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श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

नवाँ अध्याय

चित्र 2

नवाँ अध्याय नवें अध्यायका सार—इस अध्यायमें भक्तिको एक वृक्षके रूपमें वर्णन करके एक रहस्यको प्रकट किया गया है कि मूलवृक्ष विश्वम्भर-श्रीगौराङ्ग महाप्रभु ही भक्तिवृक्षके माली और उसके फलके दाता एवं भोक्ताके रूपमें भी हैं। श्रीनवद्वीपधाममें यह फलवृक्ष रोपित हुआ और उसके पश्चात् पुरुषोत्तम, वृन्दावनआदि अन्य स्थानोंमें ऐसे प्रेमफलके उद्यानोंकी वृद्धि हुई। श्रीमाधवेन्द्रपुरी इस वृक्षके प्रथम अङ्कुर हैं और उनके शिष्य श्रीईश्वरपुरीने इस अङ्कुरको पुष्ट किया। महाप्रभु श्रीचैतन्यदेव माली होकर अपनी अचिन्त्य-शक्तिके बलसे इस वृक्षके स्कन्ध भी हैं। श्रीपरमानन्दपुरी आदि नौ संन्यासी इस वृक्षके मूल हैं। मूल-स्कन्धके ऊपर श्रीअद्वैताचार्य एवं श्रीनित्यानन्दरूप और भी दो स्कन्ध हुए। इन दो स्कन्धोंसे अनेक प्रकारकी शाखाएँ-उपशाखाएँ निकलीं, जिन्होंने सम्पूर्ण जगत्‌को आवृत्त कर लिया। इस वृक्षके प्रेमफलको सर्वत्र सभीको ही दान किया है। इस प्रकार भक्तिवृक्षको रोपण करके उसके फलास्वादनके द्वारा जगत्‌को आनन्दमें डुबो दिया। यह वर्णन एक रूपक है। (अमृतप्रवाह भाष्य) श्रीगौर-कृपासे असम्भव भी सम्भव :— तं श्रीमत्कृष्णचैतन्यदेवं वन्दे जगद्गुरुम्। यस्यानुकम्पया श्वापि महाब्धिं सन्तरेत् सुखम् ॥ 1 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ 1 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—जिनकी कृपा प्राप्त करके एक कुकुर (कुत्ता) भी महासागरको पार करनेमें समर्थ हो जाता है, उन जगद्गुरु श्रीकृष्णचैतन्यदेवकी मैं वन्दना करता हूँ॥ 1 ॥ अनुभाष्य—यस्य (चैतन्यदेवस्य) अनुकम्पया (प्रसादेन) श्वा (कुकुरः) अपि महाब्धिं (महासमुद्रं) सुखं सन्तरेत् (सन्तरणेन तत्पारं गच्छेत्), तं जगद्गुरुं (सर्वजगतां गुरुं पूज्यं) श्रीकृष्णचैतन्यदेवम् [अहं] वन्दे। श्लोक भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ 1 ॥ जय जय श्रीकृष्णचैतन्य गौरचन्द्र। जय जयाद्वैत जय जय नित्यानन्द ॥ 2 ॥ अनुवाद—श्रीकृष्णचैतन्य गौरचन्द्रकी जय हो, जय हो। श्रीनित्यानन्द प्रभु और श्रीअद्वैताचार्यकी जय हो, जय हो॥ 2 ॥ जय जय श्रीवासादि गौरभक्तगण। सर्वाभीष्ट-पूर्ति हेतु याँहार स्मरण ॥ 3 ॥ अनुवाद—श्रीवासादि गौरभक्तोंकी जय हो, जय हो, जिनके स्मरणसे समस्त कामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं॥ 3 ॥ श्रीरूप, सनातन, भट्ट-रघुनाथ। श्रीजीव, गोपालभट्ट, दास-रघुनाथ ॥ 4 ॥ एसब-प्रसादे लिखि चैतन्य-लीलागुण। जानि वा ना जानि, करि आपन-शोधन ॥ 5 ॥ अनुवाद—श्रीरूप, श्रीसनातन, श्रीरघुनाथभट्ट, श्रीजीव, श्रीगोपालभट्ट और श्रीरघुनाथदास गोस्वामी—इन सबकी कृपासे मैं श्रीचैतन्य महाप्रभुकी लीलाओं और गुणोंको लिख रहा हूँ। मैं इन्हें जानता हूँ अथवा नहीं जानता हूँ, तो भी अपने चित्तकी शुद्धिके लिये मैं इन्हें लिख रहा हूँ॥ 4-5 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'आपन शोधन'—अपने शुद्धिकरणके लिये ॥ 5 ॥ महाप्रभु स्वयं 'माली' :— मालाकारः स्वयं कृष्ण-प्रेमामृतरुः स्वयम्। दाता भोक्ता तत्फलानां यस्तं चैतन्यमाश्रये ॥ 6 ॥

[ 9/6-10 अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥6॥ अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीचैतन्य स्वयं ही प्रेमरूप-कल्पवृक्ष और स्वयं ही उसके माली हैं। जो उस वृक्षके फलोंके दाता और भोक्ता हैं, उन श्रीकृष्णचैतन्यका मैं आश्रय ग्रहण करता हूँ॥6॥ अनुभाष्य— यः (चैतन्यदेवः) स्वयं मालाकारः (उद्यानरक्षकः) स्वयं कृष्णप्रेमाम्रतरुः (कृष्णस्य प्रेमैव अमरतरुः अविनाशी वृक्षः) तत्फलानां (कल्पवृक्षस्य प्रेमफलानां) दाता, भोक्ता च, [स्वयं एव] तं चैतन्यम् [अहम्] आश्रये (प्रपद्ये)। श्लोक भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥6॥ माली होनेका कारण—अभिधेय-अधिदेवता होनेकी सार्थकता :— प्रभु कहे, आमि 'विश्वम्भर' नाम धरि। नाम सार्थक हय, यदि प्रेमे विश्व भरि॥7॥ अनुवाद—श्रीचैतन्य महाप्रभुने विचार किया कि मेरा नाम 'विश्वम्भर' (विश्वका पालन करनेवाला) है। यदि मैं कृष्णप्रेमसे सम्पूर्ण विश्वको भर दूँ, तभी मेरा यह नाम सार्थक होगा॥7॥ नवद्वीपमें भक्तिफलके उद्यानकी रचना :— एत चिन्ति' लैला प्रभु मालाकार-धर्म। नवद्वीपे आरम्भिला फलोद्यान-कर्म॥8॥ श्रीचैतन्य मालाकार पृथिवीते आनि'। भक्ति-कल्पतरु रोपिला सिञ्चि' इच्छा-पानि॥9॥ अनुवाद—ऐसा विचार करके महाप्रभुने माली बनकर नवद्वीपमें फलका उद्यान लगाना आरम्भ किया। श्रीचैतन्य मालीने भक्ति-कल्पवृक्षको पृथ्वीपर लाकर रोपण किया और इच्छारूपी जलके द्वारा उसका सिञ्चन किया॥8-9॥ उसके प्रथम अङ्कुर—श्रीमाधवेन्द्रपुरी :— जय श्रीमाधवपुरी कृष्णप्रेमपूर। भक्तिकल्पतरुर तेंहो प्रथम अङ्कुर॥10॥ अनुवाद—श्रीमाधवेन्द्रपुरीकी जय हो, जिनका हृदय कृष्णप्रेमसे परिपूर्ण है। वे भक्ति-कल्पवृक्षके प्रथम अङ्कुर हैं॥10॥ अमृतप्रवाह भाष्य— 'श्रीमाधवपुरी'—इनका नाम श्रीमाधवेन्द्रपुरी है। ये श्रीमध्वाचार्य सम्प्रदायमें एक प्रसिद्ध संन्यासी थे। श्रीचैतन्यदेव इनके अनुशिष्य (शिष्यके शिष्य) थे। इनसे पहले श्रीमध्व-सम्प्रदायमें प्रेमभक्तिका कोई लक्षण नहीं था। इनके द्वारा रचित “अयि दयार्द्रनाथ' श्लोकमें श्रीमन्महाप्रभुके द्वारा शिक्षित तत्त्व बीजरूपमें था॥10॥ अमृतानुकणिका—श्रीमाधवेन्द्र पुरी श्रीमध्व गौड़ीय सम्प्रदायके द्वारा सेवित भक्ति कल्पतरुके प्रथम अङ्कुर हैं। इनसे पूर्व श्रीमध्व सम्प्रदायमें शृङ्गार रसात्मिका भक्तिका कोई भी लक्षण नहीं देखा जाता। श्रीमाधवेन्द्रपुरीकी महिमा श्रीचैतन्यभागवत और श्रीभक्तिरत्नाकर ग्रन्थमें वर्णित हुई है। श्रीभक्तिरत्नाकर पाँचवीं तरङ्ग— “माधवेन्द्रपुरी प्रेमभक्तिरसमय। याँर नामस्मरणे सकल सिद्धि हय॥2272॥” “श्रीमाधवेन्द्रपुरी प्रेमभक्तिके रसस्वरूप हैं, जिनके नाम स्मरण मात्रसे ही सब सिद्धियाँ प्राप्त हो जाती हैं।” चैःभाः आदिखण्ड नौवाँ अध्याय— “माधवेन्द्र-कथा अति अद्भुत-कथन। मेघ देखिलेइ मात्र हय अचेतन॥175॥ अहर्निश कृष्णप्रेम मद्यपेर प्राय। हासे, कान्दे, है है करे हाय हाय॥176॥” “श्रीमाधवेन्द्रपुरीकी ऐसी अद्भुत कथा है कि मेघ देखने मात्रसे ही नवजलधर मेघ कान्तिवाले श्रीकृष्णकी उद्दीपनावनेपर वे उसी समय अचेतन हो जाते। वे रात-दिन श्रीकृष्णप्रेममें मदिरापान करनेवालेके भाँति कभी हँसते, कभी रोते और कभी उल्लसित होकर 'है है' करते तथा कभी दुःखी होकर 'हाय हाय' करते॥” चैःभाः आदिखण्डके नौवें अध्यायमें श्रीमाधवेन्द्र पुरीके साथ श्रीनित्यानन्द प्रभुके मिलनका प्रसङ्ग वर्णित है। 28 | श्रीचैतन्यचरितामृत

9/10 ]

“एइमत नित्यानन्दप्रभुर भ्रमण। दैवे माधवेन्द्र-सह हैल दरशन॥ 154 ॥ माधवेन्द्रपुरी प्रेममय कलेवर। प्रेममय यत सब सङ्गे अनुचर॥ 155 ॥ कृष्णरस बिनु आर नाहिक आहार। माधवेन्द्रपुरी-देहे कृष्णेर विहार॥ 156 ॥ याँर शिष्य प्रभु आचार्यवर-गोसाञि। कि कहिब आर ताँर प्रेमेर बड़ाइ॥ 157 ॥ माधवपुरीरे देखिलेन नित्यानन्द। तत्क्षणे प्रेम मूर्च्छा हइला निष्पन्द॥ 158 ॥ नित्यानन्दे देखि' मात्र श्रीमाधवपुरी। पड़िला मूर्च्छित हइ' आपना' पासरि'॥ 159 ॥ भक्तिरसे माधवेन्द्र आदि-सूत्रधार। गौरचन्द्र इहा कहियाछेन बारे-बार॥”160 ॥

“इस प्रकार भ्रमण करते-करते श्रीनित्यानन्द प्रभुको दैवयोगसे श्रीमाधवेन्द्रपुरीके दर्शन हुए। श्रीमाधवेन्द्र पुरीका शरीर प्रेममय था और उनके सङ्गी-अनुचर जितने भी थे, सभी प्रेममें मत्त थे। कृष्णरस ही उनका आहार था। उनके दिव्य कलेवरको देखकर ऐसा अनुभव होता था कि वह श्रीकृष्णकी विहार-स्थली है। और उनकी अधिक बड़ाई क्या करें कि स्वयं श्रीअद्वैताचार्य उनके शिष्य थे। जैसे ही श्रीनित्यानन्द प्रभुने श्रीमाधवेन्द्रपुरीको देखा, उसी क्षण वे प्रेममें मूर्च्छित हो गये। श्रीनित्यानन्द प्रभुको देखकर श्रीमाधवेन्द्रपुरी भी स्वयंको भूलकर उसी क्षण मूर्च्छित होकर भूमिपर गिर पड़े। श्रीमाधवेन्द्रपुरी भक्तिरसके आदि सूत्रधार हैं, ऐसा श्रीगौरचन्द्रने बार-बार कहा है।”

“नित्यानन्द बोले, - 'यत तीर्थ करिलाङ। सम्यक् ताहार फल आजि पाइलाङ॥ 166 ॥ नयने देखिनु माधवेन्द्रेर चरण। ए प्रेम देखिया धन्य हइल जीवन॥”167 ॥

“मूर्च्छा भङ्ग होनेपर श्रीनित्यानन्द प्रभु कहने लगे-“मैंने जितने तीर्थोंमें भ्रमण किया है, आज उन सबका सम्पूर्ण फल पाया है। मैंने अपने नेत्रोंसे श्रीमाधवेन्द्रपुरीके चरणोंके दर्शन किये हैं और इनके प्रेमको देखकर मेरा जीवन धन्य हो गया है।”


“माधवेन्द्रपुरी नित्यानन्दे करि' कोले। उत्तर ना स्फुरे, - कण्ठरुद्ध प्रेमजले॥ 168 ॥ हेन प्रीत हइलेन माधवेन्द्रपुरी। वक्ष हैते नित्यानन्दे बाहिर ना करि॥ 169 ॥ जानिलुँ कृष्णेर कृपा आछे मोर प्रति। नित्यानन्द-हेन बन्धु पाइनु संहति॥ 183 ॥ नित्यानन्दे याहार तिलेक द्वेष रहे। भक्त हइलेओँ से कृष्णेर प्रिय नहे॥ 186 ॥”

“श्रीमाधवेन्द्रपुरी श्रीनित्यानन्द प्रभुको छातीसे लगाकर उनसे कुछ कहना चाहते थे, किन्तु प्रेमके कारण उनका गला रुँद्ध गया। उनके हृदयमें इतना प्रेम उमड़ आया कि वे श्रीनित्यानन्द प्रभुको छातीसे अलग नहीं कर सके और कहने लगे कि आज मैं समझ गया हूँ कि श्रीकृष्णकी मेरे प्रति अपार कृपा है, इसलिये तो उन्होंने श्रीनित्यानन्द जैसे परम बन्धुसे मुझे मिला दिया है। श्रीनित्यानन्द प्रभुके प्रति यदि किसीके हृदयमें तिलमात्र भी द्वेष रहेगा, वह भक्त होनेपर भी श्रीकृष्णका प्यारा नहीं हो सकता।”

भक्तिरत्नाकर पाँचवीं तरङ्गमें उन दोनोंके पुनः मिलन और उनके परस्पर सम्बन्धका वर्णन है— “कथोदिन परे माधवेन्द्रर सहिते। देखा हैल प्रतीची-तीर्थेर समीपेते॥ 2330 ॥ ये प्रेम प्रकाश हइल दोँहार मिलने। ताहा के वर्णिब? - ये देखिल सेइ जाने॥ 2331 ॥ नित्यानन्दे बन्धुज्ञान करे माधवेन्द्र। माधवेन्द्रे गुरुबुद्धि करे नित्यानन्द॥ 2332 ॥”

“पुनः कितने दिनोंके बाद प्रतीची-तीर्थके समीप श्रीमाधवेन्द्रपुरी और श्रीनित्यानन्द प्रभु परस्पर मिले, उन दोनोंके मिलनेपर जिस प्रेमका प्रकाश हुआ उसे कौन वर्णन कर सकेगा? इसे तो वही जान सकता है जिसने उस दृश्यको देखा है। श्रीमाधवेन्द्रपुरी श्रीनित्यानन्द प्रभुको अपना परम बन्धु समझते थे और श्रीनित्यानन्द प्रभु श्रीमाधवेन्द्रपुरीके प्रति गुरु बुद्धि रखते थे।”

श्रीमाधवेन्द्रपुरीके लिये श्रीगोपीनाथके द्वारा क्षीर चुरानेका प्रसङ्ग चैःचः मध्यलीला चौथे अध्यायमें तथा

नवाँ अध्याय | 29

[ 9/10-15 अपने शिष्य रामचन्द्रपुरीपर गुरु-अवज्ञाके कारण क्रोध प्रकाश एवं त्याग तथा अन्य शिष्य श्रीईश्वरपुरीकी सेवा देखकर कृपाशीर्वादके प्रसङ्ग चैःचः अन्त्यलीलाके आठवें अध्यायमें द्रष्टव्य हैं॥10॥ ईश्वरपुरीमें उसकी वृद्धि प्राप्ति :- श्रीईश्वरपुरी-रूपे अङ्कुर पुष्ट हैल। आपने चैतन्यमाली स्कन्ध उपजिला॥ 11 ॥ अनुवाद-श्रीईश्वरीपुरीरूपमें यह अङ्कुर पुष्ट हुआ और स्वयं चैतन्यमाली इस वृक्षके तनेके रूपमें प्रकट हुए॥11॥ अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीईश्वरीपुरी श्रीचैतन्य महाप्रभुके दीक्षामन्त्र गुरु थे। इनका जन्म कुमारहट्टमें अर्थात् हालिसहर गाँवमें एक ब्राह्मण कुलमें हुआ था और ये श्रीमाधवेन्द्रपुरीके शिष्य थे॥11॥ अनुभाष्य-श्रीईश्वरपुरी कुमारहट्टमें ब्राह्मणकुलमें उत्पन्न हुए थे और ये श्रीमाधवेन्द्रपुरीके प्रियतम शिष्य थे। चैःचः अन्त्यलीलाके 8/26-29 संख्यामें- “ईश्वरपुरी करे श्रीपदसेवन। स्वहस्ते करेन मल-मूत्रादि मार्जन॥ निरन्तर कृष्णनाम कराय स्मरण। कृष्णनाम, कृष्णलीला सुनाय अनुक्षण॥ तुष्ट हञा पुरी ताँरे कैल आलिङ्गन। वर दिल कृष्णे तोमार हउक् प्रेमधन॥ सेइ हैते ईश्वरपुरी प्रेमेर सागर।” “श्रीईश्वरपुरी श्रीमाधवेन्द्रपुरीके चरणोंकी सेवा करते थे। (श्रीमाधवेन्द्रपुरी जब वृद्धावस्थाके कारण चलने-फिरनेमें असमर्थ हो गये थे, तब) वे अपने हाथोंसे उनके मल-मूत्रका मार्जन करते थे। वे निरन्तर श्रीकृष्णनाम तथा श्रीकृष्णलीलाका कीर्तन करते और श्रीमाधवेन्द्रपुरीको सुनाते थे। उनकी सेवासे सन्तुष्ट होकर श्रीमाधवेन्द्रपुरीने उनका आलिङ्गन किया और उन्हें वर दिया कि श्रीकृष्ण उनके प्रेमधन हों। उस आशीर्वादके फलस्वरूप श्रीईश्वरपुरी 'प्रेमके सागर' हो गये।” श्रीईश्वरपुरी महाप्रभुको गयामें दशाक्षर-मन्त्र दीक्षा देनेसे पूर्व एक बार नवद्वीप आये थे और श्रीगोपीनाथाचार्यके घर कुछ मास रहे। उस समय उनका महाप्रभुसे कई बार वार्तालाप हुआ और उन्होंने महाप्रभुको स्वरचित 'कृष्णलीलामृत' ग्रन्थका श्रवण कराया। (चैःभाः आदिखण्ड सातवाँ अध्याय द्रष्टव्य है)। महाप्रभु जब श्रीईश्वरपुरीके जन्मस्थान कुमारहट्टके दर्शन करने आये, तो जीवोंको गुरुभक्तिकी शिक्षा देनेके लिये उन्होंने इस लीलाका प्रदर्शन किया था- “सेइ स्थानेर मृत्तिका आपने प्रभु तुलि'। लइलेन बहिर्वासे बान्धि' एक झुलि॥” -(चैःभाः आदिखण्ड, 12वाँ अः) “उन्होंने उस स्थानसे मिट्टी लेकर उसे अपने बहिर्वास वस्त्रमें बाँध लिया। उस समयसे जो श्रीईश्वरपुरीके स्थानके दर्शनके लिये आते हैं, वे सभी वहाँसे कुछ मिट्टी अपने साथ ले जाते हैं॥”11॥ अचिन्त्यशक्तिके प्रभावसे माली होकर भी स्वयं स्कन्ध और सब शाखाओंके आश्रय :- निजाचिन्त्यशक्त्ये माली हञा स्कन्ध हय। सकल शाखार सेइ स्कन्ध मूलाश्रय ॥ 12 ॥ अनुवाद-श्रीचैतन्य महाप्रभु अपनी अचिन्त्य शक्तिके प्रभावसे माली होते हुए भी उस वृक्षका तना भी बने। यह तना सभी शाखाओंका मूल आश्रय है॥12॥ नौ संन्यासी-नौ जड़ें :- परमानन्द पुरी, आर केशव भारती। ब्रह्मानन्द पुरी, आर ब्रह्मानन्द भारती ॥ 13 ॥ विष्णु पुरी, केशव पुरी, पुरी कृष्णानन्द। श्रीनृसिंह तीर्थ, आर पुरी सुखानन्द ॥ 14 ॥ एइ नव मूल निकसिल वृक्षमूले। एइ नव मूले वृक्ष करिल निश्चले ॥ 15 ॥ अनुवाद-परमानन्द पुरी, केशव भारती, ब्रह्मानन्द 30 | श्रीचैतन्यचरितामृत

9/13-15 ] पुरी, ब्रह्मानन्द भारती, विष्णु पुरी, केशव पुरी, कृष्णानन्द पुरी, श्रीनृसिंहतीर्थ और सुखानन्द पुरी—ये नौ जड़ें वृक्षके मूलसे निकलीं, जिन्होंने वृक्षको स्थिर किया॥13-15॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'पुरी' नामके ये सभी संन्यासी श्रीईश्वरपुरीके सम्बन्धसे और 'भारती' नामके ये संन्यासी श्रीचैतन्य महाप्रभुके संन्यास गुरु श्रीकेशव भारतीके सम्बन्धसे आत्मीयवर्ग हैं॥14॥ अनुभाष्य—श्रीपरमानन्दपुरी त्रिहुत नामक देशमें ब्राह्मण कुलमें आविर्भूत हुए और वे श्रीमाधवेन्द्र पुरीके शिष्य तथा श्रीचैतन्य महाप्रभुके परम प्रियपात्र थे। (चैःभाः अन्त्यखण्ड 10/46-49, 42) में— “संन्यासीर मध्ये ईश्वरेर प्रियपात्र। आर नाहि, एक पुरी गोसाञि से मात्र॥46॥ दामोदरस्वरूप, परमानन्द-पुरी। संन्यासीपार्षदे एइ दुइ अधिकारी॥47॥ निरवधि निकटे थाकेन दुईजन। प्रभुर संन्यासे करे दण्डेर ग्रहण॥48॥ पुरी ध्यानपर, दामोदरेर कीर्त्तन। न्यासी-रूपे न्यासी-देहे बाहु दुइ जन॥49॥ यत प्रीति ईश्वरेर पुरी-गोसाञिरे। दामोदर-स्वरूपेओ तत प्रीति करे॥42॥” “दामोदर-स्वरूप संन्यासियोंमें से महाप्रभुके प्रियपात्र थे। एक परमानन्दपुरीके अतिरिक्त उनके समान और कोई न था। संन्यासी पार्षदोंमें दामोदर-स्वरूप और परमानन्दपुरी—ये दोनों अधिकारी थे। दोनों निरन्तर महाप्रभुके पास ही रहते थे। महाप्रभुके संन्यासके पश्चात् इन्होंने दण्ड ग्रहण किया। परमानन्दपुरी विरक्त ध्यानपरायण भजनमें अनुरक्त रहते थे और दामोदर स्वरूप कीर्तनानन्दी थे। भगवान् श्रीगौरसुन्दरके संन्यासी शरीरमें ये दोनों भुजा सदृश थे। श्रीपरमानन्दपुरीके प्रति भगवान् श्रीगौरसुन्दरका जिस प्रकारका मर्यादाभाव था, दामोदर स्वरूपके प्रति भी वह भाव किसी भी प्रकारसे न्यून नहीं था।” श्रीपरमानन्दपुरीका दर्शनकर महाप्रभु कहने लगे— (चैःभाः अन्त्यखण्ड 3रा अध्याय संख्या 171-172, 175)— “आजि धन्य लोचन, सफल आजि जन्म। सफल आमार आजि हैल सर्वधर्म॥”171॥ प्रभु बोले,—“आजि मोर सफल संन्यास। आजि माधवेन्द्र मोरे हइल प्रकाश॥”172॥ कत क्षणे अन्योऽन्ये करेन प्रणाम। परमानन्दपुरी—चैतन्येर प्रेम-धाम॥” “हरि हरि! नेत्रोंसे परमानन्दपुरीके दर्शनकर आज मेरे नेत्र धन्य हो गये, आज जन्म सफल हो गया, धन्य हो गया। आज मेरे सभी धर्म सफल हो गये।” महाप्रभुने आगे कहा—“आज मेरा संन्यास सफल हुआ है। आज श्रीमाधवेन्द्रपुरीका प्रकाश मेरे सामने प्रकट हुआ है।” कुछ क्षणों पश्चात् दोनोंने एक दूसरेको प्रणाम किया। श्रीपरमानन्दपुरी चैतन्य-प्रेमके धाम हैं। श्रीपरमानन्दपुरी पुरुषोत्तम क्षेत्रमें श्रीमन्दिरके पश्चिम दिशाकी ओर एक मठका और एक कुँआ निर्माणकर रहते थे। कुँएका जल पवित्र न देख महाप्रभुने कहा— (चैःभाः अन्त्यखण्ड 3रा अध्याय)— “महाप्रभु जगन्नाथ मोरे देह एह वर। गङ्गा प्रवेशुक एई कूपेर भितर॥”242॥ प्रभु बोले,—“शुनह सब भक्तगण। ए कूपेर जले ये करिबे स्नान पान॥251॥ सत्य सत्य हबे तार गङ्गास्नान-फल। कृष्णे भक्ति हबे तार परम निर्मल॥”252॥ प्रभु बोले,—“आमि ये आछिये पृथिवीते। निश्चयइ जानिह पुरी-गोसाञिर प्रीते॥”255॥ श्रीचैतन्य महाप्रभु भुजाएँ उठाकर कहने लगे,—“जगन्नाथ महाप्रभु, मुझे यह वर दीजिये कि गङ्गा इस कुँएके भीतर प्रविष्ट हो जाय।” तब श्रीचैतन्य महाप्रभु कहने लगे,—“सभी भक्तों सुनो! इस कुँएके जलमें जो स्नान करेगा और जो इसका जल पान करेगा, उसे सत्य ही गङ्गा-स्नानका फल मिलेगा और परम निर्मल कृष्णभक्तिकी प्राप्ति होगी।” आगे श्रीचैतन्य महाप्रभुने कहा,—“केवल नवाँ अध्याय | 31

[ 9/14 पुरी गोसाईंकी प्रीतिके कारण ही मैं पृथ्वीपर आया हूँ, यह निश्चय ही जानना।” श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका (118 श्लोक) में इस प्रकार वर्णन आता है— “पुरी श्रीपरमानन्दो य आसीदुद्धवः पुरा।” “पहले जो उद्धव थे, वे ही अब श्रीगौरलीलामें श्रीपरमानन्द पुरी हैं।” केशवभारती—श्रीशङ्कर-प्रवर्त्तित दशनामी दण्डिगर्णोंके अन्यतम 'भारती' सम्प्रदायके अन्तर्भुक्त हैं। सरस्वती, पुरी और भारती—ये तीन सम्प्रदाय दक्षिणापथके शृंगेरी मठके अधीन हैं। श्रीकेशवभारती उस समय काटोयाके शाखा मठमें अधिष्ठित थे। किसी-किसीका यह कहना है कि ये ब्रह्म संन्यासी होनेपर भी श्रीमाध्व-सम्प्रदायके अन्तर्भुक्त श्रीमाधवेन्द्रपुरीके मन्त्र-शिष्य और वैष्णव संन्यासी थे। वर्द्धमान जिलाके कान्द्रा डाकघरके अन्तर्गत खाटुन्दि गाँवमें इनकी देवसेवा और मठ स्थापित हैं। मठाधिकारियोंके मतानुसार वे सब श्रीकेशवभारतीके वंशज हैं। श्रीकेशवके पुत्र (अन्य मतानुसार शिष्य)—निशापति और ऊषापति हैं। [श्रील भक्तिसिद्धान्त सरस्वती ठाकुरके द्वारा यह टीका लिखे जानेके समय] निशापतिके वंशमें श्रीनकड़िचन्द्र विद्यारत्न सेवाधिकारीके रूपमें वर्त्तमान थे और ऊषापतिके वंशज हुगलीके वैँचिके निकट राखालदासपुरमें विद्यमान थे। किसी अन्यके मतानुसार ये (निशापति और ऊषापति) श्रीकेशव भारतीके पूर्वाश्रमके वंशज भी हो सकते हैं। किसी अन्यके मतानुसार, श्रीकेशवभारतीके भ्राता, मतान्तरसे उनके शिष्य माधव भारतीके शिष्य बलभद्र भी भारती थे। बलभद्रके पूर्वाश्रमके दो पुत्र मदन और गोपाल थे, मदन आउरियामें और गोपाल देन्दुड़में वास करते थे। मदनके वंशमें 'भारती' और गोपालके वंशमें 'ब्रह्मचारी' उपाधि हैं। इन दोनों वंशोंके अनेक उत्तराधिकारी विद्यमान हैं। श्रीगौरगणोद्देश दीपिकाके 52 श्लोकमें इस प्रकार वर्णन आता है— “मथुरायां यज्ञसूत्रं पुरा कृष्णाय यो मुनिः। ददौ सान्दीपनिः सोऽभूत् अद्य केशवभारती॥” “पूर्वकालमें मथुरामें श्रीकृष्णका यज्ञोपवीत संस्कार करानेवाले श्रीसान्दीपनि मुनि अब श्रीगौरलीलामें श्रीकेशव भारती हैं।” श्रीगौरगणोद्देश-दीपिकाका 117 श्लोक— “इति केचित् प्रभाषन्तेऽक्रूरः केशवभारती॥” “कोई-कोई श्रीकेशव भारतीको अक्रूरका अवतार भी कहते हैं।” 1432 शकाब्दमें कटोयामें इन्होंने निमाइ पण्डितको संन्यास प्रदान किया। वैष्णवमञ्जुषा-द्वितीय संख्या द्रष्टव्य है। श्रीब्रह्मानन्दपुरी—श्रीमहाप्रभुकी नवद्वीपलीलामें ये कीर्त्तनके सङ्गी थे। संन्यास ग्रहण करनेसे पहले भी और संन्यासके बाद भी महाप्रभु उनपर विशेष विश्वास करते थे। नीलाचलमें भी ये महाप्रभुके सङ्गी होकर आये थे। श्रीब्रह्मानन्द भारती—जब वे नीलाचलमें महाप्रभुके दर्शनके लिये गये, तब उनका नीचेका वस्त्र मृगके चमड़ेसे निर्मित था। यद्यपि वे महाप्रभुके निकट थे, तो भी महाप्रभु छल करते हुए कहने लगे कि मैं ब्रह्मानन्द भारतीको देखना चाहता हूँ। यह सुनकर अर्थात् महाप्रभुके अभिप्रायको जानकर श्रीब्रह्मानन्दने चमड़ेके वस्त्र परित्यागकर काषाय-बहिर्वासको ग्रहण किया। इन्होंने महाप्रभुके निकट फिर कुछ दिनों तक नीलाचलमें वास किया॥13॥ केशवपुरी, कृष्णानन्दपुरी, नृसिंहतीर्थ और सुखानन्दपुरीके सम्बन्धमें श्रीगौरगणोद्देश दीपिकामें (97-101 श्लोक) इस प्रकार वर्णन आता है— “अनन्तश्च सुखानन्दो गोविन्दो रघुनाथकः। कृष्णानन्दः केशवश्च श्रीदामोदर-राघवौ। पुर्युपाधिक्रमात् ज्ञेया अणिमाद्यष्टसिद्धयः ॥97॥ जायन्तेयाः स्थिता ऊर्ध्वरेतसः समदर्शिनः। नव भागवताः पूर्वं श्रीभागवतसंहिताः॥98॥ प्रत्यूचुर्जनकं तेऽद्य भूत्वा संन्यासिनः सदा। प्रभुणा गौरहरिणा विहरन्ति स्म ते यथा॥99॥ 32 | श्रीचैतन्यचरितामृत

9/14-25 ] श्रीनृसिंहानन्दतीर्थः श्रीसत्यानन्दभारती। श्रीनृसिंह-चिदानन्द-जगन्नाथा हि तीर्थकाः ॥ १०० ॥ तीर्थाभिधो वासुदेवः श्रीरामः पुरुषोत्तमः। गरुडाख्यावधूतश्च श्रीगोपेन्द्राख्य आश्रमः ॥ १०१ ॥ “पूर्वकालमें श्रीवृन्दावनमें जो अणिमा आदि अष्टसिद्धियाँ थीं, उन्होंने गौड़देशमें आठ भक्तोंके रूपमें जन्म ग्रहण किया है। क्रमसे उन आठोंके नाम इस प्रकार हैं—अनन्त, सुखानन्द, गोविन्द, रघुनाथ, कृष्णानन्द, केशव, दामोदर और राघव। ये आठों ‘पुरी’ उपाधिसे युक्त थे। पूर्वकालमें राजा जनकको श्रीभागवत संहिताका श्रवण करानेवाले जयन्तीके ऊर्ध्वरेताः अर्थात् ब्रह्मचर्यमें प्रतिष्ठित, समदर्शी एवं भगवद्भक्त नौ-के-नौ पुत्र ही अब संन्यासी होकर सदैव महाप्रभु श्रीगौरहरिके साथ विहार कर रहे हैं। अब उनके नाम श्रीनृसिंहानन्द तीर्थ, श्रीसत्यानन्द भारती, श्रीनृसिंह तीर्थ, श्रीचिदानन्द तीर्थ, श्रीजगन्नाथ तीर्थ, श्रीवासुदेव तीर्थ, श्रीराम तीर्थ, श्रीगरुड़ अवधूतके नामसे भी प्रसिद्ध श्रीपुरुषोत्तम तीर्थ तथा श्रीगोपेन्द्र आश्रम हैं॥ १४ ॥ परमानन्दपुरी मध्यमूल :- मध्यमूल परमानन्द पुरी महाधीर। एइ नव मूले वृक्ष करिल सुस्थिर ॥ १६ ॥ अनुवाद—जिन नौ जड़ोंने वृक्षको स्थिर किया है, महाधीर श्रीपरमानन्दपुरी उसकी मध्य जड़ हैं॥ १६ ॥ उनके द्वारा असंख्य शाखा और उपशाखा :- स्कन्धेर उपरे बहु शाखा निकसिल। उपरि उपरि शाखा असंख्य हइल ॥ १७ ॥ विश विश शाखा करि' एक एक मण्डल। महा-महा-शाखा छाइल ब्रह्माण्ड सकल ॥ १८ ॥ एकैक शाखाते उपशाखा शत शत। यत उपजिल शाखा के गणिबे कत ॥ १९ ॥ मुख्य मुख्य शाखागणेर नाम गणन। आगे ता' करिब, शुन वृक्षेर वर्णन ॥ २० ॥ अनुवाद—तनेसे ऊपर अनेक शाखाएँ निकलीं और उन शाखाओंके ऊपर असंख्य शाखाएँ और निकलीं। बीस-बीस शाखाओंको लेकर एक मण्डल बना। बड़ी-बड़ी शाखाएँ सम्पूर्ण ब्रह्माण्डमें छा गयीं। एक-एक शाखासे सौ-सौ उपशाखाएँ उपजीं। इन शाखाओंकी कौन कहाँ तक गिनती कर सकता है? मुख्य-मुख्य शाखाओंके नामोंकी गणना आगे करूँगा। अभी चैतन्यवृक्षका वर्णन सुनिये ॥ १७-२० ॥ मूल तनेके दोनों ओर दो तने— श्रीनिताइ और श्रीअद्वैत :- शाखार उपरे हैल वृक्ष-दुइ स्कन्ध। एक 'अद्वैत' नाम, आर 'नित्यानन्द' ॥ २१ ॥ अनुवाद—वृक्षके तनेके ऊपरवाले सिरेपर तनेके दो भाग हुए। एक तनेका नाम ‘श्रीअद्वैत’ और दूसरेका नाम ‘श्रीनित्यानन्द’ हुआ॥ २१ ॥ शिष्य-प्रशिष्यरूप शाखा-उपशाखा-परम्परासे विस्तार :- सेइ दुइस्कन्धे शाखा यत उपजिल। तार उपशाखागणे जगत छाइल ॥ २२ ॥ बड़ शाखा, उपशाखा, तार उपशाखा। जगत व्यापिल तार के करिबे लेखा ॥ २३ ॥ शिष्य, प्रशिष्य, आर उपशिष्यगण। जगत व्यापिल तार नहिक गणन ॥ २४ ॥ उडुम्बर-वृक्ष येन फले सर्व अङ्गे। एइ मत भक्तिवृक्षे सर्वत्र फल लागे ॥ २५ ॥ अनुवाद—इन दोनों तनोंसे जितनी भी शाखाएँ उत्पन्न हुईं, उनकी उपशाखाओंने सम्पूर्ण जगत्‌को आच्छादित कर दिया। बड़ी शाखाएँ, उपशाखाएँ और उनकी भी उपशाखाओंने जगत्‌को व्याप्त कर लिया, उनके बारेमें कौन लिख सकता है? इस प्रकार शिष्य, प्रशिष्य (शिष्यके शिष्य) और उनके भी उपशिष्य इतनी संख्यामें सम्पूर्ण जगत्‌में फैल गये कि उनकी गिनती नवाँ अध्याय | 33

[ 9/22-36 करना सम्भव नहीं है। जिस प्रकार गूलर वृक्षके सभी अङ्गोंमें फल लगता है, उसी प्रकार भक्ति-वृक्षके प्रत्येक अङ्गमें फल लग गये ॥ 22-25 ॥ उससे माली श्रीगौरकी श्रीकृष्ण-प्रेमामृत फल-वितरण-लीला :- मूलस्कन्धेर शाखा आर उपशाखागणे। लागिल ये प्रेमफल,-अमृतके जिने ॥ 26 ॥ अनुवाद-(चैतन्य महाप्रभुरूपी) मूल तनेकी शाखाओं- उपशाखाओंमें जो फल लगे, वे अमृतको भी पराभूत करनेवाले थे॥ 26 ॥ बिना मूल्य प्रेमफल-वितरण :- पाकिल ये प्रेमफल अमृत-मधुर। बिलाय चैतन्यमाली, नाहि लय मूल ॥ 27 ॥ त्रिजगते यत आछे धन-रत्नमणि। एकफलेर मूल्य करि' ताहा नाहि गणि ॥ 28 ॥ अनुवाद-जो प्रेमफल पक गये, उनका स्वाद अमृतसे भी मधुर था। माली श्रीचैतन्य महाप्रभु उन मधुर फलोंको बिना मोलके ही बाँटने लगे। तीनों लोकोंमें जितनी भी धन-रत्न-मणि आदि सम्पत्ति है, उसका मूल्य इस वृक्षके एक प्रेमफलके समान भी नहीं है ॥ 27-28 ॥ अनुभाष्य-'मूल'-मूल्य ॥ 27 ॥ पात्र-अपात्र विचार बिना वितरण :- मागे वा ना मागे केह, पात्र वा अपात्र। इहार विचार नाहि जाने, देय मात्र ॥ 29 ॥ अनुवाद-किसीने माँगा अथवा नहीं माँगा, कोई इसका अधिकारी था या नहीं था, इसपर बिना कोई विचार किये श्रीचैतन्य महाप्रभु सबको यह प्रेमफल देते गये ॥ 29 ॥ दीन-दुःखी जीवोंका उद्धार :- अञ्जलि अञ्जलि भरि' फेले चतुर्दिशे। दरिद्र कुड़ाञा खाय, मालाकार हासे ॥ 30 ॥ अनुवाद-महाप्रभु अञ्जली भर-भरकर प्रेमफलको चारों ओर फेंकने लगे। दरिद्र (साधन-भजन अथवा प्रेम रूपी धनसे विहीन) लोग उन्हें उठा-उठाकर खाने लगे, तो श्रीचैतन्यमाली उनको देखकर हँसने लगे ॥ 30 ॥ मालाकार कहे,-शुन, वृक्ष-परिवार। मूलशाखा-उपशाखा यतेक प्रकार ॥ 31 ॥ चैतन्य-वृक्षके सभी अङ्ग ही चेतनमय और चेतनमय फलास्वादनसे अचेतन जीवोंका चैतन्य होना :- अलौकिक वृक्ष करे सर्वेन्द्रिय-कर्म। स्थावर हइया धरे जङ्गमेर धर्म ॥ 32 ॥ ए वृक्षेरे अङ्ग हय सब सचेतन। बाड़िया व्यापिल सबे सकल भुवन ॥ 33 ॥ अनुवाद-माली कहने लगे-"वृक्षके परिवारकी मूलशाखाओं! उपशाखाओं! सब सुनो। यह भक्तिवृक्ष अलौकिक है, यह सभी इन्द्रियोंसे दूसरी इन्द्रियोंके कार्य करनेमें सक्षम है और स्थावर होते हुए भी इसने जङ्गमके धर्मको अपनाया हुआ है। इस वृक्षके समस्त अङ्ग चेतन हैं, जो फैलकर समस्त जगत्में व्याप्त हो गये हैं ॥ 31-33 ॥ नामप्रचार अकेले असम्भव देखकर सबको बिना विचार किये वितरणका आदेश :- एकला मालाकार आमि काहाँ काहाँ याब। एकला वा कत फल पाड़िया विलाब ॥ 34 ॥ एकला उठाञा दिते हय परिश्रम। केह पाय, केह ना पाय, रहे मने भ्रम ॥ 35 ॥ अतएव आमि आज्ञा दिलुँ सबाकारे। याँहा ताँहा प्रेमफल देह' यारे तारे ॥ 36 ॥ 34 | श्रीचैतन्यचरितामृत

9/34-41 ]

एकला मालाकार आमि कत फल खाब। ना दिया वा एइ फल आर कि करिब ॥ 37 ॥ आत्म-इच्छामृते वृक्ष सिञ्चि निरन्तर। ताहाते असंख्य फल वृक्षर उपर ॥ 38 ॥ अनुवाद-मैं माली अकेला कहाँ-कहाँ जा सकता हूँ और कितने फलोंको तोड़कर बाँट सकता हूँ? मुझ अकेलेको फल उठानेमें बहुत परिश्रम हो रहा है। उसपर भी किसे मिला और किसे नहीं मिला, यह भ्रम मेरे मनमें रह जाता है। इसलिये मैं सबको आज्ञा देता हूँ कि जहाँ-तहाँ जिस-किसीको भी यह प्रेमफल प्रदान करो। मैं अकेला माली कितने फल खा सकता हूँ? यदि इन्हें नहीं बाँटूगा, तो इन फलोंका मैं क्या करूँगा? मैं अपनी इच्छारूपी अमृतके द्वारा इस वृक्षको निरन्तर सींचता हूँ, इसलिये इसके ऊपर असंख्य फल लगे हैं॥ 34-38 ॥ प्रेमास्वादनसे जीवोंको अमृतत्वकी प्राप्ति :- अतएव सब फल देह' यारे तारे। खाइया हउक् लोक अजर अमरे ॥ 39 ॥ अनुवाद-इसलिये इन सब प्रेमफलोंको जहाँ-तहाँ सभीको प्रदान करो, जिससे वे इसे खाकर अजर-अमर हो जाँय ॥ 39 ॥ अमृतानुकणिका-जीव स्वरूपतः अजर और अमर है। गीता (2/20)- “न जायते म्रियते वा कदाचिन्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः। अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे ॥” “यह जीवात्मा कभी न तो जन्म लेता है और न ही कभी मरता है अथवा पुनः पुनः इसकी उत्पत्ति या वृद्धि नहीं होती है। यह अजन्मा, नित्य, शाश्वत और प्राचीन होनेपर भी नित्य नवीन है। शरीरके नष्ट होनेपर भी जीवात्माका विनाश नहीं होता।” श्रीकृष्णको भूल जानेके कारण ही जीव मायाके वशीभूत होकर नश्वर शरीरोंको धारण और फिर उनका त्याग करता है। महाप्रभु और उनके पार्षदोंकी कृपासे जब जीव प्रेमरूपी फल प्राप्त करता है, तब आनुषङ्गिक रूपसे उसका मायाका बन्धन कट जाता है और वह अपने स्वरूप जो अजर-अमर है, उसको प्राप्त करता है। इसलिये महाप्रभुने अपने सभी पार्षदोंको इस प्रेमरूपी फलको सर्वत्र बाँटनेके लिये आदेश एवं यथायोग्य शक्ति भी प्रदान की है ॥ 39 ॥ श्रीगौरकी दया देखकर श्रीगौरनाम-कीर्त्तनसे ही जीवोंका नित्य मङ्गल :- जगत व्यापिया मोर हवे पुण्य ख्याति। सुखी हइया लोक मोर गाहिबेक कीर्त्ति ॥ 40 ॥ अनुवाद-जगत्को प्रेम वितरण करनेसे सम्पूर्ण जगत्में मेरी ख्याति होगी और लोग सुखी होकर मेरी कीर्त्तिका गान करेंगे ॥ 40 ॥ अनुभाष्य-जिस प्रकार संसारमें पुण्यके प्रभावसे लोग सुखी होते हैं, पापोंके विस्तारसे मनुष्योंके दुःखोंकी वृद्धि होती है, पुण्यवानोंकी पवित्र चरित्र-गाथा गायी जाती है और पापियोंके दुष्कर्मोंकी बात लोग अपने मुखमें लानेकी इच्छा नहीं करते, उसी प्रकार कृष्णप्रेमको प्राप्तकर जगत्के लोग सुखी होंगे और इससे प्रेमप्रदाताके सुखकी वृद्धि होगी ॥ 40 ॥ भारतभूमिमें जन्म लेकर मानवमात्रकी मानवके प्रति नित्यदया या उनको श्रीकृष्णोन्मुखी करना आवश्यक कर्त्तव्य :- भारतभूमिते हैल मनुष्य-जन्म यार। जन्म सार्थक करि' कर पर-उपकार ॥ 41 ॥ अनुवाद-भारत भूमिपर जिसने मनुष्यका जन्म ग्रहण किया है, उसका आवश्यक कर्त्तव्य है कि वह परोपकार कर अपना जन्म सार्थक करे ॥ 41 ॥ अनुभाष्य-पवित्र भारतवर्षमें मनुष्य जन्म ग्रहणकर

नवाँ अध्याय | 35

[ 9/41-44 जगत्का वास्तव नित्य उपकार करना ही सबसे पवित्र देशमें और सबकी अपेक्षा श्रेष्ठ मनुष्य शरीर धारण करनेकी सफलता है॥41॥ अमृताणुकणिका—साधारणतः लोक समाजमें अभावग्रस्त प्राणियोंके दुःखोंको अन्न-वस्त्र-धन-औषधि दानादिके द्वारा दूर करनेको ही परोपकार कहा जाता है, परन्तु यह उपाय तात्कालिक है, इसके द्वारा दुःखोंका समूल नाश नहीं होता, अपितु वे पुनः पुनः आते हैं। समस्त दुःखोंका मूल कारण तो जीवोंकी श्रीकृष्ण विस्मृति है, (चैःचः मध्यलीला 20/117)— कृष्ण भूलि सेइ जीव अनादि-बहिर्मुख। अतएव माया तारे देय संसार-दुःख॥ भारत भूमि अति पवित्र भूमि है, यहींपर भगवान्के अनेकों अवतार हुए हैं, जीवोंके परम कल्याणका मार्गदर्शन करानेवाले वेद-पुराणादि शास्त्र भी यहीं प्रकट हुए हैं और यह अनेकों ऋषियों-मुनियोंकी भजन स्थली है। इसलिये सुकृति-सम्पन्न जीवोंको इस पवित्र भूमिमें जन्म प्राप्त होता है। ऐसी भारत भूमिमें जन्मका सुअवसर प्राप्त होनेको विशेष भगवद्-कृपा ही जानना चाहिये। इसलिये श्रीचैतन्य महाप्रभु भारतमें जन्में सभी मनुष्योंको यह स्मरण करा रहे हैं कि इस सुअवसरका पूर्ण लाभ उठाओ और श्रीकृष्ण भजन करके अपने जीवनको सार्थक बनाओ और साथ-ही-साथ सम्पूर्ण विश्वके मनुष्योंके जीवनको सार्थक करानेका दायित्व भी तुम्हारा है॥41॥ कायमनोवाक्यसे जीवको श्रीकृष्णभक्तिमें उन्मुखी कराना ही सर्वापेक्षा श्रेष्ठ दया या मङ्गलाचरण :— श्रीमद्भागवत (10/22/35)— एतावज्जन्मसाफल्यं देहिनामिह देहिषु। प्राणैरर्थैर्धिया वाचा श्रेय आचरणं सदा॥42॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥42॥ अमृतप्रवाह भाष्य—प्राण, धन, बुद्धि और वचनके द्वारा दूसरोंके प्रति निरन्तर श्रेय आचरण करना ही देहधारी जीवोंके जन्मकी सार्थकता है॥42॥ अनुभाष्य—वस्त्रहरण-लीलाके अन्तमें अपने सखा गोपबालकोंके साथ बहुत दूर जाकर वृक्षके नीचे विश्राम करते हुए वृक्षोंके परोपकार या दया-प्रवृत्ति और सहिष्णुताका दर्शनकर श्रीकृष्ण गोपबालकोंसे कहने लगे— सदा प्राणैः अर्थैः धिया वाचा (सर्वतोभावेन) देहिषु (जीवेषु) श्रेय आचरणं (नित्यं-मङ्गळानुष्ठानं भगवद्वैमुख्या- पनोदनपूर्वक-तदुन्मुखीकरणेन नित्य-दयायाः सुष्ठु प्रदर्शन- मित्यर्थः)—एतावत् एव इह (संसारे) देहिनां (जीवानां) जन्मसाफल्यं [भवतीती शेषः]। श्लोक भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥42॥ विष्णुपुराण (3/12/42)— प्राणिनामुपकाराय यदेवेह परत्र च। कर्मणा मनसा वाचा तदेव मतिमान् भजेत्॥43॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥43॥ अमृतप्रवाह भाष्य—कर्म, मन और वचनके द्वारा इस जन्मके तथा अगले जन्मोंके लिये प्राणियोंके जो उपकार योग्य है, उसीका ही बुद्धिमान व्यक्ति आचरण करते हैं॥43॥ अनुभाष्य—मतिमान् (बुद्धिमान् जनः) यत् एव कर्म इह (जगति) परत्र (अमूत्र) च, प्राणिनाम् उपकाराय (नित्य मङ्गलाय) भवति, तदेव (भगवद्भक्त्युन्मुखि-सुकृतोत्पादनमेव) कर्मणा, मनसा, वाचा (कायमनोवाक्येन) भजेत्। श्लोक भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥43॥ माली मनुष्य आमार नाहि राज्य-धन। फल-फूल दिया करि' पुण्य उपार्जन॥44॥ अनुवाद—मैं एक माली हूँ, मेरे पास राज्य-धन आदि कुछ भी नहीं है। मैं तो केवल फल-फूल देकर पुण्य कमाता हूँ॥44॥ 36 | श्रीचैतन्यचरितामृत

9/45-52 ] वृक्षोंकी निर्हेतुक दया-दर्शनसे, मूल कल्पवृक्ष होनेकी इच्छा :- माली हञा वृक्ष हइलाङ एइ त' इच्छाते। सर्वप्राणीर उपकार हय वृक्ष हैते॥ 45 ॥ अनुवाद-वृक्षसे समस्त प्राणियोंका उपकार होता है, इसी इच्छासे मैं माली होते हुये भी वृक्ष बना हुआ हूँ॥ 46 ॥ श्रीमद्भागवत (10/22/33)- अहो एषां वरं जन्म सर्वप्राण्युपजीविनाम्। सुजनस्येव येषां वै विमुखा यान्ति नार्थिनः ॥ 46 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ 46 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- श्रीकृष्ण गोपबालकोंसे वृक्षों को लक्ष्य करके कह रहे हैं, - "अहो ! ये [वृक्ष] सब प्राणियोंके उपजीविका स्वरूप हैं अर्थात् समस्त प्राणियोंका उपकार करते हैं, इसलिये इनका जन्म सफल है। इनके निकट आकर कोई भी याचक विमुख होकर नहीं लौटता। ये सब सुजनगणकी भाँति व्यवहार करते हैं॥" 46॥ इति अमृतप्रवाह भाष्ये नवम परिच्छेद। नौवें अध्यायका अमृतप्रवाह भाष्य समाप्त। अनुभाष्य-वस्त्रहरण-लीलाके अन्तमें अपने सखा गोपबालकोंके साथ बहुत दूर जाकर वृक्षके नीचे बैठकर विश्राम करते हुए वृक्षोंकी सहिष्णुता और सदा परोपकार-प्रवृत्ति देखकर उनको लक्ष्य करके श्रीकृष्ण गोपबालकोंसे कहने लगे- अहो एषां (वृक्षाणां) सर्वप्राण्युपजीवनं (सर्वेषां प्राणिनाम् उपजीवनं) जन्म सुजनस्य इव वरं (श्रेष्ठं), - येषां (येभ्यः) अर्थिनः (प्रार्थिनः) विमुखाः (विफलाभीष्टाः सन्तः) न यान्ति (प्रत्यावर्त्तन्ते)। श्लोक भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ 46 ॥ इति अनुभाष्ये नवम परिच्छेद। नौवें अध्यायका अनुभाष्य समाप्त हुआ। यह सुनकर वृक्षके अङ्गोंको आनन्द :- एइ आज्ञा कैल यदि चैतन्य-मालाकार। परम आनन्द पाइल वृक्ष-परिवार ॥ 47 ॥ अनुवाद-जब श्रीचैतन्य मालीने यह आज्ञा प्रदान की, तो वृक्ष-परिवार अर्थात् महाप्रभुके पार्षद परमानन्दित हुए॥ 47 ॥ अधिकारके विचार बिना प्रेमफल-वितरण :- येइ याँहा ताँहा दान करे प्रेमफल। फलास्वादे मत्त लोक हइल सकल ॥ 48 ॥ महामादक प्रेमफल पेट भरि' खाय। मातिल सकल लोक-हासे, नाचे, गाय ॥ 49 ॥ केह गड़ागड़ि याय, केह त' हुँकार। देखि' आनन्दित हञा हासे मालाकार ॥ 50 ॥ अनुवाद-फिर वे जहाँ-तहाँ प्रेमफल प्रदान करने लगे, जिसका आस्वादनकर सभी लोग प्रेमोन्मत्त हो उठे। महामत्त करनेवाले उस प्रेमफलको पेट भर खाकर सभी लोग मत्तवालोंकी भाँति हँसने, नाचने, गाने लगे। कोई भूमिपर लोट-पोट होने लगे, तो कोई हुँकार करने लगे। यह सब देखकर श्रीचैतन्य माली आनन्दित होकर हँसने लगे ॥ 48-50 ॥ जीवोंको अपने समान श्रीकृष्णप्रेमार्पणके द्वारा महाभागवत बनाना :- एइ मालाकार खाय एइ प्रेमफल। निरवधि मत्त रहे, विवश-विह्वल ॥ 51 ॥ सर्वलोके मत्त कैला आपन-समान। प्रेमे मत्त लोक बिना नाहि देखि आन ॥ 52 ॥ अनुवाद-श्रीचैतन्य माली स्वयं भी इस प्रेमफलका आस्वादनकर निरन्तर उन्मत्त रहते और वे प्रेमके द्वारा विवश तथा विह्वल हो जाते। उन्होंने सभी लोगोंको अपने समान इतना प्रेमोन्मत्त कर दिया कि कोई भी ऐसा नहीं दीखता था, जो प्रेममें मत्त न हो ॥ 51-52 ॥ नवाँ अध्याय | 37

[ 9/53-55 अधम निन्दकादिका भी श्रीकृष्णप्रेम-प्राप्ति-फलसे उद्धार :- ये ये पूर्वे निन्दा कैल, बलि' मातोयाल। सेइ फल खाय, नाचे, बले-भाल, भाल ॥ 53 ॥ अनुवाद—जिन्होंने पहले श्रीचैतन्य महाप्रभुको मतवाला कहकर उनकी निन्दा की थी, वे भी फलको खाकर नाचते हुए कहने लगे कि 'बहुत अच्छा है', 'बहुत अच्छा है' ॥ 53 ॥ एइ त' कहिलुँ प्रेमफल-वितरण। एबे शुन, फलदाता ये ये शाखागण ॥ 54 ॥ अनुवाद—यहाँ तक प्रेमफलके वितरणके सम्बन्धमें मैंने वर्णन किया। अब फल प्रदान करनेवाली जो-जो शाखाएँ हुईं, उनको श्रवण करो ॥ 54 ॥ श्रीरूप-रघुनाथ-पदे यार आश। चैतन्यचरितामृत कहे कृष्णदास ॥ 55 ॥ अनुवाद—श्रीरूप-रघुनाथ गोस्वामीके चरणकमल ही जिसके एकमात्र आश्रय हैं, वह कृष्णदास श्रीचैतन्यचरितामृतका वर्णन कर रहा है ॥ 55 ॥ इति श्रीचैतन्यचरितामृते आदिखण्डे भक्तिकल्पतरुवर्णनं नाम नवमः परिच्छेदः। श्रीचैतन्यचरितामृतके आदिखण्डमें भक्तिकल्पवृक्षका वर्णन नामक नौवें अध्यायका अनुवाद समाप्त।

दसवाँ अध्याय

चित्र ३

दसवाँ अध्याय दसवें अध्यायका सार-इस दसवें अध्यायमें श्रीचैतन्य महाप्रभुकी निजशाखाका वर्णन हुआ है। (अमृतप्रवाह भाष्य) श्रीगौर-कल्पतरुकी मूलशाखाका वर्णन :- एइ मालीर-एइ वृक्षर अकथ्य कथन। एबे शुन मुख्य-शाखार नाम-विवरण॥ ३॥ अनुवाद-श्रीचैतन्यमालीके इस भक्ति-कल्पवृक्षका वर्णन अनिर्वचनीय है। अब उनकी मुख्य शाखाओंके नाम और विवरण सुनिये॥ ३॥ श्रीगौरभक्त-वन्दना :- श्रीचैतन्यपदाम्भोज-मधुपेभ्यो नमो नमः। कथञ्चिदाश्रयाद् येषां श्वापि तद्गन्धभाग्भवेत्॥ १॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥१॥ अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीचैतन्य महाप्रभुके चरणकमलोंके भ्रमररूपी भक्तोंको मैं बारम्बार नमस्कार करता हूँ। उनका किसी प्रकारसे आश्रय लेनेसे (अभक्तरूपी) कुत्ता भी उनके चरणकमलोंकी गन्ध प्राप्त करनेका सौभाग्य प्राप्त करता है॥ १॥ अनुभाष्य-श्रीचैतन्यपदाम्भोजमधुपेभ्यः (श्रीचैतन्यस्य पदाम्भोजयोः मधुः भक्तिरसं पिबन्ति ये मधुपाः भृङ्गाः तेभ्यः गौरभक्तेभ्यः) नमो नमः; - येषां कथञ्चित् (केनचित् अपि प्रकारेण) आश्रयात् श्वा (कुकुरः - भोगापरः भगवद्भक्तौ श्रद्धाहीनः) अपि तद्-गन्धभाक् (तयोः गौरपदकमलयोः गन्धं भजति प्राप्नोति इति गौरभक्तिमान्) भवेत्। श्लोक भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है। श्रीगौरसुन्दरके चरणकमलोंकी गन्धको प्राप्त करते हैं अर्थात् उनके भक्त बन जाते हैं॥१॥ जय जय श्रीकृष्णचैतन्य-नित्यानन्द। जयाद्वैतचन्द्र जय गौरभक्तवृन्द॥२॥ अनुवाद-श्रीचैतन्य महाप्रभु और श्रीनित्यानन्द प्रभुकी जय हो, जय हो। श्रीअद्वैतचन्द्रकी जय हो, सभी गौरभक्तोंकी जय हो॥ २॥ श्रीगौरभक्तोंमें बड़े-छोटेका भेद नहीं :- चैतन्य-गोसाञिर यत पारिषदचय। लघु-गुरु-भाव ताँर ना हय निश्चय॥ ४॥ यत यत महान्त कैला ताँ-सबार गणन। केह करिवारे नारे ज्येष्ठ-लघु-क्रम॥ ५॥ अतएव ताँ-सबारे करि' नमस्कार। नाम-मात्र करि, दोष ना लबे आमार॥ ६॥ अनुवाद-श्रीचैतन्य गोस्वामीके पार्षदोंमें कौन बड़ा है? कौन छोटा है?- यह निर्णय करना सम्भव नहीं है। जिन-जिन महापुरुषोंने उन सबकी गणना की है, उनमेंसे किसीने भी बड़े-छोटेके क्रमानुसार उनका परिचय नहीं दिया। इसलिये मैं उन सबको प्रणामकर केवलमात्र उनके नामोंका उल्लेख कर रहा हूँ, वे मेरे इस दोषको ग्रहण न करें॥ ४-६॥ वन्दे श्रीकृष्णचैतन्य-प्रेमामरतरोः प्रियान्। शाखारूपान् भक्तगणान् कृष्णप्रेमफलप्रदान्॥ ७॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ ७॥ अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीकृष्णचैतन्यरूप प्रेम-कल्पवृक्षके श्रीकृष्णप्रेमफलदाता शाखारूप उनके प्रिय भक्तोंकी मैं वन्दना करता हूँ॥ ७॥

[ 10/7-13 अनुभाष्य-श्रीकृष्णचैतन्यप्रेमाम्रतरोः (गौरप्रेम-देववृक्षस्य) कृष्णप्रेमफलप्रदान् शाखारूपान् प्रियान् भक्तगणान् अहं वन्दे। श्लोक भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥7॥ (1-क, ख, ग, घ) श्रीवास-श्रीरामादि चार भ्राता-शाखा :- श्रीवास पण्डित आर श्रीराम पण्डित। दुइ भाइ-दुइ शाखा, जगते विदित॥8॥ श्रीपति, श्रीनिधि-ताँर दुइ सहोदर। चारि भाइर दास-दासी, गृह-परिकर॥9॥ उनकी ऐकान्तिकी गौरभक्ति :- दुइ शाखार उपशाखाय ताँ-सबार गणन। याँर गृहे महाप्रभुर सदा सङ्कीर्त्तन॥10॥ सवंशे करेन याँरा चैतन्येर सेवा। गौरचन्द्र बिना नाहि जाने देवी-देवा॥11॥ अनुवाद-श्रीवास पण्डित और श्रीराम पण्डित-ये दोनों भाई दो शाखाओंके रूपमें जगत्में जाने जाते हैं। इन दोनोंके भाई श्रीपति और श्रीनिधि एवं इन चारों भाइयोंके दास-दासियाँ तथा समस्त गृह-परिवारकी गणना उन दो शाखाओंकी उपशाखाके रूपमें होती है। इनके घरमें श्रीचैतन्य महाप्रभु सदा सङ्कीर्तन करते थे। ये चारों भाई अपने वंश सहित श्रीचैतन्यदेवकी सेवा करते थे और श्रीगौरचन्द्रके अतिरिक्त किसी अन्य देवी-देवताको नहीं जानते थे॥8-11॥ अनुभाष्य-श्रीगौरगणोद्देश-दीपिकाके 90वें श्लोकमें श्रीवास पण्डितके विषयमें इस प्रकार वर्णन आता है- “श्रीवासपण्डितो धीमान् यः पुरा नारदो मुनिः। पर्वताख्यो मुनिवरो य आसीन्नारदप्रियः। स रामपण्डितः श्रीमान् तत्कनिष्ठसहोदरः॥"90॥ “जो पूर्वकालमें श्रीनारद मुनि थे, वे ही अब श्रीवास पण्डितरूपमें विख्यात हैं। श्रीनारद-प्रिय श्रीपर्वतमुनि ही श्रीवासके कनिष्ठ भ्राता श्रीमान् राम पण्डित हैं।" और 42वें श्लोकमें यह वर्णित है- “नाम्नाम्बिका व्रजे धात्री स्तन्यदात्री स्थिता पुरा। सैवेडयं 'मालिनी' नाम्नी श्रीवासगृहिणीमता॥"42॥ “पूर्वकालमें जो व्रजमें श्रीकृष्णको स्तनपान करानेवाली धात्री-माता 'अम्बिका' थीं, वे ही अब श्रीवास पण्डितकी पत्नी मालिनीदेवी हैं।” श्रीवासके भाईकी पुत्री ही श्रीवृन्दावनदास ठाकुरकी जननी नारायणीदेवी हैं। श्रीचैतन्य महाप्रभुके संन्यास ग्रहणके पश्चात् श्रीवास पण्डित नवद्वीपके वास-स्थानको छोड़कर कुमारहट्टमें वास करने लगे-चैःभाः अन्त्यखण्डके पाँचवें अध्यायमें इसका वर्णन है॥8-11॥ (2) श्रीचन्द्रशेखर-शाखा :- 'आचार्यरत्न'-नाम धरे बड़ एक शाखा। ताँर परिकर, ताँर शाखा-उपशाखा॥12॥ आचार्यरत्नेर नाम 'श्रीचन्द्रशेखर'। याँर घरे देवी-भावे नाचिला ईश्वर॥13॥ अनुवाद-'आचार्यरत्न' नामकी एक बड़ी शाखा है और उनके परिकर उनकी शाखा और उपशाखा हैं। आचार्यरत्नका नाम श्रीचन्द्रशेखर है और उनके घरमें महाप्रभुने देवीके (रुक्मिणीके) भावमें नृत्य किया था॥12-13॥ अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीचन्द्रशेखर आचार्यरत्न किसी- किसी ग्रन्थके अनुसार महाप्रभुके मौसा हैं। अनुभाष्य-'श्रीचन्द्रशेखर' - श्रीमान् नवनिधिमेंसे प्रमुख, अथवा चन्द्र (?) हैं। इनके घरमें ही महाप्रभुका देवीभावमें नृत्य-अभिनय हुआ था (चैःभाः मध्यखण्ड, 18वाँ अः)। श्रीचन्द्रशेखरका घर अब 'व्रजपत्तन'-नामसे सुप्रसिद्ध है। श्रीमन्महाप्रभुके संन्यास ग्रहण करनेके विषयमें श्रीनित्यानन्द प्रभुने उन्हें अवगत कराया था (चैःभाः मध्यखण्ड, 28वाँ अः) और संन्यासके समय श्रीनित्यानन्द एवं मुकुन्द दत्तके साथ कटोआमें उपस्थित 42 | श्रीचैतन्यचरितामृत

10/13-14 ] होकर संन्यासके उपयुक्त कार्योंका सम्पादनकर इन्होंने नवद्वीप लौटकर सबको महाप्रभुके संन्यास-ग्रहणकी सूचना दी थी। इनके घरपर महाप्रभुके कीर्त्तनका विषय-चैःभाः मध्यखण्ड, ४वें अः, चाँद-काजीके दलनके समय ये नगरसङ्कीर्त्तनमें सम्मिलित थे और श्रीधरपर महाप्रभुकी कृपा करनेके समय भी ये वहाँ उपस्थित थे (चैःभाः मध्यखण्ड, २३वाँ अः)। ये भक्तोंके साथ श्रीचैतन्यदेवके दर्शनके लिये गौड़देशसे श्रीजगन्नाथपुरी आया करते थे॥13॥ (3) श्रीपुण्डरीक-शाखा :- पुण्डरीक विद्यानिधि-बड़शाखा जानि। याँर नाम लञा प्रभु कान्दिला आपनि॥14॥ अनुवाद-भक्ति-कल्पवृक्षकी एक और बड़ी शाखा श्रीपुण्डरीक विद्यानिधि हैं, जिनका नाम लेकर महाप्रभु स्वयं क्रन्दन करते थे॥14॥ अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीपुण्डरीक विद्यानिधि चट्टग्रामके निवासी थे॥14॥ अनुभाष्य-श्रीगौरगणोद्देश-दीपिकाके 54-57वें श्लोकोंमें इस प्रकार वर्णन आता है- “वृषभानुस्तया ख्यातः पुरा यो व्रजमण्डले। अधुना पुण्डरीकाक्षो विद्यानिधि-महाशयः॥ 54॥ स्वकीयभावमास्वाद्य राधा-विरहकातरः। चैतन्यः पुण्डरीकाक्षमये तातावदत् स्वयम्॥ 55॥ 'प्रेमनिधि' तया ख्यातिं गौरो यस्मै ददौ सुधीः। माधवेन्द्रस्य शिष्यत्वात् गौरवञ्च सदाकरोत्॥ 56॥ तत्प्रकाशविशेषोऽपि मिश्रः श्रीमाधवो मतः। रत्नावती तु तत्पत्नी कीर्त्तिदा कीर्त्तिता बुधैः॥”57॥ “पूर्वकालमें जो व्रजमण्डलमें श्रीवृषभानुरूपमें विख्यात थे, वे ही अब पुण्डरीकाक्ष विद्यानिधि हैं। स्वकीयभावका अवलम्बन करते राधाभावमें विरहकातर श्रीचैतन्य महाप्रभु श्रीपुण्डरीकाक्षको स्वयं पिता कहकर सम्बोधन करते थे। श्रीगौरसुन्दरने उन्हें 'प्रेमनिधि' उपाधि दी थी और श्रीमाधवेन्द्रपुरीपादका शिष्य जानकर उनका सदा सम्मान करते थे। इनकी पत्नी 'रत्नावती' थीं, किन्तु पण्डितलोग उन्हें 'कीर्त्तिदा' कहते थे।” इनके पिताका नाम वाणेश्वर (अन्य मतके अनुसार 'शुक्लाम्बर' ब्रह्मचारी) और माताका नाम गङ्गादेवी था। अन्य मतके अनुसार, वाणेश्वर शिवराम गङ्गोपाध्यायके वंशमें जन्में थे। इनके पिता जिला ढाका जिलाके बाधिया ग्रामके वारेन्द्र-श्रेणीके ब्राह्मण थे, इसलिये वहाँके राढ़ीय ब्राह्मण समाजने उन्हें स्वीकार नहीं किया; इस कारणसे उनके शाक्त अधस्तनगण 'बहिष्कृत' होकर समाजके 'बहिष्कृत' लोगोंके ही पुरोहितका कार्य करते आ रहे हैं। इनमेंसे सरोजानन्द गोस्वामी नामक एक व्यक्ति वृन्दावनमें आकर रह रहे हैं। इनके वंशकी यह विशेषता यह है कि सभी भाइयोंमें केवल एकको ही पुत्रकी प्राप्ति होती थी और अन्य भाइयोंके घरोंमें कन्याका जन्म होता था या कोई सन्तान नहीं होती थी। इस कारणसे इनके वंशका विस्तार न हो सका। चट्टग्रामके उत्तर-पूर्वमें 'मेखलाग्राम'में इनका पूर्व निवास था। [टीका लिखनेके समय-] विद्यानिधिका भजन मन्दिर अत्यन्त जीर्ण और अस्वच्छ है, इसका संस्कार नहीं करनेपर शीघ्र ही लुप्त होनेकी सम्भावना है। मन्दिरकी दीवारपर ईंटके पटलपर दो श्लोक खुदे हैं; अक्षर विकृत होनेके कारण पढ़े नहीं जा सकते और उनके अर्थ भी समझे नहीं जा सकते। इस मन्दिरसे दक्षिण-पूर्व दिशामें 400-500 हाथ दूरीपर एक और मन्दिर देखा जाता है, उसकी दीवारपर ईंटके पटलपर लिखे अक्षर भी नहीं पढ़े जाते हैं। इसके ही सामने 15-20 हाथकी दूरीपर बाई ओर एक और मन्दिर होनेकी बात वहाँ गिरी हुई अनेक ईंटोंके टुकड़ोंको देखकर जानी जाती है। वहाँके लोगोंसे सुननेमें आता है कि यही मुकुन्द दत्तका भजन मन्दिर था। पुण्डरीक विद्यानिधिके वंशमें श्रीहरकुमार स्मृतितीर्थ और श्रीकृष्णकिङ्कर विद्यालङ्कार अभी भी वर्तमान हैं। (वैष्णव-मञ्जूषा-प्रथम संख्या द्रष्टव्य है)। दसवाँ अध्याय | 43

[ 10/14

महाप्रभु इनको 'बाप' कहकर बुलाते थे और इन्हें 'प्रेमनिधि' नाम दिया था। ये श्रीगदाधर पण्डित गोस्वामीके गुरु और श्रीदामोदर स्वरूपके सुहृद थे। अबोध लोगोंको सतर्क करके मङ्गल शिक्षा देनेके उद्देश्यसे श्रीगदाधर पण्डित गोस्वामीने श्रीविद्यानिधिको पहले विषयी समझकर भूल करनेका अभिनयकर फिर अन्तमें उन्हींसे दीक्षा-अभिनय लीला की। श्रीजगन्नाथदेवके द्वारा उन्हें थप्पड़ मारनेका वृत्तान्त—चैःभाः अन्त्यखण्ड, 10वें अध्यायमें द्रष्टव्य है॥14॥

अमृतानुकणिका—(चैःभाः अन्त्यखण्ड, 10अः संख्या 90-151) ओड़न अथवा उड़न-षष्ठी नामक यात्रामें श्रीजगन्नाथदेव नये माँड़युक्त वस्त्र धारण करते हैं। माँड़युक्त वस्त्र धारण किये हुए श्रीजगन्नाथदेवको देखकर विद्यानिधिके मनमें सन्देह हुआ। विद्यानिधिने दामोदर स्वरूपसे पूछा,—"ईश्वरको माँड़युक्त वस्त्र क्यों प्रदान किये जाते हैं? इस देशमें तो श्रुति-स्मृतिका प्रचुर परिमाणमें प्रचार है, फिर क्यों बिना धोए माँड़युक्त वस्त्र पहनाये जाते हैं? माँड़युक्त वस्त्रोंको स्पर्श करनेसे हाथ धोकर शुद्ध होना पड़ता है।" दामोदर स्वरूपने कहा,—"यद्यपि श्रीजगन्नाथदेवके सेवक नियम जानते हैं, तो भी इस यात्रा-उत्सवपर सब समय ऐसा ही होता है। यह श्रीजगन्नाथदेवकी ही इच्छा है, इसलिये राजा भी इसके लिये निषेध नहीं करते।" विद्यानिधिने कहा,—"ठीक है, श्रीजगन्नाथदेव ईश्वर हैं, उनके लिये सब कुछ सम्भव है, परन्तु उनके सेवक ईश्वर जैसा आचरण क्यों कर रहे हैं? इन पूजा-पण्डा आदिने अपवित्र वस्त्र क्यों धारण किये हैं? राजाने भी माँड़युक्त वस्त्र सिरपर क्यों धारण किया है?" दामोदर स्वरूपने कहा,—"सुनो भाई! लगता है, ओड़न-यात्रामें दोष नहीं है। श्रीजगन्नाथदेव परमब्रह्म हैं। यहाँ वे विधि-निषेधका विचार नहीं करते हैं।" विद्यानिधिने कहा,—"भाई, एक बात सुनो! श्रीजगन्नाथदेव विग्रह परम ब्रह्मस्वरूप हैं। वे यदि विधि-निषेधोंका उल्लङ्घन करें, तो इसमें कोई दोष नहीं है। परन्तु ये सब लोग भी नीलाचलमें रहकर लोक व्यवहार छोड़ चुके हैं, क्या सभी ब्रह्मरूप-अवतार हो गये हैं?" इतना कहकर दोनों सम्पूर्ण मार्गमें हँसते-हँसते श्रीजगन्नाथदेवके सेवकोंके प्रभावको न जानकर उनके आचरणपर दोषारोपण कर रहे थे। भिक्षाके उपरान्त दोनों गौराङ्ग महाप्रभुके पास चले आये। महाप्रभुके पास आकर वे सो गये। केवल श्रीकृष्ण ही जानते हैं कि किसमें कितना अनुराग है। श्रीकृष्ण अपने दासोंको भ्रममें डाल देते हैं, और बादमें दयावान होकर भ्रम दूर भी करते हैं। गौराङ्ग महाप्रभु सब कुछ जानते थे। श्रीजगन्नाथके रूपमें महाप्रभु स्वप्नमें उनके पास गये। विद्यानिधि महाशयने स्वप्नमें देखा कि श्रीजगन्नाथ-बलरामका शुभागमन हुआ है, परन्तु दोनों क्रोधित होकर उन्हें पकड़कर उनके दोनों गालोंपर थप्पड़ मार रहे हैं। थप्पड़ इतने ज़ोरसे मारे कि उनके गाल फूल गये और उनपर उँगलियोंके निशान बन गये। विद्यानिधि कहने लगे,—"हे कृष्ण! रक्षा करो, अपराध क्षमा करो, हे स्वामी! किस अपराधके कारण आप मुझे मार रहे हैं?" श्रीजगन्नाथने कहा,—"तेरे अपराधोंका अन्त नहीं है। मेरी और मेरे सेवकोंकी जाति नहीं है। मुझे परब्रह्मके रूपमें स्थापित करके भी तुमने माँड़युक्त वस्त्रके प्रति दोष-दृष्टि रखकर मेरे सेवकोंकी निन्दा की है।" स्वप्नमें विद्यानिधि मनसे महाभयभीत होकर श्रीचरणोंपर सिर पटकते हुए क्रन्दन करने लगे। विद्यानिधि कहने लगे,—"हे प्रभु! मुझ पापीके सभी अपराध क्षमा कीजिये। हे प्रभु, जिस मुखसे मैंने आपके सेवकोंकी हँसी उड़ाई है, आपने मेरे उस मुखको भलीभाँति दण्ड प्रदान किया है। आज मेरे सौभाग्यका दिन है। मेरे मुख और ललाटको आपके श्रीहस्तका स्पर्श मिला है।" श्रीजगन्नाथने कहा,—"सेवक समझकर तुमपर अनुग्रह करनेके लिये मैंने तुम्हें दण्ड प्रदान किया है।" स्वप्न देखनेके उपरान्त विद्यानिधि जाग उठे। फिर सूजे हुए गालोंपर थप्पड़ोंके निशान देखकर वे हँसने लगे। यह देखकर विद्यानिधिने कहा,—"बहुत अच्छा

44 | श्रीचैतन्यचरितामृत