सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Soundarya Lahari of Shankaracharya Hindi
श्रीमदादि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Soundarya Lahari with Shlokas, Yantras & Hindi Commentary (उद्गम)
सौंदर्य लहरी २४३
से प्रतीत होते हैं। वैसे ही भगवती के केशों का ध्यान अज्ञान को दूर करने वाला है। भगवतीके केश स्वयं सुगंधित हैं, इन्द्र की बाटिका के पुष्पों को भी मानो वे ही सुगन्ध प्रदान कर रहे हैं अर्थात् पुष्पों में जो सुगन्ध होती है वह प्रकृति देवी की ही देन है। प्रायः केशभूषार्थ स्त्रियां अपने केशों में पुष्प गूंथा करती हैं, यह रिवाज मद्रास प्रान्त में अधिक प्रचलित है। भाव यह है कि स्त्रियों के केश. धारण किये हुए पुष्पों से सुगन्धित होते हैं, परन्तु भगवती के केशों की सुगन्ध से पुष्प स्वयं सुवासित होतेहैं।
[ ४४ ]
वहन्ती सिन्दूरं प्रबलकबरीभारतिमिर द्विषां वृन्दैर्बन्दीकृतमिव नवीनार्ककिरणम् । तनोतुक्षेमं नस्तव वदनसौन्दर्यलहरी परीवाहः स्रोतः सरणिरिव सीमान्तसरणिः ॥
कठिन शब्दों के अर्थ:—कबरी=केश, सरणि=मार्ग, सड़क रेखा, लाइन। वदन=मुख, सीमान्त सरणि=जिस रेखा पर सीमा का अन्त होता है, सिर पर केशों की मांग।
अर्थ:— तेरे मुख की सौन्दर्य लहरी के प्रवाहस्रोत के मार्ग के सदृश सिन्दूर से भरी तेरे केशों की मांग हमारे क्षेम (कल्याण) का प्रसार करे, जो मांग केशों के भारमय अन्धकार रूपी प्रबल दुश्मनों के वृन्दों से बन्दी की हुई उदय होने वाले नवीन सूर्य की अरुण किरण के सदृश है।
२४४ | सौंदर्य लहरी
जैसे स्त्रियां मांग में सिंदुर भरती हैं उसी प्रकार मानो देवी के मुख कमल की अरुणिमा केशों की मांग में सिंदूर सी चमकती हुई मूर्धा पर बह रही है । मानों उदय कालीन सूर्य की लाल किरणें रात्रि के अन्धकार को चीरना चाहती हैं । परन्तु अन्धकार रूपी दुश्मनों ने उसको कैद कर लिया है ।
स्रोत का प्रवाह ऊपर से निम्न तल पर हुआ करता है, परन्तु भगवती की शोभा की कान्ति उर्ध्व गामिनी है । उसे योगियों में ज्ञान के सूर्य के उदय होने से पूर्व प्रकट होने वाले प्रातिभ ज्ञान के सदृश समझना चाहिये ।
अलकों का ध्यान:—
( ४५ )
अरालैः स्वाभाव्यादलिकलभश्रीभिरलकैः
परीतं ते वक्त्रं परिहसति पंकेरुह रुचिम् ।
दरस्मेरे यस्मिन्दशन रुचि किंजल्करुचिरे
सुगन्धौ माद्यन्ति स्मरदहन चक्षुर्मधुलिहः ॥
कठिन शब्दों का अर्थ:— अराल=घुंघराले; कलभ=बच्चा; स्मेर=मुस्कराहट; दर=किंचित, थोडी; किंजल्क=स्फटिक; मधुलिह=भौँरा; अलक=जुल्फ ।
**अर्थ:—**स्वाभाविक घुंघराली जवान भौंरा की कांतियुक्त अलकावलि से घिरा हुआ तेरा मुख, कमलों की शोभा का
सौंदर्य लहरी २७५
परिहास करता है । जिनमें स्फटिक सदृश शोभा वाले दन्तों में किंचित् मुस्कराते समय निकलने वाली सुगंध पर काम के दहन करने वाले शिवजी के नेत्र रूपी भौंरे मस्त हो जाते हैं ।
मानो शिवजी भी जिन पर काम का लेशमात्र भी प्रभाव नहीं, प्रकृति के सौंदर्य से मुग्ध हो रहे हैं अर्थात् वह निर्गुण ब्रह्म प्रकृति के गुणों का भोक्ता भी है । असक्तं सर्वभृच्चैव निर्गुणं गुणभोक्तृच । (गीता १३, १४)
ललाट का ध्यान:—
( ४६ )
ललाटं लावण्यद्युति विमलमाभाति तव यद्
द्वितीयं तन्मन्ये मुकुटघटितं चन्द्रशकलम् ।
विपर्यासन्यासादुभयमपि संभूय च मिथः
सुधालेपस्यूतिः परिणमति राकाहिमकरः ॥
**कठिन शब्दों के अर्थ:—**मिथ=अकेला; स्यूतिः=सीवन, जोड; विपर्यन्यास=एक दूसरे से उलट ।
**अर्थ:—**लावण्य कांति से युक्त विमल चमकने वाला जो तेरा ललाट है, उसे मैं मुकुट में जड़ी हुई चन्द्रमा की दूसरी कला समझता हूं, जो एक दूसरे पर उलट कर रखी होने के कारण दोनों का एक रूप बनकर और अमृत के लेप से जुड़ कर पूर्ण चन्द्रमा बन गया है ।
२४६ | सौंदर्य लहरी
चन्द्रमा से अमृत का स्राव होता ही है उससे मानों दोनों कलाएं जुडकर पूर्ण चन्द्रमा बन गया है दोनों कलाओं की दोनों नोक एक दूसरे से मिलकर जुड गई हैं और बीच का अवकाश अमृत से लिप कर पूर्णिमा के चन्द्रवत् चमकने लगा है।
भ्रुकुटि का ध्यान:—
(४७)
ध्रुवौ भुग्ने किंचिद् भुवनभयभङ्गव्यसनिनि
त्वदीये नेत्राभ्यां मधुकररुचिभ्यां धृतगुणम्।
धनुर्मन्ये सव्येतरकरगृहीतं रतिपतेः
प्रकोष्ठे मुष्टौ च स्थगयति निगूढान्तरमुमे ॥
कठिन शब्दों का अर्थ:— भुग्न=त्योरी; रतिपति=कामदेव; प्रकोष्ठ=मुट्ठी का ऊपरी भाग, कलाई पोंहचा।
अर्थ:— हे भुवन के भय का नाश करने में आनन्द लेने वाली उमे ! भ्रुवों की त्योरी चढने पर मैं उसकी बायें हाथ में लिये हुए कामदेव के धनुष् से उपमा देता हूं, जिसकी प्रत्यंचा भौरों की कांति वाले तेरे दोनों नेत्रों की बनी है, और जिसका मध्य भाग मुट्ठी के और कलाई के नीचे छुपा हुआ है ।
भाव यह है कि भगवती जगत् के भय का नाश करने के लिये सदा उद्यत रहती है और कामदेव का धनुष् इस कार्य के लिये वह
सौन्दर्य लहरी २४७
सदा चढ़ाये रखती हैं और वह धनुष् उसकी त्योरी चढ़ी हुई भौंहें ही हैं। कामदेव के धनुष् की प्रत्यंचा भौंरों की कही जाती है, इसलिये भौंरो की उपमा रखने वाले दोनों नेत्र धनुष् की प्रत्यंचा समझनी चाहिये, अर्थात् भगवती की त्योरी चढ़ते ही संसार के सब भय भाग जाते हैं और भृकुटी का मध्यभाग मानो धनुष् को चढ़ाते समय बांये हाथ की मुट्ठी में दबा हुआसा है।
संसार का सबसे बड़ा शत्रु काम है इसलिये उसका धनुष मानो भगवती ने स्वयं छीन लिया है।
कामएष क्रोध एष रजोगुण समुद्भवः ।
महाशनो महापाप्मा विद्ध्येनमिह वैरिणम् ॥
(गीता ३, ३७)
काम से क्रोध उत्पन्न होता है, कामात्क्रोधोऽभिजायते (गीता-२, ६२) इसलिये क्रोध भी काम का ही रूपान्तर है जो रजोगुण से उत्पन्न होता है, भगवान कहते हैं कि यह बड़ा पेटू है, बहुत भोजन करने वाला है अर्थात् कभी तृप्त नहीं होता और बड़ा पापी है। अर्थात् सब पापों का घर है। इसलिये इसे यहां संसार का बैरी समझना चाहिये।
उपरोक्त श्लोक का भाव है कि भगवती की त्योरी का ध्यान करने से कामवासना शांत हो जाती है और सब भय दूर हो जाते हैं
२४८ | सौंदर्य लहरी
तीन नेत्रों का ध्यान:—
(४८)
अहः सूते सव्यं तव नयनमर्कात्मकतया
त्रियामां वामं ते सृजति रजनीनायकतया ।
तृतीया ते दृष्टिर्दरदलित हेमाम्बुजरुचिः
समाधत्ते संध्यां दिवस निशयोरन्तरचरीम् ॥
कठिन शब्दों का अर्थ: — त्रियामा=रात्रि; रजनी नायक=चद्रमा
**अर्थ:—**तेरा दक्षिण नेत्र सूर्यात्मक होने से दिन बनाता है, और बायां चन्द्रात्मक होने से रात्रि की सृष्टि करता है, और किंचित् विकसित सुवर्ण के बने हुए कमल की शोभा से युक्त तेरी तीसरी दृष्टि दिन और रात दोनों के बीच में रहने वाली संध्या है ।
दिन रात्रि की संधि प्रातः और सायंकाल दोनों समय होती है, इसलिये तीसरी दृष्टि दोनों के सदृश हो सकती है, परन्तु दिवस शब्द का प्रयोग प्रथम, और तत्पश्चात् निशि का प्रयोग होने से, सायं संध्या से ही यहां अभिप्राय है । संध्या शब्द जो सायं संधि के लिये ही प्रयुक्त होता है, इस आशय की पुष्टि करता है ।
सामने से देखने वाले को भगवती का दक्षिण नेत्र प्रथम और वाम नेत्र पश्चात् दिख पड़ेगा जैसा कि पढ़ते समय
सौंदर्य लहरी २४९
ा से दक्षिण की ओर लिपिक्रम होता है, अर्थात् पहिले दिवस
र पश्चात् रात्रि की क्रमगति है और मध्य में संध्या । दिवस से
ग्रत, रात्रि से सुषुप्ति और संध्या से स्वप्नावस्था का ग्रहण करना
हिये । भगवती की कृपा दृष्टि से जाग्रत में जगत् की अज्ञान स्वरूप
ति होती है, रात्रि में सुषुप्ति का अज्ञानान्धकार रहता है परन्तु वह
वती के चन्द्रात्मक नेत्र के प्रकाश से ज्ञानमय समाधि की अवस्था में
णत हो जाता है, और संध्या रूपी स्वप्नावस्था ज्ञान की वह भूमिका
जिसमें जगत स्वप्नवत् दिखने लगता है । तीनों को ज्ञान की
शः पांचवी, छठी और सातवी भूमिकायें समझना चाहिये ।
सूत्र (३. २. १.) में स्वप्न के लिये संध्य पद का प्रयोग किया
ा है। वहां शंकर भगवत्पाद अपने भाष्य में संध्य की व्याख्या
शब्दों में करते हैं:— "संध्यामिति स्वप्नस्थानमाचष्टे वेदे प्रयोग
नात् 'संध्यं तृतीयं स्वप्न स्थानम्' (वृ. ४. ३. ९.) द्वयोर्लोक
ानयोः प्रबोधसंप्रसादस्थानयोर्वा संधौ भवतीति संध्यम् ।"
अर्थ:— सन्ध्या स्वप्नावस्था को कहते हैं । वेदों में ऐसा
योग मिलता है । जैसे सन्ध्या तीसरा स्वप्न स्थान है । अथवा
ोध संप्रसाद के दोनों लोकस्थानों की संधी भी संध्या होती है ।
ात् में प्रबोध अर्थात् ज्ञान दृष्टि और संप्रसाद (ब्रह्मलीनता
रूप समाधि) दोनों के मध्यवर्तीदशा संध्या कहलाती है । प्रबोध
जाग्रत् और संप्रसाद से सुषुप्ति का अभिप्राय है । परन्तु ज्ञानी
र अज्ञानी के दृष्टिकोण में इतनी भिन्नता रहती है, कि ज्ञानी
ग्रत् में जगत् को ब्रह्म में स्थित देखता है । जैसा कि भगवान
२५० सौंदर्य लहरी
के इस वाक्य से प्रकट होता है। यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति। इत्यादि।
गीता के एकादश अध्यायोक्त विराट् दर्शन में अर्जुन को इस ही प्रकार की दिव्य दृष्टि होने का वर्णन है।
तत्रैकस्थं जगत्कृत्स्नं प्रविभक्तमनेकधा
अपश्यद्देवदेवस्य शरीरे पाडवस्तदा (गीता ११.१३)
पांडव ने वहां सारे अनेकधा प्रविभक्त जगत् को एक स्थान पर ही देवाधिदेव के शरीर में देखा। अज्ञानी की दृष्टि इससे विपरित जगत् को 'सत्यवत् देखती है और भगवान की उसमें व्यापकता की कल्पना मात्र करती है। सुषुप्ति में ज्ञानी की स्थिति सात्विक सोमामृतमयी होने से आत्मस्थिति का अनुभव कराती है, और ज्ञानी स्वप्नों के दृश्यों को भी आत्मा के स्वरूप की रश्मियोंवत् जानता है।
तीसरा नेत्र आग्नेय है। और अग्नि का रंग लाल होता है। वह नेत्र लाल क्यों है। इसका कारण ५० वें श्लोक में बताया गया है, ४९ वें श्लोक में उस ही दृष्टि की विविध भावपूर्ण अवलोकन-शक्तियों का वर्णन है। जिनका वर्णन करने में प्रत्येक शक्ति को कवि ने अपनी समकालीन प्रमुख नगरियों के नाम से नामांकित किया है।
जिनके नाम यह हैं, १ विशाला (बद्रीनाथ) २ कल्याणी (मुंबई और नासिक के मध्यवर्ती एक रेलवे जंक्शन) ३ अयोध्या,
सौंदर्य लहरी २५१
४ धारा (आधुनिक धार), ५ मथुरा (आधुनिक मथुरा अथवा मदुरा), ६ भोगवतिका (अमरावती), ७ अवन्ती (आधुनिक उज्जैन) ८ विजया (आधुनिक विजय नगर)।
[ ४९ ]
विशाला कल्याणी स्फुटरुचिरयोध्या कुवलयैः
कृपाधारा धारा किमपि मधुराभोगवतिका ।
अवन्ती दृष्टिस्ते बहुनगरविस्तारविजया
ध्रुवं तत्तन्नामव्यवहरणयोग्या विजयते ॥
कठिन शब्दों का अर्थः— कुवलय = कमल; व्यवहरण = नाना-अर्थों के संदेह को हरण करने वाले।
अर्थः— तेरी दृष्टि विशाला, कल्याणी खिले हुए कमलों की शोभा की उपमा से ऊंची अयोध्या, कृपा की धारा सदृश धारा, कुछ२ मधुरा, भोगवतिका, सबकी रक्षा करने वाली अवन्तिका, और अनेक नगरों के विस्तार को जीतने वाली विजया है, और निश्चय से इन प्रत्येक नगरियों के नाम से संबोधित नाना अर्थों के संदेह को हरण करने के योग्य हैं । अर्थात् प्रत्येक के नाम की भाव सूचक हैं ।
विशाला अर्थात् उदारता के कारण विशाला है। सबका कल्याण करती है, इसलिये कल्याणी है। कमलों की शोभा तेरे सामने हार मानती है, इसलिये अयोध्या है। मधुर होने के कारण मधुरा है।
२५२ सौंदर्य लहरी
भोगों को देती है, इसलिये भोगवतिका है। सबकी रक्षा करती है, इसलिये अवन्तिका है। और तेरे पराक्रम को कोई नहीं पा सकता, इसलिये विजया है। उक्त आठ प्रकार के भाव युक्त भगवती की दृष्टि है, पंडित सुब्रह्मण्य शास्त्री और श्री निवास अयंगर की अंग्रेजी पुस्तक में इन दृष्टियों के स्वरूप इस प्रकार बताये गये हैं। अन्तर्विकसित दृष्टि विशाला कहलाती है, आश्चर्ययुक्त दृष्टि कल्याणी है, जिसमें पुतलियां फैल जायें वह अयोध्या, आलस्य युक्त दृष्टि धारा, नेत्रों के किंचित् चक्कर खाने पर मधुरा, मैत्री के भावयुक्त भोगवती, निष्पाप दृष्टि जिसमें भोलापन टपक अवन्ती, और तिरछी निगाह विजया कहलाती है। इन दृष्टियों का प्रभाव क्रमशः उच्चाटन, आकर्षण, द्रवीकरण, संमोहन, वशीकरण, ताडन, विद्रावण और मारण है।
उक्त आठों भाव अग्नि में पाये जाते हैं, इसलिये यह दृष्टि तीसरे नेत्र से विशेषेण संबंधित है।
[ ५० ]
कवीनां संदर्भस्तवकमकरन्दैकरसिकं
कटाक्षव्याक्षेपभ्रमरकलभौ कर्णयुगलम् ।
अमुञ्चन्तौ दृष्ट्वा तव नवरसास्वादतरला-
वसूयासंसर्गादलिकनयनं किञ्चिदरुणम् ॥
कठिन शब्दों का अर्थ:—संदर्भ=कविता; अलिकनयनं=माथे का तीसरा नयन; अलिक=ललाट ।
सौंदर्य लहरी २५३
अर्थ:— कवियों की कविता रूपी स्तवक से उठने वाली सुगंध के रसिक कानों का साथ न छोड़ने वाले तेरे कटाक्ष विक्षेप युक्त, तिरछी निगाह से देखने वाले, भ्रमरों के सदृश, और कविताओं के ९ रसों का आस्वाद लेने को बेचैन, चंचल दोनों नेत्रों को देख कर ईर्ष्या के संसर्ग से तेरा (तीसरा) मस्तक वाला नेत्र कुछ लाल रंग युक्त है ।
भाव यह है कि दोनों कान कवियों की कविताओं के रसिक हैं, और दोनों नेत्र भी उसके ९ रसों का स्वाद लेने को बेचैन हैं, इसलिये कानों का स्पर्श करने के लिये वहां तक फैले हुए हैं। और उनसे तीसरा नेत्र ईर्ष्या करता है, क्योंकि उसकी पहुंच कानों तक नहीं होती, इसीलिये वह असूया से लाल हो गया है। नेत्रों का बड़ा होना सौंदर्य का लक्षण है। कवि उनको कान तक फैला हुआ कहा करते हैं, और साथ ही इस मिस से तीसरे नेत्र के रक्तवर्ण होने का कारण भी बताया गया है।
[ ५१ ]
शिवे शृङ्गारार्द्रा तदितरजने कुत्सनपरा
सरोषा गंगायां गिरिशचरिते विस्मयवती ।
हराहिभ्यो भीता सरसिरुह सौभाग्यजयिनी
सखीषु स्मेरा ते मयि जननि दृष्टिः सकरुणा ॥
अर्थ:— शिव के प्रति तेरी दृष्टि शृङ्गारार्द्र है. इतर जनों के प्रति कुत्सित उपेक्षा युक्त, गंगा पर सरोष, शिवजी के
२५४ | सौंदर्य लहरी
चरित्रों पर विस्मय प्रकट करने वाली, शिवजी के सर्पों से भीत, कमलों की शोभा को पराजित करने वाली, सखियों के प्रति मुस्कान लिए हुए है, और हे जननि मेरे ऊपर तेरी करुणायुक्त दयादृष्टि है ।
यहां यह बताया गया है कि भगवती की दृष्टि से ९ रसों का भाव टपकता है। जिनके क्रमशः नाम इस प्रकार हैं। श्रृंगार, विभत्स (घृणा), रौद्र, अद्भुत (विस्मय), भयानक, वीर, हास्य, करुणा, और शान्त। इस श्लोक में अन्तिम शान्त रस का नाम नहीं आया है। इसका अभिप्राय यह है कि भगवती की स्वाभाविक दृष्टि शान्त रस पूर्ण है, जो शान्ति कला का स्वभाव है, इसलिये स्पष्ट कहने की आवश्यकता नही है। अर्थात् भगवती की दृष्टि नवधारस पूर्ण है। इस श्लोक का संबंध ४९ वें श्लोक से है। परन्तु दोनों के भाव में भिन्नता है।
[ ५२ ]
गते कर्णाभ्यर्णं गरुत इव पक्ष्माणि दधती
पुरां भेत्तूश्चित्तप्रशमरसविद्रावणफले ।
इमे नेत्रे गोत्राधरपतिकुलोत्तंसकलिके
तवाकर्णाकृष्टस्मरशरविलासं कलयतः ॥
कठिन शब्दों के अर्थ:— फल=फल और बाण का अग्र भाग; गोत्र=पर्वत, गरुत=पर, पंख.
सौंदर्य लहरी २५५
अर्थः- हे पर्वतराज के कुल की प्रमुख कली ! ये तेरे बाणों सदृश दोनों नेत्र कानों तक पहुंचे हुए हैं, जो पंखों के स्थान पर पलकें धारण किए हुए हैं, और पुरारि के चित्त की शान्ति को भंग करने वाले फल से युक्त हैं, कान तक ताने हुए ये कामदेव के बाणों का कार्य कर रहे हैं ।
बाणों को गति देने के लिये पंख लगाये जाते हैं, और चीरने का कार्य करने के लिये अग्र भाग में लोहे का फल होता है, यहां पलकें पंखवत् हैं, और कटाक्ष का फल शंकर के शान्त चित्त को भंग करने वाला फल है। यहां फल शब्द उभयार्थ प्रयुक्त है, और धनुष चढाने पर बाण को कान तक ताना जाता है, इस प्रकार दोनों नेत्रों की पूर्ण उपमा कामदेव के बाणों से दी गई है । काम देव के बाणों का प्रहार मनुष्यों के चित्त में क्षोभ उत्पन्न करता है, इसी प्रकार देवी का कटाक्ष शंकर के चित्त में क्षोभ उत्पन्न करता है, अर्थात् परब्रह्म में स्पन्द उत्पन्न करता है ।
[ ५३ ]
विभक्तत्रैवर्ण्यं व्यतिकरितलीलाऽञ्जनतया
विभाति त्वन्नेत्रत्रितयमिदमीशानदयिते ।
पुनः स्रष्टुं देवान्द्रुहिणहरिरुद्रानुपरतान्
रजः सत्त्वं बिभ्रत्तम इति गुणानां त्रयमिव (स्वयमिव) ॥
अर्थः- हे ईशान की दयिते ! ये तेरे तीनों नेत्र तीन रंग का अंजन लगाने से मानों पृथक २ तीन रंग के चमक
२५६ | सौंदर्य लहरी
रहे हैं, और महा प्रलय के अन्त में ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र को जो प्रलय काल में उपरत हो गये थे, फिर पैदा करने के लिये रज, सत्व और तम तीनों गुणों को धारण किये हुए से प्रतीत होते हैं ।
रजो गुण रक्त वर्ण हैं, सत्व शुक्ल वर्ण और तमो गुण कृष्ण वर्ण हैं। भगवती के दो नेत्र चन्द्र सूर्यात्मक श्वेत और कृष्ण वर्ण हैं, और तीसरा नेत्र मस्तक में आग्नेय रक्त वर्ण हैं। महा प्रलय में ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र भी लीन हो जाते हैं, परन्तु शक्ति ब्रह्म के साथ अव्यक्त रूप में बनी रहती है। प्रलय के अन्त में व्यक्त होकर ब्रह्मा, विष्णु, और रुद्र को फिर अपने नेत्रों के उन्मीलन से उत्पन्न करती है। ब्रह्मा रजो गुण के, विष्णु सत्व गुण के और रुद्र तमो गुण के अधिदेव हैं, इसलिये मानों भगवती के तीनों नेत्रों के खुल जाने पर वह उन में सत्व, रज और तम रूपी तीन प्रकार का अंजन आंज लेती हैं। अर्थात् भगवती की दृष्टि तीन गोलकों का आश्रय लेने से तीनों के रूप में व्यक्त होती हैं। यद्यपि दृष्टि की शक्ति एक ही है तो भी तीन प्रकार के गुण रूपी अंजनों के कारण त्रिधा प्रतीत होती है, क्योंकि तीनों में सृष्टि स्थिति संहार करने की तीनों शक्तियां एक ही शक्ति के तीन रूप हैं ।
सौंदर्य लहरी २५७
( ५४ )
पवित्री कर्तुं नः पशुपतिपराधीनहृदये दयामित्रै र्नेत्रैररुणधवलश्यामरुचिभिः । नदः शोणो गङ्गा तपनतनयेति ध्रुवममु ( मयं ) त्रयाणां तीर्थानामुपनयसि संभेदमन्वम् ॥
**अर्थः—**पशुपति शंकर भगवान की पराधीनता में हृदय समर्पण करने वाली हे भगवती ! अरुण, शुक्ल, और श्याम वर्णों की शोभा से युक्त दयापूर्ण अपने नेत्रों से शोणनदी, गंगा और सूर्यतनया ( जमुना ) इन तीनों तीर्थों के सदृश निश्चय ही हम लोगों को पवित्र करने के लिये तू पवित्र संगम बना रही है ।
गंगा और यमुना का संगम प्रयाग में है जो दोनों नेत्रों के बीच है, वह भ्रू मध्य भाग काशी है । उसके ऊपर तीसरा नेत्र शोणनदी है । ज्ञाननेत्र में तीनों का एकीकरण होता है । शोणनदी काशी से कुछ आगे चल कर गंगाजी से मिलती है । नासिका के अग्रभाग पर, भ्रूमध्य में और ललाट प्रदेश में ध्यान करने की विधि योग धारणा के प्रधान साधन हैं । उन स्थानों पर धारणा करके वहां चित्त को ध्यान मग्न कर देना ही उक्त तीर्थों में स्नान करना है ।
२५८ सौंदर्य लहरी
( ५५ )
निमेषोन्मेषाभ्यां प्रलयमुदयं याति जगती
तवेत्याहुः सन्तो धरणिधरराजन्यतनये ।
त्वदुन्मेषाज्जातं जगदिदमशेषं प्रलयतः
परित्रातुं शंके परिहृतनिमेषास्तव दृशः ॥
अर्थ:— हे धरणिधर राजन्य हिमाचल की पुत्री ! सन्तों का कहना है कि तेरे निमेष (नेत्र बंद करने) से जगत् का प्रलय और उन्मेष अर्थात् नेत्र खोलने से उद्भव अर्थात् सृष्टि होती है । यह सारा जगत् प्रलय के पश्चात् तेरे उन्मेष से उत्पन्न हुआ है, उसकी रक्षा करने के लिये ही मुझे शंका होती है, कि तेरी आंखों ने झपकना बंद कर रखा है ।
आंखों का झपकना इस लिये बन्द कर रखा है कि कहीं झपकने के साथ तुरन्त प्रलय न हो जाय । देवताओं के नेत्रों में झपकियां नहीं पडतीं; इस लिये भगवती के नेत्र भी सदा निमेषोन्मेषरहित रहते हैं, यह बात इस श्लोक में कही गई है । यदि कहो कि कमल खिला रहता है और मछलियों के नेत्र भी नहीं झपकते, तो अगला श्लोक लिखते हैं कि:—
सौन्दर्य लहरी १०२
[ ५६ ]
तवार्पणे कर्णे जपनयन पैशुन्य चकिता
निलीयन्ते तोये नियतमनिमेषाः शफरिकाः ।
इयं च श्रीर्बद्धच्छदपुटकवाटं कुवलयं
जहाति प्रत्यूषे निशि च विघटय्य प्रविशति ॥
कठिन शब्दों का अर्थ:— शफरिका=मछली; कुवलय=कुमुद ।
अर्थ:— हे अपर्णे ! निमेष रहित मछलियां तो सदा पानी में छुपी रहती हैं, उनको यह भय रहता है कि कहीं तेरी आंखें ईर्ष्या वश उनकी चुगली तेरे कानों से न करदें, और यह लक्ष्मी सबेरा होने पर कपाटों के सदृश बंद हो जाने वाले दलयुक्त कुमुदिनी को छोड़ जाती है, और रात्रि को उन्हें खोल कर प्रवेश करती है ।
भाव यह है कि भगवती के निमेषोन्मेषवर्जित नेत्रों की प्रतिद्वंद्वी एक तो मछलियां हैं, दूसरी कुमुदिनी हैं । मछली तो पानी में छुपी रहती है, और कुमुदिनी रात्रि को ही खिलती है और दिन में बंद होकर श्री (कांति) हीन हो जाती है ।
२६० सौंदर्य लहरी
[ ५७ ]
दृशा द्राघीयस्या दरदलितनीलोत्पलरुचा
दवीयांसं दीनं स्नपय कृपया मामपि शिवे ।
अनेनायं धन्यो भवति न च हानिरियता
वने वा हर्म्ये वा समकरनिपातो हिमकरः ॥
**अर्थ:—**हे शिवे ! किंचित् विकसित् नीलोत्पल की शोभा से युक्त दूर तक पहुंचने वाली अपनी दृष्टि से कृपया दूरस्थित मुझ दीन को भी स्नान करा दे । उससे यह धन्य हो जायगा, और ऐसा करने से तेरी कोई हानि नहीं है, क्योंकि चन्द्रमा की किरणें वन में और महलों में समान रूप से पडती हैं ।
कनपटियों का ध्यान:—
[ ५८ ]
अरालं ते पालीयुगलमगराजन्यतनये
न केषामाधत्ते कुसुमशरकोदंडकुतुकम्
तिरश्चीनो यत्र श्रवणपथमुल्लंघ्य विलस—
न्नपांगव्यासंगो दिशति शरसंधानधिषणाम् ॥
कठिन शब्दों का अर्थ:— अरालं=वक्र; पाली=कनपटीकोण; अग=पर्वत; अपांग=कटाक्ष ।
सौंदर्य लहरी २६१
**अर्थ:—**हे पर्वत राज की पुत्रि तेरी दोनों वक्र कनपटियां किसकी बुद्धि में पुष्पवाण धारण करने वाले धनुष के कोणों का कौतुहल न करेंगी। जहां श्रवणपथ का उल्लंघन करके तेरा तिरछा कटाक्ष कनपटी को लांघकर कान तक पहुंचा हुआ बाण सदृश दिखता है. जो दोनों भौंहों के धनुष पर चढ़ा हुआ है. कनपटियां धनुष के कोण हैं। भगवती की त्योरी रूपी धनुष पर चढ़े हुए कटाक्ष रूपी बाण से समस्त बाधाओं का नाश होता है।
मुख का ध्यान:—
[ ५९ ]
स्फुरद्गण्डाभोगप्रतिफलितताटंकयुगलं
चतुश्चक्रं मन्ये तव मुखमिदं मन्मथरथम् ।
यमारुह्य (यमाश्रित्य) द्रुह्यत्यवनिरथमर्केन्दुचरणं
महावीरो मारः प्रमथपतये सज्जितवते ॥
कठिन शब्दों का अर्थ:— ताटंक=कर्णफूल।
**अर्थ:—**तेरे चमकते हुए कपोलों पर प्रतिबिंबित दोनों कर्णफूलों युक्त तेरा मुख मुझे चार पहियों वाला कामदेव का रथ जंचता है, जिस पर चढ़ कर अथवा जिसका आश्रय लेकर महावीर कामदेव, सूर्य और चन्द्रमा दो पहियों वाले पृथिवी रूपी रथ पर युद्धार्थ सुसज्जित शंकर के विरुद्ध अड़ा है।
२६२ सौंदर्य लहरी
मुख रथ है, उसके चार पहिये कानों में लटकते हुए दो कर्ण फूल हैं, और दो उनके कपोलों पर प्रतिबिंब हैं । शंकर का रथ पृथ्वी है, जिसके सूर्य और चन्द्रमा दो पहिये हैं, जिसपर चढकर शंकर ने त्रिपुरों को हराया था । परन्तु यहां देवी के मुख रूपी रथ का आश्रय लेने के कारण कामदेव शंकर के समक्ष युद्ध करने का साहस करता है ।
[ ६० ]
सरस्वत्याः सूक्तीरमृतलहरीकौशलहरीः
पिबंत्याः शर्वाणि श्रवणचुलुकाभ्यामविरलम् ।
चमत्कारश्लाघाचलितशिरसः कुण्डलगणो
झणत्कारैस्तारैः प्रतिवचनमाचष्ट इव ते ॥
कठिन शब्दों के अर्थ:- तार=ॐ कार. प्रति वचन=स्वीकृति सूचक हुंकार कहना ।
अर्थ:- हे शर्वाणि ! सरस्वती की सुन्दर युक्ति को जो अमृत की लहरी के कौशल को हरती है श्रवण रूपी चुल्लुओं द्वारा अविरल पान करते समय तेरे कुंडलगण चमत्कार पूर्ण उक्तियों की श्लाघा सूचक सिर हिलाते समय, झण २ बजकर मानों ॐकार का उच्चारण सदृश हुंकार द्वारा उत्तर दे रहे हैं ।
प्राचीन काल में अनुज्ञा सूचक शब्द के स्थान पर ॐ कहते थे, जैसे आजकल हां अथवा हुं कहकर अनुज्ञा प्रकट की जाती है । देखें छान्दोग्योपनिषत् ( १. १. ८)