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स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary

महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished190 पृष्ठ

९६ स्पन्दकारिका विवरण शैवदर्शन का यह सिद्धान्त है कि बहिर्मुख होकर, विशेष रूप में प्रवहमान शक्ति की मुख्य विशेषता यही है कि वह प्रतिक्षण स्वरूप के ऊपर आवरण डालने पर उद्यत रहती है। इसका अभिप्राय यह है कि बहिर्मुखीन प्रवहमानता में शक्ति, एक ओर पञ्चकञ्चुक, स्थूलदेह इत्यादि आवरणों के रूपों को धारण करके जीवात्मा के चारों ओर इस प्रकार चिमट जाती है कि वह स्वत्त्वाधिकारिता को भूलकर, इन्हीं अनात्मभूत ओर जड़ पदार्थों पर आत्माभिमान करता रहता है और दूसरी ओर गुणत्रय से उद्भूत सुखिता, दुःखिता और मूढ़ता, इन तीन रागात्मक भावनाओं के रूप को धारण करके, उसको (जीव को), मूलतः निर्गुण, निष्कल और निरञ्जन होने पर भी, इन पर ममत्व अभिमान रखने पर विवश बना लेती है। इन्हीं भावनाओं से उद्भूत अन्तर्द्वन्द्व के फलस्वरूप, संसार का पशुवर्ग, प्रति- समय, सांसारिक भोगलिप्साओं को, कामिनी और कांचन इत्यादि विषयों के उपभोग के द्वारा, शान्त करने पर दिन-रात लगा रहता है। जितना-जितना वह (पशुवर्ग) इस भोगलिप्सा की अनबूझ पिपासा को, विषयोपभोग के द्वारा, शान्त करना चाहता है उतनी-उतनी इसकी चक्रवृद्धि हो जाती है और परिणामतः युग युगों तक, उसके लिए वासनात्मक चक्रवात से निकलने की सम्भावना ही नहीं रहती है। संक्षेप में कहा जा सकता है कि अज्ञानी पुरुषों के लिए शाङ्कर-शक्ति का रूप, विषवेग से फुफकारती हुई महाभयंकर नागिन के समान घोर से घोर,- तर होता जाता है और वे इसके विषैले दंश से वास्तविक सुध-बुध को खोकर, निर्विवेकता की नींद में पड़े हुए रहते हैं। उनका वितण्डापूर्ण बुद्धिवाद जितने अतिस्वनिक वेग से आगे बढ़ता रहता है उतने ही वेग से हृदयपक्ष पिछड़ता रहता है। शुष्क बुद्धिवाद, रागात्मक वासनाओं को जन्म देता है और सरस हृदयपक्ष के अभाव में स्वरूप का स्थगित होना स्वाभाविक है। पशुजनों में पाई जाने वाली इस दशा को यदि स्वशक्तिविरोध की दशा कहा जाये तो कोई अत्युक्ति नहीं होगी। शैवशास्त्रों में भी इस दशा को शक्तिदारिद्र्य की संज्ञा देकर प्रस्तुत किया गया है। शक्तिदरिद्रता से ज्ञानक्रियात्मक स्पन्दना का अभाव नहीं, प्रत्युत पशुभाव के स्तर पर उसके स्वतन्त्र प्रसार में विशेष प्रकार के संकोच का अभिप्राय लिया जाता है। पशुभाव तब तक सम्पन्न नहीं हो सकता है जब तक असीम स्वातन्त्र्य ससीम पराधीनता न बन जाये। सर्वस्वतन्त्र शिव, स्वशक्ति विरोध से ही अस्वतन्त्र पशु बन कर अशुद्धाध्व का राही बन गया है। शैवशास्त्रों में, तत्त्वक्रम की दृष्टि से, चिन्मात्ररूप आत्मतत्त्व की अवरोह- प्रक्रिया की वैज्ञानिक मीमांसा प्रस्तुत की गई है। प्रस्तुत विषय के साथ सम्बन्धित होने के कारण यहाँ पर संक्षेप में उसका उल्लेख करना आवश्यक प्रतीत होता है :— अशुद्धाध्व अर्थात् मायातत्त्व से लेकर पृथिवीतत्त्व तक के शाक्त अवरोहक्रम में, समस्त स्पन्दनामयी और सर्वस्वतन्त्र चित्-शक्ति जड मायातत्त्व का रूप धारण कर लेती है। यह १. विषयेष्वेव संलीनानधोऽधः पातयन्त्यमून । रुद्राणून् याः समालिङ्गय घोरतर्योऽपराः स्मृताः ।। (मा० वि०, ३.३१)

अज्ञान और विशेष स्पन्द ९७ तत्त्वरूपा १माया पशु को, जोकि वास्तव में शिव का ही अंश है, मौलिक चिन्मात्ररूप शिव- भाव से अलग करके, पहले निःसंज्ञ जैसा बना लेती है । निःसंज्ञ होने का यह अर्थ नहीं कि जीव शिव के अलग होने की दशा में पूर्णतया चेतनाहीन हो जाता है, अपितु इसका यह अभिप्राय है कि वह सशक्त एवं दुर्भेद्य मायीय आवरण के द्वारा आवृत होने के कारण पूर्णचेतना को खोकर, अंशतः, चेतना से युक्त रह जाता है और उसकी ऐसी दशा हो जाती है कि मानों गहरी नींद में पड़ा हुआ हो । निःसंज्ञ जैसा बन जाने की दशा में उसके निरंकुश ज्ञान-क्रिया के प्रसार में बाधा पड़ जाना भी स्वाभाविक ही है। पहले भी इस बात का ] उल्लेख किया जा चुका है कि पूर्ण शिवभाव के स्तर पर, शक्ति के चित्, निर्वृति, इच्छा, ज्ञान और क्रिया ये पांच मुख हैं और इसकी व्यापकता और प्रसार में कहीं कोई देशकालादि से जनित बाधा या सीमा नहीं है । इसके प्रतिकूल जहाँ एक ओर माया, अपने प्रभाव से पूर्ण-चेतन शिव को अंशतः चेतन पशु बनाकर संकुचित बना लेती है, वहाँ इन उपर्युक्त पांच असीम शक्तियों को भी ससीम बना कर क्रमशः कला, विद्या, राग, काल और नियति इन पांच तत्त्वों के रूप में अवभासित कर लेती है । माया का आवरणात्मक प्रभाव, सर्वव्यापी होने के कारण, किसी भी पक्ष को अछूता नहीं रहने देता है क्योंकि उसी दशा में संसारभाव की चरितार्थता सिद्ध हो सकती है । प्राकृतिक प्रतिविधान के अनुकूल यही बात है कि अंशतः स्वतन्त्र पशु की शक्तियां भी अंशतः ही स्वतन्त्र अर्थात् दरिद्र होनी चाहिये । अस्तु, माया- तत्त्व सबसे पहले कलातत्त्व को जन्म देता है । यह २कलातत्त्व, मायीय प्रभाव से निःसंज्ञ जैसे बने हुए अणु में, संकुचित कर्तृत्त्वरूप चेतना का संचार करता है और उससे वह, जीवभाव के अनुकूल अत्यन्त सीमित रूप में, केवल सांसारिक आदान-प्रदान करने की क्षमता प्राप्त कर लेता है । इसको पारिभाषिक शब्दों में किञ्चित्कर्तृत्व कहते हैं । इसके अनन्तर विद्यातत्त्व का आविर्भाव हो जाता है । ३यह तत्त्व इसको (अणु को), बुद्धिदर्पण में प्रतिबिम्बित सुख-दुःख आदि प्रत्ययों अथवा हान-आदान इत्यादिरूप कर्मजाल की विवेचना करने का, सीमित सामर्थ्य प्रदान करता है। इसको शैवशब्दों में किञ्चित्-ज्ञत्व कहते हैं। ४शैवदार्शनिकों का विचार यह है कि बुद्धि स्वतः जड़ होने के कारण स्वयं सुख-दुःख आदि प्रत्ययों का विवेचन नहीं कर सकती है । फलतः यह विद्यातत्त्व ही है जिसके द्वारा, प्रत्येक जीव इन्द्रियों की सरणियों से बुद्धिदर्पण में प्रतिबिम्बित सुख-दुःख आदि विषयों की पारस्परिक भिन्नता का विश्लेषण कर

१. माया हि चिन्मयाद् भेदं शिवाद्द्विदधती पशोः । सुषुप्ततामिवाधत्ते तत एव हृद्दृक्क्रियः ॥ (तं०, ९.२७५) २. असूत सा कलातत्त्वं यद्योगादभवत् पुमान् । जातकर्तृत्वसामर्थ्यो .... .... .... .... ... ॥ (मा० वि०, १.२७) ३. विद्या विवेचयत्यस्य कर्म तत्कार्यकारणे । (मा० वि०, १.२८) ४. बुद्धि के विषय में शैवों और सांख्यों के दृष्टिकोण की भिन्नता समझने के लिए द्रष्टव्य तं० : ९.१११-९८ ७

९८ स्पन्दकारिका सकता है। विद्या के अनन्तर १राग-तत्त्व उद्भूत होकर, इसमें (पशु में) अपूर्णम्मन्यतारूप आसक्ति उत्पन्न कर देता है। पशु में आसक्ति के द्वारा ही, संसार के भोगों को भोगने के प्रति लगाव उत्पन्न हो जाता है। प्रत्येक जीव उन्हीं भोगों को भोगने की ओर आकृष्ट हो जाता है जो कि उसकी दृष्टि में, उसके लिये रुचिकर हों, चाहे अन्यथारूप में, वे कितने ही भद्दे और घिनोने ही क्यों न हों। राग-तत्त्व के सम्बन्ध में शैवशास्त्रियों ने यह विवेचन प्रस्तुत किया है कि संसार के सारे आदान-प्रदान, चाहे वे अविरोधी हों या विरोधी हों, रागमूलक ही हैं। यदि किसी को किसी के साथ २द्वेष है तो वह इस कारण से है कि उसको अपने आप के लिए इष्टप्राप्ति के प्रति राग है। यदि किसी के मन में संसार के पदार्थों के प्रति ३विरक्ति उत्पन्न हुई है वह इसलिए नहीं कि वह इनको हेय समझता है अपितु इसलिये कि उसको इनके जञ्जाल से छुटकारा पाने के प्रति आसक्ति है। फलतः संसार का समूचा आडम्बर केवल रागमूलक है। यह राग स्वतः प्रत्येक जीव में किसी न किसी प्रकार की अपूर्णता का द्योतक है। ४अपूर्णता की भावना ही प्रत्येक प्राणी को, उसकी दृष्टि में हेय या उपादेय कर्मों में से कइयों की ओर प्रवृत्त और कइयों से निवृत्त होने पर विवश करके, सामा- न्यतः—'मुझे कुछ चाहिये'—इस प्रकार की भावनारूप मृगतृष्णा से लिप्त बना देती है। राग-तत्त्व को पारिभाषिक शब्दों में 'अतृप्ति' भी कहते हैं। अस्तु, उपर्युक्त रागतत्त्व के द्वारा कर्तव्यों की हेयोपादेयता के निश्चय के साथ ही. काल-तत्त्व ५उद्भूत होकर, इस पशु को त्रुटि, क्षण, इत्यादिरूप कालभेद की परिधियों में फँसा लेता है। जीव, काल की तथाकथित परिधियों के संकोच में पड़ने के कारण ही, संसार के प्रत्येक कार्यकलाप के लिये निश्चित क्षणों या प्रहरों की कल्पनाओं में व्यस्त रहता है। उसकी प्रत्येक इतिकर्तव्यता पर—'इस समय केवल घट बनाना ही ठीक रहेगा, पट बनाने का सुयोग्य अवसर कल ही है; श्री गीता का पाठ करने के लिये प्रातःकाल का समय ही उपयुक्त है, मध्याह्न में ऐसा करने में अनिष्टापत्ति का भय है'—इसप्रकार की कालकलनाओं का रंग चढ़ा रहता है। यही कारण है कि कालतत्त्व को दूसरे शब्दों में 'अनित्यता' भी कहते हैं। पांचवां ६नियति तत्त्व पशु के वैचारिक क्षेत्र को, निश्चित ७कारणों से ही निश्चित कार्यों १. रागोऽपि रञ्जयत्येनं स्वभोगेष्वशुचिष्वपि । (मा० वि०, १.२८) २. एवं द्वेषोऽप्यस्यैव प्रसरः, तत्रापि अनिष्टप्रहाणादावभिष्वङ्गस्यैव संभवात् । (तं० वि, ९. २०१) ३. विरक्तावपि तृप्तस्य सूक्ष्मरागव्यवस्थितेः । (तं०, ९. २०१) ४. तस्माद्यत्र क्वचनोपादेये हेये वा—'किञ्चिन्मे भूयात्' इति सामान्येनाभिष्वङ्गमात्रं राग- तत्त्वम्' । (तं० वि, ९. २०१) ५. कालोऽपि कलयत्येनं त्रुट्यादिभिरवस्थितः ॥ (मा० वि, १.२९) ६. नियतिर्योजयत्येनं स्वके कर्मणि पुद्गलम् । (मा० वि०, १. २९) ७. नियतिर्हि—'अस्मादेव कारणादिदमेव कार्यं भवेत्' इति नियममादध्यात् । (तं० वि०, ९. २०२)

अजपा-गायत्री और विशेष स्पन्द ९९ की उत्पत्ति, मानने के नियमों में सीमित कर देता है। 'किसी १विशिष्ट कारण से कोई विशिष्ट कार्य होगा या अमुक विशिष्ट कार्य का अमुक विशिष्ट कारण था'—इस प्रकार के संकोचों में पड़ा हुआ जीव, प्रतिसमय, विशिष्ट कार्यों और कारणों को जन्मभर ढूँढ़ता हुआ ही काल-कवलित हो जाता है। जन्मभर स्वार्थ को ही सर्वोपरि मान्यता देकर, २नियत कारणों से नियत अर्थक्रिया की सिद्धि चाहता हुआ पशु, नियत वस्तुओं का ही उपादान करता रहता है और इतरों को छोड़ता रहता है। ऐसी भावनायें उसकी अव्यापकता को सूचित कर देती हैं। यही कारण है कि नियति को दूसरे शब्दों में 'अव्यापकता' भी कहते हैं। इस सम्बन्ध में निम्नलिखित तालिका को ध्यान में रखें— स्वातन्त्र्यशक्ति | मायातत्त्व | संकोचहीन शिव की अभिन्न स्वातन्त्र्य शक्ति के पांच मुख | संकुचित पशुभाव को जन्म देने वाली भेदपूर्ण माया के पांच मुख | | चित् — सर्वज्ञता | विद्या — अल्पज्ञता | | निर्वृति — सर्वकर्तृता | कला³ — अल्पकर्तृता | | इच्छा — पूर्णता | राग — अपूर्णता | | ज्ञान — नित्यता | काल — अनित्यता | | क्रिया — व्यापकता | नियति — अव्यापकता | मायातत्त्व और उसके विकासरूप उपरिलिखित पांच तत्त्वों को मिला कर शैव शब्दों में, षट्-कञ्चुक कहते हैं। यह मौलिक अन्तरंग ४आवरण है क्योंकि यह पूर्णसंवित् को आच्छा- दित करके, उसके साथ ऐसा चिपका रहता है कि चावल के दाने के साथ चिपके हुये ऊपरी छिलके की तरह ५व्यतिरिक्त होने पर भी अव्यतिरिक्त जैसा लगता है। इसके प्रतिकूल देह, प्राण, पुर्यष्टक, ज्ञानेन्द्रियां, कर्मेन्द्रियां इत्यादिकों को बहिरङ्ग आवरण कहा जाता है। इन ६वेद्यभूत आवरणों के द्वारा आच्छादित ज्ञान-क्रियारूप संवेदन अर्थात् चेतन-प्रमाता, मूलतः १. नियतिर्योजनां धत्ते विशिष्टे कार्यमण्डले । (तं०, ९. २०२) २. नियतामर्थक्रियामर्थयता नियतमेव वस्तु उपादातव्यम् । (तं० वि०, ९. २०२) ३. तालिका में कला को विद्या के पश्चात् लिखा गया है इससे पाठकों को किसी सैद्धान्तिक मतभेद की कल्पना नहीं करनी चाहिये। हो सके तो अधिक स्पष्टीकरण के लिए 'तन्त्रालोक' नवम आह्निक का अध्ययन करें। ४. मायासहितं कञ्चुकषट्कमणोरन्तरङ्गमिदमुक्तम् । (प० सा० १७) ५. तथा एतत् मायादिकञ्चुकम् अणोः तण्डुलस्थानीयस्य अन्तरङ्गत्वात् कम्बुकस्थानीयं व्यति- रिक्तमपि अव्यतिरिक्ततया पूर्णसंवित्स्वरूपम् आच्छाद्य स्थितम् । (प० सा० वि० १८) ६. देहपुर्यष्टकाद्येषु वेद्येषु किल वेदनम् । एतत्षट्कप्रपञ्चोऽयं प्रत्यपादि प्रसङ्गतः (तं० ९. २०५)

१०० स्पन्दकारिका वेदक होने पर भी, स्वरूप संकोच की दशा में (शक्तिदरिद्रता की दशा में) पड़ जाने के कारण अणु अर्थात् संसारी जीव बना हुआ है और इसको शास्त्रीय शब्दों में 'पुरुष-तत्त्व' कहा जाता है। इस प्रकार के विश्लेषण से प्रस्तुत सूत्र में उल्लिखित सिद्धान्त सरलता से समझ में आ सकता है कि बहिर्मुखीन संसारभाव की ओर अजस्ररूप में प्रवहमान, गुणादि-स्पन्दों के निष्पन्द अथवा दूसरे शब्दों में अपनी ही शक्तियों की दरिद्रता, संसार के अपरिपक्व बुद्धि वाले व्यक्तियों को, अपनी वास्तविक स्थिति की अनुभूति प्राप्त करने में बाधा उपस्थित कर देती है। उपरिलिखित रागतत्त्व के विषय में और अधिक जानकारी प्राप्त करने के लिए जिज्ञासु पाठकों को निम्नलिखित बातें भी ध्यान में रखने का प्रयत्न करना चाहिये। यद्यपि ये बातें कुछ मात्रा तक अप्राकरणिक भी सिद्ध हो सकती हैं परन्तु आत्म-अन्वेषण के मार्ग में प्राकरणिकता या अप्राकरणिकता की सीमाओं का वशवर्ती बनना भी ठीक नहीं है। शैवदार्शनिकों का विचार है कि पूर्वोक्त आणवमल ही राग का मूल उद्गमस्थान है। संवित्-भट्टारिका में भी, विश्वरूप में उच्छलित होने का आन्तर-अभिलाष वर्तमान है। यह बात अलग है कि उस अवर्ण्य स्तर पर वर्तमान अभिलाषा को क्षुद्र पशुओं में वर्तमान क्षुद्र अभिलाषा की संज्ञा नहीं दी जा सकती है परन्तु अभिलाषा तो अभिलाषा ही है क्योंकि उसी ने सर्वस्वतन्त्र संवित् को पृथिवीतत्त्व तक की निकृष्ट कोटि पर अवरूढ़ होने के लिये विवश किया है। संसार-भाव के स्तर पर अवस्थित पशुओं में भी यही आणवमल पहले सूक्ष्मातिसूक्ष्म १लोलिका के रूप में प्रकट हो जाता है। शैवग्रन्थों में 'लोलिका' अभिलाषा के उस सूक्ष्माति- सूक्ष्म रूप को कहते हैं जिसमें अभिलषणीय विषय की स्पष्टता तो नहीं होती है परन्तु मन में अपूर्णता की अनुभूति से जन्य सिहरन जैसी होती है। यह एक प्रकार की निष्कर्म अभिलाषा है और पशु के मन में—'मुझे कुछ चाहिये' इस प्रकार की जैसी अस्पष्ट आकांक्षा की अनुभूति को जन्म देती है। यह लोलिका ही परिपुष्ट होकर और चतुर्दिक क्षोभ में पड़कर, कर्मसहित स्थूल अभिलाषा का रूप धारण कर लेती है और इस रूप में इसको बुद्धि का धर्म बना हुआ 'राग-तत्त्व' कहते हैं ॥२०॥ [ निरन्तर प्रयत्न की अनिवार्यता ] परमकारुणिक गुरु अगले सूत्र में यह परामर्श देते हैं कि आत्मा का उद्धार चाहने वाले व्यक्तियों को अपने आप ही स्पन्दशक्ति की अनुभूति प्राप्त करने के लिए लगातार प्रयत्न- शील बनना चाहिये। निरन्तर उद्योग करने से इच्छापूर्ति होने में अधिक समय नहीं लगता है:— १. अणूनां लोलिका नाम निष्कर्मा याभिलाषिता अपूर्णम्मन्यताज्ञानं मलं सावच्छिदोज्झिता ।। (तं०, ९.६२)

सूत्र—इस पूर्वोक्त कारण को दृष्टिपथ में रखकर, जो कोई (प्रबुद्ध भूमिका पर अव-

निरन्तर प्रयत्न की अनिवार्यता १०१ अतः सततमुद्युक्तः स्पन्दतत्त्वविविक्तये। जाग्रदेव निजं भावं न चिरेणाधिगच्छति ॥२१॥ अतः सततं सर्वकालं यः करोत्युद्योगं स्पन्दतत्त्वस्य स्वरूपाभिव्यक्त्यर्थं, स जाग्रदवस्थायामेव निजमात्मीयं तुर्यभोगाख्यं स्वभावम् अचिरेणैव कालेन प्राप्नोति ॥२१॥ अनुवाद सूत्र—इस पूर्वोक्त कारण को दृष्टिपथ में रखकर, जो कोई (प्रबुद्ध भूमिका पर अव- स्थित योगी), अपने आप में स्पन्द-तत्त्व को अभिव्यक्ति के लिये, प्रतिसमय अथक प्रयत्न करता रहता है, उसको जाग्रत्-अवस्था में ही अपने चिन्मात्र भाव की उपलब्धि, अति अल्प समय में हो जाती है ॥२१॥ वृत्ति—अतः जो कोई (प्रबुद्ध योगी) अपने में, स्पन्दतत्त्व के स्वरूप की अनुभूति प्राप्त करने के लिये, प्रतिसमय उद्योग करता रहता है, वह जाग्रत्-अवस्था में ही, अपने भाव अर्थात् तुर्यचमत्कारमय स्पन्द-तत्त्व की अनुभूति, अति अल्प समय में प्राप्त कर लेता है ॥२१॥ विवरण प्रस्तुत सूत्र में उन व्यक्तियों को प्रतिसमय प्रयत्नशील रहने का उपदेश दिया गया है जो स्पन्दात्मक परसंवित्-धाम में प्रवेश पाने के इच्छुक हों। इस सम्बन्ध में मन में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक ही है कि प्रयत्न किस बात का करना है ? भगवान् चन्द्रमौलि ने— 'प्रयत्नः साधकः' (शिवसूत्र, २.२) इस सूत्र में, दो ही शब्दों में, शङ्कानिवारण किया है। शास्त्रकारों ने बहुत विस्तार से भगवान् के इस सूत्र में अन्तर्निहित अभिप्राय का विश्लेषण किया है। संक्षेप में उसका अभिप्राय इस प्रकार है:— बहिर्मुखीन विश्वप्रसार की ओर लगातार गुणादि रूपों में प्रवाहमान स्पन्द-प्रवाहों का रूप चित्त है। पाञ्चभौतिक काया में रहते रहते केवल १चित्त के द्वारा ही परतत्त्व का अनुसन्धान किया जाता है ! अतः मननधर्मा होने के कारण वास्तव में चित्त को ही मन्त्र की संज्ञा दी गई है। त्रिगुणमय होने के कारण चित्त में प्रतिसमय संकल्प-विकल्प उठते और बैठते ही रहते हैं। इसी संकल्प-विकल्पात्मक चित्त को धीरे धीरे आन्तरिक अनुसन्धान अर्थात् सद्विमर्श के बल से सामान्य-स्पन्दरूप पर-प्रतिभा अर्थात् विकल्पहीन परसंवित्-धाम में निलीन करने के अकृत्रिम प्रयास को पारिभाषिक शब्दों मे 'प्रयत्न' कहते हैं। भगवान् ने सूत्र में ऐसे ही प्रयत्न को करते रहने का आदेश दिया गया है क्योंकि यही अन्ततोगत्वा, योगी के हृदय में शाक्तस्वरूप की अभिव्यक्ति कर देता है। सहज प्रयत्न के द्वारा पूर्ण अहंद्रूप आत्म-अनुभूति १. 'चित्तं मन्त्रः' चेत्यते विमृश्यते अनेन परम् तत्त्वम् इति चित्तम्••••तदेव मन्त्र्यते गुप्तम् अन्तरभेदेन विमृश्यते परमेश्वररूपम् अनेन इति कृत्वा मन्त्रः ॥ (शिवसूत्र वि०, २.१)

१०२ स्पन्दकारिका CC-0.In Public Domain. Digitization by eGangotri प्राप्त करने को ही शास्त्रीय शब्दों में मन्त्रवीर्य की अनुभूति प्राप्त करना कहते हैं क्योंकि पूर्ण-अहंभाव की अनुभूति ही सर्वोत्कृष्ट वीर्य है । आध्यात्मिक मार्ग पर आगे बढ़ने के लिए अपेक्षित प्रयत्न या उद्योग का स्वरूप समझने के साथ ही, मन में, इसे प्रयत्न की क्रियान्वित करने की प्रक्रिया का ज्ञान प्राप्त करने की इच्छा का उत्पन्न होना भी स्वाभाविक ही है । शास्त्रकारों ने शाक्तभूमिका की अनुभूति प्राप्त करने के लिए अनेक प्रकार की प्रक्रियाओं का लेखा-जोखा प्रस्तुत किया है परन्तु भगवान् अभिनवगुप्त ने इस विषय में, 'विकल्पसंस्कार'¹ की प्रक्रिया को ही सर्वप्रथम मान्यता प्रदान की है । आत्मिक उन्नति के मार्ग में 'विकल्प-संस्कार' अर्थात् अपनी भावनाओं का परिष्कार करना ही प्रयत्न की मुख्य प्रक्रिया है और कम से कम, आधुनिक युग की शतशः उलझनों से भरे हुये व्यस्त जीवन में इसी का कार्यान्वयन भी संभव हो सकता है । आध्यात्मिक पक्ष में ही नहीं, अपितु साधारण जीवनपक्ष में भी इस प्रक्रिया को अपनाने से प्रत्येक मानव का और उसके द्वारा सारे जगत् का श्रेय हो सकता है । विकल्पों का संस्कार किस प्रकार हो सकता है—इस विषय में गुरुओं का कथन है कि बार बार कामिनी-कांचनरूप प्रतिकूल दिशा में प्रवहमान विकल्पों की परम्परा का मार्ग बदलकर, बलपूर्वक, स्वरूप-चिन्तन की अनुकूल दिशा में लगाने से स्वयं ही विकल्पों का संस्कार हो जाता है । पहले इस बात का उल्लेख हो चुका है कि गुणादि-स्पन्दों के निःष्यन्द प्रतिक्षण आत्मा के वास्तविक रूप पर आवरण डालते रहते हैं । यही कारण है कि मानसिक विकल्प प्रतिक्षण मायीय एवं निहित स्वार्थों की पूर्ति करने पर ही कटिबद्ध रहते हैं । बुरे विकल्पों के संस्कार और भी शतगुण बुरे ही विकल्पों की परम्पराओं को जन्म देते हैं । फलतः सांसारिक विषयोपभोगों की श्रृंखलायें इस प्रकार उलझ जाती है कि जन्म-जन्मान्तरों तक चित्त की स्थिरता प्राप्त करना स्वप्न बन जाता है । अतः प्रबुद्ध व्यक्तियों को खाते, पीते, सोते, जागते अर्थात् जीवन का प्रत्येक कार्य-कलाप करते करते ही इन्द्रियों की सरणियों से बाहरी हेय-विषयों की ओर दौड़ने वाली विकल्प-परम्पराओं को, अलंग्रास की युक्ति से ग्रस्त करके, अर्थात् सत्-विमर्श के बल से बाह्य-विषयों से निवृत्त करके, हृदय में अर्थात् चित्प्रकाशमय संवित्-धाम में, एकाग्रभाव से लगाने का निरन्तर प्रयत्न करते रहना चाहिये । ऐसा करने से मन में संस्कृत (परिष्कृत) विकल्प ही उठने लगते हैं, संस्कृत विकल्पों के संस्कार शतगुण संस्कृत विकल्पों को ही ²जन्म देते रहते हैं और असत् विकल्प स्वयं ही क्षीण होते रहते हैं । सावधान रहकर लगातार अभ्यास करते रहने से विकल्प संस्कृत होकर संस्कार की पूर्ण परिणति की अवस्था पर पहुँच जाते हैं । पूर्ण-संस्कृत विकल्प का शास्त्रीय नाम 'स्फुटतम १. ..............................स्वभावे पारमेश्वरे । प्रविविक्षुर्विकल्पस्य कुर्यात् संस्कारमञ्जसा ॥ (तं०, ४.३) २. विकल्पः संस्कृतः सूते विकल्पं स्वात्मसंस्कृतम् । स्वतुल्यं सोऽपि सौन्दर्य्यात्सौन्दर्यं सदृशात्मकम् । (तं०, ४.२)

निरन्तर प्रयत्न की अनिवार्यता १०३ CC-0.In Public Domain. Digitization by eGangotri विकल्प' है । पूर्णसंस्कार की अवस्था में पहुँचने से पहले विकल्प को १'अस्फुट, स्फुटता के उन्मुख, स्फुट होता हुआ और पूर्णप्रस्फुटित' इन चार अवस्थाओं में से गुजरना पड़ता है । अन्तिम अवस्था पूर्णविकास की अवस्था है । यहाँ तक पहुँचते पहुँचते असत्-विकल्पों के संस्कार भी नष्ट हुये होते हैं । फलतः संवित् स्वयं ही २निर्मल पारमार्थिक विकल्प के रूप में निखर उठती है । संस्कृत विकल्पों के संस्कारों के द्वारा आगे आगे जो दूसरे संस्कृत विकल्प उद्भूत होते रहते हैं वे शुद्धविद्या के ही ३अंश होते हैं । दूसरे शब्दों में इनको सद्-ज्ञान या सत्- तर्क४ के विकल्प भी कहते हैं । सत्-तर्क ही तो योग का उत्तम अंग माना गया है क्योंकि इसके द्वारा शनैः शनैः, चित्त पर जमी हुई तामसिक या राजसिक काई हट जाती है और विकल्प का वह अनुपम रूप विकसित हो जाता है जोकि संसारिता का कारण बने हुये असत्-तर्क का सशक्त ५प्रतिद्वन्द्वी बनकर, उसको मटियामेट कर देता है । यद्यपि विकल्प संस्कार की प्रक्रिया के द्वारा संस्कृत हो जाने पर विकल्प का पारमा- र्थिक रूप उदित हो जाता है तथापि इतने से ही उपर्युक्त प्रयत्न की इतिश्री नहीं हो जाती है । विकल्प अन्ततः विकल्प ही है चाहे वह सत्-विकल्प (पारमार्थिक विकल्प) हो या असत् विकल्प (सांसारिक विकल्प) हो । जब तक मन में किसी भी प्रकार का विकल्प विद्यमान हो तब तक विशुद्ध चिन्मात्ररूप शिवभाव की अखण्ड अनुभूति प्राप्त होना या स्वशक्तिविरोध के भूत से पिंड छूटना दुर्लभ ही है । अतः सिद्ध गुरुओं ने श्रेयस्काम शिष्यों को बार बार सचेत किया है कि मन में पारमार्थिक विकल्पों का उदय हो जाने पर भी विवेकी व्यक्तियों को ६इतराना नहीं चाहिये अपितु संस्कार-प्रक्रिया के द्वारा उनका भी तब तक संस्कार करते रहना चाहिये जब तक विशेषस्पन्द रूप चित्त, सामान्य स्पन्दरूप अभेद-भूमिका में पूर्णतया विश्रान्त होकर, विकल्पहीन संवित्-स्वभाव में ही विलीन हो जाये । ऐसे ही निर्मल ७चित्त के साथ शाक्त उपाय के आधारभूत मन्त्रगण का विमर्शात्मक १. चतुःष्वेव विकल्पेषु यः संस्कारः क्रमादसौ । अस्फुटः स्फुटताभावी प्रस्फुटत् स्फुटितात्मकः ।। (तत्रैव, ३.४) २. ततः स्फुटतमोदारताद्रूप्यपरिवृंहिता । संविदभ्येति विमलामविकल्पस्वरूपताम् ।। (तत्रैव, ३.६) ३. इत्थं विचित्रैः शुद्धविद्यांशरूपैः विकल्पैः...................। (तं० सा०, पृष्ठ २७) ४. न च. अत्र सत्तर्कात् शुद्धविद्याप्रकाशरूपात् ऋते अन्यत् योगाङ्गं साक्षात् उपायः । (तत्रैव, पृष्ठ २३) ५. अतः प्रतिद्वन्द्विरूपो विकल्प उदितः संसारहेतुं विकल्पं दलयति इति अभ्युदयहेतुः । (तं० सा०, पृष्ठ २१) ६. परमार्थविकल्पेऽपि नावसीयेत पण्डितः । को हि भेदो विकल्पस्य शुभे वाप्यथवाऽशुभे ।। (तं०, ४. ६ में उदाहृत) ७. अथ च मन्त्रदेवताविमर्शपरत्वेन प्राप्ततत्सामरस्यम् आराधकचित्तमेव मन्त्रः । (शिवसूत्रवि०, २ १). Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal

१०४ स्पन्दकारिका तादात्म्य हो जाने पर चित्त, मंत्र और मंत्र-देवता तीनों एकाकार बन जाते हैं। अतः योगी के निर्मल चित्त को ही मन्त्र की संज्ञा दी गई हैं। कहने का अभिप्राय यह कि ऐसी स्थिति में सारे वर्णात्मक मन्त्र भी निर्विकल्प अहंरूप में ही विश्रान्त हो जाते हैं और तब जाकर उनमें स्पन्दात्मक १शाक्त बल का संचार हो जाता है। यदि मन्त्र एवं चित्त की अहंरूप एकाकारता न हो जाये तो चाहे कितने ही मन्त्रों का उच्चारण क्यों न किया जाये, वह केवल वर्णमात्र का उच्चारण होगा और उससे कोई भी अभीष्ट सिद्ध नहीं होगा। आगे सूत्राङ्क २६ के विवरण में इस विषय पर सविस्तार चर्चा होगी। प्रस्तुत सन्दर्भ में अभी यह शङ्का विद्यमान है कि इस पूर्वोक्त विकल्पसंस्कार की दिशा में आगे बढ़ने की क्षमता कैसे प्राप्त हो सकती है ? इस विषय में भी भगवान् आशुतोष ने स्वयं यह आदेश दिया है—'गुरुपायः' ( शिवसूत्र; २. ६ ), अर्थात् ऐसी क्षमता तो केवल सद्गुरु की कृपा से ही प्राप्त हो सकती है। सद्गुरु के उपदेशमात्र से ही शिष्य के मन में विद्यमान कुंठायें दूर हो जाती हैं और वह अभ्यासक्रम का रहस्य अवगत करने में समर्थ हो जाता है। श्री गीता में भगवान् ने स्वयं उद्घोषणा की है : 'मय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते । श्रद्धया परयोपेतास्ते मे युक्ततमा मताः ।।' 'अप्यावेशयितुं चित्तं न शक्नोषि मयि स्थिरम् । अभ्यासयोगेन ततो मामिच्छाप्तुं धनञ्जय ! ।।' २१।। [ जाग्रत् में स्पन्दतत्त्व की अनुभूति ] सतत प्रयत्नशील प्रबुद्ध व्यक्तियों को, सत्-गुरु, जाग्रत् अवस्था में भी कई निश्चित अवसरों पर स्पन्दशक्ति की अनुभूति करवा लेते हैं। तदनन्तर वे स्वयं बार बार उस अनुभूति को ग्रहण करने का भगीरथ प्रयत्न करके, अन्ततोगत्वा, उस पर स्थिरता प्राप्त कर लेते हैं। अगले सूत्र में जाग्रत्-अवस्था के उन्हीं निश्चित अवसरों का वर्णन किया जा रहा है। विवेकी व्यक्तियों को उन अवसरों पर सावधान रहने से, सहज ही में, स्पन्दतत्त्व की उपलब्धि होती है :— अतिक्रुद्धः प्रहृष्टो वा किं करोमीति वा मृशन् । धावन् वा यत्पदं गच्छेत्तत्र स्पन्दः प्रतिष्ठितः ।। २२ ।। तस्य च स्पन्दतत्त्वस्य अतिक्रुद्धे प्रहृष्टे धावमाने च किं करोमि, इत्येवं चिन्ताविष्टे यदा शक्तिप्रत्यस्तमयः, तदा स्पन्दतत्त्वस्य स्फुट एवोदयो गुरुपदेशात् [ अधिगन्तव्यः ।। २२ ।। १. मन्त्राणां जीवभूता तु या स्मृता शक्तिरन्वया । तया हीना वरारोहे ! निष्फलाः शरदभ्रवत् ।। ( तन्त्रसद्भाव में, से. वि. १. ४८ में उदाहृत )

सूत्र—सहसा क्रोध की चरम सीमा पर पहुँचा हुआ अथवा हर्ष की पराकाष्ठा पर

जाग्रत् में स्पन्दतत्त्व का अनुभूति १०५ अनुवाद सूत्र—सहसा क्रोध की चरम सीमा पर पहुँचा हुआ अथवा हर्ष की पराकाष्ठा पर पहुँचा हुआ अथवा ( किसी अतर्कित कारण से )—'मैं क्या करूँ ?' इस प्रकार की किंकर्तव्य- विमूढ़ता की अवस्था में पड़ा हुआ अथवा अकस्मात् दौड़ पड़ने के लिए विवश बना हुआ व्यक्ति, जिस अवस्था में प्रविष्ट हो जाता है, उसी में प्रतिष्ठित स्पन्दतत्त्व की उपलब्धि हो जाती है ॥ २२ ॥ वृत्ति—अत्यन्त क्रोधी होने, हर्ष में पड़ने, अकस्मात् दौड़ पड़ने और (किसी समय अकस्मात्)—'मैं क्या करू ?' इस प्रकार की चिन्ता में पड़ जाने पर, जब किसी व्यक्ति के अन्तस् में शक्तिप्रत्यस्तमित दशा का उदय हो जाता है, तब (उस क्षणिक अवधान में) स्पन्द-तत्त्व का स्पष्ट-रूप में उदय हो जाता है। उसकी अनुभूति गुरु के उपदेश से प्राप्त कर लेनी चाहिये ॥२२॥ विवरण प्रस्तुत सूत्र में अन्तर्निहित ध्वनि को अच्छी प्रकार हृदयङ्गम करने के लिये, सूत्र की वृत्ति में प्रयुक्त 'शक्तिप्रत्यस्तमितदशा' शब्द का तात्पर्य समझना अत्यावश्यक है। जीवभाव के साथ सम्बन्ध रखने वाले दैनिक आदान-प्रदान में, कभी कभी ऐसे भी क्षण आते हैं कि उन मनोभावों के रूप में बाहर की ओर प्रवहमानविशेष स्पन्दों के प्रवाहों में, सहसा किसी अतर्कित कारण से, पलभर के लिए गतिनिरोध की अवस्था उभर आती है। विशेष रूप में प्रवहमान शक्ति की इस गतिनिरोधात्मक अवस्था को 'शक्तिप्रत्यस्तमितदशा', 'वृत्तिक्षयदशा', 'निस्ति- मितबुद्धिदशा' इत्यादि शास्त्रीय शब्दों के द्वारा अभिहित किया जाता है। इस सम्बन्ध में यह बात विशेषरूप में स्मरणीय है कि शक्तिप्रत्यस्तमितदशा के क्षणों पर शक्ति की प्रवहमानता कदापि रुकती तो नहीं है अपितु होता यह है कि इसकी बहिर्मुखीन प्रवहमानता सहसा दिशा बदलकर क्षणभर के लिए अन्तर्मुखीन हो जाती है और इतने ही स्थूल बुद्धि के द्वारा अग्राह्य, कालखण्ड में विद्युत् की तरह अत्यन्त तीव्र गति से, मौलिक सामान्यरूपता के साथ एकाकार होकर फिर विशेष रूप में प्रवाहित होने लगती है। कहने का तात्पर्य यह कि शाक्त-स्फुरणा किसी भी रूप में रुकती नहीं है क्योंकि स्फुरणा एक अविराम गतिशीलता है। जाग्रत्-अवस्था में सामान्य-स्पन्दतत्त्व का अनुभव ऐसे ही 'शक्तिप्रत्यस्तमित' क्षणों पर हो सकता है क्योंकि इन क्षणों पर विशेष-स्पन्दों का क्षोभ पूर्णतया शान्त हुआ होता है। वस्तुस्थिति इस प्रकार है कि जब किसी व्यक्ति के मन में क्रोध, हर्ष, भय या अन्य कोई मनोभाव, अपने अनुकूल १आलम्बन के साथ सामना होने की दशा में, अकस्मात् अतिस्वनिक १. प्रत्येक मनोभाव का अपना कोई निश्चित आलम्बन अर्थात् आश्रय होता है। विविध प्रकार के आलम्बनों के अवलम्बन से विविध प्रकार के मनोभाव उभर आते हैं। उदाहरण के तौर पर अकस्मात् प्राणघातक शत्रु को देखकर क्रोध, प्राणों से भी प्रिय इष्टजन को चिरकाल के अनन्तर देखकर हर्ष, अपने स्वामी की कठोर एवं जोखिम भरी आज्ञा को

१०६ स्पन्दकारिका वेग से उभर आता है तब उसके मन पर इसकी एक विलक्षण प्रतिक्रिया हो जाती है । वह यह कि जितनी अलक्ष्य तीव्रता से उभर आनेवाला भाव उभर आता है, उतनी ही तीव्रगति से उसका पूर्ववर्ती मनोभाव डूब जाता है । इन दोनों मनोभावों के ऐसे अप्रत्याशित अन्त एवं आरम्भ के बीचवाले संधिक्षण में सारी विशेषरूप मानसिक वृत्तियों की बहिर्मुखीन गति स्तब्ध हो जाती है । दूसरे शब्दों में यह क्षण एक प्रकार का निर्विकल्प क्षण जैसा होता है और इसमें बिजली की तीव्रतम कौंध की तरह, अलक्षित रूप में, विगलित-वेद्यान्तरता अपनी झलक दिखाकर फिर शान्त हो जाती है । सुखिता, दुःखिता या मूढ़ता इत्यादि अन्तःकरणवृत्तियों की चेतना का नाममात्र भी अवशिष्ट नहीं रहता है और फलस्वरूप इस क्षण में केवल सामान्य स्पन्द-तत्त्व की प्रकाशमानता ही अवशिष्ट रह जाती है । प्रत्येक जीव की मानसिक प्रक्रिया में, प्रतिसमय न जाने कितने ऐसे शक्तिप्रत्यस्तमित दशा के क्षण आते-जाते रहते हैं क्योंकि प्रतिक्षण मनोभावों की उन्मज्जन और निमज्जन की क्रिया अविराम गति से चलती रहती है । कठिनता तो यह है कि मनोभावों का उन्मज्जन और निमज्जन इतना तीव्र होता है कि साधारण रूप में किसी मनुष्य को भी—मानवेतर प्राणियों की तो बात ही नहीं—इस बीच वाले सन्धिक्षण का आभास भी नहीं मिलता है । इसका कारण यह कि यह क्षण अत्यन्त सूक्ष्म होने के कारण स्थूल-बुद्धि के द्वारा ग्राह्य नहीं है । जिन भाग्यशाली व्यक्तियों पर परमेश्वर का तीव्रतम शक्तिपात हो उनको सद्गुरु लोकोत्तर प्रातिभ-ज्ञान के द्वारा, इन अन्तरालवर्ती सन्धिक्षणों और इनमें प्रकाशमान रहने वाले स्पन्दतत्त्व की अनुभूति करवा लेते हैं । अनन्तर वे अभ्यास की दृढ़ता से, ऐसे ही क्षणों पर, अपनी बहिर्मुखीन शक्ति को कूर्मांग-२संकोच की युक्ति से एकदम समेट कर, अन्तर्मुख हो जाते हैं और धीरे धीरे इस भाव पर स्थिर रहने की क्षमता भी प्राप्त कर लेते हैं । प्रस्तुत सूत्र में हर्ष, क्रोध और मूढ़ता इनसे क्रमशः सारी सुखात्मक, दुःखात्मक और मोहात्मक अन्तःकरणवृत्तियों का ग्रहण करके, सारी ज्ञानेन्द्रियों की व्यापाररूपा जाग्रत्-अवस्था सुनकर किंकर्तव्यविमूढ़ता अथवा जंगल के सुनसान मार्ग में चलते समय अचानक सामने आते हुये शेर या फनियाले को देख कर भय का भाव उभर आता है । इसी प्रकार अन्य मनोभावों के विषय में समझना चाहिये । १. क्षुताद्यन्ते भये शोके गह्वरे वा रणद्रुते । कुतूहले क्षुधाद्यन्ते ब्रह्मसत्तामयी दशा ॥ (वि० भै०, ११९) इस विषय में वि० भै० ७१-१०१ और शि० दृ० १.९-११ भी द्रष्टव्य हैं । २. जिस प्रकार कछुआ भय की खनक पाते ही, पलक भर में, अपने सारे अंगों को अपनी ही पीठ पर वर्तमान कटाह के नीचे समेट लेता है । 'प्रसृताया अपि वा कूर्माङ्गसंकोचवत् त्राससमये हृत्प्रवेशवच्च सर्वतो निवर्तनम्' । (मा० वि० वा० १८)

सूत्र—(साधारण जीवभाव के स्तर पर, जिस प्रकार किसी महान् गौरवशाली और

चित्त की एकाग्रता—सोम-सूर्य १०७ में और दौड़ने की क्रिया के द्वारा सारी बहिरंग कर्मेन्द्रियवृत्तियों का ग्रहण करके कर्मे- न्द्रियों की व्यापकरूपा जाग्रत्-अवस्था में, समान रूप से स्पन्द-तत्त्व की उपलब्धि की ओर संकेत किया गया है ॥२२॥ [ चित्त की एकाग्रता—सोम-सूर्य ] यहाँ तक के प्रकरण में जिस प्रकार का वर्णन किया गया है उस प्रकार की अनुभूति प्राप्त करवाने में, शिष्य पर सद्गुरु की छत्रच्छाया का होना अनिवार्य है । परन्तु जिस समय कोई साधक स्पन्दात्मक शाक्तभूमिका में वास्तविक प्रवेश कर लेता है उस समय से सत्-गुरु का साथ भी छूट जाता है । इसका कारण यह कि तुर्यधाम में प्रविष्ट होने के समय तक विकल्पों का इतना संस्करण हुआ होता है कि गुरुभाव और शिष्यभाव का विकल्प भी समाप्त हुआ होता है । फलतः यहाँ से आगे का क्षेत्र पार करने में, साधक की, अपनी उद्-बुद्ध शक्ति ही पथप्रदर्शिका बन जाती है । अगले तीन¹ सूत्रों में, ऐसे ही, शाक्त-भूमिका में प्रविष्ट होने के बिल्कुल अभिमुख योगी की, मानसिक संकल्प-बद्धता, यौगिक प्रक्रिया और सुषुम्नाधाम में अन्तिम लयीभवन का वर्णन किया जा रहा है— यामवस्थां समालम्ब्य यदयं मम वक्ष्यति । तदवश्यं करिष्येऽहमिति सङ्कल्प्य तिष्ठति ॥२३॥ तामाश्रित्योर्ध्वमार्गेण सोमसूर्यावुभावपि । सौषुम्नेऽध्वन्यस्तमितो हित्वा ब्रह्माण्डगोचरम् ॥२४॥ तदा तस्मिन् महाव्योम्नि प्रलीनशशिभास्करे । सौषुप्तपदवन्मूढः प्रबुद्धः स्यादनावृतः ॥२५॥ यां स्पन्दस्वरूपरूपामस्थामवलम्ब्य 'यत्किंचित् अयं मम वक्ष्यति, तत् अवश्यं करिष्यामि' इत्यध्यवसायेन स्पन्दतत्त्वमधिष्ठाय यो वर्तते ॥२३॥ तस्य, तामवस्थामाश्रित्य पुरुषस्य, सोमसूर्यो द्वावपि सौषुम्ने अध्वनि मध्यनाड्य- भिधाने, अस्तमयं कुरुतः, ब्रह्माण्डगोचरं शरीरमार्गं परित्यज्य योगिनः ॥२४॥ तस्मिन् महाव्योम्नि प्रत्यस्तमित-शशिभास्करे यस्य स्वस्वभावाभिव्यक्तिः न सम्यक् वृत्ता, स स्वप्नादिना मुह्यमानोऽप्रबुद्धो निरुद्धः स्यात्, प्रबुद्धः पुनरनावृत एव भवति ॥२५॥ अनुवाद—(सूत्र २३ दृष्टान्त के रूप में) सूत्र—(साधारण जीवभाव के स्तर पर, जिस प्रकार किसी महान् गौरवशाली और सहानुभूति से पूर्ण हृदय वाले स्वामी का परिचारक, उसकी कोई आवश्यक आज्ञा सुनने के पूर्ववर्ती क्षण में—) १. इन तीनों सूत्रों में से पहला सूत्र दृष्टान्त और दार्शनिक दोनों रूपों में प्रस्तुत हुआ है।

१०८ स्पन्दकारिका 'यह मेरा स्वामी जो कोई भी (साध्य या दुस्साध्य) कार्य करने की आज्ञा देगा, वह मैं अवश्य उसी यथावत् रूप में करके ही रहूँगा' इस प्रकार संकल्पबद्ध होकर, जिस प्रकार की मानसिक अवस्था (वृत्तिप्रत्यस्तमित-अवस्था) का आश्रय लेकर अवस्थित रहता है— (दार्ष्टान्तिक के रूप में) (उसी प्रकार साधना के क्षेत्र में कोई भी प्रबुद्ध-भूमिका पर अवस्थित साधक) 'यह स्पन्दात्मिका शक्ति मुझे जिस प्रकार की स्वरूपविमर्शात्मक अनुभूति करायेगी, मैं उस पर आरूढ होकर रहूँगा'—इस प्रकार संकल्पबद्ध होकर जिस प्रकार की मानसिक अवस्था (वृत्तित्रत्यस्तमित-अवस्था) का आश्रय लेकर अवस्थित रहता है ॥२३॥ उस योगी की उसी अवस्था का आश्रय लेकर, उसके चन्द्रमा और सूर्य (मनस् एवं प्राण अथवा प्राण एवं अपान) शरीर व्याप्ति को छोड़कर, ऊर्ध्व-मार्ग से सुषुम्नाधाम में पहुँचकर, उसी में लय हो जाते हैं ॥२४॥ जहाँ पहुँचकर चन्द्रमा और सूर्य दोनों ही लीन हो जाते हैं उस महान् आकाश में (तुर्यरूप शाक्तभूमिका के अनन्त आकाश में) प्रबुद्ध योगी की चिन्मात्ररूप अनुभूति पर कोई भी आवरण नहीं रहता है । इसके प्रतिकूल मूढ अर्थात् सम्यक्-अनुभूति से हीन योगी, उस अवस्था में भी, सुषुप्ति१-पद की जैसी प्रगाढ़ अन्धतमस् की दशा में अचेत पड़ा रहता है ॥२५॥ वृत्ति—(तुर्यरूप शाक्तभूमिका में प्रविष्ट होने के अभिमुखीभाव के अवसर पर) जो योगी—'यह मेरी स्वभावभूत स्पन्द-शक्ति 'मुझे जो कुछ भी कहेगी अर्थात् तुर्या भूमिका में प्रविष्ट होने के लिए जैसा भी पथप्रदर्शन करेगी, मैं अवश्य उसी का अनुसरण करूँगा' इस प्रकार का अटल संकल्प धारण करके, स्पन्दतत्त्व का स्वरूप ही बनी हुई अवस्था का आश्रय लेकर, स्पन्दतत्त्व पर अधिष्ठित होकर रहता है— उस योगी की उसी अवस्था के आधार पर, उसके चन्द्रमा और सूर्य दोनों, शरीर व्याप्ति को छोड़कर अर्थात् पाञ्चभौतिक काया में अपने बहिर्मुखोन प्रसार को छोड़कर, 'मध्य- नाड़ी' नामवाले सुषुम्नामार्ग में लय हो जाते हैं । जिसमें चन्द्रमा और सूर्य दोनों का अस्तमन हो जाता है उस महान् आकाश में अर्थात् विशुद्ध चिन्मात्ररूप तुर्या भूमिका के असीम आकाश में, ऐसा योगी जिसको पूर्णरूप से स्वभाव की अभिव्यक्ति न हुई हो, साधारण स्वप्न इत्यादि (लौकिक स्वप्न और सुषुप्ति) के द्वारा मूढभाव (तामसिक मोह) में डाला जाने के कारण, अप्रबुद्ध बनकर२ निरुद्ध अवस्था में पड़ा रहता है । इसके प्रतिकूल प्रबुद्ध योगी की आत्मचेतना निरावृत रूप में प्रकाशमान रहती है ॥२३-२५॥ १. यहाँ पर सुषुप्ति-पद से योगी की उस अवस्था का अभिप्राय है जिसमें उसको आत्म- साक्षात्कार हो जाने पर भी उसकी चेतना नहीं रहती है । २. चित्त की ऐसी अवस्था जिसमें वह अपनी मौलिक चितिरूपता का साक्षात्कार करने के क्षण पर मूढता (मोहग्रस्तता अथवा तमोऽभिभव) के कारण,

चित्तवृत्ति एकाग्रता—सोमसूर्य १०९ विवरण प्रस्तुत सूत्र (सूत्र २३) में विशेषस्पन्द कही जाने वाली बहिर्मुखीन चित्तवृत्तियों की निरोधात्मक प्रक्रिया का वर्णन किया गया है। बहिर्मुखीन चित्तवृत्तियों को, अलंग्रासयुक्ति के द्वारा दिशा बदलकर, अन्तर्मुखीन बनाना ही 'चित्तनिरोध' है और यही शाक्त-उपाय का आधार-स्तम्भ है। इस विषय में पहले भी पर्याप्त उल्लेख हो चुका है अतः उन बातों को फिर दोहराने की आवश्यकता नहीं है। यहां पर केवल इस बात को ध्यान में रखने की आवश्यकता है कि इस सूत्र में, एक कर्मचारी (जो अन्य सारे कर्त्तव्यों को भूलकर प्राणपन से अपने हितैषी स्वामी की आज्ञा को पूर्ण करने पर उद्यत हो) की क्षणपर्यवसायिनी वृत्तिप्रत्यस्तमितदशा के दृष्टान्त की पृष्ठभूमि पर, इस बात का स्पष्ट संकेत किया गया है कि, स्पन्दमयी शाक्तभूमिका में प्रवेश पाने के प्रति उत्सुक योगी को, पहले अपने में प्रखर मानसिक नियन्त्रण की क्षमता प्राप्त करना नितान्त आवश्यक है। इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिये संकल्प की दृढ़ता, सद्विचार, अटल श्रद्धा और आत्म-शक्ति की तीव्रता परम अपेक्षित अंग हैं। दृढ़संकल्प वाला योगी ही, स्वरूप-की उपलब्धि के लिए सांसारिक बाधाओं एवं तथाकथित विभीषिकाओं को अपनी शक्ति से परास्त कर सकता है, अन्यथा नहीं। भारतीय जनगण के मानविहारी भगवान् मुरलीमनोहर ने 'चित्तनिरोध' की क्षमता रखने वाले व्यक्ति को 'स्थित-प्रज्ञ' कहा है। भगवान् का कथन है कि स्थित-प्रज्ञ व्यक्ति सारी सांसारिक कामनाओं को भूलकर केवल अपने आप में रमणशील होकर रहते हैं। वे न तो किसी दुःख के आने पर उद्विग्न होते हैं और न सुखभोग की सरिता में ही बह जाते हैं। उन पर भगवान् का पूर्ण अनुग्रह होता है जिससे वे मायिय द्वन्द्वों के द्वारा प्रभावान्वित होने के बिना, अपने मार्ग पर आगे बढ़ते जाते हैं। सूत्र २४ में योग की प्रक्रिया के द्वारा मनस् एवं प्राण अथवा प्राण एवं अपान को सुषुम्ना- धाम के अन्तर्वर्ती चिदाकाश में लय करने का भाव अभिव्यक्त किया गया है। इस सम्बन्ध में सूत्र में उल्लिखित कई पारिभाषिक शब्दों पर यथासम्भव प्रकाश डालना आवश्यक है— सोमसूर्य—भट्टकल्लट ने अपनी वृत्ति में इन दो शब्दों को, व्याख्या करने के बिना, अस्पष्ट रूप में ही छोड़ रखा है। ऐसा प्रतीत होता है कि उन्होंने जान-बूझ कर ही ऐसा किया होगा। आगमशास्त्रों में भिन्न-भिन्न प्रकार की धारणाओं के आधार पर इस शब्द-युग्म के भिन्न भिन्न अर्थ लगाये हैं। कहीं इनसे प्रमेयपद और प्रमाणपद का, कहीं प्राण और अपान का अथवा कहीं शिवकला और जीवकला का अर्थ लिया गया है। शायद भट्टकल्लट ने भी इसीबात को दृष्टि में रखकर, इस शब्द-युग्म को किसी निश्चित अर्थ की परिधि में बांधने के बिना साधकों की रुचि पर ही छोड़ दिया है। आध्यात्मिक विषयों की चर्चा करते समय अत्यन्त सावधानी से काम लेना आवश्यक है अतः केवल इतना कहा जा सकता है कि प्रस्तुत सूत्र में पूर्व प्रकरण के आधार पर इन दो शब्दों से 'मनस् एवं प्राण ये ही दो अभिप्राय लेना युक्तिसंगत है। कारण यह कि पूर्ववर्ती १. चन्द्रसूर्यौ मनःप्राणौ द्वावपि। (स्प० का०, ७६ पृष्ठ)

११० स्पन्दकारिका सूत्रों में इस सिद्धान्त की स्थापना की गई है कि सामान्य स्पन्द-शक्ति एक ओर से ज्ञानरूपता के द्वारा गुणत्रय पर आधारित अन्तःकरण की वृत्तियों (जिनको साधारण रूप में मनस् या चित्त कहते हैं) और दूसरी ओर क्रियारूपता के द्वारा पाँच स्थूल प्राणों के रूप में, पाञ्चभौतिक काया में व्याप्त होकर रहती है । कहना न होगा कि अपान स्वयं भी पांच प्रकार के स्थूल प्राणों में ही अन्तर्भूत हो जाता है । फलतः योगी के लिए, प्राण के साथ मनस् का भी चिदाकाश में लयीकरण परम आवश्यक है । श्रीयुत क्षेमराज ने अपनी व्याख्या में इस शब्द-युग्म का अर्थ १ प्राण एवं अपान ही लगाया है । सुषुम्ना मार्ग—आगम शास्त्रों में सुषुम्ना नाडी का प्रधान नाम 'मध्यनाडी' रखा गया है । भट्टकल्लट ने भी अपनी वृत्ति में इसी नाम से इसका उल्लेख किया है । इसके अतिरिक्त इसको 'ब्रह्मनाडी' भी कहते हैं । इस नाडी को 'मध्य' कहे जाने के दो कारण हैं । एक यह कि मूलरूप में यह नाडी स्वतः संवित्-रूपा ही है और संवित् ही प्रत्येक जड़ अथवा चेतन पदार्थ का 'मध्य' अर्थात् २अन्तरतम जीवन है । प्रत्येक प्राणी के शरीर में यही नाडी जीवनी शक्ति का मूलस्रोत है । पहले भी कहा गया है कि संवित् भगवती ही अवरोहक्रम में सूक्ष्म ३प्राणना का रूप धारण करके, क्रमशः उत्तरोत्तर स्थूलता को प्राप्त होती हुई, समूचे अस्थिमेदोमय स्थूल शरीरका और उसमें फैली हुई असंख्य शिराओं के जाल का रूप धारण कर लेती है । ४स्वयं इन असंख्य नाडियों के जाल के ठीक मध्य में ब्रह्मरन्ध्र से लेकर मूलाधार तक प्रधान प्राणशक्ति- रूपा सुषुम्नानाडी के रूप से अवस्थित रहती है । शिराजाल के ठीक मध्य में इसका अवस्थित रहना ही दूसरा कारण है जिसके लिये इसको 'मध्य' की संज्ञा दी गयी है । शिराजाल के ५मध्य में यह ठीक उसीप्रकार ऊपर से नीचे तक अवस्थित रहती है जिस प्रकार पलाश के पत्ते के ठीक बीचोबीच एक प्रधान शिरा ऊपर से नीचे तक अवस्थित रहती है । मध्यनाडी के आकार-प्रकार के विषय में अनुभवी व्यक्तियों का कथन है कि यह नाडी ६मृणाल के तन्तु के समान अत्यन्त सूक्ष्म है । इसके अन्तराल में ७शून्य अवकाश की वर्तमानता है और उसी को सूत्रकार ने 'महान् व्योम' की संज्ञा के द्वारा अभिव्यक्त किया है । यह अन्त- १. चन्द्रसूर्यौ अपानः प्राणश्चोभावपि । (स्प० का०, ४२ पृष्ठ) २. सर्वान्तरतमत्वेन वर्तमानत्वात् ......... संविदेव भगवती मध्यम् । (प्र० हृ०, १७) ३. सा तु मायादशायां .... प्राणशक्तिभूमिं स्वीकृत्य, अवरोहक्रमेण बुद्धिदेहादिभुवम् अधिशयाना नाडीसहस्रसरणिम् अनुसृता । (प्र० हृ०, १७) ४. तत्रापि च पलाशपर्णमध्यशाखान्यायेन आब्रह्मरन्ध्राद् अधोवक्त्रपर्यन्तं प्राणशक्तिमध्यनाडी- रूपतया प्राधान्येन स्थिता । (तत्रैव) ५. मध्यनाडी मध्यसंस्था । (वि० भै०, ३५) ६. सूक्ष्मत्वात् मृणालसूत्रतुल्यरूपतया (प्र० हृ०, १७) मध्यनाड्या मन्तश्चिदात्मकं शून्यमेवास्ति । (तत्रैव)

प्रकाश डाला जा चुका है अतः यहाँ पर फिर से उन्हीं बातों को दोहराना पिष्टपेषण ही

CC-0.In विज्ञानानन्दी एकाग्रता Digitization eGangotri १११ रालवर्ती अवकाश अपरिमित चैतन्यरूप होने के कारण 'चिदाकाश' कहलाता है। इसी महान् व्योम से १प्राणशक्ति का निकास होता रहता है और प्राणशक्ति पर ही विश्व के सारे चेतन पदार्थों का जीवन निर्भर रहता है। फलतः मध्यनाडी ही शरीर की प्रधान नाडी है जहां से शरीर के रोम रोम को चेतना वितीर्ण होती है; २जहाँ से सारी मानसिक वृत्तियां उदित होती हैं और जिसमें अन्ततोगत्वा लय भी होती हैं। साधारण जीवभाव की अवस्था में किसी भी जीवधारी को इस नाडी की वर्तमानता अथवा इसकी मौलिक स्पन्दना का आभास नहीं मिल सकता है। केवल योगीजनो को ही प्राणाभ्यास की प्रक्रिया के द्वारा इसके महत्त्व की अनुभूति हो पाती है। ऊर्ध्वं मार्गं—साधारण रूप में इस शब्द का अर्थ उत्कृष्ट-मार्ग है और आगमशास्त्रों में उत्कृष्ट मार्ग से उदान वायु के मध्यनाडी रूप मार्ग का अभिप्राय लिया जाता है। साधारण जीवधारियों में, प्राण एवं अपान की प्रवहमानता का मार्ग, मध्यनाडी के बायें और दायें पाश्र्वों में अवस्थित दो अन्य नाडियां हैं। इस अवस्था में प्राणापान की प्रवहमानता के लिये सुषुम्ना का मार्ग बिल्कुल बन्द रहता है। योग की प्रक्रिया के द्वारा प्राण एवं अपान का छेदन करने से अर्थात् दोनों के बहिर्मुखीन संचार को रोक कर दोनों को हृत्-मंडल में ही अवस्थित करने से, ये उदानवायु का रूप धारण करके, सुषुम्नामार्ग अर्थात् ऊर्ध्वमार्ग से ३ऊर्ध्वसंचार करने लगते हैं। प्राणापान के ऊर्ध्वसंचार की अवस्था पर पहुँचे हुये योगी के अन्तस् में विद्यमान भेद-भावना स्वयं ही पिघल कर अभेद-भावना के रूप में उदित हो जाती है क्योंकि प्राणापान का ऊर्ध्व- संचार तुर्यरूप शाक्तभूमिका का समावेश हो जाने पर ही होने लगता है। सूत्र २५ में मूढ़ और प्रबुद्ध व्यक्तियों की समाधिकालीन अनुभूति के अन्तर को स्पष्ट किया गया है। इस सम्बन्ध में पहले ही सूत्र १२ से सूत्र २० तक के विवरणों में पर्याप्त प्रकाश डाला जा चुका है अतः यहाँ पर फिर से उन्हीं बातों को दोहराना पिष्टपेषण ही होगा ॥ २३, २४, २५ ॥ इति श्रीकल्लटाचार्यविरचितायां स्पन्दकारिकावृत्तौ 'स्वरूपस्पन्दः' नाम प्रथमो निःष्यन्दः ॥ १ ॥ श्रीकल्लटाचार्य के द्वारा विरचित स्पन्दकारिका वृत्ति का 'स्वरूपस्पन्द' नामक पहला निःष्यन्द समाप्त हुआ ॥ १ ॥ १. तस्मात् (शून्यात्) प्राणशक्तिर्निःसरति । (प्र० हृ०, १७) २. तत एव सर्ववृत्तीनामुदयात् तत्रैव च विश्रामात् । (प्र० हृ०, १७) ३. द्रष्टव्य—ईश्वरप्रत्यभिज्ञा (३.२.१९-२०) Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal

दूसरा निःष्यन्द 'सहजविद्योदय' नामक दूसरा निःष्यन्द यहाँ तक के प्रकरण में ग्रन्थकार ने अनेक युक्तियों और उपपत्तियों के द्वारा यह तथ्य निर्धारित किया कि विश्व के कण कण में चैतन्यमयी स्पन्दशक्ति सामान्यरूप में अनुस्यूत है। योगी लोग पूर्वोक्त विकल्पसंस्कार की प्रक्रिया के द्वारा अपने संवेदन को निर्मल बना कर, अपने ही हृदयमण्डल में इस शाक्त-भूमिका की अनुभूति प्राप्त करते हैं। फलस्वरूप वे पशुभाव की संकुचित सीमाओं को लांघ कर असीम विश्वात्मभाव में लय हो जाते हैं। अब प्रस्तुत प्रकरण के सूत्रों में आध्यात्मिक उपलब्धियों के आधार पर इस रहस्य का उद्घाटन किया जा रहा है कि विकल्प-संस्कार की प्रक्रिया का निरन्तर अभ्यास करने से प्रबुद्ध योगियों के हृदयों में 'सहजविद्या' का उदय हो जाता है। शुद्ध विकल्प अथवा अहंविमर्शात्मक स्वरूप की यथार्थ अनुभूति ही इस 'सहजविद्या' का स्वरूप होता है। निर्मल हृदय में शुद्धविद्या का प्रकाश फैल जाने से ही योगी को वास्तविक स्वरूप का परिचय प्राप्त होता है। उसको मन्त्रवीर्य का अनुभव हो जाता है ओर वह प्रबुद्ध अवस्था से निकल कर सुप्रबुद्ध अवस्था में प्रविष्ट हो जाता है। [ मन्त्र और मन्त्रवीर्य ] इस सम्बन्ध में अब सूत्रकार अगले दो सूत्रों में इस तथ्य का प्रतिपादन करते हैं कि सिद्ध योगियों की वाणी में ऐसे आत्मबल का संचार हो जाता है कि उनके द्वारा उच्चारे गये मन्त्र कागज के पत्रों पर लिखे हुए साधारण वर्णमात्र न रह कर अमोघ वीर्य बन जाते हैं। उनमें, योगी की रुचि के अनुसार भोगरूप या मोक्षरूप फलों को प्राप्त करवाने की क्षमता निश्चित बन जाती है :- तदाक्रम्य बलं मन्त्राः सर्वज्ञबलशालिनः । प्रवर्तन्तेऽधिकाराय करणानीव देहिनाम् ॥ २६ ॥ तत् बलं निरावरणचिद्रूपमधिष्ठाय, मन्त्राः सर्वज्ञत्वादिना बलेन श्लाघायुक्ताः प्रवर्तन्ते अनुग्रहादौ स्वाधिकारे। करणानि यथा देहिनाम्, नान्येन आकारादि- विशेषेण ॥ २६ ॥ तत्रैव संप्रलीयन्ते शान्तरूपा निरञ्जनाः । सहाराधकचित्तेन तेन ते शिवधर्मिणः ॥ २७ ॥ तत्रैव स्वस्वभावव्योम्नि निवृत्ताधिकाराः प्रलीयन्ते, शान्तरूपाः, मायाकालुष्य- रहिताः, सह साधकचित्तेन; अनेन कारणेन शिवसंयोजनास्वभावेन इति शिवात्मका उच्यन्ते ॥ २७ ॥

सूत्र—(दूसरी ओर) वे मन्त्र शान्तरूप अर्थात् शुद्ध संवित्-रूप और निरञ्जन अर्थात्

मन्त्र और मन्त्रवीर्य ११३ अनुवाद सूत्र—प्रत्येक प्रकार के मन्त्र उस स्पन्दरूप आत्मबल के साथ तादात्म्य प्राप्त करने से ही सर्वज्ञता इत्यादि (छः प्रकार के) माहेश्वर ¹बलों को प्राप्त करके शोभित होने लगते हैं। ऐसी परिस्थिति में वे (मन्त्र) किसी भी मनचाहे कार्य को अधिकार पूर्वक सिद्ध करने के लिये, उसी प्रकार, सहज ही में प्रवृत्त होते हैं जिस प्रकार शरीरधारियों की इन्द्रियां संकल्प- मात्र से ही अपने अपने कार्यों को सिद्ध कर देती हैं ॥ २६ ॥ वृत्ति—सारे मन्त्र उस आवरणहीन चिद्रूपता के साथ एकाकार होने से ही सर्वज्ञता इत्यादि माहेश्वर बलों को प्राप्त करके श्लाघ्य बन जाते हैं और शरीरधारियों की इन्द्रियों की तरह हो, अपने अनुग्रह इत्यादि अधिकारिता के कामों की ओर प्रवृत्त हो जाते हैं। (आत्मबल का स्पर्श प्राप्त करने के बिना) वे किसी दूसरे प्रकार के आकार विशेष अर्थात् अक्षरों और मात्राओं की (किसी पुस्तकादि में अंकित) विशेष रचनामात्र के द्वारा किसी भी कार्य को सिद्ध नहीं कर सकते हैं ॥ २६ ॥ सूत्र—(दूसरी ओर) वे मन्त्र शान्तरूप अर्थात् शुद्ध संवित्-रूप और निरञ्जन अर्थात् मायीय उपराग से रहित होकर, आराधना करने वाले के चित्त के साथ-साथ, चिदाकाश में ही लीन हो जाते हैं। इस कारण सारे मूलतः शिवधर्मा अर्थात् शिवरूप ही हैं ॥२७॥ वृत्ति—ये ही मन्त्र सांसारिक भोगसिद्धि से निवृत्त होकर और माया के उपराग से रहित होकर शान्तरूप बन जाने के कारण, साधक के चित्त के साथ ही उस स्वभाव अर्थात् विशुद्ध चिद्-रूपता या दूसरे शब्दों में सामान्य-स्पन्दात्मक शाक्तभूमिका के असीम अवकाश में लीन हो जाते हैं। वास्तव में प्रत्येक प्रकार के मन्त्र का पार्यन्तिक एवं अनौपचारिक स्वभाव यही है कि वह (पशुभाव में पड़ी हुई) आत्मा को शिवभाव के साथ एकाकार बना लेता है। इन कारणों से सारे मन्त्रों को शिवात्मक अर्थात् शिवरूप ही कहा जाता है ॥ २७ ॥ विवरण भोगरूप और मोक्षरूप फलों के आधार पर मन्त्र दो प्रकार के हैं—(१) साञ्जन, (२) निरञ्जन । मन्त्रशक्ति का साञ्जनरूप वह है जिसको सांसारिक भोगरूप फलों को प्राप्त करने के अभिप्राय से प्रयोग में लाया जाता है। कई साधक, अपने में मन्त्रवीर्य को विकसित करने के अनन्तर, उसके द्वारा दैनिक जीवव्यवहार के साथ सम्बन्ध रखने वाले कार्यों को सिद्ध करने लगते हैं। उदाहरणार्थ वे किसी पर अनुग्रह, किसी पर निग्रह, किसी का रोगनिवारण, किसी का मारण इत्यादि अवरकोटि के लक्ष्यों को पूरा करने में लग जाते हैं। ऐसे मन्त्र मायीय उपरागों के द्वारा ही रंजित होने के कारण 'साञ्जन-मन्त्र' कहलाते हैं। १. सर्वज्ञता, तृप्ति, अनादि-बोध, अप्रतिहत-स्वातन्त्र्य, शक्ति का निर्वाध प्रसार, विश्वरूप में विकसित अनन्त शक्तियों का ऐश्वर्य, ये छः प्रकार के माहेश्वर बल हैं। ८

सूत्रकार के इस उपरलिखित अभिप्राय को अच्छी प्रकार समझने के लिए मन्त्रशक्ति

११४ स्पन्दकारिका निरञ्जन मन्त्रशक्ति वह है जिसको केवल अपने आप में शिवत्व की अभिव्यक्ति के लिए ही प्रयोग में लाया जाता है। ऐसे मन्त्रों पर किसी भी प्रकार का मायीय रंग चढ़ा हुआ नहीं होता है अतः ये 'निरञ्जन-मन्त्र' कहलाते हैं। यह बात मन्त्रवीर्य के अनुभवी साधकों की रुचि पर निर्भर है कि क्या वे मन्त्रों का साञ्जन उपयोग करें या निरञ्जन ? प्रस्तुत दो सूत्रों में ऐसे लोगों का मुखमुद्रण करने का प्रयास किया गया है जिसके विचार में मन्त्रशक्ति की बातें एक 'ढकोसले' अथवा आज की शब्दावली में 'शोषण' के अति- रिक्त और कुछ नहीं है। सूत्रकार के विचारानुसार ऐसे लोग मन्त्र और मन्त्रवीर्य का वास्त- विक रूप समझने में गलती कर रहे हैं। साधारण रूप में 'मन्त्र' शब्द से पुस्तकों के पन्नों में अंकित अनेक प्रकार की १वर्णरचनाओं का अभिप्राय लिया जाता है परन्तु वह बिल्कुल गलत है क्योंकि उसमें कोई बल नहीं होता है। वास्तव में मन्त्र उच्चतर-भूमिका पर अवस्थित उस निर्मल एवं विकल्पहीन २संवेदन को कहते हैं जिसके द्वारा योगियों को अपनी भौतिक काया में ही छिपी हुई अमोघ और असीम आत्मशक्ति की अनुभूति हो जाती है। फलतः साधारण से साधारण मन्त्र का उच्चारण भी महान् प्रभावोत्पादक बन सकता है परन्तु यदि उसके साथ आत्मशक्ति का सहयोग हो, अन्यथा नहीं। सूत्रकार के इस उपरलिखित अभिप्राय को अच्छी प्रकार समझने के लिए मन्त्रशक्ति के साथ सम्बन्ध रखने वाली कई निम्नलिखित बातें ध्यान में रखना आवश्यक है। मन्त्र का स्वरूप — ३मन्त्र शब्द अवबोधनार्थक 'मनु' और पालनार्थक 'तृ' इन दो धातुओं के संयोग से बना हुआ है। इस आधार पर मन्त्र का सीधा सम्बन्ध कोरी लिपिबद्ध वर्णरचना से ऊपर उठ कर, आंतरिक संवेदन के साथ जुड़ जाता है क्योंकि मानव में संवे- दनात्मक शक्ति ही ऐसी है जिसके द्वारा वह सामान्य-स्पन्दात्मक स्वरूप का आन्तररूप में मनन करने से, अपनी आत्मा को पशुता के संकुचित स्तर से बहुत ऊपर उठाने के रूप में उसका पालन कर सकता है। शैव शब्दों में संवेदन को 'चित्त' कहते हैं। चित्त के द्वारा ही साधारण व्यवहार से लेकर परमतत्त्व के स्वरूप तक का विमर्श सम्भव हो सकता है। पहले यह बात समझाई गई है कि संवेदन, चित्त, मन्त्र और विमर्श इनका स्वरूप आंतरिक आत्मस्फुरणा के अतिरिक्त और कुछ नहीं है अतः ये सारे शब्द पर्यायवाची होने के कारण एक ही आत्म-स्पन्दना के द्योतक हैं। १. लिपिस्थितस्तु यो मन्त्रो निर्वीर्यः सोऽत्र कल्पितः (तं०, ४.६६ में उदाहृत) २. मन्त्रदेवताविमर्शपरत्वेन प्राप्ततत्सामरस्यम् आराधकचित्तमेव मन्त्रः, न तु विचित्रवर्ण- संघट्टनामात्रम् ............। (शिवसूत्रवि०, २.१) ३. 'मनु अवबोधने', 'तृ पालने' इत्येताभ्यां निष्पन्नतया निर्वचनीयत्वेन निर्णीततया उच्यते। (शिवसूत्र, २.१ की टिप्पणी)

मन्त्र और मन्त्रवीर्य ११५ शैवदार्शनिकों के विचारानुसार विमर्श या आत्मस्पन्दना ही प्रत्येक भाव का 'हृदय है क्योंकि सारे भाव यहाँ से निकलकर अन्ततोगत्वा इसी में विश्रान्त भी हो जाते हैं। इस बात का उल्लेख हो चुका है कि अभिनवगुप्ताचार्य जी के कथनानुसार जड़ का हृदय चेतन, चेतन का हृदय प्रकाश और प्रकाश का हृदय विमर्श है। विमर्शात्मक आत्म-स्फुरणा ही परमन्त्र है और इसका वास्तविक स्वरूप मात्र 'अहंविमर्श' है। यहाँ तक यह बात स्पष्ट हो गई कि २'मन्त्र' का वास्तविक स्वरूप 'अहंविमर्श' है। अब देखना यह है कि विमर्श किस रूप में कार्यनिरत होता है? विमर्श चाहे जिस किसी भी भूमिका पर अवस्थित हो शब्दना अथवा अभिलाप ही इसका रूप है। शब्दना से रहित विमर्श के अस्तित्व की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। उच्चतम भूमिका पर अवस्थित विमर्शात्मक शब्दना को शास्त्रीय शब्दों में 'परा-वाणी' कहते हैं। यह परा-वाणी अथवा आन्तर-शब्दना एक ऐसी मात्र स्पन्दनामयी शब्दना है जिसमें अनन्त एवं अतर्क्य स्थूल वाचक और वाच्यरूप शब्दराशि, मोर के अण्डरस के न्याय से, केवल स्फुरणा के रूप में ही अवस्थित है। इस भूमिका पर अवस्थित शब्दना में कोई स्थूल वाच्यवाचकरूप विभाग न होने के कारण यह 'बीजरूप' अर्थात् 'अहंरूप' ही है। सारे मन्त्र मूलतः 'परा-वाणी' रूप ही हैं। 'परा-वाणी' के विषय में पहले भी इस बात का उल्लेख किया जा चुका है कि यही वह सामान्य स्पन्दना है जिसका स्वरूप अगतिमय गति है और जो अचल आत्मा में ३चलता का आभास करा देती है। यह चलता ही परमेश्वर की ज्ञानक्रियात्मक विमर्शना है। परा-शब्दना बहिर्मुख प्रसार की प्रक्रिया में पश्यन्ती और मध्यमा अवस्थाओं में से प्रसृत होती हुई और उत्तरोत्तर स्थूल होती हुई, वैखरी वाणी का रूप धारण करके, ४'अ' से 'क्ष' तक मातृका या 'न' से 'फ' तक मालिनी के रूप में विकसित होती है। इस दृष्टि से यदि देखा जाये तो अनेक शास्त्रों में लिखे गये केवल विशिष्ट वर्ण-रचनात्मक मंत्र ही नहीं १. हृदयं च नाम प्रतिष्ठास्थानमुच्यते, तच्च उक्तनीत्या जडानां चेतनम्, तस्यापि प्रकाशा- त्मकत्वम्, तस्यापि विमर्शशक्तिः-इति विश्वस्य परमे पदे तिष्ठतो विश्रान्तस्य इदमेव हृदयं विमर्शरूपं परमन्त्रात्मकं यत्र-तत्र अभिधीयते । (ई० प्र० वि, १.५.१४) २. मन्त्रश्च विमर्शनात्मा (ई० प्र० वि, १.५.१४) ३. एषैव च किञ्चिद्रूपता यत् अचलमपि चलमाभासते । (ई० प्र० वि०, १.५.१४) - ४. संस्कृत वर्णमाला का 'अ'से 'क्ष' तक का क्रम आज भी प्रचलित है। इस क्रम को शास्त्रीय शब्दों में 'मातृका' या 'पूर्वमालिनी' कहते हैं। स्वच्छन्दतन्त्र में इसी क्रम को स्वीकारा गया है। इसके प्रतिकूल मालिनी-विजयोत्तरतन्त्र में वर्णमाला को 'न' से 'फ' तक के दूसरे क्रम में भी रखा गया है। इसका शास्त्रीय नाम 'मालिनी' है। यह क्रम इस प्रकार है- न, ऋ, ॠ, ऌ, ॡ, थ, च, ध, ई, ण, उ, ऊ, ब, क, ख, ग, घ, ङ, इ, अ, व, भ, य, ड़, ढ़, ठ ज्ञ, ण, ज, र, ट, प, छ, ल, आ, स, अः, ह, ष, क्ष, म, श, अं, त, ए, ऐ, ओ, औ, द, फ। (ये कुल पचास अक्षर हैं)