स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा
९२ स्पन्दकारिका जप के ५ अंग → (मन्त्रोच्चारण के समय—) जपांग— अवस्था ५ शून्य ६ विषुवत् ७ चक्रों का स्मरण ९ मन्त्रार्थचिन्तन मन्त्र और नाद—मूलाधार से उठने वाला 'नाद' मन्त्राक्षरों के मध्य माला में पिरोये सूत्र की भाँति होता है— आधारोत्थित नादो गुण इव परिभाति वर्णामध्यगतः (२।२२) मन्त्रजप के समय मन्त्र-विस्तार— प्रथमकूट = मूलाधार से आरब्ध प्रलयाग्निवतः क ए ई ल ह्रीं । द्वितीयकूट = अनाहत से आरब्ध एवं उसके आगे कोटिसूर्यवत्— ह स क ह ल ह्रीं । तृतीयकूट = आज्ञा चक्र से आरब्ध एवं ललाट के मध्य तक कोटिचन्द्र के समान— मन्त्र संस्क्रिया के १० भेद होते हैं—जनन, जीवन, ताडन, बोधन, अभिषेक विमलीकरण, तर्पण, दीपन, गुप्ति आदि । 'मन्त्र' और उसके विभिन्न अर्थ— १. मननत्राणधर्माणो 'मन्त्राः'। २. मननात् त्राणधर्मासौ मन्त्रोऽयं परिकीर्तितः । ३. चित्तं मन्त्रः । (शि०सू० ३।१) ४. संविद्देव्य मन्त्रः । (क्रमकेलि) ५. देव्येय मन्त्रः । (भूतिराज) ६. चिदग्निसंहार मरीचिमन्त्रः संविद्विकल्पान्गलपयन्नुदेति । (स्तोत्रभट्टारक) ७. वर्णात्मको न मन्त्रो दशभुजदेहो न पञ्चवदनोऽपि । संकल्पपूर्वकोटौ नादोल्लासो भवेन्मन्त्रः ॥' ८. नास्ति नादात् परो मन्त्रः । (राजभट्टारक) ९. मन्त्रः पदार्थांदियस्रंभात्मा परामर्शः । (महार्थमंजरी परिमल) १०. तद्विमर्शस्वभावा हि सा वाच्या मन्त्रदेवता । (महासंवित् समासत्रा) ११. प्रमातृभूमिगता मन्त्राः । (मतंग टीका) १२. मान्त्री शक्तिं मनसि महती देवतेत्याद्रियते । (संविदुल्लास) १३. 'अग्निरूपा मन्त्राः' 'मन्त्रा न मीमांस्या' । (रौरवागम) १४. सर्वे वर्णात्मकाः मन्त्राः । (तन्त्रसद्भाव) १५. मन्त्रा वर्णात्मका सर्वे । (सर्ववीर) १६. ते मन्त्रा वर्णरूपेण सबाह्याभ्यन्तरोदिताः । (संकर्षणसूत्र)
परिचय एवं पृष्ठभूमि ९३ १७. पशुभावे स्थिता मन्त्रा केवलं वर्णरूपिणः । सौषुम्णेध्वन्युच्चरिताः पतित्वं प्राप्नुवन्ति ते ।। (हंसपारमेश्वर) १८. बीजपिण्डादिकं सर्वं संविदः स्पन्दनात्मताम् । विदधत परसंवित्तावुपाय इति वर्णितम् ।। एकानुसंधान बलाज्जाते मन्त्रोदयेऽनिशम् । तन्मन्त्रदेवता यत्नात् तादात्म्येन प्रसीदति ।। —अभिनवगुप्त : तन्त्रालोक (७।२-५) 'मन्त्र' वीर्यवान् होते हैं । 'संवित्स्तोत्र' में इस 'मन्त्रवीर्य' के विषय में कहा गया है कि— आदिमान्तिगगृहीतवर्णराश्यात्मिकाहमिति या स्वतः प्रथा । मन्त्रवीर्यम् ।।' १९. त्रिकहृदय में कहा गया है—'अर्थस्य प्रतिपत्तिर्या ग्राह्यग्राहकरूपिणी । सा एव मन्त्रशक्तिस्तु वितता मन्त्रसन्ततौ ।।' २०. किंकरत्वं च गच्छन्ति मन्त्रा मन्त्राधिपैः सह । (त्रिकसार) २१. तन्त्रालोक—समस्त मन्त्र वीर्यबलोपेत हैं । २२. मन्त्र एवं मांत्रिक में अभेद आवश्यक है क्योंकि इस अभेदात्मकता के बिना मन्त्र कभी सिद्ध नहीं होते—पृथङ्मन्त्रः पृथङ्मन्त्री न सिद्ध्यति कदाचन । —'श्रीकण्ठीसंहिता' २३. उच्चार्यमाणा ये मन्त्रा न मन्त्राश्चापि तान् विदुः । २४. शक्तौ नियोजयेन्मन्त्र जपस्तु सफलीभवेत् ।। (तत्वरक्षाविधान) २५. 'विषुवत्कं जपं कुर्यात्' । २६. एकस्य मन्त्रनाथस्य अन्तर्बाह्योदितस्य च । यदैक्यं तं जपं विद्धि ।। (सुभगोदयवासनाः १४।६९) २७. उच्चार्यमाणा ये मन्त्रा न मन्त्राश्चापि तान्विदुः । मोहिता देवगंधर्वा मिथ्याज्ञानेन गर्विताः ।। (सर्वज्ञानोत्तर) २८. 'मन्त्र' शक्ति के बिना व्यर्थ हैं—'तन्त्रसद्भाव'— 'मन्त्राणां जीवभूता तु या स्मृता शक्तिरव्यया । तया हीना वरारोहे निष्फलाः शरदभ्रवत् ।।' २९. मन्त्र के तत्त्व—१. देवतत्त्व २. प्राणतत्त्व ३. बिन्दु तत्त्व ४. ज्ञान तत्त्व ५. शक्तितत्त्व ६. योगिनी तत्त्व (कामधेनु तन्त्र) ।। ३०. मन्त्र के स्थान—१. सकल २. निष्कल ३. सूक्ष्म ४. सकल निष्कल ५. कलाभिन्न ६. कलातीत । ३१. चैतन्यशून्य मन्त्र निरर्थक होते हैं— चैतन्यरहितं मन्त्रं यो जपेत् स च पापकृत् । मन्त्राश्चैतन्यसंहिताः सर्वसिद्धिकराः स्मृताः ।। (शाला० ९।१०३)
९४ स्पन्दकारिका मन्त्र—अपने तात्त्विक स्तर पर वर्ण या अक्षर नहीं है प्रत्युत् शक्ति की नादात्मक अभिव्यक्ति है । इसीलिए इन्हें शिवात्मक कहा गया है—‘मन्त्रावर्णात्मिका सर्वे वर्णा सर्वे शिवात्मकाः ।’ अर्थात् समस्त मन्त्र वर्णात्मक है किन्तु मन्त्रों के अवयव वर्ण स्वयं में शिवात्मक हैं । इस प्रकार समस्त मन्त्र भी शिवात्मक हैं । प्रणव रूप जो मूलमन्त्र है उसके १२ अवयव निम्नांकित हैं— अकारश्च उकारश्च मकारो बिन्दुरेव च । अर्धचन्द्रो निरोधी च नादो नादान्त एव च ॥ कौण्डली व्यापिनी शक्तिः समना श्रेति सामयाः । निष्कलं चात्मतत्त्वं च शक्तिश्चैव तथोन्मना ॥१ मन्त्रों का मूल स्रोत (योनि) ‘ज्ञानशक्ति’ है— ज्ञानशक्तिः परासूक्ष्मा मातृकां तां विदुर्बुधाः । सा योनिः सर्वमन्त्राणां सर्वत्रार णिवत्स्थिता ॥ यह ‘ज्ञानशक्ति’ मन्त्रों के अवयवभूत वर्णों का भी आत्मस्वरूप है—इसीलिए इसे ‘मातृका’ भी कहा गया है— ‘ततोऽष्टविधभेदेन पञ्चादशवर्णरूपिणी । (ज्ञानशक्तिः) परा सूक्ष्मा मातृका तां बिदुर्बुधाः ॥’२ परावाक् को परमेष्ठी परमशिव का परमन्त्रात्मक विमर्श स्वरूप ‘हृदय’ कहा गया है । ‘मन्त्र’ ही उसका हृदय है । विमर्श शक्ति के अतिरिक्त अन्य कोई ‘मन्त्र’ नहीं है और यही मन्त्र परमेष्ठी शिव का हृदय है—‘सा स्फुरत्ता महासत्ता देशकाला विशेषिणी । सैषा सारतया प्रोक्ता हृदयं परमेष्ठिनः ॥’३ मन्त्र का यथार्थ स्वरूप है—‘अहंविमर्श’ । उच्चतम भूमिकावस्थित विमर्शमय शब्द ‘परावाक्’ है । ‘मनु अवबोधने’ ‘तृ पालने’ धातु से मन्त्र शब्द निष्पन्न हुआ । ‘शिवसूत्रविमर्शिनी’ (२.१) में कहा गया है कि—विचित्रवर्णों के संघट्टन मात्र को ‘मन्त्र’ नहीं कहते प्रत्युत् मन्त्र के देवता का निरन्तर विमर्श करते रहने से प्राप्त साधक चित्त का अपने देवता के साथ जो तादात्म्यभाव है वही है ‘मन्त्र’—‘मन्त्रदेवताविमर्शपरत्वेन प्राप्ततत्सामरस्यम् आराधकचित्तमेव मन्त्रः न तु विचित्रवर्णसंघट्टनमात्रम् (शि०सू०वि०)। ‘ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी’ (१.५.१४) में मन्त्र को विमर्शनात्मा कहा गया है— ‘मन्त्रश्च विमर्शनात्मा’ विमर्शात्मक आत्मस्फुरण परममन्त्र है और इसका स्वस्वरूप है— ‘अहं परामर्श’ । यह ‘अहंविमर्श’ शुद्धाशुद्ध द्विविध प्रकारक है । ‘शुद्ध अहं विमर्श’ ही मन्त्र है क्योंकि मन्त्र आत्मा की चिद्रश्मि ही मन्त्र है—‘मन्त्राश्चिन्मरीचयः । विमर्श (आत्मस्पन्दन) ही प्रत्येक भाव का हृदय है और तद्रूप है ‘मन्त्र’ । शब्द, मन्त्र एवं ओंकार तत्वतः अभिन्न हैं । १-२. नेत्रतन्त्र । ३. ईश्वरप्रत्यभिज्ञा अ० ४ ।
परिचय एवं पृष्ठभूमि ९५ समस्त मन्त्रों की मूल एवं सर्वोच्चप्रकृति ॐकार है। अर्धमात्रादिक में जो प्रतिफलित चैतन्य है वही ‘मन्त्र’ है, प्रणव या मन्त्र के निम्न अवयव हैं—अकार, उकार, मकार, बिन्दु, अर्धचन्द्र, निरोधिका, नाद, नादान्त, शक्ति, व्यापिनी, समना एवं उन्मना। समग्र विश्व की उत्पत्ति शब्द द्वारा ही हुई है एवं समस्त विश्व शब्द में ही विधृत है। शब्दातीत परमपद का साक्षात्कार करने के लिए भी शब्द का आश्रय लेकर ही शब्द राज्य का भेदन करना पड़ता है। सृष्टि से बाहर जाने के लिए भी शब्द ही एक मात्र आलम्बन है। इसीलिए शब्द को पकड़कर शब्दातीत परब्रह्म पद में जाने का विधान किया गया है। प्रश्न—यदि ‘अहंविमर्श’ आत्मस्फुरण, ‘परावाक्’ चित् तत्त्व की मरीचि ही ‘मन्त्र’ है तब तो समस्त बैखरी वाक् भी आत्मस्फुरण, आत्मा, प्रत्यक् चैतन्य एवं परावाक् का विकास है। फिर सारे वर्ण ही मन्त्र पद वाच्य हैं। बैखरी वाक् भी आन्तर विमर्श का ही कार्य है अतः बैखरी के प्रत्येक वर्ण ‘मन्त्र’ हैं। समस्त वर्ण शिवरूप हैं, परस्वरूप हैं और शक्तिस्वरूप हैं ‘सर्वे वर्णात्मका मन्त्रास्ते च शक्त्यात्मकाः प्रिये’। मन्त्रों की आत्मभूता शक्ति होती है उसके बिना मन्त्र निरर्थक होते हैं—‘मन्त्राणां जीवभूता तु या स्मृता शक्तिरव्यया। तया हीना वरारोहे निष्कलाः शरदभ्रवत् ।। (तं० स०, शि० सू० २.१)। ‘स्वात्मरूपतया स्फुरणं भवति’ मन्त्र इसी आत्मस्फुरण का अपर पर्याय है। भट्टकल्लट ‘स्पन्दकारिकावृत्ति’ में कहते हैं कि स्पन्दतत्त्व नामक आत्मबल से तादात्म्य प्राप्त मन्त्र सर्वज्ञता आदि समस्त माहेश्वर बलों से युक्त हो जाते हैं—‘तत् बलं निरावरणचिद्रूपमधिष्ठाय मन्त्राः सर्वज्ञत्वादिन बलेन श्लाघायुक्ताः प्रवर्तन्ते अनुग्रहादौ स्वाधिकारे ।।’ ‘स्पन्दकारिका’ (सहज० २६) मे भी यही कहा गया है— ‘तदाक्रम्य बलं मन्त्राः सर्वज्ञबलशालिनः । प्रवर्तन्तेऽधिकाराय करणानीव देहिनाम् ।। २६ ।।’ ये मन्त्र शान्त (शुद्धसंवित्रूप) एवं निरञ्जन (मायिक दूषणों से रहित) होकर आराधकों के साथ-साथ चिदाकाश में ही लीन हो जाते हैं। अतः सारे मन्त्र शिवरूप (शिवधर्मा) हैं— ‘तत्रैव सम्प्रलीयन्ते शान्तरूपाः निरञ्जनाः । सहाराधकचित्तेन तेन ते शिवधर्मिणः ।।’ (२७) मन्त्र देवता विमर्श स्वभाव हैं—‘तद्विमर्शस्वभावा हि वाच्या मन्त्रदेवता ।’ ‘महा- संवित् सम्पन्ना’ ‘मन्त्र’ प्रमातृभूमिगत है—प्रमातृभूमिगता मन्त्राः ।। (मतंगटीका) ‘बौद्धायन संहिता’ नामक ग्रन्थ में कहा गया है कि ‘चन्द्रमा शान्त हो जाय और सूर्य का उदय भी न हो उस समय समस्त देवताओं (इन्द्रियों) का विलय और समस्त मन्त्रों का उदय होता है।’
९६ स्पन्दकारिका 'मालिनीविजय' में भी इसी मत की पुष्टि करते हुए कहा गया है कि 'जिस अवस्था में जीव अन्य आधारों से विनिर्मुक्त होकर स्वस्वरूप में लीन हो जाता है वही अवस्था मन्त्रों के उद्भव का स्थान है।' यह भी कहा गया है कि 'जब पुरुष का चित्त धर्माधर्म के संधिस्थल में निरुद्ध हो जाता है तब वह जो कुछ भी बोलता है वही 'मन्त्र' हो जाता है। स्वरवर्ण-मातृका से निर्मित मन्त्र ही मन्त्र नहीं होते ॥' १. रामकण्ठाचार्य ने तो 'स्पन्दकारिका विवृत्ति' (२ नि० १०-११) में मन्त्र को वर्ण-संनिवेश कहा है—'मन्त्रा आराध्यदेवतावाचका वर्णादिसंनिवेशः ॥' २. रामकण्ठ पुनः कहते हैं कि—यदि साधक का चित्त मन्त्रात्मक हो जाता है तो वर्णसंकल्प आदि स्वरूप धारण करके शिवशक्ति ही मन्त्र के रूप में उदित होती है— 'मन्त्रात्मकतया साधक चित्तात्मकतया च शिवशक्तिरेव वर्णसंकल्पादिरूपधारिणी उदिता ॥' क्योंकि मन्त्रचेता एवं शिव में अभेद स्थापित हो जाता है—'मन्त्रचेतसोः उदया- स्तमदशयोः परमकारणात् शिवाद्भेदः ॥' ३. 'कुलार्णव तन्त्र' में कहा गया है कि—'तत्त्वरूप', 'तेजस्वरूप' देवता का मनन करने से जो शक्ति समस्त भयों से मुक्त कर देती है उसे मन्त्र कहते हैं— 'मननात्तत्त्वरूपस्य देवस्यामिततेजसः । त्रायते सर्वभयस्तस्मान्मन्त्र इतीरितः ॥' 'यम भूतादि सर्वेभ्यो भयेभ्योऽपि कुलेश्वरि । त्रायते सततञ्चैव तस्मान्मन्त्र इतीरितः ॥' ४. जो मनन करने से त्राण करने वाले हैं वे 'मन्त्र' कहलाते हैं 'मननत्राणधर्माणो मन्त्राः' । ५. चित्तं मन्त्रः' (शिवसूत्रः ३।१) (मन्त्र का आध्यात्मिक स्वरूप) ६. संवित् तत्त्व ही मन्त्र हैं—संविद्देव्येय मन्त्रः (क्रमकेलि)। 'देव्ये मन्त्र'— भूतिराज । ७. चिदग्नि संहार मरीचिमन्त्रः संविद्विकल्पान् ग्लपयन्नुदेति (स्तोत्रभट्टारक) ८. वर्णात्मको न मन्त्रो दशभुजदेहो न पञ्चवदनोऽपि । संकल्पपूर्वकौटौ नादो- ल्लासो भवेन्मन्त्रः ॥ (स्तोत्रभट्टारक) ९. 'नास्ति नादात् परो मन्त्रः' । १०. मन्त्रः पदार्थादयसंरम्भात्मा परामर्शः ॥' (महार्थमंजरी परिमल) मन्त्र शक्ति एवं उसका स्वरूप—स्पन्दप्रदीपिकाकार का अभिमत— (क) मन्त्र में चार मुख्य तत्त्व होते हैं—१. 'बीज' २. 'पिण्ड' ३. 'पद' और ४. 'नाम' । (ख) मन्त्र का मुख्य धर्म है—१. मनन एवं २. त्राण ।
परिचय एवं पृष्ठभूमि ९७ (ग) मन्त्र का बल है—निरावरण चित् का उल्लास अर्थात् पराशक्ति का उल्लास। उसी शक्ति को लेकर 'मन्त्र' सहज नाद शक्ति से उद्बोधित होकर प्रदीप्त हो उठते हैं और उनमें सर्वज्ञता आदि का बल आ जाता है। जब सिद्धमन्त्री उनका प्रयोग करता है तब वे अनुग्रह एवं निग्रह करने में भी समर्थ हो जाते हैं। आत्मा के पर तत्त्व का अवबोध होने के कारण मन्त्रज्ञ इच्छामात्र द्वारा मन्त्रो का यथेष्ट प्रयोग कर सकता है। 'त्रिकसार' में इसी संदर्भ में कहा गया है कि—'वर्णातीत निराकार परम तत्त्व का अवबोध हो जाने पर 'मन्त्र' मन्त्राधियों के साथ ही मांत्रिक के किंकर हो जाते हैं।' चिच्छक्ति के बल का संस्पर्श न होने पर वे मन्त्र केवल वर्ण मात्रा (जडअक्षर) मात्र बनकर रह जाते हैं और कठपुतली के समान निष्फलचेष्ट रहते हैं। (घ) 'हंस पारमेश्वर' नामक ग्रन्थ में कहा गया है कि—केवल वर्णरूपमन्त्र 'पशु- भाव' में स्थित हैं जबकि सुषुम्नामार्ग से उच्चारित होने पर वे 'पशुपति' बन जाते हैं और इस प्रकार मन्त्र की दो अवस्थायें है—१. 'पशु अवस्था' २. 'पशुपति अवस्था'। (ङ) शाक्तमार्ग में ही मन्त्रों की सफलता है—मन्त्र का प्रयोग केवल शक्ति के संदर्भ में ही करना चाहिए क्योंकि वही जप सफल होता है। (च) 'श्रीवैहायसी' नामक ग्रन्थ में निर्देश दिया गया है कि—'सन्धिसथल में नादोर्ध्वध्वनि द्वारा बोधित जप करना चाहिए। जिस प्रकार सूत्र में मणि पिरोये रहते हैं उसी प्रकार शक्ति के ताने-बाने से निर्मित मन्त्राक्षरों का ही ध्यान करना चाहिए। वह शक्ति परम व्योम में निवास करती है और परमामृत से समृद्ध है। उक्त पद्धति से जप करने पर 'मन्त्र' अपना स्वस्वरूप उद्घाटित कर देता है और अपने ऊपर से आवरण हटा देता है। (छ) 'श्रीकालपरा' नामक ग्रन्थ में कहा गया है कि—शब्द नादात्मक हैं अतएव उनके साथ प्रत्यय, संवित् संलग्न रहता है और उनमें वृद्धि करता रहता है मन्त्र बोध के स्वरूप में स्थित जो संवित् है वह मन्त्र से अभिन्न है। अतः वह आत्म बोध भी करा देती है। (ज) 'संकर्षण सूत्र' में कहा गया है कि—'चिद्रूपता स्वात्मैकनिष्ठ है। भाव एवं अभाव उसकी दशाएँ एवं परिष्कार हैं। वह स्वसंवेदनसंवेद्य है। वह प्रकृति का विषय भी है और प्रकृति से अतीत भी है यही मन्त्रों का प्रत्ययात्मक कारण है। मन्त्र बाहर एवं भीतर वर्णरूप से प्रकट होते हैं। वे शाश्वत पदरूप मन्त्र मनुष्य के करचरणादिक के समान हैं। वीर्य का योग होने पर प्रत्येक काल में (प्रयोग करने पर) सिद्ध होते हैं। शुद्ध बोधात्मक रूप से अन्तर्बाह्य दोनों में उदित मन्त्र का एक बार भी 'जप' कर लिए जाने पर वह लक्ष बार किये गए जप के समान फल वाला हो जाता है। इसीलिए 'जपसंहिता' में कहा गया है कि—जब एक ही मन्त्रनाथ अन्तर एवं बाह्य दोनों में उदित होकर एक हो जाता है तब ऐसे जप को लक्षसंख्या से भी अधिक महनीय समझना चाहिए।। इन समस्त भावों एवं सिद्धान्तों को स्पन्दकारिकाकार मे इस प्रकार व्यक्त किया है— 'तदाक्रम्य बलं मन्त्राः सर्वज्ञबलशालिनः । प्रवर्तन्तेऽधिकाराय करणानीव देहिनः ॥' स्पं.भू. ६
९८ स्पन्दकारिका (झ) ये मन्त्र साधक चित्त की प्रवृत्ति-निवृत्ति के निमित्त (साधक की इच्छा होने पर) शक्ति स्वस्वभाव में लीन हो जाते हैं क्योंकि मन्त्र स्वस्वभाव के अनुगामी एवं शक्तिरूप हैं । 'कालपरा' नामक ग्रन्थ भी इसकी पुष्टि करता है । तदनुसार पर अक्षर रूप विटप में अनेक शक्तियाँ विद्यमान हैं । उनके विवर्त शक्ति के रूप में वर्णों के माध्यम से प्रकट होते हैं (वर्णों में प्रकट होते हैं) । ये शक्तियाँ कृतकृत्य होने के कारण शान्त एवं निरञ्जन (कालुष्यरहित) हैं । मन्त्र सर्वज्ञ एवं सर्वकर्ता हैं । मन्त्र शिवधर्मी हैं । आचार्य कल्लट ने 'स्पन्दकारिका' में इसकी पुष्टि की है— 'तत्रैव सम्प्रलीयन्ते शान्तरूपाः निरञ्जनाः । सहसाधकचित्तेन तेन ते शिवधर्मिणः ॥' (ञ) 'साधक के चित्त में मन्त्र लीन हो जाते हैं'—'तत्रैव सम्प्रलीयन्ते' कहने का तात्पर्य यह है कि आत्मा ही शिव है । यह आत्मा सर्वमय, सर्वात्मक विश्वरूप है क्योंकि यह बोद्धा है । संवित् ही मन्त्रात्मा है अतः मन्त्र शिवरूप है । स्पन्दप्रदीपिकाकार कहते हैं कि—१. मन्त्रों में स्पन्दात्मक बल स्वभाव से ही अन्तर्निहित है । अशुभविकल्प—स्वात्मशक्तियों का लोप या अज्ञान । २. आत्मबल की विस्मृति की अवस्था में मन्त्र वीर्यहीन हो जाते हैं । ३. स्वरूप की स्पन्दमयता का निरन्तर अनुसंधान करने से ही मन्त्र शक्ति की अनुभूति होती है । ४. आन्तर अनुसंधान में प्रगाढ़ता आने पर मन्त्रोच्चारण मात्र से अभीष्ट सिद्धियाँ प्राप्त हो जाती हैं । ५. मन्त्रशक्ति स्वात्मस्वरूप में ही स्फुरित होती है । ६. चित्त-नैर्मल्य—आन्तर अनुसंधान की शक्ति-प्राप्ति और निर्मल चित्त में ही स्वरूप का प्रकाश प्रतिबिम्बित । विकल्प संस्कार— भावशुद्धि, शुद्धविद्योदय, अशुभ विकल्पों का नाश, —मन्त्रशक्ति की अनुभूति । ७. समस्त वर्ण ही मन्त्र हैं और वे शक्त्यात्मक है—सर्वे वर्णात्मकाः मन्त्रास्ते च शक्त्यात्मकाः प्रिये (तं०स०) ८. मन्त्रों में एक शक्ति निहित होती है । जो मन्त्र शक्ति- रहित होते है वे निष्फल होते हैं—मन्त्राणां जीवभूता तु या स्मृता शक्तिरव्यया । तया हीना वरारोहे निष्फलाः शरदभ्रवत् ॥ ९. शक्ति मन्त्रवीर्यस्फार है—'शक्तिः मन्त्रवीर्यस्फाररूपा' (शिवसूत्र) मन्त्रशक्ति स्वात्मरूप में ही स्फुरित होती है । 'मन्त्र'— आत्मस्फुरण के अतिरिक्त अन्य कुछ नहीं है । आत्मस्पन्दन ही मन्त्र भी है । आत्मस्पन्दन या 'विमर्श' प्रत्येक भाव की आत्मा (हृदय) है—'हृदयं च नाम प्रतिष्ठा स्थानमुच्यते, तच्च उक्तनीत्या जडानां चेतनम्' तस्यापि प्रकाशात्मकम्, तस्यापि विमर्शशक्तिः इति विश्वस्य परमे पदे तिष्ठतो विश्रान्तस्य इदमेव हृदयं विमर्शरूपं परमन्त्रात्मकं यत्र यत्र अभिधीयते (ई०प्र०वि०) ।
स्पन्दकारिका
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॥ श्रीः ॥ ग्रन्थ खण्ड स्पन्दकारिका [१] स्पन्दकारिका का अध्यायीकरण [२] सूत्रों की अनुक्रमणिका [३] विशेष ध्यातव्य [४] प्रथम निष्यन्द—'स्वरूपस्पन्दनिष्यन्द' [५] द्वितीय निष्यन्द—'सहजविद्योदयनिष्यन्द' [६] तृतीय निष्यन्द—'विभूतिस्पन्दनिष्यन्द'
[१] स्पन्दकारिका का अध्यायीकरण १) आचार्य क्षेमराज के अनुसार 'स्पन्दनिर्णय' में— (क) प्रथम निष्यन्द : २५ कारिकायें : स्वरूपस्पन्द (ख) द्वितीय निष्यन्द : ७ कारिकायें : सहजविद्योदयस्पन्द (ग) तृतीय निष्यन्द : १९ कारिकायें : विभूतिस्पन्द (घ) चतुर्थ निष्यन्द : १ कारिका : अगाध... गुरुभारतीम् (१का०) २) आचार्य रामकण्ठ के अनुसार 'स्पन्दकारिकाविवृति' में— (क) प्रथम निष्यन्द : १६ कारिकायें : व्यतिरेकोपपत्तिनिर्देशनिष्यन्द (ख) द्वितीय निष्यन्द : ११ कारिकायें : व्यतिरिक्तस्वभावोपलब्धिनिष्यन्द (ग) तृतीय निष्यन्द : ३ कारिकायें : विश्वस्वभावशक्त्युपपत्तिनिष्यन्द (घ) चतुर्थ निष्यन्द : २१ कारिकायें : अभेदोपलब्धिनिष्यन्द (ङ) अन्त में : १ कारिका : अगाध ... गुरुभारतीम् ॥ ३) आचार्य उत्पलदेव के अनुसार 'स्पन्दप्रदीपिका' में— कारिकाओं का वर्गीकरण करके कारिकाओं को प्रस्तुत नहीं किया गया । ४) आचार्य वसुगुप्त के अनुसार 'शिवसूत्र' में— (क) प्रथम अध्याय : 'शांभवोपाय' : (साधना-पद्धति) ॥ (ख) द्वितीय अध्याय : 'शाक्तोपाय' : (साधना-पद्धति) ॥ (ग) तृतीय अध्याय : 'आणवोपाय' : (साधना-पद्धति) ॥ ५) आचार्य भट्टकल्लट के अनुसार 'स्पन्दकारिकावृत्ति' में— (क) प्रथम निष्यन्द : 'स्वरूपस्पन्द' : १-२५ कारिकायें : २५ का० (ख) द्वितीय निष्यन्द : 'सहजविद्योदय' : २६-३२ कारिकायें : ६ का० (ग) तृतीय निष्यन्द : 'विभूतिस्पन्द' : ३३-५२ कारिकायें : २० का० (प्रस्तुत ग्रन्थ में आचार्य भट्टकल्लट की 'स्पन्दकारिकावृत्ति' के द्वारा प्रस्तुत अध्यायीकरण को ही स्वीकार किया गया है ।)
[२] सूत्रों की अनुक्रमणिका संख्या सूत्रार्थ १. अगाधसंशयाम्भोधि समुत्तरणतारिणीम् ॥ २. अतस्तत्कृत्रिमं ज्ञेयं सौषुप्तपदवत्सदा ॥ ३. अतिक्रुद्धः प्रहृष्टो वा किं करोमीति वा मृशन् ॥ ४. अतो बिन्दुरतो नादोरूपमस्मादतो रसः ॥ ५. अतः सततमुद्युक्तः स्पन्दतत्त्वविविक्तये ॥ ६. अनेनाधिष्ठिते देहे यथा सर्वज्ञतादयः ॥ ७. अन्यथा तु स्वतन्त्रा स्यात्सृष्टिस्तद्धर्मकत्वतः ॥ ८. अप्रबुद्धधियस्त्वेते स्वस्थितिस्थगनोद्यताः ॥ ९. अयमेवोदयस्तस्य ध्येयस्य ध्यायिचेतसि ॥ १०. अवस्थायुगलञ्चात्र कार्यकर्तृत्वशब्दितम् ॥ ११. अहं सुखी च दुःखी च रक्तश्चेत्यादि संविदः ॥ १२. इति वा यस्य संवित्तिः क्रीडात्वेनाखिलं जगत् ॥ १३. इयमेवाप्राप्तिरयमेवात्मनो ग्रहः । १४. एक चिन्ता प्रसक्तस्य यतः स्यादपरोदयः ॥ १५. कार्योन्मुखः प्रयत्नो यः केवलं सोऽत्र लुप्यते ॥ १६. गुणादिस्पन्दनिष्यन्दाः सामान्यस्पन्द संश्रयात् ॥ १७. ग्लानिर्विलुम्पिका देहे तस्याश्चाज्ञानतः सृतिः ॥ १८. जाग्रदादि विभेदे तदभिन्ने प्रसर्पति । १९. तत्रैव संप्रलीयन्ते शान्तरूपा निरंजनाः ॥ २०. तथा यत्परमार्थेन यदा यत्र यथास्थितम् ॥ २१. तथा स्वप्नेऽप्यभीष्टार्थान् प्रणयस्यानतिक्रमात् ॥ २२. तदाक्रम्य बलं मन्त्राः सर्वज्ञबलशालिनः ॥ २३. तदा तस्मिन्महाव्योम्नि प्रलीनशशिभास्करे ॥ २४. तदास्याकृत्रिमो धर्मो ज्ञत्वकर्तृत्वलक्षणः । २५. तन्मात्रोदयरूपेण मनोऽहंबुद्धिवर्तिना ॥ २६. तमधिष्ठातृभावेन स्वभावमवलोकयन् ॥ २७. तस्योपलब्धिः सततं त्रिपदाव्यभिचारिणी ॥ २८. तामाश्रित्योर्ध्वमार्गेण सोमसूर्यावुभावपि ॥
४ स्पन्दकारिका २९. तेन शब्दार्थचिन्तासु न सावस्था न यः शिवः ॥ ३०. दिदृक्षयेव सर्वार्थान् यदा व्याप्यावतिष्ठते ॥ ३१. दुर्बलोऽपि तदाक्रम्य यतः कार्ये प्रवर्तते । ३२. न तु योऽन्तर्मुखो भावः सर्वज्ञत्वगुणास्पन्दम् ॥ ३३. न दुःखं न सुखं यत्र न ग्राह्यो ग्राहको न च ॥ ३४. न हीच्छादनोदनस्यायं प्रेरकत्वेन वर्तते ॥ ३५. नाभावो भाव्यतामेति न च तत्रास्त्यमूढता ॥ ३६. निजाशुद्ध्यासामर्थ्यस्य कर्तव्येष्वभिलाषिणः ॥ ३७. परामृतरसापायस्तस्य यः प्रत्ययोद्भवः ॥ ३८. प्रबुद्धः सर्वदा तिष्ठेत् ज्ञानेनालोच्य गोचरम् ॥ ३९. भुंक्ते परवशो भोगं तद्भावात्संसरत्यतः ॥ ४०. यत्र स्थितमिदं सर्वं कार्यं यस्माच्च निर्गतम् ॥ ४१. यतः करणवर्गोऽयं विमूढोऽमूढवत् स्वयम् ॥ ४२. यथा ह्यर्थोऽस्फुटो दृष्टः सावधानेऽपि चेतसि ॥ ४३. यथेच्छाभ्यर्थितो धाता जाग्रतोऽर्थान् हृदि स्थितान् ॥ ४४. यदा त्वेकत्र संरूढस्तदा तस्य लयोद्भवौ ॥ ४५. यस्मात्सर्वमयो जीवः सर्वभावसमुद्भवात् ॥ ४६. यस्योन्मेषनिमेषाभ्यां जगतः प्रलयोदयौ ॥ ४७. यामवस्थां समालम्ब्य यदयं मम वक्ष्यति ॥ ४८. लभते तत्प्रयत्नेन परीक्ष्यं तत्त्वमादरात् ॥ ४९. शब्दराशिसमुत्थस्य शक्तिवर्गस्य भोग्यताम् ॥ ५०. स्वरूपावरणे चास्य शक्तयः सततोत्थिताः ॥ ५१. सेयं क्रियात्मिका शक्तिः शिवस्य पशुवर्तिनी ॥ ५२. ज्ञानज्ञेयस्वरूपिण्या शक्त्या परमया युतः ॥
[३] विशेष ध्यातव्य
कतिपय ऐसी स्पन्दकारिकायें भी हैं जो कि भट्टकल्लट के 'स्पन्दसर्वस्व' में तो नहीं हैं किन्तु अन्य ग्रन्थों में हैं; यथा—
| कारिका | वह ग्रन्थ जिसमें यह कारिका उद्धृत की गई है— |
|---|---|
| १. 'लब्ध्वाप्यलभ्यमेतज्ज्ञानधनं, हृद्गुहान्तकृतनिहितेः ।<br>वसुगुप्तवच्छिवाय हि, भवति सदा सर्वलोकस्य ॥'<br>— 'स्वोपज्ञपरिमल' में उद्धृत ॥ | 'महार्थमंजरी' की 'स्वोपज्ञ<br>'परिमल' टीका श्लोक<br>क्रमाङ्क १ |
| २. वसुगुप्तादवाप्येदं गुरोस्तत्त्वार्थदर्शिनः ।<br>रहस्यं श्लोकयामास सम्यक् श्रीभट्टकल्लटः ॥<br>— 'स्पन्दप्रदीपिका' (का० ५३)<br>(यह कारिका 'स्पन्दकारिकाविवृति' में नहीं है ।)<br>उपर्युक्त कारिका (क्र० २) उत्पलाचार्य की टीका<br>'स्पन्दप्रदीपिका' में है, तो उनके परवर्ती ग्रन्थकार<br>रामकण्ठाचार्य की 'स्पन्दकारिकाविवृति' में भी होनी<br>चाहिए थी किन्तु वहाँ उल्लिखित नहीं है । | 'स्पन्दप्रदीपिका' में तो है<br>किन्तु 'स्पन्दसर्वस्व'<br>(कल्लट की टीका) में नहीं<br>है । 'स्पन्दसर्वस्व' में मात्र<br>५२ कारिकायें हैं । |
| ३. अन्तिम कारिका (विभिन्न टीकाओं में)—<br>(क) 'अगाधसंशयाम्भोधि समुत्तरणतारिणीम् ॥'<br>— 'स्पन्दसर्वस्व' (५२)<br>— 'स्पन्दकारिकाविवृति (५२)<br>(ख) 'वसुगुप्तादवाप्येदं गुरोस्तत्त्वार्थदर्शिनः'<br>— 'स्पन्दप्रदीपिका' (५३) | |
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[४] प्रथमो निष्यन्दः स्वरूपस्पन्दनिष्यन्दः ‘स्पन्दकारिका’ के प्रथम निष्यन्द का नाम ‘स्वरूपस्पन्द’ रखा गया है । प्रत्येक अध्याय के साथ ‘निष्यन्द’ शब्द का प्रयोग किया गया है यथा—‘प्रथमनिष्यन्द— ‘स्वरूपस्पन्द’ ‘द्वितीयनिष्यन्द’—‘सहजविद्योदयनिष्यन्द’ । ‘निस्यन्द’ या ‘निःष्यन्द’ (नि
- स्यन्द + घञ्, षत्व) का अर्थ है—चूना, टपकना, बहना, रस, बहाव या प्रवाह । निस्रव एवं निस्राव भी इसी के समानार्थक हैं । तुलना कीजिए : ‘शिवसूत्र’ एवं ‘स्पन्दसूत्र’— | (क) स्पन्दसूत्र—<br>(अध्यायीकरण) | (ख) शिवसूत्र—<br>(अध्यायीकरण) | | :--- | :--- | | १. स्वरूपस्पन्दः प्रथम ‘निःष्यन्द’ । | १. ‘शांभवोपाय’ = प्रथम ‘उन्मेष’ । | | २. सहजविद्योदयः द्वितीय ‘निःष्यन्द’। | २. ‘शाक्तोपाय’ = द्वितीय ‘उन्मेष’ । | | ३. विभूतिस्पन्दः तृतीय ‘निःष्यन्द’ । | ३. ‘आणवोपाय’ = तृतीय ‘उन्मेष’ । | ‘उन्मेष’ (उद्+मिष्+घञ्) (उद्+मिष्+ल्युट्) = ‘उन्मेषण’ ॥ अर्थ—आँख का खुलना, खिलना । स्फुरण । प्रकाश ॥ ‘उन्मिषित’ = खिला हुआ, खुला हुआ, दृष्टि, नजर, निगाह ॥ उन्मीलन = आँख खुलना ॥ (ग) योगशास्त्र : अध्यायीकरण—१. ‘समाधिपाद’ २. ‘साधनपाद’ ३. विभूति- पाद, ४. कैवल्यपाद । ‘स्पन्दशास्त्र’ में ‘उन्मेष’ का अर्थ— १. एकचिन्ताप्रसक्तस्य यतः स्यादपरोदयः । उन्मेषः स तु विज्ञेयः स्वयं तमुपलक्षयेत् ॥ ४१ ॥ (स्पन्दकारिका) २. ग्लानिर्विलुण्ठिका देहे तस्याश्चाज्ञानतः सृतिः । तदुन्मेष विलुप्तं चेत् कुतः सा स्यादहेतुका ॥ ४० ॥ (स्पन्दकारिका) ३. यस्योन्मेषनिमेषाभ्यां जगतः प्रलयोदयौ ॥ १ ॥ ‘स्पन्द’ का अर्थ— १. अतिक्रुद्धः प्रहृष्टो वा किं करोमीति वा मृशन् । धावन्वा यत् पदं गच्छेत्तत्र स्पन्दः प्रतिष्ठितः ॥ २२ ॥
प्रथमः निष्यन्दः ७ २. 'गुणादिस्पन्दनिष्यन्दाः सामान्यस्पन्दसंश्रयात् । (१९) (स्पन्द०) ३. 'अतः सततमुद्युक्तः स्पन्दतत्त्वविविक्तये । जाग्रदेव निजं भावमचिरेणाधिगच्छति ।। २१ ।। (स्पन्द०) 'स्पन्द के निष्यन्द'— रामकण्ठाचार्य = 'उन्मेष-निमेष' = 'शक्तिप्रसर प्रलय' । रामकण्ठाचार्य का तर्क—भगवान् शंकर तो नित्य हैं, 'अव्यभिचरदेकस्वभाव' एवं 'एकमात्र पदार्थ' एवं परमार्थ पदार्थ हैं फिर उनके साथ अनित्य निमेषोन्मेष नामक परस्पर विरुद्ध अवस्थाद्वय का संबंध कैसे दिखाया गया ? यह हो सकता है कि—'कर्तृ- प्रथया हि अनया एवं प्रतिपाद्यते शंकर उन्मिषति निमिषन्ति इति ।।' (रामकण्ठ) किन्तु— नित्य भगवान् में 'अनित्यावस्था योगित्वं' अनुपपन्न है। फिर 'यस्योन्मेषनिमेषाभ्यां' क्यों कहा गया ? (रामकण्ठाचार्य) ।। पूर्वपक्ष के उपरान्त रामकण्ठ उत्तरपक्ष में कहते हैं कि—(१) 'उन्मेष' एवं 'निमेष' दोनों शब्द शांकरी इच्छा के द्योतक हैं और यह 'इच्छा' उनका स्वरूपभूत नित्य धर्म है—१. 'उन्मेष-निमेषशब्दाभ्यां तदुपचरितवृत्तिभ्याम् इच्छामात्रमेकं शंकर संबंधि प्रति- पाद्यते । स च तस्य नित्यो धर्मः स्वभावभूतः । २. उन्मेष-निमेष का द्वित्व मात्र उपचारवश है—'तस्य उन्मेष-निमेषशब्दवाच्यत्वं द्वित्वं च उपचारात् ।' इच्छाशक्ति या परमात्मा की संकल्प शक्ति को व्यक्त करने के लिए 'उन्मेष' एवं 'निमेष' दो शब्द का प्रयोग औपचारिक मात्र है क्योंकि ये दोनों शब्द परमात्मा के संकल्प या इच्छामात्र के द्योतक हैं—संकल्पात्मक गतिमयता या इच्छा ही दोनों का अर्थ है—इससे पृथक् कुछ नहीं है ।१ इच्छा सृष्टिवाद— तर्क यह है कि जगत् पारमेश्वरी मायाशक्ति के द्वारा उद्भावित होने के कारण (कार्य होने के कारण, अनित्य होने के कारण) अनित्यात्मक प्रलयोदय से तो प्रभावित होते ही हैं अतः निमेषोन्मेष तो होंगे ही किन्तु ये ईश्वरेच्छाप्रसूत मात्र ही हैं— 'निमेषोन्मेषौ वस्तुतः संभवतः । तौ च ईश्वरेच्छामात्रनिमित्तकौ ।' अतः—'उन्मेष' उदयात्मक होने के कारण यह ईश्वरेच्छा मात्र का ही द्योतक है—'उदयात्मकोन्मेषहेतु- त्वात् ईश्वरेच्छैव उन्मेष शब्देन ।' इसी प्रकार 'निमेष' शब्द प्रलयवाचक है । प्रलयवाची 'निमेष' भी इसी ईश्वरेच्छा का औपचारिक अर्थ द्योतित करता है जिस प्रकार कि आयु- प्रदायक घृत भी आयु कहा जाता है ।२ उन्मेष-निमेष भी शंकर की अव्यतिरिक्ता शक्ति हैं—'सा च अव्यतिरिक्ता शंकरस्य शक्तिः ।' उसका ज्ञान आत्मैश्वर्यप्रत्यभिज्ञालक्षण की सिद्धि का प्रतिपादक है । परमात्मा के अवगमार्थ ही 'इच्छा' शब्द को भी प्रयुक्त किया गया है । जिस प्रकार पुरुष १ - २. स्पन्दकारिकाविवृति ।
८ स्पन्दकारिका की इच्छावस्था में इष्यमाण पदार्थ उसके स्वरूप से व्यतिरिक्त नहीं होता उसी प्रकार ‘अनन्तावभासात्मक एवं अनन्तवैचित्र्यात्मक जगत् भगवान् की शक्ति से रंचमात्र भी व्यतिरिक्त नहीं है—१ ‘भगवतः शक्तौ अनन्तावभासविशेषचित्रं जगत् मनागपि । अनुपजातविशेषात् स्वरूपात् अव्यतिरेकेणैव अवतिष्ठते ॥' यह नश्वर नहीं शिवदशा है इसीलिए इसकी स्तुति की गई है—‘सेयं परमार्थ सती शिवदशा'— सदा सृष्टि विनोदाय सदा स्थितिसुखासिने । सदा त्रिभुवनाहारतृप्ताय स्वामिने नमः ॥ ईश्वरप्रत्यभिज्ञा में भी कहा गया है— सा चैषा प्रतिभा तत्तत्पदार्थक्रमरूपिता । अक्रमानन्तचिद्रूपः प्रमाता स महेश्वरः ॥ परमात्मा की मात्र एक ही शक्ति है किन्तु उसके लिए—इच्छा ज्ञान क्रिया रूप में भिन्न-भिन्न प्रयोग किया जाता है—‘एकस्या एव पारमेश्वर्याः शक्तेः इच्छा-ज्ञान-क्रिया व्यपदेशः और उसे मायावश इदन्तोन्मिषित रूप में देखा जाता है । इसी प्रकार एक ही शिवतत्त्व में सदाशिवादि तत्त्वान्त अनेक व्यपदेश हुए हैं । इसीलिए पारमेश्वरी शक्ति स्वलीलोल्लासित जगत् की दो अवस्थाओं में वर्तमानता के कारण, दो प्रकार भी कही गई है । ‘यस्योन्मेषनिमेषाभ्यां जगतः प्रलयोदयौ' का अर्थ यह होगा—‘यस्य इच्छामात्रेण जगतः प्रलयोदयौ तं स्तुमः ॥' संकल्पसृष्टिवाद— उन्मेष-निमेष दो शब्द अवश्य प्रयुक्त हुए हैं किन्तु दोनों का अर्थ एक है—इसका अर्थ है—‘परमेश्वरेच्छा' उन्मेषेण उदयो, निमेषेण प्रलयः—इति तु अर्थसंख्या समवैति । इच्छामात्रम् उन्मेषनिमेषौ ॥ इसीलिए तो भट्टकल्लट ने 'उन्मेषनिमेष' की व्याख्या 'संकल्प' शब्द से की है—‘संकल्पमात्रेण' (भट्टकल्लट) ।२ आचार्य रामकण्ठ यह भी कहते हैं कि—१. जिन व्याख्याकारों ने यथासंख्य समर्थनानुरोध के कारण जिसके 'उन्मेष' में क्रियाशक्ति के प्रतिसंहार के कारण स्वरूप विकास में जगत् के प्रलय को विनाश के रूप में तथा २. 'निमेष' में क्रियाशक्ति के प्रसृत होने से स्वरूपसंकोच रूप में जगत् का उदय या उद्भव स्वीकार किया है और जो उन्मेष निमेष को शंकर का पारमार्थिक धर्म प्रतिपादित करते हैं उनकी व्याख्या काल्पनिक है और उन्होंने इस दर्शन को ठीक से हृदयंगम नहीं किया हैं—‘ते च काल्पनिकमेव अर्थ- परमार्थत्वेन प्रतिपद्यमानाः तथा दर्शनस्य अस्य अन्तरं नमु प्रविष्टाः । इति नमस्तेभ्यः ॥'३ अनेकात्मकता एवं एकात्मकता में सामरस्य—नित्याव्यभिचरदेकस्वभाव भगवान् की शक्ति भी इसी प्रकार एक है और परमात्मा से अभिन्न है । फिर ‘शक्तिचक्र' की बात १-३. स्पन्दकारिकाविवृति ।
प्रथमः निष्यन्दः ९ क्यों कही गई ? वस्तुतः इसके द्वारा ईश्वर के निरतिशय ऐश्वर्य को द्योतित किया गया है। जो समस्त अनन्तरूपात्मक जगत् को 'अहं' के रूप में एकात्मक एवं अहमात्मक मानता है वह ईश्वर अपने एकात्मक नित्य स्वभाव एवं स्वरूपपरामर्श से अव्यभिचरित रहता हुआ भी 'निरवधि-विजृंभमाण विचित्रावभास खचित त्रैलोक्यालेख्य' को 'इदम्' के रूप में उल्लिखित करके भी परमार्थतः अपने परामृश्यमान एकात्मक स्वस्वरूप से यत्किंचित् भी भिन्न नहीं हो पाता। कहा भी गया है— 'लिखते जगतत्रितयचित्रमद्भुतं, प्रतिमा परिस्फुरितशंसि ते नमः । सुसितैकसूक्ष्मनिजशक्तिवर्तिका, रचितावभास शतशोभि शंभवे ॥ परमेश्वरता जयत्यपूर्वा, तव सर्वेश यदीशितव्यशून्या । अपरापि तथैव ते ययेदं, जगदाभाति यथा तथा न भाति ॥'१ सुप्रबुद्ध महात्माओं ने इस प्रकार के शांकर ऐश्वर्य को अनुग्रह स्वीकार किया है। चित् एवं अचित् के रूप में जो जगत् को द्विविध स्वीकार किया गया है, वह मात्र मायावश है किन्तु वे परमेश्वर की स्वरूपशक्ति से अभिन्न हैं। जडचेतन अभेदवाद— 'शंकरस्य पारमैश्वर्ये या इमाः परमाद्भुतमायाशक्तिवशात् चिदचिद्भेदेन द्विविधा अपि अपर्यन्ताभावव्यक्तयः सा परमेश्वरस्य स्वरूपात् अभिन्ना शक्तिरेकैव तात्त्विकी ॥'२ शक्तिशक्तिमान में अभेदात्मकता—'शक्तीनां चक्रं' कहकर परमात्मा की अनेक शक्तियों की बात नहीं कही गई है क्योंकि परमात्मा की मुख्य शक्ति—'स्वातन्त्र्यशक्ति' तो एक ही है। 'इदम्' रूप में परामर्शभेद होने के कारण ही एक ही शक्ति नाना- नामरूपात्मक रूप में अवभासित होकर 'शक्तीनां चक्रम्' कहकर बहुत्व रूप में व्यपदिष्ट हुई है किन्तु परमार्थतः शक्ति केवल एक है। शक्ति एवं शक्तिमान में अभिन्नता दिखाने हेतु ही 'शक्ति' शब्द का पृथक् प्रयोग किया गया है। यह ईश्वर का 'विभव' (ऐश्वर्य) है। वस्तुतः दोनों एवं विश्व (नानात्मक भेद) एकात्मक हैं—दो पदार्थ हैं फिर भी एक हैं— शक्तिश्च शक्तिमांश्चैव पदार्थद्वयमुच्यते । शक्तयोऽस्य जगत्कृत्स्नं शक्तिमांश्च महेश्वरः ॥३ 'शक्तिचक्रविभवप्रभवं' में 'प्रभव' उत्पत्तिकारण का सूचक है इसके 'स्वशक्ति- भूतविभव का प्रभव' सूचित करता है कि सारे वैभव कहीं अन्यत्र (परमात्मा से भिन्न) से नहीं आए और न तो वे स्वरूपव्यतिरिक्त ही हैं। 'यस्य' शब्द शंकर के जगतकारणत्व का प्रतिपादक है। १-३. स्पन्दकारिकाविवृति ।
१० स्पन्दकारिका 'शंकर' शब्द = श्रेयकर्ता का द्योतक है। 'प्रलयोदयौ' = विनाश प्रादुर्भाव के द्योतक हैं। 'उन्मेषनिमेष'—शक्ति के प्रसार एवं प्रलय के द्योतक हैं। 'चक्र' = समूह। 'प्रभव' = कारण के द्योतक हैं। शक्तिचक्रात्मकस्वैश्वर्यभूत जगत् का प्रभव 'इदम्' का प्रत्यायक होते हुए भी 'अहं' से पृथक् नहीं है। वृत्तिकार भट्टकल्लट ने 'विज्ञानदेहात्मकस्य शक्तिचक्रैश्वर्यस्य उत्पत्तिहेतुत्वम्' व्याख्या की है। 'विज्ञानदेहो' = विशुद्ध संविन्मात्रमूर्ति महेश्वर। वही 'आत्मा' है—अर्थात् यही उसका स्वभाव है। 'शक्तिचक्रात्मन ऐश्वर्यस्य'—यही इसका अर्थ है। सर्वात्मवाद— शंकर = आत्मा ॥ 'शंकर शब्देन इह प्रतिपादितः। स च आत्मैव नान्यः ॥ वृत्तिकार भी कहते हैं—'अनेन स्वस्वभावस्यैव शिवात्मकस्य' ॥ 'स्वस्य' = आत्मा के। 'स्व' = आत्मीय भाव। 'भाव' = स्वरूप, स्वस्वभाव ॥ सारांश—१. इच्छासृष्टिवाद २. इच्छाप्रलयवाद ३. नानात्व में एकत्व— रामकण्ठ कहते हैं— (क) 'परमेश्वरः इच्छामात्रेण जगतः प्रलयोदयौ विदधाति। (ख) 'लब्धस्थितिकमपि जगत् तच्छक्तिविभूतिरेकैव माया वशात् तु नानात्वेन अवभासते ॥' (ग) 'इदमेव अर्थद्वयम् अत्र प्रकरणे विस्तार्यते।' आचार्य रामकण्ठ कहते हैं कि 'स्पन्दकारिका' के चारों निष्यन्द इसी प्रथम श्लोक के स्पन्दसिद्धान्त में आसूत्रित हैं। सारांश यह कि—(क) परमात्मा माया के कारण (स्वरूपप्रत्यवमर्श के अनुल्लास के कारण) वेद्य देहादिक से अव्यतिरिक्त प्रतिभासमान आत्मा का व्यतिरेक प्रदर्शित किया गया है। इस ग्रन्थ की सिद्धान्तता—(ख) इसके अनन्तर, वेदक के द्वारा ही वेद्य का अस्तित्व होने का भान होने से वेदक एवं वेद्य में एवं उन दोनों का शक्ति से अव्यतिरिक्तत्व सिद्ध होता है।—ये दो अर्थ हैं जिनका चारों निष्यन्दों में प्रतिपादन किया गया है। यही इसका सिद्धान्त (सिद्ध का अन्त = सिद्ध की निष्ठा, निश्चय) है। इसकी यह भी सिद्धान्तता संभव है कि—१. 'ज्ञान' २. 'क्रिया' ३. 'योग' एवं ४. 'चर्या' रूप चतुष्टयपूर्ण यह स्पन्दविज्ञान ही साफल्य-प्रापक है। 'शंकरं स्तुमः' का प्रयोग इस ग्रन्थ की निर्विघ्न समाप्ति को उद्देश्य में रखकर भी किया गया है। 'शंकरं स्तुमः' में 'शंकर' शब्द का अर्थ— (क) उपायलक्षण—श्रेयस्कर स्पन्दशास्त्र। (ख) उपेयलक्षण—आत्मैश्वर्य प्रत्यभिज्ञा। 'शम्' (शंकर = शम्कारक) का अर्थ है। शंकर = परमेश्वर, श्रेयकर्ता ईश्वर ॥
प्रथमः निष्यन्दः ११ १. संबंध—ईश्वर एवं शास्त्र का कर्तृकार्यलक्षण संबंध है। शास्त्राभिधेय प्रतिपाद्य- प्रतिपादकभावलक्षण ही संबंध है। 'स्तुमः' = स्तवन करते हैं। उपादेय वस्तुस्वरूप का प्रतिपादन ही स्तुति का अर्थ है। २. प्रयोजन क्या है? 'प्रयोजनं च आत्मैश्वर्य प्रत्यभिज्ञात्मक शंकर पदादेव अवसीयते ।।' अभिधेय-प्रयोजन में उपायोपेयभावलक्षणरूप संबंध है। इस शास्त्र का अभिधान है—'स्पन्द' क्योंकि स्पन्दका० में 'स्पन्दतत्त्वविविक्तये' (१ नि० २१ का० २ पा०) कहा गया है। स्पन्द का अर्थ क्या है?—'स्पन्द' का क्या अर्थ है? 'स्वस्वभावपरामर्शमात्र, नित्य, शून्यताव्यतिरेचनकारणभूत, तावन्मात्रसंरभात्मा 'शक्ति' नामवाली पारमेश्वरधर्म का किंचिच्चलन ही 'स्पन्द' कहलाता है—'स्पन्दशब्दश्च अयं स्वस्वभाव परामर्शमात्रस्य, नित्यस्य, शून्यताव्यतिरेचनकारणभूतस्य, तावन्मात्रसंरंभात्मनः शक्त्यपराभिधानस्य पारमे- श्वरस्य धर्मस्य किंचिच्चलनात् 'स्पन्द' इति अर्थानुगमात् वाचकत्वेन व्यपदिष्टः ।।' 'स्पन्द' शास्त्र नाम क्यों पड़ा?—इसी स्पन्द तत्त्व के प्रतिपादन के कारण इस शास्त्र का नाम 'स्पन्द' शब्द द्वारा व्यपदिष्ट है 'तत्प्रतिपादनहेतुत्वात् शास्त्रमपि इदं स्पन्द- शब्देन अभिधीयते ।।' स्पन्दशास्त्र का विषय क्या है?—यहाँ स्पन्दशास्त्र का विषय क्या है? 'विशुद्ध- श्रद्धा भक्ति प्रकर्ष पिशुनित परमेश्वर-परशक्तिपात-प्रोन्मील्यमानस्वभावालोक तिरस्कृत सकलसंदेहान्धकारत्वात् प्रबुद्धः सम्यगुपनत दीक्षादिसंस्कारो गुरुवचनचोदनामात्रावशेष- स्वात्मैश्वर्योपलब्धिः'—यहाँ 'विषय' शब्द अधिकारी के अर्थ में प्रयुक्त किया गया है न कि प्रतिपाद्यविषय के अर्थ में। 'शंकर ही हमारी आत्मा है'—'स कथं शंकरो ममैव आत्मा ?' इसका उत्तर द्वितीय कारिका में दिया गया है। स्पन्दशास्त्र के ज्ञान का पात्र कौन है?—स्पन्दशास्त्र के उपदेश का पात्र कोई विरला विवेकी व्यक्ति ही संभव है— 'किंत्वेतेऽद्य विवेकिनः कतिपये सन्त्यत्र पात्रं सताम्' ।। (रामकण्ठ)। 'स्पन्द' शाक्ततत्त्व है जो कि शंभु का स्वभावभूत आत्मधर्म है— 'निजो धर्मः शंभोरनुपमचमत्कार सरसः । परं शाक्तं तत्त्वं जगति जयति स्पन्द इति तत् ।। (रामकण्ठ)। 'स्वरूपस्पन्द' शब्द की सोद्देश्यता—प्रथम निष्यन्द को 'स्वरूप स्पन्द' क्यों कहा गया? कारण निम्नांकित हैं—१. 'स्पन्दकारिका' शिवसूत्र की ही व्याख्या होने के कारण शिवसूत्र के मुख्य प्रतिपाद्य विषय ('आत्मा') की ही प्रतिपादक होनी चाहिए क्योंकि तभी इसका उद्देश्य पूर्ण हो सकता है। २. 'स्पन्दकारिका' सर्वात्मवाद, सर्व- स्पन्दवाद, सर्वशिववाद एवं सर्वशक्तिवाद का पोषक होने के कारण भी 'स्वरूप' (आत्मा या शिव या चैतन्य) का प्रधानतया प्रतिपादन करता है। ३. स्पन्दशास्त्र मुख्यतः 'शक्ति' को प्राधान्य देता है—'स्पन्द' को प्रामुख्य प्रदान करता है और 'स्पन्द' स्वातंत्र्य शक्ति