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स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished519 पृष्ठ

४८ स्पन्दकारिका 'चिदानन्दलाभ' एवं 'समापत्ति' : 'स्पन्दकारिका' में 'आत्मग्रह' 'आत्मोदय' 'परामृतस्य' एवं 'समापत्ति' प्राप्त करने का प्रतिपादन किया गया है। 'स्पन्दशास्त्र' प्रतिपादित चरमोपलब्धि 'जीवन्मुक्ति'— यह 'समापत्ति' क्या है? आचार्य क्षेमराज 'प्रत्यभिज्ञाहृदयम्' में कहते हैं— 'मध्यविकासाच्चिदानन्दलाभः स एव च परमयोगिनः समावेश समापत्त्यादि पर्यायः समाधिः तस्य नित्यो-दितत्वे युक्तिमाह—समाधिसंस्कारवति व्युत्थाने भूयो भूयश्चिदैक्या- मर्शात्रित्योदित समाधि लाभः (प्रत्यभिज्ञाहृदयम्) ॥ इसी चिदानन्द की प्राप्ति के पश्चात् देहादिक की अनुभूति होने पर भी चित् शक्ति के साथ एकात्मता-प्रतिपत्ति की दृढ़ता से 'जीवन्मुक्ति' की प्राप्ति होती है— चिदानन्दलाभे देहादिषु चेत्यमानेष्वपि चिदैकात्म्यप्रतिपत्तिदार्ढ्या जीवन्मुक्तिः ॥ (प्रत्यभिज्ञाहृदयम्ः 'शक्तिसूत्र' : १६) 'स्पन्दप्रदीपिका' में भी इसी जीवन्मुक्ति को चरम उपलब्धि स्वीकार करते हुए कहा गया है— 'इति वा यस्य संवित्तिः क्रीडात्वेनाखिलं जगत् । स पश्यन् सततं युक्तो जीवन्मुक्तो न संशयः ॥' जब ऐश्वर्यशक्ति 'मध्यधाम (सुषुम्नापथ) के उल्लास रूप उदान शक्ति एवं विश्व- व्याप्तिसारभूत व्यानशक्ति को जिसे क्रमशः आनन्दघनरूप 'तुर्यदशा' एवं चिद्घनरूप तुर्यातीतदशा कहा जाता है—उन्मीलित करती है तब देहादि अवस्था में भी पति- दशात्मक 'जीवन्मुक्ति' उपलब्ध होती है। 'तुर्यदशारूपां तुर्यातीतदशारूपां च चिदानन्दघनाम् उन्मीलयति तदा देहाद्यवस्थाया- मपि पतिदशात्मा जीवन्मुक्तिर्भवति ।।' (प्र०हृ०)। त्रिकदर्शन 'सालोक्य' 'सामीप्य' 'सायुज्य' आदि मुक्तियों को स्थान न देकर 'जीवन्मुक्ति' को महनीय स्थान देते हुए उसे ही यथार्थ मुक्ति मानता है— १. पशुमात्रस्य सालोक्यं सामीप्यं दीक्षितस्य तु । तत्परस्य तु सायुज्यमित्याज्ञा पारमेश्वरी ॥ २. यस्तूर्ध्वशास्त्रगस्तत्र व्यक्तास्थः संशयेन सः । व्रजेदायतनं नैव स फलं किंचिदश्नुते ॥ दीक्षायतन विज्ञानद्वेषिणो ये तु चेतसा । आचरन्ति च तत्ते वै सर्वे निरयगामिनः ॥ (नरकगामी होते हैं) ये च स्वभ्यस्तविज्ञानमयाः शिवमया हि ते । जीवन्मुक्तो न तेषां स्यान्मृतौ कापि विचारणा ॥ ('जन्ममरणविचार' में उद्धृत) माया एवं शक्ति में अभिन्नता—'माया' शिव की शक्ति है न कि अनिर्वचनीय भ्रान्ति तत्त्व है—आचार्य शंकर ने 'माया' को मिथ्या भी कहा है किन्तु इसे सत्-असत्-

सदसदनुभय से परे भी मानकर ‘अनिर्वचनीय’ भी कहा है। इसे ब्रह्म से असमवेत एवं जड़ माना है। यह सांख्य की प्रकृति की जड़ता से ग्रस्त है और मात्र अज्ञान भी उद्भाविका है यह सृष्टि-व्यापार की संचालिका आदि भी है किन्तु पारमार्थिक सत्य नहीं है। ‘स्पन्द’ एवं प्रत्यभिज्ञा दर्शन में ‘माया’ भी चिद्रूपा स्वातंत्र्य शक्ति का अवरोहणात्मक रूप है। चितिशक्ति ही—‘ज्ञान, क्रिया’ एवं ‘माया’ बन जाती है। ज्ञान, क्रिया एवं माया ही सत्व, रज एवं तम बन जाते हैं। भगवान् की ‘क्रियाशक्ति’ (सर्वकर्तृत्व) अल्पकर्तृत्व बन जाती है और ‘कार्ममल’ का प्रसव करती है। ‘सर्वकर्तृत्व, सर्वज्ञत्व, पूर्णत्व, नित्यत्व एवं व्यापकत्व ‘कला’ ‘विद्या’ ‘राग’ ‘काल’ एवं ‘नियति’ (पञ्चकञ्चुक) बन जाते हैं। संवित् ही प्राण बन जाता है—‘प्राक् संवित् प्राणे परिणता’ ‘न सावस्थान यः शिवः’ (स्पन्दकारिका) ऐसी कोई अवस्था ही नहीं है जो शिव न हो। वाक् तत्त्व, अहन्ता और विश्व में तादात्म्य—‘अहन्ता’ समस्त मन्त्रों के उदय. और विश्रान्ति के स्थान भी हैं यह महती वीर्यभूमि है। (प्र०हृ०) परमात्मा और स्वात्मा तथा जगत् एक ही सत्ता के विभिन्न रूप हैं। आचार्य क्षेमराज कहते हैं—‘श्री परमशिवः स्वात्मैक्येन स्थितं विश्वं’ (सूत्र ४ की व्याख्या) ‘अहं’ में ‘इदम्’ के अवस्थान की विभिन्न स्थितियाँ— १. ‘सदाशिवतत्त्व’ में—अहन्ताच्छादित और अस्फुट इदन्तात्मक ‘परापर विश्व’ ग्राह्य है। (सदाशिव भट्टारकाधिष्ठित ‘मन्त्रमहेश्वर वर्ग प्रमाता परमेश्वरेच्छा’ कल्पित है)। २. ‘ईश्वरतत्त्व में—स्फुट इदन्ता और अहन्ता का सामानाधिकरण्य जैसा विश्व ग्राह्य है (ईश्वरभट्टारक से अधिष्ठित ‘मन्त्रेश्वर वर्ग’ ग्राहक है)। ३. ‘विद्यापद’ में—श्रीमदनन्तभट्टारक से अधिष्ठित मन्त्ररूप ग्राहक है और भेदात्मक विश्व ग्राह्य है। शुद्ध विद्याः सामानाधिकरण्यं च सद्विद्यामिदं धियोः। (ईश्वर- प्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (३।१) सामनाधिकरण्य रूप है)। स्वतन्त्र चिद्घनसंवित्स्वरूप, अनुत्तरविग्रह, परमेश्वर जब अपनी स्वातन्त्र्यशक्ति द्वारा, अखिल जगत् की रचना के लिए किंचित् चलानात्मक दशा का अनुभव करते हैं तो उस प्रथम ‘स्पन्द’ को ही तत्त्वज्ञ ‘शिवतत्त्व’ कहते हैं— ‘यदद्यमनुत्तरमूर्तिर्निजेच्छयाऽखिलमिदं जगत्स्रष्टुम्। मन्त्रवर्णात्मकाः सर्वे सर्वे वर्णाः शिवात्मकाः ॥’ ‘नादसिद्धान्त’— चित्प्रकाश से अभिन्न, नित्योदित, महामन्त्ररूप, पूर्ण ‘अहं’ विमर्शात्मक जो यह ‘परावाक् शक्ति’ है जिसके गर्भ में ‘अ’ से लेकर ‘क्ष’ तक वर्णात्मक समग्र शक्ति चक्र विद्यमान है वही ‘पश्यन्ती’ एवं ‘मध्यमा’ के क्रम से ग्राहक भूमिका को आभासित करता है। पूर्ण होने से इसे ‘परा’ एवं प्रत्यवमर्श द्वारा विश्व का अभिलाप करने से इसे ‘वाक्’ कहा गया है— स्पं.भू. ३

५० स्पन्दकारिका 'चितिः प्रत्यवमर्शात्मा परावाक् स्वरसोदिता । स्वातंत्र्यमेतन्मुख्यं तदैश्वर्यं परमात्मतः ॥ (ईश्वरप्रत्यभिज्ञाकारिका अ० १। आ० ५) 'पूर्णत्वात् परा, वक्ति विश्वं अभिलपति प्रत्यवमर्शेन इति च वाक् ॥ (ई० प्र० वि०) 'पश्यन्ती' परावाक् की उत्तरवर्ती वाच्यवाचकात्मकविश्व विकास की द्वितीय कोटि है । १. 'पश्यति सर्वं स्वात्मनि कारणानां सरणिमपि यदुत्तीर्णा । तेनेयं पश्यन्तीत्युत्तीर्णेत्यप्युदीर्यते माता ॥ (सौभाग्य सुधोदय) २. पश्यन्तीव न केवलमुत्तीर्णा नापि बैखरीव बहिः । स्फुटतर निखिलावयवा वाग्रूपा मध्यमा तयोरस्मात् ॥ वर्णों के अष्ट वर्ग की अधिष्ठात्री देवियाँ— | 'ब्राह्मी'-क वर्ग | 'माहेश्वरी'-च वर्ग | 'कौमारी'-ट वर्ग | 'वैष्णवी'-त वर्ग | | 'वाराही'-प वर्ग | 'ऐन्द्री'-य वर्ग | 'चामुण्डा'-श वर्ग | 'महालक्ष्मी'-अ वर्ग | इसी शब्द राशि से समुत्थित शक्ति वर्ग के भोग हैं जीव और इसी भोग्यता के कारण वे पशु बन जाते हैं— शब्दराशिसमुत्थस्य शक्तिवर्गस्य भोग्यताम् । कलाविलुप्तविभवो गतः सन् स पशुः स्मृतः ॥ (स्पन्द० ४५) अद्वैतवादी दृष्टि का वैलक्षण्य— स्वरूपावरण में भी शब्द एवं शाब्दी शक्तियाँ ही कारण हैं— 'स्वरूपावरणे चास्य शक्तयः सततोत्थिताः । यतः शब्दानुरोधेन न विना प्रत्ययोद्भवः ॥ (स्पन्दकारिका० ४७) शांकर अद्वैत भी अद्वैत है और माहायानिकों का शून्याद्वैत एवं विज्ञानवादियों का विज्ञानाद्वैत भी अद्वैत है किन्तु स्पन्द एवं प्रत्यभिज्ञा का अद्वैत उनसे भिन्न है उसमें दो का अभिन्न सामरस्य है और इसका ब्रह्माद्वैत से मतवैषम्य है—क्षेमराज कहते हैं 'इह ईश्वराद्वयदर्शनस्य ब्रह्मवादिभ्यः अयमेव विशेषः ।' [४] शिव और शक्ति तत्त्व एवं शिव तथा शक्ति— प्रत्यभिज्ञा एवं स्पन्द दर्शन में मुख्यतः दो तत्त्व स्वीकृत हैं और वे हैं—१. शिव, २. शक्ति । तात्त्विक दृष्टि से तो दो नहीं एक तत्त्व है और वह है 'परमशिव' क्योंकि 'शक्ति' उसका स्वभाव है, धर्म है उसका मुख है—'शैवी मुख मिहोच्यते ।' यह वह तत्त्व है जो कि शिव में समवेत दृष्टि से अन्तर्लीन है । इसीलिए 'कामकलाविलास' में कहा गया है—

परिचय एवं पृष्ठभूमि ५१ 'सकल भुवनोदय स्थिति लयमय लीला विनोदुक्तः । अन्तर्लीन विमर्शः पातु महेशः प्रकाशमात्र तनुः ॥ (१)' भेदात्मक दृष्टि से देखने पर प्रत्यभिज्ञा एवं स्पन्द में ३६ या ३७ तत्त्व स्वीकृत हैं किन्तु ये सभी शिव-शक्ति के स्फार हैं । 'शान्तब्रह्मवाद' एवं 'शिवाद्वयवाद'—शाङ्कर वेदान्त का निर्गुण, निराकार सृष्टि- स्थिति-संहार आदि व्यापारों से रहित शान्त ब्रह्म स्पन्द एवं प्रत्यभिज्ञा को स्वीकार्य नहीं है । वे 'शिवाद्वयवाद'—प्रतिपादक हैं । 'शिव' और 'शक्ति'—प्रत्यभिज्ञा एवं स्पन्द का शिव पञ्चकृत्यकारी है—'स्पन्द- कारिका' की प्रथम कारिका में इसी पक्ष की ओर ध्यान आकृष्ट करते हुए कहा गया है— 'यस्योन्मेषनिमेषाभ्यां जगतः प्रलयोदयौ । तं शक्तिचक्रविभवप्रभवं शङ्करं स्तुमः ॥ इसके पाँच कार्य निम्नांकित हैं—१. सृष्टि, २. स्थिति, ३. संहार, ४. तिरोधान एवं ५. अनुग्रह । (१) 'नमः शिवाय सततं पञ्चकृत्य विधायिने । चिदानन्दघनस्वात्म परमार्थविभासिने ।।' (प्रत्यभिज्ञाहृदयम्) (२) 'सृष्टि संहार कर्तारं विलयस्थितिकारकम् । अनुग्रहकरं देवं प्रणतार्तिविनाशनम् ।। (स्वच्छन्दतन्त्र, प्र०पटल) इसके अतिरिक्त १. आभासन, २. रक्ति, ३. विमर्शन, ४. बीजावस्थापन एवं ५. विलापन भी उसके कार्य हैं— (क) 'तथापि तद्वत् पञ्चकृत्यानि करोति' (प्र०हृ० १०) । (ख) 'आभासनरक्तिविमर्शनबीजावस्थापनविलापनतस्तानि ।।' प्रमाताओं की दृष्टि से सर्वोच्च प्रमाता 'शिव' है—(प्र०हृ० ११) और उसके स्फारस्वरूप ७ प्रमाता हैं— १. सत्य प्रमाता 'शिव' 'परप्रमाता' २. सदाशिवतत्त्वाश्रित प्रमाता = 'मन्त्र- महेश्वर' ३. ईश्वरतत्त्वावस्थित प्रमाता 'मन्त्रेश्वर' ४. शुद्धविद्यातत्त्वावस्थित प्रमाता 'मन्त्र' ५. शुद्धविद्या तत्त्व से नीचे एवं मायोपरि स्थित प्रमाता = 'विज्ञानाकल' ६. माया- तत्त्वावस्थित प्रमाता—प्रलयाकल, प्रलय केवली ७. माया प्रमाता, परिमित प्रमाता, संकुचित प्रमाता—'सकल' (जीव) ॥ शिव का अपर पर्याय है 'प्रकाश' एवं शक्ति का 'विमर्श', 'विमर्श' शिव का अहमाकार विमर्शन है और जगत् उसी का विराट् 'अवभासन' है । शिव की शक्तियाँ—शिव में अनन्त शक्तियाँ हैं किन्तु उन्हें पाँच वर्गों में वर्गीकृत किया गया है जो निम्न हैं—१. 'चितिशक्ति' २. 'आनन्दशक्ति' ३. 'इच्छाशक्ति' ४. 'ज्ञानशक्ति' एवं ५. 'क्रियाशक्ति' । 'शक्ति' अपने भीतर समस्त चराचर का बीज स्थित

५२ स्पन्दकारिका रखकर सृष्टि का अवभासन करती है और यही शिव का दर्पण है— ‘सा जयति शक्तिराद्यानिजसुखमयनित्यनियमाकारा । भाविचराचरबीजं शिवरूप विमर्श निर्मलादर्शः ॥’ (का०) स्वातंत्र्यवाद—‘स्वातंत्र्य’ शिव की पराशक्ति है। ‘आनन्द’ इसका अपर पर्याय है। परमात्मा की इच्छा का अनभिहत प्रसार ही स्वातंत्र्य है—‘स्वातंत्र्यं च नाम यथेच्छं तथेच्छाप्रसरस्य अविघातः (ई० प्रत्यभिज्ञा वि०)। यह दुर्घटकारित्व है—‘एतदेव स्वातंत्र्यं दुर्घटकारित्वम् ॥ परमात्मा का यही दुर्घटकारित्व ‘नित्योदित परावाक्’ है। अविभक्त या अन्तर्लीन विमर्शात्मक शिव ही ‘परमशिव’ है ‘स्वातंत्र्य’ का प्रसार ही जड़चेतन जगत् है। [५] जीव तत्त्व जीव परमार्थतः शिव है। शिव एवं जीव में निम्न भेद है— ‘स्वांगरूपेषु भावेषु प्रमातो कथ्यते पतिः । मायातो नेदिषु क्लेश कर्मादिक्लुषः पशुः ॥’—उत्पलदेव विकल्प-ज्ञान ‘परामृतरस’ एवं ‘स्वातंत्र्य’ दोनों जीव से छीन लेता है। (स्पन्दका० ४६)॥ भगवान् स्वस्वातंत्र्य शक्ति की महिमा से अपने को संकुचित की भाँति आभासित करते हुए ‘अणु’ या जीव कहलाता है—अर्थात् पशुत्व भी शिव की एक लीला या आत्मप्रच्छादन क्रीडा है—एक आभासन है— ‘इत्थं सर्वशक्तियोगेऽपि आभिर्मुख्याभिः शक्तिभिरुपचर्यते, स च भगवान् स्वातंत्र्य- शक्तिमहिम्ना स्वात्मान संकुचितमिव आभासयन् अणुः’ इति उच्यते। ‘व्यापको हि शिवः स्वेच्छाक्लृप्तसंकोचमुद्रणात् । विचित्रकलकर्मोदिवशात्तत्त- च्छरीरभाक्’ शिव की स्वात्मप्रच्छादन-क्रीडा ही उसे जीव बना देती है। शिव एवं जीव में परमार्थतः कोई भेद नहीं है।¹ वह भगवान् अपनी मायाशक्ति के द्वारा (अपनी स्वातंत्र्यशक्ति से अभिन्न रहकर भी) अपने द्वारा अपने को संकुचित जैसा अवभासित करता हुआ। १. ‘विज्ञानाकल’ २. ‘प्रलयाकल’ ३. एवं ‘सकल’ बन जाता है। (क) ‘विज्ञानाकल’ : एकमलोपेत । (ख) ‘प्रलयाकल’ : मलद्वयोपेत ॥ (ग) ‘सकल’ : मलत्रयोपेत ॥² ‘पञ्चकंचुक’ शिव को मलावृत करके एवं उसके स्वातंत्र्य को संकुचित करके मलावृत संसारी बना देता है। शाब्दी शक्ति भी उसे ‘पशु’ बनाने में योग देती है। इसलिए ‘स्पन्दकारिका’ में कहा गया है— १-२. जन्ममरणविचारः (वामदेव)।

परिचय एवं पृष्ठभूमि ५३ १. शब्दराशि समुत्थस्य शक्तिवर्गस्य भोग्यताम् । कलाविलुप्तविभवो गतः सन् सपशुः स्मृतः ॥१ २. स्वरूपावरण के लिए शाब्दीशक्तियाँ उत्तरदायी हैं— 'स्वरूपावरणे चास्य शक्तयः सततोत्थिता' ३. 'क्रियाशक्ति' ही अज्ञात होने की दशा में बंधन का कारण है किन्तु ज्ञात होने पर सिद्धियाँ प्रदान करती हैं— 'सेयं क्रियात्मिकाशक्तिः शिवस्य पशुवर्तिनी । बंधयित्री स्वमार्गस्था ज्ञाता सिद्ध्युपपादिका ॥२ आत्मा पर चढ़े हुए पञ्चावरण एवं वाग्योग— अन्नमयकोश । 'स्पन्दकारिका' प्राणमय कोश । में 'शब्दराशि मनोमय कोश । समुत्थस्य...पशुः विज्ञानमय कोश । स्मृतः' (४५. वि०स्पन्द) आनन्दमय कोश । कहकर शब्द को मल एवं पशुत्व का कारण माना गया है । आत्मा (५ चहर-दीवारो की कारा में बन्द बद्धात्मा) । (१) अ० कोश की शुद्धि—आसन । तप । प्राणायाम । तत्त्वशुद्धि । (२) प्रा० कोश की शुद्धि—बंध । मुद्रा । प्राणायाम । (३) मनो० कोश की शुद्धि—जप । त्राटक । तन्मात्रा साधना । ध्यान । (४) वि० कोश की शुद्धि—सोऽहं की साधना, स्वर संयम, ग्रंथिभेद आत्मानुभूति । (५) आ० कोश की शुद्धि—नाद-साधना, बिन्दु-साधना, कला । प्रकाशांशरूपरौद्री + विमर्शांशरूप क्रिया का योग—'बैखरीवाक्' = 'रौद्रीशक्ति' ।। 'परावाक्' = चित्शक्ति ।—(पदार्थदर्श) । बैखरी वाक्-विखर (शरीर)— अर्थात् शरीरोद्भवा, शरीरेन्द्रियपर्यन्त चेष्टासंवादिका वाणी बैखरी है—'विखरः शरीरं तत्र भवा तत्पर्यन्तचेष्टासंपादिका इत्यर्थः ।। (ई०प्र०वि०वि० १।५) १.-२. स्पन्दकारिका ।

५४ स्पन्दकारिका [चित्र: परा, पश्यन्ती, मध्यमा, वैखरी वृत्त-चित्र] १. अनाहत वाक् परावाक् । (परा) ↓ (चिन्मय वाक्) । २. अनाहत वाक् पश्यन्तीवाक् । (पश्यन्ती) ↓ (चिन्मय वाक्) । ३. अनाहत वाक् मध्यमावाक् । (मध्यमा) ↓ (चिन्मयवाक्) । ४. आहत वाक् वैखरीवाक् । (वैखरी) (जड़ वाक्) । (१) विवक्षात्मक अनुसंधान = सूक्ष्म बैखरी (२) स्फुटवर्णों की उत्पादिका = स्थूल बैखरी (३) अनुपाधिमान चिदात्मक = पररूप बैखरी [सोपान-चित्र:] परावाक् / पश्यन्तीवाक् / मध्यमावाक् / वैखरीवाक् बैखरी: स्थूल, सूक्ष्म, पर —तन्त्रालोक (तृ०आ०२४६) पञ्चशक्तियाँ एवं वाक्चतुष्टय 'योगिनीहृदय' (चक्रसंकेत)— १. आत्मनःस्फुरणं पश्येद्यदा सा परमा कला । अम्बिका रूपमापन्ना परावाक समुदीरिता ॥ (१।३६ यो०हृ०) । २. बीजभावस्थितं विश्वं स्फुटीकर्तुं यदोन्मुखी । वामाविश्वस्य वमनादंकुशाकारतां गता ॥ (यो०हृ० १।३७) ३. इच्छाशक्तिस्तदा सेयं पश्यन्ती वपुषा स्थिता । ज्ञानशक्तिस्तथा ज्येष्ठा मध्यमा वागुदीरिता ॥ (१।३८) ४. ऋजुरेखामयी विश्वस्थितौ प्रथितविग्रहा । तत्संहतिदशायां तु बैन्दवं रूपमास्थिता ॥ (१।३९) प्रत्यावृत्तिक्रमेणैवं शृंगाटवपुरुज्ज्वला । क्रियाशक्तिस्तु रौद्रीयं बैखरी विश्वविग्रहा ॥ (योगिनीहृदय १।४०) १. इच्छाशक्तिर्वामाशक्ति-सामरस्यमापन्ना पश्यन्तीरूपेण स्थिता । २. ऋजुरेखामयी अत्र शृंगाटाग्ररेखाकारा मध्यमा वागुदीरिता मध्यमामातृका- त्वमापन्ना ॥ ३. बैखरीविश्वविग्रहा वाग्रूपप्रपञ्चमयबैखरीरूपा जाता ।

परिचय एवं पृष्ठभूमि ५५ सृष्टि = एक क्रीड़ा है—'हर्षानुसारी स्पन्द' है—सोमानन्दः 'शिवदृष्टि' 'यथा नृपः सार्वभौमः प्रभावामोदभावितः । क्रीडन्करोति पादातधर्मांस्तद्धर्मधर्मतः । तथा प्रभुः प्रमोदात्मा क्रीडत्येवं तथा तथा ।। (शिवदृष्टि) । हर्षानुसारी स्पन्दः क्रीडा ।। (सोमानन्द) ।। परोपादाननिरपेक्ष इच्छासृष्टिवाद— योगिनामिच्छया यद्वन्नानारूपोपपत्तित । न चास्ति साधनं किंचिन्मृदादीच्छां विना प्रभोः । तथा भगविदच्छैव तथात्वेन प्रजायते ।। (शिवदृष्टि) सर्वशिववाद— 'एवं सर्वेषु भावेषु यथा सा शिवरूपता ।। 'सर्वस्य शिवरूपत्वस्' (शिवदृष्टि) एवं सर्व पदार्थानां समैव शिवता स्थिता ।।' (सोमानन्द) (अण्ड चतुष्टयात्मक) विश्व— [चित्र: अण्ड-मण्डल — शाक्ताण्ड, मायाण्ड, प्रकृत्यण्ड, ब्रह्माण्ड, पिण्ड] [वृत्त १: शिव तत्त्व / शान्त्यातीत / कला] — अण्ड-हीन [वृत्त २: शाक्ताण्ड / शान्ति / कला] — शुद्धाध्वा में स्थित । मायोपरि । ज्योतिर्मय शुद्ध सत्त्वात्मक । शुद्ध विद्या । सदाशिव एवं ईश्वर = उपादान तत्त्व । [वृत्त ३: मायाण्ड / शान्ति / कला] — एक मायाण्ड में असंख्य प्रकृत्यण्ड स्थित है । [वृत्त ४: प्रकृत्यण्ड / प्रतिष्ठा / कला] — १. असंख्य । २. जल तत्त्व से प्रकृति पर्यन्त । ३. प्र० में असंख्य ब्रह्माण्ड है । ४. उपादान—जल से प्रकृति तत्त्व समूह । [वृत्त ५: ब्रह्माण्ड / निवृत्ति / कला] — १. असंख्य । २. $\rightarrow$ १४ लोक (पुराण) (७ ऊर्ध्व + ७ अधोलोक) [वृत्त ६: रिक्त] — जगत—'कदाचिदात्म प्रच्छादनात्मकाभेदाख्यातिमयीं संसार रूपां भ्रान्तिं क्रीडामेव कथंचन तथा स्वभावत्वात् कुर्वतो'—सोमानन्द । (१) मायोपरिस्तर पर संक्षुब्ध 'बिन्दु' $\rightarrow$ नाद-ज्योति (वाच्य वाचक अध्वा) (२) वाचकाध्वा में—वर्ण, पद, मन्त्र । (३) वाच्याध्वा में— (क) कला, (तत्त्व, भुवन) $\downarrow$ शान्त्यातीत शान्ति विद्या प्रतिष्ठा निवृत्ति (ख, ग) तत्त्व भुवन । । ३६ असंख्य

५६ स्पन्दकारिका वैष्णव, शैव एवं बौद्ध— १. वै० शैव = शुद्ध जगत् होता है । २. बौद्ध = अनाश्रव धातु शुद्ध जगत् है । (माहायानिक बौद्ध) विश्व = भूमित्रय ┌───────────────┬───────────────┐ अभेदभूमि भेदाभेदभूमि भेदभूमि │ │ │ अहं प्रत्यय (अहमिदम्) (इदमहम्) (अहमस्मि) (‘व्यपदेष्टुमशक्यासौ अकथ्या परमार्थतः ।’—वि०भै०) (न यहाँ शिव, न शक्ति न विश्वामयता और न विश्वोत्तीर्णता—किसी का भी पता नहीं है) यहाँ ‘इदम्’ का सर्वथा अभाव है । परतत्त्व और जगत— ‘यत् पर तत्त्वं तस्मिन् विभाति का षट्त्रिंशदात्म जगत् ।।—(‘परमार्थसार’) औन्मुख्य → इच्छाशक्ति → (परमेश्वर का विश्वचिकीर्षा रूप परामर्श या इच्छात्मक विमर्श)—(शिवदृष्टिवृत्ति) । ‘इच्छाशक्ति’—परमेश्वर की बहिरुल्लिलासयिषा = परमेश्वर के ऐश्वर्य (आनन्द) का चमत्कार या उसका विश्वात्मक भाव से उल्लसित होने की अभिलाषा! इच्छाशक्ति । इच्छाशक्ति का विकसित होकर विश्व रूपी कार्य के प्रकाशन की शक्ति बनने पर उसकी अभिख्या = ‘ज्ञानशक्ति’ ।। ज्ञान प्रक्रिया के दो रूप—१. ‘ज्ञानशक्ति’ ।। ज्ञान प्रक्रिया के दो रूप—१. ज्ञातृरूप । २. ज्ञेयरूप ।। (चिदात्मा ज्ञाता + ज्ञेय रूप । (चिदात्मा ज्ञाता

  • ज्ञेय रूपों में अपना अवभासन करता है ।) ज्ञातृ + ज्ञेय दोनों रूपों का अव-भासन करके जो शक्ति ज्ञान कराती है वही ‘ज्ञानशक्ति’ है ।। शिव की इच्छा का अन्तर्मुख स्पन्द = ‘ज्ञानशक्ति’ और शिव का बहिर्मुख स्पन्द = ‘क्रियाशक्ति’ । शिव जिस शक्ति के द्वारा विश्वात्मकभाव से नाना पदार्थों का भेदावभासन करता है उस ‘भासना’ को ही ‘क्रियाशक्ति’ कहते हैं । समस्त विश्वस्फार = क्रियाशक्ति का स्वरूप है । इच्छा—शिव के विमर्श (स्वातंत्र्य) का प्रकाश (स्वरूप परामर्श) ही उसकी चिकीर्षारूपा इच्छा है । परमशिव का शक्ति पचक ┬ ┬ ┬ ┬ ┬ चित् आनन्द इच्छा ज्ञान क्रिया शक्ति शक्ति शक्ति शक्ति शक्ति (प्रकाश = (आनंद अंश चिदंश + प्रकाशांश (प्रकाश+ विमर्श) का चित् अंश) = विमर्श) सामरस्य = परमभाव (शिवभाव) (शक्तिभाव)

परिचय एवं पृष्ठभूमि ५७ 'जगत' = परमशिव की शक्ति है। शिव की शिवता—इच्छारूपा स्वातंत्र्य शक्ति ही शिव की शिवता है। जो शिवता (शक्ति) है वही शिव है 'शक्तयोऽस्य जगत्कृत्स्नं शक्तिमांस्तु महेश्वरः ।।' (तन्त्रा०) 'सृष्टि'—चिदात्मा की आनन्दोच्छलित स्वभाव क्रीड़ा ।। 'विश्व' = विश्वं शिवादिभूम्यन्तनामरूपात्मके' ('दीपिका:' अमृतानन्दनाथ) 'विश्व' = आत्मप्रच्छादन क्रीडा 'आत्मप्रच्छादनक्रीडां कुर्वतो वा कथंचन । मायारूपमितीत्यादि षट्त्रिंशत्तत्त्वरूपताम् ।।' (सोमानन्द—शिवदृष्टि) [६] सृष्टि-विधान जगत् का उपादान—१. 'विवर्त', २. 'परिणाम' । 'विवर्त' = अवस्थान्तरभानं तु विवर्तो रज्जुसर्पवत् । 'परिणाम' = अवस्थान्तीतापत्तिरेकस्य 'परिणामिता' । स्यात्क्षीरं दधिमृदं कुम्भः सुवर्णे कुण्डलं यथा ।। (पञ्चदशी) । 'आरम्भवाद' = आरंभवादिनोऽन्य अन्यस्योसन्तिभूचिरे । तन्तोः पटस्य निष्पत्तेभिन्नौ तन्तु पटौ खलु । आरम्भवादी (वैशेषिक न्याय वाले) कहते हैं कि अन्य (कार्य से सर्वथा भिन्न रहने वाले कारण) सामान्य (अर्थात् कार्य नामक) वस्तु उत्पन्न होती है जो उससे सर्वथा भिन्न होती है। वे कहते हैं कि तन्तु से पट की उत्पत्ति होती है। साँख्य को देखें तो उसकी सृष्टि की प्रक्रिया निम्नांकित है— सांख्य का सिद्धान्त— (पुरुष चेतन) प्रकृति विकृति प्रकृति-विकृति = (तत्त्वों के प्रकार) (जड़) (जड़) (जड़) | ज्ञ अव्यक्त व्यक्त महत्तत्त्व (Primordial Matters) = बुद्धि ↓ ↓ ↓ | शब्द अनुमान प्रत्यक्ष अहंकार → (षोडशक) प्रमाण प्रमाण प्रमाण (१) मन (५) ज्ञानेन्द्रियाँ (५) कर्मेन्द्रियाँ (५) तन्मात्रायें (तदेव हि तन्मात्रं) शब्द स्पर्श रूप रस गंध ↓ ↓ ↓ ↓ ↓ आकाश वायु अग्नि जल पृथ्वी

५८ स्पन्दकारिका 'स्पन्दशास्त्र में प्रकृति की सहायता के बिना ही परमात्मा = पञ्चकृत्य विधायक है। 'स्पन्दशास्त्र' = 'स्वेच्छया स्वभित्तौ विश्वमुन्मीलयति' = जगत् का कारण चिति शक्ति ॥ यह भी मान्यता है कि—पञ्चभूतों का सात्त्विक अंश -> ज्ञानेन्द्रियाँ । पञ्चभूतों का राजस अंश -> कर्मेन्द्रियाँ । पञ्चभूतों का तामस अंश -> ५ प्राण ॥ 'स्पन्दशास्त्र'—सृष्टि का कारण—'भगवती चिति'—'पराशक्तिः चितिः एव भगवती स्वतन्त्रा अनुत्तरविमर्शमयी शिवभट्टारिका भिन्ना हेतुः कारणम् ॥ (प्र०हृ०) नित्य तत्त्व = (१) 'पुरुष' (चेतन), (२) 'प्रकृति' (जड़) । 'प्रकृतेर्महांस्ततोऽहंकारस्तस्माद्गणश्चषोडशकः । तस्मादपि षोडशकात्पञ्चभ्यः पञ्चभूतानि ॥' अभिमानोऽहंकारस्तस्माद् द्विविधः प्रवर्तते सर्गः । एकादशकश्च गणस्तन्मात्रपञ्चकश्चैव ॥ —सांख्यकारिका पुरुष + प्रकृति का संयोग—सृष्टि | महत्तत्त्व (बुद्धि) | सात्त्विक अहंकारः (११) तामस अहंकार (५) | | १ मन ५ ज्ञानेन्द्रियाँ ५ कर्मेन्द्रियाँ ५ तन्मात्रायें | | | | श्रोत्र त्वक् चक्षु जिह्वा घ्राण शब्द स्पर्श रूप रस गंध तन्मात्रा तन्मात्रा तन्मात्रा तन्मात्रा तन्मात्रा पाणि पाद पायु उपस्थ वाक् ↓ ↓ ↓ ↓ ↓ (गुदा) (लिंग आकाश वायु अग्नि जल पृथ्वी योनि) तत्त्व तत्त्व तत्त्व तत्त्व तत्त्व 'सात्विक एकादशक प्रवर्तते वैकृतादहंकारात् । भेतादेस्तन्मात्रः स तामसस्तैजसादुभयम् ॥ सांख्य का कार्यकारणवाद का सिद्धान्त—'सत्कार्यवाद' 'स्पन्द' एवं 'प्रत्य- भिज्ञा' का कारणकार्यवाद—इन दर्शनों में दो प्रकार का 'कार्यकारणवाद' है—१. 'कल्पित कार्यकारणवाद' २. पारमार्थिक कार्यकारणवाद । १. 'पारमार्थिक कार्यकारणवाद'—'कारण' = परसंवित् । कार्य = अनन्त विश्व वैचित्र्य भगवती चिति (पूर्णांहं विमर्शात्मक तत्त्व) जो कि अनन्तरूपात्मक जगत् के रूप में स्फुरित होती है पारमार्थिक कार्यकारणभाव है ।

परिचय एवं पृष्ठभूमि ५९ २. 'कल्पितकार्यकारणभाव'—'शुद्धाध्वा' (शिव । शक्ति । सदाशिव । ईश्वर । शुद्ध विद्या)—अशुद्धाध्वा' ।। महामाया—कला—पञ्चकंचुक ।—'मल' = आणव । मायीय कार्य मल । पशुपति पशु बन जाता है । आचार्य क्षेमराज कहते हैं— ‘चिदेव भगवती स्वच्छस्वतन्त्ररूपा तत्तदान्तजगदात्मना । स्फुरति इत्येतावतपरमार्थोऽयं कार्यकारणभावः ।। (प्र०हृदयम्) शब्द-सृष्टिवाद [ शक्ति (विमर्श) ] ——————————— [ शिव (प्रकाश) ] प्रकाशांश / विमर्शांश — [ अम्बिका / शान्ता ] — [ परावाक् ] प्रकाशांश / विमर्शांश — [ वामा / इच्छाशक्ति ] — [ पश्यन्ती वाक् ] प्रकाशांश / विमर्शांश — [ ज्येष्ठा / ज्ञानशक्ति ] — [ मध्यमा वाक् ] प्रकाशांश / विमर्शांश — [ रौद्री ] — [ वैखरी वाक् ] जगत् शब्द का विवर्त है—भर्तृहरि ॥ सारांश— (१) अम्बिका + शान्ता → परावाक् । (२) वामा + इच्छा का सामरस्य → पश्यन्ती वाक् । (३) ज्येष्ठा + ज्ञानशक्ति का सामरस्य → मध्यमा वाक् । (४) रौद्री + क्रियाशक्ति का सामरस्य → बैखरी वाक् ।

६० स्पन्दकारिका शिव ┌─────────────────┴─────────────────┐ प्रकाशांश (चिद्भाव) ────────────────── विमर्शांश (आनन्दभाव) │ सामरस्य → वाक चतुष्टय (१) अम्बिका + शान्ता → ‘परावाक्’ । (२) वामा + इच्छाशक्ति — पश्यन्तीवाक् । (३) ज्येष्ठा + ज्ञानशक्ति → मध्यमावाक् । (४) रौद्री + क्रियाशक्ति → बैखरी वाक् । सृष्टि सृष्टि ब्रह्म ┌────┴────┐ ┌────┴────┐ ┌────┴────┐ नाद सृष्टि बिन्दु सृष्टि शाब्दी सृष्टि आर्थी सृष्टि पर ब्रह्म शब्द ब्रह्म (‘शब्दब्रह्मणि निष्णातः परंब्रह्माधिगच्छति ॥’) ॥ ‘जगत’ = शब्द का विवर्त है— ‘विवर्ततेऽर्थभावेन जगतः प्रक्रिया यथा’ । (१) इच्छाशक्ति → का पश्यन्ती वाक् के रूप में रूपान्तरण । (२) ज्ञानशक्ति → का ज्येष्ठा वाक् के रूप में रूपान्तरण । (३) मध्यमावाक् → का ऋजु रेखा के रूप में रूपान्तरण । (४) क्रिया शक्ति → का रौद्री के रूप में रूपान्तरण । (५) बैखरीवाक् → का विश्वविग्रह (विश्ववपु के रूप में रूपान्तरण) (‘परमाकला’ द्वारा परमशिव की सिसृक्षात्मिका स्फुरणा-दिदृक्षा सम्बंधी औत्सुक्य → ‘अम्बिका’ का रूप धारण करना और उसी रूप में ‘परावाक्’ का अभिधान प्राप्त करना) । पशुपति की शक्तियाँ— ‘ज्ञान’ ‘क्रिया’ ‘माया’ स्वातंत्र्यात्मा चिति पशु की स्थिति में ↓ ↓ ↓ शक्ति का रूपान्तरण सत्वगुण रजोगुण तमोगुण ↓ गुणत्रयात्मक ‘चित्त’ ‘स्वातंत्र्यात्मा चितिशक्तिरेव ज्ञानक्रियामायाशक्तिरूपा पशुदशायां संकोचप्रकर्षात् सत्वरजस्तमःस्वभावचित्तात्मतया स्फुरति’ । ‘स्वांगरूपेषु भावेषु पत्युर्ज्ञानं क्रिया च या । माया तृतीये ते एव पशोः सत्वं रजस्तमः ॥ (प्रत्य० हृदयम्) ‘चित्त’ = भगवती । ‘न चित्तं नाम अन्यत्किंचित् अपितु सैव भगवती तत् । तथा हि सा स्वं स्वरूपं गोपयित्वा यदा संकोचं गृह्णाति तदा द्वयी गतिः, कदाचित् उल्लसित-

परिचय एवं पृष्ठभूमि ६१ मपि संकोचं गुणीकृत्य चित्प्राधान्येन स्फुरति कदाचित् संकोचप्रधानतया । चित्प्राधान्य- पक्षे सहजे प्रकाशमात्रप्रधानत्वे विज्ञानाफलता प्रकाशपरामर्शप्रधानत्वे तु विद्याप्रमातृता ।' भगवती चिति के दो रूप—(१) चित्प्राधान्य, (२) संकोचप्राधान्य । भगवती चिति $\rightarrow$ चित्प्राधान्य $\rightarrow$ विज्ञानाकल (प्रकाशप्रधान) । $\quad\quad\quad\quad\quad\downarrow$ प्रकाश-विमर्श $\rightarrow$ दोनों का प्राधान्य $\rightarrow$ विद्या तत्त्वाश्रित प्रमातृता । —प्रत्यभिज्ञाहृदयम् । (१) 'पदार्थदर्श' (आगमानुष्ठान) के अनुसार—मूलवाक् चितिशक्ति है— 'चिच्छक्तिरेव पराख्या चैतन्याभासविशिष्टतया प्रकाशिकामाया निष्पन्दा परावागि- त्यर्थः ॥' (२) लक्ष्मीधरी टीका (सौ०ल०) के अनुसार—गुणत्रय की साम्यावस्था 'परा' है और उसकी वैषम्यावस्था 'पश्यन्ती' है—'एकापरेति सत्वरजस्तमोगुणसाम्यरूपो तदन्या पश्यन्ती अन्यतरगुणवैषम्यरूपो' । विश्लेषण—सांख्य की स्थूल प्रकृति को जो कि जड़ है उसे चैतन्यघन एवं शिव की चिदानन्दस्वरूपा 'परावाक्' कहना समीचीन नहीं है । इच्छा, ज्ञान, क्रिया आदि पारमात्मिक शक्तियाँ संकुचित होकर सतोगुण, रजोगुण एवं तमोगुण बन जाती हैं— 'स्वाङ्गरूपेषु भावेषु पत्युर्ज्ञानं क्रिया च या । मायातीये ते एव पशोः सत्वं रजस्तमः ॥ ('ईश्वरप्रत्यभिज्ञा') । सांख्य की प्रकृति अशुद्ध है । शुद्ध प्रकृति में इच्छादिक शक्तियाँ स्थित रहती हैं किन्तु सांख्य की प्रकृति में नहीं । योगसूत्र के व्यासभाष्य में तो कहा गया है कि गुणों का परमरूप कभी दृष्टिगत नहीं होता । दृष्टिगत रूप माया की भाँति तुच्छ होता है— 'गुणानां परमं रूपं न दृष्टिपथमृच्छति । यतु दृष्टिपथं प्राप्तं तन्मायेव सुतुच्छकम् ॥' मूल महाप्रकृति 'परावाक्' के निकट अवश्य है । परमेश्वर की सृजन-प्रक्रिया में अन्यनिरपेक्षता ही 'प्रतिभा' एवं 'परावाक्' है— यही 'प्रतिभा देवी' है । यही चित्स्वरूपा, स्वरसोदिता 'परावाक्' है । शब्द की चरमावस्था ही 'परावाक्' है । 'मध्यमा' $\rightarrow$ ┌ स्थूल मध्यमा │ 'तन्त्रालोक' (३ आ०) ॥ │ सूक्ष्म मध्यमा │ 'पश्यन्ती' $\rightarrow$ ┌ स्थूल प० └ पर मध्यमा │ (इच्छा शक्ति का रूप │ सूक्ष्म प० └ = पश्यन्ती) └ पर प० व्याकरणागम—वाणी के मात्र ३ रूप हैं— (१) अनादिनिधन शब्दब्रह्म 'पश्यन्ती'—सोमानन्दपाद में 'शब्दपरब्रह्माद्वयवाद' का खण्डन करके 'ईश्वराद्वयवाद' का मण्डन किया है ।

६२ स्पन्दकारिका पश्यन्ती → ┌ पश्यन्ती, परावाक् (अभिनवगुप्त) │ महापश्यन्ती ┌────────┴────────┐ └ परम महापश्यन्ती प्रकाशांश = अम्बिका विमर्शांश = शान्ता (सदाशिवेश्वर दशा) └────────┬────────┘ परावाक् ‘मूलाधारात् प्रथममुदितो यश्च भावः पराख्यः ॥’ (प्र०सा०तन्त्र) विमर्शात्मा स्वातन्त्र्यरूप प्रतिभा (परावाक्) ही परमशिव की शक्ति है जिसके कारण शिव ‘शक्तिमान्’ कहलाते हैं । ┌ शब्द ब्रह्म — अपर प्रणव ॥ ┌ शब्दमयी ब्रह्म → ┼ अर्थ ब्रह्म — पर प्रणव ॥ सृष्टि → ┼ अर्थमयी └ पर ब्रह्म └ चक्रमयी निश्चल (निस्पन्द) परावाक् रूप प्रणवात्मक कुण्डलिनी शक्ति ही ‘प्रकृति’ है । भास्करराय—(१) शब्दब्रह्मरूप बीज की उच्छूनावस्था = ‘परावाक्’ (२) स्फुटितावस्था = ‘पश्यन्तीवाक्’ (३) मुकुलित, अव्यक्त किन्तु दलद्वयावस्था = ‘मध्यमावाक्’ (४) सम्यक् विकसितावस्था = ‘बैखरीवाक्’—(‘सौभाग्य भास्कर’) ‘कुण्डलिनी’ वाक्रूपा है । कुण्डलिनी— ┌ मूलाधार में ‘अग्निकुण्डलिनी’ । │ हृदय में ‘सूर्य कुण्डलिनी’ । │ भ्रूमध्य में ‘सोमकुण्डलिनी’ । └ मूलाधार-अधोगत वाग्भावाकार त्रिकोण में—‘समष्टि कुण्डलिनी’ । सर्वशिवत्ववाद का प्रतिपादन—आचार्य सोमानन्द पाद कहते हैं— ‘सर्वशिवत्वमिदानीं स्वरूपेणोपपादयितुमाह—‘अथेदानीं प्रवक्तव्यं यथा सर्व शिवात्मकम् ।’ (‘शिवदृष्टि’) ॥ [७] साधनान्तर्गत आत्मचैतन्य की विविध अवस्थायें एवं मोक्ष के उपाय—(तन्त्रालोकः आ०५)

'शांभवो पाय' या 'अनुपाय' का स्तर(शांभव)(शाक्त)(आणव)
'शांभवो पाय' या 'अनुपाय' का स्तरअभेद की चिन्मयदशा में प्रथम, सर्वोत्कृष्ट एवं उत्मोत्तम दशा—‘स्वात्मसाक्षात्कार’ (परप्रमाता): ‘शांभवोपाय’ (योगी का प्रवेश = ‘भैरव महाभाव’ में) सर्वात्म्य-ऐश्वर्य ब्रह्मद्रव का उद्रेक = पूर्ण तत्त्वामृत का निष्यंद ॥भेदाभेदमयीदशा (इसमें इन्द्रियार्थसन्निकर्ष से ज्ञत्व एवं कर्तृत्व की संकुचित अनुभूति होती है) ‘बुद्धिप्रमाता’ = स्वान्तःकरण की वृत्तियों के संचार से बुद्धि प्रमाता विवश हो जाता है । ‘शाक्तोपाय’ ।भेदावस्था (देह प्रमाता की अनुभूति) सुख,दुःख, इष्ट अनिष्ट आदि का संचार होता रहता है । (आणवोपाय) ‘मोक्ष’ = ‘मोक्षो हि नाम नैवान्यः स्वरूपप्रथनं हि सः ॥’ —तन्त्रा०

परिचय एवं पृष्ठभूमि ६३ 'भेदावस्था' की दो दशायें हैं अन्यथा इसे साधना नहीं बंधन की अवस्था कहना अधिक उपपन्न होता ॥ स्वात्मास्था में विश्रान्त योगी की जो भेदावस्था होती है वह उसमें (भेदावस्था में) अभेदभावना का लाभ प्राप्त करता है और भेदमयता की स्थिति में भी योगी अभेद रूपात्मक स्थिति से विभूषित रहते हैं— 'बहिस्तत्तद्व्यवहारपरत्वेऽपि स्वात्ममात्रविश्रान्त्या परं चमत्कारातिशयमनुभवन्ति' १ 'भेदमयत्वेऽपि अभेदरूपतयावस्थान- मिति' । २ भेदमयत्वेऽपि अभेदरूपत्वमिति । ३ — आत्मनः स्वरूप प्रथनमेव मोक्षः (विवेक) । 'बाह्यस्पर्शेष्वसक्तात्मा विन्दत्यात्मनि यत्सुखम् । स ब्रह्मयोगयुक्तात्मा सुखमव्ययमश्नुते ॥ (गी०५।२१)४ मुक्ति के उपाय— 'तन्त्रालोक' में मुक्ति के निम्न उपाय बताए गये हैं— (१) अनुपाय, (२) शांभावोपाय, (३) शाक्तोपाय, (४) आणवोपाय । शिवसूत्रों के तीन अध्यायों का नाम भी यही है— 'शांभवोपाय', 'शाक्तोपाय' एवं 'आणवोपाय' ॥ उपाय ┌─────────────┬─────────────┬─────────────┐ अनुपाय शांभावोपाय शाक्तोपाय आणवोपाय (१) 'अनुपाय'— यह मात्र गुरु या भगवान् के अनुग्रह पर ही आश्रित है । इसमें सकृत उपदेश के द्वारा अपनी आत्मा प्रकाशित हो उठती है । इसमें भावनाओं की पुनरावृत्तियाँ आवश्यक नहीं होतीं । सकृद्देशना ही इसका साधना-संसार है क्योंकि एक बार का उपदेश ही साधक को आत्मपरामर्शात्मक स्वरूपोपलब्धि का पर्याय बन जाता है । एक दीपक से दूसरे दीपक का जल उठना ही 'अनुपाय' है । इसे 'आनन्दोपाय' भी कहते हैं । किसी सिद्ध या योगिनी के संदर्शन मात्र से ही संवित्-संक्रमण की घटनायें भी दिखाई पड़ती हैं । ये 'अनुपाय' के उदाहरण हैं । शांभव मार्ग = 'इच्छोपाय', शाक्त समावेश = 'ज्ञानोपाय' एवं 'आणवोपाय' = क्रियोपाय कहलाते हैं— विभुशक्त्यणुसंबंधात् समावेशस्त्रिधा मतः । इच्छा-ज्ञान-क्रिया योगादुत्तरोत्तरसंभृतः ॥ (जयरथ) उत्कृष्टतम, अनुत्तर एवं तीनों उपायों से श्रेष्ठतर ज्ञान आनन्दशक्ति में विश्रान्त हैं— 'ततोऽपि परमं ज्ञानमुपायादिविवर्णितम् । आनन्दशक्तिविश्रान्तमनुत्तरमिहोच्यते' ॥ २४२ ॥ 'अनुपाय'— 'शांभवोपाय' दोनों अभेद के स्तर की साधनायें हैं । बिन्दु— अर्द्ध- चन्द्र-निरोधिनी-नाद-नादान्त-शक्ति-व्यापिनी-समना को अतिक्रान्त करना $\rightarrow$ ऊर्ध्वकुण्ड- लिनी पद की प्राप्ति—(जयरथ—'विवेक' आ०५। श्लोक ५६) । १. जयरथ—विवेक (पृ० ३०६, आ० ५) । २-४. जयरथ—'विवेक' ।

६४ स्पन्दकारिका अनुपाय—समावेश विश्रान्त योगी को यह प्रतीत होने लगता है कि यह निखिल समुल्लसित भावमण्डल पूर्णतः संवित्तिरूपी भैरवीभाव के प्रकाश में समाहित हो रहा है।१ 'शांभवोपाय' का चरम रूप ही 'अनुपाय' है— 'साक्षादुपायेन इति शांभवेन । तदेव हि अव्यवहितं परज्ञानावाप्तौ निमित्तं स एव परांकाष्ठां प्राप्तश्चानुपाय इत्युच्यते'' ।। (तन्त्रा० आ० १।१८२) (२) शांभवोपाय— हठपाक क्रम या शांभवोपाय—स्वात्मपरामर्श एवं स्वरूपोपलब्धि के लिए सर्वोत्कृष्ट उपाय शांभवोपाय है जो अभेदात्मक स्तर पर स्थित है। इसमें अभेदभावना का परामर्श आवश्यक है। 'संपूर्ण (प्रमाता-प्रमाण-प्रमेय रूप) जगत् मुझ परबोध शिव से ही उत्पन्न हुआ है। वह अनतिरिक्त होने पर भी अतिरिक्तवत् मुझ में अवस्थित् एवं मुझसे सर्वथा अभिन्न है।'—यही परामर्श 'शांभवोपाय' है— 'मत्त एवोदितमिदं मय्येव प्रतिबिम्बितम् । मदभिन्नमिदं चेति त्रिधोपायः स शांभवः' ।। (तन्त्रालोक आ० ३) अभिनवगुप्त इस शांभव परामर्श को और सुस्पष्ट करते हुए उसका परामर्श इस प्रकार निरूपित करते हैं— मैं अपने आत्मारूपी चिदाकाश में विश्वावभासन कर रहा हूँ अतएव मैं ही विश्व- स्रष्टा हूँ। संपूर्ण 'षडध्व' (वर्ण, पद, मन्त्र, कला तत्त्व, भुवन) मुझमें ही प्रतिबिम्बित है अतः मैं ही स्थिति का सूत्रधार हूँ। यह संसार मुझ महाज्ञानमय अग्नि में लीन होता जा रहा है। ऐसा सततानुसंधान करने से योगी शान्ति प्राप्त कर लेता है। अनन्त वैचित्र्या- त्मक संसार के स्वप्न-गृह को दग्ध करने वाला मैं हुताशन हूँ। यही तुरीय पद एवं शिवत्व प्रदान करता है।२ इसे 'शांभव समावेश' भी कहते हैं। शांभव समावेश में अनन्तः चिन्तन का भी त्याग कर दिया जाता है। यहाँ किसी विकल्प की उपयोगिता नहीं रह जाती। १. तन्त्रालोक (२ अ० ३५) । २. षडध्व जातं निखिलं मय्येव प्रतिबिम्बितम् । स्थितिकर्ताहमस्मीति स्फुटेयं विश्वरूपता ।। सदोदितमहाबोधज्वालाजटिलतात्मनि । विश्वं द्रवति मय्येवदिति पश्यन् प्रशाम्यति ।। अनन्तचित्रसद्दर्भसंसारस्वानसद्मनः ।। पोषकः शिव एवाहमित्युल्लासी हुताशनः । जगतः सर्वमत्त प्रभवति विभेदेन बहुधा ।। तथाप्येतद्रूढं मयि विगलितेत्वत्र न परः । तदित्यं यः सृष्टि-स्थिति-विलयमेकीकृतवशा- दनंशं पश्येत्स स्फुरति हि तुरीयं पदमिति ।।—तन्त्रालोक (आ० ३, २८३-२८७)

परिचय एवं पृष्ठभूमि ६५ गुरुप्रदत्त ज्ञान द्वारा विकल्प विगलित हो जाते हैं। इस अनुत्पन्नावस्था में भावना आदि की अपेक्षा न रखने वाली अविकल्परूपा संवित् शिव के साथ तादात्म्य स्थापित करने वाली अवस्था का उदय होता है। इसका साधन ही है— 'शांभवोपाय'। १. अकिंचिच्चिन्तकस्यैव गुरुणा प्रतिबोधतः । उत्पद्यते य आवेशः शांभवोऽसावुदीरितः ॥ (तन्त्रा० आ० १ । १६८) २. अकिञ्चिन्तकस्येति विकल्पानुपयोगिता । तथा च झटिति ज्ञेयसमापत्तिर्निरूप्यते ॥ (१७१) ३. तेनाविकल्पा संवित्तिर्भावनाद्यनपेक्षिणी । शिवतादात्म्यमापन्ना समावेशोऽत्र शांभवः ॥ (१७८)¹ समावेशों की संख्या ┌────────────────────────┴────────────────────────┐ ३ (शांभव । शाक्त । आणव) ५० भेद—'श्रीपूर्वशास्त्र' ┌──────┬──────┬──────┬──────┬──────┴──────┐ भूत तत्त्व आत्मा मन्त्र शक्ति (५ रुद्रशक्ति ५ ३० ३ १० २ समावेश) भेद भेद भेद भेद भेद = ५० भेद । (३) शाक्तोपाय— 'तन्त्रालोक' (आ० १ । २२०) 'भेदाभेदौ हि शक्तिता': 'शाक्तो- पाय, भेदाभेदात्मक है। इसे ही 'ज्ञानोपाय' भी कहा गया है। 'आत्मैवेदं सर्वं' का चिन्तन करने पर आत्मा और अनात्मा (आत्मा+इदम्) दो विकल्पांशों की विद्यमानता रहती है-'आत्मा ही अनात्मा के रूप से प्रकाशित हो रहा है।'-इस प्रकार पौनःपुन्येन अभ्यास करने पर अभेदपरामर्श प्राप्त होता है। विकल्प निर्विकल्पता में रूपान्तरित हो जाते हैं—यही ज्ञान है। इसीलिए इसे 'ज्ञानोपाय' भी कहते हैं। भूयो भूयो विकल्पांशान्निश्चयक्रमचर्चनात् । यत्परामर्शमभ्येति ज्ञानोपायं तु तद्विदुः ॥ उपायत्रय ┌──────────────────────┬──────────────────────┬──────────────────────┐ 'अभेदोपाय' │ 'भेदाभेदोपाय' │ 'भेदोपाय' │ ── अभेदोपायमन्त्रोक्तं शांभवं शाक्तमुच्यते । (शांभव उपाय) │ (शाक्त उपाय) │ (आणव उपाय) │ ├──────────────────────┼──────────────────────┼──────────────────────┤ 'इच्छोपाय' │ 'ज्ञानोपाय' │ 'क्रियोपाय' │ ── भेदाभेदात्मकोपायं भेदोपायं तदाणवम् ॥ └──────────────────────┴──────────────────────┴──────────────────────┘ —(तन्त्रालोक आ० १) ─────────────────────────────────────────────────────────── १. ज्ञान ┌──────────┼──────────┐ आणव शाक्त शाम्भव स्पं. भू. ४

६६ स्पन्दकारिका 'शाक्तोपाय' क्या है? उच्चाररहितं वस्तु चेतसैव विचिन्तयत् । यः समावेशमाप्नोति शाक्तः सोत्राभिधीयते ॥ 'इच्छोपाय' क्या है? तत्राद्ये स्वपरामर्शैर्निर्विकल्पैकधामनि । यत्स्फुरेत् प्रकटं साक्षात् तदिच्छाख्यं प्रकीर्तितम् ॥ १४६ ॥ 'शांभवोपाय' क्या है? एवं परेच्छाशक्त्यंशसदुपायमिमं विदुः । शांभावाख्यं समावेशं सुमत्यन्ते निवासिनः ॥ २१३ ॥ 'शाक्तोपाय' में बाह्योच्चार, करण, ध्यान, वर्ण एवं स्थान की कल्पना करके इनकी साधना नहीं की जाती । अतः यहाँ अभेदावस्था ही होने से शाक्तोपाय भेदाभेदमय है—(तन्त्रालोक)— 'उच्चाररहितं वस्तु चेतसैव विचिन्तयत् । यः समावेशमाप्नोति शाक्तः सोत्राभिधीयते ॥ (अ०१।१६९) (४) आणवोपाय—'आणवोपाय' यह भेदप्रधान है । 'अणुषु भेदिषूपायेषु भवः आणवः ॥' इसके अनेक साधन हैं— उच्चार ध्यान वर्ण करण स्थान (प्राणायाम एवं मन्त्र जप) इन पाँचों अंगों से समन्वित समावेश का उपाय 'आणवोपाय' कहा जाता है । यही 'क्रियोपाय' भी कहा जाता है । आणवोपाय के साधन एवं उनके उपसाधन१ उच्चार करण ध्यान वर्ण स्थान पञ्चप्राणात्मक चिदात्मक (प्राणात्मक उच्चारण में स्वस्फुरित अनाहत नाद । नाद -> वर्ण) (सृष्टि-संहार बीजात्मक वर्ण) प्राण ५ भेद देह २ भेद बाह्य ११ भेद चित्प्राधान्य विमर्शप्राधान्य ग्राह्य ग्राहक संवित्ति संनिवेश व्याप्ति आक्षेप त्याग १. उच्चारकरणं ध्यानं वर्णस्थानप्रकल्पनैः । यो भवेत् स समावेशः सम्यगाणव उच्यते ॥ —तंत्रालोक आ० १/१७०

परिचय एवं पृष्ठभूमि ६७ ग्राह्य ग्राहक चिद्व्याप्तित्यागाक्षेपवेशनैः । करणं सप्तधा प्राहुरभ्यासं बोधपूर्वकम् ॥ (तन्त्र० आ०५) शाक्तोपाय = ज्ञान-प्राधान्य ॥ आणवोपाय = क्रिया-प्रधान 'ज्ञान' → १. परज्ञान (सूक्ष्म) : (इच्छा शक्तिप्रधान) 'शांभव ज्ञान'—वैकल्पिक स्थूल, 'शाक्त' एवं 'आणव ज्ञान' । मलों की क्षीणता के तारतम्यानुसार ही आत्माओं की भगवद्रूपता होती है । शक्तिपात—१. तीव्र-तीव्र २. तीव्र-मध्य ३. तीव्र-मन्द ४. मध्यतीव्र ५. मध्य- मध्य ६. मध्य-मन्द ७. मन्द-तीव्र ८. मन्द-मध्य ९. मन्द-मन्द ॥ वर्ण— 'उक्तो य एष उच्चारस्तत्र योऽसौ स्फुरन् स्थितः । अव्यक्तानुकृतिप्रायो ध्वनिर्वर्णः स कथ्यते' ॥ (तन्त्रा०आ०५।१३१-१३२) क्रियोपाय → ज्ञानोपाय → इच्छोपाय → अनुपाय' ॥ —उपायत्रय 'तन्त्रालोक' में कहा गया है कि 'अज्ञान' संसृति का कारण एवं 'ज्ञान' मोक्ष का कारण हैं— 'इह तावत्समस्तेषु शास्त्रेषु परिमीयते । अज्ञानं संसृते हेतुर्ज्ञानं मोक्षैककारणम् ॥ (तन्त्रा०१।२२) मलमज्ञानमिच्छन्ति संसारांकुरकारणम् । १ इति प्रोक्तं तथा च श्रीमालिनीविजयोत्तरे ॥ (तन्त्रा०१।२३) आणवमल (अज्ञान) के दो रूप हैं । इसके द्वारा स्वरूप का बोध क्षीण हो जाता है । आणवमल के भेद । २ ┌─────────────────┬─────────────────┐ स्वात्मस्वातंत्र्य का बोध के स्वातंत्र्य की हानि होती है बोध नहीं होता क्योंकि संकोच-प्राधान्य रहता है । 'अज्ञान' का स्वरूप क्या है ? संसारांकुर कारण 'मायीय मल' = जिसमें वेद्य की भिन्नता की प्रतीति प्रमुख होता है । 'कार्ममल' = जिसके द्वारा संसार अंकुरित होता है—ये दोनों संसारांकुर के कारण हैं । कर्म का निमित्त भी 'मल' ही होता है— 'मलं कर्मनिमित्तं तु नैमित्तिकमतः परम्' ॥ अज्ञान के दो रूप हैं—१. पौरुष अज्ञान, २. बौद्ध अज्ञान । ३ यहाँ पौरुष अज्ञान ही विवक्षित है । पौरुष ज्ञान—मोक्ष ॥ बौद्ध अज्ञान = दुष्टाध्यवसायरूप ॥ यह कर्म का कारण नहीं है । यह कर्म ही १. उच्चारणे च प्राणाद्या व्यानान्ताः पंचवृत्तयः । आद्या तु प्राणनाभिख्या परोच्चारात्मिका भवेत् ॥ —तंत्रालोक आ० ४ २-३. तन्त्रालोक ।