श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
514 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला जालि-तीर्थे ]
जालियार चेष्टा देखि' सबार 18/45
जिह्वाय उच्चारिमु तोमार 11/34
जिह्वार लालसे येइ इति-उति 6/227
जीव क्षुद्रबुद्धि कोन् ताहा 20/71
जीव छार कँहा तार पाइबेक 18/21
जीवज्ञान-कल्पित, ईश्वरे 2/99
जीव दीन कि करिबे, ताहार 17/65
जीव-'प्रकृति' 'पति' करि' 7/99
'जीव' हञा केबा सम्यक् पारे 20/80
जीवे सम्मान दिबे जानि 20/25
ट
टानाटानि प्रभुर मन हैल 15/9
ठ
ठाकुर उपवासी रहे, जिये 2/65
त
तथाइ आमार सङ्ग हइबे 12/81
तथापि तोमार ताते प्राकृत 4/173
तथापि नूतनप्राय सब द्रव्ये 10/126
तथापि नामेर तेज ना हय 3/55
तथापि विषयेर स्वभाव-हय 6/199
तथापि भक्त-स्वभाव-मर्यादा 4/130
तथापि से निर्लज्ज, वृथा 16/136
तव कृपा काड़िल आमा 6/194
“तव योग्य नहे” बलि' बले 6/323
तबहिँ विकार पाय मोर 5/36
तबे आमार नाक काटिमु 3/197
तबे गोविन्द तार बहिर्वास 10/89
तबे जानिबा सिद्धान्तसमुद्र 5/132
तबे पाण्डित्य तोमार हइबे 5/133
तमो-रजो-धर्मे कृष्णेर ना 4/57
तरजा-प्रहेली आचार्य कहेन 19/18
तरजार ना जानि अर्थ 19/27
तरजा शुनि' महाप्रभु ईषत् 19/23
तरुणी-स्पर्शे रामानन्देर तैछे 5/19
तर्क ना करिह, तर्कगोचर 3/226
तर्क ना करिह, शुन, विश्वास 19/106
तर्केर गोचर नहे नामेर 3/204
तर्केर गोचर नहे चरित्र 19/103
ताँर आज्ञा बिना आमि ना 7/147
ताँर आज्ञा भाङ्गे ताँर 10/6
ताँर आज्ञाय आइला, आज्ञा 4/235
ताँर चरण धुञा करौँ 20/151
ताँर पिता कहे तारे 6/38
ताँर प्रसादे जानिलुँ 'कृष्ण 7/22
ताँर फल कि कहिमु 5/50
“ताँर येइ आज्ञा”—बलि' 19/23
ताँर लागि' आमि मरि 19/51
ताँर शेष पाइले, तोमार 6/123
ताँर सङ्गे आमार मन 7/17
ताँरे कैलि क्षुद्र जीव 5/119
ताँरे कैलि जड़-नश्वर 5/118
ताँरे तुमि उठाइला आपनार 18/65
ताँरे बालु दिया उपरे पिण्डा 11/69
ताँरे भय नाहि किछु, 'विषम' 7/94
ताँ-सबार आगे भट्ट-खद्योत 7/60
ताँ-सबार आचार-चेष्टा 13/37
ताहाते तर्क उठाञा दोष 8/49
ताँहा बिकाइ, याँहा बेचिते 12/74
ताहा बिना रत्न-शून्या 11/97
ताँहा याब, सेइ मोर 4/144
ताँहार मनेर भाव तैं ह 5/43
ता'ते अनुरागी वाञ्छे आपन 4/62
ताते जानि अप्राकृत-देह 5/42
ताते जानि,-कोन तपस्यार 16/138
ताते जानि-पूर्वे तोमार 1/117
ताते प्रेमभक्ति-'पुरुषार्थ 7/24
ताते बार बार कहि,-शुन 16/62
ताते 'वैष्णवेर झूटा' खाओ 16/58
तावत् इँहा बसि' शुन नाम 3/120
तार एक कणा स्पर्शि आपना 20/71
तार एक 'लव' ये पाय 16/98
तार दुःख देखि' तार 9/74
तार मध्ये पूर्वविधि 'प्रशंसा' 8/77
ता'र मध्ये मिथ्या केने 1/179
ता'र मध्ये सर्वश्रेष्ठ नाम 4/71
तार लक्षण-श्लोक शुन 20/20
तारे मिलिबारे प्रभु आवेशे 13/81
ताहा छाड़िते चाह तुमि 4/83
ताहा जानिबारे आर द्वितीय 5/43
ताहाते दीक्षित आमि हइ 3/238
ताहाते सुगन्धि तैल,-परम 12/108
ताहा बिना नहे तोमार 1/117
ताहा येइ पाय, तार सफल 16/135
ताहार गणना कारों, मने 9/109
ताहा हरि' भोग करे महापापी 9/89
तिन अमृते हरे काण, हरे 17/38
तिनगुण-क्षोभ नहे, 'महाधीर' 5/46
तिन चापड़ मारि' कह 18/62
तिन-दशाय महाप्रभु रहेन 18/77
तिनद्वार देओया आछे, प्रभु 14/60
तिन दिन रहि' सेइ विप्रेर 3/207
तिन पुत्र मरुक शिवार 12/20
तिन भोग खाइला, किछु 2/62
तिन 'रघुनाथ'-नाम हय 6/203
तिन-लक्ष नाम ठाकुर करेन 3/175
तिन हैते कृष्णनाम-प्रेमेर 16/63
तीरे रहि' देखि आमि 18/82
तीर्थेर महिमा, निज-भक्ते 2/169
[ तुम्हि-देखि पद्य सूची 515
तुम्हि एत कृपा कैला 7/125 | तोमार गुणे स्तुति कराय 4/170 | दधि, चिड़ा भक्षण कराह 6/51
तुम्हि ऐछे ना करिले करे 4/132 | तोमार दर्शन ये पाय, सेइ 7/8 | दम्भ करि' बलि, श्रोता 20/100
तुम्हि कृपा कैले ताँरे 6/131 | तोमार देह आमारे लागे 4/172 | दर्शन दूरे, 'प्रकृतिर' नाम 5/35
तुम्हि कृष्णनाम-मन्त्र कैला 16/71 | तोमार देह कहेन प्रभु 4/94 | दर्शने पवित्र हबे,—इथे 7/9
तुम्हि खाइले हय कोटि 3/220 | तोमार देह तुम्हि कर 4/172 | दर्शनेन्द्रिये शिष्य करि' 14/47
तुम्हि ना देखाइले इहा शिखिमु 13/59 | तोमार नित्य दास मुइ, तोमा 20/33 | दाता, भोक्ता—दुँहार मलिन 6/279
तुम्हि मोरे करियाछ आत्म 4/76 | तोमार बाप-ज्येठा—विषय 6/197 | 'दारी संन्यासी' करि' आमारे 12/114
तुम्हि-सर्वगुरु, तुम्हि-जगतेर 4/103 | तोमार भजन-फले तोमाते 9/69 | दारु-प्रकृति हरे मुनेरपि 2/118
तुलसी सेवन करे, चर्वण 3/140 | तोमार यैछे विषयत्याग, तैछे 1/201 | 'दास' करि' वेतन मोरे देह' 20/37
तुषानले पोड़े,—येन ना 20/41 | तोमार योग्य নহে,—याबे 11/38 | दिने नृत्य-कीर्त्तन, ईश्वर 11/12
तुष्ट हञा शिला-माला 6/293 | तोमार शरीर—मोर प्रधान 4/78 | दिने प्रभु नाना-सङ्गे हय 6/7
तृतीय दिवसे प्रभु ताँर 12/121 | तोमार सङ्गे लोभ हैल 3/254 | दीक्षाकाले भक्त करे आत्म 4/192
तृष्णानुरूप झारी भरि' 20/88 | तोमार सेवक, करौं तोमार 20/34 | दीनदयालु-गुण तोमार ताहाते 4/182
तेँह जानाइला, कृष्ण—स्वयं 7/23 | तोमार सेवा छाड़ि' आमि 19/9 | 'दीन' देखि' कृपा करि' 5/62
तेँह देखाइला मोरे भक्तियोग 7/22 | तोमार हृदय एइ जानिबे 1/115 | दीने दया करे,—एइ साधु 3/235
तेँह याँर पदधूलि करेन 7/45 | तोमारे उपदेश करे, ना 4/159 | दीनेरे अधिक दया करे 4/68
तेँह सेइ शिला-गुञ्जामालो 6/288 | तोमारे काड़िल विषय-विष्ठा 6/193 | दुइ अपूर्व वस्तु पाञा प्रभु 6/290
तेँहो कहे,—"बाउलि, केने 12/23 | तोमारे क्षीण देखि, शुनि 8/63 | दुष्कार्ये अवधूत करेन 3/148
तेँहो कहे,—"संख्या-कीर्त्तन 11/23 | तोमारे ये स्मरण करे, से 7/9 | दुइगुण याँहा, ताँहा नाहि 7/127
तैल भाङ्गि' सेइ पथे निज 12/120 | तोमारे 'लाल्य', आपनाके 4/184 | दुइ-ठाञि अपराधे पाइबि 5/120
तोमरा कृष्णनाम-लह,—कोन् 7/100 | तोमारेह उपदेशे, बालका करे 4/160 | दुइ त' ईश्वरे तोर नाहिक 5/117
तोमाके देखिये,—येन साक्षात् 7/8 | तोमा लागि' रामानन्द राज्य 9/70 | दुइदिके दुइपत्र-मध्ये कोमल 6/297
तोमा-दुँहार कृपाते इँहार 1/57 | तोमा लागि' सनातन 'विषय' 9/70 | दुइ प्रकारे सहिष्णुता करे 20/22
तोमा-स्पर्शे पवित्र हय 4/129 | तोमा सबार दोष नाहि 3/203 | दुइ वस्तु महाप्रभुर आगे 6/289
तोमार अनुकम्पा चाहे, भजे 9/76 | तोमा-सबारेह उपदेश करिते 4/158 | दुर्गति ना हय तार, सद्गति 2/159
तोमार आगमने मोर पवित्र 5/30 | तोमा सम 'निरपेक्ष' नाहि 3/23 | दुर्द्दैव-झञ्झापवने, मेघे 15/68
तोमार आगे धाष्टर्य एइ 1/174 | तोमा-सम भाग्यवान् नाहि 4/94 | दुर्द्दैवे सेवक यदि याय 4/47
तोमार आगे मूर्ख आमि 7/122 | तोरे देखि' मैले मोर हबे 8/22 | दुर्वार इन्द्रिय करे विषय 2/118
तोमार आज्ञाते आमि आछि 3/39 | त्रिजगते तोमार चरित्र बुझे 12/28 | दुर्वासार ठाञि तेँहो पाञाछेन 6/116
तोमार एइ दशा केने 18/46 | | दूरे गान शुनि' प्रभुर 13/80
तोमार कृपा-अञ्जने गर्व 7/125 | द | दूरे रहि' भक्ति करि' सङ्गे 13/37
तोमार कृपा बिना केह 6/131 | | देखा दिया मन हरि' करे 15/80
तोमार कृपाय वंशे मङ्गल 4/29 | दड़िर बन्धने ताँरे राखिबा 6/40 | देखि एइ उपाये, कृष्ण 17/55
तोमार कृष्णनाम-कीर्त्तन 3/250 | दण्ड-दुइ वह प्रभुर हैल 10/91 | देखिते ना पारों आमि 2/117
516 | श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला | देखि-पाद ]
[स्तम्भ १]
देखि' त्रास उपजिल सब २/१४४
देखेन, एक जालिया आइसे १८/४४
देखे, शीघ्र आसि' बसिला २/६२
देखे, —हरिदास-ठाकुर ११/१७
देखौं, —यदि कृष्ण करेन १४/१०६
देहत्यागादि तमो-धर्म ४/६०
देहत्यागादि यत, सब ४/५७
देहत्यागे कृष्ण ना पाइ ४/५६
देह' देह' बलि' प्रभु ११/८८
देह-देहि-भेद ईश्वरे कैले ५/१२१
देहमात्र धन तोमाय कैलुँ १२/७४
देहेर स्वभावे करेन स्नान १४/३९
दैन्य-वैराग्य-पाण्डित्येर १/२०१
द्वादश वत्सर ऐछे दशा २०/६९
द्वार चाहि' फिरि' शीघ्र १९/६३
द्वार-माना, हरिदास दुःखी २/११४
द्वारे बसि' शुन तुम नाम ३/२४०
'द्वैते' भद्राभद्र-ज्ञान, सब ४/१७६
ध
धन, जन नाहि मागों २०/३०
धर्म छाड़ाय वेणुद्वारे, हाने १७/३६
धाञा यायेन प्रभु, स्त्री १३/८३
ध्याने तबे प्रभु महाप्रभुरे ६/७७
न
नयने देखिमु तोमार चाँद ११/३३
ना कहिले हय मोर २०/१००
ना गणि आपन दुःख, सबे २०/५२
नाटक-लक्षण सब, सिद्धान्तेरे १/१९३
'नाटकालाङ्कार'-ज्ञान नाहिक ५/१०४
नाना-भाव-चन्द्रोदये हयेन २०/६६
नाना-रोगग्रस्त, —चलिते बसिते २०/९४
[स्तम्भ २]
नाम-प्रेम आस्वादिला मनुष्ये ३/२६२
नामसङ्कीर्त्तन—कलौ परम २०/८
नामसङ्कीर्त्तने हय सर्वानर्थ २०/११
नाम समाप्त हैले करिमु ३/२४०
ना मानिले दुःखी हइबेक ६/२७६
नामाभास हैते हय संसाररे ३/६१
नामाभास हैते हय सर्वपाप ३/६१
नामाभासे 'मुक्ति' हय सर्वशास्त्रे ३/६४
नामेर अक्षर-सबेर एइ त' ३/५९
नामेर फले कृष्णपदे प्रेम ३/१७७, ७/१०४
नामेर महिमा यँह करिला ११/९९
नामेर माधुरी ऐछे काँहा १/१०१
नामेर सहित प्राण करिला ११/५६
नारद-प्रह्लादादि आसे मनुष्य ३/२६१
नारायण-हृदि स्थिति, तबु २०/६०
निकटे ना आइस, चोरा ६/५०
निगूढ़ चैतन्यलीला बुझिते ७/१६५
निज-कृपागुणे प्रभु बान्धिला १२/८३
निज-देहे ये कार्य ना ४/९५
निज-भक्ते दण्ड करेन २/१४३
निज-सुखे माने लाभ २०/५५
नित्यसिद्ध सेइ, प्राय-सिद्ध ५/५०
नित्यानन्द-कृपापात्र-वृन्दावन २०/८२
नित्यानन्दप्रभु भोके व्याकुल १२/१९
नित्यानन्दे आज्ञा दिलुँ गौड़ेते १२/६९
नित्यानन्दे कहिला, —'तुमि ना १२/८१
नित्यानन्देर नृत्य देखेन आसि' २/८०
नित्यानन्देर नृत्य, —येन ताँहार ६/१०४
निवेदन-प्रभावेह तबु फले ९/११४
निरन्तर नाम कर तुलसी ३/१३६
निरपराधे नाम लैले पाय ४/७१
'निरपेक्ष' नहिले 'धर्म' ना ३/२३
निर्विकार देह-मन-काष्ठ-पाषाण ५/४१
[स्तम्भ ३]
'निर्विघ्ने चैतन्य पाउँ'—कर ६/१३३
निर्विण्ण हइनु, मोते 'विषय' ९/१३९
निषेधिह इँहारे, —येन ना करे ४/८८
निष्किञ्चन भक्त खाड़ा हय ६/२१७
निस्तारेर हेतु तां'र त्रिविध २/३
नीचजाति नहे कृष्णभजने ४/६६
नीच-शूद्र-द्वारा करेन धर्मेर ५/८४
नेत्रजले सेइ शिला भिजे ६/२९२
प
पञ्चगुणे करे पञ्चेन्द्रिय आकर्षण १५/८
पञ्चरोग-पीड़ा-व्याकुल, रात्रि २०/९४
पड़ियाछौं भवार्णवे मायाबद्ध २०/३३
पण्डित कहे, —'ये खाइबे १२/१३४
पण्डित हञा मने केने ३/१५
पण्डिते ना बुझे तार १९/१०८
पण्डितेर भाव-मुद्रा कहन ७/१५९
पण्डितेह तार चेष्टा बुझिते १९/१०४
पतिव्रता हञा पतिर नाम ७/१००
पतिर आज्ञा, —निरन्तर ताँर ७/१०३
पतिर आज्ञा पतिव्रता ना ७/१०३
पथे याइते तैलगन्ध मोर १२/११४
पथे सिञ्जे बाड़ी' हय, फुटिया १३/८१
परविधि 'निन्दा' करे 'बलिष्ठ' ८/७७
परम दुर्लभ एइ कृष्णाधरामृत १६/१३५
परमार्थ याय, आर हय रसेर ६/२२५
परमार्थे प्रभुर कृपा, सेह ९/१०८
परेर द्रव्य तुमि केने चाह ४/७७
परेर स्थाप्य द्रव्य केह ना ४/८८
पाइनु वृन्दावननाथ, पुन: १४/३७
पात्रा कृष्णेर लीला देखिते १४/१०५
पाँचगण्डार पात्र हय संन्यासी ९/४०
पाद-सम्वाहन कैल, कटि-पृष्ठ १०/९०
[ पिक-फला पद्य सूची 517
पिकस्वर-कण्ठ, ताते रागे 13/128 | प्रभु कहे,—“कृष्णकृपा बलिष्ठ 6/193 | प्रभुर गम्भीर लीला ना पारि 20/77
पिछे निन्दा करे, आगे बहुत 8/15 | प्रभु कहे,—“कृष्णनामेर बहु 7/81 | प्रभुर विच्छेदे कार देहे 18/39
पिपिलिका मैले पृथिवीर 11/41 | प्रभु कहे,—“कोन व्याधि 11/23 | प्रभुर विरहोन्माद-भाव—गम्भीर 14/5
पुत्र ‘वातुल’ हइल, राखह 6/38 | प्रभु कहे,—“गोविन्द, आजि 13/85 | प्रभुर यतेक गुण स्पर्शिते 8/41
पुत्र-भृत्य-रूपे तुमि कर 6/202 | प्रभु कहे,—“तुमि ‘पण्डित’ 7/127 | प्रभुर ‘शिक्षाष्टक’-श्लोक येइ 20/65
पुनः पुनः सर्वशास्त्रे फुकारिया 16/61 | प्रभु कहे,—“तोमार देह मोर 4/76 | प्रभुर सङ्गे यत महान्त 6/150
पुनरपि सेइ पथे बाहुड़ि’ 13/84 | प्रभु कहे,—“वृद्ध हइला 11/24 | प्रभु लेखा करे यारे 2/105
‘पुरीदास’ बलि’ नाम धरिह 12/47 | प्रभु कहे,—“वैरागी करे 2/117 | प्रभु हासि’ कहे,—“स्वामी ना 7/111
पुरीर स्वभाव,—यथेष्ठ आहार 8/71 | प्रभु कहे,—“वैष्णव-देह 4/191 | प्रश्रय-प्रागल्भ्य शुद्ध-वैदग्धी 12/60
पुष्पगन्ध लञा बहे मलय 19/81 | प्रभु कहे,—“भागवतार्थ बुझिते 7/78 | प्रसन्न ना हय इहाय, जानि 6/274
पूजाकाले देखे शिलाय 6/300 | प्रभु कहे,—“भाल कैल 6/284 | प्रसाद-कड़ार-सह बान्धि’ 13/134
पूजा-निर्वाहण हैले पाछे करेन 19/27 | प्रभु कहे,—“मोर वश नहे 2/124 | प्रसाद मागिये भिक्षा देह त’ 11/74
पूजा लागि’ कतकाल करेन 19/26 | प्रभु कहे,—‘रामानन्द विनयेरे 5/77 | प्रसिद्धा वैष्णवी हैल परम 3/141
पूजिते चाहिये आमि सबार 6/150 | प्रभु कहे,—“रूपे कृपा कर 1/56 | ‘प्राकृत’ हैलेह तोमार वपु 4/174
पूर्ण-षड़ैश्वर्य चैतन्य—स्वयं 5/119 | प्रभु कहे,—“शक्ति नाहि अङ्ग 10/86 | प्राण-रक्षा लागि’ येबा करेन 6/313
पूर्णानन्द-चित्स्वरूप जगन्नाथ 5/118 | प्रभु कहे,—“संन्यासीर तैले 12/108 | प्राण-राज्य करों प्रभुपदे 9/96
पूर्वप्राय यथावत् शरीर हइल 14/71 | प्रभु कहे,—“समुद्र एइ 11/64 | प्रीति-स्वभावे काँहा कोन 4/171
पूर्वे आमि ‘रामनाम’ पाञाछि 3/254 | प्रभु कहे,—‘हरिदास, ये तुमि 11/37 | प्रेमधन बिना व्यर्थ दरिद्र 20/37
पूर्वे येन रघुनाथ सब अयोध्या 3/80 | प्रभु कहेन,—“उद्वेगे घरे ना 19/63 | प्रेम-परकाश नहे कृष्णशक्ति 7/14
पृथिवीते विज्ञवर नाहि ताँर 1/200 | प्रभु कहेन,—“कृष्णकथा आमि 5/7 | प्रेमवश गौरप्रभु, याँहा प्रेमोत्तम 2/81
पृथिवीते भक्त नाहि उद्धव 7/44 | प्रभु-कृपापात्र, आर क्षेत्रेर 2/158 | प्रेमवाची ‘हा’-शब्द ताहाते 3/58
पेटाङ्गि-गाय करे दण्डवत् 12/37 | प्रभुगणे याँ’र देखे अल्प 3/45 | प्रेम बिना कृष्णप्राप्ति अन्य 4/58
पेटेर भितर हस्त-पाद—कूर्मेर 17/16 | प्रभु ताँर उपर करेन पाद 19/68 | प्रेमाविष्ट हय—प्रभुर सहज 2/35
प्रकृति-दर्शन कैले एइ 2/165 | प्रभु ना खाइले केह ना 11/85 | प्रेमावेशे पड़िला तँहो समुद्रेर 18/65
प्रकृति-दर्शने स्थिर हय 5/36 | प्रभु पड़ि’ आछेन दीर्घ हात 14/64 | प्रेमार विकार वर्णिते चाहे येइ 18/19
प्रकृति-सम्भाषी वैरागी ना करे 2/124 | प्रभु-पादतले शङ्कर करेन 19/68 | प्रेमी भक्त वियोगे चाहे देह 4/61
प्रचार करेन केह, ना करेन 4/102 | ‘प्रभु-पादोपाधान’ बलि’ ताँर 19/69 | प्रेमे आज्ञा भाङ्गिले हय 10/8
‘प्रतिध्वनि’ नहे, सेइ करये 3/70 | प्रभु बोले,—“निति निति 6/324 | प्रेमे कृष्ण मिले, सेह ना 4/61
प्रतीत करिते कहि कारण 3/259 | प्रभु-भङ्गी एइ, पाछे जानिबा 2/159 | प्रेमेर स्वभाव, याँहा प्रेमेर 20/28
प्रभु कहे,—“अङ्ग आमि नारि 10/87 | प्रभुमात्र बुझेन, केह बुझिते 19/18 | प्रेमेर ‘स्वरूप’ जाने, पाय 12/154
प्रभु कहे,—“अज्ञ बालक मुञ 8/67 | प्रभुर अत्यन्त प्रिय पण्डित 19/4 |
प्रभु कहे,—“एइ ये दिला 16/97 | प्रभुर ‘अन्तरङ्ग’ बलि’ याँरे 6/11 | फ
प्रभु कहे,—“एइ शिला कृष्णेर 6/294 | प्रभु आगे आङ्गिनाते फेलिला 12/119 |
प्रभु कहे,—“कर वा ना कर 10/88 | प्रभुर आज्ञाय कृष्णकथा शुनिते 5/58 | ‘फलाभास’ एइ,—याते विषय’ 9/137
518 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला बड़-महा ]
ब
बड़ बड़ वैष्णव ताँर दर्शनेते 3/141
बसि' कृष्णनाम मात्र करिये 7/79
बहु जन्म पुण्य करे, तार 16/131
बहुदिनेर अपराधे पाइल 3/146
बाउलके कहिह,—लोक 19/20-21
'बाउल' हञा आमि कैलुँ 19/9
'बान्धे सबारे'—ताते अविद्या 5/145
बार बार गोविन्द कहे 10/87
'बालिश'—तथापि 'शिशुप्राय' 5/140
'बासि' विस्वाद नहे, सेइ 10/126
बाहिरे जड़िमा, अन्तरे आनन्द 17/17
बाह्य अर्थ करिबारे करि 3/48
बाह्य प्रकाशिते एस्ब करिला 3/89
बाह्यार्थ येइ लय, सेइ नाश 7/164
बिश, पञ्चाश, दश, बार 6/151
बुझिते ना पारे केह, यद्यपि 14/5
बुद्धि-प्रवेश नाहि, ताते 20/77
बुद्धिभ्रष्ट हैल तोमार गोपालेर 2/94
ब्रह्मलोक-आदि सुख ताँरे 6/136
ब्रह्मस्व-अधिक एइ हय 9/89
ब्रह्मादि-दुर्लभ एइ निन्दये 16/97
ब्रह्मार दुर्लभ तोमार श्रीचरण 12/29
ब्रह्मा-शिव आदि याँर 9/115
ब्रह्मा-शिव-सनकादि पृथिवीते 3/260
'ब्राह्मणेर सेवा',—एइ मोर 13/97
भ
'भकतवत्सल' तुमि, मुइ 11/42
भक्त-चित्ते भक्त-गृहे सदा 6/124
भक्त-ठाञि लुकाइते नारे 3/90
भक्तपदधूलि आर भक्तपद 16/60
भक्त-प्रेमार ये-दशा, ये 18/16
भक्तभाव अङ्गीकारे, ताहा 18/17
भक्त-भक्ति-कृष्ण-तत्त्व 4/219
भक्तभुक्त-शेष,—एइ तिन 16/60
'भक्तशेष' हैले महा-महाप्रसाद 16/59
भक्त-स्वभाव,—अज्ञ-दोष 3/211
'भक्ति', 'प्रेम', 'तत्त्व' कहे 5/85
'भक्ति' बिना कृष्णे कभु नहे 4/58
भक्तिसिद्धान्त-सिन्धु नाहि 5/103
भक्तिसुख-आगे 'मुक्ति' 3/194
भक्तेर प्रेम-विकार देखि' 18/15
भजनेर मध्ये श्रेष्ठ नवविधा 4/70
भद्राभद्र-वस्तुज्ञान नाहि 4/174
भवसिन्धु तरिवारे आछे यार 11/107
भागवत पड़, सदा लह 13/121
भागवतार्थ शुनिते आमि नहि 7/78
भागवते स्वामीर् व्याख्यान 7/109
भावग्राही महाप्रभु स्नेहमात्र 10/18
भावानुरूप श्लोक पड़ेन राय 17/6
भावुकेर सिद्धान्त शुन, पण्डितेर 3/191
भारत-भूमिते जन्मि' एइ 4/98
भाल कैल, वैरागीर धर्म 6/222
भाल ना खाइबे, आर भाल 6/236
भाल-मन्द-किछु आमि 5/62
भाल हैल—जानिया से आपनि 6/280
भितर-घरे गेला गोविन्द प्रभुरे 10/89
भूत नहे, तँहो-कृष्णचैतन्य 18/64
भूत-प्रेत आमार ना लागे 18/57
भोके मरि' गेनु, मोरे वासा 12/20
म
मड़ा रूप धरि' रहे उत्तान 18/54
मदनमोहन-नाट, पसारि 19/98
मधुर प्रसङ्ग इहार काव्य 1/198
मधुर-मर्द्दने प्रभुर परिश्रम 10/90
मध्याह्ने आसिमु, एबे याइ 12/122
'मनुष्य' नहे राय, कृष्णभक्ति 5/71
मने मने जपे, मुखे ना 16/72
मनेर सन्तोषे ताँरे कैला 3/89
मन्त्र पाञा कार आगे 16/71
मन्द मन्द करितेछेन संख्या 11/17
मर्द्दनिया एक राख करिते 12/112
मर्यादा-पालन हय साधुर 4/130
मर्यादा राखिले, तुष्ट हय मोर 4/132
मर्यादा-लङ्घन आमि ना पारों 4/166
मर्यादा-लङ्घने लोक करे 4/131
महदनुग्रह-निग्रहेर साक्षी दुइजने 8/30
महदपराधेर हैल फल अद्भुत 3/144
महानुभवेर एइमत 'स्वभाव' 5/78
महान्तेर अपमान ये देश 3/163
महा-अपराध हय प्रभुर 10/99
महाप्रभु-नित्यानन्द, दोहार 19/109
महाप्रभु पादाङ्गुष्ठ तार मुखे 12/50
महाप्रभुर आगे, आर देखि' 4/12
महाप्रभुर आसन डाहिने पातिया 6/107
महाप्रभुर कृपा-ऋण के 12/83
महाप्रभुर दत्त माला मननेर 13/134
महाप्रभुर दर्शन पाय कोन 6/82
'महाप्रभुर प्रसाद' जानि' ताँहारे 13/52
महाप्रभुर भक्तगणेर दुर्गम 5/21
महाप्रभुर भक्तगणेर वैराग्य 6/220
महाप्रभुर श्रीहस्ते अल्प ना 11/82
महाप्रसाद आनियाछ, केमते 11/19
महाविषय कर, किबा विरक्त 9/141
महाभागवत, कृष्ण प्राणधन 2/96
महाभागवत तुमि,—तोमार 3/250
महाभागवत तँहो, सरल 16/6
महाभागवत हरिदास—परम 11/105
[ महा-राज्य ] [ पद्य सूची ] [ 519 ]
| | | | | |
|---|---|---|---|---|---|
| महा-महा विप्र एथा कुलीन | 3/217 | यत नाचाइला, नाचिं करिला | 20/149 | याहा हैते पाइबा कृष्णप्रेम | 17/69 |
| महा-मादक हय एइ कृष्ण | 16/113 | यति हञा जिह्वा-लाम्पट्य | 8/83 | येइ चतुर, सेइ करे राजार | 9/33 |
| महिषीर गीत येन 'दशमे'र | 19/108 | यतिर धर्म,—प्राण राखिते | 8/83 | येइ जन कहे, सुने करिया | 5/45 |
| मागिया खाञा करे जीवन | 6/223 | यथायोग्य उदर भरे, ना | 8/64 | येइ भजे, सेइ बड़, अभक्त | 4/67 |
| मागिले वा केने दिबे दुइलक्ष | 9/40 | 'यद्वा-तद्वा' कविर वाक्ये | 5/102 | येइ महाप्रभु कह़ान, सेइ | 1/211 |
| मातार यैछे बालकेर 'अमेध्य' | 4/186 | यद्यपि अन्यत्र सङ्केते हय | 3/55 | येइ ये मागये, तारे देय | 20/24 |
| मातृभक्तगणेर प्रभु हन | 19/14 | यद्यपिओ तुमि हओ जगत् | 4/129 | ये कराइते चाहे ईश्वर, सेइ | 4/96 |
| मानसेइ कृष्णचन्द्रे अर्पिला | 16/33 | यद्यपि काहार 'ममता' बहुजने | 4/171 | ये-गोपी मोर करे द्वेषे | 20/56 |
| माया-दासी 'प्रेम' मागे,—इथे | 3/264 | यद्यपि प्रभु—कोटिसमुद्र | 20/66 | ये ना खाय, तारे खाओयाय | 8/71 |
| मायावाद शुनिवारे उपजिल | 2/94 | यद्यपि ब्रह्मण्य करे ब्राह्मणेर | 6/198 | ये वंशेर उपरे तोमार हय | 4/44 |
| मायावाद-श्रवणे चित्त अवश्य | 2/96 | यद्यपि मासेकेर बासि मुकुता | 10/125 | येमन अपराध भृत्येरे, योग्य | 12/27 |
| मायावादी संन्यासी आमि, ना | 7/16 | यवनसकलेर मुक्ति हबे | 3/53 | ये मुक्ति भक्त ना लय | 3/185 |
| माहितिर भगिनीर नाम—माधवी | 2/104 | यमुनाते जलकेलि गोपीगण | 18/32 | येरूपे लइले नाम, प्रेम | 20/20 |
| 'मुक्ति' तुच्छ-फल हय | 3/185 | यमुनार जले महारङ्गे करेन | 18/81 | यैछे कहाय, तैछे कहि | 5/73 |
| मुक्ति-हेतु तारक हय | 3/255 | याँहा गुण शत आछे, ना | 8/79 | यैछे तैछे करे मात्र उदर | 8/62 |
| मुखर जगतेर मुख पार | 3/14 | याँहा प्रीति ताँहा आइसे | 3/7 | यैछे नाचाओ, तैछे नाचि | 4/74 |
| मुखे फेन, पुलकाङ्ग, नेत्रे | 17/16 | याहार चरित्रे प्रभु पायेन | 19/4 | योग्य जन नाहि पाय, लोभे | 16/137 |
| मुञि कोन् क्षुद्र,—येन खद्योत | 1/173 | याते विवरिते पारेन कृष्णरस | 1/57 | | |
| मुद्रा देह' विचारिया योग्य | 6/151 | यावत् कीर्त्तन समाप्त नहे | 3/239 | र | |
| मोर द्रव्य लइते चित्त ना | 6/275 | यावत् बुद्धिर गति, ततेक | 20/81 | रक्तवस्त्र वैष्णवेर' परिते ना | 13/61 |
| मोर पादजल येन ना लय | 16/43 | यार कृष्णकथाय रुचि, सेइ | 5/9 | रघुनाथ कहे मने,—'कृष्ण | 6/194 |
| मोर मुखे कथा इँहा करे | 5/74 | यार यत शक्ति, तत करे | 20/79 | रघुनाथदासेर तेंहो हय ज्ञाति | 16/8 |
| मोर मुखे कथा कहेन आपने | 5/73 | यारे कृपा करेन, तार | 19/109 | रघुनाथेर नियम,—येन पाषाणे | 6/309 |
| 'मोर सखा', 'मोर पुत्र',—एइ | 7/31 | यारे चाहि छाड़िते, से शुञा | 17/56 | रघुनाथेर पादपद्मे बेचियाछौं | 4/40 |
| मोर सुख—सेवने, कृष्णेर | 20/59 | यारे मिले सेइ माने | 12/101 | रथे देह छाड़िमु,—एइ परम | 4/12 |
| मोरे 'चैतन्य' देह' गोसाञि | 6/132 | यारे यैछे नाचाओ, से | 4/86 | 'रस', 'रसाभास' यार नाहिक | 5/103 |
| मोरे दिते मनःपीडा, मोर | 20/51 | याह, भागवत पड़ वैष्णवेर | 5/131 | 'रसाभास' हय यदि | 5/97 |
| मोरे पियाओ गौरवस्तुति | 4/163 | याहा देखि' प्रीत हन गौर | 6/220 | राघवेर घरे रान्धे राधा | 6/115 |
| मोरे मुख ना देख़ाबि | 8/22 | याहार दर्शने मुनिर हय | 3/236 | राजदण्ड्य हय सेइ शास्त्रेर | 9/90 |
| मोरे यदि दिया दुःख, ताँर | 20/52 | याहार श्रवणे भागे 'अज्ञान | 3/46 | राज-द्रव्य शोधि' पाय | 9/33 |
| मोरे शिक्षा देह',—एइ भाग्य | 8/67 | याहार श्रवणे हय विश्वास | 3/259 | राजहंस-मध्ये येन रहे बक | 7/98 |
| | | याहा हैते अन्य पुरुषसकल | 5/144 | राजार वर्त्तन खाय, आर | 9/90 |
| य | | याहा हैते अन्य 'विज्ञ' | 5/141 | 'राज्य-विषय'-फल एइ | 9/109 |
| यत दुःख, यत सुख, यतेक | 18/16 | याहा हैते पाइबा वाञ्छित सब | 16/58 | | |
520 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला रातू-शीघ्र ]
रातुल वस्त्र देखि' पण्डित 13/52
रात्रिकाले बाड़े प्रभुर विरह 6/7
रात्र्ये राय-स्वरूप-सने 11/12
राधिकादि गोपीगण-सङ्गे 18/81
राधिकार भावे प्रभुर सदा 14/14
रामचन्द्र खाँन अपराध-बीज 3/143
रामदास कहे, —“आमि शूद्र 13/97
'राम' दुइ अक्षर इहा नहे 3/58
रामानन्देर कृष्णकथा, स्वरूपेर 6/6
राय कहे, —“ईश्वर तुमि 1/203
राय कहे, —“कह सहज 1/149
राय कहे, —“रूपेर काव्य 1/180
राय, भट्टाचार्य बोले, —'तोमार 1/115
रासस्थलीर बालु, आर 13/67
रूप-गोसाञि कहे, —'साहजिक 1/149
रौरव हइते मोरे वैकुण्ठे 11/28
ल
लइते ना पारि ताँर व्याख्यान 7/109
लक्ष्मी-आदि करि' कृष्णप्रेमे 3/262
लालकेर लाल्ये नहे दोष 4/184
'लाल्यामेध्य' लालकेर चन्दन 4/187
लीलामृत-वरिषणे, सिञ्चे चौद्द 15/68
लीला सम्वरिबे तुमि, —लय 11/31
लोकहित लागि' तोमार सब 2/136
व
वन्द्याभावे 'अनम्र' —'स्तब्ध' 5/141
वाक्यदण्ड करि' करे मर्यादा 3/45
'वाचाल' कहिये—'वेदप्रवर्त्तक' 5/140
वायु यैछे सिन्धुजलेर हरे 18/20
विदग्ध-आत्मीय-वाक्य शुनिते 5/107
विद्यापति, चण्डीदास, श्रीगीत 17/6
विद्युत्प्राय देखा दिया हय 14/78
विप्रेर श्राद्धपात्र खाइनु 'म्लेच्छ' 11/30
“विवाह ना करिह” बलि' 13/112
विरह-वेदनाय प्रभुर राखये 6/6
विश्वास करिया कर ए 16/62
विश्वास करिया शुन करिया 3/226
विषय लागि' तोमाय भजे 9/69
विषय-सुख दिते प्रभुर नाहि 9/114
'विषयी' हञा संन्यासीरे उपदेशे 5/80
विषयीर अन्न खाइले मलिन 6/278
विषयीर अन्न हय 'राजस' 6/279
विषयीर द्रव्य लञा करि 6/274
विषयीर भाल मन्द वार्त्ता 9/93
वृक्ष येन काटिलेह किछु 20/23
वृद्ध-जरातुर आमि अन्ध 20/93
वृद्ध माता-पितार याइ' करह 13/113
वृद्धा तपस्विनी आर परमा 2/104
वेणुनाद-अमृत-घोलेले, अमृत 17/38
वेश्यागणे आनि' करे छिद्रेर 3/103
वेश्यार भितरे तारे करिये 7/111
वैरागी करिबे सदा नाम 6/223
वैरागी हञा एत खाय 8/14
वैरागी हञा करे जिह्वार 6/225
वैरागी हञा येबा करे 6/224
वैरागीर कृत्य-सदा नाम 6/226
वैराग्येर कथा ताँर अद्भुत 6/311
वैष्णवधर्म निन्दा करे, वैष्णव 3/146
वैष्णव-पाश भागवत कर 13/113
वैष्णव हञा येबा शारीरक 2/95
वैष्णवेर उच्छिष्ट खाइते तँहो 16/8
वैष्णवेर कर्त्तव्य याँहा पाइये 4/221
'वैष्णवेर' तेज देखि' भट्टेर 7/60
वैष्णवेरे निन्द्य-कर्म नाहि 13/133
वैष्णवेर शेष-भक्षणेर एतेक 16/57
व्यवहार लागि' तोमा भजे 9/68
व्यवहारे-परमार्थे तुमि-तार 4/159
व्यवहित हैले ना छाड़े आपन 3/59
'व्याकरण' नाहि जाने, ना 5/104
व्रज छाड़ि' कृष्ण कभु 1/66
व्रजवधु-सङ्गे कृष्णेर रासादि 5/45
व्रजलीला-प्रेमरस येन वर्णे 1/199
व्रजे राधाकृष्ण-सेवा मानसे 6/237
व्रजेश्वर-शुद्धप्रेम, —येन जाम्बुनद 20/62
श
शङ्कर-पण्डिते प्रभुर सङ्गे 19/67
शङ्करानन्द-सरस्वती वृन्दावन 6/288
शङ्ख-घण्टा आदि सह आरति 16/88
शचीर मन्दिरे, आर नित्यानन्द 2/34
शत-जनेरे भक्ष्य प्रभु दण्डेके 10/127
शब्द ना पाञा स्वरूप कपाट 14/60
शरीर सुस्थ हय मोर, असुस्थ 11/22
शाक-पत्र-फल-मूले उदर 6/226
शाखा-चन्द्र-न्याय करि' 17/65
'शास्ति'-छले कृपा कर 12/28
शास्त्र करि' कतकाल 'भक्ति' 4/235
शास्त्रलोकातीत येइ येइ 14/82
शास्त्रे कहे, —नामाभास-मात्रे 3/193
शास्त्रे येइ दुइ धर्म करियाछे 8/75
शिखि-माहिति—तिन, ताँर 2/106
शिवानन्देर पत्नी ताँरे कहेन 12/22
शिरेर पाथर येन पड़िल 8/95
शिला दिया गोसाञि समर्पिला 6/307
शिलारे कहेन प्रभु, —'कृष्ण 6/292
शिश्नोदर-परायण कृष्ण नाहि 6/227
शिष्य हञा गुरुके कहे 8/18
शीघ्र आसिह, ताँहा ना रहिह 13/39
[ शुइ-सिद्ध ] पद्य सूची 521
शुइया रहिला घरे कपाट 12/120 षड्दर्शने जगद्गुरु भागवतोत्तम 7/21 सबे एइ आस्वाद कर करि' 16/114
शुकाञा मैलेह कारे पानी 20/23 षोडशोपचार-पूजाय तत सुख 6/302 सब-लोके निस्तारिला जङ्गम 5/153
शुद्ध कृपा कर, गोसाञि 9/139 सबे कृपा करि' इँहारे 1/199
'शुद्धप्रेम' व्रजदेवीरे—कामगन्ध 7/39 स सबे कृष्ण भजन करे 13/133
'शुद्धवैष्णव' नहे, वैष्णवेर प्राय' 6/198 सबे गाय,—“जय जय 11/99
'शुद्धभक्ति' देह' मोरे, कृष्ण 20/30 सङ्कीर्त्तनयज्ञे कलौ कृष्ण 20/9 सबे चारि-दण्ड आहार 6/310
शुद्धभावे व्रजेश्वरी करेन 7/30 सङ्कीर्त्तन हैते पाप-संसार 20/13 सबे देखि—हय मोर कृष्ण 14/78
शुद्धभावे सखा करे स्कन्ध 7/30 संख्या-कीर्त्तन पूरे नाहि 11/19 सबे रामानन्द जाने, ताँर 5/7
शुनिते शुनिते जुड़ाय हृदय 19/111 संख्या-नाम-कीर्त्तन यावत् 3/113 समुद्रेर मध्ये येन एक 20/81
शुनि' नित्यानन्दप्रभुर आनन्दित 12/31 संख्या-नाम पूर्ण मोर 7/79 सर्वज्ञ, कृपालु तुमि—ईश्वर 4/74
शुनिया आनन्द हैल रघुनाथेर 6/51 संख्या-नाम-सङ्कीर्त्तन—एइ 3/238 सर्वत्र 'व्यापक' प्रभुर सदा 6/125
शुनि' शिवानन्देर पत्नी कान्दिते 12/21 संख्या लागि' दुइ-हाते 9/57 सर्वनाश हबे तोर, ना हबे 3/200
शुष्क-ब्रह्मते नाहि कृष्णेर 8/25 सकल जगते हय उच्च 3/71 सर्वभक्त-पदरेणु मस्तक-भूषण 11/54
श्रद्धा करि' एइ लीला 5/163 सकल मङ्गल ताहे, खण्डे 4/44 सर्वभावे भज, लोक, चैतन्य 17/69
श्रद्धा करि' शुन इहा, शुनिते 19/110 सखि हे, कृष्णगन्ध जगत् 19/93 सर्वलोक उद्धारिते गौर-अवतार 2/3
श्रद्धा करि' शुन सेइ चैतन्य 11/107 सचेतन रहु दूरे, अचेतन 16/124 सर्व-लोक निन्दा करे 8/25
श्रीकृष्णचरणे ताँर प्रेम उपजाय 20/26 सत्कुल-विप्र नहे भजनेर 4/66 सर्वशक्ति नामे दिला करिया 20/19
श्रीकृष्णचैतन्यप्रभु देशे देशे 5/153 सनातन ग्रन्थ कैला 4/219 सर्वशास्त्रे कृष्णभक्त्ये नाहि 7/18
श्रीकृष्णचैतन्य-लीला—अमृतेर 5/162 सनातन, देहत्यागे कृष्ण यदि 4/55 सर्व-शुभोदय कृष्णे प्रेमेर 20/11
'श्रीकृष्णचैतन्य'-शब्द करिते 11/56 सनातनद्वारा भक्तिसिद्धान्त 5/86 'सर्वोत्तम भजन एइ सर्वभक्ति 7/42
श्रीचैतन्यचरितामृत—नित्य 19/111 सनातनेर क्लेदे आमार घृणा 4/187 'सहज' धर्म कहे तैं हो 8/82
श्रीचैतन्यलीला एइ—अमृतेर 5/88 संन्यास करिया सदा सेवेन 19/14 सहजेइ पिपीलिका सर्वत्र 8/49
श्रीधर-उपरे गर्वे ये किछु 7/130 संन्यासी, पण्डितगणेर करिते 5/84 सहस्र-वदने यबे कहये 18/13
श्रीधरस्वामी नाहि मान',—एत 7/128 संन्यासी विरक्त तोमार का 9/68 सहस्रादि पूर्ण हैले, अङ्गे 9/57
श्रीधरस्वामी निन्दि' निज-टीका 7/128 संन्यासी मानुष आमार भूमिते 13/15 सहिते ना पारे प्रभु, मने 5/97
श्रीधरस्वामि-प्रसादे 'भागवत' 7/129 संन्यासीर तबे सिद्ध हय 8/64 सात्त्विक-सेवा एइ—शुद्धभावे 6/296
श्रीधरानुगत कर भागवत 7/132 संन्यासीर धर्म नहे 'इन्द्रिय 8/62 साधक ना पाय ता'ते 4/60
श्रीवास-कीर्त्तने आर राघव 2/34 संन्यासीरे एत खाओयाञा 8/14 'साधुकृपा'-'नाम' बिना 'प्रेम' 3/264
श्रीभागवत-शास्त्र—ताहाते 5/44 संन्यासी हञा करे मिष्टान्न 8/42 सावधाने प्रभुर कैला आज्ञार 6/312
श्रीमदनगोपाल मोरे लेखाय 20/99 सब जीव प्रेमे भासे 3/252 सामान्य भाग्य हैते तार 16/99
श्रीराधार प्रलाप 'भ्रमर-गीता'ते 19/107 सब त्यजि' भजि याँरे 19/51 साहजिक प्रेमधर्म 1/149
श्रीरूप-द्वारा व्रजेर रस-प्रेम 5/87 सब भक्तद्वारे ताँरे आशीर्वाद 6/144 सिंहद्वारे आसिं प्रभु पसारिर 11/73
श्रोतार पदरेणु करौं मस्तक 20/152 सब मुक्त करि' तुमि 3/78 सिंहद्वारे भिक्षा-वृत्ति—वेश्यार 6/284
षड्दर्शन-वेत्ता भट्टाचार्य-सार्वभौम 7/21 सब लोक मान्य करि' 7/131 सिद्ध-देह तुमि, साधने 11/24
522 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला सिद्ध-स्वपन ]
सिद्धदेह-तुल्य, ताते 5/51 | सेइ ठाकुर धन्य तारे 4/47 | सेइ हय 'पुरुषोत्तम' 5/144
सिद्धान्तविरुद्ध शुनिते ना 5/102 | सेइ त' सुमेधा पाय कृष्णेर 20/9 | से कार्य कराइबे तोमा 4/95
सिद्धान्तसार ग्रन्थ कैला 4/220 | सेइ दश दशा हय प्रभुर 14/52 | सेकाले ए दुइ रहेन 14/8
“सुकृति-लभ्य फेला-लव” 16/96 | सेइ दशा कहेन भक्त 18/78 | से फेलार एक लव 16/131
'सुकृति'-शब्दे कहे 16/100 | सेइ देह करे तार 4/193 | 'सेवा' लागि' कोटि 'अपराध' 10/96
सुख करि' माने विषय-विषे 6/197 | सेइद्वारा आर सब लोके 7/163 | सेव्य-सेवक-भाव छाड़ि' 2/95
सुदृढ़ सरलभावे आमारे 7/158 | सेइ प्रभु धन्य, ये ना 4/46 | से यैछे तृष्णाय पिये 20/90
सुस्थ हओ, हरिदास बलि' 11/21 | सेइ प्रेमाङ्कुरेर वृक्ष-चैतन्य 8/34 | स्तम्भिल सूर्येर गति 20/57
सूक्ष्मजीवे पुनः कर्मे उद्बुद्ध 3/78 | सेइ बीज वृक्ष हञा आगेते 3/143 | “स्त्री-गान” बलि' गोविन्द 13/83
सेइ अपराधे इँहार 'वासना' 8/24 | सेइ बुझे, गौरचन्द्रे याँर 7/165 | स्त्री-नाम शुनि' प्रभुर 13/84
सेइ आचरिब, येइ शास्त्रमत 3/219 | सेइ बुझे, ताँर पदे याँर 9/151 | स्त्री, पुरुष, के गाय 13/80
सेइ कर्म कराय, याते हय 6/199 | सेइ व्याख्या करेन याँहा 7/110 | 'स्थिर'-'चर' जीवेर 3/75
सेइ कर्म निरन्तर इँहार 8/75 | सेइ भक्ष्य-भोज्य-पान 16/130 | स्नान, दर्शन, भोजन देह 15/6
से कार्य कराइबे तोमा 4/95 | सेइ भक्त धन्य, ये ना 4/46 | “स्वकर्मफलभुक् पुमान्” 2/163
सेइकाले कृष्ण तारे करे 4/192 | सेइ भावे आपनाके हय 14/14 | स्वतन्त्र ईश्वर तुमि हओ 11/29
सेइकाले देवदासी लागिला 13/78 | सेइ माने,-'कृष्णे मोर नाहि 20/28 | स्वतन्त्र कृष्णेर इच्छा,-कैला 11/94
सेइ कुण्डल काणे परि' 14/44 | सेइ याँर हय, 'फेला' पाय 16/100 | स्व-निमित्त 'अपराधाभासें' 10/96
सेइ कृपा 'कारण' हैल 3/169 | सेइ हैते अभ्यन्तरे ना 6/155 | स्वप्नेह छाड़िल सबे स्त्री 2/144
[ स्व-हेन पद्य सूची 523
स्वभक्तेर गाढ़-अनुराग 2/168 | हरिदास आछिल पृथिवीर 11/97 | 'हरिभक्तिविलास'-ग्रन्थ कैला 4/221
स्वयं भगवान् कृष्णचैतन्य 2/67 | हरिदास कहे, — “आजि करिमु 11/18 | 'हरे कृष्ण' 'हरे कृष्ण' करि' 16/7
स्वरूप कहे, — “ऐछे अमृत 6/320 | हरिदास कहेन, — “केने करह 3/193 | हर्षे प्रभु कहेन, — “शुन, स्वरूप 20/8
स्वरूप कहे, — “तथापि मायावाद 2/98 | हरिदास कहेन, — “नामेर एइ 3/177 | हस्त हाले, मनोबुद्धि नहे 20/93
स्वरूप कहे, — “सिंहद्वारे 6/283 | हरिदास कहेन, — “यैछे सूर्येर 3/182 | 'हा राम, हा राम' बलि' 3/53
स्वरूप गोसाञि, आर राय 2/106 | हरिदास कृपा करेन ताँहार 3/169 | हासे, कान्दे, नाचे, गाय 18/44
स्वरूप-गोसाञि तारे पुछेन 18/45 | हरिदास ठाकुर—महाभागवत 7/46 | हाहा कृष्ण प्राणधन, हाहा 17/60
स्वरूप, देह, —चिदानन्द 5/122 | हरिदास ठाकुरे तुजि कैलि 3/200 | हा हा कृष्ण प्राणनाथ 12/5
स्वरूप— 'सूत्रकर्त्ता', रघुनाथ 14/10 | हरिदास-ठाकुरेर महोत्सवे 11/74 | हाहा श्यामसुन्दर, हाहा 17/60
'स्वरूपेर रघु' — आजि हैते 6/203 | हरिदास-द्वारा नाम-माहात्म्य 5/86 | हित-निमित्त आइलाङ आमि 4/140
स्वरूपेर सङ्गे पाइलूँ ए 7/45 | हरिदासे दिते गेला आनन्दित 11/16 | हुङ्कार करिया प्रभु तबहिँ 18/75
स्वहस्ते करेन मलमूत्रादि 8/26 | हरिदासेर अपराधे हैल असुर 3/145 | हृदय-उपरे धरौं, सेवा 20/58
स्वामी-आज्ञा पाले, —एइ 7/102 | हरिदासेर इच्छा यबे हइल 11/95 | हृदये धरिमु तोमार कमल 11/33
स्मरणेर काले गले परेन 6/290 | हरिदासेर कृपापात्र, ताते 3/166 | हृद्रोग-काम ताँर तत्काले 5/46
हरिदासेर कैल तेंह चरण 4/14 | हेनकाले 'गोपाल-वल्लभ'-भोग 16/88
ह | हरिदासेर पादोदक पिये भक्त 11/65 | हेन-चरण स्पर्श पाइल 12/29
हरिदासे समुद्र-जले स्नान 11/64 | हेन वंशे घृणा छाड़ि' 4/29
हंस-मध्ये बक येन किछु 5/129 | 'हरिबोल' 'हरिबोल' बलेन 11/68 | हेन 'रस' पान मोरे 5/76
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शब्दकोश
अ
अक्षजज्ञान—इन्द्रियोंके द्वारा प्राप्त ज्ञान
अघटन-घटन-पटीयसी—असम्भवको भी
सम्भव तथा इसके विपरीत करनेवाली
अचिद्वस्तु—जो वस्तु चित् नहीं हो
अच्छेद्य—अविभाज्य, जिसका छेदन ना हो सके
अच्युत—जो च्युत नहीं हो
अज—अजन्मा
अजागलस्तन—बकरीके गलेमें लटकनेवाली
स्तनके जैसी चीज
अज्ञ—ज्ञानरहित
अणिमा—योगकी आठ सिद्धियोंमेंसे एक,
जिसमें योगी अणुके समान सूक्ष्म
हो जाता है
अतिक्रम—मर्यादा, कर्त्तव्य, अधिकार आदिका
उल्लङ्घन
अतिक्रान्त—अतीत, क्रमका उल्लङ्घन किया
हुआ
अतिशय—अत्यधिक
अतिशयोक्ति—किसी बातका बढ़ा-चढ़ाकर
कहना
अत्याज्य—नहीं त्यागने योग्य
अत्युत्तम—अति उत्तम
अदृष्ट—न देखा हुआ, अज्ञात
अधिदैव—आराध्य देवता
अधिरूढ़—बढ़ा हुआ
अधिष्ठान—आधार, आश्रय
अनभिज्ञ—न जाननेवाला
अनवरत—निरन्तर
अनायास—बिना कष्टके
अनिर्वचनीय—वचनसे ना वर्णन करने योग्य
अनुक्षण—निरन्तर
अनुगत—अनुगामी, अधीन
अनुवर्त्तन—अनुसरण, अनुगमन
अनुष्ठान—आरम्भ करना, कोई धार्मिक कृत्य
अनुसन्धान—खोज, प्रयत्न
अन्तर्भुक्त—किसीके अन्तर्गत होना
अन्तर्भूत—अन्तर्गत
अन्त्य—अन्तका, आखिरी
अन्यतम—बहुतोंने से एक, सर्वश्रेष्ठ
अन्वय—वाक्यमें शब्दोंका परस्पर सम्बन्ध,
मेल
अन्वेषण—खोज, ढूँढना
अपकार—अहित
अपटुता—अकुशलता
अपरा—जो श्रेष्ठ ना हो
अपरिमित—अगणित, अनगिनत
अपवर्ग—मोक्ष, निर्वाण
अपूर्व—जो पहले ना हुआ हो, अनूठा
अप्राकट्य—अप्रकट होना
अप्राकृत—अलौकिक
अप्रारब्ध—वैसा फल जो वर्तमान शरीरमें न
भोगा जा रहा हो
अप्रासङ्गिक—प्रस्तुत विषयसे असम्बद्ध,
प्रसङ्गके विरुद्ध
अबाध—बाधारहित
अभयत्व—अभयता
अभिज्ञ—जाननेवाला
अभिधा—नाम, वाच्यार्थ प्रकट करनेवाली
शब्द शक्ति
अभिधान—शब्दकोष
अभिधेय—अर्थ या उपाय, कथनीय, विषय
526 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला अभि-ईशि ]
अभिप्राय-मूल अर्थ, तात्पर्य
अभिप्रेत-उद्दिष्ट, अभिलाषित, स्वीकृत
अभिवृद्धि-अभ्युदय, बढ़ना
अभिव्यक्ति-प्रकट करना
अभिसन्धि-जोड़, समझौता
अभिसार-आगे बढ़ना, प्रियसे मिलने जाना
अभिहित-कहा हुआ
अभीष्ट-प्रिय, रुचिकर
अभ्यस्त-बार बार अभ्यास किया गया
अभ्युदय-उदय
अमित-अत्यधिक
अरण्य-वन
अवगत-जाना हुआ
अर्वाचीन-नया, बादमें उत्पन्न हुआ
अवतारणा-नीचे लाना, इन्द्रियगोचर करना
अवतीर्ण-अवतारके रूपमें प्रकट
अवधारण-शब्दके अर्थकी सीमा बाँधना,
निश्चय करना
अवयव-अङ्ग, अंश
अवरुद्ध-रुका हुआ
अवलम्बन-आश्रय लेना, सहारा लेना
अवलोकन-देखना
अवशिष्ट-बचा हुआ, शेष
अवस्थान-रहना, अवस्थिति
अविचिन्त्य-अचिन्त्य
अविच्छिन्न-अविभक्त, लगातार अविच्छिन्न
तैलधारावत्-तेलकी धाराके समान अटूट
अव्यय-अविकारी
अव्याकृत-अव्यक्त
अशेष-सम्पूर्ण
अष्टसिद्धि-आठ प्रकारकी सिद्धियाँ
असङ्ग-आसक्तिहीन
असङ्गत-प्रसङ्गविरुद्ध, अनुचित
असङ्गति-मेलका ना होना
असंस्कृत-संस्कारहीन
असमोर्द्ध-जिससे बड़ा और जिसके बराबर
कोई नहीं हो
असार-सारहीन
असूया-ईर्ष्या, दूसरेके गुणमें दोष निकालना
आ
आख्यायिका-कहानी
आच्छन्न-ढका हुआ
आत्मविषयणी-आत्म-सम्बन्धी
आत्मसात्-अपने अधिकारमें
आत्यन्तिक-असीम
आदित्य-सूर्य
आधान-स्थापन, कोई वस्तु रखनेका स्थान
रखना
आधिदैविक-देवताओंके द्वारा कृत
आधिभौतिक-अन्य प्राणियों द्वारा प्रदत्त
आध्यात्मिक-मानसिक, आत्म-सम्बन्धी
आपाततः-अचानक, अन्तमें
आप्त-पूर्ण, कुशल
आम्नाय-वेद, श्रुत, परम्पराप्राप्त उपदेश
आयुध-अस्त्र
आरूढ़-आसीन
आरोहण-चढ़ना, ऊपरकी ओर जाना
आर्त्ति-क्लेश, पीड़ा
आर्ष-ऋषियोंका
आलोचना-गुण-दोष निरूपण
आलोच्य-आलोचना योग्य
आह्लादित-आनन्दित
इ
इति-इस प्रकार, समाप्ति
इहलोक-यह लोक
ई
ईक्षण-दृष्टिपात
ईशिता-ईश्वरत्व
[ उच्छि-छन्द शब्दकोश 527
उ
उच्छिष्ट—खाकर छोड़ा हुआ, परित्यक्त
उत्कृष्ट—उन्नत, श्रेष्ठ
उद्बुद्ध—जगा या जगाया हुआ, विकसित
उद्भासित—व्यक्त, चमकता हुआ
उद्यत—तैयार
उद्रेक—प्रचुरता, बढ़ती
उद्वेग—क्षोभ, चित्तकी अस्थिरता
उपक्रम—योजना, आरम्भ, प्रयास
उपशम—विराग, विरक्ति
उपलक्षित—इशारेसे बताया हुआ
उपाङ्ग—छोटा या सहायक अंग
उपार्जित—कमाया हुआ
उपादान—साधन-सामग्री
उपादेय—ग्रहण करने योग्य, उपयोगी
उपेयत्व—उपाय-योग्य होनेका भाव
उरु—विस्तृत, महान
उरुक्रम—विष्णु
उरुगाय—उत्तम व्यक्तियोंके द्वारा जिसका
स्तुतिगान किया गया हो
ए
एकरस—जो सदा एक रूपमें रहे,
एकीभूत—जो मिलकर एक हो गया हो
ऐ
ऐहिक—सांसारिक
औ
औत्सुक्य—उत्सुकता
औद्धत्य—उद्धतता, अख्खड़पन
औपाधिक—उपाधियुक्त
क
कर्त्तृत्व—कर्ताका धर्म, कार्य
कलुषित—गंदा, कलुषयुक्त
कल्प—वेदका एक अङ्ग, ब्रह्माका एक दिन
कल्पवृक्ष—इच्छा पूरी करनेवाला वृक्ष
काम्यकर्म—फलकी कामनासे किया
जानेवाला कर्म
कैतव—छल, धोखा
केवला भक्ति—शुद्धा भक्ति
कैङ्कर्य—दासत्व
कैवल्य मुक्ति—निर्वाण मुक्ति
कौतूहलवश—उत्सुकतावश
क्रोड़ीभूत—अन्तर्भूत
क्लान्त—थका हुआ, क्षीण
क्ष
क्षिति—पृथ्वी
क्षेत्र—शरीर
क्षेत्रज्ञ—शरीरका ज्ञाता, आत्मा तथा
परमात्मा
क्षोभ—असन्तोष, व्याकुलता
ग
ग्रथित—गूँथा हुआ
ग्रन्थि—गाँठ
ग्रास—आहार
ग्रीवा—गर्दन
घ
घ्राण—गन्ध, सूँघनेकी शक्ति
च
चित्तगुहा—हृदयरूपी कन्दरा
चित्-शक्ति—भगवानकी एक प्रकारकी शक्ति
चिदालोचना—चित्-वस्तुकी आलोचना
चिन्तामल—चिन्तारूपी मल
चिन्मयत्व—चिन्मयता
चैतन्यत्व—चेतनता
चैतन्यनिष्ठ—चित्-वस्तुमें जिसकी निष्ठा है
चैतन्यहीन—चेतनारहित
छ
छन्दविद्या—अठारह विद्याओंमें एक
528 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला जर्ज–नैति ]
ज
जर्जरित—जो जर्जर हो गया हो
त
तत्त्वज्ञान—तत्त्ववस्तुका ज्ञान
तत्त्वतः—यथार्थतः
तत्त्वविद्—तत्त्वको जाननेवाला
तदीय—भगवत्-सम्बन्धी
तनय—पुत्र
तन्मय—तल्लीन
तादात्म्य—दो वस्तुओंके परस्पर अभिन्न
होनेका स्वभाव
तारतम्य—दो वस्तुओंके घट-बढ़कर होनेका
भाव
तिर्यग्—पशु-पक्षी
तैलधारावत्—तैलकी भाँति धारावाला
त्रिगुणातीत—तीनों गुणोंसे अतीत
त्रिवर्ग—धर्म, अर्थ और काम
द
दिक्पाल—दश दिशाओंके रक्षक देवता
दुर्ज्ञेय, दुर्बोध—कठिनाईसे जानने योग्य
दुर्निगृहीत—कठिनाईसे वशमें लाया हुआ
दुर्निवारित—कठिनाईसे निवारण किया हुआ
दुरुह—कठिन
दुस्त्याज्य—नहीं त्यागने योग्य
देदीप्यमान—चकमता-दमकता हुआ
देहाध्यास—देहमें मिथ्या अभिमान
द्रव्यमययज्ञ—द्रव्य द्वारा किया गया यज्ञ
द्विजवर—ब्राह्मणश्रेष्ठ
द्वैतभाव—दो होनेका भाव
ध
धूसरित—धूलसे भरा हुआ
ध्वनित होना—पता चलना
न
नराकृति—मनुष्यके समान आकृति
नामाभास—नामका आभास
निःशक्तिक—शक्तिरहित
निःश्वास—प्राणवायु या साँसका बाहर
निकलना
निःसृत—निकला हुआ
निकृष्ट—तुच्छ
निकेतन—घर
निक्षेप करना—फेंकना
निगृहीत—निग्रह किया हुआ
निग्रह—संयम
निन्तान्त—अत्यन्त, एकदम
निमज्जित—डूबा हुआ, स्नात
नियमाग्रह—नियम-पालनमें आलस्य
निरञ्जन—निर्दोष, अज्ञानसे रहित
निरपेक्ष—किसी औरकी अपेक्षा नहीं
निर्गत—बाहर निकला हुआ
निर्गुण—सत्त्व, रज और तमोगुणसे अतीत
निर्दिष्ट—निर्देशित
निर्वाण—मोक्ष
निर्विकल्प—विकल्पसे रहित
निर्विवाद—बिना विवादका
निरुद्ध—विशेषरूपसे रोका हुआ
निरूपक—निरूपण करनेवाला
निरूपण—किसी विषयको ठीक-ठीक समझा
देना
निशा—रात्रि
निष्काम कर्म—कामनासे रहित कर्म
निष्पन्न—जिसकी उत्पत्ति हुई है
निसर्गवाद—प्रकृतिवाद (प्रकृति ही जगत्की
सृष्टि करनेवाली है, ऐसा मतवाद)
निस्तारक—निस्तार करनेवाला
निस्त्रैगुण्य—तीनों गुणोंसे अतीत
निहत—मारा हुआ
नीलमणि—नीलम
नैतिक—नीति-सम्बन्धी
[ नैमि-प्राकृ शब्दकोश 529
नैमित्तिक—निमित्तसे उत्पन्न
नैरन्तर्य—निरन्तर होनेका भाव
नैर्घृण्य—निर्ममता, क्रूरता
प
पक्षान्तर—दूसरी ओर
पन्था—पथ
परिज्ञात—अच्छे प्रकारसे ज्ञात
परिनिष्ठित—दूसरेमें निष्ठावाला
परदार—दूसरेकी स्त्री
परवर्ती—बादमें
पराक्रान्त—शक्तिशाली
परिग्रह—ग्रहण
पराभक्ति—श्रेष्ठा, शुद्धा भक्ति
पराभूत—पराजित
परिचर्या—सेवा
परिचालक—चलानेवाला
परिदृष्ट—दृष्ट
परिनिष्ठित—पूर्णतया निपुण
परिमित—सीमित
परिलक्षित—अच्छी तरह देखाभाला हुआ
परिव्राजक—संन्यासी
परिवेष्टित—घिरा हुआ
पर्यन्त—तक
पर्यवसित—समाप्त
पाण्डित्य—विद्वता
पारत्रिक—परलोक-सम्बन्धी
पारलौकिक—परलोक-सम्बन्धी
पार्षद—परिकर
पाषण्डी—पाखण्डी
पूर्वपक्ष—संशयके सम्बन्धमें उठाया गया प्रश्न
पूर्वराग—मिलनसे पहलेका राग
प्रकरण—निर्माण, प्रसङ्ग
प्रकृत—यथार्थ
प्रकृष्ट—उत्तम
प्रक्षिप्त—बादमें जोड़ा या घुसाया हुआ
प्रच्छन्न—ढका हुआ
प्रजल्प—इधर-उधरकी बात
प्रज्ञा—बुद्धि
प्रणयन—रचना, निर्माण
प्रणत—शरणागत
प्रणतपाल—शरणागतकी रक्षा करनेवाले
प्रणति—प्रणाम, शरणागति
प्रताड़ित—सताया गया
प्रतिपादित—प्रमाणित
प्रतिपाद्य—जिसे प्रमाणित किया जाय
प्रतिभात—प्रभावयुक्त, ज्ञात
प्रतीयमान—जान पड़ता हुआ, जिसकी प्रतीति
हो रही हो
प्रत्यगात्मा—जीवात्मा
प्रत्यवाय—दोष
प्रत्याहार—निरोध, रोकना
प्रत्युपकार—भलाईके बदलेमें की हुई भलाई
प्रदत्त—दिया हुआ
प्रधान—मायाकी एक वृत्ति
प्रधानतः—मुख्यरूपसे
प्रपत्ति—शरणागति
प्रभूत—अत्यधिक
प्रभृति—जैसा
प्रयोजनीयता—आवश्यकता
प्रयोजक—प्रयुक्त करनेवाला
प्रयोजकत्व—प्रयोजक होनेका भाव
प्रवर—श्रेष्ठ
प्रवर्त्तक—किसी काममें लगानेवाला, आरम्भ
करनेवाला
प्रवृत्ति—मनका किसी विषयकी ओर झुकाव,
प्रभाव
प्रशस्त—प्रशंसाके योग्य
प्रशान्तात्मा—शुद्ध या शान्त आत्मा
प्रशामक—शान्त करनेवाला
प्राकृत—प्रकृति-सम्बन्धी
530 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला प्राक्त-विक्षि ]
प्राक्तन-प्राचीन
प्रादुर्भूत-आविर्भूत, अवतरित
प्रादेशिक वाक्य-प्रसङ्गत, स्थानीय वाक्य
प्रापक-प्राप्त करने या करानेवाला
प्रापञ्चिक-जगत् या प्रपञ्च-सम्बन्धी
प्राप्य-प्राप्त होने योग्य
प्रार्थित-प्रार्थना किया हुआ
प्रेमास्पद-प्रेमका स्थल
प्रेमोत्कर्ष-प्रेमका उत्कर्ष
ब
बाहुल्य-अधिकता
बाह्य अङ्ग-बाहरी अङ्ग
बहिर्वास-शरीरके ऊपरी भागको लपेटनेवाला
वस्त्र
बिद्ध-छेदा हुआ, आहत
बृहत्-बड़ा
बोधगम्य-समझमें आने योग्य
ब्रह्मलय-ब्रह्ममें लय होना
ब्रह्मवेत्ता-ब्रह्मको जाननेवाला
ब्रह्मानन्द-ब्रह्मका आनन्द
ब्रह्मानुभूति-ब्रह्मकी अनुभूति
भ
भक्तानन्दायिनी-भक्तोंको आनन्द देनेवाली
भोक्तृत्वभाव-भोक्ता होनेका भाव
म
मत्सम्बन्धी-मेरे सम्बन्धी
मत्सरता-डाह, जलन, द्वेष
मथन-मथनेका भाव
मधुरिमा-माधुर्य
मन्वन्तर-ब्रह्माजीके दिनका चौदहवाँ भाग
मन्तव्य-विचार, मत
मर्मार्थ-सार
महत्-बड़ा
मायाच्छन्न-मायाके द्वारा आच्छन्न
मुकुलित-आधा विकसित
मुमुक्षु-मुक्तिकी इच्छा करनेवाला
मेधायुक्त-मेधावी
मोहान्ध-मोहसे अन्धा
म्लेच्छ-चारो वर्णोंसे भी नीच
य
यतिगण-संन्यासी लोग
याग-यज्ञ
यादृच्छिक-स्वतन्त्र, ऐच्छिक
युक्तियुक्त-उचित, युक्तिपूर्ण
युगपत्-एक ही समयमें, साथ-साथ
युगावतार-प्रत्येक युगमें लेनेवाले अवतार
योगमाया-भगवान्की परा शक्ति
योगस्थैर्य-योगकी स्थिरता
र
रक्तिम-लालिमायुक्त
रञ्जित-रंगा हुआ
रूक्ष-रूखा, नीरस
ल
लिङ्गशरीर-सूक्ष्म शरीर
लिप्सा-किसी वस्तुको पानेकी इच्छा
लुब्ध-ललचाया हुआ, लोभित
लोकपाल-लोकका पालन करनेवाला
लोकप्रवर्त्तन-लोगोंके कल्याणके लिये
व
वञ्चक-वञ्चना करनेवाला
वयस-उम्र
वर्चस्व-अधिकार
वर्णविशिष्ट-वर्णवाला
वर्णसङ्कर-भिन्न जातियोंके स्त्री-पुरुषसे उत्पन्न
वाक्-वाणी, बोलनेकी इन्द्रिय
वाचाल-अधिक बोलनेवाला
वागिन्द्रिय-जिह्वा
विक्षिप्त-पागल, उद्विग्न
[ विगु-साम्य शब्दकोश 531
विगुण—गुणहीन
विच्युति—भूल, पतन, वियोग
विजितात्मा—जिसने मनको जीत लिया है
विज्ञ—पण्डित, जाननेवाला
विदित—मालूम
विधर्म—धर्मविरुद्ध
विधिवादिगण—नैतिक लोग
विधेय—करने योग्य
विधेयात्मा—जिसकी आत्मा संयत हो
विन्यास—व्यवस्थित करना
विपर्यय—प्रतिकूलता, विपरीतता
विभूति—ऐश्वर्य
विरहकातर—विरहसे कातर
विरोधाभास—विचारमें विरोध प्रतीत होना
विलास—क्रीड़ा
विवक्षित—इच्छित, कथित
विवृत—स्पष्ट, व्यक्त
विशारद—निपुण
विशिष्ट—विशेषतायुक्त
विशिष्टता—विशेषता
विशुद्धचित्त—जिसका चित्त शुद्ध है
विशेषत्व—विशेषता
विषयणी—विषयसे सम्बन्धित
विहित—आदेश किया हुआ
वृष्टि—वर्षा
वेदज्ञ—वेदोंके जाननेवाला
वैषम्य—विषमता
व्यङ्गोक्ति—गूढ़भाषा, वह भाषा जिसमें व्यङ्ग
हो
व्यतिक्रम—उल्लङ्घन
व्यतिरेक—असङ्गति, निषेध
व्यवहृत—व्यवहार किया हुआ
व्योम—आकाश
श
शोच्य—शोचनीय
शैव—शिवके उपासक
श्रुत—सुना हुआ
श्रोतव्य—सुनने योग्य
श्लेषोक्ति—छिपे अर्थवाली बात
ष
षडैश्वर्यपूर्ण—छः ऐश्वर्योंसे परिपूर्ण
स
सङ्कीर्णता—उदार ना होनेका भाव
संवरण—छिपाना
संवेदन—अनुभूति
संस्पर्श—अच्छी तरहसे होनेवाला स्पर्श
संहर्त्ता—संहार करनेवाला
सङ्गति—मेल
सञ्चित—जमा किया हुआ
सदातन—विष्णु
सद्विवेकी—सद् विवेकवाला
समत्वभाव—समताका भाव
सन्निविष्ट—उत्तम रूपसे एकाग्र
समाहर—समुच्चय, समूह
समाहित—संयमित, व्यवस्थित
सम्बन्धविशिष्ट—सम्बन्धवाला
सम्मत—सहमत, एक मत
समन्वित—संयुक्त, स्वाभाविक रूपसे क्रमबद्ध
सम्यक्—भलीभाँति, अच्छी तरह
सर्वतन्त्र—समस्त सिद्धान्त
सर्वतोभावेन—सम्पूर्ण रूपसे
सर्वभूतात्मा—सभी जीवोंके आत्मा अर्थात्
परमात्मा
सर्वभुक्—सब कुछ खा जानेवाला
सर्वात्मकत्व—सर्वात्मकता
सहस्र—हजार
साम—सामवेद
सामर्थ्यविशिष्ट—सामर्थ्यवान्
साम्यलक्षण—समानताका लक्षण
532 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला सार-हृद ]
सारगर्भित—तत्त्वपूर्ण स्पृहा—इच्छा, आकाङ्क्षा
सालोक्य मुक्ति—जीवका भगवान्के साथ स्फुरण—व्यक्त होना
एक ही लोकमें वास करना स्फुलिङ्ग—चिङ्गारी
साष्टाङ्ग प्रणाम—आठ अङ्गोंसे प्रणाम (सिर, स्मार्त्त—स्मृति शास्त्रका अनुयायी
हाथ, पैर, आँख, जंघा, हृदय, स्थायित्व—स्थिरता
वचन और मन) स्रुवा—घीमें आहुति डालनेकी करछी
सुखान्वेषी—सुखकी खोज करनेवाला स्वच्छन्द—स्वतन्त्र
सुदुराचारी—अति दुराचारी स्वधर्मस्थ—अपने धर्ममें स्थित
सुधा—अमृत स्वयंभू—स्वयं उत्पन्न
सुरस—रसयुक्त स्वानन्दपूर्ण—अपने आनन्दमें पूर्ण
सुष्ठु—भली भाँति, अच्छी तरह ह
सुस्पष्ट—विशेषरूपसे स्पष्ट हत—मरा हुआ
सौम्य—सुन्दर, कोमल हतभागा—भाग्यहीन
स्खलित—गिरा हुआ हन्त—मारना
स्निग्ध—स्नेहयुक्त, प्रियता हिरण्यगर्भ—ब्रह्मा
स्नेहाधिक्य—स्नेहकी अधिकता हेयता—तुच्छता
स्फूर्ति—स्फुरण, व्यक्त होना हृदगत—हृदय-सम्बन्धी