सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Soundarya Lahari of Shankaracharya Hindi
श्रीमदादि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Soundarya Lahari with Shlokas, Yantras & Hindi Commentary (उद्गम)
The provided image is completely blank and contains no text to transcribe. Please upload a clear image containing the text you would like transcribed.
सौंदर्य लहरी २३७
सौन्दर्य लहरी (उत्तरार्द्ध)
नमो देव्यै महादेव्यै शिवायै सततं नमः ।
नमः प्रकृत्यै भद्रायै नियताः प्रणतास्म ताम् ॥
सौन्दर्य लहरी को दो भागों में विभक्त किया जाता है। प्रथम भाग जिसमें ४१ श्लोक हैं, आनन्द लहरी के नाम से विख्यात है। यह नाम श्लोक ८ में स्पष्ट रूप से मिलता है और २१ वें श्लोक में भी परमाह्लाद लहरी पद का प्रयोग तदर्थ वाचक है। इस भाग में शंकर भगवत्पाद ने पिंडस्थ शक्ति और तत्संबंधी श्री चक्र, श्री विद्या, षट् चक्र वेध और उनका मातृकाओं के द्वारा परा, पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी वाणि से, और सब के पारस्परिक संबंधों पर प्रकाश डाला है, जिसका उद्देश्य कुण्डलिनी शक्ति के जागरण द्वारा अद्वैत सिद्धान्त के जीव ब्रह्मैक्य ज्ञान की अपरोक्षानुभूति कराना मात्र है। यह पूर्व भाग पूरे ग्रंथ की आत्मा कही जा सकती है, क्योंकि सृष्टि के जड चेतन अनन्त प्रसार में मनुष्य देह ही पूर्ण समझा जाता है। यद्यपि चेतन सत्ता जड प्रकृति का कार्य प्रतीत होती है, और इस भ्रान्ति में पडकर अनेक भौतिकवादी अनात्म वाद का समर्थन करने लगते हैं, परन्तु चेतना को प्रकृति
२३८ सौंदर्य लहरी
का अन्तिम विकासस्तर कहकर चेतनकारण वाद को स्वयं सिद्ध करने में, बिना समझे सहायक बनते हैं । ब्रह्माण्ड में जो चेतन सत्ता अपरोक्ष में निहित है, वह पिंड में प्रत्यक्ष प्रकाशमान है । सूर्य चन्द्र, तारागण के अनन्त विश्व में भौतिक वादियों को जड प्रकृति का ही विस्तार दिखाई देता है, जिसके सामने आकीट पतंग, पशु, पक्षि, एवं मनुष्य में चमकने वाली चेतना के ये सब विकास स्थान अतिक्षुद्र और अणु समान हैं, तो भी समस्त चेतन जगत् का शिरोमणि मनुष्य, प्रकृति को स्वायत करने में कृत कार्य होकर चेतन सत्ताकी महिमा को सिद्ध करता है । जो चेतन सत्ता प्राणि-मात्र में अर्ध विकसित दिख पडती है, मनुष्य देह में उसका विकास इतना अधिक है कि उसे पूर्ण विकास कहने में संकोच नहीं होता, परन्तु भारत के ऋषि महर्षियों ने यह दावा किया है कि मनुष्य देह में जो चेतन प्रकाश है वह प्रसुप्तवत् अंशविकास ही है, उसकी चरम और परम सीमा ब्रह्म भाव के जागृत होने पर मिलती है । सृष्टि की आदि कारण भूताशक्ति चिति की ही वह सत्ता है, जो एक अंश में समस्त चेतन जगत में विद्यमान है ।
ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः ॥ गीता ॥
और प्रत्येक मनुष्य-देह प्रकृति देवी के विकास का वह पुष्प है, जिसके द्वारा पूर्णतया विकसित होने पर, वह आदि शक्ति अपनी संपूर्ण अनन्त महिमा की अभिव्यक्ति स्वरूप किरणों को सुगन्धवत् फैलाने लगती है, तथापि उसके परोक्ष अस्तित्व का परिचय ब्रम्हाण्ड का अणु २ दे रहा है । पिंड और ब्रह्मांड दोनों में उसी की व्यक्तता
सौंदर्य लहरी २३९
है, परन्तु एक में चेतन रूप में और दूसरे में जड के रूप में । पूर्व भाग में चिति शक्ति का कीर्ति गान कर के साधक-गणों के ध्यानार्थ ब्रह्मांड रूपी विराट् देह में निवास करने वाली उस अधि-देवी के सौन्दर्य का निरूपण सौन्दर्य लहरी संज्ञक उत्तर विभाग के ६२ श्लोकों में किया गया है, ४४ वें श्लोक में जैसा भगवत्पाद स्वयं कहते हैं:—
तनोतु क्षेमं नस्तव वदनसौन्दर्य लहरी ।
सौन्दर्य लहरी के उत्तरार्ध में विश्व को भगवती का विराट् देह मानकर, प्रकृति देवी के दिव्य देह का चित्र खींचा गया है जो छन्द-शास्त्रोक्त आभूषणों से अलंकृत, सर्व भाव पूर्ण, नवरसों में पगी अनादि अनन्त महामाया महादेवी आदि शक्ति की झांकी दिखाने वाली, वास्तव में सौन्दर्य लहरी ही है, जिसको पढकर अनात्मवादी भी पुराण कवि भगवान शंकर के अवतार भगवत्पाद की इस वैखरी झरी के रसों का आस्वादन कर के, अपनी अनात्म देह में स्थित अधिष्ठातृ चेतना देवी की अनन्त महिमा की किंचित झांकी पाकर आत्म विश्वासी बन सकता है। हम उसको उसके अनात्म विश्वासी होने पर दोषी नहीं ठहराते, क्योंकि जिस प्रकार हम जड प्रकृति को भी जिस ब्राह्मी चिति शक्ति की एक अभि-व्यक्ति कहते हैं, उसी प्रकार वह अनात्मवादी भी तो उसी का जड-चेतन-मय एक अर्ध विकसित स्तर है, जो समय पाकर अपनी अध्यात्म विकास यात्रा के किसी स्टेशन पर आत्मवादी हो जायगा।
श्री मच्छंकर भगवत्पाद ने भगवती उमा के सौन्दर्य का आनख शिख चित्र, एक भक्त के दृष्टिकोण से, उपासकों के ध्यान लाभार्थ
२४० | सौंदर्य लहरी
खेंचा है। १ श्लोक में किरीट, ३ श्लोकों में केश, एक में ललाट एक में भ्रू, ९ श्लोकों में नेत्र, २ में दृष्टि, १ में कपोल, १ में कर्ण एक में नासिका, १ में दान्त, १ में मुस्कराहट, १ में मुख का तांबूल, १ में बाणि, १ में चिबुक, २ में ग्रीवा और कंठ, १ में चार हाथ, १ में नखों की द्युति, ४ श्लोकों में स्तन पान द्वारा वात्सल्य स्नेह, ३ श्लोकों में नाभि, २ में कटि, १ में नितम्ब, १ में जानु, १ में पैर, ८ श्लोकों में चरण, १ में शरीर की आभा, शेष श्लोकों में प्रार्थना युक्त सामान्य रूप से सर्वांग सौन्दर्य का चित्र खेंचा गया है। अनुमान होता है, कि कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी की प्रातःकालीन उषा के रूप में विराट देवी का ध्यान कराया गया है।
पंडित स. सुब्रह्मण्य शास्त्री, और टी. आर. श्रीनिवास अयंगार के अंग्रेजी में लिखित सौन्दर्य लहरी के प्रत्येक श्लोक के साथ एक-एक यंत्र दिया गया है। जिसके पूजन और उससे संबंधित श्लोक के जप सहित अनुष्ठान करने से अनेक कामनाओं की सिद्धी होती है,
हमने सकाम अनुष्ठानों की ओर ध्यान न देकर केवल एक निष्काम उपासक अथवा एक योगी की दृष्टि से यह ग्रन्थ लिखा है, क्योंकि जिस भगवती के स्तोत्र के एक २ श्लोक के अनुष्ठान द्वारा जन्म मरण की शृंखलाबद्ध कारणभूत कामनाओं की पूर्ति होती है उस स्तोत्र के सामूहिक अनुष्ठान का फल अनन्त आप्तकाम पद का देने वाला क्यों न होगा ?
सौंदर्य लहरी २४१
मुकुट का ध्यान
[ ४२ ]
गतैर्माणिक्यत्वं गगनमणिभिः सान्द्रघटितं
किरीटं ते हैमं हिमगिरिसुते कीर्तयति यः ।
स नीडेयच्छायाच्छुरणशबलं चन्द्रशकलं
धनुः शौनासीरं किमिति न निबध्नाति धिषणाम् ॥
कठिन शब्दों के अर्थ:— सान्द्रं घटितं=घनी भूत पास २ जडे हुए. नीडे=घोंसले में. छायाच्छुरण=मणियौं की द्युति की चमक. शकल=टुकडा. शौनासीरं=इन्द्रं का. धिषणा=समझ, धारणा.
अर्थ:— हे हिमाचल की पुत्रि ! जो मनुष्य तेरे सुवर्ण के बने हुए किरीट का वर्णन करे तो उसकी धारणा ऐसी क्यों न होगी, कि मानो इन्द्र धनुष निकला हुआ है । क्योंकि वह किरीट गगन मणियों अर्थात तारागण रूपी मणियों से घनीभूत जडा हुआ है और चन्द्रमा के टुकडे का पक्षि के घोंसले सदृश जान पडता है और जो उषः कालीन प्रकाश में रंगबरंगा चमक रहा है ।
अर्थात् उषः कालीन आकाश प्रकृति देवी का किरीट है । यहां कृष्णा चतुर्दशी और अमावस्या की संधि में पडने वाले उषः काल का चित्र खेचा गया है । कृष्णा चतुर्दशी भगवती की उपासना के लिये उपयुक्त तिथि समझी जाती है अर्थात वह भगवती का ही
२४२ | सौंदय लहरी
रूप है और विशेषतया कार्तिक की कृष्णा चतुर्दशी ली जाय तो और भी अच्छा है, जिसको रूप चतुर्दशी भी कहते हैं, और उसके तुरन्त पश्चात् महालक्ष्मी पूजन का दीपावली पर्व होता है ।
केशों का ध्यान:
[ ४३ ]
धुनोतुध्वान्तं नस्तुलित दलितेन्दीवर वनं
घनस्निग्धंश्लक्ष्णं चिकुरनिकुरुम्बं तवशिवे ।
यदीयं सौरभ्यं सहजमुपलब्धुं सुमनसो
वसन्त्यस्मिन्मन्ये बलमथनवाटीविटपिनाम् ॥
ध्वान्त=अंधकार. इन्दीवर=नीलकमल. श्लक्षण=मुलायम. निकुरुम्ब=समुह. चिकुर=केश. सौरभ्यं=सुगंध. बलमथन=बलासुर का मारने वाला इन्द्र.
अर्थः— हे शिवे ! तेरे गहरे चिकने मुलायम केशों का समूह जो खिले हुए इन्दीवर के बन की तुलना करता है हमारे अज्ञानान्धकार को हटावे, जिसमें गुंथे हुए इन्द्र की वाटिका के वृक्षों के पुष्प. मेरी समझ में, उसकी सुगंधि से स्वयं सहज ही सुगंधित होने के लिये वहां आबसे हैं ।
प्रातःकालीन विकसित इन्दीवर वनों की शोभा और उषःकाल का प्रकाश दोनों मिलकर जैसे रात्रि के अन्धकार को भगाते हुए
सौंदर्य लहरी २४३
से प्रतीत होते हैं। वैसे ही भगवती के केशों का ध्यान अज्ञान को दूर करने वाला है। भगवतीके केश स्वयं सुगंधित हैं, इन्द्र की बाटिका के पुष्पों को भी मानो वे ही सुगन्ध प्रदान कर रहे हैं अर्थात् पुष्पों में जो सुगन्ध होती है वह प्रकृति देवी की ही देन है। प्रायः केशभूषार्थ स्त्रियां अपने केशों में पुष्प गूंथा करती हैं, यह रिवाज मद्रास प्रान्त में अधिक प्रचलित है। भाव यह है कि स्त्रियों के केश. धारण किये हुए पुष्पों से सुगन्धित होते हैं, परन्तु भगवती के केशों की सुगन्ध से पुष्प स्वयं सुवासित होतेहैं।
[ ४४ ]
वहन्ती सिन्दूरं प्रबलकबरीभारतिमिर द्विषां वृन्दैर्बन्दीकृतमिव नवीनार्ककिरणम् । तनोतुक्षेमं नस्तव वदनसौन्दर्यलहरी परीवाहः स्रोतः सरणिरिव सीमान्तसरणिः ॥
कठिन शब्दों के अर्थ:—कबरी=केश, सरणि=मार्ग, सड़क रेखा, लाइन। वदन=मुख, सीमान्त सरणि=जिस रेखा पर सीमा का अन्त होता है, सिर पर केशों की मांग।
अर्थ:— तेरे मुख की सौन्दर्य लहरी के प्रवाहस्रोत के मार्ग के सदृश सिन्दूर से भरी तेरे केशों की मांग हमारे क्षेम (कल्याण) का प्रसार करे, जो मांग केशों के भारमय अन्धकार रूपी प्रबल दुश्मनों के वृन्दों से बन्दी की हुई उदय होने वाले नवीन सूर्य की अरुण किरण के सदृश है।
२४४ | सौंदर्य लहरी
जैसे स्त्रियां मांग में सिंदुर भरती हैं उसी प्रकार मानो देवी के मुख कमल की अरुणिमा केशों की मांग में सिंदूर सी चमकती हुई मूर्धा पर बह रही है । मानों उदय कालीन सूर्य की लाल किरणें रात्रि के अन्धकार को चीरना चाहती हैं । परन्तु अन्धकार रूपी दुश्मनों ने उसको कैद कर लिया है ।
स्रोत का प्रवाह ऊपर से निम्न तल पर हुआ करता है, परन्तु भगवती की शोभा की कान्ति उर्ध्व गामिनी है । उसे योगियों में ज्ञान के सूर्य के उदय होने से पूर्व प्रकट होने वाले प्रातिभ ज्ञान के सदृश समझना चाहिये ।
अलकों का ध्यान:—
( ४५ )
अरालैः स्वाभाव्यादलिकलभश्रीभिरलकैः
परीतं ते वक्त्रं परिहसति पंकेरुह रुचिम् ।
दरस्मेरे यस्मिन्दशन रुचि किंजल्करुचिरे
सुगन्धौ माद्यन्ति स्मरदहन चक्षुर्मधुलिहः ॥
कठिन शब्दों का अर्थ:— अराल=घुंघराले; कलभ=बच्चा; स्मेर=मुस्कराहट; दर=किंचित, थोडी; किंजल्क=स्फटिक; मधुलिह=भौँरा; अलक=जुल्फ ।
**अर्थ:—**स्वाभाविक घुंघराली जवान भौंरा की कांतियुक्त अलकावलि से घिरा हुआ तेरा मुख, कमलों की शोभा का
सौंदर्य लहरी २७५
परिहास करता है । जिनमें स्फटिक सदृश शोभा वाले दन्तों में किंचित् मुस्कराते समय निकलने वाली सुगंध पर काम के दहन करने वाले शिवजी के नेत्र रूपी भौंरे मस्त हो जाते हैं ।
मानो शिवजी भी जिन पर काम का लेशमात्र भी प्रभाव नहीं, प्रकृति के सौंदर्य से मुग्ध हो रहे हैं अर्थात् वह निर्गुण ब्रह्म प्रकृति के गुणों का भोक्ता भी है । असक्तं सर्वभृच्चैव निर्गुणं गुणभोक्तृच । (गीता १३, १४)
ललाट का ध्यान:—
( ४६ )
ललाटं लावण्यद्युति विमलमाभाति तव यद्
द्वितीयं तन्मन्ये मुकुटघटितं चन्द्रशकलम् ।
विपर्यासन्यासादुभयमपि संभूय च मिथः
सुधालेपस्यूतिः परिणमति राकाहिमकरः ॥
**कठिन शब्दों के अर्थ:—**मिथ=अकेला; स्यूतिः=सीवन, जोड; विपर्यन्यास=एक दूसरे से उलट ।
**अर्थ:—**लावण्य कांति से युक्त विमल चमकने वाला जो तेरा ललाट है, उसे मैं मुकुट में जड़ी हुई चन्द्रमा की दूसरी कला समझता हूं, जो एक दूसरे पर उलट कर रखी होने के कारण दोनों का एक रूप बनकर और अमृत के लेप से जुड़ कर पूर्ण चन्द्रमा बन गया है ।
२४६ | सौंदर्य लहरी
चन्द्रमा से अमृत का स्राव होता ही है उससे मानों दोनों कलाएं जुडकर पूर्ण चन्द्रमा बन गया है दोनों कलाओं की दोनों नोक एक दूसरे से मिलकर जुड गई हैं और बीच का अवकाश अमृत से लिप कर पूर्णिमा के चन्द्रवत् चमकने लगा है।
भ्रुकुटि का ध्यान:—
(४७)
ध्रुवौ भुग्ने किंचिद् भुवनभयभङ्गव्यसनिनि
त्वदीये नेत्राभ्यां मधुकररुचिभ्यां धृतगुणम्।
धनुर्मन्ये सव्येतरकरगृहीतं रतिपतेः
प्रकोष्ठे मुष्टौ च स्थगयति निगूढान्तरमुमे ॥
कठिन शब्दों का अर्थ:— भुग्न=त्योरी; रतिपति=कामदेव; प्रकोष्ठ=मुट्ठी का ऊपरी भाग, कलाई पोंहचा।
अर्थ:— हे भुवन के भय का नाश करने में आनन्द लेने वाली उमे ! भ्रुवों की त्योरी चढने पर मैं उसकी बायें हाथ में लिये हुए कामदेव के धनुष् से उपमा देता हूं, जिसकी प्रत्यंचा भौरों की कांति वाले तेरे दोनों नेत्रों की बनी है, और जिसका मध्य भाग मुट्ठी के और कलाई के नीचे छुपा हुआ है ।
भाव यह है कि भगवती जगत् के भय का नाश करने के लिये सदा उद्यत रहती है और कामदेव का धनुष् इस कार्य के लिये वह
सौन्दर्य लहरी २४७
सदा चढ़ाये रखती हैं और वह धनुष् उसकी त्योरी चढ़ी हुई भौंहें ही हैं। कामदेव के धनुष् की प्रत्यंचा भौंरों की कही जाती है, इसलिये भौंरो की उपमा रखने वाले दोनों नेत्र धनुष् की प्रत्यंचा समझनी चाहिये, अर्थात् भगवती की त्योरी चढ़ते ही संसार के सब भय भाग जाते हैं और भृकुटी का मध्यभाग मानो धनुष् को चढ़ाते समय बांये हाथ की मुट्ठी में दबा हुआसा है।
संसार का सबसे बड़ा शत्रु काम है इसलिये उसका धनुष मानो भगवती ने स्वयं छीन लिया है।
कामएष क्रोध एष रजोगुण समुद्भवः ।
महाशनो महापाप्मा विद्ध्येनमिह वैरिणम् ॥
(गीता ३, ३७)
काम से क्रोध उत्पन्न होता है, कामात्क्रोधोऽभिजायते (गीता-२, ६२) इसलिये क्रोध भी काम का ही रूपान्तर है जो रजोगुण से उत्पन्न होता है, भगवान कहते हैं कि यह बड़ा पेटू है, बहुत भोजन करने वाला है अर्थात् कभी तृप्त नहीं होता और बड़ा पापी है। अर्थात् सब पापों का घर है। इसलिये इसे यहां संसार का बैरी समझना चाहिये।
उपरोक्त श्लोक का भाव है कि भगवती की त्योरी का ध्यान करने से कामवासना शांत हो जाती है और सब भय दूर हो जाते हैं
२४८ | सौंदर्य लहरी
तीन नेत्रों का ध्यान:—
(४८)
अहः सूते सव्यं तव नयनमर्कात्मकतया
त्रियामां वामं ते सृजति रजनीनायकतया ।
तृतीया ते दृष्टिर्दरदलित हेमाम्बुजरुचिः
समाधत्ते संध्यां दिवस निशयोरन्तरचरीम् ॥
कठिन शब्दों का अर्थ: — त्रियामा=रात्रि; रजनी नायक=चद्रमा
**अर्थ:—**तेरा दक्षिण नेत्र सूर्यात्मक होने से दिन बनाता है, और बायां चन्द्रात्मक होने से रात्रि की सृष्टि करता है, और किंचित् विकसित सुवर्ण के बने हुए कमल की शोभा से युक्त तेरी तीसरी दृष्टि दिन और रात दोनों के बीच में रहने वाली संध्या है ।
दिन रात्रि की संधि प्रातः और सायंकाल दोनों समय होती है, इसलिये तीसरी दृष्टि दोनों के सदृश हो सकती है, परन्तु दिवस शब्द का प्रयोग प्रथम, और तत्पश्चात् निशि का प्रयोग होने से, सायं संध्या से ही यहां अभिप्राय है । संध्या शब्द जो सायं संधि के लिये ही प्रयुक्त होता है, इस आशय की पुष्टि करता है ।
सामने से देखने वाले को भगवती का दक्षिण नेत्र प्रथम और वाम नेत्र पश्चात् दिख पड़ेगा जैसा कि पढ़ते समय
सौंदर्य लहरी २४९
ा से दक्षिण की ओर लिपिक्रम होता है, अर्थात् पहिले दिवस
र पश्चात् रात्रि की क्रमगति है और मध्य में संध्या । दिवस से
ग्रत, रात्रि से सुषुप्ति और संध्या से स्वप्नावस्था का ग्रहण करना
हिये । भगवती की कृपा दृष्टि से जाग्रत में जगत् की अज्ञान स्वरूप
ति होती है, रात्रि में सुषुप्ति का अज्ञानान्धकार रहता है परन्तु वह
वती के चन्द्रात्मक नेत्र के प्रकाश से ज्ञानमय समाधि की अवस्था में
णत हो जाता है, और संध्या रूपी स्वप्नावस्था ज्ञान की वह भूमिका
जिसमें जगत स्वप्नवत् दिखने लगता है । तीनों को ज्ञान की
शः पांचवी, छठी और सातवी भूमिकायें समझना चाहिये ।
सूत्र (३. २. १.) में स्वप्न के लिये संध्य पद का प्रयोग किया
ा है। वहां शंकर भगवत्पाद अपने भाष्य में संध्य की व्याख्या
शब्दों में करते हैं:— "संध्यामिति स्वप्नस्थानमाचष्टे वेदे प्रयोग
नात् 'संध्यं तृतीयं स्वप्न स्थानम्' (वृ. ४. ३. ९.) द्वयोर्लोक
ानयोः प्रबोधसंप्रसादस्थानयोर्वा संधौ भवतीति संध्यम् ।"
अर्थ:— सन्ध्या स्वप्नावस्था को कहते हैं । वेदों में ऐसा
योग मिलता है । जैसे सन्ध्या तीसरा स्वप्न स्थान है । अथवा
ोध संप्रसाद के दोनों लोकस्थानों की संधी भी संध्या होती है ।
ात् में प्रबोध अर्थात् ज्ञान दृष्टि और संप्रसाद (ब्रह्मलीनता
रूप समाधि) दोनों के मध्यवर्तीदशा संध्या कहलाती है । प्रबोध
जाग्रत् और संप्रसाद से सुषुप्ति का अभिप्राय है । परन्तु ज्ञानी
र अज्ञानी के दृष्टिकोण में इतनी भिन्नता रहती है, कि ज्ञानी
ग्रत् में जगत् को ब्रह्म में स्थित देखता है । जैसा कि भगवान
२५० सौंदर्य लहरी
के इस वाक्य से प्रकट होता है। यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति। इत्यादि।
गीता के एकादश अध्यायोक्त विराट् दर्शन में अर्जुन को इस ही प्रकार की दिव्य दृष्टि होने का वर्णन है।
तत्रैकस्थं जगत्कृत्स्नं प्रविभक्तमनेकधा
अपश्यद्देवदेवस्य शरीरे पाडवस्तदा (गीता ११.१३)
पांडव ने वहां सारे अनेकधा प्रविभक्त जगत् को एक स्थान पर ही देवाधिदेव के शरीर में देखा। अज्ञानी की दृष्टि इससे विपरित जगत् को 'सत्यवत् देखती है और भगवान की उसमें व्यापकता की कल्पना मात्र करती है। सुषुप्ति में ज्ञानी की स्थिति सात्विक सोमामृतमयी होने से आत्मस्थिति का अनुभव कराती है, और ज्ञानी स्वप्नों के दृश्यों को भी आत्मा के स्वरूप की रश्मियोंवत् जानता है।
तीसरा नेत्र आग्नेय है। और अग्नि का रंग लाल होता है। वह नेत्र लाल क्यों है। इसका कारण ५० वें श्लोक में बताया गया है, ४९ वें श्लोक में उस ही दृष्टि की विविध भावपूर्ण अवलोकन-शक्तियों का वर्णन है। जिनका वर्णन करने में प्रत्येक शक्ति को कवि ने अपनी समकालीन प्रमुख नगरियों के नाम से नामांकित किया है।
जिनके नाम यह हैं, १ विशाला (बद्रीनाथ) २ कल्याणी (मुंबई और नासिक के मध्यवर्ती एक रेलवे जंक्शन) ३ अयोध्या,
सौंदर्य लहरी २५१
४ धारा (आधुनिक धार), ५ मथुरा (आधुनिक मथुरा अथवा मदुरा), ६ भोगवतिका (अमरावती), ७ अवन्ती (आधुनिक उज्जैन) ८ विजया (आधुनिक विजय नगर)।
[ ४९ ]
विशाला कल्याणी स्फुटरुचिरयोध्या कुवलयैः
कृपाधारा धारा किमपि मधुराभोगवतिका ।
अवन्ती दृष्टिस्ते बहुनगरविस्तारविजया
ध्रुवं तत्तन्नामव्यवहरणयोग्या विजयते ॥
कठिन शब्दों का अर्थः— कुवलय = कमल; व्यवहरण = नाना-अर्थों के संदेह को हरण करने वाले।
अर्थः— तेरी दृष्टि विशाला, कल्याणी खिले हुए कमलों की शोभा की उपमा से ऊंची अयोध्या, कृपा की धारा सदृश धारा, कुछ२ मधुरा, भोगवतिका, सबकी रक्षा करने वाली अवन्तिका, और अनेक नगरों के विस्तार को जीतने वाली विजया है, और निश्चय से इन प्रत्येक नगरियों के नाम से संबोधित नाना अर्थों के संदेह को हरण करने के योग्य हैं । अर्थात् प्रत्येक के नाम की भाव सूचक हैं ।
विशाला अर्थात् उदारता के कारण विशाला है। सबका कल्याण करती है, इसलिये कल्याणी है। कमलों की शोभा तेरे सामने हार मानती है, इसलिये अयोध्या है। मधुर होने के कारण मधुरा है।
२५२ सौंदर्य लहरी
भोगों को देती है, इसलिये भोगवतिका है। सबकी रक्षा करती है, इसलिये अवन्तिका है। और तेरे पराक्रम को कोई नहीं पा सकता, इसलिये विजया है। उक्त आठ प्रकार के भाव युक्त भगवती की दृष्टि है, पंडित सुब्रह्मण्य शास्त्री और श्री निवास अयंगर की अंग्रेजी पुस्तक में इन दृष्टियों के स्वरूप इस प्रकार बताये गये हैं। अन्तर्विकसित दृष्टि विशाला कहलाती है, आश्चर्ययुक्त दृष्टि कल्याणी है, जिसमें पुतलियां फैल जायें वह अयोध्या, आलस्य युक्त दृष्टि धारा, नेत्रों के किंचित् चक्कर खाने पर मधुरा, मैत्री के भावयुक्त भोगवती, निष्पाप दृष्टि जिसमें भोलापन टपक अवन्ती, और तिरछी निगाह विजया कहलाती है। इन दृष्टियों का प्रभाव क्रमशः उच्चाटन, आकर्षण, द्रवीकरण, संमोहन, वशीकरण, ताडन, विद्रावण और मारण है।
उक्त आठों भाव अग्नि में पाये जाते हैं, इसलिये यह दृष्टि तीसरे नेत्र से विशेषेण संबंधित है।
[ ५० ]
कवीनां संदर्भस्तवकमकरन्दैकरसिकं
कटाक्षव्याक्षेपभ्रमरकलभौ कर्णयुगलम् ।
अमुञ्चन्तौ दृष्ट्वा तव नवरसास्वादतरला-
वसूयासंसर्गादलिकनयनं किञ्चिदरुणम् ॥
कठिन शब्दों का अर्थ:—संदर्भ=कविता; अलिकनयनं=माथे का तीसरा नयन; अलिक=ललाट ।
सौंदर्य लहरी २५३
अर्थ:— कवियों की कविता रूपी स्तवक से उठने वाली सुगंध के रसिक कानों का साथ न छोड़ने वाले तेरे कटाक्ष विक्षेप युक्त, तिरछी निगाह से देखने वाले, भ्रमरों के सदृश, और कविताओं के ९ रसों का आस्वाद लेने को बेचैन, चंचल दोनों नेत्रों को देख कर ईर्ष्या के संसर्ग से तेरा (तीसरा) मस्तक वाला नेत्र कुछ लाल रंग युक्त है ।
भाव यह है कि दोनों कान कवियों की कविताओं के रसिक हैं, और दोनों नेत्र भी उसके ९ रसों का स्वाद लेने को बेचैन हैं, इसलिये कानों का स्पर्श करने के लिये वहां तक फैले हुए हैं। और उनसे तीसरा नेत्र ईर्ष्या करता है, क्योंकि उसकी पहुंच कानों तक नहीं होती, इसीलिये वह असूया से लाल हो गया है। नेत्रों का बड़ा होना सौंदर्य का लक्षण है। कवि उनको कान तक फैला हुआ कहा करते हैं, और साथ ही इस मिस से तीसरे नेत्र के रक्तवर्ण होने का कारण भी बताया गया है।
[ ५१ ]
शिवे शृङ्गारार्द्रा तदितरजने कुत्सनपरा
सरोषा गंगायां गिरिशचरिते विस्मयवती ।
हराहिभ्यो भीता सरसिरुह सौभाग्यजयिनी
सखीषु स्मेरा ते मयि जननि दृष्टिः सकरुणा ॥
अर्थ:— शिव के प्रति तेरी दृष्टि शृङ्गारार्द्र है. इतर जनों के प्रति कुत्सित उपेक्षा युक्त, गंगा पर सरोष, शिवजी के
२५४ | सौंदर्य लहरी
चरित्रों पर विस्मय प्रकट करने वाली, शिवजी के सर्पों से भीत, कमलों की शोभा को पराजित करने वाली, सखियों के प्रति मुस्कान लिए हुए है, और हे जननि मेरे ऊपर तेरी करुणायुक्त दयादृष्टि है ।
यहां यह बताया गया है कि भगवती की दृष्टि से ९ रसों का भाव टपकता है। जिनके क्रमशः नाम इस प्रकार हैं। श्रृंगार, विभत्स (घृणा), रौद्र, अद्भुत (विस्मय), भयानक, वीर, हास्य, करुणा, और शान्त। इस श्लोक में अन्तिम शान्त रस का नाम नहीं आया है। इसका अभिप्राय यह है कि भगवती की स्वाभाविक दृष्टि शान्त रस पूर्ण है, जो शान्ति कला का स्वभाव है, इसलिये स्पष्ट कहने की आवश्यकता नही है। अर्थात् भगवती की दृष्टि नवधारस पूर्ण है। इस श्लोक का संबंध ४९ वें श्लोक से है। परन्तु दोनों के भाव में भिन्नता है।
[ ५२ ]
गते कर्णाभ्यर्णं गरुत इव पक्ष्माणि दधती
पुरां भेत्तूश्चित्तप्रशमरसविद्रावणफले ।
इमे नेत्रे गोत्राधरपतिकुलोत्तंसकलिके
तवाकर्णाकृष्टस्मरशरविलासं कलयतः ॥
कठिन शब्दों के अर्थ:— फल=फल और बाण का अग्र भाग; गोत्र=पर्वत, गरुत=पर, पंख.
सौंदर्य लहरी २५५
अर्थः- हे पर्वतराज के कुल की प्रमुख कली ! ये तेरे बाणों सदृश दोनों नेत्र कानों तक पहुंचे हुए हैं, जो पंखों के स्थान पर पलकें धारण किए हुए हैं, और पुरारि के चित्त की शान्ति को भंग करने वाले फल से युक्त हैं, कान तक ताने हुए ये कामदेव के बाणों का कार्य कर रहे हैं ।
बाणों को गति देने के लिये पंख लगाये जाते हैं, और चीरने का कार्य करने के लिये अग्र भाग में लोहे का फल होता है, यहां पलकें पंखवत् हैं, और कटाक्ष का फल शंकर के शान्त चित्त को भंग करने वाला फल है। यहां फल शब्द उभयार्थ प्रयुक्त है, और धनुष चढाने पर बाण को कान तक ताना जाता है, इस प्रकार दोनों नेत्रों की पूर्ण उपमा कामदेव के बाणों से दी गई है । काम देव के बाणों का प्रहार मनुष्यों के चित्त में क्षोभ उत्पन्न करता है, इसी प्रकार देवी का कटाक्ष शंकर के चित्त में क्षोभ उत्पन्न करता है, अर्थात् परब्रह्म में स्पन्द उत्पन्न करता है ।
[ ५३ ]
विभक्तत्रैवर्ण्यं व्यतिकरितलीलाऽञ्जनतया
विभाति त्वन्नेत्रत्रितयमिदमीशानदयिते ।
पुनः स्रष्टुं देवान्द्रुहिणहरिरुद्रानुपरतान्
रजः सत्त्वं बिभ्रत्तम इति गुणानां त्रयमिव (स्वयमिव) ॥
अर्थः- हे ईशान की दयिते ! ये तेरे तीनों नेत्र तीन रंग का अंजन लगाने से मानों पृथक २ तीन रंग के चमक