संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
३४० * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
है। वह फूल और फलसे रहित तथा पल्लवोंसे सुशोभित है। सूर्यके हटनेपर भी उसकी छायामें कोई परिवर्तन नहीं होता। उसके पश्चिम रौहिण नामसे प्रसिद्ध कुण्ड है, वहाँ जलका उद्गम है। उसमें उतरनेके लिये नील पत्थरोंकी सीढ़ी उसकी शोभा बढ़ाती है। कुण्डके बाहर चारों दिशाओंमें स्फटिकमणिकी चार वेदियाँ हैं; पापराशिका संहार करनेवाले पवित्र जलसे भरा हुआ वह कुण्ड बड़ा ही मनोरम है। कुण्डकी पूर्व दिशामें जो वेदी है, उसके मध्यभागमें शंख-चक्र-गदाधारी इन्द्रनीलमणिमय भगवान् विष्णु विराजमान हैं। वह स्थान वटवृक्षकी छाया पड़नेसे सदा शीतल बना रहता है। भगवान्का वह विग्रह इक्यासी अंगुल ऊँचा है और सुवर्णमय कमलके ऊपर स्थित है। उस श्रीविग्रहके मुखचन्द्रसे तीनों प्रकारके तापोंका निवारण होता है। भगवान्के दोनों नासिकापुट तिलके फूलके समान शोभा धारण करते हैं। प्रस्तरमयी मूर्ति होनेपर भी भगवान्के अधरपर मुसकानकी छटा रहती है। हँसीसे खिले हुए युगल कपोलोंद्वारा ठोढ़ी बहुत सुन्दर दिखायी देती है। मुँहके दोनों कोने ऐसे दिखायी देते हैं मानो और किसी मूर्तिके मुखकोण वैसे कभी बने ही न हों। हास्युक्त अधर, कपोल, ठोढ़ी और मुँहके सुन्दर कोने आदिको धारण करनेवाले भगवान् माधव विश्वकर्मा आदि शिल्पियोंके लिये आदर्श बने हुए हैं। मकराकार कुण्डलोंसे सुशोभित दोनों कानोंके द्वारा भगवान्का मुखचन्द्र गुरु और शुक्रके मध्यभागमें स्थित पूर्णचन्द्रका उपहास कर रहा है। गलेके सुन्दर आभूषणसे शोभाजनक कण्ठप्रदेशके द्वारा भगवान् अपना दर्शन करनेवाले पुरुषोंके चित्तमें दक्षिणावर्त शंखसे मुक्तामणिके प्रकट होनेकी आशंका उत्पन्न करते हैं। उनके कन्धे मोटे और चौड़े हैं। घुटनेतककी लंबी चार भुजाएँ हैं। वक्षःस्थलपर स्वच्छ एवं निर्मल हार शोभा पा रहा है। दिव्य कौस्तुभमणिमें पड़े हुए प्रतिबिम्बके रूपमें मानो वे चौदह भुवनोंको धारण करते हैं। गहरे नाभिरूपी सरोवरमें प्रविष्ट हुई सूक्ष्म रोमावलियोंके कारण भगवान्का श्रीविग्रह बड़ा मनोहर प्रतीत होता है। गलेमें लटकता हुआ हार त्रिवलीके मध्यभागतकका स्पर्श करता है। मोतीकी माला कमरके पासतक लटकी हुई है। वे पीताम्बरसे शोभा पाते हैं। दोनों जंघाएँ दो खम्भोंके समान जान पड़ती हैं, मानो वे मोक्षके मंगलमय धाममें जानेके लिये बाहरी द्वारके आश्रय हों। भगवान्के दोनों चरण गोलाकार घुटनों, पैरोंतक लटकती हुई वनमाला तथा रत्नमय कड़ोंसे शोभा पाते हैं। वे हार, कंकण, भुजबन्द और मुकुट आदिसे विभूषित हैं। भगवान् अपने चारों हाथोंमें क्रमशः चक्र, पद्म, गदा और शंखरूपमें परिणत ज्ञान, अहंकार, ऐश्वर्य तथा शब्दब्रह्म (वेदराशि)-को धारण करते हैं।* भगवान् जगन्नाथ सम्पूर्ण दिशाओंको प्रकाशित करते हुए नीलाचलके शिखरपर विराजमान हैं, जिनका दर्शन करके, भक्तिपूर्वक प्रणाम करनेसे मनुष्य देहबन्धनसे मुक्त हो जाता है। भगवान्के वामपार्श्वमें भगवती लक्ष्मी वीणा बजा रही हैं। उनकी दृष्टि भगवान्के मुखकी ओर है। वे सम्पूर्ण लावण्यका निवास तथा समस्त अलंकारोंसे विभूषित हैं। जगत्के पिता और माता भगवान् विष्णु और भगवती लक्ष्मी दोनों उस पर्वतपर निवास करते हैं। मैंने उन दोनोंका दर्शन किया। वे दोनों मौनभावसे बैठे हैं और अपनी मुसकराती हुई दृष्टिसे दर्शन करनेवाले प्राणीपर कृपाकी वर्षा करते हैं। दीनोंपर दया करनेके कारण मैंने उन्हें चैतन्यरूप ही माना है। उनके पीछे अपने फणोंका छत्र लगाये भगवान् शेषनाग खड़े हैं और आगे सुदर्शन चक्रको दिव्य शरीर
* तेजोमय सुदर्शन चक्र प्रकाशस्वरूप ज्ञानका प्रतीक है। इस प्रकार कमल अहंकारका, गदा ऐश्वर्यका और शंख नादात्मक शब्दब्रह्मका प्रतीक है।
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धारण करके खड़े हुए देखा है। सुदर्शनके पीछे गरुड़जी हाथ जोड़े खड़े हैं। इस प्रकार अद्भुत रूप धारण करनेवाले साक्षात् लक्ष्मीपति भगवान् विष्णुका दर्शन करके मेरा मन बार-बार उन्हींकी ओर दौड़ रहा है मानो कोई इसे रस्सियोंमें बाँधकर अपनी ओर खींच रहा हो। तीर्थस्नान, तप, दान, देवयज्ञ और व्रतोंके द्वारा भी कोई वैसे दिव्यरूपमें भगवान्का दर्शन नहीं कर सकता। जो लोग निर्मल आकाशकी भाँति प्रतीत होनेवाले पुरुषोत्तमतीर्थनिवासी नील-विग्रह भगवान् विष्णुका ध्यान करते हैं वे सब प्रकारके बन्धनोंसे रहित होकर भगवान् विष्णुके धाममें प्रवेश करते हैं। जिसने नीलाचलनाथ भगवान्का दर्शन कर लिया है, वही दानी, वही यज्ञकर्ता, वही सत्यवादी, वही धर्मात्मा तथा वही सम्पूर्ण गुणोंसे श्रेष्ठ और समस्त जगत्में महान् है। राजन्! वहाँ जगदीश्वर माधवके जो सेवक हैं, उन्हींसे मैंने भगवान्के इस माहात्म्यका परिचय प्राप्त किया। वहाँ आदिसृष्टिकी परम्परासे चला आता हुआ पुरातन एवं सुप्रसिद्ध आख्यान सुनकर मैं यहाँ आया हूँ। महाराज! आपकी ही आज्ञासे श्रीपुरुषोत्तमका दर्शन करके वहाँका सब वृत्तान्त आपसे निवेदन किया है। अब आपकी जैसी इच्छा हो वैसा करें।
इन्द्रद्युम्न बोले—भगवान्! आपका वचन मेरे लिये सर्वथा विश्वसनीय है। आपके मुखसे भगवान्के पापहारी स्वरूपका वर्णन सुनकर तथा इस दिव्य प्रसादमालाका संयोग पाकर मैं कृतकृत्य हो गया। अनेक जन्मोंमें उपार्जित मेरी समस्त पापराशि आज नष्ट हो गयी। अब मैं भगवान् लक्ष्मीपतिके दर्शनका अधिकारी हो गया। सर्वतोभावेन वहाँकी यात्रा करूँगा और इस राज्य एवं बढ़ी हुई समृद्धिके द्वारा पुरुषोत्तमतीर्थमें निवासस्थान, नगर और दुर्ग बनवाऊँगा। भगवान् विष्णुकी प्रीतिके लिये सौ अश्वमेध यज्ञोंका अनुष्ठान करूँगा और प्रतिदिन सैकड़ों उपचारोंसे श्रीनाथजीकी पूजा करूँगा, व्रत, उपवास और नियमोंद्वारा जगद्गुरु भगवान्को प्रसन्न करूँगा, जिससे वे मुझ सन्तप्त प्राणीको अपने वचनामृतसे अभिषिक्त करेंगे। भगवान् नारायण दीनोंपर अनुग्रह करनेवाले हैं।
इस प्रकार राजा इन्द्रद्युम्न श्रद्धा और भक्तिसे भगवान् जगदीश्वरकी स्तुति कर रहे थे। इतनेमें ही सम्पूर्ण भुवनोंको देखनेकी उत्सुकता रखनेवाले देवर्षि नारदजी वहाँ आ पहुँचे। विष्णुभक्तोंमें श्रेष्ठ ब्रह्मपुत्र नारदजीको आते देख राजा सहसा उठकर खड़े हो गये और पाद्य, अर्घ्य एवं आचमनीय निवेदन करके उन्हें उत्तम आसनपर बैठाकर प्रणामपूर्वक हाथ जोड़कर बोले—‘आज मेरे सम्पूर्ण यज्ञ, दान, स्वाध्याय और तप सफल हो गये; क्योंकि मेरे घरपर ब्रह्माजीके द्वितीय स्वरूप देवर्षि नारद कृपापूर्वक पधारे हैं। मुने! आपने यहाँतक आनेकी कृपा की, इतनेसे ही यद्यपि मैं कृतार्थ हो गया हूँ तथापि आपकी प्रसन्नताके लिये आपकी क्या सेवा करूँ, आपकी किस आज्ञाका पालन करूँ? कौन-सा प्रयोजन लेकर आपने मेरे इस घरको पवित्र किया है?’
भक्ति और विनयसे सनी हुई राजाकी यह कोमल वाणी सुनकर नारदजीने मुसकराते हुए कहा—‘नृपश्रेष्ठ! तुम्हारे निर्मल गुणोंसे ब्रह्मा आदि सम्पूर्ण देवता, सिद्ध और मुनि अत्यन्त प्रसन्न हैं। तुमने बहुत अच्छा निश्चय किया। हजारों जन्मोंके अभ्याससे नीलाचलगुहानिवासी भगवान् माधवमें भक्ति होती है। परम बुद्धिमान् ब्रह्माजीने उन्हीं भगवान् जगदीश्वरकी आराधना करके इस सृष्टिका निर्माण किया और पितामहकी पदवी पायी है। तुम भी उन्हींके वंशमें उत्पन्न हुए हो, अतः भगवान्के प्रति तुम्हारी ऐसी भक्ति होनी उचित ही है। पग-पगपर दुःख और संकटोंसे व्याप्त इस संसाररूपी वनमें भटकते हुए मनुष्योंके लिये एकमात्र भगवान् विष्णुकी भक्ति ही सुख देनेवाली है। यह संसार एक
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समुद्र है जहाँ कोई भी सहारा देनेवाला नहीं है। सुख-दुःख आदि द्वन्द्वोंकी प्रचण्ड आँधीसे इसमें सदा तूफान आता रहता है, इस कारण यह अत्यन्त दुस्तर है। इस भवसागरमें डूबे हुए मनुष्योंके लिये भगवान् विष्णुकी भक्ति ही नौका मानी गयी है। एकमात्र माता भगवती विष्णुभक्तिका आश्रय लेकर सन्तुष्ट रहनेवाले साधुपुरुष कभी शोक नहीं करते। राजन्! देहधारियोंकी जो बड़ी भारी पापराशि है, वह विष्णुभक्तिरूपी महान् दावानलमें पतंगोंकी भाँति जल जाती है। प्रयाग, गंगा आदि तीर्थ, तपस्या, श्रेष्ठ अश्वमेध यज्ञ, महान् दान, व्रत, उपवास और नियम—इन सबका सहस्रों बार सेवन किया जाय और इनके पुण्यसमूहको कोटि-कोटि गुना करके एकत्र किया जाय तो भी वह विष्णुभक्तिके हजारवें अंशके बराबर भी नहीं बताया गया है १।'
नारदजीके बताये हुए विष्णुभक्ति-माहात्म्यको सुनकर राजा इन्द्रद्युम्नके मनमें विष्णुभक्तिका स्वरूप जाननेकी इच्छा हुई। अतः उन्होंने पूछा—'भगवन्! भक्तिका क्या स्वरूप है? उसके लक्षणका वर्णन कीजिये।'
नारदजीने कहा—राजन्! सावधान होकर सुनो। मैं भगवान् विष्णुकी सनातन भक्तिका सामान्य और विशेषरूपसे वर्णन करता हूँ। गुणोंके भेदसे भक्तिके तीन भेद हैं—सात्त्विकी, राजसी और तामसी। इनके अतिरिक्त एक चौथी भक्ति भी है, जो निर्गुणा मानी गयी है। राजन्! जो लोग काम और क्रोधके वशीभूत हैं और प्रत्यक्ष (इस जगत्)-के सिवा और किसी (परलोक आदि)-की ओर दृष्टि नहीं रखते, वे अपनेको लाभ और दूसरोंको हानि पहुँचानेके लिये जो भजन करते हैं, उनकी वह भक्ति तामसी कही गयी है। अधिक यशकी प्राप्तिके लिये अथवा दूसरेकी स्पर्धा (लाग-डाँट)-से, प्रसंगवश परलोकके लिये भी, जो भक्ति होती है, वह राजसी मानी गयी है। पारलौकिक लाभको स्थायी समझकर और इहलोकके समस्त पदार्थोंको नश्वर देखकर अपने वर्ण तथा आश्रमके धर्मोंका परित्याग न करते हुए आत्मज्ञानके लिये जो भक्ति की जाती है, वह सात्त्विकी है। यह जगत् जगन्नाथका ही स्वरूप है, उनसे भिन्न इसका दूसरा कोई कारण नहीं है, मैं भी भगवान्से भिन्न नहीं हूँ और वे भी मुझसे पृथक् नहीं हैं, ऐसा समझकर भेद उत्पन्न करनेवाली बाह्य उपाधियोंका त्याग करना और अधिक प्रेमसे भगवत्-स्वरूपका चिन्तन करते रहना—यह अद्वैत (निर्गुणा) नामवाली भक्ति है, जो मुक्तिका साक्षात् साधन है। यह अत्यन्त दुर्लभ है। २
अब मैं भगवान् विष्णुके भक्तोंका लक्षण बतलाता हूँ—जिनका चित्त अत्यन्त शान्त है, जो सबके प्रति कोमल भाव रखते हैं, जिन्होंने स्वेच्छानुसार अपनी इन्द्रियोंपर विजय प्राप्त कर ली है तथा जो मन, वाणी और क्रियाद्वारा कभी दूसरोंसे द्रोह करनेकी इच्छा नहीं रखते, जिनका चित्त दयासे द्रवीभूत होता है, जो चोरी और हिंसासे सदा ही मुख मोड़े रहते हैं, सद्गुणोंके संग्रह तथा दूसरोंके कार्यसाधनमें जो प्रसन्नतापूर्वक संलग्न रहते हैं, सदाचारसे जिनका जीवन सदा उज्ज्वल (निष्कलंक) बना रहता है, जो दूसरोंके उत्सवको अपना उत्सव मानते हैं, सब प्राणियोंके
१- अश्वमेधः क्रतुवरो दानानि सुमहन्ति च। व्रतोपवासनियमाः सहस्राण्यर्जिता अपि॥
समूह एषामेकत्र गणितः कोटिकोटिभिः। विष्णुभक्तेः सहस्रांशसमोऽसौ न हि कीर्तितः॥
(स्क० पु०, वै० उ० १०। ७३-७४)
२- जगच्चेदं जगन्नाथो नान्यच्चापि च कारणम्। अहं च न ततो भिन्नो मत्तोऽसौ न पृथक् स्थितः।
हानं बहिरुपाधीनां प्रेमोत्कर्षेण भावनम्। दुर्लभा भक्तिरेषा हि मुक्तयेऽद्वैतसंज्ञिता॥
(स्क० पु०, वै० उ० १०। ८६-८८)
- वैष्णवखण्ड-उत्कलखण्ड * ३४३
भीतर भगवान् वासुदेवको विराजमान देखकर कभी किसीसे ईर्ष्या-द्वेष नहीं रखते, दीनोंपर दया करना जिनका स्वभाव बन गया है और जो सदा परहितसाधनकी इच्छा रखते हैं, अविवेकी मनुष्योंका विषयोंमें जैसा प्रेम होता है, उससे सौ कोटि गुनी अधिक प्रीतिका विस्तार वे भगवान् श्रीहरिके प्रति करते हैं।१ नित्य कर्तव्यबुद्धिसे विष्णुस्वरूप शंकर आदि देवताओंका भक्तिपूर्वक पूजन और ध्यान करते हैं, पितरोंमें भगवान् विष्णुकी ही बुद्धि रखते हैं, भगवान् विष्णुसे भिन्न दूसरी किसी वस्तुको नहीं देखते। समष्टि और व्यष्टि सब भगवान्के ही स्वरूप हैं, भगवान् जगत्से भिन्न होकर भी भिन्न नहीं हैं, 'हे भगवान् जगन्नाथ! मैं आपका दास हूँ, आपके स्वरूपमें भी मैं हूँ, आपसे पृथक् कदापि नहीं हूँ, जब आप भगवान् विष्णु अन्तर्यामीरूपसे सबके हृदयमें विराजमान हैं, तब सेव्य अथवा सेवक कोई भी आपसे भिन्न नहीं है।' इस भावनासे सदा सावधान रहकर जो ब्रह्माजीके द्वारा वन्दनीय युगल चरणारविन्दोंवाले श्रीहरिको सदा प्रणाम करते, उनके नामोंका कीर्तन करते, उन्हींके भजनमें तत्पर रहते और संसारके लोगोंके समीप अपनेको तृणके समान तुच्छ मानकर विनयपूर्ण बर्ताव करते हैं। जगत्में सब लोगोंका उपकार करनेके लिये जो कुशलताका परिचय देते हैं, दूसरोंके कुशल-क्षेमको अपना ही मानते हैं, दूसरोंका तिरस्कार देखकर उनके प्रति दयासे द्रवीभूत हो जाते हैं तथा सबके प्रति मनमें कल्याणकी भावना करते हैं, वे ही विष्णुभक्तके नामसे प्रसिद्ध हैं। जो पत्थर, परधन और मिट्टीके ढेलेमें, परायी स्त्री और कूटशाल्मली नामक नरकमें, मित्र, शत्रु, भाई तथा बन्धुवर्गमें समान बुद्धि रखनेवाले हैं, वे ही निश्चितरूपसे विष्णुभक्तके नामसे प्रसिद्ध हैं। जो दूसरोंकी गुणराशिसे प्रसन्न होते और पराये मर्मको ढकनेका प्रयत्न करते हैं, परिणाममें सबको सुख देते हैं, भगवान्में सदा मन लगाये रहते तथा प्रिय वचन बोलते हैं, वे ही वैष्णवके नामसे प्रसिद्ध हैं।२ जो भगवान् के पापहारी शुभनाम-सम्बन्धी मधुर पदका जप करते और जय-जयकी घोषणाके साथ भगवन्नामोंका कीर्तन करते हैं, वे अकिंचन महात्मा वैष्णवके रूपमें प्रसिद्ध हैं। जिनका चित्त श्रीहरिके चरणारविन्दोंमें निरन्तर लगा रहता है, जो प्रेमाधिक्यके कारण जडबुद्धि-सदृश बने रहते हैं, सुख और दुःख दोनों ही जिनके लिये समान हैं, जो भगवान्की पूजामें चतुर हैं तथा अपने मन और विनययुक्त वाणीको भगवान्की सेवामें समर्पित कर चुके हैं, वे ही वैष्णवके नामसे प्रसिद्ध हैं। मद और अहंकार गल जानेके कारण जिनका अन्तःकरण अत्यन्त शुद्ध हो गया है, अमरोंके विश्वसनीय बन्धु भगवान् नृसिंहका यजन करके जो शोकरहित हो गये हैं, ऐसे वैष्णव निश्चय ही उच्चपदको प्राप्त होते हैं। भगवान्में सदैव उत्तम भक्ति रखनेवाले भक्तोंके शुभ चरित्र और लक्षणका वर्णन मैंने तुमसे किया है। यह मनुष्योंके कानोंमें पड़ते ही उनके चिरसंचित मलका नाश करता है। भजनके लिये कभी धनकी आवश्यकता तथा शरीरको कष्ट देकर किये जानेवाले किसी विशेष प्रकारके प्रयोगकी भी आवश्यकता नहीं है। मृदुल एवं मन्द स्वरसे वाणीके द्वारा भगवान्के
१- विषयेष्वविवेकानां या प्रीतिरुपजायते।
वितन्वते तु तां प्रीतिं शतकोटिगुणां हरौ॥ (स्क० पु०, वै० उ० १०। १०४-१०५)
२- दृषदि परधने लोष्टखण्डे परवनितासु च कूटशाल्मलीषु।
सखिरिपुसहजेषु बन्धुवर्गे सममतयः खलु वैष्णवाः प्रसिद्धाः॥
गुणगणसुमुखाः परस्य मर्मच्छदनपराः परिणामसौख्यदा हि।
भगवति सततं प्रदत्तचित्ताः प्रियवचसः खलु वैष्णवाः प्रसिद्धाः॥
(स्क० पु०, वै० उ० १०। ११-१२)
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नामोंका कीर्तन होता रहे, तो मैं इसीको भजन मानता हूँ। तुम्हारे मनमें भगवान्के दास्यभावका ही चिन्तन होना चाहिये।
किंतु जो मनुष्योंके शुभ आचरणोंसे भी द्वेष करते हैं और स्वयं अपने चित्तको दुराचारमें ही बाँधे रखते हैं, बड़े भारी अमंगलको पा करके भी निश्चिन्त रहते हैं और सदा ऐश्वर्य तथा विषयभोगके रसमें ही सुखका अनुभव करते हैं, वे मनुष्य वैष्णव नहीं हैं; वे तो बहुत ही निम्नश्रेणीके मनुष्य हैं। अपने हृदयरूपी कमलमें विराजमान परमानन्दमय श्रीहरिके स्वरूपका जो क्षणभर भी चिन्तन नहीं करते, उन्मत्तभावसे बैठे रहते हैं और अपने झूठे वचनोंके जालसे भगवान्के नामको भी निरन्तर आच्छादित किये रहते हैं, वे भी भगवान्के भक्त नहीं हैं। जिनके मनमें परायी स्त्री और पराये धनके लिये सदा लोभ बना रहता है, जो कृपण बुद्धिवाले हैं और सदा अपना ही पेट भरनेमें लगे रहते हैं, वे नरपशु विष्णुभक्तिसे सर्वथा रहित हैं। जो निरन्तर दुष्ट पुरुषोंके साथ अनुराग रखते हैं, दूसरोंका तिरस्कार और हिंसा करते हैं, जिनका स्वभाव अत्यन्त भयंकर है तथा जो भगवान् नृसिंहके चरणोंके चिन्तनसे विरक्त रहते हैं, उन मलिन मनुष्योंको दूरसे ही त्याग देना चाहिये।
राजा इन्द्रद्युम्नका पुरुषोत्तमक्षेत्रको प्रस्थान और महानदीके तटपर विश्राम
जैमिनिजी कहते हैं—ब्रह्मपुत्र देवर्षि नारदसे इस प्रकार उत्तम भगवद्भक्तिका वर्णन सुनकर राजा इन्द्रद्युम्न बहुत प्रसन्न हुए और इस प्रकार बोले—‘भगवन्! विद्वान् पुरुषोंने मुझे बताया था कि साधु पुरुषोंका संग संसाररूपी रोगका नाश करनेवाला है, ऐसा साधुसंग मुझे इसी समय प्राप्त हुआ है। आपके संगसे मेरे अज्ञानमय अन्धकारका नाश हो गया, क्योंकि मेरा चित्त इस समय नीलमाधवकी पूजा करनेके लिये अत्यन्त उतावला हो रहा है। अतः हम और आप दोनों ही रथपर बैठकर चलें और भगवान् नीलमाधवका दर्शन करें। यदि आपके मुखसे पुरुषोत्तमक्षेत्रके तीर्थोंका ज्ञान प्राप्त कर सकूँ, तो पहलेके कहे हुए महात्माओंके वचन भी सफल हो जायँ।'
नारदजीने कहा—राजन्! यह तो बड़े हर्षकी बात है। मैं तुम्हें पुरुषोत्तमक्षेत्र और वहाँके तीर्थोंके दर्शन कराऊँगा। उस तीर्थमें जो शक्तियाँ और शिव आदि हैं, उन्हें भी दिखाऊँगा। उस क्षेत्रके माहात्म्यका भी परिचय दूँगा। तुम वहाँ भक्तोंको आत्मसमर्पण करनेवाले देवेश्वर भगवान् जगन्नाथका साक्षात् दर्शन करोगे।
इस प्रकार वार्तालाप करके दोनोंने प्रसन्नतापूर्वक दिनका कृत्य समाप्त किया और ज्येष्ठ शुक्ला पंचमी बुधवारको पुष्य नक्षत्रमें उत्तम लग्न आनेपर यात्रा अनुकूल होगी, ऐसा निर्णय करके दोनोंने रातके समय एक ही स्थानपर शयन किया। फिर सबेरा होनेपर नृपश्रेष्ठ इन्द्रद्युम्नने भाइयोंसहित नीलाचलपर जानेके विषयमें अपने राज्यमें यह घोषणा करायी कि 'हमलोग जीवनपर्यन्त पुरुषोत्तमक्षेत्रमें निवास करेंगे। राजालोग अपनी रानियों, मन्त्रियों तथा परिकरोंसमेत रथ, हाथी, घोड़ा, खजाना और पैदल सेना साथ लेकर वहाँ चलें।' इस प्रकार आज्ञा देकर राजा इन्द्रद्युम्न अपने आगे खड़े हुए नारद मुनिकी परिक्रमा करके छड़ीदार सिपाहियोंसे घिरे हुए मध्यद्वारपर आये। उनके आगे-आगे अग्निहोत्रकी अग्नि ले जायी जा रही थी। वहाँ उन्होंने अपने दाहिनी ओर ब्राह्मणोंको खड़े हुए देखा, जो मांगल्यसूक्तका पाठ कर रहे थे। राजाने भक्तिसे विनीत होकर वस्त्र, आभूषण, माला, सुगन्ध और अनुलेपनके
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द्वारा उन ब्राह्मणोंका पूजन किया। इसी समय एक ही साथ सैकड़ों शंख बज उठे। उनके साथ और भी बहुत-से बाजोंकी तुमुल ध्वनि महाराजने सुनी। तदनन्तर वे मन्दिरमें भगवान् विष्णुका दर्शन करनेके लिये गये, जिनका स्मरण करनेसे मनुष्य सब प्रकारके कल्याणका भागी होता है। दिव्य सिंहासनपर बैठे हुए उन्हीं भगवान् विष्णुका दूरसे दर्शन करके उन्होंने साष्टांग प्रणाम किया और उपनिषदोंकी दिव्य वाणीसे उनकी स्तुति करके दुर्गाजीके चरणोंमें भी मस्तक झुकाया। तत्पश्चात् उन दोनों देवताओंकी परिक्रमा करके उन्हें पालकीमें बिठाया और उनको आगे करके प्रस्थान किया। बाहरके दरवाजेपर पहुँचकर उन्होंने अपना रथ तैयार देखा और परिक्रमा करके वे नारदजीके साथ उस रथपर बैठे। इन्द्रद्युम्नके रथके दोनों ओर उनके अधीन राजाओंके अनेकों रथ शोभा पा रहे थे, जो नाना प्रकारके अस्त्र-शास्त्रोंसे संयुक्त तथा ध्वजा-पताकाओंसे अलंकृत थे। उसी समय पुरवासी भी अपना-अपना सामान लेकर तैयार हो गये और घोड़े, खच्चर तथा ऊँट आदि वाहनोंपर चढ़कर वहाँसे चल दिये। राजाओंकी सैकड़ों रानियाँ, नपुंसक सिपाहियोंसे घिरी हुई अनेक प्रकारकी सवारियोंपर चढ़कर राजभवनसे बाहर निकलीं। बड़े-बड़े राज्याधिकारी तथा विशाल सैनिक भी उनकी रक्षामें तत्पर थे। राजाके सामन्त, मन्त्री, सेवक, पुरोहित, ऋत्विग् तथा राजाके व्यक्तिगत सेवक भी सब प्रकारके उपयोगी सामान साथ लेकर चले। कोषके संरक्षणमें नियुक्त किये गये राजकर्मचारी सारा खजाना साथ लेकर शीघ्र ही प्रस्थित हुए, जो अवसरके अनुसार राजसेवामें उपस्थित होते थे। सामान बेचकर जीविका चलानेवाले सेठ, व्यापारी, माली आदि भी अपनी-अपनी विक्रयकी वस्तुएँ लेकर राजाज्ञाका पालन करते हुए चले। जिसके लिये जो मार्ग सीधा प्रतीत हुआ, वह उसीसे गया। नीलाचलपर पहुँचानेवाले कठिन-से-कठिन मार्गके द्वारा भी लोगोंने यात्रा की। महाराज इन्द्रद्युम्न समस्त पुरवासियों तथा हर्षमें भरी हुई चतुरंगिणी सेनासे घिरे हुए थे। जंगलका रास्ता जाननेवाले पुरुष जो मार्ग बतलाते, उसीसे राजा यात्रा करते थे। मार्गके दोनों ओर आनेवाले देशों और वनोंको देखते हुए वे बड़ी शीघ्रतासे यात्रा कर रहे थे। महानदीके तटपर जहाँ वृक्ष बहुत कम थे तथा पर्वतीय गुफाओंके कारण जो स्थान बहुत प्रसिद्ध था, वहाँ उन्होंने अपराह्नकालका आवश्यक कृत्य करनेके लिये अपनी सेनाका पड़ाव डाला। फिर अपने पुरोहितके साथ नदीके जलमें उतरे और स्नान करके देवताओं तथा पितरोंका तर्पण किया। तत्पश्चात् विधिपूर्वक भगवान् विष्णुकी पूजा करके नारदजीके साथ बैठकर भोजन किया। जब सूर्य अस्ताचलके शिखरपर पहुँचे, तब सायंकालकी उपासना पूरी करके राजा सभामें बैठे। उस समय उन्होंने श्रेष्ठ वैष्णवोंका चन्दन, माला और ताम्बूलोंसे पूजन किया। तदनन्तर भगवान्के सर्वपापापहारी चरित्रका श्रवण करनेके लिये सिंहासनपर बैठे हुए मुनिवर नारदजीसे राजा इस प्रकार कहा—'भगवन् ! आप वेद और वेदांगोंकी निधि हैं, भगवान्के प्रिय
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भक्त हैं। यदि मुझपर आपकी कृपा हो तो भगवान् विष्णुकी लीलाकथारूपी सुधासे मेरे मलिन अन्तःकरणको शुद्ध कर दीजिये।'
देवर्षि नारद तथा राजा इन्द्रद्युम्नमें इस प्रकारकी बात चल ही रही थी कि द्वारपालने समीप आकर सूचना दी 'महाराज! उत्कल देशके राजा आपके द्वारपर उपस्थित हैं और श्रीमान्के चरणारविन्दोंका दर्शन करना चाहते हैं।' राजा बोले—'श्रीमान् ओढ्रनरेशको शीघ्र ही भीतर ले आओ, उनका दर्शन करके हम सब लोग पापरहित हो जायेंगे।' महाराजका यह वचन सुनकर द्वारपालने शीघ्र ही राजसभामें उत्कल-नरेशका प्रवेश कराया। अपने वैष्णव मन्त्रियोंके साथ राजसभामें प्रवेश करके ओढ्रदेशके राजाने इन्द्रद्युम्नके वन्दनीय चरणोंको सादर नमस्कार किया। तब उन वैष्णव नरेशको उठाकर महाराज इन्द्रद्युम्नने उनका सत्कार किया और अपने आसनपर ही बिठाकर विनययुक्त वाणीमें कहा—'राजन्! आप कुशलसे तो हैं न? ओढ्रपते! नीलाचल-शिखरनिवासी भगवान् माधव तो वहाँ विजयपूर्वक विराज रहे हैं न? क्या आपकी निर्मल बुद्धि भगवान्के चरणारविन्दोंमें लगती है? समस्त प्राणियोंमें समान चित्त रखनेवाले आपका मन भगवान्में अनुरक्त तो है न?'
तब उत्कलनरेशने हाथ जोड़, नम्रतापूर्वक कहा—'स्वामिन्! आपके चरणोंकी कृपासे मेरे लिये सर्वत्र कुशल है। दक्षिण समुद्रके तटपर जंगलोंसे घिरा हुआ नीलाचल विद्यमान है, किंतु वहाँ लोगोंका आना-जाना नहीं है। भगवान् नीलमाधव भी वहीं हैं परंतु इस समय प्रचण्ड आँधीके कारण उठी हुई अधिक बालुकाराशिसे छिप गये हैं, ऐसी बात सुनी जाती है। इसीलिये मेरे राज्यमें भी अकाल और मृत्युका भय बढ़ गया है, परंतु अब आप पधारे हैं, तो सर्वत्र कुशल ही होगा।' उत्कलनरेशके ऐसा कहनेपर राजा इन्द्रद्युम्नने उनका आदर करते उन्हें विदा किया और नारदजीकी ओर देखकर उदासीन भावसे कहा—'मुने! यह क्या हो गया?'
नारदजी बोले—राजन्! इस विषयमें तुम्हें विस्मय नहीं करना चाहिये। श्रेष्ठ वैष्णव भाग्यवान् होता है। वैष्णवोंका मनोरथ कभी निष्फल नहीं होता। जगत्के आदिकारण एवं रोग-शोकसे रहित प्रत्यक्ष शरीर धारण किये हुए भगवान् नारायणको तुम अवश्य देखोगे। वे तुमपर ही अनुग्रह करनेके लिये इस पृथ्वीपर उतरेंगे। सम्पूर्ण चराचर जगत् भगवान् विष्णुके वशमें है। सनातन परमात्मा विष्णु किसीके भी वशमें नहीं हैं; वे भगवान् भक्तवत्सल हैं। अतः केवल भक्तिके वशमें रहते हैं। भगवान् विष्णुकी भक्ति ही धर्म, अर्थ, काम और मोक्षरूपी चारों पुरुषार्थोंकी जड़ है। वह भक्ति ही भगवान्को वशमें करनेका उपाय है। एक ही भगवान् विष्णु अपनी मायासे अनेक रूपमें प्रकट हुए हैं। इसलिये उन परमात्माके सिवा और कोई भी सुखका कारण नहीं है। राजेन्द्र! तुम ब्रह्माजीकी सन्तान-परम्परामें पाँचवें पुरुष हो, साथ ही श्रेष्ठ वैष्णव हो। तुमने अठारह विद्याओंमें पूर्ण विद्वत्ता प्राप्त की है और तुम सदैव सदाचारमें स्थित रहते हो। तुमने इस पृथ्वीका न्यायपूर्वक पालन किया है, विशेषतः तुम ब्राह्मणोंके पूजक हो। अतः पुरुषोत्तमक्षेत्रमें इन चर्मचक्षुओंसे भगवान् पुरुषोत्तमका दर्शन तुम्हें अवश्य प्राप्त होगा। तुम्हारे इस कार्यमें स्वयं ब्रह्माजीने मुझे नियुक्त किया है। पुरुषोत्तमक्षेत्रमें चलनेपर वह सब बात मैं तुम्हें बताऊँगा। इस समय रातका तीसरा पहर चल रहा है; इन सब राजाओंको अपने-अपने डेरेमें जानेकी आज्ञा दो और तुम भी आराम करो।
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- वैष्णवखण्ड-उत्कलखण्ड * ३४७
राजाका एकाग्रक्षेत्र ( भुवनेश्वर )-में जाकर भगवान् शिवका पूजन करना और भगवान् शिवका नारदजीसे उनके कर्तव्यकार्योंका संकेत करना
जैमिनिजी कहते हैं—नारदजीके इस प्रकार आश्वासन देनेपर राजा इन्द्रद्युम्नने प्रसन्नचित्त होकर जब उत्तम बुद्धिसे विचार किया, तब अपने परिश्रमको सफल माना और सभासदोंको विदा करके मुनिका हाथ अपने हाथमें लेकर अन्तःपुरमें प्रवेश किया। फिर विधिपूर्वक उनकी पूजा करके उन्हें पलंगपर सुलाया और उन्हींके साथ बातचीत करते शेष रात्रि व्यतीत की। तदनन्तर निर्मल प्रभात होनेपर नित्यकर्म पूरा करके उन्होंने जगन्नाथजीका पूजन किया। तदनन्तर सब महानदीके पार उतरे। इसके बाद ओढ़्रदेशके राजाके बताये हुए मार्गसे राजा इन्द्रद्युम्न अपनी सेनाके साथ एकाग्रवन नामक क्षेत्रकी ओर चले। वहाँसे कुछ दूर आगे जानेपर मार्गमें 'गन्धवहा' नामवाली नदी मिली, जो बड़े वेगसे बह रही थी। उसको पार करके आगे बढ़नेपर शंख आदि वाद्योंकी ध्वनि सुनायी पड़ी। तब राजाने नारदजीसे पूछा—'महामुने! यह शब्द कहाँ हो रहा है?'
नारदजीने कहा—राजन्! यह अत्यन्त दुर्लभ क्षेत्र है, जिसे भगवान् विष्णुने गुप्त कर रखा है। तुम भाग्यवानोंमें श्रेष्ठ हो, इसीलिये तुम्हारे सौभाग्यसे जितेन्द्रिय पुरोहितने किसी प्रकार जाकर भगवान्का दर्शन किया है। यहाँसे तीसरे योजनपर नीलगिरि विद्यमान है और यह भगवान् गौरीपतिक एकाग्रवन नामक क्षेत्र है, जो अब अधिक दूर नहीं है। एक समय भगवान् शिवने लोकोंके आदिकारण अनादि पुरुषोत्तमका इस प्रकार स्तवन किया—'हे नारायण! हे परम धाम! हे परमात्मन्! हे परात्पर! हे सच्चिदानन्दमय वैभवसे युक्त निरंजन परमेश्वर! आपको मेरा नमस्कार है। आप संसारके कारण हैं और गुणोंके भेदसे सृष्टि, पालन तथा संहाररूप कर्म किया करते हैं। स्वप्रकाश परमात्मन्! आपने अपनी ही योगमायासे अपनेको गुप्त कर रखा है; आपको नमस्कार है। आप न भीतर हैं न बाहर, साथ ही बाहर भी हैं और भीतर भी। दूर होते हुए भी अत्यन्त निकट हैं; भारी, हलके, स्थिर, अत्यन्त सूक्ष्म और अतिशय स्थूल भी आप ही हैं; आपके लिये नमस्कार है। जिनके कटाक्षविलाससे कोटि-कोटि ब्रह्मा और अगणित रुद्र उत्पन्न होते हैं, उन कालात्मा श्रीहरिको नमस्कार है। जिनके एक-एक रोममें अनेकानेक ब्रह्माण्डोंका समुदाय भरा हुआ है तथा जिनका शरीर माँप-जोखके बाहर है, उन विश्वरूप भगवान्को नमस्कार है। जिनके स्वरूपभूत कालके परिमाणसे ब्रह्माकी सृष्टि और प्रलय होते हैं, मन्वन्तर आदिकी संघटना करनेवाले उन भगवान्को नमस्कार है।'
त्रिपुरासुरका दाह करनेवाले भगवान् शंकरने जब इस प्रकार स्तवन किया, तब शंख, चक्र, गदा धारण करनेवाले, वनमालाविभूषित, हार, कुण्डल, केयूर और मुकुट आदिसे सुशोभित कृपानिधान भगवान् गरुड़वाहन विष्णुने शिवजीसे कहा—'दक्षिण समुद्रके किनारे नीलाचलसे विभूषित जो दस योजन विस्तृत क्षेत्र चित्रोत्पला नदीसे लेकर समुद्रतक फैला हुआ है, उसके उत्तर 'एकाग्रवन' नामक सुन्दर वन है। वहीं पार्वतीजीके साथ आप निवास करें। यहाँ सब लोकोंकी सृष्टि करनेवाले ब्रह्माजी मेरे आदेशसे आपको कोटि लिंगोंके अधीश्वर पदपर अभिषिक्त करेंगे।'
भगवान् विष्णुके ऐसा कहनेपर शिवजीने कहा—'देवदेव! जगन्नाथ! शरणागतदुःखभंजन!
३४८ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
प्रभो ! जगत्पते ! आप पुरुषोत्तमक्षेत्रमें जानेके लिये जो आज्ञा दे रहे हैं, उसे शिरोधार्य करके मैं उस मोक्षदायक कल्याणमय तीर्थमें जाऊँगा।' यों कहकर भगवान् शंकर उस क्षेत्रमें पधारे। साक्षात् ब्रह्माजीने वहाँ भगवान् शंकरकी स्थापना की। राजन् ! अब हम सब लोग वहाँ चलेंगे और त्रिपुरविनाशक शिवजीका दर्शन करेंगे। यह जो शिवजीका क्षेत्र है, इसे तमोगुणका नाशक बताया गया है। जो रजोगुणको धो डालनेवाला क्षेत्र है, वह 'विरजमण्डल' नामसे प्रसिद्ध है। सत्त्वगुणकी अधिकताके कारण पुरुषोत्तमक्षेत्र मुक्तिदायक बताया गया है। महाराज ! जिनका चित्त पापकर्मोंसे मलिन हो गया है, उनका विश्वास इस क्षेत्रपर नहीं जमता।
नारदजीकी बात सुनकर राजाका चित्त प्रसन्न हो गया और वे बोले—'ब्रह्मन् ! आपने मुझे परम पावन क्षेत्रका परिचय दिया। जहाँपर साक्षात् भगवान् उमापति विराजमान हैं वहाँपर हम अवश्य चलेंगे।' इस निश्चयके अनुसार देवर्षि नारद और राजा इन्द्रद्युम्न दोपहरके समय सेनाके साथ एकास्रवन नामक क्षेत्रमें पहुँच गये। वहाँ बिन्दुतीर्थमें स्नान करके उसके तटपर विद्यमान भगवान् पुरुषोत्तमका उन्होंने विधिपूर्वक पूजन किया। उसके बाद वे कोटीश्वर महालयको गये। वहाँके जलसे भलीभाँति आचमन करके सात्त्विक धर्ममें स्थित राजाने त्रिभुवनेश्वर (भुवनेश्वर) नामक लिंगका महास्नानकी विधिसे पूजन किया। फिर अनन्यचित्तसे भगवान् शंकरका ध्यान करते हुए वे खड़े रहे। तब परमेश्वर भगवान् शंकरने प्रसन्न होकर स्पष्ट वाणीमें कहा—'महाराज इन्द्रद्युम्न ! थोड़े ही समयमें तुम्हारा मनोरथ पूर्ण होगा।' तत्पश्चात् उन्होंने नारदजीसे कहा—'महाभाग ! ब्रह्माजीने जो आज्ञा दी है, उसे इस राजाद्वारा अश्वमेध यज्ञ कराते हुए पूर्ण करो। पुरुषोत्तमक्षेत्र साक्षात् भगवान् विष्णुका स्वरूप है। उसमें भी परम पुण्यमयी अन्तर्वेदी भगवान् विष्णुके हृदयके समान मानी गयी है, जिसकी रक्षाके लिये श्रीविष्णुने आठ स्वरूपोंमें मुझे स्थापित किया है। शंखाकार पुरुषोत्तमक्षेत्रके अग्रभागमें दुर्गा देवीके साथ मैं नीलकण्ठ नामसे निवास करता हूँ, वहीं इस राजाको ले चलो। इस समय नीलमणिमय विग्रहवाले भगवान् श्रीहरि अन्तर्धान हो गये हैं। वहाँ मेरी आज्ञासे भगवान् श्रीनृसिंहदेवका क्षेत्र बनाओ। उस क्षेत्रमें हमारे समीप नृपश्रेष्ठ इन्द्रद्युम्न एक सहस्र अश्वमेध यज्ञ करें। यज्ञ समाप्त होनेपर इन्हें वह अद्भुत ब्रह्मस्वरूप वृक्ष दिखलाओ। उसके द्वारा विश्वकर्मा चार प्रतिमाओंका निर्माण करेंगे और उन प्रतिमाओंकी स्थापनाके समय ब्रह्माजी स्वयं पधारेंगे। तदनन्तर ये राजा समस्त पापोंका नाश करनेवाले और सम्पूर्ण जगत्के आधारभूत भगवान् विष्णुका दर्शन करेंगे। काष्ठमय शरीर धारण करके प्रकट हुए भगवान् दर्शनमात्रसे मोक्ष प्रदान करनेवाले होंगे। नारद ! भगवान् विष्णु अपनी आज्ञाके पालन एवं भक्तिसे प्रसन्न होते हैं।'
नारदजी भी जगद्गुरु महादेवजीको प्रणाम करके हाथ जोड़कर बोले—प्रभो ! आपने जो आदेश दिया है वैसा ही करनेके लिये ब्रह्माजीने भी मुझे आज्ञा दी है। नाथ ! आप और ब्रह्माजी परमात्मा श्रीहरिसे भिन्न नहीं हैं। इन राजा इन्द्रद्युम्नकी भाग्य-समृद्धि महान् है, इसीसे इन्हें आप तीनों देवताओंका वह विशाल अनुग्रह प्राप्त हुआ, जिसको मनके द्वारा सोचा भी नहीं जा सकता था। जिनके प्रसंगसे पापी मनुष्य भी भवसागरसे तर जाते हैं, वे भूतभावन भगवान् विष्णु अचिन्त्य महिमावाले हैं। वे भगवान् कितनी भक्तिसे प्रसन्न होते हैं, यह बात बुद्धिमें नहीं आ सकती। वेदोंके स्वाध्याय आदि साधनोंद्वारा चिरकालतक विद्वान् पुरुष यत्न करते रह जाते
| * वैष्णवखण्ड-उत्कलखण्ड * | ३४९ |
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हैं, किंतु सफलता नहीं पाते। और एक नीच मनुष्य अनायास होनेवाले कर्मसे मोक्ष पा जाता है। वनचर ग्वालोंके घरमें रहकर दही-दूध एवं जंगली फल-मूलोंसे जीविका चलानेवाली गोपियाँ भगवान्के स्नेह-सुखका उपभोग करके ही मुक्ति पा गयीं। निरन्तर भगवान्से द्रोह रखनेवाला शिशुपाल भी राजसूय यज्ञकी सभामें भगवान्को कटु वचन सुनाकर भी मोक्षको प्राप्त हुआ। भगवान्का चरित्र ऐसा है, वैसा है, इस प्रकारके निश्चयका विषय नहीं है। बहुत समयतक महान् प्रयत्न करते रहनेपर भी भगवान् विष्णुके दिव्य चरित्रके विषयमें कोई निर्णय नहीं दिया जा सकता। इस संसारमें पुरुषोत्तमक्षेत्रका निवास भगवान्की सायुज्यकी प्राप्ति करानेवाला है। भगवान् विष्णु इन्द्रद्युम्नके प्रसंगसे वहाँ सब लोगोंको प्रत्यक्ष दर्शन देंगे।
तदनन्तर महादेवजी 'तथास्तु' कहकर उसी क्षण अन्तर्धान हो गये।
राजा इन्द्रद्युम्नका नारदजीके साथ नृसिंहजी, कल्पवट तथा नीलमाधवके स्थानका दर्शन करना और आकाशवाणी सुनना
जैमिनिजी कहते हैं—तदनन्तर नारदजी और राजा इन्द्रद्युम्न पुरोहितके छोटे भाई विद्यापतिके साथ पुरुषोत्तमक्षेत्रमें नीलकण्ठ महादेवजीके समीप गये। वहाँ महादेवजीकी पूजा करके राजाने श्रीदुर्गाजीको भी प्रणाम किया। फिर सब लोग अपना उत्तम रथ छोड़कर अनुगामियोंसहित पैदल हो गये और अपनी इन्द्रियोंको वशमें रखते हुए नीलगिरिपर चढ़नेके लिये आगे बढ़े। वह पर्वत नाना प्रकारके वृक्षों और लताओंसे व्याप्त था। भाँति-भाँतिके पक्षी वहाँ कलरव करते थे। बड़ी-बड़ी चट्टानोंके कारण उस पर्वतका किनारा ऊँचा-नीचा एवं दुर्गम दिखायी देता था। वह नीलगिरि चारों ओरसे गोलाकार था। वे सब लोग उस मार्गसे गये, जहाँ काले अगुरु वृक्षके नीचे सब विपत्तियों और भयोंको हरनेवाले दिव्य सिंहरूपधारी भगवान् नृसिंह निवास करते हैं, जिनका दर्शन करके मनुष्योंकी कोटि-कोटि ब्रह्महत्याएँ विलीन हो जाती हैं। उनका मुख फैला हुआ है, दाँत बड़े भयंकर दिखायी देते हैं। कुछ पीले रंगके अयालों (गर्दनके बालों)-से उनका मुखमण्डल व्याप्त है। वे तीन नेत्रोंसे युक्त एवं भयानक हैं। अपनी जाँघोंपर उत्तान सोये हुए दैत्यके वक्षःस्थलको वज्रतुल्य कठोर नखोंसे विदीर्ण कर रहे हैं। मुखपर अट्टहासकी छटा है, जिसमें लपलपाती हुई लाल रंगकी जिह्वा शोभा पाती है। उनके हाथोंमें शंख और चक्र सुशोभित हैं। मस्तक किरीट-मुकुटसे उद्भासित हो रहा है। नेत्रोंसे आगकी चिनगारियाँ निकलती हैं, जिनसे समस्त दिशाएँ संत्रस्त हो रही हैं। प्रचण्ड आघातके कारण भगवान्के चरण-कमल धरतीमें धँस गये हैं। उन आदिमूर्ति भगवान् नृसिंहका दर्शन करके सबने प्रणाम किया। इन्द्रद्युम्नने भी भगवान् नृसिंहका दर्शन करके नारदजीके वचनोंपर विश्वास किया और कहा—'महर्षे! मैं कृतार्थ हो गया। आप तो ज्ञानकी निधि हैं। मैं तो भगवान्के दर्शनमात्रसे ही सब पातकोंसे छूट गया। दयासिन्धु भगवान्की नीलमणिमयी मूर्ति किस स्थानपर विराजमान है, जो दर्शनमात्रसे ही मुक्ति देनेवाली है। विप्रवर! उसीका मुझे दर्शन कराइये।' तब नारदजीने राजा इन्द्रद्युम्नको उस परम पावन स्थानका दर्शन कराया, जहाँ भगवान् विष्णु स्वर्णमयी बालुकासे आच्छादित हो गये थे। मुनिने वहाँ ले जाकर राजासे कहा—'महाराज!
३५० * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
इस दो योजन ऊँचे और एक योजनतक फैले हुए वटवृक्षको देखो। यह प्रलयकालमें भी स्थिर रहता है और मनुष्योंको मोक्ष प्रदान करनेवाला है। इसकी छायामें जानेसे ही मानव पापसे मुक्त हो जाता है। इसकी जड़में प्राण त्याग करनेवाला मनुष्य मोक्षको प्राप्त होता है। फिर जो इसकी पूजा और स्तुति करता है, उसके लिये तो कहना ही क्या है। इसके मूलभागसे पश्चिम और नृसिंहजीसे उत्तर भगवान् नीलमाधव विराजमान थे। वे ही तुमपर अनुग्रह करनेके लिये अब चार स्वरूपोंमें यहाँ प्रकट होंगे। जैसे श्वेतद्वीपके भीतर भगवान्का अपना धाम है, उसी प्रकार जम्बूद्वीपके अन्तर्गत यह पुरुषोत्तमक्षेत्र ही भगवान्का अपना धाम है। राजन्! जो मोक्षका अधिकारी है, वही इसकी महिमाको समझ पाता है। अन्य मनुष्योंके विशेषतः पापकर्मियोंके लिये यह विश्वासकी भूमि नहीं है। भगवान् जगन्नाथका अन्तर्धान होना या छिप जाना किसी विशेष कारणसे होता है, परंतु वे साधुपुरुषोंपर अनुग्रह करनेके लिये प्रत्येक युगमें प्रकट होते रहते हैं। राजन्! भगवान् मत्स्य, कच्छप आदि अनेक अवतारोंके द्वारा जब अवतारका उद्देश्य पूर्ण कर देते हैं, तब कारणकी निवृत्ति हो जानेसे वे अन्तर्धान हो जाते हैं। परंतु वे ही दयासागर भगवान् इस पुरुषोत्तमक्षेत्रमें बिना किसी कारणके नित्य निवास करते हैं। जैसे श्वेतद्वीपसे जाकर भगवान् विष्णु अन्यत्र अवतार लेते हैं, उसी प्रकार यहाँ रहते हुए भी वे द्वारिका, कांची और पुष्कर आदिमें कृपापूर्वक प्रकट होते हैं। राजन्! अनेकानेक तीर्थ, देश, क्षेत्र और मन्दिरोंमें भगवान् विराज रहे हैं।'
महात्मा नारदजीके दिखाये हुए उस स्थानको महाराज इन्द्रद्युम्नने साष्टांग प्रणाम किया और भगवान्को वहाँ प्रत्यक्ष स्थित मानकर इस प्रकार स्तवन किया—'देवदेव! जगन्नाथ! शरणागतोंकी पीड़ा दूर करनेवाले कमलनयन नारायण! मैं भवसागरमें डूबा हुआ हूँ, मेरा उद्धार कीजिये। परमेश्वर! एकमात्र आप ही दुःखराशिका विध्वंस करनेवाले हैं। क्षुद्र मनुष्य लेशमात्र सुखकी लिप्सासे क्षुद्र देवताओंकी सेवा करते हैं। भगवन्! आप भक्तिभावसे आराधना करनेपर मनुष्योंको साक्षात् मोक्ष प्रदान करनेवाले हैं। अजामिल ब्राह्मणने अपने वर्णाश्रमोचित कर्मोंका परित्याग करके कौन-सा पाप नहीं किया था? किंतु नाथ! वह भी आपके नामका उच्चारण करनेमात्रसे मुक्त हो गया। आपके स्मरणमात्रसे ही पाश हाथमें लेकर आये हुए यमदूतोंने उसे छोड़ दिया। देवेश्वर! समस्त शास्त्रीय उपाय आपके दर्शनके लिये ही बताये गये हैं। आपका साक्षात्कार हो जानेपर हृदयके सभी संशय नष्ट हो जाते हैं, उसी क्षण मनुष्य सन्देहरहित हो जाता है। प्रभो! आप ही सबको आश्रय देनेवाले हैं। मुझ दीनपर अनुग्रह कीजिये। मैं आपसे केवल इतनी ही भीख माँगता हूँ कि आपकी जो मूर्ति यहाँ विराजमान है, उसका मैं इस नेत्रसे दर्शन करूँ। इसके सिवा दूसरा कोई प्रयोजन नहीं है।'
इस प्रकार हाथ जोड़े हुए राजा इन्द्रद्युम्नने भगवान् मधुसूदनकी स्तुति करके पृथ्वीपर लोटकर उन्हें साष्टांग प्रणाम किया। उस समय उनके नेत्रोंमें आँसू भर आये थे। इसी समय आकाशवाणी हुई, जिसे इन्द्रद्युम्नने भी सुनी—'राजन्! चिन्ता न करो, मैं तुम्हें प्रत्यक्ष दर्शन दूँगा। देवर्षि नारदने ब्रह्माजीका जो वचन तुमसे कहा है, उसके अनुसार कार्य करो।' उस दिव्य वाणीको सुनकर राजाने नारदजीसे कहा—'मुने! आपने ब्रह्माजीकी आज्ञासे जो कुछ कहा था, इस आकाशवाणीने भी उसीका अनुमोदन किया है। ब्रह्माजी साक्षात् जगन्नाथ हैं। इन दोनोंमें कुछ भी भेद नहीं है। आप ब्रह्माजीके पुत्र हैं, आपका वचन भगवान्का ही वचन है; अतः मुझे उसका प्रयत्नपूर्वक पालन करना चाहिये।'
\sim\sim\sim\circ\sim\sim\sim
- वैष्णवखण्ड-उत्कलखण्ड * ३५१
देवर्षि नारदजीके द्वारा भगवान् नृसिंहकी स्थापना और राजा इन्द्रद्युम्नके द्वारा उनका स्तवन
नारदजीने कहा—राजन् ! चलो, अब हमलोग भगवान् नीलकण्ठके समीप चलें। वहीं सब राक्षसोंका संहार तथा समस्त विघ्नोंका निवारण करनेवाले भगवान् नृसिंहकी पश्चिमाभिमुख स्थापना करूँगा। इससे अन्तर्धानको प्राप्त हुए भगवान् विष्णु नृसिंहजीके रूपमें प्रकट होंगे और उनके समीप किया हुआ यज्ञ अतिशय फल देनेवाला होगा। तुम आगे चलो और शीघ्र ही वहाँ एक मन्दिर बनवाओ। मेरे स्मरण करनेसे विश्वकर्माका पुत्र आकर शीघ्र पश्चिमाभिमुख मन्दिरका निर्माण करेगा। भगवान् नीलकण्ठके दक्षिण सौ धनुषकी दूरीपर जो बहुत बड़ा चन्दनका वृक्ष है, उसके पश्चिमका स्थान क्षेत्र होगा। वहीं तुम्हें एक हजार यज्ञोंका अनुष्ठान करना है। तुम अभी जाओ। मैं पाँच दिनोंतक अभी यहीं ठहरूँगा और इन ज्योतिःस्वरूप अनन्तशक्तिसम्पन्न दिव्य नृसिंहभगवान्की आराधना करके एक अर्चाविग्रहमें इनकी प्रतिष्ठा करूँगा। वे उसमें प्राण, इन्द्रिय और मनके साथ विराजेंगे।
नारदजीकी यह बात सुनकर राजा इन्द्रद्युम्न चन्दनवृक्षके समीप गये। वहाँ उन्होंने विश्वकर्माके पुत्र सुघटकको उपस्थित देखा। सुघटक राजाको देखकर हाथ जोड़कर बोले—'देव! मैं शिल्पशास्त्रका ज्ञाता हूँ; इस समय आपके परम सुन्दर नृसिंह-भवनका निर्माण करूँगा।' राजा बोले—'तुम कोई साधारण शिल्पी नहीं, विश्वकर्माके पुत्र हो। यह नारदजीने मुझे बता दिया है। अतः प्राकार और तोरणके साथ नृसिंहजीका सुन्दर मन्दिर तुम शीघ्र तैयार करो। उसका मुख्य द्वार पश्चिमकी ओर होगा।' यों कहकर देवशिल्पीका विधिवत् पूजन-सत्कार करके राजाने उन्हें मन्दिरनिर्माणके कार्यमें नियुक्त किया और शिला-संग्रह करनेवाले सेवकोंको बहुत धन देकर उस कार्यमें लगा दिया। वह सुन्दर मन्दिर यद्यपि बहुत दिन में बननेवाला था, तथापि देव-शिल्पीकी महिमासे चौथे दिन ही बनकर तैयार हो गया। तदनन्तर पाँचवें दिन सबेरे नित्यकर्मके पश्चात् प्रतिष्ठा-विधिकी सारी सामग्री एकत्र करके जब राजा नारदजीके आनेकी प्रतीक्षा कर रहे थे, तभी शंख, मृदंग, ढोल, गीत, मंगलवाद्य तथा हाथियोंके घण्टोके शब्द सहसा सुनायी पड़े। साथ ही उच्च स्वरसे जय-जयकारका शब्द आकाश-मण्डलमें गूँज उठा। इतनेमें ही नारदजी विश्वकर्माकी बनायी हुई सुन्दर नृसिंहमूर्तिको लेकर वहाँ आ गये। उस मूर्तिमें प्राणप्रतिष्ठा हो चुकी थी। उसने दिव्यमाला और वस्त्र धारण किये थे। उसपर दिव्य चन्दनका अनुलेप किया गया था। वह सब ओरसे तेजःपुंजसे व्याप्त थी और सबको हर्ष प्रदान करती थी। उसे देखकर राजा और उनके अनुयायी बहुत प्रसन्न हुए। सबने देवर्षि नारदजीकी प्रशंसा की। फिर निकटसे देखकर उसमें नृसिंहजीकी आकृति पहचानी और यह निश्चय किया कि यह आदिमूर्ति भगवान् नृसिंहजीकी प्रतिमा है। तब प्रसन्नचित्त हुए राजा इन्द्रद्युम्नने भगवान् नृसिंहकी परिक्रमा की और धरतीपर मस्तक रखकर साष्टांग प्रणाम किया। तत्पश्चात् राजाके अनुरोधसे नारदमुनिने भूदेवी और लक्ष्मी देवीके साथ देवाधिदेव भगवान् नृसिंहकी प्रतिमाको रत्नमयी वेदीपर शुभ मुहूर्त्तमें स्थापित कराया। उसके बाद वैष्णव, ब्राह्मण, अन्यान्य नरेशगण तथा बुद्धिमान् नारदजीके साथ राजा इन्द्रद्युम्नने उपनिषदों और धर्मशास्त्रीय स्तोत्रोंद्वारा प्रसन्नतापूर्वक भगवान्का
३५२ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
स्तवन किया—'भगवन्! आप एक, अनेक, स्थूल, सूक्ष्म तथा अत्यन्त लघु शरीर धारण करते हैं, आप आकाशसे परे होकर भी आकाशस्वरूप हैं, आपका रूप सदा एकरस रहता है, अथवा आप अद्वितीयस्वरूप हैं। आपका आकार आकाशके समान सर्वव्यापी है, आप आकाशमें स्थित हैं, आकाशपर आरूढ़ हैं। व्योमकेश शिव तथा पद्मयोनि ब्रह्मा आपके ही स्वरूप हैं। दिव्य नृसिंहरूपमें प्रकट हुए परमात्मन्! आपका तेज कई करोड़ सूर्योंके समान है। प्रभो! आप दुःखरूपी समुद्रसे मेरा उद्धार कीजिये। आप नित्य समीप हैं, दूर-से-दूर स्थित हैं, न दूर हैं, न समीप हैं तथा बोध्य और बोध आपके ही स्वरूप हैं। आप ज्ञेयके भी ज्ञेय हैं, ज्ञानगम्य होते हुए भी अगम्य हैं। मायासे अतीत हैं, आपतक किसी भी प्रमाणकी पहुँच नहीं है, तो भी लोग अनुमानसे आपके विषयमें विचार करते हैं। आप सबके आदि, सबके कर्ता, सबको अनुमति प्रदान करनेवाले तथा सबके पालक और संहारक हैं। विश्वसाक्षिन्! आपको नमस्कार है। आप ज्योतिःस्वरूप, ज्ञानरूप, प्रकाशपुंज, व्यूहाकार और सृष्टिके हेतु हैं। दुःखोंके विनाश करनेके एकमात्र कारण होकर भी आप वस्तुतः कारण नहीं हैं। सबके संशयोंको छिन्न-भिन्न करनेके लिये आप सबसे पहले प्रकट हुए हैं। स्वामिन्! आप मुझे अपने चरणारविन्दोंकी श्रेष्ठ भक्ति प्रदान कीजिये; जो चारों पुरुषार्थोंकी मूल कारण मानी गयी है। भक्तोंके अभीष्ट मनोरथकी पूर्ति करनेवाले आप भगवान् नृसिंहकी मैं शरण लेता हूँ। अपने चरणोंका आश्रय लेनेवाले लोगोंकी पापराशिका विनाश करनेवाले दयासागर श्रीनृसिंहजीको मैं प्रणाम करता हूँ। तीनों लोक जिनके उदरमें स्थित हैं, उन नृसिंहदेवको मैं नमस्कार करता हूँ। दीनोंपर दया करनेवाले विष्णो! आपको नमस्कार है, नमस्कार है, नमस्कार है। आप मुझ अनाथकी रक्षा कीजिये। मैं अपने इस चर्मचक्षुसे आपके दिव्य स्वरूपका दर्शन कर सकूँ, ऐसी कृपा कीजिये। आपकी कृपासे मेरे सहस्र अश्वमेधयज्ञ निर्विघ्न पूर्ण हों; मेरी करोड़ों पापराशियाँ नष्ट हो जायें। भगवन्! जो मनुष्य आपकी शरण लेते हैं, वे मोक्षके भागी होते हैं।'
इस प्रकार दिव्य नृसिंहकी स्तुति करके राजा इन्द्रद्युम्नके मनमें बड़ी प्रसन्नता हुई। उन्होंने बार-बार धरतीपर लेटकर भगवान्को दण्डवत् प्रणाम किया। जो लोग इस स्तोत्रसे दिव्य नृसिंहजीकी स्तुति करते हैं, उन्हें भगवान् नृसिंह मोक्ष प्रदान करते हैं। ज्येष्ठमासके शुक्ल पक्षकी द्वादशी तिथिको स्वातीनक्षत्रके योगमें महर्षि नारदने उस क्षेत्रमें दिव्य नृसिंहदेवकी स्थापना की है। जो लोग वहाँ उनका दर्शन करते हैं, वे सहस्र अश्वमेध यज्ञसे अधिक फल प्राप्त करते हैं। जो पंचामृत, दूध, नारियलके रस अथवा सुगन्धित जलसे भगवान् नृसिंहको नहलाते, खीर आदि उपचार समर्पित करके पूजा करते, जवाकुसुमकी माला, चन्दन, धूप, दीप और ताम्बूल चढ़ाकर, स्तुति-पाठ, जय-जयकार, परिक्रमा, प्रणाम तथा दानसे नृसिंहजीको सन्तुष्ट करते हैं, वे ब्रह्मलोकको प्राप्त होते हैं। वैशाखकी चतुर्दशीको शनिवारके दिन स्वातीनक्षत्रमें प्रदोषके समय भगवान् नृसिंहका आदि-अवतार हुआ है। उस तिथिको विधिपूर्वक नृसिंहजीकी पूजा करके मनुष्य अपने करोड़ों जन्मोंकी संचित पापराशिको तत्काल भस्म कर देता है। जो भगवान् नृसिंहका दर्शन, स्पर्श, नमस्कार, भक्तिपूर्वक दण्डवत् तथा स्तुति करता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो जाता है।
- वैष्णवखण्ड-उत्कलखण्ड * ३५३
इन्द्रद्युम्नके द्वारा सहस्र अश्वमेध यज्ञोंका अनुष्ठान और ध्यानमें भगवान्का दर्शन
मुनियोंने पूछा—महर्षे! उस क्षेत्रमें भगवान् नृसिंहके स्थापित हो जानेपर राजा इन्द्रद्युम्नने क्या किया ?
जैमिनिजी बोले—राजाने सर्वप्रथम इन्द्रादि देवताओंका आवाहन किया। छहों अंग, पद और क्रमसहित चारों वेदोंके विद्वान् सहस्रों ऋषियों और ब्राह्मणोंको निमन्त्रित किया, जो यज्ञविद्यामें कुशल और मीमांसाशास्त्रमें परिनिष्ठित थे। सदाचारी, शुद्ध, कुलीन एवं सत्यवादी वैष्णवोंको भी आदरपूर्वक निमन्त्रित किया। राजाका सभाभवन पत्थरका बना हुआ था। उसकी ऊँचाई बहुत थी और वह चूनेसे लेपा गया था। उसका विस्तार दो कोसका था। उसमें नीचेकी भूमि कहीं रत्नोंसे मढ़ी गयी थी, कहीं सोनेसे, कहीं स्फटिकमणिसे तथा कहीं चाँदीसे। उस भवनके चारों ओर सुखपूर्वक उतरनेके लिये सैकड़ों सीढ़ियाँ बनी हुई थीं। शुभ दिन और शुभ नक्षत्रमें सब सभासदोंकी बैठक बुलाकर राजाने सबको यथायोग्य आसन दिया। जब सब लोग यथायोग्य स्थानपर सुखपूर्वक बैठ गये, तब राजाने अपने पुरोहितके साथ उपस्थित हो देवताओं, ऋषियों तथा राजाओंके बीचमें रत्नसिंहासनपर बैठे हुए शचीपति इन्द्रका दिव्य माला, चन्दन, वस्त्र और विष्टर (आसन) आदिके द्वारा सबसे पहले पूजन किया। तत्पश्चात् वैष्णवोंकी पूजा की। फिर नारद और पुरोहितसहित उन्होंने इन्द्रसे कहा—'देवेश्वर! मैं अश्वमेध-यज्ञद्वारा यज्ञपुरुष भगवान् विष्णुका पूजन करूँगा, आप इसके लिये मुझे आज्ञा दें और जबतक सहस्र यज्ञ पूर्ण न हो जायँ, तबतक देवताओंसहित आप इस सभाभवनमें निवास करें। आपने पहले यहाँ जिन शरीरधारी नीलमाधवका दर्शन किया है, वे बालुकाराशिमें छिप गये हैं। उनके पुनः प्रकाशमें आनेपर आपलोगोंका भी कल्याण होगा। इसीलिये मेरा सारा प्रयत्न है।' राजाके इस प्रकार सूचित करनेपर इन्द्रादि देवताओंने कहा—'इन्द्रद्युम्न! तुम सचमुच महात्मा हो। तुमने इस पृथ्वीपर सत्यव्रतका पालन किया है। हमने पहलेसे ही तुम्हारे भविष्य कार्यक्रमको जान लिया है। तुम्हारा यह कार्य तीनों लोकोंको पवित्र करनेवाला है। हम इसमें तुम्हारे सहायक होंगे। तुम भक्तवत्सल भगवान् विष्णुका सहस्र अश्वमेध यज्ञोंद्वारा सुखपूर्वक पूजन करो।'
तदनन्तर राजाने यज्ञके आरम्भके लिये भगवान्का पूजन किया। भगवान् विष्णुको सभाभवनमें इष्टदेवके स्थानपर बिठाकर राजा अपनी पत्नीके साथ निश्चित लग्नकी प्रतीक्षा करने लगे। स्वस्तिवाचन हो जानेपर पुण्याहवाचन और आभ्युदयिक श्राद्ध सम्पन्न किया। उसके बाद सब सामग्री लेकर राजाने ऋत्विजोंका वरण किया। वरण हो जानेपर उन्होंने सपत्नीक राजाको यज्ञकी दीक्षा दी। वेदीका संस्कार करके उसपर प्रज्वलित आहवनीय अग्निकी स्थापना की गयी। वह अग्नि साक्षात् भगवान् विष्णुका तेज है। फिर प्रोक्षण और अभिमन्त्रण करके उत्तम लक्षणोंवाले अश्वको छोड़ा गया। यज्ञकी दीक्षा लिये हुए राजा मौन होकर मृगचर्मपर बैठे। जबतक महायज्ञका कार्य चलता रहा, तबतक सब मनुष्योंके लिये वहाँ छहः प्रकारके अन्न-पान आदि चतुर रसोइयोंद्वारा तैयार किये जाते थे। उस यज्ञमें प्रतिदिन लोगोंके सम्मान और आदरमें वृद्धि होती थी। साथ ही नित्य नये-नये भोज्यपदार्थ एक-से-एक बढ़कर प्रस्तुत किये जाते थे। वहाँ सर्वत्र प्रयत्न करके लोगोंका आदर-सम्मान किया जाता और आग्रहपूर्वक भोजन कराया जाता था। वहाँ किसीको याचना नहीं करनी पड़ती थी। कोई विमुख नहीं लौटता
३५४ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
था। महाराजके महल सब मनुष्योंके लिये अपने घरके समान हो गये थे। भगवान् विष्णुकी प्रसन्नताके लिये किये जानेवाले उस यज्ञमें यज्ञानुष्ठानमें कुशल तथा सदाचारविभूषित विद्वान् कार्य करते थे। अग्न्याधानसे लेकर अवभृथ-प्रचारतक सब कार्य क्रमशः और विधिके अनुसार सम्पन्न हुए। कोई भी मन्त्र कभी स्वर और वर्णसे हीन नहीं होने पाया। विधिके विधायक महर्षि ही वहाँ यज्ञकर्मके अधिष्ठाता थे; अतः कर्ममें कहीं कोई त्रुटि नहीं होने पाती थी। वहाँ सप्तर्षि याज्ञवल्क्य आदि मुनि, जो गुण-दोषका विभाग करनेवाले हैं, यज्ञके दिव्य सदस्य, यज्ञके साक्षी और यज्ञकर्म करानेवाले थे। उन्हींका ऋत्विजोंके रूपमें वरण कराया गया था। यज्ञमें सम्मिलित हुए मुनिलोग परस्पर कथा-वार्ताके प्रसंगमें वैदिक वाकोवाक्य, सूक्त तथा गुह्य उपनिषदकी चर्चा करते थे। सब पापोंका नाश करनेवाले भगवच्चरित्रोंकी कथा वहाँ सभामें हुआ करती थी। राजा इन्द्रद्युम्नके यज्ञमें सब देवता प्रत्यक्ष होकर हविष्य ग्रहण करते थे। वह यज्ञ तीनों लोकोंको प्रसन्न करनेवाला था।
इस प्रकार क्रमशः विधिपूर्वक चलनेवाला वह अश्वमेध यज्ञ नौ सौ निन्यानबेकी संख्यातक पहुँच गया। जब अन्तिम यज्ञ होने लगा, तब राजा इन्द्रद्युम्न प्रतिदिन दिव्यावस्थाको प्राप्त होने लगे। सुत्या (सोमरस निकालनेके दिन) से सात दिनके बाद जो रात्रि आयी, उसके चौथे पहरमें राजा इन्द्रद्युम्नने अविनाशी भगवान् विष्णुका ध्यान किया। उस ध्यानमें उन्होंने स्फटिकमणिमय श्वेतद्वीपको प्रत्यक्ष हुआ-सा देखा। उसके चारों ओर क्षीरसमुद्र लहरा रहा था। उस श्वेतद्वीपके मध्यभागमें दिव्य मणियोंका बना हुआ एक उत्तम मण्डप दिखायी दिया। उसके भीतर प्रकाशमान रत्नसिंहासन सुशोभित था। उस रत्नसिंहासनपर मध्यभागमें शंख-चक्र-गदाधारी भगवान् विष्णुका दर्शन हुआ। उनके श्रीअंगोंकी कान्ति नीलमेघके समान श्याम थी। वे वनमालासे विभूषित थे। उनके दाहिने भागमें हिमालयके सदृश गौर तथा कोटि चन्द्रमाओंके समान कान्तिमान् धरणीधर अनन्त विराजमान थे, जो फणरूपी मुकुटका विस्तार करके सुन्दर छत्रके आकारमें परिणत हो गये थे। उनका स्वरूप बड़ा ही मनोहर था। उनके कानोंमें दो रत्नमय कुण्डल झिलमिला रहे थे। शरीरपर सुन्दर नील वस्त्र शोभायमान था। भगवान्के वाम भागमें शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न भगवती लक्ष्मी विराजमान थीं। उनके हाथोंमें वर और अभयकी मुद्रा तथा कमल सुशोभित थे। उनके शरीरकी कान्ति कुंकुमके समान थी और नेत्र बड़े सुन्दर थे। वे कमलके आसनपर बैठी हुई थीं। भगवान्के आगे ब्रह्माजी हाथ जोड़े खड़े थे। श्रीहरिके वाम भागमें नाना मणिमय सुदर्शनचक्र स्थित था। सनकादि मुनीश्वर उन जगद्गुरु भगवान् विष्णुकी स्तुति कर रहे थे। ध्यानमें भगवान्का इस प्रकार दर्शन पाकर राजा इन्द्रद्युम्नको बड़ा हर्ष हुआ। वे गद्गद वाणीसे उनकी स्तुति करने लगे।
इन्द्रद्युम्न बोले—जगदाधार! आपको नमस्कार
राजा इन्द्रद्युम्नको ध्यानमें भगवान्के दर्शन
| ३५६ | * संक्षिप्त स्कन्दपुराण * |
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है। जगदात्मन्! आपको नमस्कार है। कैवल्यस्वरूप! त्रिगुणातीत! गुणांजन! आपको नमस्कार है। आप विशुद्ध निर्मल ज्ञानस्वरूप हैं, आपको नमस्कार है। शब्दब्रह्म नामसे प्रसिद्ध आपको नमस्कार है। जगत्स्वरूप! आपको नमस्कार है। संसारसागरमें गिरे हुए दीन-दुःखी मनुष्योंके दुःखका नाश करनेवाले आपको नमस्कार है। हृदयकी दुर्भेद्य ग्रन्थियोंका भेदन करनेवाले आपको नमस्कार है। आप चौदह भुवनरूपी भवनके मूलस्तम्भ हैं। आपको नमस्कार है। कोटि-कोटि ब्रह्माण्डोंकी रचना करनेवाले शिल्पीरूप आप भगवान् चक्रपाणिको नमस्कार है। आप करुणारूपी अमृतसिन्धुको बढ़ानेवाले चन्द्रमा हैं, आपको नमस्कार है। दीनोंका उद्धार करनेके लिये एकमात्र गुप्त दयासिन्धु-स्वरूप आपको नमस्कार है। जगत्को प्रकाशित करनेवाले जो सूर्य आदि ज्योतिर्मय ग्रह और नक्षत्र हैं, उनकी भी ज्योति आप हैं; आपको नमस्कार है। आप अन्तःकरणके पापोंको जलानेके लिये प्रदीप्त अग्निरूप हैं, आपको नमस्कार है। आप सबको पवित्र करनेवाले हैं। पवित्र वस्तुओंमें सबसे अधिक पवित्र हैं आपको बार-बार नमस्कार है। आप सबसे अधिक भारी, सबसे महान् और सबसे अधिक | विस्तारयुक्त हैं, आपको बार-बार नमस्कार है। आप अतिशय निकट, बहुत ही दूर और अत्यन्त छोटे हैं, आपको बार-बार नमस्कार है। नारायण! आप सबसे श्रेष्ठ और परम पवित्र हैं, आपको नमस्कार है। जगन्नाथ! मेरी रक्षा कीजिये। दीनबन्धो! आपको नमस्कार है। प्रभो! आपको सुखदायिनी नौकाके रूपमें पाकर मैं भवसागरके पार हो गया। रमानाथ! आपका दर्शन होनेसे मेरे सब क्लेश दूर हो गये। आप सच्चिदानन्दस्वरूप हैं। आपको प्राप्त हुए मनुष्योंके दुःखोंका सर्वथा नाश हो जाता है।<br><br>इस प्रकार ध्यानमें स्थित हुए राजा इन्द्रद्युम्नने जगदीश्वर भगवान् विष्णुकी यों स्तुति करके उन्हें प्रणाम किया। फिर ध्यानके अन्तमें राजाको अपने-आपका भान हुआ। वे सोचने लगे— यहाँपर भगवान् विष्णु कैसे स्वयं मेरे प्रत्यक्ष होंगे? इस चिन्तासे उनका मन व्याकुल हो उठा। उन्होंने नारदजीसे सब बातें कहीं। तब नारदजीने आश्वासन देते हुए कहा—'राजन्! अब तुम्हारा शोक समाप्त हो गया। इस यज्ञके अन्तमें भगवान् तुम्हें यहाँ प्रत्यक्ष दर्शन देंगे। ये सब बातें दूसरे किसीके आगे प्रकाशित न करना।'
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अश्वमेधकी पूर्ति, आकाशवाणी, भगवान्की काष्ठमयी प्रतिमाका निर्माण, संस्कार तथा स्तवन
**जैमिनिजी कहते हैं—**तदनन्तर राजाके अश्वमेध यज्ञमें सुत्या (सोमरस निकालने)-का उत्सव प्रारम्भ हुआ। उसमें दीनोंको बेरोक-टोक मनोवांछित दान दिये जाने लगे। उस समय नारदजीने नृपश्रेष्ठ इन्द्रद्युम्नसे कहा—'राजन्! अब पूर्णाहुतिका कार्य समाप्त हो, जिससे यह यज्ञ सफल हो | जाय। पहले ध्यानमें तुमने जो कुछ देखा है, उसके अनुसार तुम्हारे भाग्योदयका समय समीप आ गया है। श्वेतद्वीपमें जिन विश्वमूर्ति अविनाशी विष्णुका तुमने दर्शन किया है, उनके शरीरसे गिरा हुआ रोम वृक्षभावको प्राप्त हो जाता है। वह इस पृथ्वीपर स्थावररूपमें भगवान्का अंशावतार
- वैष्णवखण्ड-उत्कलखण्ड * ३५७
होता है। भक्तवत्सल भगवान् अब उसी रूपमें अवतीर्ण हो रहे हैं। तुम्हारे ही सौभाग्यसे सर्वपापापहारी भगवान् यहाँ सब लोगोंके नेत्रोंके अतिथि बनेंगे। अब यज्ञान्तस्नान समाप्त करके वृक्षरूपमें प्रकट हुए यज्ञेश्वर भगवान् विष्णुको तुम इस महावेदीपर स्थापित करो।' इस प्रकार विचार करके नारद और इन्द्रद्युम्न दोनों प्रसन्नतापूर्वक वहाँ गये और उस वृक्षको देखकर 'इसके रूपमें साक्षात् ब्रह्म भगवान् विष्णु प्रकट हो गये'—ऐसा मानते हुए सब लोग बड़े प्रसन्न हुए। चार शाखाओंसे युक्त उस चतुर्भुज वृक्षका दर्शन करके राजाने अपने परिश्रमको सफल माना। फिर नीलमणि माधवके अन्तर्धान होनेका जो शोक था, उसे उन्होंने त्याग दिया और बार-बार उस वृक्षको प्रणाम करके नेत्रोंसे आनन्दके आँसू बहाते हुए राजाने ब्राह्मणोंसे उस वृक्षको मँगवाया। वे लोग माला और चन्दनसे विभूषित विष्णुके उस दिव्य वृक्षको महावेदीपर ले आये। नारदजीके कहनेके अनुसार राजाने उस वृक्षका पूजन किया और पूजा समाप्त करके मुनिश्रेष्ठ नारदजीसे पूछा—'मुने! भगवान् विष्णुकी कैसी प्रतिमाएँ बनेंगी और उन्हें कौन बनायेगा?' नारदजीने उत्तर दिया—'राजन्! भगवान्की लीला सब लोकोंसे परे है, उसे कौन जान सकता है।' इस प्रकार बातचीत हो ही रही थी कि ऊपरसे आकाशवाणी सुनायी दी—'भगवान् विष्णु अत्यन्त गुप्त रखी हुई महावेदीपर स्वयं अवतीर्ण होंगे। पंद्रह दिनोंतक इसे ढक दिया जाय। हाथमें हथियार लेकर उपस्थित हुआ जो यह बूढ़ा बढ़ई है, इसे भीतर प्रवेश कराकर सब लोग यत्नपूर्वक दरवाजा बंद कर लें। जबतक मूर्तियोंकी रचना हो, तबतक बाहर बाजे बजते रहें; क्योंकि रचनाका शब्द कानमें पड़नेपर वह बहरा बना देनेवाला है। कोई भी भीतर प्रवेश न करे और न कभी देखनेकी चेष्टा करे; क्योंकि वहाँ काम करनेवालेके अतिरिक्त जो भी देखेगा, उसके दोनों नेत्र अन्धे हो जायँगे।'
तत्पश्चात् राजाने जिस प्रकार आकाशवाणीने कहा था, वैसी ही व्यवस्था कर दी। क्रमशः पंद्रहवाँ दिन आते ही भगवान् स्वयं चार विग्रहोंमें प्रकट हुए। बलभद्र, सुभद्रा और सुदर्शनचक्रके साथ भगवान् जनार्दन दिव्य सिंहासनपर विराजमान हुए। भगवान्के चार दिव्य रूप सम्पन्न हो जानेपर सम्पूर्ण विश्वके उपकारके लिये पुनः आकाशवाणी हुई—'राजन्! इन चारों प्रतिमाओंको वस्त्रोंसे भलीभाँति आच्छादित करके इन्हें अपने-अपने स्वाभाविक रंगकी प्राप्ति कराओ। भगवान् जनार्दन नीलमेघके समान श्यामवर्ण धारण करें, भगवान् बलभद्र शंख और चन्द्रमाके समान गौर वर्णसे विराजमान हों, सुदर्शन चक्रका रंग लाल होना चाहिये और सुभद्रादेवी कुंकुमके समान अरुण वर्णकी होनी चाहिये। इन विग्रहोंपर पहलेका किया हुआ रंग आदि संस्कार छूटनेपर प्रतिवर्ष नूतन संस्कार कराना चाहिये। केवल दिव्य वल्कल-लेप रहने देना चाहिये। यदि कोई प्रमादवश इस लेपको दूर करेगा तो राज्यमें दुर्भिक्ष और महामारी फैलेगी। राजन्! तुम्हें भी नग्न रूपमें इन मूर्तियोंका दर्शन नहीं करना चाहिये। अन्य मनुष्य भी यदि नग्न रूपमें देखेंगे तो उनके लिये भी ये भय उपस्थित करनेवाली होंगी। नाना प्रकारके लेपसे लिप्त एवं विचित्र शृंगारोंसे युक्त मूर्तियोंका ही दर्शन करना चाहिये। राजन्! तुम्हारे ऊपर कृपा करके भगवान् प्रकट हुए हैं और तुम्हारे ही प्रसादसे वे सब जीवोंको धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष प्रदान करेंगे। नीलाचलपर कल्पवृक्षके वायव्य कोणमें सौ हाथकी दूरीपर और भगवान् नृसिंहके उत्तर भागमें जो बहुत बड़ा मैदान है, उसमें अत्यन्त सुदृढ़ और हजार हाथ ऊँचा मन्दिर बनवाकर उसीमें भगवान्की स्थापना करो। पहले इस पर्वतपर जो प्रतिदिन भगवान् नील-
३५८ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
माधवका पूजन करता था, वह विश्वावसु नामवाला शबर (भील) वैष्णवोंमें श्रेष्ठ है। उसके साथ तुम्हारे पुरोहितकी मित्रता हो चुकी है। इन्हीं दोनोंकी सन्ततिको भावी उत्सवोंमें भगवान्के विग्रहपर लेप और संस्कार करनेके कार्यमें लगाया जाय।'
इतना कहकर वह दिव्य आकाशवाणी मौन हो गयी। उसका उपदेश सुनकर राजाने प्रसन्नतापूर्वक उसका पालन किया। जब बलराम, श्रीकृष्ण, सुभद्रा तथा सुदर्शन चक्रपर आकाशवाणीके कथनानुसार लेप आदि संस्कार हो गया, तब उनकी आकृति बड़ी ही सुन्दर हो गयी। उसके बाद राजाने महावेदीका पर्दा खुलवा दिया। फिर सबने रत्नसिंहासनपर विराजमान भगवान्की झाँकी की। (वस्त्रालंकारोंसहित) उन भगवद्विग्रहोंका दर्शन करके राजा इन्द्रद्युम्न आनन्दके समुद्रमें डूब गये और नेत्रोंको कुछ-कुछ बंद किये, प्रेमके आँसू बहाते हुए हाथ जोड़कर खम्भेके समान खड़े रहे। तब नारदजीने राजासे कहा— 'नृपश्रेष्ठ! कमलके समान नेत्रोंवाले इन भगवान् जगन्नाथका दर्शन करो। ये भक्तोंपर अनुग्रह करनेके लिये सम्पूर्ण ज्ञानकी निधि हैं। इन्हीं श्रीहरिको देखनेके लिये योगीलोग मनको संयममें रखकर सदा प्रयत्न करते रहते हैं। वे ही भगवान् विष्णु आज काष्ठमय शरीरमें स्थित हो तुमपर अनुग्रह करनेके लिये प्रत्यक्ष हुए हैं। इन करुणासागर भगवान्की स्तुति करो।'
नारदजीके द्वारा इस प्रकार सचेत किये जानेपर राजा इन्द्रद्युम्ने करुणामय जगन्नाथका स्तवन किया— 'दयासागर मुरारे! कहाँ तो ब्रह्मा, रुद्र तथा इन्द्रके मुकुटोंमें मग्न हुए आपके निर्मल युगलचरणारविन्द और कहाँ मल, मूत्र, रक्त, मांस एवं हड्डियोंसे बना और चमड़ेसे ढका हुआ मुझ दीनका यह अधम शरीर? ईश! इस असार संसारमें भटकते रहनेके कारण मैं श्रमसे व्याकुल हूँ। भला आपको कैसे जानूँ? देव! मैंने अपने कर्मोंद्वारा सुख भोगनेके लिये जिन विषय-भोगोंका संग्रह किया, वे ही परिणाममें मेरे लिये दुःखरूप हो गये। अतः मेरे समान दुःखी दूसरा कोई नहीं है। प्रभो! यदि मैंने पहले कभी मनसे भी आपकी उपासना की होती तो दुःख भोगनेके लिये बार-बार नाना प्रकारके जन्म मुझे क्यों प्राप्त होते? मुरारे! क्या आपके चरणारविन्दोंसे दूर रहनेका ही यह फल नहीं है? सम्पूर्ण पृथ्वीके धनसे भरा हुआ मेरा खजाना, सेना, मनके अनुकूल सैकड़ों स्त्रियाँ और निष्कण्टक राज्य यह सब कुछ आपके तत्त्वज्ञानसे शून्य पशुके तुल्य मुझ अधमके लिये बड़ा भारी भार हो रहा है। इसमें सदा कष्ट ही प्राप्त हुआ करता है। दीनोंपर दया करनेवाले प्रभो! आपके स्मरण करनेमात्रसे ही जीवकी मुक्ति होती है। इस संसारमें आपके सिवा मेरा कोई बन्धु नहीं है। मेरी बुद्धि आपके चरणारविन्दोंसे कभी अलग न हो। आप सच्चिदानन्दमय परिपूर्ण सिन्धु हैं। जो सहस्रों जन्मोंका भाग्योदय होनेपर आपको पा गये हैं, वे क्या कभी लेशमात्र सुख और अनन्त दुःखोंसे भरे हुए विषय-भोगरूपी इन्द्रजालकी ओर आँख उठाकर देखते हैं? कहाँ तो जिसमें लेशमात्र सुख और अनन्त दुःखोंकी खानरूप सैकड़ों ग्रन्थियाँ हैं, ऐसे कर्मोंका अटूट बन्धन और कहाँ अनन्त, अनादि, एक एवं आनन्दप्रद आपके पवित्र चरणारविन्द? सबपर स्वभावतः कृपा करनेवाले प्रभो! मूलभूत आप परमेश्वरको न पाकर तुच्छ कार्यके लिये बहुत भटकनेवाले क्लेशके ही भाजनरूप मुझ अत्यन्त दीनकी रक्षा कीजिये। सम्पूर्ण विश्वके एकमात्र वन्दनीय विष्णुदेव! वेदान्तवेद्य! अव्यय! विश्वनाथ! आप ही समस्त पापराशियोंका नाश करनेमें समर्थ हैं।
* वैष्णवखण्ड-उत्कलखण्ड * ३५९
बलवानोंमें श्रेष्ठ बलभद्र! आपका विग्रह सहस्रों फणोंसे आवृत है। आप ईश्वर हैं, मैं आपकी शरणमें आया हूँ। संसारको आश्रय देनेवाली तथा सम्पूर्ण देवताओंको उत्पन्न करनेवाली मंगलमयी सुभद्राके दोनों चरणोंको प्रणाम करता हूँ। हे नाथ! यह ब्रह्माण्डोंका समूह जिसकी किरणोंके समुदायसे रचा गया है और जो दैत्योंकी सेनाका संहार करनेवाला है, उस सुदर्शन चक्रके रूपमें आपको मैं प्रणाम करता हूँ।'
इस प्रकार स्तुति करके श्रेष्ठ राजा इन्द्रद्युम्नने भगवान्को साष्टांग प्रणाम किया और कहा— 'अनाथोंके बन्धु जगन्नाथ! संसार-समुद्रमें डूबे हुए मुझ दीन तथा दुःख-शोकसे व्याकुल मनुष्यका आप कृपापूर्वक उद्धार करें।'
तत्पश्चात् नारदजीने कहा—अपार भवसागरसे पार उतारनेमें तत्पर भगवान् नारायण! आपकी जय हो, जय हो। सनक, सनन्दन और सनातन आदि श्रेष्ठ योगी आपके दिव्य तत्त्वका चिन्तन करते रहते हैं। आप सर्वलोकस्वरूप, सब लोगोंको सुख देनेवाले, सम्पूर्ण विश्वके उपकारक तथा समस्त जगत्के वन्दनीय हैं। कोटि-कोटि ब्रह्मा, रुद्र, इन्द्र, मरुद्गण, अश्विनीकुमार, साध्य तथा सिद्धगण आपके लीला-विलाससे उत्पन्न हैं। सम्पूर्ण देवता और दानव आपके चरणोंमें प्रणाम करते हैं। त्रिभुवनगुरो! आप किसीके भी पूर्णतया जाननेमें नहीं आते। आपको नमस्कार है, नमस्कार है।
तदनन्तर अन्यान्य राजा, वेदोंके पारंगत विद्वान्, श्रोत्रिय मुनि, ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा विद्वान् वैश्य जातिके लोगोंने भी वैदिक सूक्तों, स्तोत्रों, पौराणिक स्तुतियों और स्वरचित कविताओंसे, जैसे बना उसी प्रकार, बलभद्र और सुभद्राके साथ कमलनयन भगवान् श्रीकृष्णका स्तवन किया। इसके बाद राजाने पुरोहितजीसे भगवान् वासुदेवकी पूजाके लिये सामग्री संग्रह करनेको कहा। फिर नारदजीके उपदेशसे स्वयं राजाने ही विधि एवं मन्त्रोच्चारणके साथ क्रमशः उन सब विग्रहोंका पूजन किया। द्वादशाक्षर (ॐ नमो भगवते वासुदेवाय) मन्त्रसे बलभद्रजीकी पूजा की। इसी मन्त्रके द्वारा उपासना करके ध्रुवजीने परम उत्तम स्थान प्राप्त किया है। पुरुषसूक्तसे राजाने यथाशक्ति भगवान् नारायणकी पूजा की। देवीसूक्तसे सुभद्राका और सुदर्शन-सम्बन्धिनी ऋचासे सुदर्शन चक्रका पूजन किया। इस प्रकार अपने वैभवके अनुसार भक्तिपूर्वक उन सबकी पूजा करके भगवत्प्रीतिके लिये उन्होंने श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको दान दिया। इसके बाद राजाने शुभ समय एवं शुभ नक्षत्रमें नारद आदि श्रेष्ठ ब्राह्मणोंकी पूजा करके स्वस्तिवाचन कराया और जगन्नाथजीका स्मरण करते हुए वास्तुपूजनपूर्वक शिल्पीका भी पूजन किया। भगवान् विष्णुके उस काष्ठमय अवतारको देखकर कृतार्थ एवं पापरहित हुए राजाओंको इन्द्रद्युम्नने बड़े आदरके साथ विदा किया।
देवताओं तथा ब्रह्माजीके द्वारा भगवद्विग्रहोंका स्तवन और उनकी स्थापना
जैमिनिजी कहते हैं—तदनन्तर राजा इन्द्रद्युम्नने शिल्पशास्त्रमें प्रवीण सब कारीगरोंको मन्दिरके निर्माणकार्यमें नियुक्त किया। थोड़े ही समयमें मन्दिर बनकर इतना ऊँचा हो गया कि वह नीचेसे दिखायी नहीं पड़ता था। उस समय भारतवर्षमें जितने समकालीन राजा थे, वे सभी राजा इन्द्रद्युम्नके उस पुण्य कार्यमें संलग्न थे। वह मन्दिर ऊँचाईमें आकाशको छूता था और चौड़ाईमें सब दिशाओंको पूरा कर रहा था। उसमें स्थान-स्थानपर सुवर्ण जड़ा हुआ था और अनेक प्रकारके रत्नोंसे वह