स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा
६८ स्पन्दकारिका अज्ञान का कारण है। बौद्ध अज्ञान = कर्मोत्पन्न शरीर में होता है शरीर ही संसार है और मायीय हैं शरीरभुवनाकारो मायीयः परिकीर्तित ।। 'सर्वो विकल्पों संसार:' ॥ = 'विकल्प' = संसार है । बौद्ध ज्ञान भी संसार का ही आविर्भावक है । दीक्षा—पौरुष अज्ञान निवृत्त । पौरुष ज्ञान का अधिक महत्त्व है (बौद्ध ज्ञान की अपेक्षा) । दीक्षा में पौरुष पाशों (मलों) का शोधन आवश्यक है । बौद्ध पाशों (मलों) का निराकरण विवेक से होता है ।१ मोक्ष का तो स्वभाव ही ज्ञान है । अख्याति के अभाव को ही पूर्ण ख्याति कहते हैं । प्रकाशानन्दघन आत्मा का तात्विक रूप पूर्ण ख्याति ही है । इसका प्रथन (संस्कार दृढ़ता) ही 'मोक्ष' है । इस अज्ञान के अभाव में ही मोक्ष संभव है । 'तच्च ज्ञान मात्रस्वभावम्' अख्यात्यभाव एव हि पूर्णाख्यातिः, सैव च प्रकाशानन्द घनस्यात्मन- स्तात्विक स्वरूपं तत्प्रथनमेव मोक्ष इति ॥२ १. अज्ञान का अर्थ ज्ञान का अभाव नहीं है । अज्ञान का अर्थ है—अपूर्ण ज्ञान ज्ञानाभाव नहीं— 'अतो ज्ञेयस्य तन्त्रस्य सामस्त्येनाप्रथात्मकम् । ज्ञानमेवं तदज्ञानं शिव-सूत्रेषु भाषितम् (तं०१।२६) । ज्ञेयस्य च परं तत्त्वं यः प्रकाशात्मक शिवः । शिवसूत्र का द्वितीय सूत्र है—'ज्ञानं बंध:' ज्ञाता, ज्ञान एवं ज्ञेय की त्रिपुटी में ही समस्त दर्शनविज्ञान स्थित है ।३ ज्ञेय का परमतत्त्व प्रकाशात्मक शिव ही है । यह द्विविध है— (क) वस्तु, स्थान, नाम आदि द्वैत की प्रथा पर आधृत । (ख) परतत्त्व, चिदानन्दघन परमशिव सर्वत्र समस्तता एवं समरसता से परिपूर्ण परमतत्त्व ।४ द्वितीय तत्त्व की एकान्त सत्ता के विपरीत जब नीले, पीले, सुखदुःख आदि द्वैत प्रथात्मक ज्ञान होते हैं तो ये ज्ञान ही अज्ञान बन जाते हैं, यही अपूर्णज्ञान है, ज्ञान का अभाव नहीं । यही अपूर्ण ज्ञान बंध बन जाता है । यही संसार के अंकुर का कारण है । यही संसृति का हेतु है । यही है शिवसूत्र का कथ्य ।५ 'चैतन्यमात्मा' + 'ज्ञानं बंधः' इसे दो प्रकार से लिखा जा सकता है— १. चैतन्यमात्माज्ञानं बंधः, २. चैतन्यमात्मा । ज्ञानं बंधः ॥ 'त्मा' + 'ज्ञा' के मध्य 'अ' का प्रश्लेष करने पर 'ज्ञानम्' ही 'अज्ञानम्' बन जाता है । अज्ञान का अर्थ है—अपूर्ण ज्ञान + ज्ञान का अर्थ है—द्वैत प्रथात्मक ज्ञान । १-३. विवेक । ४. तन्त्रालोक । ५. विवेक ।
परिचय एवं पृष्ठभूमि ६९ (तन्त्रालोक १।२६-२७) 'ज्ञानमेव तदज्ञानं शिवसूत्रेषु भाषितम् ॥' 'ज्ञानं बंधः अज्ञानं बंधः ।' 'अज्ञानशब्दस्य अपूर्णज्ञानाभिधानलक्षणः' 'द्वैतप्रथा तदज्ञानं तुच्छत्वात् बंध उच्यते' (तन्त्रालोक) ।¹ १. संविद्द्वैतात्मनः पूर्णस्य रूपस्य अख्यानात् 'द्वैतप्रथा' एवं 'अज्ञानम्' ।² २. अपूर्ण ज्ञानमपूर्णत्वाच्च तदेव अपूर्णमन्यता शुभाशुभ वासना शरीर-भुवनाकार स्वभावविविध संकुचितज्ञानरूपतया मलत्रयात्मा 'बंध' इति उच्यते ।³ ३. 'मलं कर्म च मायीय आणवमखिलं च यत् ।'⁴ ४. नन्वत्र द्वैतप्रथात्मकत्वादपूर्ण ज्ञानमेव 'अज्ञानम्' । ५. स्वातंत्र्य के अतिरिक्त तुच्छ एवं अतुच्छ रूप कोई अन्य मोक्ष नहीं है । (क) यदि तुच्छ मोक्ष है तो बंध है ।⁵ (ख) यदि अतुच्छ है तो पारमार्थिक होने के कारण स्वतन्त्रात्मा मोक्ष ही है ।⁶ क) स्वतन्त्रात्मातिरिक्तस्तु तुच्छोऽतुच्छोऽपि कश्चन । न मोक्षो नाम तन्नास्य पृथङ्नामापि गृह्यते ॥ (१।३१) ख) मोक्षो हि नाम नैवान्यः स्वरूप प्रथनं हि सः ।⁷ स्वरूपं चात्मनः संवित् ॥ ग) यत्तु ज्ञेयसतत्त्वस्य पूर्णपूर्णप्रथात्मकम् । यदुत्तरोत्तरं ज्ञानं तत्तत्संसारशान्तिदम् ॥ (१।३२) मोक्ष = स्वरूप प्रथन ॥ आत्मा = संविद्रूप ॥⁸ आत्मा एवं मोक्ष दोनों के एक लक्षण हैं— 'इह तावदात्मज्ञानं मोक्ष' 'यदेवात्मनोलक्षणस्तदेव मोक्षस्य ।' योगाचार— रागादिकलुशं चित्तं संसारस्तद्विमुक्तता । संक्षेपात्कथितो मोक्षः प्रहीनावरणैर्जिनैः ॥⁹ रागादि—कलुषित चित्त = 'संसार' है और उनसे विमुक्ति ही मोक्ष है । चित्त मल का आश्रय है । मल आगन्तुक है । मलों का क्षय—स्वतः प्रभास्वरता ॥ शैव इस मत को नहीं मानते ॥ सांख्य—सुखदुःखों आदि द्वन्द्वों से शून्य पौरुष ज्ञान ही मोक्ष है । अध्वा—बंधन ॥ पूर्णज्ञान—मुक्ति ॥१० 'ज्ञान'—अज्ञान अवच्छेदात्मक है । संकोच प्रवर्धक है । इदन्ता का परामर्श देता है । ज्ञान-अज्ञान के भेद—१. पौरुष ज्ञान, २. बौद्ध ज्ञान, १. पौरुष अज्ञान, २. बौद्ध अज्ञान । पुरुष का अज्ञान = 'मल' । शिव—मल ।¹¹ १-११. तन्त्रालोक—विवेक ।
७० स्पन्दकारिका ‘मल’ = शिवता का आवरक, स्व का चिदात्मक उल्लास का आवरक, शिव के दृक् (ज्ञान) क्रिया शक्तियों को संकुचित करने वाला ।। पशुपति → पशु । शिव के ६ रूप—१. भुवन, २. विग्रह, ३. ज्योति, ४. आकाश, ५. शब्द, ६. मन्त्र । भुवनं विग्रहो ज्योतिः खं शब्दो मन्त्र एव च । बिन्दुनादादिसंभिन्नः षड्विधः शिव उच्यते ॥ (१।६३)१ बिन्दुनादस्तथा व्योम मन्त्रो भुवनविग्रहो । षडवस्वात्मा शिवो ध्येयः फलभेदेन साधकैः ॥ इस शिव का एक ही स्वभावभूत धर्म है—‘अहंप्रत्यवमर्श’ ‘अहंप्रत्यवमर्शाख्यो हि स्वभावभूतो धर्मोऽस्ति ॥’२ ‘स्वातंत्र्यमेतन्मुख्यं तदैश्वर्यं परमात्मनः (प्र०१। अ०५। आ०१३) परमात्मा का स्वातंत्र्य ही उसका मुख्य ऐश्वर्य है । यही उसकी शक्तिमत्ता का द्योतक है । उसकी शक्ति इच्छा है— या सा शक्तिर्जगद्धातुः कथिता समवायिनी । इच्छात्वं तस्य सा देवि सिसृक्षोः प्रतिपद्यते ॥३ परमात्मा की यह शक्ति केवल एक है फिर भी नानारूपावभासित है । पुरुष का अज्ञान = ‘मल’ है । ‘मल’ = शिव से उद्भूत है । यह मल स्व के चिदात्मक उल्लास का अवच्छेदक या आवरक है । आत्मा मलिन कैसे होती है ? (नेत्रतन्त्र)— तत्संबंधात्समलिनो ह्रस्वतन्त्रोऽप्यशक्तिमान् । अविशुद्धो ह्यसौ तस्मान्मलत्रय निरोधतः ॥ १४६ ॥ (नेत्रतन्त्र)४ ‘आणव मल’—चिन्मय के साथ मल योग कैसे ? निर्मलो वा कथं सक्तो भोगेषु एतद्विरुध्यते । शुद्धो भोगी न सिद्धयेत्तु विकल्पो भोग उच्यते ॥ (१४७ नेत्रतन्त्र)५ विकल्पमात्र संसारः पशोः संसरणं सदा । संसार्यस्य च बद्धस्य निर्मलत्वं न युज्यते ॥ (१४८) (ने०तं०) १. पूर्णचिदानन्दघनस्य विशुद्धस्य कथमशुद्धभोगाकांक्षा स्यात् ? २. माया शक्त्या उल्लासित अपूर्णामन्यतात्मकं आणवमलभाज एव ‘किचिन्मे- स्यात्’ इति रागत्वात्मा अभिलाषो घटते । (ने०तं०) ३. शुद्धस्य चिदानन्दघनस्य न सुखदुःखप्रतिपत्यात्मा विकल्प परमार्थो भोगः संस- रणसतत्व उपपद्यते ।
१-३. तन्त्रालोक—विवेक । ४-५. नेत्रतन्त्र ।
परिचय एवं पृष्ठभूमि ७१ 'पशु' कौन है ? यही मलयोग संपृक्त चेतन । 'आणवमल' क्या है? आणवोऽयं मलः सूक्ष्मः कार्यतो ह्युपपद्यते । अभिलाषस्ततः कार्यों भोगादौ स प्रवर्तकः ? (नेत्रतन्त्र १९।१४९)१ 'स्वच्छन्दतन्त्र' में कहा गया है—विशेष-सामान्य विषयालम्बनाभिलाषात्मा, वैराग्यराग तत्त्वलक्षणोऽपूर्णमन्यतात्मा, निष्कर्माभिलाष आणवोमलोऽभिप्रेतः ।। 'कार्म मल' एवं 'मायीय मल'—१. भोगः सुखादिसंवित् कार्यं यस्य तत् कार्मं मलम्, तद्देशकाल शरीरेभ्यः प्राच्येभ्यो हेतुभ्यो भवति । २. कलादिक्षित्यन्तं तु त्रिंशत्तत्वात्म माया कार्यं मायाख्यं मलम्—'उद्योत' ।२ मलावृत होता कौन है? व्यापकःपुरुषः सूक्ष्मो निर्गुणो निष्क्रियोऽचलः । किन्त्वाणवावस्था कार्मो मायीयस्त्रिविधो मलः ।। (नेत्रतन्त्र १।१४७) कार्म यद्योग कार्यं तु देशकालशरीरतः । कलादि यत्पृथिव्यन्तं मायाकार्यं विदुर्बुधाः ।। (ने०तन्त्र १।१५०) एवं मलत्रयोपेतः संसारे संसरेदणुः । कोशकारः कृमिर्यद्वदात्मानं वेष्टयेद्द्दढम् ।। (ने०तं० १।१२१)३ 'कोशकार' क्यों कहा गया ? कोशकारदृष्टान्तेन स्वशक्त्यैव अस्य अणु- भूमिका ग्रहणं न तु व्यतिरिक्तद्रव्यरूपानादिमलशक्तिनिरुद्धत्वम् ।। (उद्योत) ।। पशुत्व रूप बंधन कब तक रहता है ?—अनुग्रह प्राप्ति के पूर्व तक स्वशक्तिगूह-नावभासिताणुभूमिकः परमेश्वरो यावत् न निज शक्ति विकासेन अनुगृह्णाति अणुभूमिं तावत् स्वमायाशक्त्यावगूहनेन गूहतिः पशुस्तिष्ठति ।।४ सारांश—(मालिनीविजयोत्तर तन्त्र के शब्दों में)— १. 'आणव समावेश'— उच्चारकरणध्यानवर्णस्थानप्रकल्पनैः । यो भवेत्स समावेशः सम्यगाणव उच्यते ।। (२ अधि०।२१) २. 'शाक्तसमावेश'— उच्चाररहितं वस्तु चेतसैव विचिन्तयन् । यं समावेशमाप्नोति शाक्तः सोऽत्राभिधीयते ।। (अधि०२।२२) ३. 'शांभव समावेश'— अकिंचिच्चिन्तकस्यैव गुरुणा प्रतिबोधतः । जायते यः समावेशः शांभवोऽसावुदाहृतः ।। (अधि०२।२३)
१. उद्योत । २. नेत्रतन्त्र । ३. नेत्रोद्योत । ४. मालिनीविजयविजयोत्तरतन्त्र ।
७२ स्पन्दकारिका उपायों एवं समावेशों का 'तन्त्रालोक' (३ से १२ आ०) 'तन्त्रसार' (पृ० १०- ११४) 'महार्थमंजरी' (५६-५९) 'परिमल' (पृ० १३८-१५३) 'मालिनीविजयोत्तर तन्त्र' (द्वि० आ० १३-४४) में विवेचन किया गया है । सारांश—'आणव उपाय' : उच्चार, करण, ध्यान, वर्ण, स्थान-कल्पना का अभ्यास । 'आणव समावेश'—किसी एक अभ्यास से प्राप्त होने वाली एकाग्रता ॥ 'अणु' = मितप्रमाता, जीव, सकल । परिमित स्वरूप वाले बुद्धि, प्राण, देह, देश, ध्यान, करण आदि को उपाय के रूप में ग्रहण करने वाले ॥ इसीलिए इसके उपाय की संज्ञा है—'आणव उपाय' ॥ आणवोपाय में—'ध्यान' बुद्धि का व्यापार है । 'प्राण' स्थूल-सूक्ष्म भेद से द्विविध रूप वाला है । 'स्थूल प्राण' का व्यापार = 'उच्चार' प्राणवृत्तियों के रूप में अवस्थित, 'सूक्ष्मप्राण' = 'वर्ण' । 'करण'—शरीर के अंगों को किसी विशेष प्रकार की स्थिति में रखना ॥ 'स्थान-कल्पना' = घट-स्थापन, मण्डल-निर्माण, मन्दिर, मूर्ति, चित्र आदि की रचना आदि विधियों का समावेश ॥ 'ध्यान' = सगुण स्वरूप में चित्त की एकाग्रता । 'उच्चार' = प्राण, अपान, व्यान, उदान, समान आदि के श्वास-प्रश्वास, छींक (क्षुत्) प्रभृति प्राण-वृत्तियाँ । 'वर्ण'—प्राणोच्चार के साथ स्वाभाविक रूप से उच्चरित 'सकार'-'हकार' ध्वनि = 'वर्ण' ॥ ये सभी वर्णों एवं मन्त्रों के बोधक हैं । 'वर्ण' पीत-अरुण आदि रंगों के भी बोधक ॥ 'करण' के भेद ('तन्त्रालोक' में 'त्रिशिरोभैरव' का उल्लेख करके उद्धृत ७ करण— ग्राह्य ग्राहक संवित्ति संनिवेश व्याप्ति आक्षेपं त्याग ('तन्त्रालोक' के ११, १५, १६, २९ एवं ३२ आह्निक में सविस्तृत विवेचन) 'स्थान-कल्पना'—हृदय के स्पन्दनात्मक प्राणशक्तिमूलक सामान्य व्यापार में शरीरस्थ नाड़ी-चक्र में एवं बाह्य लिंग, चत्वर, प्रतिमा आदि में स्थान-कल्पना की जाती है । सामान्य स्पन्द तत्त्व का उन्मेष → षडध्वं-स्फुरण । सबसे पूर्व परमेश्वर का 'काल' नामक स्वरूप भासित होता है और यह परमात्मस्वरूप अभेदावस्था में 'काली-शक्ति' एवं भेदावस्था में 'प्राणशक्ति' कहलाता है । संवित्स्वरूपा काली शक्ति में स्वेच्छानुसार क्रमाक्रम (क्रम+अक्रम) रूपों में भासनार्थ क्रिया शक्ति का उन्मेष । क्रियाशक्ति का प्रथमोन्मेष = प्राण-व्यापार । 'प्राक् संवित् प्राणे परिणता ।'
परिचय एवं पृष्ठभूमि ७३ 'प्राणशक्ति' (प्राणापानादिक ५ रूपों में) जीवों को व्याप्त रखता है → इसीलिए 'चेतन' है। क्रियाशक्ति = अध्वा पूर्वभाग (कालाध्वा) उत्तरभाग (देशाध्वा) परवर्ण सूक्ष्मवर्ण स्थूलवर्ण मन्त्र पद कला तत्त्व भुवन 'वर्ण' = शब्दार्थ स्वरूप का शिव-शक्ति में व्याप्यव्यापकभाव से 'पर' सूक्ष्म एवं स्थूल रूप से स्थित वर्ण, पद, मन्त्र, कलातत्त्व, भुवन 'षदध्व' स्थित हैं। समस्त षडध्वात्मक जगत् 'क्रियाशक्ति' का उन्मेष है। प्राणशक्ति का स्पन्दन = समस्त षडध्वात्मक जगत् के बाह्य-अन्तर सर्वत्र अनवरत प्रवाहित किन्तु इसकी अनुभूति मात्र हृदयादिक में। हृदयादिक स्थानों में स्पन्दमान प्राणशक्ति में चित्त का विलय— 'स्थान-कल्पना' (आणवोपाय का अंग) है। 'स्थान कल्पना' = शरीर के नाड़ीचक्र, चक्र आदि स्थानों में, लिंग, चत्वर, प्रतिमा आदि चित्त का नियोजन = स्थान कल्पना। देह, बुद्धि, प्राण आदि अपारमार्थिक साधनों (विकल्प) विकल्पात्मक स्थूलोपाय = आणवोपाय। 'अपारमार्थिकेऽप्यस्मिन् परमार्थः प्रकाशते। (तन्त्रालोक ५।७) बुद्धौ प्राणे तथा देहे देशे वा जडता स्थिता। तां विरोध्याय मेधावी संविद्रश्मिमयो भवेत् ॥ (तन्त्रालोक ५।१०) जब साधक 'शाक्तोपाय' में सतर्क, सदागम एवं सद्गुरु की सहायता से उच्चार, करण आदि विकल्प-व्यापारों का शोधन कर लेता है (सभी में स्वात्मस्वरूप का साक्षात्कार करने लगता है) तब उसके चित में 'विश्वाहन्ता' का विकास होता है। दो प्रकार की अनुभूतियाँ— १. समस्त जगत् मेरा ही स्वरूप है। २. मेरा शुद्ध स्वरूप (स्वात्मस्वरूप) इससे भी परे हैं। एतत्र्कारक 'सार्वात्म्य भावना'—चित्त में शुद्ध विकल्पों की सृष्टि (समस्त जागतिक पदार्थों में अपने शुद्ध स्वरूप की भावना एवं उनसे अपृथकत्व-दृष्टि) ॥ 'शांभवोपाय' में जगत् को (दर्पण-प्रतिबिम्बित मुख की भाँति) बोधगगन विज्ञान भैरव में स्थित माना जाता है। 'प्रतिबिम्ब'— १. जिसकी कोई स्वतन्त्र सत्ता नहीं है। २. अन्य पदार्थ में संक्रान्त होकर ही प्रकाशित। ३. बिम्ब की स्वतन्त्र सत्ता होती है। यह स्वतः प्रकाश्य है यथा मुख स्वयं भासित। 'यद् भेदेन भासितुमशक्तमन्याव्यामिश्रत्वेनैव भाति तत् प्रतिबिम्बं मुखरूपमिव दर्पणे। (तन्त्रसार) अन्यामिश्रं स्वतन्त्रसद्भासमानं मुखं यथा। (तन्त्रालोकः ३।५३)
७४ स्पन्दकारिका यह विश्व भी दर्पणप्रतिबिम्बित नगरी के समान शिवमय दर्पण में अवभासित है। शिवस्वभाव है कि अपने में ही अपने विज्ञानमय स्वरूप को जगत् के रूप में भासित करता है। शिवमय दर्पण में बिना किसी बिम्ब की सत्ता के भी यह जगत् स्वातन्त्र्य शक्ति के चमत्कार द्वारा जगत् रूप प्रतिबिम्ब अवभासित होता है। प्रश्न—यदि शिव 'दर्पण' है तो उसमें प्रतिबिम्बित जगत् का यह 'प्रतिबिम्ब' जगद्रूप किसी पृथक् 'बिम्ब' पर आधृत है क्या ? नहीं। निर्विकल्प शिव से पृथक् किसी स्वतन्त्र जगत् का कोई अस्तित्व नहीं है। इसी निर्विकल्प शून्य स्वरूप परम सत्ता में चित्त को समाहित करना 'शांभवोपाय' है। 'आणव' 'शाक्त' एवं 'शांभव' उपायों से पृथक् है—'अनुपाय' ॥ 'अनुपाय'—उपायों से परतत्त्व प्रकाशित नहीं होता । क्या घट सूर्य को प्रकाशित कर सकता है? उपायजालं न शिवं प्रकाशयेत् घटेन किं भाति सहस्रदीधितिः । विवेचयन्नित्यमुदारदर्शनः स्वयं प्रकाशं शिवमाविशेत् क्षणात् ॥ (अभिनवगुप्त) उदार दृष्टि वाला व्यक्ति उपाय-निरर्थकता पर विचार करते-करते स्वप्रकाश शिव- स्वरूप में समाविष्ट हो जाता है। ठीक भी है—उपाय सार्थक नहीं है। 'अपरोक्षे भवत्तत्त्वे सर्वतः प्रकटे स्थिते । यैरूपायाः प्रतन्यन्ते नूनं त्वां न विदन्ति ते ॥ (संवित्प्रकाश) 'आणवोपाय' में—क्रम एवं कुल दर्शनों से भिन्न समस्त तांत्रिक एवं यौगिक विधियों का समावेश किया गया है। तन्त्रशास्त्र की विभिन्न कोटियाँ एवं उपाय—'शाक्तोपाय' में—क्रम दर्शन एवं 'शांभवोपाय' में कुल दर्शन एवं 'अनुपाय' में प्रत्यभिज्ञा दर्शन की ही (अभिनवगुप्त प्रभृति द्वारा) विवेचना की गई है। उपाय भी तो शिव से पृथक् नहीं है अतः उपायोपेय की स्वतन्त्र कल्पना भी सार्थक नहीं है। 'तन्त्रालोक' में अभिनवगुप्त ने तन्त्रशास्त्र को चार कोटियों में विभक्त किया है—१. 'अनुपाय' २. 'शांभवोपाय' ३. 'शाक्तोपाय' ४. 'आणवोपाय' । 'अनुपाय' = त्रिक या प्रत्यभिज्ञादर्शन । 'अनुपाय' कोटि के शास्त्र = त्रिकदर्शन या प्रत्यभिज्ञा ('तन्त्रालोक' : अभिनव) 'अनुपाय' सिद्धसाहित्य के 'सहज' के निकटस्थ है। 'अनुपाय' = अल्पोपाय (जयरथ) विज्ञानभैरव में अनुपाय पद्धति का ही सविस्तार विवेचन किया गया है। 'अनुपाय पद्धति' योग-प्रक्रिया-सापेक्ष है। अनुपाय— आचार्य अभिनवगुप्त 'तन्त्रसार' में कहते हैं—साधक गुरु के एक बार के उपदेश से ही नित्योदित समावेश दशा में संलीन हो जाता है। वह उपाय के रूप में षडंग योग के 'तर्क' का आश्रय ग्रहण करता है। उसकी दृष्टि यह है कि स्वप्रकाश
परिचय एवं पृष्ठभूमि ७५ स्वात्मस्वरूप ही तो परमात्मा है अतः किसी उपाय की सार्थकता क्या है? नित्य, स्वप्रकाश, निरावरण तत्त्व स्वात्मस्वरूप की प्राप्ति के लिए उपाय की क्या आवश्यकता है ? ‘स्वात्मस्वरूप में लीन होना’—भी निरर्थक है क्योंकि उसके अतिरिक्त अन्य (प्रवेश करने वाले) की सत्ता ही नहीं है । जगत् चिन्मय है—चिन्मात्रसार है । यह देश, काल, उपाधि, आकृति, से परे, शब्दागम्य, प्रमाणागम्य, स्वतन्त्र, आनन्दघन यह स्वात्मस्वरूप सभी सत्ताओं का केन्द्र है । मैं इस स्वात्म स्वरूप से भिन्न नहीं हूँ । इस अहमात्मक स्वात्मस्वरूप में ही यह समस्त जगत् प्रतिबिम्बित हो रहा है । इस प्रत्यभिज्ञा के उदित होने पर साधक नित्योदित परमात्मस्वरूप में प्रविष्ट हो जाता है— १. अनन्यचेताः प्रत्यन्ते परव्योमवपुर्भवेत् ॥ (वि०भै० ४१) २. अतश्च तन्मयं सर्वं भावयन् भवजिज्जनः (वि० भै० ९७) ३. बुद्धिं निस्तिमितां कृत्वा तत्तत्त्वमवशिष्यते ॥ (वि० भै० ९९) ४. क्षोभशक्ति विरामेण परा संजायते दशा । (वि० १०९) ५. तत्र-तत्र शिभावस्था व्यापकत्वात् क्व यास्यति । (वि० भै० ११३) ६. सर्वत्र भैरवो भावः समान्येष्वपि गोचरः । न च तद्व्यतिरेकेण परोऽस्तीत्यद्वया गतिः ॥ (१२१ वि० भै०) इस उपायशून्य 'अनुपाय' में मन्त्र, पूजा, ध्यान एवं चर्या आदि सभी साधन व्यर्थ हैं क्योंकि—‘उपायजालं न शिवं प्रकाशयेत्' । 'त्रिक दर्शन' में 'बंधन' एवं 'मुक्ति' तथा मुक्ति के उपायों के संदर्भ में भी नव्य दृष्टि प्रस्तुत की गई है यथा— 'बंधन' परमात्मा का अवरोहणात्मक व्यापार है । आत्मा का सम्यक् ज्ञान 'मुक्ति' है और अज्ञान ही 'बंधन' है— क) शिवजीवयोरभेद एव (मुक्तिः) उक्ता (आचार्य क्षेमराज) । ख) एतत्तत्त्वपरिज्ञानमेव मुक्तिः (आचार्य क्षेमराज) । ग) एतत्तत्त्वापरिज्ञानमेव बंधः (आचार्य क्षेमराज) । 'मालिनीविजयोत्तर' तन्त्र में 'मल' को ही 'अज्ञान' एवं 'संसारांकुर कारण' कहा गया है—'मलमज्ञानमिच्छन्ति संसारांकुरकारणम् ।' समावेश के पाँच भेद— १. जाग्रत्स्वप्नादिभेदेन सर्वाविशक्रमो बुधैः । पञ्चभिस्तु परिज्ञेयः स्वव्यापारात्पृथक् पृथक् ॥ (अधि २।२६) २. तत्र स्वरूपं शक्तिश्च सकलश्चेति तत्त्रयम् । इति जाग्रदवस्थेयं भेदे पञ्चदशात्मके ॥ (अधि० २।२७) ३. अकलौ द्वौ परिज्ञेयौ सम्यक् स्वप्नसुषुप्तयोः । मन्त्रादितत्पतीशान वर्गस्तुर्यः इति स्मृतः ॥ (२।२८)
७६ स्पन्दकारिका ४. शक्तिशांभू परिज्ञेयौ तुर्यातीते वरानने । त्रयोदशात्मके भेदे स्वरूपसकलावुभौ ॥ (२।२९) मोक्ष—Tantric view of Moksha—Moksha, in the tantric sense of the word, is the unfoldment of powers brought about by the self- realisation. रुद्रशक्ति ┌─────────────┬─────────────┐ आणव शाक्त शांभव १. रुद्रशक्ति समावेशः पञ्चधा परिपठ्यते । २. रुद्रशक्ति समावेशस्तत्र नित्यं प्रतिष्ठितः (अधि० २।१३,१७) १. भूत २. तत्त्व ३. आत्मा ४. मन्त्रेश ५. शक्ति—इन ५ भेदों तथा उपभेदों के अनुसार रुद्रशक्ति के ५० भेद हैं । आणव—१. 'जाग्रत्' २. 'स्वप्न' ३. 'सुषुप्ति' ४. 'स्वप्नातीत'-'तुरीय' ५. 'तुर्यातीत' । पृथ्वी से पदार्थ तक (१) स्वरूप सकल स्तर— (क) स्वरूप सकल शक्ति—जाग्रत् अवस्था । (ख) प्रलयाकल—स्वप्नावस्था । (ग) विज्ञानाकल—सुषुप्ति अवस्था । (घ) मन्त्र, मन्त्रेश—मन्त्रमहेशः तुरीयावस्था । (ङ) शिव-शक्ति—तुरीयातीतावस्था । पुरुष से कला पर्यन्त (२) स्वकल स्तर— (क) सकल = जाग्रतावस्था । (ख) यथा पूर्वोक्त । (ग) यथा पूर्वोक्त । (घ) यथा पूर्वोक्त । (ङ) यथा पूर्वोक्त । माया तत्त्व (३) प्रलयाकल स्तर— (क) प्रलयाकल-जाग्रतावस्था । (ख) विज्ञानाकल शक्ति-स्वप्नावस्था । (ग) यथा पूर्ववत् । (घ) यथा पूर्ववत् । (ङ) यथा पूर्ववत् । मायोर्ध्व (४) विज्ञानाकल स्तर— (क) विज्ञानाकल-जाग्रतावस्था ।
परिचय एवं पृष्ठभूमि ७७ (ख) मन्त्र-स्वप्नावस्था । (ग) मन्त्रेश-स्वप्नातीतावस्था । (घ) मन्त्रमहेश-तुरीयावस्था । (ङ) यथा पूर्वोक्त । शुद्धविद्या (५) मन्त्रस्तर— (क) मन्त्र-जाग्रतावस्था । (ख) मन्त्रेश-स्वानावस्था । (ग) मन्त्रमहेश-स्वप्नातीतावस्था (घ) शक्ति-तुरीयावस्था । (ङ) शिव-तुरीयातीतावस्था । ईश्वर (६) मन्त्रेश स्तर— (क) मन्त्र-जाग्रतावस्था । (ख) मन्त्रेश-स्वानावस्था । (ग) मन्त्रमहेश-स्वप्नातीतावस्था । (घ) शक्ति-तुरीयावस्था । (ङ) शिव-तुरीयातीतावस्था । सदाशिव (७) मन्त्रमहेश स्तर— (क) मन्त्रमहेश-जाग्रतावस्था । (ख) क्रियाशक्ति-स्वप्नावस्था । (ग) ज्ञानशक्ति-स्वप्नातीतावस्था । (घ) इच्छाशक्ति-तुरीयावस्था । (ङ) शिव-तुरीयातीतावस्था । अव्यक्त स्तर (८) शिव स्तर (Undifferentiated stage)— (क) क्रिया-जाग्रतावस्था । (ख) ज्ञान-स्वप्नावस्था । (ग) इच्छा-स्वप्नातीतावस्था । (घ) आनन्द-तुरीयावस्था । (ङ) चित् तुरीयातीतावस्था अवस्थाओं के पर्याय— (क) जाग्रत्-पिण्डस्थ—सर्वतोभद्र । (ख) स्वप्न-पदस्थ—व्याप्ति । (ग) सुषुप्ति-रूपस्थ—महाव्याप्ति । (घ) तुर्य-प्रचय—रूपातीत । (ङ) तुरीयातीत—महाप्रचय ।
७८ स्पन्दकारिका संसार की सर्वोच्च सत्ता—सर्वकर्ता, सर्वज्ञ, सर्वस्थिति कारक, नित्य ॥ परमात्मा सिसृक्षा के स्तर (Creational Stage)—पर अपने को 'विज्ञानाकल' के रूप में प्रस्तुत करता है। परमात्मा उन्हें स्थिति, संहार एवं रक्षा का कार्य प्रदान करते हैं— क्रिया हेतु परमात्मा ७ करोड़ मन्त्रों को जन्म देते हैं। ये मन्त्र साधकों की इच्छाओं की पूर्ति प्रदान करते हैं। आत्मा अपने को चार रूपों में व्यक्त करती है—१. 'शिव' २. 'मन्त्रमहेश' ३. 'मन्त्रेश' ४. 'मन्त्र'। विज्ञानाकल एवं मन्त्र—विज्ञानाकल में—१. मल। 'प्रलयाकल' में—२ मल ॥ 'मल' = अपूर्ण ज्ञान ॥ रुद्र = ११८ 'रुद्र' ही मन्त्रेश्वरों के रूप में नियुक्त किये जाते हैं। (मालिनीविजयोत्तरतन्त्र)। [८] बंधन और मुक्ति शिवसूत्रकार तो कहते हैं कि 'ज्ञान' ही बंधन है—'ज्ञानं बंधः' (१।२) आत्मा में अनात्मा एवं अनात्मा में आत्माभिमानस्वरूप अख्याति अर्थात् अज्ञानात्मक ज्ञान ही बंधन है— (१) 'आत्मनि अनात्मताभिमानरूपाख्यातिलक्षणाज्ञानात्मकं ज्ञानं केवलं बंधो' तथा— (२) अनात्मनि शरीरादौ आत्मताभिमानात्मकम् अज्ञानमूलं ज्ञानमपि बंध एव ॥१ स्पन्दकारिका = 'शब्दराशि समुत्थस्य शक्ति वर्गस्य भोग्यताम् । कलाविलुप्त विभवो गतः सन् स पशुः स्मृतः ॥'—पशुत्व ही बंधन है। आचार्य क्षेमराज की दृष्टि—सारांश बंधन—१. आत्मा में अनात्मा का अभिमान रूप अज्ञान। २. अनात्मा में आत्मा का अभिमानरूप अज्ञान। ३. 'अपूर्णम्मन्यतात्मकआणवमलसतत्त्वसंकुचितज्ञानात्मा बंधः ॥' ४. 'मल' = 'मलमज्ञानमिच्छन्ति संसारांकुरकारणम्' ५. अज्ञानाद् बध्यते लोकस्ततः सृष्टिश्श्च संहतिः ।२ ६. आत्मप्रत्यभिज्ञा का अभाव (स्वस्वरूप का ज्ञानाभाव) ७. ज्ञानाभाव 'अज्ञान' नहीं है प्रत्युत अपूर्णज्ञान अज्ञान है और यही बंधन का कारण है। ८. जिस स्वस्वरूप का ज्ञान नहीं है उसका स्वरूप है क्या? 'आत्मनो भैरवं रूपम्'। 'स्पन्दकारिका' का मत—(१) इति वा यस्य संवित्तिः क्रीडात्वेनाखिलं जगत् स पश्यन् सर्वतो युक्तो जीवन्मुक्तो न संशयः ।
१-२. शिवसूत्रविमर्शिनी।
परिचय एवं पृष्ठभूमि ७९ २. अयमेवोदयस्तस्यध्येयस्यध्यायि चेतसि तदात्मतासमापत्तिमिच्छतः साधकस्य वा। ३. इयमेवाऽमृतप्राप्तिरयमेवाऽत्मनो ग्रहः। इयं निर्वाणदीक्षां च शिवसद्भावदायिनी। ४. यदा त्वेकत्रसंरूढस्तदा तस्य लयोद्भवौ। नियच्छन् भोक्तृतामेति ततश्चक्रेश्वरो भवेत् ॥—‘स्पन्दकारिका’ ५. कलाविलुप्त विभव ही पशु है। मुक्ति क्या है? ‘जीवन्मुक्ति’ ही मुक्ति है— चिदानन्दलाभे देहादिषु चेत्यमानेष्वपि चिदैकात्म्यप्रतिपत्तिदार्ढ्यं जीवन्मुक्तिः। अविचला चिदेकत्वप्रथा सैव जीवन्मुक्तिः। —(प्र०हृ०सू० १६ ‘स्पन्दकारिका’ में कहा गया है कि जगत् को अपनी क्रीड़ा मानना ही ‘जीवन्मुक्ति’ है— ‘इति वा यस्य संवितिः क्रीड़ात्वेनाखिलं जगत्। स पश्यन् सततं युक्तो जीवन्मुक्तो न संशयः ॥’ समस्त ज्ञायमान पदार्थ जीव के अपने अंगसदृश हैं—‘भोक्तैव भोग्यभावेन सदा सर्वत्र संस्थितः ॥ (स्पन्द का० २४) पारमार्थिक दृष्टि से बंधन एवं मुक्ति—परमात्मा स्वयमेव अपनी इच्छा से स्व- स्वरूप का आच्छादन करके पशु बन जाता है और स्वेच्छा से ही इस आच्छादन का त्याग करके शिव भी बन जाता है अतः पशु का पशुत्वरूप बंधन एवं इस बंधन का त्याग रूप शिवत्व या मुक्ति तो कल्पित ही है अतः कैसा बंधन कैसी मुक्ति?— न मे बंधो न मोक्षो मे भीतस्यैता विभीषिकाः। प्रतिबिम्बमिदं बुद्धेर्जलेष्विव विवस्वतः ॥ (१३२)१ आचार्य सोमानन्द का कथन है कि प्रतीतिमात्र ही बंधन-मोक्ष दोनों हैं— विभिन्न शिवपक्षे तु सत्ये दार्ढ्यं परत्र नो। प्रतीतिमात्रमेवात्र तावता बंधमोक्षता ॥२ अर्थात् ‘शिवाभेदप्रतीतिमात्रं मोक्षस्तदप्रतीतिस्तु बंध इति।’३ [९] अद्वैत भक्ति ‘स्पन्द’ एवं ‘प्रत्यभिज्ञा’ में अद्वैतभक्ति स्थापित है। ‘अनुभवसूत्र’ में भी यही दृष्टि प्रतिपादित है— १. द्वैतभक्तिः प्रपञ्चाख्या केनचित् कल्पिता मृषा। अद्वैतभक्तिरचला निर्विकल्पा निरञ्जना ॥ (८ अधिकरणः ४८) १. विज्ञानभैरव। २. शिवदृष्टि (सोमानन्द)। ३. शिवदृष्टिवृत्ति (उत्पलदेव)।
८० स्पन्दकारिका २. एवमद्वैतभक्त्यैव प्रसादः सर्वतोमुखः । प्रसिद्ध्यति ततः सर्वमात्मरूपेण दृश्यते ॥ (८।३६)१ ३. इसका प्रभाव क्या है ? (क) कर्ता कारयिता कर्म करणं कार्यमेव च । सर्वमात्मतया भाति प्रसादात् पारमेश्वरात् ॥ (८।३७) (ख) भोक्ता भोजयिता भोगो भोगोपकरणानि च । सर्वमात्मतया भाति प्रसादात् पारमेश्वरात् ॥ (८।३८)२ (ग) ग्राहकश्च तथा ग्राह्यं ग्रहणं सर्वतोमुखम् । सर्वमात्मतया भाति प्रसादात् पारमेश्वरात् ॥ (८।३९) (घ) शरीरमिन्द्रियं प्राणा मनो बुद्धिरहंकृतिः । सर्वमात्मतया भाति प्रसादात् पारमेश्वरात् ॥ (८।४१) (ङ) विधयश्च निषेधाश्च निषिद्धकरणान्यपि । सर्वमात्मतया भाति प्रसादात् पारमेश्वरात् ॥ (८।४२)३ (च) कामक्रोधादयः सर्वे तथा शान्त्यादयोऽपि च । सर्वमात्मतया भाति प्रसादात् पारमेश्वरात् ॥ (८।४३) निष्कर्ष— १. तस्मादद्वैतगां भक्तिमाश्रयेत् सर्वसिद्धिदाम् । न च द्वैतात्मिकां भक्तिं क्लेशहेतुप्रदायिनीम् ॥ (८।४४)४ २. अद्वैतपदरूढा या भक्तिरद्वैतलक्षणा । सैवाद्वैताभिधा भक्तिरन्या केवल कल्पिता । (८।४६)५ (क) द्वैतभक्ति—संसार-वर्धन-भेद बुद्धि—संसरण चक्र ॥ (ख) अद्वैतभक्ति—अभिन्नरूप—भेदहीन—संसार-विनाश ॥ द्वैतभक्त्या हि संसारवर्धनं भिन्नरूपतः । अभिन्नरूपतोऽद्वैतभक्त्या संसारनाशनम् ॥ (८।४७)६ अद्वैतभक्ति—द्वैतभक्ति की निवृत्ति । द्वैतभक्तिनिवृत्तौ हि साक्षादद्वैतलक्षण । भक्तिर्गरीयसी भाति निजर्वाण निरूपिणी ॥ (८।४९) भक्ति की शक्ति एवं उसका विमर्श-स्वरूप— १. भक्तिरेव परमार्थदायिनी भक्तिरेव परतत्त्ववेदिनी । भक्तिरेव भवदोषहारिणी भक्तिरेव शिवभावकारिणी ॥ (८।८३) १-६. अनुभवसूत्र ।
परिचय एवं पृष्ठभूमि ८१ २. नाहमनात्मा पश्चात्कोऽहं योऽहं पदस्थ आत्मा साक्षी । सोऽहं तत्पति शिवदासोऽहं दासोऽहमिति चरेदुपरि ॥ (८।८५)१ —वातूलोत्तरतन्त्र शिवानुभवसूत्र ‘विज्ञानभैरव’ में कहा गया है कि भक्ति के उद्वेक से विरक्त मल के हृदय में जिस प्रकार की मानसिक दशा (मति) उत्पन्न होती है वही ‘शांकरीशक्ति’ है और ऐसा साधक ‘शिव’ हो जाता है । भक्त्युद्रेकाद्विरक्तस्य यादृशी जायते मतिः । सा शक्तिः शांकरी नित्यं भावयेत् तां ततः शिवः ॥ (विज्ञानभैरव ११८) ‘गीतानिष्यन्द’ में क्षेमेन्द्र ने कहा है कि—सर्वत्र सर्वव्यापक भगवान् के श्रीचरणों में साष्टांग प्रणाम करना ही भक्ति नहीं है प्रत्युत् यथार्थ भक्ति तो यह है कि भाव स्वभाव के सभी पदार्थों में एक ही भगवान् का अनुचिन्तन किया जाय । समस्त जगत् को भगवन्मय समझा जाय । न पादपतनं भक्तिर्व्यापिनः परमेशितुः । भक्तिर्भावस्वभावानां वदेकीभावभावनम् ॥ उत्पलदेवाचार्य (‘श्री शिवस्तोत्रावली’ के पञ्चम स्तोत्र में) कहते हैं ‘हे भगवन् । आपके अद्वयानन्द को प्राप्त करके और इस जगत् को अपनी ही आत्मा की झलक से युक्त देखते हुए भी मैं भक्तिरस के चमत्कारों से वंचित न रहूँ— ‘अपि लब्धभवद्भावः स्वात्मोल्लासमयः जगत् । पश्यन् भक्तिरसाभोगैर्गर्भवेयमवियोजितः ॥ १६ ॥ आचार्य उत्पलदेव पुनः कहते हैं—‘शिव बनकर शिव की पूजा करनी चाहिए— ऐसा भक्त जनों से कहा जाता है क्योंकि पारमार्थिक सारभूत स्वरूप वाले आप भक्तों द्वारा ही अभेद दृष्टि से ढूँढ़े जाते हैं— ‘शिवा भूत्वा यजेतेति भक्तो भूत्वेति कथ्यते । त्वमेव हि वपुः सारं भक्तैर्हृदयशोधितम् ॥ (१।१४) ‘हे पूर्णाहन्ता स्वरूप स्वामी ! मैं ईश्वर हूँ’ मैं ही सुन्दर (चिदात्मा के प्रकाश से उज्ज्वल) हूँ । मैं ही सौभाग्यवान् हूँ । ज्यादा क्या कहूँ ? ‘इस जगत् में मेरे समान अन्य कौन है ?’—ऐसे स्वात्माभिमान की भावना आपके भक्त को अत्यन्त शोभा देती है— ईश्वरोऽहमेव रूपवान् पण्डितोऽस्मि सुभगोऽस्मि कोऽपरः । मत्समोऽस्ति जगतीति शोभते, मानिता त्वदनुरागिणः परम् ॥ ४ ॥ यहाँ समावेशमयी भक्ति स्पृहणीय है— ‘हे उमापति! अथाह, निर्विकल्प, अभेदरूप स्वात्मस्वरूप और सभी भेदमय १. अनुभवसूत्र । स्पं.भू. ५
८२ स्पन्दकारिका पदार्थों को निगल डालने वाले आप चिद्रूप में समावेश करते हुए मैं सदैव आपकी पूजा करता हूँ— 'त्वामगाधमविकल्पमद्वयं, स्वं स्वरूपमखिलार्थघस्मरम् । आविशन्नहमुमेश सर्वदा, पूजयेयमभिसंस्तुवीय च ॥' 'भक्त्यावेशस्तु मे सदा' (१६।६) 'जहाँ इस अलौकिक चिदात्मा महादेव की पूजा की जाती है वहाँ कौन सी शोभा नहीं होती, कौन सा आनन्द नहीं होता, कौन सी उत्कृष्ट सुखसम्पत्ति नहीं होती और कौन सा मोक्ष नहीं होता ?' का न शोभा न को ह्लादः का समृद्धिर्न वापरा । को वा न मोक्षः कोऽत्येष महादेवे यदर्च्यते ॥ (१७।२५) 'प्रत्यभिज्ञाकारिका' के ज्ञानाधिकार में उत्पलदेवाचार्य भगवान् की दास्य भक्ति की चर्चा करते हुए प्रत्यभिज्ञा के प्रतिपादन की बात करते हैं— 'कथं चिदासाद्य महेश्वरस्य, दास्यं जनस्याप्युपकारमिच्छन् । समस्त सम्पत्समवाप्ति हेतुं, तत्प्रत्यभिज्ञामुपपादयामि ॥' (प्र०का०) यहाँ 'भक्ति' को भगवान् की 'आह्लादिनी शक्ति' माना जाता है। 'भक्ति' भगवान् की 'आनन्द शक्ति' है । यहाँ 'भक्ति' भावना, गलदश्रुभावुकता या 'चित्त का द्रवीभाव' मात्र नहीं है प्रत्युत् यह भगवान् में अपृथक् रूप से समवेत आनन्द शक्ति का उल्लास है । यह परमात्मा की शाश्वत आनन्द शक्ति का उसके अपरिमेय आनन्दोल्लास की अभिव्यञ्जना है । यह परमात्मा की अचिन्त्य शक्ति की (भक्त के हृदय में) अभिव्यक्ति है । [१०] मन्त्रविज्ञान और स्पन्दशास्त्र 'स्पन्दशास्त्र' ज्ञान-साधना, योग-साधना, मन्त्र-साधना एवं समावेशमयी भक्ति- साधना—इन सभी में आस्था रखता है । मन्त्र विज्ञान के विषय में स्पन्दशास्त्र में मुख्यतः 'सहजविद्योदय स्पन्द निष्यन्द' में प्रकाश डाला गया है । इसमें कहा गया है— १. 'तदाक्रम्य बलं मन्त्राः सर्वज्ञ बल शालिनः । प्रवर्तन्तेऽधिकाराय करणानिव देहिनाम् ॥ २६ ॥ (स्पन्दकारिका) २. 'तत्रैव संप्रलीयन्ते शान्तरूपा निरञ्जनाः । सहाराधकचित्तेन तेन ते शिवधर्मिणः ॥ २७ ॥ (स्पन्दकारिका) अर्थात् स्पन्दरूप आत्मबल के साथ तद्रूपता प्राप्त करने से प्रत्येक प्रकार के मन्त्र में सर्वज्ञता, सर्वकर्तृत्वता, पूर्णता, सर्वव्यापकता, अमित तृप्ति, नित्यता, अप्रतिहत स्वातंत्र्य आदि षडात्मक माहेश्वर बलों का संचार हो जाता है अतः वे इन बलों से अनन्त
परिचय एवं पृष्ठभूमि ८३ शक्तिसम्पन्न हो उठते हैं और मन्त्र उनके समस्त अभीष्टो को उसी प्रकार पूर्ण कर देते हैं जैसे इन्द्रियाँ ॥ ये मन्त्र शान्तरूप एवं निरंजन (शुद्ध संविद्रूप एवं मायिक उपरागों से शून्य) होकर आराधक के चित्त के साथ चिदाकाश में विलीन हो जाते हैं । ये समस्त मन्त्र शिवधर्मा (शिवस्वरूप) हैं । ये मन्त्र द्विविध प्रकारक हैं—१. भोगरूप, २. मोक्षरूप । अर्थात् साञ्जन एवं निरञ्जन ॥ (क) मन्त्र का साञ्जन स्वरूप—(सांसारिक भोगों के रूप में फल प्रदान करने हेतु प्रयुक्त मन्त्र) उदा० मारण, मोहन, उच्चाटन, वशीकरण स्तंभन एवं द्वेषण आदि अभिचार-सिद्धि हेतु, रोग-निवारण हेतु निग्रहानुग्रह हेतु या किसी अन्य सांसारिक फलेच्छा हेतु प्रयुक्त मन्त्र 'साञ्जन मन्त्र' कहलाते हैं । (ख) निरञ्जन मन्त्र का स्वरूप—जिन मन्त्रों को अपने शिवत्व की अभिव्यक्ति हेतु प्रयुक्त किया जाता है वे मन्त्र मायीय उपरागों, दूषणों, एवं ऐहिक फलाकांक्षाओं से शून्य होने के कारण 'निरंजन' कहलाते हैं । इस प्रकार मन्त्रों के उपयोग की दो विधियाँ हुईं १. 'सांजन विधि', २. 'निरंजन विधि' । वर्णरचना के रूप में विरचित मन्त्र को ही मन्त्र का स्वस्वरूप मानना असंगत है—अभिनवगुप्त एवं क्षेमराज कहते हैं— (क) 'लिपिस्थितस्तु यो मन्त्रो निर्वीर्यः सोऽत्र कल्पितः । (तन्त्रालोक ४.६६) (ख) 'मन्त्रदेवताविमर्शपरत्वेन प्राप्ततत्सामरस्यम् आराधकचित्तमेव, न तु विचित्र- वर्णसंघटनामात्रम् ॥ (शिवसूत्र वि० २-१) अर्थात् वर्ण समुदाय की विशिष्ट संरचना मात्र 'मन्त्र' नहीं है प्रत्युत् देवता के विमर्श के कारण प्राप्त सामरस्य युक्त (आराधक का) चित्त ही 'मन्त्र' है—'चित्तं मन्त्रः' (शि.सूत्र)। (ग) आचार्य उत्पल (स्पन्दप्रदीपिका में) कहते हैं— 'तद् बलं निरावरण चिदुल्लासरूपं परशक्त्याख्यमाक्रम्य अधिष्ठाय मन्त्राः बीज- पिण्ड-पदनामरूपा मननत्राणधर्मिणः सहजनादशक्त्युद्बोधदीप्तत्वात् सर्वज्ञत्वादिन बलेन श्लाघा युक्ता मंत्रिप्रयुक्ता अधिकारायानुग्रहादौ प्रवर्तते ॥' (घ) आचार्य रामकण्ठ ('स्पन्द का०वि०') में कहते हैं— 'शिवस्य परमेश्वरस्यानन्यसाधारणः सर्वज्ञत्वादिर्गुणो सविद्यते येषां ते तथा शिवाद- भिन्नस्वरूपा' 'शिवधर्मिणाः' । (ङ) 'तद्बलं'—'तत्' समनन्तर प्रतिपादितस्वरूपस्य शिवस्य संबंधि 'बलं सामर्थ्य शक्तिम्' । (च) 'आक्रम्य'—उच्चिचारयिषावस्थायां तद्भेदोपपत्या स्वीकृत्य । (छ) सर्वज्ञस्य शिवस्य बलेन शक्त्या श्लाघमाना सन्तः यथास्वं प्रतिनियतकार्य- संपादनस्वाम्यार्थ्यं प्रसरन्ति ॥
८४ स्पन्दकारिका (ज) यदि मन्त्र को ‘परमेश्वराभेद’ प्राप्त न हुआ तो वे शक्तिहीन रहते हैं—यहाँ तक कि तिनके को भी टेढ़ा नहीं कर सकते— ‘एते हि अनासादित परमेश्वरा-भेददशा उत्पादविनाशधर्मकवर्णमात्रात्मकाः तृणमपि कुब्जयितुमशक्ताः’। ‘उक्त बलाक्रमणेन ... वृश्चिकविषाकर्षणान्त परापरस्वकार्यसंपादनाधिकारा प्रतिहत शक्तयो भवन्ति ॥’ (झ) मन्त्रा नियताधिकारा एव ॥ (ञ) यस्तु स्वस्वभावे एव सुदृढात्मप्रतिपत्तिः तस्य उदयास्तमयज्ञस्य सर्व मन्त्राः सर्वार्थसाधनाधिकारिणो भवन्ति तत्तदिति कर्तव्यता साहित्य नियमाद्यपेक्षां विना ॥ ‘मन्त्र’ और आत्मबल की प्राप्ति का अन्तर्सम्बन्ध— सारांश—१. पुस्तकों में लिखित मन्त्र (आत्मबल शून्य मन्त्र) निःशक्त होते हैं । २. मन्त्र वर्णरचना मात्र नहीं प्रत्युत् मन्त्रदेवता के साथ प्राप्त सामरस्य है । अतः इस देव-सामरस्य-प्राप्त चित को भी मन्त्र कहते हैं । ३. ‘मन्त्र’ सर्वज्ञत्वादिशक्तियों से तभी युक्त होते हैं जब वे निरावरणात्मक चिदु- ल्लास रूप पराशक्ति से अधिष्ठित होते हैं । अन्यथा नहीं क्योंकि ‘मन्त्राश्चिन्मरीचयः’ (‘मन्त्र’ आत्मा की रश्मियाँ हैं)। ४. मन्त्र में चार बातें मुख्य होती हैं—१. ‘बीज’ २. ‘पिण्ड’ ३. ‘पद’ ४. ‘नाम’ और उनका धर्म है (क) ‘मनन’ (ख) ‘त्राण’ । मन्त्र का बल है—निरावरण चित् शक्ति का उल्लास अर्थात् पराशक्ति इसी परा- शक्ति को ग्रहण करके ‘मन्त्र’ सहजनाद शक्ति से उद्बोधित होकर प्रदीप्त होते हैं । इसी के कारण वे सर्वज्ञता आदि शक्तियों से शक्तिमान बनते हैं । ५. ये ‘मन्त्र’ शिव से अभिन्नस्वरूप अर्थात् ‘शिवधर्मी’ हैं और इनमें परमेश्वर शिव के समस्त सर्वज्ञत्वादि गुण या शक्तियाँ समाविष्ट हो जाती हैं । ६. जब ये ‘मन्त्र’ आत्मबल (स्पन्द) को प्राप्त कर लेते हैं (अर्थात् आत्मबल को अपने से अभिन्नस्वरूप में ग्रहण कर लेते हैं) (‘अभेदोपपत्त्या स्वीकृत्य’—रामकण्ठा- चार्य)—तब वे सर्वज्ञ शिव के बल से श्लाघमान हो जाते हैं और नियत कार्यों को सम्पन्न करने की सामर्थ्य प्राप्त कर लेते हैं । ७. परमेश्वर से तादात्म्य न प्राप्त कर पाने पर ये मन्त्र एक तुच्छ तिनके को भी टेढ़ा नहीं कर सकते । ८. जो साधक स्वस्वभाव में दृढ़ रहकर मन्त्रों की सिद्धि करते हैं वे नियतकार्यों को ही नहीं प्रत्युत् परमेश्वरवत् समस्त कार्यों को निष्पादित करने में समर्थ होते हैं । ९. ‘त्रिकसार’—‘वर्णातीत निराकार परम तत्त्व का अवबोध हो जाने पर ‘मन्त्र’ मन्त्राधियों के साथ साधक के किंकर बन जाते हैं—
परिचय एवं पृष्ठभूमि ८५ विदिते तु परे तत्त्वे वर्णातीते ह्यविग्रहे । किंकरत्वं तु गच्छन्ति मन्त्रा मन्त्राधिपैः सह ॥ १०. 'हंसपारमेश्वर' — 'केवल वर्णरूप मन्त्र पशुभाव में स्थित है सुषुम्णामार्ग से उच्चारण करने पर वे पशुपति बन जाते हैं 'पशुभावे स्थिताः मन्त्राः केवला वर्णरूपिणः । सौषुम्णेध्वन्युच्चरिताः पतित्वं प्राप्नुवन्ति ते ॥ सौषुप्तपदवन्मूढः प्रबुद्धः स्यादनावृतः ।। (स्पन्द का० २५) ११. 'मन्त्र' शाक्त मार्ग में सफल होते हैं—'एष शाक्तो मार्गोऽत्र च मन्त्राणां साफल्यम्' (स्पन्दप्रदीपिका उत्पलाचार्य) ।। १२. 'तत्त्वरक्षाविधान' में कहा गया है—'आत्मसंवित् या परमपद में मन्त्र का प्रयोग नहीं करना चाहिए क्योंकि वह शक्ति एवं क्रिया से रहित है । शक्ति के विषय में ही मन्त्र का प्रयोग करना चाहिए क्योंकि मन्त्र का जप वहीं सफल होता है ।' १३. 'श्रीवैहायसी'—'संधिस्थल में नादोर्ध्वध्वनि से बोधित जप करना चाहिए । यथा सूत्र में मणिग्रथित होते हैं तद्वत् शक्ति के ताने-बाने से निर्मित ही मन्त्राक्षरों का ध्यान करना चाहिए । वह 'शक्ति' परम व्योम में अवस्थित रहती है और परामृत समृद्ध है । उक्त पद्धति से जप करने पर ही 'मन्त्र' स्वस्वरूप को प्रकट करता है और तब अपने को आच्छादित नहीं करता'— 'विष्णुवक्तं जपं कुर्यान्नादोर्ध्वध्वनिबोधितम् । मन्त्राक्षराणि मणिवच्छक्तौ प्रोतानि भावयेत् ।। तामेव च परे व्योम्नि परामृत बृंहितम् । दर्शयत्यात्मसद्भावमेवं मन्त्रो हृतिं विना ।।' १४. 'श्री कालपरा' में कहा गया है—'शब्द नादात्मक हैं अतः उसके साथ प्रत्यय संवित्-संलग्न रहकर बढ़ाती है । मन्त्र बोध के स्वरूप में स्थित संवित् अभिन्न है अतः वह आत्मबोध भी करा देती है'— शब्दो नादात्मकस्तस्मात् प्रत्ययेनोपबृंहितः । मन्त्रबोधस्वरूपस्थमभिन्नो बोधयत्यपि ।। १५. 'संकर्षणसूत्र' में कहा गया है—'चिद्रूपता स्वात्मैकनिष्ठ है । भावाभाव उसकी दशाएं एवं परिष्कार हैं । वह स्वसंवेदन संवेद्य है । प्रकृति से अतीत भी वही है और प्रकृति का विषय भी वही है । यही मन्त्रों का प्रत्ययात्मक कारण है । मन्त्र बाहर एवं भीतर वर्णसप से प्रकट होते हैं । वे शाश्वत पद रूप में होते हैं । वे मनुष्य के कर चरण आदि के समान हैं । वीर्य का योग होने पर किसी भी काल में प्रयोग करने पर वे सिद्ध होते हैं ।'— 'स्वात्मैकनिष्ठं चिद्रूपं भावाभावपरिष्कृतम् । स्वसंवेदनसंवेद्यं प्रकृत्यातीतगोचरम् ।।
८६ स्पन्दकारिका इयं योनिः स्मृता विप्र मन्त्राणां प्रत्ययात्मिका । ते मन्त्रा वर्णरूपेण सबाह्याभ्यन्तरोदिताः ॥ नैष्कालिक पदावस्थाः करणानीव देहिनाम् । प्रयुक्ताः सर्वकालेषु सिद्ध्यन्ते वीर्ययोगतः ॥' १६. 'जय संहिता' में कहा गया है—'एक ही मन्त्रनाथ अन्तर एवं बाह्य दोनों में उदित होकर एकहो जाता है । तब उस जप को लक्षसंख्या से अधिक समझना चाहिए'— 'एकस्य मन्त्रनाथस्याप्यन्तर्बाह्योदितस्य च । यदैक्यं तं जपं विद्धि लक्षसंख्याधिकं मुने ॥' (एवं शुद्धबोधात्मकत्वेन अन्तर्बाह्योदयादेकोऽपि जपो लक्षसंख्याकः'—'स्पन्द- प्रदीपिका') । १७. पुस्तक में लिखे मन्त्रों का जप इन्हीं कारणों से निषिद्ध है और ऐसा मन्त्र- जापक चाण्डाल होता है— 'पुस्तके लिखितान्मन्त्रा दृष्ट्वा जपति यो नरः । स जीवन्नेव चाण्डालो,—तथा—'मृतःश्वा चाभिजायते ॥' १८. 'मन्त्र' समस्त देवशक्तियों से युक्त होते हैं— यथा—'श्रीविद्या' । 'श्रीविद्या' में (१) 'वाग्भवकूट'—'क ए ई ल' । अ (श्रीकण्ठ) क (कोधीश) ए (कोणत्रय = योनि) ई (लक्ष्मी) 'अ' (अनुत्तर) के साथ लं (मांस) । (२) 'कामराजकूट'—ह, स, क, ह, ल । ह (शिव) स (हंस) क (ब्रह्मा) ह (वियत्) ल (शक्र) अ (अक्षर) । (३) 'शक्तिकूट'—शिव (ह) वियत् (ह) के बिना 'कामराजकूट । शक्तिकूट कहा जाता है । प्रत्येक कूट के अन्त में एक-एक हृल्लेखा 'ह्रीं' अन्त में जोड़ लेना चाहिए । ('वरिवस्यारहस्यम्') । (४) 'ह्रीं' (हृल्लेखा) में 'ह' (व्योम) र (अग्नि) ई (वामलोचना) बिन्दु (.) अर्धचन्द्र, रोधिनी, नाद, नादान्त, शक्ति, व्यापिका, समना एवं उन्मनी । बिन्दादि ९ की समष्टि 'नाद' कहलाता है । १९. 'वरिवस्यारहस्यम्'—मन्त्र के वर्णों का उच्चारण करते हुए ५ अव- स्थाओं, ६ शून्यों, ७ विषुवों, ९ चक्रों एवं मन्त्र के अर्थ का चिन्तन करना चाहिए । यही 'जप' है— एवमवस्थाशून्यविषुवन्ति चक्राणि पञ्च षट् सप्त । नव च मनोरर्थांश्च स्मरतोऽर्णोच्चरणं तु जपः ॥ (वरि०र०)
परिचय एवं पृष्ठभूमि ८७ (क) ५ अवस्थायें—जागरण, स्वप्न, सुषुप्ति, तुरीय, तुरीयातीत । (ख) ६ शून्य—तृतीयकूट के रेक, बिन्दु, रोधिनी, नादान्त, व्यापिका एवं उन्मनी में महाशून्य ॥ (ग) ७ विषुव—मन्त्रविषुव । नाडी विषुव । प्रशान्तविषुव । शक्तिविषुव । तत्त्वविषुव । (घ) ९ चक्र—चक्रभावन—१. सकल, २. निष्कल, ३. सकल-निष्कल । (१) अकुल सहस्रार (२) मूलाधार (३) स्वाधिष्ठान (४) मणिपूरक (५) अनाहत (६) विशुद्धाख्य (७) आज्ञा (८) सूक्ष्म जिह्वा (९) बिन्दु । (त्रैलोक्यमोहनादि ९ चक्र) । 'शून्यषट्कं सुरेशानि अवस्थापञ्चकं पुनः । विषुवत्सप्तरूपं च भावयन्मनसा जपेत् ॥' (ङ) मन्त्रार्थ—भावार्थ, संप्रदायार्थ, निगर्भार्थ, कौलिकार्थ, रहस्यार्थ, महातत्त्वार्थ, नामार्थ, शब्दरूपार्थ, नामैकदेशार्थ, शाक्तार्थ सामरस्यार्थ, समस्तार्थ, सगुणार्थ, महा- वाक्यार्थ आदि । ('पञ्चदशी' के उतने ही अर्थ हैं जितने उसके वर्ण हैं ।) 'अहं'—'अहं' भी एक मन्त्र है और उसका अर्थ निम्नांकित है— अहमित्येकमद्वैतं यत्प्रकाशात्मविभ्रमः । अकारः सर्ववर्णाग्र्यः प्रकाशः परमः शिवः ॥ हकारोऽन्त्यः कालरूपो विमर्शाख्यः प्रकीर्तितः । अनयोः सामरस्यं यत् परस्मिन्ब्रह्मणि स्फुटम् ॥' 'अ' = शिव । 'ह' = 'शक्ति' 'अहकारौ शिवशक्ती शून्याकारौ परस्पराश्लिष्टौ । स्फुरणप्रकाशरूपावुपनिषदुक्तं परं ब्रह्म ॥' (वरि०२० २।६९) 'अहं'—'प्रकाश' + 'विमर्श' का सामरस्य ॥ 'स्पन्दकारिका' में—'स्वबल' 'आत्मबल' शब्दों का बार-बार प्रयोग किया गया है । यही बल 'मन्त्र' की आत्मा है जिसका स्पन्द० में अनेक बार प्रयोग किया गया है— १. अपित्वात्मबलस्पर्शात् पुरुषस्तत्समो भवेत् ॥ ८ ॥ (स्पन्द का०) २. स्वबलोद्योगभावितः (३६) (स्पन्दकारिका) । ३. 'तत्तथा बलमाक्रम्य' (३७) ४. स्वात्मन्यधिष्ठानात् (३९) ५. 'स्वयमेवावबोत्स्यते' (४३) (स्पन्द का०) । ६. तदाक्रम्य बलं मन्त्राः (२६) (स्पन्द का०) । 'स्वभाव' 'तदात्मतापत्ति' भी आत्मा के वाचक हैं— 'स्वभावादुपलब्धृतः' (इ) 'स्वभावमवलोकयन्' (११) (स्पन्द का०) ।