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श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

494 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 20/83-91 ]
ये किछु वर्णिलुँ, सेह संक्षेप करिया।
लिखिते ना पारेन, तबु राखियाछेन लिखिया ॥ 84 ॥
अनुवाद—यद्यपि श्रीवृन्दावनदास ठाकुरके समक्ष
महाप्रभुकी समस्त लीलाओंका भण्डार था, तथापि
उन्होंने उसमें-से अल्प लीलाओंका वर्णन करके अन्य
सबको छोड़ दिया। यद्यपि उन्होंने जिन लीलाओंका
वर्णन नहीं करके छोड़ दिया था, तथापि उन लीलाओंको
उन्होंने संक्षेपमें लिखकर रखा है॥ 83-84 ॥
विष्णु, वैष्णव और शुद्धविष्णुभक्तिके सम्बन्धमें चूड़ान्त
(सर्वोत्तम) ग्रन्थ चैतन्यभागवत ही सर्वश्रेष्ठ प्रमाण :-
चैतन्य-मङ्गले तँहो लिखियाछे स्थाने स्थाने।
सेइ वचन शुन, सेइ परम-प्रमाणे ॥ 85 ॥
“संक्षेपे कहिलुँ, विस्तार ना याय कथने।
विस्तारिया वेदव्यास करिबेन वर्णने ॥” 86 ॥
चैतन्यमङ्गले इहा लिखियाछे स्थाने-स्थाने।
सत कहेन, —'आगे व्यास करिला वर्णने ॥' 87 ॥
अनुवाद—उन्होंने चैतन्यमङ्गलमें (चैतन्यभागवतमें)
स्थान-स्थानपर लिखा है, उस वचनको आप सुनिये,
वही सर्वोत्तम प्रमाण है, —“मैंने महाप्रभुकी लीलाओंका
संक्षेपमें ही वर्णन किया है, विस्तारपूर्वक उसका वर्णन
नहीं किया जा सकता। विस्तारपूर्वक वेदव्यास उसका
वर्णन करेंगे।” चैतन्यमङ्गलमें (चैतन्यभागवतमें) उन्होंने
स्थान-स्थानपर यही लिखा है। उन्होंने सत्य ही कहा
है,—'आगे व्यासने वर्णन किया है॥ '85-87 ॥
अनुभाष्य—पाठान्तरमें, —'आगे व्यास करिबेन वर्णने
(आगे व्यास वर्णन करेंगे)' अर्थात् चैतन्यभागवतके
आदिखण्डके (1/180) में -
“शेषखण्डे चैतन्येर अनन्त विलास।
विस्तारिया वर्णिते आछेन वेदव्यास ॥”
[अर्थात् “शेषखण्डमें श्रीचैतन्य महाप्रभुके अनन्त
विलास हैं, जिन्हें वेदव्यास विस्तारसे वर्णन करेंगे।”]
आदि बहुतसे वचन श्रील कविराज गोस्वामी प्रमुख
परवर्ती गौरलीला-लेखक शुद्धवैष्णवाचार्योंको उद्देश्य
करके ही लिखे गये हैं, —कोई-कोई इस प्रकारकी
व्याख्या भी करते हैं॥ 87 ॥
अमानी और मानद ग्रन्थकारके द्वारा स्वयंको
ठाकुर-वृन्दावनका उच्छिष्ट भोजी समझना :-
चैतन्यलीलामृत-सिन्धु-दुग्धाब्धि-समान।
तृष्णानुरूप झारी भरि' तँहो कैला पान॥ 88 ॥
ताँर झारी-शेषामृत किछु मोरे दिला।
ततेके भरिल पेट, तृष्णा मोर गेला ॥ 89 ॥
अनुवाद—श्रीचैतन्यलीलामृत-सिन्धु दुग्धके सागरके
समान है। श्रीवृन्दावनदास ठाकुरने उस सिन्धुसे मटकी
भरकर उसमें-से अपनी प्यासके अनुरूप पान किया।
उन्होंने उस मटकीमें बचे हुए अमृतमें-से कुछ मुझे
दिया, उतनेसे ही मेरा पेट भर गया। अब मेरी तृष्णा
मिट गयी है॥ 88-89 ॥
पुनः दैन्यपूर्ण उक्ति :-
आमि-अति क्षुद्र जीव, पक्षी राङ्गाटूनि।
से यैछे तृष्णाय पिये समुद्रेर पानी ॥ 90 ॥
तैछे आमि एक कण छुइँलुँ लीलार।
एइ दृष्टान्ते जानिह प्रभुर लीलार विस्तार ॥ 91 ॥
अनुवाद—मैं बया पक्षीकी भाँति अति क्षुद्र जीव
हूँ। वह बया जैसे प्यास बुझानेके लिये समुद्रका
बिन्दुमात्र पानी पीती है, वैसे मैंने भी महाप्रभुकी
लीलाके एक कणका ही स्पर्श किया है। इस दृष्टान्तसे
महाप्रभुकी लीलाके विस्तारको समझा जा सकता
है॥ 90-91 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य- 'राङ्गाटूनि', —छोटीसी बया
पक्षी॥ 90 ॥
प्राकृत कवि और साहित्यिककी भाँति अप्राकृत कविसम्राट
ग्रन्थकार अहङ्कार विमूढात्मा नहीं होकर सम्पूर्ण रूपसे
श्रीकृष्णके परतन्त्र और श्रीचैतन्य-इच्छासे परिचालित :-

[ 20/92–101 बीसवाँ अध्याय 495
'आमि लिखि',—इह मिथ्या करि अनुमान।
आमार शरीर—काष्ठपुतली-समान ॥ 92 ॥
अनुवाद—'मैंने चैतन्यलीलाको लिखा है'—मेरा ऐसा
मानना मिथ्या विचार है। मेरा शरीर तो कठपुतलीके
समान है ॥ 92 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—मैं कठपुतलीके समान कार्य
करनेमें असमर्थ हूँ; मैंने यह ग्रन्थ लिखा है—ऐसा
विचार करना व्यर्थ है। तात्पर्य यह है, भगवान् और
भक्तगण ही मुझसे यह ग्रन्थ लिखवा रहे हैं ॥ 92 ॥
स्वयंको यन्त्र-मानकर अपनी अयोग्यताका वर्णन :—
वृद्ध-जरातुर आमि अन्ध, बधिर।
हस्त हाले, मनोबुद्धि नहे मोर स्थिर ॥ 93 ॥
अनुवाद—मैं वृद्ध और जर्जरित हूँ, मैं प्राय अन्धा
और बहरा हूँ। मेरे हाथ काँपते हैं और मेरा मन और
बुद्धि भी स्थिर नहीं है ॥ 93 ॥
नाना-रोगग्रस्त,—चलिते बसिते ना पारि।
पञ्चरोग-पीड़ा-व्याकुल, रात्रि-दिने मरि ॥ 94 ॥
अनुवाद—मैं अनेक प्रकारके रोगोंसे ग्रस्त हूँ—मैं न
तो चल पाता हूँ और न ही बैठ पाता हूँ। मैं पाँचों
इन्द्रियोंके रोगोंकी पीड़ासे दुःखित रहता हूँ, रात्रि अथवा
दिनमें मैं कभी भी शरीर त्याग कर सकता हूँ ॥ 94 ॥
पूर्वे ग्रन्थे इहा करियाछि निवेदन।
तथापि लिखिये, शुन इहार कारण ॥ 95 ॥
अनुवाद—यद्यपि इस बातको मैंने पहले भी इसी
ग्रन्थमें लिखा है, तथापि मैं कैसे लिखता जा रहा हूँ,
इसका कारण सुनिये ॥ 95 ॥
अपने उपास्य-विग्रहोंका वर्णन :—
श्रीगोविन्द, श्रीचैतन्य, श्रीनित्यानन्द।
श्रीअद्वैत, श्रीभक्त, आर श्रीश्रोतृवृन्द ॥ 96 ॥
श्रीस्वरूप, श्रीरूप, श्रीसनातन।
श्रीरघुनाथ-दास श्रीगुरु, श्रीजीवचरण ॥ 97 ॥
मदनमोहन-कृपा लाभरूपी अपने सौभाग्यका वर्णन :—
इँहा-सबार चरण-कृपाय लेखाय आमारे।
आर एक हय—तँहो अतिकृपा करे ॥ 98 ॥
अनुवाद—श्रीगोविन्ददेव, श्रीचैतन्यदेव, श्रीनित्यानन्द
प्रभु, श्रीअद्वैताचार्य, श्रीभक्तगण और समस्त श्रीश्रोतागण,
श्रीस्वरूप दामोदर, श्रीरूप गोस्वामी, श्रीसनातन गोस्वामी,
श्रीगुरुदेव—श्रीरघुनाथदास गोस्वामी और श्रीजीव गोस्वामी—इन
सबके चरणकमलोंकी कृपा ही मुझसे लिखवाती है।
इनके अतिरिक्त एक और भी हैं, जो मुझपर बहुत
अधिक कृपा करते हैं ॥ 96–98 ॥
अनुभाष्य—'श्रीरघुनाथदास श्रीगुरु'—ग्रन्थकार श्रीकविराज
गोस्वामी प्रभुके भजन-शिक्षा गुरु ही श्रीरूपानुगश्रेष्ठ
श्रीरघुनाथदास गोस्वामी प्रभु हैं। परवर्ती 145 संख्या और
आदिलीलाके पहले अध्यायके प्रारम्भमें अनुभाष्यमें
श्रीरूपानुग-आम्नाय अथवा गुरु-परम्परा देखें ॥ 97 ॥
श्रीमदनगोपाल मोरे लेखाय आज्ञा करि'।
कहिते ना युयाय, तबु रहिते ना पारि ॥ 99 ॥
अनुवाद—श्रीमदनगोपाल मुझे आदेश प्रदान करके
मुझसे लिखवा रहे हैं। यद्यपि यह सब कहना उचित
नहीं है, तथापि मैं कहे बिना रह नहीं पा रहा हूँ ॥ 99 ॥
ना कहिले हय मोर कृतघ्नता-दोष।
दम्भ करि' बलि, श्रोता, ना करिह रोष ॥ 100 ॥
श्रोताओंकी वन्दना :—
तोमा-सबार चरण-धूलि करिनु वन्दन।
ताते चैतन्य-लीला हैल ये किछु लिखन ॥ 101 ॥
अनुवाद—मैं अभिमान करके यह कह रहा हूँ, हे
श्रोताओं! ऐसा मानकर आप मेरे प्रति रोष मत करना,
क्योंकि ऐसा नहीं कहनेपर मुझपर कृतघ्नताका दोष
लगेगा। मैंने आप सबके चरणोंकी धूलिकी वन्दना की

496 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 20/100-112 ]
है, मैं जो कुछ भी चैतन्य-लीलाको लिख पाया हूँ, यह
उसीका फल है॥ 100-101 ॥
भागवतमें वर्णित व्यासकी रीतिके अनुसरणसे संक्षेपमें
अन्त्यलीलाके अध्यायोंका वर्णन करते हुए पुनरावृत्ति :-
एबे अन्त्यलीलागणेर करि अनुवाद।
'अनुवाद' कैले पाइ लीलार 'आस्वाद' ॥ 102 ॥
अनुवाद-अब मैं अन्त्यलीलाके अध्यायोंका संक्षेपमें
पुनः वर्णन करता हूँ, संक्षेपमें वर्णन करनेसे लीलाओंका
पुनः आस्वादन हो जायेगा ॥ 102 ॥
प्रथम परिच्छेदे-रूपेर द्वितीय-मिलन।
तार मध्ये दुइ नाटकेर विधान-श्रवण ॥ 103 ॥
तार मध्ये शिवानन्द-सङ्गे कुक्कुर आइला।
प्रभु तारे कृष्ण कहाञा मुक्त करिला ॥ 104 ॥
अनुवाद-पहले अध्यायमें श्रीरूप गोस्वामीका महाप्रभुके
साथ द्वितीय-मिलन, महाप्रभुके द्वारा श्रीरूप गोस्वामीके
द्वारा रचित दो नाटकोंका (विदग्ध-माधव और
ललित-माधवका) श्रवण, एक कुत्तेका श्रीशिवानन्द
सेनके साथ नीलाचल आना और महाप्रभुके द्वारा
उसके मुखसे कृष्ण कहलवाकर उसे मुक्त कर देना-ये
प्रसङ्ग वर्णित हुए हैं॥ 103-104 ॥
द्वितीये-छोट हरिदासे कराइला शिक्षण।
तार मध्ये शिवानन्देर आश्चर्य दर्शन ॥ 105 ॥
अनुवाद-दूसरे अध्यायमें महाप्रभुके द्वारा छोटे
हरिदासको शिक्षा प्रदान करना और श्रीशिवानन्द सेनके
आश्चर्यचकित हो जानेका वर्णन है ॥ 105 ॥
तृतीये-हरिदासेर महिमा प्रचण्ड।
दामोदर-पण्डित कैला प्रभुरे वाक्यदण्ड ॥ 106 ॥
प्रभु 'नाम' दिया कैला ब्रह्माण्ड-मोचन।
हरिदास करिला नामेर महिमा-स्थापन ॥ 107 ॥
अनुवाद-तीसरे अध्यायमें श्रीहरिदास ठाकुरकी
प्रभावशाली महिमा, श्रीदामोदर पण्डितके द्वारा महाप्रभुको
दिया गया वाक्यदण्ड, महाप्रभुके द्वारा 'नाम' प्रदान
करके ब्रह्माण्डका उद्धार और श्रीहरिदास ठाकुरके द्वारा
नामकी महिमाको स्थापित करना-ये प्रसङ्ग वर्णित हुए
हैं॥ 106-107 ॥
चतुर्थे-श्रीसनातनेर द्वितीय-मिलन।
देहत्याग हैते ताँर करिला रक्षण ॥ 108 ॥
ज्येष्ठ-मासे प्रभु ताँरे कैला परीक्षण।
शक्ति सञ्चारिया पुनः पाठाइला वृन्दावन ॥ 109 ॥
अनुवाद-चौथे अध्यायमें श्रीसनातन गोस्वामीके
महाप्रभुके साथ द्वितीय-मिलन, महाप्रभुके द्वारा श्रीसनातनकी
देह त्याग करनेसे रक्षा करना और ज्येष्ठ मासमें
उनकी परीक्षा एवं उनमें शक्ति सञ्चारित करके उन्हें
पुनः वृन्दावन भेजना-इन सबका वर्णन हुआ
है॥ 108-109 ॥
अनुभाष्य-पाठान्तरमें, - "ज्येष्ठमासे धूपे ताँरे।" अर्थात्
'ज्येष्ठ मासमें धूपमें उनकी ॥' 109 ॥
पञ्चमे-प्रद्युम्नमिश्रे प्रभु कृपा करिला।
राय-द्वारा कृष्णकथा ताँरे शुनाइला ॥ 110 ॥
तार मध्ये 'बाङ्गाल'-कविर नाटक-उपेक्षण।
स्वरूप-गोसाञि कैला विग्रहेर महिमा-स्थापन ॥ 111 ॥
अनुवाद-पाँचवें अध्यायमें महाप्रभुके द्वारा श्रीप्रद्युम्न
मिश्रपर कृपा करके उन्हें श्रीरामानन्द रायसे कृष्णकथाका
श्रवण करवाना, श्रीस्वरूप दामोदरके द्वारा बङ्गालके
कविके द्वारा रचित नाटककी उपेक्षा और विग्रहकी
महिमाको स्थापित करनेके प्रसङ्ग वर्णित हुए हैं॥ 110-111 ॥
षष्ठे-रघुनाथ-दास प्रभुरे मिलिला।
नित्यानन्द-आज्ञाय चिड़ा-महोत्सव कैला ॥ 112 ॥

[ 20/112-123 बीसवाँ अध्याय 497
दामोदर-स्वरूप ठाञि ताँरे समर्पिल।
'गोवर्धन-शिला', 'गुञ्जामाळा' ताँरे दिल॥113॥
अनुवाद—छठे अध्यायमें श्रीरघुनाथदास गोस्वामीका महाप्रभुसे [शान्तिपुरमें] मिलन, बादमें श्रीनित्यानन्द प्रभुकी आज्ञासे उनके द्वारा किया गया दही-चिड़ा महोत्सव, उनके पुरीमें महाप्रभुके पास आनेपर महाप्रभुके द्वारा उन्हें श्रीस्वरूप दामोदरके निकट समर्पित करना और उन्हें गोवर्धन शिला एवं गुञ्जामाला प्रदान करना—ये प्रसङ्ग वर्णित हुए हैं॥112-113॥
सप्तम-परिच्छेदे—वल्लभ-भट्टेरे मिलन।
नाना-मते कैला ताँर गर्व-खण्डन॥114॥
अनुवाद—सातवें अध्यायमें श्रीवल्लभ भट्टका महाप्रभुके साथ मिलन और महाप्रभुके द्वारा अनेक प्रकारसे उनके गर्वके खण्डनका वर्णन हुआ है॥114॥
अष्टमे—रामचन्द्रपुरीर आगमन।
ताँर भये कैला प्रभु भिक्षा-सङ्कोचन॥115॥
अनुवाद—आठवें अध्यायमें रामचन्द्रपुरीका जगन्नाथ पुरीमें आगमन और उनके भयसे महाप्रभुके द्वारा भोजनको कम करनेका प्रसङ्ग वर्णित हुआ है॥115॥
नवमे—गोपीनाथ पट्टनायक-मोचन।
त्रिजगते लोक प्रभुर पाइल दरशन॥116॥
अनुवाद—नौवें अध्यायमें गोपीनाथ पट्टनायकका उद्धार और त्रिभुवनके लोगोंके द्वारा आकर महाप्रभुके दर्शन प्राप्त करनेके प्रसङ्ग वर्णित हुए हैं॥116॥
दशमे—कहिलुँ भक्तदत्त-आस्वादन।
राघव-पण्डितेर ताँहा झालिर साजन॥117॥
तार मध्ये गोविन्देर कैला परीक्षण!
तार मध्ये परिमुण्डा-नृत्येरे वर्णन॥118॥
अनुवाद—दसवें अध्यायमें मैंने वर्णन किया है कि कैसे महाप्रभुने भक्तोंके द्वारा प्रदान की गयी खाद्य वस्तुओंका आस्वादन किया, श्रीराघव पण्डितके द्वारा झोलीमें लायी गयी खाद्य सामग्रीका वर्णन, महाप्रभुने कैसे श्रीगोविन्दकी परीक्षा ली और महाप्रभुके द्वारा किये गये परिमुण्डा-नृत्यका भी वर्णन किया है॥117-118॥
एकादशे—हरिदास-ठाकुरेर निर्याण।
भक्त-वात्सल्य याँहा देखाइला गौर-भगवान्॥119॥
अनुवाद—ग्यारहवें अध्यायमें श्रीहरिदास ठाकुरके अप्रकट होनेका वर्णन हुआ है जिसमें श्रीगौर-भगवान्ने अपने भक्त-वात्सल्यका दर्शन करवाया॥119॥
द्वादशे—जगदानन्देर तैल-भञ्जन।
नित्यानन्द कैला शिवानन्देरे ताड़न॥120॥
अनुवाद—बारहवें अध्यायमें श्रीजगदानन्द पण्डितके द्वारा तेलकी मटकीको फोड़ने और श्रीनित्यानन्द प्रभुके द्वारा श्रीशिवानन्द सेनको लात मारने एवं शाप देनेका प्रसङ्ग वर्णित हुआ है॥120॥
त्रयोदशे—जगदानन्द मथुरा याइ' आइला।
महाप्रभु देवदासीर गीत शुनिला॥121॥
रघुनाथ-भट्टाचार्येर ताँहाइ मिलन।
प्रभु ताँरे कृपा करि' पाठाइल वृन्दावन॥122॥
अनुवाद—तेरहवें अध्यायमें श्रीजगदानन्द पण्डितके मथुरामें जाकर लौट आनेका, महाप्रभुके द्वारा देवदासीके गीतको सुननेका, श्रीरघुनाथ-भट्टका महाप्रभुसे मिलनका और महाप्रभुके द्वारा कृपा करके उन्हें वृन्दावन भेजनेका वर्णन हुआ है॥121-122॥
चतुर्दशे—दिव्योन्माद-आरम्भ वर्णन।
'शरीर' एथा प्रभुर, मन गेला वृन्दावन॥123॥

498 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 20/123-135 ]
तार मध्ये प्रभुर सिंहद्वारे पतन।
अस्थि-सन्धि-त्याग, अनुभावेर उद्गम ॥ 124 ॥
चटक-पर्वत देखि' प्रभुर धावन।
तार मध्ये प्रभुर किछु प्रलाप-वर्णन ॥ 125 ॥
अनुवाद—चौदहवें अध्यायमें महाप्रभुमें दिव्योन्मादके आरम्भका वर्णन हुआ है, जिसमें उनका शरीर तो जगन्नाथपुरीमें था, किन्तु उनका मन वृन्दावन चला गया। इसी अध्यायमें महाप्रभुका सिंहद्वारपर पड़े मिलना, उनकी अस्थियोंके जोड़ोंका खुलना और अनुभावके उदित होनेका प्रसङ्ग वर्णित हुआ है। इसी अध्यायमें महाप्रभुके द्वारा चटक पर्वतको देखकर दौड़ना और उनके द्वारा किये गये कुछ प्रलापका वर्णन हुआ है॥ 123-125 ॥
पञ्चदश-परिच्छेदे-उद्यान-विलासे।
वृन्दावनभ्रमे याँहा करिला प्रवेशे ॥ 126 ॥
तार मध्ये प्रभुर पञ्चेन्द्रिय-आकर्षण।
तार मध्ये करिला रासे कृष्ण-अन्वेषण ॥ 127 ॥
अनुवाद—पन्द्रहवें अध्यायमें उद्यान-विलासका वर्णन है, जिसमें महाप्रभु वृन्दावनके भ्रमसे प्रवेश कर गये थे। इसी अध्यायमें श्रीकृष्णके द्वारा महाप्रभुकी पाँचों इन्द्रियोंका आकर्षण और महाप्रभुके द्वारा रासलीलामें श्रीकृष्णको ढूँढ़नेका प्रयास वर्णित हुआ है॥ 126-127 ॥
षोडशे-कालिदासे प्रभु कृपा करिला।
वैष्णवोच्छिष्ट खाइबार फल देखाइला ॥ 128 ॥
शिवानन्देर बालके श्लोक कराइला।
सिंहद्वारेर द्वारी प्रभुरे कृष्ण देखाइला ॥ 129 ॥
महाप्रसादेर ताँहा महिमा वर्णिला।
कृष्णाधरामृतेर फल-श्लोक आस्वादिला ॥ 130 ॥
अनुवाद—सोलहवें अध्यायमें श्रीकालिदासके द्वारा वैष्णवके उच्छिष्ट खानेके फलस्वरूप महाप्रभुकी कृपाकी प्राप्ति, महाप्रभुके द्वारा श्रीशिवानन्द सेनके पुत्रके द्वारा श्लोककी रचना करवाना, सिंहद्वारके द्वारपालके द्वारा महाप्रभुको श्रीकृष्णको दिखलाना, महाप्रभुके द्वारा महाप्रसादकी महिमाको बतलाना और श्रीकृष्णके अधरामृतके फलके श्लोकके आस्वादनका वर्णन हुआ है॥ 128-130 ॥
सप्तदशे-गाभी-मध्ये प्रभुर पतन।
कूर्माकार-अनुभावेर ताँहाइ उद्गम ॥ 131 ॥
कृष्णेर शब्दगुणे प्रभुर मन आकर्षिला।
'कास्त्र्यङ्ग ते' श्लोकेर अर्थ आवेशे करिला ॥ 132 ॥
भाव-शाबल्ये पुनः कैला प्रलापन।
कर्णामृत-श्लोकेर अर्थ कैला विवरण ॥ 133 ॥
अनुवाद—सतरहवें अध्यायमें महाप्रभुका गैयाओंके बीचमें पड़े मिलना और कूर्माकार-अनुभावका वहींपर प्रकाशित होना, श्रीकृष्णके शब्द-गुणके द्वारा महाप्रभुके मनको आकर्षित करनेपर महाप्रभुके द्वारा आवेशमें 'कास्त्र्यङ्ग ते' श्लोकके अर्थका वर्णन करना और उनके द्वारा भाव-शाबल्यमें पुनः प्रलाप करना एवं कर्णामृतके श्लोकके अर्थका विवरण दिया गया है॥ 131-133 ॥
अष्टादश-परिच्छेदे-समुद्रे पतन।
कृष्ण-गोपी-जलकेलि ताँहा दरशन ॥ 134 ॥
ताँहाइ देखिला कृष्णेर वन्यभोजन।
जालिया उठाइल, प्रभु आइला स्व-भवन ॥ 135 ॥
अनुवाद—अठारहवें अध्यायमें महाप्रभुका समुद्रमें जा गिरना और श्रीकृष्ण एवं गोपियोंके द्वारा की जानेवाली जलक्रीड़ाका दर्शन, महाप्रभुके द्वारा श्रीकृष्णके द्वारा किये जाने वाले वन्य-भोजनका दर्शन, मछुवारेके द्वारा महाप्रभुको समुद्रसे निकालना एवं महाप्रभुके अपने वास-स्थानपर आना—ये सब प्रसङ्ग वर्णित हुए हैं॥ 134-135 ॥

[ 20/136-146 बीसवाँ अध्याय 499
ऊनविंशे—भित्ये प्रभुर मुखसङ्घर्षण।
कृष्णेर विरह-स्फूर्त्ति-प्रलाप-वर्णन ॥ 136 ॥
वसन्त-रजनीते पुष्पोद्याने विहरण।
कृष्णेर सौरभ्य-श्लोकेर अर्थ-विवरण ॥ 137 ॥
अनुवाद—उन्नीसवें अध्यायमें महाप्रभुके द्वारा दीवारोंपर
अपने मुखको घिसना, श्रीकृष्णविरहमें उनका स्फूर्त्ति-प्रलाप,
उनके द्वारा वसन्तकी रात्रिमें पुष्पोद्यानमें विहार करना
और श्रीकृष्णके अङ्गोंकी सुगन्धका वर्णन करनेवाले
श्लोकके अर्थको प्रकाशित करना—ये प्रसङ्ग वर्णित हुए
हैं॥ 136-137॥
विंशति-परिच्छेदे—निज 'शिक्षाष्टक' पड़िया।
तार अर्थ आस्वादिला आविष्ट हञा ॥ 138 ॥
भक्ते शिखाइते येइ शिक्षाष्टक कहिला।
सेइ श्लोकाष्टकेर अर्थ पुनः आस्वादिला ॥ 139 ॥
अनुवाद—बीसवें अध्यायमें महाप्रभुके द्वारा स्वरचित
शिक्षाष्टकके श्लोकोंका पाठ और प्रेमाविष्ट होकर
उनके अर्थोंका आस्वादन करना, भक्तोंको सिखलानेके
लिये महाप्रभुके द्वारा शिक्षाष्टकके श्लोकोंको कहना
और उसके द्वारा पुनः स्वयं उनका आस्वादन करना—ये
सब प्रसङ्ग वर्णित हुए हैं॥ 138-139॥
अनुवाद, पुनः चर्चा अथवा पुनरावृत्तिके
फलस्वरूप लीलाके स्मरणका उदय :-
मुख्य-मुख्य-लीलार अर्थ करिलुँ कथन।
'अनुवाद' हैते स्मरे ग्रन्थ-विवरण ॥ 140 ॥
अनुवाद—इस प्रकार मैंने विभिन्न अध्यायोंमें वर्णित
मुख्य-मुख्य लीलाओं और उनके अर्थको प्रकाशित
किया है, संक्षेपमें पुनः वर्णन करनेसे ग्रन्थके विवरणका
स्मरण होता है॥ 140 ॥
ग्रन्थ-विस्तारके भयसे प्रधान प्रधान घटनामात्र वर्णित :-
एक एक परिच्छेदेर कथा—अनेक प्रकार।
मुख्य-मुख्य कहिलुँ, कथा ना याय विस्तार ॥ 141 ॥
अनुवाद—यद्यपि एक-एक अध्यायमें ही अनेक
प्रकारकी कथाएँ वर्णित हुई हैं, तथापि मैंने अभी
मुख्य-मुख्य कथाओंके विषयमें ही बतलाया है, यहाँपर
विस्तारसे उसका वर्णन सम्भवपर नहीं है॥ 141 ॥
ग्रन्थकारके अपने उपास्य-विग्रह सम्बन्ध-
अभिधेय-प्रयोजनके अधिदेव गौड़ीयेश्वर
श्रीराधा-मदनमोहन-गोविन्द-गोपीनाथ :-
श्रीराधा-सह 'श्रीमदनमोहन'।
श्रीराधा-सह 'श्रीगोविन्द'-चरण ॥ 142 ॥
श्रीराधा-सह श्रील 'श्रीगोपीनाथ'।
एइ तिन ठाकुर हय 'गौड़ीयार नाथ' ॥ 143 ॥
अनुवाद—श्रीराधाके साथ श्रीमदनमोहन, श्रीराधाके
साथ श्रीगोविन्द, श्रीराधाके साथ श्रीगोपीनाथ—ये तीनों
ठाकुर गौड़ीय भक्तोंके नाथ हैं॥ 142-143 ॥
सपरिकर श्रीगौरको प्रणाम :-
श्रीकृष्णचैतन्य, श्रीयुक्त, नित्यानन्द।
श्रीअद्वैत-आचार्य, श्रीगौरभक्तवृन्द ॥ 144 ॥
ग्रन्थकारका श्रीगौरशक्तिस्वरूप गुरुवर्गोंको प्रणाम :-
श्रीस्वरूप, श्रीरूप, श्रीसनातन।
गुरु श्रीरघुनाथ, श्रीजीवचरण ॥ 145 ॥
उनको नमस्कारसे ही अभीष्ट सिद्धि :-
निज-शिरे धरि' एइ सबार चरण।
याहा हैते हय सब वाञ्छित-पूरण ॥ 146 ॥
अनुवाद—मैं श्रीकृष्णचैतन्य महाप्रभु, श्रीयुक्त नित्यानन्द
प्रभु, श्रीअद्वैताचार्य, श्रीगौरभक्तवृन्द, श्रीस्वरूप दामोदर,
श्रीरूप, श्रीसनातन, गुरु श्रीरघुनाथ और श्रीजीव गोस्वामी
पाद—इन सबके श्रीचरणोंको अपने सिरपर धारण
करता हूँ, जिससे समस्त प्रकारकी वाञ्छाएँ पूर्ण हो
जाती हैं॥ 144-146 ॥

यहाँ पृष्ठ का पूर्ण एवं सटीक देवनागरी पाठ प्रस्तुत है:

500 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 20/147-154 ]
चैतन्यमयी नित्यानन्द-कृपाके आनुगत्यमें ही जिह्वा अथवा
वचनोंका श्रीचैतन्यलीलाके कीर्तनका सामर्थ्य :-
सबार चरण-कृपा-गुरु 'उपाध्यायी'।
तार वाणी-शिष्या, तारे बहुत नाचाइ ॥ 147 ॥
अनुवाद-इन सभीके चरणोंकी कृपा ही गुरुकी
उपाधिसे युक्त है और उनकी वाणी उस कृपाकी शिष्या
है, कृपारूपी गुरुने वाणीरूपी शिष्याको बहुत नचाया
है ॥ 147 ॥
अनुभाष्य - 'उपाध्यायी',-
'उपेत्य अधीयते अस्मात्';
'एकदेशस्तु वेदस्य वेदाङ्गान्यपि वा पुनः।
योऽध्यापयति वृत्त्यर्थमुपाध्यायः स उच्यते॥'
[अर्थात् 'निकट जाकर जिनसे अध्ययन किया
जाता है।' मनुसंहिता - 'जो जीवनधारणके लिये वेदके
एकदेश, पुनः वेदोंके छह अङ्गोंका (शिक्षा, कल्प,
व्याकरण, निरुक्त, छन्द और ज्योतिषका) अध्यापन
करते हैं, वे उपाध्याय कहलाते हैं।']
उपाध्याय अर्थात् कलाविद्या-शिक्षक। पाठान्तरमें-'मोर
वाणी शिष्या' अर्थात् मेरी वाणी शिष्या है ॥ 147 ॥
शिष्यार श्रम देखि' गुरु नाचान राखिला।
'कृपा' ना नाचाय, 'वाणी' बसिया रहिला ॥ 148 ॥
अनिपुणा वाणी आपने नाचिते ना जाने।
यत नाचाइला, नाचि' करिला विश्रामे ॥ 149 ॥
अनुवाद-शिष्याका परिश्रम देखकर गुरुने शिष्याके
नचानेको स्थगित कर दिया। कृपाके नहीं नचानेपर
वाणी शान्त होकर बैठ गयी है। अनिपुण वाणी स्वयं
नाचना नहीं जानती, उसे गुरुने जितना नचाया, वह
उतना नाचकर विश्राम करने लगी ॥ 148-149 ॥
श्रोताओंकी वन्दना और कृपा-प्रार्थना :-
सब श्रोतागणेर करि चरण-वन्दन।
याँ-सबार चरण-कृपा-शुभेरे कारण ॥ 150 ॥
अनुवाद-मैं समस्त श्रोताओंके चरणकमलोंकी वन्दना
करता हूँ, जिनके चरणकमलोंकी कृपा समस्त शुभका
कारण है ॥ 150 ॥
चैतन्यचरितामृत येइ जन सुने।
ताँर चरण धुञा करों मुञि पाने ॥ 151 ॥
श्रोतार पदरेणु करों मस्तक-भूषण।
तोमरा ए-अमृत पिले सफल हैल श्रम ॥ 152 ॥
अनुवाद-जो भी व्यक्ति चैतन्यचरितामृतका श्रवण
करता है, मैं उसके चरणोंको धोकर उनके चरणामृतका
पान करता हूँ। मैं श्रोताओंके चरणकमलोंकी धूलिको
अपने मस्तकके आभूषणके रूपमें धारण करता हूँ,
आपके इस चैतन्यचरित्ररूपी अमृतका पान करनेसे मेरा
परिश्रम सफल हुआ है ॥ 151-152 ॥
श्रीरूप-रघुनाथ-पदे यार आश।
चैतन्यचरितामृत कहे कृष्णदास ॥ 153 ॥
अनुवाद-श्रीरूप-रघुनाथ गोस्वामीके चरणकमलोंकी
कृपाभिलाषा करते हुए कृष्णदास इस श्रीचैतन्यचरितामृतका
वर्णन कर रहा है ॥ 153 ॥
ग्रन्थकारकी दैन्यपूर्ण उक्ति :-
चरितममृतमेतच्छ्रीलचैतन्यविष्णोः
शुभदमशुभनाशि श्रद्धयास्वादयेद् यः।
तदमलपदपद्मे भृङ्गतामेत्य सोऽयं
रसयति रसमुच्चैः प्रेममाध्वीकपूरम् ॥ 154 ॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 154 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य-जो श्रद्धापूर्वक भगवान्
श्रीचैतन्यदेवके इस अमृतके समान शुभ प्रदान करनेवाले
एवं अशुभका नाश करनेवाले चरित्रका आस्वादन
करते हैं, ये लेखक (ग्रन्थकार श्रीकविराज गोस्वामी)
उनके अमल चरणकमलोंके भ्रमर बनकर प्रेमरूपी
मदिरासे पूर्ण रसका अतिशय आस्वादन करते हैं ॥ 154 ॥

[ 20/154-158 बीसवाँ अध्याय 501
अनुभाष्य-
यः श्रद्धया श्रीलचैतन्यविष्णोः एतत् अशुभनाशि शुभदं चरितम् आस्वादयेत्, सः अयं तदमलपदपद्मे भृङ्गाताम् एत्य (प्राप्य) प्रेममाध्वीकपूरं (प्रेममदिरापूर्णं) रसम् उच्चैः (अतिशयेन) रसयति (आस्वादयति)।
श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 154॥
श्रीकृष्णकी प्रसन्नताके लिये श्रीचैतन्यके प्रति इस ग्रन्थरूपी अमृतका अर्पण :-
श्रीमन्मदनगोपाल-गोविन्ददेव-तुष्टये।
चैतन्यार्पितमस्त्वेतच्चैतन्यचरितामृतम्॥ 155॥
अनुवाद-अमृतानुकणा देखें॥ 155॥
अनुभाष्य-
श्रीमन्मदनगोपाल-श्रीगोविन्ददेव-तुष्टये एतत् चैतन्यचरितामृतं ग्रन्थं चैतन्यार्पितं (श्रीचैतन्ये समर्पितम्) अस्तु।
श्लोक-भावानुवाद-अमृतानुकणा देखें॥ 155॥
अमृतानुकणा-श्रीराधाके साथ श्रीमन्मदनगोपाल और श्रीगोविन्ददेवकी प्रसन्नता विधान करनेके लिये यह श्रीचैतन्यचरितामृत-ग्रन्थ श्रीचैतन्यदेवको समर्पित हो॥ 155॥
श्रीकृष्णचरणकमल ही अप्राकृत अनन्त-रसके आधार :-
परिमलवासितभुवनं स्वरसोन्मादित-रसिकालम्बम्।
गिरिधरचरणाम्भोजं कः खलु रसिकः समीहते हातुम्॥ 156॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 156॥
अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीकृष्णके जो चरणकमल सुगन्धके द्वारा भुवनको सुगन्धित करके अपने रसमें उन्मादित करके रसिकोंके आश्रय स्वरूप हुए हैं, उन्हें कौन रसिक व्यक्ति परित्याग करनेकी चेष्टा करता है? 156॥
अनुभाष्य-
कः रसिकः (रसज्ञः कृष्णभजनशीलः) परिमलवासितभुवनं (सुगन्धेन सुरभितं भुवनं येन तं) स्वरसोन्मादित-रसिकालम्बं (शृङ्गाररसोन्मादित-रसिकावलम्बनं) गिरिधरचरणाम्भोजं हातुं (परित्यक्तुं) समीहते (संवेष्टते)?
श्लोक-भावानुवाद-कौन रसज्ञ कृष्णभजनशील व्यक्ति समस्त जगत्को सुगन्धित करनेवाले और शृङ्गाररसमें उन्मादित रसिकोंके आश्रयस्वरूप श्रीगिरिधरके चरणकमलोंका परित्याग करनेकी चेष्टा करता है॥ 156॥
अपने अभीष्टदेव श्रीराधागोविन्दके प्रति शरणागति :-
मत्प्राणसर्वस्वपदाम्बजेरेणो-र्मदीश्वरी-श्रीयुतराधिकायाः।
प्राणोरुसर्वस्वपदाम्बजरेणुं श्रीश्रील-गोविन्दमहं प्रपद्ये॥ 157॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 157॥
अमृतप्रवाह भाष्य-अपने प्राण-सर्वस्वके चरणकमलोंकी रेणुके बलसे मैं अपनी ईश्वरी श्रीमती राधिकाके प्राणोंसे अधिक और सर्वस्वरूप चरणकमलोंकी रेणुका ध्यान करते हुए श्रीश्रीगोविन्ददेवके शरणागत होता हूँ॥ 157॥
ग्रन्थ समाप्तिके कालका निर्देश :-
शाके सिन्ध्वग्निबाणेन्दौ ज्येष्ठे वृन्दावनान्तरे।
सूर्यहिङ्सितपञ्चम्यां ग्रन्थोऽयं पूर्णतां गतः॥ 158॥
इति श्रीचैतन्यचरितामृते अन्त्यखण्डे शिक्षा-श्लोकार्थास्वादनं नाम विंश परिच्छेदः।
॥ इति अन्त्यलीला समाप्ता॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 158॥
अमृतप्रवाह भाष्य-1537 शकाब्दके ज्येष्ठ मासकी कृष्ण-पञ्चमी तिथि रविवारको श्रीवृन्दावनमें यह ग्रन्थ सम्पूर्ण हुआ।
श्रीचैतन्यचरितामृतके अन्त्यखण्डमें शिक्षाश्लोक-अर्थ-आस्वादन नामक बीसवें अध्यायका अनुवाद समाप्त।

502 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 20/158 ]
विपिनविहारी हरि, ताँर शक्ति अवतरि',
विपिनविहारी प्रभुवर।
श्रीगुरुगोस्वामि-रूपे, देखि' मोरे भवकूपे,
उद्धारिल आपन-किङ्कर ॥
[विपिनविहारी श्रीहरिकी शक्ति मेरे प्रभुवर (गुरु)
श्रीविपिनविहारीके रूपमें अवतरित हुई। श्रीहरिने मेरे
श्रीगुरुदेव श्रीविपिनविहारी गोस्वामीके रूपमें मुझे भवकूपमें
पड़ा देखकर मुझे अपना किङ्कर जानकर मेरा उद्धार
किया।]
तदाज्ञा-पालनकामे, 'अमृतप्रवाह'-नामे,
चैतन्यचरितामृत-अर्थ।
रचिलाम सयतने, अर्पिलाम भक्तगणे,
पाठ करि' घुचाओ अनर्थ ॥
[उनकी (गुरुदेव श्रीविपिन-विहारी गोस्वामीकी) आज्ञाका
पालन करनेकी कामनासे मैंने अमृतप्रवाहके नामसे
श्रीचैतन्यचरितामृतके अर्थकी यत्नपूर्वक रचना करके
उसे भक्तोंको अर्पित किया है। हे भक्तों! आप उसका
पाठ करके अपने अनर्थोंको दूर करो।]
ये-सब आत्मज मम, करियाछे परिश्रम,
एइ ग्रन्थ प्रस्तुत-कारणे।
निर्विघ्न-जीवने सबे, साधुसङ्ग-महोत्सवे,
करूक भक्ति श्रीहरिचरणे ॥
[मेरे जिन सब पुत्रोंने इस श्रीचैतन्यचरितामृत
नामक ग्रन्थको प्रस्तुत करनेमें परिश्रम किया है, (मेरा
उनके लिये आशीर्वाद है कि) वे निर्विघ्न अपने सम्पूर्ण
जीवनमें साधुसङ्ग महोत्सवमें श्रीहरिके चरणोंकी भक्ति
करें।]
वैष्णव-चरणे धरि', सदैव प्रार्थना करि,
ए दासेर जीवनावशेषे।
श्रीगोद्रुमे साधुसङ्गे, चिदानन्द-रसरङ्गे,
याय दिन कृष्णनामावेशे ॥
[मैं वैष्णवोंके चरणोंको धारण करके दीनतापूर्वक
उनसे प्रार्थना करता हूँ कि इस दासके जीवनके शेष
दिन श्रीगोद्रुममें साधु-सङ्गमें चिदानन्द-रसके आनन्दमें
कृष्णनामके आवेशमें व्यतीत हों।]
ए संसार-सारहीन, एते मजे अर्वाचीन,
इहाते विरक्त महाशय।
साधुसङ्गे कृष्णे भजे, राधाकृष्णे सेवे व्रजे,
निरन्तर कृष्णनामाश्रय ॥
[यह संसार सारहीन है। अज्ञानी व्यक्ति ही इसमें
निमज्जित होता है। इस संसारसे विरक्त महाशय
साधुसङ्गमें रहकर निरन्तर कृष्णनामका आश्रय ग्रहण
करके बाह्यदेहके द्वारा भजन करते हैं और अपनी
अन्तश्चिन्तित देहसे व्रजमें श्रीराधाकृष्णकी सेवा करते
हैं।]
गौर चारिशत-दशे, मेष-शुक्ल-एकादशे,
श्रीसुरभिकुञ्ज-वनान्तरे।
सम्पूर्ण हइल भाष्य, इहाते पुरिल दास्य,
दोष-क्षमा मागि' अतःपरे ॥
[चार सौ दस गौराब्दमें मेष-शुक्ल एकादशीके दिन
श्रीसुरभिकुञ्ज-वनमें अमृतप्रवाह भाष्य सम्पूर्ण हुआ।
इससे ही मेरा दास्य पूर्ण हुआ। इस अमृतप्रवाह भाष्यमें
हुई किसी दोष-त्रुटिके लिये क्षमा माँगता हूँ।] ॥ 158 ॥
श्रीचैतन्यचरितामृत ग्रन्थका अमृतप्रवाह-भाष्य समाप्त।
अनुभाष्य—
अयं (श्रीचैतन्यचरितामृताख्यः) ग्रन्थः वृन्दावनान्तरे ज्येष्ठे
असितपञ्चम्यां (कृष्णपञ्चम्यां) सूर्याहे (रविवारी) सिन्ध्वग्निव्वाणेन्दौ
('अङ्कस्य वामा गतिः' इति न्यायेन, 1537 शकावनीपतेरतीताब्दे)
पूर्णतां गतः।
156 से 158 तकके श्लोक अनेक प्रकाशनोंमें
दिखायी नहीं देते।
चारिशत ऊनत्रिंशे, ज्येष्ठे दिन एकत्रिंशे,
चैतन्याब्दे, मास-त्रिविक्रम।
श्रीव्रजपत्तने थाकि', 'गौरहरि' बलि' डाकि,
दथितदासिया नराधम ॥ 1 ॥
नवद्वीप-मायापुरे, प्रभुगृह नातिदूरे,
अनुभाष्य कैल समापन।
श्रीगौरकिशोर-दास, सम्प्रति कुलिया वास,
याँर भृत्य-एइ अभाजन ॥ 2 ॥

[ 20/158 बीसवाँ अध्याय 503

[चार सौ उनतीस चैतन्याब्द त्रिविक्रम मासमें
ज्येष्ठके इकतीसवें दिन, श्रीनवद्वीप मण्डलके अन्तर्गत
मायापुरमें श्रीशचीनन्दन गौरहरिके जन्मस्थानके निकट
श्रीव्रजपत्तन (मूलमठ श्रीचैतन्य मठ)में रहकर 'गौरहरि'
बोलते हुए इस समय कुलियामें वास कर रहे
श्रीगौरकिशोर दास बाबाजी महाराजके अयोग्य दास इस
दयितदास नामक नराधमने श्रीचैतन्यचरितामृतके 'अनुभाष्य'के
लेखनको सम्पूर्ण किया है।]

आजि एइ सुख-दिने, भकतिविनोद बिने,
सुखवार्त्ता जानाब काहारे?
'अनुभाष्य' शुनि' येइ, परम प्रफुल्ल हइ'
उरुकृपा वितरिल मोरे॥३॥

[आज इस परम सुखके दिनमें श्रीभक्तिविनोद
ठाकुरके प्रकट रूपमें विद्यमान नहीं रहनेके कारण मैं
इस सुखवार्त्ताको किसको कहूँ? (आंशिक) 'अनुभाष्य'को
सुनकर वे परम आनन्दित हुए थे और उन्होंने मुझपर
प्रचुर कृपाका वितरण किया था।]

ताँहार करुणा-कथा, माधव-भजन-प्रथा,
तुलना नाहिक त्रिभुवने।
ताँर सम अन्य केह, धरिया ए नरदेह,
नाहि दिल कृष्णप्रेमधने॥४॥

[उनकी करुणाकी बात और उनके माधव-भजनकी
प्रथाकी इन तीनों लोकोंमें तुलना नहीं है। उनके समान
अन्य किसीने भी इस मनुष्य देहको धारणकर श्रीकृष्णप्रेम
रूपी धनका वितरण नहीं किया है।]

सेइ प्रभु-शक्ति पाइ', एबे 'अनुभाष्य' गाइ,
इहाते आमार किछु नाइ।
यावत् जीवन रबे, तावत् स्मरिब भवे,
नित्यकाल सेइ पद चाइ॥५॥

[उन प्रभुसे शक्तिको प्राप्तकर ही मैंने अब
'अनुभाष्य'का लेखन कार्य किया है, इसमें मेरी कुछ
भी योग्यता नहीं है। जब तक जीवन रहेगा, तब तक
मैं भावमें विभोर होकर उनका स्मरण करूँगा और
नित्यकालके लिये मैं उन श्रीचरणकमलोंको चाहता हूँ।]

गदाधर-मित्रवर, श्रीस्वरूप-दामोदर,
सदा काल गौर-कृष्ण यजे।
जगतेर देखि' क्लेश, धरिया भिक्षुक-वेश,
अहरहः कृष्णनाम भजे॥६॥

[श्रीगदाधर पण्डितके मित्रवर श्रीस्वरूप दामोदर सब
समय श्रीगौर-कृष्णका यजन करते हैं। वे जगत्के
जीवोंके क्लेशोंको देखकर भिक्षुक-वेश धारण करके
दिन-रात श्रीकृष्णनामका भजन करते हैं।]

श्रीगौर-इच्छाय दुइ, महिमा कि कब मुइ,
अप्राकृत-पारिषद-कथा।
प्रकट हइया सेवे, कृष्ण-गौराभिन्न-देवे,
अप्रकाश्य कथा यथा तथा॥७॥

[श्रीगदाधर पण्डित और श्रीस्वरूप दामोदर-इन
दोनों अप्राकृत-पार्षदोंकी महिमाका मैं क्या वर्णन करूँ?
श्रीगौरसुन्दरकी इच्छासे ये दोनों इस जगत्में प्रकटित
होकर श्रीकृष्णसे अभिन्न भगवान् श्रीगौरसुन्दरके निगूढ़
चरित्रको यत्र-तत्र-सर्वत्र प्रकाशित कर रहे हैं।]

श्रीगौराङ्ग-निजजन, भकतिविनोद-गण,
अप्राकृत-भावे याँर स्थिति।
'अनुभाष्य' सयतने, पाठ कर भक्त-सने,
लाभ कर युगल-पीरिति॥८॥

[श्रीगौराङ्ग महाप्रभुके निजजन श्रीभक्तिविनोद ठाकुरके
गणोंकी अप्राकृत-भावमें स्थिति है। हे पाठको!
श्रीचैतन्यचरितामृतके अनुभाष्यका ध्यानपूर्वक भक्तोंके
सङ्गमें पाठ करके श्रीश्रीराधाकृष्ण-युगलके प्रेमको प्राप्त
करो।] ॥ 158 ॥

श्रीचैतन्यचरितामृत-ग्रन्थका अनुभाष्य समाप्त।

॥ अन्त्यलीला समाप्त ॥

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श्लोक सूची
[वर्णक्रमानुसार प्रथम और तृतीय चरण]


अ

अंहः संहरदखिलं सकृदुदयादेव — 3/180
अकारुण्यः कृष्णो यदि मयि — 1/146
अगण्यधन्यचैतन्यगणानां प्रेम — 9/1
अग्रे वीक्ष्य शिखण्ड — 1/145
अजामिलोऽप्यगाद्धाम — 3/63, 186
अनर्पितचरीं चिरात् करुणया — 1/132
अनिष्टाशङ्कीनि बन्धुहृदयानि — 18/40
अनुद्घाट्य द्वारत्रयमसुर च — 17/72
अन्तःक्लेशकलङ्किताः किल — 1/154
अन्तर्वाणीभिरप्यस्य मुद्रा सुष्ठु — 19/105
अन्नानुरूपां तनुरूप — 1/92
अन्वीयमान इह वस्तरवः — 15/51
अप्येण-पत्युपगतः प्रिययेह — 15/44
अभिव्यक्ता मत्तः प्रकृति — 1/139
अमानिना मानदेन — 6/239, 20/21
अयं नयनदण्डितप्रवर — 1/165
अयं हि भगवान् दृष्टः — 3/84
अयमागच्छति अयं दास्यति — 6/285
अयि दीनदयार्द्रनाथ हे — 8/32
अयि नन्दतनुज किङ्करं — 20/32
अरण्यजपरिष्क्रिया-दमित — 1/165
अस्मिन् सम्पुटिते गभीर — 1/154
अहह चटुलैरुत्सपद्भि — 1/190
अहो बत श्वपचोऽतो — 16/27
अहो विधातस्तव न — 19/45
अहो! विरक्तानां — 8/47

आ

आक्षिप्तः कालसाम्येन — 1/135
आचार्यो यदुनन्दनः — 6/263
आत्मानञ्चेद्विजानीयात् परं — 6/314
आनन्दाम्बुधिवर्धनं प्रतिपदं — 20/12
आविष्करोति पिशुनेष्वपि — 1/108
आश्लिष्य वा पादरतां — 20/47
आस्वाद्यास्वादयन् भक्तान् — 16/1


इ

इतररागविस्मारणं नृणां — 16/117
इति केन सदाश्रियोज्ज्वलं — 1/170
इति ब्रुवाणं विदुरं — 19/70
इतो नृसिंहः परतो — 16/53
इत्थं सतां ब्रह्मसुखानुभूत्या — 7/32
इयं सखि सुदुःसाध्या — 1/143

उ

उक्त्वापि मुक्तिमाप्नोति किं — 3/56
उद्घूर्णा-चित्रजल्पाद्यास्तद्भेदा — 14/16
उपगीयमानमाहात्म्यं — 7/33
उरोऽम्बरतटस्य चाभरण — 1/191
उरो गुआहारं प्रियमपि च — 6/327
उल्लङ्घितत्रिविधसीमसमातिशायि — 3/91

ए

एकस्य श्रुतमेव लुम्पति मतिं — 1/142
एतस्य मोहनाख्यस्य गतिं — 14/16
एतादृशी तव कृपा — 20/16
एवंब्रतः स्वप्रियनाम — 3/178
एष स्निग्धघनद्युतिर्मनसि — 1/142

औ

औत्सुक्यावलिभिर्बलिं — 1/164


क

कर्षन् वेणुस्वनैर्गोपीर्गोपीनाथः — 1/7
कस्मात्त्वया सखि गुरोर्विषमा — 1/162
कान्ताङ्गसङ्गकुचकु ङ्कुम — 15/44
कास्त्र्यङ्ग ते कलपदामृत — 17/31
किं काव्येन कवेस्तस्य किं — 1/195
किं पुनर्दर्शनस्पर्शपाद — 7/10
किं भद्रं किमभद्रं वा — 4/175
किमिच्छन् कस्य वा — 6/314
किमिह कृणुमः कस्य ब्रूमः — 17/51
किम्बा पामर-काम — 1/151
कुरङ्गमदजिद्वपुः परिमलोर्मि — 19/91
कुलवरतनुधर्मग्राववृन्दानि — 1/167
कृतान्दोलं मन्दोन्नतिभिर — 1/158
कृता यत्र चिकित्सापि — 1/143
कृपया तव पादपङ्कज — 20/32
कृपागुणैर्याः कुगृहान्धकूप — 6/1
कृष्णं मर्त्यमुपाश्रित्य गोपा — 5/137
कृष्णनाम्नो रूढिरिति सर्वशास्त्र — 7/82
कृष्णवर्णं त्विषाऽकृष्णं — 20/10
कृष्णविच्छेदजातात्त्यां क्षीणे — 13/1
कृष्णविच्छेदविभ्रान्त्या मनसा — 14/1
कृष्णादन्यः को वा लतास्वपि — 7/15
कृष्णोऽन्यो यदुसम्भृतो यस्तु — 1/67
क्वचित् कृष्णावृत्तिप्रचलरासनो — 15/97
कच्चित्तुलसि कल्याणि — 15/33
क्वचिद्द्वाराशाली करकफल — 1/160
क्वचिद्भृङ्गीगीतं क्वचिद — 1/160
क्वचिन्मिश्रावासे व्रजपतिसुतस्य — 14/73

506 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला क्व-नाम्न ]


कॉलम १कॉलम २कॉलम ३
क्व नन्दकुलचन्द्रमाः क्व19/35तच्चेद्देह-द्रविण-जनता-लोभ3/60दीव्यद्वृन्दारण्यकल्पद्रुमाधः1/6
क्व मे कान्तः कृष्ण16/87तत्तेऽनुकम्पां सुसमीक्ष्यमाणो9/77दीयमानं न गृह्णन्ति बिना3/187
क्व रासरसताण्डवी क्व सखि19/35तथाप्यन्तःखेलन्मधुरमुरली1/79, 114दुर्गमे कृष्णभावाब्धौ निमग्ना15/1
गतदपि भजसि शश्वच्चुम्बन1/163दुर्गमे पथि मेऽन्धस्य स्खलत्पाद1/2
गतिविदस्तवोद्गीतमोहिताः7/41तदमलपदपद्मे भृङ्गतामेत्य20/154देह-देहि-विभागोऽयं नेश्वरे5/123
गन्धर्वपालिभिरणुद्रुत18/25तदामृतत्वं प्रतिपद्यमानो4/194देहापाताद्वन् स्नेहात् शुद्धं चक्रे4/1
गिरिधरचरणाम्भोजं20/156तद्वा इदं भुवनमङ्गल5/125दैन्यार्णवे निमग्नोऽहं चैतन्य5/1
गूढ़ग्रहा रुचिरया सह1/136तनुद्यत्सङ्कोचात् कमठ इव17/72दोषेण क्षयितां गुणेन गुरुतां1/150
गृहान्तःखेलन्त्यो निजसहज1/153तमालश्यामलत्विषि श्रीयशोदा7/82द्रुतः गच्छन् द्रष्टुं प्रियमिति16/87
गृहीतकापालिकधर्मको14/41तमालस्य स्कन्धे सखि कलित1/146ध
गोप्यः किमाचरदयं कुशलं16/140तयोर्मध्ये हीरोज्ज्वलविमल1/161धन्यस्यायं नवप्रेमा यस्या19/105
गौरेण हरिणा प्रेममर्यादा15/1तरणिरिव तिमिरजलधिं जयति3/180धरीज पडिच्छन्दगुणं सुन्दर मह1/144
चतस्मै देयं ततो ग्राह्यं स16/25धर्मः सोऽपि महान्मया न1/152
चरितममृतमेतच्छ्रीलचैतन्य20/154तस्मै नमो भगवतेऽनुविधेम5/125धर्मः स्वनुष्ठितः पुंसां विष्वक्सेन5/10
चिन्तात्र जागरोद्वेगौ तानवं14/53तस्य हरेः पदकमलं वन्दे1/212न
चिन्त्यतां चिन्त्यतां भक्ता12/1तह तह रुन्धसि बलिजं जह1/144न चातिस्वप्नशीलस्य जाग्रतो8/65
चिरमखिलसुहृच्चकोरनन्दी1/175तांश्चाकृतार्थान् वियुनङक्ष्यपार्थकं19/45न चैवं विस्मयः कार्यो भवता3/83
चूतप्रियाल-पनसासन15/32ताभिर्युतः श्रममपोहितुमङ्ग18/25नटता किरातराजं निहत्य1/184
चेतःप्राङ्गणसङ्गिनी विजयते1/99, 120तासां तत्सौभगमदं वीक्ष्यमाणश्च15/81नदज्ज्वलदनिखनः श्रवण17/40
चेतोदर्पणमार्जनं भवमहादावाग्नि20/12तुण्डे ताण्डविनी रतिं1/99, 120न धनं न जनं न सुन्दरीं20/29
चैतन्यचरणाम्भोजमकरन्दलिहो7/1तृणादपि सुनीचेन6/239, 20/21नन्दः किमकरोद्ब्रह्मन् श्रेय एवं7/34
चैतन्यार्पितमस्त्वेतच्चैतन्य20/155तेनाटवीमटसि तद्व्यथते न किं7/40न पारयेऽहं निरवद्यसंयुजां7/43
जतेपुस्तपस्ते जुहुवुः सस्नुरार्या16/27न मेऽभक्तश्चतुर्वेदी मद्भक्तः16/25
जगमोहन-परिमूण्डा याङ्10/68त्रय्या चोपनिषद्भिश्च सांख्ययोगैश्च7/33नवाम्बुद-लसद्द्युतिर्नव15/63
जङ्घाधस्तटसङ्गदक्षिणपदं1/166त्रैलोक्य-सौभगमिदञ्च निरीक्ष्य17/31नमस्ते नरसिंहाय प्रह्लादाह्लाद16/52
जयतां सुरतौ पङ्गोर्मम1/5त्वत्साक्षात्कारणाह्लादविशुद्ध3/195नमामि हरिदासं तं चैतन्यं11/1
जहौ युवैव मलवदुत्तमःश्लोक6/137त्वमेवेति द्वाराधिपमभिवदन्कुम्मद16/87नयनं गलदश्रुधारया वदनं20/36
ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा कूटस्थो4/178दन साधयति मां योगो न4/59
ज्ञानिनाञ्चात्मभूतानां यथा7/27दृष्ट्रि3/56न स्वाध्यायस्तपस्त्यागो यथा4/59
तदत्ताभयञ्च भुजदण्डयुगं15/70नातः परं परम यद्भवतः5/124
तं निर्व्याजं भज गुणनिधे3/62दधद्भिन्तौ शश्वद्वदनविधुघर्षेण19/76नात्यश्नतोऽपि योगोऽस्ति8/65
तं वन्दे कृष्णचैतन्यं8/1दधाते फुल्लतां भावैर्यस्य तं13/1नाम्नैकं यस्य वाचि स्मरणपथगतं3/60
दशां कष्टामष्टापदमपि1/169नाम्नामकारि बहुधा निज20/16

[ नायं-रात्रा श्लोक सूची 507
नायं श्रियोऽङ्ग उ नितान्तरतेः 7/29
नायं सुखापो भगवान् देहिनां 7/27
निजप्रणयितां सुधामुदयमाप्नुवन् 1/177
निन्येऽधन्यजनस्वान्तमरुं 9/1
निमग्नो मूर्च्छानः पयसि 18/1
नो चेद्वयं विरहजाग्न्युपयुक्त 4/64
नो जाने जनयन्नपूर्वटननक्रीड़ा 1/145
नोत्पादयेद् यदि रतिं श्रम 5/10
न्यस्य स्वरूपे विदधेऽन्तरङ्गं 6/1
प
पङ्गुं लङ्घयते शैलं मूकम् 1/1
पतिसुतान्वयभ्रातृबान्धवान् 7/41
पदानि त्वगतार्थानि तदर्थगतये 1/186
पयोराशेस्तीरे स्फुरदुपवनाली 15/97
परस्य हृदये लग्नः न घूर्णयति 1/195
परस्वभावकर्माणि न प्रशंसेन्न 8/76
परामृष्टाङ्गुष्ठत्रयमसित 1/161
परिमलवासितभुवनं 20/156
पश्यामि विश्वसृजमेकम 5/124
पीडाभिर्नवकालकूटकटुता 1/148
पुलकैर्निचितं वपुः कदा तव 20/36
पुलिन्देनाप्यग्निः किमु 1/139
पुष्पाणि च स्फीतमधुव्रतानि 1/159
पूर्वपरयोर्मध्ये परविधिर्बलवान् 8/78
प्रकृतिजड़मशेषं चेतयन्न 5/112
प्राणोरुसर्वस्वपदाब्जरेणुं 20/157
प्रमदरसतरङ्गास्मेरगण्डस्थलायाः 1/171
प्रलप्य मुखसङ्घर्षी मधूद्याने 19/1
प्रलापो व्याधिरुन्मादो मोहो 14/53
प्रशमाय प्रसादाय तत्रैवान्तरधीयत 15/81
प्रहृष्टरोमा भगवत्कथायां 19/70
प्राप्तप्रणष्टाच्युतवित्त आत्मा 14/41
प्रियः सोऽयं कृष्णः 1/79, 114
प्रियेण संग्रथ्य विपक्ष-सन्निधौ 10/21
प्रीतिं वो जनयन् यातः कर 15/34
प्रेमा सुन्दरि नन्दनन्दनपरो 1/148
प्रेमोद्भावितहर्षर्षोद्वेगदैन्यार्त्ति 20/1
प्रोद्यन्नन्तःकरणकुहरे हन्त 3/62
फ
फलेन फलकारणमनुमीयते 1/91
ब
बलवानिन्द्रियग्रामो विद्वांसमपि 2/119
बलादक्षणोर्लक्ष्मीः कवलयति 1/169
बहिर्नृसिंहो हृदये नृसिंहो 16/53
बाहुं प्रियांस उपधाय गृहीत 15/51
भ
भक्तानामुद्गादनर्गलधियां वर्गो 1/138
भक्तिं परां भगवति प्रतिलभ्य 5/48
भुङ्क्ते स्वयं यदवशिष्टरसं 16/140
भृत्यस्य पश्यति गुरून्नपि 1/108
भ्रमाभा कापि वैचित्री दिव्य 14/16
म
मत्प्राणसर्वस्वपदाब्जरेणो 20/157
मत्सर्वस्वपदाम्भोजौ राधा 1/5
मदकलचलभृङ्गीभ्रान्तिभङ्गीं 1/171
मदेन्दुवरचन्दनागुरुसुगन्धि 19/91
मधुरमधुरस्मेराकारे मनोनयन 17/51
मन्ये तदर्पित-मनो 4/69, 16/26
मम जन्मनि जन्मनीश्वरे 20/29
मयूरदलभूषितः सुभगतारहार 15/63
मर्त्यो यदा त्यक्तसमस्तकर्मा 4/194
महासम्पद्वारादपि पतितमुद्धृत्य 6/327
महेन्द्रमणिमण्डलीयद 1/168
मात्रा स्वस्रा दुहित्रा वा 14/86
मायाबलेन भवतापि निगुह्यमानं 3/91
मायाश्रितानां नरदारकेण सार्द्धं 7/32
मालत्यदर्शि वः कच्चिन्मल्लिके 15/34
म्रियमाणो हरेर्नाम गृणन् 3/63, 186
य
यः कौमारहरः स एव हि 1/78
यः सर्वलोकैकमनोभिरुच्या 6/264
यज्ञैः सङ्कीर्त्तनप्रायैर्यजन्ति हि 20/10
यत्कृपा तमहं वन्दे कृष्णचैतन्य 1/1
यत्ते सुजातचरणाम्बुरुहं 7/40
यथा तथा वा विदधातु 20/47
यद्यद्द्व्यधत्त गौराङ्गस्तल्लेशलः 14/1
यर्ह्यम्बुजाक्ष न लभेय 4/63
यशोदा वा महाभागा पपौ 7/34
यस्यां समारोपणतुल्यकालं 6/264
यस्यांघ्रिपङ्कजरजःस्नपनं 4/63
यस्योत्सङ्गसुखाशाया शिथिलता 1/152
या माऽभजन् दुर्जरगेहशृंखलाः 7/43
युक्त इत्युच्यते योगी समलोष्ट्र 4/178
युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति 8/66
युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य 8/66
युगपदयमपूर्वः कः पुरो 1/167
युगायितं निमेषेण चक्षुषा 20/39
येऽन्ये परार्थभवका यमुनोपकूलाः 15/32
येन केनापि सन्तुष्टं भक्तदत्तेन 10/1
येषां प्रसादमात्रेण पामरोऽप्यमरो 7/1
येषां संस्मरणात् पुंसां सद्यः 7/10
यैर्दृष्टं तन्मुखाच्छ्रुत्वा दिव्य 17/1
योगेश्वेरश्वरे कृष्णे यत 3/83
योजयन्ति पदैरन्यैः स 1/186
यो दुस्त्यजान् दारसुतान् 6/137
र
रमादिक-वराङ्गणा-हृदयहारि 17/40
रात्रावत्र ऐक्षवमासीत्, तेन 8/47

508 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला रासे-हियम ]
रासे हरिमिह विहितविलासम् 15/84
रासोत्सवेऽस्य भुजदण्डगृहीत 7/29
रुन्धन्नम्बुभृतश्चमत्कृतिपरं 1/164
ल
लपितं गौरचन्द्रस्य भाग्य 20/1
लुठन् भूमौ काक्वा विकल 14/73
लिख्यते श्रीलगौरेन्द्रोरत्यद्भुतम 17/1
लेभे कृष्णार्णव नवरसा 1/155
लेभे चत्वरताश्च ताण्डवविधौ 1/138
लौकिकाहारतः स्वं यो भिक्षान्नं 8/1
व
वंशीं कुट्मलिते दधानमधरे 1/166
वन्देऽहं श्रीगुरोः श्रीयुत 2/1, 3/1
वन्दे तं कृष्णचैतन्यं मातृभक्त 19/1
वन्दे श्रीकृष्णचैतन्यं कृष्णभाव 16/1
वन्दे श्रीकृष्णचैतन्यं भक्तानुग्रह 10/1
वयं नेतुं युक्ताः कथमशरणां 1/153
वाचालं बालिशं स्तब्धमज्ञं 5/137
वाचोदितं तदनुतं मनसा 4/175
विकचकमलनेत्रे श्रीजगन्नाथ 5/112
विक्रीड़ितं व्रजवधूर्भिरिदञ्च 5/48
विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि 4/177
विधूरेति दिवा विरूपतां शतपत्रं 1/170
विप्राद्विषडंगुणयुता 4/69, 16/26
विश्वमेकात्मकं पश्यन् प्रकृत्या 8/76
विहारसुरदीर्घिका मम मनः 1/191
वीक्ष्यालकावृतमुखं तव 15/70
वृन्दावनं दिव्यलता-परीतं 1/159
वृन्दावनं परित्यज्य स क्वचिन्नैव 1/67
वृन्दावनरमणीनां मण्डनमखिलं 16/74
वृन्दावनात् पुनः प्राप्तं श्रीगौरः 4/1
वैगुण्यकीटकलिनः पैशुन्य 5/1
व्रजन्नस्मीत्युक्त्वा प्रमद इव 14/120
व्रजवामदृशां न पद्धतिः प्रकटा 1/188
व्रजातुलकुलाङ्गनेतर-रसालि 16/119
श
शरज्ज्योत्स्ना-सिन्धोरवकलनया 18/1
शाके सिन्ध्वग्निवान्देन्दौ ज्येष्ठे 20/158
शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः 4/177
शून्यायितं जगत् सर्वं गोविन्द 20/39
श्वसोः कुवलयमक्ष्णोरञ्जनमुरसो 16/74
श्रीचैतन्यकृपातिरेकसंततस्निग्धः 6/263
श्रीमद्रूपाथा-श्रीलगोविन्ददेवौ 1/6
श्रीमन्मदनगोपाल-गोविन्ददेव 20/155
श्रीमान्रासरसारम्भी वंशीवटतट 1/7
श्रुत्वा निष्ठुरतां ममेन्दुवदना 1/151
श्रूयतां श्रूयतां नित्यं गीयतां 12/1
स
संस्थितामपि यन्मूर्त्तिं स्वाङ्के 11/1
सखि मुरलि विशालच्छिद्र 1/163
सखि स्थिरकुलाङ्गना-निकर 1/168
सद्भ्रंशतस्तव जनिः पुरुषोत्तम 1/162
सन्तव्वतारा बहवः पङ्कजनाभस्य 7/15
समन्तात् सन्तापोद्गम 1/128
समये तेन विधेयं गुणवति 1/184
समीपे नीलाद्रेश्चटकगिरिराजस्य 14/120
समेत्ययं दास्यति अनेनापि न 6/285
स लुञ्चित-तमस्ततिमर्म 1/177
सहचरि निरातङ्कः कोऽयं युवा 1/190
सह त्वालिकुलैर्विभ्रद्भ्रष्टस्तेऽति 15/33
सा चैवास्मि तथापि 1/78
सा जयति निस्पृहार्था वरवंशज 1/189
साद्वैतं सावधूतं परिजन 2/1, 3/1
सालोक्य-सार्टि-सारूप्य 3/187
सिञ्चाङ्ग नस्त्वदधरामृतपूरकेण 4/64
सुखानि गोष्पदायन्ते ब्राह्माण्यापि 3/195
सुगन्धौ माकन्दप्रकरमकरन्दस्य 1/158
सुधांशुहरिचन्दनोत्पलसिता 15/78
सुधाजिद्दहिवल्लिका-सुदलवीटिका 16/119
सुधानां चान्द्रीणामपि 1/128
सुरतवर्धनं शोकनाशनं 16/117
सुररिपुसुदृशामुरोजकोकान्मुख 1/175
सुरासुरादिदुर्लभं फलं प्रयच्छति 3/84
सूयह्रिदसितपञ्चम्यां ग्रन्थोऽयं 20/158
सोऽयं वसन्तसमयः समियाय 1/136
सौन्दर्यामृतसिन्धुभङ्गललना 15/14
सौरभ्यामृतसंप्लवावृतजगत् 15/14
स्तोत्रं यत्र तटस्थतां प्रकट 1/150
स्मरति मनो मम कृतपरिहासम् 15/84
स्रजं न काचिद्विजहौ जल 10/21
स्वकीयस्य प्राणार्बुदसदृश 19/76
स्वकृपा-यष्टिदानेन सन्तः 1/2
स्वर्गापगा-हेममृणालिनीनां 1/92
स्वाविद्या-संवृतो जीवः 5/127
ह
हन्तायमद्रिरबला हरिदास 14/86
हरिः पुरटसुन्दरद्युतिकदम्ब 1/132
हरिमणिकवाटिका 15/78
हरिमुद्दिशते रजोधरः पुरतः 1/188
हसत्यथो रोदिति रौति 3/178
हित्वा दूरे पथि धवतरोरन्तिकं 1/155
हिरण्यकशिपोर्वक्षःशिलाटङ्क 16/52
हृदयं त्वदलोककातरं दयित 8/32
हृदि यस्य प्रेरणया 1/212
हृद्गावपुभिर्विदधन्नमस्ते 9/77
ह्लादिन्या संविदाश्लिष्टः 5/127
हियमवगृह्य गृहेभ्यः कर्षति 1/189

प्रयोजनीय अंशकी पद्य-सूची
[वर्णक्रमानुसार प्रथम और द्वितीय चरण]
अ
अङ्गे काँटा लागिल, किछु 13/82
अचिरात् पाबे तबे कृष्णेर 3/136, 4/65, 7/133
अचिरात् पाबे तुमि कृष्ण 6/295
अचिरात् मिले ताँरे तोमार 9/76
अचिरे करिबेन कृपा कृष्ण 13/121
अचेतन देह, नासाय श्वास 14/64
अचेतन पड़ियाछेन, - येन 17/17
अज्ञ मूर्ख सेइ, ताँरे दुःख 3/132
अतएव 'अद्वैत-आचार्य' ताँर 7/18
अतएव ऐश्वर्य हइते 'केवल' 7/35
अतएव कृष्ण कहे, - 'आमि 7/42
अतएव गूढ़ अर्थ किछुइ 3/48
अतएव नाम लय, नामेर 7/104
अतएव भक्तगण 'मुक्ति' नाहि 3/194
अतएव शुक-व्यास करे 7/31
अतस्त्वज्ञ 'तत्त्व' वर्णे, तार 5/120
अति उच्च-नासा तार 3/207
अति दैन्ये पुनः मागे 20/31
अदृश्य, अस्पृश्य मोरे 11/28
अद्भुत-दयालु चैतन्य-अद्भुत 17/68
अद्वैताचार्य-गोसाञि-साक्षात् 7/17
अधरेर एइ रीति, आर 16/130
अनन्त चैतन्यलीला ना याय 15/98
अनिपुणा वाणी आपने नाचिते 20/149
अनिष्टाशङ्का बिना कार मने 18/39
'अनुवाद' हैते स्मरे ग्रन्थ 20/140
अनुरागेर लक्षण एइ,- 'विधि' 10/6
अनेक नाचाइला मोरे प्रसाद 11/30
अनेक लोकेर वाञ्छा अनेक 20/17
अनेक 'सुकृते' इहा हजाछे 16/114
अन्तरे 'अनुग्रह', बाह्ये 7/164
'अन्तर्दशा', 'बाह्यदशा' 8/77
अन्तर्दशार किछु घोर, किछु 18/78
'अन्तर्धान हइला प्रभु',-निश्चय 18/38
अन्तर्यामी प्रभु जानिबेन मोर 7/94
अन्य ऐछे हय, आमार नाहि 16/29
अन्यकथा, अन्यमन, बाहिरे 17/37
अन्य कथा नाहि, सुखे 6/286
अन्योपदेशे पण्डित, कहे 3/11
अपराध कैनु, क्षम, लइनु 7/126
अपराध छाड़ि' कर कृष्ण 7/133
अपराध हउक, किबा नरके 10/95
अपार सौन्दर्ये हरे जगत्रेन्न 15/56
अप्राकृत देह तोमार प्राकृत 4/173
'अप्राकृत' देह भक्तेर 4/191
अप्राकृत-देहे ताँर चरण 4/193
अवश्य पूरिबे, प्रभु, मोर 11/42
अविद्या-नाशक' - 'बन्धुहन्' 5/145
अवैष्णव-जगत् केमने हइबे 3/221
अभिमान छाड़ि' भज कृष्ण 7/132
अभिमान-पङ्क धुजा भट्टेरे 7/163
अमानी मानद हञा कृष्णनाम 6/237
अमृत-गुटिकादि, पानादि 10/125
अमृत हइते पाक ताँर 6/116
अयोग्य हञा ताहा केह 16/137
अयोग्येर देओयाय कृष्ण 16/138
अरण्ये रोदित हैल स्त्रीभाव 3/244
'अर्थव्यस्त' लिखन सेइ, लोके 7/130
'अर्द्धबाह्यें, इति-उति करेन 18/76
'अर्द्धबाह्ये' कहेन प्रभु प्रलाप 18/79
अर्द्धरात्रित्रे प्रभु करेन उच्च 17/9
अलौकिक कृष्णलीला, दिव्य 19/103
अलौकिक-गन्ध-स्वाद अन्य 16/113
अलौकिक प्रभुर 'चेष्टा' 19/106
अल्पसेवा बहु माने आत्म 1/107
असद्व्यय ना करिह,-याते 9/144
अस्थिग्रन्थि भिन्न, चर्म्मे आछे 14/65
आ
आकण्ठ पूराजा सबाय 11/88
आकाश-अनन्त, ताते यैछे 20/79
आँचल पातिया प्रसाद 11/73
'आचार', 'प्रचार'-नामेर 4/103
आचार्य कहे,- "आगे तोमार 7/101
आचार्य-सम्बन्धे बाह्ये करे 2/91
आजन्म कृष्णकीर्त्तन, प्रभुर 2/158
आजन्म ना दिला जिह्वाय 6/311
आजि केने एतक्षण आछिस् 10/92
आजि भिक्षा दिबा आमाय 12/122
आजि मोरे भृत्य करि' 12/27
आजि लाग् पाञाछि, दण्डिमु 6/50
आजि हैते एइ मोर आज्ञा 2/113
आज्ञा-पालने कृष्णेर यैछे 10/8

510 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला आज्ञा-उपास ]

आज्ञा लद्धि' आइला, कि 12/69
'आदिवस्या' एइ स्त्रीरे ना 14/26
आनुषङ्गिक फल नामेर 3/179
आपन कारुण्य, लोके वैराग्य 2/168
आपना बिना अन्य माधुर्य 16/111
आपनार आगे मोर शरीर 11/32
आपनार कथा परमुण्डे देन 5/77
आपनार गुण नाहि आपने 5/78
आपनारे करे संसारी जीव 20/31
आपनि प्रद्युम्नमिश्र-सह हय 5/85
आपनि श्रीमुखे मोरे करुन 6/232
आपनि श्रीहस्ते बालु दिला 11/68
आपने आचरे केह, ना करे 4/102
आपने नाचये-तिने नाचे 18/18
आपने ना जाने, पुतली 4/85
आपने प्रश्न करि' पाछे 5/64
'आवेश' करये काँहा हजा 2/4
आभासे कहेन प्रभु, शुनेन 18/79
आमाकेह बुझाइते तुमि 4/168
आमार उपदेष्टा तुमि 4/160
आमार एइ देह प्रभुर कार्ये 4/98
आमार दुर्देव, - नामे नाहि 20/19
आमार शक्ति ताँरे नारिल 11/95
आमार शरीर - काष्ठपुतली 20/92
आमार 'सर्वनाश'-तोमार 12/113
आमार 'हित' करेन, -इहो 7/120
आमारे आदर कर, ना 3/217
आमारे खाट-तुलि-बालिश 13/15
आमारे भासाओ तैछे एइ 3/256
आमा-सब अधमे ये 4/182
आमा-सबाय नाहि देह' 6/320
आमा-हेन यदि एक कीट 11/41
आमि अज्ञ जीव, - अज्ञोचित 7/122
आमि-अज्ञ, 'हित'-स्थाने 7/124
आमि-अति क्षुद्र जीव 20/90
आमि-कृष्णपद-दासी 20/48
'आमि जिति', - एइ गर्व 7/118
आमि त'-संन्यासी, आमार 4/179
आमि त' संन्यासी, आपनारे 5/35
आमि त' संन्यासी, -तैल 12/116
आमि-नीचजाति, आमार 16/29
आमि-परतन्त्र, आमार प्रभु 7/147
'आमि लिखि', -इह मिथ्या 20/92
आमि सब, - केवलमात्र 12/134
आमि सब ना जानि 2/136
आमिह देखिते ताहा याइमु 1/219
आर ग्रास लैते स्वरूप 6/323
आर दिन महाप्रभु ताँर 11/21
आर सब कड़चा-कर्त्ता 14/8
आरे मूर्ख, आपनार कैलि 5/117
आश्चर्य, - तरुणी-स्पर्शे निर्विकार 5/41
आस्वाद दूरे रहु, गन्धे माते 16/111
आस्वादिते प्रेमे मत्त हइल 16/115
आस्ते-व्यस्ते गोविन्द ताँर 13/82

इ

इच्छामात्रे कैला निजप्राण 11/96
इतर-लोकेर ताते ना 14/82
इन्द्र येन कृष्णेर निन्दा 7/124
इन्द्रसम ऐश्वर्य, स्त्री अप्सरा 6/39
इन्द्रिय चराजा बुले 'प्रकृति' 2/120
इन्द्रिय-दमन हैल, प्रेमेर 3/140
इहलोक, परलोक-दुइ हय 4/131
इहाते संशय यार, सेइ 6/125
इहा वड़ महाभाग्य आमि 5/58
इहा येइ नाहि शुने, से 17/48
ईँहार ये ज्येष्ठभ्राता, नाम 1/200
ईँहार सङ्गोचे आमि एतदिन 6/280
ईँहारे पुछह, ईँह करिबेन 7/101
ईँहा हैते आजि मुइ 14/106
इहार श्लोक-गीते प्रभुर 15/27

ई

ईश्वर-चरित्र किछु बुझन 12/85
ईश्वर-चरित्र प्रभुर-बुद्धि 8/93
ईश्वर जगन्नाथ, याँर हाते 9/44
ईश्वरपुरी करे श्रीपाद-सेवन 8/26
ईश्वर-स्वभाव'-भक्तेर ना 1/107
ईश्वर-स्वभाव, - ऐश्वर्य चाहे 3/90
ईश्वर-स्वभाव,- करेन 7/118
ईश्वरेर नाहि कभु देह 5/122

उ

उच्च करि' कहे कृष्णनाम 14/59
उच्च सङ्कीर्त्तन ता'ते करिला 3/75
उठह पण्डित करि' कहेन 12/121
उठि' ताँरे लाथि माइला 12/24
उठि' शिवानन्दे कैला प्रेम 12/31
उठितेइ अस्थि सब लागिल 18/76
उत्तम हञा आपनाके माने 20/22
उदय कैले कृष्णपदे हय 3/184
उदय ना हैते आरम्भे 3/182
उदय हैले धर्म-कर्म 3/183
उद्धव-दर्शने यैछे राधार 14/13
उपदेश पाञा माया चलिला 3/258
उपमा दिवार नाहि ए-तिन 6/104
उपरोधे प्रभु मोर मानेन 6/276
उपासना लागि' देवेर करेन 19/26

[ [एइ-कालि] पद्य सूची 511

ए

पदसंदर्भ
एइ इहार मनःकथा करि16/72
ए-ऋण शोधिते आमि नारिमु13/86
एइ कहे, —नामाभास-मात्रे3/192
एइ चारि ठाञि, प्रभुर सदा2/35
एइ त' स्वभाव ताँर आग्रह8/15
एइ तिन-सेवा हैते कृष्णप्रेमा16/61
एइ दुइद्वारे शिखाइला जगजने8/30
एइ दुइर कड़काते ए-लीला14/7
एइ निमन्त्रणे देखि, —'प्रतिष्ठा'6/275
एइ नीच देह मोर पड़ुक11/36
एइ प्रेम सदा जागे याहार19/104
एइ वाञ्छा-सिद्धि मोर11/36
एइ व्रजेर रमणी, कामार्क19/38
'एइ भाल, एइ मन्द'4/176
एइ भोगे हय कैछे8/42
एइमत अष्टमञ्जरी दिबे श्रद्धा6/297
एइमत गौर-राय, विषादे19/53
एइमत तिनवत्सर शिला-माला6/293
एइमत महाप्रभुर सुखे काल11/13
एइमत मोर इच्छा, —छाड़िमु11/34
एइमत हञा येइ कृष्णनाम20/26
एइ रघुनाथे आमि सँपिनु6/202
एइ शिलार कर तुमि6/295
एइ 'शुष्क-वैराग्य' नहे8/63
एइ सब हय भक्तिशास्त्र10/100
एइ सुख लागि' आमि12/113
एक एक पाते पञ्चजनार11/82
एक एक हस्त-पाद14/65
एक कुँजा जल आर6/296
एकक्षण प्रभुर यदि पाइये9/95
एक जनार दोषे सब3/163
एकदिन गोविन्द महाप्रसाद11/16
एकदिन प्रभु यमेश्वर-टोटा13/78
एकदिनेर लीलार तबु18/13-14
एकपाश हओ, मोरे देह'10/86
एकवाक्यता नाहि, ताते7/110
एक वाञ्छा हय मोर11/31
एकबारे स्फुरे प्रभुर कृष्णेर15/8
एकमन पञ्चदिके पञ्चगुण15/9
एक वस्त्र लञा तार करिला11/20
एक रामानन्देर हय एइ5/42
एकलीला-प्रवाहे बहे शत5/162
एक लीलाय करेन प्रभु2/169
एकलीलाय बहे गङ्गार शत7/161
एकश्लोक पड़िते फिराय13/128
एकसखी सखीगणे देखाय18/82
एकान्त आश्रय कर चैतन्य5/131
'एत अन्न खाओ'—तोमार8/72
एत बलि' एक ग्रास करिला6/322
एत बलि' घर हैते तैल12/119
एत बलि' ताँरे पुनः6/287
एत बलि' महाप्रसाद करिला11/20
एत बलि' श्राद्धपात्र कराइला3/220
एत सब कर्म आमि4/83
ए-वन्याय ये ना भासे3/253
एबार तोमार येइ हइबे12/47
ए शरीरे साधिमु आमि4/78
ए सङ्कटे कृष्ण राख7/93
ए-सब कथाते कारो ना3/258
ए सब बान्धिते नारिलेक6/39
ए सौभाग्य लागि' आगे11/105

ऐ

पदसंदर्भ
ऐछे कवित्व बिना नहे1/198
ऐछे चैतन्यनिष्ठा योग्य13/59
ऐछे दयालु दाता लोके17/68
ऐछे नामोदयारम्भे पाप3/184
ऐछे स्वाद आर कोन प्रसादे6/324
'ऐश्वर्यज्ञानयुक्त', 'केवल'-भाव7/26
ऐश्वर्यज्ञान हैते केवल-भाव7/44
ऐश्वर्य-ज्ञाने ना पाइ7/26
ऐश्वर्य देखिलेह 'शुद्धेर' नहे7/35

क

पदसंदर्भ
कतक्षणे प्रभुर काणे शब्द18/75
कत ठाञि बुझाञाछ व्यवहार4/168
कवित्व ना हय एइ अमृतेर1/193
कभु गुप्त, कभु व्यक्त6/124
कभु गों गों करे, कभु18/54
कभु नासाय घ्राण लय6/291
कभु बाह्यस्फूर्त्ति, —तिन15/5
कभु भावे मग्न, कभु15/5
कभु लौकिक रीति, —येन8/91
कभु स्वतन्त्र, करेन ऐश्वर्य8/91
कर्ण-मन तृप्त करे11/106
कर्णामृत, विद्यापति, श्रीगीत15/27
कर्त्तुमकर्त्तुमन्यथा करिते9/44
कलिकालरे धर्म—कृष्णनाम7/11
कह जालिय़ा, एइ दिके18/46
कहिते ना युयाय, तबु20/99
कहिबार कथा नहे, याहा5/37
काड़िते ना पारों माथा4/40
कान्त-सेवा-सुखपूर, सङ्गम20/60
कार्यसिद्धि नहे, कृष्ण करेन6/224
काल, देश, नियम नाहि20/18
कालिकार पड़ुया जगा ऐछे4/158
कालिदासे पाओयाइल प्रभुर16/57

512 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला कालि-क्षुधा ]
कालिन्दी देखिया आमि गेलाङ 18/80 कृष्ण करेन, महाप्रभु मग्न 18/32 कृष्णेर उपरे येन कैल 7/120
काष्ठ-पाषाण-स्पर्शे हय 5/19 कृष्ण कृपामय ताहा अवश्य 11/37 कृष्णेर प्रसाद, ताते 'साक्षी' 16/63
काष्ठेर पुतली येन कुहके 4/85, कृष्ण ताहा सम्यक् ना पारे 18/17 कृष्णेर वियोगे गोपीर दश 14/52
12/85 कृष्णनाम उपदेशि' कृपा करह 3/251 कृष्णेर याँते पूर्ण कृपा 16/99
काष्ठेर पुतली तुमि पार 1/203 कृष्णनाम देह' तुमि मोरे 3/256 कृष्णेर ये भुक्त-शेष, तार 16/98
काँहा करों, काँहा याङ 15/24 'कृष्णनाम' पारक हञा करे 3/255 कृष्णेर स्वरूप-लीला वर्णिबा 5/133
काँहा 'क्षुद्र' जीव 'दुःखी' 5/126 कृष्णनाम बिना तेंहो नाहि 16/5 कृष्णेरे नाचाय प्रेमा, भक्तेरे 18/18
काँहा गेले तोमा पाइ 17/61 कृष्णनाम लञा नाचे, प्रेम 3/261 कृष्णेरे बाहिर नाहि करिह 1/66
काँहा तोमार कृष्णरसवाक्य 1/179 कृष्णनाम 'सङ्केते' चालाय 16/6 के कहिते पारे गम्भीर 5/87
काँहा 'पूर्णानन्दैश्वर्य' कृष्ण 5/126 कृष्णनामेर महिमा शास्त्र 1/101 के कहिते पारे गौरेर आश्चर्य 9/115
काँहा यमुना, वृन्दावन 18/109 कृष्णपादपद्म-गन्ध येइ जन 6/136 के बुझिते पारे गौरेर कृपा 9/58
काँहा याङ, काँहा पाङ 12/5 कृष्णप्राप्ति, सेवामृत-समुद्रे 20/14 के मोर निलेक कृष्ण 14/37
कि करिले हित हय नारि 4/140 कृष्णप्राप्त्ये उपाय कोन नाहि 4/56 केह बले,—'नाम हैते हय 3/176
किन्तु आमार ये किछु 11/38 कृष्णप्रेम-कण तैछे जीवेर 18/20 केह बले,—'नाम हैते जीवेर 3/176
किन्तु तोमार स्मरणेर नहे 9/137 'कृष्णप्रेम', 'कृष्ण' दिते धरे 4/70 कैछे नाचे, केबा नाचाय 4/86
किन्तु शास्त्रदृष्ट्ये करि एक 5/44 कृष्णप्रेमे मत्त करे कृष्ण 3/266 कैला जगते वेणुध्वनि 17/35
किवा अनुराग करे, किवा 20/49 कृष्णप्रेमोद्गम, प्रेमामृत 20/14 कोटिचिन्तामणि-लाभ नहे 9/95
किवा ना देय दरशन 20/48 कृष्णविच्छेदे प्रभुर से-दशा 14/12 कोटि-जन्मे ब्रह्मज्ञाने येइ 3/192
कि मोर कर्त्तव्य, मुञि 6/232 कृष्णभक्ति बिना प्रभुर ना 2/91 कोटि-देह क्षणके तबे 4/55
कीर्त्तन समाप्त हैले, हय 3/239 कृष्णभजने नाहि जाति-कुल 4/67 कोटि नामग्रहणयज्ञ करि 3/123
कुक्कुरके 'कृष्ण' कहाञा 1/33 कृष्ण मथुराय गेले गोपीर 14/12 कोटिमन्मथमोहन मुरलीवदन 15/56
कुबुद्धि छाड़िया कर श्रवण 4/65 कृष्ण-मोर जीवन 20/58 कोटियुग पर्यन्त यदि लिखये 18/14
कुमाररेर चाक येन सतत 15/6 कृष्ण मोरे 'कान्ता' करि' 20/59 कोथा हैते जानिबे से एइ 3/204
कुलीन, पण्डित, धनीर बड़ 4/68 कृष्ण यार ना पाय अन्त 18/15 कोन् छार पदार्थ एइ दुइ 9/96
कुष्ठी-विप्रेर रमणी 20/57 कृष्णरस आस्वादये दुइ 20/69 कोन् जाने क्षुद्र जीव काँहा 5/26
कृपा करि' कर मोरे 20/34 कृष्णरूपामृतसिन्धु, ताहार 15/19 कोनप्रकारे हरिदासेर छिद्र 3/103
कृपा करि' कृष्ण मोरे 11/94 कृष्णलीला वर्णिते ना जाने 5/105 कोन प्रवासीरे दिमु, कि 13/61
कृपा करि' मोर माथे 7/126 कृष्णलीला-मण्डल, शुद्ध 14/44 कौतुकेते तेंहो यदि पाशक 16/7
कृपाते करिल अनेक-नामेर 20/17 कृष्णलीलारस-प्रेम याहा हैते 4/220 क्या करों, काँहा याङ 17/53
कृष्ण-आदि, आर यत 3/266 कृष्ण-शक्ति बिना नहे तार 7/11 क्रमे ईश्वर-पर्यन्त अपराधे 8/97
कृष्णनाम उपदेशि' कृपा 3/251 'कृष्णसुखतात्पर्य',—एइ तार 7/39 क्रमे क्रमे हैल प्रभुर से 14/13
'कृष्ण'—एक प्रेमदाता, शास्त्र 7/14 कृष्ण-स्वभाव,—भक्त-निन्दा 3/211 क्षणे क्षणे उठे प्रेमार तरङ्ग 18/21
कृष्णकथा-पूजादिते अष्टप्रहर 13/132 कृष्णाद्भुत बलाहक, मोर 15/65 क्षुद्रजीव सब मर्कट-वैराग्य 2/120
कृष्णकथाय रुचि तोमार 5/9 कृष्णे नामाविष्ट-मना सदा 3/244 क्षुधा नाहि बाधे, चैतन्यचरण 6/186

[ खण्डि-जालि पद्य सूची 513
ख गौर-पादपद्म याँर हय प्राण 5/106 चैतन्येर लीला-गम्भीर 3/47
गौरलीला, भक्ति-भक्त-रस 5/163 चोरार माके डाकि' कान्दिते 16/129
खण्डिबे आध्यात्मिकादि 19/110 ग्राम्यकथा ना शुनिबे, ग्राम्यवार्त्ता 6/236 चौद्द-हात जगन्नाथेर तुलसीर 13/123
खाइते शुइते यथा तथा 20/18 ग्राम्य-कविर कवित्व शुनिते 5/107 चौर-प्रेत-राक्षसादि भय हय 3/183
खाओयाञा पुनः तारे करये 8/72 ग्राम्यवार्त्ता ना शुने, ना कहे 13/132
खासा वस्तु खाओ सबे 6/322 छ
घ
ग छत्रे गिया यथा-लाभ उदर 6/286
घट-पटिया मूर्ख तुमि 3/199 छत्रे मागि' खाय मध्याह्नकाले 6/283
'गदाधर-प्राणनाथ' नाम हैल 7/159 घृणा नाहि जन्मे, आर 4/186 छोड़ि' कृष्णकथा अधन्य, कह 17/55
गम्भीरा-भितरे मुख घषिते 19/58 छिण्डा-कानि काँथा बिना 6/312
गाढानुरागेर वियोग ना याय 4/62 च छिद्र चाहि' बुले, काँहा छिद्र 8/41
'गीतगोविन्द'-पद गाय 3/79 छोट हरिदासे इँहा आसिते 2/113
गुञ्जामाळा दिया दिला राधिका 6/307 चञ्चलस्वभाव कृष्णेर, ना रय 15/80
गुणमध्ये छले करे दोष 8/79 चन्दन-पङ्केते आमार ज्ञान 4/179 ज
गुर्जरीरागिनी लञा सुमधुर 13/79 चम्पक-कलि-सम हस्त 3/208
गुरु उपेक्षा कैले, ऐछे 8/97 चान्द धरिते चाहे, येन हञा 18/19 जगत् नाचाओ, यारे यैछे 11/29
'गुरु' हञा तरुलताय शिखाय 19/81 'चित्, ब्रह्म, माया, मिथ्या' 2/98 जगत्-निस्तार लागि' करेन 3/221
गुह्य अङ्ग यत, तार 5/39 चित्त शुद्ध हैल, चाहे 3/251 जगत् भासाइते पारे यार 5/88
'गृहस्थ' हञा नहे राय षड्वर्गेर 5/80 चित्तशुद्धि, सर्वभक्तिसाधन 20/13 जगते नाहि जगदानन्द-सम 4/162
गोपीनाथ-पट्टनायक-रामानन्द 9/17 चेतन पाइते अस्थि-सन्धि 14/71 जगतेर मध्ये 'पात्र'-साड़े 2/105
गोपीभाव हृदये, तार वाक्य 19/53 चैतन्यचन्द्रेर कृपा हञाछे 6/41 जगतेर हित लागि' गौर 7/113
गोवर्द्धन-शिला प्रभु हृदये 6/291 चैतन्यचरित्र एइ परम 9/151 जगतेर 'हित' हउक,-एइ 7/136
गोवर्धन हैते मोरे के इँहा 14/105 चैतन्यचरितामृत नित्य कर 5/89 जगद्गुरु श्रीधरस्वामी, 'गुरु' 7/129
गोवर्धने ना चड़िह देखिते 13/39 श्रीचैतन्यचरितामृत-नित्य 19/111 जगदानन्दे पिआओ आत्मीयता 4/163
'गोवर्द्धनेर शिला', 'गुञ्जा-माला' 6/287 चैतन्यचरितामृत येइ जन 20/151 जगदानन्देर प्रेमविवर्त्त शुने 12/154
गोविन्द कहे,-'आमार 'सेवा' 10/95 चैतन्यचरित्र एइ-अमृतेर 11/106 जगन्नाथ-नृसिंह-सह किछु 2/67
गोविन्द कहे, -'उठ आसि' 11/18 चैतन्यप्रभुर लीला के बुझिते 7/161 जन्मे जन्मे तुमि पञ्च-मोर 9/141
गोविन्द कहे,-'जगन्नाथ राखेन 13/86 चैतन्यलीलामृत-सिन्धु-दुग्धाब्धि 20/88 जन्मदाता पिता नारे 'प्रारब्ध' 6/40
गोविन्द कहे,-"श्रीकान्त, आगे 12/37 चैतन्यावतारे कृष्णप्रेमे लुब्ध 3/260 जन्मे जन्मे तोमार पाय 5/76
गोविन्द-चरणारविन्द-याँर 13/130 चैतन्यावतारे बहे प्रेमामृत 3/252 जल-तुलसीर सेवाय यत 6/302
गोविन्द-चरणे कैला आत्म 13/130 चैतन्येर कृपाय जाने एइ 10/100 जानि' हरिदास ताँरे कैला 4/14
गोविन्दे देखिया प्रभु बले 10/92 चैतन्येर प्रेमपात्र जगदानन्द 12/101 जाल बाहिते एक मृत मोर 18/47
गोविन्देरे महाप्रभु कैराछे 16/43 चैतन्येर भक्तगणे नित्य कर 5/132 जालिया कहे,-"इँहा एक 18/47