स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा
२८ स्पन्दकारिका स्पन्द एवं प्रत्यभिज्ञा दोनों शास्त्र 'विमर्शवाद' के प्रतिपादक भी हैं । शिव का 'स्वभाव' 'विमर्श' हैं । भट्टकल्लट ने 'स्पन्द सर्वस्व' में कहा है कि—शिव 'स्वस्वभाव' है— 'स्वस्वभावस्यैव शिवात्मकस्य' । क्षेमराज 'शिवसूत्रविमर्शिनी' में कहते है— (क) चैतन्यं परमार्थतः 'शिव एव विश्वस्य आत्मा' । (ख) चैतन्यम् उक्तं स एव आत्मा । स्वभाव... भावाभाव रूपस्य विश्वस्य जगतः ॥ (ग) चैतन्यं विश्वस्य स्वभावः ॥ (घ) जीवजडात्मनो विश्वस्य परमशिवरूपं चैतन्यमेव स्वभावः । (ङ) शंकरात्मक स्पन्दतत्त्वरूपं चैतन्यम् । (च) स्वप्रकाशचिदेकीभूतत्वात् चैतन्यमैव । (छ) चैतन्य शब्देनोक्तं यत्किंचित् स्वातंत्र्यात्मकं रूपम् । (९) स्वस्वभाववाद—शिव 'स्वस्वभाव' है अतः उसका स्वात्माभिनय रूप जगत् भी 'स्वस्वभाव' है । जगत् स्वस्वभाव शिव को अपना स्वरूप न मानकर परस्वभाव (परस्वरूप) = शरीर, इन्द्रिय, मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार एवं अन्य वेद्योँ (प्रमेयों) को अपना स्वभाव मानता है, उनके साथ तादात्म्य रखने के कारण तद्रूप (परस्वभाव, पर स्वरूप) बन जाता है । समस्त, दुःख, सुख, मिलन, वियोग, जन्म-मरण बंधन-संसरण आदि सभी का कारण यही परस्वभाव ग्रहण है । स्वस्वभाव अपनी आत्मा है—अपना शाश्वत आत्म चैतन्य है—स्पन्द है—शिव है और अपनी शाश्वत आत्मसत्ता हैं । यह स्वस्वभावावस्थान ही ('तदा द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम्'—योगसूत्र) स्वरूपावस्थान है । चेतन जब जड़ पदार्थों, अनित्य वस्तुओं एवं अनात्म सत्ताओं के साथ अपना तादात्म्य स्थापित कर लेता है तब चेतन होकर भी जड़, नित्य होते हुए भी अनित्य एवं आत्मा होकर भी अनात्मक होने का अनुभव करने लगता है—यही है उसके संसरण एवं बंधन का कारण । स्पन्द एवं प्रत्यभिज्ञा का लक्ष्य 'स्वस्वभाव' की प्राप्ति पर बल देता है । (१०) अद्वैतवाद—चूँकि सारे भावों का स्वस्वभाव शक्ति एवं शिव है या स्पन्दात्मा एवं स्पन्द है । अतः स्पन्द एवं प्रत्यभिज्ञा का उद्देश्य उसी स्वस्वभाव (शिव- शक्ति) के साथ अद्वैतभाव (तादात्म्य, ताद्रूप्य) या एकीभाव की प्राप्ति है । शक्ति एवं शिव के साथ अपनी अभेदता या अद्वैतभाव की अनुभूति ही स्पन्द एवं प्रत्यभिज्ञा का लक्ष्य है—'विश्वात्मा शिव एवास्मि इति यो वितर्को विचारः एतदेव अस्य आत्मज्ञानम्'; यही अनुभूति आत्मज्ञान है— सर्वज्ञः सर्वकर्ता च व्यापकः परमेश्वरः । स एवाहं शैवधर्मा इति दाढर्याच्छिवो भवेत् ॥ (विज्ञानभैरव) स्पन्द में कहा गया है—'अयमेवात्मनो ग्रहः' । क्षेमराज ने ठीक ही कहा है कि—'जीवजडात्मनो विश्वस्य परमशिवरूपं चैतन्यमेव स्वभावः ॥' (क्षेमराज) 'चैतन्यं विश्वस्य स्वभावः ॥' 'शिव एव विश्वस्य आत्मा' (क्षेमराज) । इन समस्त उदाहरणों से,
परिचय एवं पृष्ठभूमि २९ समस्त विश्व को शिव का विमर्श या शक्तिरूप प्रतिपादित करने से तथा उन्मेष-निमेष से 'प्रलयोदय' मानने से भी अद्वैत की ही पुष्टि होती है। निरपेक्ष शक्ति अपने स्वस्वरूप के उपादान से स्वात्मभित्ति पर चित्रात्मक जगत् को चित्रित करती है। जगत् उसका व्यक्त स्वरूप-उसका चित्र-लेखन या आभास मात्र है अतः सर्वत्र अद्वैतभाव ही प्रतिष्ठित है। स्वभाववाद एवं स्वस्वरूपवाद—जब भी 'आत्मा' या 'परमात्मा' के विषय में कोई बात कही जाती है तब यह ऐसा ही लगता है कि यह किसी 'अन्य' के विषय में बात कही जा रही है जो कि अप्रत्यक्ष रूप से हमसे शायद सम्बद्ध तो है किन्तु अनुभव के धरातल पर उसका अपने से संबंधित होना भी (आत्मानुभव का विषय न होने के कारण) प्रमाणित एवं असंदिग्ध नहीं है। जो 'अन्य' है और स्वानुभव का विषय न होने के कारण केवल कल्पना का विषय है उसकी साधना करना भी कितना सार्थक होगा? इस प्रकार के अनेक विकल्प एवं तर्क मन में उठते हैं। इन्हीं कारणों से जैनियों ने 'परमात्मा' के अस्तित्व को भी स्वीकार करने का निषेध कर दिया और केवल अपने स्वस्वरूप (आत्मा) की उपासना को ही स्वीकार किया। बौद्धों ने 'आत्मा' और 'परमात्मा' दोनों का निषेध करके अपनी सत्ता का और निकट से संधान करते हुए साधना के नूतन मार्ग का प्रवर्तन किया। किन्तु जैन धर्म में भी आत्मोपासना की ही बात करते-करते ऐसा प्रतीत होने लगा कि मानों आत्मा भी हमसे पृथक् कोई अन्य सत्ता है और उसे पाने या उसका साक्षात्कार करने हेतु किसी अपने से अन्य (आत्मा नामक तत्त्व) की शरण में जाना पड़ेगा। यह 'अहं' (व्यक्ति का भौतिक अस्तित्व) और 'त्वं' (आत्मिक सत्ता) की भेद-दृष्टि, 'आत्मा' का अपनी जागतिक सत्ता से पृथक् स्थिति का भान कराता रहा अतः 'आत्मा' शब्द भी अपने से 'अन्य' की श्रेणी में अनुभूत होने लगा यथा बौद्धों का 'शून्य' एवं 'विज्ञान' । 'स्पन्ददर्शन' एवं 'प्रत्यभिज्ञादर्शन'—इन दर्शनों ने आत्मा एवं परमात्मा दोनों को व्यक्ति का आन्तर स्वभाव, आन्तर शक्ति 'स्वभाव' 'स्वस्वरूप' कहकर उपास्य- उपासक की विप्रकृष्टता को दूर कर दिया। 'स्पन्दकारिका' में 'आत्मा' एवं 'परमात्मा' या 'शिव' तथा 'शक्ति' का भी अत्यल्प प्रयोग किया है और सर्वत्र उस 'आत्मा' एवं 'परमात्मा' को अपनी ही अभिन्नसत्ता के रूप में प्रतिष्ठित करने हेतु बार बार 'स्वस्वरूप' 'स्वस्वभाव' शब्दों का प्रयोग किया है। उद्देश्य यह था कि साधक यह न माने कि वह अपने से पृथक् किसी अन्य महत्तम सत्ता की उपासना कर रहा है या वह जिसकी आराधना कर रहा है वह अपने से पृथक् कोई अन्य सर्वातिशायी स्वतन्त्र सत्ता है जिसकी कि वह आराधना कर रहा है। परमात्मा को अपने से निकटतम से निकटतम देखने का प्रयास 'शिवोऽहं' 'अहं ब्रह्मास्मि' 'अयमात्मा ब्रह्म' 'तत्त्वमसि' आदि वाक्यों द्वारा भी किया गया किन्तु 'अहं' एवं 'शिव' (शिवोऽहं) अहं + ब्रह्म + अस्मि (अहं ब्रह्मास्मि) तत् + त्वं + असि (तत्त्वमसि) में भी 'स्व' एवं 'पर' (साधक एवं आत्मा तथा परमात्मा) की पृथकता का भाव बना ही रहा और उसने साधना में साधक को साध्य से पृथक् ही रक्खा।
३० स्पन्दकारिका 'स्पन्ददर्शन' एवं 'प्रत्यभिज्ञादर्शन' दोनों इस भूल को पहचान चुके थे अतः उन्होंने परमात्मा एवं आत्मा शब्द को आराधक के और निकट लाने के प्रयास में 'स्व' शब्द का प्रयोग किया—(१) 'यस्योन्मेषनिमेषाभ्यां' (का०१) की व्याख्या में—भट्टकल्लट ने 'स्वस्वभावस्यैव' द्वि०का० की व्याख्या में—'स्वस्वभावस्यैव' 'अनाच्छादित स्वभावत्वात्' (का-३) 'न तस्य स्वरूपम् अप्रियते' 'न तस्य स्वरूपान्यथाभावः' 'स्वस्वभावः' (का० ४), (स्वस्वभावभूतस्य) (का०६,७) अपितु स्वस्वरूपे (का० ८) स्वभावमवलोकन (का० ११) 'आत्मस्वभावः' (वृत्ति), न च आत्मस्वभाव एष (वृत्तिः का० १२) 'स्वभावो मे विलुप्त' (का० १५ः वृत्ति) तत्स्वरूप मे (का० १६ वृत्ति) चिद्रूपस्य सर्वगतस्य स्वस्वभावस्य (का० १७ वृत्ति) 'स्वभावस्य' (का० १९ः वृत्ति) 'स्वस्थितेः चिद्रूपायाः' (२० वृत्ति) 'स्पन्दतत्त्वस्य (स्वरूपाभिव्यक्त्यर्थ) (का० २१ वृत्ति) स्पन्दस्वरूपरूपावस्थायाम् (२३ वृत्ति) स्वस्वभावाभिव्यक्ति (का० २५ वृत्ति) 'स्वस्वभाव व्योम्नि (का० २७ वृत्ति) 'सर्वभावसमुद्भावात् (का०२८) सर्वात्मकेन स्वभावेन (का० २९ वृत्ति) एवं स्वभावं यस्य (का० ३० वृत्ति) अनभिव्यक्त स्वस्वरूपस्य (३३ का० वृत्ति), स्वरूप स्थित्यभावे (का० ३५ वृत्ति) स्वबल (का० ३६) 'बलमाक्रम्य' (का० ३७) 'स्वबलं स्वस्वरूपं (का० ३७ वृत्ति) 'स्वभावानुशीलेन (का० ३८ वृत्ति) अने- नात्मस्वभावेन (का० ३९ वृत्ति) स्वयमेवावभोत्स्यते (का० ४३) तत्स्वभावं अवभोत्स्यते ज्ञास्यते (का० ४३ वृत्ति) स्वस्वभावात् प्रच्यवितः पशुरुच्यते (४५ वृत्ति) स्वरूपावरणे (का० ४७) स्वस्वभावास्त्याच्छादने (४७ वृत्ति) ।। 'स्वस्वभाव' 'स्वस्वरूप' के अतिरिक्त 'स्वबल' (अर्थात् आत्मबल) 'बलं आक्रम्य' (आत्मबलं अधिष्ठाय) आदि सभी पदों में 'स्व' का ही प्राधान्य है । जहाँ तक 'स्पन्द' की बात है 'स्पन्द' का अर्थ ही है—'अहं विमर्श' । स्पन्द में भी 'अहं' (स्व का भाव) सुरक्षित है । परादेवी एवं स्वभाव— परादेवी भी 'स्वभावामर्शनोत्सुका' है— 'तस्यैवैषा परा देवी स्वभावामर्शनोत्सुका । पूर्णत्वं सर्वभावानां यस्या नाल्पं न वाधिकम् ॥' १ परमेश्वर एवं स्वभाव— स एव सर्वभूतानां स्वभावः परमेश्वरः । स एव भैरवो देवो जगद्भरणलक्षणः ॥२ अनुग्रहवाद—'शङ्करं स्तुमः' (१ का०) कहकर सूत्रकार ने परमात्मा शिव के अनुग्रहात्मास्वरूप की स्तुति की है । शिवात्मक (अनुग्रह शक्ति द्वारा शिवत्व प्राप्ति की क्षमता वाले) या मंगलमय ।। 'शं' = मंगल 'करं' = करने वाले = अनुग्रह (मंगल) करने वाले । १. स्पन्दकारिका एवं भट्टकल्लट कृत स्पन्दकारिकावृत्ति । २. चिद्वल्ली (कामकलाविलास) ।
परिचय एवं पृष्ठभूमि ३१ अभिनवगुप्तपादाचार्य 'परात्रिंशिका' विवृत्ति में कहते हैं—परमात्मा अनुग्रहात्मा है। यह पञ्चकृत्यविधायक परमात्मा अपनी अनुग्रहरूपा पराशक्ति से युक्त है और इस पराशक्ति को किसी भी दृष्टि से शिव से यत्किंचित् भी पृथक् आमर्शन करना उचित नहीं है— 'परमेश्वरः पञ्चविधकृत्यमयः सततम् अनुग्रहमय्या परारूपया शक्त्या आक्रान्तो वस्तुनोऽनुग्रहैकात्मैव, नहि शक्तिः शिवात् भेदमामर्शयेत् ॥'¹ जीवों के 'अदृष्ट' के कारण सृष्टि होती है—ऐसा मीमांसक मानते हैं । कार्यों का भोग तो आवश्यक है । विना कर्मोपभोग या कर्मों के बीजों को दग्ध किए बिना तो मुक्ति संभव नहीं । अतः भगवान् अपनी अहेतु की कृपा से जीवों को जन्म देकर उन्हें कार्यों- पभोग या साधनाओं द्वारा मुक्त होने का आसार प्रदान करते हैं । यह उनका अनुग्रह है । मुक्ति के जो उपायत्रय—शांभव, शाक्त एवं आणव है,—इनकी सफलता का सूत्रधार भी परमेश्वर का अनुग्रह है । शास्त्रों में तो कहा गया है कि उपायजाल से मुक्ति नहीं मिलती । मुक्ति तो परमेश्वरानुग्रह है अतः 'अनुपाय' (उपाय शून्य किन्तु परमात्मा का शक्तिपात) ही मुक्ति का उत्कृष्टतम साधन है । अभिनवगुप्त 'मालिनीवार्तिक' में कहते हैं— 'अतएव पराद्वैतं यद्विक्षानुग्रहात्मकम् ॥ (२ का० १८) अनुपायमिदं तस्मादुपायोपेययोगतः । भेदबंधाद्विमुच्येत कथं वेतरथा जनः ।। (द्वि०काण्ड १२०) 'नहि तस्य परा वित्तिं प्रति काचिदुपायता ॥' (मा०वि०) जीवों को पशु अवस्था से विमर्शभूमिका में पहुँचाना भी शिव की कृपा मात्र ही है । यही उनका शंकरत्व (कल्याणकारित्व) है । यही अनुग्रह है । भट्टकल्लट का 'अनेन स्वस्वभावस्यैव शिवात्मकस्य' व्याख्या शिव के इसी अनुग्रह-वाद—कल्याणकारी स्वभाव, अनुग्रह शक्ति द्वारा भेदस्तर से अभेद स्तर पर जीवों का आरोहण—का प्रतिपादन करती है । (१) 'शिवात्मक' = बंधन से मुक्ति, भेदस्तर से अभेद स्तर पर आरोहण, (२) 'स्वस्वभाव' = यही शिवात्मक (अनुग्रहकारी) स्वभाव है । (३) 'विज्ञानदेह' = शंकर नामक वह 'स्वस्वभाव' 'विज्ञानदेह' (कल्लट के शब्दों में) है—विमर्शात्मक स्पन्दन स्वरूप है । (४) 'शक्तिचक्रविभव' = स्पन्दशक्ति को एक साथ ही विशेष स्पन्दों के रूप में प्रवाहमयता एवं अपने नित्य एवं अभेदात्मक सामान्य स्पन्द रूप में या केवली रूप में विश्रान्त होने की स्वातन्त्र्यशील क्रियाशीलता ही शक्ति चक्र का ऐश्वर्य या चमत्कार है । यह ऐश्वर्य भी अनुग्रहात्मक है । १. परात्रिंशिका (श्लोक क्र० १) ।
३२ स्पन्दकारिका पूर्णाहन्ताविमर्श—‘यस्योन्मेषनिमेषाभ्यां’ ‘शक्तिचक्रविभव’ पदों का प्रयोग करके कारिकाकार ने शक्ति के स्वरूप ‘पूर्ण अहंविमर्श’—अहं-विमर्शरूपा मौलिक स्फुरणा (जिसके द्वारा यह शक्ति अद्वैत, एक एवं अभिन्न होने पर भी द्वैतात्मक, भिन्नात्मक एवं अनेकात्मक विश्व के रूप में प्रसृत या अवभासित होती है) की ओर भी संकेत करते ही (स्पन्द = किंचित् चलन = सूक्ष्माकारित अहंविमर्शात्मक स्फुरणा—अहंविमर्शात्मक स्पन्द या अहंप्रत्यवमर्श) साधना इनके लक्ष्य इसी को ‘पूर्णाहन्ता’ के आदर्श एवं अखण्ड ‘अहं प्रत्यवमर्श’ के रूप में रेखांकित किया है । अहंप्रत्यवमर्श न करना सर्वोच्च अपराध है ।१ शास्त्र एवं उनके उपदेश भी परमानुग्रहजन्य हैं— कैलासाद्रौ भ्रमन्देवो मूर्त्या श्रीकण्ठरूपया । अनुग्रहायावतीर्णश्चोदयामास भूतले ॥ अनुग्रहवाद— मुनि दुर्वाससं नाम भगवानूर्ध्वरेतसम् । नोच्छिद्यते यथा शास्त्रं रहस्यं कुरु तादृशम् ॥ ततः सभगवान्देवादादेशं प्राप्य यत्नतः । ससर्ज मानसं पुत्रं त्र्यम्बकादित्यनामकम् ॥ (शिवः १०७-१११) अमृतानन्दनाथ ‘दीपिका’ में कहते हैं— ‘तन्त्रावतारं तन्वाते सर्वत्रानुजिघृक्षया ॥’ भगवान् शिव ने अनुग्रहेच्छा से तन्त्रों को अवतरित किया । प्रकाशात्मकः परमशिवोऽहमेव विश्वानुग्रहपरः सन् परापश्यन्तीमध्यमाबैखरीक्रमेण व्यापृत्य विमर्शांशेन प्रष्टा भूत्वा प्रकाशांशेन प्रतिवचनदातापि सन् तन्त्रं समवतारया- मीत्यर्थः । संकल्पवाद—पाश्चात्य दार्शनिक शोपेन हावर की एक पुस्तक का नाम है ‘World as an Idea’ अर्थात् संसार एक विचार मात्र है । यूनानी दार्शनिकों ने भी जगत् को मूल ईश्वरीय विचार की अनुकृति (Emitation) कहा है । स्पन्दशास्त्र के दार्शनिकों ने इसे परमात्मा का ‘संकल्प’ कहा है । भट्टकल्लट ने ‘स्पन्दकारिकावृत्ति’ में इस संकल्पवाद का बार-बार स्मरण कराया है— ‘अनेन स्वस्वभावस्य शिवात्मकस्य संकल्पमात्रेण जगदुत्पत्तिसंहारयोः कारणत्वं’ (वृत्तिः स्पं० का० १।१) । योगी भी इसी तथ्य की पुष्टि करते हैं । स्वात्माराम मुनीन्द्र ‘हठयोग प्रदीपिका’ में कहते हैं— संकल्पमात्रकलनैव जगत्समग्रं संकल्पमात्रकलनैव मनोविलासः ।
१. तन्त्रालोक—अभिनवगुप्तपादाचार्य ।
परिचय एवं पृष्ठभूमि ३३ संकल्पमात्रमतिमुत्सृज्य निर्विकल्प- माश्रित्य निश्चयमवाप्नुहि राम शान्तिम् ॥ (४।५८) भोगापवर्गसाहचर्यवाद—'त्रिकदर्शन' योग एवं भोग, संसार एवं अपवर्ग दोनों में विश्वास करता है। स्पन्दप्रदीपिकाकार ने पाठकों को यह सूचना देते हुए कि— 'अथ संग्रहग्रन्थकृता समग्रमग्र्य ग्रन्थार्थं गर्भीकृत्य ग्रन्थनिष्पत्यर्थमभिमतदेवतां स्तोतुं श्लोक उपन्यस्तस्त्यार्थः प्राक् श्लोके ध्वनितोऽपि विततोच्यते— 'यस्योन्मेषनिमेषाभ्यां जगतः प्रलयोदयौ। तं शक्तिचक्रविभवप्रभवं शंकरं, स्तुमः।' (स्पन्दकारिकाविवृति) १ अर्थात् 'स्पन्दकारिका' ग्रन्थ की अगली कारिकाओं में या संपूर्ण इस ग्रन्थ में जो कुछ भी कहा गया है उसका सारांश प्रथम कारिका में दिया जा चुका है—आगे कहते हैं कि इन पंक्तियों द्वारा युगपदभोगापवर्गसाहचर्यवाद की पुष्टि की गई है क्योंकि 'शंकर स्तुमः' में 'शंकर' का अर्थ मात्र कल्याण' ही नहीं प्रत्युत् 'भोग' भी है। 'शं' का अर्थ है श्रेय या सुख। यह सुख 'शं' द्विपक्षीय है—१. भोग, २. अपवर्गः 'भोगापवर्गाख्यं शं = श्रेयः सुखं वा करोतीति शंकरः ॥' २ 'स्पन्दकारिका' के विभूति स्पन्द निष्पन्द में अनेक प्रकार की भोगात्मक सिद्धियों की ओर संकेत किया गया है तथा स्पन्दशास्त्र का लक्ष्य शक्तिचक्र की ईश्वरता की प्राप्ति बताया गया है— यदात्वेकत्र संरूढस्तदा तस्य लयोद्भवौ। नियच्छन् भोक्तृतामेति ततश्चक्रेश्वरो भवेत् ॥ (स्पन्द का० २१) शब्दाद्वैत के निरासपूर्वक 'ईश्वराद्वयवाद' की स्थापना— उत्पलदेव 'शिवदृष्टिवृत्ति' में कहते हैं—'ईश्वराद्वयवाद एव युक्तियुक्तो न तु शब्दपरब्रह्माद्वयवाद इति वक्तुं वैयाकरणोपेतशब्दाद्वैतं तावन्निराकर्तुमुपक्रममाण आह— 'अथास्माकं ज्ञानशक्तिर्या सदाशिवरूपता। वैयाकरणासाधूनां पश्यन्ती सा परा स्थितिः ॥ ('शिवदृष्टि' २ आ०१) 'अद्वयवादस्थितः'। (शिवदृष्टिवृत्तिः (उत्पलदेव) २।१) सर्वचिन्मयवाद—आचार्य सोमानन्दपाद कहते हैं— 'सर्वभावेषु चिद्व्यक्तेः स्थितैव परमार्थता ॥' (शिवदृष्टिः ४ आ०५) सारे भाव चित् शक्ति की मात्र अभिव्यक्तियाँ हैं। आचार्य क्षेमराज 'प्रत्यभिज्ञाहृदयम्' में कहते हैं—(१) चिदेव भगवती स्वच्छ- स्वतन्त्ररूपा तत्तदनन्तजगदात्मना स्फुरति।—इत्येतावत् परमार्थोऽयं कार्यकारणभावः। (२) चितिः स्वतन्त्रा विश्वसिद्धिहेतुः ॥ (३) पराशक्तिरूपा चितिः एव भगवती स्वतन्त्रा १. स्पन्दकारिकाविवृति। २. स्पन्दकारिका (प्रथम कारिका)। स्पं.भू. २
३४ स्पन्दकारिका अनुत्तरविमर्शमयी शिवभट्टारकाभिन्ना हेतुः । (४) चितो माहेश्वर्यसारतां ब्रूते । (५) चिदै- कात्म्येव विश्वशरीरः शिवभट्टारक एव ।। (६) चितिरेव भगवती विश्ववमनात् संसार- वामाचारत्वाच्च वामेश्वर्याख्या सती, खेचरी, गोचरी, दिक्चरी भूचरीरूपैः अशेषैः प्रमातृ अन्तःकरण बहिष्करणाभावस्वभावैः परिस्फुरन्ती । ‘जीवन्मुक्तिवाद’—त्रिक दर्शन ‘विदेह मुक्ति’ ‘सालोक्य’ ‘सामीप्य’ ‘सारूप्य’ ‘सार्ष्टि’ ‘सायुज्य’ आदि का प्रतिपादन न करके समावेशमयी मुक्ति या ‘जीवन्मुक्ति’ में विश्वास करता है—‘इह हि जीवन्मुक्ततैव मोक्षः ।।' १ स्पन्दकारिका में भी कहा गया है— 'इति वा यस्य संवित्तिः क्रीडात्वेनाखिलं जगत् । सपश्यन् सततं युक्तो जीवन्मुक्तो न संशयः ॥' २ ऐसा योगी जीवित रहता हुआ भी ईश्वर की भाँति मुक्त रहता है— 'योऽखिलं समग्रं जगत् क्रीडारामतया पश्यन् विभावयन नित्ययुक्तत्वाच्च बंधकारण- स्याज्ञानस्य क्षयात् प्रबोधारतो जीवन्नेवेश्वरवन्मुक्तो' । ३ 'सम्यक् स्वबोधविश्रान्तौ योऽलुप्तानुभवः स्थितः । विषयानपि सोऽश्नन् स्याज्जीवन्मुक्तस्तु तत्त्ववित् ॥' ४ जो लोग यह कहते हैं कि—'विनोत्क्रान्तिं कुतो मोक्षः'? उनका संदेह व्यर्थ है क्योंकि— 'विना स्वभावानुभवेन पुंसः कैवल्यमुत्क्रान्तिबलाद्यदि स्यात् । अत्रापि पक्षे ननु मोक्ष भाक्त उद्धन्धनं यः कुरुते प्रमूढः ॥' और— 'विदेहा अपि बध्यन्ते प्रलये गुणवासिताः । शरीरिणोऽपि मुच्यन्ते विशुद्धज्ञानसंश्रयात् ॥' सर्वचैतन्यवाद—'स्पन्द' एवं 'प्रत्यभिज्ञा' दोनों सर्वचिन्मयवाद या सर्वचैतन्यवाद के प्रतिपादक हैं । इनकी मान्यता है कि कोई भी पदार्थ जड़ है ही नहीं केवल उनमें चैतन्य की अल्पता है न कि अभाव है । चिद्रूपा पराशक्ति की शक्ति अचेतन कैसे हो सकती है? रही चैतन्य की कमी तो यह कमी तो सृष्टि के प्रत्येक स्तर पर न्यूनाधिक विद्यमान है तथा चैतन्य के विभिन्न स्तर चैतन्य की कमी एवं अधिकता पर ही अवलम्बित है । सर्वचिन्मयतावाद—'शिवसूत्र' का प्रथम सूत्र है—'चैतन्यमात्मा' (१।१) भट्टभास्कर इस विषय में कहते हैं— १. स्पन्दप्रदीपिका (उत्पलाचार्य) : प्रथम कारिका की व्याख्या । २. स्पन्दप्रदीपिका (का० ३०) । ३. स्पन्दकारिका (३०) । ४. स्पन्दकारिका : स्पन्दकारिका का 'क्रीडावाद' (इति वा यस्य संवित्तिः क्रीडात्वेनाऽ- खिलं जगत् ।) । शिवदृष्टि—'क्रीडन्करोति पादातधर्मांस्तद्धर्मधर्मतः । तथा प्रभुः प्रमोदात्मा क्रीडत्येवं तथा तथा ॥' (शि०दृ० १।३८) ।
१. प्रथम निःष्यन्द: स्वरूप-स्पन्द (उन्मेष-निमेष, चिति-स्पन्दन एवं शक्ति-स्वरूप)
परिचय एवं पृष्ठभूमि ३५ ‘चैतन्यमात्मनो रूपं सिद्धं ज्ञानक्रियात्मकम् । तस्यानावृतरूपत्वाच्छिवत्वं केन वार्यते ॥’ ‘नेत्रतन्त्र’ में भी यही प्रतिपादित किया गया है— ‘परमात्मस्वरूपन्तु सर्वोपाधिविवर्जितम् । चैतन्यमात्मनो रूपं सर्वशास्त्रेषु पठ्यते ॥’ चिदानन्द की प्राप्ति से जडात्मक देहादिकों में चिदैक्य प्रतिपत्ति की दृढ़ भावना होने पर ‘जीवन्मुक्तावस्था’ प्राप्त होती है— ‘चिदानन्दलाभे देहादिषु चेत्यमानेष्वपि चिदैक्यप्रतिपत्तिदार्ढ्यं जीवन्मुक्तिः ॥’ (प्रत्यभिज्ञाहृदयम्) सिद्धान्तानुसार चिच्छक्ति से कुछ भी भिन्न हो ही नहीं सकता क्योंकि सृष्टि केवल चिच्छक्ति का स्फार या बाह्य प्रकाशन मात्र है । चैतन्य ही आत्मा का लक्षण है स्पन्दशास्त्र में कहा गया है कि विश्वबीज चैतन्य आत्मतत्त्व में अहंता स्थापित होने पर पर्वतादि का भी इच्छा मात्र से संचालन किया जा सकता है । ‘विरूपाक्षपञ्चाशिका’ के विश्वात्मा स्कंध में ‘चैतन्यमात्मा’ (शिवसूत्र) के सार का प्रतिपादन किया गया है । ज्ञानक्रियात्मक परिपूर्णस्वतन्त्र चैतन्य ही आत्मतत्त्व है । सर्वज्ञत्व-सर्वकर्तृत्वसम्पन्न, पूर्णस्वतन्त्र, चेतन पदारूढ आत्मतत्त्व ही शिव भी है । चूँकि स्रष्टा परमशिव अपनी लीला हेतु अपनी सर्वज्ञता, सर्वकर्तृता आदि शक्ति को संकुचित करके जीव के रूप में क्रीडा करते हैं अतः चैतन्यविग्रह आत्मतत्त्व या चिद्रूप शिव से भिन्न कुछ भी नहीं है । विश्वात्मवाद—‘स्पन्द’ एवं ‘प्रत्यभिज्ञा’ दर्शन संपूर्ण विश्व को अहंभाव से देखने की ही वास्तविक ज्ञान एवं अपने विराट् स्वस्वरूप की ‘प्रत्यभिज्ञा’ मानते हैं । इसके किसी एक अंश में अहन्ता तो जीवन्मृतावस्था है— उत्क्रम्य विश्वतोऽङ्गात् तद्भागैकतनुनिष्ठताहन्तः । कण्ठलुठत्राण इव व्यक्तं जीवन्मृतो लोकः ॥ ‘पूर्णांहन्ता’ एवं ‘विश्वाहन्ता’ ही पूर्णत्व है । यही शिवत्वाप्ति है । इदन्ता एवं अहन्ता के ऐक्य से समुत्पन्न पूर्णांहन्तारूपी संवित् का साक्षात्कार ही प्रत्यभिज्ञान है और यही सारतम उपलब्धि या मोक्ष है । जगत् का स्वस्वरूप जान लेने पर उसमें चिन्मयत्व का ही संदर्शन होता है— (१) यदैव विदितं विश्वं तदानीमेव चिन्मयम् । (२) वेद्यो वेदकतामाप्तो वेदकः संविदात्मताम् । संवित् त्वदात्मा चेत् सत्यं तदिदं त्वन्मयं जगत् ॥ सर्वात्मवाद—समस्त विश्व-प्रसार और उसके समस्त पदार्थ केवल आत्मा के स्फार हैं । ‘विरूपाक्षपञ्चाशिका’ में भगवान् शिव ने इन्द्र को—‘विश्वात्मा’ ।
३६ स्पन्दकारिका 'प्रकाशात्मा'। 'विमर्शात्मा' एवं 'विभूति' चार स्कंधों द्वारा उपदेश दिया है। भगवान् शिव कहते हैं कि विश्व मेरा शरीर है। चेतनपदारूढ चैतन्य आत्मा ही विश्व का मूल है। ग्राहकाभिमान से चैतन्य अवच्छिन्न हो जाता है किन्तु मेरा चैतन्य अनवच्छिन्न है। मै विश्व से पृथक् नहीं हूँ। अहं और इदम् में भेद से विश्व अन्य पृथक् प्रतीत होता है। यह तो दृष्टिभ्रम है। विश्व आत्मा से, चैतन्य से एवं मुझसे अभिन्न है— 'सर्वं मम चैतन्यमात्मनः शरीरमिदम्' ।। (विरूपाक्षपञ्चाशिका) 'ननु जगदपि चितो भिन्नं नैव किचित्' (प्रत्यभिज्ञाहृदयम्) 'प्रकाशरूपा चितिरेव हेतुः ॥' 'जगतः प्रकाशैका- त्म्येन अवस्थानम् (प्रकाश के साथ एकात्मरूप से संसार का अवस्थान है ।) (प्रत्य०हृ०) आत्मा के दो अंश है—१. अहं २. इदम् (विश्व)। शिवशक्तिदशा = 'अहं रूप'। सदाशिवदशा = 'इदन्तरूप'। विमर्श के प्रकार—१. 'अहमस्मि' (अहं एवं इदम् रूप जगत् में पूर्ण अद्वैत) २. 'अहमिदम्' = सदाशिव का विमर्श (अहं का प्राधान्य), ३. 'इदमहम्' = ईश्वर का विमर्श (इद- महमिति..... सामाना-धिकरण्यं विमर्श ईश्वरभट्टारके') (ई०प्र०वि० ३१ पृ० २६६) । 'स्पन्दकारिका' में सर्वत्र इसी 'सर्वचिन्मयतावाद', 'विश्वात्मवाद' 'सर्वशक्तिवाद' 'सर्वात्मवाद' आदि का भी प्रतिपादन किया गया है और इसे रेखांकित करने हेतु 'स्पन्द- कारिका के प्रथम निष्यन्द का नाम 'स्वरूप निष्यन्द' (आत्म निष्यन्द) रखा गया है। 'स्पन्द' (आत्मा, संवित्, शक्ति) ही जीव एवं जगत् दोनों है। शिव अपनी 'लीला' 'क्रीडा' 'इच्छा' 'संकल्प' से अपने स्वरूप में से ही निरूपादन योगी की भाँति विश्व का बाह्यावभासन करते हैं। शिव का विमर्श अहंप्रत्यावमर्श है इसी अहमाकार विमर्श या शक्ति का स्फार जगत् है अतः जगत् भी—'चेतन', 'शक्ति', शिव शक्ति रूप है। शिव शक्ति संघट्ट या सामरस्य जगत् के आविर्भाव का उत्स है अतः जगत् एवं जीव शिवशक्तिरूप है। कोई अवस्थाओं में भिन्नता संभव है किन्तु 'स्पन्द' या आत्मा में नहीं— जाग्रदादि विभेदेऽपि तदभिन्ने प्रसर्पति । निवर्तते निजात्रैव स्वभावादुपलधृतः ॥ (स्पन्द का० ३) आत्मा के संस्पर्श से अचेतन इन्द्रियाँ भी सचेतन हो जाती है— 'यतः करणवर्गोऽयं विमूढोऽमूढवत् स्वयम् । सहान्तरेण चक्रेण प्रवृत्ति-स्थिति-संहतीः ॥ (स्पन्द का० ६) सर्वात्मवाद—मितप्रमाता भी स्पन्दतत्त्व के स्पर्श से पतिप्रमाता (शिव) बन जाता है— 'अपि त्वात्मबलस्पर्शात् पुरुषस्तत्समो भवेत् ॥ (स्पन्द का०८) क्षोभ के विलीन हो जाने पर आत्मबल के स्पर्श से योगी को परमपद की प्राप्ति होती है और उसमें (शिववत्) सर्वज्ञातृत्व-सर्वकर्तृत्व आदि की माहेश्वर शक्तियों का उदय हो जाता है—
परिचय एवं पृष्ठभूमि ३७ निजाशुद्धासमर्थस्य कर्तव्येष्वभिलाषिणः । यदा क्षोभः प्रलीयेत् तदा स्यात्परमं पदम् ॥ (९) ॥ जिस अशुद्धि के कारण क्षोभ उत्पन्न होता है वह भी 'स्व' के द्वारा 'स्व' पर आरोपित है अतः पारमार्थिक या नित्य नहीं है प्रत्युत् स्वकल्पना (स्वलीला, स्वक्रीडा कल्पित है) अतः उसका दूरीकरण भी 'स्व' के द्वारा (उन्मेष के माध्यम से) सहज संभाव्य है । इस विषय में भी कारिकाकार ने 'निज' शब्द का प्रयोग करके अशुद्धि (मल, अज्ञान एवं बंधन) की दुर्निवार्य भयंकरता परवशता, अशक्य संसारोत्तीर्णता पर विराम चिह्न लगाते हुए संकेतित किया है कि इसकी भयानकता कोई परकृत नहीं प्रत्युत् आत्मकृत मात्र है अतः न तो दुर्निवार्य है और न तो यथार्थतः भयानक ही है । सब कुछ 'स्व' की ('निज' की) आरोहण लीला का चमत्कार है । आत्मबल का स्पर्श होते ही यह 'स्व' (निज) (स्पन्द) (या आत्मा) में विलीन हो जाता है । सब कुछ 'स्व' की स्वकल्पित लीला है । 'स्व' का (निज का) या अपना अकृत्रिम धर्म तो—सर्वज्ञातृत्व, सर्वकर्तृत्व, सर्वतृप्ति, सर्वव्याप्ति आदि माहेश्वर धर्म हैं क्योंकि 'स्व' स्वयं महेश्वर है— 'तदाऽस्याऽकृत्रिमो धर्मो ज्ञत्वकर्तृत्वलक्षणः । यतस्तदीप्सितं सर्वं जानाति च करोति च ॥ १० ॥ सारा प्रापंचिक व्यापार दो अवस्थाओं के मध्य है—१. कार्य २. कारण १. भोग्य २. भोक्ता १. दृश्य २. द्रष्टा १. वेद्य २. वेदक या १. स्मर्त्तव्य २. स्मर्ता और ये सभी 'स्व' (आत्मा) के ही विभिन्न रूप हैं क्योंकि ये 'स्पन्द' (स्व, आत्मा, संवित्) की ही द्विविध अवस्थायें हैं— अवस्था युगलं चाऽत्र कार्यकर्तृत्वशब्दितम् । कार्यता क्षयिणी तत्र कर्तृत्वं पुनरक्षयम् ॥ १४ ॥ जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति, तुरीय, तुरीयातीत, शुभेच्छा, तनुमानसा, सत्त्वापत्ति, तुर्यगा आदि ज्ञान की सप्तावस्थायें तथा अन्य अनेकविध मानसिक-शारीरिक सभी अवस्थाओं के वैविध्य एवं भेदात्मकता में 'स्व' (स्पन्द, आत्मा, प्रत्यक् चैतन्य) सदैव 'एक' 'अभेद' अद्वैत रूप में स्वक्रीडा करता रहता है । सारी अवस्थायें भी उसीका रूप है किन्तु वह स्वयं अवस्थातीत है । उसकी 'उपलब्धि, (व्यापकता) सर्वत्र है, त्रिकालाबाधित है— 'तस्योपलब्धिः सततं त्रिपदाव्यभिचारिणी' । (१७) 'स्पन्द' या परमाशक्ति विश्वस्वरूपा है अतः विश्व भी 'स्व' का ही विस्तार है— 'यदा सा परमा शक्तिः स्वेच्छया विश्वरूपिणी' उसकी 'स्फुरत्ता' ही विश्व एवं चक्र की उद्भाविका है—'स्फुरत्तात्मनः पश्येत्तदा चक्रस्य संभवः ।।' 'चितिः स्वतन्त्रा विश्वसिद्धिहेतुः ।।' 'विमर्श' के ही 'दर्पण' में स्वयं 'महाबिन्दु' भी प्रतिबिम्बित होता है— परशिवरविकरनिकरे प्रतिफलति विमर्शदर्पणे विशदे । प्रतिरुचिरुचिरे कुड्ये चित्तमये निविशते महाबिन्दुः ।। (कामकलाविलास)
३८ स्पन्दकारिका 'क्रीडावाद' 'लीलावाद' 'चित्रवाद'—जगत् 'स्व' आत्मा (शक्ति, संवित्, स्पन्द) की लीला मात्र है— हृदयस्थापि लोकानामदृश्या मोहनात्मिका । नामरूपविभागे च या करोति स्वलीलया (ललितोपाख्यान) ।१ लीलावाद—यदि 'स्व' शिव है तो 'स्पन्द' 'संवित्' भी उसी महेश्वर 'स्व' 'आत्मा' की 'लीला' है । 'लोकवत्तु लीला कैवल्यम्' (ब्रह्मसूत्र) भी इसी 'लीलावाद' का प्रतिपादक है । जगत् 'स्व' (शिव) की स्वेच्छा तूलिका से निर्मित (स्वभित्ति पर खींचा गया) एक 'स्व'—स्फार का चित्र है—जो कि 'स्व' की इच्छा से प्रणीत है— चित्रवाद—१) जगच्चित्रं समालिख्य स्वेच्छा तूलिकयात्मनि । स्वयमेव समालोक्य प्रीणाति परमेश्वरः ॥ (चिद्रल्ली में उद्धृत) २) जगच्चित्रं समालिख्य स्वयमेवात्मविग्रहम् । स्वयमेव समालोक्य सन्तष्टां परमाद्भुतम् ॥ (परावासना) जगत् नित्य 'क्रीडारसोत्सुक महादेव' की विचित्र सृष्टि है— एष देवोऽनया देव्या नित्यं क्रीडारसोत्सुकः । विचित्रान् सृष्टिसंहारान्विधत्ते युगपत्प्रभुः ॥ (चिद्रल्ली)२ क्रीडावाद—इसीलिए तो 'स्पन्दकारिका' में जगत् को क्रीडा कहा गया और जगत् को 'स्व' अर्थात् क्रीडा मानने को ही मुक्ति कहा गया है— (१) इति वा यस्य संवित्तिः क्रीडात्वेनाखिलं जगत् । स पश्यन् सर्वतो युक्तो जीवन्मुक्तो न संशयः ॥ (स्पन्द का० ३०) (२) सोऽखिलं समग्रं जगत् क्रीडारामतया पश्यन् विभावयन् नित्ययुक्तत्वाच्च बंध- कारणस्याज्ञानस्य क्षयात् प्रबोधाप्तौ जीवन्नेवेश्वरवन्मुक्तो नाऽत्र संशयः ॥' (स्पन्द- प्रदीपिका) ।३ 'अखिलम् अशेषमनन्तवस्तुव्यक्तिविचित्रं 'जगत्' (३) विश्वं क्रीडात्वेन स्वनिर्मितचराचरभावक्रीडनकापरचितलीलामात्रतया पश्यन् विभावयन् (रामकण्ठाचार्यः स्पन्दकारिका विवृति) । (४) एव स्वभावं यस्य चित्तं 'मन्मयमेव जगत् सर्वम् इति । स सर्वं क्रीडात्वेन पश्यन् नित्ययुक्तत्वात् जीवन्नेव ईश्वरवत् मुक्तो न त्वस्य शरीरादि बंधकत्वेन वर्तते ॥ (भट्टकल्लटः स्पं० का० वृत्ति) ।४ अहंतावाद—'परमशिव' 'अहं' 'त्वं' दोनों से शून्य है । जब वह 'अहं' का १. ललितोपाख्यान । २. चिद्रल्ली में उद्धृत । ३. स्पन्द प्रदीपिका (उत्पलाचार्य) । ४. स्पन्दसर्वस्व ।
परिचय एवं पृष्ठभूमि ३९ साक्षात्कार करना चाहता है तब वह विमर्श शक्ति रूपी दर्पण में अपने अहं को देखता है—उसका यह अहंसाक्षात्कार ही जगत् है अतः वह विश्व को अहमाकार देखता है । उसका 'विमर्श' है 'अहमिदम्' अर्थात् 'इदम्' (जगत) 'अहं' ही है—अहं के अतिरिक्त जगत् है ही नहीं—'इदम्' (जगत) अहं का ही एक अंश है । 'अहं' के दो अंश है—१. 'अहं' (आत्मा) २. 'इदम्' (जगत) । 'लीलात्मक विनोदवाद'—जगत् शिव का 'विनोद' है—सकलभुवनोदयस्थिति- लयमयलीलाविनोदोद्युक्तः । अनन्तर्लीनविमर्शः पातु महेशः प्रकाशमात्रतनुः ।। (कामकलाविलास) । 'स्वेच्छावाद' एवं 'इच्छासृष्टिवाद'—ईश्वरस्य जगत्सृष्ट्यादिकं लीलामात्रम् न प्रयोजनमस्तिः स्वेच्छयास्वभित्तौ विश्वमुन्मीलयति । 'स्वेच्छयैव जगत्सर्वं निगिरत्युद्गि- रत्यपि' । 'चिदात्मैव हि देवोऽन्तः स्थितमिच्छावशाद् बहिः । योगीव निरूपादानमर्थजातं प्रकाशयेत् ।।' स्वभाववाद—जगत् 'स्वभाव' है अर्थात् 'स्व' का भाव है—जीव भी 'स्व' का भाव है । (१) स एव सर्वभूतानां स्वभावः परमेश्वरः । स एव भैरवो देवो जगद्भरणलक्षणः ।। (२) इस परमेश्वर की पराशक्ति भी 'स्वभावामर्शनोत्सुका' है— तस्यैवैषा परा देवी स्वभावामर्शनोत्सुका । पूर्णत्वं सर्वभावानां यस्या नाल्पं न वाधिकम् । 'स्वभाव'—का स्फार ही जीवन एवं जगत् दोनों है । जगत् एवं जीव दोनों 'स्व' के आनन्दात्मक उल्लास हैं—शक्ति के अवभास हैं—शिव के अवरोहण क्रीडा रूप स्वभाव के चमत्कार हैं । सर्वात्मवाद—इन समस्त भावों में आत्मा ही स्फुरित होती है इसीलिए सोमानन्द 'शिवदृष्टि' में कहते हैं— आत्मैव सर्वभावेषु स्फुरन्निवृतचिद्विभुः । अनिरुद्धेच्छाप्रसरः प्रसरद् दृक्क्रियः शिव ।। अहन्तावाद का विकास—विश्व के समस्त धर्म और दर्शन उपदेश देते हैं कि अहन्ता को निर्मूल करो क्योंकि जब तक 'अहन्ता' (अहंभाव) रहेगा तब तक आध्यात्मिक साधना में उन्नति संभव नहीं हो सकती । साधक परिवार, परिजन, गृह, वसन, भोग, उच्चपद और परिग्रह आदि सभी का परित्याग कर देता है किन्तु अपनी अहन्ता (अहंभाव) का परित्याग नहीं कर पाता । जब तक 'अहं' रहेगा तब तक 'इदम्' रहेगा ही और जब तक अहं-इदं का द्वैत बना रहेगा तब तक पूर्णत्व, शिवत्व, मुक्ति, कैवल्य या मोक्ष की कोई संभावना नहीं है ।
४० स्पन्दकारिका काश्मीरीय 'स्पन्द' एवं 'प्रत्यभिज्ञा' की दृष्टि—संपूर्ण त्रिक दर्शन 'अहन्तावाद' में आस्था रखता है। ये दर्शन यह मानते हैं कि अहन्ता का विकास ही मुक्ति का साधन है। जो साधक अपनी अहन्ता का जितना ही उच्च से उच्चतर विकास करेगा वह उतनी ही आध्यात्मिक उन्नति करेगा तथा उतना ही अधिक पूर्णत्व, शिवत्व एवं परमपद के निकट पहुँचेगा। 'स्पन्द' एवं 'प्रत्यभिज्ञा' दर्शन की मान्यता है कि जिसने अहन्ता को उच्चतम शिखर तक पहुँचा दिया है वह साक्षात् शिव है—वह 'चक्रेश्वर' है—वह 'परमात्मा' है—वह 'शक्तिमान' है—वह अद्वैत पर ब्रह्म है। 'अहन्ता का सत्स्वरूप'—'विरूपाक्षपञ्चाशिका' (विश्वशरीर स्कंध) में तो यहाँ तक कहा गया है कि 'ईश्वरता' 'कर्तृत्व' 'चित्स्वरूपता' का भी स्वस्वरूप 'अहन्ता' है। 'ईश्वरता कर्तृत्व स्वतन्त्रता चित्स्वरूपता चेति। एतेऽहन्तायाः किल पर्यायाः सद्बिरुच्यते ।।' (१।८) इसीलिए इसमें कहा गया है कि सर्वत्र 'अहन्ता' धारण करे— 'बिन्दुं प्राणं शक्तिं मनइन्द्रियमण्डलं शरीरं च। आविश्य चेष्टयन्ती धारय सर्वत्र चाहन्ताम् ।।' (१।७) संपूर्ण विश्व में अहन्ता (अहंभाव) धारण करना विश्वात्मभाव—'विश्वोऽहं' का भाव एवं उसकी अखण्ड अनुभूति ही तो मोक्ष है। संपूर्ण विश्व में अपनी अहन्ता का विराट् प्रसार देखना विश्वात्मभाव है किन्तु विश्व के किसी एक अंश में अहंभाव धारण करना जीवन्मृतत्व है— 'उत्क्रम्य विश्वतोऽङ्गात् तद्भागैकतनुनिष्ठताहन्तः। कण्ठलुण्ठत्राण इव व्यक्तं जीवन्मृतो लोकः ।।' 'ईश्वरता' 'सर्वज्ञता' सर्वकर्तृता, स्वतन्त्रता, चित्स्वरूपता 'शिवोऽहं' की भावना— 'पूर्णाहन्ता' के पर्याय हैं। ये बंधन नहीं महामुक्ति के पर्याय हैं। अहन्ता का शुद्ध परामर्श—'विश्वाहन्ता' या 'पूर्णाहन्ता' ही साधना के विकास का चरम सोपान है। जिस प्रकार शरीर में ही अहन्ता (अस्मिता) का प्रत्यय या अनुभूति प्रमाता को (मितात्मा को) जड़ हाथों से भी कार्य कराने की शक्ति प्रदान कर देता है उसी प्रकार यदि चेतनतत्त्व में अहन्ता का आधान किया जाय तो निश्चल पर्वतों को भी चलायमान एवं संचालित किया जा सकता है— देहेस्मिततया यद्रुज्जडडोरास्फालनं मिथोः बाह्वोः । इच्छामात्रेणेत्यं गिर्योरपि तद्द्शाज्जगति ।। (वि०प०६) यौगिक सिद्धियाँ अपूर्ण ख्याति हैं। शिवता का समावेश पूर्ण ख्याति है। विमर्श के द्वारा इदन्ता का अहन्ता में लय करके विश्वात्मभाव से सर्वज्ञत्व, सर्वकर्तृत्व आदि स्वयं आविर्भूत विभूतियों से संवलित परमैश्वर्य की संप्राप्ति करना ही समस्त उपदेशों का सार है। इसके द्वारा 'यामलीसिद्धि' का वर्णन किया गया है—
परिचय एवं पृष्ठभूमि ४१ 'अहो संसारसुखकेलि अहो सुलभं मोक्षमार्गे सौभाग्यम् । त्रुटितान्तककलंका अहो शिवयोगिनां यामलीसिद्धिः ।। 'महार्थमंजरी' इदन्ता-अहन्ता के ऐक्य से समुत्पन्न पूर्णाहन्ता स्वरूप संवित् का साक्षात्कार (प्रत्यभिज्ञान) । भास्करराय 'प्रकाश' ('वरिवस्यारहस्यम्' की व्याख्या) में कहते हैं कि— 'इच्छामि' 'जानामि' इत्यादि उदाहरणों में प्रथम पुरुष की वर्तमानता एवं उसमें भासमान स्फुरणान्वयि अहं का ज्ञान ही प्रकाशाभिध ब्रह्म है । यह सर्वज्ञत्व, सर्वेश्वरत्व, सर्व- कर्तृत्व, पूर्णत्व, एवं सर्वव्यापकत्व आदि से संवलित है । उसका आनन्दरूपांश ही 'स्फुरण' है, वही 'अहन्ता' है, वही 'विमर्श' है, वही परा ललिता भट्टारिका त्रिपुर- सुन्दरी है— 'अत्रेयं तांत्रिकप्रक्रिया—'इच्छामि' 'जानामि' इत्यादावुत्तम पुरुषान्तर्भासमानं स्फुरणान्वयि ज्ञानमेव प्रकाशाभिधं ब्रह्म । तच्च सर्वज्ञत्व-सर्वेश्वरत्वसर्वकर्तृत्व-व्यापकत्वादि शक्तिसंवलितम् । तस्य चानन्दरूपांश एव स्फुरणं परा अहंता, विमर्शः, परा ललिता भट्टारिका, त्रिपुरसुन्दरीत्यादि पदैर्व्यवह्रियते ।' 'अहन्ता' साक्षात् भगवती महात्रिपुरसुन्दरी हैं । 'अहन्ता' शिव का 'आत्मविमर्श' है—स्फुरत्ता है—पराशक्ति है—शिव का आत्मधर्म है और सर्वेश्वर शिव की आधीन आत्मभूता 'शक्ति' है । 'विश्वरूपो महेश्वरः' ('प्रत्यभिज्ञाकारिका') की महेश्वरता महेश्वर में देखना 'स्पन्द'—'प्रत्यभिज्ञा' का लक्ष्य नहीं है प्रत्युत् (१) महेश्वरता (२) विश्वरूपता इन दोनों की अपने में अनुभूति कर—'महेश्वरोऽहं' 'विश्वोऽहं' की अनुभूति करना ही 'स्पन्द' एवं 'प्रत्यभिज्ञा' का लक्ष्य है । यदि चिदात्मा के साथ तादात्म्य प्राप्त करना ही पूर्णता है तो उसके 'विश्वोऽहं' के विमर्श के साथ ही तदात्मता प्राप्त करनी होगी क्योंकि वह केवल 'विश्वातीत' ही नहीं 'विश्वमय' भी है— 'चिदात्मैव हि देवोऽन्तः स्थितमिच्छावशाद्बहिः । योगीव निरुपादानमर्थजात प्रकाशयेत् ॥ (प्र०का०१।३८) 'इच्छया भासयेद् बहिः ।' (प्र०का० ५९) समस्त प्राणियों में एक ही आत्मा (महेश्वर) अवस्थित है अतः निखिल विश्व में अखण्ड अहं की अनुभूति, अखण्डित रूप में अहं का आमर्श शिव का (महेश्वर का) स्वभाव है, स्वरूप है— स्वात्मैव सर्वजन्तूनामेक एव महेश्वरः । विश्वरूपोऽहमित्येवमखण्डामर्शबृंहितः ॥ (प्रत्यभिज्ञा का० ४।१) उस महेश्वर के साथ तादात्म्य प्राप्त करने हेतु साधक को भी 'विश्वोऽहं' का विमर्श करना आवश्यक है । साधक में दो भाव होने चाहिए—१. सोऽहं २. 'ममायं विभव' (सोऽहं ममायं विभव इत्येवं परिजानतः) (प्रत्य० का० ४।१२) विश्वात्मनो विकल्पानां
४२ स्पन्दकारिका प्रसरेऽपि महेशता' (प्रत्य०का० ४।१२) 'पूर्णााहन्ता' है क्या? 'संविदः स्वात्ममात्र- विश्रान्तिः स एव पूर्णााहन्ताविमर्शस्वभावोऽहंभावो' (उत्पल—अजडप्रमातृसिद्धि) । शैवशास्त्र में ७ प्रमाता माने गए हैं जो निम्न है— प्रमाता ┌──────┬──────┬──────┬──────┬──────┬──────┐ शिव मन्त्रमहेश्वर मन्त्रेश्वर मन्त्र विज्ञानाकल प्रलयाकल सकल (मायीयमल १ मल) (२ मल) (३ मल) पूर्णााहन्ता—'विज्ञानभैरव' में इन प्रमाताओं में से मात्र 'शिव' एवं 'परमशिव' में अहन्ता के आधान का उपदेश दिया गया है—'मित' प्रमाता को अमितप्रमाता बनने का, अपूर्ण को पूर्ण बनने का, पशु को पशुपति बनने का या जीव को शिव बनने का यही मार्ग है । यही 'पूर्णााहन्ता' (शिवोऽहं) स्वरूप है तथा विश्वोऽहं के साथ तादात्म्य है । 'अहं' एवं अहन्ता का यथार्थ स्वरूप—अकार और हकार विमर्श और प्रकाश हैं । इन दोनों के सामरस्य से 'अहं' निष्पन्न होता है । यही 'अहं' अकार से हकार पर्यन्त समस्त मातृकाओं एवं अकार शिव एवं हकार शक्ति का समन्वित रूप है । 'श्वेतबिन्दु' शिवात्मक है और 'रक्तबिन्दु' शक्त्यात्मक है । ये दोनों एक दूसरे में प्रविष्ट होते हैं । रक्त एवं श्वेत बिन्दु के समागम से तृतीय-'मिश्रबिन्दु' का आविर्भाव होता है । यही 'अहं पद' है । इसी अहं में अकार से हकार पर्यन्त समस्त वर्ण राशि समाहित है । 'चिद्वल्ली' में कहा गया है—'महामन्त्रमयीपूर्णााहन्तामयी प्रकाशानन्दसारा बिन्दुत्रयसमष्टि भूतदिव्या- रसरूपिणी कामकला नाम महात्रिपुरसुन्दरी' ।। 'त्रिपुरसुन्दरी पूर्णााहन्तामयी है । अद्वयसंपत्तिकार वामननाथ कहते हैं कि अहंभाव उपादेय है न कि हेय । तपस्वीराज कहते हैं कि अहंकार एक पिशाच है । मानव-रक्त को चूसने वाला है । मानव की सद्बुद्धि का आच्छादक है, किन्तु मानव के द्वारा भगवान् की शरण में जाने पर यही अहंकार यही उसका सेवक बन जाता है— 'अहमितिपिशाच एष त्वत्स्मृतिमात्रेण किंकरीभवति ।' जब व्यक्ति यह सोचता है कि 'मैं अकेला हूँ, मेरा कोई सहायक नहीं है' तब वह भयभीत रहता है किन्तु जब वह यह सोचता है कि 'मैं अकेला ही तो इस संसार में हूँ । यह सब कुछ मुझसे पृथक् थोड़े हैं'—तब वह निर्भय होकर घूमता है—'एकोऽहमिति संसृतौ जनस्त्रास साहसरसेन खिद्यते एकोऽहमिति कोऽपरोऽस्ति मे इत्यमस्मि गतभी- र्व्यवस्थितः ।।' 'विमर्शदीपिका' में कहा गया है कि विश्वात्मक होते हुए भी विश्वोत्तीर्ण, स्वतन्त्र, दिव्य, अक्षर तत्त्व ही 'अहं' नाम से कहा जाता है । इस प्रकार के 'अहं' तत्त्व में धारणा स्थिर हो जाने पर भय किसको स्पर्श कर पाता है? 'विश्वात्मा विश्वोत्तीर्णं च स्वतन्त्रं दिव्यमक्षरम् । अहमित्युत्तमं तत्त्वं समाविश्य बिभेति कः ?'
परिचय एवं पृष्ठभूमि ४३ जो साधक विश्व को अपनी क्रीडा मानता है अर्थात् अपनी लीला मानता है और इस प्रकार 'विश्वोऽहं' के विमर्श से परिपूर्ण है उसे ही जीवन्मुक्त कहते हैं अर्थात् जगत् को अपनी क्रीड़ा समझने की 'संवित्ति' ही जीवन्मुक्ति' है— 'इति वा यस्य संवित्तिः क्रीडात्वेनाखिलं जगत्। स पश्यन् सर्वतो युक्तो जीवन्मुक्तो न संशयः ॥ (द्वि० ३०) उत्पलाचार्य कहते हैं—'सोऽखिलं समग्रं जगत् क्रीडारामतया पश्यन् विभाव- यन्नित्युक्तत्वाच्च बन्धकारणस्याज्ञानस्य क्षयात् प्रबोधाप्तौ जीवन्नेवेश्वरवन्मुक्तो नाऽत्र संशयः ।।' ('स्पन्दप्रदीपिका' का० ३०) । रामकण्ठाचार्य ('स्पन्दकारिका वृत्ति' में) कहते हैं—कि ऐसी संवित्ति रखने वाला योगी समस्त माहेश्वर शक्तियों को प्राप्त कर लेता है—'सर्वव्यापक सर्वात्मक सर्वेश्वर- स्वतन्त्रस्वभावाहंकार प्रतिपत्तिदार्थेन जन्मादिविरोधात निष्क्रान्तः परमेश्वर एव संवृत्त इति ।। 'अशेषमनन्तवस्तुव्यतिरिक्तं विचित्रं जगत् विश्वं क्रीडात्वेन स्वनिर्मितचराचरभाव क्रीडनकोपरचितलीलामात्रतया पश्यन् विभावयन्'–'एवं सर्वं कीडात्वेनैव पश्यन् जीव- न्नेव मुक्तः ।।' 'कामकलाविलास' में कहा गया है कि— पूर्णाहन्तात्मभावेन कृत्रिमाहन्तया विना । आत्मानमात्मना साक्षाद्यः पश्यति स पश्यति ।। (काम० ५) अहंता की विभिन्न भूमिकायें— अहन्ता की मुख्यतः तीन भूमिकायें हैं—१. अहं के अभाव की भूमिका, २. मितप्रमाता के संकुचित अहं की भूमिका, ३. परमशिव के अहं की भूमिका । १. अहं के निषेध की भूमिका—तत्वमंजरीकार कहते हैं कि 'यदि मै कुछ होऊँ—तब मुझे इधर-उधर, जहाँ-तहाँ से भय हो सकता है किन्तु यदि मैं ही कुछ न हूँ तो फिर भय किसका?' । बौद्ध भी यही कहते हैं— सत्यात्मनि परसंज्ञा स्वपरविभागे च रागविद्वेषौ । अनयोः संप्रतिबद्धाः सर्वे दोषाः प्रजायन्ते ।। (प्र०वा० १।२२१-२२२) अर्थात् अपनी आत्मा के रहने पर दूसरी आत्मा की बात उठती है । 'यह अपना है यह पराया है? —ऐसी कल्पना हो जाने पर अपने से राग एवं दूसरे के प्रति विद्वेष उत्पन्न होने लगते हैं । इस राग-द्वेष से जुड़े छोटे-बड़े दोष उत्पन्न हो जाते हैं । इसीलिए बौद्ध कहते हैं कि—'आत्मा ध्वंसो हि मोक्षः' । (स०द०सं०) । बौद्धों का यह आत्माभाववाद उनकी दृष्टि में पूर्णत्व है—निर्वाण है किन्तु स्पन्द एवं प्रत्यभिज्ञा इस दृष्टि को स्वीकार नहीं करते ॥ २. परिमित (संकुचित) अहं की भूमिका—सारे माया बद्ध प्राणी शरीर, मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार, विषय आदि संकुचित देश में अपने अहं को तदाकार रूप में अनुभव करते हैं । यही संकुचित अहं उन्हें पशुपति से पशु बना देता है । यही उनके
४४ स्पन्दकारिका बंधन एवं संसरण का कारण है। मित प्रमातृत्व, मित अहंता जीव से उसके शिवत्व (भैरवभाव) को छीन लेती है। यह अहंता हेय है। यह शुद्ध परामर्श की नहीं अशुद्ध परामर्श की क्षुद्र (संकुचित) अहन्ता है। श्लाघ्य अहन्ता का स्वरूप ‘विज्ञानभैरव’ (८४) में इस प्रकार दिया गया है— ‘सर्वज्ञः सर्वकर्ता च व्यापकः परमेश्वरः । स एवाहं शैवधर्मा इति दाढर्याच्छिवो भवेत् ॥ (प्रथम प्रत्यभिज्ञा की धारणा-८४) ३. शिव के अहं की भूमिका—‘पूर्णाहन्ता’ ‘विश्वाहन्ता’ प्रत्यभिज्ञा दर्शन में ‘प्रत्यभिज्ञा’ के निम्न दो प्रकारों का विवेचन किया गया है— १. प्रथम प्रत्यभिज्ञा—मैं शुद्धबोधस्वरूप शिव हूँ । २. द्वितीय प्रत्यभिज्ञा—समस्त जगत् मेरा ही अपना विस्तार है। अहन्ता एवं प्रत्यभिज्ञा—इन दोनों प्रकार की प्रत्यभिज्ञाओं के उदित होने पर साधक ‘विश्वमय’ हो जाता है। इस स्थिति में उसके चित्त में विकल्पों का प्रादुर्भाव होने पर भी वह अपनी शिवावस्था में ही प्रतिष्ठित रहता है— प्रथम प्रत्यभिज्ञा— ‘सोऽहं ममायं विभव इति प्रत्यभिजानतः । विश्वात्मनो विकल्पानां प्रसरेऽपि महेशता ॥ (४।१।१२) शिवोपाध्याय—१. ‘मैं शुद्धस्वरूप हूँ’—प्रत्यभिज्ञा के इस अंश पर धारणा के स्थिरीकरण की विधि यह है कि साधक यह भावना करे कि स्वातंत्र्यादिक शिव धर्मों से युक्त सर्वज्ञ, सर्वकर्ता, व्यापक परमेश्वर मुझसे पृथक् नहीं है—ये सभी मेरे ही धर्म हैं।’—इस प्रकार के दृढ़ निश्चय से साधक शिव बन जाता है। प्रथम प्रकार की प्रत्यभिज्ञा उदित हो उठती है और समस्त अवस्थाओं में उसका शिवस्वरूप निरन्तर अनुस्यूत रहता है। द्वितीय प्रत्यभिज्ञा— २. ‘यह जगत् मेरा ही विस्तार है’—प्रत्यभिज्ञा के इस द्वितीय अंश पर धारणा के स्थिरीकरण हेतु यह भावना करनी चाहिए— ‘जलस्येवोर्मयो वह्नेर्ज्वालाभंग्यः प्रभा रवेः । ममैव भैरवस्यैता विश्वभंग्यो विभेदिताः’ ॥ १०८ ॥ अर्थात् जैसे जल की लहरें जल से ही उठती हैं, अग्नि की ज्वालाएं अग्नि से ही निकलती हैं या जैसे सूर्य का प्रकाश सूर्य से ही उत्पन्न होता है उसी प्रकार स्वात्मस्वरूप भैरव से ही चलना-फिरना, भोजन, हवन, दान, प्रसारण, निर्गमन प्रभृति इस विश्व की समस्त विचित्रताएँ प्रकट होती हैं। इस धारणा में दृढ़ता आने पर योगी इस समस्त विश्व में अपने ही शिवस्वरूप का साक्षात्कार करता है।
परिचय एवं पृष्ठभूमि ४५ १. नादसृष्टिवाद—१. चिणि, २. चिणिचिणी, ३. घण्टानाद, ४. शंखनाद, ५. तन्त्रीनाद, ६. भेरीनाद, ७. तालनाद, ८. वेणुनाद, ९. मृदंगनाद ('कामकलाविलास') 'स्वच्छन्दतन्त्र' के अनुसार—१. घोष, २. राव, ३. स्वन, ४. शब्द, ५. स्फोट, ६. ध्वनि, ७. झांकार, ८. ध्वंकृति = ८ नाद। पद्मपादाचार्य के अनुसार वाणी के ५ और ७ पद हैं— सप्तपदीवाणी—१. शून्य, २. संवित्, ३. सूक्ष्मा, ४. परा, ५. पश्यन्ती, ६. मध्यमा, ७. बैखरी (स्पन्दकारिका दे० 'स्वरूपावरणे... प्रत्ययोद्भवः') पञ्चपदीवाणी—१. सूक्ष्मा, २. परा, ३. पश्यन्ती, ४. मध्यमा, ५. बैखरी । 'शून्य' = स्पन्दहीन, अनुत्पन्न वाक् । 'संवित्' = उत्पन्न होने की इच्छा वाली वाक् । 'सूक्ष्मा'—उत्पत्यवस्था । 'परा' = मूलाधार में प्रथमोदित ।। (प्र०सा०टीका) २. सर्वशिववाद—आचार्य सोमानन्दपाद कहते हैं कि 'विश्व' शिव का ही एक रूप है— 'तस्मादनेकभावाभिः शक्तिभिस्तदभेदतः । एक एव स्थितः शक्तः शिव एव तथा तथा ।।' (शिवदृष्टि) ठीक भी है क्योंकि—'न सावस्था न यः शिवः ।।' (स्पन्दसूत्र) तथा— 'यत्तसत्तपरमार्थो हि परमार्थस्ततः शिवः । सर्वभावेषु चिद्व्यक्तेः स्थितैव परमार्थता ।।' (शिवदृष्टि) 'तद्वत्सर्वपदार्थानां जगत्त्यैक्ये स्थितः शिवः । तस्मात्सर्वं शिवात्मकम्' (शिवदृष्टि) ।। 'विश्व' परमात्मा के चिदाकाश रूप स्वांग में एक आलेख्य है— 'चिदाकाशमये स्वांगे विश्वालेख्यविधायिने' (शिवदृष्टिवृत्ति) 'स्तवचिन्तामणि' (श्लोक ५) में भी जगत् को पारमेश्वर चित्र कहा गया है— 'निरुपादानसंभारमभित्तावेन तन्वते । जगच्चित्रं नमस्तस्मै कलाश्लाध्याय शूलिने ।।' अर्थात्— शिव महान् कलाकार है और उसकी तूलिका का ही चमत्कार है यह 'जगत' ।। ३. अद्वैतवादी काश्मीरीय शैवदर्शन का उद्देश्य—विश्वशिवैक्यवाद की अनुभूति है— (i) The title of the work (शिवदृष्टि = शैवदर्शन) is significant enough to express clearly what he wants to bring home to his readers. i.e.—realisation of the whole universe as the manifestation of one absolute Reality called Siva the all blissful.' (मधुसूदन कौल शास्त्री) ।
४६ स्पन्दकारिका (ii) The purpose of the body of his book : “What constitutes the essential identity of every being and what therefore is self- evident is Siva as an ever-running stream of desire, as a spontaneous flow of cognition and activity, as happiness and intelligence and as all pervasive” (मधुसूदन कौल शास्त्री) । (iii) यह दर्शन पूर्णतया अद्वैतवादी है क्योंकि प्रारंभ में ही सोमानन्दपाद ने ‘अस्मद्रूप समाविष्टः’ कहकर अपने को शिव के साथ अभिन्न घोषित करते हुए कहा है— “Let Siva who is one in substance with us often his obeisant to Siva, who has materialized his own nature in the form of universe by his own native power for success in overcoming the obstacle with the help of the triple agency of Mind, Tongue and body.” ‘अस्मद्रूपसमाविष्टः स्वात्मनात्मनिवारणे । शिवः करोतु निजया नमः शक्त्या ततात्मने ॥’ (शिवदृष्टि) ४. सर्वात्मवाद—प्रत्यभिज्ञा एवं स्पन्द दोनों दर्शन सर्वात्मवादी हैं— आत्मैव सर्वभावेषु स्फुरन्निर्वृतचिद्विभुः । अनिरुद्धेच्छाप्रसरः प्रसरद् दृक्क्रियः शिवः ॥ (शिवदृष्टि) ‘सर्वभावेषु स्वात्मैव शिव व्यवहर्तव्यमिति प्रतिज्ञा । निवृत्तचिदित्यादिविशेषण- कलापो हेतुः । स्फुरन्नपि धर्मिणो हेतोश्च स्वसंवेदनप्रत्यक्षप्रमाणम् ।।’ (शिवदृष्टिवृत्ति— उत्पलदेवाचार्य) ।। ५. इच्छाज्ञानक्रियाभेदवाद— ‘तदिच्छातावत्ती तावज्ज्ञानं तावत्क्रिया हि सा ॥’ (शिवदृष्टि) सोमानन्दं एवं स्पन्द दार्शनिक—दोनों इसे मानते हैं । ६. शब्दसृष्टिवाद— अनादिनिधनं ब्रह्म शब्दतत्त्वं यदक्षरम् । विवर्ततेऽर्थभावेन प्रक्रिया जगतो यतः ॥¹ उत्पलदेव कहते हैं— ‘पश्यन्तीरूप शब्दतत्त्वमक्षरमनाद्यन्तं ब्रह्मविश्वार्थभावेन विवर्तते ।।’² बिना वाणी के तो ब्रह्म का प्रकाश भी प्रकाशित होना संभव नहीं है— ‘वाग्रूपतां बिना न ब्रह्मतत्त्व प्रकाशोऽपि प्रकाशेत् ।’ (शिवदृष्टिवृत्ति) यद्यपि ‘ईश्वराद्वयवादी’ ‘शब्दपरब्रह्माद्वयवाद’ को स्वीकार न करके ‘ईश्वराद्वय- वाद’ की स्थापना करते हैं फिर भी शब्दसृष्टिवाद मानते हैं— १. शिवदृष्टि में उद्धृत । २. शिवदृष्टिवृत्ति (उत्पलदेव) ।
परिचय एवं पृष्ठभूमि ४७ 'ईश्वराद्वयवाद' एव युक्तियुक्तो न तु 'शब्दब्रह्माद्वयवाद' इति वक्तुं वैयाकरणोपेत शब्दाद्वैतं तावन्निराकर्तुमुपक्रममाण आह— अथास्माकं ज्ञानशक्त्या सदा शिवरूपता । वैयाकरणसाधूनां पश्यन्ती सा परा स्थितिः । (२।१)¹ 'वाक्यदीय' में भर्तृहरि—कहते हैं कि जगत् एक 'अर्थ' है अर्थ 'वाच्य' है और 'शब्द' वाचक है । जगत् एवं शब्द में वाच्यवाचक संबंध तो है किन्तु यथार्थ सत्ता की दृष्टि से तो जगत् शब्द का 'विवर्त' (असत् में सत् का भ्रम, अतत्वतो प्रथा') है अर्थात् जगत् मूलतः शब्द है न कि स्वतन्त्र पदार्थ । 'पराशक्ति' 'परावाक्' के रूप में एवं परावाक् 'पश्यन्ती' के रूप में, पश्यन्ती 'मध्यमा' के रूप में एवं मध्यमा 'बैखरी' के रूप में विकसित होती है और यही बैखरी विश्वविग्रहा है—'बैखरी विश्वविग्रहा' । 'अहं' (अ से ह = शिव + शक्ति) में ही सारी वर्णसमष्टि एवं निखिल जगत् अवस्थित है । जगत् अहमाकार है । 'कामकला' अहमाकार है । 'स्पन्द' में शक्ति-प्राधान्य—'स्पन्दशास्त्र' में 'स्पन्द' (आत्मशक्ति, चित् शक्ति, इच्छाशक्ति, स्वातंत्र्यशक्ति, संवित्शक्ति) का प्राधान्य है इसीलिए इस शास्त्र का नाम भी स्पन्दशास्त्र भी है । इसका शक्ति-प्राधान्य प्रतिपाद संगत भी है क्योंकि—'तद्योगादेव शिवो जगदुत्पादयति पाति संहरति' (वरिवस्यारहस्यम्) शिव-शक्ति-अभेदवाद—'शिव शक्तिरिति ह्येकं तत्त्वमाहुर्मनीषिणः ।' 'शिवाभिन्ना पराशक्तिः' 'न शिवेन विनादेवी न देव्या च बिना शिवः' इन दोनों में चन्द्रमा एवं चन्द्रिका के सम्बन्ध की भाँति ऐक्य है—'नानयोरन्तरं किंचिच्चन्द्रचन्द्रिकयोरिव' । महेश्वर एवं जीवात्मा का ऐक्य—निखिल जगदात्मा, सर्वोत्तीर्ण, सर्वमय, विकल्पों से असंकुचित, संवित्प्रकाशरूप, अनवच्छिन्नचिदानन्दविश्रान्त, अविरल प्रसरण- शील, विचित्र पञ्चवाहवाहवाहिनीमहोदधि, निरतिशयस्वातंत्र्य से प्रगल्भमान, सर्वशक्ति- खचित एकात्मक, अद्वैत समस्त शक्तियों से उपहित संविदात्मा महेश्वर ही अपनी स्वातंत्र्यशक्ति की महिमा से अपने को संकुचित की भाँति आभासित करते हुए अणु (जीव) कहलाते हैं—'स च भगवान् स्वातंत्र्यशक्तिमहिम्ना स्वात्मानं संकुचितमिव आभासयन् अणुः उच्यते । यथोक्तम्— 'व्योपको हि शिवः स्वेच्छाक्लृप्तसंकोचमुद्रणात् । विचित्रफलकर्मौघवशात्तत्तच्छरीरभाक् ॥ 'अतिदुर्धटकारित्वात्स्वाच्छन्द्यान्निर्मलादसौ । स्वात्मप्रच्छादनक्रीडा पण्डितः परमेश्वरः ॥ (जन्ममरणविचार—भट्टवामदेव) १. शिवदृष्टि ।