संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
- माहेश्वरखण्ड-कुमारिकाखण्ड * ११७
काशीपुरीमें पहुँचकर मेरे बताये अनुसार संवर्तको देखा। उनके रखे हुए शवको देखकर संवर्तजी भूखसे व्याकुल होनेपर भी सहसा लौट पड़े। तब वे उन्हें पहचानकर शीघ्रतापूर्वक उनके पीछे गये। सड़कपर चलते हुए संवर्तको पुकारकर कहते जाते थे—'ब्रह्मन्! क्षणभरके लिये खड़े तो हो जाइये।' परन्तु वे उन्हें फटकारते हुए चले जाते थे। साथ ही यह भी कहते जाते थे—'अरे! तुम सब लोग लौट जाओ।' भागते-भागते जब वे बहुत दूर चले गये, तब एक स्थानपर रुककर पूछा—'किसने तुम्हें मेरा पता बताया है, शीघ्र बताओ?' तब उन्होंने काँपते हुए उत्तर दिया—'नारदजीने बताया है।' तब संवर्तने पुनः मार्कण्डेय आदिसे कहा, 'मेरे रास्तेका शल्य हटा दो, मैं भूखा हूँ, पुनः पुरीमें भिक्षाके लिये जाऊँगा। तुम्हारा प्रश्न क्या है, उसे भी कहो।'
वे बोले—महामुने! हम आपकी शरणमें आये हैं। कृपया हमें ऐसा कोई उपाय बतावें, जिससे हमलोग आपके अनुग्रहसे मोक्ष प्राप्त कर लें। जिस तीर्थमें जाकर मनुष्य सब तीर्थोंका फल प्राप्त कर लेता है, उसका नाम बताइये, जिससे हम सब लोग जाकर वहीं रहें।
संवर्तने कहा—स्वामिकार्त्तिकेय तथा नव दुर्गाओंको नमस्कार करके मैं तुमलोगोंको सर्वोत्तम तीर्थका परिचय देता हूँ। उस तीर्थका नाम है—महीसागरसंगम। ये परम बुद्धिमान् नृपश्रेष्ठ इन्द्रद्युम्न जब यहाँ यज्ञ करते थे, तब इनके द्वारा यह पृथ्वी दो अंगुल ऊँची कर दी गयी थी। उस समय जैसे गीले काठके तपनेपर उससे पानी चूता है, उसी प्रकार यज्ञाग्निद्वारा तपती हुई पृथ्वीसे जलका स्रोत टपकने लगा। उस जलराशिको समस्त देवताओंने नमस्कार किया। वही मही नामक नदी है। पृथ्वीपर जो कोई भी तीर्थ हैं, उन सबके जलसे उत्पन्न साररूप मही नदीका जल माना गया है। मालवा नामक देशसे मही नदी उत्पन्न हुई है और दक्षिण समुद्रमें जाकर मिली है। उसके दोनों तट परम पुण्यमय तीर्थ हैं। वह सबके लिये कल्याणमयी है। पहले तो महानदी मही स्वयं ही सर्वतीर्थमयी है। फिर जहाँ सरिताओंके स्वामी समुद्रसे उसका संगम हुआ है, उस तीर्थके विषयमें कहना ही क्या है। काशी, कुरुक्षेत्र, गंगा, नर्मदा, सरस्वती, तापी, पयोष्णी, निर्विन्ध्या, चन्द्रभागा, इरावती, कावेरी, सरयू, गण्डकी, नैमिषारण्य, गया, गोदावरी, अरुणा, वरुणा तथा अन्य जो बीस हजार छः सौ नदियाँ इस पृथ्वीपर विद्यमान हैं, उन सबके सारतत्त्वसे मही नदीका जल प्रकट हुआ बताया गया है। पृथ्वीके सब तीर्थोंमें स्नान करनेसे जो फल मिलता है, वही महीसागरसंगममें भी प्राप्त होता है, ऐसा कहा गया है। स्वामिकार्त्तिकेयका भी इस विषयमें ऐसा ही वचन है। यदि तुमलोग किसी एक स्थानमें सब तीर्थोंका संयोग चाहते हो तो परम पुण्यमय महीसागरसंगम तीर्थमें जाओ। मैंने भी पहले बहुत वर्षोंतक वहाँ निवास किया है। यहाँ नारदजीके भयसे आकर रहता हूँ। महीसागरसंगममें नारदजी मेरे पास ही रहते थे। इधरकी बातें उधर लगा देनेका गुण उनमें विशेषरूपसे है। इन दिनों राजा मरुत्त मुझे ढूँढ़नेका प्रयास करते हैं। नारदजी उन्हें मेरा पता अवश्य बता देंगे, यही भय था। यहाँ तो बहुत-से दिगम्बर साधुओंके बीच उन्हींके समान बनकर मैं भी रहता हूँ। मरुत्तसे अधिक भयभीत होनेके कारण मैं यहाँ गुप्तरूपसे निवास करता हूँ। मुझे सन्देह है, नारद पुनः मेरा यहाँ रहना मरुत्तको बता देंगे, क्योंकि उनकी प्रायः ऐसी चेष्टा देखी जाती है। तुमलोग कभी किसीसे यह सब न कहना। राजा मरुत्त यज्ञकी सिद्धिके लिये चेष्टा कर रहे हैं। कुछ कारणवश देवताओंके आचार्य मेरे पिताने उनको त्याग दिया है। अतः उस यज्ञका ऋत्विग् बनानेके लिये उन्होंने मुझ गुरुपुत्रको ही मनोनीत किया है; परंतु अविद्याके अन्तर्गत होनेवाले हिंसात्मक यज्ञोंसे मेरा कोई प्रयोजन नहीं है। इसलिये राजा इन्द्रद्युम्नके साथ
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तुमलोग शीघ्रतापूर्वक महीसागरसंगम तीर्थमें जाओ। वहाँके पाँच तीर्थोंका सेवन करते हुए तुमलोग निश्चय ही मोक्ष प्राप्त कर लोगे।
ऐसा कहकर संवर्तजी अपने अभीष्ट स्थानको चले गये और इन्द्रद्युम्न आदि वे सब लोग भर्तृयज्ञ मुनिके पास पहुँचकर वहाँ महीसागरसंगम तीर्थमें रहने लगे। मुनिने अपने विशेष ज्ञानसे जान लिया कि ये सब लोग भगवान् शंकरके गण हैं। यह जानकर वे उन सब लोगोंसे बोले—'अहो! तुमलोगोंका पुण्य अत्यन्त निर्मल और महान् है। जिससे इस महीसागरसंगम नामक गुप्तक्षेत्रमें तुम्हारा आगमन हुआ है। महीसागरसंगममें किया हुआ स्नान, दान, जप, होम और विशेषतः पिण्डदान सब अक्षय होता है। पूर्णिमा और अमावास्याको यहाँ किया हुआ स्नान, दान और जप आदि सब कर्म अक्षय फल देनेवाला होता है। देवर्षि नारदने पूर्वकालमें जब यहाँ स्थान निर्माण किया था, उस समय ग्रहोंने आकर वरदान दिया था। शनिदेवने जो वरदान दिया, वह इस प्रकार है—'जिस समय शनिवारके साथ अमावास्या हो, उस दिन यहाँ स्नान, दानपूर्वक श्राद्ध करे। यदि श्रावण मासके शनिवारको अमावास्या तिथि हो और उसी दिन सूर्यकी संक्रान्ति तथा व्यतीपात योग भी हो तो यह 'पुष्कर' नामक पर्व होता है। इसका महत्त्व सौ सूर्यग्रहणोंसे भी अधिक है। उक्त सब योगोंका सम्बन्ध यदि किसी प्रकार उपलब्ध हो जाय, तो उस दिन लोहेकी शनिमूर्तिका और सोनेकी सूर्यप्रतिमाका महीसागरसंगममें विधिपूर्वक पूजन करना चाहिये। शनिके मन्त्रोंसे शनिका और सूर्यसम्बन्धी मन्त्रोंसे सूर्यका ध्यान करके सब पापोंकी शान्तिके लिये भगवान् सूर्यको अर्घ्य देना चाहिये। उस समय वहाँका स्नान प्रयागसे भी अधिक है, दान कुरुक्षेत्रसे भी बढ़कर है। महान् पुण्यराशि सहायक हो, तभी यह सब योग प्राप्त होता है। वहाँ किये हुए श्राद्धसे पितरोंको स्वर्गमें अक्षय तृप्ति प्राप्त होती है। जैसे परम पवित्र गयाशिर पितरोंके लिये परम तृप्तिदायक है। इसी प्रकार उससे भी अधिक पुण्य देनेवाला महीसागरसंगम है।—'अग्निश्च ते योनिरिडा च देहो रेतोऽथ विष्णोर्मृतस्य नाभिः।' अर्थात् 'हे महीनदी! अग्नि तुम्हारी योनि (उत्पत्तिस्थान) और पृथ्वी तुम्हारी देह है। तुम यज्ञस्वरूप विष्णुके वीर्यसे उत्पन्न हुई हो और अमृतका केन्द्रस्थान हो।' इस सत्य वाक्यका श्रद्धापूर्वक उच्चारण करते हुए महीसागरसंगम तीर्थमें स्नान करना चाहिये। जो सब नदियोंमें प्रधान और पवित्र सागर है, तथा प्रचुर जलवाली समस्त तीर्थस्वरूपा जो मही नदी है, इन दोनोंको मैं अर्घ्य देता हूँ, प्रणाम करता हूँ और इनकी स्तुति भी करता हूँ। ताम्रा, रस्या, पयोवाहा, पितृप्रीतिप्रदा, शुभा, शस्यमाला, महासिन्धु, दातृदात्री, पृथुस्तुता, इन्द्रद्युम्नकन्या, क्षितिजन्मा, इरावती, महीपर्णा, महीशृंगा, गंगा, पश्चिमवाहिनी, नदी तथा राजनदी—इन अठारह नामोंकी मालाका स्नानकाल और श्राद्धकालमें मनुष्य सर्वत्र पाठ करे। ये सब नाम महाराज पृथुके कहे हुए हैं, इनका पाठ करनेवाला मनुष्य यज्ञमूर्ति भगवान् विष्णुके पदको प्राप्त होता है।* तदनन्तर निम्नांकित मन्त्र पढ़कर मही नदीको अर्घ्य देना चाहिये—
महीदोहे महानन्दसन्दोहे विश्वमोहिनि।
जाता हि सरितां राज्ञि पापं हर महिद्रवे ॥
'हे देवी! तू इस पृथ्वीकी दुग्ध है, परमानन्दकी राशि है, सम्पूर्ण विश्वको मोहनेवाली है तथा
* मुखं च यः सर्वनदीषु पुण्यः पाथोधिरम्बुप्रचुरा मही च।
समस्ततीर्थाकृतिकेतयोश्च ददामि चार्घ्यं प्रणमामि नौमि॥
ताम्रा रस्या पयोवाहा पितृप्रीतिप्रदा शुभा। शस्यमाला महासिन्धुर्दातृदात्री पृथुस्तुता॥
इन्द्रद्युम्नस्य कन्या च क्षितिजन्मा इरावती। महीपर्णा महीशृङ्गा गङ्गा पश्चिमवाहिनी॥
नदी राजनदी चेति नामाष्टादशमालिकाम्।
स्नानकाले च सर्वत्र श्राद्धकाले पठेन्नरः। पृथुनोक्तानि नामानि यज्ञमूर्तिपदं व्रजेत्॥
(वेङ्कटेश्वर प्रेसकी प्रतिसे)
(स्क० पु०, मा० कुमा० १३। १२४—१२७)
* माहेश्वरखण्ड-कुमारिकाखण्ड * ११९
समस्त सरिताओंकी महारानीके रूपमें प्रकट हुई है। महिद्रवे! तू मेरे पाप हर ले।'
इस महीसागरसंगम तीर्थमें स्नान, जप और तपस्या करके पुण्यकर्मके प्रभावसे बहुत लोग रुद्रलोकमें चले गये हैं। विशेषतः सोमवारको, उत्तम भक्तिपूर्वक यहाँ स्नान करके जो पाँच तीर्थोंकी यात्रा करता है, वह पाँच महापातकोंसे मुक्त हो जाता है। इस प्रकार इस तीर्थका बहुविध उत्तम माहात्म्य बताकर भर्तृयज्ञने उन सबको शिवागममें बताये अनुसार शिवारोधनकी विधि बतलायी तथा पूजायोगका उपदेश देकर शिवभक्तिके उद्रेकसे पूर्ण हो उन इन्द्रद्युम्न आदि भक्तोंसे पुनः इस प्रकार कहा— 'शिवजीके व्रतका वर्णन करनेवाले उपासको! शिवजीसे बढ़कर दूसरा कोई देवता नहीं है। यह सर्वथा सत्य है, जो भगवान् शंकरको छोड़कर अन्य किसी भी वस्तुकी उपासना करता है वह हाथमें रखे हुए अमृतको त्यागकर मृगतृष्णाकी ओर दौड़ रहा है। यह सम्पूर्ण जगत् शिवशक्तिस्वरूप है; यह बात प्रत्यक्ष देखी जाती है; क्योंकि कुछ प्राणी पुँल्लिगंके चिह्नोंसे युक्त हैं और कुछ स्त्रीलिंगके चिह्नोंसे युक्त हैं। जो पुरुषचिह्नसे युक्त हैं वे शिवस्वरूप हैं तथा जिनमें स्त्रीलिंगसूचक चिह्न हैं वे सब शक्तिस्वरूप हैं। भगवान् रुद्रका उत्तम माहात्म्य 'शतरुद्रिय' के नामसे प्रसिद्ध है। तुमलोग यदि अपने पाप धोना चाहते हो तो उसका नियमपूर्वक श्रवण करो।
वह इस प्रकार है— ब्रह्माजी भगवान् शिवके सुवर्णमय लिंगकी आराधना करके उसके जगत्प्रधान (१) नामका जप करते हुए, अपने पदपर विराजमान हैं। श्रीकृष्णने स्थलभागमें काले पत्थरका शिवलिंग स्थापित करके ऊर्जित (२) नामसे उसकी आराधना की है। सनकादि महर्षियोंने अपने हृदयरूपी लिंगका जगद्गति (३) नामसे पूजन करके अपना अभीष्ट साधन किया है। सप्तर्षियोंने दर्भांकुरमय लिंगका विश्वयोनि (४) के नामसे पूजन किया है। देवर्षि नारद आकाशमें ही शिवलिंगकी भावना करके उसे जगद्बीज (५) नाम देकर उसकी आराधना करते हैं। देवराज इन्द्र वज्रमय लिंगकी विश्वात्मा (६) नामसे पूजा करते हैं। सूर्यदेव ताम्रमय लिंगकी पूजा और उसके विश्वसृग् (७) नामका जप करते हैं। चन्द्रमा मुक्तामय लिंगकी उपासना और उसके जगत्पति (८) नामका जप करते रहते हैं। अग्निदेव इन्द्रनीलमणिके शिवलिंगकी पूजा करते हुए उसके विश्वेश्वर (९) नामका जप करते हैं। बृहस्पतिजी पुखराज मणिके शिवलिंगकी आराधना और उसके विश्वयोनि (१०) नामका जप किया करते हैं। शुक्राचार्य विश्वकर्मा (११) नामसे प्रसिद्ध पद्मराग मणिमय शिवलिंगकी उपासना करते हैं। धनाध्यक्ष कुबेर सुवर्णमय लिंगकी पूजा और उसके ईश्वर (१२) नामका जप करते हैं। विश्वेदेवगण जगद्गति (१३) नामसे प्रसिद्ध रजतमय शिवलिंगकी पूजा करते हैं। यमराज पित्तलके शिवलिंगकी पूजा और उसकी शम्भु (१४) नामसे उपासना करते हैं। वसुगण काँसेके शिवलिंगकी आराधना और उसके स्वयम्भू (१५) नामका जप करते हैं। मरुद्गण त्रिविध लोहमय लिंगकी पूजा और उमेश या भूतेश (१६) नामका जप करते हैं। राक्षस लोहमय लिंगकी उपासना और भूतभव्यभवोद्भव (१७) नामका जप करते हैं। गुह्यकगण शीशेके शिवलिंगकी पूजा और योग (१८) नामका जप करते हैं। जैगीषव्य मुनि ब्रह्मरन्ध्रमय शिवलिंगकी उपासना और योगेश्वर (१९) नामका जप करते हैं। राजा निमि सबके युगल नेत्रोंमें ही शिवलिंगकी भावना करके उसकी आराधना करते और शर्व (२०) नाम जपते रहते हैं। धन्वन्तरि सर्वलोकेश्वरेश्वर (२१) नामसे प्रसिद्ध गोमयलिंगकी उपासना करते हैं। गन्धर्वगण लकड़ीके शिवलिंगकी पूजा और उसके सर्वश्रेष्ठ (२२) नामका जप करते हैं श्रीरामचन्द्रजी ज्येष्ठ (२३) नामका जप करते हुए वैदूर्यमय शिवलिंगकी पूजा करते हैं। बाणासुर मरकतमणिमय शिवलिंगकी पूजा और वासिष्ठ
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(२४) नामकी पूजा करता है। वरुणजी परमेश्वर (२५) नामसे प्रसिद्ध स्फटिकमणिमय शिवलिंगकी पूजा करते हैं। नागगण मूँगेके शिवलिंगकी उपासना और लोकत्रयंकर (२६) नामका जप करते हैं। सरस्वती देवी शुद्धमुक्तामय शिवलिंगको पूजती और लोकत्रयाश्रित (२७) नामका जप करती हैं। शनिदेव शनिवारकी अमावास्याको आधी रातके समय महीसागरसंगममें आवर्त (भँवर)-मय शिवलिंगकी पूजा और जगन्नाथ (२८) नामका जप करते हैं। रावण चमेलीके फूलका शिवलिंग बनाकर पूजा करता और सुदुर्जय (२९) नामका जप करता है। सिद्धगण मानसलिंगकी उपासना और काममृत्युजरातिग (३०) नामका जप करते हैं। राजा बलि यज्ञमय लिंगकी आराधना और उसके ज्ञानात्मा (३१) नामका जप करते हैं। मरीचि आदि महर्षि पुष्पमय शिवलिंगकी उपासना और ज्ञानगम्य (३२) नामका जप करते हैं। सत्कर्म करनेवाले देवता शुभ कर्ममय लिंगको पूजते और ज्ञानज्ञेय (३३) नामका जप करते हैं। फेन पीकर रहनेवाले महर्षि फेनिज लिंगकी उपासना और सुदुर्विद (३४) नामका जप करते हैं। कपिलजी वरद (३५) नामका जप करते हुए बालुकामय शिवलिंगकी पूजा करते हैं। सरस्वतीपुत्र सारस्वत मुनि वाणीमें शिवलिंगकी उपासना करते हुए वागीश्वर (३६) नामका जप करते हैं। शिवगण भगवान् शिवके मूर्तिमय लिंगकी उपासना करते हुए रुद्र (३७) नामका जप करते हैं। देवतालोग जाम्बूनद सुवर्णमय लिंगकी आराधना और शितिकण्ठ (३८) नामका जप करते हैं। बुध कनिष्ठ (३९) नामका जप करते हुए शंखमय शिवलिंगकी पूजा करते हैं। दोनों अश्विनीकुमार सुवेधा (४०) नामसे प्रसिद्ध मृत्तिकामय (पार्थिव) शिवलिंगकी पूजा करते हैं। गणेशजी आटेका शिवलिंग बनाकर कपर्दी (४१) नामसे उसकी उपासना करते हैं। मंगल मक्खनके शिवलिंगकी कराल (४२) नामसे उपासना करते हैं। गरुड़जी ओदनमय शिवलिंगकी हर्यक्ष (४३) नामसे उपासना करते हैं। कामदेव गुड़के शिवलिंगकी रतिद (४४) नामसे उपासना करते हैं। शचीदेवी लवणमय (सैन्धव अथवा सुन्दर रूपमय) शिवलिंगकी आराधना तथा बभ्रुकेश (४५) नामका जप करती हैं। विश्वकर्मा प्रासादमय (महलके आकारका) शिवलिंग बनाकर याम्य (४६) नामसे उसकी उपासना करते हैं। विभीषण धूलिमय शिवलिंगकी पूजा और सुहृत्तम (४७) नामका जप करते हैं। राजा सगर वंशांकुरमय शिवलिंगकी पूजा और संगत (४८) नामका जप करते हैं। राहु हींगमय लिंगकी उपासना और गम्य (४९) नामका कीर्तन करते हैं। लक्ष्मीदेवी लेप्य लिंगका पूजन तथा हरिनेत्र (५०) नामका जप करती हैं।
योगी पुरुष सर्वभूतस्थ लिंगकी उपासना और स्थाणु (५१) नामका जप करते हैं। मनुष्य नानाविध लिंगका पूजन और पुरुष (५२) नामका जप करते हैं। नक्षत्र तेजोमय लिंगका पूजन तथा भग और भास्वर (५३) नामका जप करते हैं। किन्नरगण धातुमय लिंगका पूजन तथा सुदीप्त (५४) नामका जप करते हैं। ब्रह्मराक्षसगण अस्थिमय लिंगका पूजन और देवदेव (५५) नामका जप करते हैं। चारणलोग दन्तमय लिंगका पूजन तथा रंहस (५६) नामका जप करते हैं। साध्यगण सप्तलोकमय लिंगका पूजन और बहुरूप (५७) नामका जप करते हैं। ऋतुएँ दूर्वांकुरमय लिंगका पूजन और सर्व (५८) नामका जप करती हैं। अप्सराएँ कुंकुम लिंगका पूजन और आभूषण (५९) नामका जप करती हैं। उर्वशी सिन्दूरमय लिंगका पूजन और प्रियवासन (६०) नामका जप करती हैं। गुरु ब्रह्मचारी लिंगका पूजन और उष्णीवी (६१) नामका जप करते हैं। योगिनियाँ अलक्तक लिंगका पूजन और सुवभ्रुक् (६२) नामका जप करती हैं। सिद्ध योगिनियाँ श्रीखण्ड लिंगका पूजन और सहस्राक्ष (६३) नामका जप करती हैं। डाकिनियाँ मांसमय लिंगका पूजन तथा उसके सुमीढुष् (६४) नामका जप करती हैं। मनुगण गिरिश (६५) नामसे प्रसिद्ध अन्नमय लिंगका पूजन करते हैं। अगस्त्य मुनि व्रीहिमय लिंगका पूजन और सुशान्त (६६) नामका जप करते
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हैं। देवल मुनि यवमय लिंगका पूजन और पति (६७) नामका जप करते हैं। वाल्मीकि मुनि वाल्मीक लिंगका पूजन और चीरवासा (६८) नामका जप करते हैं। प्रतर्दनजी वाणलिंगका पूजन और हिरण्यभुज (६९) नामका जप करते हैं। दैत्यगण राईके शिवलिंगका पूजन और उग्र (७०) नामका जप करते हैं। दानवलोग निष्पावज लिंगका पूजन और दिक्पति (७१) नामका जप करते हैं। बादल नीरमय लिंगका पूजन तथा पर्जन्य (७२) नामका जप करते हैं। यक्षराज माषमय लिंगका पूजन और भूतपति (७३) नामका जप करते हैं। पितृगण तिलमय लिंगका पूजन और वृषपति (७४) नामका जप करते हैं। गौतम मुनि गोधूलिमय लिंगका पूजन और गोपति (७५) नामका जप करते हैं। वानप्रस्थगण फलमय लिंगका पूजन और वृक्षावृत (७६) नामका जप करते हैं। स्वामिकार्तिकेय पाषाणलिंगका पूजन और सेनान्य (७७) नामका जप करते हैं। अश्वतर नाग धान्यमय लिंगका पूजन और उसके मध्यम (७८) नामका जप करते हैं। यज्ञकर्ता पुरुष पुरोडाशमय लिंगका पूजन और स्रुवहस्त (७९) नामका जप करते हैं। यम कालायसमय लिंगका पूजन और धन्वी (८०) नामका जप करते हैं। परशुरामजी यवांकुर-लिंगका पूजन तथा भार्गव (८१) नामका जप करते हैं। पुरूरवा घृतमय लिंगका पूजन और बहुरूप (८२) नामका जप करते हैं। श्रीमान्धाता शर्करामय लिंगकी बाहुयुग (८३) नामसे आराधना करते हैं। गायें पयोमय 'दुग्धमय' लिंगका पूजन और नेत्रसहस्रदृक् (८४) नामका जप करती हैं। पतिव्रता स्त्रियाँ भर्तृमय लिंगका पूजन तथा विश्वपति (८५) नामका जप करती हैं। नर-नारायण मौञ्जीमय शिवलिंगका सहस्रशीर्ष (८६) नामसे आराधन करते हैं। पृथु सहस्रचरण (८७) नामवाले तार्क्ष्यलिंगका पूजन करते हैं। पक्षी सर्वात्मक (८८) नामसे व्योमलिंगका पूजन करते हैं। पृथ्वी गन्धमय लिंगका पूजन और उसके द्वितनु (८९) नामका जप करती हैं। पाशुपतगण भस्ममय लिंगका पूजन और उसके महेश्वर (९०) नामका जप करते हैं। ऋषि ज्ञानमय लिंगकी चिरस्थान (९१) नामसे उपासना करते हैं। ब्राह्मण ब्रह्म-लिंगकी ज्येष्ठ (९२) नामसे उपासना करते हैं। शेषनाग गोरोचनमय लिंगका पूजन और पशुपति (९३) नामका जप करते हैं। वासुकिनाग विषलिंगका पूजन और शंकर (९४) नामका जप करते हैं। तक्षकनाग कालकूटमय लिंगका पूजन तथा बहुरूप (९५) नामका जप करते हैं। कर्कोटकनाग हाला-हलमय लिंगका पूजन और पिंगाक्ष (९६) नामका जप करते हैं। शृंगी विषमय लिंगका पूजन तथा धूर्जटि (९७) नामका जप करते हैं। पुत्र पितृमय लिंगका पूजन और विश्वरूप (९८) नामका जप करता है। शिवादेवी पारदमय लिंगका पूजन और त्र्यम्बक (९९) नामका जप करती हैं। मत्स्य आदि जीव शस्त्रमय लिंगका पूजन तथा वृषाकपि (१००) नामका जप करते हैं।
इस प्रकार बहुत कहनेसे क्या लाभ, संसारमें जो-जो जीव किसी विलक्षण विभूतिसे युक्त हैं, उनकी यह विशेषता भगवान् शिवके आराधनाके प्रभावसे ही हुई है। यदि धर्म, अर्थ, काम, मोक्षकी प्राप्तिका विचार बुद्धिमें आता हो तो भगवान् शिवकी भलीभाँति आराधना करनी चाहिये; क्योंकि त्रिलोकीमें वे ही मनोवांछित वस्तु देनेवाले माने गये हैं। जो प्रतिदिन प्रातःकाल उठकर इस शतरुद्रियका पाठ करेगा, उसपर प्रसन्न हो भगवान् शिव उसे सभी मनोवांछित वर प्रदान करेंगे। पृथ्वीपर इससे बढ़कर परम पवित्र दूसरी कोई वस्तु नहीं है। यह सम्पूर्ण वेदोंका रहस्य है। भगवान् सूर्यने मुझे इसका उपदेश दिया था। शतरुद्रियका पाठ करनेपर मन, वाणी और क्रियाद्वारा आचरित समस्त पापोंका नाश हो जाता है। जो शतरुद्रियका जप करता है, वह रोगातुर हो तो रोगसे छूट जाता है, कारागारमें बँधा हुआ हो तो बन्धनसे छुटकारा पा जाता है, और भयभीत हो तो भयसे मुक्त हो जाता है। इन सौ नामोंका उच्चारण करके जो विद्वान् उतने ही फूलोंद्वारा भगवान् शिवकी पूजा करता है और सौ बार उन्हें प्रणाम करता है, वह सब पातकोंसे मुक्त हो जाता है। ये सौ लिंग, सौ इनके उपासक
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और सौ इन लिंगोंके नाम ये सभी सम्पूर्ण दोषोंका नाश करनेवाले माने गये हैं। विशेषतः इस महीतीर्थके इन पाँच लिंगोंके समक्ष जो इस शतरुद्रियका पाठ करेगा, वह पंचविषयजनित दोषोंसे मुक्त हो जायगा।
नारदजी कहते हैं—अर्जुन! उस गुप्त क्षेत्रमें शंकरजीके आराधनका यह माहात्म्य सुनकर वे इन्द्रद्युम्न आदि भक्त बहुत प्रसन्न हुए और पंचलिंगोंकी आराधना करते हुए भगवान् शिवके ध्यानमें तत्पर रहने लगे। तदनन्तर बहुत समय बीत जानेपर उनकी विशेष भक्तिसे प्रसन्न हो भगवान् शंकरने उन्हें प्रत्यक्ष दर्शन दिया और इस प्रकार कहा—
'हे बक, उलूक, गृध्र, कच्छप और राजा इन्द्रद्युम्न! तुमलोग मेरी सारूप्य मुक्तिको प्राप्त होकर मेरे ही लोकमें निवास करोगे। लोमश और मार्कण्डेय मुनि जीवन्मुक्त होंगे।'
भगवान् शिवके ऐसा कहनेपर राजा इन्द्रद्युम्नने महाकालसे पूर्वकी ओर इन्द्रद्युम्नेश्वर नामक शिवलिंगकी स्थापना की। उस तीर्थके गुणोंको जानकर राजाने वहाँ चिरस्थायिनी कीर्ति करनेकी इच्छासे परम सुन्दर अविचल शिवलिंगकी स्थापना की। फिर शिवजीने कहा—'जो इस इन्द्रद्युम्नेश्वर लिंगकी पूजा करेगा, वह मेरा गण होगा और मेरे ही लोकमें निवास करेगा।' ऐसा कहकर भगवान् चन्द्रशेखर उन पाँचोंके साथ रुद्रलोकको चले गये और वे सब-के-सब पुनः शिवजीके गण हो गये। राजा इन्द्रद्युम्न ऐसे प्रभावशाली थे; जिन्होंने यज्ञ करते हुए इस महीनदीको प्रकट किया था। इस प्रकार यह महीसागरसंगम अत्यन्त पुण्यदायक तीर्थ हुआ। कुन्तीनन्दन! इस तीर्थका माहात्म्य तुम्हें संक्षेपसे बतलाया है। जो मनुष्य यहाँ संगममें स्नान करके इन्द्रद्युम्नेश्वरका पूजन करता है, उसका निवास उस धाममें होता है, जहाँ पार्वतीवल्लभ भगवान् महेश्वर विराजमान हैं। यह लिंग सब प्रकारके बन्धनोंका नाशक तथा गणाधीशका पद प्रदान करनेवाला है; क्योंकि राजाने सब प्रकारके बन्धनोंका त्याग करके ही इस लिंगको स्थापित किया था। अर्जुन! इस प्रकार इस उत्तम संगमका पुण्यदायक माहात्म्य तुमसे कहा है, तथा इन्द्रद्युम्नेश्वरकी भी पुण्योत्पादक महिमाका वर्णन किया है। जो इसका पाठ करेगा, उसको महान् पुण्य प्राप्त होगा।
कुमारका अनुताप, भगवान् विष्णुका उन्हें समझाना तथा उनकी सम्मतिसे स्कन्दद्वारा तीन शिवलिंगोंकी स्थापना और भगवान् शिवका वरदान
| **अर्जुनने कहा—**महामुने! आपने कथाके बीचमें जो कुमार नाथके माहात्म्यकी चर्चा की थी, उसे मैं विस्तारपूर्वक सुनना चाहता हूँ। | **नारदजी बोले—**अर्जुन! भगवान् कार्तिकेयजीने तारकासुरका वध करके स्वयं ही इस कुमारेश्वर नामक शिवलिंगको स्थापित किया था। मैं |
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- माहेश्वरखण्ड-कुमारिकाखण्ड * १२३
देवताओंके सेनानायक और सबका शासन करनेमें समर्थ कुमार कार्तिकेयको प्रणाम करके उनके महान् चरित्रका वर्णन करता हूँ। तुम एकाग्रचित्त होकर सुनो।
नारदजी कहते हैं—अर्जुन ! तारकासुरके मरनेके कारण परम बुद्धिमान् कार्तिकेयजी मन-ही-मन अत्यन्त उदास हो शोक करने लगे। उन्होंने स्तुति करनेवाले देवताओंको रोककर कहा—'देवगण ! मुझ पातकीका, जो सर्वथा शोचनीय है, गुण-गान कैसे करते हो? यद्यपि पापाचारीका वध करनेमें कोई दोष नहीं है, तथापि यह तारकासुर तो भगवान् शंकरका भक्त था, यह स्मरण करके मुझे बड़ा शोक हो रहा है। इसलिये मैं कोई प्रायश्चित्त सुनना चाहता हूँ; क्योंकि प्रायश्चित्त करनेसे बहुत बड़ा पाप भी नष्ट हो जाता है।'
भगवान् शंकरके बुद्धिमान् पुत्र कार्तिकेयजी जब इस प्रकार शोक कर रहे थे, उस समय भगवान् विष्णु देवताओंके बीच यों बोले—'महेशनन्दन ! यदि श्रुति, स्मृति, इतिहास और पुराणको प्रमाण माना जाय तो दुष्टोंके वधमें कोई दोष नहीं है।* जो निर्दय मनुष्य दूसरोंके प्राणोंसे अपने प्राणोंका पोषण करता है, उसका वध कर डालना ही उसके लिये कल्याणकारी है; क्योंकि अपने दोषपूर्ण आचरणसे वह मनुष्य नरकको ही जाता है। रक्षाके कार्यमें लगे हुए समर्थ पुरुषोंद्वारा यदि पापाचारियोंका वध न किया जाय तो ये असमर्थ मनुष्य किसकी शरणमें जायँगे, तथा सम्पूर्ण विश्वको धारण करनेवाले धर्मस्वरूप वेद और यज्ञ कैसे होंगे। इसलिये तुमने तारकासुरका वध करके पुण्य ही प्राप्त किया है। तुम्हें पाप तो किसी प्रकार भी नहीं लगेगा। इतनेपर भी भगवान् शंकरके भक्तोंके प्रति यदि तुम्हारा बहुत अधिक आदर है, तो उसके लिये मैं बहुत उत्तम उपाय बतलाऊँगा, जिससे जन्मभरके पापोंसे छुटकारा मिल जाता है तथा एक कल्पतक रुद्रलोकमें दिव्य शरीर धारण करके वह मनुष्य परमानन्दका उपभोग करता है। स्कन्द ! पाप करनेपर जिसे बहुत अधिक पश्चात्ताप होता है, उसके लिये भगवान् शंकरके आराधनसे बढ़कर दूसरा कोई उपाय नहीं है। जिनकी महिमाका वर्णन करनेमें ब्रह्माजी भी समर्थ नहीं हैं तथा जिनके विषयमें कुछ कहनेमें श्रुति भी भयभीत होती है, उन भगवान् महेश्वरसे बढ़कर दूसरी कौन वस्तु हो सकती है।'
'त्रिलोकीमें भगवान् शंकरके सिवा दूसरा कौन ऐसा देवता है, जिसका पृथ्वी ही रथ है, ब्रह्माजी सारथी हैं, मैं बाण हूँ, मन्दराचल धनुष है तथा चन्द्रमा और सूर्य रथके पहिये हैं। कोई-कोई योगमार्गसे भगवान् शंकरकी आराधना बताते हैं, परंतु सदा शून्यकी उपासना करनेवाले उन योगियोंका मार्ग सर्वसाधारणके लिये दुःसाध्य है। इसलिये जो भोग और मुक्ति दोनों चाहता है, उसे उनके लिंगमय स्वरूपकी ही आराधना करनी चाहिये। सृष्टिके आदिमें मेरे और ब्रह्माजीके विवादमें भगवान् शिव लिंगरूपमें प्रकट हुए थे। उस लिंगमय स्वरूपमें सम्पूर्ण चराचर जगत् लीन होता है, इसीलिये वेदमें उसे लिंग कहा गया है। जो परम बुद्धिमान् भगवान् शंकरके स्वरूपभूत लिंगको श्रद्धा और पवित्र भावसे जलके द्वारा स्नान कराता है, उसने मानो ब्रह्माजीसे लेकर तृणपर्यन्त इस सम्पूर्ण जगत्को तृप्त कर दिया। मिट्टीका, काठका, ईंटेका अथवा पत्थरका मन्दिर बनाकर जो भगवान् शिवको अर्पित करता है, उसे क्रमशः सौगुना पुण्यफल प्राप्त होता है। इसलिये महासेन ! तुम्हें यहाँ शिवलिंगकी स्थापना करनी चाहिये।'
भगवान् विष्णुके ऐसा कहनेपर सब देवता
* श्रुतिः स्मृतिश्चेतिहासः पुराणं च शिवात्मज। प्रमाणं चेत्ततो दुष्टवधे दोषो न विद्यते॥ (स्क० पु०, मा० कुमा० २६। ११)
९२४ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
'बहुत अच्छा, बहुत अच्छा' कहने लगे। तत्पश्चात् महादेवजीने कार्तिकेयको छातीसे लगाकर कहा— 'वत्स! तुम मेरे भक्तोंपर जो इतनी कृपा रखते हो, इससे तुम्हारे ऊपर मेरा प्रेम बहुत बढ़ गया है। जगद्गुरु भगवान् वासुदेवने जो कुछ कहा है, वह सब यथार्थ है। जो मैं हूँ, वही भगवान् विष्णुको जानना चाहिये तथा जो भगवान् विष्णु हैं, वही मैं हूँ। जैसे दो दीपकोंमें प्रकाशकी दृष्टिसे कोई अन्तर नहीं होता, उसी प्रकार हम दोनोंमें भी किंचिन्मात्र अन्तर नहीं है। स्कन्द! जो भगवान् विष्णुसे द्वेष करता है वह मुझसे भी द्वेष करता है, जो उनका अनुगमन करता है, वह मेरा भी अनुगामी है*। जो ऐसा जानता है, वही मेरा वास्तविक भक्त है।'
कुमार बोले—पिताजी! आपका कहना सत्य है, मैं आपको और भगवान् विष्णुको एक ही समझता हूँ। भक्तवत्सल भगवान् विष्णुने जो मुझे शिवलिंग स्थापित करनेकी सलाह दी है, वही बात तारकासुरके वधके समय पहले आकाशवाणीने भी मुझसे कही थी। अतः मैं सब पापोंका नाश करनेवाले शिवलिंगकी स्थापना करूँगा। वह शिवलिंग मेरे पापोंको शान्त करनेवाला हो।
यों कहकर अग्निनन्दन स्कन्दने विश्वकर्माको बुलाया और उन्हें आदेश दिया कि 'तुम शीघ्र ही तीन विशुद्ध शिवलिंग तैयार करो।' कार्तिकेयकी आज्ञाके अनुसार विश्वकर्माने तीन विशुद्ध शिवलिंग तैयार किये और उन्हें उनको समर्पित कर दिया। तदनन्तर भगवान् विष्णु, शिव तथा ब्रह्मा आदि देवताओंके साथ स्कन्दने पहले पश्चिमदिशामें थोड़ी ही दूरपर 'प्रतिज्ञेश्वर' नामक परम सुन्दर शिवलिंगकी स्थापना की। तब भगवान् महेश्वरने कुमारकी प्रसन्नताके लिये वहाँ स्वयं ही यह वरदान दिया। 'जो इस स्थानपर कार्तिक और चैत्रमासमें अष्टमीको स्नान, उपवास, पूजा और जागरण करके निवास करेगा, वह मृत्युको भी लाँघ जायगा।'
इसके बाद वहाँसे अग्निकोणमें जहाँ दैत्यके कपालसे शक्ति निकली थी, वहाँ कार्तिकेयने द्वितीय शिवलिंगको स्थापित किया। सब पापोंका नाश करनेवाला वह कल्याणकारी शिवलिंग 'कपालेश्वर'के नामसे प्रसिद्ध हुआ। कपालेश्वरके समीप ही उस शक्तिका भी स्तवन करके कुमारने उसकी स्थापना की। जो कापालिकेश्वरी देवीके नामसे प्रसिद्ध हुई। वहाँसे उत्तर दिशामें एक तीर्थ है, जिसे 'शक्तिछिद्र' कहते हैं। वहाँ सब पापोंका नाश करनेवाली कल्याणमयी पातालगंगा प्रकट हुई हैं। उसमें स्नान करके स्कन्दने सब देवताओंके साथ कृपापूर्वक तारकासुरको जलांजलि दी। जिसका संकल्प-वाक्य इस प्रकार है—'महर्षि कश्यपके कुलमें उत्पन्न शिवभक्त तारकको अर्पित किया जानेवाला यह तिलसहित जल अक्षय भावसे प्राप्त हो।'
तब भगवान् महेश्वरने प्रसन्न होकर स्कन्दको सुनाते हुए कहा—'जो मनुष्य चैत्रमासके कृष्ण पक्षकी चतुर्दशी तिथिको यहाँ स्नान और उपवास करके भगवान् कपालेश्वरका पूजन करेगा, वह तेजस्वी महात्माओंके वधजनित पातकसे मुक्त हो जायगा। इसी तिथिको यदि सोमवार हो, शिवयोग हो और तैतिलकरण हो तो इन छहों योगोंके एकत्र होनेपर जो पुरुष 'शक्तिछिद्रा' नामक तीर्थमें स्नान करके रातमें रुद्रियका जप करेगा, वह शरीरसहित रुद्रलोकमें चला जायगा।'
* यो ह्यहं स हरिर्ज्ञेयो यो हरिः सोऽहमित्युत॥
नावयोरन्तरं किञ्चिद्दीपयोरिव सुव्रत। एनं द्वेष्टि स मां द्वेष्टि योऽन्वेत्येनं स मानुगः॥
(स्क० पु०, मा० कुमा० २६। ४१-४२)
- माहेश्वरखण्ड-कुमारिकाखण्ड * | १२५ ---|---
| भगवान् शंकरका यह वचन सुनकर स्कन्द बहुत प्रसन्न हुए तथा सब देवता आनन्दमग्न हो 'साधु-साधु' कहने लगे।<br><br>तदनन्तर तीसरे लिंगकी स्थापना करनेकी इच्छावाले कार्तिकेयसे ब्रह्माजीने उनकी प्रसन्नताके लिये कहा—'कुमार! मैं स्वयं एक दूसरे लिंगका निर्माण करता हूँ।' यों कहकर ब्रह्माजीने स्वयं सब दोषोंसे रहित मनोहर शिवलिंगका निर्माण किया। इसी प्रकार सब देवताओंने भी स्कन्दको प्रसन्न करनेके लिये वहाँ एक सुन्दर सरोवर तैयार किया और उसमें गंगा आदि समस्त तीर्थोंकी स्थापना करके उनसे कहा—'जबतक यह सरोवर यहाँ रहे तबतक तुम सब तीर्थ इसमें निवास करो।' तब स्कन्दकी प्रसन्नताके लिये इन सब तीर्थोंने 'एवमस्तु' कहकर देवताओंकी आज्ञा स्वीकार की। तत्पश्चात् स्कन्दने प्रसन्नतापूर्वक उस सुन्दर सरोवरमें स्नान किया और सब तीर्थोंके जलसे भक्तिपूर्वक उस शिवलिंगको स्नान कराकर भाँति-भाँतिके पुष्पोंसे 'सद्योजातादि' पाँच मन्त्रोंद्वारा पूजन किया। पूजाके समय साक्षात् भगवान् महेश्वर स्थावर-जंगम प्राणियोंके साथ उस शिवलिंगमें स्थित हो स्वयं पूजनसामग्री ग्रहण करते थे। भक्तिभावमें डूबे हुए स्कन्दने पूजन करते समय भगवान् शंकरसे पूछा—'भगवन्! आपको कौन-सा उपहार भेंट करनेसे क्या-क्या फल प्राप्त होता है?'<br><br>भगवान् महेश्वर बोले—जो मेरे लिंगकी स्थापना करता और उसके लिये सुन्दर मन्दिर बनवाता है, वह कल्पभर मेरे लोकमें निवास करता है। जो मेरे मन्दिरमें झाडू देता और धूल आदि हटाकर शुद्ध करता है, वह सब रोगोंसे छूट जाता है। देवमन्दिरको चूने आदिसे पुतवानेपर मनुष्यका शरीर दृढ़ होता है। पुष्प, दूध आदि, कुशा, तिल, जल, अक्षत और सरसोंसे भगवान् शंकरके मस्तकपर | अर्घ्य देकर मनुष्य दस हजार वर्षोंतक स्वर्गमें निवास करता है। दही और दूधसे शिवलिंगको स्नान करानेपर मनुष्यका शरीर नीरोग हो जाता है। जल, दही, दूध और घीसे स्नान करानेपर क्रमशः दसगुना फल प्राप्त होता है। उपर्युक्त वस्तुओंसे मुझे स्नान कराकर भक्तिपूर्वक गोधूम-चूर्ण आदिके द्वारा उबटन लगावे, फिर कपिला गायके पंचगव्यसे और गंगाके जलसे मुझे स्नान करावे और विधिपूर्वक मेरा पूजन करे। ऐसा करनेवाला पुरुष मेरे परम धामको प्राप्त होता है। कुशमिश्रित जलकी अपेक्षा गन्धमिश्रित जल उत्तम है, उससे भी तीर्थका जल श्रेष्ठ है तथा अन्य सब तीर्थोंके जलकी अपेक्षा महीसागर तीर्थका जल श्रेष्ठ है। ताँबे, चाँदी और सोनेके कलशोंसे स्नान करानेपर क्रमशः सौगुना फल होता है। इसी प्रकार चन्दन, अगर, केशर तथा कपूर अर्पण करनेसे उत्तरोत्तर अधिक फलकी प्राप्ति होती है। इन सब वस्तुओंको मेरे अंगमें लगानेसे मनुष्य धनवान्, सौभाग्यवान् तथा सुखी होता है। गुग्गुलका धूप उत्तम माना गया है, उससे भी श्रेष्ठ अगुरु है, इन सब धूपोंको मुझे अर्पण करनेसे सुख और स्वर्गकी प्राप्ति होती है। दीप-दान करनेवाला पुरुष कीर्ति तथा उत्तम नेत्र प्राप्त करता है। नैवेद्य अर्पण करनेसे मनुष्य मिष्टान्नभोजी होता है। अखण्ड बिल्वपत्रों और भाँति-भाँतिके पुष्पोंसे शिवलिंगकी पूजा करनेपर मनुष्य एक लाख वर्षोंतक स्वर्गमें निवास करता है। भगवान् शिवको चँवर भेंट करनेसे मनुष्य राजा होता है। मेरे मन्दिरमें गीत, वाद्य और नृत्य करके शुद्ध चित्त हुआ मनुष्य मुझको प्राप्त होता है। मेरी पूजाके लिये शंख और घण्टा दान करके दाता अवश्य विद्वान् होता है। मेरी रथयात्राका उत्सव करके मनुष्य चिरकालके लिये शोकोंसे मुक्त हो जाता है। मुझे नमस्कार और प्रणाम करके मानव महान् कुलमें जन्म लेता है। जो मेरे आगे शास्त्रका पाठ कराता है, वह |
| १२६ | * संक्षिप्त स्कन्दपुराण * |
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ज्ञानी होता है। भक्तिपूर्वक मेरी स्तुति करनेपर मनुष्य मनके मोहसे मुक्ति पा जाता है। मेरे आगे आरती घुमानेसे उपासक पीड़ारहित होता है। मुझे शीतल चन्दन अर्पण करनेपर दुःखजनित सन्तापोंसे छुटकारा मिल जाता है। शिवलिंगके समीप अपनी शक्तिके अनुसार दान करनेपर दाताको उस दानका सौगुना फल मिलता है तथा वह इस लोक और परलोकमें आनन्दका भागी होता है। मैं शिवलिंगको प्रणाम करनेपर पंद्रह, उसे स्नान करानेपर बीस तथा उसकी विधिपूर्वक पूजा करनेपर सौ अपराधोंको क्षमा कर देता हूँ। कुमार! इस तीर्थमें पूर्वोक्त सम्पूर्ण फलोंकी प्राप्ति होगी। जो लोग कुमारेश्वर नामसे यहाँ मेरी पूजा करेंगे, वे पूर्वोक्त सम्पूर्ण फलोंके भागी होंगे। बेटा! जैसे काशीपुरीमें मैं विश्वनाथके रूपमें निवास करता हूँ, उसी प्रकार इस गुप्त क्षेत्रमें मैं कुमारेश्वर नाम धारण करके रहूँगा।
देवताओंके सामने ही भगवान् शंकरका यह वचन सुनकर कुमार कार्तिकेयको बड़ा विस्मय हुआ। वे भगवान् गिरिजापतिको नमस्कार करके उनकी स्तुति करने लगे—'जो सब प्रकारके रोग-शोकसे रहित हैं, उन कल्याणस्वरूप भगवान् शिवको नमस्कार है। जो सबके भीतर मनरूपसे निवास करते हैं, उन भगवान् शिवको नमस्कार है। सम्पूर्ण देवताओंसे पूजित भगवान् शंकरको नमस्कार है। भक्तजनोंपर निरन्तर कृपा करनेवाले आप भगवान् महेश्वरको नमस्कार है। सबकी उत्पत्तिके कारण भगवान् भवको नमस्कार है। भगवन्! आप भवके उद्भव (संसारके स्रष्टा) हैं, आपको नमस्कार है। कामदेवका विध्वंस करनेवाले आपको नमस्कार है। आप गूढ़ भावसे महान् व्रतका पालन करनेवाले हैं, आपको नमस्कार है। आप मायारूपी गहन वनके आश्रय हैं, अथवा सबको आश्रय देनेवाला आपका स्वरूप योगमायासमावृत होनेके कारण दुर्बोध है, आपको नमस्कार है। प्रलयकालमें जगत्का संहार करनेवाले 'शर्व' नामधारी आपको नमस्कार है। शिवरूप आपको नमस्कार है। आप पुरातन सिद्धरूप हैं, आपको नमस्कार है। कालरूप आपको नमस्कार है। आप सबकी कलना (गणना) करनेवाले होनेके कारण 'कल' नामसे प्रसिद्ध हैं। आपको नमस्कार है। आप कालकी कलाका अतिक्रमण करके उससे बहुत दूर रहते हैं, आपको नमस्कार है। आप स्वाभाविक ऐश्वर्यसे सम्पन्न हैं, आपको नमस्कार है। आप अप्रमेय महिमावाले वृषभ तथा महासमृद्धिसे सम्पन्न हैं, आपको नमस्कार है। आप सबको शरण देनेवाले हैं, आपको नमस्कार है। आप ही निर्गुण ब्रह्म हैं, आपको नमस्कार है। आपके अनुगामी सेवक भयानक गुणसम्पन्न हैं, आपको नमस्कार है। नाना भुवनोंपर अधिकार रखनेवाले आपको नमस्कार है। भक्तोंको मनोवांछित फल प्रदान करनेवाले आपको नमस्कार है। भगवन्! आप ही कर्मोंका फल देनेवाले हैं, आपको नमस्कार है। आप ही सबका धारण-पोषण करनेवाले धाता तथा उत्तम कर्ता हैं। आपको सर्वदा नमस्कार है। आपके अनन्त रूप हैं, आपका कोप सबके लिये असह्य है। आपको सदैव नमस्कार है। आपके स्वरूपका कोई माप नहीं हो सकता, आपको नमस्कार है। वृषभेन्द्रको अपना वाहन बनानेवाले आप भगवान् महेश्वरको नमस्कार है। आप सुप्रसिद्ध महौषधरूप हैं, आपको नमस्कार है। समस्त व्याधियोंका विनाश करनेवाले आपको नमस्कार है। आप चराचरस्वरूप, सबको विचार देनेवाले, कुमारनाथके नामसे प्रसिद्ध तथा परम कल्याणस्वरूप हैं, आपको नमस्कार है। प्रभो! आप मेरे स्वामी हैं, सम्पूर्ण भूतोंके ईश्वर एवं महेश्वर हैं। आप ही समस्त भोगोंके अधिपति हैं। वाणी, बल और बुद्धिके अधिपति भी आप ही हैं। आप ही क्रोध और मोहपर शासन करनेवाले हैं। पर और अपर (कारण और कार्य)-के स्वामी भी आप ही हैं। सबकी हृदयगुहामें निवास करनेवाले परमेश्वर
- माहेश्वरखण्ड-कुमारिकाखण्ड * १२७
तथा मुक्तिके अधीश्वर भी आप ही हैं, आपको नमस्कार है।'
पार्वतीनन्दन स्कन्दने सबको वर देनेवाले शूलपाणि भगवान् उमापतिकी इस प्रकार स्तुति करके उनके चरणोंमें मस्तक झुकाया और 'नमो नमः' का उच्चारण किया।*
इस प्रकार भक्तिभावसे भरे हुए अपनेयोग्य स्तवन सुनकर शिवजी बहुत सन्तुष्ट हुए और पुत्र कार्तिकेयका उन्होंने चिरकालतक अभिनन्दन करके कहा—'बेटा! मेरे भक्तके वध करनेका जो दुःख तुम्हारे मनमें हुआ है, उसका विचार तुमको नहीं करना चाहिये। अपने इस कर्मसे तुम मुनियोंके लिये भी स्पृहणीय बन गये हो। जो लोग सायंकाल और सबेरे पूर्ण भक्तिपूर्वक तुम्हारे द्वारा की हुई इस स्तुतिसे मेरा स्तवन करेंगे, उनको जो फल प्राप्त होगा, उसका वर्णन करता हूँ, सुनो—उन्हें कोई रोग नहीं होगा, दरिद्रता भी नहीं होगी तथा प्रियजनोंसे कभी वियोग भी न होगा। वे इस संसारमें दुर्लभ भोगोंका उपभोग करके मेरे परम धामको प्राप्त होंगे। इतना ही नहीं, मैं उन्हें और भी परम दुर्लभ वर प्रदान करूँगा। बेटा! मैं तुम्हारी भक्तिसे बहुत प्रसन्न हूँ और तुम्हारी प्रसन्नताके लिये सब कुछ करूँगा। जो मनुष्य वैशाखमासकी पूर्णिमाको महीसागरके तटपर मेरी स्तुति करेंगे, उनका वह सब दान, पूजन अक्षय होगा। जो मानव वैशाखकी पूर्णिमाको यहाँके सरोवरमें स्नान करेंगे, उन्हें सब तीर्थोंके स्नानजनित फलकी प्राप्ति होगी। कार्तिकेय! जब कभी अनावृष्टि हो, नाना प्रकारके उत्तम कलशोंद्वारा विधिपूर्वक गन्धयुक्त जलसे मुझे एक, तीन, पाँच अथवा सात राततक स्नान करावे और मेरे सर्वांगमें कुंकुमका लेप करे, फिर दो वस्त्र धारण कराकर लाल कनेरके पुष्पोंसे तथा जवाके पुष्पोंसे और फूलकी मालाओंसे मेरा पूजन करे। पूजनके पश्चात् उत्तम व्रतका पालन करनेवाले तपस्वी ब्राह्मणोंको भोजन करावे। मेरी प्रसन्नताके लिये एक लाख आहुति हवन करे, ग्रहादिकी शान्तिके लिये भी हवन करे। तदनन्तर भूमिदान करके गौके लिये दैनिक ग्रास (अथवा एक दिनके खानेके लिये पर्याप्त चारा, दाना आदि) दे। तत्पश्चात् मंगलमय शान्तिपाठ एवं रुद्रका जप करावे। इसी विधानसे उत्तम ब्राह्मणोंद्वारा अनुष्ठान करानेपर जल-शून्य बादल भी उस समय अवश्य वर्षा करते हैं। भाँति-भाँतिके धान्यों तथा हरी-हरी घासोंसे वसुधा परिपूर्ण हो जाती है। मनुष्यों और पशुओंमें कोई रोग नहीं रह जाता। इस अनुष्ठानके प्रभावसे राजा धर्मपरायण होता है। शत्रुमण्डलीसे वह कभी पीड़ित नहीं होता। जो मनुष्य यहाँ भक्तियुक्त होकर मुझे घृतसे स्नान कराता है, उसे कन्यादानका फल होता है। जो दूध अथवा पंचामृतसे मुझे स्नान कराता है, उसे अग्निष्टोम यज्ञका फल प्राप्त होता है। जो कुमारेश्वर तीर्थमें मृत्युको प्राप्त होता है,
* नमः शिवायास्तु निरामयाय नमः शिवायास्तु मनोमयाय । नमः शिवायास्तु सुरार्चिताय तुभ्यं सदा भक्तकृपापराय ॥
नमो भवायास्तु भवोद्भवाय नमोऽस्तु ते ध्वस्तमनोभवाय । नमोऽस्तु ते गूढमहाव्रताय नमोऽस्तु मायागहनाश्रयाय ॥
नमोऽस्तु शर्वाय नमः शिवाय नमोऽस्तु सिद्धाय पुरातनाय । नमोऽस्तु कालाय नमः कलाय नमोऽस्तु ते कालकलातिगाय ॥
नमो निसर्गात्मकभूतिकाय नमोऽस्त्वमेयोक्षमहर्द्धिकाय । नमः शरण्याय नमोऽगुणाय नमोऽस्तु ते भीमगुणानुगाय ॥
नमोऽस्तु नाना भुवनाधिकर्त्रे नमोऽस्तु भक्ताभिमतप्रदात्रे । नमोऽस्तु कर्मप्रसवाय धात्रे नमः सदा ते भगवन्सुकर्त्रे ॥
अनन्तरूपाय सदैव तुभ्यमसहा्रकोपाय सदैव तुभ्यम् । अमेयमानाय नमोऽस्तु तुभ्यं वृषेन्द्रयानाय नमोऽस्तु तुभ्यम् ॥
नमः प्रसिद्धाय महौषधाय नमोऽस्तु ते व्याधिगणापहाय । चराचरायाथ विचारदाय कुमारनाथाय नमः शिवाय ॥
ममेश भूतेश महेश्वरोऽसि कामेश वागीश बलेश धीश । क्रोधेश मोहेश परापरेश नमोऽस्तु मोक्षेश गुहाशयेश ॥
(स्क० पु०, मा० कुमा० २७। ४०—४७)
१२८ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
वह महाप्रलयकालतक मेरे लोकमें निवास करता है। अयणारम्भके दिन, विषुव योगमें (जब कि दिन और रात बराबर होते हैं), चन्द्रमा और सूर्यके ग्रहणकालमें, पूर्णिमा तथा अमावास्या तिथिको, संक्रान्तिके समय तथा वैधृति योगमें जो मनुष्य महीसागरसंगममें स्नान करके भक्तिपूर्वक कुमारेश्वरका पूजन करता है, उसके पुण्यफलका वर्णन सुनो—पृथ्वीके सम्पूर्ण तीर्थोंमें स्नान करनेका जो महान् फल है तथा सम्पूर्ण शिवलिंगोंके पूजनका जो सर्वश्रेष्ठ फल है, वह सब उसे प्राप्त होता है। कुमारेश्वरकी सेवासे मनुष्यको निश्चतरूपसे आरोग्य, पुत्र, धन तथा उत्तम सुखकी प्राप्ति होती है। जो तपस्वी इस तीर्थमें ब्रह्मचर्यका पालन करते हुए, पवित्रतापूर्वक निवास करता है, वह सर्वश्रेष्ठ पाशुपत योगको प्राप्त करके मुझमें लीन हो जाता है। बेटा! यहाँ तुम्हारे द्वारा स्थापित किये हुए शिवलिंगको तुम्हारी प्रसन्नताकी वृद्धिके लिये मैंने ये वरदान दिये हैं।
स्कन्दने कहा—महेश्वर! आपके दिये हुए ये वरदान पाकर मैं कृतकृत्य हो गया। आपको नमस्कार है, नमस्कार है, नमस्कार है। प्रभो! आप कभी इस स्थानका त्याग न करें।
देवेश्वर भगवान् शिवसे प्रणामपूर्वक यह प्रार्थना करनेके पश्चात् स्कन्दने माता पार्वतीके चरणोंमें मस्तक झुकाकर कहा—'माँ! मेरा प्रिय करनेकी अभिलाषासे तुम्हें भी इस स्थानका कभी त्याग न करना चाहिये।'
पार्वती बोलीं—बेटा! जहाँ भगवान् शंकर विराजमान होते हैं, वहाँ तो मैं स्वभावसे ही निवास करती हूँ। षडानन! यहाँ स्त्रियोंद्वारा मेरी आराधना होनेपर मैं उन्हें सौभाग्य, उत्तम पति तथा अनेक पुत्र प्रदान करूँगी। चैत्रमासकी तृतीयाको शीतल जलसे स्नान करके जो नारी फूल, चन्दन, धूप आदिसे मेरी पूजा करेगी और भक्तिपूर्वक मुझे आठ सौभाग्यसूचक वस्तुएँ अर्पण करेगी, उसे मैं पिता, माता, सास, श्वशुर, पति, पुत्र, सौभाग्य तथा सम्पत्ति—ये आठ वस्तुएँ प्रदान करूँगी। कुंकुम, पुष्प, चन्दन, ताम्बूल, काजल, ईख, लवण और जीरा—ये आठ सौभाग्यसूचक वस्तुएँ हैं। इन सब वस्तुओंको तराजूके पलड़ेपर रखकर उनसे अपनेको तोले तथा वह स्त्री अपने पैरसहित सम्पूर्ण अंगोंके साथ तुल जाय और उन वस्तुओंका मेरी प्रीतिके लिये दान कर दे। तत्पश्चात् वह बिना नमकका भोजन करे। ऐसा करनेवाली स्त्री संसारमें कभी विधवा नहीं होती—सदा सौभाग्यवती बनी रहती है। जो स्त्री माघ, कार्तिक अथवा चैत्रमें यहाँ स्नान करके मेरी पूजा करेगी, उसे दुःख, दरिद्रता और दुर्भाग्यका संयोग कभी नहीं होगा।
गिरिराजनन्दिनी पार्वतीकी यह बात सुनकर उनके पुत्र स्कन्दको बड़ी प्रसन्नता हुई। उन्होंने माता पार्वतीकी स्थापना करके अपने भाई गणेशजीसे कहा—'विनायक! जो लोग पुष्प, धूप और मोदकसे पहले तुम्हारी पूजा करके फिर कुमारेश्वरका पूजन करते हैं, उनके सभी विघ्नोंका तुम निवारण करो।'
- माहेष्वरखण्ड-कुमारिकाखण्ड * १२९
गणेशजी बोले—भैया ! तुम्हारे द्वारा स्थापित इस शिवलिंगके प्रति जो लोग भक्ति रखते हैं, उन्हें मेरी तथा मेरे अनुगामियोंकी ओरसे कोई भी विघ्न नहीं होगा।
विघ्नराज गणेशके प्रसन्नतापूर्वक ऐसा कहनेपर कुमारने उनकी भी स्थापना की। इसलिये वहाँ सर्वदा ही विशेषतः चतुर्थी तिथिको गणेशजीका पूजन अवश्य करना चाहिये। इस प्रकार भगवान् कुमारेश्वरकी स्थापना करके भगवान् शिवसे ये वरदान पाकर प्रसन्न हुए कार्तिकेयने अपनेको कृतकृत्य माना तथा वे भगवान् कुमारेश्वरके समीप स्वयं भी अंशतः निवास करने लगे। स्वामिकार्तिकेयकी यात्रा करनेवाले जो लोग इस तीर्थमें निवास करनेवाले भगवान् शंकरका दर्शन करते हैं, उनकी वह यात्रा सफल होती है। विशेषतः कार्तिककी पूर्णिमाको कार्तिकेयजीका पूजन करे। ऐसा करनेसे स्कन्द स्वामीकी यात्राका जो फल है, वह पूर्णरूपेण प्राप्त होता है। कार्तिकेयके एक सौ आठ नामोंका ब्रह्मचर्यपालनपूर्वक पवित्र भावसे एक मासतक जप करनेपर मनुष्य सब संकटोंसे छुटकारा पा जाता है।* अर्जुन ! यह महीसागरसंगम तीर्थ ऐसी ही महिमावाला है।
* श्रीविश्वामित्रजीने कुमार कार्तिकेयजीकी स्तुति करते हुए उनके १०८ नाम इस प्रकार बतलाये हैं—
'भगवान्! आप (१) ब्रह्मवादी (वेदोंके वक्ता एवं परब्रह्म परमात्माके तत्त्वका प्रतिपादन करनेवाले) हैं, आप ही (२) ब्रह्मा हैं, आप ही (३) ब्रह्म, (४) ब्राह्मणवत्सल, (५) ब्रह्मण्य (ब्राह्मणभक्त), (६) ब्रह्मदेव, (७) ब्रह्मद (ब्रह्मज्ञानको देनेवाले) तथा (८) ब्रह्मसंग्रह (वेदार्थोंके संग्रही और केवल परब्रह्म परमात्माको ही सम्यक् रूपसे ग्रहण करनेवाले) हैं। आप (९) सर्वोत्कृष्ट, परमतेज, (१०) मंगलमंगल (मंगलोंके भी मंगल), (११) अप्रमेयगुण (असंख्य गुणवाले) और (१२) मन्त्रमन्त्रग (मन्त्रोंके सारभूत मन्त्रमें भी गति रखनेवाले) हैं। आप ही (१३) देव! आप ही सावित्रीमय हैं। आप (१४) सर्वत्र अपराजित (अजेय), (१५) मन्त्र, शर्वात्मक मन्त्र, (१६) देव (दिव्यप्रकाशमय) तथा (१७) षडक्षरवतां वरः (छः अक्षरवाले मन्त्र 'ॐ नमः शिवाय' का जप करनेवालोंमें सर्वश्रेष्ठ) हैं। आप (१८) गवाम्पुत्र (गौ अर्थात् जलस्वरूपा गंगाके पुत्र), (१९) सुरारिघ्न (देवशत्रुओंका नाश करनेवाले), (२०) सम्भव (असम्भवको भी सम्भव कर दिखानेवाले), (२१) भवभावन (ब्रह्मरूपसे संसारकी सृष्टि करनेवाले), (२२) पिनाकी (शंकररूपसे पिनाक नामक धनुष धारण करनेवाले), (२३) शत्रुहा (शत्रुनाशक), (२४) श्वेत (श्वेत पर्वतरूप), (२५) गूढ (एकान्तस्थानमें जन्म ग्रहण करनेवाले अथवा छिपी हुई शक्ति और महिमावाले), (२६) स्कन्द (उछलकर चलनेवाले), (२७) सुराग्रणी (देवताओंके अगुआ), (२८) द्वादश (बारह नेत्र और कान आदि धारण करनेवाले), (२९) भू (मण्डलस्वरूप), (३०) भुवः (अन्तरिक्ष लोकस्वरूप), (३१) भावी (सबको उत्पन्न करनेवाले अथवा भवितव्यतारूप), (३२) भुवःपुत्र (पृथ्वीपर रखे हुए भगवान् शंकरके वीर्यसे उत्पन्न होनेके कारण पृथ्वीके पुत्ररूपसे प्रसिद्ध) (३३) नमस्कृत (सबके द्वारा अभिवन्दित), (३४) नागराज (नागोंके स्वामी), (३५) सुधर्मात्मा, (३६) नाकपृष्ठ (स्वर्गके संरक्षक होनेके कारण उसकी आधारभूमि), (३७) सनातन (सदा रहनेवाले), (३८) हेमगर्भ (स्वर्णके समान कान्तिवाले तेजोमय वीर्यसे उत्पन्न), (३९) महागर्भ (अनेक माताओंके गर्भमें वास करनेवाले), (४०) जय (युद्धमें जय पानेवाले) तथा (४१) विजयेश्वर (विजयके स्वामी) हैं। आप ही (४२) कर्ता, (४३) विधाता (धारण-पोषण करनेवाले), (४४) नित्य (अविनाशी), (४५) नित्यारिमर्दन (सदा शत्रुओंका संहार करनेवाले), (४६) महासेन (विशाल सेनाके अधिपति), (४७) महातेजा (परम तेजस्वी), (४८) वीरसेन (पराक्रमी सैनिकोंके अधिनायक), (४९) चमूपति (सेनापति), (५०) शूरसेन (शौर्यशालिनी सेनाके संचालक), (५१) सुराध्यक्ष (देवताओंके सेनानायक), (५२) भीमसेन (भयंकर सेनावाले), (५३) निरामय (रोगरहित), (५४) शौरि (शौर्यसम्पन्न भगवान् शंकरके पुत्र), (५५) पटु (कुशल एवं समर्थ), (५६) महातेजा (महाप्रतापी), (५७) वीर्यवान् (बल और पराक्रमसे सम्पन्न), (५८) सत्यविक्रम (सत्यपराक्रमी), (५९) तेजोगर्भ (अग्निपुत्र अथवा तेजोमय वीर्यसे प्रादुर्भूत), (६०) असुररिपु (असुरोंके शत्रु), (६१) सुरमूर्ति (देवस्वरूप), (६२) सुरोजित (देवताओंसे अधिक बलवान्), (६३) कृतज्ञ (उपकारको माननेवाले) (६४) वरद (वर देनेवाले), (६५) सत्य (सत्यवादी), (६६) शरण्य (शरणागतपालक), (६७) साधुवत्सल (साधु पुरुषोंपर स्नेह रखनेवाले), (६८) सुव्रत (उत्तम व्रतका पालन करनेवाले), (६९) सूर्यसङ्काश (सूर्यके समान तेजस्वी), (७०) वह्निगर्भ (अग्निके गर्भसे उत्पन्न), (७१) रणोत्सुक (युद्धके लिये उत्कण्ठित रहनेवाले), (७२) पिप्पली (पीपलका सेवन करनेवाले), (७३) शीघ्रग (तीव्र गतिसे चलनेवाले), (७४) रौद्रि (रुद्रपुत्र), (७५) गाङ्गेय (गंगापुत्र), (७६) रिपुदारण (शत्रुओंको विदीर्ण करनेवाले), (७७) कार्तिकेय (कृत्तिकापुत्र), (७८) प्रभु (समर्थ), (७९) क्षान्त (क्षमाशील),
१३० * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
इस प्रकार कुमारेश्वरका संक्षेपसे वर्णन किया गया, जो कुमारेश्वरके इस माहात्म्यका उनके आगे पाठ करता है तथा जो लोग इस माहात्म्यको सुनते और प्रसन्न होते हैं, वे सभी रुद्रलोकमें निवास करते हैं। जो श्राद्धकालमें इस लिंगके माहात्म्यका पाठ करता है, उसका किया हुआ श्राद्ध पितरोंको अक्षय तृप्ति प्रदान करनेवाला होता है। यदि कोई गर्भवती स्त्रीको इस शिवलिंगका माहात्म्य सुनावे, तो उसके गर्भसे गुणवान् पुत्र उत्पन्न होता है। और यदि कन्या हुई तो वह पतिव्रता होती है। यह प्रसंग परम पवित्र, पापहारक, धर्मानुकूल तथा अतिशय आनन्द प्रदान करनेवाला है। इसे पढ़ने और सुननेवाले मनुष्योंको यह समस्त मनोवांछित फल प्रदान करनेवाला है।
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कुमारका विजयस्तम्भ, प्रलम्ब दानवका वध तथा भूगोलका वर्णन
नारदजी कहते हैं— कुमारके द्वारा कुमारेश्वरकी स्थापना हो जानेपर देवताओंने दोनों हाथ जोड़कर उन्हें प्रणाम किया और इस प्रकार कहा— 'प्रभो! हम आपकी विजयकीर्ति प्रकाशित करनेके लिये जलमें एक उत्तम स्तम्भ डालेंगे और उसके आगे आप विश्वकर्माके द्वारा बनाये हुए तीसरे शिवलिंगकी स्थापना करें।' देवताओंके ऐसा कहनेपर महामना स्कन्दने 'तथास्तु' कहकर अनुमति दे दी। तब इन्द्र आदि देवताओंने प्रसन्न होकर सुवर्ण एवं उत्तम रत्नोंके बने हुए एक उत्तम स्तम्भको जलमें डालकर खड़ा किया। उस खम्भेके चारों ओर रत्नोंका चबूतरा बनवाया। उस समय आकाशसे फूलोंकी वर्षा हुई और देवताओंके बाजे बज उठे। उस स्तम्भका नाम रखा गया 'विश्वनन्दक'। उसका आरोपण हो जानेके पश्चात् उसीके पश्चिम भागमें भगवान् स्तम्भेश्वरकी स्थापना की गयी। स्तम्भेश्वरसे पश्चिमकी ओर महात्मा स्कन्दने अपनी शक्तिके अग्र भागसे एक कूपका निर्माण किया, जिसमें पातालगंगा प्रकट हुई हैं। अर्जुन! माघके कृष्णपक्षकी चतुर्दशी तिथिको जो मनुष्य उस कूपमें स्नान करके पितरोंका तर्पण करेगा, उसे निश्चय ही गया-श्राद्धसे होनेवाले पुण्यफलकी प्राप्ति होगी। तर्पणके पश्चात् गन्ध और पुष्पसे भगवान् स्तम्भेश्वरकी पूजा करनी चाहिये। ऐसा करनेवाला पुरुष वाजपेय यज्ञका फल प्राप्त करके भगवान् शिवके परमधाममें आनन्दका
(८०) नीलदंष्ट्र (नीले दाँतवाले), (८१) महामना (अत्यन्त उदार हृदयवाले), (८२) निग्रह (निरपराध लोगोंका दमन करनेकी दानवीय प्रथाको बलपूर्वक रोकनेवाले), (८३) नेता (सेनानायक) तथा आप ही, (८४) सुरनन्दन (देवताओंको आनन्दित करनेवाले), (८५) प्रग्रह (शत्रुओंको बलपूर्वक पकड़ लेनेवाले), (८६) परमानन्द, (८७) क्रोधघ्न (अपने भक्तोंके क्रोधका नाश करनेवाले), (८८) तार (उच्च स्वरसे गर्जना करनेवाले), (८९) उच्छ्रित (ऊँचे पदपर स्थित अथवा ऊँची कदवाले), (९०) कुक्कुटी (बालके लिये मोर अथवा पहाड़ी मुर्गी पालनेवाले), (९१) बहुली (बहुत साधनसामग्रीसे सम्पन्न), (९२) दिव्य (स्वर्गीय शोभा धारण करनेवाले), (९३) कामद (मनोरथ पूर्ण करनेवाले), (९४) भूरिवर्द्धन (अधिक वृद्धि प्रदान करनेवाले), (९५) अमोघ (कभी असफल न होनेवाले), (९६) अमृतद (अमृत प्रदान करनेवाले), (९७) अग्नि (अग्निरूप), (९८) शत्रुघ्न (शत्रुनाशक), (९९) सर्वबोधन (सबको ज्ञान देनेवाले), (१००) अनघ (पापरहित), (१०१) अमर (अविनाशी), (१०२) श्रीमान् (शोभासम्पन्न), (१०३) उन्नत (उन्नतिशील), (१०४) अग्निसम्भव (अग्निसे उत्पन्न), (१०५) पिशाचराज (शिवके पिशाच आदि गणोंका आधिपत्य ग्रहण करनेवाले), (१०६) सूर्याभ (सूर्यके समान कान्तिमान्), (१०७) शिवात्मा (शिवस्वरूप) तथा आप ही (१०८) सनातन (नित्य) हैं। (स्क० पु०, मा० कुमा० २३। २२ से ३५)
- माहेश्वरखण्ड-कुमारिकाखण्ड * १३१
भागी होता है। जो पूर्णिमा और अमावास्याको महीसागरसंगममें श्राद्ध करके स्तम्भेश्वरका पूजन करता है, उसके पितर तृप्त होते हैं। तृप्त होकर उत्तम आशीर्वाद देते हैं तथा वह पुरुष सब पापोंका नाश करके भगवान् रुद्रके लोकमें प्रतिष्ठित होता है। यह बात स्वयं भगवान् शंकरने कार्तिकेयकी प्रशंसाके लिये पहले कही थी। इस प्रकार स्कन्दद्वारा स्थापित किये हुए चौथे उत्तम लिंगको सब देवताओोंने प्रणाम किया और 'साधु साधु' कहकर उनके इस कार्यकी प्रशंसा की।
इस प्रकार भगवान् शंकरके पुत्र स्कन्दद्वारा पृथ्वीपर स्थापित किये हुए उन शिवलिंगोंका दर्शन करके विष्णु, ब्रह्मा और इन्द्र आदि देवता आपसमें इस प्रकार कहने लगे—'अहो ! ये कुमार धन्य हैं, जिन्होंने परम दुर्लभ महीसागरसंगममें चार शिवलिंग स्थापित किये। हम लोग भी यहाँ आत्मशुद्धिके लिये, भगवान् शंकर और कुमार कार्तिकेयकी प्रसन्नताके लिये, सत्कर्मका अनुष्ठान करनेके लिये तथा अपने परम लाभके लिये शिवलिंगोंकी परम्परा स्थापित करें। ऐसी सलाह करके सबने भगवान् महेश्वरसे आज्ञा प्राप्त की। आज्ञा मिल जानेपर उन्हें बड़ी प्रसन्नता हुई और उन्होंने साक्षात् ब्रह्माजीके द्वारा बनाये हुए एक उत्तम शिवलिंगको एकान्त स्थानमें स्थापित किया। जिनका प्रयोजन सिद्ध हो चुका था, ऐसे ब्रह्मा आदि देवताओोंने उस लिंगकी स्थापना की थी, इसलिये उसका नाम 'सिद्धेश्वर' रखा गया। फिर सब देवताओोंने मिलकर वहाँ एक उत्तम सरोवर खोदा और उन महात्माओोंने समस्त तीर्थोंके उत्तम जलसे उस जलाशयको भर दिया। इसी समय पातालसे शेषनागके पुत्र कुमुदने आकर शेष आदि सर्पगणोंसे कहा—'तारकासुरके साथ जब युद्ध हो रहा था, उस समय प्रलम्ब नामक दानव कुमारके भयसे भागकर पातालमें जा घुसा था। वह इस समय आपलोगोंके धन, पुत्र, पत्नी, कन्या और गृहोंका विध्वंस कर रहा है।'
यह सुनकर कुमार कार्तिकेयने शक्ति हाथमें ली और 'प्रलम्ब नामक दैत्य मारा जाय' ऐसा संकल्प करके उसे पातालकी ओर छोड़ दिया। स्कन्दके हाथसे छूटी हुई वह शक्ति पृथ्वीको चीरकर बड़े वेगसे पातालमें जा पहुँची और दस करोड़ दैत्योंसे युक्त प्रलम्बको भस्म करके जलकी लहरोंके साथ पुनः लौट आयी। शक्तिने पातालको जाते समय जो बिल बना दिया, उस मार्गसे पातालगंगाका पापहारी जल आकर वहाँ पूर्ण हो गया। स्कन्दने उसका नाम 'सिद्धकूप' रखा। जो मनुष्य उपवासपूर्वक कृष्णपक्षकी अष्टमी और चतुर्दशीको सिद्धकूपमें स्नान करता और अनन्य भावसे भगवान् सिद्धेश्वरका पूजन करता है, उसका अनेक जन्मोंका पाप भाग जाता है। जो सिद्धकुण्डमें श्रद्धापूर्वक स्नान करता है, वह सब पापोंसे मुक्त होकर भगवान् शंकरकी भक्तिके योग्य हो जाता है।
उस तीर्थमें अक्षयवट भी है, उसके ऊपर सन्तुष्ट हो भगवान् शंकरने यों वरदान दिया—'यह वटवृक्ष प्रयागके अक्षय वटके समान है। जो यहाँ श्राद्ध करता है, उसके पिण्ड देनेसे सब पितरोंको अक्षय दान प्राप्त होता है।'
तदनन्तर ब्रह्मा आदि देवताओोंने स्कन्दके साथ जाकर महाशक्ति भगवती सिद्धाम्बिकासे प्रार्थना की—'देवि! तुम यहीं रहकर इस क्षेत्रकी दुष्ट जीवोंसे रक्षा करो। शुभे! अष्टमी और चतुर्दशीको जो लोग तुम्हारी पूजा करते हैं, उनकी सब प्रकारकी आपत्तियोंसे तुम्हें रक्षा करनी चाहिये।' उनके इस प्रकार कहनेपर सिद्धाम्बिकाने 'तथास्तु' कहकर उनकी प्रार्थना स्वीकार की। तत्पश्चात् सिद्धेश्वर लिंगसे उत्तर भागमें देवताओोंने भगवती सिद्धाम्बाको स्थापित किया। उस तीर्थमें भी देवसमूहने सिद्धेश्वर क्षेत्रकी रक्षाके लिये क्षेत्रपतिके रूपमें चतुःषष्ठि महेश्वरकी स्थापना की। उसके बाद उन्होंने सिद्धिके लिये वहाँ शिवजीके पुत्र गणेशकी
१३२ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
सिद्धिविनायकके नामसे स्थापना की। जो लोग प्रत्येक कार्यके आरम्भमें सदा उनकी पूजा करते हैं, उन सबको ये प्रबल विघ्नराज सिद्धि प्रदान करते हैं। इस प्रकार उस तीर्थके सिद्धसप्तककी जो लोग सदा पूजा, दर्शन और स्मरण करते हैं, वे सब दोषोंसे मुक्त हो जाते हैं। सिद्धेश्वर, सिद्ध-वट, सिद्धाम्बिका, सिद्धिविनायक, सिद्धेश क्षेत्राधिपति, सिद्धसर तथा सिद्धकूप—ये सात सिद्धसप्तक कहलाते हैं।
सिद्धेशके सम्बन्धमें देवताओंने भी ये गाथा गायी है—'जो मनुष्य सिद्धलिंगका पूजन करेगा, उसके द्वारा हम सब देवता यज्ञ, जप, स्तोत्र और तपस्याद्वारा सन्तुष्ट किये हुएके समान हो जायेंगे।'
यों कहकर वे सब देवता बड़े हर्षको प्राप्त हो स्कन्दके साथ उस क्षेत्रसे चले गये। स्कन्दने मारुतस्कन्ध नामसे प्रसिद्ध सप्तमस्कन्धको प्रस्थान किया। अर्जुन! इस प्रकार मैंने तुमसे महीसागरसंगम तीर्थके पाँच लिंगोंका वृत्तान्त कह सुनाया।
कुन्तीनन्दन! सृष्टिके पहले यहाँ सब कुछ अव्यक्त एवं प्रकाशशून्य था। उस अव्याकृत अवस्थामें प्रकृति और पुरुष—ये दो अजन्मा (जन्मरहित) एक-दूसरेसे मिलकर एक हुए, यह हम सुना करते हैं। तत्पश्चात् अपने स्वरूपभूत स्वभाव और कालकी प्रेरणा होनेपर पुरुषके ईक्षण (सृष्टिविषयक संकल्प) से क्षोभको प्राप्त हुई, प्रकृतिसे महत्तत्त्वकी उत्पत्ति हुई। फिर महत्तत्त्वमें विकार आनेपर अहङ्कार प्रकट हुआ। मुनियोंने उस अहंकारको सात्त्विक, राजस और तामसभेदसे तीन प्रकारका बतलाया है। तामस अहंकारसे पाँच तन्मात्राएँ उत्पन्न हुईं तथा उन तन्मात्राओंसे पाँच महाभूतोंकी उत्पत्ति हुई और रूप-रसादि पाँच विषय पाँच महाभूतोंके कार्य हैं। तैजस अर्थात् राजस अहंकारसे पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ और पाँच कर्मेन्द्रियाँ उत्पन्न हुईं। पूर्वोक्त दस इन्द्रियोंके देवता तथा ग्यारहवीं इन्द्रिय मन सात्त्विक अहंकारसे उत्पन्न हुए हैं, ऐसा विद्वान् पुरुषोंका मत है। ये ही चौबीस तत्त्व पूर्वकालमें उत्पन्न हुए, फिर परम पुरुष भगवान् सदाशिवकी दृष्टि पड़नेपर ये सभी तत्त्व बुलबुलेके आकारमें परिणत हो गये; उस बुलबुलेसे सुन्दर अण्ड उत्पन्न हुआ, जिसका परिमाण सौ कोटि योजन है। इसीको ब्रह्माण्ड कहते हैं।
ब्रह्माण्डके आत्मा ब्रह्माजी बताये गये हैं, उन्होंने इसके तीन विभाग किये—ऊर्ध्वभाग, मध्यभाग और अधोभाग। ऊर्ध्वभाग स्वर्ग है, उसमें देवता निवास करते हैं। मध्यभाग भूलोक है, इसमें मनुष्य रहते हैं। अधोभागको पाताल कहते हैं, उसमें नाग और दैत्य निवास करते हैं। ये ही ब्रह्माण्डके तीन विभाग किये गये हैं। इनमेंसे एक-एक विभागके पुनः सात-सात भाग ब्रह्माजीने किये हैं। जो सात पाताल, सात द्वीप और सात स्वर्गलोकके रूपमें प्रसिद्ध हैं।
पहले मैं सात द्वीपोंका वर्णन करूँगा। उनकी कल्पना सुनो—पृथ्वीके मध्यमें जम्बूद्वीप है; इसका विस्तार एक लाख योजनका बतलाया जाता है। जम्बूद्वीपकी आकृति सूर्यमण्डलके समान है। वह उतने ही बड़े खारे पानीके समुद्रसे घिरा हुआ है।* जम्बूद्वीप और क्षारसमुद्रके बाद शाकद्वीप है, जिसका विस्तार जम्बूद्वीपसे दुगुना है। वह अपने ही बराबर प्रमाणवाले क्षीरसमुद्रसे, उसके बाद उससे दुगुना बड़ा पुष्करद्वीप है, जो दैत्योंको मदोन्मत्त कर देनेवाले उतने ही बड़े सुरासमुद्रसे घिरा हुआ है। उससे परे कुशद्वीपकी स्थिति मानी
* भागवत आदि अन्य पुराणोंके अनुसार द्वीपोंका क्रम इस प्रकार है—जम्बू, प्लक्ष, शाल्मलि, कुश, क्रौंच, शाक और पुष्कर। परंतु स्कन्दपुराणके कुमारिकाखण्डमें क्रमभेद प्राप्त होता है। इसमें यहाँ तो जम्बू, शाक, पुष्कर, कुश, क्रौंच, शाल्मलि तथा गोमेद (प्लक्ष) इस क्रमसे उल्लेख हुआ है, परंतु जहाँ इन द्वीपोंका विशेष वर्णन है, वहाँ पुष्करको सबके अन्तमें तथा प्लक्षद्वीपके बाद रखा है। मूलमें जैसा पाठ है, वैसा ही अर्थमें भी रखा गया है।
* माहेश्वरखण्ड-कुमारिकाखण्ड *
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गयी है, जो अपनेसे पहले द्वीपकी अपेक्षा दुगुने विस्तारवाला है। कुशद्वीपको उतने ही बड़े विस्तारवाले दहीके समुद्रने घेर रखा है। उसके बाद क्रौंच नामक द्वीप है; जिसका विस्तार कुशद्वीपसे दूना है। वह अपने ही समान विस्तारवाले घीके समुद्रसे घिरा है। इसके बाद इसके दूने विस्तारवाला शाल्मलि द्वीप है; जो उतने ही बड़े ईखके रसके समुद्रसे घिरा है। उसके बाद उससे दुगुने विस्तारवाला गोमेद (प्लक्ष) नामक द्वीप है; जिसे उतने ही बड़े अत्यन्त रमणीय स्वादिष्ट जलके समुद्रने घेर रखा है। अर्जुन! इस प्रकार सात द्वीप और समुद्रोंसहित पृथ्वीका विस्तार दो करोड़, पचास लाख, तिरपन हजार योजन है। शुक्ल और कृष्णपक्षमें समुद्रके जलकी पाँच सौ दस अंगुलकी वृद्धि और क्षय देखे गये हैं। उसके बाद दस करोड़ योजनतक सुवर्णमयी भूमि है; वह देवताओंकी क्रीडास्थली है। उसके बाद कंकणके समान गोल आकारवाला लोकालोकपर्वत है, जिसका विस्तार दस हजार योजन है। उस पर्वतके बाह्य भागमें भयंकर अन्धकार है, जिसकी ओर देखना भी कठिन है। वहाँ कोई जीव-जन्तु नहीं रहते। वह अन्धकारपूर्ण प्रदेश पैंतीस करोड़, उन्नीस लाख, चालीस हजार योजनतक फैला हुआ है। उसके बाद गर्भोदक सागर है, जिसका विस्तार सात समुद्रोंके बराबर है। उसके बाद एक करोड़ योजन विस्तृत कड़ाह है, जो ब्रह्माजीके अण्डकटाहसे ढका हुआ है। ब्रह्माण्डके मध्यमें मेरुपर्वत है, उसकी दसों दिशाओंमें पचास-पचास करोड़ योजनतक ब्रह्माण्डका विस्तार जानना चाहिये। जम्बूद्वीपके मध्यभागमें मेरुपर्वत है, वह नीचेसे ऊपरतक एक लाख योजन ऊँचा है। सोलह हजार योजन तो वह पृथ्वीके नीचेतक गया हुआ है और चौरासी हजार योजन पृथ्वीसे ऊपर उसकी ऊँचाई है। मेरुके शिखरका विस्तार बत्तीस हजार योजन है। उसकी आकृति प्यालेके समान है। वह पर्वत तीन शिखरोंसे युक्त है, उसके मध्यम शिखरपर ब्रह्माजीका निवास है, ईशान कोणमें जो शिखर है, उसपर शंकरजीका स्थान है तथा नैर्ऋत्य कोणवाले शिखरपर भगवान् विष्णुकी स्थिति है। मेरुके सुवर्णमय शिखरपर ब्रह्माजीका, रत्नमय शिखरपर शंकरजीका तथा रजतमय शिखरपर भगवान् विष्णुका अधिकार है।
मेरुपर्वतके चारों ओर चार विष्कम्भ पर्वत माने गये हैं। पूर्वमें मन्दराचल, दक्षिणमें गन्धमादन, पश्चिममें सुपार्श्व तथा उत्तरमें कुमुद नामक पर्वत है। मन्दराचल पर्वतपर कदम्बका विशाल वृक्ष है, जो विशेषरूपसे जाननेयोग्य है। इसी प्रकार गन्धमादन पर्वतपर जम्बू वृक्ष, सुपार्श्व पर्वतपर अश्वत्थ वृक्ष तथा कुमुद पर्वतपर वट वृक्षकी स्थिति मानी गयी है। ये चारों वृक्ष उन-उन पर्वतोंकी ध्वजाके समान हैं। इनका दीर्घ विस्तार ग्यारह-ग्यारह सौ योजन है। इनके चार वन हैं, जो पर्वतके शिखरपर ही स्थित हैं। पूर्वमें नन्दन वन, दक्षिणमें चैत्ररथ वन, पश्चिममें वैभ्राज वन तथा उत्तरमें सर्वतोभद्र नामक वन है। इन्हीं चार वनोंमें चार सरोवर भी हैं। पूर्वमें अरुणोद सरोवर, दक्षिणमें मान सरोवर, पश्चिममें शीतोद सरोवर तथा उत्तरमें महाह्रद नामक सरोवर है। ये विष्कम्भ पर्वत पचीस-पचीस हजार योजन ऊँचे हैं। इनकी चौड़ाई भी हजार-हजार योजन मानी गयी है। इनके सिवा वहाँ और भी बहुत-से केसरपर्वत* हैं। मेरुगिरिके दक्षिण दिशामें निषध, हेमकूट और हिमवान्—ये तीन मर्यादा पर्वत हैं। इनकी लंबाई एक लाख योजन और चौड़ाई दो हजार योजन है। मेरुके उत्तरमें भी तीन मर्यादा पर्वत हैं—नील, श्वेत और शृंगवान्। मेरुसे पूर्व माल्यवान् पर्वत है और मेरुके पश्चिम गन्धमादन पर्वत है। ये सभी पर्वत जम्बूद्वीपमें चारों ओर फैले हुए हैं। गन्धमादन पर्वतपर जो जम्बूका वृक्ष है, उसके
* जैसे कमलकी कर्णिकाके चारों ओर केसर होते हैं, वैसे मेरुके सब ओर दो पर्वत हैं। वे केसरके ही सदृश जान पड़ते हैं। अतः उन्हें केसरपर्वत कहा है।
१३४ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
फल बड़े-बड़े हाथियोंके समान होते हैं। उस जम्बूके ही नामपर इस द्वीपको जम्बूद्वीप कहा गया है।
पूर्वकालमें स्वायम्भुव नामसे प्रसिद्ध एक मनु हो गये हैं; वे ही आदि मनु और प्रजापति कहे गये हैं। उनके दो पुत्र हुए, प्रियव्रत और उत्तानपाद। राजा उत्तानपादके पुत्र परम धर्मात्मा ध्रुवजी हुए, जिन्होंने भक्ति-भावसे भगवान् विष्णुकी आराधना करके अविनाशी पदको प्राप्त कर लिया। राजर्षि प्रियव्रतके दस पुत्र हुए, जिनमेंसे तीन तो संन्यास ग्रहण करके घरसे निकल गये और परब्रह्म परमात्माको प्राप्त हो गये। शेष सात द्वीपोंमें उन्होंने अपने सात पुत्रोंको प्रतिष्ठित किया। राजा प्रियव्रतके ज्येष्ठ पुत्र आग्नीध्र जम्बूद्वीपके अधिपति हुए। उनके नौ पुत्र जम्बूद्वीपके नौ खण्डोंके स्वामी माने गये हैं। वे नवों खण्ड आज भी उन्हींके नामसे विख्यात हैं। प्रत्येक खण्डका विस्तार एक हजार योजन है। मेरुके चारों ओर और गन्धमादन तथा माल्यवान्के बीचमें सुवर्णमयी भूमिसे सुशोभित भू-भाग है, उसे इलावृत वर्ष कहते हैं। माल्यवान् पर्वतसे लेकर समुद्रपर्यन्त भद्राश्व वर्ष कहलाता है। गन्धमादनसे समुद्रतककी भूमिको केतुमाल वर्ष कहा गया है। शृंगवान् पर्वतसे आरम्भ करके सागरतकके भूखण्डको कुरु वर्ष कहते हैं। शृंगवान् और श्वेत पर्वतके बीचका भाग हिरण्मय वर्ष कहलाता है। नील और श्वेत पर्वतके बीचमें रम्यक् वर्ष है। निषध और हेमकूटके बीच हरिवर्षकी स्थिति है। हिमवान् और हेमकूटके मध्यका भूभाग किंपुरुष वर्ष माना गया है। हिमालयसे लेकर समुद्रतकके भूभागको नाभिखण्ड कहते हैं। नाभि और कुरु ये दोनों वर्ष धनुषकी-सी आकृतिवाले हैं। इनमें क्रमशः हिमवान् और शृंगवान् पर्वत प्रत्यंचाके स्थानपर स्थित बताये गये हैं। नाभिके पुत्र ऋषभ हुए और ऋषभसे 'भरत' का जन्म हुआ; जिनके नामपर इस देशको भारतवर्ष भी कहते हैं। अर्जुन! यहाँ धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—चारों पुरुषार्थोंका उपार्जन होता है। भारतवर्षके सिवा अन्य सब द्वीपों और वर्षोंमें केवल भोग-भूमि है।
शाकद्वीपमें एक हजार योजन विस्तृत शाक वृक्ष है। उसीके नामसे उस वर्षको शाकद्वीप कहा गया है। राजा प्रियव्रतके पुत्र मेधातिथि उस द्वीपके अधिपति हैं। उनके सात पुत्र हुए— पुरोजव, मनोजव, पवमान, धूम्रानीक, चित्ररेफ, बहुरूप तथा विश्वधार— ये उनके पुत्रोंके नाम हैं। इन्हीं नामोंसे प्रसिद्ध वहाँ सात खण्ड हैं। शाकद्वीपमें ऋतव्रत, सत्यव्रत, दानव्रत और अनुव्रत नामवाले चार वर्णोंके लोग हैं, जो वायुस्वरूप भगवान्के नामोंका जप करते हैं। जो अपनी प्राण आदि वृत्तियोंके द्वारा सम्पूर्ण भूतोंके भीतर प्रवेश करके उनका पालन-पोषण करते हैं तथा यह जगत् जिनके अधीन है, वे अन्तर्यामी ईश्वर साक्षात् वायुदेव हम सबकी रक्षा करें। कुशद्वीपमें एक हजार योजनतक कुशोंकी झाड़ी है। उसीके चिह्नसे चिह्नित होनेके कारण उसको कुशद्वीप कहते हैं। राजा प्रियव्रतके पुत्र हिरण्यरोमा उस द्वीपके स्वामी हैं; उनके वसु, वसुदान, दृढ़रुचि, नाभिगुप्त, स्तुत्यव्रत, विविक्त और वामदेव— इन सात पुत्रोंके नामसे प्रसिद्ध सात वर्ष कुशद्वीपमें हैं। वहाँके चार वर्णोंका नाम कुशल, कोविद, अभियुक्त और कुलक है। वे भगवान् अग्निदेवकी इस प्रकार स्तुति करते हैं— 'हे अग्निदेव! आप जन्म ग्रहण करनेवाले सम्पूर्ण भूतोंको जानते हैं; इसलिये 'जातवेदा' हैं। साक्षात् परब्रह्म परमात्माके लिये आप हविष्य पहुँचाया करते हैं। सब देवता परम पुरुष भगवान्के ही अंग हैं। अतः उनके यजनद्वारा आप उन परम पुरुषका ही यजन करें।'
क्रौञ्चद्वीपमें क्रौञ्च नामक पर्वत है, जिसका विस्तार दस हजार योजन है। उसी पर्वतको स्वामिकार्तिकेयने विदीर्ण कर डाला था। उसके चिह्नसे चिह्नित होनेके कारण उस द्वीपका नाम क्रौञ्चद्वीप है। वहाँ प्रियव्रतके पुत्र महाराज धृतपृष्ठका अधिकार है। उनके सात पुत्र हुए— आम, मधुरूह,
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मेघपृष्ठ, सुधामा, भ्राजिष्ठ, लोहितार्णव तथा वनस्पति। इन्हींके नामपर उस द्वीपके सात वर्ष हैं। वहाँ पुरुष, ऋषभ, द्रविण और देवक नामवाले चार वर्णोंके लोग रहते हैं और जलस्वरूप भगवान्की स्तुति करते हैं—‘हे जल! तुम परम पुरुष परमात्माके रेतस् हो अथवा परमेश्वर ही तुम्हारी शक्ति हैं; तुम भूः, भुवः, स्वः तीनों लोकोंको पवित्र करते हो। अतः स्वभावसे ही पापनाशक हो। हम अपने शरीरसे तुम्हारा स्पर्श करते हैं, तुम हमें पवित्र कर दो।’
शाल्मलिद्वीपमें सेमलका एक बहुत बड़ा वृक्ष है, जिसपर गरुड़जी निवास करते हैं। उसका विस्तार एक हजार योजन है। वही वहाँका चिह्न है; इसलिये उसे शाल्मलिद्वीप कहते हैं। राजा प्रियव्रतके पुत्र यज्ञबाहु उसके अधिपति हैं। उनके सुरोचन, सौमनस्य, रमणक, देवबर्हि, पारिभद्र, आप्यायन और अविज्ञात नामवाले सात पुत्र हैं, जिनके नामपर वहाँके सात वर्ष प्रसिद्ध हैं। उस द्वीपमें श्रुतधर, वीर्यधर, वसुन्धर और ईषन्धर नामवाले चार वर्णोंके लोग भगवान् सोमका यजन एवं स्तवन करते हैं। ‘जो अपनी किरणोंसे कृष्ण और शुक्ल पक्षमें पितरों और देवताओंको अन्न वितरण करते हैं, वे भगवान् चन्द्रमा हम सब प्रजाओंके राजा हों।’
गोमेद या प्लक्षद्वीपमें गोमेद नामसे प्रसिद्ध एक पाकरिका वृक्ष है, जिसकी सुगन्धित छायासे विशेष सुख मिलनेके कारण लोगोंका मेदा बढ़ जाता है। अतः उससे उपलक्षित द्वीपको गोमेद द्वीप कहते हैं। वहाँ राजा प्रियव्रतके पुत्र इध्मजिह्व राजा हैं। उनके शिव, यवस, सुभद्र, शान्त, क्षेम, अमृत तथा अभय नामवाले सात पुत्र हैं, जिनके नामसे उस द्वीपके सात वर्ष प्रसिद्ध हुए हैं। वहाँ हंस, पतंग, ऊर्ध्वंचन और सत्यांग नामवाले चार वर्णोंके लोग रहते हैं जो भगवान् सूर्यकी आराधना करते हैं। जो पुराण-पुरुष भगवान् विष्णुके स्वरूप हैं, सत्य, ऋत, वेद, अमृत तथा मृत्युके भी आत्मा हैं, उन भगवान् सूर्यकी हम शरण लेते हैं।’
पुष्करद्वीपमें एक हजार योजनतक विस्तृत स्वर्णमय कमल देदीप्यमान होता है, जिसके लाखों स्वर्णमय दल शोभा पाते हैं। वही वहाँका चिह्न है। इसलिये उसे पुष्करद्वीप कहते हैं। राजा प्रियव्रतके पुत्र वीतिहोत्र वहाँके अधिपति हैं। उनके दो ही पुत्र हैं—रमणक और धातकि। इन्हींके नामसे उस द्वीपके दो खण्ड प्रसिद्ध हैं। इन दोनों खण्डोंके मध्य भागमें मानसोत्तर नामक पर्वत है; जिसकी आकृति कंगनके समान है। उसीके ऊपर भगवान् भास्कर भ्रमण करते हैं। वहाँ वर्ण-विभाग नहीं है। सब समान हैं और केवल ब्रह्माजीका चिन्तन करते रहते हैं। वे इस प्रकार प्रार्थना करते हैं—‘जो सुप्रसिद्ध कर्मफलस्वरूप हैं, साक्षात् ब्रह्ममें ही जिनकी स्थिति है, सब लोग जिनका पूजन करते हैं तथा जो एकान्तनिष्ठ, अद्वितीय एवं परम शान्त हैं, उन भगवान् ब्रह्माको नमस्कार है।’ पुष्करद्वीपके निवासियोंमें क्रोध और मात्सर्य नहीं होता। पुण्य और पापकी भी प्रवृत्ति नहीं होती। उनकी आयु दस हजार वर्षसे लेकर बीस हजार वर्षतककी होती है। वे लोग जप करते रहते हैं और देवताओंकी भाँति अपनी पत्नियोंके साथ विहार किया करते हैं। अर्जुन! अब मैं तुम्हें ऊपरके लोकोंकी स्थिति बतलाऊँगा।
नवग्रहोंकी स्थिति, ऊपरके सात लोकोंका वर्णन, वायुके सात स्कन्ध, सात पाताल, इक्कीस नरक, ब्रह्माण्डकटाह एवं काल-मान आदिका निरूपण
नारदजी कहते हैं— कुरुश्रेष्ठ! भूमिसे लाख योजन ऊपर सूर्यमण्डल है। भगवान् सूर्यके रथका विस्तार नौ सहस्र योजन है। उसका ईषादण्ड (हरसा) अठारह हजार योजन बड़ा है। इसकी
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धुरी डेढ़ करोड़, साढ़े सात लाख योजनकी है। उसीमें सूर्यके रथका पहिया लगा है। उस पहियेमें तीन नाभि, पाँच अरे और छः नेमि बताये गये हैं। सूर्यके रथका जो दूसरा धुरा है, उसका माप साढ़े पैंतालीस हजार योजन है। धुरेका जो प्रमाण है, वही दोनों युगाद्धोंका भी है। उस रथका जो छोटा धुरा और युगार्द्ध है, वह ध्रुवके आधारपर स्थित है और दूसरे बायें धुरेमें जो पहिया लगा है, वह मानसोत्तर पर्वतपर स्थित है। वेदके जो सात छन्द हैं, वे ही सूर्यरथके सात अश्व हैं। उनके नाम सुनो—गायत्री, बृहती, उष्णिक्, जगती, त्रिष्टुप्, अनुष्टुप् और पङ्क्ति—ये छन्द ही सूर्यके घोड़े बताये गये हैं। सदा विद्यमान रहनेवाले सूर्यका न तो कभी अस्त होता और न उदय ही होता है। सूर्यका दिखायी देना ही उदय है और उनका दृष्टिसे ओझल हो जाना ही अस्त है।
इन्द्र, यम, वरुण और कुबेर—इनमेंसे किसी एककी पुरीमें प्रकाशित होते हुए सूर्यदेव शेष तीन पुरियों और दो विकोणों (कोनों)-को प्रकाशित करते हैं और जब किसी कोनकी दिशामें स्थित होते हैं तब वे शेष तीन कोनों और दो पुरियोंको प्रकाशित करते हैं। उत्तरायणके प्रारम्भमें सूर्य मकर राशिमें जाते हैं, उसके पश्चात् वे कुम्भ और मीन राशियोंमें एक राशिसे दूसरी राशिपर होते हुए जाते हैं। इन तीनों राशियोंको भोग लेनेपर सूर्यदेव दिन और रात दोनोंको बराबर करते हुए विषुवत् रेखापर पहुँचते हैं। उसके बादसे प्रतिदिन रात्रि घटने लगती है और दिन बढ़ने लगता है। फिर मेष तथा वृष राशिका अतिक्रमण करके मिथुनके अन्तमें उत्तरायणके अन्तिम सीमापर उपस्थित होते हैं और कर्क राशिपर पहुँचकर दक्षिणायनका आरम्भ करते हैं। जैसे कुम्हारके चाकके सिरे बैठा हुआ जीव बड़ी शीघ्रतासे घूमता है उसी प्रकार सूर्य भी दक्षिणायनको पार करनेमें शीघ्रतासे चलते हैं। वे वायुवेगसे चलते हुए अत्यन्त वेगवान् होनेके कारण बहुत दूरकी भूमि भी थोड़ेमें पार कर लेते हैं। कुलालचक्रके मध्यमें स्थित जीव जिस प्रकार मन्द गतिसे चलता है, उसी प्रकार उत्तरायणमें सूर्य मन्द गतिसे चलते हैं, अतः वे थोड़ी-सी भूमिको भी चिरकालमें पार करते हैं।
सन्ध्याकाल आनेपर मन्देह नामक राक्षस भगवान् सूर्यको खा जानेकी इच्छा करते हैं। उन राक्षसोंको प्रजापतिका यह शाप है कि उनका शरीर तो अक्षय रहेगा, परंतु मृत्यु प्रतिदिन होगी। अतः सन्ध्याकालमें उन राक्षसोंके साथ सूर्यका बड़ा भयानक युद्ध होता है। उस समय द्विजलोग गायत्री मन्त्रसे पवित्र किये जलका जो अर्घ्य देते हैं, उससे वे पापी राक्षस जल जाते हैं। इसलिये सदा सन्ध्योपासना करनी चाहिये। जो सन्ध्योपासना नहीं करते, वे कृतघ्न होनेके कारण रौरव नरकमें पड़ते हैं।
प्रत्येक मासमें भिन्न-भिन्न सूर्य, ऋषि, गन्धर्व, राक्षस, अप्सरा, यक्ष तथा सर्प—इन सातोंसे संयुक्त भगवान् सूर्यका रथ गमन करता है। धाता, अर्यमा, मित्र, वरुण, विवस्वान्, इन्द्र, पूषा, सविता, भग, त्वष्टा तथा विष्णु ये बारह आदित्य, चैत्र आदि मासोंमें सूर्यमण्डलमें अधिकारी माने गये हैं।
सूर्यके स्थानसे लाख योजन दूर चन्द्रमाका मण्डल स्थित है, चन्द्रमाका भी रथ तीन पहियोंवाला बताया जाता है, उसमें बायीं और दाहिनी ओर कुन्दके समान श्वेत दस घोड़े जुते होते हैं। चन्द्रमासे पूरे एक लाख योजन ऊपर सम्पूर्ण नक्षत्रमण्डल प्रकाशित होता है। नक्षत्रोंकी संख्या अस्सी समुद्र चौदह अरब और बीस करोड़ बतायी गयी है। नक्षत्रमण्डलसे दो लाख योजन ऊपर बुधका स्थान है। चन्द्रनन्दन बुधका रथ वायु तथा अग्निद्रव्यसे बना हुआ है, उसमें वायुके समान वेगवाले आठ पीले रंगके घोड़े जुते रहते हैं। बुधसे भी दो लाख योजन ऊपर शुक्राचार्यका स्थान माना गया है, उनके रथमें भी आठ घोड़े जोते जाते हैं। शुक्रसे लाख योजन ऊपर मंगल हैं, इनका रथ सुवर्णके समान कान्तिवाले आठ घोड़ोंसे युक्त होता है। मंगलसे दो लाख योजन ऊपर