संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
- वैष्णवखण्ड-उत्कलखण्ड * ३२७
अर्द्धाशिनी तथा लम्बा, दक्षिणमें कालरात्रि, पूर्वमें मरीचिका तथा कालरात्रिके पीछे चण्डरूपा शक्ति स्थित है। इस प्रकार इन उग्र रूपवाली आठ शक्तियोंसे यह क्षेत्र सब ओरसे सुरक्षित है। इन आठों शक्तियोंके दर्शन तथा कीर्तनसे सब पापोंका नाश होता है। रुद्राणीके आठ भेद देखकर भगवान् शंकर भी अपनेको आठ स्वरूपोंमें व्यक्त करके परमेश्वर श्रीहरिकी उपासना करते हैं। कपालमोचन, क्षेत्रपाल, यमेश्वर, मार्कण्डेयेश्वर, ईशान, बिल्वेश्वर, नीलकण्ठ और वटवृक्षकी जड़में वटेश्वर—ये आठ भगवान् शिवके लिंग हैं, जिनका दर्शन, स्पर्श और पूजन करके मनुष्य मुक्त हो जाता है। इस क्षेत्रमें जिनकी मृत्यु होती है, उनके स्वामी यमराज नहीं हैं। तथापि भक्तको आत्मसमर्पण करनेवाले शरणागत-दुःखभंजन भगवान् जगन्नाथको यमराजने अपनी भक्तिसे सन्तुष्ट कर लिया है। इसलिये मेरे और सुदर्शनचक्रके साथ भगवान् विष्णु स्वर्णबालुकासे आवृत होकर न त्यागने योग्य इस उत्तम तीर्थमें अदृश्य भावसे रहेंगे।
यमराजसे ऐसा कहकर लक्ष्मीजीने आगे खड़े हुए ब्रह्माजीसे कहा—सत्ययुगमें राजा इन्द्रद्युम्न होनेवाले हैं, जो भगवान् विष्णुके परम भक्त तथा शास्त्रोंके विद्वान् होंगे। प्रजानाथ! उस राजापर अनुग्रह करनेके लिये भगवान् एक काष्ठसे उत्पन्न चार प्रतिमाओंके रूपमें अभिव्यक्त होंगे। काष्ठकी उन प्रतिमाओंका निर्माण स्वयं विश्वकर्मा करेंगे और तुम इन्द्रद्युम्नपर प्रसन्न होकर उन प्रतिमाओंकी स्थापना कराओगे। लक्ष्मीजीकी यह बात सुनकर ब्रह्मा और यमराज दोनों परम प्रसन्न होकर अपने-अपने स्थानको चले गये। पुरुषोत्तम-क्षेत्रकी महिमाका बार-बार स्मरण करके विस्मय और हर्षसे उनके शरीरमें रोमांच हो आता था।
मुनियो! इस समय उस क्षेत्रमें इन्द्रद्युम्नकी भक्तिसे सन्तुष्ट हो नीलमेघके समान श्यामसुन्दर शंखचक्रधारी भगवान् काष्ठमय शरीर धारण करके सम्पूर्ण लोकोंका उपकार करनेके लिये नीलाचलकी गुफामें विराजमान हैं। करुणासागर भगवान् काष्ठनिर्मित बलभद्र, सुभद्रा तथा सुदर्शनचक्रकी प्रतिमाओंके साथ स्वयं भी दारुमय विग्रह धारण करके शरणागतोंकी पीड़ाका नाश करते हैं। उनका दर्शन करके मनुष्य पापोंके सुदृढ़ बन्धनसे भी मुक्त हो जाता है। भगवान् विष्णुका यह परम उत्तम स्थान अत्यन्त गुप्त है तथा वह अलौकिक प्रतिमा लौकिक रूपसे प्रकाशित है। राजा इन्द्रद्युम्नको दारुमय शरीर धारण करनेवाले भगवान्ने वर दिया है। भगवान् दीनों और अनाथोंके एकमात्र शरण हैं। भवसागरसे पार उतारनेके लिये नौका हैं। उनके चरण समस्त चराचर जगत्के लिये वन्दनीय हैं। वे ही सबके परम आश्रय हैं। भगवान् नारायण सम्पूर्ण जगत्की उत्पत्तिके स्थान तथा सृष्टि और संहारके कारण हैं। वे समस्त पापोंको छुड़ानेवाले तथा सब आपत्तियोंका नाश करनेवाले हैं। विभूतियोंका प्रसार करनेवाले तथा सब योगियोंको वरण करनेवाले हैं। सम्पूर्ण जीवोंका भरण तथा अखिल विश्वको धारण करनेवाले भी वे ही हैं। वे सब भाषाओंको बोलते और समस्त दुष्कर्मोंका विनाश करते हैं। मुनीश्वरो! तुम अनन्यभावसे उन्हीं भगवान् श्रीहरिकी शरण लो। वे चेष्टारहित काष्ठशरीर धारण करके भी दिव्य लीलाविलास करनेवाले हैं। थोड़ी-सी भक्ति करनेपर भी मनुष्योंके सौ-सौ अपराध क्षमा करते हैं।
कुरुक्षेत्रमें उत्पन्न हुए एक ब्राह्मण और एक क्षत्रिय दोनों मित्र थे। दोनोंने प्रेमपूर्वक परदेशकी यात्रा की। उनका आहार-विहार एक ही था। दोनों सदाचारके मार्गसे भ्रष्ट हो चुके थे और मोहवश शास्त्रनिषिद्ध आचरण करते थे। स्वाध्याय, वषट्कार, स्वधा (श्राद्ध-तर्पण) और स्वाहा (यज्ञ) इनसे वे कोसों दूर थे। महापातकोंसे कलंकित
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होकर वे मदिरा पीते और वेश्याके सहवासमें रहकर आनन्दका अनुभव करते थे। परलोककी चिन्ता तो उन्हें कभी स्वप्नमें भी नहीं होती थी। इसी प्रकार मनमाना बर्ताव करते हुए उनकी आधी आयु बीत गयी। एक दिन घूमते हुए वे दोनों यज्ञशालामें जा पहुँचे और दूरसे ही स्तोत्र तथा शास्त्रचर्चा सुनने लगे। वहाँ होनेवाली वैदिक क्रियाओंको देखकर उस समय उन अधार्मिकोंके मनमें भी धर्मके प्रति श्रद्धा हो गयी। उनका नाम पुण्डरीक और अम्बरीष था। वे अपनी उच्च जातिका स्मरण करके अपने दुराचारोंकी निन्दा करते हुए एक-दूसरेसे कहने लगे—'हम दोनों पापके भयंकर समुद्रको कैसे पार करेंगे?' हमने जो-जो पाप संचित किये हैं, उनको शास्त्र भी नहीं जानता। उन घोर पापोंका प्रायश्चित्त अत्यन्त दुर्लभ है तथापि इस यज्ञसभामें जो ये ब्रह्मनिष्ठ पधारे हुए हैं, उन्हें प्रणामसे प्रसन्न करके हम अपने उद्धारका उपाय पूछें।'
ऐसा निश्चय करके उन दोनोंने ब्राह्मणोंको प्रणाम किया और अपने-अपने पापोंको ठीक-ठीक बताकर उनसे प्रायश्चित्त पूछा। उन दोनोंकी बातें सुनकर उन श्रेष्ठ ब्राह्मणोंने आँखें बंद कर लीं। किसीने कुछ भी नहीं कहा। उनके बीच एक श्रेष्ठ वैष्णव थे, जो उस यज्ञसभामें प्रधान थे। भगवान्की भक्तिके माहात्म्यसे उन्होंने समस्त पापोंका नाश कर दिया था। वक्ताओंमें श्रेष्ठ उन वैष्णव ब्राह्मणने हँसकर वहाँ बैठे हुए उन दोनोंसे कहा—'हे ब्राह्मण! और हे क्षत्रियकुमार! यदि तुम दोनों अत्यन्त भयंकर पापराशिसे छुटकारा पाना चाहते हो तो शीघ्र पुरुषोत्तमक्षेत्रमें चले जाओ। वह सब क्षेत्रोंसे उत्तम है, जहाँ राजर्षि इन्द्रद्युम्नकी भक्तिसे उनपर अनुग्रह करनेवाले भगवान् पुरुषोत्तम काष्ठमय शरीर धारण करके रहते हैं। शंख, चक्र और गदा धारण करनेवाले उन भगवान् जगन्नाथकी आराधना करके तुम इच्छानुसार पापक्षय और मोक्ष भी पा सकोगे, यह ध्रुव सत्य है। उनका दर्शन करनेसे सब पाप एक साथ ही नष्ट हो जाते हैं। इसलिये परम पवित्र उत्कलदेशमें दक्षिण समुद्रके तटपर नीलाचलके शिखरपर निवास करनेवाले सर्वव्यापी भगवान् जगदीशकी शरणमें जाओ। वे करुणानिधान भगवान् तुम दोनोंका मनोरथ अवश्य सिद्ध करेंगे।'
वैष्णव महात्माके इस प्रकार आदेश देनेपर वे ब्राह्मण और क्षत्रिय अत्यन्त हर्षयुक्त हो उसी मार्गसे पुरुषोत्तमक्षेत्रको चल दिये।
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पुण्डरीक और अम्बरीषद्वारा भगवान्की स्तुति तथा पुरुषोत्तमक्षेत्रमें रहकर भजन करनेसे उनकी मुक्तिका वर्णन
जैमिनीजी कहते हैं—उन दोनोंके मनमें निर्वेद (खेद एवं वैराग्य)-का उदय हुआ था। वे कुसंग छोड़कर मन-ही-मन भगवान् विष्णुका ध्यान करते हुए तथा शुद्ध आहार और व्रतका पालन करते हुए कुछ समयमें भगवान् पुरुषोत्तमके नीलाचल-निवासपर पहुँचे। वहाँ तीर्थराजके जलमें विधिपूर्वक स्नान करके वे मन्दिरके दरवाजेपर खड़े हो गये और साष्टांग प्रणाम करके भगवान्का निरीक्षण करने लगे। परंतु उस समय उन्हें भगवद्विग्रहका दर्शन नहीं हुआ। तब चिन्तासे व्याकुल होकर उन्होंने भगवान्का दर्शन जबतक न हो जाय तबतकके लिये अनशन आरम्भ किया और भगवान्के पापनाशक नामोंका कीर्तन करने लगे। तीसरी रात्रिमें उन्हें एक ज्योतिका दर्शन हुआ। तत्पश्चात् वे पुनः तीन दिनोंतक धैर्यपूर्वक उपवास करते रहे। इस प्रकार
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जब सातवीं रात्रि आयी, तब उन्हें भगवत्स्वरूपका दर्शन हुआ। उनके भीतर दिव्य ज्ञान प्रकट हुआ और वे पापसे छूटकर साक्षात् भगवान् जगन्नाथका दर्शन करने लगे। भगवान्के हाथोंमें शंख, चक्र और गदा विराजमान थे। वे दिव्य वस्त्राभूषणोंसे विभूषित थे। उन्होंने अपने चरणकमलोंको रत्नमयी पादुकाके ऊपर रखा था। खिले हुए कमलके समान विशाल नेत्र शोभा पा रहे थे। मुखपर प्रसन्नता छायी हुई थी। बायीं ओर श्रीलक्ष्मीजी विराजमान थीं। आगे खड़े होकर भगवत्स्वरूपका ध्यान करनेवाले प्रह्लाद आदि वैष्णवोंको, जो कि भगवान्का चित्त अपनी ओर आकृष्ट कर रहे थे, भगवान् श्रीहरि मानो अपने श्रीविग्रहमें धारण कर रहे थे। वक्षःस्थलपर शोभा पानेवाली कौस्तुभमणिमें प्रतिबिम्बित हुए देवता आदिके द्वारा मानो भगवान् अपनी विश्वमय मूर्तिका प्रकाश कर रहे थे। इस प्रकार भगवान्की झाँकी करके वे ब्राह्मण और क्षत्रिय क्षणभरमें सब विद्याओंके पारंगत विद्वान् हो गये। उन्होंने तीन बार देवेश्वर विष्णुकी परिक्रमा करके दोनों हाथ जोड़कर उन्हें साष्टांग प्रणाम किया और अत्यन्त प्रसन्न होकर स्तुति प्रारम्भ की।
पुण्डरीक बोले—जगदाधार ! आपको नमस्कार है। आप सृष्टि, पालन और संहारके कारण हैं। परमात्मन् ! नारायण ! आप सबको शरण देनेवाले हैं। आपको नमस्कार है। एकमात्र आप ही परमार्थ हैं। उत्पत्ति और नाश आदि विकार आपसे सर्वथा दूर हैं। ध्यानरूपी नेत्रोंसे देखनेवाले महात्मा आपको नित्यानन्दस्वरूप मानते हैं। आप चैतन्यमात्र सम्पूर्ण जगत्के स्वामी, सबके अधिष्ठान तथा परसे भी परे हैं। आपका स्वरूप अत्यन्त निर्मल है। मूढ़ हृदयवाले मनुष्य आपको कैसे जान सकते हैं? नाथ! मैं अत्यन्त दीन होकर आपकी शरणमें आया हूँ, मुझपर दया कीजिये। मैं अज्ञानी, पापाचारी तथा संसार-समुद्रमें डूबा हुआ हूँ, मेरा उद्धार कीजिये। ब्रह्माण्डमें आपके समान दूसरा कौन बन्धु है, जो अपने स्वार्थकी अपेक्षा न रखकर दीनों और अनाथोंपर दया करता हो? जो मूढ़ योग और क्षेमकी इच्छा रखकर अनायास ही मोक्ष प्रदान करनेवाले आपकी उपासना करते हैं, वे आपकी मायासे मोहित हैं। जगन्नाथ ! अकस्मात् लिया हुआ आपका 'नारायण' नाम धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—चारों पुरुषार्थोंकी सिद्धि अकेले ही कर देता है। नाथ ! संसार-सागरमें डूबे हुए लोगोंके लिये एकमात्र आप ही शरण हैं। आप अनन्य भक्तिसे चिन्तन करनेपर ज्ञानरूपी नौकापर आरूढ़ हो करुणाकी पतवार हाथमें लेकर अचेतन प्राणीको संसार-समुद्रके दूसरे पार पहुँचानेमें अकेले ही समर्थ हैं। भगवन् ! मुझे अपने चरणकमलोंके प्रति दृढ़ भक्ति प्रदान कीजिये, जिससे मैं इस अत्यन्त दुस्तर भयंकर संसार-समुद्रके पार हो जाऊँ। धर्म, अर्थ और काम इस त्रिवर्गका सेवन केवल मन्दबुद्धि पुरुष ही करते हैं। ये तीनों बहुत क्षुद्र हैं और अहितकर एवं अल्प सुख प्रदान करनेवाले हैं। अतः इनसे मेरा कोई प्रयोजन नहीं है। मुझे तो आप अब अपने युगल चरणारविन्दोंके चिन्तनसे बढ़े हुए घनीभूत आनन्दके समुद्रमें अवगाहन करनेकी आज्ञा दीजिये।
इस प्रकार स्तुति करके ब्राह्मण पुण्डरीक अश्रुगद्गद वाणीसे 'त्राहि कृष्ण' की पुकार लगाते हुए भगवान् जगन्नाथके चरणकमलोंमें गिर पड़े। तत्पश्चात् क्षत्रियकुमार अम्बरीषने उठकर हाथ जोड़े हुए इस प्रकार स्तवन किया।
अम्बरीष बोला—देव ! सर्वात्मन् ! मुझपर प्रसन्न होइये। आपके मस्तक और भुजाएँ असंख्य हैं। नासिका, नेत्र और हाथ-पैरोंकी भी कोई संख्या नहीं है। आपको नमस्कार है। विश्वमूर्ते ! आप छत्तीस तत्त्वोंसे परे हैं। प्रपंचसे रहित होते
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हुए भी इसके विस्तारमें सहायक हैं। जरायुज, अण्डज, स्वेदज और उद्भिज्ज—इन चार प्रकारके प्राणियोंसे भरे हुए जगत्के आप ही आश्रय हैं। आपको नमस्कार है। जिनके चरणोंसे प्रकट हुई गंगा तीनों लोकोंको पवित्र करती है, जिनका नाम ब्रह्महत्या आदि पापोंकी निश्चित शुद्धि करनेवाला है तथा कीर्तन करनेपर सबको कल्याण प्रदान करता है, उन कल्याणस्वरूप आप परमात्माको नमस्कार है। देव! केवल आपके नामकीर्तनसे भी सब प्रकारकी सिद्धियाँ प्राप्त हो जाती हैं। बुद्धिशाली विद्वान् पुरुष कौतूहलपूर्वक आपकी खोज करते हैं। नाथ! आपके चरणकमलोंके जल (चरणोदक)-का आश्रय लेनेपर वह सन्तापको हर लेता है। मैं तीनों तापोंसे पीड़ित हूँ। अपने इन युगल चरणोंमें मेरी भक्ति दृढ़ कर दीजिये। मेरा दूसरा कोई स्वामी नहीं है तथा मेरे माँगने योग्य दूसरी कोई वस्तु ही नहीं है। जगन्नाथ! मैं आपके चरणोंमें सहस्रों बार प्रणाम करके यह याचना करता हूँ कि जबतक मैं प्राण धारण करूँ तबतक आपके इन युगल चरणकमलोंमें ही मेरी दृढ़ भक्ति बनी रहे। आपके ये चरण ही समस्त पुरुषार्थोंके बीज हैं। इन चरणोंकी भक्ति करके ब्रह्माजीने यह सृष्टि की है, रुद्रदेव सबका संहार करते हैं तथा लक्ष्मीजी सबको ऐश्वर्य प्रदान करती हैं। दीनोंपर दया करनेवाले प्रभो! मैं अनन्यचित्त होकर आपके उन्हीं चरणोंकी भक्ति माँगता हूँ। अनादि अविद्याके इस दुस्तर एवं सुदृढ़ पंकमें डूबकर मैं कोई आश्रय न मिलनेके कारण नष्ट हो रहा हूँ। जगन्नाथ! इससे मेरा उद्धार करनेके लिये आपकी महामहिमामयी भक्तिके सिवा दूसरा कोई आश्रय नहीं है। आपकी भक्तिको छोड़कर कोई भी साधन प्राणियोंका उद्धार करनेमें समर्थ नहीं है। स्वामिन्! आपके अतिरिक्त दूसरा कोई मुझे शरण देनेवाला नहीं है। प्रभो! मुझ शरणागतपर कृपा कीजिये।
इस प्रकार स्तुति करते हुए अम्बरीष भगवान् जगन्नाथके चरण-कमलोंके समीप 'प्रभो! प्रसन्न होइये, प्रसन्न होइये' ऐसा बार-बार कहकर दण्डकी भाँति गिर पड़ा। तदनन्तर पुण्डरीक और अम्बरीषने जब पुनः नेत्र खोले तब चर्मचक्षुसे दिव्य सिंहासनपर विराजमान नीलमेघके समान श्यामसुन्दर भगवान् पुरुषोत्तमको देखा। उनके नेत्र खिले हुए कमलके समान विशाल थे। अधर लाल और नासिका मनोहर थी। उनके कानोंमें दिव्य कुण्डल झिलमिला रहे थे। भगवान्ने अपने चारों हाथोंमें शंख, चक्र, गदा और पद्म धारण कर रखे थे। वे वनमालासे विभूषित थे। उनका वक्षःस्थल ऊँचा दिखायी देता था। कण्ठमें परम सुन्दर हार शोभा पा रहे थे। मस्तकपर बहुमूल्य मुकुट प्रकाशमान था। वक्षमें श्रीवत्सका चिह्न और कौस्तुभमणि शोभा दे रहे थे। भुजाओंमें उन्होंने दिव्य अंगद (भुजबंद) धारण कर रखे थे। उनकी विशाल भुजाएँ घुटनोंतक लंबी थीं। वे दीनों और दुखियोंकी रक्षाके लिये सदैव उद्यत प्रतीत होते थे। उनकी कटिमें दिव्य पीताम्बर शोभा पाता था। उसके ऊपर सोनेकी करधनी बँधी हुई थी, जिसकी बिचली गाँठमें मणि पिरोयी गयी थी। भगवान् दिव्य हार और दिव्य चन्दनसे विभूषित थे। वे सुवर्णमय कमलके आसनपर विराजमान थे। उनके सब अंगोंमें अनुपम शोभाका निवास था। वे शरणागतोंका सन्ताप हरनेके लिये महान् सुधासागरके समान प्रतीत होते थे। भलीभाँति खिले हुए कल्पवृक्षके समान वे सम्पूर्ण मनोवांछित फलोंको देनेवाले थे। उनके दक्षिण भागमें हलमय शस्त्र धारण करनेवाले भगवान् बलभद्र बैठे थे। जिन्होंने अपने महान् बलसे समस्त ब्रह्माण्डका भार धारण किया है, वे बलभद्रजी नागराज शेषके रूपमें शोभा पाते थे। मस्तकपर सात फन उन्हें सुशोभित करते थे। वे कैलाशशिखरके समान ऊँचे और श्वेतवर्ण थे। उनके कानोंमें कुण्डल प्रकाशित हो रहा था।
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गलेमें विचित्र वनमाला थी। उन्होंने दिव्य नीलवस्त्र पहन रखा था। उनकी पीठ नीची और छाती ऊँची थी। वे सम्पूर्ण शरीरको कुण्डलित करके बैठे थे। उनके चारों हाथोंमें भी शंख, चक्र, गदा और पद्म शोभायमान थे। अनेक प्रकारके अलंकार धारण करनेसे वे और भी सुन्दर प्रतीत होते थे। भगवान् बलभद्र प्रणाम करनेवालोंके समस्त पापोंका नाश करनेवाले हैं। इन दोनोंके मध्यभागमें कुंकुमके समान लाल वर्णवाली कल्याणमयी सुभद्रादेवी विराजमान थीं, जो सम्पूर्ण लावण्यका निवासस्थान जान पड़ती थीं। समस्त देवता उनके चरणोंमें मस्तक झुकाते थे। उन्होंने अपने हाथोंमें कमल धारण कर रखा था। वे दिव्य आभूषणोंसे विभूषित थीं। सुभद्रा भी शरणागतोंके लिये कल्पवृक्ष हैं। समस्त पापोंका नाश करनेवाली हैं तथा संसार-समुद्रमें डुबे हुए मनुष्योंको पार उतारनेवाली और देवताओंको भी तारनेवाली हैं। भगवान् पुरुषोत्तमके वामभागमें उत्तम चक्र प्रकाशित होता था। श्रेष्ठ काष्ठसे निर्मित तथा स्वर्णके संयोगसे परम उज्ज्वल चार स्वरूपोंमें स्थित भगवान् पुरुषोत्तमका प्रातःकालका दर्शन करके उन ब्राह्मण और क्षत्रियकुमारोंने अपने परिश्रमको सार्थक माना और पूर्वोक्त स्वप्नलीलाका स्मरण करके वे बड़े विस्मयको प्राप्त हुए और सोचने लगे 'यह काष्ठकी प्रतिमा नहीं, यहाँ तो साक्षात् ब्रह्म प्रकाशमान | हैं।' उस समय उन्होंने यज्ञसभामें आये हुए ब्राह्मणोंकी बातपर पूर्ण विश्वास किया और आपसमें कहा— 'कहाँ हम दोनों महापातकी क्रमशः यमयातना भोगनेके अधिकारी और कहाँ देवताओंसे सेवित भगवान् विष्णुका दर्शन! हम तो निरे मूर्ख थे। इस समय अठारह विद्याओंमें प्रवीण हो गये हैं। इसलिये यह भ्रम नहीं, वास्तविक ज्ञान है। यथार्थवादी ब्राह्मणोंने जो कहा था कि तीर्थराज समुद्रके तटपर साक्षात् ब्रह्म विराजमान हैं और वटवृक्षकी जड़में ये सदा प्रकाशमान होते हैं। उनके दर्शनसे सब प्राणी मुक्त हो जाते हैं, उन सब बातोंका आज प्रत्यक्ष अनुभव हुआ। ये वही भगवान् जगन्नाथ हैं, जो चार स्वरूपोंमें स्थित हुए हैं। पृथ्वीपर जब ये अवतार लेते हैं, तब चार रूपोंमें प्रकाशित होते हैं। अब हम दोनों जबतक प्राण धारण करेंगे, इन्हींके समीप रहेंगे। क्षुद्र कामनाओंसे मुँह मोड़कर अन्यत्र जानेका नाम भी न लेंगे।'<br><br>ऐसा निश्चय करके वे दोनों भगवान् विष्णुके भजनमें तत्पर हो गये। सदा नारायणका नाम जपते हुए उन्होंने मोक्ष प्राप्त कर लिया। यह पापनाशक चरित्र अत्यन्त गोपनीय है। इस तीर्थके प्रसंगसे मैंने इसका वर्णन किया है। जो मनुष्य पुण्डरीक और अम्बरीषके इस चरित्रको सुनते और कहते हैं, वे परम आनन्दके साथ भगवान् विष्णुके परमधामको प्राप्त होते हैं।
## उत्कल देशके भव्य रूपका परिचय, राजा इन्द्रद्युम्नका एक तीर्थयात्रीसे पुरुषोत्तमक्षेत्रकी महिमा सुनकर पुरोहितके भाईको वहाँ भेजना और उनका नीलाचलके समीप शबरसे वार्तालाप
**मुनियोंने पूछा—** द्विजश्रेष्ठ! जहाँ काष्ठप्रतिमाके रूपमें साक्षात् भगवान् नारायण विराजमान हैं, वह पुरुषोत्तमक्षेत्र किस देशमें है? | **जैमिनिजीने उत्तर दिया—** उत्कल (उड़ीसा) नामसे प्रसिद्ध एक परम पावन देश है, जहाँ अनेक तीर्थ और बहुत-से पवित्र देवमन्दिर हैं।
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वह प्रदेश दक्षिण समुद्रके तटपर बसा हुआ है। उसमें रहनेवाले पुरुष सदाचारके आदर्श हैं। वहाँके ब्राह्मण उत्तम आचार और स्वाध्यायसे सम्पन्न हो सदा यज्ञकर्ममें संलग्न रहते हैं। सृष्टिके आदिमें यज्ञ और वेदाध्ययनकी प्रवृत्ति वहींसे होती है, अतः वहाँके निवासी ब्राह्मण वेद-शास्त्रोंके प्रवर्तक हैं। उस देशको अठारह विद्याओंकी निधि बताया गया है। वहाँ भगवान् नारायणकी आज्ञासे घर-घरमें लक्ष्मीका वास है। उस देशके निवासी मनुष्य लज्जाशील, विनयी, चिन्ता तथा रोगसे रहित, पिता-माताके सेवक, सत्यवादी तथा विष्णुभक्त होते हैं। वहाँ कोई भी ऐसा पुरुष नहीं होगा, जो विष्णुका भक्त एवं आस्तिक न हो। उस देशके सब लोग परोपकारी होते हैं। लोभी, दुष्ट और शठ मनुष्योंका वहाँ सर्वथा अभाव है। उस प्रदेशके लोग दीर्घजीवी होते हैं। स्त्रियाँ पतिव्रता, सुशीला, धर्मपरायणा, लज्जा और सदाचारसे विभूषित, रूपवती, सब प्रकारके आभूषणोंसे अलंकृत तथा कुल, शील और वयके अनुसार आचार-विचारका पालन करनेवाली होती हैं।
वहाँके क्षत्रिय भी अपने कर्तव्यका पालन करते हैं। वे सब-के-सब प्रजाकी रक्षाके व्रतमें दीक्षित होते हैं। दान देनेमें उदार और सब शास्त्रोंके ज्ञानमें निपुण होते हैं। सदा अधिक दक्षिणावाले यज्ञोंका अनुष्ठान करते हैं। उनकी यज्ञवेदियाँ सदा प्रज्वलित रहती हैं तथा सुवर्णभूषित यूप शोभा पाते रहते हैं। उनके घरपर पधारे हुए अतिथियोंको उनकी कामनासे अधिक वस्तुएँ देकर सन्तुष्ट किया जाता है। उत्कलके वैश्य भी कृषि, वाणिज्य और गोरक्षाकी वृत्तिमें स्थित होते हैं। वे अपनी भक्ति और धनसे देवता, गुरु और ब्राह्मणोंको तृप्त करते हैं। वहाँ एकके घरपर पधारे हुए याचकको दूसरेके घरपर जानेकी आवश्यकता नहीं रह जाती। उस देशके शूद्र संगीत, काव्य, कला और शिल्पमें कुशल तथा प्रिय वचन बोलनेवाले होते हैं। धार्मिक एवं स्नान-दानादि कर्मोंमें तत्पर होते हैं। वे अपने मन, वाणी, क्रिया तथा धनके द्वारा द्विजोंकी सेवामें लगे रहते हैं। वहाँ वर्णसंकरजातिके लोग भी अपने-अपने धर्ममें स्थित होते हैं। ऋतुएँ विपरीतभाव नहीं धारण करतीं। मेघ असमयमें वर्षा नहीं करते। खेतीको हानि नहीं पहुँचती। हवाका भी कष्ट नहीं होता तथा प्रजाको भूखकी पीड़ा नहीं सहन करनी पड़ती। अकाल और महामारीका प्रकोप नहीं होता। राज्यका नाश नहीं होता। पृथिवीपर होनेवाली कोई भी वस्तु वहाँ अलभ्य नहीं है। यही वह सब देशोंमें श्रेष्ठ उत्कल है। दक्षिण समुद्रमें मिलनेवाली ऋषिकुल्या नदीतक पहुँचकर स्वर्णरेखा और महानदीके बीचमें जो देश प्रतिष्ठित है, वही उत्कल है। इस पवित्र प्रान्तमें बहुत-से उत्तम क्षेत्र हैं।
सत्ययुगमें इन्द्रद्युम्न नामसे प्रसिद्ध एक श्रेष्ठ राजा हो गये हैं। उनका जन्म सूर्यवंशमें हुआ था। वे ब्रह्माजीसे पाँचवीं पीढ़ी नीचे थे। राजा इन्द्रद्युम्न सत्यवादी, सदाचारी, शुद्ध तथा सात्त्विक पुरुषोंमें अग्रगण्य थे। प्रजाको अपनी सन्तान समझकर सदा न्यायपूर्वक उसका पालन करते थे। वे आध्यात्मिक ज्ञानमें कुशल, शूर, समरविजयी, सदा उद्यमशील, ब्राह्मणपूजक तथा पितृभक्त थे। अठारह विद्याओंमें दूसरे बृहस्पतिके समान प्रवीण थे। ऐश्वर्यमें देवराज इन्द्र तथा कोष-संग्रहमें कुबेरकी समानता करते थे। रूपवान्, सौभाग्यशाली, शीलवान्, दानी, भोगी, प्रिय वक्ता, समस्त यज्ञोंका यजन करनेवाले तथा सत्यप्रतिज्ञ भी थे। उनमें भगवान् विष्णुकी भक्ति थी, सत्यभाषणका गुण था। उन्होंने क्रोध और इन्द्रियोंपर विजय प्राप्त कर ली थी। वे श्रेष्ठ राजसूय यज्ञ तथा सहस्रों अश्वमेध यज्ञका अनुष्ठान कर चुके थे। संसारबन्धनसे मुक्त होनेकी इच्छा रखकर सदा धर्माचरणमें ही लगे रहते थे। इस प्रकार वे सर्वगुणसम्पन्न राजा इन्द्रद्युम्न समूची पृथिवीका पालन करते हुए मालव देशमें विख्यात
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और समस्त रत्नोंसे सम्पन्न द्वितीय अमरावतीके समान सुशोभित अवन्ती नामवाली नगरीमें निवास करते थे। वहाँ रहते हुए राजाने भगवान् विष्णुमें मन, वाणी और क्रियाद्वारा परम अद्भुत एवं उत्तम भक्ति बढ़ायी।
एक दिन भगवान् लक्ष्मीपतिकी पूजाके समय देवपूजागृहमें बैठे हुए राजाने अपने पुरोहितसे आदरपूर्वक कहा—'आप उस उत्तम क्षेत्रका पता लगाइये जहाँ हम इसी नेत्रसे साक्षात् भगवान् जगन्नाथका दर्शन करें।' वैष्णव राजाके ऐसा कहनेपर पुरोहितजीने तीर्थयात्रियोंके एक झुंडको देखकर उनसे प्रेमपूर्वक कहा—'तीर्थोंमें विचरनेवाले तथा तीर्थोंका ज्ञान रखनेवाले धर्मात्मा पुरुषो ! हमारे महाराज जो आज्ञा देते हैं उसे तुमलोगोंने सुना है क्या ? तुममेंसे किसीको उत्तम तीर्थका पता है क्या ?' उनका अभिप्राय समझकर उन यात्रियोंमेंसे एक व्यक्ति, जो बहुत तीर्थोंमें घूम चुका था और अच्छा वक्ता था, राजाके पास आ हाथ जोड़कर बोला—'राजन् ! मैंने बचपनसे ही अनेक तीर्थोंमें भ्रमण किया है। भारतवर्षमें ओड्र नामसे प्रसिद्ध एक देश है। उस देशमें दक्षिण समुद्रके तटपर श्रीपुरुषोत्तमक्षेत्र है, जहाँ नीलाचल नामक एक पर्वत है। वह सब ओरसे वनोंद्वारा घिरा हुआ है। उसके बीचमें कल्पवृक्ष है, जिसके पश्चिम भागमें रौहिण कुण्ड है। वह भगवान्की करुणारूप जलसे भरा हुआ है, जो स्पर्श करनेमात्रसे ही मोक्ष देनेवाला है। उसके पूर्वीय तटपर इन्द्रनीलमणिकी बनी हुई भगवान् वासुदेवकी प्रतिमा है, जो साक्षात् मोक्ष प्रदान करनेवाली है। उस कुण्डमें स्नान करके जो भगवान् पुरुषोत्तमका दर्शन करता है, वह मुक्त हो जाता है। वहाँ शबरदीपक नामक एक श्रेष्ठ आश्रम है, जो भगवद्विग्रहसे पश्चिम दिशामें स्थित है। उस आश्रमसे एक पगडंडीका रास्ता है, जिससे भगवान् विष्णुके स्थानतक जा सकते हैं। वहाँ शंख-चक्र-गदाधारी साक्षात् भगवान् जगन्नाथ विराजमान हैं। वे करुणाके समुद्र हैं, दर्शनमात्रसे ही सब जीवोंको मुक्ति प्रदान करते हैं। राजन् ! देवाधिदेव जगन्नाथजीकी प्रसन्नताके लिये मैंने एक वर्षतक पुरुषोत्तमक्षेत्रमें निवास किया। मैं महामूर्ख था परंतु उनकी कृपासे इस समय अठारहों विद्याओंमें प्रवीण हो गया हूँ। मेरी बुद्धि भी निर्मल हो गयी है, जिससे भगवान् विष्णुके सिवा और कुछ मैं नहीं देखता। तुम सदैव दृढ़तापूर्वक उत्तम व्रतका पालन करनेवाले विष्णुभक्त हो, इसलिये तुम्हारे पास आया हूँ। मैं तुमसे इस समय धन अथवा भूमि नहीं माँगता। केवल इतना ही कहता हूँ कि मेरी इस बातको झूठ न मानकर वहाँ पुरुषोत्तमक्षेत्रमें निवास करनेवाले भगवान् लक्ष्मीपतिका भजन करो।'
यों कहकर वह जटाधारी यात्री सबके देखते-देखते शीघ्र अन्तर्धान हो गया। इससे राजाको बड़ा विस्मय हुआ। वे व्याकुल होकर पुरोहितसे बोले—'यह अलौकिक वृत्तान्त अलौकिक पुरुषसे ही सुना गया है। अब मेरी बुद्धि जहाँ भगवान् गदाधर विराजमान हैं, वहाँ जानेके लिये उतावली हो रही है। द्विजश्रेष्ठ ! मेरे धर्म, अर्थ और काम एक-दूसरेके अनुकूल रहकर सदा आपके अधीन रहे हैं। आपके प्रसादसे मैंने त्रिवर्गका साधन तो कर लिया। यदि आप इस भगवद्दर्शनके कार्यमें भी मेरे साथ चलेंगे तो मैं आपके सहयोगसे चारों पुरुषार्थोंको प्राप्त कर लूँगा।'
पुरोहित बोले—राजन् ! मैं ऐसा प्रयत्न करूँगा कि हमलोग सहायकोंसहित पुरुषोत्तमक्षेत्रमें चलकर बस जायँ। जन्मकी सफलता इससे बढ़कर और क्या हो सकती है कि साक्षात् भगवान् लक्ष्मीपतिका दर्शन किया जाय। इस समय मेरा छोटा भाई विद्यापति सब देशोंमें घूमनेवाले दूतोंके साथ वहाँ जायगा और जगन्नाथजीका दर्शन करके उस पर्वतपर सैनिकोंके ठहरनेयोग्य स्थानका पता
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लगाकर शीघ्र सब समाचार ले आयेगा। इससे हमलोगोंका कल्याण होगा।
पुरोहितकी यह बात सुनकर राजा इन्द्रद्युम्नने कहा—ब्रह्मन्! बहुत अच्छा। अब मैं भगवान् विष्णुके समीप उसी क्षेत्रमें चलकर बसूँगा।
ऐसा कहकर राजाने प्रसन्नतापूर्वक अन्तःपुरमें प्रवेश किया और पुरोहितने उन सब यात्रियोंको यथायोग्य सम्मान देकर अपने-अपने आश्रमको भेजा। फिर अपने भाईको ब्राह्मणोंसे स्वस्तिवाचन कराकर शुभ मुहूर्तमें भेजा। विद्यापति समस्त विश्वसनीय पुरुषोंके साथ पुष्पशोभित रथपर आरूढ़ हो वहाँसे प्रस्थित हुआ। उसने रथमें बैठे-बैठे यह विचार किया कि 'अहो! मेरा जन्म सफल हो गया। मेरी रात्रि मंगलमय प्रभातका दर्शन करानेवाली होगी; क्योंकि मैं भगवान्के उस मुखारविन्दका दर्शन करूँगा, जो समस्त पापोंको दूर करनेवाला है। श्रवण, मनन आदि साधनोंसे निरन्तर प्रयत्न करनेवाले साधक जिन्हें अपने हृदय-कमलके मध्य विराजमान देखते हैं, उन्हीं भगवान् चक्रपाणिको आज मैं नीलाचलके शिखरपर साक्षात् शरीर धारण किये देखूँगा, जो शरीरबन्धनका नाश करनेवाले हैं। श्रुति, स्मृति, इतिहास और पुराणके वचनोंद्वारा जिनके स्वरूपका भलीभाँति निरूपण करना असम्भव है, उन्हीं भगवान् लक्ष्मीनधिके अदृष्टपूर्व स्वरूपका दर्शन करके आज मैं भवसागरसे पार हो जाऊँगा। जिनके नामसंकीर्तनमात्रसे उनका स्मरण करनेवाले मनुष्योंके विविध पापोंका संहार हो जाता है, उन्हीं अप्रमेय भगवान् जगन्नाथके नीलगिरिनिवासी स्वरूपका आज मैं प्रत्यक्ष दर्शन करूँगा जिनके रोम-रोममें असंख्य ब्रह्माण्डोंकी मालाएँ हैं, जिनके सहस्रों मस्तक, चरण और नेत्र हैं, जिनकी निःश्वास-वायुसे सम्पूर्ण वेदोंकी राशि प्रकट हुई है तथा जो सब प्रपंचोंके स्वामी हैं, उन पुराणपुरुष भगवान् विष्णुकी मैं शरण लेता हूँ। अहा! मेरा कैसा भाग्य है कि इन्हीं चर्मचक्षुओंसे मैं जगत्के आदिकारण भगवान् नारायणका दर्शन करूँगा।'
इसी विचारमें पड़े हुए प्रसन्नचित्त ब्राह्मणको रथके वेगसे लाँघे हुए विशाल मार्गका कुछ भी पता न चला। मार्गमें मिले हुए अनेकों वन, पर्वत तथा दुर्गम स्थानोंको देखते हुए वे सूर्यास्तके समय महानदीके तटपर जा पहुँचे। उन्होंने रथसे उतरकर विधिपूर्वक नित्यकर्म किया और सायंसन्ध्या करके भगवान् मधुसूदनका ध्यान किया। तत्पश्चात् रथपर ही बैठे-बैठे रात बितायी। सबेरा होनेपर शीघ्र ही महानदीको पार किया। फिर प्रातःकालिक कृत्य समाप्त करके रथपर आरूढ़ हो गोविन्दका चिन्तन करते हुए ही आगेको प्रस्थान किया। भगवान्के निकट जानेवाले मार्गको देखते हुए वे एकाम्रवनमें पहुँचे। उसके बाद कल्पवटसे विभूषित गगनचुम्बी नीलाचलका शिखर देखा, जो दर्शकोंके पापोंका नाश करनेवाला है। साक्षात् शरीरधारी भगवान् विष्णुके उस अद्भुत निवासस्थानको खोजते हुए विद्यापति नीलाचलकी उपत्यका (तराई)-में जा पहुँचे। अब वे भगवान्के दर्शनके लिये अत्यन्त उत्कण्ठित हो गये; किंतु आगे बढ़नेका मार्ग नहीं मिला। तब भूमिपर कुशा बिछाकर मौनभावसे लेट गये और भगवद्दर्शनकी सिद्धिके लिये भगवान्के ही शरणागत हो गये। तब पर्वतसे पश्चिम भगवद्भक्तके विषयमें बातचीत करनेवाले लोगोंकी अलौकिक वाणी सुनायी देने लगी। तब वे प्रसन्न होकर उसी शब्दका अनुसरण करते हुए आगे बढ़े। कुछ ही दूरपर विख्यात शबरदीपक नामक आश्रम मिला। वहाँ उन्होंने वैष्णव भक्तोंका दर्शन किया और उन्हें प्रणाम करके हाथ जोड़कर खड़े हो गये। तब विश्वावसु नामक शबर भगवान् विष्णुका पूजन समाप्त करके पूजाके प्रसादसे सुशोभित हो पर्वतके बीचसे वहाँ आया। उसे देखकर ब्राह्मणको बड़ा हर्ष हुआ और वे सोचने लगे—ये श्रेष्ठ वैष्णव हैं, इनसे मुझे भगवान् विष्णुके सम्बन्धमें
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दुर्लभ समाचार प्राप्त होगा। इसी विचारमें पड़े हुए ब्राह्मणसे शबरने कहा—'ब्रह्मन्! आप कहाँसे इस वनमें पधारे हैं? यह वनका मार्ग तो बड़ा दुस्तर है, आप भूख-प्याससे बहुत थक गये होंगे। यहाँ सुखपूर्वक बैठिये और दीर्घकालतक विश्राम कीजिये।' ऐसा कहते हुए विश्वावसुने ब्राह्मणके लिये पाद्य, आसन और अर्घ्य प्रदान किया तथा विनययुक्त वाणीमें पूछा—'विप्रवर! आप फलाहार करेंगे या तैयार की हुई रसोई? जैसी आपकी रुचि हो, वैसा ही भोजन मैं प्रस्तुत करूँगा। भगवन्! आज मेरा अहोभाग्य है, यह जीवन सफल हो गया; क्योंकि आप साक्षात् दूसरे विष्णुकी भाँति मेरे घरपर पधारे हैं।'
इस प्रकार पूछनेपर श्रेष्ठ ब्राह्मण विद्यापतिने कहा—वैष्णवश्रेष्ठ! फल अथवा तैयार की हुई रसोईसे मेरा कोई प्रयोजन नहीं है। मैं बहुत दूरसे जिस उद्देश्यको लेकर यहाँ आया हूँ, उसे सफल करें। मैं अवन्तीपुरीके निवासी महाराज इन्द्रद्युम्नका पुरोहित हूँ और भगवान् विष्णुके दर्शनकी इच्छासे यहाँ आया हूँ। राजाने मुझे यहाँ निवास करनेवाले नीलमाधव श्रीहरिका दर्शन करनेके लिये भेजा है। दर्शन करके मैं जबतक राजाके पास इसका समाचार न पहुँचा दूँगा, तबतक राजा निराहार रहेंगे। इसलिये आप मुझे भगवान् विष्णुका दर्शन कराइये।
विद्यापतिका शबरके साथ नीलमाधवका दर्शन करके तीर्थकी परिक्रमा करना और अवन्तीमें जाकर राजा इन्द्रद्युम्नको सब समाचार सुनाना
जैमिनिजी कहते हैं—ब्राह्मणकी बात सुनकर शबरने अविनाशी भगवान् विष्णुका ध्यान करते हुए कहा—'विप्रवर! हमने पहलेसे भी यह समाचार सुन रखा है कि इस तीर्थमें राजा इन्द्रद्युम्न निवास करेंगे। चलिये, पर्वतके ऊपरकी भूमिपर चलें।' ऐसा कहकर शबर ब्राह्मणको उसी मार्गसे गहन वनमें ले गया। ऊपर-ऊपर चढ़कर शिलाखण्डोंके कारण ऊँची-नीची भूमिपर एक-एक मनुष्यके चलनेयोग्य रास्ता था, वह भी काँटोंसे भरा होनेके कारण अति दुर्गम हो रहा था और वहाँ प्रायः अन्धकार छाया रहता था। शबर वाणीद्वारा बोल-बोलकर ब्राह्मणको रास्तेका परिचय कराता चलता था। इस प्रकार चार घड़ीतक चलकर वे दोनों रौहिण कुण्डके तटपर पहुँचे। उसे देखकर शबरने कहा—'द्विजश्रेष्ठ! यह रौहिण नामक कुण्ड है, जो समस्त जलोंकी उत्पत्तिका कारणभूत महातीर्थ है। यहाँ स्नान करके मनुष्य वैकुण्ठ धाममें जाता है। इसके पूर्वभागमें यह महान् कल्पवट है, जिसकी छायामें जाकर मनुष्य ब्रह्महत्याका भी नाश कर देता है। इन दोनोंके मध्यभागमें जो
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कुंज है, उसमें वेदान्तप्रतिपादित साक्षात् भगवान् जगन्नाथजी विराजमान हैं; इनका दर्शन कीजिये। दर्शन करके समस्त पापराशिका विनाश कर डालिये और इसके बाद 'मैं भवसागरमें पड़ा हूँ'— इस शोक और चिन्ताको सदाके लिये त्याग दीजिये।'
तब विद्वान् ब्राह्मण विद्यापतिने प्रसन्नचित्त होकर उस कुण्डमें स्नान किया और दूरसे ही मन, वाणी एवं मस्तकद्वारा भगवान्को प्रणाम करके हर्षगद्गद वचन बोलकर उनकी स्तुति की— 'प्रभो! आप प्रकृति और पुरुषसे सर्वथा अतीत पुरुषोत्तम हैं। सर्वव्यापी एवं परात्पर हैं। इस चराचर जगत्को भिन्न-भिन्न अवस्थाओंमें परिणत करनेवाले आप ही हैं। परमार्थस्वरूप परमेश्वर! आपको नमस्कार है। जगत्पते! श्रुति-स्मृति-पुराण और इतिहासद्वारा प्रतिपादित समस्त कर्मोंसे एकमात्र आपकी ही आराधना होती है। जिनके चरणकमलोंके संयोगसे सर्वतीर्थमयी गंगा सब लोगोंको पवित्र करती हैं, उन परमपावन भगवान् श्रीहरिको नमस्कार है। जिनके अंशभूत आनन्दको पाकर सम्पूर्ण विश्वके प्राणी आनन्दमय होकर जीवन धारण करते हैं, समस्त पापोंसे रहित उन ब्रह्मस्वरूप विष्णुको नमस्कार है। प्रभो! आप निर्मलस्वरूप, कल्याणरूप, सब प्रकारकी आसक्तियोंसे रहित तथा विश्वसाक्षी हैं, आपको नमस्कार है। आपके असंख्य चरण, नेत्र, मस्तक, मुख और भुजाएँ हैं। आप सबको जीतनेवाले हैं। सभी जीव आपके स्वरूप हैं; आप सर्वरूपी परमात्माको नमस्कार है। भगवन्! इस असार संसारमें चक्कर लगानेके कारण मैं रोग और शोकोंसे बहुत पीड़ित हो गया हूँ और आपके युगल चरणारविन्दोंकी शरणमें आया हूँ। आप इस सांसारिक दुःखसमुदायसे मेरा उद्धार कीजिये।'
प्रणवरूपी देवेश्वर भगवान् विष्णुका इस प्रकार स्तवन करके उनके चरणोंमें मस्तक झुकाकर विद्यापति ब्राह्मण भगवान् विष्णुके आगे प्रणवमन्त्रका जप करने लगे। जपके अन्तमें शबरने कहा— 'द्विजश्रेष्ठ! इस समय आप भगवान्का दर्शन पाकर कृतार्थ हो गये। दिन बीत गया, आप थके-मांदे और भूखे-प्यासे हैं, अतः चलिये घर चलें। इस घोर वनमें हिंसक जन्तुओंका निवास है; इसलिये हमारा यहाँ ठहरना उचित नहीं है। जबतक सूर्यकी किरणोंका प्रकाश है, तबतक ही हमलोग अपने घर पहुँच जायँ।' ऐसा कहकर ब्राह्मणके साथ शबर शीघ्रतापूर्वक आश्रमको लौटा। ब्राह्मण भी आनन्दसागर भगवान् जगन्नाथके ध्यानमें डूबे हुए थे, अतः उन्हें भूख-प्यास और थकावटसे प्राप्त होनेवाले दुःखोंका भान नहीं हुआ। भगवच्चिन्तनमें संलग्न होनेसे शरीरमें उनकी आस्था नहीं रह गयी थी। वे शरीरस्थितिसे ऊपर उठ चुके थे, इसलिये कण्टकराशिसे व्याप्त शिलाखण्डोंके ऊँचे-नीचे दुर्गम मार्गमें चलते हुए भी कष्टका अनुभव नहीं करते थे। घर आनेपर शबरने ब्राह्मण अतिथिको नाना प्रकारके पवित्र दिव्य पदार्थ देकर भलीभाँति उनका पूजन किया। तदनन्तर शबरके दिये हुए राजोचित उपचारोंसे पूर्णतः तृप्त होकर ब्राह्मणको बड़ा विस्मय हुआ। उन्होंने चकित होकर कहा— 'साधो! तुमने मेरे सत्कारके लिये जो ये अलौकिक वस्तुएँ समर्पित की हैं, उनका दर्शन राजाओंने भी नहीं किया है। तुम्हारे घरमें ऐसी दिव्य वस्तुओंका संग्रह आश्चर्यकी बात है!'
शबरने कहा— द्विजश्रेष्ठ! इन्द्र आदि देवता प्रतिदिन दिव्य उपचार लेकर जगन्नाथजीकी पूजा करनेके लिये आते हैं, पूजा करके भक्तिपूर्वक स्तुति और नमस्कार करते हैं। फिर गीत, वाद्य और नृत्यके द्वारा भगवान्को सन्तुष्ट करके अपने स्थानको लौट जाते हैं। ये सब दिव्य पदार्थ जगन्नाथजीके प्रसाद हैं, जो मैंने आपको अर्पित किये हैं। भगवान्के इस प्रसादको खाकर हमलोगोंके रोग और बुढ़ापेका नाश हो गया है। जिसके
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सेवनसे मनुष्य मोक्षका भागी होता है, उस प्रसादका यदि ऐसा प्रभाव हो तो यह कोई आश्चर्यकी बात नहीं है।
भगवत्प्रसादका यह दुर्लभ प्रभाव सुनकर ब्राह्मणके शरीरमें रोमांच हो आया, आनन्दके आँसुओंसे उनकी आँखें बंद हो गयीं और उन्होंने अपनेको कृतार्थ मानते हुए कहा—'अहो! यह शबरकुलमें उत्पन्न मनुष्य प्रतिदिन अविनाशी परमात्माका दर्शन करता है और उनके प्रसादस्वरूप दिव्य भोगका उपभोग करता है। इस पृथ्वीपर चराचर जगत्में इसके समान भाग्यवान् दूसरा कोई नहीं है। इसके साथ मैत्री करके मैं भी इस वनमें निवास करूँगा।' इस प्रकार दीर्घकालतक विचार करके भगवान् श्रीविष्णुमें मन लगाये रहनेवाले उस ब्राह्मणने शबरसे कहा—'यदि मुझपर तुम्हारा अनुग्रह हो, तो मैं तुम्हारे साथ मित्रता करूँगा। यह मेरे मनका महान् निश्चय है। बड़े भाग्यसे तुम्हारे साथ समागम हुआ है। अब तुम्हारे प्रसादसे मैं दुस्तर भवसागरको पार कर जाऊँगा। वैष्णवके साथ मित्रता होना दुःखमय संसारसे पार करनेवाला है। इसीको इस असार संसारसागरमें सार वस्तु बताकर साधु पुरुष इसकी सराहना करते हैं। तुम-जैसे मित्रके सहवाससे कमलके समान नेत्रोंवाले, शंख-चक्र-गदाधारी भगवान् विष्णुका पुनः प्रत्यक्ष दर्शन होगा। सखे! मेरे लौट जानेपर राजा इन्द्रद्युम्न भगवान्की आराधना करनेके लिये यहीं आकर निवास करेंगे। उनकी इच्छा है, यहाँ एक विशाल मन्दिर बनवावें, जो भगवान्को प्रिय है। जगन्नाथजीकी पूजाके लिये सहस्रों उपचारोंका प्रबन्ध करूँगा—यह उनकी महाप्रतिज्ञा है।'
शबरने कहा—सखे! यह भी पुरातनकालसे वैसी ही बात प्रसिद्ध है, जैसी कि आपने इन्द्रद्युम्नके आगमनके सम्बन्धमें कही है। केवल इतनी ही बात होगी कि राजा यहाँ नीलमाधवका दर्शन नहीं कर सकेंगे। भगवान्ने यमराजसे एक प्रतिज्ञा की है, उसके अनुसार वे शीघ्र ही स्वर्णमयी बालुकाममें छिपकर अदृश्य हो जायेंगे। आपने महान् सौभाग्यके फलसे भगवान्का प्रत्यक्ष दर्शन कर लिया है। इन्द्रद्युम्नके आनेपर निश्चय ही आँखोंसे ओझल हो जायेंगे, परन्तु यह बात आपको राजाके आगे नहीं कहनी चाहिये। राजा जब यहाँ आकर भगवान्को नहीं देखेंगे और अन्न-जल त्यागकर मरनेको तैयार हो जायेंगे, तब स्वप्नमें उन्हें भगवान् गदाधरका दर्शन होगा और उन्हींके आदेशसे वे भगवान्की काष्ठमयी चार मूर्तियोंको ब्रह्माजीके द्वारा स्थापित कराकर भक्तिपूर्वक उनकी पूजा करेंगे।
इस प्रकार परस्पर पुण्यमयी चर्चा करके दोनों सुन्दर स्थानमें पल्लव बिछी हुई शय्यापर सो गये। सबेरा होनेपर दोनोंने तीर्थराज समुद्रके जलमें विधिपूर्वक स्नान किया और भगवान् माधवको प्रणाम करके राजाके रहने योग्य उत्तम स्थानका निश्चय करनेके पश्चात् वे दोनों लौट आये। तत्पश्चात् मित्रसे विदा लेकर ब्राह्मण रथपर आरूढ़ हो अवन्तीपुरीको चले।
रथपर बैठे हुए विद्यापति ब्राह्मणने यह विचार किया कि मैंने जो भगवान् नीलमाधवका दर्शन कर लिया, उससे मेरा कर्तव्य पूरा हो गया। अब श्रीपुरुषोत्तमक्षेत्रकी परिक्रमा करके शीघ्र यहाँसे लौटूँ। ऐसा निश्चय करके वे नाना प्रकारके वृक्षोंसे भरे हुए क्षेत्र और वनको देखते हुए उस समय उस पुरुषोत्तमतीर्थकी परिक्रमा करने लगे। परिक्रमा पूरी करके भगवान्का ध्यान करते हुए बिना खाये-पीये चले और सन्ध्या होते-होते अवन्तीपुरीमें पहुँच गये। दूतोंने महाराजको उनके लौटनेका समाचार सुनाया; सुनकर महाराज इन्द्रद्युम्न बहुत प्रसन्न हुए। वे भगवान् जनार्दनकी पूजा करके विद्वान् ब्राह्मणोंके साथ प्रसन्नतापूर्वक बैठे और विद्यापतिके आगमनकी प्रतीक्षा करने लगे। इसी समय प्रवेशमार्ग बतानेवाले छड़ीदार सिपाहियों और द्वारपालोंद्वारा सूचित किये हुए रास्तेसे उत्कण्ठित
३३८ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
पुरवासियोंके साथ विद्यापति ब्राह्मणने भगवान् नीलमाधवकी प्रसादस्वरूप सुन्दर माला हाथमें लेकर राजाके आगे दरबारमें प्रवेश किया। उन्हें देखकर राजा सिंहासनसे उठकर खड़े हो गये और 'हे जगदीश! प्रसन्न होइये' ऐसा कहते हुए उनके समीप गये। तत्पश्चात् यों बोले—'आज मेरा जीवन, जन्म और कर्म—दोनों ही दृष्टियोंसे सफल हो गया; क्योंकि इस समय मैं यहाँ प्रसादमालाके रूपमें साक्षात् माधवका दर्शन कर रहा हूँ। संसारके समस्त पापोंका विनाश करनेवाली भगवान् विष्णुके मस्तकपर चढ़ी हुई इस दिव्य मालाको मैं प्रणाम करता हूँ। जिनके चरणकमलोंकी धूलिको अपने मस्तकमें लगाकर ब्रह्मा आदि देवताओोंने महान् ऐश्वर्य प्राप्त किया है, उन भगवान् विष्णुके श्रीअंगोंमें लगे हुए उज्ज्वल अंगरागसे संयुक्त पुष्पोंकी आधारभूत इस मालाको मैं प्रणाम करता हूँ। हे नीलाचलके शिखरको विभूषित करनेवाले पापहारी हरि! आपकी जय हो। शरणागतोंकी पीड़ा दूर करनेवाले श्रीमान् नारायण! मैं आपकी शरणमें आया हूँ, मेरा उद्धार कीजिये।'
अश्रुगद्गद वाणीसे इस प्रकार कहते हुए राजा इन्द्रद्युम्नने धरतीपर मस्तक रखकर भगवान्को प्रणाम किया। उस समय उनके अंग-अंगमें रोमांच हो आया था। वे विद्यापति ब्राह्मण भी समस्त पापोंसे रहित हो भगवान् माधवका ध्यान करते हुए राजाके सम्मुख उपस्थित हुए और इस प्रकार बोले—'अपने तेजसे सम्पूर्ण लोकोंके पापोंका निवारण करनेवाले परम बुद्धिमान् नीलाचलशिखर-निवासी भगवान् श्रीमाधव आपपर अनुग्रह करें।' यों कहकर विद्यापतिने वह माला राजा इन्द्रद्युम्नके गलेमें डाल दी। राजाने भी उठकर अपने हृदयपर लटकती हुई मालाको देखकर ऐसा माना कि इसके रूपमें साक्षात् भगवान् लक्ष्मीपति ही मेरे हृदयमें आ गये हैं। फिर दोनों हाथ मस्तकपर जोड़कर उन्होंने अपने नेत्र कुछ-कुछ बंद कर लिये और आनन्दके आँसुओंसे गद्गदकण्ठ होकर श्रीहरिका इस प्रकार स्तवन किया।
इन्द्रद्युम्न बोले—समस्त संसारकी सृष्टि, पालन और संहाररूपी शिल्पके कारीगर! आपकी जय हो। अपने विश्वरूपके रोम-रोममें लीलासे ही असंख्य ब्रह्माण्डोंका भार धारण करनेवाले नारायण! आपकी जय हो। प्रभो! आप सबके अन्तर्यामी तथा शरणागतोंका दुःख दूर करनेवाले हैं। ब्रह्मा, इन्द्र तथा रुद्र आदि देवताओंके मुकुटसे आपके चरणारविन्दोंकी विचित्र शोभा होती है। आप दीनों, अनाथों और विपत्तिग्रस्त प्राणियोंकी रक्षामें सदैव तत्पर रहते हैं। अकारणकरुणावरुणालय! परात्पर! आपकी जय हो। जगन्नाथ! भक्तवत्सल! मैं अनादि कालसे भ्रममें भटकनेवाला दीन मनुष्य एकमात्र आपकी शरणमें आया हूँ, आप मेरी रक्षा करें।
इस प्रकार स्तुति करके राजा अपने आसनपर बैठे। उस समय गृहस्थ, ब्रह्मचारी, वानप्रस्थ और संन्यासी सब उन्हें घेरे हुए थे। अठारहों विद्याओंमें कुशल यज्ञकर्ता ब्राह्मणोंके साथ राजाने बहुत आदरपूर्वक विद्यापतिका पूजन किया और अपने सामने चौकीपर बिठाकर आदिसे ही कुशल-समाचार पूछा। पुरुषोत्तमक्षेत्रके माहात्म्य, नीलमणिविग्रहधारी भगवान् विष्णुकी महिमा तथा स्वरूपके विषयमें भी प्रश्न किया। तब विद्यापतिने अपने अनुभवमें आये हुए शबरद्वीपमें प्रवेशसे लेकर समुद्रमें स्नान करनेतकके पुरुषोत्तम-क्षेत्रसम्बन्धी समस्त वृत्तान्तको विस्तारपूर्वक कह सुनाया। नीलाचलपर चढ़ना, नीलमाधवका दर्शन करना, रौहिण कुण्डमें स्नान करना, कल्पवटकी महिमा, नृसिंह आदि स्वरूपोंकी प्रतिष्ठा, आठ शिव और आठ शक्तियोंकी स्थिति, रथसे घूमकर देखी हुई पुरुषोत्तमक्षेत्रकी लंबाई और चौड़ाई—सबका क्रमशः यथावत् वर्णन किया। वह अद्भुत वृत्तान्त सुनकर प्रसन्नचित्त हुए राजा इन्द्रद्युम्नेने कहा—'भगवन्!
- वैष्णवखण्ड-उत्कलखण्ड * ३३९
नीलेन्द्रमणिमय विग्रहवाले भगवान् विष्णुके स्वरूपका यथार्थ वर्णन कीजिये।'
विद्यापति बोले—राजन्! मैं भगवान् जगन्नाथकी उस दिव्य मूर्तिको वर्णन करता हूँ, जिसे इस चर्मचक्षुसे देखकर मनुष्य मोक्षका भाजन बन जाता है। भगवान्की वह मूर्ति बहुत प्राचीन तथा इन्द्रनीलमणि नामक प्रस्तरकी बनी है। ब्रह्मा, रुद्र और इन्द्र आदि देवता प्रतिदिन जाकर उसकी पूजा करते हैं। यह दिव्य माला देवताओंने ही पूजामें चढ़ायी थी। राजन्! यह न तो कभी मलिन होती है और न कभी इसकी सुगन्ध ही कम होती है। भगवान्के दिव्य उपहारमें आये हुए प्रसादके भक्षण करनेसे मेरे समस्त पाप क्षीण हो गये हैं और मैं देवताओंके सदृश अलौकिक तेजसे सम्पन्न हो गया हूँ। क्या आप इस बातको नहीं देख रहे हैं? महाराज ! वहाँ भोग और मोक्ष दोनों एक ही साथ स्थित हैं। बुढ़ापा, रोग और शोक आदि दुःखोंका वहाँ अत्यन्त अभाव है। उस तीर्थमें विकसित नीलकमलके सदृश विशाल नेत्रोंवाले साक्षात् भगवान् जगन्नाथ प्रसन्नवदनसे विराजमान हैं, जो शरणागतोंको अमृतमय मोक्ष प्रदान करते हैं।
भगवान् जगन्नाथके नीलमणिमय विग्रहका वर्णन, इन्द्रद्युम्नके पास नारदजीका आगमन और भक्ति एवं भक्तके स्वरूपका विवेचन
इन्द्रद्युम्नने पूछा—द्विजश्रेष्ठ! जन्मसे लेकर कुछ काल पहलेतक तो आप पुरुषोत्तमक्षेत्रमें कभी गये ही नहीं थे, फिर आपने वहाँके दिव्य वृत्तान्तको कैसे जान लिया ?
विद्यापतिने कहा—राजन्! मैं सन्ध्याके समय पुरुषोत्तमतीर्थमें भगवान् नीलाचलवासी विष्णुके समीप पहुँचा था। उस समय वहाँ दिव्य सुगन्धयुक्त वायु चल रही थी। आकाशमार्गमें देवताओंका सम्मिलित शब्द सुनायी पड़ता था। वहाँ विश्वावसु नामक शबर मेरा मित्र है, उसने दिव्य उपहार, भोजन तथा यह माला मुझे प्रदान की थी। कभी मलिन न होनेवाली यह बहुमूल्य माला लक्ष्मी तथा राज्यका सुख प्रदान करनेवाली है और दरिद्रता एवं पापका संहार करनेवाली है। इसलिये इसे आपके योग्य समझकर मैं यहाँ ले आया हूँ। भगवान् विष्णुका वह उत्तम क्षेत्र सब ओरसे घने जंगलोंसे व्याप्त है। नीलाचल उसकी नाभि (केन्द्रस्थान) है, लंबाई और चौड़ाईमें वह (वर्गके हिसाबसे) पाँच कोसका बताया गया है। तीर्थराज समुद्रके तटपर उसकी स्थिति है और वह सब ओरसे सुवर्णमयी बालुकाद्वारा आवृत है। पर्वतके शिखरपर एक बहुत ऊँचा वटवृक्ष है, जो प्रलयकालमें भी स्थिर रहता है। उसकी लंबाई एक कोसकी
३४० * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
है। वह फूल और फलसे रहित तथा पल्लवोंसे सुशोभित है। सूर्यके हटनेपर भी उसकी छायामें कोई परिवर्तन नहीं होता। उसके पश्चिम रौहिण नामसे प्रसिद्ध कुण्ड है, वहाँ जलका उद्गम है। उसमें उतरनेके लिये नील पत्थरोंकी सीढ़ी उसकी शोभा बढ़ाती है। कुण्डके बाहर चारों दिशाओंमें स्फटिकमणिकी चार वेदियाँ हैं; पापराशिका संहार करनेवाले पवित्र जलसे भरा हुआ वह कुण्ड बड़ा ही मनोरम है। कुण्डकी पूर्व दिशामें जो वेदी है, उसके मध्यभागमें शंख-चक्र-गदाधारी इन्द्रनीलमणिमय भगवान् विष्णु विराजमान हैं। वह स्थान वटवृक्षकी छाया पड़नेसे सदा शीतल बना रहता है। भगवान्का वह विग्रह इक्यासी अंगुल ऊँचा है और सुवर्णमय कमलके ऊपर स्थित है। उस श्रीविग्रहके मुखचन्द्रसे तीनों प्रकारके तापोंका निवारण होता है। भगवान्के दोनों नासिकापुट तिलके फूलके समान शोभा धारण करते हैं। प्रस्तरमयी मूर्ति होनेपर भी भगवान्के अधरपर मुसकानकी छटा रहती है। हँसीसे खिले हुए युगल कपोलोंद्वारा ठोढ़ी बहुत सुन्दर दिखायी देती है। मुँहके दोनों कोने ऐसे दिखायी देते हैं मानो और किसी मूर्तिके मुखकोण वैसे कभी बने ही न हों। हास्युक्त अधर, कपोल, ठोढ़ी और मुँहके सुन्दर कोने आदिको धारण करनेवाले भगवान् माधव विश्वकर्मा आदि शिल्पियोंके लिये आदर्श बने हुए हैं। मकराकार कुण्डलोंसे सुशोभित दोनों कानोंके द्वारा भगवान्का मुखचन्द्र गुरु और शुक्रके मध्यभागमें स्थित पूर्णचन्द्रका उपहास कर रहा है। गलेके सुन्दर आभूषणसे शोभाजनक कण्ठप्रदेशके द्वारा भगवान् अपना दर्शन करनेवाले पुरुषोंके चित्तमें दक्षिणावर्त शंखसे मुक्तामणिके प्रकट होनेकी आशंका उत्पन्न करते हैं। उनके कन्धे मोटे और चौड़े हैं। घुटनेतककी लंबी चार भुजाएँ हैं। वक्षःस्थलपर स्वच्छ एवं निर्मल हार शोभा पा रहा है। दिव्य कौस्तुभमणिमें पड़े हुए प्रतिबिम्बके रूपमें मानो वे चौदह भुवनोंको धारण करते हैं। गहरे नाभिरूपी सरोवरमें प्रविष्ट हुई सूक्ष्म रोमावलियोंके कारण भगवान्का श्रीविग्रह बड़ा मनोहर प्रतीत होता है। गलेमें लटकता हुआ हार त्रिवलीके मध्यभागतकका स्पर्श करता है। मोतीकी माला कमरके पासतक लटकी हुई है। वे पीताम्बरसे शोभा पाते हैं। दोनों जंघाएँ दो खम्भोंके समान जान पड़ती हैं, मानो वे मोक्षके मंगलमय धाममें जानेके लिये बाहरी द्वारके आश्रय हों। भगवान्के दोनों चरण गोलाकार घुटनों, पैरोंतक लटकती हुई वनमाला तथा रत्नमय कड़ोंसे शोभा पाते हैं। वे हार, कंकण, भुजबन्द और मुकुट आदिसे विभूषित हैं। भगवान् अपने चारों हाथोंमें क्रमशः चक्र, पद्म, गदा और शंखरूपमें परिणत ज्ञान, अहंकार, ऐश्वर्य तथा शब्दब्रह्म (वेदराशि)-को धारण करते हैं।* भगवान् जगन्नाथ सम्पूर्ण दिशाओंको प्रकाशित करते हुए नीलाचलके शिखरपर विराजमान हैं, जिनका दर्शन करके, भक्तिपूर्वक प्रणाम करनेसे मनुष्य देहबन्धनसे मुक्त हो जाता है। भगवान्के वामपार्श्वमें भगवती लक्ष्मी वीणा बजा रही हैं। उनकी दृष्टि भगवान्के मुखकी ओर है। वे सम्पूर्ण लावण्यका निवास तथा समस्त अलंकारोंसे विभूषित हैं। जगत्के पिता और माता भगवान् विष्णु और भगवती लक्ष्मी दोनों उस पर्वतपर निवास करते हैं। मैंने उन दोनोंका दर्शन किया। वे दोनों मौनभावसे बैठे हैं और अपनी मुसकराती हुई दृष्टिसे दर्शन करनेवाले प्राणीपर कृपाकी वर्षा करते हैं। दीनोंपर दया करनेके कारण मैंने उन्हें चैतन्यरूप ही माना है। उनके पीछे अपने फणोंका छत्र लगाये भगवान् शेषनाग खड़े हैं और आगे सुदर्शन चक्रको दिव्य शरीर
* तेजोमय सुदर्शन चक्र प्रकाशस्वरूप ज्ञानका प्रतीक है। इस प्रकार कमल अहंकारका, गदा ऐश्वर्यका और शंख नादात्मक शब्दब्रह्मका प्रतीक है।
- वैष्णवखण्ड-उत्कलखण्ड * | ३४१ ---|---
धारण करके खड़े हुए देखा है। सुदर्शनके पीछे गरुड़जी हाथ जोड़े खड़े हैं। इस प्रकार अद्भुत रूप धारण करनेवाले साक्षात् लक्ष्मीपति भगवान् विष्णुका दर्शन करके मेरा मन बार-बार उन्हींकी ओर दौड़ रहा है मानो कोई इसे रस्सियोंमें बाँधकर अपनी ओर खींच रहा हो। तीर्थस्नान, तप, दान, देवयज्ञ और व्रतोंके द्वारा भी कोई वैसे दिव्यरूपमें भगवान्का दर्शन नहीं कर सकता। जो लोग निर्मल आकाशकी भाँति प्रतीत होनेवाले पुरुषोत्तमतीर्थनिवासी नील-विग्रह भगवान् विष्णुका ध्यान करते हैं वे सब प्रकारके बन्धनोंसे रहित होकर भगवान् विष्णुके धाममें प्रवेश करते हैं। जिसने नीलाचलनाथ भगवान्का दर्शन कर लिया है, वही दानी, वही यज्ञकर्ता, वही सत्यवादी, वही धर्मात्मा तथा वही सम्पूर्ण गुणोंसे श्रेष्ठ और समस्त जगत्में महान् है। राजन्! वहाँ जगदीश्वर माधवके जो सेवक हैं, उन्हींसे मैंने भगवान्के इस माहात्म्यका परिचय प्राप्त किया। वहाँ आदिसृष्टिकी परम्परासे चला आता हुआ पुरातन एवं सुप्रसिद्ध आख्यान सुनकर मैं यहाँ आया हूँ। महाराज! आपकी ही आज्ञासे श्रीपुरुषोत्तमका दर्शन करके वहाँका सब वृत्तान्त आपसे निवेदन किया है। अब आपकी जैसी इच्छा हो वैसा करें।
इन्द्रद्युम्न बोले—भगवान्! आपका वचन मेरे लिये सर्वथा विश्वसनीय है। आपके मुखसे भगवान्के पापहारी स्वरूपका वर्णन सुनकर तथा इस दिव्य प्रसादमालाका संयोग पाकर मैं कृतकृत्य हो गया। अनेक जन्मोंमें उपार्जित मेरी समस्त पापराशि आज नष्ट हो गयी। अब मैं भगवान् लक्ष्मीपतिके दर्शनका अधिकारी हो गया। सर्वतोभावेन वहाँकी यात्रा करूँगा और इस राज्य एवं बढ़ी हुई समृद्धिके द्वारा पुरुषोत्तमतीर्थमें निवासस्थान, नगर और दुर्ग बनवाऊँगा। भगवान् विष्णुकी प्रीतिके लिये सौ अश्वमेध यज्ञोंका अनुष्ठान करूँगा और प्रतिदिन सैकड़ों उपचारोंसे श्रीनाथजीकी पूजा करूँगा, व्रत, उपवास और नियमोंद्वारा जगद्गुरु भगवान्को प्रसन्न करूँगा, जिससे वे मुझ सन्तप्त प्राणीको अपने वचनामृतसे अभिषिक्त करेंगे। भगवान् नारायण दीनोंपर अनुग्रह करनेवाले हैं।
इस प्रकार राजा इन्द्रद्युम्न श्रद्धा और भक्तिसे भगवान् जगदीश्वरकी स्तुति कर रहे थे। इतनेमें ही सम्पूर्ण भुवनोंको देखनेकी उत्सुकता रखनेवाले देवर्षि नारदजी वहाँ आ पहुँचे। विष्णुभक्तोंमें श्रेष्ठ ब्रह्मपुत्र नारदजीको आते देख राजा सहसा उठकर खड़े हो गये और पाद्य, अर्घ्य एवं आचमनीय निवेदन करके उन्हें उत्तम आसनपर बैठाकर प्रणामपूर्वक हाथ जोड़कर बोले—‘आज मेरे सम्पूर्ण यज्ञ, दान, स्वाध्याय और तप सफल हो गये; क्योंकि मेरे घरपर ब्रह्माजीके द्वितीय स्वरूप देवर्षि नारद कृपापूर्वक पधारे हैं। मुने! आपने यहाँतक आनेकी कृपा की, इतनेसे ही यद्यपि मैं कृतार्थ हो गया हूँ तथापि आपकी प्रसन्नताके लिये आपकी क्या सेवा करूँ, आपकी किस आज्ञाका पालन करूँ? कौन-सा प्रयोजन लेकर आपने मेरे इस घरको पवित्र किया है?’
भक्ति और विनयसे सनी हुई राजाकी यह कोमल वाणी सुनकर नारदजीने मुसकराते हुए कहा—‘नृपश्रेष्ठ! तुम्हारे निर्मल गुणोंसे ब्रह्मा आदि सम्पूर्ण देवता, सिद्ध और मुनि अत्यन्त प्रसन्न हैं। तुमने बहुत अच्छा निश्चय किया। हजारों जन्मोंके अभ्याससे नीलाचलगुहानिवासी भगवान् माधवमें भक्ति होती है। परम बुद्धिमान् ब्रह्माजीने उन्हीं भगवान् जगदीश्वरकी आराधना करके इस सृष्टिका निर्माण किया और पितामहकी पदवी पायी है। तुम भी उन्हींके वंशमें उत्पन्न हुए हो, अतः भगवान्के प्रति तुम्हारी ऐसी भक्ति होनी उचित ही है। पग-पगपर दुःख और संकटोंसे व्याप्त इस संसाररूपी वनमें भटकते हुए मनुष्योंके लिये एकमात्र भगवान् विष्णुकी भक्ति ही सुख देनेवाली है। यह संसार एक
३४२ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
समुद्र है जहाँ कोई भी सहारा देनेवाला नहीं है। सुख-दुःख आदि द्वन्द्वोंकी प्रचण्ड आँधीसे इसमें सदा तूफान आता रहता है, इस कारण यह अत्यन्त दुस्तर है। इस भवसागरमें डूबे हुए मनुष्योंके लिये भगवान् विष्णुकी भक्ति ही नौका मानी गयी है। एकमात्र माता भगवती विष्णुभक्तिका आश्रय लेकर सन्तुष्ट रहनेवाले साधुपुरुष कभी शोक नहीं करते। राजन्! देहधारियोंकी जो बड़ी भारी पापराशि है, वह विष्णुभक्तिरूपी महान् दावानलमें पतंगोंकी भाँति जल जाती है। प्रयाग, गंगा आदि तीर्थ, तपस्या, श्रेष्ठ अश्वमेध यज्ञ, महान् दान, व्रत, उपवास और नियम—इन सबका सहस्रों बार सेवन किया जाय और इनके पुण्यसमूहको कोटि-कोटि गुना करके एकत्र किया जाय तो भी वह विष्णुभक्तिके हजारवें अंशके बराबर भी नहीं बताया गया है १।'
नारदजीके बताये हुए विष्णुभक्ति-माहात्म्यको सुनकर राजा इन्द्रद्युम्नके मनमें विष्णुभक्तिका स्वरूप जाननेकी इच्छा हुई। अतः उन्होंने पूछा—'भगवन्! भक्तिका क्या स्वरूप है? उसके लक्षणका वर्णन कीजिये।'
नारदजीने कहा—राजन्! सावधान होकर सुनो। मैं भगवान् विष्णुकी सनातन भक्तिका सामान्य और विशेषरूपसे वर्णन करता हूँ। गुणोंके भेदसे भक्तिके तीन भेद हैं—सात्त्विकी, राजसी और तामसी। इनके अतिरिक्त एक चौथी भक्ति भी है, जो निर्गुणा मानी गयी है। राजन्! जो लोग काम और क्रोधके वशीभूत हैं और प्रत्यक्ष (इस जगत्)-के सिवा और किसी (परलोक आदि)-की ओर दृष्टि नहीं रखते, वे अपनेको लाभ और दूसरोंको हानि पहुँचानेके लिये जो भजन करते हैं, उनकी वह भक्ति तामसी कही गयी है। अधिक यशकी प्राप्तिके लिये अथवा दूसरेकी स्पर्धा (लाग-डाँट)-से, प्रसंगवश परलोकके लिये भी, जो भक्ति होती है, वह राजसी मानी गयी है। पारलौकिक लाभको स्थायी समझकर और इहलोकके समस्त पदार्थोंको नश्वर देखकर अपने वर्ण तथा आश्रमके धर्मोंका परित्याग न करते हुए आत्मज्ञानके लिये जो भक्ति की जाती है, वह सात्त्विकी है। यह जगत् जगन्नाथका ही स्वरूप है, उनसे भिन्न इसका दूसरा कोई कारण नहीं है, मैं भी भगवान्से भिन्न नहीं हूँ और वे भी मुझसे पृथक् नहीं हैं, ऐसा समझकर भेद उत्पन्न करनेवाली बाह्य उपाधियोंका त्याग करना और अधिक प्रेमसे भगवत्-स्वरूपका चिन्तन करते रहना—यह अद्वैत (निर्गुणा) नामवाली भक्ति है, जो मुक्तिका साक्षात् साधन है। यह अत्यन्त दुर्लभ है। २
अब मैं भगवान् विष्णुके भक्तोंका लक्षण बतलाता हूँ—जिनका चित्त अत्यन्त शान्त है, जो सबके प्रति कोमल भाव रखते हैं, जिन्होंने स्वेच्छानुसार अपनी इन्द्रियोंपर विजय प्राप्त कर ली है तथा जो मन, वाणी और क्रियाद्वारा कभी दूसरोंसे द्रोह करनेकी इच्छा नहीं रखते, जिनका चित्त दयासे द्रवीभूत होता है, जो चोरी और हिंसासे सदा ही मुख मोड़े रहते हैं, सद्गुणोंके संग्रह तथा दूसरोंके कार्यसाधनमें जो प्रसन्नतापूर्वक संलग्न रहते हैं, सदाचारसे जिनका जीवन सदा उज्ज्वल (निष्कलंक) बना रहता है, जो दूसरोंके उत्सवको अपना उत्सव मानते हैं, सब प्राणियोंके
१- अश्वमेधः क्रतुवरो दानानि सुमहन्ति च। व्रतोपवासनियमाः सहस्राण्यर्जिता अपि॥
समूह एषामेकत्र गणितः कोटिकोटिभिः। विष्णुभक्तेः सहस्रांशसमोऽसौ न हि कीर्तितः॥
(स्क० पु०, वै० उ० १०। ७३-७४)
२- जगच्चेदं जगन्नाथो नान्यच्चापि च कारणम्। अहं च न ततो भिन्नो मत्तोऽसौ न पृथक् स्थितः।
हानं बहिरुपाधीनां प्रेमोत्कर्षेण भावनम्। दुर्लभा भक्तिरेषा हि मुक्तयेऽद्वैतसंज्ञिता॥
(स्क० पु०, वै० उ० १०। ८६-८८)
- वैष्णवखण्ड-उत्कलखण्ड * ३४३
भीतर भगवान् वासुदेवको विराजमान देखकर कभी किसीसे ईर्ष्या-द्वेष नहीं रखते, दीनोंपर दया करना जिनका स्वभाव बन गया है और जो सदा परहितसाधनकी इच्छा रखते हैं, अविवेकी मनुष्योंका विषयोंमें जैसा प्रेम होता है, उससे सौ कोटि गुनी अधिक प्रीतिका विस्तार वे भगवान् श्रीहरिके प्रति करते हैं।१ नित्य कर्तव्यबुद्धिसे विष्णुस्वरूप शंकर आदि देवताओंका भक्तिपूर्वक पूजन और ध्यान करते हैं, पितरोंमें भगवान् विष्णुकी ही बुद्धि रखते हैं, भगवान् विष्णुसे भिन्न दूसरी किसी वस्तुको नहीं देखते। समष्टि और व्यष्टि सब भगवान्के ही स्वरूप हैं, भगवान् जगत्से भिन्न होकर भी भिन्न नहीं हैं, 'हे भगवान् जगन्नाथ! मैं आपका दास हूँ, आपके स्वरूपमें भी मैं हूँ, आपसे पृथक् कदापि नहीं हूँ, जब आप भगवान् विष्णु अन्तर्यामीरूपसे सबके हृदयमें विराजमान हैं, तब सेव्य अथवा सेवक कोई भी आपसे भिन्न नहीं है।' इस भावनासे सदा सावधान रहकर जो ब्रह्माजीके द्वारा वन्दनीय युगल चरणारविन्दोंवाले श्रीहरिको सदा प्रणाम करते, उनके नामोंका कीर्तन करते, उन्हींके भजनमें तत्पर रहते और संसारके लोगोंके समीप अपनेको तृणके समान तुच्छ मानकर विनयपूर्ण बर्ताव करते हैं। जगत्में सब लोगोंका उपकार करनेके लिये जो कुशलताका परिचय देते हैं, दूसरोंके कुशल-क्षेमको अपना ही मानते हैं, दूसरोंका तिरस्कार देखकर उनके प्रति दयासे द्रवीभूत हो जाते हैं तथा सबके प्रति मनमें कल्याणकी भावना करते हैं, वे ही विष्णुभक्तके नामसे प्रसिद्ध हैं। जो पत्थर, परधन और मिट्टीके ढेलेमें, परायी स्त्री और कूटशाल्मली नामक नरकमें, मित्र, शत्रु, भाई तथा बन्धुवर्गमें समान बुद्धि रखनेवाले हैं, वे ही निश्चितरूपसे विष्णुभक्तके नामसे प्रसिद्ध हैं। जो दूसरोंकी गुणराशिसे प्रसन्न होते और पराये मर्मको ढकनेका प्रयत्न करते हैं, परिणाममें सबको सुख देते हैं, भगवान्में सदा मन लगाये रहते तथा प्रिय वचन बोलते हैं, वे ही वैष्णवके नामसे प्रसिद्ध हैं।२ जो भगवान् के पापहारी शुभनाम-सम्बन्धी मधुर पदका जप करते और जय-जयकी घोषणाके साथ भगवन्नामोंका कीर्तन करते हैं, वे अकिंचन महात्मा वैष्णवके रूपमें प्रसिद्ध हैं। जिनका चित्त श्रीहरिके चरणारविन्दोंमें निरन्तर लगा रहता है, जो प्रेमाधिक्यके कारण जडबुद्धि-सदृश बने रहते हैं, सुख और दुःख दोनों ही जिनके लिये समान हैं, जो भगवान्की पूजामें चतुर हैं तथा अपने मन और विनययुक्त वाणीको भगवान्की सेवामें समर्पित कर चुके हैं, वे ही वैष्णवके नामसे प्रसिद्ध हैं। मद और अहंकार गल जानेके कारण जिनका अन्तःकरण अत्यन्त शुद्ध हो गया है, अमरोंके विश्वसनीय बन्धु भगवान् नृसिंहका यजन करके जो शोकरहित हो गये हैं, ऐसे वैष्णव निश्चय ही उच्चपदको प्राप्त होते हैं। भगवान्में सदैव उत्तम भक्ति रखनेवाले भक्तोंके शुभ चरित्र और लक्षणका वर्णन मैंने तुमसे किया है। यह मनुष्योंके कानोंमें पड़ते ही उनके चिरसंचित मलका नाश करता है। भजनके लिये कभी धनकी आवश्यकता तथा शरीरको कष्ट देकर किये जानेवाले किसी विशेष प्रकारके प्रयोगकी भी आवश्यकता नहीं है। मृदुल एवं मन्द स्वरसे वाणीके द्वारा भगवान्के
१- विषयेष्वविवेकानां या प्रीतिरुपजायते।
वितन्वते तु तां प्रीतिं शतकोटिगुणां हरौ॥ (स्क० पु०, वै० उ० १०। १०४-१०५)
२- दृषदि परधने लोष्टखण्डे परवनितासु च कूटशाल्मलीषु।
सखिरिपुसहजेषु बन्धुवर्गे सममतयः खलु वैष्णवाः प्रसिद्धाः॥
गुणगणसुमुखाः परस्य मर्मच्छदनपराः परिणामसौख्यदा हि।
भगवति सततं प्रदत्तचित्ताः प्रियवचसः खलु वैष्णवाः प्रसिद्धाः॥
(स्क० पु०, वै० उ० १०। ११-१२)
३४४ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
नामोंका कीर्तन होता रहे, तो मैं इसीको भजन मानता हूँ। तुम्हारे मनमें भगवान्के दास्यभावका ही चिन्तन होना चाहिये।
किंतु जो मनुष्योंके शुभ आचरणोंसे भी द्वेष करते हैं और स्वयं अपने चित्तको दुराचारमें ही बाँधे रखते हैं, बड़े भारी अमंगलको पा करके भी निश्चिन्त रहते हैं और सदा ऐश्वर्य तथा विषयभोगके रसमें ही सुखका अनुभव करते हैं, वे मनुष्य वैष्णव नहीं हैं; वे तो बहुत ही निम्नश्रेणीके मनुष्य हैं। अपने हृदयरूपी कमलमें विराजमान परमानन्दमय श्रीहरिके स्वरूपका जो क्षणभर भी चिन्तन नहीं करते, उन्मत्तभावसे बैठे रहते हैं और अपने झूठे वचनोंके जालसे भगवान्के नामको भी निरन्तर आच्छादित किये रहते हैं, वे भी भगवान्के भक्त नहीं हैं। जिनके मनमें परायी स्त्री और पराये धनके लिये सदा लोभ बना रहता है, जो कृपण बुद्धिवाले हैं और सदा अपना ही पेट भरनेमें लगे रहते हैं, वे नरपशु विष्णुभक्तिसे सर्वथा रहित हैं। जो निरन्तर दुष्ट पुरुषोंके साथ अनुराग रखते हैं, दूसरोंका तिरस्कार और हिंसा करते हैं, जिनका स्वभाव अत्यन्त भयंकर है तथा जो भगवान् नृसिंहके चरणोंके चिन्तनसे विरक्त रहते हैं, उन मलिन मनुष्योंको दूरसे ही त्याग देना चाहिये।
राजा इन्द्रद्युम्नका पुरुषोत्तमक्षेत्रको प्रस्थान और महानदीके तटपर विश्राम
जैमिनिजी कहते हैं—ब्रह्मपुत्र देवर्षि नारदसे इस प्रकार उत्तम भगवद्भक्तिका वर्णन सुनकर राजा इन्द्रद्युम्न बहुत प्रसन्न हुए और इस प्रकार बोले—‘भगवन्! विद्वान् पुरुषोंने मुझे बताया था कि साधु पुरुषोंका संग संसाररूपी रोगका नाश करनेवाला है, ऐसा साधुसंग मुझे इसी समय प्राप्त हुआ है। आपके संगसे मेरे अज्ञानमय अन्धकारका नाश हो गया, क्योंकि मेरा चित्त इस समय नीलमाधवकी पूजा करनेके लिये अत्यन्त उतावला हो रहा है। अतः हम और आप दोनों ही रथपर बैठकर चलें और भगवान् नीलमाधवका दर्शन करें। यदि आपके मुखसे पुरुषोत्तमक्षेत्रके तीर्थोंका ज्ञान प्राप्त कर सकूँ, तो पहलेके कहे हुए महात्माओंके वचन भी सफल हो जायँ।'
नारदजीने कहा—राजन्! यह तो बड़े हर्षकी बात है। मैं तुम्हें पुरुषोत्तमक्षेत्र और वहाँके तीर्थोंके दर्शन कराऊँगा। उस तीर्थमें जो शक्तियाँ और शिव आदि हैं, उन्हें भी दिखाऊँगा। उस क्षेत्रके माहात्म्यका भी परिचय दूँगा। तुम वहाँ भक्तोंको आत्मसमर्पण करनेवाले देवेश्वर भगवान् जगन्नाथका साक्षात् दर्शन करोगे।
इस प्रकार वार्तालाप करके दोनोंने प्रसन्नतापूर्वक दिनका कृत्य समाप्त किया और ज्येष्ठ शुक्ला पंचमी बुधवारको पुष्य नक्षत्रमें उत्तम लग्न आनेपर यात्रा अनुकूल होगी, ऐसा निर्णय करके दोनोंने रातके समय एक ही स्थानपर शयन किया। फिर सबेरा होनेपर नृपश्रेष्ठ इन्द्रद्युम्नने भाइयोंसहित नीलाचलपर जानेके विषयमें अपने राज्यमें यह घोषणा करायी कि 'हमलोग जीवनपर्यन्त पुरुषोत्तमक्षेत्रमें निवास करेंगे। राजालोग अपनी रानियों, मन्त्रियों तथा परिकरोंसमेत रथ, हाथी, घोड़ा, खजाना और पैदल सेना साथ लेकर वहाँ चलें।' इस प्रकार आज्ञा देकर राजा इन्द्रद्युम्न अपने आगे खड़े हुए नारद मुनिकी परिक्रमा करके छड़ीदार सिपाहियोंसे घिरे हुए मध्यद्वारपर आये। उनके आगे-आगे अग्निहोत्रकी अग्नि ले जायी जा रही थी। वहाँ उन्होंने अपने दाहिनी ओर ब्राह्मणोंको खड़े हुए देखा, जो मांगल्यसूक्तका पाठ कर रहे थे। राजाने भक्तिसे विनीत होकर वस्त्र, आभूषण, माला, सुगन्ध और अनुलेपनके
* वैष्णवखण्ड-उत्कलखण्ड * ३४५
द्वारा उन ब्राह्मणोंका पूजन किया। इसी समय एक ही साथ सैकड़ों शंख बज उठे। उनके साथ और भी बहुत-से बाजोंकी तुमुल ध्वनि महाराजने सुनी। तदनन्तर वे मन्दिरमें भगवान् विष्णुका दर्शन करनेके लिये गये, जिनका स्मरण करनेसे मनुष्य सब प्रकारके कल्याणका भागी होता है। दिव्य सिंहासनपर बैठे हुए उन्हीं भगवान् विष्णुका दूरसे दर्शन करके उन्होंने साष्टांग प्रणाम किया और उपनिषदोंकी दिव्य वाणीसे उनकी स्तुति करके दुर्गाजीके चरणोंमें भी मस्तक झुकाया। तत्पश्चात् उन दोनों देवताओंकी परिक्रमा करके उन्हें पालकीमें बिठाया और उनको आगे करके प्रस्थान किया। बाहरके दरवाजेपर पहुँचकर उन्होंने अपना रथ तैयार देखा और परिक्रमा करके वे नारदजीके साथ उस रथपर बैठे। इन्द्रद्युम्नके रथके दोनों ओर उनके अधीन राजाओंके अनेकों रथ शोभा पा रहे थे, जो नाना प्रकारके अस्त्र-शास्त्रोंसे संयुक्त तथा ध्वजा-पताकाओंसे अलंकृत थे। उसी समय पुरवासी भी अपना-अपना सामान लेकर तैयार हो गये और घोड़े, खच्चर तथा ऊँट आदि वाहनोंपर चढ़कर वहाँसे चल दिये। राजाओंकी सैकड़ों रानियाँ, नपुंसक सिपाहियोंसे घिरी हुई अनेक प्रकारकी सवारियोंपर चढ़कर राजभवनसे बाहर निकलीं। बड़े-बड़े राज्याधिकारी तथा विशाल सैनिक भी उनकी रक्षामें तत्पर थे। राजाके सामन्त, मन्त्री, सेवक, पुरोहित, ऋत्विग् तथा राजाके व्यक्तिगत सेवक भी सब प्रकारके उपयोगी सामान साथ लेकर चले। कोषके संरक्षणमें नियुक्त किये गये राजकर्मचारी सारा खजाना साथ लेकर शीघ्र ही प्रस्थित हुए, जो अवसरके अनुसार राजसेवामें उपस्थित होते थे। सामान बेचकर जीविका चलानेवाले सेठ, व्यापारी, माली आदि भी अपनी-अपनी विक्रयकी वस्तुएँ लेकर राजाज्ञाका पालन करते हुए चले। जिसके लिये जो मार्ग सीधा प्रतीत हुआ, वह उसीसे गया। नीलाचलपर पहुँचानेवाले कठिन-से-कठिन मार्गके द्वारा भी लोगोंने यात्रा की। महाराज इन्द्रद्युम्न समस्त पुरवासियों तथा हर्षमें भरी हुई चतुरंगिणी सेनासे घिरे हुए थे। जंगलका रास्ता जाननेवाले पुरुष जो मार्ग बतलाते, उसीसे राजा यात्रा करते थे। मार्गके दोनों ओर आनेवाले देशों और वनोंको देखते हुए वे बड़ी शीघ्रतासे यात्रा कर रहे थे। महानदीके तटपर जहाँ वृक्ष बहुत कम थे तथा पर्वतीय गुफाओंके कारण जो स्थान बहुत प्रसिद्ध था, वहाँ उन्होंने अपराह्नकालका आवश्यक कृत्य करनेके लिये अपनी सेनाका पड़ाव डाला। फिर अपने पुरोहितके साथ नदीके जलमें उतरे और स्नान करके देवताओं तथा पितरोंका तर्पण किया। तत्पश्चात् विधिपूर्वक भगवान् विष्णुकी पूजा करके नारदजीके साथ बैठकर भोजन किया। जब सूर्य अस्ताचलके शिखरपर पहुँचे, तब सायंकालकी उपासना पूरी करके राजा सभामें बैठे। उस समय उन्होंने श्रेष्ठ वैष्णवोंका चन्दन, माला और ताम्बूलोंसे पूजन किया। तदनन्तर भगवान्के सर्वपापापहारी चरित्रका श्रवण करनेके लिये सिंहासनपर बैठे हुए मुनिवर नारदजीसे राजा इस प्रकार कहा—'भगवन् ! आप वेद और वेदांगोंकी निधि हैं, भगवान्के प्रिय
३४६ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
भक्त हैं। यदि मुझपर आपकी कृपा हो तो भगवान् विष्णुकी लीलाकथारूपी सुधासे मेरे मलिन अन्तःकरणको शुद्ध कर दीजिये।'
देवर्षि नारद तथा राजा इन्द्रद्युम्नमें इस प्रकारकी बात चल ही रही थी कि द्वारपालने समीप आकर सूचना दी 'महाराज! उत्कल देशके राजा आपके द्वारपर उपस्थित हैं और श्रीमान्के चरणारविन्दोंका दर्शन करना चाहते हैं।' राजा बोले—'श्रीमान् ओढ्रनरेशको शीघ्र ही भीतर ले आओ, उनका दर्शन करके हम सब लोग पापरहित हो जायेंगे।' महाराजका यह वचन सुनकर द्वारपालने शीघ्र ही राजसभामें उत्कल-नरेशका प्रवेश कराया। अपने वैष्णव मन्त्रियोंके साथ राजसभामें प्रवेश करके ओढ्रदेशके राजाने इन्द्रद्युम्नके वन्दनीय चरणोंको सादर नमस्कार किया। तब उन वैष्णव नरेशको उठाकर महाराज इन्द्रद्युम्नने उनका सत्कार किया और अपने आसनपर ही बिठाकर विनययुक्त वाणीमें कहा—'राजन्! आप कुशलसे तो हैं न? ओढ्रपते! नीलाचल-शिखरनिवासी भगवान् माधव तो वहाँ विजयपूर्वक विराज रहे हैं न? क्या आपकी निर्मल बुद्धि भगवान्के चरणारविन्दोंमें लगती है? समस्त प्राणियोंमें समान चित्त रखनेवाले आपका मन भगवान्में अनुरक्त तो है न?'
तब उत्कलनरेशने हाथ जोड़, नम्रतापूर्वक कहा—'स्वामिन्! आपके चरणोंकी कृपासे मेरे लिये सर्वत्र कुशल है। दक्षिण समुद्रके तटपर जंगलोंसे घिरा हुआ नीलाचल विद्यमान है, किंतु वहाँ लोगोंका आना-जाना नहीं है। भगवान् नीलमाधव भी वहीं हैं परंतु इस समय प्रचण्ड आँधीके कारण उठी हुई अधिक बालुकाराशिसे छिप गये हैं, ऐसी बात सुनी जाती है। इसीलिये मेरे राज्यमें भी अकाल और मृत्युका भय बढ़ गया है, परंतु अब आप पधारे हैं, तो सर्वत्र कुशल ही होगा।' उत्कलनरेशके ऐसा कहनेपर राजा इन्द्रद्युम्नने उनका आदर करते उन्हें विदा किया और नारदजीकी ओर देखकर उदासीन भावसे कहा—'मुने! यह क्या हो गया?'
नारदजी बोले—राजन्! इस विषयमें तुम्हें विस्मय नहीं करना चाहिये। श्रेष्ठ वैष्णव भाग्यवान् होता है। वैष्णवोंका मनोरथ कभी निष्फल नहीं होता। जगत्के आदिकारण एवं रोग-शोकसे रहित प्रत्यक्ष शरीर धारण किये हुए भगवान् नारायणको तुम अवश्य देखोगे। वे तुमपर ही अनुग्रह करनेके लिये इस पृथ्वीपर उतरेंगे। सम्पूर्ण चराचर जगत् भगवान् विष्णुके वशमें है। सनातन परमात्मा विष्णु किसीके भी वशमें नहीं हैं; वे भगवान् भक्तवत्सल हैं। अतः केवल भक्तिके वशमें रहते हैं। भगवान् विष्णुकी भक्ति ही धर्म, अर्थ, काम और मोक्षरूपी चारों पुरुषार्थोंकी जड़ है। वह भक्ति ही भगवान्को वशमें करनेका उपाय है। एक ही भगवान् विष्णु अपनी मायासे अनेक रूपमें प्रकट हुए हैं। इसलिये उन परमात्माके सिवा और कोई भी सुखका कारण नहीं है। राजेन्द्र! तुम ब्रह्माजीकी सन्तान-परम्परामें पाँचवें पुरुष हो, साथ ही श्रेष्ठ वैष्णव हो। तुमने अठारह विद्याओंमें पूर्ण विद्वत्ता प्राप्त की है और तुम सदैव सदाचारमें स्थित रहते हो। तुमने इस पृथ्वीका न्यायपूर्वक पालन किया है, विशेषतः तुम ब्राह्मणोंके पूजक हो। अतः पुरुषोत्तमक्षेत्रमें इन चर्मचक्षुओंसे भगवान् पुरुषोत्तमका दर्शन तुम्हें अवश्य प्राप्त होगा। तुम्हारे इस कार्यमें स्वयं ब्रह्माजीने मुझे नियुक्त किया है। पुरुषोत्तमक्षेत्रमें चलनेपर वह सब बात मैं तुम्हें बताऊँगा। इस समय रातका तीसरा पहर चल रहा है; इन सब राजाओंको अपने-अपने डेरेमें जानेकी आज्ञा दो और तुम भी आराम करो।
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