भारतकोश
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संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

* वैष्णवखण्ड-भूमिवाराहखण्ड *

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सखियोंके इस प्रकार पूछनेपर उस पुरुषने मन्द मुसकानयुक्त मुखारविन्दसे इस प्रकार कहा— 'मेरे नाम अनन्त हैं। तपस्वी लोग रंग, रूप और नाम दोनों ही दृष्टियोंसे मुझे कृष्ण कहते हैं। मैं वह हूँ, जिसके धनुषकी समता करनेवाला कोई धनुष देवताओंके पास भी नहीं है। लोग मुझे वेंकटाचलनिवासी वीरपति कहते हैं। शिकारके लिये वनमें आया हूँ। इस वनकी शोभा देखते हुए मेरी दृष्टि सुन्दरीपर भी पड़ गयी। क्या यह मुझे प्राप्त हो सकती है?'

श्रीकृष्णकी यह बात सुनकर सब सखियाँ कुपित हो गयीं। तब कृष्ण घोड़ेपर चढ़कर शीघ्र ही वेंकटाचलपर चले गये। वहाँ अपने दिव्य निवासस्थानपर पहुँचकर वे घोड़ेसे उतर गये। कृष्णके रूपमें साक्षात् श्रीहरि ही थे। घोड़ेसे उतरकर उन्होंने रत्नमय मण्डपमें प्रवेश किया और मुक्तामय मन्दिरमें जाकर नूतन रत्नमय सिंहासनपर वे विराजमान हुए और उसी विशाल नेत्रोंवाली तथा मन्द मुसकानसे सुशोभित मुखारविन्दवाली पद्मावतीका स्मरण करने लगे।

तदनन्तर मध्याह्न कालमें भगवान्‌के भोग लगानेयोग्य दिव्य उत्तम एवं सुगन्धित अन्न तैयार करके बकुलमालिका नामकी सखी भगवान्‌को देखनेके लिये शीघ्रतापूर्वक गयी और उनके चरणोंमें भक्ति-भावसे प्रणाम करके पास ही बैठ गयी। उसने देखा, श्रीहरि नेत्र बंद किये किसीकी याद कर रहे हैं। तब उस सखीने कहा—'देवदेवेश्वर! उठिये, पुरुषोत्तम! आपके लिये बहुत उत्तम रसोई तैयार की गयी है। माधव! अब भोजनके लिये पधारिये।'

श्रीभगवान् बोले—सखी! प्राचीन कालकी बात है। पवित्र त्रेतायुगमें जब मैंने रावणका वध किया था, उस समय वेदवती नामवाली एक कन्याने लक्ष्मीजीकी सहायता की थी। लक्ष्मी राजा जनकके यहाँ पृथ्वीसे उत्पन्न हो सीताके रूपमें निवास करती थीं। फिर मुझसे विवाह होनेपर जब वे मेरे साथ वनमें गयीं, तब एक दिन पंचवटीमें मारीच नामक राक्षसका वध करनेके लिये मैं आश्रमसे बाहर गया। मेरा छोटा भाई लक्ष्मण भी सीताके कहनेसे मेरे ही पीछे चला आया। तत्पश्चात् राक्षसराज रावण सीताको हर ले जानेके लिये मेरे आश्रमके समीप आया। उस समय मेरे अग्निहोत्र-गृहमें विद्यमान अग्निदेव रावणकी वैसी चेष्टा जानकर सीताको साथ ले पातालमें चले गये और अपनी पत्नी स्वाहाकी देख-रेखमें सीताको सौंपकर लौट आये। पूर्वकालमें कल्याणमयी वेदवतीको एक बार उसी राक्षसने स्पर्श कर लिया था, जिससे दुःखी होकर उसने प्रज्वलित अग्निमें अपने शरीरको त्याग दिया। उस समय उसी वेदवतीको रावणका संहार करनेके उद्देश्यसे अग्निदेवने सीताके समान रूपवाली बना दिया और मेरी पर्णशालामें सीताके स्थानपर उसे लाकर छोड़ दिया। रावणने उसीका अपहरण करके लंकामें ला बिठाया। तदनन्तर रावणके मारे जानेपर अग्नि-परीक्षाके समय उसी वेदवतीने अग्निमें प्रवेश किया। उस समय अग्निदेवने

२७० * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

स्वाहाके समीप सुरक्षित जनकनन्दिनी सीतारूपा लक्ष्मीको लाकर पुनः मेरे हाथमें दिया और इस प्रकार कहा—'देव! यह वेदवती सीताका परम प्रिय करनेवाली है; अतः आप इसे वरदान देकर प्रसन्न करें।' अग्निकी यह बात सुनकर कल्याणमयी सीताने भी मुझसे कहा—'प्रभो! यह वेदवती सदा मेरा प्रिय कार्य करनेवाली है। यह उच्चकोटिकी भगवद्भक्त है। अतः आप स्वयं ही इसे अंगीकार करें।'

तब मैंने कहा—देवि! मैं कलियुगमें तुम्हारे कथनानुसार कार्य करूँगा। तबतक यह देवताओंसे पूजित होकर ब्रह्मलोकमें निवास करे। पश्चात् पृथ्वीसे उत्पन्न होकर आकाशराजकी पुत्री होगी। सखी! इस प्रकार मैंने और लक्ष्मीने पूर्वकालमें जिसे वरदान दिया था, वह सुन्दरी इस समय नारायणपुरमें पृथ्वीसे प्रकट हुई है। वह लक्ष्मीके समान ही सद्गुणवती है। उसके नेत्र कमलके समान परम सुन्दर हैं। आज जब मैं शिकार खेलने गया था, तब वह मेरे देखनेमें आयी थी। वह अपने ही समान सुन्दरी सखियोंके साथ वनमें फूल तोड़ रही थी। वकुलमालिके! तुम वहाँ जाकर उस कन्याको देखो और यह जान लो कि वह अपने अनुपम रूप और लावण्यसे इस प्रशंसाके योग्य है या नहीं।

तब वकुलमालिका सखी देवाधिदेव भगवान्‌को प्रणाम करके गुंजाके दानेके समान लाल रंगवाले घोड़ेपर सवार हुई और उनके बताये हुए मार्गसे चल दी। रास्तेमें अनेक प्रकारके मृगों, पक्षियों तथा वृक्ष-लताओंका अवलोकन करती और बार-बार प्रसन्न होती हुई वह आरणी नदीके पश्चिम तटपर जा पहुँची। वह स्थान बहुतेरे वृक्षोंसे हरा-भरा था। वहाँ अगस्त्येश्वरके समीप अपने लाल घोड़ेसे उतरकर वकुलमाला स्नान तथा जलपान करके नदीके तटपर विश्राम करने लगी। इतनेमें ही राजभवनसे बहुत-सी स्त्रियाँ देवताके समीप वहाँ आयीं। वे सब-की-सब पद्मावतीकी सखियाँ थीं। उन्हें देखकर वकुलमालिका उनके समीप गयी और इस प्रकार बोली—'सुन्दरियो! तुम कौन हो? तुम्हारे आभूषण और हार तो बड़े विचित्र हैं। तुम कहाँसे आयी हो और इस स्थानपर तुम्हारा क्या कार्य है?'

उसकी बात सुनकर सखियोंने मन्द-मन्द मुसकराते हुए कहा—हम आकाशराजकी रनिवासमें रहनेवाली स्त्रियाँ और महाराजकी पुत्री पद्मावतीकी सहेलियाँ हैं। एक दिन राजकुमारीको आगे करके हम वनमें गयी थीं। वहाँ उनके लिये फूल तोड़ती हुई सब सखियाँ एक वृक्षके नीचे जा बैठीं। वहीं हमें एक सुन्दर पुरुषका दर्शन प्राप्त हुआ। उनके श्रीअंगोंकी कान्ति इन्द्रनीलमणिके समान श्याम थी। उनका वक्षःस्थल लक्ष्मीका निवास जान पड़ता था। मुखपर मन्द-मन्द मुसकानकी छटा छा रही थी। दोनों भुजाएँ बहुत ही सुन्दर, विशाल और हृष्ट-पुष्ट थीं। कटिप्रदेशमें शुद्ध पीताम्बर शोभायमान था। उन्होंने एक हाथमें सुवर्णमय धनुष और दूसरेमें बाण धारण कर रखा था। मस्तकपर सोनेका मुकुट चमक रहा था। वे हार और भुजबंद आदि आभूषणोंसे विभूषित थे। उन्हें देखकर सुवर्णसदृश गौर वर्णवाली हमारी कमलनयनी सखी पद्मावती सहसा बोल उठी—'देखो, देखो!' तब हम सब सखियाँ उन्हींकी ओर देखने लगीं। इतनेहीमें वे शीघ्र चले गये। उनके चले जानेपर सखी पद्मावती मूर्च्छित हो गयीं। उसे उसी अवस्थामें हमलोग राजभवनमें ले गयी। पुत्रीकी ऐसी अवस्था देखकर महाराजने ज्योतिषीसे पूछा—'विप्रवर! मेरी पुत्रीकी ग्रहदशाका फल बताइये।' तब बृहस्पतिके समान विद्वान् ब्राह्मणने मन-ही-मन ग्रहोंको विचारकर कहा—'नृपश्रेष्ठ! कोई उत्तम पुरुष आपकी कन्याके समीप आया था, उसे ही देखकर राजकुमारी मूर्च्छित हो गयी हैं। उसीके साथ पद्मावतीका विवाहसम्बन्ध होगा।'

  • वैष्णवखण्ड-भूमिवराहखण्ड * २७१

राजासे ऐसा कहकर ज्यौतिषीजी अपने घर चले गये। तब आकाशराजने वैदिक ब्राह्मणोंको बुलाकर आदरपूर्वक कहा—'ब्राह्मणो! आपलोग देवमन्दिरमें जाकर वेदमन्त्रोंके साथ शंकरजीका महा-अभिषेक कीजिये।' उनको ऐसा आदेश देकर महाराजने हमें बुलाया और इस प्रकार कहा—'कन्याओ! तुम भगवान्‌के महा-अभिषेककी सामग्री जुटाओ।' राजाकी यह आज्ञा पाकर हम सब सखियाँ देवमन्दिरमें आयी हैं। शुभगे! अब तुम हमें अपना परिचय दो। कहाँसे या किसके कामसे यहाँ आगमन हुआ है अथवा यहाँसे कहाँ जानेका तुम्हारा विचार है? जान पड़ता है, इस दिव्य अश्वपर आरूढ़ होकर तुम देवलोकसे आयी हो।

सखियोंके इस प्रकार पूछनेपर वकुलमालिकाको बड़ा हर्ष हुआ। उसने मधुर वाणीमें कहा—'मैं वेंकटाचलसे इस घोड़ेपर सवार होकर आयी हूँ और महारानी धरणीदेवीसे मिलना चाहती हूँ। क्या राजभवनमें महारानीके दर्शन हो सकते हैं?' उसकी यह बात सुनकर उन कन्याओंने कहा—'शुभे! तुम हमारे साथ धरणीदेवीका दर्शन कर सकती हो।' तब वकुलमालिका उन कन्याओंके साथ राजभवनमें आयी। उधर धरणीदेवीने अन्तःपुरमें जाकर अपनी पुत्रीसे कहा—'बेटी! तुम्हारा कौन कार्य करूँ? तुम्हें कौन वस्तु प्रिय लगती है?' माताके इस प्रकार पूछनेपर मनस्वी कन्या पद्मावतीने मन्द स्वरमें कहा—'अम्बे! संसारमें जो सबसे अधिक नयनाभिराम है, साधु-संतोंके मनको भी जो परम प्रिय लगता है, ब्रह्मा आदि देवता भी जिसके दर्शनकी इच्छा रखते हैं, जो सबसे महान् और सर्वत्र व्यापक है, तेजस्वी पदार्थोंमें भी सर्वाधिक तेजस्वी है, देवताओंका भी देवता है, श्रेष्ठ भक्तोंको ही जो इस लोकमें सुलभ है तथा अभक्तोंको जिसकी प्राप्ति कभी नहीं होती, उसी वस्तुमें मेरा मन लग रहा है। माताजी! वह भक्तोंको सम्पूर्ण कामनाएँ देनेवाला है, तुम मेरे लिये उसी वस्तुकी खोज कराओ।'

धरणी बोली—सुलोचने! उसके भक्तोंका लक्षण बतलाओ, जिनके लिये वह संसारमें सुलभ है।

पद्मावतीने कहा—उनके मनोरम लक्षणोंका वर्णन करती हूँ, सुनो। वे वेदोंके स्वाध्यायमें तत्पर होकर सदा वैदिक कर्मका अनुष्ठान करते हैं, सत्य बोलते हैं, दूसरोंके दोषोंको कभी नहीं देखते हैं, परायी निन्दासे दूर रहते हैं, दूसरोंके धनका अपहरण नहीं करते। परायी स्त्रियाँ कितनी ही सुन्दरी क्यों न हों, वे न तो उनकी याद करते हैं, न उनकी ओर देखते हैं और न कभी उनका स्पर्श ही करते हैं। ऐसे सदाचारी महात्माओंको ही तुम वैष्णव जानो। जो सब प्राणियोंके प्रति दयाभावसे युक्त होकर सबके हितमें संलग्न रहते हैं तथा देवेश्वर विष्णुके गुणोंका गान करते हैं, उनको निश्चय ही भगवान्‌का भक्त समझो। जिस किसी वस्तुसे भी जो सन्तुष्ट रहते, अपनी ही स्त्रीके प्रति अनुराग रखते तथा राग, भय और क्रोधसे दूर रहते हैं, उन पुरुषोंको तुम भगवान् विष्णुका भक्त जानो। जो ऐसे लक्षणोंसे युक्त हैं, वे ही वैष्णव माने गये हैं। ऐसे सदाचारी भक्तोंको ही उन परमात्माकी प्राप्ति होती है। उन्हीं परमेश्वरमें मेरा प्रेम हो गया है, मेरा मन उन्हींसे मिलना चाहता है। मा! भगवान् विष्णुके सिवा और किसी वस्तुकी मुझे कोई इच्छा नहीं है। मैं श्यामसुन्दर भगवान् विष्णुका स्मरण करती हूँ। उन्हींके हरि, अच्युत आदि नाम लेती हूँ और उन्हींके सहारे जीवन धारण करती हूँ। अतः जिस प्रकार उनसे सम्बन्ध हो सके वैसा उपाय सोचो।

मातासे ऐसा कहकर दयनीय दशाको पहुँची हुई कमलसदृश मुखवाली पद्मावती चुप हो गयी। पुत्रीकी बातें सुनकर धरणीदेवी यह सोचने लगी

२७२ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

कि—'भगवान् विष्णु कैसे प्रसन्न होंगे?' इसी समय अगस्त्येश्वरकी पूजा करके पूर्वोक्त कन्याएँ वकुलमालिकाके साथ धरणीदेवीका दर्शन करनेके लिये आयीं। महारानी धरणीने घरपर पधारे हुए ब्राह्मणोंको उत्तम भोजन दे उनका स्वागत-सत्कार करके वस्त्र और आभूषणोंसहित पर्याप्त दक्षिणा दी तथा अपने मनोरथकी सिद्धिके लिये आशीर्वाद लेकर उन सबको विदा किया। तत्पश्चात् वहाँ आयी हुई मनस्विनी कन्याओंसे पूछा—'बताओ, यह श्रेष्ठ कन्या कौन है? तुमलोगोंसे इसका साथ कहाँ हुआ है? इस राजभवनमें यह किसलिये आयी है? मुझे तो यह कोई पूजनीया देवी प्रतीत होती है।'

कन्याएँ बोलीं—महारानी! यह देवी वास्तवमें दिव्यांगना है और किसी कार्यसे आपके ही पास आयी है। देवालयमें भगवान् शंकरके समीप हमलोगोंसे यह मिली है। हमारे पूछनेपर इसने बताया कि 'मैं पूजनीया महारानीसे मिलने आयी हूँ।' तब हमने कहा—'तुम हमारे ही साथ चलो। हम महारानीकी दासियाँ हैं और अभी राजमहलमें चलेंगी।' इस प्रकार यह आपके समीप आयी है। अब आप ही पूछें, इसके आगमनका क्या उद्देश्य है।

तब धरणीदेवीने पूछा—तुम कहाँसे आयी हो? मुझसे तुम्हें क्या काम है? सच-सच बताओ।

वकुलमालिका बोली—महारानी! मैं वेंकटाचलसे आयी हूँ। मेरा नाम वकुलमालिका है। हमारे स्वामी भगवान् नारायण सदा श्रीवेंकटाचलमें निवास करते हैं। एक दिन वे हंसके समान श्वेत और मनके समान वेगशाली अश्वपर सवार हो वेंकटगिरिके पास ही वनमें शिकार खेलनेके लिये गये और एक वनसे दूसरे वनमें विचरते हुए आरणी नदीके तटपर जा पहुँचे। वहाँ घोड़ेसे उतरकर वे नदीके सुन्दर तटपर भ्रमण करने लगे। उसी समय उन्होंने फूल तोड़ती हुई कुछ सुन्दरी कन्याओंको देखा। उनके बीचमें एक तन्वंगी कन्या थी, जो लक्ष्मीजीके समान सुवर्ण गौरी एवं अत्यन्त मनोहर थी। उस कन्याके प्रति भगवान्‌का मन अनुरक्त हो गया। उसे प्राप्त करनेकी इच्छासे श्रीहरिने उन कन्याओंसे पूछा—'यह सुन्दरी कुमारी कौन है?' कन्याओंने उत्तर दिया—'महाबल! यह आकाशराजकी कन्या है।' इतना सुनकर वे घोड़ेपर सवार हो गये और बड़े वेगसे अपने निवासस्थान वेंकटाचलपर जा पहुँचे। वहाँ स्वामिपुष्करिणीके किनारे अपने धाममें प्रवेश करके भगवान्‌ने मुझे बुलाया और इस प्रकार कहा—'सखी वकुलकालिके! तुम आकाशराजके नगरमें जाकर महाराजके अन्तःपुरमें प्रवेश करो और महारानी धरणीसे मिलकर कुशल-प्रश्न पूछनेके पश्चात् उनकी सुन्दरी पुत्री पद्मालयाको मेरे लिये माँगो तथा राजाका मनोभाव जानकर शीघ्र लौट आओ।' महारानी! भगवान्‌की ऐसी आज्ञा होनेपर मैं तुम्हारे महलमें आयी हूँ। अब तुम मन्त्रीसहित महाराजसे सलाह करके जो उचित जान पड़े वैसा करो।

वकुलमालिकाकी बात सुनकर महारानी धरणी बहुत प्रसन्न हुईं। उन्होंने आकाशराजको बुलाया और पद्मालयाके पास जाकर मन्त्रियोंके बीचमें उसकी कही हुई सारी बातें कह सुनायीं। सुनकर राजा भी अत्यन्त प्रसन्न हुए और मन्त्रियों तथा पुरोहितोंसे बोले—'मेरी पुत्री पद्मालया दिव्यरूपवाली अयोनिजा कन्या है। उसके लिये वेंकटाचल-निवासी देवाधिदेव भगवान् नारायणने याचना की है। आज मेरा मनोरथ पूर्ण हो गया। बताइये, आपलोगोंकी क्या राय है?' महाराजका उत्तम वचन सुनकर सब मन्त्री प्रसन्नचित्त होकर बोले—'राजेन्द्र! यदि ऐसी बात है, तो हम सब लोग कृतार्थ हो गये। इस सम्बन्धसे आपका यह कुल सबसे उन्नत होगा। आपकी अनुपम कन्या साक्षात् भगवती लक्ष्मीके साथ आनन्दपूर्वक रहेगी। आप

  • वैष्णवखण्ड-भूमिवाराहखण्ड * २७३

इसे देवाधिदेव शार्ङ्गधनुषधारी परमात्मा विष्णुको समर्पित करें। यह शोभामय वसन्त-ऋतु है। इसमें इस शुभ कार्यका अनुष्ठान शीघ्र कर डालना चाहिये। बृहस्पतिजीको बुलाकर आप विवाहके लिये लग्न निश्चित करें।'

तदनन्तर 'बहुत अच्छा' कहकर आकाशराजने देवलोकसे बृहस्पतिजीको बुलाया और वर-कन्याके विवाहके लिये लग्न पूछा—'ब्रह्मन्! कन्याका जन्मनक्षत्र मृगशिरा है और वरका श्रवण। अतः इन दोनोंके विवाह-सम्बन्धका विचार कीजिये।' तब बृहस्पतिजीने कहा—'वर और कन्या दोनोंके सुखकी वृद्धिके लिये ज्योतिषियोंने उत्तराफाल्गुनी नक्षत्रको सर्वश्रेष्ठ माना है। अतः वैशाखमासके उत्तराफाल्गुनी नक्षत्रमें दोनोंका विधिपूर्वक विवाहकार्य सम्पन्न किया जाय।' यह सुनकर राजाने बृहस्पतिजीकी पूजा करके उन्हें विदा किया और भगवान्‌की दूतीसे कहा—'शुभे! तुम भगवान्‌के निवासस्थानको जाओ और देवाधिदेव नारायणसे कहो—वैशाखमासमें यह मंगलकार्य सम्पन्न होगा। आप वैवाहिक मंगलाचार सम्पन्न करके यहाँ पधारें।'

इसके बाद देवीका प्रिय करनेवाले शुकरूपी दूतको वकुलमालिकाके साथ भेजकर आकाशराजने अपने पुत्रको वायु, इन्द्र आदि देवताओंके बुलानेके कार्यमें नियुक्त किया। साथ ही विश्वकर्माको बुलाकर अपने नगरकी सजावटके काममें लगाया। विश्वकर्माने पलभरमें अपना कार्य पूर्ण कर दिया। उधर वकुलमालिका अश्वपर सवार हो शुकके साथ प्रस्थित हुई और वेंकटाचलपर पहुँचकर देवालयके समीप घोड़ेसे नीचे उतरी। फिर शुकको अपने साथ ले मन्दिरके भीतर गयी। वहाँ सुन्दर नेत्रोंवाले भगवान् नारायणको लक्ष्मीजीके साथ रत्नसिंहासनपर विराजमान देख प्रणाम करके प्रसन्नतापूर्वक बोली—'प्रभो! वहाँका कार्य तो मैंने पूरा कर लिया, उधरसे मांगलिक वार्ता करनेके लिये यह शुक आया हुआ है।'

तब भगवान्‌की आज्ञा पाकर शुकने उन्हें प्रणाम किया और इस प्रकार कहा—'माधव! भूमिकन्या पद्मावतीने आपके पास यह सन्देश भेजा है कि मुझे अंगीकार कीजिये। रमापते! मैं आपके ही नाम लेती हूँ, आपके ही स्वरूपका सदा स्मरण करती हूँ। मधुसूदन! आपकी प्रसन्नताके लिये ही मैं सब कार्य करती हूँ। मेरे इस काममें पिता और माताकी भी सम्मति है। देवेश! मुझपर कृपा करके मुझे अंगीकार कीजिये।'

शुकका यह प्रिय वचन सुनकर श्रीहरिने कहा—'शुक! जाओ और पद्मालयासे इस प्रकार कहो—'देवि! श्रीनारायणदेवने कहा है कि मैं देवताओंको साथ लेकर मंगलमय विवाहकार्य सम्पन्न करनेके लिये अवश्य आऊँगा।' भगवान्‌का यह वचन सुनकर और प्रसादरूपसे उनकी दी हुई वनमाला लेकर शुक शीघ्र ही आकाशराजकी कन्याके पास लौट गया। उसने कस्तूरीकी सुगन्धसे युक्त वह तुलसीमाला राजकुमारीको देकर प्रणाम किया और भगवान्‌का शुभ सन्देश कह सुनाया। सुनकर उस प्रसादमालाको हाथमें ले पद्मालयाने उसे मस्तकपर चढ़ा लिया और भगवान्‌के आगमनकी प्रतीक्षा करती हुई योग्य आभूषण धारण किये। आकाशराजने भी आनन्दमग्न हो चन्द्रदेवको बुलाकर आदरपूर्वक कहा—'राजन्! आप नाना प्रकारका सरस भोजन तैयार कीजिये जो भगवान् विष्णुके भोगमें आने योग्य हो। उत्तम-से-उत्तम अन्नकी व्यवस्था होनी चाहिये।' इस प्रकार प्रबन्ध करके भगवान्‌के आगमनकी प्रतीक्षा करते हुए आकाशराज प्रसन्न मनसे राजसभामें बैठे थे।

तदनन्तर देवाधिदेव भगवान् नारायणने भी लक्ष्मीजीको बुलाकर कहा—'कल्याणि! अपनी सखियोंको आज्ञा दो और वैवाहिक कार्य सम्पन्न करो।' भगवान्‌का यह आदेश सुनकर लक्ष्मीदेवीने सखियोंको बुलाया और सबको आवश्यक कार्य करनेकी आज्ञा दी। लक्ष्मीकी आज्ञासे प्रीतिदेवीने

२७४* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

सुगन्धित तेल लिया, श्रुतिदेवी रेशमी वस्त्र लेकर भगवान्‌के समीप खड़ी हुईं, स्मृति भी भाँति-भाँतिके आभूषण लेकर प्रसन्नतापूर्वक उपस्थित हुईं। धृतिने दर्पण हाथमें लिया, शान्तिने कस्तूरीको प्रस्तुत किया, लज्जादेवी यक्षकर्दम१ लेकर भगवान्‌के सामने खड़ी हुईं, कीर्तिने सोनेका पट्ट तथा रत्नयुक्त मुकुट हाथमें लिया, शचीने छत्र लगाया, सरस्वतीदेवी चँवर डुलाने लगीं, गौरीदेवीने दूसरा चँवर हाथमें लिया, विजया और जया पंखा झलने लगीं। उपर्युक्त सब देवियोंको वहाँ उपस्थित देख लक्ष्मीदेवीने शीघ्रतापूर्वक उठकर सुगन्धित तेल हाथमें लिया और भगवान्‌के मस्तकसे लेकर सब अंगोंमें उसे लगाकर सुगन्धित चूर्णसे उबटन किया। इस प्रकार श्रीनारायणदेवके सब अंगोंको भलीभाँति मलकर आकाशगंगा आदि तीर्थोंसे भरकर लाये हुए सौ सुवर्णमय कलश मँगवाये और उनमेंसे एक-एकको लेकर उसके जलसे भगवान्‌का अभिषेक किया। तत्पश्चात् सुनहरे रंगके सुगन्धयुक्त चन्दनसे भगवान्‌के अंगमें लेप लगाया। फिर उनकी कमरमें रेशमी पीताम्बर बाँधकर उसमें करधनी पहना दी। मस्तकपर मुकुट रखा और अन्यान्य आभूषणोंसे भी विभिन्न अंगोंको विभूषित किया। उनकी सभी अंगुलियोंमें लक्ष्मीजीने दिव्य सोनेकी अंगूठियाँ पहना दीं। इसके बाद धृतिदेवीने भगवान्‌के समीप जाकर दर्पण दिखाया। दर्पण देखकर देवाधिदेव विष्णुने स्वयं ही ऊर्ध्वपुण्ड्र धारण किया। तदनन्तर वे लक्ष्मीजीके साथ गरुड़पर आरूढ़ हुए। इसी समय ब्रह्मा, महादेवजी, इन्द्र, वरुण, यम और कुबेर उनकी सेवामें उपस्थित हुए। इन सब देवताओं, वसिष्ठ आदि मुनीश्वरों, सनकादि योगियों तथा अन्य भगवद्भक्तोंके साथ भगवान् विष्णु नारायणपुरको गये। उस समय भगवान् विष्णुके समीप देवताओंके नगाड़े बज रहे थे। मुनिलोग स्वस्त्ययनसम्बन्धी सूक्तोंका जप करते हुए भगवान्‌के पीछे-पीछे चल रहे थे। भगवान्‌के साथ सम्पूर्ण देवता और विष्वक्सेन आदि पार्षद चल रहे थे। वकुलमाला आदि सखियाँ रथोंमें बैठकर गयीं। इस प्रकार भगवान्‌ने बारात लेकर आकाशराजके सजे-सजाये नगरमें प्रवेश किया।

आकाशराजने देखा, भगवान् आ गये और पुत्री पद्मावती भी ऐरावतपर बैठकर समस्त पुरीकी परिक्रमा करके गोपुरद्वारपर आ पहुँची है। तब वे वर-वधूको साथ ले आकर भाई-बन्धुओंके साथ भगवान्‌का दर्शन करते हुए खड़े हो गये। भगवान्‌ने अपने कण्ठमें पड़ी हुई माला हाथमें लेकर पद्मालयाके गलेमें डाल दी और पद्मालयाने बेलाके फूलोंका गजरा लेकर भगवान्‌के कण्ठमें पहना दिया। ऐसा करके वे दोनों सवारीसे उतर गये और थोड़ी देर पीढ़ीपर खड़े होनेके पश्चात् सुन्दर गृहमें प्रवेश किया। उनके साथ ब्रह्मा आदि देवताओंका समुदाय भी था। ब्रह्माजीने अंकुरारोपणपूर्वक मांगल्य-सूत्र-बन्धन (कंकण-बन्धन)-से लेकर लाजाहोमतककी सम्पूर्ण वैवाहिक विधि सम्पन्न करायी। फिर व्रत-पालनकी आज्ञा लेकर पद्मालया और श्रीहरिने पृथक्-पृथक् शयन किया। पुनः चौथे दिन चतुर्थी कर्म आदि सब कार्य पूर्ण करके चतुर्मुख ब्रह्माने आकाशराजकी अनुमति ले दोनों देवियोंके साथ भगवान्‌को गरुड़पर बिठाया और देवताओंके साथ वहाँसे चलनेकी तैयारी की। तब आकाशराजने इन्द्र आदि देवताओंके साथ अपनी पुत्री और दामादका प्रिय करनेके लिये सोनेके कड़ाहोंमें अगहनीके चावल, मूँगसे भरे हुए अनेक पात्र और सैकड़ों घीके घड़े दहेजमें दिये। हजारों


१- कपूर, अगर, कस्तूरी और कंकोलसे बनी हुई अंगराग-सामग्रीका नाम 'यक्षकर्दम' है।

पद्मालया और भगवान्‌का परस्पर माला पहनाना

२७६ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

घड़े दूध और दहीसे भरे हुए अनेकों भाण्ड, आम, केला और नारियलके दिव्य फल, आँवले, कूष्माण्ड, राजकदलीके फल, कटहल, बिजौरा नींबू, शक्करसे भरे हुए घड़े, सोना, मणि, मोती, करोड़ों रेशमी वस्त्र, हजारों दास-दासी, करोड़ों गाय, हंस और चन्द्रमाके समान श्वेत रंगके दस हजार घोड़े और सदा उन्मत्त रहनेवाले सौसे अधिक ऊँचे-ऊँचे हाथी—ये सारी वस्तुएँ भगवान् विष्णुको भेंट करके आकाशराज उनके आगे खड़े हुए।

पद्मावती और लक्ष्मीदेवीके साथ वेंकटनाथ भगवान् विष्णु दहेजकी वह सब सामग्री देखकर बड़े प्रसन्न हुए और अपने श्वसुरसे बोले—'राजन्! इस समय आप मेरे गुरु हैं। आपकी जो इच्छा हो मुझसे वर माँगिये।' भगवान्‌की यह बात सुनकर आकाशराजने कहा—'देव! इस संसारमें आपकी अनन्य सेवा ही मेरे द्वारा होती रहे, मेरा मन आपके चरणारविन्दोंमें रमता रहे और आपमें मेरी निरन्तर भक्ति बनी रहे।'

श्रीभगवान् बोले—राजेन्द्र! आपने जो कहा है, वह सब पूर्ण होगा। तत्पश्चात् ब्रह्मा आदि देवताओने और शुक आदि मुनिगणोंने भगवान् पुरुषोत्तमका स्तवन किया। फिर ब्रह्मा आदि सब देवताओंका यथायोग्य सत्कार करके श्रीहरिने उन्हें स्वर्गलोकमें जानेके लिये प्रसन्नतापूर्वक आज्ञा दे दी। उन सबके चले जानेपर भगवान् नारायण स्वामिपुष्करिणीके तटपर लक्ष्मीदेवी और पद्मावतीके साथ अपने दिव्य धाममें रहने लगे।

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तोण्डमानको निषादके साथ भगवान् श्रीनिवासका दर्शन होना

पृथ्वीने पूछा— मुझे धारण करनेवाले प्रियतम! कलियुगमें आपका दर्शन किसको होगा तथा परम सुन्दर विग्रहवाले भगवान् श्रीनिवासका दर्शन भी किसे प्राप्त हो सकेगा? यह मुझे बतलाइये।

भगवान् वराह बोले— देवि! सुनो। जो भविष्यमें होनेवाली बात है उसे भूतकालकी भाँति बतला रहा हूँ। इस पवित्र पर्वतपर एक वसु नामक निषाद था, जो श्यामाक वन (सावाँके जंगल)-की रक्षा किया करता था। भगवान् पुरुषोत्तमके प्रति उसके मनमें बड़ी भक्ति थी। वह सावाँके चावलोंका भात बनाकर उसमें मधु मिला देता और श्रीदेवी तथा भूदेवीसहित देवाधिदेव भगवान् विष्णुको निवेदन करके स्वयं प्रसाद पाता था। इस प्रकार भक्ति करनेवाले उस निषादकी कल्याणमयी भार्या चित्रवतीने एक उत्तम पुत्रको जन्म दिया, जिसका नाम वीर था। वसु अपने पुत्र तथा पतिव्रता पत्नीके साथ आनन्दपूर्वक रहता था।

एक दिन वह अपने पुत्रको सावाँकी रक्षा करनेका आदेश दे स्वयं पत्नीके साथ मधुकी खोजमें चला। मधुका छाता देखनेकी इच्छासे वह एक वनसे दूसरे वनमें शीघ्रतापूर्वक चला जा रहा था। इधर उसके पुत्रने सावाँके तैयार किये हुए भातको लेकर कुछ अग्निमें डाल दिया और कुछ पीसकर वृक्षकी जड़में भगवान् श्रीपतिको भोग लगाया। फिर भगवान्‌का प्रसाद खाकर वीर वहाँ सुखसे बैठा रहा। तदनन्तर वसु मधु लेकर आया और सावाँके चावलोंको खाया हुआ देख अपने पुत्रको फटकारने लगा। उसने बड़ी उतावलीके साथ वीरको मार डालनेके लिये तलवार लेकर हाथको ऊपर उठाया। उस समय भगवान् विष्णु उस वृक्षपर ही विराजमान थे। उन्होंने वसुकी तलवार हाथसे पकड़ ली। तब उसने वृक्षकी ओर देखा। भगवान् विष्णु हाथमें शंख, चक्र

  • वैष्णवखण्ड-भूमिवाराहखण्ड * २७७

और गदा लिये तथा आधा शरीर वृक्षपर टिकाये खड़े थे। उन्हें देखते ही वसुने तलवार छोड़ दी और भगवान्‌के चरणोंमें प्रणाम करके कहा— 'देवदेवेश्वर! आप यह क्या कर रहे हैं?'

श्रीभगवान् बोले—वसो! तुम मेरी बात सुनो। तुम्हारा पुत्र मुझमें भक्ति रखता है। यह तुमसे भी बढ़कर मुझे प्यारा है। इसलिये मैंने इसे प्रत्यक्ष दर्शन दिया। इसकी दृष्टिमें मैं सर्वत्र हूँ, किंतु तुम्हारी दृष्टिमें केवल स्वामिपुष्करिणीके तटपर रहता हूँ।

भगवान्‌का यह वचन सुनकर वसु बड़ा प्रसन्न हुआ। एक समय चन्द्रवंशमें तोण्डमान नामसे प्रसिद्ध एक राजा हुए। वे बड़े वीर थे। उनके पिताका नाम सुवीर और माताका नाम नन्दिनी था। पाँच ही वर्षकी अवस्थामें उनके हृदयमें भगवान् विष्णुकी भक्ति प्रकट हो गयी थी। वे बड़े बुद्धिमान् और शीलता, शूरता तथा पराक्रम आदि गुणोंकी निधि थे। युवा होनेपर उन्होंने पाण्ड्यनरेशकी सुन्दरी पुत्री पद्माके साथ विवाह किया। तत्पश्चात् भिन्न-भिन्न देशोंकी सैकड़ों स्वयंवरा कन्याओंको भी वे ब्याह लाये और नारायणपुरमें रहकर इस पृथ्वीपर देवराज इन्द्रकी भाँति सुख भोगने लगे। एक दिन सिंहके समान पराक्रमी तोण्डमान अपने पिताकी आज्ञा लेकर वेंकटाचलके समीप शिकार खेलनेके लिये गये। वहाँ अपने सेवकोंके साथ पैदल घूमते हुए उन्होंने एक यूथपति गजराजको देखा और उसे पकड़नेके लिये उसका पीछा किया। सुवर्णमुखरी नदीको पार करके वे परम उत्तम ब्रह्मर्षि शुकके पास गये और उन्हें प्रणाम करके, उनकी आज्ञा ले एक वनसे दूसरे वनमें चलते गये। एक जगह उन्होंने रेणुकादेवीको देखा, जो वल्मीक—बाँबी (बिमौट)—के आकारमें खड़ी थीं। उनको प्रणाम करके वीर तोण्डमान पश्चिमकी ओर चले गये। आगे जाकर उन्हें एक पँचरंगा तोता दिखायी दिया। फिर उसे पकड़नेके लिये वे भी उसके पीछे-पीछे दौड़ने लगे। तोता श्रीनिवासका नाम रटता हुआ शीघ्र ही पर्वतके शिखरपर जा पहुँचा। पीछा करते हुए राजा भी गिरिराजपर चढ़ गये और उस तोतेको ढूँढ़ते-ढूँढ़ते श्यामाक वनमें जा पहुँचे। वहाँ तोतेको न देखकर उन्होंने उस वनकी रक्षा करनेवाले निषादको देखा। उसने भी राजाको आते देख शीघ्रतापूर्वक आगे आकर उनकी अगवानी की और उन्हें प्रणाम करके विनीतभावसे वह दोनों हाथ जोड़कर खड़ा हो गया। तोण्डमानने भी उसका आदर करके उससे पूछा—'वनेचर! इधर कोई पँचरंगा तोता आया है? क्या तुमने उसे देखा है? वह 'श्रीनिवास-श्रीनिवास' की रट लगा रहा था। बताओ वह किधर गया है?'

वनेचर बोला—महाराज! वह पाँच रंगोंवाला शुक भगवान् श्रीनिवासको बहुत प्रिय है। उसे श्रीदेवी और भूदेवीने पाल-पोसकर बड़ा किया है। वह सदा भगवान् श्रीहरिके ही पास रहता

२७८ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

है और स्वामिपुष्करिणीके तटपर भगवान्‌के समीप विचरता रहता है। उस सुन्दर शुकको कोई भी पकड़ नहीं सकता। राजकुमार! अब मैं भगवान्‌की आराधनाके लिये जाऊँगा, जबतक मैं लौटकर न आऊँ तबतक आप यहीं वृक्षके नीचे विश्राम कीजिये।

राजा बोले—वनेचर! मैं भी तुम्हारे साथ भगवान् जनार्दनका दर्शन करनेके लिये चलूँगा। तुम मुझे वेंकटाचलनिवासी देवेश्वरका दर्शन कराओ।

राजाकी यह बात सुनकर निषादने मधुमिश्रित साँवाँका भात आमके पत्तेके दोनेमें रख लिया और राजाको भी साथ लेकर वह भगवान्‌के समीप गया। वहाँ राजासहित विधिपूर्वक स्नान करके निषादराजने स्वामिपुष्करिणीके तटपर बिल्ववृक्षके नीचे विराजमान भगवान् विष्णुका राजाको दर्शन कराया। उनके श्रीअंगोंकी कान्ति अलसीके फूलकी भाँति श्याम थी। कमलदलके समान सुन्दर एवं विशाल नेत्र थे। वे चार भुजाओंसे सुशोभित थे। उनके अंग-अंगसे उदारता प्रकट हो रही थी। मुखारविन्दपर मन्द-मन्द मुसकानकी छटा छा रही थी। उनके अंगोंपर दिव्य पीताम्बर शोभा पा रहा था। मस्तकपर किरीट और हाथोंमें कंकण आदि आभूषणोंसे उनकी शोभा और भी बढ़ गयी थी। भगवान्‌के दोनों पार्श्वमें परमसुन्दरी श्रीदेवी और भूदेवी विराज रही थीं। शंख, चक्र, खड्ग, गदा, शार्ङ्गधनुष और बाण आदि आयुध मूर्तिमान् होकर सब ओरसे भगवान्‌की सेवामें उपस्थित थे। इस प्रकार उन पुरुषोत्तमका दर्शन करके उन दोनोंने आनन्दमग्न होकर उन्हें प्रणाम किया। निषादने भी मधुमिश्रित साँवाँका भात भगवान्‌को निवेदन किया। फिर राजाके साथ श्यामाक वनमें अपनी पवित्र पर्णकुटीपर वह लौट आया। राजा एक रात उसकी कुटीमें रहे और सबेरे उठकर अपनी सेनाके साथ पुनः नगरकी ओर लौटे। फिर देवीके वनमें जाकर वे घोड़ेसे उतरे और चैत्र शुक्ला नवमीको उन्होंने रेणुकादेवीका पूजन किया। उनसे पूजित होकर देवीने प्रसन्न हो उन्हें वर दिया—'राजन्! तुम्हारा राज्य निष्कण्टक होगा। राजधानी तुम्हारे ही नामसे प्रसिद्ध होगी। मेरे समीप तुम दीर्घकालतक राज्य करोगे और तुम्हारे ऊपर देवाधिदेव भगवान् विष्णुका कृपाप्रसाद सदा बना रहेगा।'

इस प्रकार वरदान पाकर राजा पुनः शुकमुनिके आश्रमपर गये और उन्हें प्रणाम करके उनके द्वारा सम्मानित हो हर्षको प्राप्त हुए। फिर उन्होंने मुनिसे कहा—'महर्षे! आप कमल्सरोवरका माहात्म्य बतलाइये।'

**श्रीशुक मुनिने कहा—**राजन्! यह कमल्सरोवर नामक तड़ाग सब पापोंका नाश करनेवाला है। कीर्तन, स्मरण और स्नान करनेसे यह मनुष्योंको इस पृथ्वीपर लक्ष्मी प्रदान करनेवाला होता है। तुम भी इसमें स्नान करके अपने पिताके समीप जाओ।

शुक मुनिका यह वचन सुनकर राजकुमारने कमल्सरोवरमें स्नान किया और मुनिको प्रणाम करके घोड़ेपर सवार हो अपने नगरको प्रस्थान किया। पिताने तोण्डमानको तीन वर्षके लिये युवराज बनाकर देख लिया कि मेरे पुत्रमें प्रजाको प्रसन्न रखनेकी योग्यता, सामर्थ्य, पराक्रम, शौर्य, सुशीलता और ब्राह्मणभक्ति है। तब उन्होंने मन्त्रियोंसे सलाह करके विधिपूर्वक पुत्रका राज्याभिषेक किया और उन्हें अपने पदपर स्थापित करके उनकी अनुमति ले राजा सुवीर वनमें चले गये। तोण्डमानने वह विशाल साम्राज्य पाकर धर्मपूर्वक राज्य किया।

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भूदेवी तथा श्रीदेवीसहित सपरिकर भगवान् विष्णु

२८० * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

वाराहभगवान् तथा अस्थिसरोवर तीर्थकी महिमा, भक्त कुम्हार तथा राजा तोण्डमानका परमधामगमन

भगवान् वाराह कहते हैं—एक दिन निषादराज वसु तोण्डमानके द्वारपर आया। द्वारपालोंसे उसके आगमनकी सूचना पाकर महाराजने उसे दरबारमें बुलाया और मन्त्रियोंके साथ पुत्र और परिवारसहित उसका स्वागत-सत्कार किया। तत्पश्चात् प्रसन्न होकर उन्होंने वसुसे पूछा—‘वनेचर ! किस कार्यसे तुम्हारा यहाँ आगमन हुआ है?’

वसुने कहा—राजन् ! मैंने वनमें एक बड़े आश्चर्यकी बात देखी है, उसे सुनिये। रातमें कोई श्वेत रंगका वाराह आकर मेरा सावाँ चरने लगा। तब मैंने हाथमें धनुष लेकर उसका पीछा किया। खदेड़नेपर वह वायुके समान वेगसे भागा और मेरे देखते-देखते स्वामिपुष्करिणीके तटपर वल्मीकमें घुस गया। तब मैंने क्रोधवश उस वल्मीकको खोदना आरम्भ किया। इतनेमें ही मूर्छित होकर पृथ्वीपर गिर पड़ा। उसी समय मेरा यह पुत्र भी आ गया और मुझे पृथ्वीपर मूर्च्छित होकर पड़ा देख, पवित्र होकर देवाधिदेव भगवान् मधुसूदनकी स्तुति करने लगा। तब भगवान् वाराहका मुझमें आवेश हुआ, उन्होंने मेरे पुत्रसे कहा—‘निषादराज ! तुम शीघ्र राजाके पास जाकर मेरा सारा वृत्तान्त उनसे कहो। राजा काली गौके दूधसे अभिषेक करते हुए इस वल्मीकको धो डालें, तब इसके भीतर एक परमसुन्दर शिला दिखायी देगी। उसे लेकर किसी कारीगरसे मेरी मूर्ति बनवावें, जिसमें मैं भूमिदेवीको अपने बायें अंकमें लेकर खड़ा रहूँ और मेरा मुख सूकरके समान हो। मूर्ति तैयार हो जानेपर बड़े-बड़े मुनीश्वरों और वैखानस महात्माओंद्वारा उसकी स्थापना कराकर स्वयं तोण्डमान भी उसकी पूजा करें।’ यों कहकर भगवान् वाराहने मुझे छोड़ दिया, तब मैं स्वस्थ हो गया। देवाधिदेव भगवान् वाराह आपसे क्या कराना चाहते हैं, यह बतलानेके लिये ही मैं यहाँ आया हूँ।

राजा तोण्डमान भी यह सुनकर बहुत प्रसन्न और विस्मित हुए। तदनन्तर पुष्कर आदि मन्त्रियोंके साथ कार्यका निश्चय करके वेंकटाचल जानेका विचार किया और सब ग्वालोंको बुलाकर कहा—‘गोपगण ! जितनी भी मेरी काली और कपिला गौएँ हैं, उन सबको बछड़ोंसहित वेंकटाचलके समीप लाओ।’ गोपोंको ऐसी आज्ञा देकर राजाने मन्त्रियोंको सूचित किया—‘कल ही यात्रा करनी है।’ इसके बाद सब प्रजाको विदा करके जितेन्द्रिय राजाने अन्तःपुरमें प्रवेश किया और अपनी पत्नियोंसे वाराहजीकी वह कथा सुनाकर वे रातमें वहीं सोये। सपनेमें भगवान् श्रीनिवासने राजाको बिलका मार्ग दिखाया और उनके नगरसे लेकर बिलके अन्ततक मार्गमें पल्लव बिछा दिये। राजा यह स्वप्न देखकर जब सबेरे उठे, तब उन्होंने शीघ्र ही मन्त्रियों, प्रजाओं और ब्राह्मणोंको भी बुलाया। उन सबसे अपना देखा हुआ स्वप्न सुनाकर जब उन्होंने दरवाजेपर दृष्टि डाली, तब वहाँ पल्लव बिछे हुए दिखायी दिये। तब उपयुक्त मुहूर्तमें घोड़ेपर सवार हो राजा तोण्डमान घरसे चले और बिलके पास पहुँचकर वहीं उन्होंने नगर बनाया। उस समय देवाधिदेव भगवान्‌ने स्वयं राजाको यह आदेश दिया अर्थात् संकेत किया कि ‘इमली और चम्पा—ये दो वृक्ष बहुत उत्तम हैं, इनका पालन करो। इमली मेरा आश्रय है और चम्पा लक्ष्मीजीका स्थान है। अतः राजाओं, ऋषियों, देवताओं तथा मनुष्योंको इन दो वृक्षोंकी वन्दना करनी चाहिये।’

तोण्डमानसे ऐसा कहकर भगवान् विष्णु चुप

५. वैष्णवखण्ड (बद्रिकाश्रममाहात्म्य)

  • वैष्णवखण्ड-भूमिवाराहखण्ड * २८१

हो गये। उनका वचन सुनकर राजाने चाहरदीवारी बनवायी और वैखानस कुलके मुनियोंसे पूजन कराया। वे प्रतिदिन बिलके मार्गसे आकर भगवान्‌को प्रणाम करते और लौट जाते थे। उन्होंने उत्तम भोग भोगते हुए धर्मपूर्वक राज्य किया। इसी समय दक्षिण देशके एक श्रेष्ठ ब्राह्मण गंगास्नानके लिये स्त्रीसहित घरसे चले। मार्गमें ब्राह्मणी गर्भवती हो गयी। उसे इस दशामें देखकर और अपने साथ चलनेमें असमर्थ जानकर ब्राह्मण देवता राजाके द्वारपर आये। द्वारपालसे उनके आगमनकी सूचना पाकर राजाने उन्हें दरबारमें बुलाया और उनकी विधिपूर्वक पूजा करके उनसे कुशल-समाचार पूछा—'ब्रह्मन्! आपके आगमनका क्या हेतु है? बताइये, मैं आपकी किस आज्ञाका पालन करूँ?'

ब्राह्मणने कहा—नृपश्रेष्ठ! मैं वसिष्ठकुलमें उत्पन्न वीरशर्मा नामक सामवेदी ब्राह्मण हूँ। घरसे गंगास्नान करनेके लिये पत्नीको साथ लेकर निकला था। मार्गमें यह गर्भवती हो गयी। यह कुशिकवंशकी कन्या तथा बड़ी पुण्यशालिनी है। इसका नाम लक्ष्मी है। यह बड़ी सुशील और पतिव्रता है। इसे मैं आपके घरमें रखकर अपना व्रत पूर्ण करना चाहता हूँ। अतः जबतक मैं लौटकर न आ जाऊँ, तबतक आप इसकी रक्षा करें।

ब्राह्मणकी बात सुनकर राजाने छः महीनेके लिये चावल और धन देकर ब्राह्मणीके लिये अन्तःपुरमें एक घर दे दिया। अपनी पत्नीको वहाँ रखकर ब्राह्मण प्रसन्नतापूर्वक गंगास्नानके लिये चले गये। उत्तम क्षेत्र प्रयागमें भागीरथी गंगाके तटपर पहुँचकर उन्होंने स्नान किया। वहाँसे काशीकी यात्रा की और वहाँ भी तीन दिनोंतक रहकर वे गया चले गये। वहाँ उन श्रेष्ठ ब्राह्मणने अपने पितरोंका श्राद्ध किया। तत्पश्चात् अयोध्यापुरीकी यात्रा करके वे बद्रिकाश्रमको गये। फिर शालिग्राम-तीर्थका सेवन करके अपने देशकी ओर लौटे। इसीमें दो वर्ष बीत गये। वैशाखमासकी शुक्लपक्षीय एकादशी तिथिको वे पुनः राजाके पास गये। राजा ब्राह्मणीको भूल गये थे। उन्होंने उसका कभी स्मरण नहीं किया। ब्राह्मणी स्वाभिमानिनी थी, (छः महीने बाद अन्न समाप्त हो जानेपर भी वह माँगने नहीं गयी) घरमें ही मरकर सूख गयी थी। तदनन्तर वीरशर्मा ब्राह्मणने गंगाजलकी पिटारी खोलकर एक शीशी गंगाजल राजाको भेंट किया और पूछा—'मेरी धर्मपत्नी कुशलसे तो है न?' तब राजाने ब्राह्मणको स्मरण करके कहा, 'आप ठहरिये, मैं अभी आता हूँ।' यों कहकर उन्होंने अन्तःपुरमें जाकर देखा तो ब्राह्मणी घरमें मर गयी थी। ब्राह्मणको यह बात न बताकर राजाने उसी उत्तम बिलमें प्रवेश किया और श्री तथा भूदेवीके सहित भगवान् श्रीनिवासका दर्शन करनेके लिये वे वेंकटाचलपर गये। राजाको सहसा आते देख श्रीदेवी और भूदेवी—दोनों छिप गयीं। उन्हें प्रणाम करते देख भगवान्‌ने पूछा, 'राजन्! यह असमयमें तुम्हारा आगमन कैसे हुआ?' राजाने भयभीत होकर ब्राह्मणीकी मृत्युका वृत्तान्त बतलाया। उसे सुनकर देवदेव भगवान् विष्णुने कहा—'राजन्! उस श्रेष्ठ ब्राह्मणसे भय न करो। तुम ब्राह्मणीके शवको डोलीमें बैठाकर अपनी रानियोंके साथ यहाँ ले आओ और मेरे निवासस्थानसे पूर्व भागमें जो अस्थिसरोवर है, उसीमें द्वादशीको नहलाओ। वह सरोवर अपमृत्युका निवारण करनेवाला है। उसमें स्नान करके ब्राह्मणी जीवित हो जायगी और अन्य स्त्रियोंके साथ ही सरोवरसे बाहर निकलेगी। फिर उसका ब्राह्मणके साथ संयोग होगा।'

भगवान् श्रीनिवासका यह वचन सुनकर राजा अपने नगरमें गये और सुन्दर-सुन्दर डोलियोंमें अपनी रानियोंको तथा एक डोलीमें मरी हुई ब्राह्मणीको भी बैठाकर ब्राह्मणको आगे करके वहाँसे भगवान्‌का दर्शन करनेके लिये चले। अस्थिकूटसरोवरपर पहुँचकर राजाने उन सब

२८२ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

स्त्रियोंको स्नान करनेकी आज्ञा दी। उनकी रानियोंने अस्थिचर्मविशिष्ट ब्राह्मणीको भी सरोवरमें डाल दिया। फिर तो वह जी उठी। उसके शरीरके सभी चिह्न पूर्ववत् प्रकट हो गये। तत्पश्चात् वह मंगलमयी ब्राह्मणी रानियोंके साथ नहाकर सरोवरसे बाहर आयी और तीर्थयात्रासे पुनः लौटे हुए अपने स्वामी ब्राह्मणदेवतासे प्रसन्नतापूर्वक मिली। राजाने भगवान्‌की पूजा करके ब्राह्मणको धन दिया। एक हजार स्वर्णमुद्रा और भाँति-भाँतिके वस्त्र देकर स्वदेश जानेके लिये उन ब्राह्मणदम्पतिको सादर विदा किया। ब्राह्मणने जब अपनी स्त्रीका समाचार और भगवान् वेंकटेश्वरका प्रभाव सुना, तब राजाको आशीर्वाद देकर अपने देशको प्रस्थान किया।

राजा तोण्डमान भगवान् श्रीनिवासजीकी आज्ञाके अनुसार प्रतिदिन सुवर्णमय कमलोंसे उनकी पूजा किया करते थे। एक दिन उन्होंने देखा भगवान्‌के ऊपर मिट्टीका बना हुआ तुलसी-पुष्प चढ़ा हुआ है। इससे विस्मित होकर राजाने पूछा—'भगवन्! ये मिट्टीके कमल और तुलसीपुष्प चढ़ाकर कौन आपकी पूजा करता है?' उनके इस प्रकार पूछनेपर देवाधिदेव भगवान्‌ने स्मरण करके कहा—'मेरा एक भक्त कुम्हार है जो कूर्मग्राममें निवास करता है। वह अपने घरमें मेरी पूजा करता है और मैं उसे स्वीकार करता हूँ।'

भगवान्‌की यह बात सुनकर राजा उस कुम्हारको देखनेके लिये गये और कूर्मपुरमें जाकर उसके घर पहुँचे। राजाको आया देख कुम्हार उन्हें प्रणाम करके आगे खड़ा हो गया; उसका नाम भीम था। राजाने उससे पूछा—'भीम! तुम अपने कुलमें सबसे श्रेष्ठ हो, बताओ भगवान्‌की पूजा किस प्रकार करते हो?' उनके पूछनेपर कुलालने कहा—'महाराज! मैं कभी कोई पूजा नहीं जानता। भला, आपसे किसने कह दिया कि कुम्हार पूजा करता है?'

तोण्डमान बोले—स्वयं भगवान् श्रीनिवासने तुम्हारे पूजनकी बात कही है।

राजाकी बात सुनकर कुम्हारको पूर्वकालमें दिये हुए भगवान्‌के वरदानका स्मरण हो आया। उसने कहा—'महाराज! पहले भगवान् वेंकटेश्वरने मुझे यह वरदान दिया है कि 'जब तुम्हारी की हुई पूजा प्रकाशित हो जायगी, जब राजा तोण्डमान तुम्हारे द्वारपर आ जायेंगे और उनके साथ तुम्हारा संवाद होगा, तब तुम्हें मोक्ष प्राप्त हो जायगा।' यों कहकर पत्नीसहित कुम्हारने वहाँ आये हुए विमानको और उसपर बैठे हुए भगवान् जनार्दनको देखकर उन्हें प्रणाम करते हुए प्राण त्याग दिया तथा राजाधिराज तोण्डमानके देखते-देखते विमानपर बैठकर दिव्यरूप धारण करके दिव्य रूपधारिणी पत्नीके साथ वह भगवान् विष्णुके परमधामको चला गया।'

यह अद्भुत घटना देखकर राजा हर्षमें भरे हुए अपने नगरको आये और अपने श्रीनिवास नामक पुत्रका विधिपूर्वक राज्याभिषेक करके बोले—'वत्स! तुम धर्मपूर्वक सब मनुष्योंका

भक्त भीम कुम्हारका पत्नीसहित विमानारोहण

२८४ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *


पालन और पृथ्वीकी रक्षा करो।' पुत्रको यह आज्ञा देकर बुद्धिमान् राजाने बड़ी भारी तपस्या की। तपस्या करते समय भगवान्‌ने उन्हें प्रत्यक्ष दर्शन दिया। वे श्री तथा भूदेवियोंके साथ गरुड़पर आरूढ़ होकर वहाँ आये थे।

श्रीभगवान् बोले—नृपश्रेष्ठ! मैं तुम्हारी तपस्यासे बहुत सन्तुष्ट हूँ, बोलो—तुम्हारी किस इच्छाको पूर्ण करूँ?

देवाधिदेव भगवान्‌के ऐसा कहनेपर सम्राट् तोण्डमान अत्यन्त प्रसन्न हो हाथ जोड़कर गद्गद वाणीमें बोले—'माधव! मैं आपके जरा-मृत्यु-रहित धाममें निवास करना चाहता हूँ, मुझे यही मनोवांछित वरदान दीजिये।' ऐसा कहकर राजा भगवान्‌के समीप पृथ्वीपर साष्टांग पड़ गये और शरीर त्यागकर विमानपर जा बैठे। उस समय गन्धर्वगण उनकी स्तुति कर रहे थे। राजा भगवान् विष्णुका सारूप्य प्राप्त करके शोक-मोहरहित, जरा-मरणवर्जित तथा पुनरावृत्तिशून्य वैकुण्ठधामको चले गये।

सूतजी कहते हैं—देवाधिदेव भगवान् वाराहके द्वारा कहे हुए इस भविष्य-प्रसंगको जो सुनता है तथा पुण्यमयी पुराणकथाका भक्तिपूर्वक पाठ करता है, वह सब कामनाओंको भोगकर अन्तमें भगवान् विष्णुके परमपदको प्राप्त होता है।


## राजा परीक्षित्‌को ब्राह्मणका शाप, तक्षकके काटनेसे उनकी मृत्यु तथा उनकी रक्षा न करनेके पापसे कलंकित काश्यप ब्राह्मणका स्वामिपुष्करिणीमें स्नान करके शुद्ध होना

श्रीसूतजी कहते हैं—महर्षियो! अब मैं श्रीस्वामिपुष्करिणीके माहात्म्यका प्रतिपादन करनेवाला इतिहास कहता हूँ, जो इसे पढ़नेवालोंके भी पापका नाश करनेवाला है। अभिमन्युके पुत्र राजा परीक्षित् धर्मके अनुसार इस पृथ्वीका पालन करते हुए हस्तिनापुरमें निवास करते थे। एक समय वे मृगयामें अनुरक्त होकर वनमें घूम रहे थे। उस समय उनकी अवस्था साठ वर्षकी हो गयी थी। वे भूख और प्याससे पीड़ित थे। घूमते-घूमते उन्होंने एक ध्यानमग्न मुनिको देखकर पूछा—'मुने! मैंने इस समय वनमें अपने बाणसे एक मृगको घायल किया है। वह भयसे कातर होकर भाग गया है। क्या आपने उसे देखा है?' मुनिकी समाधि लग गयी थी, उन्होंने मौन रहनेका व्रत भी लिया था, इस कारण राजाको कुछ भी उत्तर नहीं दिया। तब राजाने कुपित हो एक मरे हुए साँपको धनुषसे उठाकर मुनिके कंधेपर रख दिया और अपने नगरकी राह ली। मुनिके एक पुत्र था, जिसका नाम शृंगी रखा गया था। शृंगीके कृष नामवाला कोई श्रेष्ठ द्विज मित्र था। उसने विवादमें अपने मित्र शृंगीसे व्यंगपूर्वक कहा—'सखे! तुम्हारे पिता इस समय मरा हुआ साँप कंधेपर ढो रहे हैं। तुम बहुत घमंड न दिखाया करो और मेरे आगे यह व्यर्थ क्रोध न किया करो।'

यह सुनकर शृंगी कुपित हो उठा और शाप देते हुए बोला—'जिस मूढ़बुद्धि मानवने मेरे पिताके कंधेपर मरा हुआ साँप रखा है, वह सातवें दिन तक्षक नागके काटनेपर मृत्युको प्राप्त होगा।' इस प्रकार उस मुनिकुमारने उत्तरानन्दन परीक्षित्‌को शाप दे दिया। उसके पिता शमीक मुनिने जब यह सुना कि मेरे पुत्रने राजाको शाप दिया है, तब वे उससे बोले—'अरे! समस्त लोगोंकी रक्षा करनेवाले राजाको तूने क्यों शाप दिया? राजाके न रहनेपर हमलोग संसारमें सुखपूर्वक कैसे रह

* वैष्णवखण्ड-भूमिवाराहखण्ड * २८५


सकेंगे? क्रोधसे पाप होता है और दयासे सुख मिलता है। जो मनुष्य मनमें आये हुए क्रोधको क्षमासे शान्त कर देता है, वह इहलोक और परलोकमें भी अतिशय सुखका भागी होता है। क्षमायुक्त मनुष्य ही उत्तम श्रेय प्राप्त करते हैं।' बेटेको इस प्रकार समझाकर शमीकने दौर्मुख नामवाले अपने शिष्यसे कहा—'वत्स दौर्मुख! तुम जाकर राजा परीक्षित्‌से मेरे पुत्रके दिये हुए शापका वृत्तान्त, जिसमें तक्षक नागके डँसनेकी बात है, बता दो। महामते! फिर शीघ्र मेरे पास लौट आना।'

शमीकके ऐसा कहनेपर दौर्मुखने उत्तराकुमार राजा परीक्षित्‌के पास जाकर कहा—राजन्‌! आपके द्वारा पिताके कंधेपर रखे हुए मृतक सर्पको देखकर, शमीकके पुत्र शृंगी ऋषिने रोषमें आकर आपको यों शाप दिया है—'आजसे सातवें दिन अभिमन्युपुत्र परीक्षित् महानाग तक्षकके काटनेपर उसकी विषाग्निसे जलकर भस्म हो जायँ।' राजासे ऐसा कहकर दौर्मुख शीघ्र लौट गया। उसके जानेपर राजाने गंगाकी बीच धारामें एक ही खंभेका एक बहुत ऊँचा और विस्तृत मण्डप बनवाया और भगवान्‌ विष्णुके प्रति भक्तिभाव बढ़ाते हुए अनेक देवर्षि, ब्रह्मर्षि तथा राजर्षियोंके साथ वे उस ऊँचे मण्डपमें रहने लगे। उसी अवसरपर मन्त्र जाननेवालोंमें श्रेष्ठ काश्यप नामवाला ब्राह्मण तक्षकके महान् विषसे राजाकी प्राणरक्षा करनेके लिये सातवें दिन वहाँ जा रहा था। दरिद्र होनेके कारण वह राजासे धन पानेकी इच्छा रखता था। इसी बीचमें तक्षक नाग भी ब्राह्मणका रूप धारण करके आ गया। मार्गमें काश्यपको देखकर उसने पूछा—'ब्रह्मन्‌! महामुने! तुम कहाँ जाते हो? मुझे बताओ।' काश्यपने उत्तर दिया—आज महाराज परीक्षित्‌को तक्षक नाग अपनी विषाग्निसे जलायेगा। उसकी विषाग्निको शान्त करनेके लिये मैं महाराजके समीप जाता हूँ।'


तक्षक बोला—विप्रवर! मैं ही तक्षक हूँ। मैं जिसे काट लूँ, उसकी चिकित्सा सौ वर्षोंमें भी, दस हजार महामन्त्रोंसे भी नहीं हो सकती। यदि तुममें मेरे काटे हुए को भी अपनी चिकित्साद्वारा जिला देनेकी शक्ति है, तो बहुत ऊँचे इस वृक्षको मैं डँसता हूँ, तुम जिला दो।

यों कहकर तक्षकने उस वृक्षको काट लिया। उसके डँसते ही वह अत्यन्त ऊँचा वृक्ष जलकर भस्म हो गया। उस वृक्षपर पहलेसे ही कोई मनुष्य चढ़ा हुआ था, वह भी तक्षकके विषकी ज्वालाओंसे दग्ध हो गया। तब मन्त्रज्ञोंमें श्रेष्ठ काश्यपने अपनी मन्त्रशक्तिसे उस जले हुए वृक्षको भी जिला दिया। उसके साथ ही वह मनुष्य भी जी उठा। यह देख तक्षकने मन्त्रकुशल काश्यपसे कहा—'ब्रह्मन्‌! राजा तुम्हें जितना धन दे सकते हैं, उससे दूना मैं देता हूँ। इसे लेकर शीघ्र लौट जाओ।' यों कहकर तक्षकने उसे बहुमूल्य रत्न देकर लौटा दिया।

तत्पश्चात् तक्षकने सब सर्पोंको बुलाकर कहा—'तुम सब लोग मुनियोंके वेष धारण करके राजाके पास जाओ और उन्हें भेंटमें फल समर्पित

२८६* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

करो।' 'बहुत अच्छा' कहकर सभी राजाको फल देने लगे। उस समय तक्षक भी किसी बेरके फलमें कृमिका रूप धारण करके राजाको डँसनेके लिये बैठ गया। ब्राह्मणरूपी सर्पोंके दिये हुए सभी फल राजा परीक्षित्‌ने बूढ़े मन्त्रियोंको देकर कौतूहलवश एक मोटे फलको हाथमें ले लिया। इसी समय सूर्य भी अस्ताचलपर पहुँच गये। उस फलमें सब लोगोंने तथा राजाने भी एक लाल रंगका कीट देखा, वही तक्षक था। उसने शीघ्र ही फलसे निकलकर राजाके शरीरको लपेट लिया। यह देख आसपास बैठे हुए सब लोग भयसे भाग गये। ब्राह्मणो! तक्षककी अत्यन्त प्रबल विषाग्निसे राजा परीक्षित् मण्डपसहित तत्काल जलकर भस्म हो गये। पुरोहित और मन्त्रियोंने उनका और्ध्वदेहिक संस्कार करके प्रजाकी रक्षाके लिये उनके पुत्र जनमेजयको राजाके पदपर अभिषिक्त कर दिया।

तक्षकसे राजाकी रक्षा करनेके लिये जो काश्यप नामक ब्राह्मण आया था, उसकी सब लोग निन्दा करने लगे। अन्तमें वह शाकल्य मुनिकी शरणमें गया और उन्हें प्रणाम करके बोला—'भगवन्! आप सब धर्मोंके ज्ञाता और भगवान् विष्णुके प्रिय भक्त हैं। ये मुनि, ब्राह्मण, सुहृद् तथा अन्य लोग जो मेरी निन्दा करते हैं, इसका क्या कारण है, यह मैं नहीं जानता। यदि आप जानते हों तो बतायें।' तब महामुनि शाकल्यने क्षणभर ध्यान करके काश्यपसे कहा—'तुम तक्षकसे महाराज परीक्षित्‌को बचानेके लिये जा रहे थे, किंतु आधे मार्गमें तक्षकने तुम्हें मना कर दिया। जो मनुष्य विष, रोग आदिकी चिकित्सा करनेमें समर्थ होकर भी काम, क्रोध, भय, लोभ, मात्सर्य अथवा मोहसे विष एवं रोगसे पीड़ित मनुष्यकी रक्षा नहीं करता, वह ब्रह्महत्यारा, शराबी, चोर, गुरुपत्नीगामी तथा इन सबके संसर्गदोषसे दूषित है। उसके उद्धारका कोई उपाय नहीं है। महाराज परीक्षित् पवित्र यशवाले, धर्मात्मा, विष्णुभक्त, महायोगी तथा चारों वर्णोंकी रक्षा करनेवाले थे। उन्होंने व्यासपुत्र शुकदेवजीसे भक्तिपूर्वक श्रीमद्भागवतकी कथा सुनी थी। ऐसे पुण्यात्मा राजाकी रक्षा न करके जो तुम तक्षकके कहनेसे (धन लेकर) लौट गये उसी कारणसे श्रेष्ठ ब्राह्मण और बन्धु-बान्धव तुम्हारी निन्दा करते हैं। मरनेवाले मनुष्यके प्राण जबतक कण्ठमें रहते हैं, तबतक उसकी चिकित्सा करनी चाहिये। तुम चिकित्सा करनेमें समर्थ होकर भी उनकी दवा किये बिना ही आधे मार्गसे लौट आये। इसलिये तुम वास्तवमें निन्दाके पात्र हो।'

काश्यप बोले—उत्तम व्रतका पालन करनेवाले शाकल्यजी! मेरे दोषकी शान्तिके लिये कोई उपाय बताइये। जिससे मेरे बन्धु-बान्धव और सुहृद् मुझे ग्रहण करें। आप भगवान्‌के प्रिय भक्त हैं, मुझपर अवश्य कृपा करें।

तब मुनिवर शाकल्यने क्षणभर ध्यान करके कृपापूर्वक काश्यपसे कहा—ब्रह्मन्! इस पापकी शान्तिके लिये मैं तुम्हें एक उपाय बताता हूँ। सुवर्णमुखरी नदीके तटपर भगवान् लक्ष्मीपतिकी निवासभूमि है, उसका नाम वेंकटाचल है, जो सब लोगोंमें पूजित है। उसका दूसरा नाम शेषाचल भी है। वह परमपवित्र तथा देवता और दानवोंसे भी वन्दित है। ब्रह्महत्या, सुरापान तथा सुवर्णकी चोरी आदि बड़े-बड़े पापोंका वह नाश करनेवाला है। उसी पर्वतपर स्वामिपुष्करिणी है, जो सब पापोंका निवारण करनेवाली है। वह मंगलदायिनी पुष्करिणी भगवान् श्रीनिवासके स्थानसे उत्तर दिशामें है। तुम वेंकटाचलपर जाकर कल्याणमयी स्वामिपुष्करिणीमें संकल्पपूर्वक स्नान करो। फिर पश्चिम तटपर बसे हुए वाराह-स्वामीकी सेवा करके भगवान्‌के मुख्य मन्दिरमें

  • वैष्णवखण्ड-भूमिवाराहखण्ड * २८७

जाओ। वहाँ भक्तोंको अभय प्रदान करनेवाले शंख-चक्रधारी वनमालाविभूषित स्वर्णाचलनिवासी भगवान् श्रीनिवासका विधिपूर्वक दर्शन करके तुम सब पापोंसे मुक्त हो जाओगे।

यह सुनकर मुनिवर काश्यपने देव-दानववन्दित स्वामिपुष्करिणीमें नियमपूर्वक स्नान किया। इससे वे शुद्ध और स्वस्थ हो गये। फिर सब बन्धु-बान्धवोंने उनका विधिपूर्वक पूजन करके कहा—'आप निःसन्देह हमारे पूज्य हैं।' ब्राह्मणो! इस प्रकार मैंने आपलोगोंसे वेंकटाचलकी महिमाका वर्णन किया है। जो मनुष्य भक्तिपूर्वक इसे सुनता है, वह विष्णुलोकमें प्रतिष्ठित होता है।

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स्वामितीर्थकी महिमा और उसमें स्नान करनेसे राजा धर्मगुप्तके शापजनित उन्मादका निवारण

ऋषि बोले—सूतजी! आप स्वामिपुष्करिणी तीर्थकी महिमाका पुनः वर्णन कीजिये।

सूतजीने कहा—जो लोग स्वामितीर्थमें स्नान करते हैं, वे तामिस्र, अन्धतामिस्र, महारौरव, रौरव, कुम्भीपाक, कालसूत्र, असिपत्रवन, कृमिभक्ष, अन्धकूप, सन्दंश, शाल्मलि, लालाभक्ष, अवीचि, सारमेयादन, वज्रकण्टक, क्षारकर्दमपातन, रक्षोगणान्न, शूलप्रोतनिरोधन, तिरोधान, सूचीमुख, पूयभक्ष, शोणितभक्ष और विषाग्निपरिपीडन आदि अट्ठाईस नरकोंमें नहीं जाते। जो दूसरोंके धन, सन्तान और स्त्रियोंका अपहरण करनेवाला है, वह बहुत वर्षोंतक तामिस्र नामक भयंकर नरकमें डाला जाता है। जो अधम मनुष्य माता-पिता और ब्राह्मणोंसे द्वेष रखता है, वह दस हजार योजन विस्तृत कालसूत्र नरकमें डाला जाता है। जो वेदमार्गका उल्लंघन करके कुपथपर चलता है, वह यमदूतोंद्वारा भयंकर असिपत्रवनमें गिराया जाता है। जो पकवान और दाल-शाक आदि अन्न पंक्तिभेद करके खाता है और मोहवश पंचयज्ञोंका अनुष्ठान किये बिना ही भोजन करता है, वह कृमिभोजन नरकमें डाला जाता है, जहाँ सैकड़ों कीड़े उसको खाते हैं और वह भी कीड़ोंको ही खाकर रहता है। जो स्नेह अथवा बलसे ब्राह्मणका धन हड़प लेता है तथा जो राजा या राजपुरुष दूसरोंके धनका अपहरण कर लेता है, वह सन्दंश नामक भयंकर नरकमें गिराया जाता है। जो नीच मानव अगम्या स्त्रीके साथ गमन करता है, अथवा जो नारी अगम्य पुरुषके साथ संगम करती है, वे दोनों क्रमशः लोहेकी तपायी हुई नारी-मूर्ति और पुरुष-मूर्तिको आलिंगन करके तबतक खड़े रहते हैं, जबतक चन्द्रमा और सूर्यकी सत्ता रहती है। तत्पश्चात् वे सूचीनामक घोर नरकमें डाले जाते हैं। जो मनुष्य अनेक प्रयत्नों और उपद्रवोंसे सब प्राणियोंको सताता है, वह बहुत काँटोंवाले भयंकर शाल्मलि नरकमें गिराया जाता है। जो राजा अथवा राजाका नौकर पाखण्डमतका अनुयायी होकर धार्मिक मर्यादाओंको तोड़ता है, वह वैतरणी नरकमें डाला जाता है। वृषलीसंगसे दूषित, शौचाचारहीन, अशास्त्रीय कर्मोंके करनेमें लज्जित न होनेवाले, वेदमार्गके त्यागी, सदा पशुका-सा आचरण करनेवाले व्यक्तियोंको यमकिंकर पूय, विष्ठा, मूत्र, कफ और पित्तादिसे पूर्ण अत्यन्त वीभत्स नरकमें गिराते हैं। जो कुत्तोंको अथवा जंगलमें वन्य मृगादि पशुओंको बाणोंके द्वारा पीड़ा पहुँचाता है, यमकिंकर उसको बाणोंके द्वारा बींधते हैं और पुनः प्राणरोध नामक नरकमें गिराते हैं। जो पाखण्डी यज्ञमें पशुओंकी हत्या

२८८* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

करता है, वह परलोकमें वैशस नामक नरकमें गिराया जाता है। जो लुटेरोंके मार्गका आश्रय लेकर दूसरोंको जहर देता, गाँवोंको जला डालता और बनियोंके धनका अपहरण करता है, वह परलोकमें वज्रदंष्ट्र नामक भयानक नरकमें दीर्घकालतकके लिये डाल दिया जाता है। ये तथा और भी जितने नरक हैं, उन सबमें वह मनुष्य कभी नहीं पड़ता, जो स्वामिपुष्करिणी तीर्थमें गोता लगाता है। स्वामिपुष्करिणीमें एक बार स्नान करनेसे मनुष्य अश्वमेध यज्ञका फल पाता है। उसे आत्मज्ञान तथा चार प्रकारकी साक्षात् मुक्तिकी भी प्राप्ति होती है। जो महापातकों अथवा सम्पूर्ण पातकोंसे युक्त है, वह भी स्वामितीर्थमें गोता लगानेसे तत्काल पवित्र हो जाता है। स्वामितीर्थके सेवनसे मनुष्योंकी बुद्धि, लक्ष्मी, कीर्ति, सम्पत्ति, ज्ञान, धर्म और वैराग्यकी वृद्धि तथा मनकी शुद्धि होती है।

इस प्रकार अद्वैतज्ञान, भोग और मोक्ष तथा मनोवांछित कामना प्रदान करनेवाले अज्ञाननाशक स्वामितीर्थके प्रभावका वर्णन किया गया, जो मनुष्योंके समस्त पापोंका नाश करनेवाला है।

नैमिषारण्यनिवासी महर्षियो! मैं तुमलोगोंसे स्वामितीर्थकी महिमाका अभी और वर्णन करूँगा। चन्द्रवंशमें नन्द नामसे प्रसिद्ध एक महाराजा थे, जो समुद्रपर्यन्त पृथ्वीका धर्मपूर्वक पालन करते थे। उनके एक पुत्र हुआ, जिसका नाम धर्मगुप्त था। नन्दने राज्यकी रक्षाका भार अपने पुत्रपर रख दिया और स्वयं इन्द्रियोंको वशमें करके आहारपर विजय पाकर तपस्याके लिये तपोवनमें चले गये। पिताके तपोवन चले जानेपर राजा धर्मगुप्तने सारी पृथ्वीका पालन किया। वे धर्मोंके ज्ञाता और नीतिपरायण थे। उन्होंने अनेक प्रकारके यज्ञोंद्वारा इन्द्र आदि देवताओंका पूजन किया और ब्राह्मणोंको धन एवं बहुत-से क्षेत्र प्रदान किये। उनके शासनकालमें समस्त प्रजा अपने-अपने धर्मका पालन करती थी। उनके राज्यमें कभी चोर आदिसे किसीको कष्ट नहीं प्राप्त हुआ। एक दिन धर्मगुप्त उत्तम घोड़ेपर सवार हो वनमें गये। वहीं रात हो गयी। विनयशील राजाने वहीं सायं-सन्ध्याकी उपासना करके वेदमाता गायत्रीका जप किया। तत्पश्चात् सिंह, व्याघ्र आदिके भयसे वे एक वृक्षपर जा बैठे। उस वृक्षके पास एक रीछ आया, जो सिंहके भयसे पीड़ित था। वनमें विचरनेवाला एक सिंह उस रीछका पीछा कर रहा था। रीछ वृक्षपर चढ़ गया। वहाँ उसने महान् बल-पराक्रमसे सम्पन्न राजा धर्मगुप्तको बैठे देखा। उन्हें देखकर रीछ बोला—‘महाराज! भय न करो। हम दोनों रातभर यहीं रहेंगे, क्योंकि वृक्षके नीचे बड़ा भयंकर सिंह आया हुआ है। महामते! तुम आधी राततक निर्भय होकर नींद लो, मैं सजग होकर तुम्हारी रक्षा करता रहूँगा। उसके बाद जब मैं सो जाऊँ, तब शेष आधी राततक तुम मेरी रक्षा करना।'

रीछकी यह बात सुनकर धर्मगुप्त सो गये। उस समय सिंहने रीछसे कहा—‘यह राजा तो सो गया है, अब तुम इसे मेरे लिये नीचे गिरा दो।' तब धर्मज्ञ रीछने सिंहको उत्तर दिया—‘वनचारी मृगराज! तुम धर्मको नहीं जानते। अहो! विश्वासघात करनेवाले प्राणियोंको संसारमें बड़ा कष्ट भोगना पड़ता है। मित्रद्रोहियोंका पाप दस हजार यज्ञोंके अनुष्ठानसे भी नष्ट नहीं होता। ब्रह्महत्या आदि पापोंका तो किसी प्रकार निवारण हो सकता है, परंतु विश्वासघातियोंका पाप कोटिजन्मोंमें भी नष्ट नहीं हो सकता है।*


* ब्रह्महत्यादिपापानां कथञ्चिन्निष्कृतिर्भवेत्। विश्वासघातिनां पापं न नश्येज्जन्मकोटिभिः॥ (स्क० पु०, वै० वे० १३।२२)