स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा
८ स्पन्दकारिका शक्ति में सूक्ष्म रूप में अवस्थित रहता है। जगत का शक्ति एवं शिव दोनों के साथ तादात्म्य है। जगत न तो जड़ परमाणुओं का संघात है और न तो पूर्व कर्मों के भोग का या संसरण की संरचना है। यह शिव की आनन्द क्रीड़ा है—यह परम शिव की स्वेच्छा रूप तूलिका द्वारा आत्मा के पट पर बनाया गया चित्र है—यह क्रीड़ाराम है—क्रीडनक है—शिव के अहं को व्यक्त करने का माध्यम है—'शक्ति' के स्वरूप का उल्लास है— शिव का आनन्दोल्लास है—शिव की आत्म-स्वरूप दिदृक्षा है एवं शिव का विनोद है। (४) 'परमशिव' निष्क्रिय एवं उदासीन (शान्त) ब्रह्म नहीं है प्रत्युत पञ्चकृत्यकारी परमात्मा है और 'शक्ति' उसी शिव का अपना विमर्श है—आत्मपरामर्श है—प्रत्यविमर्श है। शिव शांकर अद्वैत का अद्वयतत्त्व नहीं है प्रत्युत् शक्ति के साथ सामरस्यापन्न, द्वयात्मक अद्वैत है। बंधन भी बंधन नहीं और मुक्ति भी मुक्ति नहीं, प्रत्युत अवरोहण एवं आरोहण का स्वकल्पित अभिनय है—एक क्रीडा है। यहाँ का अद्वैत मिथुनात्मक, दाम्पत्यात्मक, संघट्टात्मक, युगलभावात्मक एवं सामरस्यात्मक है। (५) यहाँ मुक्ति 'सामीप्य', 'सालोक्य', 'सार्षि' एवं 'सायुज्य' नहीं है। प्रत्युत् जीते जी मुक्ति है—'जीवन्मुक्ति' है न कि 'विदेहमुक्ति'। (६) साधना के मार्गों में ज्ञान-भक्ति-योग इन तीनों का मणिकांचन योग ही उपादेय है। 'भक्ति' भी वही वरेण्य है जिसे 'अद्वैतभक्ति' कहते हैं। शिव के साथ अभेदात्मकता की अनुभूति ही यथार्थ ज्ञान है और यह अनुभूत्यात्मक ज्ञान ही 'मुक्ति' है। 'भक्ति' का वह प्रकार जो 'वैधी', 'गौणी' आदि रूप वाली है या 'साधन भक्ति है स्पृहणीय नहीं है—'ज्ञानोत्तरा भक्ति' ही अभीष्ट है। यदि देश को शक्तिशाली बनाना है तो 'स्पन्द' एवं 'प्रत्यभिज्ञा' के शक्ति सिद्धान्त एवं शक्ति-साधना का आत्मीकरण करना आवश्यक है। 'शिवोऽहं', 'शिवोऽहं', 'अहं देवी न चान्योस्मि', 'न सावस्था न यः शिवः' आदि को आत्मसात करके जीव को शिव बनाने की साधना का प्रवर्तन करने वाले आचार्य वसुगुप्त को शतशः नमन करते हुए मैं प्रकाशक महोदय को पुनः धन्यवाद देना चाहता हूँ कि उन्होंने 'स्पन्दकारिका' प्रकाशित करने का सत्संकल्प रूपायित कर दिया। श्यामाकान्त द्विवेदी 'आनन्द'
विषयानुक्रमणिका भूमिका खण्ड परिचय एवं पृष्ठभूमि पृष्ठाङ्क [१] काश्मीरीय शैवाद्वैत एवं स्पन्दमत १४ [२] स्पन्दसूत्र एवं स्पन्द १६ [३] स्पन्द १८ स्पन्दसूत्र एवं शिवसूत्र २१ शैव दर्शन एवं उसकी साम्प्रदायिक परम्परा २१ स्पन्दशास्त्र और उसके सिद्धान्त २४ १. सर्वशक्तिवाद २५ २. अजातिवाद एवं उदयवाद २६ ३. क्रीडावाद २६ ४. संकल्पसृष्टिवाद २७ ५. इच्छासृष्टिवाद २७ ६. स्वातंत्र्यवाद २७ ७. द्वयात्मक अद्वयवाद २७ ८. सर्वविमर्शवाद २७ ९. स्वस्वभाववाद २८ १०. अद्वैतवाद २८ स्वस्वरूपवाद ३०, अनुग्रहवाद ३०, संकल्पवाद ३२, भोगापवर्ग- साहचर्यवाद ३३, जीवन्मुक्तिवाद ३४, सर्वचैतन्यवाद ३४, सर्व- चिन्मयतावाद ३४, विश्वात्मवाद ३५, सर्वात्मवाद ३५, क्रीडावाद ३८, लीलावाद, चित्रवाद ३८, अहंतावाद ३८, लीलात्मक विनोदवाद ३९, स्वभाववाद ३९, सर्वात्मवाद ३९, अहन्तावाद ३९, नादसृष्टिवाद ४५, सर्वशिववाद ४५, अद्वैतवादी काश्मीरीय शैव दर्शन का उद्देश्य ४५, सर्वात्मवाद ४६, इच्छा-ज्ञान-क्रियाभेद- वाद ४६, शब्दसृष्टिवाद ४६, वाक्तत्त्व अहन्ता एवं विश्व में तादात्म्य ४९, नादसिद्धान्त ४९, अद्वैतवादी दृष्टि का वैलक्षण्य ५०
१० स्पन्दकारिका [ ४ ] शिव और शक्ति ५० शिव की शक्तियाँ ५१ स्वातन्त्र्यवाद ५२ [ ५ ] जीवतत्त्व ५२ आत्मा पर चढ़े हुए पंचावरण एवं वाग्योग ५३ [ ६ ] सृष्टिविधान जगत् का उपादान ५७ शब्दसृष्टिवाद ५९ [ ७ ] साधनान्तर्गत आत्म चैतन्य की विविध अवस्थायें एवं मोक्ष के उपाय ६२ [ ८ ] बन्धन और मुक्ति ७८ [ ९ ] अद्वैत भक्ति ७९ [ १०] मन्त्रविज्ञान और स्पन्दशास्त्र ८२ मन्त्र और आत्मबल की प्राप्ति का अन्तर्सम्बन्ध ८४ अवस्थाएँ, शून्य विषुव, ९ चक्र, मन्त्रार्थ, अहं ८७ [११] मन्त्र और नाद ८८ मन्त्र के अङ्ग ९१ मन्त्र और उसके विभिन्न अर्थ ९२ मन्त्र शक्ति एवं उसका स्वरूप ९६ ग्रन्थ खण्ड स्पन्दकारिका १. स्पन्दकारिका का अध्यायीकरण २ २. सूत्रों की अनुक्रमणिका ३ ३. विशेष ध्यातव्य ५ प्रथम निष्यन्द—स्वरूपस्पन्द निष्यन्द ६ इच्छासृष्टिवाद ७, संकल्पसृष्टिवाद ८, अनेकात्मकता एवं एकात्मकता में सामरस्य ८, जड़चेतन अभेदवाद ९, शक्ति-शक्तिमान में अभेदात्मकता ९, सर्वात्मवाद १०, स्पन्द-सिद्धान्त ११, स्पन्द नामकरण ११, स्पन्दशास्त्र का विषय एवं स्वरूपस्पन्द शब्द की सोद्देश्यता ११, स्वरूपस्पन्द नामकरण की सार्थकता १२, शिव विश्वात्मा १३, स्वरूपस्पन्द १५ स्पन्दकारिका के प्रतिपाद्य विषय १. शक्ति-विशिष्ट शङ्कर की वन्दना १८ २. स्पन्द तत्त्व का स्वरूप ५५
विषयानुक्रमणिका ११ ३. आत्मा की सभी अवस्थाओं में अविचल एकरूपता ७८ ४. समस्त अवस्थाओं एवं मनोदशाओं में एक ही स्पन्दतत्त्व की अनुस्यूतता ९१ ५. पारमार्थिक तत्त्व का स्वरूप १०७ ६-७. शैवी स्वातन्त्र्य शक्ति के द्वारा आन्तर शक्ति चक्र के साथ अचेतन इन्द्रियों को भी चैतन्य प्रदान किए जाने का प्रतिपादन ११५ ८. आत्मबल प्राप्त होने पर 'पशु' भी 'पशुपति' बन जाता है १२५ ९. क्षोभावसान से परमपद की प्राप्ति का प्रतिपादन १३३ १०. क्षोभ के विलीन हो जाने पर मितात्मा का सर्वज्ञातृत्व एवं सर्वकर्तृत्व १६६ ११. 'स्वस्वभाव' की सर्वव्यापकता के साक्षात्कार के कारण योगी की संसरण से मुक्ति १७३ १२-१३. अभावब्रह्मवाद शून्यात्मवाद तथा सर्वशून्यवाद की अयथार्थता १८० १४. स्पन्द तत्त्व की दो अवस्थायें १९३ १५. जड़ समाधि में अवस्थित अबुध योगी की अभावात्मक मिथ्यानुभूति १९७ १६. अन्तर्मुख चेतन सत्ता के सार्वकालिक अस्तित्व एवं नित्यता का प्रतिपादन २०४ १७. सुप्रबुद्ध एवं प्रबुद्ध योगियों में चिद्रूप स्वभाव की अनुभूतियों के भेद २०८ १८. विभिन्न अवस्थाओं में आत्माभिव्यक्ति के विभिन्न रूप २१४ १९. गुणादि विशेष स्पन्द एवं सामान्य स्पंद का अन्तर्सम्बन्ध २२२ २०. विशेष स्पंदों के लक्षण और प्रभाव २२८ २१. जाग्रत अवस्था में भी स्पन्दतत्त्वाभिव्यक्ति के उपयोगी उपाय २३२ २२. स्पन्द का स्वरूप-लक्षण २३९ २३-२५. मूढ़ एवं प्रबुद्ध साधकों की अवस्थाओं की तुलना २४७ द्वितीय निष्यन्द—सहजविद्योदय निष्यन्द २६२ २६. स्पन्दस्वरूप आत्मबल-प्राप्त मन्त्रों की शक्तियों में वृद्धि २६२ २७. मन्त्रों का चिदाकाश में लय एवं उनकी शिवात्मकता २६९
१२ स्पन्दकारिका २८-२९. पशुप्रमाता एवं पतिप्रमाता में साम्य एवं सभी अवस्थाओं शिवत्व की व्यापकता २७२ ३०. जीवन्मुक्ति का स्वरूप एवं विश्व के साथ ऐकात्म्य-प्रतिपत्ति २८४ ३१-३२. तदात्मता महासमापत्ति २९० तृतीय निष्यन्द—विभूतिस्पन्द निष्यन्द ३३-३४. योगियों की यथाकांक्षित अभीष्टों की तत्काल सिद्धि ३०४ ३५. योगी के स्वरूपस्थित न रहने के परिणाम ३१५ ३६-३७. स्वबल का महत्त्व ३१६ ३८. स्पन्दात्मक आत्मबल की शक्ति ३२२ ३९. स्पन्दतत्त्व के समावेश से अधिगत शक्तियाँ ३२५ ४०. ग्लानि और उसकी निवृत्ति ३२९ ४१. उन्मेष का स्वरूप ३३३ ४२. यौगिक सिद्धियाँ और उन्मेषानुशीलन ३३७ ४३. प्रत्येक भाव में स्पन्दात्मक स्वरूप की अनुभूति द्वारा प्रथमाभास ३४२ ४४. प्रत्येक भाव में स्वस्वरूप की व्यापकता की अनुभूति करने विषयक योगोपदेश ३४६ ४५. पशु कौन है? शाब्दी प्रभाव से पशुत्व प्राप्ति ३५१ ४६. विकल्पात्मक ज्ञान परामृतरस एवं स्वातन्त्र्य दोनों से वंचित होना ३६२ ४७. स्वरूपाच्छादन और उसके कारण ३७४ ४८. शिव की क्रियात्मिका शक्ति के कार्य ३८० ४९-५०. संसरण के कारण और पुर्यष्टक की भूमिका ३९० ५१. भोक्तृभाव एवं चक्रेश्वरत्व की प्राप्ति ३९८ ५२-५३. गुरुवाणी की वन्दना एवं भट्टकल्लट द्वारा स्पन्दकारिका के प्रणयन की पुष्टि ४१०
भूमिका खण्ड परिचय एवं पृष्ठभूमि अन्तस्थल में निस्पन्द सिन्धु के वक्षस्थल पर तरंगात्मक स्पन्दन की भाँति निस्पन्द परमशिव को स्पन्दित करने वाली उनकी स्वात्मरूपा शक्ति ‘स्पन्द’ है। ‘स्पन्द’ शिव का अपना ‘धर्म’ है—‘स्वभाव’ है—‘शक्ति’ है—‘हृदय’ है—‘ऊर्मि’ है—‘विमर्श’ है और ‘स्वातंत्र्य’ है। ‘स्पन्द’ को कहीं ‘शिव की शक्ति’ कहा गया है और कहीं उसे स्वयं ‘शिव’ कहा गया है यथा— स्पन्दः सामान्यपूर्वश्च शुद्धात्माशांकरः शिवः ।१ किन्तु इसे ‘भाव’, ‘स्वभाव’, ‘तत्त्व’ एवं ‘ज्ञाता’ आदि भी कहा गया है— भावः स्वभावस्तत्त्वं च ज्ञातेत्याद्यभिधा स्मृताः ।। १ ।।२ ‘स्पन्द’ के दो रूप— १. शिवरूप २. शक्तिरूप । रामकण्ठाचार्य ‘स्पन्द’ को ‘शिव’ नहीं शाक्ततत्त्व कहकर उसकी वन्दना कर रहे हैं—‘निजोधर्मः शंभोरनुपम चमत्कारसरसः । १. परंशाक्तं तत्त्वं जगति जयति स्पन्द इति तत् ।। २. ‘स्पन्दस्य परस्य शाक्तस्य तत्त्वस्य । (स्पं०का० वि० २।५) ३. स्पन्दानां क्षेत्रज्ञज्ञानादिशक्तीनां । (स्पं०का०वि० २।६) ‘स्पन्द’ ‘सामान्य’ एवं ‘विशेष’ इन दो भागों में भी विभाजित है— ‘गुणादिस्पन्दनिष्यन्दाः सामान्यस्पन्द संश्रयात्’ । ‘स्पन्द’ का धात्वर्थ— १. गुणादिस्पन्द = ‘विशेष स्पन्द’ } ‘स्पदिकिंचिच्चलने धातु से ‘स्पन्द’ २. ‘सामान्य स्पन्द’ } शब्द की व्युपत्ति हुई है । ‘सामान्य स्पन्द’ १. यही परमेश्वर की मुख्य शक्ति हैः ‘सामान्यस्पन्द एव परमेश्वर मुख्यशक्तित्वेन’ । २. ‘मैं दुखी हूँ, मैं सुखी हूँ, आदि संवेदन तथा इन्द्रियाँ, पञ्चभूत, तन्मात्रा, शरीर, बुद्धि, अहंकार, शरीर, गुणत्रय आदि जो ‘विशेष स्पन्द’ हैं उनसे यह ‘सामान्य- स्पन्द’ भिन्न है और विशेष स्पन्दों का आश्रय है— ‘गुणादिस्पन्दनिष्यन्दाः सामान्यस्पन्दसंश्रयात् ।’ (२।३ स्पं० का०) ‘स्पन्द’ के दो रूप हैं—(१) ‘सामान्य’, (२) ‘विशेष’— १.-२. स्पन्दप्रदीपिका ।
१४ स्पन्दकारिका १) 'परस्य शाक्तस्य तत्त्वस्य उपचरित—सामान्यविशेषात्मकतया द्विप्रकारत्वेन' (रामकण्ठाचार्यः स्पन्द का० २।३) । २) 'सुखाद्युपाध्युपरागजनितान्योन्यभिन्नरूपेभ्यो विशेषस्पन्देभ्यो' स्पन्दों के 'निष्यन्द'—स्पन्दात्मक प्रत्यय संधान हैं— 'गुणमयाः स्पन्दनिष्यन्दाः प्रत्ययसंधानाः प्रसरन्ति।' (२।५) स्पन्द निष्यन्दा नानार्थोन्मुख्येन प्रसृत प्रवाह रूप भिन्नात्मक प्रत्यय हैं— निष्यन्दाः नानार्थोन्मुख्येन प्रसूताः प्रवाहाः भिन्नाः प्रत्ययाः स्पन्दनिष्यन्दाः ॥ (राम- कण्ठाचार्यः स्पन्दका०वि० २।५) । स्पन्दनात्मक होने के कारण ही इस शक्ति को 'स्पन्द' संज्ञा प्राप्त हुई 'स्पन्दनात् स्पन्दः ॥१' 'स्पन्दन' है क्या ? निस्तरंग परमात्मा की जो युगपद (एक साथ) निर्विकल्पात्मक सार्वत्रिक औन्मुख्यवृत्तिता है उसे ही 'स्पन्द' कहा जाता है—'स्पन्दनं च निस्तरंगस्यास्य तावत् परमात्मनः युगपन्निर्विकल्पा या सर्वत्रौन्मुख्यवृत्तिता' ।२ 'शान्तषाड्गुण्यस्वरूप' 'आत्मबलशक्तीश' की जो चिद्रूप प्रतिभा का उदय है वही स्फुरणात्मिका 'स्पन्द शक्ति' है । शान्तषाड्गुण्यरूपस्य यत् स्फुरन् प्रतिभोदयः । स चाऽत्मबलशक्तीशश्चिद्रूपः स्पन्दसंज्ञकः ॥३ आचार्य रामकण्ठ 'स्पन्दकारिकाविवृति' में कहते हैं कि—स्पन्द शक्ति के निम्न लक्षण हैं— १) जो नानात्मक दशाओं एवं दिक्काल आदि से अकलित 'चिदालोक वपु' शिव के हृदय में तद्रूप स्वात्मानुभव के रूप में विस्फुरित होती है । २) जो शंभु का स्वधर्म है (स्वाभाविक स्वरूप है) । ३) जो अनुपम चमत्कार से रसान्वित है । ४) जो परं शाक्त तत्त्व है—वह 'स्पन्द' है— दशादिक्कालाद्यैरकलितचिदालोकवपुषः, सदा तादृक्स्वात्मानुभवितृतया विस्फुरति यः । निजो धर्मः शंभोरनुपम चमत्कारसरसः परं शाक्तं तत्त्वं जगति जयति स्पन्द इति तत् ॥ [१] काश्मीरीय शैवाद्वैत एवं स्पन्द मत कश्मीर की अद्वैतवादी शैव परम्परा में शैव दर्शन की दो शाखायें मिलती हैं— १. 'प्रत्यभिज्ञा', २. 'स्पन्द' ॥ इसी स्पन्द शाखा का आद्य दार्शनिक ग्रंथ है— १-३ स्पन्दप्रदीपिका ।
परिचय एवं पृष्ठभूमि १५ 'स्पन्दशास्त्र' या 'स्पन्दसूत्र' या 'स्पन्दकारिका' । यह एक अनुभूति परक ग्रन्थ है । इसके रचनाकार के संबंध में संदेह उत्पन्न होने का कारण यह है कि किसी-किसी संस्करण में अंतिम श्लोक के रूप में यह श्लोक पाया गया है— वसुगुप्तादवाप्येदं गुरोस्तत्त्वार्थदर्शिनः । रहस्यं श्लोकयामास सम्यक् श्री भट्टकल्लटः ॥ ५३ ॥ अर्थात् श्री भट्टकल्लट ने अपने तत्त्वार्थदर्शी गुरु वसुगुप्त से यह रहस्य भलीभाँति प्राप्त करके इसे श्लोकबद्ध किया । स्पष्ट है कि विचार एवं दार्शनिक सिद्धान्त तो वसुगुप्ताचार्य के हैं किन्तु इन्हें पुस्तकाकार में प्रस्तुत करने का कार्य भट्टकल्लट ने किया । तो क्या 'स्पन्दकारिकावृत्ति' के साथ ही 'स्पन्दकारिका' के भी रचयिता भट्टकल्लट हैं?—यह विवादास्पद विषय है । निस्तरंग परमात्मा में जो एक साथ सर्वरूप से उन्मुख होने की योग्यता है वही किंचित् चलन है किन्तु इसके द्वारा उसकी निर्विकल्पता भंग नहीं होती । प्राचीन काल में परमात्मा का एक नाम 'स्पन्द' भी था । शुद्धात्मा, शंकर, शिव, भाव, स्वभाव, ज्ञाता, सामान्य, शक्ति आदि सभी स्पन्द वाच्य हैं । 'स्पन्द' पूर्ण अहं विमर्श है । यह अहं विमर्श वह मौलिक स्फुरण है जिसके द्वारा वह एक रहते हुए भी विश्व के अनन्त रूपों एवं आकारों में स्फुरित हो रहा है यह शाश्वत स्फुरणशील (या स्पन्दायमान) होने के कारण ही स्पन्द नाम से पुकारा जाता है । 'स्पन्द किंचित् चलन तो है किन्तु किसका किंचित् चलन ? किस स्वरूप का किंचित् चलन? सूक्ष्म अहं विमर्श की स्फुरण ही किंचित् चलन है और वही 'स्पन्द' है । यह शक्ति के प्रसार ही किंचित् चलन है और वही 'स्पन्द' है । यह शक्ति के प्रसार की संकल्पोत्मक उन्मुखता है । 'स्पन्द' अहं प्रत्यवमर्शात्मक गति है । यह एक उच्छ-लन है । यह संवित् समुद्र की तरंग है स्वतन्त्र रूप में स्फुरण ही किंचित् चलन है और चूँकि स्पन्द का यही स्वभाव है इसलिए इसे 'स्पन्द' कहा गया है । यह परमात्मा की स्वातंत्र्य शक्ति है । इसी के दर्पण में परमात्मा अपना मुख देख पाते हैं इसीलिए कहा गया है— 'शैवीमुखंगिहोच्यते' अर्थात् पत्नी शिव की मुख है । आचार्य अभिनवगुप्त 'मालिनीवार्तिक' में प्रश्न उठाकर फिर कहते हैं— 'किं यादृग्लोकसंसिद्धकर्तृत्वं कर्मयोगतः ? स्पन्दात्म तद्विभौ स्पन्दहीने समुपपद्यते । ननु ज्ञानं चिकीर्षा च यत्नश्चेति गुणत्रयम् ॥ (३२४) समवैति यदत्रास्य तत्कर्मत्वमुदाहृतम् । कर्तृमित्येव यद्रूपं ज्ञानादीनां विशेषणम् ॥ (३२५) करोतेस्तत्र कोऽर्थ स्याद्यदि सस्पन्दता किल । (३३०) तदसौ स्पन्दितुं वेत्ति प्रेप्सतीति भवेद्रुचः । तच्च स्वात्मगतं नास्य स्पन्दितं वैभवोद्भवात् । (३३१) अन्यदस्पन्दितं ज्ञानं सर्वस्यापि च संभवेत् ॥ (३३२)
१६ स्पन्दकारिका हृदय (शिव की आत्मभूता शक्ति) स्पन्दात्मिका है— ‘तस्योपायं परं ब्रूते हृदयं स्पन्दनात्मकम् । (द्वि०का० १८) ‘स्पन्द’ का मुख्य स्वरूप ‘सामान्यस्पन्द’ है जिसके विषय में ‘मालिनीवार्तिक’ (२०) में अभिनवगुप्त कहते हैं— भावग्राह्याद्यचरमदशाद्रयोल्लासिनिर्वृतिसुपूर्णः । जगदानन्दमयोऽसौ ‘सामान्यस्पन्द’ इत्युक्तः ॥ (मा० वा० २०) इसके अतिरिक्त ‘विशेषस्पन्द’ भी हैं— ‘चित्त्तत्त्वस्य विशेषस्पन्ददशाशालिनश्चिदानन्दः ॥ (६३) एक ही स्पन्दन के ३ भेद हैं—एकस्य स्पन्दनस्येयं त्रिधा भेदव्यवस्थिति ॥ (६५) (मा०वा०) । काश्मीर शैव दर्शन के अनुसार परमेश्वर अपनी ‘स्पन्दरूपा शक्ति’ से सदैव अवियुक्त रहता है । स्पन्दरूपा शक्ति ही उसका नित्यस्वभाव है । इसीलिए ‘स्पन्द निर्णय वृत्ति’ में क्षेमराज ने इस दर्शन को ‘स्पन्दशास्त्र’ कहा है—‘यथोक्तं स्पन्दशास्त्रे’ (स्पन्दनिर्णय) । [२] स्पन्दसूत्र एवं स्पन्द आचार्य उत्पलदेव ने ‘स्पन्द’ शब्द का व्यापक अर्थ न लेकर केवल ‘स्पन्द- कारिकाओं के लिए ही ‘स्पन्दशास्त्र’ का प्रयोग किया है । काश्मीर शैव दर्शन का साहित्य इन तीन भागों में विभक्त है—(१) ‘आगमशास्त्र’, (२) ‘स्पन्दशास्त्र’, (३) प्रत्यभिज्ञाशास्त्र’ । काश्मीर शैव दर्शन का साधना-पक्ष ‘स्पन्दशास्त्र’ है । ‘स्पन्दशास्त्र’ में आगमों की भाँति सिद्धान्त-निरूपण मात्र ही नहीं है परपक्ष खण्डन एवं स्वपक्ष मण्डन वाली दार्शनिक शैली की प्रधानता भी आत्मीकृत नहीं हुई है । खण्डन-मण्डन सामान्य रूप से प्रस्तुत यदि है—सम्प्रदायों का नाम लेकर नहीं । स्पन्द शब्द की सोद्देश्यता— काश्मीरीय शैव दर्शन की एक शाखा ‘प्रत्यभिज्ञाशास्त्र’ के नाम से इसलिए प्रसिद्ध हुई क्योंकि इस दर्शन का चरम लक्ष्य ‘प्रत्यभिज्ञा’ (‘नूनं स एव ईश्वरोहमिति’) प्राप्त करना है । किन्तु इसी दर्शन की दूसरी शाखा का नाम ‘स्पन्द’ क्यों पड़ा ? दोनों के दार्शनिक सिद्धान्त दोनों की साधना-पद्धति एवं चिन्तन तो समान हैं तथा दोनों के आचार्य भी एक ही हैं फिर दूसरी शाखा को ‘स्पन्द’ क्यों कहा गया ? आचार्य वसुगुप्त के दार्शनिक चिन्तन की दो धारायें थीं—१) ‘शिवसूत्र’ और २) ‘स्पन्दकारिका’ । अद्वैतवादी काश्मीरी शैव दर्शन को दार्शनिक, तार्किक एवं खण्डनमण्डनात्मक दृष्टि देने का कार्य तो सोमानन्दपाद ने अपने ग्रन्थ ‘शिवदृष्टि’ के माध्यम से किया किन्तु ‘शिवदृष्टि’ भी शिवसूत्रों की ही व्याख्या है । सोमानन्द की ‘शिवदृष्टि’ को
परिचय एवं पृष्ठभूमि १७ 'प्रत्यभिज्ञा-शास्त्र' के रूप में प्रतिष्ठित करने का कार्य उनके शिष्य उत्पलदेवाचार्य ने— 'ईश्वरप्रत्यभिज्ञा' नामक ग्रन्थ ('शिवदृष्टि' की व्याख्या के रूप में रचित) द्वारा सम्पादित किया किन्तु 'शिवसूत्र' के साधनात्मक, श्रद्धात्मक एवं धार्मिक पक्ष को प्रस्तुत करने के लिए जिस ग्रन्थ का प्रणयन किया गया—उसका नाम है 'स्पन्दकारिका'। प्रश्न उठता है कि शिवसूत्रों की व्याख्या करने वाली इस शाखा ने शिवसूत्रों को 'स्पन्दसूत्र' या स्पन्दकारिका' के नाम से क्यों ग्रहण किया ? शिवसूत्रों में तो कहीं भी 'स्पन्द' शब्द का भूल से भी प्रयोग नहीं किया गया है? इसका समाधान यह है कि शिव के 'प्रकाश' पक्ष को जिन आचार्यों ने प्राधान्य दिया वे सोमानन्द, एवं उत्पलदेव आदि आचार्य शैवशास्त्र को खण्डनमण्डनात्मक पद्धति से तार्किक एवं दार्शनिक आधार देते हुए मुख्यतः सैद्धान्तिक पक्ष पर जोर देते रहे और उन्होंने अपनी चरम उपलब्धि 'प्रत्यभिज्ञा' के रूप में स्थापित की । चूँकि इस दर्शन या साधना-पक्ष विवृत नहीं हो पा रहा था । अतः एतदर्थ स्पन्दसूत्र (स्पन्दकारिका) की रचना की गई । एक प्रश्न पुनः उठता है कि यदि 'शिवसूत्र' सिद्धान्त-प्रधान मात्र था तो उसकी साधना-प्रधान व्याख्या 'स्पन्दसूत्र' में करके क्यों शिवसूत्रों की मूल दृष्टि के साथ विश्वासघात नहीं किया गया? इसका उत्तर यह है कि स्वयं 'शिवसूत्र' भी साधना-प्रधान हैं क्योंकि उनका अध्यायीकरण साधना के तीन उपायों—(१) 'शांभवोपाय' (२) 'शाक्तोपाय' एवं (३) 'आणवोपाय' के नाम पर ही किया गया है और 'स्पन्दसूत्र' भी मात्र साधनाशास्त्र ही नहीं है प्रत्युत् सिद्धान्तपक्ष का प्रस्तोता भी है । सोमानन्दपाद की 'शिवदृष्टि' एवं 'स्पन्दसूत्र' दोनों शिवसूत्रों की व्याख्यायें हैं किन्तु दोनों में दृष्टिभेद है । 'स्पन्दकारिका' को वसुगुप्त की रचना माना जाता है और 'शिवसूत्र' को वसुगुप्त के द्वारा उद्धार की गई रचना स्वीकार किया जाता है । यदि 'स्पन्दकारिका' के रचनाकार वसुगुप्त स्वयं ही शिवसूत्रों की व्याख्या 'स्पन्दसूत्र' के रूप में करते हैं तो स्पष्ट है कि 'शिवसूत्र' एवं 'स्पन्दसूत्र' दोनों में ऐकात्म्य है और यदि दृष्टि-वैषम्य के बिन्दु सिद्ध भी हो जायें तो मानना पड़ेगा कि ये बिन्दु भी प्रारंभ से ही रहे हैं । प्रश्न पुनः अनुत्तरति रह जाता है कि काश्मीरी अद्वैतवाद की इस शाखा का नाम 'स्पन्द' क्यों रखा गया ? वसुगुप्त ने 'स्पन्दकारिका' एवं सोमानन्द (९०० ई०) ने 'शिवदृष्टि' द्वारा कश्मीरी अद्वैतवादी शैवमत की पृष्ठभूमि प्रस्तुत की काश्मीरी शैवमत की अद्वैतवादी शाखा के ये ही मूल संस्थापक हैं । 'सोमानन्द' वसुगुप्त के शिष्य हैं । उनके समय में स्पन्दकारिका ('स्पन्दशास्त्र' के नाम से) विद्यमान थी । उन्होंने 'शिवदृष्टि' के प्रारंभ में (प्रथम श्लोक की व्याख्या में) 'नहीच्छानोदनस्यायं प्रेरकत्वेन वर्तते' (१।८) सूत्र को उद्धृत भी किया है । उनके शिष्य ने 'शिवदृष्टि' की व्याख्या के रूप में जिस 'ईश्वरप्रत्यभिज्ञा' का प्रणयन करके 'प्रत्यभिज्ञा शाखा' के नाम से शैवाद्वैतवादी एक नए मत का नामकरण किया यह नाम ही 'शिवदृष्टि' के प्रथम श्लोक की व्याख्या में सोमानन्द ने 'ईश्वरप्रत्यभिज्ञा प्रपंचित न्यायेन' वाक्य द्वारा पहले से ही लिख दिया था । १. सोमानन्द का 'शिव' 'अस्मद्रूपसमाविष्ट' शिव है । स्पं. भू. १
१८ स्पन्दकारिका २. स्पन्दसूत्रकार का 'शंकर'—'यस्योन्मेषनिमेषाभ्यां जगतः प्रलयोदयौ तं शक्ति चक्रविभवप्रभवं शंकरं... ... ...' है। यह 'अस्मद्रूपसमाविष्ट' नहीं है । 'अस्मद्रूपसमाविष्ट' शब्दावली 'प्रत्यभिज्ञोपरान्त योगी के ज्ञानात्मक अनुभव की दशा है अतः यहाँ उपाय (साधनोपाय) भी व्यर्थ हैं अतः इस 'शिवदृष्टि' में साधना- प्राधान्य न भी हो तो उचित ही है और ज्ञानमार्ग (अहं सः एव) के लिए उपासना आवश्यक भी नहीं है—'प्रत्यभिज्ञा' ही साधना है और 'प्रत्यभिज्ञा' ही 'साध्य' है । स्पन्दसूत्रकार 'नमः' नहीं कहते 'स्तुमः' कहते हैं । सोमानन्द 'शिव' को नमस्कार करते हैं किन्तु स्पन्दसूत्रकार 'शंकर' की स्तुति करते हैं । 'स्तुति' 'स्तुत्य' 'स्तोत्र' 'स्तुतिकर्ता' के भाव ज्ञानमार्ग में संभव नहीं अर्थात् 'प्रत्यभिज्ञा' (तत् त्वं असि) में संभव नहीं । यह केवल भक्ति—उपासना—प्रेममार्ग में ही संभव है । 'प्रत्यभिज्ञा' ज्ञानमार्गीय अद्वैत है और 'स्तुति'-द्वैतात्मक भक्ति है । 'स्पन्द' नामकरण क्यों? इसलिए कि यह सिसृक्षात्मकता का सूक्ष्म संकल्प है—संकल्पात्मक गतिमयता है—निस्पन्द परमशिव में यत्किंचिच्चलन रूप अहं विमर्श है—अहं प्रत्यवमर्श रूप एक विमर्शात्मक चलता है । [३] स्पन्द 'स्पदि किंचिच्चलने' धातु से निष्पन्न होने के कारण 'स्पन्द' शब्द अल्प- चलनात्मक अर्थ में प्रयुक्त होता है ।१ स्पन्द शब्द विकारों के अर्थ में भी प्रयुक्त हुआ है—'तेन षोडश स्पन्दाः विकारा' । 'षोडशस्पन्दसन्दोहे' (योगिनी हृदय के इस श्लोक) की व्याख्या करते हुए भास्करराय ने 'स्पन्द' को विकार के जो अर्थ में प्रयुक्त किया है । समस्त द्वैत स्पन्द है—गौड़पादाचार्य कहते हैं कि विषय एवं इन्द्रियों के सहित यह संपूर्ण द्वैत चित्त का स्फुरण मात्र है— 'चित्त स्पन्दितमेवेदं ग्राह्यग्राहकमद्वयम्' ।२ 'सर्वं ग्राह्यग्राहकवच्चित्तस्पन्दितमेव' ।३ 'षट्त्रिंशत् तत्त्वसंदोह' में कहा गया है कि—विश्वोन्मीलन की आद्या इच्छाशक्ति ही शिव तत्त्व है और इसी को 'स्पन्द' कहते हैं । आचार्य क्षेमराज 'शिवसूत्रविमर्शिनी' में कहते हैं कि 'स्पन्दतत्त्व' शंकरात्मक एवं चैतन्यात्मक, सर्वदा स्वप्रकाश एवं परमार्थ सत् है—शंकरात्मक स्पन्दतत्त्वरूपं चैतन्यं सर्वदा स्वप्रकाशं परमार्थसत् अस्ति ।'४ यह शिव की एक अनुत्तरा शक्ति है और प्रतिभा १. भास्कर राय—'सेतुबंध' (चक्रसंकेत में श्लोक २१ की व्याख्या) । २. माण्डूक्यकारिका—'अलातशान्तिप्रकरण' । ३. शांकर भाष्यः माण्डूक्यकारिका । ४. शिवसूत्रविमर्शिनी ।
परिचय एवं पृष्ठभूमि १९ एवं चमत्कार भी है—अभिनवगुप्तपादाचार्य 'परात्रिंशिका विवृति' में इसी शक्ति को नमस्कार करते हैं— नरशक्तिशिवात्मकं त्रिकं, हृदये या विनिधाय भासयेत् । प्रणमामि परमानुत्तरां निजभासां प्रतिभाचमत्कृतिम् ॥१ 'तन्त्रालोक' (५ आह्निकः श्लोक ५७) में अभिनवगुप्त कहते है— उन्मना और 'स्पन्द'—'समना' भूमि को अतिक्रान्त करके 'उन्मना' का परिवेश प्राप्त होता है । 'समना' तक अनन्तपाश हैं । भैरवीय चिद्रूप में प्रवेश के लिए 'समना' को अतिक्रान्त करना अपरिहार्य है । उन्मना के अन्तिम छोर पर ऊर्ध्वकुण्डलिनी के अधिष्ठान में यहाँ 'विसर्ग' की सुषमा का साम्राज्य उल्लसित है । उसमें शाश्वत 'स्पन्द' का उच्छलन होता रहता है । प्राणना, व्यापार एवं 'स्पन्द'— 'तन्त्रालोक' (आ० ५ । श्लोक १८) की व्याख्या में आचार्य जयरथ ने 'विवेक' में कहा है कि—आन्तरउद्योगरूपा, जीवनात्मिका मुख्य वृत्ति 'प्राणना' है । आह्निक ६ के १२वें श्लोक में प्राणना व्यापार के निम्न पर्याय बताए गए हैं— 'आन्तर स्पन्द' 'स्फुरत्ता' 'विश्रान्ति' 'जीव' 'हृत' और मति । इयं सा प्राणना शक्तिरान्तरोद्योगदोहदा । स्पन्दः स्फुरत्ता, विश्रान्ति जीवो हृत्प्रतिभामतिः ॥ 'विमर्श' 'संवित् शक्ति' और 'स्पन्द'— परबोधमय देवाधिदेव की सर्वज्ञ, सर्वज्ञानशालिनी पराशक्ति को 'विमर्श' कहते हैं । संवित् शक्ति में समस्त परामर्श उल्लसित हैं । उसे ही 'विमर्श', 'स्पन्द', 'हृदय', विसर्ग आदि कहते हैं— 'इह खलु इदमेव संविदः संवित्त्वं यत् पराम्रष्टृत्वं नाम यस्य विमर्शः, 'स्पन्दो' 'हृदय' विसर्ग, इत्यादयः सहस्रशो व्यपदेशाः । (विवेक) तस्य देवातिदेवस्य परबोधस्वरूपिणः । विमर्शः परमाशक्तिः सर्वज्ञा सर्वशालिनी ॥ ७७ (तन्त्रालोक आ० ५) इसी विमर्श का अपर पर्याय 'स्पन्द' है । 'विमर्श' संवित-'स्पन्द' ही है—संवित्स्पन्दस्त्रिशक्त्यात्मा संकोचविकासवान् ॥ (तन्त्रालोक आ० ५।७९) इदमात्मक विमर्श एवं स्पन्द—'विशेष स्पन्द'—इदमात्मक विमर्श ही विशेष नामक 'स्पन्द' है इसे ही 'औन्मुख्य' भी कहते हैं— 'ततः स्वातन्त्र्यनिर्मेये विचित्रार्थक्रियाकृति । विमर्शनं विशेषाख्यः 'स्पन्द' औन्मुख्य संज्ञितः ॥ (तन्त्रालोक ५।८१) १. मालिनीवार्तिक (अभिनवगुप्त) ।
२० स्पन्दकारिका 'शिवसूत्र' का प्रथम सूत्र है—'चैतन्यमात्मा' । ब्रह्मसूत्रकार की जिज्ञासा ब्रह्म की है—'अथातो ब्रह्म जिज्ञासा' किन्तु शिवसूत्रकार की जिज्ञासा ब्रह्म की नहीं चैतन्यस्वरूप आत्मा की है । 'शिवसूत्र' के प्रथम व्याख्याकार तो वसुगुप्त हैं और दूसरे व्याख्याकार सोमानन्दपाद हैं । 'शिवसूत्र' की व्याख्यायें—(अनन्यपूर्व प्राथमिक व्याख्यायें) । १) ग्रन्थकार—वसुगुप्त ग्रन्थ—'स्पन्दसूत्र' । २) ग्रन्थकार—सोमानन्द ग्रन्थ—'शिवदृष्टि' । ऐसा माना जाता है कि शिवसूत्रों का उद्धार करके वसुगुप्त ने इसको अपने शिष्यों को पढ़ाया । उन्होंने इसकी व्याख्या की । उनकी यह शिवसूत्रीय व्याख्या ही 'स्पन्दसूत्र' है । वसुगुप्ताचार्य के शिष्य सोमानन्द ने जो 'शिवदृष्टि' नामक ग्रन्थ लिखा उसे भी शिवसूत्रों की ही व्याख्या माना जाता है । 'शिवदृष्टि' शब्द में 'शिव' शब्द क्या शिवसूत्रों की ओर इंगित नहीं करता ? 'शिवदृष्टि' का अर्थ—'शिवसूत्रों की दार्शनिक दृष्टि' लिया जा सकता है । यदि इसका अर्थ 'शिव की दृष्टि' भी लिया जाय तो चूँकि शिव की दृष्टि एवं शिवसूत्र तो अभिन्न ही हैं क्योंकि शिवसूत्र शिव-प्रणीत ही तो हैं अतः शिवदृष्टि उन शिव की दृष्टि ही तो है । ३) ग्रन्थकार—भट्टकल्लट, ग्रन्थ—'स्पन्दसर्वस्व' । कतिपय ध्यातव्य बिन्दु— 'स्पन्दकारिका' की भाँति स्पन्दशास्त्र पर अन्य स्वतन्त्र ग्रन्थ क्यों नहीं लिखे गए? 'स्पन्दसर्वस्व' (भट्टकल्लट) 'स्पन्दनिर्णय' (क्षेमराज) 'स्पन्दसन्दोह' (क्षेमराज) 'स्पन्द- प्रदीपिका' (उत्पल वैष्णव) 'स्पन्दकारिकाविवृति' (रामकण्ठाचार्य)—केवल 'स्पन्दसूत्र' की टीकायें या व्याख्यायें हैं किन्तु स्पन्दशास्त्र पर कोई अन्य स्वतन्त्र ग्रन्थ नहीं लिखा गया । सोमानन्दपाद प्रत्यभिज्ञादर्शन के संस्थापक हैं और उन्होंने स्पन्दसूत्रों को प्रमाण के रूप में 'शिवदृष्टि' में प्रस्तुत भी किया है किन्तु समस्त आचार्यों द्वारा स्पन्दसूत्रों को प्रमाण के रूप में उद्धृत किये जाने के बाद भी उनके द्वारा इस दर्शन पर स्वतन्त्र ग्रन्थ क्यों नहीं लिखा गया? वैसे क्षेमराज ने 'स्पन्दनिर्णय' में 'स्पन्दसूत्र' पर लिखी गई अनेक विवृत्तियों का भी उल्लेख किया है यथा भट्टलोल्लट की वृत्ति एवं अन्य टीकायें । इन विभिन्न टीकाकारों की दृष्टि में भी भेद रहा है । प्रत्येक टीकाकार ने किसी विशेष आध्यात्मिक दृष्टिकोण को अपनाकर ही सूत्रों की व्याख्या की है । भट्टकल्लट भी वसुगुप्त के शिष्य थे और सोमानन्दनाथ भी । भट्टकल्लट ने पर- तत्त्व की विमर्श प्रधानता के सिद्धान्त को आत्मीकृत करके स्पन्दसूत्र पर वृत्ति लिखकर 'स्पन्द सम्प्रदाय' का शिलान्यास किया । 'स्पन्दकारिका' के अतिरिक्त स्पन्दतत्त्व पर मौलिक ग्रन्थ क्यों नहीं लिखे गए ? यह अनुसंधेय बिन्दु है ? स्पन्द सूत्रों का प्रति- पाद्य विषय सतत् स्पन्दमयी पारमेश्वरी विमर्श शक्ति है किन्तु प्रत्यभिज्ञा दर्शन का प्रधान प्रतिपाद्य शिव है ।
परिचय एवं पृष्ठभूमि २१ १. 'स्पन्द सूत्र' और शिवसूत्र— 'स्पन्दसूत्र' के प्रथम निष्यन्द— 'स्वरूप स्पन्द' की २५ कारिकाओं में मुख्यतः 'स्पन्द' या आत्म तत्त्व के स्वरूप पर ही प्रकाश डाला गया है । 'शिवसूत्र' में प्रथम सूत्र चैतन्यस्वरूप आत्मा से सम्बद्ध है और सूत्र है— 'चैतन्यमात्मा' ।। सोमानन्दनाथ की 'शिवदृष्टि' (शिवसूत्र की व्याख्या माना जाने वाला ग्रन्थ) का प्रथम श्लोक (मंगलाचरण के श्लोक को छोड़कर भी शिवसूत्र की भाँति आत्मपरक ही है—) 'शिवदृष्टि' का (मंगलाचरण को छोड़कर) प्रथम श्लोक— 'आत्मैव सर्वभावेषु स्फुरन्निर्वृतचिद्विभुः । अनिरुद्धेच्छाप्रसरः प्रसरद्दृक्क्रियः शिवः ।। (१।२) है । सोमानन्दपाद कहते हैं कि समस्त भावों (सत्ताओं) में आत्मा ही स्फुरित हो रही है । उसका प्रसार अनिरुद्ध है । वह चिद्रूप है । शिव चिद्रूप, विभु, अरुद्ध, इच्छाप्रसर, स्फुरणशील, दृक् एवं क्रियावान् है । 'स्पन्दसूत्र' का द्वितीय सूत्र भी इन्हीं बिन्दुओं का प्रतिपादक है । कहीं सोमानन्दनाथ ने इसी स्पन्द सूत्र की व्याख्या के रूप में तो 'आत्मैव सर्वभावेषु ... शिवः ।।' नहीं लिखा है? इस सूत्र में भी यही बिन्दु प्रतिपादित हैं— आत्मा— 'यत्र स्थितमिदं सर्वं कार्यं'— अर्थात् जिस स्पन्दात्मक विमर्श भूमिका (आत्मा) या शक्ति में यह समस्त कार्यरूप जगत् अभेदरूप में अवस्थित है । अर्थात् जगत् 'कार्य' है और उसका कर्ता आत्मा या शिव है न कि वेदान्तियों का निष्क्रिय ब्रह्म । इसी आत्मा से समस्त कार्यजगत् निर्गत होता है— 'यस्माच्च निर्गतम्' । उस सत्ता के स्वरूप को कोई आवरण ढक नहीं सकता अतः उसके स्वतन्त्र प्रसार में कहीं कोई निरोध (रुकावट) नहीं है— 'तस्यानावृतरूपत्वात्' 'न निरोधोऽस्ति कुत्रचित् ।।' बन्धन— 'शिवसूत्र' में दूसरा सूत्र बंधन के स्वरूप पर प्रकाश डालता है और 'स्पन्दसूत्र' में भी आत्मा के स्वरूप पर विचार करने के अनन्तर अगले सूत्रों में भी 'बंधन' के स्वरूप पर प्रकाश डाला गया है । २. शैव दर्शन एवं उसकी साम्प्रदायिक परम्परा— शिव के पञ्चमुख—(१) ६४ तन्त्र, (२) शैवागम । कलियुगारंभ— शास्त्रों के उपदेशों + शास्त्रों + परम्पराओं का ह्रास तथा कैलासपर्वत पर भ्रमण करते समय शंकर के द्वारा श्रीकण्ठ बनकर दुर्वासा को त्रिकमत-प्रचार का आदेश । शैव सम्प्रदाय = शैवमत ──────────────────────────────────────────────────────────────────────── नकुलीश वीरशैव शैव रसेश्वर कापालिक कालामुख नाथ दसनामी त्रिक दर्शन पाशुपत (लिंगायत) सिद्धान्त सन्यासी │ ┌────────────┴────────────┐ क्रम प्रत्यभिज्ञा स्पन्द (काश्मीरीय (स्वप्नोपदेश) अद्वैतवादी शैव प्रत्यभिज्ञा)
२२ स्पन्दकारिका सोमानन्द प्रोक्त आचार्य- (शैव शास्त्र की ३ १/२ शाखायें) परम्परा— दुर्वासा (मा० योग बल द्वारा) $\rightarrow$ ३ पुत्र $\downarrow$ ┌──────┬──────┐ श्रीकण्ठ द्वारा दुर्वासा को आदेश त्र्यम्बक आमर्दकनाथ श्रीनाथ $\downarrow$ दुर्वासा (गुफा में त्र्यम्बक नामक (द्वैताद्वैत (द्वैत व शैव $\downarrow$ मानस पुत्र को अद्वैतोपदेश सिद्धान्त का शास्त्र का त्र्यम्बकादित्य (मानसपुत्र) देकर दुर्वासा अंतर्धान हो उपदेश) उपदेश) $\downarrow$ गए) १४ सिद्ध त्र्यम्बक नाथ $\rightarrow$ मानसपुत्री (मानसपुत्रों की पीढ़ी) $\rightarrow$ 'अर्धत्र्यम्बक शाखा' $\downarrow$ प्रवर्तन —तन्त्रालोक (३२ आ०) संगमादित्य (बिन्दु क्रम) (१) १४ सिद्ध तो $\downarrow$ अन्तर्मुखावस्था में स्थित । वर्षादित्य (२) १५ वाँ सिद्ध $\downarrow$ बहिर्मुखावस्था में था। अतः वरुणादित्य योगबल से मानसिक पुत्रों $\downarrow$ को जन्म देने में असमर्थ था आनन्द $\rightarrow$ ब्राह्मण कन्या से विवाह $\downarrow$ $\rightarrow$ संगमादित्य $\rightarrow$ सोमानन्दपाद (काश्मीर में आकर निवास) (त्र्यम्बक परम्परा में आविर्भूत) $\rightarrow$ वर्षादित्य $\rightarrow$ $\downarrow$ अरुणादित्य $\rightarrow$ आनन्द उत्पलदेवाचार्य $\rightarrow$ सोमानन्द $\rightarrow$ (शिष्य) $\downarrow$ उत्पलदेवाचार्य । रामकण्ठाचार्य (१) काश्मीर का 'शिवाद्वयवाद' : समस्त मूलशास्त्र (सर्वप्रथम) = विक्रम की नवम शताब्दी में प्रादुर्भूत 'परावाक्' । समग्र शास्त्र । (वाच्य-वाचक की अविभक्तावस्था) प्रादुर्भाव के पूर्व परावाक् में स्थित $\rightarrow$ 'मध्यमा' = (संपूर्ण वाच्यवाचक (अव्यक्तावस्थावस्थित था) । विश्व के रूप में स्थित) १ परावाक् $\rightarrow$ पश्यन्ती $\rightarrow$ मध्यमा $\rightarrow$ संपूर्णवाच्यवाचक प्रपञ्च का विभाजन $\rightarrow$ मध्यमावस्था में ही परमात्मा द्वारा अपनी ५ शक्तियों (चित्, आनन्द, इच्छा, ज्ञान, क्रिया) द्वारा $\rightarrow$ 'ईशान', 'तत्पुरुष' 'सद्योजात', 'अघोर' एवं 'वामदेव' ५ मुख $\rightarrow$ १. अभिनवगुप्तपाद के 'तन्त्रालोक' की टीका (आ० १। श्लोक १८)—परमेश्वर एव चिदानन्देच्छा ज्ञानक्रियात्मक वक्त्र पञ्चकसूत्रणेन सदाशिवेश्वरदशामधिशयानः तद्वक्त्रपञ्चकमेलनया पञ्चस्रोतोमयं अभेद-भेदाभेद-भेदशोदृकनेन तत्तद्भेदप्रभेद वैचित्र्यात्मनिखिलं शास्त्रमवतारयति, यद् बहिर्वैखरीदशायां स्फुटतामियात् ॥
परिचय एवं पृष्ठभूमि २३ १. अभेदात्मक, २. भेदाभेदात्मक, ३. भेदात्मक निखिल शास्त्रों की अवतारणा । → ‘बैखरी वाक्’ । १ सोमानन्द (९००-९५० वि०) के शिष्य उत्पलाचार्य (९५०-१०००वि०) हैं । सोमानन्द → उत्पलदेवाचार्य (शिष्य) → (पुत्र एवं शिष्य) । (१) लक्ष्मणगुप्त → अभिनवगुप्त (१०००-१०५० वि०) → (शिष्य) राजानक क्षेमराज → (शिष्य) योगराज । (सोमानन्द ‘शिवदृष्टि’) । (२) वसुगुप्त की द्वितीय शिष्य परम्परा—(शिवसूत्रवार्तिक) ‘तन्त्रालोक’ (प्रथमाह्निक) श्लोक ८ में (क) वसुगुप्त अभिनवगुप्त कहते हैं— (१०वीं श०वि०) ‘त्रैयम्बकाभिहितसन्ततिताम्रपर्णी ↓ सन्मौक्तिकप्रकरकान्तिविशेषभाजः । (ख) कल्लट पूर्वे जयन्ति गुरवो गुरुशास्त्रसिन्धु ↓ कल्लोलकेलिकलनात्मककर्णधारः ॥ (ग) प्रद्युम्न भट्ट —श्रीतन्त्रालोक (प्र०अ० ८) ↓ श्रीमच्छ्रीकण्ठनाथाज्ञावशात्सिद्धा अवातरन् । (घ) प्रज्ञार्जुन त्र्यम्बकामर्दकाभिख्य श्रीनाथा अद्वये द्वये । ↓ द्वयाद्वये च निपुणः क्रमेण शिवशासने । (ङ) महादेव भट्ट आद्यस्य चान्वयो जज्ञे द्वितीयो दुहितृक्रमात् ॥ ↓ स चार्थत्र्यम्बकाभिख्यः सन्तान सुप्रतिष्ठितः । (च) श्रीकण्ठ भट्ट अतश्चार्धचतस्रोऽत्र मठिकाः सन्तति क्रमात् ॥ ↓ (विवेकः जयरथ) (छ) भास्कर श्रीमान् श्रीकण्ठ की आज्ञा से ही—१. त्र्यम्बक २. आमर्दक ३. श्रीनाथ नामक क्रमशः (१) अद्वयवाद (२) द्वैतवाद (३) द्वयाद्वयवाद के प्रवर्तक सिद्ध अवतरित हुए । इसमें त्र्यम्बक की वंशपरम्परा प्रवर्तित हुई । आमर्दक की पुत्री का वंशक्रम चला । वह सन्तान अर्ध त्र्यम्बक रूप से प्रतिष्ठित हुई । इस प्रकार यह तीन की जगह ३ १/२ हो गई । इनकी परम्परायें चलीं । सन्तति क्रम से ये मठिकायें स्थापित हुई ॥’ १. श्री सन्तति २. आमर्दक ३. त्रैयम्बक ४. अर्द्ध त्रैयम्बिक—यह साढ़े तीन मठिकायें हुई । इनमें से त्रैयम्बक मठिका से ही इस प्रस्तुत प्रक्रिया का प्रवर्तन हुआ । परम पाशुपताचार्य भगवान् श्रीकण्ठनाथ ने अद्वयवादी शैव शास्त्र का प्रवर्तन किया । १. इह खलु परपरामर्शसारबोधात्मिकायां परस्यां वाचि सर्वभावनिर्भरत्वात् सर्वशास्त्रं परबोधात्मकतयैव उज्जृंभमाणं सत्, पश्यन्ती दशायां वाच्यवाचकाविभाग- स्वभावत्वेन असाधारणतया अहम्प्रत्यवमर्शतात्मा अन्तरुदेति अतएव हि तत्र प्रत्यवमर्शन प्रमात्रा परामृश्यमानो वाच्योऽर्थोऽहन्ताच्छादित एव स्फुरति ॥
२४ स्पन्दकारिका (१) त्र्यम्बक उसी अद्वैतवादी परम्परा के प्रवर्तक श्रीकण्ठ के पुत्र हैं। (२) आमर्दक द्वैतवादी परम्परा के प्रवर्तक थे। (३) श्रीनाथ नामक आचार्य द्वैताद्वैत परम्परा के प्रवर्तक थे। (४) त्र्यम्बक से चलने वाली परम्परा को ही इस पद्य में त्रैयम्बक सन्तति कहा गया है। (विवेक) ॥ ३. स्पन्दशास्त्र और उसके सिद्धान्त— 'स्पन्द' का स्वरूप—भास्करराय ने 'सेतुबंध' (यो० हृ० की टीका) (१।१८) में कहा है कि—'स्पन्द' षट्त्रिंश तत्त्वात्मक विश्व को कहते हैं और देवी तद्रूपिणी है— 'स्पन्दः षट्त्रिंशत्तत्त्वात्मकं विश्वम् । तद्रूपिणी तदभिन्नाम् ।।'१ 'स्पन्द' परमानन्दरूपिणी, निसर्गसुन्दरी, शिवादिक्षित्यन्तषट्त्रिंशत्तत्व स्वरूप में विश्वाकार-अभिव्यक्त, समस्त प्राणियों की आत्मा, परमशिव में सामरस्य द्वारा अभिन्नतया अवस्थित, देवत्रय, शक्तित्रय, बीजमय की समष्टि, प्रकाश-विमर्शसामरस्यरूपिणी परा भट्टारिका, स्वैराचारपरा, स्वातन्त्र्यशक्तिरूपा, चिद्रूपा, तुरीय मन्त्रवाच्या महात्रिपुरसुन्दरी ही 'स्पन्द' हैं—२ 'तन्मयीं परमानन्दनन्दितां स्पन्दरूपिणीम् । निसर्गसुन्दरीं देवीं ज्ञात्वा स्वैरमुपासते ।।'३ अभिनवगुप्तपाद 'तन्त्रालोक' (५ आ० ७९) में कहते हैं—'विमर्श संवित् स्पन्द है'यह परप्रमाता शिव रूप अन्तर तत्त्व में सामान्यरूप से और माया से पृथिवी पर्यन्त बाह्यविस्फार भी भेदभूमि में विशेषरूप से शाश्वत उल्लसित है—इसे ही 'विमर्श' 'स्पन्द' 'हृदय' 'विसर्ग' आदि अनन्त संज्ञाओं से विभूषित किया गया है— 'सामान्य स्पन्द'—यह सर्वातिशायी विश्रान्ति धाम है । सिद्ध लोग वहीं विश्राम करते हैं— अन्तर्बाह्ये द्वये वापि सामान्येतर सुन्दरः । संवित्स्पन्दस्त्रिशक्त्यात्मा संकोच प्रविकासवान् (आ०५।७९) जयरथ 'विवेक' में कहते हैं—'स एव हि संवित्स्पन्दोन्तः परप्रमात्रात्मनि शिव- तत्त्वे सर्वविशेषस्वीकारात् सामान्यात्मा, अत एव प्रविकासवान् अहमिति, 'बाह्ये' मायात: क्षित्यन्तं भेदोल्लासाद्विशेषात्मा, अतएवान्योन्यव्यावृत्त्या संकोचवान् इदमिति । द्वयेऽन्त- र्वहीरूपे विद्यापदे समधृतपुलापुटन्यायेन 'अहमिदम्' इति सामान्य विशेषात्मा अतएव संकोचविकासवान् अतएवाशेषोल्लासकारित्वात् इच्छादिशक्तित्रयात्मा इति स एव परं विश्रान्तिस्थानम्' ।४ 'विशेष स्पन्द' 'औन्मुख्य'—इदमात्मक विमर्श 'विशेष' नामक स्पन्द है और यही 'औन्मुख्य' संज्ञा से भी विभूषित है—
१. सेतुबन्ध । २. योगिनीहृदयदीपिका । ३. योगिनीहृदय । ४. तंत्रालोक—विवेक (५/७९) ।
परिचय एवं पृष्ठभूमि २५ 'ततःस्वातंत्र्यनिर्मेये विचित्रार्थक्रियाकृति। विमर्शनं विशेषाख्य, स्पन्द औन्मुख्य संज्ञितः ॥'१ (५।८१) 'स्वातंत्र्योत्यापिजे तत्तदर्थक्रियाकारिणि भावजाते यदिदमिति विमर्शनं स विशेषाख्यः स्पन्दः ॥'२ 'औन्मुख्य' (इदमात्मक विमर्श = 'स्पन्द') विच्छिन्नविमर्श है यह एक आधार का कार्य करता है। इदमात्मक विश्रान्ति की इस भूमि पर उल्लसित अहमात्मक परामर्श में अन्तर्लक्ष्य योगी ही विश्राम करता है।३ उस दशा में ये ज्ञानेन्द्रियाँ एवं कर्मेन्द्रियाँ भी दिव्य हो जाती है। 'बोध' एवं 'स्वातंत्र्य' ही इनका पर्याय है। अभिनवगुप्त कहते हैं— प्राण में 'स्पन्द' होता है। 'स्पन्द' से संयोग-विभाग भी अपने आप होते हैं। प्राणस्पन्द के अभाव में इसका भी अभाव निश्चित है।४ 'सा चेदुदयते स्पन्दमयी तत्राणगा ध्रुवम्। 'भवेदेव ततः प्राणस्पन्दाभावे न सा भवेत् ॥ ७.२८ ॥'५ स्पन्दशास्त्र की प्रथम कारिका संपूर्ण स्पन्दशास्त्र का निष्कर्ष, सार या निचोड़ है। ध्यातव्य बिन्दु निम्न है— १) 'यस्योन्मेषनिमेषाभ्यां'—यह विशेषण है तो शंकर का, किन्तु उन्मेष-निमेष है क्या? इसका शास्त्रोपक्रम के आदि शब्दों के रूप में प्रयोग क्यों किया गया ? इसका उत्तर यह है कि उन्मेषनिमेषात्मिका स्पन्दशक्ति को प्रामुख्य देने हेतु इसका मंगलाचरण के आदि पदों के रूप में प्रयोग किया गया है। निष्कर्ष—स्पन्दशास्त्र शक्ति-प्राधान्य को स्वीकार करता है। (१) सर्वशक्तिवाद—कारिकाकार कहते हैं कि जिसके 'उन्मेष' एवं 'निमेष' के द्वारा जगत् के उदय एवं प्रलय के कार्य संपन्न होते हैं। भाव यह है कि 'स्पन्दशास्त्र' का प्रणेता उस शंकर की वन्दना करता है। (१) जो शक्तिसमन्वित है ('ब्रह्म' की भाँति शक्तिहीन या स्पन्द-हीन नहीं है)। (२) वह शक्ति शिव को कृत्यकारी बनाती है; ५ कृत्यों की संपादिका बनाती है। (३) जिस शक्ति (उन्मेषनिमेषात्मिका स्पन्दशक्ति) के द्वारा ही शिव जगत् का 'प्रलय' एवं 'उदय' कर पाते हैं और जिसका सहयोग न पाने पर वे कुछ भी नहीं कर सकते। (४) उस (उन्मेषनिमेषात्मिका) स्पन्द शक्ति का स्व स्वरूप ही 'जगत' है। 'शक्ति' जगत् का उपादान कारण हैं। 'शक्ति' ही 'जगत्' है। दो पदार्थ तो हैं ही—(१) 'शक्ति', (२) शक्तिमान।
१. तन्त्रालोक। २. तन्त्रालोक—विवेक (५/८१)। ३. विवेक (५/८२)। ४. विवेक (७/२८)। ५. तन्त्रालोक (७/२८)।
२६ स्पन्दकारिका 'शक्तिश्च शक्तिमांश्चैव पदार्थद्वयमुच्यते' । 'शंकर' तो निस्पन्द है फिर स्पन्दस्वरूप जगत् का उदय होगा किसके द्वारा? 'शक्ति' के द्वारा ही होगा, क्योंकि—'सृष्टिस्तु कुण्डली ख्याता' । अर्थात् 'सृष्टि' शक्ति है। निष्कर्ष यह कि जगत् के प्रलय-उदय का निष्पादक औपचारिक (अप्रत्यक्ष) दृष्टि से भले ही शिव हो किन्तु प्रत्यक्षतः तो इसका निष्पादन 'शक्ति' द्वारा ही संभव हो पाता है—क्योंकि वही तो 'सृष्टि' है, वही तो 'जगत्' है—वही तो 'इच्छा' है—वही 'ज्ञान' है—वही 'क्रिया' है—वही 'चैतन्य' है और वही 'आनन्द' है। 'जगत्' उसी शक्ति का विकसित रूप है। वही शिव की भी शक्ति है—'सार' है 'विमर्श' है—'हृदय' है। (२) अजातिवाद एवं उदयवाद—गौड़पादाचार्य (अद्वैत वेदान्ती) ने माण्डूक्य कारिकाओं में 'अजातिवाद' का प्रतिपादत किया था। भले ही 'स्पन्द' एवं 'प्रत्यभिज्ञा' के आचार्य इसे 'अजातिवाद' का अभिधान न दें किन्तु प्रतिपादन तो उसी सिद्धान्त का करते हैं क्योंकि कारिकाकार का कथन है—'जिसके द्वारा प्रलय एवं उदय के कृत्य निष्पादित किये जाते हैं वह निमेषोन्मेषात्मिका स्पन्द शक्ति है।' 'उदय' के स्थान पर उत्पत्ति (अविर्भाव) का प्रयोग क्यों नहीं किया गया । 'उत्पत्ति' उसकी होती है जो पहले कभी न रहा हो और जो बाद में भी नहीं रहेगा—यथा 'घट' 'पट' आदि । किन्तु 'स्पन्द' एवं 'प्रत्यभिज्ञाशास्त्र' का मत है कि 'जगत्' 'शक्ति' के विकास के समय स्थूल जगत् के रूप में—स्थूल 'इदम्' के रूप में 'अहं' से पृथक् होकर रहता है और 'प्रलय' के समय यह 'इदम्' (जगत) शक्ति की कुक्षि में 'अहं' में लय होकर—अहमाकार होकर रहता है अतः जगत् जो पहले से ही कारण रूप शक्ति में नित्य विद्यमान है उसकी उत्पत्ति (नव्याविर्भाव) कैसे संभव है? उत्पत्ति तो उसकी होती है जो पहले अस्तित्व में था ही नहीं। इन्हीं दृष्टियों से कारिकाकार ने— 'प्रलयोदयौ' शब्दों का प्रयोग किया न कि 'संहार अविर्भावौ' पदों का । यही स्पन्दशास्त्रीय 'उदयवाद' 'उन्मेषवाद' भी कहलाता है। स्पन्दशास्त्र मानता है कि किसी भी वस्तु की नव्य उत्पत्ति नहीं होती—केवल उसकी (अपनी अव्यक्तावस्था से) अभिव्यक्ति—व्यक्तता होती है और संसारी लोग उसे प्रादुर्भाव या उत्पत्ति मानते हैं। यूनान का दार्शनिक Plato भी यही मानता था और इसी के समतुल्य विचार Platinus के भी थे। ये दोनों दार्शनिक भी स्पन्दशास्त्रियों की भी दृष्टि रखते थे। 'जहाँ तक' 'प्रलय' ('प्रलयोदयौ') शब्द के प्रयोग की बात है वह अत्यन्त समीचीन है क्योंकि यह 'संहार' का द्योतक नहीं प्रत्युत 'कार्य' के अपने 'कारण' में 'लय' (निमज्जन) होने या 'व्यक्त' के अपनी मौलिक सत्ता या मूल स्वरूप 'अव्यक्ता- वस्था' में प्रत्यावर्तित होने का द्योतक है। (३) 'क्रीडावाद'—'व्यक्त' का 'अव्यक्त' में छिप जाना या अव्यक्त का व्यक्त रूप से प्रकाशित हो उठना, पतिभूमिका से पशुभूमिका में अवतरण होना या पशु भूमिका
परिचय एवं पृष्ठभूमि २७ से ऊपर उठकर पति भूमिका में स्वरूपावस्थान प्राप्त करना प्रलय या उदय, पाशों को (मलों को) ग्रहण करके 'पति' द्वारा 'पशु' की भूमिका का मंचन या अभिनय करना या पशु का अपने मूल रूप में अवस्थान आदि सभी शिव की क्रीडायें हैं 'उदय' एवं 'प्रलय' ये भी शिव की क्रीडायें ही हैं। अतः विश्व एक क्रीड़ा है—यही सत्य है— 'इति वा यस्य संवित्तिः क्रीडात्वेनाखिलं जगत्'—कहकर स्पन्दसूत्रकार ने जिस क्रीड़ावाद को स्पष्टतः उद्भासित किया है उसी भाव को 'उदय' एवं 'प्रलय' द्वारा शैवी या शाक्ती क्रीड़ा के अर्थ में प्रयुक्त करके भी व्यक्त किया गया है। (४) संकल्पसृष्टिवाद—(भट्टकल्लट ने इस प्रथम सूत्र की व्याख्या—) 'अनेन स्वस्वभावस्यैव शिवात्मकस्य संकल्पमात्रेण जगदुत्पत्तिसंहारयोः'—के रूप में करके सृष्टि-प्रलय दोनों का कारण शिव के संकल्प को बताया है और इस प्रकार—'संकल्प सृष्टिवाद' का प्रतिपादन किया है। (५) 'इच्छासृष्टिवाद'—'इच्छामात्रं प्रभोः सृष्टिः' के द्वारा माण्डूक्यकारिका में गौड़पाद ने जिस 'इच्छासृष्टिवाद' के मत का उल्लेख किया है उसी का प्रतिपादन स्पन्दकारिकाकार ने भी किया है क्योंकि आचार्य रामकण्ठ 'उन्मेष-निमेष' को शैवी इच्छा का पर्याय स्वीकार करते हुए कहते हैं—'उन्मेषनिमेषशब्दाभ्यां तदुपचरितवृत्तिभ्यां इच्छामात्रमेकं शङ्करसम्बन्धि प्रतिपाद्यते' । 'मालिनीविजय' (३.५) भी इसी भाव को प्रतिपादित करता है— 'या सा शक्तिर्जगद्धातुः कथिता समवायिनी ।' इच्छात्वं तस्य वा देवी सिसृक्षोः प्रतिपाद्यते ॥ (मा०वि० ३.५) (६) स्वातन्त्र्यवाद— 'स्वातन्त्र्यवाद'—यदि 'इच्छा' ही जगत् का उपादान कारण है तो इसे 'स्वातन्त्र्य- वाद' का प्रतिपादक मानना पड़ेगा क्योंकि शिव की स्वधर्मा पराशक्ति (जिसे 'स्वातन्त्र्य- शक्ति' कहते हैं) प्रथमतः 'इच्छा' के रूप में ही विकसित होती है। विश्वरूप में रूपान्तरित या प्रसृत होने की ओर प्रवृत्त या उन्मुख होने के समय शिव की आत्मभूता 'स्वातन्त्र्यशक्ति' सबसे पूर्व इच्छा का ही रूप धारण करती है। 'स्वातन्त्र्य' ही परमात्मा की यथार्थ शक्ति है और वह एक है। इच्छा रूप में परिणत (एवं विश्व का मूलोपादान कारण) स्वातन्त्र्यशक्ति के ही प्राधान्य के कारण स्पन्दशास्त्र के मुख्य सिद्धान्त को कहते हैं। (७) द्वयात्मक अद्वयवाद—(पदार्थद्वयवाद)—'यस्योन्मेषनिमेषाभ्यां' एवं 'शक्तिचक्रविभवप्रभवं' वाक्यों का प्रयोग करके स्पन्दशास्त्र ने 'शङ्कर' एवं 'शक्ति' दोनों को मूल पदार्थ स्वीकार करके 'द्वयात्मक अद्वयवाद' को सिद्धान्ततः स्वीकार करते हुए उसे अपना मत व्यक्त किया है। यही मत (सिद्धान्त) प्रत्यभिज्ञाशास्त्र को भी स्वीकार है। (८) सर्व विमर्शवाद (विमर्शसृष्टिवाद)—'संकल्प' 'इच्छा' 'शक्ति' 'सिसृक्षा' आदि शिव के 'विमर्श' हैं। यही 'विमर्श' निखिल जगत् का मूल कारण है अतः