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संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ
८०६* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

विमानसे उतरे। उतरकर उन्होंने उन दोनों पति-पत्नीके कानोंमें स्वयं ही ज्ञानका उपदेश किया। उपदेशके अनन्तर अनिर्वचनीय परम ज्योतिःस्वरूप वह श्रेष्ठ विमान आकाशमार्गको प्रकाशित करता हुआ तत्काल ऊपरको चला गया और महादेवजी भी अपने परम धाममें चले गये।

स्कन्दजी कहते हैं—तभीसे ज्ञानवापीतीर्थका महत्त्व इस संसारमें सबसे अधिक हो गया। ज्ञानवापी भगवान् शिवकी प्रत्यक्ष मूर्ति एवं ज्ञान उत्पन्न करनेवाली है।

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संक्षेपसे सदाचार और उसके महत्त्वका वर्णन

**अगस्त्यजी बोले—**भगवन्! अविमुक्त नामक महाक्षेत्र परमुक्तिका कारण है। वह सम्पूर्ण क्षेत्रोंमें सबसे श्रेष्ठ और मंगलोंमें भी परम मंगलरूप है। जहाँ गंगा, विश्वनाथ और काशी—ये तीनों जागरूक हैं, वहाँ मोक्षरूपी सम्पत्ति मिलती है। इसमें कौन-सी आश्चर्यकी बात है। स्कन्दजी! किस-किस धर्मका आचरण करनेवाले पुरुषको काशीधामकी प्राप्ति होती है, यह बताइये। मैं तो ऐसा मानता हूँ कि सदाचारके बिना किसीके भी मनोरथ सिद्ध नहीं हो सकते। आचार परम धर्म है, आचार उत्तम तप है, आचारसे आयु बढ़ती है और आचारसे समस्त पापोंका क्षय हो जाता है*। इसलिये आप पहले आचारका ही वर्णन करें।

**स्कन्द बोले—**मुने! मैं सत्पुरुषोंके लिये हितकर सदाचारका वर्णन करता हूँ, सुनो। इस लोकमें सब प्रकारके प्राणियोंमें सबसे बढ़कर मनुष्य हैं। मनुष्योंमें श्रेष्ठ ब्राह्मण हैं और ब्राह्मणोंसे भी श्रेष्ठ विद्वान् हैं। विद्वानोंमें भी वे सबसे श्रेष्ठ हैं, जिनकी बुद्धि परम पवित्र एवं वशमें की हुई है। उनसे भी श्रेष्ठ वे लोग हैं जो पवित्र बुद्धिद्वारा किये हुए निश्चयके अनुसार कर्म करते हैं। उनसे भी श्रेष्ठ वे हैं जो सदा ब्रह्मचिन्तनमें तत्पर रहते हैं।

ब्रह्माजीने ब्राह्मणको सम्पूर्ण जीवोंका स्वामी बनाया है। इसलिये इस जगत्में जो कुछ भी स्थित है, उस सब वस्तुको प्राप्त करनेका योग्य अधिकारी ब्राह्मण ही है। उनमें भी जो सदाचारी है, वही सब कर्मोंके योग्य है, आचारभ्रष्ट नहीं। इसलिये ब्राह्मणको सदा आचारवान् होना चाहिये। मुने! राग-द्वेषसे रहित विद्वान् ब्राह्मण जिस आचारका पालन करते हैं, उसीको ज्ञानी पुरुष धर्ममूलक सदाचार मानते हैं। जो उत्तम लक्षणोंसे हीन होनेपर भी उत्तम आचारके पालनमें तत्पर, श्रद्धालु और दूसरोंके दोष न देखनेवाला है, वह मनुष्य सौ वर्षोंतक जीवित रहता है। अपने-अपने वर्णाश्रमोचित कर्मोंके विषयमें श्रुतियों और स्मृतियोंद्वारा जो धर्ममूलक सदाचार बतलाया गया है, उसका आलस्य छोड़कर पालन करना चाहिये। दुराचारी पुरुष इस संसारमें निन्दनीय होता है, उसे नाना प्रकारके रोग सताते हैं और वह सदा अत्यन्त दुःखका भागी एवं अल्पायु होता है। जिस कर्मको करते समय अन्तरात्मा प्रसन्न होता हो (जिसमें भय, आशंका एवं लज्जा आदिका अनुभव न होता हो), उसी कर्मको करना चाहिये, उससे विपरीत कर्मको नहीं। सत्य, क्षमा, आर्जव (सरलता एवं कोमलता), ध्यान, क्रूरताका अभाव, अहिंसा, दम (मन और इन्द्रियोंका संयम), प्रसन्नता, मधुरता और मृदुता—ये दस प्रकारके यम बताये गये हैं। शौच (बाहर-भीतरकी पवित्रता), स्नान, तप, दान, मौन, यज्ञ, स्वाध्याय, व्रत, उपवास और उपस्थेन्द्रियको वशमें रखना—ये दस नियम कहे गये हैं। काम, क्रोध, मद, मोह, मात्सर्य और लोभ—इन छः शत्रुओंको जीत लेनेपर मनुष्य सर्वत्र विजयी होता है। दूसरेको कष्ट न देते हुए धीरे-धीरे धर्मका संग्रह करना चाहिये। क्योंकि


* आचारः परमो धर्म आचारः परमं तपः। आचाराद्धर्धते ह्यायुराचारात् पापसंक्षयः॥ (स्क० पु०, का० पू० ३५। १५)

* काशीखण्ड-पूर्वार्ध *८०७

वही परलोकमें सहायक होता है। परलोकमें केवल धर्म ही सहायक होता है। पिता, माता, पुत्र, भाई, पत्नी, बन्धु-बान्धव और घरका साज-सामान—ये सब वहाँ सहायता नहीं करते। जीव अकेला जन्म लेता और अकेला ही मरता है। पुण्य और पापका भोग भी वह अकेला ही करता है। मृत्युको प्राप्त हुए शरीरको लकड़ी और ढेलेकी भाँति पृथ्वीपर फेंककर भाई-बन्धु मुँह फेर चल देते हैं। परलोकमें जाते हुए जीवके साथ तो केवल उसका धर्म जाता है। अतः पुण्यात्मा पुरुष परलोकमें सहायता करनेवाले धर्मका संग्रह अवश्य करे। धर्मको सहायक पाकर जीव नरकके दुस्तर अन्धकारसे भलीभाँति पार हो जाता है। उत्तम बुद्धिवाला पुरुष सदा श्रेष्ठ पुरुषोंके साथ सम्बन्ध स्थापित करे और नीच पुरुषोंका संग त्यागकर अपने कुलको उन्नतिकी ओर ले जाय। जो स्वाध्याय नहीं करता, सदाचारका उल्लंघन करता है तथा आलसी एवं दूषित अन्न खानेवाला है, ऐसे ब्राह्मणको यमराज पीड़ा देते हैं। इसलिये द्विज सदा यत्नपूर्वक सदाचारका पालन करे। व्याहृति और प्रणवके साथ प्रतिदिन किये जानेवाले सोलह प्राणायाम एक ही मासमें भ्रूणहत्यारेको भी पवित्र कर देते हैं। जैसे सोने, चाँदी आदि धातुओंके मल आगमें तपानेसे जल जाते हैं, उसी प्रकार इन्द्रियोंद्वारा किये हुए दोष प्राणायामसे नष्ट हो जाते हैं। प्रणव, सातों व्याहृतियाँ और त्रिपदा गायत्री—ये सब मिलकर एक प्राणायाम-मन्त्र हैं, जो इनके जपमें संलग्न है, उसको कहीं भी भय नहीं है। ॐकार परब्रह्म हैं, प्राणायाम परम तपस्या है और गायत्री-मन्त्रसे बढ़कर परम पावन वस्तु दूसरी कोई नहीं है। केवल गायत्री-मन्त्रका जप करनेवाला जितेन्द्रिय ब्राह्मण भी श्रेष्ठ है।

इस लोकमें जिसका चित्त निर्मल (शुद्ध) है, वह सब तीर्थोंमें स्नान कर चुका। वही सब प्रकारके मलसे रहित है और उसीने सैकड़ों यज्ञोंद्वारा देवाराधन किया है। मुने! वह चित्त जिस प्रकार निर्मल होता है, वह उपाय सुनो। जब भगवान् विश्वनाथ प्रसन्न हों तभी चित्त शुद्ध होता है। अतः चित्तशुद्धिके लिये भगवान् काशीनाथकी शरण लेनी चाहिये। उनकी शरण लेनेसे निश्चय ही मनके मल नष्ट हो जाते हैं और मानसिक मलका नाश होनेपर भगवान् विश्वनाथकी कृपासे इस शरीरका त्याग करके मनुष्य परब्रह्मको प्राप्त होता है। मनुष्योंको भगवान् विश्वनाथकी कृपा होनेमें वेदों और स्मृतियोंद्वारा बताये हुए सदाचारको ही प्रधान हेतु माना गया है। इसलिये उसका पालन अवश्य करे। विधिपूर्वक सन्ध्योपासन और तर्पण करनेके पश्चात् नित्यहोम करके वेदोंका स्वाध्याय करे।

प्रतिदिन प्रातःकाल दो घड़ी रात रहते उठकर मलोत्सर्ग आदि आवश्यक कार्य करनेके पश्चात् अंगोंकी शुद्धि तथा आचमन (कुल्ला) करे। फिर दन्तधावन करे। स्नानके द्वारा समस्त शरीरको शुद्ध करके प्रातःकालकी सन्ध्या करे। वेदोंके अर्थका विचार तथा अनेक प्रकारके शास्त्रोंका अनुशीलन करे। पवित्र, हितकारी तथा बुद्धिमान् शिष्योंको पढ़ावे और योग-क्षेम आदिकी सिद्धिके लिये परमेश्वरकी शरण ले। तदनन्तर मध्याह्नकालके नित्यकर्मका अनुष्ठान करनेके लिये पूर्वोक्त रूपसे पुनः स्नान करे। स्नानके पश्चात् मध्याह्नकालकी सन्ध्या करे। तत्पश्चात् चूल्हेकी आगको प्रज्वलित करके बलिवैश्वदेव करे। निष्पाव, कोदो, उड़द, केराव, चना, तेलमें पकायी हुई वस्तुएँ तथा सब प्रकारके नमकीन भोजन वैश्वदेवमें त्याज्य हैं। अरहर, मसूर, मटर, वरट, भोजनसे बची हुई वस्तु अथवा बासी अन्न—इन सबको वैश्वदेवकर्ममें त्याग देना चाहिये। रही, जीविकाहीन, विद्यार्थी, गुरुका पोषण करनेवाला, संन्यासी और ब्रह्मचारी—ये छः धर्मभिक्षुक कहे गये हैं। राहीको 'अतिथि' जानना चाहिये और वेदोंके पारंगत विद्वान्को 'अनूचान' कहते हैं। ये दोनों ब्रह्मलोकप्राप्तिकी इच्छावाले सद्गृहस्थोंके लिये

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सदैव सम्माननीय हैं। सायंकालकी सन्ध्योपासना एवं गायत्री-जप करके घरपर आये हुए अतिथिका मधुर वचन, रहनेके लिये स्थान, आसन और अन्न-जल आदिके द्वारा भलीभाँति सत्कार करे। इस प्रकार रात्रिका प्रथम प्रहर व्यतीत करके शयन करे। रातमें अधिक तृप्तिपूर्वक भोजन नहीं करना चाहिये (भूखसे कुछ कम ही खाना चाहिये)।


संस्कारोंका संक्षिप्त परिचय, ब्रह्मचारी एवं ब्रह्मचर्य-आश्रमके धर्म

स्कन्दजी कहते हैं—कुम्भज ! ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य—ये तीनों वर्ण द्विज माने गये हैं। जिसका दो बार जन्म हो, उसको 'द्विज' कहते हैं। ये ब्राह्मण आदि वर्ण पहले तो मातासे उत्पन्न हुए हैं और फिर उपनयन-संस्कारसे इनका द्वितीय जन्म सम्पन्न हुआ है। इन सबकी गर्भाधान आदिसे लेकर अन्त्येष्टि कर्मतक समस्त क्रियाएँ वैदिक मन्त्रोंसे सम्पन्न होती हैं। बुद्धिमान् पुरुष ऋतुकालमें रजस्वला स्त्रीके स्नान आदिसे शुद्ध हो जानेपर उसके भीतर गर्भका आधान करे। गर्भाधानकर्ममें मूल और मघा नक्षत्रको त्याग दे। गर्भका बालक जब उदरमें चलने-फिरने लगता है, उसके पहले ही उसका पुंसवन-संस्कार होना चाहिये। तत्पश्चात् छठे या आठवें महीनेमें सीमन्तोन्नयन-संस्कार करे। जब बालक उत्पन्न हो जाय तब तुरंत जातकर्म-संस्कार करे। ग्यारहवें दिन नामकरण और चौथे महीनेमें बालकके घरसे बाहर निकलनेका मुहूर्त करे। छठे मासमें अन्नप्राशन और एक वर्षमें चूड़ाकर्म करे अथवा अपने कुलमें जैसा आचार हो, वैसा करे। इन सब संस्कारोंको करनेसे बीज अथवा गर्भजनित दोष नष्ट हो जाते हैं। कन्याओंके लिये ये सब संस्कार बिना मन्त्रके करने चाहिये। केवल विवाह-संस्कार मन्त्रयुक्त करनेका विधान है। ब्राह्मण सातवें या आठवें वर्षमें गायत्री-मन्त्रकी दीक्षा लेनेके योग्य हो जाता है, क्षत्रिय ग्यारहवें वर्षमें और वैश्य बारहवें वर्षमें इसके योग्य होता है अथवा जैसा अपने कुलका आचार हो वैसा करना चाहिये। ब्राह्मण ब्रह्मतेजकी वृद्धिके लिये पाँचवें वर्षमें, बलकी इच्छा रखनेवाला क्षत्रिय छठे वर्षमें और वैश्य आठवें वर्षमें मौंजी (मेखला) धारण करे। गुरुको चाहिये कि वह शिष्यका उपनयन-संस्कार करके उसे उसी समय महाव्याहृतिपूर्वक गायत्री-मन्त्रका उपदेश दें एवं वेदोंका स्वाध्याय करावें। साथ ही शिष्यको शौचाचारके पालनमें नियुक्त करें। ब्रह्मचारी बालक पूर्वोक्त विधिसे शौच और आचमन करे। दाँत और जिह्वाकी अच्छी तरह शुद्धि करके शरीरको खूब मल-मलकर स्नान करे। स्नानके समय जल-देवता-सम्बन्धी मन्त्रोंका भी उच्चारण करे। तत्पश्चात् यत्नपूर्वक प्राणायाम करके दोनों सन्ध्याओंके समय सूर्यका उपस्थान करे। फिर गायत्रीजपसे निवृत्त होकर अग्निहोत्र करके ब्राह्मणोंको प्रणाम करे। प्रणामके समय इस प्रकार कहे—'अमुक गोत्रः अमुक शर्माहं भो ब्राह्मणा! भवतोऽभिवादये' (मैं अमुक गोत्र और अमुक नामवाला हूँ, विप्रवरो! आपको मैं प्रणाम करता हूँ)। जो सदा गुरुजनोंको प्रणाम करता है और बड़े-बूढ़ोंकी सेवामें तत्पर रहता है, उसकी आयु, यश, बल और बुद्धि प्रतिदिन अधिक बढ़ती है*। शिष्यको चाहिये कि वह गुरुके बुलानेपर उनके समीप बैठकर पढ़े। भिक्षामें जो अन्न प्राप्त हो, वह गुरुकी सेवामें निवेदन करे। मन, वाणी और क्रियाद्वारा सदा गुरुके हितका कार्य करे। जो छात्र साधु, विश्वासपात्र, ज्ञानवान्, धन देनेमें समर्थ, शक्तिशाली, कृतज्ञ, पवित्र, द्रोहरहित और


* अभिवादनशीलस्य वृद्धसेवारतस्य च। आयुर्यशो बलं बुद्धिवर्द्धतेऽहरहोऽधिकम् ॥ (स्क० पु०, का० पू० ३६। १३)

  • काशीखण्ड-पूर्वार्ध * | ८०९ ---|---

दोषदृष्टि न रखनेवाले हों, उन सबको धर्मकी दृष्टिसे पढ़ाना गुरुका कर्तव्य है, अर्थके लोभसे नहीं। ब्रह्मचारी शिष्य मेखला, दण्ड, यज्ञोपवीत और मृगचर्म धारण करे। उत्तम ब्राह्मणोंके यहाँसे अपने निर्वाहके लिये भिक्षा ग्रहण करे। ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य क्रमशः आदि, मध्य और अन्तमें 'भवत्' शब्दका प्रयोग करके भैक्षचर्या करे। यथा 'भवति भिक्षां मे देहि मातः!' यह ब्राह्मण-बालक कहे; क्षत्रिय 'भिक्षां भवति मे देहि' ऐसा कहे और वैश्य ब्रह्मचारी 'भिक्षां मे देहि भवति' ऐसा बोले। गुरुकी आज्ञा लेकर मौनभावसे अन्नकी निन्दा न करते हुए भोजन करे। ब्रह्मचारी किसी एक व्यक्तिके घरका अन्न न खाय, परंतु श्राद्धमें अथवा आपत्तिकालमें वह एक व्यक्तिका अन्न भी खा सकता है। अधिक भोजन करना आरोग्य, आयु, स्वर्ग और पुण्यका नाश करनेवाला है। यह लोकविरुद्ध कार्य भी है। इसलिये अति भोजनका सर्वथा त्याग करे। मधु, मांस, प्राणियोंकी हिंसा, उगते हुए सूर्यकी ओर देखना, अंजन लगाना, स्त्रीकी ओर देखना, बासी और उच्छिष्ट अन्न खाना और दूसरोंकी निन्दा करना—ब्रह्मचारी यह सब सर्वथा त्याग दे। ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्योंके उपनयनका अन्तिम समय क्रमशः सोलह वर्ष, बाईस वर्ष और चौबीस वर्षतक है। जिनकी आयु इससे ऊपरकी हो गयी है, उनका संस्कार नहीं करना चाहिये। वे पतित (व्रात्य) तथा धर्मसे भ्रष्ट होते हैं। व्रात्यस्तोम नामक यज्ञसे उनका पतितपन दूर होता है। जो गायत्री-मन्त्रसे भ्रष्ट हैं, ऐसे लोगोंके साथ विवाहादि सम्बन्ध नहीं करना चाहिये। ब्राह्मण आदि वर्णोंके लोग क्रमशः सन, रेशम और ऊनके वस्त्र धारण करें। ब्राह्मणकी मेखला मूँजकी, क्षत्रियकी मेखला मुर नामक तृणकी तथा वैश्यकी मेखला सनके तन्तुओंकी बनानी चाहिये। प्रत्येक मेखला तीन तारकी एवं चिकनी होनी चाहिये। ब्राह्मणादिके यज्ञोपवीत क्रमशः कपास, सन और ऊनके होने चाहिये। ब्राह्मणका दण्ड बेल और पलासका, क्षत्रियका दण्ड बरगद और खैरका तथा वैश्यका दण्ड पीलू और गूलरका होना चाहिये। पहले-पहल माता, मौसी, बहन और बुआ आदिसे भिक्षा माँगनी चाहिये तथा जो याचना करनेपर अस्वीकार न करें, ऐसी स्त्रियोंसे भी वह भिक्षा माँग सकता है। जबतक वेद पढ़े और वैदिक व्रतोंका पालन करता रहे, तबतक ब्रह्मचारी ही रहे। अध्ययन पूरा होनेके पश्चात् स्नातक होकर गृहस्थ होवे। जो गृहस्थ-आश्रमको स्वीकार करके पुनः ब्रह्मचर्याश्रमके नियमोंको ग्रहण करता है, वह सब आश्रमोंसे वर्जित हो जाता है। वह न तो वानप्रस्थ हो सकता है, न तो संन्यासी ही। आश्रमभ्रष्ट पुरुष जो जप, होम, व्रत, दान, स्वाध्याय और पितृतर्पण आदि कर्म करता है, वह उसका फल नहीं पाता। वेदपाठके आरम्भमें और अन्तमें सदा ॐकारका उच्चारण करे। ॐकारसे हीन वेदपाठ न तो सफल होता है और न सिद्धिदायक ही होता है। जो वेदोंका ज्ञाता ब्राह्मण दोनों सन्ध्याओंके समय ॐकार और व्याहृतियोंसहित गायत्रीमन्त्रका जप करता है, वह वेदपाठके पुण्यसे युक्त होता है।

विधिपूर्वक किये हुए यज्ञसे जपयज्ञ दसगुना उत्तम बताया गया है। उपांशु जप (सूक्ष्म स्वरसे उच्चारण किया हुआ जप) उससे सौगुना फल देनेवाला है। उपांशु जपकी अपेक्षा भी सहस्रगुना महत्त्व मानस-जपका माना गया है*। द्विजको अपनी शक्तिके अनुसार तीन, दो या एक वेदका अध्ययन करके सदा उसके अभ्यासमें लगे रहना चाहिये। वेदाभ्यास ब्राह्मणके लिये सर्वश्रेष्ठ तपस्या है। जो ब्राह्मण शिष्यका उपनयन-संस्कार करके उसे कल्प और रहस्यसहित वेद पढ़ाता है, उसे विद्वान् पुरुष आचार्य मानते हैं। जो जीविकाके


* विधिक्रतोर्दशगुणो जपक्रतुरुदीरितः। उपांशुस्तच्छतगुणः सहस्रो मानसस्ततः॥ (स्क० पु०, का० पू० ३६।४९)

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लिये वेदके किसी एक भागको अथवा वेदांगोंका ही अध्ययन कराता है, उसे विद्वान् पुरुष उपाध्याय कहते हैं। जो विधिपूर्वक गर्भाधान आदि संस्कार कराता है तथा अन्नसे पालन करता है, वह गुरु कहा गया है। जो जिसके द्वारा वरण किये जानेपर उसके यहाँ अग्न्याधानपूर्वक किये जानेवाले आहवनीय आदि कर्म, पाकयज्ञ तथा अग्निष्टोम आदि याग सम्पन्न करता है, वह उस यजमानका ऋत्विज् कहलाता है। उपाध्यायकी अपेक्षा दसगुना गौरव आचार्यका है, आचार्यसे सौगुना महत्त्व पिताका है और पितासे भी सहस्रगुना गौरव धारण करनेके कारण माता बड़ी है^१। ब्राह्मणोंमें वही बड़ा माना जाता है, जो ज्ञानमें बड़ा हो, क्षत्रियोंमें बलसे, वैश्योंमें धन-धान्यसे और शूद्रोंमें जन्मसे ज्येष्ठताका व्यवहार होता है। जैसे काठका हाथी और चमड़ेका मृग है, वैसे ही बिना पढ़ा हुआ ब्राह्मण है। ये तीनों केवल नाम धारण करनेवाले हैं। जहाँ गुरुकी निन्दा हो और जहाँ गुरुपर झूठे लांछन लगाये जाते हों, वहाँ अपने कानोंको मूँद लेना चाहिये अथवा उठकर अन्यत्र चले जाना चाहिये। गुरुकी सती एवं युवती पत्नीके दोनों चरणोंका स्पर्श करके कभी प्रणाम न करे, दूरसे ही नमस्कार करे। माता, पुत्री अथवा बहिनके साथ भी एकान्तमें नहीं रहना चाहिये, क्योंकि इन्द्रियाँ बड़ी प्रबल होती हैं। वे विद्वानोंको भी मोहमें डाल देती हैं^२। जैसे प्रयत्नपूर्वक कुआँ खोदनेवाला पुरुष पृथ्वीसे जल प्राप्त कर लेता है, उसी प्रकार गुरुकी पूर्णतः सेवा करनेसे शिष्य विद्याको पा लेता है। पुत्रके जन्म और लालन-पालनमें पिता-माता जो क्लेश सहन करते हैं, उसका बदला सौ वर्षोंमें भी नहीं चुकाया जा सकता। इसलिये माता-पिता और गुरुका भी सदैव प्रिय करे। इन तीनोंके सन्तुष्ट हो जानेपर पूर्ण तपस्याका फल प्राप्त होता है। इन तीनोंकी सेवा श्रेष्ठ तपस्या कहलाती है। माताकी सेवासे भूलोक, पिताकी सेवासे भुवर्लोक और गुरुकी सेवासे पुण्यात्मा पुरुष स्वर्गलोकको जीत लेता है। भगवान् विश्वनाथकी कृपासे मनुष्य अखण्ड ब्रह्मचर्यसे युक्त होता है। विश्वनाथजीकी उत्तम दया ही काशीकी प्राप्ति करानेवाली है। काशीकी प्राप्तिसे ज्ञान होता है और ज्ञानसे मनुष्य निर्वाण (मोक्ष) प्राप्त कर लेता है। अतः मोक्षके उद्देश्यसे ही बुद्धिमानोंका सदाचारके लिये प्रयत्न होता है।

गृहस्थ-आश्रममें जिस प्रकार सदाचारका पालन होता है, वैसा दूसरे आश्रममें नहीं। इसलिये विद्याध्ययन पूर्ण करके अन्तमें गृहस्थ-आश्रमकी शरण लेनी चाहिये। यदि पत्नी अपने अधीन रहनेवाली हो तो गृहस्थ-आश्रमसे बढ़कर दूसरा कोई आश्रम नहीं है। पति और पत्नीकी अनुकूलता धर्म, अर्थ तथा कामकी प्राप्ति करानेवाली होती है। यदि स्त्री अपने अनुकूल रहनेवाली हो तो स्वर्गको लेकर भी क्या करना है और यदि पत्नी अपनेसे विपरीत चलनेवाली हो तब तो उसके सामने नरक भी किस गिनतीमें है? कार्यकुशल, पुत्रवती, पतिव्रता, मीठे वचन बोलनेवाली और अपने अधीन रहनेवाली—इन गुणोंसे युक्त पत्नी वस्तुतः स्त्रीके रूपमें साक्षात् लक्ष्मी है^३। विद्याध्ययन समाप्त होनेपर ब्रह्मचारी गुरुकी आज्ञासे ब्रह्मचर्यव्रतका उद्यापन करके स्नातक होकर अपने ही वर्णकी शुभलक्षणा स्त्रीके साथ विवाह कर ले। वह स्त्री अपने पिताके गोत्रकी न हो और माताकी सपिण्ड न हो। विवाह-सम्बन्धमें ऐसे कुलका परित्याग कर दे, जिसमें मृगीरोग, राजयक्ष्मारोग और कोढ़का रोग होता हो। जिस कुलमें किसी प्रकारका कलंक लगा हो, उसको भी त्याग दे। जिससे केवल कन्या


१- उपाध्यायाद्दशाचार्य आचार्यात्तु शतं पिता। सहस्रं तु पितुर्माता गौरवेणातिरिच्यते॥ (स्क० पु०, का० पू० ३६। ५७)
२- न मात्रा न दुहित्रा वा न स्वस्रैकान्तशीलता। बलवतीन्द्रियाण्यत्र मोहयन्त्यपि कोविदान्॥ (स्क० पु०, का० पू० ३६। ६९)
३- दक्षा प्रजावती साध्वी प्रियवाक् च वशंवदा। गुणैरेमीभिः संयुक्ता सा श्रीः स्त्रीरूपधारिणी॥ (स्क० पु०, का० पू० ३६। ८७)

* काशीखण्ड-पूर्वार्ध * ८११

ही होनेकी सम्भावना हो, ऐसी स्त्रीसे विवाह न करे। जिसके कोई रोग न हो, जिसके भाई हों, जो अपनेसे कुछ छोटी हो, जिसका मुख सौम्य हो और जो मीठे वचन बोलनेवाली हो, ऐसी स्त्रीके साथ द्विजको विवाह करना चाहिये। पर्वत, भालू, वृक्ष, नदी, सर्प, पक्षी, नाग और दास आदिका बोध करानेवाले नामोंसे युक्त स्त्रीके साथ विवाह न करे। जिसका नाम सौम्य हो, उसीसे विवाह करे। जिसके कोई अंग अधिक या कम हों, जो बहुत बड़ी अथवा अत्यन्त दुबली हो, बिना रोमकी अथवा अधिकरोमवाली हो तथा जिसके केश रूखे एवं मोटे (चिपके हुए) हों, ऐसी स्त्रीके साथ भी विवाह न करे। मोहवश नीच कुलकी कन्यासे तो कभी विवाह न करे; क्योंकि हीन कुलकी कन्याके साथ विवाह करनेसे अपनी सन्तान भी हीनताको प्राप्त होती है। पहले कन्याके लक्षणोंकी परीक्षा करके तदनन्तर उसके साथ विवाह करे। उत्तम लक्षणोंवाली तथा सदाचारका पालन करनेवाली पत्नी पतिकी आयु बढ़ाती है। अगस्त्यजी ! इस प्रकार मैंने आपसे ब्रह्मचारियोंके सदाचारका वर्णन किया है।

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गृहस्थ-आश्रमके धर्म, पंचयज्ञकी महिमा, काशीवासकी महत्ता तथा राजा दिवोदासको पृथ्वीके राज्यकी प्राप्ति

**स्कन्दजी कहते हैं—**यदि स्त्री शुभलक्षणा हो तो गृहस्थ पुरुष सदा सुख भोगता है। अतः सुखकी वृद्धिके लिये पहले स्त्रीके लक्षणोंकी ही परीक्षा करे। शरीर, आवर्त, गन्ध, छाया (कान्ति), सत्त्व, स्वर, गति और वर्ण—विद्वानोंद्वारा स्त्रीके लक्षणोंकी परीक्षाके लिये यह आठ प्रकारका आधार बताया गया है। (सामुद्रिक शास्त्रीय) उत्तम लक्षणोंसे युक्त होनेपर भी जिसने अपना शील (सतीत्व) दूषित कर लिया हो, वह कुलक्षणा स्त्रियोंकी शिरोमणि है तथा जो बाह्य शुभ लक्षणोंसे युक्त न होनेपर भी सती-साध्वी है, उसे समस्त शुभ लक्षणोंका आधार मानना चाहिये। भगवान् विश्वनाथकी कृपासे ही गृहस्थके घरमें शुभलक्षणा, सदाचारिणी, पतिके अधीन रहनेवाली और पतिव्रता स्त्री प्राप्त होती है। जिन्होंने पूर्वजन्ममें उत्तम तीर्थोंमें अपने शरीरको क्षीण किया अथवा छोड़ा है, वे ही इस जगत्में शुभलक्षणा स्त्री होती हैं। जिन स्त्रियोंने जगन्माता पार्वतीजीका पूजन किया है, वे ही सदाचारिणी होती हैं। जिनका पति उनकेगुणोंसे रीझकर उनके अनुकूल बना रहता है तथा जो उत्तम शील-स्वभाववाली हैं, ऐसी मृगनयनी स्त्रियोंके लिये यहीं स्वर्ग और अपवर्ग (मोक्ष) सुलभ है। वह उनके उत्तम लक्षणोंका ही फल है। स्त्रियाँ अपने अच्छे लक्षणों और विशुद्ध आचरणोंसे अल्पायु पतिको भी दीर्घायु एवं आनन्दका भागी बना देती हैं। अतः सुलक्षणा स्त्रीसे विवाह करना चाहिये।<br><br>गृहस्थ-आश्रममें रहनेवाले पुरुषके द्वारा प्रतिदिन पाँच प्रकारकी हिंसाएँ होती हैं। ओखली, चक्की, चूल्हा, जलका घड़ा और झाडू—ये पाँचों हिंसाके स्थान हैं। ऐसी हिंसाओंका निराकरण करनेके लिये पाँच यज्ञ बताये गये हैं, जो गृहस्थके कल्याणकी वृद्धि करनेवाले हैं। उनके नाम इस प्रकार हैं—ब्रह्मयज्ञ, पितृयज्ञ, देवयज्ञ, भूतयज्ञ और मनुष्ययज्ञ। वेद और शास्त्रोंके पठन-पाठनका नाम ब्रह्मयज्ञ है। तर्पणको पितृयज्ञ कहते हैं। होम देवयज्ञ, बलिवैश्वदेव भूतयज्ञ और अतिथि-सत्कार मनुष्ययज्ञ है। जिसके घरसे आदर न पाकर अतिथि निराश लौट जाता है,

८१२ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *


वह जन्मभरके संचित पुण्यसे तत्काल हाथ धो बैठता है¹। अतः आये हुए अतिथिकी प्रसन्नताके लिये सान्त्वनापूर्ण मधुर वचन, सोनेके लिये स्थान, आसन और जल आदि वस्तुएँ तो सदा देनी ही चाहिये। सायंकालमें सूर्यास्तके समय आये हुए अतिथिका यत्नपूर्वक सत्कार करना चाहिये। सत्कार न पाकर यदि वह अन्यत्र चला जाता है तो अधिक पाप प्रदान करता है। जो अतिथिको भोजन करानेसे बचे हुए अन्नको स्वयं ग्रहण करता है, वह इस लोकमें दीर्घायु और धनवान् होता है। अतिथिको हटाकर स्वयं भोजन करनेवाला गृहस्थ पापका भागी होता है। वैश्वदेवकर्मके अन्तमें और सूर्यास्तके समय जो आता है वही अतिथि है। जो पहलेका आया हो अथवा कहींका देखा हुआ (परिचित) हो वह अतिथि नहीं है। छोटे बालक, (वृद्ध,) स्ववासिनी (पिताके घरमें रहनेवाली स्त्री), गर्भवती और अत्यन्त रोगी स्त्री-पुरुषोंको अतिथिसे पहले भी भोजन कराया जा सकता है। इसमें विचार नहीं करना चाहिये। देवता, पितर और मनुष्योंको देकर खानेवाला गृहस्थ अमृतभोजन करता है। जो केवल अपना पेट पालनेवाला है और अपने ही लिये रसोई बनाता है, वह मनुष्य पापमय भोजन करता है²। शूद्रको कभी वैदिक मन्त्रका श्रवण नहीं कराना चाहिये। उसे वेद-मन्त्रका श्रवण करानेपर ब्राह्मण ब्राह्मणत्वसे और शूद्र अपने धर्मसे गिर जाता है। ब्राह्मण आदि वर्णोंकी सेवा ही शूद्रोंका परम धर्म माना गया है। सदा मंगलमय वचन ही बोले, सबके मंगलका ही चिन्तन करे, कल्याणमय महापुरुषोंका ही संग करे, अमंगलकारी दुष्टोंका साथ कभी न करे³। बुद्धिमान् मनुष्यको चाहिये कि वह रूप, धन और कुलसे हीन मनुष्योंपर कभी आक्षेप न करे। मन, वाणी और जिह्वाके वेगको रोके। घूस, जुआ, दूतीपन और पीड़ित मनुष्यके धनको दूरसे ही त्याग दे। इस प्रकार देवता, ऋषि और पितरोंके ऋणसे उऋण होकर घरका सारा कार्यभार पुत्रको सौंप दे और स्वयं घरपर तटस्थ होकर रहे। घरमें रहकर भी ज्ञानका अभ्यास करे अथवा काशीकी शरण ले। क्योंकि सम्यग्ज्ञानसे मुक्ति प्राप्त होती है अथवा विश्वनाथपुरी काशीमें मुक्ति मिलती है। आज, कल, परसों अथवा सौ वर्ष बाद मृत्यु निश्चित है, शरीर शीघ्र जानेवाला है, अतः यदि वह काशीमें मृत्युको प्राप्त हो तो मनुष्य अमृत (मुक्त) हो जाता है। सदाचारी पुरुषको ही सदाके लिये काशी सुलभ होती है। अतः विद्वान् पुरुष मनसे भी सदाचारका उल्लंघन न करे। बड़ा भारी उपद्रव आनेपर भी जो काशीसे विलग न होने दे, वही महायोग है। अन्य जितने योग हैं, वे सब उपयोग हैं। भगवान् विश्वनाथको जो नियमपूर्वक शुद्ध हृदयसे पत्र, पुष्प, फल और जल अर्पण किया जाता है, वह यहाँ महादान ही है। भगवान् विश्वनाथके दक्षिण भागमें बैठकर हृदयमें उनका चिन्तन करते हुए जो क्षणभरके लिये नेत्र बंद किया जाता है, यही उत्तम महायोग है।

एक समयकी बात है। प्रजापति ब्रह्माजीने राजर्षियोंमें श्रेष्ठ राजा रिपुंजयको प्रत्यक्ष दर्शन दिया। रिपुंजय अविमुक्त नामक महाक्षेत्रमें मन, इन्द्रियोंको वशमें करके तपस्या कर रहे थे। उनका जन्म राजा मनुके वंशमें हुआ था। वे वीर तो थे ही, मूर्तिमान् क्षत्रियधर्मकी भाँति


१- अनर्चितोऽतिथिर्गेहाद् भग्नाशो यस्य गच्छति । आजन्मसञ्चितात्पुण्यात् क्षणात् स हि बहिर्भवेत् ॥
(स्क० पु०, का० पू० ३८ । २९)
२- कुमाराश्च स्ववासिन्यो गर्भिण्योऽतिरुजान्विताः । अतिथेरादितोऽप्येते भोज्या नात्र विचारणा ॥
पितृदेवमनुष्येभ्यो दत्त्वाश्नात्यमृतं गृही । स्वार्थं पचन्नघं भुङ्क्ते केवलं स्वोदरंभरिः ॥
(स्क० पु०, का० पू० ३८ । ३६-३७)
३- भद्रमेव वदेन्नित्यं भद्रमेव विचिन्तयेत् । भद्रैरेवेह संसर्गो नाभद्रैश्च कदाचन ॥ (स्क० पु०, का० पू० ३८ । ८४)

  • काशीखण्ड-पूर्वार्ध * | ८१३ ---|---

प्रकट हुए थे। उनके समीप जाकर ब्रह्माजीने कहा—'महामते! तुम समुद्र, पर्वत और वनोंसहित समूची पृथ्वीका पालन करो। नागराज वासुकि तुम्हें पत्नी बनानेके लिये नागकन्या अनंगमोहिनीको देंगे। देवता भी प्रतिक्षण तुम्हारे प्रजापालनसे सन्तुष्ट होकर तुम्हें स्वर्गीय रत्न और पुष्प प्रदान करते रहेंगे। इसलिये 'दिवो दास्यन्ति' इस व्युत्पत्तिके अनुसार तुम्हारा नाम 'दिवोदास' होगा। राजन्! मेरे प्रभावसे तुम्हें दिव्य सामर्थ्यकी प्राप्ति होगी।'

ब्रह्माजीकी बात सुनकर राजाओंमें श्रेष्ठ रिपुंजयने उनकी अनेक प्रकारसे स्तुति की और इस प्रकार कहा—पितामह! मनुष्योंसे भरे हुए इस भूतलपर क्या दूसरे राजालोग नहीं हैं? मुझे ही ऐसी आज्ञा क्यों मिल रही है?

ब्रह्माजीने कहा—राजन्! तुम राज करोगे तो इन्द्रदेव इस पृथ्वीपर वर्षा करेंगे। दूसरा कोई पापनिष्ठ राजा राज्य करेगा तो देव वर्षा नहीं करेंगे।

राजा बोले—महामान्य पितामह! आप स्वयं ही तीनों लोकोंकी रक्षा करनेमें समर्थ हैं, तो भी आप मुझे जो यह यश दे रहे हैं, यह आपका मेरे ऊपर महान् प्रसाद है। अतः मैं आपकी आज्ञा शिरोधार्य करता हूँ। परन्तु मुझे भी कुछ आपसे निवेदन करना है। यदि मेरे लिये मेरी इस प्रार्थनाको आप स्वीकार कर लेंगे तो मैं भूतलका अकण्टक राज्य करूँगा।

ब्रह्माजीने कहा—राजन्! तुम्हारे मनमें जो बात है, उसे शीघ्र कहो।

राजा बोले—पितामह! यदि मैं पृथ्वीका अधिपति होऊँ तो देवलोकके निवासी देवगण अपने ही लोकमें ठहरें, भूलोकमें न आवें। जब देवता देवलोकमें रहेंगे और मैं इस पृथ्वीपर निवास करूँगा तब यहाँ अकण्टक राज्य होनेसे प्रजावर्गको सुखकी प्राप्ति होगी।

'तथास्तु' कहकर ब्रह्माजीने जब उनकी प्रार्थना स्वीकार की, तब राजा दिवोदासने डंका बजाकर राज्यमें यह घोषणा करवा दी कि 'देवतालोग स्वर्गको चले जायँ और नागगण भी यहाँ कभी न आयें, जिससे मनुष्य स्वस्थ एवं सुखी रहें। पृथ्वीपर मेरे राज्य-शासनकालमें देवता स्वर्गमें सुखी रहें और मनुष्य पृथ्वीपर स्वस्थ रहें।'


गृहस्थोचित शिष्टाचार और धर्म

स्कन्दजी कहते हैं—महामते कुम्भज! अपनेको कल्याण प्रदान करनेवाले इस अविमुक्त क्षेत्र (काशी)-की प्राप्ति जिस प्रकार सम्भव है, उसे मैं बतलाता हूँ। पुण्यराशिसे मनोवांछित वस्तुकी प्राप्ति होती है और वह पुण्य वैदिक मार्गके सेवनसे उपलब्ध होता है। जो वैदिक मार्गका सेवन करता है उसके स्पर्शमात्रसे अवसर पाकर मनुष्यपर घात करनेकी इच्छा रखनेवाले कलि और काल दोनों नष्ट हो जाते हैं। निषिद्ध कर्मोंके सेवन और विहित कर्मोंके त्यागसे छिद्र देखकर

८१४ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *


कलि और काल ब्राह्मणको नष्ट कर देते हैं। प्याज, लहसुन, लसोड़ेका फल (लहेसुवा), गाजर, दस दिनके भीतर ब्यायी हुई गौका दूध और धरतीका फूल—इन सबको त्याग देना चाहिये। वृक्ष काटनेसे निकलनेवाले गोंद, देवता-पितरोंको निवेदन किये बिना खीर, पूआ और पूड़ी तथा बिना बछड़ेकी गायका दूध—ये सब त्याग देने चाहिये। एक खुरके पशुका दूध त्याज्य है। ऊँटनी और भेड़का दूध भी नहीं ग्रहण करना चाहिये। रातमें दही नहीं खाना चाहिये। मछलीका सर्वथा त्याग करना चाहिये। आयु तथा स्वर्गकी इच्छा रखनेवालेको यत्नपूर्वक मांसका त्याग करना चाहिये। बासी अन्न सभी त्याग देनेयोग्य है, परंतु घीका बना हुआ बासी अन्न भी ग्राह्य है। जो अज्ञानी अपने शरीरकी पुष्टिके लिये दूसरे जीवोंकी हत्या करता है, उस दुराचारीको न तो इस लोकमें सुख मिलता है और न परलोकमें ही। जो मांस खाता है, जो जीवोंको मारनेकी अनुमति देता है, जो मांस पकाता है, जो उसको खरीदता और जो बेचता है, जो अपने हाथसे मारता है, जो बाँटता-परोसता है तथा जो आज्ञा देकर जीवहिंसा कराता है—ये आठ प्रकारके मनुष्य हिंसक माने गये हैं।^१ जो सौ वर्षोंतक प्रत्येक वर्षमें अश्वमेध यज्ञद्वारा यजन करता है तथा जो मांस-भक्षण नहीं करता है, इन दोनोंकी परस्पर तुलना की जाय तो मांसका त्याग करनेवाला ही श्रेष्ठ सिद्ध होता है^२। सुखकी इच्छा रखनेवाले पुरुषको चाहिये कि वह जैसे अपने-आपको सुखी देखना चाहता है उसी प्रकार दूसरेको भी देखे। अपने और दूसरेमें बराबर ही सुख-दुःख होते हैं। दूसरे किसी जीवको जो सुख या दुःख दिया जाता है वह सब पीछे चलकर अपनेपर ही संघटित होता है। क्लेश उठाये बिना धन नहीं मिलता और धनके बिना कार्य कैसे हो सकते हैं। जो कर्म नहीं कर सकता, उसके द्वारा धर्मका अनुष्ठान कैसे सम्भव होगा और जो धर्महीन है उसे सुख कहाँसे मिलेगा। सुखकी अभिलाषा सभी रखते हैं। परंतु सुख धर्मसे ही प्राप्त होता है। अतः चारों वर्णोंके मनुष्योंको प्रयत्नपूर्वक अपने-अपने धर्मका पालन करना चाहिये। न्यायोपार्जित द्रव्यसे पारलौकिक कर्म करना चाहिये और उसीसे उत्तम देश, काल और पात्रमें विधि एवं श्रद्धापूर्वक दान देना चाहिये। जो अपने धनद्वारा माता-पितासे हीन बालकोंका यज्ञोपवीत और ब्याह आदि संस्कार करवाता है, उसे अक्षय कल्याणकी प्राप्ति होती है। गायको पेन्हानेमें बछड़ेका मुख पवित्र है और फल गिरानेमें पक्षीकी चोंच पवित्र मानी गयी है। बकरे और घोड़ेका मुख पवित्र है। गौएँ पीठकी ओरसे शुद्ध मानी गयी हैं तथा ब्राह्मणोंके चरण पवित्र हैं। यदि किसीने स्त्रीसे बलात् भोग कर लिया हो अथवा वह चोरके हाथमें पड़ गयी हो तो भी अपनी प्रिय पत्नीका परित्याग नहीं करना चाहिये। उसके त्यागका विधान नहीं है^३। खटाईसे ताँबेके पात्रकी शुद्धि होती है, राखसे काँसेका बर्तन शुद्ध होता है, पत्नी रजोधर्मसे शुद्ध होती है और नदी प्रवाहसे पवित्र होती है। जो मनसे भी यहाँ पर-पुरुषका चिन्तन नहीं करती वह स्वर्गलोकमें पार्वतीजीके साथ सुख भोगती है और इस लोकमें भी सुयशकी भागिनी होती है।^४

पिता, पितामह, भ्राता, कुलका कोई भी पुरुष


१- यो जन्तूनात्मपुष्ट्यर्थं हिनस्ति ज्ञानदुर्बलः। दुराचारस्य तस्येह नामुत्रापि सुखं क्वचित्॥
भोक्तानुमन्ता संस्कर्ता क्रयिविक्रयिहिंसकाः। उपहर्ता घातयिता हिंसकाश्चाष्टधा स्मृताः॥
(स्क० पु०, का० पू० ४०। २१-२२)
२- प्रत्यब्दमश्वमेधेन शतं वर्षाणि यो यजेत्। अमांसभक्षको यश्च तयोरन्त्यो विशिष्यते॥
(स्क० पु०, का० पू० ४०। २३)
३- बलात्कारोपभुक्ता वा चौरहस्तगतापि वा। न त्याज्या दयिता नारी नास्यास्त्यागो विधीयते॥
(स्क० पु०, का० पू० ४०। ४७)
४- मनसापि हि या नेह चिन्तयेत् पुरुषान्तरम्। सोमया सह सौख्यानि भुङ्क्ते चात्रापि कीर्तिभाक्॥
(स्क० पु०, का० पू० ४०। ४०)

* काशीखण्ड-पूर्वार्ध * ८१५

तथा माता—ये क्रमशः कन्यादानके अधिकारी हैं। इनमें पहले-पहलेके न रहनेपर दूसरा-दूसरा कन्यादान कर सकते हैं। कुलमें कोई भी कन्यादाता न हो तो कन्या स्वयं ही किसी योग्य पतिको वरण कर सकती है। अनिच्छापूर्वक बलात्कार हो जानेसे ऋतुकालमें स्त्रीकी शुद्धि हो जाती है। स्त्रियोंके सत्कारका अवसर आनेपर तथा उत्सवोंमें उन्हें वस्त्र-आभूषण और उत्तम अन्न आदि देकर सदा सम्मानित करना चाहिये। जहाँ भूषण, वस्त्र और अन्न आदिसे पूजित होकर स्त्रियाँ प्रसन्न रहती हैं वहाँ सब देवता सुखपूर्वक निवास करते हैं और वहाँ किये हुए समस्त सत्कर्म सफल होते हैं। जिस घरमें पतिसे पत्नी और पत्नीसे पति सन्तुष्ट रहते हैं वहाँ पग-पगपर कल्याणकी प्राप्ति होती है^१। अहुत, हुत, प्रहुत, प्राशित तथा ब्राह्महुत—ये पाँच यज्ञ शुभ बताये गये हैं। इनमें जपको अहुत यज्ञ कहते हैं, होमका नाम हुत यज्ञ है, बलिवैश्वदेवको प्रहुत यज्ञ कहते हैं, पितरोंकी तृप्तिके लिये श्राद्ध आदि करना प्राशित यज्ञ है और ब्राह्मणोंका सत्कार करके उनको भोजन कराना ब्राह्महुत यज्ञ कहलाता है। इन पाँचों यज्ञोंका अनुष्ठान करनेवाला ब्राह्मण कभी दुखी नहीं होता और इनके न करनेसे वह पाँच प्रकारकी हिंसाओंका भागी होता है।

ब्राह्मणके साथ समागम होनेपर उससे कुशल पूछे, क्षत्रियसे अनामय (स्वास्थ्य) पूछे, वैश्यसे सुख और शूद्रसे सन्तोष पूछे। जो अपने द्वारा पोषण करनेयोग्य कुटुम्बीजन और सेवक आदि हैं उनका पालन-पोषण लौकिक और पारलौकिक दोनों फलोंका देनेवाला है और यदि उनका पालन नहीं किया जाय तो पाप होता है। अतः प्रयत्नपूर्वक उनके भरण-पोषणमें तत्पर रहना चाहिये। माता, पिता, गुरु, पत्नी, सन्तान, शरणागत व्यक्ति, अभ्यागत, अतिथि और अग्नि—ये नौ पोष्यवर्गके अन्तर्गत हैं। जो पुरुष इस लोकमें अनेक व्यक्तियोंकी जीविका चलाता है, उसीका जीवन सफल है। जो केवल अपना ही पेट भरता है, वह जीते-जी मृतकके तुल्य जाननेयोग्य है। जो देवता, पितर आदि सबको उनका यथायोग्य भाग अर्पण करता है, दयावान्, सुशील, क्षमाशील और देवता एवं अतिथियोंका भक्त है वह गृहस्थ धार्मिक माना गया है। रातके मध्यमें जो दूसरे और तीसरे प्रहर हैं, उनमें ही जो सोता और यज्ञशेष अन्नका भोजन करता है वह ब्राह्मण कभी दुखी नहीं होता। अभ्यागतके आनेपर गृहस्थको सदा ये नौ बातें करनी चाहिये, जो अमृतके समान मंगलकारक हैं—सौम्य वचन, सौम्य दृष्टि, सौम्य मन, सौम्य मुख, उठकर स्वागत करना, ‘आइये-बैठिये’ ऐसा कहना, स्नेहपूर्वक वार्तालाप करना, अतिथिके समीप बैठकर उसकी सेवा करना और जब वह जाने लगे तो उसके पीछे-पीछे पहुँचानेके लिये कुछ दूरतक जाना। ये नौ बातें गृहस्थकी उन्नति करनेवाली हैं। इसके सिवा जिनके करनेमें बहुत कम खर्च हैं, ऐसी नौ बातें और हैं, जो अवश्य करने योग्य हैं—अभ्यागतको आसन देना, उसके पैर धोना, उसे यथाशक्ति भोजन कराना, सोने-बैठनेके लिये भूमि, शय्या, तृण, जल, अभ्यंग (तैल-उबटन देना) और दीपक—ये नौ कार्य गृहस्थको सिद्धि देनेवाले हैं। चुगली, परस्त्रीसेवन, द्रोह, क्रोध, असत्यभाषण, अप्रिय वचन बोलना, द्वेष, दम्भ (पाखण्ड) और माया (छल-कपट)—ये नौ दुर्गुण स्वर्गका मार्ग रोकनेके लिये साँकलके समान हैं। अब नौ आवश्यक कर्म बतलाये जाते हैं, जो द्विजोंके द्वारा प्रतिदिन करने योग्य हैं—स्नान, सन्ध्या, जप, होम, स्वाध्याय, देवपूजा, बलिवैश्वदेव, अतिथि-सत्कार और पितृतर्पण^२।


१- यत्र तुष्यति भर्त्रा स्त्री स्त्रिया भर्ता च तुष्यति । तत्र वेश्मनि कल्याणं सम्प्रद्येत पदे पदे॥ (स्क० पु०, का० पू० ४०। ६०)
२- नवावश्यककर्माणि कार्याणि प्रतिवासरम् । स्नानं सन्ध्या जपो होमः स्वाध्यायो देवतार्चनम्॥
वैश्वदेवं तथाऽऽतिथ्यं नवमं पितृतर्पणम् ।
(स्क० पु०, का० पू० ४०। ७७)

८१६ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *


मुने! नौ बातें परम गोपनीय हैं, उनको सुनिये— अपने जन्मका नक्षत्र, मैथुनकर्म, मन्त्र, अपने घरका कोई कलंक, छलना अथवा छला जाना, अपनी आयु, धन, अपमान और पत्नी— ये कभी किसी प्रकार भी प्रकाशमें लानेयोग्य नहीं हैं। सुपात्र, मित्र, विनययुक्त, दीन, अनाथ, उपकारी, माता-पिता और गुरु— इन नौ प्रकारके मनुष्योंको जो कुछ दिया जाता है वह अक्षय होता है। चिकनी-चुपड़ी बातें करनेवाले, चारण (प्रशंसाके गीत गानेवाले), चोर, अयोग्य वैद्य, धूर्त, छली, शठ, पहलवान और वन्दी— इन नौ व्यक्तियोंको जो कुछ दिया जाता है वह निष्फल होता है। अपनी स्त्री, शरणागत पुरुष, दूसरेकी धरोहर, बन्धक, कुलकी जीविका, अधिक समयतकके लिये घरमें रखी हुई दूसरेकी वस्तु, स्त्रीका धन, पुत्र तथा पुत्र रहते हुए सर्वस्व— ये नौ वस्तुएँ आपत्तिकालमें भी किसी दूसरेको नहीं देनी चाहिये। जो मूढात्मा इन वस्तुओंको देता है, वह अनेकों प्रायश्चित्त करनेपर ही शुद्ध होता है। सत्य, शौच, अहिंसा, क्षमा, दान, दया, दम (मन-इन्द्रियोंका संयम), अस्तेय (चोरीसे दूर रहना) तथा इन्द्रियोंको विषयोंकी ओरसे हटाकर अपने भीतर स्थापित करना (प्रत्याहार)— ये नौ सबके लिये धर्मके साधन हैं१। जिसकी जिह्वा, स्त्री, पुत्र, भाई, मित्र, सेवक और आश्रित मनुष्य— ये सभी विनयशील हों उसका सर्वत्र गौरव है। मदिरापान, दुष्टोंका संग, पतिसे अलग रहना, स्वच्छन्द घूमना, अधिक सोना, दूसरेके घरमें निवास करना— ये छः बातें स्त्रियोंको दूषित करनेवाली हैं२।

जबतक तैयार किया हुआ अन्न गरम रहता है, जबतक उसे मौनपूर्वक भोजन किया जाता है और जबतक उस अन्न या हविष्यके गुणोंका वर्णन नहीं किया जाता, तबतक ही पितरलोग जीमनेवाले ब्राह्मणोंके साथ उस अन्नको भोजन करते हैं। विद्वान् और विनयशील वेदज्ञ ब्राह्मण जब घरपर आता है, तब घरके सब अन्न हर्षसे उछलने लगते हैं कि ‘अब हम उत्तम गतिको प्राप्त होंगे।’ शौच, व्रत और आचारसे रहित वैदिक ज्ञानसे शून्य मूर्ख ब्राह्मणको जब कोई अन्न दिया जाता है, तब वह अव्यक्त स्वरमें रोता है कि ‘मैंने कौन-सा पाप किया था जो ऐसे व्यक्तिके उपयोगमें आया।’ जिस ब्राह्मणके पेटमें गया हुआ अन्न वेद-वेदांगोंके अभ्यासद्वारा पचता है वह दाताको और उसकी पिछली दस-दस पीढ़ियोंको भी तार देता है। जो ज्येष्ठ भ्राताके अविवाहित रहते हुए स्वयं विवाह करता और अग्निहोत्रकी दीक्षा लेता है उसे परिवेत्ता जानना चाहिये। उसका बड़ा भाई ‘परिवित्ति’ कहलाता है। परिवित्ति, परिवेत्ता तथा जिस कन्यासे विवाह करनेके कारण यह ‘परिवेत्ता’ संज्ञा प्राप्त होती है, वह कन्या, उसका दान करनेवाला पिता तथा वह विवाह करानेवाला पुरोहित— ये पाँचों नरकमें पड़ते हैं। यदि बड़ा भाई नपुंसक हो, परदेश (भारतेतर विलायत आदि)-में रहने लग जाय, गूँगा हो, संन्यास ले या जड़ (अत्यन्त मूर्ख), कुब्ज (कुबड़ा), खर्व (नाटा) अथवा पतित हो जाय तो छोटे भाईके विवाह कर लेनेमें कोई दोष नहीं है। जो संन्यासी हो जानेके बाद पुनः मैथुनका सेवन करता है, वह साठ हजार वर्षोंतक विष्ठाका कीड़ा होता है। जो ब्राह्मण गोरक्षा और वाणिज्य-वृत्तिको अपना ले, कारीगर अथवा शिल्पी हो जाय, किसीकी दासता स्वीकार कर ले अथवा सूदपर रुपया लगावे तो वह शूद्रवत् बर्ताव करनेयोग्य होता है। देवताके धनको बाँटकर लेने, ब्राह्मणके धनका अपहरण करने तथा ब्राह्मणका तिरस्कार करनेसे समूचे कुलका शीघ्र विनाश हो जाता है। जो वाणीसे प्रतिज्ञा करके क्रियाद्वारा पूर्ण नहीं किया गया वह धर्मयुक्त ऋण इहलोक और परलोकमें भी बढ़ता


१- सत्यं शौचमहिंसा च क्षान्तिर्दानं दया दमः। अस्तेयमिन्द्रियाकोचः सर्वेषां धर्मसाधनम्॥ (स्क० पु०, का० पू० ४०।८६)
२- पानं दुर्जनसंसर्गः पत्या च विरहोऽटनम्। स्वप्नोऽन्यगृहवासश्च नारीणां दूषणानि षट्॥ (स्क० पु०, का० पू० ४०।८९)

* काशीखण्ड-पूर्वार्ध *

८९७


है। श्रेष्ठ द्विज स्नान करके जलद्वारा जो पितरोंका तर्पण करता है, उसीसे पितृयज्ञका सारा फल पा लेता है। जो यज्ञकर्ममें संलग्न हैं, किसी यज्ञ या मन्त्रकी दीक्षा ले चुके हैं अथवा जो संन्यासी, ब्रह्मचारी तथा कर्म करनेवाले ऋत्विज हैं, उनको सूतक नहीं लगता। श्मशान वृक्ष, चिता, यूप और शिवनिर्माल्य भोजन करनेवाले तथा वेद बेचनेवालेका स्पर्श कर लेनेपर वस्त्रसहित जलमें प्रवेश करके स्नान करे। अग्निशाला, गोशाला, देवता और ब्राह्मणके समीप तथा स्वाध्याय, भोजन और जलपानके समय खड़ाऊँ और जूते उतार देने चाहिये। धर्मशास्त्ररूपी रथपर चढ़े हुए और वेदरूपी खड्ग धारण करनेवाले ब्राह्मण खिलवाड़में भी जो कुछ कह दें, वह सब परम धर्म माना गया है। नीलमें रँगा हुआ वस्त्र दूरसे ही त्याग देना चाहिये। नीलके पालन, विक्रय और उसकी वृत्तिसे जीविका चलानेमात्रसे ब्राह्मण अपवित्र हो जाता है और तीन कृच्छ्र व्रत करनेपर उसकी शुद्धि होती है। जो नीलका रँगा हुआ वस्त्र पहनता है, उसके स्नान, दान, तप, होम, स्वाध्याय, पितृतर्पण और पंच महायज्ञ—ये सभी व्यर्थ हो जाते हैं। ब्राह्मण जब अपने अंगोंपर नीलका रँगा वस्त्र धारण कर लेता है, तब वह उस वस्त्रके ताने-बानेमें जितने सूत लगे हैं, उतने नरकोंमें निश्चय ही निवास करता है^{१}। एक दिन-रात उपवास करके पंचगव्य पीनेसे उसकी शुद्धि होती है। नीलके रँगे वस्त्र धारण करके जो रसोई बनायी जाती है, उस अन्नको जो खाता है, वह मानो विष्ठा भोजन करता है। वह अन्न देनेवाला यजमान नरकमें जाता है।^{२}

बलिवैश्वदेव, होम, देवपूजा, जप तथा ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेदके मन्त्रोंद्वारा संस्कृत होनेसे ब्राह्मणका अन्न अमृत कहा गया है। व्यवहारके अनुरूप, न्यायपूर्वक प्रजाका पालन करते हुए जिस अन्नका उपार्जन किया जाता है, वह क्षत्रियका अन्न दूधके समान है। यदि वैश्य सीता-यज्ञकी विधिके अनुसार एक पहरतक जोते जानेवाले बैलोंसे अन्न उत्पन्न करके देता है तो उसके द्वारा संस्कृत अन्न वास्तवमें अन्न कहा गया है। श्रेष्ठ मनुष्य छोटी-छोटी बातके लिये शपथ न करे। व्यर्थ शपथ करनेवाला मनुष्य इहलोक और परलोकमें भी नष्ट होता है। विद्वान् पुरुष यमराजको यमराज नहीं कहते, अपना मन ही यमराज कहलाता है। जिसने अपने मनको वशमें कर लिया है, उसका यमराज क्या कर लेगा? क्षमावाले पुरुषोंके लिये एक ही दोष है कि संसारके लोग उस क्षमाशील मनुष्यको असमर्थ (दुर्बल) मानते हैं। जो सदा एकान्तमें रहनेवाला, देवताकी आराधनामें तत्पर, सम्पूर्ण इन्द्रियोंकी प्रीतिसे दूर रहनेवाला तथा स्वाध्याय-योगमें मनको लगाये रखनेवाला है और जो कभी भी किसी जीवकी हिंसा नहीं करता, ऐसे पुरुषको निश्चय ही मोक्षकी प्राप्ति होती है^{३}। परंतु काशीमें इन गुणोंके बिना भी सहज ही मुक्ति हो जाती है। वहाँ भगवान् विश्वनाथकी सेवा ही योग है, काशीवास ही तपस्या है, उत्तरवाहिनी गंगामें स्नान ही व्रत, दान, यम और नियमका पालन है।

जो न्यायसे धनका उपार्जन करता है, तत्त्वज्ञानमें स्थित है, अतिथियोंको प्यार करनेवाला है तथा श्राद्धकर्ता और सत्यवादी है, वह गृहस्थ


१. स्नानं दानं तपो होमः स्वाध्यायः पितृतर्पणम्। वृथा तस्य महायज्ञा नीलीवासो बिभर्ति यः॥
नीलीरक्तं यदा वस्त्रं विप्रः स्वाङ्गेषु धारयेत्। तन्तुसन्ततिसंख्याके नरके स वसेद् ध्रुवम्॥
(स्क० पु०, का० पू० ४०। १४४-१४५)
२. नीलीरक्तेन वस्त्रेण यदन्नमुपकल्पयेत्। भोक्ता विष्ठासमं भुङ्क्ते दाता च नरकं व्रजेत्॥
(स्क० पु०, का० पू० ४०। १४७)
३. एकान्तशीलस्य सदैव तस्य सर्वेन्द्रियप्रीतिनिवर्तकस्य। स्वाध्याययोगे गतमानसस्य मोक्षो ध्रुवं नित्यमहिंसकस्य॥
(स्क० पु०, का० पू० ४०। १६१)

८१८ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *


होकर भी इस जगत्में मुक्त हो जाता है। गृहस्थ पुरुष दीनों, अन्धों, दरिद्रों एवं याचकोंको विशेषरूपसे अन्नदान करके गृह-कर्मोंका अनुष्ठान करता रहे तो वह कल्याणका भागी होता है। इस प्रकार सदाचारका पालन करनेवाले पुरुषोंपर काशीनाथ भगवान् विश्वनाथ प्रसन्न होते हैं और उनके प्रसादसे मोक्षदायिनी काशीपुरीकी प्राप्ति होती है।


वानप्रस्थ और संन्यास आश्रमके धर्मका वर्णन, योगमार्गका निरूपण

स्कन्दजी कहते हैं—मुने! इस प्रकार गृहस्थ आश्रममें धर्मपालनपूर्वक निवास करके जब सिरके बाल पक जायँ और मुँहपर झुर्रियाँ पड़ जायँ तब दूसरे आश्रमसे तीसरे आश्रम (वानप्रस्थ)-में प्रवेश करे एवं ग्रामीण विषय-भोगोंका त्याग करके पत्नीको पुत्रोंके संरक्षणमें सौंपकर या पत्नीको भी साथ ही लेकर वनमें जाय। मृगचर्म एवं पुराने वस्त्र धारण करे, मुनियोंके अन्नसे निर्वाह करते हुए प्रतिदिन अग्निमें आहुति दे, सिरपर जटा धारण करे। मूँछ-दाढ़ी न कटावे, नख और लोम धारण किये रहे तथा नित्य सायंकाल और प्रातःकाल स्नान करे। शाक और मूल-फल आदिसे जीवननिर्वाह करते हुए भी कभी पंचयज्ञोंका त्याग न करे। जल, मूल और फलकी भिक्षासे भिक्षुओं एवं अतिथियोंका सत्कार करे। किसीसे दान न ले। स्वयं ही दूसरोंको दान दे एवं मन और इन्द्रियोंको संयममें रखे। सद्ग्रन्थोंके स्वाध्यायमें तत्पर रहे। वैतानिक अग्निहोत्रका विधिपूर्वक हवन करे। स्वयं लाये हुए मुनिजनोचित अन्नद्वारा देवताओंके लिये यज्ञभाग अर्पित करे। लसौड़ा, लसौहा, सहजन, धरतीका फूल, मांस और मधु—इन सबको कभी काममें न ले। आश्विन मासमें पहलेके संचित किये हुए मुनिअन्न (तिन्नीके चावल)-को भी त्याग दे। गाँवोंमें पैदा होनेवाले फल-मूल तथा हलसे जोतकर पैदा किये गये अन्नका कभी भोजन न करे। दाँतसे ही ओखलीका काम ले। दाँतोंसे ही चबाकर खाय अथवा पत्थरपर कूट ले। संग्रह उतना ही करे जो तत्काल खा-पीकर साफ हो जाय अथवा एक मासके लिये भोजनका संग्रह कर सकता है, अथवा तीन मास, छः मास या अधिक-से-अधिक बारह मासतकके लिये अन्न और फल-मूल आदिका संग्रह करे। प्रतिदिन एक बार केवल रातमें ही भोजन करे अथवा एक दिनका अन्तर देकर भोजन करे अथवा दो दिनका अन्तर देकर तीसरे दिनकी सन्ध्याको भोजन करे या चान्द्रायणव्रत करता रहे अथवा पंद्रह दिन या एक मासपर भोजन किया करे अथवा वानप्रस्थ पुरुष सदा फल-मूलका ही भोजन करते हुए तपस्यासे अपने शरीरको सुखावे और प्रतिदिन देवताओं तथा पितरोंको तृप्त करे। ऐसा सम्भव न हो तो अग्निदेवको अपने आत्मामें ही भावनाद्वारा स्थापित करके अपने लिये कोई भी आश्रम न बनाकर विचरता रहे और प्राणयात्राके लिये वनवासी तपस्वियोंसे भिक्षा माँग ले अथवा गाँवमेंसे ही भिक्षा माँगकर लावे और वनमें ही रहकर प्रतिदिन आठ ग्रास भोजन करे। इस प्रकार वानप्रस्थ-आश्रममें स्थित हुआ ब्राह्मण ब्रह्मलोकमें प्रतिष्ठित होता है। आयुका तीसरा भाग वानप्रस्थ-आश्रममें व्यतीत करके आयुके चौथे भागमें सब प्रकारकी आसक्तियोंका त्याग करके संन्यास ले ले। यज्ञके द्वारा देवऋण, अध्ययनके द्वारा ऋषिऋण और तर्पण आदिके द्वारा पितृऋणको उतारे बिना पुत्रकी उत्पत्ति किये बिना तथा यज्ञोंका अनुष्ठान किये बिना संन्यास नहीं लेना चाहिये। इस लोकमें किसी भी प्राणीको जिससे थोड़ा भी भय न होता हो, उसे सब प्राणी यहाँ सदा

* काशीखण्ड-पूर्वार्ध * \hfill ८१९


अभय प्रदान करते हैं। अग्नि और गृहसे रहित हो सदा अकेला ही विचरता रहे। मोक्षकी सिद्धिके लिये दूसरेकी सहायतासे रहित अकेला रहे। केवल अन्नकी भिक्षाके लिये गाँवमें जाना चाहिये। संन्यासी न तो जीनेकी इच्छा करे न तो मरनेकी ही। जैसे सेवक अपने स्वामीके आदेशकी प्रतीक्षा करता है वैसे ही संन्यासी मृत्युकालकी प्रतीक्षा करता है। जो कहीं भी ममता नहीं रखता और सर्वत्र समताके भावसे युक्त रहता है, वृक्षके नीचे ही जो सो लेता है, वही मुमुक्षु इस लोकमें प्रशंसित होता है। प्रतिदिन ध्यान लगाना, बाहर और भीतरसे पवित्र रहना, भिक्षा लाना और नित्य एकान्तमें रहना—ये ही चार कर्म संन्यासीके हैं। इनसे भिन्न कोई पाँचवाँ कर्म नहीं है^१। वर्षाके चार महीनोंमें संन्यासी कहीं विचरण न करे; क्योंकि उस समय यात्रा करनेसे नूतन बीजके अंकुरों और जीव-जन्तुओंकी हिंसा होती है। संन्यासी जीव-जन्तुओंको बचाते हुए चले, वस्त्रसे छानकर जल पीये, उद्वेगरहित वचन बोले, कभी किसीके साथ क्रोधपूर्ण बर्ताव न करे, अपने आत्माके साथ विचरे, किसीसे कोई अपेक्षा न रखे, अपने लिये कोई घर अथवा आश्रय न बनावे, सदा अध्यात्म-चिन्तनमें तत्पर रहे, केश और नख आदिका संस्कार न करे, मन और इन्द्रियोंको वशमें रखे, भगवाँ रंगका वस्त्र पहने, दण्ड धारण करे, भिक्षाके अन्नका भोजन करे और अपनी प्रसिद्धि न होने दे। तुम्बी, काष्ठ, मिट्टी अथवा बाँसका पात्र संन्यासीके लिये उत्तम है। इनसे भिन्न किसी पाँचवीं वस्तुका पात्र नहीं होना चाहिये। संन्यासीको कभी तैजसपात्र (पीतल, काँसी आदिका बर्तन) नहीं ग्रहण करना चाहिये। 'यति यदि प्रतिदिन कौड़ी-कौड़ीभर भी जहाँ-तहाँसे धन संग्रह करे तो उसे एक सहस्र गौओंके वधका पाप लगता है' यह सनातन श्रुति है। यदि एक दिन भी वह हृदयमें स्नेहभावसे (आसक्तिपूर्वक) किसी स्त्रीको देख ले तो उसे दो करोड़ ब्रह्मकल्पोंतक कुम्भीपाक नरकमें निवास करना पड़ता है, इसमें संशय नहीं^२। वह केवल एक समय भिक्षाके लिये विचरण करे, उसमें भी विस्तार न करे। जब रसोईघरसे धुँआ निकलना बंद हो जाय, मूसलसे कूटनेकी आवाज न होती हो, चूल्हेकी आग बुझ गयी हो और घरके सब लोग खा-पी चुके हों तब संन्यासी गृहस्थके घर भिक्षाके लिये जाय। भिक्षाके विषयमें उसे सदा इसी नियमका पालन करना चाहिये। जो थोड़ा खाता, एकान्तमें रहता, विषयोंके लिये लोलुप नहीं रहता तथा राग-द्वेषसे मुक्त होता है वही संन्यासी मोक्ष प्राप्त करनेमें समर्थ होता है। जिसके घर अथवा आश्रममें कोई संन्यासी दो घड़ी भी विश्राम कर ले वह कृतार्थ हो जाता है। गृहस्थने मृत्युपर्यन्त जो पापसंचय किया है वह सब पाप संन्यासी एक रात उसके घरमें विश्राम करके ही भस्म कर डालता है।

बुढ़ापा सबको दबा लेता है, जिससे असह्य दुःख होता है। रोगकी पीड़ा भी सहनी पड़ती है। एक दिन इस शरीरको त्याग देना पड़ता है। पुनः गर्भमें आकर जीव अत्यन्त भयंकर क्लेश भोगता है। अनेक प्रकारकी योनियोंमें वह निवास करनेको विवश होता है। उसे कभी प्रियजनोंके वियोगका और कभी अप्रिय जनोंके संयोगका कष्ट प्राप्त होता है। अधर्मसे दुःखकी


१- ध्यानं शौचं तथा भिक्षा नित्यमेकान्तशीलता। यतेश्चत्वारि कर्माणि पञ्चमं नोपपद्यते॥ (स्क० पु०, का० पू० ४१। २०)
२- वराटके संगृहीते यत्र तत्र दिने दिने। गोसहस्रवधं पापं श्रुतिरेषा सनातनी॥
हृदि सस्नेहभावेन चेद्दद्रक्ष्येत्स्त्रियमेकदा^१। कोटिद्वयं ब्रह्मकल्पं कुम्भीपाकी न संशयः॥
\hfill (स्क० पु०, का० पू० ४१। २५, २७)
१- 'चेत् रक्षेत्' ऐसा पदच्छेद करनेपर ऐसा अर्थ होगा कि यदि संन्यासी कामभावसे एक बार भी अपने हृदयमें किसी स्त्रीको रखे—उसका चिन्तन करे तो दो करोड़ ब्रह्मकल्पतक उसे कुम्भीपाकमें रहना पड़ता है।

८२० * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

उत्पत्ति होती है, फिर नरकमें निवास होता है और नाना प्रकारकी नारकीय यातनाएँ भोगनी पड़ती हैं। कर्मदोषके कारण मनुष्योंकी अनेक प्रकारकी गति होती है। यह शरीर अनित्य है और परमात्मा नित्य हैं। इन सब बातोंको देखकर और इसपर भलीभाँति विचार करके, मनुष्य जहाँ कहीं भी जिस आश्रममें भी रहे, मोक्षके लिये प्रयत्न करता रहे। जो बिना पात्रके केवल हाथोंमें ही भिक्षा लेते हैं, वे करपात्री कहलाते हैं। उन्हें अन्य यतियोंकी अपेक्षा प्रतिदिन सौगुना पुण्य होता है। इस प्रकार विद्वान् पुरुष क्रमशः चारों आश्रमोंका सेवन करके द्वन्द्वोंसे रहित एवं असंग होकर ब्रह्मभावको प्राप्त होनेका अधिकारी हो जाता है। खोटी बुद्धिवाले मनुष्योंका वशमें नहीं किया हुआ मन उन्हें बन्धनमें डालनेका कारण होता है और उत्तम बुद्धिवाले पुरुषोंद्वारा वशमें किया हुआ वही मन रोग-शोकसे रहित मोक्षपद दे सकता है। श्रुति, स्मृति, पुराण, विद्या, उपनिषद्, श्लोक, सूत्र, भाष्य तथा अन्य जो कुछ भी वाङ्मय है, उसका तथा वेदोंके अनुवचनका ज्ञान प्राप्त करना और ब्रह्मचर्य, तपस्या, दम (इन्द्रियसंयम), श्रद्धा, उपवास तथा स्वाधीनता आदि साधन—ये सभी आत्मज्ञानके हेतु हैं। समस्त आश्रमवर्तियोंके द्वारा एकमात्र आत्मा ही जाननेयोग्य, श्रवण करनेयोग्य, मनन करनेयोग्य तथा यत्नपूर्वक साक्षात्कार करनेयोग्य है। आत्मज्ञानसे मुक्ति होती है, किंतु वह आत्मज्ञान योगके बिना नहीं होता और योग दीर्घकालतक अभ्यास करनेसे ही सिद्ध होता है। न केवल वनकी शरण लेनेसे, न नाना प्रकारके ग्रन्थोंका चिन्तन करनेसे, न दानसे, न व्रतसे, न तपस्यासे, न यज्ञोंसे, न पद्मासन लगानेसे, न नासिकाके अग्रभागपर दृष्टि जमाये रखनेसे, न शौचसे, न मौनसे और न मन्त्राराधनसे ही योग सिद्ध होता है। उत्साहपूर्वक लगे रहनेसे, निरन्तर अभ्यास करनेसे, दृढ़ निश्चयसे तथा बार-बार उसकी ओरसे अरुचि न होनेसे योगकी सिद्धि होती है, अन्यथा नहीं। जो सदा अपने आत्मामें ही क्रीडा करता है, आत्मामें ही रत रहता और आत्मामें ही पूर्णतः तृप्तिका अनुभव करता है, उसके लिये योगसिद्धि दूर नहीं है। जो इस जगत्‌में आत्माके सिवा दूसरी किसी वस्तुको नहीं देखता, वह आत्माराम योगीश्वर यहीं परब्रह्मस्वरूप हो जाता है*। आत्मा और मनके संयोगको ही विद्वान् पुरुष ‘योग’ कहते हैं। किन्हीं-किन्हींके मतमें प्राण और अपान वायुका सम्यक् मिलन ही ‘योग’ है। अज्ञानियोंकी दृष्टिमें विषय और इन्द्रियोंका संयोग ही योग है। परंतु जिनका चित्त विषयोंमें आसक्त है, उनसे ज्ञान और मोक्ष बहुत दूर हैं; क्योंकि जिसका रोकना अत्यन्त कठिन है, वह मनकी वृत्ति जबतक निवृत्त नहीं होती, तबतक योगकी चर्चा कैसे निकटवर्तिनी हो सकती है। जो अपने मनको वृत्तियोंसे शून्य करके उसे क्षेत्रज्ञ परमात्मामें लगाकर एकीभूत कर देता है और स्वयं मनकी आसक्तिसे मुक्त हो जाता है, वह योगयुक्त कहलाता है। समस्त बहिर्मुख इन्द्रियोंको अन्तर्मुख करके उन्हें मनमें स्थापित करे। फिर इन्द्रियसमुदायसहित मनको क्षेत्रज्ञ आत्मामें लगावे। सब भावविकारोंसे रहित क्षेत्रज्ञको परमानन्दस्वरूप ब्रह्ममें एकीभूत करे। यही ध्यान है और यही योग है। शेष जितनी बातें हैं, सब ग्रन्थकी विस्तारमात्र हैं। जो नित्य योगके अभ्यासमें लगा हुआ है, उसके लिये परब्रह्म परमात्मा स्वसंवेद्य (स्वानुभवैकगम्य) होता है। वह सनातन परब्रह्म सूक्ष्म होनेके कारण वाणीद्वारा अथवा किसी संकेतके द्वारा भी नहीं बताया जा सकता।

आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान


* अत्रात्मव्यतिरेकेण द्वितीयं यो न पश्यति। आत्मारामः स योगीन्द्रो ब्रह्मीभूतो भवेदिह॥ (स्क० पु०, का० पू० ४१। ४७)

  • काशीखण्ड-पूर्वार्ध * | ८२१ ---|---
और समाधि—ये योगके छः अंग हैं^१। साधनके लिये जिससे स्थिरता एवं सुखपूर्वक बैठा जाय, वह आसन है। योगीके लिये सिद्धासन^२ शीघ्र योगसिद्धि देनेवाला है। इसके अभ्याससे शरीर प्रतिदिन दृढ़तर होता जाता है। योगवेत्ता पुरुष अपने दाहिने पैरको बायीं जाँघपर रखकर बायें पैरको दाहिनी जाँघपर रखे तो उसे पद्मासन कहते हैं। इसे दृढ़तापूर्वक बाँधनेकी कलाको जाननेवाला पुरुष अपने दोनों हाथोंको पीठके पीछेसे लाकर दोनों पैरोंके अँगूठोंको पकड़ ले। इस पद्मासनके अभ्याससे मनुष्यका शरीर सुदृढ़ होता है। अथवा जिस स्वस्तिक आसनसे बैठनेमें साधकको सुख मालूम होता हो, उसीसे बैठकर योगवेत्ता पुरुष योगका अभ्यास करे। जो स्थान सब प्रकारकी बाधाओंसे रहित, सम्पूर्ण इन्द्रियोंको सुख देनेवाला तथा मनको प्रसन्नता देनेवाला हो, जहाँ पुष्पहार एवं धूप आदिकी सुगन्ध छा रही हो, ऐसे स्थानमें बैठकर योगाभ्यास करे। साधक न तो अधिक भोजन करके, न भूखसे पीड़ित रहकर, न मल-मूत्रके वेगको रोककर कष्ट सहते हुए, न राहके थके होनेपर और न चिन्तासे व्याकुल होनेपर ही योगका अभ्यास करे। जितने समयमें एक ह्रस्व अक्षरका उच्चारण होता है, उतने समयको 'एक मात्रा' कहते हैं, ऐसी बारह मात्राओंका प्राणायाम निकृष्ट श्रेणीका माना गया है। इससे दूनी चौबीस मात्राओंका प्राणायाम मध्यम कहा गया है और पहलेसे तीन गुनी अर्थात् छत्तीस मात्राओंका प्राणायाम उत्तम बताया गया है। ये तीनों क्रमशः स्वेद, कम्प और विषाद उत्पन्न करनेवाले हैं। इनमेंसे प्रथम अर्थात् बारह मात्रावाले प्राणायामके द्वारा स्वेद (पसीने)-को जीते, द्वितीय अर्थात् चौबीस मात्रावाले प्राणायामके द्वारा कम्पको जीते और तृतीय—छत्तीस मात्रावाले प्राणायामके द्वारा विषादपरविजय पावे। इससे योगीका प्राणायाम सिद्ध हो जाता है। क्रमशः सेवन करनेसे सिद्ध हुआ प्राण जहाँ योगीकी इच्छा होती है, वहाँ उसे ले जाता है। प्राणवायुको यदि हठपूर्वक रोका जाता है तो वह रोमकूपोंके मार्गसे निकल जाती है, देहको विदीर्ण करती है और कोढ़ आदि रोग पैदा कर देती है। अतः जैसे जंगलके हाथीको क्रमशः विश्वास दिलाकर उसे वशमें किया जाता है, उसी प्रकार प्राणवायुको धीरे-धीरे रोकनेका प्रयत्न करना चाहिये। योगीके द्वारा क्रमयोगसे हृदयमें स्थापित किया हुआ यह प्राण धीरे-धीरे अनुकूल हो जाता है। छत्तीस अंगुलका हंस (प्राणवायु) दक्षिण—वाममार्ग (इड़ा-पिंगला नामवाली दो नाड़ियों)-से बाहर निकलता है। प्रयाण करनेके कारण उसे 'प्राण' कहते हैं। जब समस्त नाड़ी-चक्र शान्त होकर शुद्ध हो जाता है, तभी योगी पुरुष अपने प्राणोंको रोकनेमें समर्थ होता है। दृढ़तापूर्वक आसनपर बैठकर योगी यथाशक्ति चन्द्रनाड़ी—इड़ाके मार्गसे (नासिकाके वाम छिद्रद्वारा) प्राणवायुको भीतर भरे। तत्पश्चात् सूर्यमार्ग—पिंगला नाड़ी (नासिकाके दाहिने छिद्र)-से उसे बाहर निकाले। यह पूरक और रेचक नामवाला प्राणायाम कहलाता है। योगी पुरुष कुम्भक नामक प्राणायामके द्वारा चन्द्रबीजसे युक्त झरती हुई सुधाधाराके प्रवाहका ध्यान करते हुए तत्काल सुखका अनुभव करता है। तदनन्तर योगी सूर्यनाड़ी अर्थात् नासिकाके दक्षिण छिद्रके द्वारा प्राणवायुको खींचकर उदरगुफाको भरे और कुछ देरतक प्राणवायुको रोकनेके पश्चात् चन्द्रनाड़ी अर्थात् नासिकाके वाम छिद्रसे वायुको धीरे-धीरे बाहर निकाल दे। उस समय प्रज्वलित अग्निपुंजके समान भगवान् सूर्यका हृदयमें ध्यान करता रहे। इस दक्षिण प्राणायामके द्वारा योगिराज परम कल्याणका भागी होता है। इस प्रकार तीन

१- आसनं प्राणसंरोधः प्रत्याहारश्च धारणा। ध्यानं समाधिरेतानि योगाङ्गानि भवन्ति षट्॥ (स्क० पु०, का० पू० ४१।५९)
२- मलेन्द्रिय और मूत्रेन्द्रियके बीचमें बायें पैरका तलुआ तथा शिश्नके ऊपर दाहिना पैर और छातीके ऊपर चिबुक (ठोढ़ी) रखकर दोनों भौंहोंके मध्यभागको देखना सिद्धासन कहलाता है।

८२२ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *


महीनेके अभ्याससे वाम, दक्षिण दोनों प्रकारके प्राणायामका सेवन करके जब समस्त नाड़ियोंको सिद्ध कर लिया जाता है, तब उस योगीको 'सिद्धप्राण' कहते हैं। नाड़ीकी शुद्धि होनेसे योगी अपनी इच्छाके अनुसार वायुको धारण करता है। पेटकी अग्निको उद्दीप्त करता है। उसे अनाहत नाद सुनायी पड़ने लगता है अथवा नादतत्त्वका साक्षात्कार होने लगता है और उसका शरीर नीरोग बना रहता है। शरीरमें स्थित वायुका नाम प्राण है। उसे रोकनेको ही आयाम कहते हैं। जब प्राणवायु ब्रह्मरन्ध्रमें पहुँचती है, तब घण्टा आदि वाद्योंका महानाद सुन पड़ता है। फिर योगसिद्धि दूर नहीं रहती। नियमित प्राणायामसे समस्त रोगोंका नाश हो जाता है और उसके अनियमित अभ्याससे सब रोगोंकी उत्पत्ति होती है। प्राणवायुके व्यतिक्रमसे हिचकी, श्वास (दमा), कास (खाँसी), सिरदर्द, कर्णशूल तथा नेत्रपीड़ा आदि बहुतसे दोष प्रकट होते हैं। अतः थोड़ी-थोड़ी वायुका त्याग करे और थोड़ी-ही-थोड़ी वायुको खींचकर अपने भीतर भरे तथा नियमित वायुको ही रोकनेका प्रयत्न करे। ऐसा करनेसे योगवेत्ता पुरुषको सिद्धि प्राप्त होती है। सब ओर विषयोंमें स्वच्छन्द विचरती हुई इन्द्रियोंको किसी-न-किसी युक्तिसे विषयोंकी ओरसे समेटना 'प्रत्याहार' कहलाता है। जैसे कछुआ अपने अंगोंको सब ओरसे समेट लेता है, उसी प्रकार जो प्रत्याहारकी विधिसे अपनी सब इन्द्रियोंको विषयोंकी ओरसे समेट लेता है, वह पापरहित हो जाता है। नाभिप्रदेशमें सूर्य और तालुस्थानमें चन्द्रमा निवास करते हैं। चन्द्रमा नीचेको मुख करके अमृतकी वर्षा करते हैं और सूर्य ऊपरकी ओर मुँह करके उस अमृतरसको अपना ग्रास बना लेते हैं। अतः ऐसा उपाय करना चाहिये, जिससे वह अमृत प्राप्त हो सके। ऊपर नाभि हो और नीचे तालु हो जाय; ऊपर सूर्य हों और नीचे चन्द्रमा हो जायँ। ऐसे साधनको 'विपरीतकरणी मुद्रा' कहते हैं। यह अभ्याससे ही सिद्ध होती है।

प्राणायामकी विधिको जाननेवाला योगी कौवेकी चोंचके समान किये हुए अपने मुखसे शीतल-शीतल प्राणधारक वायुका पान करे तो वह जरा-मृत्युसे रहित हो जाता है। जो अपनी जिह्वाको तालुके छिद्रमें रखकर ऊर्ध्वमुख हो अमृतपान करता है, वह छः मासके भीतर ही जरा-मृत्युसे रहित देवभावको प्राप्त हो जाता है। इसमें तनिक भी संशय नहीं है। जो योगी ऊपरकी ओर जिह्वा किये स्थिरतापूर्वक अमृतपान करता है, वह पंद्रह दिनमें मृत्युको जीत लेता है। जिह्वाके अग्रभागसे उसके मूलभागमें स्थित प्रकाशमान छिद्रको दबाकर जो अमृतमयी देवीका ध्यान करता है, वह छः महीनेमें कवि हो जाता है। जिस योगीका शरीर अमृतसे परिपूर्ण हो जाता है, वह दो ही तीन वर्षोंमें ऊर्ध्वरेता हो जाता है—उसके वीर्यकी गति ऊपरकी ओर हो जाती है, जो अणिमा आदि आठों सिद्धियोंके उदयकी सूचक है। जिस योगीका शरीर सदा अमृतकलासे परिपूर्ण रहता है, उसे यदि तक्षकनाग भी डँस ले तो उसपर उसके विषका प्रभाव नहीं पड़ता। आसन, प्राणायाम और प्रत्याहारसे सम्पन्न होकर धारणाका अभ्यास करे। मनको स्थिर करके अपने हृदयमें पृथक्-पृथक् पंचमहाभूतोंको जो धारण करना है, उसीको 'धारणा' कहते हैं।

'ध्यै चिन्तायाम्' इस धातुसूत्रके अनुसार 'ध्यै' धातुका प्रयोग चिन्ता अर्थमें होता है। तत्त्वोंमें चित्तकी एकाग्रताको ही 'चिन्ता' कहते हैं। यह चिन्ता ही ध्यान है। ध्यान दो प्रकारका बताया गया है—सगुण और निर्गुण। रूप-रंग आदिके भेदसहित जो चिन्तन किया जाता है, वह सगुण ध्यान है और केवल तत्त्वका विचार निर्गुण ध्यान माना गया है। मन्त्रसहित ध्यानको सगुण और मन्त्ररहित ध्यानको निर्गुण समझना चाहिये। सुखद आसनपर बैठकर भीतर चित्तको और बाहर नेत्रको स्थिर करके शरीरको समभावसे रखना—यह ध्यानकी मुद्रा है, जो अत्यन्त सिद्धि

* काशीखण्ड-पूर्वार्ध * ८२३

देनेवाली है। अश्वमेध और राजसूय यज्ञसे भी वह पुण्य नहीं मिलता, जिसे स्थिर आसनवाला योगी पुरुष एक बार ध्यान करके पा लेता है। जबतक श्रवण आदि इन्द्रियोंमें शब्द आदि तन्मात्राओंकी स्थिति बनी रहती है—उनकी स्फूर्ति होती रहती है, तभीतक ध्यानकी अवस्था मानी गयी है। इससे आगे समाधि है। पाँच दण्डतक चित्तका एकाग्र होना धारणा है, साठ दण्डतक चित्त एकाग्र हो तो उसे ध्यान कहते हैं और यदि बारह दिनोंतक मन ध्येय वस्तुमें एकाग्र रहा तो उसे समाधि कहते हैं। जैसे जल और नमकका मेल होनेपर उनमें एकता हो जाती है, उसी प्रकार आत्मा और मनकी एकता समाधि कहलाती है। जब प्राणजनित चंचलता क्षीण हो जाती है और मन ध्येय वस्तुमें विलीन हो जाता है, उस समय जो समरसताका अनुभव होता है, उसीको यहाँ समाधि कहते हैं। जीवात्मा और परमात्माकी जो समता होती है और जहाँ सब प्रकारके संकल्प-विकल्प नष्ट हो जाते हैं उस स्थितिका नाम समाधि है। समाधिमें स्थित हुआ योगीश्वर न अपनेको जानता है न दूसरेको, उसे न सर्दीका अनुभव होता है, न गरमीका तथा उसे न तो सांसारिक सुखका बोध होता है और न दुःखका ही। समाधियुक्त योगीको न तो काल अपना ग्रास बना सकता है, न वह कर्मोंसे लिप्त होता है और न अस्त्र-शस्त्रोंसे उसके शरीरको खण्डित ही किया जा सकता है। जिसका आहार-विहार नियमित है, जिसकी कर्मविषयक चेष्टा भी नियमित है और जिसका सोना-जागना भी नियमित रूपसे ही होता है, वह योगी तत्त्वका साक्षात्कार करता है*। ब्रह्मवेत्ता पुरुष विज्ञानमय आनन्दस्वरूप ब्रह्मको ही तत्त्व मानते हैं। जिसका कोई दृष्टान्त नहीं है तथा जो मन और वाणीका अगोचर है उस आलम्बशून्य, निर्भय एवं नीरोग परब्रह्म परमात्मामें योगी पुरुष षडंगयोगकी विधिसे लीन होता है। जैसे घीमें छोड़ा हुआ घी घृत ही होता है और दूधमें मिलाया हुआ दूध दूध ही होता है, उसी प्रकार योगी ब्रह्ममें तन्मयताको प्राप्त होता है। योगी विभूति आदि जलहीन वस्तुओंसे शरीर-मर्दन करे। गरम जल और नमकको त्याग दे और सदा दूधका ही आहार करे। ब्रह्मचर्यका पालन करे, क्रोध और लोभको जीते तथा किसीसे भी द्वेष न करे। इस प्रकार एक वर्षतक निरन्तर अभ्यास करनेसे मनुष्य योगी कहलाता है। जो महामुद्रा, खेचरी मुद्रा, उड्डीयान बन्ध, जलन्धर बन्ध और मूल बन्धको जानता है, वह योगी योगसिद्धिका भागी होता है। पूरक, कुम्भक और रेचक नामक प्राणायामसे नाड़ीसमूहको शुद्ध करना और चन्द्र तथा सूर्य नाड़ी—इडा और पिंगलाको जोड़ना तथा विकारके हेतुभूत रसोंको भलीभाँति सुखाना—इसको 'महामुद्रा' कहते हैं। बायें पैरसे जननेन्द्रियको दबाकर अपनी ठोढ़ीको वक्षःस्थलपर रखे और दोनों हाथोंसे फैले हुए दाहिने पैरको देरतक पकड़े रहे। फिर प्राणवायुसे अपने उदरको पूर्ण करके धीरे-धीरे उसे देरतक बाहर निकाले। यह महामुद्रा बतायी गयी है जो बड़े-बड़े पापोंकी राशिका विनाश करनेवाली है। इस प्रकार इडा नाड़ीद्वारा प्राणायामका अभ्यास करके फिर पिंगला नाड़ीमें उसका अभ्यास करे। जब पूरक आदिकी संख्या समान हो जाय तब मुद्राका विसर्जन करे। इसका अभ्यास हो जानेपर योगीके लिये पथ्य और अपथ्यका विचार नहीं रह जाता है। उसके लिये सभी विकारोत्पादक रस नीरस हो जाते हैं। भयानक विष भी पीये हुए अमृतकी भाँति पच जाता है। जो महामुद्राका अभ्यास कर लेता है, उसके क्षय, कोढ़, बवासीर, वायुगोला और अजीर्ण आदि रोग नष्ट हो जाते हैं। यदि उलटकर गयी हुई जिह्वा कपालके छिद्रमें प्रविष्ट हो और दृष्टि दोनों भौंहोंके बीचमें स्थिर रहे तो खेचरी मुद्रा होती है। जो खेचरी मुद्राको


* युक्ताहारविहारश्च युक्तचेष्टो हि कर्मसु। युक्तनिद्रावबोधश्च योगी तत्त्वं प्रपश्यति॥ (स्क० पु०, का० पू० ४१। १३०)

८२४* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

जानता है, वह बाणसमूहसे पीड़ित नहीं होता और न कर्मोंसे ही लिप्त होता है। उसको काल भी बाधा नहीं दे सकता। इसमें चित्त आकाशमें विचरता है और जिह्वा भी आकाशगत होकर चरती है। इससे इस मुद्राका नाम खेचरी है। सिद्ध पुरुषोंने इसका सेवन किया है। शरीरमें जबतक विन्दु स्थित है, तबतक मृत्युका भय कहाँसे होगा और जबतक खेचरी मुद्रा बँधी हुई है, तबतक विन्दु बाहर नहीं जाता।

महापक्षी (महाप्राण) दिन-रात उड़ता रहता है। उसीको इस मुद्राद्वारा बाँधा जाता है। इसलिये इसका नाम उड्डीयान बन्ध है। नाभिके ऊपर और उदरमें पश्चिमततान* धारण करे। यह उड्डीयान बन्ध कहलाता है। इसके सिद्ध हो जानेपर मनुष्य मृत्युका भी भय त्याग देता है। जो नाड़ियोंके समूहको, जिसके द्वारा कि शरीरान्तर्गत छिद्रोंका जल नीचेकी ओर प्रवाहित होता है, बाँधता है, वह जालन्धर बन्ध कहलाता है, जो कण्ठमें होनेवाले दुःखसमुदायका नाश करनेवाला है। कण्ठको संकुचित करके किये जानेवाले इस जालन्धर बन्धके सिद्ध होनेपर ललाट और तालुवर्ती चन्द्रमण्डलमें स्थित अमृत उदरकी अग्निमें नहीं गिरता और वायुका भी प्रकोप नहीं होता। दोनों एड़ियोंसे लिंगको दबाकर और अपानवायुको ऊपरकी ओर खींचकर गुदाको संकुचित करे। इसे मूल बन्ध कहते हैं। मूल बन्धका सतत अभ्यास करनेसे अपान और प्राणवायुकी एकता होती है, मल-मूत्रका नाश होता है और वृद्ध पुरुष भी तरुण हो जाता है। प्राण और अपानवायुके वशमें होकर चंचल हुआ जीव इडा और पिंगला नाड़ीके द्वारा नीचे-ऊपर दौड़ता रहता है। वह कहीं स्थिर नहीं हो पाता। जैसे रस्सीमें बँधा हुआ पक्षी कहीं उड़कर जाय तो भी उसे पुनः अपने समीप खींच लिया जाता है, उसी प्रकार तीनों गुणोंमें बँधा हुआ जीव प्राणायामके द्वारा खींचा जाता है। अपान प्राणको और प्राण अपानको अपनी ओर खींचता है। ये दोनों ऊपर स्थित हैं। योगवेत्ता पुरुष इन्हें परस्पर संयुक्त कर देता है। श्वास हकारकी ध्वनिके साथ बाहर निकलता है और सकारकी ध्वनिके साथ पुनः भीतर प्रवेश करता है। इस प्रकार जीव सदा ‘हंस-हंस’ इस मन्त्रका जप करता रहता है। दिन-रातमें इक्कीस हजार छः सौ बार श्वासका आना-जाना होता है। अतः जीव उतनी ही बार ‘हंस’ मन्त्रका जप नित्यप्रति किया करता है। यह अजपा नामवाली गायत्री है जो योगियोंको मोक्ष देनेवाली है। इसके संकल्पमात्रसे मनुष्य समस्त पापोंसे मुक्त हो जाता है।

योगीके योगमार्गमें अनेक प्रकारके विघ्न आते हैं जो उसकी साधनामें हानि पहुँचानेवाले हैं। उसे दूरकी बातें सुनायी देती हैं, दूरका दृश्य अपने आगे प्रत्यक्ष दिखायी देता है, आधे पलमें सैकड़ों योजन जानेकी शक्ति आ जाती है, बिना पढ़े ही अथवा बिना स्मरण किये ही सब शास्त्र कण्ठस्थ हो जाते हैं, धारणाशक्ति बहुत बढ़ जाती है और महान् भार भी हलका प्रतीत होता है। वह क्षणमें दुबला, क्षणमें मोटा, क्षणमें छोटा और क्षणमें बड़ा हो जाता है। वह योगी दूसरेके शरीरमें प्रवेश कर जाता है, पशु-पक्षियोंकी बातें समझ लेता है, अपने शरीरमें दिव्य गन्ध धारण करता है और मुखसे दिव्य वचन बोलने लगता है। दिव्यलोककी कन्याएँ उससे प्रार्थना करती हैं और वह दिव्य देह धारण कर लेता है। ये सब विघ्न निकटवर्तिनी योगसिद्धिके सूचक हैं। यदि इन विघ्नोंसे योगीका मन चंचल नहीं हुआ तो उससे आगेकी भूमिकामें पहुँचकर वह ब्रह्मादि देवताओंके लिये भी दुर्लभ परम पदको प्राप्त कर लेता है। अगस्त्यजी!


* दोनों हाथोंके अग्रभागसे जुड़े हुए दोनों पैरोंके तलुओंको पकड़कर पैरोंको आगेकी ओर फैलावे। उस समय उन दोनों पैरोंका मध्यभाग (घुटनेके समीप) जैसा दिखायी देता है, वैसी ही आकृति पेटमें भी बन जाय तो उसे पश्चिमततान धारण करना कहते हैं। इस क्रियामें प्राण सुषुम्ना नाड़ीमें बद्ध हो जाता है और पेट भीतरकी ओर दबकर पीठमें सटता है।

* काशीखण्ड-पूर्वार्ध *८२५

जिसे पाकर मनुष्य पुनः इस संसारमें नहीं लौटता और जिसकी प्राप्ति होनेपर शोकसे सदाके लिये छुटकारा मिल जाता है, उस पदको योगी षडंगयोगकी साधनासे पा लेता है, परंतु इन्द्रियोंकी वृत्ति चंचल होनेसे और कलियुगमें पापके बढ़नेसे थोड़ी आयुवाले मनुष्योंको यहाँ योगका महान् अभ्युदय कहाँ प्राप्त हो सकता है? इसीलिये करुणासागर भगवान् विश्वनाथ जीवोंको महोदय पद प्रदान करनेके लिये काशीपुरीमें विराजमान हैं। जीव काशीमें जिस प्रकार सुखसे कैवल्य प्राप्त कर लेते हैं, उस प्रकार अन्य किसी स्थानमें योग, युक्ति आदि उपायोंके द्वारा भी नहीं पा सकते हैं, क्योंकि काशीपुरीसे अपने शरीरका संयोग करा देना ही उत्तम योग बताया गया है। इस संसारमें दूसरे किसी योगके द्वारा मनुष्यकी शीघ्र मुक्ति नहीं होती है।


मृत्युसूचक चिह्नोंका वर्णन

**अगस्त्यजीने पूछा—**स्कन्दजी! मृत्यु निकट आ गयी है, यह बात कैसे जानी जाय?

**कार्तिकेयजीने कहा—**मुने! मृत्यु निकट आनेपर जो चिह्न प्रकट होते हैं, उन्हें सुनो। जिसकी दाहिनी नासिकामें एक दिन-रात अखण्डरूपसे वायु चलती रहती है, उसकी आयु तीन वर्षमें समाप्त हो जाती है और जिसका दक्षिण श्वास लगातार दो दिन या तीन दिनतक निरन्तर चलता रहता है, उसके जीवनकी अवधि इस संसारमें केवल एक वर्षकी बतायी जाती है। यदि दोनों नासिकाछिद्र दस दिनतक निरन्तर ऊर्ध्व श्वासके साथ चलते रहें तो मनुष्य तीन दिनतक जीवित रह सकता है। यदि श्वासवायु नासिकाके दोनों छिद्रोंको छोड़कर मुखसे बहने लगे तो दो दिनके पहले ही उसका यमलोकके मार्गपर प्रस्थान हो जायगा, यह सूचित कर देना चाहिये। जिस कालमें मृत्यु अकस्मात् निकट आ जाती है, मृत्युके भयसे डरनेवाले पुरुषको उस कालका प्रयत्नपूर्वक विचार करना चाहिये। जब सूर्य सप्तम राशिपर हों और चन्द्रमा जन्मनक्षत्रपर आ गये हों, तब यदि दाहिनी नासिकासे श्वास चलने लगे तो उस समय सूर्यदेवतासे अधिष्ठित काल प्राप्त होता है। उसपर विशेष लक्ष्य रखना चाहिये। जो अकस्मात् किसी काले-पीले पुरुषको देखता है, फिर उसी क्षण उसके रूपको अदृश्य पाता है, वह केवल दो वर्ष और जीवित रह सकता है। जिसके मल-मूत्र और वीर्य अथवा मल-मूत्र एवं छींक एक साथ ही गिरते हैं, उसकी आयु केवल एक वर्ष और शेष है, ऐसा मानना चाहिये। जो इन्द्रनीलमणिके समान रंगवाले नागोंके झुंडको आकाशमें इधर-उधर फैला हुआ देखता है, वह छः महीने भी जीवित नहीं रहता। जिसकी मृत्यु निकट है, वह अरुन्धती और ध्रुवको भी नहीं देख पाता। जो अकस्मात् नीले-पीले आदि रंगोंको तथा कड़ुवे, खट्टे आदि रसोंको विपरीतरूपमें देखने और अनुभव करने लगता है, वह छः महीनेमें मृत्युका भागी होता है। वीर्य, नख और नेत्रोंका कोना—ये सब यदि नीले या काले रंगके हो जायँ तो मनुष्य छठे मासमें यमपुरीकी यात्रा करता है। भलीभाँति स्नान करनेके बाद भी जिनका हृदय शीघ्र ही सूख जाता है तथा हाथ और पैर भी जल्दी ही सूख जाते हैं, उसका जीवन केवल तीन मासतक चलता है। जो मनुष्य जल, घी और दर्पण आदिमें अपने प्रतिबिम्बका मस्तक नहीं देखता, वह एक मासतक जीवित रहता है। बुद्धि भ्रष्ट हो जाय, वाणी स्पष्ट न निकले, रातमें इन्द्रधनुषका दर्शन हो, दो चन्द्रमा और दो सूर्य दिखायी दें तो ये सब मृत्युसूचक चिह्न हैं। इन सब चिह्नोंमेंसे यदि एक चिह्नको भी मनुष्य देखता है तो मृत्यु केवल एक मासतक उसकी प्रतीक्षा करती है। हाथसे कान बंद कर लेनेपर जब किसी प्रकारकी आवाज न सुनायी