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श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished696 पृष्ठ

( ५८० ) “वे प्राणों के प्राण, नेत्रों के नेत्र, श्रोत्रों के श्रोत्र, अन्नों के अन्न और मनों के मन कहे जाते हैं” इस वाक्यांश में कहे गए, ब्रह्माश्चित प्राण आदि ही उक्त वाक्य में पांच संख्यावाले तत्त्व ज्ञात होते हैं । अथ स्यात् काण्वानां माध्यन्दिनानां च “यस्मिन् पंच पंच- जनाः” इत्ययं मंत्रः समानः । “प्राणस्य प्राणः” इत्यादि वाक्यशेषे काण्वानामन्नस्य पाठो न विद्यते । तेषां पंच पंचजनाः प्राणादय इति न शक्यते वक्तुम्–इति, तत्रोत्तरम् । आपकी बात ही ठीक हो सकती है, पर काण्व और माध्यन्दिन दोनों शाखाओं में “पंच पंचजनाः” इत्यादि मंत्र समान रूप से मिलता है, किंतु “प्राणस्य प्राणः” इत्यादि काण्व शाखीय वाक्यशेष में अन्न पाठ नहीं है, इसलिए उसमें तो प्राणादि को पांच तत्त्व कह नहीं सकते । इसका उत्तर देते हैं— ज्योतिषैकेषामसत्यन्ने ॥१।४।१३॥ एकेषां काण्वानां पाठे असत्यन्ने ज्योतिषः पंचजनाः इंद्रिया- णीति ज्ञायंते, तेषां वाक्यशेषः प्रदर्शनार्थः । एतदुक्तं भवति- “यस्मिन् पंच पंचजनाः” इत्यस्मात्पूर्वस्मिन् मंत्रे “तं देवा ज्योतिषां ज्योतिरायुर्होपासतेऽमृतम्” इति ज्योतिषां ज्योतिष्ट्वे ब्रह्मएयभि- धीयमाने ब्रह्माधीनस्वकार्याणि कानिचित् ज्योतींषि प्रतिपन्नानि, तानि च विषयाणां प्रकाशकानीन्द्रियाणीति । “यस्मिन् पंच पंचजना” इत्यनिर्धारितविशेषनिर्देशेनावगम्यंते इति । “प्राणस्य” इति प्राण शब्देन स्पर्शनेन्द्रियं गृह्यते, वायुसंबंधित्वात् स्पर्शनेन्द्रियस्य मुख्य प्राणस्य ज्योतिः शब्देन प्रदर्शनायोगात् । चक्षुष इति चक्षुरिन्द्रियम्, श्रोत्रस्येति श्रोत्रे न्द्रियम्, अन्नस्येति घ्राणरसनयोस्तंत्रे णोपादानम्, अन्न शब्दोदित पृथिवी संबंधित्वात् घ्राणेंद्रियमनेन गृह्यते । अद्यते अनेनेत्यन्नम् इति रसनेन्द्रियमपि गृह्यते । मनस इति मनः । ankurnagpal108@gmail.com

( ५८१ ) घ्राणरसनयोस्तन्त्रेणोपादानमिति पंचत्वमप्यविरुद्धम् । प्रकाशकानि मनः पर्यन्तानीन्द्रियाणि पंचजनशब्दनिर्दिष्टानि तदविरोघाय घ्राणरसनयोस्तन्त्रेणोपादानम् । तदेवम्–“यस्मिन् पंच पंचजना आकाशश्च प्रतिष्ठितः” इति पंचजन शब्दनिर्दिष्टानि इन्द्रियाणि आकाश शब्द प्रदर्शितानि महाभूतानि च ब्रह्मणि प्रतिष्ठितानीति सर्वतत्त्वानां ब्रह्माश्चयत्व प्रतिपादनात् न तंत्रसिद्ध पंचविंशति तत्त्व प्रसंगः । अतः सर्वत्र वेदांते संख्योपसंग्रहे तदभावे वा न कापिल- तंत्रसिद्ध तत्त्वप्रतीतिः, इति स्थितम् । काण्व शाखीय पाठ में अन्न शब्द के न होते हुए भी, ज्योति शब्द के निर्देश से इन्द्रियों की ही “पंचजन” शब्द से प्रतीति होती है । उक्त अर्थ के प्रकाशन के लिए ही वाक्य के शेष में “पंचजन” शब्द का प्रयोग किया गया है । कथन यह है कि—“पंच पंचजनाः” वाक्य के पूर्ववर्त्ती “तं देवा ज्योतिषां ज्योतिः” इत्यादि वाक्य में, ज्योतियों के प्रकाशक के रूप में ब्रह्म का निरूपण किया गया है । उन ज्योतियों का अपना अपना प्रकाशन कार्य ब्रह्म के ही अधीन है । ‘यस्मिन् पंच’ इत्यादि में जो विशेष निर्देश किया गया है उससे, विषयों की प्रकाशक पांच इन्द्रियों का ही बोध होता है । “प्राणस्य” पद में कहे गए प्राण शब्द से स्पर्शनेंद्रिय का ग्रहण होता है, इस इन्द्रिय का वायु के साथ संबंध है । ज्योति शब्द का मुख्य प्राण से तो ग्रहण किया जा नहीं सकता । “चक्षुषः” से चक्षु- रिन्द्रिय, “श्रोत्रस्य’ से श्रोत्रेन्द्रिय का निर्देश किया गया है । “अन्नस्य” से घ्राण और रसन दोनों इन्द्रियों का निर्देश किया गया है । अन्न का अर्थ है पृथ्वी, घ्राणेंद्रिय का पृथ्वी से संबंध है, क्योंकि यह इन्द्रिय गंध- गुणवाली पृथ्वी से ही प्रकट हुई है । “अद्यते अनेन इति अन्नम्” इस व्याख्या के अनुसार, रसनेन्द्रिय भी अन्न शब्दवाची हो सकती है । “मनसः” शब्द से मन का निर्देश है । घ्राण और रसन के एक साथ निर्देश होने पर भी, पांच संख्या में कोई अन्तर नहीं आता । प्रकाश स्वभाव वाली मनपर्यन्त इन्द्रियाँ ही “पंचजन” शब्द से निर्दिष्ट हैं, संख्या विषयक विरोध के परिहार के लिए ही घ्राण और रसन दोनों ankurnagpal108@gmail.com

( ५८२ ) का एक साथ निर्देश किया गया है । "पंच पंचजनाः" इत्यादि का तात्पर्य है कि--पंचशब्द निर्दिष्ट पांच इन्द्रियाँ और आकाश शब्द निर्दिष्ट आकाशादि पंच महाभूत, ब्रह्म में अधिष्ठित है। इस प्रकार समस्त तत्त्वो के ब्रह्माश्रयत्व प्रतिपादन से ही यह निश्चित हो जाता है कि सांख्य तंत्र सिद्ध तत्त्वो की उक्त मंत्र में चर्चा नहीं है। संख्या का ग्रहण हो न हो, वेदांत वाक्यों में कहीं भी, कपिल तंत्र सिद्ध तत्त्वों की प्रतीति ही नही होती, यह निश्चित है। ४ कारणत्वाधिकरण :— कारणत्वेन चाकाशादिषु यथाव्यपदिष्टोक्तेः १।४।१४॥ पुनः प्रधान कारणवादी प्रत्यवतिष्ठते–न वेदांतेषु एकस्मात् सृष्टिराम्नायत इति, जगतो ब्रह्मैककारणत्वं न युज्यते इति । कथम् ? तथाहि–“सदेव सोम्येदमग्र आसीत्” इति सत्पूर्विका सृष्टिराम्नायते, “असद् वा इदमग्र आसीत्” इत्यसत् पूर्विका च, अन्यत्र “असदेवेदमग्र आसीत्तत्सदासीत्तत्समभवत्” इति च । अतो वेदांतेषु स्रष्टुरव्यवस्थितेर्जगतो ब्रह्मैककारणत्वं न निश्चेतुं शक्यम्, प्रत्युत प्रधानकारणत्वमेव निश्चेतुं शक्यते । प्रधान-कारणवादी पुनः सामने आते हैं, वे कहते हैं कि वेदांत वाक्यों में केवल एक से ही सृष्टि नहीं बतलाई गई है, इसलिए जगत का कारण एक मात्र ब्रह्म ही है, ऐसा कहना उपयुक्त नहीं है। देखें—"पहिले यह जगत् सत् स्वरूप ही था" इसमे सत्पूर्विका सृष्टि तथा—"पहिले यह जगत असद् रूप ही था" इसमें असत्पूर्विका सृष्टि का वर्णन मिलता है तथा "यह जगत् पहिले असत् ही था, वही सत् था, वही संभूत हुआ" ऐसा उभयात्मक भी वर्णन मिलता है। इस प्रकार वेदांत वाक्यों में सृष्टिकर्त्ता के विषय में जो अव्यवस्थित वर्णन मिलता है, उससे एकमात्र ब्रह्म को ही जगत् की सृष्टि का निश्चित कारण नहीं कह सकते, अपितु प्रधान को ही निश्चित रूप से जगत का कारण कह सकते हैं।

( ५८३ ) “तद्धेदं तर्ह्यव्याकृतमासीत्” इत्यव्याकृते प्रधाने जगतः प्रलय- मभिधाय “तन्नामरूपाभ्यां व्याक्रियत” इत्यव्याकृतादेव जगतः सृष्टि- श्चाभिधीयते । अव्याकृतं अव्यक्तम् , नामरूपाभ्यां न व्याक्रिय ते न व्यज्यत इत्यर्थः । अव्यक्तं प्रधानमेव । अस्य च स्वरूप नित्यत्वेन परिणामाश्रत्वेन च जगत्कारणवादिवाक्यगतौ सदसच्छब्दौ ब्रह्म- णीवास्मिन्न विरोत्स्येते । एवं अव्याकृत कारणत्वे निश्चिते सतीक्ष- णादयः कारणगताः सृष्ट्यौन्मुख्याभिप्रायेण योजयितव्याः । ब्रह्मा- त्मशब्दावपि बृहत्त्वप्यपित्वाभ्यां प्रधान एव वर्त्तेते अतः स्मृतिन्याय- प्रसिद्धं प्रधानमेव जगत्कारणं वेदांतवाक्यैः प्रतिपाद्यते । “यह जगत् उस समय अव्याकृत था” इस वाक्य में अव्याकृत शब्द वाच्य प्रकृति में प्रलय बतलाकर “वह अव्याकृत ही नाम रूप से व्याकृत हो गया”इस वाक्य में उस अव्याकृत प्रकृति से ही जगत् की सृष्टि भी बतलाई गई है । अव्याकृत का अर्थ है अव्यक्त, अर्थात् जो नामरूप से व्यक्त न हो । अव्यक्त तो प्रधान है ही। यह प्रधान स्वरूपतः नित्य और संपूर्ण परिणामों का आधार होने से, जगत् कारण के प्रतिपादक सत् और असत् दोनों पदों से व्यवहृत हो सकता है, जैसे कि—ब्रह्म का दोनों शब्दों से प्रयोग होता है । इस प्रकार जगत् के कारण रूप से, अव्याकृत के निश्चित हो जाने पर, कारण के संबंध में कहे गए ईक्षण आदि गुणों को भी, सृष्ट्योन्मुखी भाव के अभिप्राय से, अव्यक्त के साथ ही जोड़ना होगा । ब्रह्म और आत्मा शब्दों को भी, जो कि वृहत्व और व्यापकत्व के द्योतकं हैं, प्रधान के लिए ही मानना होगा । इसलिए निश्चित ही सांख्यस्मृति- प्रसिद्ध प्रधान ही वेदांत वाक्यों में जगत कारण के रूप से प्रतिपादित है । सिद्धान्तः—एवं प्राप्ते प्रचक्ष्महे—“कारणत्वेन चा काशाषि” इत्यादि, च शब्दस्तुशब्दार्थे, सर्वज्ञात् सर्वेश्वरात् सत्यसंकल्पान्निरस्त निखिलदोषगन्धात् परस्माद् ब्रह्मण एव जगदुत्पद्यत इति निश्चेतुं

( ५८४ ) शक्यते, कुतः ? आकाशादिषु कारणत्वेन यथाव्यपदिष्टस्योक्तेः, सर्वज्ञत्वादि विशिष्टत्वेन “जन्माद्यस्य यतः” इ त्येवमादिषु प्रतिपादितं ब्रह्म यथा व्यपदिष्टमित्युच्यते, तस्यैकस्यैवाकाशादिषु कारणत्वेनोक्तेः । “तस्माद् वा एतस्मादात्मन आकाशः संभूतः” “तत्तेजोऽसृजत्” “इत्यादिषुसर्वज्ञं ब्रह्मैव कारणत्वेनोच्यते । तथाहि “सत्यंज्ञानमनंतं ब्रह्म” “सोऽश्नुते सर्वान् कामान् सह ब्रह्मणा विपश्चिता” इति प्रकृतं विपश्चिदेव ब्रह्म तस्माद् वा एतस्मादिति परामृश्यते। तथा-“तदैक्षत् बहुस्याम्” इतिनिर्दिष्टं सर्वज्ञं ब्रह्मैव “तत्तेजोऽसृजत्” इति परामृश्यते । एवं सर्वत्र सृष्टि वाक्येषु द्रष्टव्यम् अतोब्रह्मैक कारणं जगदिति निश्चीयते । उन सांख्यवादियों के कथन पर सूत्रकार सिद्धान्त रूप से “कारण- त्वेन चाकाशादिषु” इत्यादि सूत्र प्रस्तुत करते हैं। सूत्र में च शब्द तु शब्द वाची है। सर्वज्ञ, सर्वेश्वर, सत्य संकल्प, निर्दोष परब्रह्म से ही जगत् की सृष्टि हुई है ऐसा निश्चित कह सकते हैं। क्योंकि-आकाशादि में कारण रूप से ब्रह्म का ही उल्लेख किया गया है। “जन्माद्यस्य यतः” सूत्र में सर्वज्ञ आदि गुणविशिष्ट रूप से प्रतिपादित ब्रह्म ही, यथाव्यपदिष्ट रूप से कहा गया है, आकाशादि में एकमात्र उसी को कारण बतलाया गया है। “उसी से आकाश हुआ, उसने तेज की सृष्टि की” इत्यादि में ब्रह्म को ही कारण बतलाया गया है। उसी प्रकार--“ब्रह्म सत्य ज्ञान अनंत स्वरूप है” “वह सर्वदर्शी, ब्रह्म के साथ समस्त कामनाओं को भोगता है” इत्यादि में जिस सर्वज्ञ ब्रह्म का वर्णन किया गया है, “तस्माद् वा एतस्माद्” में उसी का उल्लेख है। “उसने सोचा बहुत हो जाऊँ” इत्यादि में निर्दिष्ट सर्वज्ञ ब्रह्म का ही “उसने तेज की सृष्टि की” इत्यादि में उल्लेख है। इसी प्रकार सभी जगह सृष्टि परक वाक्यों में देखना चाहिए। इससे निश्चित होता है कि--जगत् का एकमात्र कारण ब्रह्म ही है। ननु “असद् वा इदमग्र आसीत्” इत्यसदेव कारणत्वेन

( ५८५ ) व्यपदिश्यते । तत्कथमिव सर्वज्ञस्य सत्यसंकल्पस्य ब्रह्मण एव कारणत्वं निश्चीयत इत्यत आह-- "सृष्टि के पूर्व यह जगत् असत् था" इस वाक्य में तो असत् को ही कारण रूप से दिखलाया गया है, तब सर्वज्ञ सत्य संकल्प ब्रह्म की जगतकारणता कैसे निश्चित होगी ? इसका समाधान करते हैं-- समाकर्षात् । १।४।१५॥ "असद् वा इदमग्र आसीत्" इत्यत्रापि विपश्चिदानंदमयं सत्यसंकल्पं ब्रह्मैव समाकृष्यते । कथम् ? "तस्माद् वा एतस्माद् विज्ञानमयाद् अन्योऽन्तर आत्माऽनन्दमयः,-सोऽकामयत बहु स्यां प्रजायेयेति-इदं सर्वमसृजत, यदिदं किंच तत्सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत् तदनुप्रविश्य सच्च त्यच्चाभवत्" इत्यादिना ब्राह्मणेनानंदमयं ब्रह्म सत्यसंकल्पं सर्वस्य स्रष्टृ सर्वानुप्रवेशेन सर्वात्मभूतमभिधाय "तदप्येष श्लोको भवति" इत्युक्तस्यार्थस्य सर्वस्य साक्षित्वेनोदाहृतो- ऽयं श्लोकः "असद् वा इदमग्र आसीत्" इति । तथोत्तरत्र "भीषा- ऽस्माद् वातः पवते" इत्यादिना तदेव ब्रह्म समाकृष्य सर्वस्य प्रशा- शितृत्वनिरतिशयानंदत्वादयोऽभिधीयंते । अतोऽयं मंत्रस्तद्विषय एव । तदानीं नामरूपविभागाभावेन तत्संबंधितयाऽस्तित्वाभावात् ब्रह्मैवासच्छब्देनोच्यते । "असदेवेदमग्र आसीत्" इत्यत्राप्ययमेव निर्वाहः । "सृष्टि के पूर्व यह जगत् असत् था" इस वाक्य में भी सर्वदर्शी आनंदमय, सत्य संकल्प, ब्रह्म का ही संबंध है । सो कैसे ? ( उत्तर ) "निश्चय ही पहिले कहे हुए, विज्ञानमय जीवात्मा से भिन्न, उसके भीतर रहने वाले आत्मा आनंदमय परमात्मा हैं, -उस परमेश्वर ने विचार किया कि प्रकट होकर बहुत हो जाऊँ,-जो कुछ भी देखने और समझने में आता है उस सबकी रचना की,-उस जगत की रचना करके वह स्वयं

उसी में साथ-साथ प्रविष्ट हो गए,-उसमें प्रविष्ट होकर मूर्त्त और अमूर्त्त हो गए" इत्यादि ब्राह्मण मंत्रों से आनंदमय, सत्य संकल्प, सर्व- स्रष्टा ब्रह्म को, सब मे प्रविष्ट सर्वात्मभूत बतलाकर "उस विषय में भी यह श्लोक है" उपरोक्त अर्थ का प्रतिपादक साक्षी स्वरूप "प्रकट होने से प्रथम यह जडचेतनात्मक जगत अव्यक्त ही था" यह श्लोक कहा गया । तथा इसी प्रकरण के बाद—"इसी के भय से पवन चलता है" इत्यादि वाक्य में, उसी ब्रह्म से संबद्ध सर्व प्रशासकता निरतिशय आनंदमयता का वर्णन किया गया है। इससे सिद्ध होता है कि उक्त मंत्र ब्रह्मविषयक ही है। सृष्टि के पूर्व नाम रूप का विभाग न होने से, नाम रूप से संबद्ध उसका अस्तित्व भी नहीं था, इसलिए उस अवस्था वाले ब्रह्म का असत् शब्द से उल्लेख किया गया है। "असदेवेदमग्र आसीत्" वाक्य की भी इसी प्रकार अर्थ संगति करनी होगी ।

यदुक्तं "तद्धेदं तर्हि अव्याकृतमासीत्" इति प्रधानमेव जग- त्कारणत्वेनाभिधीयत इति, नेत्युच्यते । तत्राप्यव्याकृतशब्देनाव्याकृत- शरीरं ब्रह्मैवाभिधीयते, "स एष हि प्रविष्ट आनखाग्रेभ्यः पश्यं- श्चक्षुः शृण्वन् श्रोत्रं मन्वानो मन आत्मेत्येवोपासीत्" इत्यत्र "स एषः" इति तच्छब्देनाव्याकृतशब्दान्निर्दिष्यान्तः प्रविश्य प्रशासितृत्वेना- नुकर्षात् "तत्सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत्-अनेन जीवेनात्मनाऽनुप्रविश्य नामरूपे व्याकरवाणि" इति स्रष्टुः सर्वज्ञस्य परस्य ब्रह्मणः कार्यानु- प्रवेशनामरूपव्याकरण प्रसिद्धेश्च । "अन्तः प्रविष्टः शास्ता जनानाम्" इति नियमनार्थत्त्वादनुप्रवेशस्य प्रधानस्याचेतनस्यैवंरूपोऽनुप्रवेशो न संभवति ।

जो यह कहा कि—"उस समय यह जगत् अव्याकृत था", इत्यादि वाक्य में अव्याकृत प्रधान को ही कारण कहा गया है। यह कथन भी असंगत है, इसमें भी अव्याकृत शरीर ब्रह्म का ही वर्णन है। "वह आत्मा इस शरीर में नख से शिख पर्यन्त प्रविष्ट है उसके देखने से चक्षु, सुनने से श्रोत्र तथा मनन करने से मन आदि शब्दों का प्रयोग होता है, उसे

( १५७ ) आत्मा मानकर उपासना करो" इस वाक्य में "स एषः" वाक्यगत तत् शब्द से अव्याकृत शब्दनिर्दिष्ट पदार्थ को ही, अन्तर्यामी प्रशासक रूप से स्थिर किया गया है । "उसने सृष्टि करके उसी में प्रवेश किया" तथा इस जीव में प्रवेश करके नाम रूप को प्रकाशित करूँगा" इत्यादि में जगत् स्रष्टा, सर्वज्ञ परब्रह्म के कार्यानुप्रवेश और नामरूपाभिव्यक्तीकरण का प्रसिद्ध वर्णन है । "वह अन्तर्यामी सबका शासक है" इत्यादि वाक्य में, उसका अनुप्रवेश और जगत शासकता ही एकमात्र उद्देश्य है, प्रधान में जडता के कारण ऐसी अनुप्रवेश शक्ति संभव नहीं है । अतः अव्याकृतम्-अव्याकृतशरीरं ब्रह्म "तन्नामरूपाभ्यां व्या- क्रियत" इति तदेवाविभक्तनामरूपं ब्रह्म सर्वज्ञं सत्यसंकल्पं स्वेनैव विभक्त नामरूपं स्वयमेव व्याक्रियेत्युच्यते । एवं च सति ईक्षणा- दयो मुख्या एन भवंति ब्रह्मात्मशब्दावपि निरतिशयबृहत्त्वनियमना- र्थव्यापित्वाभावेन प्रधाने न कथंचिदुपपद्येते । अतो ब्रह्मैककारणं जगदिति स्थितम् । अव्याकृत शरीर ब्रह्म को ही अव्याकृत बतलाया गया है, जैसी कि--"वह नामरूपाकार में अभिव्यक्त हुआ" इत्यादि में अव्याकृत सर्वज्ञ सत्यसंकल्प ब्रह्म की नामरूपाकार में अभिव्यक्ति बतलाई गई है । इस प्रकार ब्रह्म की अभिव्यक्ति और अनभिव्यक्ति सिद्ध हो जाने पर ईक्षण आदि गुण भी उन्हीं के सिद्ध होते हैं । ब्रह्म और आत्मा शब्द भी, निरतिशय वृहत्व और सर्वनियमनोपयोगी व्यापकता के अभाव से, प्रधान में कभी भी संभव नहीं हैं । इससे सिद्ध होता है कि जगत का एकमात्र कारण ब्रह्म ही है । ५ जगद्वाचित्वाधिकरण :- जगद्वाचित्वात् ।१।४।१६॥ पुनरपि सांख्यं प्रत्यवतिष्ठते--यद्यपि वेदांत वाक्यानि चेतनं जगत्कारणत्वेन प्रतिपादयंति, तथापि तंत्रसिद्धप्रधानपुरुषातिरिक्तं

( ५८८ )

वस्तु जगत्कारणं वेद्यतया न तेभ्यः प्रतीयते । तथाहि-भोक्तारमेव पुरुषं कारणं वेद्यतयाऽधीयते कौषीतकिनो बालाक्यजातशत्रु- संवादे--"ब्रह्म ते ब्रवाणि" इत्युपक्रम्य "यो वै बालाक एतेषां पुरुषाणां कर्ता यस्य वैतत्कर्म स वै वेदितव्यः" इति उपक्रमे वक्तव्यतया बालाकिनोपक्षिप्तं ब्रह्माजानते तस्मा एव अजात- शत्रुणा "स वै वेदितव्यः" इति ब्रह्मोपदिश्यते । "यस्य वैतत्कर्म" इति कर्मसंबंधात् प्रकृत्यध्यक्षो भोक्ता पुरुषो वेदितव्योपदिश्टं ब्रह्मेति निश्चीयते । नाथनिरम् , तस्य कर्मसंबंधानभ्युपगमात् । कर्म च पुण्यापुण्यलक्षणं क्षेत्रज्ञस्यैव संभवति । सांख्यवादी पुनः प्रतिपक्षी होकर उठते है--यद्यपि वेदान्त वाक्यो मे चेतन को ही जगत् कारण रूप से प्रतिपादित किया गया है, तथापि उनमे सांख्य तंत्र सिद्ध प्रधान पुरुष के अतिरिक्त, कोई अन्य वस्तु जगत् कारणरूप से नही प्रतीत होती । कौषीतकि शाखा के बालाकि और अजातशत्रु के कथोपकथन मे, भोक्ता को ही, कारण रूप से, ज्ञातव्य बतलाया गया है । "तुझे ब्रह्मोपदेश करता हूँ" इत्यादि से प्रारंभ करके "हे बालाकि ! जो इस पुरुष समुदाय का कर्त्ता है, एवं जगत् जिसका कार्य है, वही ज्ञातव्य तत्त्व है" । बालाकि ने उपक्रम मे जिस ब्रह्म को जानने की अभिलाषा प्रकट की, बालाकि उस ब्रह्म को नही जानता ऐसा समझकर अजातशत्रु ने स्वतः ही उसे ब्रह्म सबंधी उपदेश उक्त वाक्य में दिया । "यही जिसका कर्म है" इत्यादि वाक्य मे, कर्म के साथ संबंधित होने से यह निश्चित होता है कि-ज्ञातव्यरूप से उपदिष्ट ब्रह्म तत्त्व, सांख्य सम्मत प्रकृति प्रेरक, भोक्ता पुरुष से भिन्न, कोई दूसरा नही है ऐसा प्रतीत होता है । उक्त प्रसग मे जिस ब्रह्म का उल्लेख किया गया है, वह परब्रह्म नही हो सकता, क्योकि--परब्रह्म का कही भी, कर्म के साथ संबंध नही बतलाया गया है । पुण्य पाप लक्षण वाले कर्म का संबंध तो क्षेत्रज्ञ ( जीव ) से ही हो सकता है । न च वाच्यम्-क्रियत इति कर्मेति व्युत्पत्त्या प्रत्यक्षादि प्रमाणो- पस्थापितं जगदेतत्कर्मेति निर्दिश्यते, यस्यैतत्कृत्स्नं जगत् कर्म, स

( ५८६ ) वेदिव्य इति क्षेत्रज्ञादर्थान्तरमेव प्रतीयतेति । “यो वै बालाके एतेषां पुरुषाणां कर्त्ता यस्य वैतत्कर्म” इति पृथङ्निर्देश वैयर्थ्यात् , कर्मशब्दस्य च लोकवेदयोः पुण्य पाप रूप एव कर्मणि प्रसिद्धेः । तत्तद्भोक्तृकर्मनिमित्तत्वात् जगदुत्पत्तेरेतेषां पुरुषाणां कर्त्तेति च भोक्तुरेवोपपद्यते । तदयमर्थः –एतेषां आदित्यमंडलाद्यधिकरणानां क्षेत्रज्ञभोग्य भोगोपकरणभूतानां पुरुषाणां यः कारणभूतः, एतत्- कारणभावहेतुभूतं पुण्यापुण्यलक्षणं च कर्म यस्य स वेदितव्यः, तत्स्व- रूपं प्रकृतेर्विविक्तं वेदितव्यम्–इति । ऐसा नहीं कह सकते कि--जो किया जाय उसे कर्म कहते हैं, इस व्याख्या के अनुसार, प्रत्यक्ष आदि प्रमाणों से सिद्ध जगत् ही, इस ब्रह्म के कर्म के रूप में बतलाया गया है । “जिसका यह सारा जगत् कर्म है, वही ज्ञातव्य है” इत्यादि में क्षेत्रज्ञ से विलक्षण, परब्रह्म ही प्रतीत होता है । ऐसा मानने पर तो “हे बालाकि ! जो इन पुरुषों का कर्त्ता है, एवं यह जगत् जिसका कर्म है” इत्यादि में किया गया कर्त्ता और कर्म का पृथक् निर्देश ही व्यर्थ हो जायेगा । कर्म शब्द की, लोक और वेद में पाप और पुण्य रूप कर्म से ही प्रसिद्धि है । विभिन्न भोक्ताओं के कर्मा- नुसार ही जगत् की उत्पत्ति होती है, इस नियम के अनुसार “इन सब पुरुषों का कर्त्ता” इत्यादि वक्तव्य से, भोक्ता संबंधी कर्म ही, सिद्ध होता है । उक्त प्रसंग से यह तात्पर्य निकलता है कि, जो आदित्य मंडल आदि में स्थित हैं, एवं जीव के भोग्य और भोगोपकरण रूप इन पुरुषों के कारण हैं तथा कारण भाव के हेतुभूत, पाप और पुण्य कर्म वाले हैं, उन्हें ही जानना चाहिए, अर्थात् उनके स्वरूप को, प्रकृति से भिन्न रूप से जानना चाहिए । तथोत्तरत्र– “तौ ह सुप्तं पुरुषमाजग्मतुः तं यष्टिना चिक्षेप” इति सुप्तपुरुषागमनयष्टिघातोत्थापनादीनि च भोक्तृप्रतिपादन एव लिंगानि । तथोपरिष्टादपि भोक्तैव प्रतिपाद्यते“ तद्यथा श्रेष्ठी स्वैर्भुंको यथा वा स्वाः श्रेष्ठिनं भुंजंत्येवमेवैष प्रज्ञात्मैतैरात्मभिर्भुंके ankurnagpal108@gmail.com

( ५६० )

एवमेवैत आत्मान एनं भुञ्जन्ति" इति । तथा "क्वौषा एतद् बालाके पुरुषोऽशयिष्ट क्व वा एतदभूत् कुत एतदायात्" इति पृष्टमर्थमजा- नते तस्मै स्वयमेवाजातशत्रुरुवाच - "हिता नाम नाड्यस्तासु तदा भवति यदा सुप्तः स्वप्नं न कथंचन पश्यत्यथास्मिन् प्राण एवैकधा भवति तदैनं वाक् सर्वैर्नामभिः सहाप्येति मनः सर्वैः ध्यानैः सहाप्येति स यदा प्रतिबुध्यते यथाग्नेर्ज्वलतः सर्वा दिशो विस्फुलिंगा विप्रतिष्ठे- रन्नेवमेवैतस्मादात्मनः प्राणा यथायतनं विप्रतिष्ठते प्राणेभ्यो देवा देवेभ्यो लोकाः" इति सुषुप्त्याधारतया स्वप्नसुषुप्तिजागरितावस्थासु वर्त्तमानं वागादिकरणाप्ययोद्गमस्थानमेव जीवात्मानम् "अथास्मिन् प्राण एवैकधा भवति" इत्युक्तवान् । प्रकरण के उत्तर भाग में कहा गया है कि- "वे दोनों सोए हुए पुरुष के निकट आए, और छड़ी से प्रहार किया" इत्यादि में सुप्त के पास आना और छड़ी के प्रहार से उठाना आदि, भोक्तृप्रतिपादन के ही चिन्ह हैं [ प्रकृत आत्मा देह इन्द्रिय आदि से भिन्न तत्त्व है, यह समझाने के लिए, अजातशत्रु बालाकि के साथ एक सोते पुरुष के पास जाकर छड़ी से मारने लगे, उसकी निद्रा भंग हो गई। इससे स्पष्ट हो गया कि- यह आत्मा यदि भोक्ता न होता तो, छड़ी के स्पर्श से उसमें संज्ञा का संचार न होता, छड़ी का स्पर्श भी एक प्रकार का भोग ही है, तभी तो उसे संज्ञा प्राप्त हुई ] । इसी प्रकार प्रकरण के पूर्व भाग में भी भोक्ता का प्रतिपादन किया गया है, जैसे- "सेठ जिस प्रकार धन का भोग करता है, ठीक उसी प्रकार यह प्रज्ञात्मा भी, इन देह इन्द्रिय आदि से भोग करता है, ये देहेन्द्रिय आदि भी उसका भोग करते हैं" तथा- "हे बालाकि ! यह जो पुरुष है, जब सोया था, तब कहाँ था, अब यह कहाँ से आया ?" इस प्रश्न द्वारा बालाकि को अज्ञानी जानकर अजातशत्रु ने स्वयं ही उससे कहा- "हिता नाम की जो, हृदय से संवद्ध शरीर में व्याप्त नाडियाँ हैं, उनके द्वारा, बुद्धि सहित हृदय में जाकर शयन करता है, सुषुप्ति में वह स्वप्न नही देखता, उस समय सारे प्राण एकत्र होकर स्थित रहते हैं, वागेन्द्रिय समस्त शब्दों के साथ उसके निकट पहुँच जाती

( ५६१ )

है। मन भी समस्त चिन्तनों के साथ उसके पास उपस्थित रहता है। जब यह जागता है तब, अग्नि से प्रस्फुटित चिनगारियों की तरह, इन्द्रियाँ इससे अलग होकर यथा स्थान पहुँच जाती हैं, उन इन्द्रियों से उनके अधिष्ठातृ देवता तथा उन देवताओं से समस्त लोक अर्थात् शब्दादि विषय अलग हो जाते हैं" इत्यादि में स्वप्न, सुषुप्ति और जागृति अव- स्थाओं मे वर्त्तमान, वाग आदि इन्द्रियों का विलय और उद्भवस्थान जीवात्मा ही बतलाया गया है।

अस्मिन् जीवात्मनि प्राणभृत्त्वनिबंधनोऽयं प्राणशब्दः-"स यदा प्रतिबुध्यते" इति प्राणशब्दनिर्दिष्टस्य प्रबोधश्रवणात् मुख्यप्राणस्ये- श्वरस्य च सुषुप्तिप्रबोधयोऽसंभवात् , अथवा "अस्मिन् प्राणे" इति व्यधिकरणे सप्तम्यौ अस्मिन्नात्मनि वर्त्तमाने प्राण एवैकधा भवति वागादिकरणग्राम इति। प्राणशब्दस्य मुख्य प्राण परत्वेऽपि जीव एवा- स्मिन् प्रकरणे प्रतिपाद्यते, स्वतः प्राणस्य जीवोपकरणत्वात्। अतो वक्तव्यतयोपक्रान्तं ब्रह्म पुरुष एवेति, तद्व्यतिरिक्तेश्वरासिद्धेः। कारणगताश्चेक्षणादयश्चेतनधर्माः अस्मिन्नेवोपपद्यंत, इत्येतदधि- ष्ठितं प्रधानमेव जगत्कारणम्।

यह जीवात्मा प्राणभृत अर्थात् प्राण विधारक है, इसीलिए उसमें प्राण शब्द का प्रयोग किया गया है। "वह जिस समय उठता है" इस स्थल में, प्राणशब्दनिर्दिष्ट पदार्थ का ही प्रबोध या जागरण प्रतीत होता है। मुख्य प्राण अर्थात् प्राणों के ईश्वर का प्रबोध या जागरण कभी संभव नहीं है। अथवा "अस्मिन् प्राणे" इस स्थल में जो दो सप्तमी विभक्ति का प्रयोग किया गया है, वह व्यधिकरण (अर्थात् दोनों में विशेष्य विशेषण भाव नहीं है) का प्रतिपादन करता है, जिससे निश्चित होता है कि--इस वर्त्तमान प्राण में ही वागादि इन्द्रियाँ एकत्र हो जाती हैं। प्राण शब्द के मुख्य प्राण परक होते हुए भी, उक्त प्रकरण में, जीव अर्थ में ही उसका प्रयोग किया गया है, प्राण तो स्वतः ही जीव का उप- करण (भोग का साधन) है। प्रकरण के प्रारंभ में वक्तव्य रूप से जिस

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( ५६२ ) ब्रह्म का उपक्रम किया गया है, वह निश्चित पुरुष ही है, इसके अतिरिक्त उक्त प्रकरण में ईश्वर का अस्तित्व सिद्ध नहीं होता। कारणगत ईक्षण आदि चेतन धर्म भी इस पुरुष ( जीव ) में ही घटते हैं। इस चेतन पुरुष द्वारा परिचालित प्रकृति ही जगत का कारण है, यह भी निश्चित होता है। इति प्राप्ते प्रचक्ष्महे—जगद्वाचित्वात्,अत्र पुण्यापुण्य परवशः क्षेत्रज्ञः स्वस्मिन् प्रकृतिधर्माध्यासेन तत्परिणामहेतुभूतः पुरुषो नाभिधीयते, अपितु निरस्तसमस्ताविद्यादिदोषगन्धोऽनवधिकातिश- यासंख्येयकल्याणगुणनिधिर्निखिल जगदेककारणभूतः पुरुषोत्तमोऽ- भिधीयते । कुतः ? “यस्य वैतत्कर्म” इति, अत्रैतच्छब्दान्वितस्य कर्मशब्दस्य परमपुरुषकार्यभूतजगद्वाचित्वात् । उक्त मत पर सिद्धान्त रूप से “जगद्वाचित्वात्” सूत्र प्रस्तुत किया जाता है। इस प्रकरण में, पुण्यपाप परवश क्षुद्र क्षेत्रज्ञ (जीवात्मा) जो कि स्वतः कर्तृत्व आदि प्राकृतिक धर्मों को कार्यरूप में परिणत करने में असमर्थ है, वह पुरुष अभिधेय नहीं है। अपितु अविद्या आदि दोषों से रहित, अगणित अपार असंख्य कल्याणगुण सागर, समस्त जगत का एक- मात्र कारणभूत पुरुषोत्तम ही अभिधेय है। “यह जगत् जिसका कर्म है” इत्यादि वाक्य में “एतत्” शब्द से प्रयुक्त “कर्म” शब्द, परम पुरुष पर- मेश्वर के कार्यरूप जगत का ही वाचक है। एतच्छब्दो ह्यर्थप्रकरणादिभिरसंकुचितवृत्तिरविशेषेण प्रत्यक्षा- दिप्रमाणोपस्थापितनिखिलचिदचिन्मिश्रितजगद्विषयः । न च पुण्या- पुण्यलक्षणं कर्मात्र कर्मशब्दाभिधेयम् “ब्रह्म ते ब्रवाणि” इत्युपक्रम्य ब्रह्मत्वेन बालाकिना निर्दिष्टादित्यमण्डलाद्यधिकरणानां पुरुषा- णामब्रह्मत्वेन “मृषा वै खलु मा संवादिष्ठाः” इतितमब्रह्मवादिनमपोद्य तेनाविदितब्रह्मज्ञानायाजातशत्रुणेदं वाक्यमवतारितं “यो वै बालाके” इत्यादि। पुण्यापुण्यलक्षण कर्मसंबंधित आदित्याद्यधिकरणाः तत्स- ankurnagpal108@gmail.com

( १६३ ) जातीयाश्चपुरुषास्तेनैव विदिता इति तदविदितपुरुषविशेषज्ञापन- परोऽयं कर्मशब्दो न पुण्यापुण्यमात्रवाची, अपितु कृत्स्नस्यजगतः कार्यत्ववाची । एवमेवखल्वविदितोऽर्थउपदिष्टो भवति । पुरुषस्य कर्मसंबंधोपलक्षितस्वाभाविकस्वरूपस्याज्ञातस्य वेदितव्योपदेशे च लक्षणा, कर्मसंबंधमात्रस्यैव वेदितव्यस्वरूपलक्षणत्वात् यस्य कर्म स वेदितव्य, इत्येतावत्तैव तत्सिद्धेः “यस्य वैतत्कर्म” इत्येतच्छब्द वैयर्थ्यं च । “एतत्” शब्द का अर्थ, प्रकरण आदि से बहुत ही स्पष्ट और सामान्य ढंग से, प्रत्यक्ष आदि प्रमाणों से गृहीत, चेतन अचेतन युक्त समस्त जगत का वाची प्रतीत होता है । इस प्रसंग में प्रयुक्त कर्म शब्द, पुण्यपाप रूप ही कर्म नहीं है । “तुम्हें ब्रह्म तत्त्व बतलाता हूँ’ इत्यादि से बालाकि को आदित्यमण्डल से अधिष्ठित जिस पूर्ण पुरुष ब्रह्म का निर्देश किया गया, उसी को “मुझे झूठी बातों से मत ठगो” ऐसी अब्रह्म- वादी बालाकि द्वारा निन्दा करने पर, उसके अज्ञान निवारण के लिए अजातशत्रु ने “यो वै बालाके” इत्यादि वाक्य से अविज्ञात ब्रह्म तत्त्व का निरूपण किया । पुण्यपाप संबद्ध आदित्य आदि के आश्रयभूत एवं उसके समानजातीय पुरुष को तो बालाकि स्वयं ही जानता था, उसको वैसा ही उपदेश देने का कोई मतलब ही नहीं था, इससे निश्चित होता है कि-“कर्म” शब्द एकमात्र पुण्यापुण्य का ही वाचक नहीं है, अपितु संपूर्ण जगत की कार्यता का भी बोधक है । ऐसा मानने से ही, सही अर्थों में अविज्ञात तत्त्व का उपदेश घटित होता है । जो स्वतः सिद्ध स्वरूप है, समय विशेष में ही कर्म से संबद्ध होता है, उस अविज्ञात पुरुष की यदि ज्ञातव्योपदेश रूप से कल्पना की जाय तो, वह लक्षणा द्वारा ही संभव है, क्योंकि-कर्म के साथ जो संबंध है, एकमात्र उससे ही जिसके स्वरूप का ज्ञान होता है, वहां ज्ञातव्य तत्त्व है । “यह जगत जिसका कर्म है, उसे जानो” इतना कहने मात्र से ही उद्देश्य की सिद्धि हो जाती है । यदि जगत् रूप कर्म का संबंध ज्ञेय से तोड़ दिया जाय तो वाक्यगत “एतत्” शब्द की उपयोगिता ही समाप्त हो जायगी । ankurnagpal108@gmail.com

“य एतेषां कर्त्ता यस्य वैतत्कर्म” इति पृथङ्निर्देशस्य चायम- भिप्रायः, ये त्वया ब्रह्मत्वेन निर्दिष्टाः तेषां यः कर्त्ता,ते यत्कार्यभूताः, किं विशिष्याभिधीयते, कृत्स्नस्यजगत्यस्यकार्यम्, उत्कृष्टा अपकृ- ष्टाः चेतनाम्चेतनाश्च सर्वेपदार्था यत्कार्यत्वे तुल्याः, स परमका- रणभूतः पुरुषोत्तमो वेदितव्यः, इति। जगदुत्पत्तेर्जीवकर्मनिबंधनत्वेऽपि न जीवः स्वभोग्यभोगोपकरणादेः स्वयमुत्पादक., अपितु स्वकर्मानुगु- ण्येनेश्वरसृष्टं सर्वं भुंक्ते, अतो न तस्य पुरुषान् प्रति कर्तृत्वमुपप- द्यते। अतः सर्वं वेदांतेषु परमकारणतया प्रसिद्धं परंब्रह्मैवात्र वेदि- तव्यतयोपदिश्यते। “जो इसका कर्त्ता है, एवं यह जिसका कर्म है” इत्यादि में किये गए कर्त्ता कर्म के पृथक् निर्देश का अभिप्राय है कि—तुम्हारे द्वारा जो ब्रह्मत्वरूप से निर्दिष्ट पुरुष हैं तथा जो कर्त्ता है, जिसके वे सब कार्यरूप हैं, अधिक क्या, सारा जगत ही जिसका कार्य है, भला बुरा, जड चेतन सभी पदार्थ उसके कार्य के समान हैं, वह परमकारण रूप पुरुषोत्तम ही ज्ञातव्य हैं। जीव का पापपुण्यमय कर्म ही यदि जगत की उत्पत्ति का कारण है तो प्रश्न उठता है कि—जीव अपने भोग्य और भोगोपकरणों का उत्पादक कैसे होगा ? वह तो अपने कर्मों के अनुसार, ईश्वर सृष्ट पदार्थों का भोग मात्र कर सकता है, जीव का जीवों के प्रति कर्तृत्व कभी संभव नहीं है। सभी वेदांत वाक्यो मे परम कारण रूप से प्रसिद्ध परब्रह्म ही उक्त प्रकरण के ज्ञातव्य विषय हैं। जीवमुख्यप्राणलिंगान्नेति चेत्तद् व्याख्यातम् ।१।४।१७।। अथ यदुक्तम्-जीवल्गिान्मुख्यप्राणसकीर्त्तनाच्च लिंगाद् भोक्तैवाऽस्मिन्प्रकरणे प्रतिपाद्यते, न परमात्मा इति, तद्व्याख्या- तम्। तस्य निर्वाहः प्रतर्दनविद्यायामभिहितः। एदतुक्तं भवति-यत्रो- पक्रमोपसंहारपर्यालोचनया ब्रह्मपरं वाक्यमिति निश्चितम्, तत्रा- न्यलिंगानि तदनुरोधेन वर्णनीयानीति तत्र प्रतिपादितम्। अत्राप्युक्रमे “ब्रह्म ते ब्रवाणि” इति ब्रह्मोपक्षिसम्, मध्ये च “यस्य वै ankurnagpal108@gmail.com

( ३६५ ) तत्कर्म" इति निर्दिष्टं न पुरुषमात्रम् अपितु निखिलजगदेककारणम् ब्रह्मैवेत्युक्तम् । जो यह कहते हो कि—इस प्रसंग में जीव शब्द और मुख्य प्राण बोधक शब्द के प्रयोग से ज्ञात होता है कि—भोक्ता पुरुष का ही इस प्रकरण में प्रतिपादन किया गया है, परमात्मा का नहीं । इस विषय की व्याख्या हम कर चुके हैं, इसका समाधान भी प्रतर्दन विद्या के प्रसंग में कर चुके हैं। अब तो कथन यह है कि—जब प्रकरण के उपक्रम और उपसंहार की पर्यालोचना से यह निश्चित हो चुका कि सारा प्रसंग परब्रह्म परक ही है, इसलिये प्रयुक्त जितने भी शब्द हैं, उनका तदनुसार ही अर्थ करना चाहिए यही बात वहाँ प्रतिपादित भी है। इस प्रसंग के उपक्रम में भी जैसे—"तुझे ब्रह्मोपदेश देता हूँ" ब्रह्म का उल्लेख किया गया है। प्रसंग के मध्य के—"यह जिसका कर्म है" इस निर्देश में केवल पुरुष मात्र ही नहीं अपितु संपूर्ण जगत के कारण रूप से ब्रह्म का ही निर्देश किया गया है । उपसंहारे च— "सर्वान्पाप्मनोऽपहृत्य सर्वेषां च भूतानां श्रैष्ठ्- यं स्वाराज्यमाधिपत्यं पर्येति य एवं वेद" इति ब्रह्मोपासनैकान्तं सर्वपापापहतिपूर्वकं स्वाराज्यं च फलं श्रुतम्, अतोऽस्यवाक्यस्य परब्रह्मपरत्वनिश्चयेन जीवमुख्यप्राणलिङ्गान्यपि तत्परतया वर्णनी- यानि—इति । प्रातर्दने हि उपासात्रैविध्येन जीवमुख्यप्राणलिंगानां ब्रह्मपरत्वमुक्तम्, अत्रापि–"अथास्मिन् प्राण एवैकधा भवति" इति सामानाधिकरण्य संभवे वैयधिकरण्यसमाश्रयणाऽऽयोगात् ब्रह्मण्येव प्राणशब्द प्रयोग निश्चयेन च प्राणशरीर कब्रह्मोपासनार्थं प्राणसंकी- र्त्तनं लिंगं युज्यते । उपसंहार में भी—"जो इस प्रकार जानता है वह समस्त पापों को भस्म करके, संपूर्ण भूतों के श्रेष्ठतम रूप स्वर्ग राज्य का आधिपत्य ankurnagpal108@gmail.com

निश्चित होता है कि-जीव का वर्णन, जीव से भिन्न परमात्मा के प्रति- पादन के लिए ही किया गया है । यदुक्तं प्रश्नव्याख्याने जीवपरे सुषुप्तिस्थानं च नाड्यएव, करणग्रामश्च प्राणशब्दनिर्दिष्टे जीवएवैकधा भवति इति, तदयुक्तम् नाडीनां स्वप्रस्थानत्वात् उक्तरीत्याब्रह्मण एव सुषुप्तिस्थान त्वात् । प्राणशब्द निर्दिष्टे ब्रह्मण्येव जीवस्य तदुपकरणभूतवागादि- करणग्रामस्य चैकताऽऽपत्ति विभागवचनाच्च । अपिचैवमेके-वाजसनेयिनोऽस्मिन्नेव बालाक्यजातशत्रु संवादे सुषुप्ताद्विज्ञानमयात् भेदेन तदाश्रयभूतं परमात्मानमामनन्ति-“य एष विज्ञानमयः पुरुषः क्वैष, तदाऽभूत्कुत एतदागात्” यत्रैष एतत् सुप्तो अभूत् य एष विज्ञानमयः पुरुषः तदैतेषां प्राणानां विज्ञानेन विज्ञानमादाय य एषोऽन्तर्हृदय आकाशः तस्मिन् शेते” इति आकाश शब्दश्च परमात्मनि प्रसिद्धः । “दहरोऽस्मिन्नंतर आकाशः” इति । अतोऽत्र जीव संकीर्तनं तस्मादर्थान्तरभूतस्यप्राज्ञस्यपरस्यब्रह्मणः प्रतिबोधनार्थमित्यवगम्यते । तस्मादस्मिन्वाक्ये पुरुषादर्थान्तरभूतस्य निखिलजगत्कारणस्यपरस्यैवब्रह्मणो वेदितव्यतयाऽभिधानान्तन्त्र- सिद्धस्य पुरुषस्यतदधिष्ठितस्य वा प्रधानस्य कारणत्वं क्वचिदपि वेदान्ते प्रतीयत इति स्थितम् । प्रश्न और उत्तर दोनों ही जीव परक हैं, परमात्मा परक नहीं, नाड़ियां ही जीव का शयन स्थल है परमात्मा नही तथा इन्द्रियाँ ही प्राण बोधक हैं जो कि जीव मे एकत्र हो जाती है, इत्यादि कथन भी असंगत है । नाड़ियो को शयन स्थल मानकर तुम उक्त मत स्थिर करते हो, उसी तरह हम, परमात्मा को शयन स्थल मानकर यह निर्णय करते है कि- प्राण शब्द निर्दिष्ट, जीव की साधन रूप वागादि इन्द्रियाँ, ब्रह्म में ही एकत्र होती और भिन्न होती है। ऐसा ही इसी वाजसनेयी की एक शाखा मे बालाकि अजातशत्रु के संवाद में, सुप्त पुरुष से भिन्न, उसके

( ५६६ ) आश्रयभूत परमात्मा का ऐसा वर्णन मिलता है कि-“यह जो विज्ञानमय पुरुष है, वह उस समय ( सुप्तावस्था में ) कहाँ था ? और बाद में ( जागरितावस्था में ) कहाँ से आ गया ? यह जब सुप्त था तब यह विज्ञानमय पुरुष, प्राण समूह विज्ञान के साथ, स्वीय विज्ञान को ग्रहण करके, इस हृदयस्थ आकाश में शयन कर रहा था” "दहरोऽस्मिन्नंतर आकाश"इत्यादि में आकाश शब्द परमात्मा के लिए प्रसिद्ध है। इस विवेचन से निश्चित होता है कि-उक्त प्रसंग में जो जीव का उल्लेख किया गया है, वह ब्रह्म परक ही है तथा पुरुष से भिन्न संपूर्ण जगत का कारण परब्रह्म ही ज्ञातव्य है। सांख्यतंत्रसिद्ध पुरुष और उससे अविष्ठित प्रधान का कारणरूप से वेदांत वाक्यों में कहीं भी उल्लेख नहीं है। ६ वाक्यान्वयाधिकरण :- वाक्यान्वयात् ।१।४।१९॥ अत्रापि कापिलतंत्रसिद्धपुरुषतत्त्वावेदनपरंवाक्यं क्वचित् दृश्यत इति, तदतिरिक्त ईश्वरो नाम न कश्चित् संभवतीत्याशंक्य निराकरोति । इस प्रकरण में भी कापिलतंत्र सिद्ध पुरुष तत्त्व को बतलाने वाले वाक्य कहीं-कहीं दिखलाई देते हैं, इसलिए उसके अतिरिक्त ईश्वर नामक कोई दूसरा नहीं हो सकता, ऐसी शंका करके उसका निराकरण करते हैं। बृहदारण्यके मैत्रेयी ब्राह्मणे श्रूयते-“न वा अरे पत्युः कामाय पतिः प्रियो भवति" इत्यारभ्य “न वा अरे सर्वस्य कामाय सर्वं प्रियं भवति, आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मंतव्यो निदिध्यासितव्यः मैत्रेय्यात्मनि खल्वरे दृष्टे श्रुते मते विज्ञाते इदं सर्वं विदितम् इति । बृहदारण्यकोपनिषद् के मैत्रेयी ब्राह्मण में कहा गया है कि- “अरे पति की कामना से पति प्रिय नहीं होता" इत्यादि से लेकर “अरे सब की कामना से सब प्रिय नहीं होते, आत्मा को ही देखो, सुनो, मनन करो और अभ्यास करो, अरी मैत्रेयी ! इस आत्मा में ही देखने, सुनने, मनन करने और जानने से यह सारा जागतिक प्रसार ज्ञात हो जाता है।" यहाँ तक । ankurnagpal108@gmail.com

( ६०० ) तत्र संशयः, किमस्मिन्वाक्ये द्रष्टव्यतयोपदिश्यमानः तंत्रसिद्धः पुरुष एव, अथवा सर्वज्ञः सत्यसंकल्पः सर्वेश्वरः ? इति किं युक्तम् ? पुरुष इति, कुतः ? आदिमध्यावसानेषु पुरुषस्यैव प्रतीतेः, उपक्रमे तावत् पतिजायापुत्रवित्तपश्वादिप्रियत्वयोगाज्जीवात्मैव प्रतीयते । मध्येऽपि “विज्ञानघन एवैतेभ्यो भूतेभ्यः समुत्थाय तान्येवानुविनश्यति न प्रेत्य संज्ञाऽस्ति" इत्युत्पत्तिविनाशयोगात्स एवावगम्यते । तथाऽन्ते च “विज्ञातारमरे केन विजानीयात्" इति स एव ज्ञाता क्षेत्रज्ञ इति प्रतीयते, नेश्वरः । अतस्तंत्रसिद्धपुरुष प्रतिपादनपरमिदं वाक्यमिति निश्चीयते । उक्त वाक्य के विषय में संशय होता है कि-इसमें द्रष्टव्य रूप से उपदिष्ट, तंत्रसिद्ध पुरुष ही है, अथवा सर्वज्ञ सत्यसंकल्प सर्वेश्वर हैं ? कह सकते हैं कि पुरुष ही है; वाक्य के आदि मध्य और अन्त से पुरुष की ही प्रतीति होती है । उपक्रम में पति स्त्री पुत्र वित्त पशु आदि की प्रियता का संपर्क दिखलाया गया है जिससे जीवात्मा की ही प्रतीति होती है । मध्य में भी जैसे-“विज्ञानघन ही इन पंच भूतों का अनुगत होकर व्यक्त होता है तथा उनके विनष्ट होने पर विनष्ट हो जाता है, मृत्यु के बाद कोई चिन्ह अवशिष्ट नहीं रह जाता"-उत्पत्ति और विनाश के साथ जो संयोग दिखलाया गया है, उससे भी उसी (जीव) का बोध होता है । इसी प्रकार अन्त में भी-“अरे ! विज्ञाता को और कैसे जानेगी ?” वह क्षेत्रज्ञ ही ज्ञाता होता है, ईश्वर नहीं । इससे निश्चित होता है कि-यह वाक्य सांख्य तंत्रोक्त पुरुष परक ही है । ननु “अमृतत्वस्य तु नाशास्ति वित्तेन” इत्युपक्रमामृतत्व- प्राप्त्युपायोपदेशपरमिदं वाक्यमिदमवगम्यते । तत्कथं पुरुषप्रतिपादन परत्वमस्यवाक्यस्य तदुच्यते, अतएव ह्यत्र पुरुषप्रतिपादनम् । तंत्रे हि अचिद्धर्माध्यासविमुक्तपुरुषस्वरूपरूपायाथात्म्यविज्ञानमेवा- मृतत्वहेतुत्वेनोच्यते, अतो जीवात्मनः प्रकृतिवियुक्तं स्वरूपमिहामृत- त्वाय “आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः” इत्यादिनापदिश्यते । ankurnagpal108@gmail.com

( ६०१ ) “धन से अमृतत्व प्राप्ति की आशा नहीं है” इस उपक्रमवाक्य से तो ज्ञात होता है कि अमृतत्व प्राप्ति के उपाय का उपदेश ही इस वाक्य में दिया गया है, इसे पुरुष प्रतिपादक कैसे कहा जा सकता है ? उत्तर देते हैं कि-इसमें पुरुष का ही प्रतिपादन किया गया है। सांख्य शास्त्र में अचित् धर्म (सुखदुःखादि) के बंधन से मुक्त पुरुष स्वरूप के यथार्थ ज्ञान को ही अमृतत्त्व प्राप्ति का कारण कहा गया है “आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः” इत्यादि में, जीवात्मा के, प्रकृति बंधन से मुक्त स्वरूप का ही, अमृतत्व प्राप्ति के लिए उपदेश दिया गया है। सर्वेषामात्मनां प्रकृतिवियुक्तस्वात्मयाथात्म्यविज्ञानेन सर्व एवात्मानो विदिता भवन्तीत्यात्मविज्ञानेन सर्वविज्ञानमुपपन्नम्। देवादिस्यावरान्तेषुसर्वेषुभूतेष्वात्मस्वरूपस्य ज्ञानैकप्रकारत्वात् “इदं सर्वं यदयमात्मा” इत्यैकात्म्योपदेशः देवाद्याकाराणामनात्मा- कारत्वात् “सर्वं तं परादात्” इत्यादिनान्यत्वनिषेधश्च “यत्र हि द्वैतमिव भवति” इति च नानात्वनिषेधेनैकस्वरूपे हि आत्मनि देवादिप्रकृति परिणामभेदेन नानात्वं मिथ्येत्युच्यते। “तस्य वा एतस्यमहतोभूतस्य निश्वसितमेतद् यदृग्वेदः” इत्याद्यपि प्रकृते- रधिष्ठातृत्वेन पुरुषनिमित्तत्वाज्जगदुत्पत्तेरुपपद्यते। एवमस्मिन्वाक्ये पुरुषपरे निश्चिते सति तदैकार्थ्यात् वेदांताः तंत्रसिद्धं पुरुषमेवाद- धतीति तदधिष्ठिता प्रकृतिरेव जगदुपादानम्, नेश्वरः, इति। सभी आत्माओं का प्रकृति बंधन से मुक्त स्वरूप एक सा है, इस- लिए प्रकृति बंधन से अपने स्वरूप का यथार्थ ज्ञान हो जाने पर, सभी आत्माओं का परिज्ञान हो जाना स्वाभाविक है, इसलिए अपने ज्ञान से सबका ज्ञान हो जाता है, यह सिद्धान्त भी समीचीन है। देवादिस्यावर पर्यन्त सभी भूतों में आत्मज्ञान स्वरूप धर्म समान है इसलिए “यह सब आत्मस्वरूप है” ऐसा एकात्मोपदेश दिया गया, देवादि का आकार तो ज्ञानस्वरूप है नहीं। “सारे पदार्थ ही उसे प्रतारित करते हैं” इससे भेद बुद्धि का प्रतिषेध किया गया है तथा “जिससे द्वैतबृद्धि होती है” इत्यादि ankurnagpal108@gmail.com