संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
- काशीखण्ड-पूर्वार्ध * | ८२१ ---|---
| और समाधि—ये योगके छः अंग हैं^१। साधनके लिये जिससे स्थिरता एवं सुखपूर्वक बैठा जाय, वह आसन है। योगीके लिये सिद्धासन^२ शीघ्र योगसिद्धि देनेवाला है। इसके अभ्याससे शरीर प्रतिदिन दृढ़तर होता जाता है। योगवेत्ता पुरुष अपने दाहिने पैरको बायीं जाँघपर रखकर बायें पैरको दाहिनी जाँघपर रखे तो उसे पद्मासन कहते हैं। इसे दृढ़तापूर्वक बाँधनेकी कलाको जाननेवाला पुरुष अपने दोनों हाथोंको पीठके पीछेसे लाकर दोनों पैरोंके अँगूठोंको पकड़ ले। इस पद्मासनके अभ्याससे मनुष्यका शरीर सुदृढ़ होता है। अथवा जिस स्वस्तिक आसनसे बैठनेमें साधकको सुख मालूम होता हो, उसीसे बैठकर योगवेत्ता पुरुष योगका अभ्यास करे। जो स्थान सब प्रकारकी बाधाओंसे रहित, सम्पूर्ण इन्द्रियोंको सुख देनेवाला तथा मनको प्रसन्नता देनेवाला हो, जहाँ पुष्पहार एवं धूप आदिकी सुगन्ध छा रही हो, ऐसे स्थानमें बैठकर योगाभ्यास करे। साधक न तो अधिक भोजन करके, न भूखसे पीड़ित रहकर, न मल-मूत्रके वेगको रोककर कष्ट सहते हुए, न राहके थके होनेपर और न चिन्तासे व्याकुल होनेपर ही योगका अभ्यास करे। जितने समयमें एक ह्रस्व अक्षरका उच्चारण होता है, उतने समयको 'एक मात्रा' कहते हैं, ऐसी बारह मात्राओंका प्राणायाम निकृष्ट श्रेणीका माना गया है। इससे दूनी चौबीस मात्राओंका प्राणायाम मध्यम कहा गया है और पहलेसे तीन गुनी अर्थात् छत्तीस मात्राओंका प्राणायाम उत्तम बताया गया है। ये तीनों क्रमशः स्वेद, कम्प और विषाद उत्पन्न करनेवाले हैं। इनमेंसे प्रथम अर्थात् बारह मात्रावाले प्राणायामके द्वारा स्वेद (पसीने)-को जीते, द्वितीय अर्थात् चौबीस मात्रावाले प्राणायामके द्वारा कम्पको जीते और तृतीय—छत्तीस मात्रावाले प्राणायामके द्वारा विषादपर | विजय पावे। इससे योगीका प्राणायाम सिद्ध हो जाता है। क्रमशः सेवन करनेसे सिद्ध हुआ प्राण जहाँ योगीकी इच्छा होती है, वहाँ उसे ले जाता है। प्राणवायुको यदि हठपूर्वक रोका जाता है तो वह रोमकूपोंके मार्गसे निकल जाती है, देहको विदीर्ण करती है और कोढ़ आदि रोग पैदा कर देती है। अतः जैसे जंगलके हाथीको क्रमशः विश्वास दिलाकर उसे वशमें किया जाता है, उसी प्रकार प्राणवायुको धीरे-धीरे रोकनेका प्रयत्न करना चाहिये। योगीके द्वारा क्रमयोगसे हृदयमें स्थापित किया हुआ यह प्राण धीरे-धीरे अनुकूल हो जाता है। छत्तीस अंगुलका हंस (प्राणवायु) दक्षिण—वाममार्ग (इड़ा-पिंगला नामवाली दो नाड़ियों)-से बाहर निकलता है। प्रयाण करनेके कारण उसे 'प्राण' कहते हैं। जब समस्त नाड़ी-चक्र शान्त होकर शुद्ध हो जाता है, तभी योगी पुरुष अपने प्राणोंको रोकनेमें समर्थ होता है। दृढ़तापूर्वक आसनपर बैठकर योगी यथाशक्ति चन्द्रनाड़ी—इड़ाके मार्गसे (नासिकाके वाम छिद्रद्वारा) प्राणवायुको भीतर भरे। तत्पश्चात् सूर्यमार्ग—पिंगला नाड़ी (नासिकाके दाहिने छिद्र)-से उसे बाहर निकाले। यह पूरक और रेचक नामवाला प्राणायाम कहलाता है। योगी पुरुष कुम्भक नामक प्राणायामके द्वारा चन्द्रबीजसे युक्त झरती हुई सुधाधाराके प्रवाहका ध्यान करते हुए तत्काल सुखका अनुभव करता है। तदनन्तर योगी सूर्यनाड़ी अर्थात् नासिकाके दक्षिण छिद्रके द्वारा प्राणवायुको खींचकर उदरगुफाको भरे और कुछ देरतक प्राणवायुको रोकनेके पश्चात् चन्द्रनाड़ी अर्थात् नासिकाके वाम छिद्रसे वायुको धीरे-धीरे बाहर निकाल दे। उस समय प्रज्वलित अग्निपुंजके समान भगवान् सूर्यका हृदयमें ध्यान करता रहे। इस दक्षिण प्राणायामके द्वारा योगिराज परम कल्याणका भागी होता है। इस प्रकार तीन |
१- आसनं प्राणसंरोधः प्रत्याहारश्च धारणा। ध्यानं समाधिरेतानि योगाङ्गानि भवन्ति षट्॥ (स्क० पु०, का० पू० ४१।५९)
२- मलेन्द्रिय और मूत्रेन्द्रियके बीचमें बायें पैरका तलुआ तथा शिश्नके ऊपर दाहिना पैर और छातीके ऊपर चिबुक (ठोढ़ी) रखकर दोनों भौंहोंके मध्यभागको देखना सिद्धासन कहलाता है।
८२२ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
महीनेके अभ्याससे वाम, दक्षिण दोनों प्रकारके प्राणायामका सेवन करके जब समस्त नाड़ियोंको सिद्ध कर लिया जाता है, तब उस योगीको 'सिद्धप्राण' कहते हैं। नाड़ीकी शुद्धि होनेसे योगी अपनी इच्छाके अनुसार वायुको धारण करता है। पेटकी अग्निको उद्दीप्त करता है। उसे अनाहत नाद सुनायी पड़ने लगता है अथवा नादतत्त्वका साक्षात्कार होने लगता है और उसका शरीर नीरोग बना रहता है। शरीरमें स्थित वायुका नाम प्राण है। उसे रोकनेको ही आयाम कहते हैं। जब प्राणवायु ब्रह्मरन्ध्रमें पहुँचती है, तब घण्टा आदि वाद्योंका महानाद सुन पड़ता है। फिर योगसिद्धि दूर नहीं रहती। नियमित प्राणायामसे समस्त रोगोंका नाश हो जाता है और उसके अनियमित अभ्याससे सब रोगोंकी उत्पत्ति होती है। प्राणवायुके व्यतिक्रमसे हिचकी, श्वास (दमा), कास (खाँसी), सिरदर्द, कर्णशूल तथा नेत्रपीड़ा आदि बहुतसे दोष प्रकट होते हैं। अतः थोड़ी-थोड़ी वायुका त्याग करे और थोड़ी-ही-थोड़ी वायुको खींचकर अपने भीतर भरे तथा नियमित वायुको ही रोकनेका प्रयत्न करे। ऐसा करनेसे योगवेत्ता पुरुषको सिद्धि प्राप्त होती है। सब ओर विषयोंमें स्वच्छन्द विचरती हुई इन्द्रियोंको किसी-न-किसी युक्तिसे विषयोंकी ओरसे समेटना 'प्रत्याहार' कहलाता है। जैसे कछुआ अपने अंगोंको सब ओरसे समेट लेता है, उसी प्रकार जो प्रत्याहारकी विधिसे अपनी सब इन्द्रियोंको विषयोंकी ओरसे समेट लेता है, वह पापरहित हो जाता है। नाभिप्रदेशमें सूर्य और तालुस्थानमें चन्द्रमा निवास करते हैं। चन्द्रमा नीचेको मुख करके अमृतकी वर्षा करते हैं और सूर्य ऊपरकी ओर मुँह करके उस अमृतरसको अपना ग्रास बना लेते हैं। अतः ऐसा उपाय करना चाहिये, जिससे वह अमृत प्राप्त हो सके। ऊपर नाभि हो और नीचे तालु हो जाय; ऊपर सूर्य हों और नीचे चन्द्रमा हो जायँ। ऐसे साधनको 'विपरीतकरणी मुद्रा' कहते हैं। यह अभ्याससे ही सिद्ध होती है।
प्राणायामकी विधिको जाननेवाला योगी कौवेकी चोंचके समान किये हुए अपने मुखसे शीतल-शीतल प्राणधारक वायुका पान करे तो वह जरा-मृत्युसे रहित हो जाता है। जो अपनी जिह्वाको तालुके छिद्रमें रखकर ऊर्ध्वमुख हो अमृतपान करता है, वह छः मासके भीतर ही जरा-मृत्युसे रहित देवभावको प्राप्त हो जाता है। इसमें तनिक भी संशय नहीं है। जो योगी ऊपरकी ओर जिह्वा किये स्थिरतापूर्वक अमृतपान करता है, वह पंद्रह दिनमें मृत्युको जीत लेता है। जिह्वाके अग्रभागसे उसके मूलभागमें स्थित प्रकाशमान छिद्रको दबाकर जो अमृतमयी देवीका ध्यान करता है, वह छः महीनेमें कवि हो जाता है। जिस योगीका शरीर अमृतसे परिपूर्ण हो जाता है, वह दो ही तीन वर्षोंमें ऊर्ध्वरेता हो जाता है—उसके वीर्यकी गति ऊपरकी ओर हो जाती है, जो अणिमा आदि आठों सिद्धियोंके उदयकी सूचक है। जिस योगीका शरीर सदा अमृतकलासे परिपूर्ण रहता है, उसे यदि तक्षकनाग भी डँस ले तो उसपर उसके विषका प्रभाव नहीं पड़ता। आसन, प्राणायाम और प्रत्याहारसे सम्पन्न होकर धारणाका अभ्यास करे। मनको स्थिर करके अपने हृदयमें पृथक्-पृथक् पंचमहाभूतोंको जो धारण करना है, उसीको 'धारणा' कहते हैं।
'ध्यै चिन्तायाम्' इस धातुसूत्रके अनुसार 'ध्यै' धातुका प्रयोग चिन्ता अर्थमें होता है। तत्त्वोंमें चित्तकी एकाग्रताको ही 'चिन्ता' कहते हैं। यह चिन्ता ही ध्यान है। ध्यान दो प्रकारका बताया गया है—सगुण और निर्गुण। रूप-रंग आदिके भेदसहित जो चिन्तन किया जाता है, वह सगुण ध्यान है और केवल तत्त्वका विचार निर्गुण ध्यान माना गया है। मन्त्रसहित ध्यानको सगुण और मन्त्ररहित ध्यानको निर्गुण समझना चाहिये। सुखद आसनपर बैठकर भीतर चित्तको और बाहर नेत्रको स्थिर करके शरीरको समभावसे रखना—यह ध्यानकी मुद्रा है, जो अत्यन्त सिद्धि
* काशीखण्ड-पूर्वार्ध * ८२३
देनेवाली है। अश्वमेध और राजसूय यज्ञसे भी वह पुण्य नहीं मिलता, जिसे स्थिर आसनवाला योगी पुरुष एक बार ध्यान करके पा लेता है। जबतक श्रवण आदि इन्द्रियोंमें शब्द आदि तन्मात्राओंकी स्थिति बनी रहती है—उनकी स्फूर्ति होती रहती है, तभीतक ध्यानकी अवस्था मानी गयी है। इससे आगे समाधि है। पाँच दण्डतक चित्तका एकाग्र होना धारणा है, साठ दण्डतक चित्त एकाग्र हो तो उसे ध्यान कहते हैं और यदि बारह दिनोंतक मन ध्येय वस्तुमें एकाग्र रहा तो उसे समाधि कहते हैं। जैसे जल और नमकका मेल होनेपर उनमें एकता हो जाती है, उसी प्रकार आत्मा और मनकी एकता समाधि कहलाती है। जब प्राणजनित चंचलता क्षीण हो जाती है और मन ध्येय वस्तुमें विलीन हो जाता है, उस समय जो समरसताका अनुभव होता है, उसीको यहाँ समाधि कहते हैं। जीवात्मा और परमात्माकी जो समता होती है और जहाँ सब प्रकारके संकल्प-विकल्प नष्ट हो जाते हैं उस स्थितिका नाम समाधि है। समाधिमें स्थित हुआ योगीश्वर न अपनेको जानता है न दूसरेको, उसे न सर्दीका अनुभव होता है, न गरमीका तथा उसे न तो सांसारिक सुखका बोध होता है और न दुःखका ही। समाधियुक्त योगीको न तो काल अपना ग्रास बना सकता है, न वह कर्मोंसे लिप्त होता है और न अस्त्र-शस्त्रोंसे उसके शरीरको खण्डित ही किया जा सकता है। जिसका आहार-विहार नियमित है, जिसकी कर्मविषयक चेष्टा भी नियमित है और जिसका सोना-जागना भी नियमित रूपसे ही होता है, वह योगी तत्त्वका साक्षात्कार करता है*। ब्रह्मवेत्ता पुरुष विज्ञानमय आनन्दस्वरूप ब्रह्मको ही तत्त्व मानते हैं। जिसका कोई दृष्टान्त नहीं है तथा जो मन और वाणीका अगोचर है उस आलम्बशून्य, निर्भय एवं नीरोग परब्रह्म परमात्मामें योगी पुरुष षडंगयोगकी विधिसे लीन होता है। जैसे घीमें छोड़ा हुआ घी घृत ही होता है और दूधमें मिलाया हुआ दूध दूध ही होता है, उसी प्रकार योगी ब्रह्ममें तन्मयताको प्राप्त होता है। योगी विभूति आदि जलहीन वस्तुओंसे शरीर-मर्दन करे। गरम जल और नमकको त्याग दे और सदा दूधका ही आहार करे। ब्रह्मचर्यका पालन करे, क्रोध और लोभको जीते तथा किसीसे भी द्वेष न करे। इस प्रकार एक वर्षतक निरन्तर अभ्यास करनेसे मनुष्य योगी कहलाता है। जो महामुद्रा, खेचरी मुद्रा, उड्डीयान बन्ध, जलन्धर बन्ध और मूल बन्धको जानता है, वह योगी योगसिद्धिका भागी होता है। पूरक, कुम्भक और रेचक नामक प्राणायामसे नाड़ीसमूहको शुद्ध करना और चन्द्र तथा सूर्य नाड़ी—इडा और पिंगलाको जोड़ना तथा विकारके हेतुभूत रसोंको भलीभाँति सुखाना—इसको 'महामुद्रा' कहते हैं। बायें पैरसे जननेन्द्रियको दबाकर अपनी ठोढ़ीको वक्षःस्थलपर रखे और दोनों हाथोंसे फैले हुए दाहिने पैरको देरतक पकड़े रहे। फिर प्राणवायुसे अपने उदरको पूर्ण करके धीरे-धीरे उसे देरतक बाहर निकाले। यह महामुद्रा बतायी गयी है जो बड़े-बड़े पापोंकी राशिका विनाश करनेवाली है। इस प्रकार इडा नाड़ीद्वारा प्राणायामका अभ्यास करके फिर पिंगला नाड़ीमें उसका अभ्यास करे। जब पूरक आदिकी संख्या समान हो जाय तब मुद्राका विसर्जन करे। इसका अभ्यास हो जानेपर योगीके लिये पथ्य और अपथ्यका विचार नहीं रह जाता है। उसके लिये सभी विकारोत्पादक रस नीरस हो जाते हैं। भयानक विष भी पीये हुए अमृतकी भाँति पच जाता है। जो महामुद्राका अभ्यास कर लेता है, उसके क्षय, कोढ़, बवासीर, वायुगोला और अजीर्ण आदि रोग नष्ट हो जाते हैं। यदि उलटकर गयी हुई जिह्वा कपालके छिद्रमें प्रविष्ट हो और दृष्टि दोनों भौंहोंके बीचमें स्थिर रहे तो खेचरी मुद्रा होती है। जो खेचरी मुद्राको
* युक्ताहारविहारश्च युक्तचेष्टो हि कर्मसु। युक्तनिद्रावबोधश्च योगी तत्त्वं प्रपश्यति॥ (स्क० पु०, का० पू० ४१। १३०)
| ८२४ | * संक्षिप्त स्कन्दपुराण * |
|---|
जानता है, वह बाणसमूहसे पीड़ित नहीं होता और न कर्मोंसे ही लिप्त होता है। उसको काल भी बाधा नहीं दे सकता। इसमें चित्त आकाशमें विचरता है और जिह्वा भी आकाशगत होकर चरती है। इससे इस मुद्राका नाम खेचरी है। सिद्ध पुरुषोंने इसका सेवन किया है। शरीरमें जबतक विन्दु स्थित है, तबतक मृत्युका भय कहाँसे होगा और जबतक खेचरी मुद्रा बँधी हुई है, तबतक विन्दु बाहर नहीं जाता।
महापक्षी (महाप्राण) दिन-रात उड़ता रहता है। उसीको इस मुद्राद्वारा बाँधा जाता है। इसलिये इसका नाम उड्डीयान बन्ध है। नाभिके ऊपर और उदरमें पश्चिमततान* धारण करे। यह उड्डीयान बन्ध कहलाता है। इसके सिद्ध हो जानेपर मनुष्य मृत्युका भी भय त्याग देता है। जो नाड़ियोंके समूहको, जिसके द्वारा कि शरीरान्तर्गत छिद्रोंका जल नीचेकी ओर प्रवाहित होता है, बाँधता है, वह जालन्धर बन्ध कहलाता है, जो कण्ठमें होनेवाले दुःखसमुदायका नाश करनेवाला है। कण्ठको संकुचित करके किये जानेवाले इस जालन्धर बन्धके सिद्ध होनेपर ललाट और तालुवर्ती चन्द्रमण्डलमें स्थित अमृत उदरकी अग्निमें नहीं गिरता और वायुका भी प्रकोप नहीं होता। दोनों एड़ियोंसे लिंगको दबाकर और अपानवायुको ऊपरकी ओर खींचकर गुदाको संकुचित करे। इसे मूल बन्ध कहते हैं। मूल बन्धका सतत अभ्यास करनेसे अपान और प्राणवायुकी एकता होती है, मल-मूत्रका नाश होता है और वृद्ध पुरुष भी तरुण हो जाता है। प्राण और अपानवायुके वशमें होकर चंचल हुआ जीव इडा और पिंगला नाड़ीके द्वारा नीचे-ऊपर दौड़ता रहता है। वह कहीं स्थिर नहीं हो पाता। जैसे रस्सीमें बँधा हुआ पक्षी कहीं उड़कर जाय तो भी उसे पुनः अपने समीप खींच लिया जाता है, उसी प्रकार तीनों गुणोंमें बँधा हुआ जीव प्राणायामके द्वारा खींचा जाता है। अपान प्राणको और प्राण अपानको अपनी ओर खींचता है। ये दोनों ऊपर स्थित हैं। योगवेत्ता पुरुष इन्हें परस्पर संयुक्त कर देता है। श्वास हकारकी ध्वनिके साथ बाहर निकलता है और सकारकी ध्वनिके साथ पुनः भीतर प्रवेश करता है। इस प्रकार जीव सदा ‘हंस-हंस’ इस मन्त्रका जप करता रहता है। दिन-रातमें इक्कीस हजार छः सौ बार श्वासका आना-जाना होता है। अतः जीव उतनी ही बार ‘हंस’ मन्त्रका जप नित्यप्रति किया करता है। यह अजपा नामवाली गायत्री है जो योगियोंको मोक्ष देनेवाली है। इसके संकल्पमात्रसे मनुष्य समस्त पापोंसे मुक्त हो जाता है।
योगीके योगमार्गमें अनेक प्रकारके विघ्न आते हैं जो उसकी साधनामें हानि पहुँचानेवाले हैं। उसे दूरकी बातें सुनायी देती हैं, दूरका दृश्य अपने आगे प्रत्यक्ष दिखायी देता है, आधे पलमें सैकड़ों योजन जानेकी शक्ति आ जाती है, बिना पढ़े ही अथवा बिना स्मरण किये ही सब शास्त्र कण्ठस्थ हो जाते हैं, धारणाशक्ति बहुत बढ़ जाती है और महान् भार भी हलका प्रतीत होता है। वह क्षणमें दुबला, क्षणमें मोटा, क्षणमें छोटा और क्षणमें बड़ा हो जाता है। वह योगी दूसरेके शरीरमें प्रवेश कर जाता है, पशु-पक्षियोंकी बातें समझ लेता है, अपने शरीरमें दिव्य गन्ध धारण करता है और मुखसे दिव्य वचन बोलने लगता है। दिव्यलोककी कन्याएँ उससे प्रार्थना करती हैं और वह दिव्य देह धारण कर लेता है। ये सब विघ्न निकटवर्तिनी योगसिद्धिके सूचक हैं। यदि इन विघ्नोंसे योगीका मन चंचल नहीं हुआ तो उससे आगेकी भूमिकामें पहुँचकर वह ब्रह्मादि देवताओंके लिये भी दुर्लभ परम पदको प्राप्त कर लेता है। अगस्त्यजी!
* दोनों हाथोंके अग्रभागसे जुड़े हुए दोनों पैरोंके तलुओंको पकड़कर पैरोंको आगेकी ओर फैलावे। उस समय उन दोनों पैरोंका मध्यभाग (घुटनेके समीप) जैसा दिखायी देता है, वैसी ही आकृति पेटमें भी बन जाय तो उसे पश्चिमततान धारण करना कहते हैं। इस क्रियामें प्राण सुषुम्ना नाड़ीमें बद्ध हो जाता है और पेट भीतरकी ओर दबकर पीठमें सटता है।
| * काशीखण्ड-पूर्वार्ध * | ८२५ |
|---|
जिसे पाकर मनुष्य पुनः इस संसारमें नहीं लौटता और जिसकी प्राप्ति होनेपर शोकसे सदाके लिये छुटकारा मिल जाता है, उस पदको योगी षडंगयोगकी साधनासे पा लेता है, परंतु इन्द्रियोंकी वृत्ति चंचल होनेसे और कलियुगमें पापके बढ़नेसे थोड़ी आयुवाले मनुष्योंको यहाँ योगका महान् अभ्युदय कहाँ प्राप्त हो सकता है? इसीलिये करुणासागर भगवान् विश्वनाथ जीवोंको महोदय पद प्रदान करनेके लिये काशीपुरीमें विराजमान हैं। जीव काशीमें जिस प्रकार सुखसे कैवल्य प्राप्त कर लेते हैं, उस प्रकार अन्य किसी स्थानमें योग, युक्ति आदि उपायोंके द्वारा भी नहीं पा सकते हैं, क्योंकि काशीपुरीसे अपने शरीरका संयोग करा देना ही उत्तम योग बताया गया है। इस संसारमें दूसरे किसी योगके द्वारा मनुष्यकी शीघ्र मुक्ति नहीं होती है।
मृत्युसूचक चिह्नोंका वर्णन
**अगस्त्यजीने पूछा—**स्कन्दजी! मृत्यु निकट आ गयी है, यह बात कैसे जानी जाय?
**कार्तिकेयजीने कहा—**मुने! मृत्यु निकट आनेपर जो चिह्न प्रकट होते हैं, उन्हें सुनो। जिसकी दाहिनी नासिकामें एक दिन-रात अखण्डरूपसे वायु चलती रहती है, उसकी आयु तीन वर्षमें समाप्त हो जाती है और जिसका दक्षिण श्वास लगातार दो दिन या तीन दिनतक निरन्तर चलता रहता है, उसके जीवनकी अवधि इस संसारमें केवल एक वर्षकी बतायी जाती है। यदि दोनों नासिकाछिद्र दस दिनतक निरन्तर ऊर्ध्व श्वासके साथ चलते रहें तो मनुष्य तीन दिनतक जीवित रह सकता है। यदि श्वासवायु नासिकाके दोनों छिद्रोंको छोड़कर मुखसे बहने लगे तो दो दिनके पहले ही उसका यमलोकके मार्गपर प्रस्थान हो जायगा, यह सूचित कर देना चाहिये। जिस कालमें मृत्यु अकस्मात् निकट आ जाती है, मृत्युके भयसे डरनेवाले पुरुषको उस कालका प्रयत्नपूर्वक विचार करना चाहिये। जब सूर्य सप्तम राशिपर हों और चन्द्रमा जन्मनक्षत्रपर आ गये हों, तब यदि दाहिनी नासिकासे श्वास चलने लगे तो उस समय सूर्यदेवतासे अधिष्ठित काल प्राप्त होता है। उसपर विशेष लक्ष्य रखना चाहिये। जो अकस्मात् किसी काले-पीले पुरुषको देखता है, फिर उसी क्षण उसके रूपको अदृश्य पाता है, वह केवल दो वर्ष और जीवित रह सकता है। जिसके मल-मूत्र और वीर्य अथवा मल-मूत्र एवं छींक एक साथ ही गिरते हैं, उसकी आयु केवल एक वर्ष और शेष है, ऐसा मानना चाहिये। जो इन्द्रनीलमणिके समान रंगवाले नागोंके झुंडको आकाशमें इधर-उधर फैला हुआ देखता है, वह छः महीने भी जीवित नहीं रहता। जिसकी मृत्यु निकट है, वह अरुन्धती और ध्रुवको भी नहीं देख पाता। जो अकस्मात् नीले-पीले आदि रंगोंको तथा कड़ुवे, खट्टे आदि रसोंको विपरीतरूपमें देखने और अनुभव करने लगता है, वह छः महीनेमें मृत्युका भागी होता है। वीर्य, नख और नेत्रोंका कोना—ये सब यदि नीले या काले रंगके हो जायँ तो मनुष्य छठे मासमें यमपुरीकी यात्रा करता है। भलीभाँति स्नान करनेके बाद भी जिनका हृदय शीघ्र ही सूख जाता है तथा हाथ और पैर भी जल्दी ही सूख जाते हैं, उसका जीवन केवल तीन मासतक चलता है। जो मनुष्य जल, घी और दर्पण आदिमें अपने प्रतिबिम्बका मस्तक नहीं देखता, वह एक मासतक जीवित रहता है। बुद्धि भ्रष्ट हो जाय, वाणी स्पष्ट न निकले, रातमें इन्द्रधनुषका दर्शन हो, दो चन्द्रमा और दो सूर्य दिखायी दें तो ये सब मृत्युसूचक चिह्न हैं। इन सब चिह्नोंमेंसे यदि एक चिह्नको भी मनुष्य देखता है तो मृत्यु केवल एक मासतक उसकी प्रतीक्षा करती है। हाथसे कान बंद कर लेनेपर जब किसी प्रकारकी आवाज न सुनायी
८२६ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
दे तथा मोटा शरीर थोड़े ही दिनोंमें दुबला-पतला और दुबला-पतला शरीर मोटा हो जाय तो एक मासमें मृत्यु हो जाती है। जिसे स्वप्नमें भूत, प्रेत, पिशाच, असुर, कौए, कुत्ते, गीध, सियार, गधे और सूअर इधर-उधर ले जाते और खाते हैं, वह वर्षके अन्तमें प्राण त्यागकर यमराजका दर्शन करता है। जो स्वप्नकालमें गन्ध, पुष्प और लाल वस्त्रोंसे अपने शरीरको विभूषित देखता है, वह उस दिनसे केवल आठ मासतक जीवित रहता है। जो सपनेमें धूलकी राशि, विमौट (दीमकका घर) अथवा यूपदण्डपर चढ़ता है, वह छठे महीनेमें मृत्युको प्राप्त होता है। जो स्वप्नमें अपनेको तेल लगाये, मूड़ मुड़ाये और गदहेपर चढ़े दक्षिण दिशाकी ओर ले जाये जाते हुए देखता है अथवा अपने पूर्वजोंको इस रूपमें देखता है, उसकी मृत्यु छः महीनेमें हो जाती है। जो मनुष्य स्वप्नमें अपने मस्तक या शरीरपर तृण और सूखे काठ देखता है, वह छठे मासमें जीवित नहीं रहता। जो स्वप्नमें लोहेका डंडा और काला वस्त्र धारण करनेवाले किसी काले रंगके पुरुषको अपने आगे खड़ा देखता है, वह तीन माससे अधिक नहीं जीवित रहता। स्वप्नमें काले रंगकी कुमारी कन्या जिस पुरुषको अपने बाहुपाशमें कस ले, वह एक ही महीनेमें यमपुरीका दर्शन करेगा। जो मनुष्य स्वप्नमें वानरकी सवारीपर चढ़कर पूर्व दिशाकी ओर जाता है, वह पाँच ही दिनमें संयमनीपुरीको देखता है। यदि कृपण मनुष्य सहसा उदार हो जाय या उदार मनुष्य सहसा कृपण हो जाय, इस प्रकार यदि प्रकृतिमें सहसा विकार आ जाय तो वह मनुष्य शीघ्र मृत्युको प्राप्त होता है। ये तथा और भी बहुतसे मृत्युसूचक चिह्न हैं, जिन्हें जानकर मनुष्य योगका अभ्यास करे अथवा काशीपुरीकी शरण ले।
मुने! मैं गर्भवासको रोकनेवाले भगवान् काशीपति शिवकी शरण लेनेके सिवा दूसरा कोई ऐसा उपाय नहीं जानता जो कालको भी वंचित करनेमें समर्थ हो। जिसने भगवान् विश्वनाथके निवासस्थान काशीपुरीको प्राप्त किया, उत्तरवाहिनी गंगाका जल पी लिया और श्रीविश्वेश्वर लिंगका स्पर्श कर लिया, ऐसा कौन पुरुष वन्दनीय नहीं होता। काल कुपित होकर काशीनिवासी मनुष्योंका क्या बिगाड़ लेगा। जबतक बुढ़ापेका आक्रमण नहीं होता और जबतक इन्द्रियाँ शिथिल नहीं हो जातीं, तभीतक बुद्धिमान् पुरुष समस्त तुच्छ प्रपंचका त्याग करके काशीपुरीकी शरण ले। अगस्त्यजी! मृत्युसूचक दूसरे चिह्न तो दूर रहे, सबसे पहला लक्षण तो बुढ़ापा ही है, परंतु आश्चर्य है कि उसके आनेपर भी लोगोंको भय नहीं होता। वृद्धावस्थाने जिसका आलिंगन कर लिया है, उस मनुष्यको भाई-बन्धु नहीं मानते। उसके पुत्र भी उसकी आज्ञाका पालन नहीं करते और पत्नी भी उससे प्रेम करना छोड़ देती है। काशीमें निवास करनेसे जिस प्रकार कालको शीघ्रतापूर्वक जीत लिया जाता है, उस प्रकार उस कालको तपस्या और योगकी युक्तियोंद्वारा नहीं जीता जा सकता।
महाराज दिवोदासके धर्मपूर्ण राज्यका वर्णन
अगस्त्यजीने पूछा— भगवन्! भगवान् शंकरने राजा दिवोदाससे किस प्रकार काशीपुरीका परित्याग करवाया ?
कार्तिकेयजी बोले— गिरिराज मन्दरकी तपस्यासे सन्तुष्ट हुए भगवान् शिव ब्रह्माजीके वचनोंके गौरवसे मन्दराचलको चले गये। उनके चले जानेपर उन्हींके साथ सम्पूर्ण देवता भी वहीं चले गये। भगवान् विष्णु भी भूमण्डलके वैष्णव तीर्थोंका परित्याग करके जहाँ देवाधिदेव उमानाथ भगवान् शिव विराजमान थे उसी मन्दराचलपर चले गये। पृथ्वीसे देवसमुदायके चले जानेपर प्रतापी राजा दिवोदासने यहाँ निर्द्वन्द्व राज्य किया।
* काशीखण्ड-पूर्वार्ध *
८२७
उन्होंने काशीपुरीमें सुदृढ़ राजधानी बनाकर धर्मपूर्वक प्रजाका पालन करते हुए सबको उन्नतिशील बनाया। हाथियोंसे भी अधिक बलवान् महाराज दिवोदासका अपराध कभी नागलोग भी नहीं करते थे। दानव भी मानवकी आकृति धारण करके उनकी सेवा करते थे। गुह्यक लोग सब ओर मनुष्योंमें राजाके गुप्तचर बनकर रहते थे। उनके सभाभवनके आँगनमें बैठे हुए विद्वानों एवं मन्त्रियोंको किसीने कभी शास्त्रोंद्वारा पराजित नहीं किया तथा रणांगणमें डटे हुए उनके योद्धाओंको कभी किसीने अस्त्र-शस्त्रोंद्वारा परास्त नहीं किया। उनके राज्यमें कभी ऐसे लोग नहीं देखे गये, जो पदभ्रष्ट तथा दूसरोंके द्वेषभाजन हों। उस समय सब प्रजा अपने-अपने पदपर प्रतिष्ठित एवं सुखी थी। राजा दिवोदासके राज्यमें सभी गाँव ईति^१-भीतिसे रहित थे। कोई गाँव ऐसा नहीं था, जिसकी रक्षाके लिये राजकर्मचारी उपस्थित न हों। घर-घरमें लोग कुबेरके समान धन दान करनेवाले थे।
इस प्रकार काशीमें राज्य करते हुए दिवोदासके अस्सी हजार वर्ष एक दिनके समान व्यतीत हो गये। अपने औरस पुत्रोंकी भाँति प्रजाका पालन करते रहनेवाले राजा रिपुंजय (दिवोदास)-के द्वारा थोड़ेसे भी अधर्मका संग्रह नहीं हुआ। वे राजनीति-सम्बन्धी छः गुणोंके^२ ज्ञाता थे। उनका चित्त अपनी त्रिविध^३ शक्तियोंसे सदा उत्साहित रहता था। वे नीतिनिपुण पुरुषोंके समस्त उपायोंका ज्ञान रखनेवाले थे। इसलिये उनके छिद्रों (दोषों)-को देवता भी नहीं जानते थे। दिवोदासके राष्ट्रमण्डलमें सभी पुरुष एकपत्नी-व्रती थे। स्त्रियोंमें कोई भी ऐसी नहीं थी जो पतिव्रता न हो। एक भी ब्राह्मण ऐसा नहीं था जिसने वेद-शास्त्रोंका अध्ययन न किया हो। कोई भी क्षत्रिय ऐसा न था जो शूरवीर न हो। एक भी वैश्य ऐसा नहीं दिखायी देता था जो अर्थोपार्जनके कर्ममें कुशल न हो। शूद्र अनन्य भावसे द्विजातियोंकी सेवामें लगे रहते थे। उनके राज्यमें अखण्ड ब्रह्मचर्यव्रतका पालन करनेवाले ब्रह्मचारी थे, जो सदा गुरुकुलके अधीन रहकर वेदविद्याके अध्ययनमें तत्पर थे। गृहस्थ लोग अतिथिसत्काररूपी धर्ममें कुशल, धर्मशास्त्रोंके मर्मज्ञ तथा सर्वदा शुभ आचरणोंमें संलग्न रहनेवाले थे। तीसरे आश्रमको स्वीकार करनेवाले वानप्रस्थी वनमें उपलब्ध होनेवाली जीविकाके प्रति ही आदर रखते थे। ग्रामीण वार्ताओंके प्रति उनके मनमें कोई उत्सुकता न थी और वे वैदिकमार्गमें चलनेवाले थे। उनके राज्यमें रहनेवाले संन्यासी सब प्रकारकी आसक्तियोंसे रहित, जीवन्मुक्त, संग्रहशून्य, मन, वाणी और कर्मरूपी दण्डसे युक्त तथा सर्वथा निःस्पृह थे। दूसरे अनुलोम^४ और विलोम^५ कर्मसे उत्पन्न होनेवाले मनुष्योंने भी अपनी पूर्वपरम्परासे प्रचलित धर्ममार्गका किंचिन्मात्र भी परित्याग नहीं किया था। राजा दिवोदासके राज्यमें कोई भी सन्तानहीन, निर्धन, वृद्धोंकी सेवा न करनेवाला तथा अकाल
१. अतिवृष्टि, अनावृष्टि, चूहोंका उपद्रव, टिड्डी गिरना, तोते आदि पक्षियोंद्वारा खेतीको हानि पहुँचना और अपने देशपर किसी शत्रु राजाका आक्रमण होना—ये छः प्रकारकी ईतियाँ हैं।
२. सन्धि, विग्रह, यान, आसन, द्वैधीभाव और समाश्रय—ये छः गुण हैं। इनमें अवसर और आवश्यकताके अनुसार शत्रुसे मेल करना या रखना सन्धि, उससे लड़ाई छेड़ना विग्रह, स्वयं आक्रमण करना यान, योग्य समयकी प्रतीक्षामें बैठे रहना आसन, दुरंगी नीति बर्तना द्वैधीभाव और अपनेसे बलवान् राजाकी शरण लेना समाश्रय कहलाता है।
३. प्रभुशक्ति, उत्साहशक्ति और मन्त्रशक्ति—ये तीन प्रकारकी शक्तियाँ हैं। कोष और दण्ड आदिके सम्बन्धकी शक्ति प्रभु-शक्ति, सन्धि-विग्रह आदिके सम्बन्धकी शक्ति मन्त्रशक्ति और पराक्रम प्रकट करने तथा विजय प्राप्त करनेकी शक्ति उत्साह-शक्ति कहलाती है।
४. उच्च वर्णके पुरुष तथा नीच वर्णकी स्त्रीसे उत्पन्न हुआ मनुष्य अनुलोम कहा जाता है।
५. नीच वर्णके पुरुष और उच्च वर्णकी स्त्रीसे उत्पन्न हुआ मनुष्य विलोम कहा जाता है।
८२८ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
मृत्युसे मरनेवाला नहीं था। चंचल, वाचाल, | सेवा-पूजा करते थे। सब विद्वान् सब स्थानोंपर वंचक, हिंसक, पाखण्डी, भाँड़, रँडुवे और | अपनी मनोवांछित वस्तु पाकर सम्मानित होते मदिरा बेचनेवाले भी नहीं थे। सर्वत्र मन्त्रोंका | थे। विद्वान् लोग तपस्वी महात्माओंकी, तपस्वी घोष सुनायी देता था। पद-पदपर शास्त्रचर्चा | महात्मा जितेन्द्रिय पुरुषोंकी, जितेन्द्रिय महापुरुष सुनायी देती थी। सब ओर शुभ वार्तालाप होते | ज्ञानियोंकी और ज्ञानीलोग शिवयोगियोंकी पूजा और आनन्दसे मंगलगीत गाये जाते थे। मांसभक्षी, | करते थे। ब्राह्मणोंके मुखरूपी अग्निमें दिन-रात ऋण लेनेवाले और चोर भी उनके राज्यमें नहीं | विधिपूर्वक उत्तम रूपसे तैयार की हुई मन्त्रपूत थे। पुत्र पिताके चरणोंकी पूजा, देवाराधना, | एवं बहुमूल्य हविका हवन किया जाता था। उपवास, व्रत, तीर्थ और देवोपासनाको परम धर्म | दिवोदासके राज्यमें जहाँ-तहाँ सब ओर पग- समझकर करते थे। नारियाँ अपने पतिके चरणोंकी | पगपर शुद्ध द्रव्यराशिके द्वारा बावली, कुआँ और पूजा, उनके वचनोंको सुनना और स्वामीकी | पोखरा खुदवानेवाले तथा बगीचे लगानेवाले आज्ञाका पालन करना अपना श्रेष्ठ धर्म समझती | धर्मात्मा पुरुष बहुत बड़ी संख्यामें थे। वहाँ सब थीं। सब लोग अपने बड़े भाईकी सदा पूजा | जातिके लोग अनिन्द्य (उत्तम) सेवाकार्यसे करते थे। सेवक प्रसन्नतापूर्वक अपने स्वामीके | सम्पन्न हो हृष्ट-पुष्ट दिखायी देते थे। इस प्रकार चरणकमलोंकी पूजा करते थे। छोटी जातिके | सर्वत्र शुद्ध एवं पवित्र बर्ताव करनेवाले उस लोग ऊँची जातिके लोगोंके गुण और गौरवकी | भूपालके छिद्र ढूँढ़नेके लिये देवताओंने बहुत प्रशंसा करते थे। काशीपुरीके रहनेवाले सब | चेष्टा की, किंतु उन्हें थोड़ा-सा भी छिद्र नहीं मनुष्य तीनों समय वहाँके देवताओंकी बार-बार | प्राप्त हो सका।
$\approx\approx ० \approx\approx$
भगवान् शिवके आदेशसे सूर्यका काशीमें गमन और निवास तथा लोलार्कतीर्थका माहात्म्य
स्कन्दजी कहते हैं—अगस्त्य! इन्द्रादि देवताओंने | जिस प्रकार वह क्षेत्र उजाड़ हो जाय, वैसा दिवोदासके राज्य-शासनको असफल बनानेके | करो। परंतु उस राजाका अनादर न करना, लिये अनेक प्रकारके विघ्न उपस्थित किये, किंतु | क्योंकि धर्मके मार्गमें लगे हुए सत्पुरुषका जो धर्मात्मा राजा दिवोदासने अपने तपोबलसे उन | अपमान किया जाता है वह अपने ही ऊपर सब विघ्नोंपर विजय पायी। तदनन्तर मन्दराचलसे | पड़ता है और वैसा करनेसे महान् पाप भी होता महादेवजीने चौंसठ योगिनियोंको राजाका छिद्र | है। यदि तुम्हारे बुद्धिविकाससे राजा धर्मसे च्युत देखनेके लिये काशीमें भेजा। वे योगिनियाँ बारह | हो जायँ, तब अपनी दुःसह किरणोंसे तुम्हें उस महीनोंतक काशीमें रहकर निरन्तर चेष्टा करते | नगरको उजाड़ देना चाहिये। राजा दिवोदासमें रहनेपर भी राजाका कोई छिद्र (दोष) न पा | काम, क्रोध, लोभ, मोह, ईर्ष्या और अहंकारका सकीं। अतएव उनके ऊपर अपना कोई प्रभाव | सर्वथा अभाव है, इसलिये उन्हें काल भी नहीं न डाल सकीं। जब वे लौटकर वापस नहीं | जीत सकता। सूर्य! जबतक धर्ममें स्थिर बुद्धि गयीं, तब भगवान् शिवने सूर्यदेवको बुलाकर | है और धर्ममें मन स्थिरतापूर्वक लगा हुआ है, कहा—'सप्ताश्ववाहन! तुम उस मंगलमयी | तबतक विपत्तिमें भी मनुष्योंके मार्गमें विघ्नका काशीपुरीको शीघ्रतापूर्वक जाओ जहाँ धर्मात्मा | उदय कैसे हो सकता है। दिवाकर! इस संसारमें राजा दिवोदास विद्यमान हैं। राजाके धर्मविरोधसे | जितने जीव हैं उन सबकी चेष्टाओंको तुम जानते
- काशीखण्ड-पूर्वार्ध * ८२९
हो, इसीलिये लोकचक्षु कहलाते हो। मेरे बताये हुए कार्यकी सिद्धिके लिये जाओ।'
भगवान् शिवकी आज्ञा शिरोधार्य करके सूर्यदेव काशीपुरीमें गये। वहाँ बाहर-भीतर विचरते हुए उन्होंने राजामें थोड़ा-सा भी धर्मका व्यतिक्रम नहीं देखा। वे अनेक रूप धारण करके एक वर्षतक काशीमें रहे। वे कभी अतिथि बनकर राजाके पास जाते और उनसे कुछ दुर्लभ वस्तु माँग बैठते थे, परंतु राजा दिवोदासके राज्यमें उन्हें कोई वस्तु दुर्लभ नहीं दिखायी दी। सूर्य कभी याचक बनते, कभी बहुत बड़े दानी होकर जाते, कभी दीनताको प्राप्त होते और कभी ज्योतिषी बन जाते थे। कभी प्रत्यक्षवादी बनकर इस लोकमें प्रत्यक्ष दिखायी देनेवाली वस्तुओंकी ही सत्यताका प्रतिपादन करते थे। कभी जटाधारी बनते, कभी दिगम्बर हो जाते और कभी विष उतारनेकी विद्यामें प्रवीण सँपेरा बन जाते थे। कभी-कभी उन्होंने नाना प्रकारके दृष्टान्तों और कथानकोंद्वारा अनेक प्रकारके व्रतका उपदेश करके वहाँकी पतिव्रता स्त्रियोंको बहकानेकी भी चेष्टा की। कभी तो वे ब्राह्मण बनते, कभी ब्रह्मज्ञानी, कहीं वेदाध्यासी, कहीं क्षत्रिय, कहीं वैश्य और अन्त्यज, कहीं ब्रह्मचारी, कहीं गृहस्थ, कहीं वानप्रस्थ, कहीं संन्यासी—इस प्रकार अनेकानेक रूप धारण करके वे लोगोंको भ्रममें डालते थे। कहीं-कहीं तो वे सम्पूर्ण विद्याओंमें पारंगत एवं सर्वज्ञ बनकर उपस्थित होते थे। इस प्रकार काशीमें विचरते हुए सूर्यने कभी किसी मनुष्यमें भी कोई छिद्र नहीं पाया।
इस क्षणभंगुर शरीरके रहते हुए जिसने धर्मकी रक्षा की है, उसने तीनों लोकोंकी रक्षा कर ली। उसे अर्थ और कामकी भलीभाँति रक्षा करनेसे क्या प्रयोजन है ? यदि बहुत-से मनुष्योंको सुखकारी प्रतीत होनेवाला काम भी रक्षा करनेके योग्य होता तो कामवैरी भगवान् शिव उसे क्षणभरमें भस्म करके अनंग (अंगहीन) क्यों बना देते ? शिवि आदि राजाओं तथा दधीचि आदि समस्त ब्राह्मणोंने अपने शरीरका त्याग करके भी धर्मकी रक्षा की है।
दुर्लभ काशीपुरीको पाकर कौन सचेत पुरुष उसे छोड़ सकता है। इस संसारमें प्रत्येक जन्ममें पुत्र, मित्र, स्त्री, खेत और धन मिल सकते हैं, केवल काशीपुरी नहीं मिलती। जबतक काशीसेवनसे उत्पन्न पुण्यमय तेजका उदय नहीं होता, तभीतक जुगुनूके समान अन्यान्य तेज प्रकाशित होते हैं। इस प्रकार काशीके प्रभावको जाननेवाले तथा अन्धकारको दूर करनेवाले लोकचक्षु सूर्यदेव अपनेको बारह स्वरूपोंमें व्यक्त करके काशीपुरीमें स्थित हो गये। इनमें पहले लोलार्क है, दूसरे उत्तरार्क, तीसरे साम्बादित्य, चौथे द्रौपदादित्य, पाँचवें मयूखादित्य, छठे खखोल्कादित्य, सातवें अरुणादित्य, आठवें वृद्धादित्य, नवें केशवादित्य, दसवें विमलादित्य, ग्यारहवें गंगादित्य तथा बारहवें यमादित्य—ये बारहों काशीपुरीमें स्थित हैं। अगस्त्य! जिनका तमोगुण अधिक बढ़ा हुआ है, ऐसे दुष्टोंसे ये सदा इस क्षेत्रकी रक्षा करते हैं। अर्क अर्थात् भगवान् सूर्यका मन काशीके दर्शनके लिये लोल (चंचल) हो उठा था, इसलिये काशीमें उनकी लोलार्क नामसे ख्याति हुई। दक्षिण दिशामें असीसंगमके समीप लोलार्ककी स्थिति है, वे सदा काशीवासी मनुष्योंके योग-क्षेमकी सिद्धि करते हैं। मार्गशीर्षमासकी सप्तमी या षष्ठी तिथिको रविवारका योग होनेपर वहाँकी वार्षिक यात्रा करके मनुष्य समस्त पापोंसे मुक्त हो जाता है। मनुष्य असीसंगममें स्नान करके देवताओं और पितरोंका तर्पण एवं विधिपूर्वक श्राद्ध करे तो वह पितरोंके ऋणसे छूट जाता है। जो मनुष्य रविवारको लोलार्कका दर्शन करके उनका चरणामृत लेता है, उसे कोई दुःख नहीं होता और खुजली, दाद तथा फोड़ा-फुंसीका कष्ट भी नहीं भोगना पड़ता। जो श्रेष्ठ मनुष्य लोलार्कके इस माहात्म्यको सुनता है, वह इस दुःखसागर संसारमें कहीं भी दुःखी नहीं होता।
८३० * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
उत्तरार्क सूर्यकी महिमा, सुलक्षणाकी तपस्या और उसपर शिव-पार्वतीकी कृपा
स्कन्दजी कहते हैं—काशीपुरीकी उत्तर दिशामें उत्तम अर्ककुण्ड है, जहाँ भगवान् सूर्य उत्तरार्क नामसे निवास करते हैं। मुने! वहाँ जो इतिहास घटित हो चुका है, उसको सुनो। काशीपुरीमें प्रियव्रत नामसे प्रसिद्ध एक ब्राह्मण थे जो आत्रेयकुलमें उत्पन्न, सदाचारी तथा अतिथिजनोंके प्रेमी थे। उनकी पत्नी अत्यन्त सुन्दरी तथा उत्तम व्रतका पालन करनेवाली थी। वह घरके काम-काजमें बड़ी चतुर तथा पतिकी सेवामें तत्पर रहनेवाली थी। ब्राह्मणने अपनी पत्नीसे एक उत्तम लक्षणोंवाली कन्याको जन्म दिया। वह कन्या मूल नक्षत्रके प्रथम चरणमें उत्पन्न हुई थी। उस समय बृहस्पति केन्द्रमें थे। ब्राह्मणकी वह कन्या पिता-माताके घरमें दिन-दिन बढ़ने लगी। वह बड़ी रूपवती, विनयशील, सदाचारपरायणा तथा माता-पिताका प्रिय करनेवाली थी। घरकी सामग्रियोंको माँज-धोकर साफ-सुथरा रखनेमें अत्यन्त निपुण थी। वह अपने पिताके घरमें जैसे-जैसे बढ़ने लगी, वैसे-ही-वैसे उसके पिताके मनमें यह चिन्ता भी बढ़ने लगी कि—'मेरी यह परम सुन्दरी उत्तम लक्षणोंवाली श्रेष्ठ कन्या किसको देनेयोग्य है। इसके योग्य उत्तम वर मुझे कहाँ मिलेगा जो कुल, अवस्था, शील, स्वभाव, शास्त्राध्ययन, रूप और धनसे भी सम्पन्न हो। किसके साथ ब्याह होनेपर इसे सुख मिलेगा।' इस प्रकार चिन्ता नामक ज्वरसे ग्रस्त हो प्रियव्रत ब्राह्मण गृह आदि सब वस्तुओंका त्याग करके मृत्युको प्राप्त हो गये। पिताके मरनेपर उस कन्याकी पतिव्रता माता भी कन्याको अकेली छोड़कर पतिके पीछे चली गयी। पतिव्रतका पालन करनेवाली सहधर्मिणीका यह धर्म ही है कि वह पतिके जीते-जी तथा मरनेपर भी पतिके ही साथ रहे। पुत्र, पिता, माता और बन्धु-बान्धव इनमेंसे कोई भी (पतिके सदृश) स्त्रीकी रक्षा नहीं करते। स्त्री अपने पतिके चरणोंकी जो सेवा करती है वह सेवा ही सर्वत्र उसकी रक्षा करती है। माता-पिताके मरनेपर वह सुलक्षणा नामवाली कन्या दुःखसे व्याकुल हो उठी। उसने उनके और्ध्वदैहिक संस्कार करके दशाह आदि क्रियाएँ सम्पन्न कीं और अनाथ एवं दीन होकर वह बड़ी भारी चिन्ता करने लगी—'अहो! मैं पिता-मातासे हीन असहाय अबला इस संसारसागरके उस पार, जहाँ पहुँचना अत्यन्त कठिन है, कैसे जा सकूँगी; क्योंकि स्त्रीभाव सबके द्वारा तिरस्कृत होनेवाला है। मेरे माता-पिताने मुझे किसी वरको अर्पण नहीं किया। ऐसी दशामें मैं स्वेच्छासे दूसरे किसी वरका वरण कैसे करूँ। यदि मैंने किसीका वरण कर भी लिया तो भी यदि वह कुलीन, गुणवान्, सुशील और अपने अनुकूल रहनेवाला न मिला तो उसका वरण करनेसे भी क्या लाभ होगा।'
इस प्रकार चिन्ता करती हुई रूप, उदारता और गुणोंसे युक्त उस ब्राह्मणकन्याने अनेकों युवकोंद्वारा प्रतिदिन बार-बार प्रार्थना की जानेपर भी किसीको अपने हृदयमें स्थान नहीं दिया। पिता-माताकी मृत्यु और उनके अद्भुत वात्सल्यका विचार करके वह बार-बार अपनी और इस नश्वर संसारकी निन्दा करने लगी—'अहो! जिन्होंने मुझे जन्म दिया और बड़े लाड़-प्यारसे पाला, वे मेरे माता-पिता कहाँ चले गये? देहधारी जीवकी इस अनित्यताको धिक्कार है। जैसे मेरे ही आगे मेरे माता-पिताका शरीर चला गया, उसी प्रकार मेरा भी शरीर चला जायगा।' ऐसा विचार करके उस बालिकाने अपने मन और इन्द्रियोंको काबूमें किया और स्थिरचित्त हो दृढ़तापूर्वक ब्रह्मचर्यका पालन करती हुई वह उत्तरार्कदेवके समीप कठोर तपस्या करने लगी। उसकी तपस्याके समय प्रतिदिन एक छोटी-सी बकरी उसके आगे आकर अविचल भावसे खड़ी हो जाती। फिर सन्ध्याके समय वह कुछ घास तथा पत्ते आदि चरकर और उत्तरार्क
* काशीखण्ड-पूर्वार्ध * ८३१
कुण्डका जल पीकर अपने स्वामीके घरको लौट जाती थी। इस प्रकार पाँच-छः वर्ष व्यतीत होनेपर एक दिन भगवान् शिव पार्वतीदेवीके साथ लीलापूर्वक विचरते हुए वहाँ आये। उत्तरार्कदेवके समीप तपस्या करती हुई सुलक्षणाको उन्होंने ठूँठ पेड़की भाँति अविचल और तपस्यासे अत्यन्त दुर्बल देखा। तब दयामयी पार्वतीदेवीने भगवान् शंकरसे निवेदन किया—'देव! यह सुन्दरी कन्या बन्धु-बान्धवोंसे हीन है, इसे वर देकर अनुगृहीत कीजिये।' पार्वतीजीका यह वचन सुनकर दयासागर भगवान् शिवने नेत्र बंदकर समाधिमें स्थित हुई उस कन्यासे वर देनेके लिये उद्यत होकर बोले—'उत्तम व्रतका पालन करनेवाली सुलक्षणे! मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ, तुम कोई वर माँगो।'
महादेवजीकी यह अमृतवर्षिणी वाणी सुनकर सुलक्षणेने जब नेत्र खोले, तब देखा, सामने वरदान देनेके लिये उद्यत भगवान् त्रिलोचन खड़े हैं और उनके वामांग भागमें देवी उमा विराजमान हैं। उन दोनोंका दर्शन करके सुलक्षणेने हाथ जोड़कर प्रणाम किया। इतनेमें ही उसे अपने आगे खड़ी हुई वह बकरी दिखायी दी। तब वह सोचने लगी—'इस जीवलोकमें अपना स्वार्थ सिद्ध करनेके लिये कौन मनुष्य जीवन नहीं धारण करता है? परंतु जो परोपकारके लिये जीवन धारण करता है, उसीका जीवनधारण सफल है।' मन-ही-मन ऐसा विचारकर उसने भगवान् शिवसे कहा—'कृपानिधान! यदि आप मुझे वर देना उचित समझते हैं तो पहले इस बेचारी बकरीपर अनुग्रह कीजिये।' सुलक्षणाकी यह परोपकारसे सुशोभित वाणी सुनकर शरणागतोंकी पीड़ा दूर करनेवाले भगवान् शंकर बहुत प्रसन्न हुए और पार्वतीदेवीसे इस प्रकार बोले—'गिरिराजनन्दिनि ! देखो, साधु पुरुषोंकी ऐसी ही परोपकारयुक्त बुद्धि होती है। सम्पूर्ण लोकोंमें वे ही धन्य हैं और वे ही सम्पूर्ण धर्मोंके आश्रय हैं जो सर्वथा परोपकारके लिये यत्न करते हैं। सब वस्तुओंका संग्रह भी कहीं दीर्घकालतक नहीं ठहरता। एकमात्र परोपकार ही चिरस्थायी होता है। यह सुलक्षणा परम धन्य और अनुग्रह करनेयोग्य है। देवि ! तुम्हीं बताओ, इस सुलक्षणाको और इस बकरीको भी कौन-सा वरदान देना चाहिये ?'
पार्वतीदेवीने कहा—भगवन् ! यह शुभ आचरणोंवाली सुलक्षणा कल्याणके लिये उद्योग करनेवाली है; यह मेरी सखी होकर रहे। यह बालब्रह्मचारिणी है, इससे मुझे अत्यन्त प्रिय होगी। मेरी इच्छा है कि यह दिव्य शरीर धारण करके सदैव मेरे समीप निवास करे। यह बकरी भी यहीं काशीनरेशकी कन्या होवे और काशीमें उत्तम भोगोंका उपभोग करके अन्तमें परम मोक्षको प्राप्त हो। इसने शीतसे भयभीत न होकर पौष मासके रविवारको सूर्योदयसे पहले इस कुण्डमें स्नान किया है, इसलिये इस अर्क कुण्डका नाम आजसे 'बर्करी कुण्ड' हो जाय। यहाँ सब मनुष्योंके द्वारा इस बकरीकी प्रतिमा पूजनीय होगी। काशीतीर्थके फलकी इच्छा रखनेवाले मनुष्योंको पौष मासके रविवारके दिन उत्तरार्कदेवकी वार्षिक यात्रा करनी चाहिये।
इस प्रकार पार्वतीजीके कहे हुए सब वचनको सिद्ध करके सर्वव्यापी भगवान् विश्वनाथने अपने मन्दिरमें प्रवेश किया।
| ८३२ | * संक्षिप्त स्कन्दपुराण * |
|---|
साम्बादित्य, द्रौपदादित्य और मयूखादित्यकी माहात्म्य-कथा
स्कन्दजी कहते हैं—मुने! द्वारकामें भगवान् श्रीकृष्णके एक लाख अस्सी पुत्र थे। वे सभी सूर्यके समान तेजस्वी, अत्यन्त सुन्दर, महाबलवान्, शस्त्र-विद्या और शास्त्रोंके अतिशय ज्ञाता तथा अत्यन्त सुलक्षण थे। उन सबमें साम्ब सबसे अधिक गुणवान् थे। उन्होंने काशीमें आकर सूर्यदेवकी आराधना की और एक कुण्ड बनवाया। जो मनुष्य रविवारको साम्ब कुण्डमें स्नान करके साम्बादित्यकी पूजा करता है, वह रोगोंसे पीडित नहीं होता है। माघके शुक्ल पक्षकी सप्तमीको यदि रविवार हो तो वह सूर्यग्रहणके समान कल्याणकारी महापर्व बताया गया है। उस दिन अरुणोदय कालमें साम्ब कुण्डमें स्नान करके जो साम्बादित्यकी पूजा करता है, वह बड़े-बड़े रोगोंसे मुक्त हो अक्षय धर्मको प्राप्त होता है। चैत्रमासके रविवारको साम्बादित्यकी वार्षिक यात्रा होती है। उस दिन साम्ब कुण्डमें विधिपूर्वक स्नान करके जो अशोक पुष्पोंसे साम्बादित्यकी पूजा करता है, वह कभी शोकग्रस्त नहीं होता। भगवान् विश्वनाथसे पश्चिम दिशामें महात्मा साम्बने यहाँ शुभ देनेवाली सूर्यमूर्तिकी भलीभाँति आराधना की थी। महामते! साम्बादित्यका पूजन और नमस्कार करके जो आठ बार उनकी परिक्रमा करता है, वह पापरहित हो काशीवासका फल पाता है।
अब मैं द्रौपदादित्यका परिचय दूँगा। द्रौपदादित्य भक्तोंको सिद्धि प्रदान करनेवाले हैं। अतः उनका भलीभाँति सेवन करना चाहिये। एक समयकी बात है, पाँचों पाण्डव अपने शत्रुओंद्वारा उपस्थित की हुई बड़ी भारी विपत्तिमें पड़कर वनवासी हो गये। पांचाल देशके राजा द्रुपदकी कन्या द्रौपदी उनकी धर्मपत्नी थी। उसने अपने पतियोंके दुःखसे सन्तप्त होकर भगवान् सूर्यकी आराधना की। इससे प्रसन्न होकर भगवान् सूर्यने द्रौपदीको करछुल और ढक्कनके साथ एक अक्षय स्थालीपात्र (बटलोई) दिया और इस प्रकार कहा—'महाभागे! इस स्थालीसे जितने भी अन्नकी इच्छा रखनेवाले लोग आयेंगे, वे सभी तृप्तिको प्राप्त होंगे। ऐसा तभीतक होगा, जबतक तुम भोजन नहीं कर लोगी। तुम्हारे भोजन कर लेनेपर यह खाली हो जायगी। यह रसीले व्यंजनोंकी निधि है और इच्छानुसार भोजन देनेवाली है। जो मनुष्य भगवान् विश्वनाथके दक्षिण भागमें तुम्हारे सम्मुख स्थित हुए मुझ द्रौपदादित्यकी आराधना करेगा, उसकी भूखकी पीड़ा नष्ट हो जायगी। धर्मप्रिय द्रौपदी! काशीमें तुम्हारे दर्शनसे रोग और भूख-प्यासका भय नहीं रहेगा।' इस प्रकार वर देकर सूर्यदेव भगवान् शंकरकी आराधनामें लग गये। जो मनुष्य द्रौपदीके द्वारा आराधित भगवान् सूर्यकी कथाको भक्तिपूर्वक सुनेगा, उसका पाप नष्ट हो जायगा।
स्कन्दजी कहते हैं—मुने! मैंने द्रौपदादित्यकी महिमा संक्षेपसे कही। अब मयूखादित्यका माहात्म्य सुनो। पूर्वकालमें त्रिभुवनविख्यात पंचगंगा तीर्थमें भगवान् सूर्यने अत्यन्त उग्र तपस्या की। गभस्तीश्वर नामक महालिंग और भक्तोंको मंगल प्रदान करनेवाली मंगला नामक गौरीदेवीकी स्थापना करके उनकी आराधना करते हुए भगवान् सूर्य तीव्र तपके तेजसे अत्यन्त जाज्वल्यमान हो उठे। उस समय पृथ्वी और आकाशके बीचका समस्त प्रदेश त्रिलोकीको दग्ध करनेमें समर्थ सूर्यकिरणोंद्वारा अत्यन्त सन्तप्त हो उठा। जैसे कदम्बफलके ऊपर सब ओरसे पुष्प ही दिखायी देते हैं, फल नहीं। उसी प्रकार ऊपर, नीचे और अगल-बगलमें सब ओर केवल सूर्यकी किरणें ही दिखायी देती थीं, सूर्यदेव नहीं। तेज और तपस्याकी राशिभूत सूर्यकी तपोमयी ज्वालाओंके तीव्र भयसे तीनों लोकोंके समस्त चराचर प्राणी काँप उठे। सब मन-ही-मन सोचने लगे—अहो! सूर्यदेव सम्पूर्ण जगत्के आत्मा
| * काशीखण्ड-पूर्वार्ध * | ८३३ |
|---|
हूँ। यदि वही हमें जलाने लगे तो कौन हमारा रक्षक होगा। सूर्य समस्त संसारके नेत्र हैं। ये ही सब ओर प्रकाश फैलाते हैं और प्रतिदिन प्रातःकाल मृतप्राय जगत्को नूतन जीवन देकर जाग्रत् करते हैं। ये ही अन्धकारमय अन्धकूपमें पड़े हुए समस्त प्राणियोंका चारों ओर अपने किरणरूप हाथ फैलाकर उद्धार करते हैं।
इस प्रकार सम्पूर्ण विश्वको व्याकुल देख विश्वरक्षक भगवान् विश्वनाथ सूर्यदेवको वर देनेके लिये गये। वे समाधिमें स्थित होकर अपने-आपको भी भूल गये थे। अत्यन्त निश्चलभावसे बैठे हुए अंशुमाली सूर्यको देखकर भगवान् शंकरने कहा—‘आकाशमें प्रकाशित होनेवाले सूर्य ! अब तपस्याकी आवश्यकता नहीं है, वह पूरी हो गयी। अब कोई वर माँगो।’ सूर्यदेव ध्यान एवं समाधिके द्वारा अपनी इन्द्रियवृत्तियोंको रोककर स्थिर बैठे थे। अतः उन्होंने भगवान् शंकरकी बात नहीं सुनी। तब शिवजीने अपने हाथसे उनका स्पर्श किया। उनका स्पर्श पाते ही विश्वलोचन सूर्यने अपनी आँखें खोलीं और अपने आराध्यदेव भगवान् शिवको प्रत्यक्ष देखकर साष्टांग प्रणाम किया। तदनन्तर उन्होंने इस प्रकार स्तुति की—
सूर्य बोले—देवाधिदेव ! जगत्पते ! सर्वव्यापी ! भर्ग ! भीम ! भव ! चन्द्रभूषण ! भूतनाथ तथा भवभयहारी देव ! आप प्रणत जनोंको मनोवांछित वस्तु देनेवाले हैं, आपको नमस्कार है। चन्द्रचूड ! मृड ! धूर्जटे ! हर ! त्र्यक्ष ! दक्षके सैकड़ों यज्ञोंका नाश करनेवाले शान्त ! शाश्वत ! शिवापते ! शिव ! आप प्रणत जनोंको मनोवांछित वस्तु देनेवाले हैं, आपको मैं नमस्कार करता हूँ। नीललोहित ! अभीष्ट वस्तु देनेवाले त्रिलोचन ! विरूपाक्ष ! व्योमकेश ! जीवोंके अज्ञानमय बन्धनका नाश करनेवाले। आप प्रणत जनोंकी मनोवांछा पूर्ण करनेवाले हैं, आपको मेरा नमस्कार है। वामदेव ! शितिकण्ठ ! शूलपाणे ! चन्द्रशेखर ! नागेन्द्रभूषण ! कामनाशन ! पशुपते ! महेश्वर ! आप शरणागतोंकी इच्छा पूर्ण करनेवाले हैं, आपको मैं नमस्कार करता हूँ। त्र्यम्बक ! त्रिपुरारे ! ईश्वर ! सबकी रक्षा करनेवाले त्रिनयन ! तीनों वेदस्वरूप ! कालकूटके विषका दलन करनेवाले ! कालके भी काल ! आप प्रणत जनोंकी मनोवांछित वस्तुओंको देनेवाले हैं, आपको नमस्कार है। आप जहाँ हैं वहाँ रात्रिका अभाव है। शर्व ! आप सर्वव्यापी हैं। स्वर्गमार्गका सुख देनेवाले तथा अपवर्ग (मोक्ष)-की प्राप्ति करानेवाले हैं। अन्धकासुरके शत्रु तथा जटाजूटधारी हैं। प्रभो ! आप प्रणत जनोंकी इच्छा पूर्ण करनेवाले हैं, आपको मेरा नमस्कार है। आप भक्तोंके लिये कल्याणकारी और दुष्टोंके लिये उग्र हैं। गिरिराजनन्दिनीके प्राणवल्लभ ! आप ही सबके वास्तविक पति हैं। विश्वनाथ ! ब्रह्मा और विष्णु भी आपकी स्तुति करते हैं। आप ही वेदोंके द्वारा जाननेयोग्य परमात्मा हैं, आपको सबकी चेष्टाओंका ज्ञान है। नाथ ! आप अपने चरणोंमें मस्तक झुकानेवाले भक्तोंको उनकी अभीष्ट वस्तुएँ देते हैं, आपको नमस्कार है। यह विश्व आपका ही स्वरूप है, तथापि आप सबसे परे हैं, आप ही निराकार ब्रह्म हैं, आपमें कुटिलताका सर्वथा अभाव है, आप अमृत
८३४ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
| (मोक्ष) देनेवाले हैं, मन और वाणीकी पहुँचसे सर्वथा दूर हैं। दूरतक पहुँचे हुए सर्वव्यापी परमेश्वर! आप प्रणत जनोंको मनोवांछित वस्तुएँ प्रदान करनेवाले हैं, आपको मेरा नमस्कार है।^१ <br><br> इस प्रकार स्तुति करके सूर्यने महादेवजी और पार्वतीजीकी परिक्रमा की। तदनन्तर प्रसन्नचित्त होकर उन्होंने शिवके वामांग भागमें विराजमान गौरीदेवीका इस प्रकार स्तवन किया^२। <br><br> **सूर्य बोले—**देवि! आपको प्रणाम करनेमें प्रवीण जो भक्त पुरुष अपने ललाटको आपके चरणारविन्दोंकी धूलिसे उज्ज्वल करता है, जन्मान्तरमें भी चन्द्रमाकी मनोहर लेखा उसके भाल-प्रदेशको अत्यन्त उज्ज्वल बना देती है। अर्थात् वह पुरुष भगवान् शंकरका सारूप्य प्राप्त कर लेता है। श्रीमती मंगलागौरी! आप सम्पूर्ण मंगलोंकी जन्मभूमि हैं। श्रीमंगले! आप सम्पूर्ण पापराशिरूपी रूईको दग्ध करनेके लिये प्रज्वलित अग्नि हैं। श्रीमंगले! आप सम्पूर्ण दानवोंके दर्पका दलन करनेवाली हैं। श्रीमंगले! आप इस सम्पूर्ण विश्वकी रक्षा | करें। विश्वेश्वरी! आप ही समस्त जगत्के जीवोंकी सृष्टि, पालन तथा प्रलयकालमें उनका संहार करनेवाली हैं। आपके नामकीर्तनसे प्रकट हुई पुण्यमयी निर्मल नदी पातकरूपी तटवर्ती वृक्षोंको बहा ले जाती है। मातः! आप भगवान् शिवकी प्रिया हैं, आप ही संसारके दुःसह दुःखभारका निवारण करनेवाली हैं। इस जगत्में आपके सिवा दूसरी कोई ऐसी शक्ति नहीं है जो शरणागतोंकी रक्षा करनेमें समर्थ हो। जिनके ऊपर आपका कल्याणकारी कृपाकटाक्ष हो जाता है, वे ही समस्त भुवनोंमें धन्य हैं और वे ही माननीय हैं। देवि! आप सहज प्रकाशस्वरूपा हैं। काशीपुरीमें आप सदा निवास करती हैं और प्रणत जनोंके लिये मोक्ष-लक्ष्मीरूपा हैं। जो लोग निरन्तर आपका स्मरण करते हैं, वे मोक्षरूपी धनकी रक्षा करनेमें कुशल एवं उसे पानेके सुयोग्य पात्र हैं। उनकी बुद्धि परम शुद्ध है। आपके उन बड़भागी भक्तोंको कामारि भगवान् शिव भी सदा स्मरण करते |
रविरुवाच
१- देवदेव जगताम्पते विभो भर्ग भीम भव चन्द्रभूषण।
भूतनाथ भवभीतिहारक त्वां नतोऽस्मि नतवांछितप्रद॥
चन्द्रचूड मृड धूर्जटे हर त्र्यक्ष दक्षशततन्तुशातन।
शान्त शाश्वत शिवापते शिव त्वां नतोऽस्मि नतवांछितप्रद॥
नीललोहित समीहितार्थद द्व्येकलोचन विरूपलोचन।
व्योमकेश पशुपशनाशन त्वां नतोऽस्मि नतवांछितप्रद॥
वामदेव शितिकण्ठ शूलभृच्चन्द्रशेखर फणीन्द्रभूषण।
कामकृत्पशुपते महेश्वर त्वां नतोऽस्मि नतवांछितप्रद॥
त्र्यम्बक त्रिपुरसूदनेश्वर त्राणकृत्त्रिनयन त्रयीमय।
कालकूटदलनान्तकान्तक त्वां नतोऽस्मि नतवांछितप्रद॥
शर्वरीरहित शर्व सर्वग स्वर्गमार्गसुखदापवर्गद।
अन्धकासुररिपो कपर्दभृत् त्वां नतोऽस्मि नतवांछितप्रद॥
शङ्करोग्र गिरिजापते पते विश्वनाथ विधिविष्णुसंस्तुत।
वेदवेद्य विदिताखिलेङ्गित त्वां नतोऽस्मि नतवांछितप्रद॥
विश्वरूप पररूपवर्जित ब्रह्म जिह्वरहितामृतप्रद।
वाङ्मनोविषयदूर दूरग त्वां नतोऽस्मि नतवांछितप्रद॥
(स्क० पु०, का० पू० ४९। ४६–५३)
२- इत्थं परीत्य मार्तण्डो मृडं देवं मृडानिकाम्। अथ तुष्टाव प्रीतात्मा शिववामार्द्धहारिणीम्॥
(स्क० पु०, का० पू० ४९। ५४)
* काशीखण्ड-पूर्वार्ध * । ८३५
हैं। मात:! जिसके हृदयमें आपके अत्यन्त निर्मल युगलचरणारविन्द सतत विराजमान हैं, यह सम्पूर्ण विश्व उसके हाथमें ही है। मंगलगौरि! जो प्रतिदिन आपके नामका जप करता है, उसके घरको अणिमा आदि आठों सिद्धियाँ कभी नहीं छोड़ती हैं। देवि! आप ही प्रणवस्वरूपा वेदमाता गायत्री हैं। आप ही द्विजोंके लिये कामधेनु हैं। आप ही तीनों व्याहृतियाँ (भूः, भुवः, स्वः) हैं और आप ही सम्पूर्ण कर्मोंकी सिद्धिके लिये देवताओं और पितरोंकी तृप्तिमें कारणभूत स्वाहा और स्वधा हैं। माता मंगलागौरी! आप ही भगवान् चन्द्रशेखरके समीप गौरीरूपसे विराजमान हैं। आप ही ब्रह्माजीके निकट सावित्री होकर रहती हैं। आप ही चक्रपाणि भगवान् विष्णुके यहाँ मनोहर लक्ष्मी रूपसे निवास करती हैं तथा आप ही काशीमें मोक्षलक्ष्मी हैं। निर्मल स्वरूप धारण करनेवाली देवि! आप ही इस जगत्में मुझ शरणागतकी रक्षा करनेवाली हैं*।
इस प्रकार भगवान् शिवके आधे शरीरकी शोभास्वरूपा मंगलादेवीका इस मंगलाष्टक नामक महास्तोत्रसे स्तवन करके सूर्यदेवने महादेवजी तथा मंगलागौरीको बारंबार प्रणाम किया और उन दोनोंके सामने चुपचाप पड़े रहे।
तब महादेवजीने कहा—सूर्यदेव! उठो, उठो, तुम्हारा कल्याण हो। महामते! मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ। मित्र! तुम तो सदा मेरे नेत्रमें ही स्थित हो, जिससे मैं समस्त चराचर जगत्को देखता हूँ। तुम मेरी आठ मूर्तियोंमेंसे एक हो। आजसे तुम सर्वज्ञ, सर्वव्यापी, सम्पूर्ण तेजोंका समुदाय तथा सबके सम्पूर्ण कर्मोंके ज्ञाता होओ। अपने सब भक्तोंके समस्त दुःखोंको दूर करो। तुमने मेरे चौंसठ नामोंके द्वारा जो यह अष्टकस्तोत्र सुनाया है, इसके द्वारा मेरी स्तुति करके मनुष्य मेरी भक्ति प्राप्त कर लेगा। यह मंगलागौरीका अष्टकस्तोत्र मंगलाष्टक नामसे विख्यात होगा। इसके द्वारा मंगलागौरीकी स्तुति करके मनुष्य मंगल प्राप्त करेगा। ये नामचतुःषष्ट्यष्टक तथा मंगलाष्टक नामक दोनों स्तोत्र श्रेष्ठ, पुण्यमय तथा सब पातकोंके नाशक हैं। जो काशीसे दूरदेशमें रहता है, वह भी यदि प्रतिदिन तीनों समय इन दोनों स्तोत्रोंका जप करे तो वह श्रेष्ठ एवं शुद्धचित्त होकर दुर्लभ काशीको प्राप्त
रविरुवाच
* देवि त्वदीयचरणाम्बुजरेणुगौरैं भालस्थलीं वहति यः प्रणतिप्रवीणः।
जन्मान्तरेऽपि रजनीचरचारुलेखा तां गौरयत्यतितरां किल तस्य पुंसः॥
श्रीमङ्गले सकलमङ्गलजन्मभूमे श्रीमङ्गले सकलकल्मषतूलवस्त्रे।
श्रीमङ्गले सकलदानवदर्पहन्त्रिश्रीमङ्गलेऽखिलमिदं परिपाहि विश्वम्॥
विश्वेश्वरि त्वमसि विश्वजनस्य कर्त्री त्वं पालयिष्यसि तथा प्रलयेऽपि हन्त्री।
त्वन्नामकीर्तनसमुल्लसदच्छपुण्या स्रोतस्विनी हरति पातककूलवृक्षान्॥
मातर्भवानि भवती भवतीव्रदुःखसंहारहारिणि शरण्यमिहास्ति नान्या।
धन्यास्त एव भुवनेषु त एव मान्या येषु स्फुरेत्तव शुभः करुणाकटाक्षः॥
ये त्वां स्मरन्ति सततं सहजप्रकाशां काशीपुरीस्थितिमतीं नतमोक्षलक्ष्मीम्।
तान् संस्मरेत्स्मरहरो धृतशुद्धबुद्धीन् निर्वाणरक्षणविचक्षणपात्रभूतान्॥
मातस्तवाङ्घ्रियुगलं विमलं हृदिस्थं यस्यास्ति तस्य भुवनं सकलं करस्थम्।
यो नाम ते जपति मङ्गलगौरि नित्यं सिद्ध्यष्टकं न परिमुञ्चति तस्य गेहम्॥
त्वं देवि वेदजननी प्रणवस्वरूपा गायत्र्यसि त्वमसि वै द्विजकामधेनुः।
त्वं व्याहृतित्रयमिहाखिलकर्मसिद्धयै स्वाहा स्वधासि सुमनःपितृतृप्तिहेतुः॥
गौरि त्वमेव शशिमौलिनि वेधसि त्वं सावित्र्यसि त्वमसि चक्रिणि चारुलक्ष्मीः।
काश्यां त्वमस्यमलरूपिणि मोक्षलक्ष्मीस्त्वं मे शरण्यमिह मङ्गलगौरि मातः॥
(स्क० पु०, का० पू० ४९।५५–६२)
| ८३६ | * संक्षिप्त स्कन्दपुराण * |
|---|
करेगा। ये दोनों स्तोत्र काशीमें मोक्षसम्पत्ति प्रदान करते हैं। अतः मोक्षकी इच्छा रखनेवाले मनुष्योंको प्रयत्नपूर्वक अनेक स्तोत्रोंका परित्याग करके भी इन दोनों स्तोत्रोंका पाठ एवं जप करना चाहिये। तुम्हारे द्वारा स्थापित यह गभस्तीश्वरलिंग भक्तिभावसे सेवित होनेपर सब सिद्धियोंका दाता होगा। तुमने भक्तिभावसे चम्पा और कमलके समान कान्तिवाली गभस्तिमालाओं (किरणों)से जो इस ईश्वरलिंगका पूजन किया है, उससे इसका नाम गभस्तीश्वर लिंग होगा। पंचगंगामें स्नान करके गभस्तीश्वरका पूजन करनेवाला मनुष्य सब पापोंसे रहित होकर कभी भी माताके गर्भमें जन्म धारण नहीं करेगा। जो स्त्री या पुरुष चैत्र शुक्ला तृतीयाको उपवास करके वस्त्र, आभूषण आदि महान् उपचारोंसे इन महादेवी मङ्गलागौरीकी पूजा करेगा और प्रातःकाल व्रत पूर्ण करके पारण करेगा, वह कभी दुर्भाग्य एवं दरिद्रताको नहीं प्राप्त होगा। उसके सारे पाप नष्ट हो जायँगे और वह पुण्यकी राशि प्राप्त करेगा। वन्ध्या भी इस मंगलागौरीव्रतको करके बालकको जन्म देती है। यहाँ तपस्या करते हुए तुम्हारे मयूखसमूह (किरणपुंज) ही देखे गये हैं, शरीर नहीं दिखायी दिया है। अतः अदितिनन्दन! तुम्हारा नाम मयूखादित्य होगा। तुम्हारी पूजा करनेसे मनुष्योंको कोई रोग-व्याधि नहीं होगी। रविवारको तुम्हारे दर्शनसे दरिद्रताका नाश होगा।
इस प्रकार मयूखादित्यको बहुत-से वर देकर भगवान् शिव अन्तर्धान हो गये और सूर्यदेवने वहीं निवास किया।
~~ ० ~~
गरुडेश्वर लिंग तथा खखोल्कादित्यकी प्रादुर्भाव-कथा, काशीमें गरुड और विनताकी तपस्या और वरदान-प्राप्ति
स्कन्दजी कहते हैं— अगस्त्य! त्रिलोचन स्थानके उत्तरभागमें खखोल्क नामक आदित्यकी स्थिति बतायी गयी है। वे सब रोगोंका नाश करनेवाले हैं। पूर्वकालमें कद्रू और विनता—ये दोनों बहनें परस्पर खेल रही थीं। ये दक्ष प्रजापतिकी कन्याएँ और मरीचिनन्दन कश्यपकी धर्मपत्नयाँ थीं। उस खेलमें कद्रूने अपनी बहनसे कहा—‘विनते! सूर्यके रथमें जो उच्चैःश्रवा नामक घोड़ा सुना जाता है, उसका रूप कैसा है, जानती हो तो कहो। हम दोनों शर्त रखकर इसका निर्णय करें, जो जिससे पराजित हो, वह उसकी दासी हो। हमारी इस प्रतिज्ञामें ये सब सखियाँ साक्षी हैं।' इस प्रकार आपसमें शर्त बदकर कद्रूने सूर्यके घोड़ेको चितकबरा बताया और विनताने श्वेत कहा। विनताके चले जानेपर कद्रूने अपने पुत्रोंको बुलाकर कहा—‘तुम मेरे वचनसे शीघ्र ही उच्चैःश्रवा घोड़ेके समीप जाओ और उसे श्याम रंगसे युक्त चितकबरा कर दो।' कद्रूके बुद्धिमान् पुत्रोंने उच्चैःश्रवाके पास जाकर उसके शरीरको जगह-जगहसे काले केशके समान चितकबरा कर दिया। कद्रू और विनता दोनोंने सूर्यके रथमें घोड़ेको कुछ-कुछ काले रंगसे युक्त अर्थात् चितकबरा देखा। तब विनताने कहा—‘बहन! तुम्हारी ही बात सत्य निकली, अतः तुमने मुझे जीत लिया।' तबसे विनता कद्रूकी दासी हो गयी। तदनन्तर विनताके पुत्र गरुड़ने नागोंको अमृत देकर अपनी माताको दासीभावसे मुक्त किया। दासीपनसे छुटकारा मिलनेपर विनताने गरुड़से कहा—बेटा! मैं दास्यजनित दुष्कृतको दूर करनेके लिये काशीपुरी जाऊँगी, वहाँ साक्षात्
| * काशीखण्ड-पूर्वार्ध * | ८३७ |
|---|
भगवान् विश्वनाथ चन्द्रमाका आभूषण धारण किये तारकमन्त्ररूपी नौकाके द्वारा दुस्तर संसारसागरसे सबको पार लगा देते हैं। जिनपर भगवान् विश्वनाथकी कृपा होती है और जिनके समस्त कर्मबन्धन टूट जाते हैं, उन्हीं मनुष्योंकी बुद्धि काशीपुरीमें निवास करनेकी होती है। समस्त पाप धुल जानेके कारण जिनका मन काशीपुरीमें निवास करनेके लिये उत्सुक होता है, वे ही इस संसारमें वस्तुतः मनुष्य हैं। दूसरे लोग तो मनुष्यके रूपमें पशु ही हैं।'
माताकी यह बात सुनकर गरुड़ने नमस्कार करके कहा—मैं भी भगवान् शिवसे सम्मानित काशीपुरीका दर्शन करनेके लिये चलूँगा। तत्पश्चात् माताकी आज्ञा पाकर पक्षिराज गरुड़ उन्हींके साथ क्षणभरमें मोक्षभूमि वाराणसीपुरीमें आ पहुँचे। वहाँ इन दोनोंने बड़ी भारी तपस्या की। अविचल इन्द्रियोंवाले पक्षिराज गरुड़ने शिवलिंगकी स्थापना की और विनताने खखोल्क* नामक 'आदित्य' को स्थापित किया। थोड़े ही दिनोंमें उन दोनोंकी तीव्र तपस्यासे काशीमें भगवान् शंकर और सूर्यदेव दोनों प्रसन्न हो गये। गरुड़द्वारा स्थापित शिवलिंगसे उमानाथ भगवान् शिव प्रकट हुए और उन्होंने गरुड़को बहुत-से अत्यन्त दुर्लभ वरदान दिये—'पक्षिराज ! मेरे यथार्थ रहस्यको, जिसे देवता भी नहीं जान सके हैं, तुम जान लोगे। तुम्हारे द्वारा स्थापित यह लिंग गरुडेश्वरके नामसे विख्यात होगा। इसका दर्शन, स्पर्श और पूजन मनुष्योंको परम ज्ञान देनेवाला होगा। हम ही वह विष्णु हैं और वह विष्णु ही हम हैं, हम दोनोंमें तुम्हारी भेददृष्टि नहीं होनी चाहिये। तुम भगवान् विष्णुके श्रेष्ठ वाहन होकर स्वयं भी पूजनीय हो जाओगे।' अपने भक्त गरुड़को इस प्रकार वरदान देकर भगवान् शंकर वहीं अन्तर्धान हो गये और गरुड़जी भी भगवान् विष्णुके वाहन होकर भूमण्डलमें सबके लिये पूजनीय हो गये।
तदनन्तर एक दिन तपस्यामें संलग्न हुई विनताको देखकर शिवके ही दूसरे स्वरूप 'खखोल्कादित्य' नामक सूर्यदेव प्रकट हुए और उन्होंने विनताको शिवज्ञानसे युक्त पापनाशक वरदान दिया। वरदान देकर वे काशीमें ही रह गये और विनतादित्यके नामसे प्रसिद्ध हुए। इस प्रकार काशीके विघ्नस्वरूप अन्धकारका नाश करनेवाले खखोल्क नामक आदित्य वहाँ निवास करते हैं। उनके दर्शनमात्रसे मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। काशीमें पैशंगिल (पिलपिला) तीर्थमें भगवान् खखोल्कादित्यका दर्शन करनेसे मनुष्य क्षणभरमें नीरोग हो जाता है और मनोवांछित वस्तुको प्राप्त करता है।
$\sim\sim\circ\sim\sim
काशीखण्ड पूर्वार्ध सम्पूर्ण।
\sim\sim\circ\sim\sim$
* एक बार गरुड़की माता विनता सर्पोंकी माता कद्रूको पीठपर चढ़ाकर सूर्य-मण्डलके समीप ले गयी। कद्रू सूर्यका ताप सहन न कर सकनेके कारण मूर्च्छित-सी होने लगी और घबराहटमें बोल उठी—'खखोल्का निपतेत्।' वह कहना चाहती थी, 'सखी उल्का निपतेत्'—'सखी! उल्का गिरेगी' परंतु निकल गया—'खखोल्का' तबसे सूर्यकी 'खखोल्क' संज्ञा हो गयी।
८३८ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
काशीखण्ड ( उत्तरार्ध )
अरुणादित्य, वृद्धादित्य, केशवादित्य, विमलादित्य, गंगादित्य तथा यमादित्यकी महिमाका वर्णन
स्कन्दजी कहते हैं—महामते! विनतानन्दन अरुणने काशीमें तपस्या करके भगवान् सूर्यकी आराधना की। इससे प्रसन्न होकर आदित्यने अरुणको अनेक वर दिये और उन्हींके नामपर अरुणादित्य नामसे विख्यात हुए।
सूर्यदेव बोले—विनतानन्दन! तुम जगत्के हितके लिये घोर अन्धकारका नाश करते हुए सदा मेरे रथपर आगे सारथिके स्थानपर बैठा करो। जो यहाँ अरुणादित्य नामसे प्रसिद्ध मेरा निरन्तर पूजन करेंगे, उन्हें दुःख, दरिद्रता और पापकी प्राप्ति नहीं होगी। वे न तो रोगोंसे पीड़ित होंगे और न उन्हें कोई उपद्रव ही सतावेंगे।
ऐसा कहकर भगवान् सूर्य उन्हें रथपर बिठाकर अपने साथ ले गये। तबसे लेकर आज भी प्रातःकाल सूर्यके रथपर अरुणका उदय होता है। जो मनुष्य प्रातःकाल उठकर प्रतिदिन सूर्यसहित अरुणको नमस्कार करता है, उसे दुःखका भय कहाँसे हो सकता है। जो श्रेष्ठ मनुष्य अरुणादित्यका माहात्म्य सुनेगा, उसे किसी प्रकारके पापकी प्राप्ति नहीं होगी।
अगस्त्य! अब वृद्धादित्यका माहात्म्य सुनो। प्राचीन कालमें काशीपुरीमें महातपस्वी वृद्ध हारीतने भगवान् सूर्यकी आराधना की। विशालाक्षी-देवीके दक्षिण भागमें सूर्यदेवकी शुभ लक्षणोंसे युक्त शुभदायिनी मूर्ति स्थापित करके दृढ़भक्तिके साथ उन्होंने सूर्यदेवका आराधन किया। इससे प्रसन्न होकर भगवान् सूर्यने वृद्धतपस्वी हारीतसे कहा—'माँगो, तुम्हें कौन-सा वर अभीष्ट है, जो दिया जाय?'
मुनिने कहा—मुझको पुनः युवावस्था प्रदान कीजिये। युवावस्था प्राप्त होनेपर मैं उत्तम तपस्या करूँगा; क्योंकि तपस्या ही श्रेष्ठ धर्म है, तपस्या ही श्रेष्ठ धन है, तपस्या ही श्रेष्ठ काम है और तपस्या ही श्रेष्ठ मोक्ष है। जितेन्द्रिय पुरुष दीर्घकालतक तपस्या करनेके लिये ही चिरस्थायी आयु चाहते हैं। दान करनेके लिये ही धन चाहते हैं, पुत्र प्राप्त करनेके लिये ही स्त्री चाहते हैं और मोक्षके लिये ही उत्तम ज्ञान चाहते हैं। तब सूर्यदेवने तत्काल ही वृद्धहारीतका बुढ़ापा दूर करके उन्हें रमणीयताकी हेतु और पुण्यकी साधनभूता युवावस्था प्रदान की। इस प्रकार महामुनि वृद्धहारीतने काशीमें सूर्यदेवसे युवावस्था प्राप्त करके उग्र तपस्या की। वृद्धसे पूजित होनेके कारण वहाँ भगवान् सूर्य वृद्धादित्यके नामसे प्रसिद्ध हैं। कुम्भज! बुढ़ापा, दुर्गति तथा रोगका नाश करनेवाले वृद्धादित्यकी काशीमें आराधना करके बहुतोंने सिद्धि प्राप्त की है। काशीमें रविवारके दिन वृद्धादित्यको नमस्कार करके मनुष्य मनोवांछित सिद्धि प्राप्त कर लेता है, उसकी कभी भी दुर्गति नहीं होती।
मुने! इसके बाद मैं तुम्हें केशवादित्यका उत्तम माहात्म्य सुनाता हूँ, सुनो। जिस प्रकार भगवान् केशवके समीप पहुँचकर सूर्यदेवने ज्ञान प्राप्त किया था, वह प्रसंग इस प्रकार है। एक दिन आकाशमें विचरण करते हुए सूर्यदेवने काशीमें भगवान् केशवको विश्वनाथजीकी पूजा करते देखा। तब वे कौतूहलवश दूसरे रूपसे आकाशसे उतर आये और भगवान् केशवके समीप बैठे। उस समय वे मौन होकर अविचल भावसे स्थित हो महान् आश्चर्यमें डूबे हुए अवसरकी प्रतीक्षा करते रहे। जब भगवान् विष्णुने पूजा समाप्त की, तब सूर्यदेवने हाथ जोड़कर उन्हें प्रणाम किया। श्रीहरिने
- काशीखण्ड-उत्तरार्ध * ८३९
सूर्यदेवको अपने समीप बैठा लिया। तत्पश्चात् नमस्कार करके सूर्यदेवने कहा—'जगत्पते ! आप सम्पूर्ण विश्वके पालक तथा समस्त जगत्के अन्तरात्मा हैं। जगत्पूज्य माधव ! क्या इस काशीपुरीमें आपके लिये भी कोई पूजनीय है? यह समस्त संसार आपसे ही प्रकट होता और आपमें ही लयको प्राप्त होता है। आप ही सम्पूर्ण विश्वके पालक हैं। नाथ ! समस्त संसारका सन्ताप दूर करनेवाले आप यह किसकी पूजा कर रहे हैं? आपके इस आश्चर्ययुक्त कार्यको देखकर ही मैं आपके समीप आया हूँ।'
सहस्रों किरणोंसे सुशोभित श्रीसूर्यदेवका यह वचन सुनकर भगवान् विष्णुने हाथके संकेतसे उन्हें मना किया कि 'जोरसे न बोलो।' तत्पश्चात् श्रीसूर्यको समझाते हुए कहा—'इस काशीपुरीमें समस्त कारणोंके कारणभूत एकमात्र देवदेव, नीलकण्ठ, उमानाथ महादेवजी ही पूजनीय हैं। जन्म-मृत्यु और जराका नाश करनेवाले एकमात्र मृत्युंजय ही पूज्य देवता हैं। राजा श्वेत भगवान् मृत्युंजयकी पूजा करके स्वयं भी मृत्युंजय हो गये थे। कालके भी काल महाकालकी आराधना करके भृंगीने भी कालपर विजय पायी। मृत्युंजयकी पूजा करनेवाले शिलादपुत्र नन्दीको भी मृत्युने छोड़ दिया है। जिन्होंने लीलापूर्वक एक ही बाणके प्रहारसे त्रिपुरासुरपर विजय पायी, उन भगवान् भूतनाथकी आराधना करके कौन पुरुष पूजनीय नहीं हो सकता। वे भगवान् शिव तीनों लोकोंपर विजय पानेवाले सबके सार तत्त्व हैं; उनकी उत्तम आराधना कौन नहीं करेगा। जिनके नेत्रोंकी पलकके संकोचमात्रसे सम्पूर्ण जगत्का संकोच (प्रलय) हो जाता है और जिनके नेत्रोंके खुलनेसे ही समस्त संसारकी सृष्टि होती है, वे भगवान् शिव किसके परम पूजनीय नहीं हैं। यहाँ भगवान् शिवके शिवविग्रहकी पूजा करके मनुष्य शीघ्र ही चारों पुरुषार्थोंको प्राप्त कर लेता है। काशीमें शिवलिंगकी आराधना करके मनुष्य क्षणभरमें सौ जन्मोंके संचित पाप-समूहको भी त्याग देता है। सूर्य ! तुम भी अपने महान् तेजको बढ़ानेवाली परम शोभा-सम्पत्तिकी प्राप्तिके लिये भगवान् महेश्वरके श्रीविग्रहकी पूजा करो।'
भगवान् विष्णुका यह वचन सुनकर श्रीसूर्यदेव स्फटिक मणिका शिवलिंग बनाकर आज भी इसकी पूजा करते हैं। वे भगवान् केशवको गुरु मानकर उनके उत्तर भागमें आज भी स्थित हैं। इसीलिये वे केशवादित्यके नामसे विख्यात हैं। वे काशीमें अपने भक्तोंके अज्ञानमय अन्धकारको दूर करते हैं और पूजित होनेसे मनोवांछित फल देते हैं। श्रेष्ठ मनुष्य काशीमें केशवादित्यकी आराधना करके उस परम ज्ञानको पा लेता है, जिससे मोक्षकी प्राप्ति होती है। वहाँ पादोदकतीर्थमें स्नान, सन्ध्या और तर्पण आदि करके जो केशवादित्यका दर्शन करता है, वह जन्मभरके पातकोंसे छूट जाता है। अगस्त्य ! यदि माघमासकी रथसप्तमी (अचला सप्तमी)—को रविवारका योग प्राप्त हो तो आदि-केशवके समीप पादोदकतीर्थमें प्रातःकाल स्नान करके केशवादित्यकी पूजा करनेसे मनुष्य सात जन्मोंके पातकोंसे तत्काल मुक्त हो जाता है। सप्तमीकी अधिष्ठात्री देवीसे यह प्रार्थना करे—'मैंने पहलेके सात जन्मोंमें जन्मभर जो-जो पातक किये हैं, उन सबको तथा मेरे रोग और शोकको भी माघमासकी सप्तमी नष्ट कर दे। हे माघकी सप्तमी! इस जन्मके किये हुए, दूसरे जन्मोंके किये हुए, मनसे, वाणीसे और शरीरसे किये हुए, जानकर या अनजानमें किये हुए—इन सात प्रकारके पापोंको, जो सात रोगोंसे युक्त हैं, तुम आजके स्नानसे हर लो।' इस प्रकार तीन मन्त्रोंका जप (मन्त्रार्थकी भावना) करके मनुष्य पादोदकतीर्थमें स्नान करे। तत्पश्चात् श्रीकेशवादित्यका दर्शन करके वह क्षणभरमें पापमुक्त हो जाता है। केशवादित्यके माहात्म्यका श्रद्धापूर्वक श्रवण करनेवाला मनुष्य पापसे लिप्त नहीं होता और भगवान् शिवकी भक्ति पा लेता है।
मुने ! इसके पश्चात् अब विमलादित्यका उत्तम माहात्म्य सुनो। काशीके परम सुन्दर हरिकेश—
८४० * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
वनमें भगवान् विमलादित्य विराजमान हैं। प्राचीन कालकी बात है, उच्च देशमें कोई विमल नामक क्षत्रिय था। यद्यपि वह निर्मल मार्ग (सदाचार)-में ही स्थित था, तो भी पूर्वजन्मके किसी कर्मके योगसे उसको कोढ़का रोग हो गया। उसने स्त्री, गृह और धन सबका परित्याग करके काशीमें आकर सूर्यदेवकी आराधना की। वह विधिपूर्वक अर्घ्य देता और सूर्यदेवता-सम्बन्धी स्तोत्रोंका जप करता था। इस प्रकार आराधना करनेवाले विमलपर प्रसन्न हो भगवान् सूर्य उसे वर देनेको उद्यत हुए
और बोले—'विमल! तुम्हारा यह कुष्ठरोग दूर हो जाय, इसके सिवा तुम कोई और भी वर माँगो।' तब विमलने प्रणाम करके कहा—'भगवन्! आप सम्पूर्ण जगत्के नेत्र हैं। जो लोग आपमें भक्ति रखते हों, उनके कुलमें कभी कोई कोढ़ी न हो। इतना ही नहीं, उन्हें अन्य प्रकारके रोग भी न हों और उनके घरमें कभी दरिद्रता न रहे। आपके भक्तजनोंके मनमें कभी किसी प्रकारका सन्ताप न हो।'
भगवान् सूर्यने कहा—महाप्राज्ञ! ऐसा ही होगा, इसके सिवा दूसरा भी उत्तम वर तुम्हें दिया जाता है, सुनो। तुमने काशीमें मेरी जिस मूर्तिका पूजन किया है, उसका सान्निध्य मैं कभी नहीं छोड़ूँगा, यह प्रतिमा तुम्हारे ही नामसे विख्यात होगी। इसका नाम विमलादित्य होगा। यह प्रतिमा सदा भक्तोंको वर देनेवाली तथा सब रोगोंका नाश और समस्त पापोंका संहार करनेवाली होगी।
ऐसा वरदान दे भगवान् सूर्य वहीं अन्तर्धान हो गये। विमल भी निर्मल-शरीर होकर अपने घर चला गया। इस प्रकार काशीमें विमलादित्य सबका कल्याण प्रदान करनेवाले हैं। उनके दर्शनमात्रसे कोढ़का रोग नष्ट हो जाता है। जो मनुष्य विमलादित्यकी इस माहात्म्य-कथाको सुनता है, वह निर्मल शुद्धिको प्राप्त होता है और उसके मनकी मैल धुल जाती है।
भगवान् विश्वनाथके दक्षिण भागमें गंगादित्य हैं, उनके दर्शनमात्रसे मनुष्य यहाँ शुद्धिको प्राप्त होता है। जब राजा भगीरथको आगे करके गंगाजी काशीपुरीमें आयीं, उस समय भगवान् सूर्य गंगाजीकी स्तुति करनेके लिये वहीं स्थित हुए। इस समय भी वे गंगाजीको अपने सम्मुख करके दिन-रात उनकी स्तुति करते रहते हैं और प्रसन्नचित्त हो गंगाजीके भक्तोंको वरदान देते हैं। श्रेष्ठ मनुष्य काशीमें गंगादित्यकी आराधना करके कभी दुर्गतिको नहीं पाता और न रोगका ही भागी होता है।
महाभाग! अब यमादित्यके प्रकट होनेकी कथा सुनो। यमेशसे पश्चिम और वीरेशसे पूर्वकी दिशामें यमादित्यकी स्थिति है, उनका दर्शन कर लेनेपर मनुष्य कभी यमलोकको नहीं देखता। पूर्वकालमें यमने यमतीर्थमें बड़ी भारी निर्मल तपस्या करके भक्तोंके सिद्धिदाता यमेश और यमादित्यको स्थापित किया है। कुम्भज! वहाँ साक्षात् यमने आदित्यकी स्थापना की है, इसलिये वे 'यमादित्य' कहलाते हैं। यमादित्य जीवोंकी यमयातनाको हर लेते हैं। जो यमतीर्थमें स्नान करके यमके द्वारा स्थापित यमेश्वर और यमादित्यको नमस्कार करता है, वह कभी यमलोकको नहीं