुदृग्ज्यादृक्क्षेपसंज्ञः सूर्यग्रहणाधिकार उक्तः ॥७॥ केदारदत्तः—उक्त दृङ्मण्डल का प्रयोजन—एक ही चल दृङ्मण्डल का उपयोग सभी ग्रहों पर किया जा सकता है। ऊर्ध्वाधर खमध्यों में बद्ध और इतस्ततः ऐच्छिक ग्रह बिम्ब केन्द्र बिन्दु गत एक ही धरातल गत दृङ्मण्डल की आठों या अनेकों ग्रह तारों के वेध के लिये इस वृत्त का ग्रहों में वेध के लिये उपयोग किया जा सकता है। अथवा प्रत्येक ग्रह का पृथक् एक ही दृङ्मण्डल इतस्ततः चलायमान करने से इसका उपयोग किया जा सकता है। वित्रिभलग्न के दृङ्मण्डल की विक्षेप वृत्त संज्ञा है। लग्न से ९० अंश चाप की दूरी से विधीयमान वृत्त का नाम दृक्क्षेप वृत्त है। दृक्क्षेप वृत्त के क्रान्ति वृत्त के साथ दो सम्पात होते हैं लग्न से पृष्ठगत सम्पात का नाम वित्रिभ और लग्न से अग्रगत सम्पात का नाम सत्रिम होता है ॥७॥ इदानीमेवं खगोलमुक्त्वा दृग्गोलमाह— बद्ध्वा खगोले नलिकाद्वयं च ध्रुवद्वये तन्नलिकास्थमेव । बहिः खगोलाद्विदधीत धीमान्दृग्गोलमेवं खलु वक्ष्यमाणम् ॥८॥ भगोलवृत्तैः सहितः खगोलो दृग्गोलसंज्ञोऽपममण्डलाद्यैः । द्विगोलजातं खलु दृश्यतेऽत्र क्षेत्रं हि दृग्गोलमतो वदन्ति ॥९॥ वा० भा०—तस्मिन्खगोले ध्रुवचिह्नयोर्नलिकायं बद्ध्वा तन्नलिकाधारमेव खगोलाद्बहिरङ्गुलत्रयान्तरे दृग्गोलं रचयेत् । कथितैः खगोलवृत्तैर्वक्ष्यमाणैर्भगोल- वृत्तैः क्रान्तिविमण्डलाद्यैर्नो निबध्यते स दृग्गोलः । कथमस्य दृग्गोलसंज्ञेति तदर्थ- माह-द्विगोलजातमित्यादि । यतोऽग्राकुज्यासमाशङ्कायक्षक्षेत्राणि द्विगोलजा- तानि । भगोलवृत्तैः खगोलवृत्तमिलितैस्तान्युत्पद्यन्ते । भिन्नगोलबन्धे सम्यङ्नो- पलक्ष्यन्त इति दृग्गोलः कृतः ॥८॥९॥ इति खगोलदृग्गोलबन्धौ । मरीचिः—अथ क्रमप्राप्तं दृग्गोलबन्धनमुपजातिकयाऽऽह—बद्ध्वेति । खगोले । उक्तप्रकारजनितवृत्तसंनिवेशरूपे ध्रुवद्वये नलिकाद्वयं बद्ध्वा । खगोल- सम्बन्ध्याम्योत्तरवृत्ते दक्षिणोत्तरध्रुवचिह्नयोः प्रत्येकमेकां नलिकां दत्त्वा । तद्दानं च
२३४ गोलाध्याये याम्योत्तरोन्मण्डलभिन्ननलिकामध्यपरिधिरूपमुपक्रम एवोक्तरीत्या संभवति । अन्यथा तद्बन्धनानुपपत्तेः । चकारान्नलिकच्छिद्रमार्गेण वृत्तदाननिरासः । भ्रमद्गोलानां नलिका- प्रोतयष्ट्या तदाधारत्वात् । खगोलादस्माद्बहिरुपरि । एवकारात्तदधोनिरासः । खगोला- ज्ञानेन तन्निबन्धनाशक्यत्वात् । तन्नलिकास्थम् । खगोलप्रोतनलिकास्थानान्तरप्रोत- दृग्गोलम् । एवं खगोलवद्वंशादिवृत्तैः । धीमान्गणको विदधीत कुर्यात् । धीमानित्यनेन यथा खगोलो वृत्तस्पृष्टो न भवति तथा नलिकाद्वयान्तस्थानान्तरे बध्नीयादिति सूचितम् । ननु तत्प्रकाराभावात्कथं तन्निबन्धनं शक्यमित्यत आह—वक्ष्यमाणप्रकारेणेत्यर्थः । ननु दृग्गोल- स्यावास्तवत्वेन तन्निबन्धनं व्यर्थमेवेत्यत आह—खल्विति । निश्चयेनावश्यं तन्निबन्धनं कार्यमित्यर्थः । तथा च तदवास्तवत्वेऽपि तन्निबन्धनं क्षेत्रादिदर्शनार्थमावश्यकमिति भावः ॥८॥ अथ प्रतिज्ञातदृग्गोलस्य निबन्धनं प्रकारदृग्गोलसंज्ञाहेतुं चोपजातिकयाऽऽह—भगोल- वृत्तैरिति । भगोलसंबन्धीनि यानि वृत्तानि तैः सहितो युक्तः खगोलो दृग्गोलसंज्ञो भवति । उक्त- प्रकारेण खगोलं बद्ध्वा तत्र भगोलवृत्तानि बध्नीयात् । तेन सिद्धो गोलो दृग्गोलत्वेन व्यपदिश्यत इति भावः । ननु भगोलवृत्तानामज्ञानात्कथं तन्निबन्धनमत आह—अपवि- मण्डलाद्यैरिति । अपमण्डलं क्रान्तिमण्डलम् । विमण्डलं विक्षेपमण्डलं वृत्तम् । नामैकदेशे नामग्रहणात् । आद्यपदाद्युद्युरात्रवृत्तानि । एतानि भगोलसंबन्धिवृत्तानीत्यर्थः । नन्वेतस्यो- भयगोलवृत्तात्मकत्वात्खगोलभगोलमिश्रगोलत्वं कथं दृग्गोलत्वमत आह—द्विगोलजात- मिति । खगोलभगोलवृत्तसंपातजनितं क्षेत्रं द्वितीयाक्षेत्रभिन्नम् । अत्र मिश्रगोले हि यतः खल्वसंशयं दृश्यते । अतः कारणादेनं मिश्रगोलं दृग्गोलं पूर्वाचार्या वदन्ति । तथा च गोलक्षेत्रं खगोले प्रत्यक्षम् भगोले भगोलक्षेत्रं प्रत्यक्षम् । तदुभयजं क्षेत्रं तत्र तत्रादृश्यमत- स्तद्दर्शनार्थमयं गोलबन्ध उपकल्पित इत्ययं दृग्गोलसंज्ञ उक्त इति भावः ॥९॥ केदारदत्तः—द्विगोलज दृग्गोल बताया जा रहा है— इस प्रकार खगोल में दो नलिका (१-दृग्गोलखगोल) जो दोनों ध्रुवों को जो नलिका, २-अपने अग्र भागों में दर्शाती हैं उसके आगे आकाश में खगोलाधार से वक्ष्यमाण दृग्गोल की रचना कर, क्रान्ति वृत्त प्रभृति अनेक उपकरणों से युक्त खगोल एवं दृग्गोल की रचना से द्विगोलोत्पन्न क्षेत्रों की रचना जो दृष्टिगत होती है बनानी चाहिए । अतः एव उक्त सभी पूर्वापरयाम्योत्तर क्षितिज-उन्मण्डल-कोण-क्रान्ति-विमण्ड आदि सभी द्विगोलीय विषयों को दृग्गोलीय समझा जाता है । गोल का सम्यक् ज्ञान होने से उक्त विषय समझ में आते हैं और गोल रचना ठीक होती है । नहीं तो बुद्धि ही गोल हो जाती है ॥८-९॥
गोलबन्धाधिकारः २३५ इदानीं भगोलबन्धमाह— याम्योत्तरक्षितिजवत् सुदृढं विदध्या- दाधारवृत्तयुगलं ध्रुवयष्टिबद्धम् । षष्ट्यङ्कमत्र सममण्डलवृत्ततीयं नाडचाह्वयं च विषुवद्वलयं तदेव ॥१०॥ वा० भा०—यथा खगोले क्षितिजं याम्योत्तरं च तदाकारमपरमाधारवृत्तद्वयं ध्रुवयष्टिसंस्थंकृत्वा तदुपर्यंन्यत्तृतीयं सममण्डलाकारं घटीषष्ट्या चाङ्कितं कार्यम् । तन्नाडीवृत्तं विषुवद्वृत्तसंज्ञं च ॥१०॥ मरीचिः—अथ भगोलवृत्तानां ज्ञानेऽपि तन्निबन्धनप्रकाराभावाद्दृग्गोलसम्बन्धोऽप्य- शक्य इत्यतो भगोलबन्धं विवक्षुः प्रथमं वृत्तत्रयनिबन्धनं वसन्ततिलकयाऽऽह--याम्येति । याम्योत्तरक्षितिजवत् । यथा खगोले याम्योत्तरवृत्तं खमध्यात्तद्वृत्तार्धं क्षितिजवृत्तं निबद्धं तथैवाऽऽधारवृत्तद्वयं ध्रुवयष्टिबद्धं तत्प्रोतमुभयत्राऽङ्गुलान्तरेणोपान्तिमभागे सुदृढं विदध्यात् कुर्यात् । अत्र क्षितिजवदिति निरक्षक्षितिजवदिति समीचीनम् । भ्रमद्गोले तस्य तदाकारत्वात् । स्वदेशक्षितिजप्रदेशयोध्रुवयष्ट्याग्राभ्यामध ऊर्ध्वं सत्त्वात् । अत्र भगोल- वृत्तानां निराधारार्थं खगोलसंबद्ध्यु(द्धत्वम्)क्तम् । तत्रैकैकवृत्तस्यैव ध्रुवयष्टिप्रोतत्वे शिथिल- तयाऽर्धार्धे यष्टिः कदाचिन्न स्यादिति वृत्तमावश्यकम् । अत्राऽऽधारवृत्तयुगले षष्टिचिह्ना- ङ्कितं तृतीयं वृत्तं सममण्डलवत् । यथा खगोले याम्योत्तरक्षितिजवृत्ताभ्यामर्धार्धसममण्डल- मस्ति तथेद् वृत्तयुगलार्धार्धे निबद्धं नाडी(ड्या)ह्वयं भवति । भ्रमद्गोले तस्य खगोल- बद्धनाडीवल्याकारत्वात् । ननु भगोलवृत्ते खगोलवृत्तस्याप्रयोजनात्तद्गोले किमर्थमत आह—विषुवद्वलयमिति । तत् । यत्षष्ट्यङ्कं वृत्तं बद्धं तत् । एवकारातदतिरिक्तवृत्तनिरासः । विषुवद्वृत्तम् । तथा च भगोले ग्रहस्य तुल्यदिनरात्रिसमय एतद्वृत्तानुरोधेन भ्रमणादस्य विषुवद्वृत्तत्वमिति भावः । चकारो वार्थकस्तेन खगोल एतदनुकारवृत्तं नाडीसंज्ञं स्थिरत्वात् । भगोल एतदनु- कारवृत्तविषुवत्संज्ञं चलत्वादित्यर्थः । अत्र षष्ट्यङ्कनं क्रान्तिवृत्तं नक्षत्रादीनां भ्रमणं षष्टि- नाक्षत्रघटीभिरिति दर्शनार्थमिति ध्येयम् ॥१०॥ केदारदत्तः—भगोलबन्ध बताया जा रहा है— याम्योत्तर क्षितिज वृत्त की तरह सुदृढ़ दो आधार वृत्त जो ध्रुवयष्टि से संलग्न होते हैं उनकी रचना पूर्वक सममण्डल (पूर्वापर वृत्त) के आकार का एक अन्यवृत्त की रचना जिसमें १, २...३...४...५०...६० तक घटिका चिह्न अङ्कित होते हैं, और जिसे विषुवद्वृत्त या नाडीवृत्त कहते हैं उसकी भी रचना भगोलाकाश में करनी चाहिए ॥१०॥
२३६ गोलाध्याये इदानीं क्रान्तिवृत्तमाह — क्रान्तिवृत्तं विधेयं गृहाङ्कं भ्रम- त्यत्र भानुश्च भार्धे कुभा भानतः । क्रान्तिपातः प्रतीपं तथा प्रस्फुटाः क्षेपपाताश्च तत्स्थानकान्यङ्कयेत् ॥११॥ वा० भा०—अथान्यत्तत्प्रमाणमेव वृत्तं कृत्वा तत्र मेषादिं प्रकल्प्य द्वादश- राशयोऽङ्कयाः । तत्क्रान्तिवृत्तसंज्ञम् । तस्मिन् वृत्ते रविर्भ्रमति । तथा रखेर्भा- र्द्धान्तरे भूभा च । तथा तत्र क्रान्तिपातो मेषादेर्विलोमं भ्रमति । तथा ग्रहाणां विक्षेपपाताः प्रस्फुटा विलोमं भ्रमन्ति । अतः क्रान्तिपातादीनां स्थानानि तत्रा- ङ्कयानि ॥११॥ मरीचि—अथ भगोले क्रान्तिवृत्तं स्वरूपेण सिद्धं कुर्वन् स्रग्विण्याऽऽह—क्रान्तिवृत्तमिति। विषुवद्वृत्तसमं वंशादिजमन्यद्वृत्तं गृहाङ्कं चक्रांशाद्यङ्कितमप्यभीष्टस्थानान्मेषादिद्वाद- शराशिप्रथमाक्षराङ्कितं विधेयम् । तत्क्रान्तिवृत्तम् । एतद्वृत्तमाकाशस्थितभगोलवृत्तान मध्ये कस्यानुकल्पमत आह—भ्रमतीति । अत्रास्मिन्वृत्ते भानुः सूर्यः स्वकक्षायां भ्रमतीति । स्वपूर्वगत्या गच्छति । भानतः सूर्यात् । भार्धे षड्भान्तरे कुभा भूछाया स्वकक्षायां भ्रमति । रविः पूर्वगत्या गच्छति । चः समुच्चये । भूम्यभितः सूर्यभ्रमणात्तत्कृतभूछाया- यास्ततो वृत्तार्धे पतनात् । तथा च यस्मिन्वृत्तेऽर्कः पूर्वगत्या द्वादशराशिभोगं करोति तद्वृत्तानुकल्पमिदमिति भावः । प्रसङ्गादेतद्वृत्तभ्रमणपदार्थान्तरानाह—क्रान्तिपातो वक्ष्यमाणस्वरूपः । स्वगत्या प्रतीपं सूर्यगमनस्थितिविरुद्धं तथा विलक्षणम् । कदाचित्पूर्वतः कदाचित्पश्चिमत इत्यार्षाभिप्रायेणार्थः । मुञ्जालादिमते तु प्रतीपं पश्चिमानुक्रमेण । तथा स्वगत्यर्थः । क्षेपपाताश्चन्द्रादीनां शरपाता वक्ष्यमाणस्वरूपाः । प्रस्फुटा ग्रहशीघ्रफलव्यस्त- संस्कृता वक्ष्यमाणस्वरूपा इत्यर्थः । न मध्यमाः । चकारात्प्रतीपं पश्चिमगतयः । भ्रमति भ्रमन्तीति यथायोग्यम् । नन्वाकाशे ते तत्र भ्रमन्तु । परमनुकल्पवृत्तकथने तत्कथनम्- युक्तमत आह—तत्स्थानकानीति । तेषां सूर्यभूछायाक्रान्तिपातशरपातानामत्र वृत्ते यत्र यत्र स्थानं तत्र तत्र तदाद्यक्षराण्यङ्कयेत् ॥११॥ केदारदत्तः—क्रान्तिवृत्त की रचना— १२ राशियों के अंशों की कला विकलाओं से अंकित क्रान्ति वृत्त का निर्माण करना चाहिए । सूर्यबिम्ब का भ्रमण क्रान्तिवृत्त में होता है, भूकेन्द्राभिप्रायिक भ्रमण कक्षा क्रम से क्रान्तिवृत्त में सूर्य की गति की जगह सूर्य केन्द्राभिप्रायिक ग्रह कक्षा में पृथ्वी की पूर्वाभिमुखी गति वशेन क्रान्ति का ज्ञान होता है । स्पष्ट गणित और वेध सिद्ध ग्रह गणि में अन्तर नहीं पड़ेगा ।
गोलबन्धाधिकारः २३७ सूर्य बिम्ब केन्द्र से ६ राशि की दूरी पर सूर्य प्रकाश से प्रकाशित विपरीत दिशा में पृथ्वी की छाया चलती है। तथा मेषादि से विलोम गति से क्रान्तिपात का भ्रमण होता है। इस प्रकार सभी ग्रहों के विमण्डल क्रान्तिवृत्त सम्पात भी विलोम गति से मेष से विलोम, मीन कुम्भादि क्रम से चलते हैं ।।११।। इदानीं क्रान्तिवृत्तस्य निवेशमाह— क्रान्तिपाते च पाताद्भूषट्कान्तरे नाडिकावृत्तलग्नं विदध्यादिदम् । पाततः प्राक् त्रिभे सिद्धभागैरुदग्दक्षिणे तैश्च भागैर्विभागेऽपरे ।।१२।। वा० भा०—क्रान्तिपातचिह्नात् षड्भेऽन्तरेऽन्यच्चिह्नं कार्यम् । ते चिह्ने नाडी- वृत्तेन संसक्ते कृत्वा पातचिह्नादग्रतस्त्रिभेऽन्तरे नाडीवृत्ताद्भागचतुर्विंशत्योत्तरतो यथा भवत्यपरविभागे त्रिभेऽन्तरे दक्षिणतश्च तैर्भागैर्यथा भवति तथा बध
२३८ गोलाध्याये केदारदत्तः—क्रान्ति सम्पात चिह्न से ६ राशि की दूरी पर नाडी वृत्त सम्पात समझ कर नाडी क्रान्ति वृत्त सम्पात से प्राग्विभाग में ३ राशि = ९० अंश की दूरी पर पूर्वभाग में २४ अंश उत्तर की तरफ तथा परभाग में २४° दक्षिण की तरफ के अन्तर से एक गोलज धरातल से क्रान्तिवृत्त की स्थापना करना चाहिए ॥१२॥ इदानीं विमण्डलमाह— नाडिकामण्डले क्रान्तिवृत्तं यथा क्रान्तिवृत्ते तथा क्षेपवृत्तं न्यसेत् । क्षेपवृत्तं तु राश्यङ्कितं तत्र च क्षेपपातेषु चिह्नानि कृत्वोक्तवत् ॥१३॥ क्रान्तिवृत्तस्य विक्षेपवृत्तस्य च क्षेपपाते सषड्भे च कृत्वा युतिम् । क्षेपपाताग्रतः पृष्ठतश्च त्रिभे क्षेपभागैः स्फुटैः सौम्ययाम्ये न्यसेत् ॥१४॥ शीघ्रकर्णेन भक्तास्त्रिभज्यागुणाः । स्युः परक्षेपभागा ग्रहाणां स्फुटाः । क्षेपवृत्तानि षष्णां विदध्या- त्पृथक् स्वस्ववृत्ते भ्रमन्तीन्दुपूर्वा ग्रहाः ॥१५॥ वा० भा०—अस्य श्लोकस्य समग्रस्य व्याख्यानम् । यथा क्रान्तिवृत्तं पृथक्कृत- मेवं विमण्डलमपि राश्यङ्क पृथक् कृत्वा तत्र मेषादेर्व्यस्तं स्फुटं क्षेपपातं दत्त्वाऽग्रे चिह्नं कार्यम् । अथ क्रान्तिवृत्तस्य विमण्डलस्य च क्षेपपातचिह्नयोः संपातं कृत्वा तस्मात्षड्भान्तरेऽन्यं च संपातं कृत्वा क्षेपपाताग्रतस्त्रिभेऽन्तरे क्रान्तिवृत्तादुत्तरतः स्फुटैः क्षेपभागैः पृष्ठतश्च त्रिभेऽन्तरे तैरेव भागैर्दक्षिणतः स्थिरं कृत्वा विमण्डलं निवेशनीयम् । अथ पठिता ये विक्षेपभागास्ते त्रिज्यागुणाः शीघ्रकर्णेन भक्ताः स्फुटा ज्ञेयाः । अत्रानुपातः । यदि कर्णाग्रे एतावन्तस्तर्हि त्रिज्याग्रे कियन्त इति । यतो भगोले त्रिज्यैव व्यासार्धम् । एवं चन्द्रादीनां षड्विमण्डलानि कार्याणि । स्वस्वविमण्डले ग्रहा भ्रमन्ति ॥१३॥१४॥१५॥ मरीचिः—अथ क्रमप्राप्तं विमण्डलनिबन्धनं स्रग्विणीभ्यामाह—नाडिकामण्डल इति । यथा नाडिकावृत्ते क्रान्तिवृत्तं निवेशितमुत्तरगोले उत्तरतो दक्षिणगोले दक्षिणतो नाडिकामण्डलादित्यर्थः । तथा च तद्वत्क्षेपवृत्तं विक्षेपवृत्तं क्रान्तिवृत्ते न्यसेत् । क्रान्तिवृत्त- प्रदेशाभ्यां विक्षेपकृतान्तरोत्तरदक्षिणगोलप्रदेशौ वृत्तार्धरूपावुत्तरतो दक्षिणतश्च क्रमेण यथा भवतस्तथा शरवृत्तं निवेदनीयम् । ननूक्तप्रकारेण शरोऽपि ग्रहाणां क्रान्तिवदेव सिद्धः । नाडिकावृत्ताच्चतुर्विंशत्यंशैः क्रान्तिवृत्तोत्तरदक्षिणभागयोरवस्थानात् । चतुर्विंश- त्यंशैः क्रान्तिवृत्ताच्छरवृत्तोत्तरदक्षिणभागयोरवस्थानस्योक्तत्वात् । न चेष्टापत्तिः । ग्रह- शराणां परगत्वेऽपि चतुर्विंशानुपलम्भादित्यतः साधारणोक्तं विशदयति—क्षेपवृत्तमिति ।
गोलबन्धाधिकारः २३९ क्षेपवृत्तं शलाकजं तुकारात्पूर्ववृत्तसमं चक्रभागाद्यङ्कितमपि मेषादिराशिप्रथमाक्षराद्यङ्कितं यद्वृत्तं तत्क्षेपवृत्तम् । तत्र क्षेपवृत्ते क्षेपयातेषु प्रस्फुटपातस्थानेषु चिह्नान्युक्तवत्क्रान्तिवृत्ते शरपातस्थानचिह्नानि तथेत्यर्थः । कृत्वा । चः समुच्चये । तेन क्रान्तिशरवृत्ते पातचिह्ना- ङ्कितेनैकतसम् । क्रान्तिवृत्तस्य विक्षेपवृत्तस्य च । चः समुच्चये । क्षेपपातेऽङ्कितशरपात- स्थाने सषड्भे स्वस्वषड्भान्तरितस्थानाभ्यां सह वर्तमाने । युतिं संयोगम् । चः समुच्चये । कृत्वा । क्षेपपातस्थानादग्रिमभागे राशिक्रममार्गेण । त्रिभे त्रिराश्यन्तरितप्रदेशे पृष्ठतो राश्यङ्कनविलोममार्गेण । पातस्थानात्पृष्ठभागे त्रिभान्तरिते प्रदेशे । चः समुच्चये । क्षेपभागैः स्फुटैः परमैर्वक्ष्यमाणैःक्रान्तिवृत्तात्सौम्ययाम्ये । अग्रपृष्ठक्रमेण शरवृत्तं निबन्ध- येत् । इदमप्यतीन्द्रियदृग्बिभ्रंशादिभिश्चन्द्रादिगतिदर्शनानुरोधेनोपकल्पितशरवृत्तानुकल्प- रूपम् ।।१३।।१४।। ननु शरवृत्तक्रान्तिवृत्तयोरेकत्वात्तयोः सर्वग्रहशरपाताङ्कनात्कयोः शरपातयोः संपातं कृत्वा विक्षेपवृत्तं निबन्धव्यमित्यतः क्षेपपाते त्विति बहुवचनसूचिताभिप्रायं स्फुटक्षे- पभागकथनपुरःसरं स्रग्विण्या विशदयति—शीघ्रकर्णेनेति । ग्रहाणां भौमादीनां क्षेपभागा ग्रहच्छायाधिकारे याः परमशरकलास्ताः षष्टिभक्ता इत्यर्थः । त्रिज्यागुणिताः शीघ्रकर्णेन भक्ताः फलं स्फुटाः परमशरभागाः स्युः । चन्द्रस्य परमशरभागाः सार्धचत्वार एव । शीघ्रकर्णाभावात् । अत्रोपपत्तिः । पठिताः परमशरः कर्णाग्रे । भगोलस्तु त्रिज्याव्यासार्धकः । अतो भगोले क्रान्तिशरवृत्तयोः परमान्तरज्ञा- नार्थं कर्णाग्रे परमशरस्तदा त्रिज्याग्रे क इत्यनुपातः समञ्जसः । चन्द्रस्य तु भगोले लक्षितः इति स्थिरः । क्षेपवृत्तानीति । षण्णां चन्द्रादिग्रहाणां शरवृत्तानि पृथक् पृथक् कुर्यात् । तथा च क्षेपपातेष्वित्यनेन चन्द्रादीनां षड्वृत्तानि राश्यङ्कितानि शरवृत्तानि । तेषु क्रमेण चन्द्रादिशरपाता अङ्क्याः । ततः क्रान्तिवृत्ते स्वस्वपातचिह्ने तत्षड्भान्तरे च स्वशरवृत्तं पातस्थाने षड्भान्तरे स्थाने च निबद्धं स्वस्वस्फुटशरभागैः क्रान्तिवृत्तादुत्तरयाम्ये ग्रहपृष्ठ- त्रिभान्तरे च निबद्धम् । एवमेकस्मिन्क्रान्तिवृत्ते षट्शरवृत्तानि स्वस्वपातचिह्नस्वस्वस्फुट- शरभागवशतो भिन्नानि भवन्ति । ननु भगोलस्थक्रान्तिवृत्ते शरवृत्तानां निबन्धनं नोचितम् । शरवृत्तस्य ग्रहमार्गत्वेन भगोलाद्यः कक्षामार्गेण तन्निबन्धनस्योचितत्वादित्यत आह— स्वस्ववृत्त इति । इन्दुपूर्वाद्याश्चन्द्राद्या ग्रहाः स्वकक्षायां स्वस्वशरवृत्ते भगोलस्था भ्रमन्ति । स्वपूर्वगत्या गच्छन्ति । तथा च यथा सूर्यःस्वकक्षायां भ्रमत्य(न्न)पि तत्र नक्षत्रव्यञ्जकरा- शीनामभावात्सूर्यवृत्तानुकल्पितभगोलस्थक्रान्तिवृत्ते नक्षत्राश्रितगोलान्तर्गत्वेन राशीनां सत्त्वात्तत्र सूर्यगतिः समसूत्रतया कल्प्यते । तथैव चन्द्रादीनां भगोलाधोवस्थानेऽपि तत्र राशीनामभावात्तत्समसूत्रेण भगोल एव गतिनक्षत्राद्यधिष्ठानज्ञानार्थं शरवृत्तानि कल्प्यन्त इति युक्तमेव भगोले शरवृत्ताबन्धनं लाघवं च । ग्रहगोलानपेक्षणादिति भावः ।।१५।। **केदारदत्तः—**गोल में क्षेप वृत्त अर्थात् ग्रहों के भ्रमणमार्ग में विमण्डल वृत्त निवेशन बताये जा रहे है—
२४० गोलाध्याये क्षेपवृत्त में भी राश्यादि अङ्कित कर, मेषादि बिन्दु से विलोम क्षेप पातदान बिन्दु पर चिह्न लगाकर, इस बिन्दु पर क्रान्तिवृत्त और क्षेपपात वृत्त अर्थात् विमण्डल वृत्त का सम्पात कर, इस सम्पात बिन्दु से ६ राशि आगे पर क्रान्तिवृत्त विमण्डल का द्वितीय सम्पात करना चाहिए। उक्त सम्पात द्वय बिन्दुओं से तीन राशि की दूरी पर परम शर तुल्य दूरी पर पीछे उत्तर को विमण्डल को स्थिर कर तथा उसी सम्पात से ३ राशि की दूरी पर परमशर तुल्य दूरी पर दक्षिण की तरफ स्थिर बिन्दुगत विमण्डल वृत्त की स्थापना करनी चाहिए । ग्रहों के पाठ पठित शर को त्रिज्या से गुणा कर शीघ्र कर्ण से भाग देने पर ग्रह गोलीय कक्षावृत्त रूप क्रान्ति वृत्तीय शर को त्रिज्या वृत्त में परिणत कर उसे स्फुट शर समझना चाहिए । इस प्रकार त्रिज्यागोल में चन्द्रादि शनि पर्यन्त सभी ग्रहों का इष्ट स्थानीय स्पष्ट शर होता है। सभी ग्रह भूगर्भ से शीघ्र कर्णाग्र दूरी पर अपनी कक्षाओं में भ्रमण करते हैं इसलिये सभी के शर को कर्णानुपात द्वारा अपने त्रिज्यागोल में परिणत करना उपपत्ति सिद्ध होता है ।।१३।१४।१५।। इदानीं क्रान्ति विक्षेपं चाह— नाडिकामण्डलात् तिर्यगत्रापमः क्रान्तिवृत्तावधिः क्रान्तिवृत्ताच्छरः । क्षेपवृत्तावधिस्तिर्यगेवं स्फुटो नाडिकावृत्तखेटान्तरालेऽपमः ॥१६॥ वा० भा०—क्रान्तिवृत्ते यत्स्फुटग्रहस्थानं तस्य नाडीवृत्तात्तिर्यगन्तरं सा क्रान्तिः। अथ विमण्डले च यद् ग्रहस्थानं तस्य क्रान्तिवृत्ताद्यत्तिर्यगन्तरं स विक्षेपः। अथ विमण्डलस्थग्रहस्य नाडावृत्ताद्यत्तिर्यगन्तरं सा स्फुटा क्रान्तिः ।।१६।। मरीचिः—अथ प्रसङ्गात्क्रान्तिशरयोः स्वरूपं सविवृण्वाऽऽह—नाडिकेति । अत्र भगोले नाडिकामण्डलप्रदेशात् । तिर्यग् दक्षिणोत्तरमन्तरमपमः क्रान्तिः । ननु द्वितीयावधेरज्ञानादन्तरज्ञानं कथमित्याह—क्रान्तिवृत्तावधिरिति । नाडिकावृत्तप्रदेशैकदेश- क्रान्तिवृत्तस्थस्पष्टग्रहचिह्नयोरन्तरं ध्रुवप्रोतवृत्तस्थं क्रान्तिरित्यर्थः । शरस्वरूपमाह— क्रान्तिवृत्तादिति । स्पष्टग्रहस्थानसंबन्धिक्रान्तिवृत्तप्रदेशात् तिर्यग्याम्योत्तरमन्तरं शरः । अत्र द्वितीयावधिमाह—क्षेपवृत्तावधिरिति । क्षेपवृत्तस्थस्पष्टग्रहस्थानं क्रान्तिवृत्तस्थस्पष्टग्रह- स्थानयोरन्तरं क्रान्तिवृत्ताम्योत्तररूपं कदम्बप्रोतवृत्तस्थं शर इत्यर्थः । अथ प्रसङ्गात्स्फुट- क्रान्तिस्वरूपमाह—एवमिति । नाडिकावृत्तप्रदेशैकदेशग्रहबिम्बाश्रयशरवृत्तप्रदेशैकदेश-