श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
२७८ श्रीरामकृष्णवचनामृत १८ अगस्त, १८८३
आता है और फिर निकल जाता है। यहाँ पर पाताल से निकले हुए स्वयम्भू शिव हैं, स्थापित किए हुए शिव नहीं हैं। तू क्रोध में दक्षिणेश्वर से चला आया; मैंने माँ से कहा, 'माँ, इसके अपराध पर ध्यान न देना।'
क्या श्रीरामकृष्ण अवतार हैं? स्वयम्भू शिव हैं?
फिर भावविभोर होकर अधर से कह रहे हैं – “भैया, तुमने जो नाम लिया था, उसी का ध्यान करो।” ऐसा कहकर अधर की जिव्हा अपनी उँगली से छूकर उस पर न जाने क्या लिख दिया। क्या यही अधर की दीक्षा हुई?
परिच्छेद ४९
परिच्छेद ४९
दक्षिणेश्वर में भक्तों के साथ
(१)
वेदान्तवादियों का मत। माया अथवा दया?
आज रविवार का दिन है। श्रावण कृष्णा प्रतिपदा, १९ अगस्त १८८३ ई.। अभी कुछ ही देर पहले देवी का भोग लगा और आरती हुई। अब मन्दिर बन्द हो गया है। श्रीरामकृष्ण देवी का प्रसाद पाने के बाद कुछ आराम कर रहे थे। विश्राम के बाद – अभी दोपहर का समय ही है – वे अपने कमरे में तख्त पर बैठे हुए हैं। इसी समय मास्टर ने आकर उन्हें प्रणाम किया। थोड़ी देर बाद उनके साथ वेदान्त-सम्बन्धी चर्चा होने लगी।
श्रीरामकृष्ण (मास्टर से) – देखो, ‘अष्टावक्र-संहिता’ में आत्मज्ञान की बातें हैं। आत्मज्ञानी कहते हैं, ‘सोऽहम्’ अर्थात् मैं ही वह परमात्मा हूँ। यह वेदान्तवादी संन्यासियों का मत है। सांसारिक व्यक्तियों के लिए यह मत ठीक नहीं है। सब कुछ किया जा रहा है, फिर भी ‘मैं ही वह निष्क्रिय परमात्मा हूँ’ यह कैसे हो सकता है? वेदान्तवादी कहते हैं कि आत्मा निर्लिप्त है। सुख-दुःख, पाप-पुण्य – ये सब आत्मा का कुछ भी बिगाड़ नहीं सकते; परन्तु देहाभिमानी व्यक्तियों को कष्ट दे सकते हैं। धुआँ दीवार को मैला करता है, पर आकाश का कुछ नहीं कर सकता। कृष्णकिशोर ज्ञानियों की तरह कहा करता था कि मैं ‘ख’ अर्थात् आकाशवत् हूँ। वह परम भक्त था; उसके मुँह में यह बात भले ही शोभा दे, पर सब के मुँह में यह शोभा नहीं देती।
“पर ‘मैं मुक्त हूँ’ यह अभिमान बड़ा अच्छा है। ‘मैं मुक्त हूँ’ कहते रहने से कहनेवाला मुक्त हो जाता है। और ‘मैं बद्ध हूँ’ कहते रहने से कहनेवाला बद्ध ही रह जाता है। जो केवल यह कहता है कि ‘मैं पापी हूँ’ वही सचमुच गिरता है। कहते यही रहना चाहिए – ‘मैंने उनका नाम लिया है, अब मेरे पाप कहाँ? मेरा बन्धन कैसा?’
* हृदय श्रीरामकृष्णदेव के भानजे थे और १८८१ ई. तक कालीमन्दिर में रहकर लगभग २३ वर्ष तक इनकी सेवा की थी। उनका जन्मस्थान हुगली जिले के अन्तर्गत सिहोड़ ग्राम में था। श्रीरामकृष्ण का जन्मस्थान कामारपुकुर, यहाँ से दो कोस दूर है। ६२ वर्ष की अवस्था में हृदय का देहावसान हुआ।
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“देखो, मेरा चित्त बड़ा अप्रसन्न हो रहा है। हृदय* ने चिट्ठी लिखी है कि वह बहुत बीमार है। यह क्या है - माया या दया?”
मास्टर भी क्या कहें - मौन रह गये।
श्रीरामकृष्ण – माया किसे कहते हैं, पता है? माता-पिता, भाई-बहन, स्त्री-पुत्र, भानजे-भानजी, भतीजे-भतीजी आदि आत्मीयजनों के प्रति प्रेम – यही माया है। और प्राणिमात्र से प्रेम का नाम दया है। मुझे यह क्या हुई – माया या दया! हृदय ने मेरे लिए बहुत-कुछ किया था – बड़ी सेवा की थी – अपने हाथों मेरा मैला तक साफ किया था; पर अन्त में उसने उतना ही कष्ट भी दिया था। वह इतना अधिक कष्ट देता था, कि एक बार मैं बाँध पर जाकर गंगा में डूबकर देहत्याग करने तक को तैयार हो गया था। पर फिर भी उसने मेरा बहुत-कुछ किया था। इस समय यदि उसे कुछ रुपये मिल जाते, तो मेरा चित्त स्थिर हो जाता। पर मैं किस बाबू से कहूँ! कौन कहता फिरे!
(२)
'मृण्मयी आधार में चिन्मयी देवी' – विष्णुपुर में मृण्मयी का दर्शन
लगभग दो या तीन बजे होंगे। इसी समय भक्तवीर अधर सेन तथा बलराम आ पहुँचे और भूमिष्ठ हो प्रणाम कर बैठ गए। उन्होंने पूछा, “आपकी तबीयत कैसी है?” श्रीरामकृष्ण ने कहा, “हाँ, शरीर तो अच्छा ही है, पर मेरे मन में थोड़ी व्यथा हो रही है।” इस अवसर पर हृदय की तकलीफ के सम्बन्ध में कोई बात ही नहीं उठायी।
बड़ा बाजार (कलकत्ते) के मल्लिक-घराने की सिंहवाहिनी देवी की चर्चा छिड़ी।
श्रीरामकृष्ण – मैं भी सिंहवाहिनी के दर्शन करने गया था। चासाधोबीपाड़ा के एक मल्लिक के यहाँ देवी विराजमान थीं। मकान टूटा-फूटा था, क्योंकि मालिक गरीब हो गये थे। कहीं कबूतर की विष्ठा पड़ी थी, कहीं काई जम गयी थी, और कहीं छत से सुरखी और रेत ही झर-झरकर गिर रही थी। दूसरे मल्लिक घरानेवालों के मकान में जो श्री देखी वह श्री इसमें नहीं थी।
(मास्टर से) – “अच्छा, इसका क्या अर्थ है, बतलाओ तो सही।”
मास्टर चुप्पी साधे बैठे रहे।
श्रीरामकृष्ण – बात यह है कि जिसके कर्म का जैसा भोग है, उसे वैसा ही भोगना पड़ता है। संस्कार, प्रारब्ध आदि बातें माननी ही पड़ती हैं।
“उस टूटे-फूटे मकान में भी मैंने देखा कि सिंहवाहिनी का चेहरा जगमगा रहा है! आविर्भाव मानना ही पड़ता है।
“मैं एक बार विष्णुपुर गया था। वहाँ राजासाहब के अच्छे अच्छे मन्दिर आदि हैं। वहाँ मृण्मयी नाम की भगवती की एक मूर्ति है। मन्दिर के पास ही कृष्णबाँध, लालबाँध
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नाम के बड़े बड़े तालाब हैं। तालाब में मुझे उबटन के मसाले की गन्ध मिली! भला ऐसा क्यों हुआ? मुझे तो मालूम भी नहीं था कि स्त्रियाँ जब मृण्मयी देवी के दर्शन के लिए जाती हैं तो उन्हें वे वह मसाला चढ़ाती हैं! तालाब के पास मेरी भाव-समाधि हो गयी। उस समय तक विग्रह नहीं देखा था – भावावेश में मुझे वहीं पर मृण्मयी देवी के दर्शन हुए – कटि तक।”
भक्त का सुख-दुःख
इसी बीच में दूसरे भक्त आ जुटे और काबुल के विद्रोह तथा लड़ाई की बातें होने लगीं। किसी एक ने कहा कि याकूब खाँ (काबुल के अमीर) राजसिंहासन से उतार दिये गये हैं। श्रीरामकृष्णदेव को सम्बोधन करके उन्होंने कहा कि याकूब खाँ भी ईश्वर का एक बड़ा भक्त है।
श्रीरामकृष्ण – बात यह है कि सुख-दुःख देह के धर्म हैं। कविकंकण-चण्डी में लिखा है कि कालूवीर को कैद की सजा हुई थी और उसकी छाती पर पत्थर रखा गया था। कालूवीर भगवती का वरपुत्र था फिर भी उसे यह दुःख भोगना पड़ा। देहधारण करने से ही सुख-दुःख का भोग करना पड़ता है।
“श्रीमन्त भी तो बड़ा भक्त था। उसकी माँ खुल्लना को भगवती कितना अधिक चाहती थीं! पर देखो, उस श्रीमन्त पर कितनी विपत्ति पड़ी! यहाँ तक कि वह श्मशान में काट डालने के लिए ले जाया गया।”
“एक लकड़हारा परम भक्त था। उसे भगवती के साक्षात् दर्शन हुए, उन्होंने उसे खूब चाहा और उस पर अत्यन्त कृपा की, परन्तु इतने पर भी उसका लकड़हारे का काम नहीं छूटा! उसे पहले की तरह लकड़ी काटकर ही रोटी कमानी पड़ी। कारागार में देवकी को चतुर्भुज शंख-चक्र-गदा-पद्मधारी भगवान् के दर्शन हुए, पर तो भी उनका कारावास नहीं छूटा।”
मास्टर – केवल कारावास ही क्यों? शरीर ही तो सारे अनर्थ का मूल है। उसी को छूट जाना चाहिए था।
श्रीरामकृष्ण – बात यह है कि प्रारब्ध कर्मों का भोग होता ही है। जब तक वह हैं, तब तक देहधारण करना ही पड़ेगा। एक काने आदमी ने गंगास्नान किया। उसके सारे पाप तो छूट गए, पर कानापन दूर नहीं हुआ! (सभी हँसे।) उसे अपना पूर्वजन्म का फल भोगना था, वही वह भोगता रहा।
मास्टर – जो बाण एक बार छोड़ा जा चुका उस पर फिर किसी तरह का वश नहीं रहता।
श्रीरामकृष्ण – देह का सुख-दुःख चाहे जो कुछ हो, पर भक्त को ज्ञान-भक्ति का
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ऐश्वर्य रहता है। वह ऐश्वर्य कभी नष्ट नहीं होता। देखो, पाण्डवों पर कितनी विपत्ति पड़ी, पर इतने पर भी उनका चैतन्य एक बार भी नष्ट नहीं हुआ। उनकी तरह ज्ञानी, उनकी तरह भक्त कहाँ मिल सकते हैं?
(३)
कप्तान और नरेन्द्र का आगमन
इसी समय नरेन्द्र और विश्वनाथ उपाध्याय आये। विश्वनाथ नेपालराजा के वकील थे – राजप्रतिनिधि थे। श्रीरामकृष्ण इन्हें कप्तान कहा करते थे। नरेन्द्र की आयु लगभग इक्कीस वर्ष की है – इस समय वे बी. ए. में पढ़ते हैं। बीच बीच में, विशेषतः रविवार को दर्शन के लिए आ जाते हैं।
जब वे प्रणाम करके बैठ गए तो श्रीरामकृष्णदेव ने नरेन्द्र से गाना गाने के लिए कहा। कमरे के पश्चिम ओर एक तम्बूरा लटका हुआ था। यन्त्रों का सुर मिलाया जाने लगा। सब लोग एकाग्र होकर गवैये की ओर देखने लगे कि कब गाना आरम्भ होता है।
श्रीरामकृष्ण (नरेन्द्र से) – देख, यह अब वैसा नहीं बजता।
कप्तान – यह पूर्ण होकर बैठा है, इसी से इसमें शब्द नहीं होता! (सब हँसे।) पूर्णकुम्भ है!
श्रीरामकृष्ण (कप्तान से) – पर नारदादि कैसे बोले?
कप्तान – उन्होंने दूसरों के दुःख से कातर होकर उपदेश दिए थे।
श्रीरामकृष्ण – हाँ, नारद, शुकदेव आदि समाधि के बाद नीचे उतर आए थे। दया के कारण, दूसरों के हित की दृष्टि से उन्होंने उपदेश दिए थे।
नरेन्द्र ने गाना शुरू किया। गाने का आशय इस प्रकार था – "सत्य-शिव-सुन्दर का रूप हृदय-मन्दिर में चमक रहा है। उसे देख-देखकर हम उस रूप के समुद्र में डूब जायेंगे। वह दिन कब होगा? हे नाथ, जब अनन्त ज्ञान के रूप में तुम हमारे हृदय में प्रवेश करोगे, तब हमारा अस्थिर मन निर्वाक् होकर तुम्हारे चरणों मे शरण लेगा। आनन्द और अमृतत्व के रूप में जब तुम हमारे हृदयाकाश में उदित होगे, तब चन्द्रोदय में जैसे चकोर उमंग से खेलता फिरता है, वैसे हम भी, नाथ, तुम्हारे प्रकाशित होने पर आनन्द मनाएंगे।" इत्यादि।
'आनन्द और अमृतत्व के रूप में' ये शब्द सुनते ही श्रीरामकृष्ण गम्भीर समाधि में मग्न हो गए। आप हाथ बाँधे पूर्व की ओर मुँह किए बैठे हैं। देह सरल और निश्चल है। आनन्दमयी के रूपसमुद्र में आप डूब गए हैं। बाह्यज्ञान बिलकुल नहीं है। साँस अत्यन्त मन्द चल रही है। नेत्र पलकहीन हैं। आप चित्रवत् बैठे हैं। मानो इस राज्य को छोड़ कहीं और चले गये हैं।
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(४)
सच्चिदानन्द-लाभ का उपाय। ज्ञानी और भक्त में अन्तर
समाधि टूटी। इसी बीच में नरेन्द्र उन्हें समाधिस्थ देखकर कमरे से बाहर पूर्ववाले बरामदे में चले गए हैं। वहाँ हाजरा महाशय एक कम्बल के आसन पर हरिनाम की माला हाथ में लिए बैठे हैं। नरेन्द्र उनसे बातें कर रहे हैं। इधर कमरा दर्शकों से भरा है। समाधि-भंग के बाद श्रीरामकृष्ण ने भक्तों की ओर दृष्टि डाली तो देखा कि नरेन्द्र वहाँ नहीं हैं। तम्बूरा सूना पड़ा है। सब भक्त उनकी ओर उत्सुक होकर देख रहे हैं।
श्रीरामकृष्ण – आग लगा गया है, अब चाहे वह रहे या न रहे!
(कप्तान आदि से) “चिदानन्द का आरोप करो तो तुम्हें भी आनन्द मिलेगा। चिदानन्द तो है ही, – केवल आवरण और विक्षेप है।* विषय पर आसक्ति जितनी घटेगी, उतनी ही ईश्वर पर रुचि बढ़ेगी।
कप्तान – कलकत्ते के घर की ओर जितना ही बढ़ोगे, वाराणसी से उतनी ही दूर होते जाओगे।
श्रीरामकृष्ण – श्रीमती (राधिका) कृष्ण की ओर जितना बढ़ती थीं उतनी ही कृष्ण की देहगन्ध उन्हें मिलती जाती थी। मनुष्य जितना ही ईश्वर के पास जाता है उतनी ही उसकी उन पर भाव-भक्ति होती जाती है। नदी जितनी ही समुद्र के समीप होती है उतना ही उसमें ज्वार-भाटा होता है।
“ज्ञानी के भीतर मानो गंगा एक-सी बहती रहती है। उसके लिए सभी स्वप्नवत् है। वह सदा स्व-स्वरूप में स्थित रहता है। पर भक्त की गंगा एक गति से नहीं बहती। भक्त कभी हँसता, कभी रोता है; कभी नाचता और कभी गाता है। भक्त ईश्वर के साथ विलास करना चाहता है – वह कभी तैरता है, कभी डूबता है और कभी फिर ऊपर आता है – जैसे बर्फ का टुकड़ा पानी में कभी ऊपर और कभी नीचे आता-जाता रहता है! (हँसी)
ब्रह्म और शक्ति अभिन्न हैं
“ज्ञानी ब्रह्म को जानना चाहता है। भक्त के लिए भगवान् – सर्वशक्तिमान् षडैश्वर्यपूर्ण भगवान् हैं। परन्तु वास्तव में ब्रह्म और शक्ति अभिन्न हैं। जो सच्चिदानन्दमय हैं वे ही सच्चिदानन्दमयी हैं। जैसे मणि और उसकी ज्योति। मणि की ज्योति कहने से ही मणि का बोध होता है और मणि कहने से ही उसकी ज्योति का। बिना मणि को सोचे उसकी ज्योति की धारणा नहीं हो सकती, वैसे ही बिना मणि की ज्योति को सोचे मणि को भी सोचा नहीं जा सकता।
* अर्थात वह ढक गया है और उसकी जगह दूसरी चीज का आभास हो रहा है।
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“एक ही सच्चिदानन्द का शक्ति के भेद से उपाधिभेद होता है। इसलिए उनके विविध रूप होते हैं। 'तारा, वह तो तुम्हीं हो।' जहाँ कहीं कार्य (सृष्टि, स्थिति, प्रलय) हैं वहीं शक्ति है। परन्तु जल स्थिर रहने पर भी जल है और हिलोरें, बुलबुले आदि उठने पर भी जल ही है। सच्चिदानन्द ही आद्याशक्ति हैं – जो सृष्टि, स्थिति, प्रलय करती हैं। जैसे कप्तान जब कोई काम नहीं करते तब भी वही हैं, जब पूजा करते हैं तब भी वही हैं, और जब वे लाटसाहब के पास जाते हैं तब भी वही हैं, केवल उपाधि का भेद है।”
कप्तान – जी हाँ।
श्रीरामकृष्ण – मैंने यही बात केशव सेन से कही थी।
कप्तान – केशव सेन भ्रष्टाचार, स्वेच्छाचार हैं; वे बाबू हैं, साधु नहीं।
श्रीरामकृष्ण (भक्तों से) – कप्तान मुझे केशव सेन के यहाँ जाने को मना करता है।
कप्तान – महाराज, आप तो जाएँगे ही, भला उस पर मैं क्या करूँ?
श्रीरामकृष्ण (नाराज होकर) – तुम लाटसाहब के पास रुपये के लिए जा सकते हो, और मैं केशव सेन के पास नहीं जा सकता? वह तो ईश्वरचिन्तन करता है, हरि का नाम लेता है। इधर तुम्हीं तो कहते हो, 'ईश्वर ही अपनी माया से जीव और जगत् हुए हैं।'
(५)
ज्ञानयोग और भक्तियोग का समन्वय
यह कहकर श्रीरामकृष्ण एकाएक कमरे से उत्तर-पूर्ववाले बरामदे में चले गये। कप्तान और अन्य भक्त कमरे में ही बैठे उनकी प्रतीक्षा करने लगे। मास्टर भी उनके साथ बरामदे में आये। बरामदे में नरेन्द्र हाजरा से बातें कर रहे थे। श्रीरामकृष्ण जानते थे कि हाजरा को शुष्क ज्ञानविचार बड़ा प्यारा है; वे कहा करते हैं, 'जगत् स्वप्नवत् है, पूजा और चढ़ावा आदि सब मन का भ्रम है, केवल अपने यथार्थ रूप की चिन्ता करना ही हमारा लक्ष्य है, और मैं ही वह परमात्मा हूँ – सोऽहम्।'
श्रीरामकृष्ण (हँसते हुए) – तुम लोगों की क्या बातचीत हो रही है?
नरेन्द्र (हँसते हुए) – कितनी लम्बी लम्बी बातें हो रही हैं।
श्रीरामकृष्ण (हँसते हुए) – किन्तु शुद्ध ज्ञान और शुद्धा भक्ति एक ही है। शुद्ध ज्ञान जहाँ ले जाता है वहीं शुद्धा भक्ति भी ले जाती है। भक्ति का मार्ग बड़ा सरल है।
नरेन्द्र – 'ज्ञानविचार का और प्रयोजन नहीं माँ, अब मुझे पागल बना दो!' (मास्टर से) देखिये, हैमिल्टन की एक किताब में मैंने पढ़ा – ‘A learned ignorance is the end of Philosophy and beginning of Religion.’
श्रीरामकृष्ण (मास्टर से) – इसका अर्थ क्या है?
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नरेन्द्र – दर्शनशास्त्रों का पठन समाप्त होने पर मनुष्य पण्डितमूर्ख बन बैठता है; और 'धर्म धर्म' करने लगता है। तब धर्म का आरम्भ होता है।
श्रीरामकृष्ण (हँसते हुए) – थैंक यू, थैंक यू (धन्यवाद, धन्यवाद)! (सब लोग हँसे।)
(६)
नरेन्द्र के अनेक गुण
थोड़ी देर में सन्ध्या होते देखकर अधिकांश लोग अपने अपने घर लौटे। नरेन्द्र ने भी विदा ली।
दिन ढलने लगा। सन्ध्या होने ही वाली है। देवस्थान में चारों ओर बत्तियाँ जलाने का प्रबन्ध होने लगा। कालीमन्दिर और विष्णुमन्दिर के पुजारी गंगाजी में अर्धनिमग्न होकर अन्तरबाह्य शुद्धि कर रहे हैं – शीघ्र ही आरती करनी होगी तथा देवताओं को रात्रिकालीन नैवेद्य चढ़ाना होगा। दक्षिणेश्वर ग्राम के निवासी युवकगण बगीचे में टहलने आए हुए हैं – किसी के हाथ में छड़ी है, तो कोई मित्रों के साथ घूम रहा है। वे लोग गंगा के किनारे पुश्ते पर टहल रहे हैं तथा पुष्पों की सुगन्ध से भरे निर्मल सन्ध्या-समीरण का आनन्द लेते हुए श्रावण की गंगा के तरंगमय प्रवाह को देख रहे हैं। उनमें से जो कुछ चिन्तनशील हैं वे पंचवटी की निर्जन भूमि में अकेले टहल रहे हैं। भगवान् श्रीरामकृष्ण भी पश्चिमवाले बरामदे से थोड़ी देर के लिए गंगादर्शन करने लगे।
सन्ध्या हुई। नौकर बत्तियाँ जला गया। दासी ने श्रीरामकृष्ण के कमरे में दीप जलाकर धूनी दी। बारह शिवमन्दिरों में आरती होते ही विष्णु तथा काली के मन्दिर में आरती होने लगी। घण्टा, घड़ियाल आदि का मधुर गम्भीर नाद उठने लगा – मन्दिर के निकट ही बहती हुई गंगा का कलकलनिनाद तो गूँज ही रहा था।
श्रावण की कृष्णा प्रतिपदा है। थोड़ी ही देर में चाँद निकला। विशाल प्रांगण तथा उद्यान के वृक्ष धीरे धीरे चन्द्रकिरण से आप्लावित हो गए। ज्योत्स्ना के स्पर्श से भागीरथी का जल मानो प्रफुल्लित होकर बह रहा है।
सन्ध्या होते ही श्रीरामकृष्ण जगन्माता को प्रणाम करके तालियाँ बजाते हुए हरिध्वनि करने लगे। कमरे में बहुतसे देवदेवियों की तस्वीरें थी – जैसे ध्रुव और प्रह्लाद की, राजाराम की, कालीमाता की, राधाकृष्ण की – आपने सभी देवताओं को उनके नाम ले-लेकर प्रणाम किया। फिर कहने लगे, 'ब्रह्म-आत्मा, भगवान् भागवत-भक्त-भगवान्, ब्रह्म-शक्ति, शक्ति-ब्रह्म; वेद-पुराण-तन्त्र; गीता-गायत्री; मैं शरणागत हूँ, शरणागत हूँ; नाहं नाहं (मैं नहीं, मैं नहीं), तू ही, तू ही; मैं यन्त्र हूँ, तुम यन्त्री हो'; इत्यादि।
नामोच्चारण के बाद श्रीरामकृष्ण हाथ जोड़कर जगन्माता का चिन्तन करने लगे।
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२८६ श्रीरामकृष्णवचनामृत १९ अगस्त, १८८३
सन्ध्या समय दो-चार भक्त बगीचे में गंगा के किनारे टहल रहे थे। आरती के बाद वे एक-एक करके श्रीरामकृष्ण के कमरे में इकट्ठे होने लगे।
श्रीरामकृष्ण तख्त पर बैठे हैं। मास्टर, अधर, किशोरी आदि नीचे, उनके सामने बैठे हैं।
श्रीरामकृष्ण (भक्तों से) – नरेन्द्र, भवनाथ, राखाल ये सब नित्यसिद्ध और ईश्वरकोटि के हैं। इनकी जो शिक्षा होती है वह बिना प्रयोजन के ही होती है। तुम देखते नहीं, नरेन्द्र किसी की 'केयर' (परवाह) नहीं करते? मेरे साथ वह कप्तान की गाड़ी पर जा रहा था। कप्तान ने उसे अच्छी जगह पर बैठने को कहा, परन्तु उसने उस तरफ देखा तक नहीं। वह मेरा ही मुँह नहीं ताकता। फिर जितना जानता है उतना प्रकट नहीं करता – कहीं मैं लोगों से कहता न फिरूँ कि नरेन्द्र इतना विद्वान् है। उसके माया-मोह नहीं हैं – मानो कोई बन्धन ही नहीं है। बड़ा अच्छा आधार है। एक ही आधार में बहुत से गुण रखता है – गाने-बजाने, लिखने-पढ़ने सब में बहुत प्रवीण है। इधर जितेन्द्रिय भी है – कहता है, विवाह नहीं करूँगा! नरेन्द्र और भवनाथ इन दोनों में बड़ा मेल है – जैसा स्वामी-स्त्री में होता है। नरेन्द्र यहाँ ज्यादा नहीं आता। यह अच्छा है। ज्यादा आने से मैं विह्वल हो जाता हूँ।
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दक्षिणेश्वर मन्दिर में भक्तों के साथ
मणिमोहन को शिक्षा, ब्रह्मज्ञान के लक्षण। ध्यानयोग
श्रीरामकृष्ण अपनी छोटी खाट पर बैठे मसहरी के भीतर ध्यान कर रहे हैं। रात के सात-आठ बजे होंगे। मास्टर और उनके एक मित्र हरिबाबू जमीन पर बैठे हैं। आज सोमवार, तारीख २० अगस्त १८८३ ई. है।
आजकल हाजरा महाशय यहाँ रहते हैं। राखाल भी प्रायः रहा करते हैं - और कभी कभी अधर के यहाँ रहते हैं। नरेन्द्र, भवनाथ, अधर, बलराम, राम, मनोमोहन, मास्टर आदि प्रायः प्रति सप्ताह आया करते हैं।
हृदय ने श्रीरामकृष्ण की बड़ी सेवा की थी। वे घर पर बीमार हैं, यह सुनकर श्रीरामकृष्ण बहुत चिन्तित हुए हैं। इसीलिए एक भक्त ने राम चटर्जी के हाथ आज दस रुपये भेजे हैं - हृदय को भेजने के लिए। देने के समय श्रीरामकृष्ण वहाँ उपस्थित नहीं थे। वही भक्त एक लोटा भी लाए हैं। श्रीरामकृष्ण ने उनसे कहा था, “यहाँ के लिए एक लोटा लाना; भक्त लोग पानी पीएँगे।”
मास्टर के मित्र हरिबाबू को लगभग ग्यारह वर्ष हुए, पत्नीवियोग हुआ है। फिर उन्होंने विवाह नहीं किया। उनके मातापिता, भाई-बहन, सभी हैं। उन पर उनका बड़ा स्नेह हैं, और उनकी सेवा वे करते हैं। उनकी आयु अट्ठाईस-उनतीस वर्ष होगी। भक्तों के आते ही श्रीरामकृष्ण मसहरी से बाहर आए। मास्टर आदि ने उनको भूमिष्ठ हो प्रणाम किया। मसहरी उठा दी गयी। आप छोटे तख्त पर बैठकर बातें करने लगे।
श्रीरामकृष्ण (मास्टर से) – मसहरी के भीतर ध्यान कर रहा था। फिर सोचा कि यह तो केवल एक रूप की कल्पना ही है। इसीलिए फिर अच्छा न लगा। अच्छा होता यदि ईश्वर बिजली की चमक की तरह अपने आपको झट से प्रकट करते। फिर मैंने सोचा, कौन ध्यान करनेवाला है, और ध्यान करूँ ही किसका?
मास्टर – जी हाँ। आपने कह दिया है कि ईश्वर ही जीव और जगत् आदि सब कुछ हुए हैं। जो ध्यान कर रहा है वह भी तो ईश्वर ही है।
श्रीरामकृष्ण – फिर बिना ईश्वर के कराए तो कुछ होनेवाला नहीं। वे अगर ध्यान
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कराए, तो ध्यान होगा। इस पर तुम्हारा क्या मत है?
मास्टर – जी, आप के भीतर 'अहं' का भाव नहीं है, इसीलिए ऐसा प्रतीत हो रहा है। जहाँ 'अहं' नहीं रहता वहाँ ऐसा ही हुआ करता है।
श्रीरामकृष्ण – पर 'मैं दास हूँ, सेवक हूँ' – इतना अहंभाव रहना अच्छा है। जहाँ यह बोध रहता है कि मैं ही सब कुछ कर रहा हूँ वहाँ 'मैं दास हूँ और तुम प्रभु हो' – यह भाव बहुत अच्छा है। जब सभी कुछ किया जा रहा है, तो सेव्यसेवक-भाव से रहना ही अच्छा है।
मास्टर सदा परब्रह्म के स्वरूप का चिन्तन करते हैं। इसीलिए श्रीरामकृष्ण उनको लक्ष्य करके फिर कह रहे हैं –
“ब्रह्म आकाश की तरह हैं। उनमें कोई विकार नहीं है। जैसे आग के कोई रंग नहीं है। पर हाँ, अपनी शक्ति के द्वारा वे विविध आकार के हुए हैं। सत्त्व, रज, तम – ये तीन गुण शक्ति ही के गुण हैं। आग में यदि सफेद रंग डाल दो, तो वह सफेद दिखेगी। यदि लाल रंग डाल दो, तो वह लाल दिखेगी। यदि काला रंग डाल दो, तो वह काली दिखेगी। ब्रह्म सत्त्व, रज और तम – इन तीनों गुणों से परे हैं। वे यथार्थ में क्या हैं, यह मुँह से नहीं कहा जा सकता। वे वाक्य से परे हैं। 'नेति नेति' (ब्रह्म यह नहीं, वह नहीं) करके विचार करते हुए जो बाकी रह जाता है, और जहाँ आनन्द है, वही ब्रह्म हैं।
“एक लड़की का पति आया है। वह अपने बराबरी के युवकों के साथ बाहरवाले कमरे में बैठा है। इधर वह लड़की और उसकी सहेलियाँ खिड़की से देख रही हैं। सहेलियाँ उसके पति को नहीं पहचानतीं। वे उस लड़की से पूछ रही है, 'क्या वह तेरा पति है?' लड़की मुसकराकर कहती है, – 'नहीं।' एक दूसरे युवक को दिखलाकर वे पूछती हैं, 'क्या वह तेरा पति है?' वह फिर कहती है – 'नहीं।' एक तीसरे युवक को दिखाकर वे फिर पूछती हैं, 'क्या वह तेरा पति है?' वह फिर कहती है – 'नहीं।' अन्त में उसके पति की ओर इशारा करके उन्होंने पूछा, 'क्या वह तेरा पति है?' तब उसने 'हाँ' या 'नहीं' कुछ नहीं कहा; केवल मुसकरायी और चुप्पी साध ली! तब सहेलियों ने समझा कि वही इसका पति है। जहाँ ठीक ब्रह्मज्ञान होता है, वहाँ सब चुप हो जाते हैं।
सत्संग। गृहस्थ के कर्तव्य
(मास्टर से) “अच्छा, मैं बकता क्यों हूँ?”
मास्टर – जैसा आपने कहा कि पके हुए घी में अगर कच्ची पूड़ी छोड़ दी जाय, तो फिर आवाज होने लगती है। आप बोलते हैं भक्तों का चैतन्य कराने के लिए।
श्रीरामकृष्ण मास्टर से हाजरा महाशय की चर्चा करते हैं।
श्रीरामकृष्ण – अच्छे मनुष्य का स्वभाव कैसा है, मालूम है? वह किसी को दुःख
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२० अगस्त, १८८३ परिच्छेद ५० २८९
नहीं देता – किसी को झमेले में नहीं डालता। किसी-किसी का ऐसा स्वभाव है कि कहीं न्यौता खाने गया हो तो शायद कह दिया – मैं अलग बैठूँगा! ईश्वर पर यथार्थ भक्ति रहने से ताल के विरुद्ध पैर नहीं पड़ते – मनुष्य किसी को झूठमूठ कष्ट नहीं देता।
“दुष्ट लोगों का संग करना अच्छा नहीं। उनसे अलग रहना पड़ता है। अपने को उनसे बचाकर चलना पड़ता है। (मास्टर से) तुम्हारा क्या मत है?”
मास्टर – जी, दुष्टों के संग रहने से मन बहुत गिर जाता है। हाँ, जैसा आपने कहा, वीरों की बात दूसरी है।
श्रीरामकृष्ण – कैसे?
मास्टर – कम आग में थोड़ीसी लकड़ी डाल दो तो वह बुझ जाती है। पर धधकती हुई आग में केले का पेड़ भी झोंक देने से आग का कुछ नहीं बिगड़ता। वह पेड़ ही जलकर भस्म हो जाता है।
श्रीरामकृष्ण मास्टर के मित्र हरिबाबू की बात पूछ रहे हैं।
मास्टर – ये आपके दर्शन करने आये हैं। ये बहुत दिनों से विपत्नीक हैं।
श्रीरामकृष्ण (हरिबाबू से) – तुम क्या काम करते हो?
मास्टर ने उनकी ओर से कहा, “ऐसा कुछ नहीं करते, पर अपने माता-पिता, भाई-बहन आदि की बड़ी सेवा करते हैं।”
श्रीरामकृष्ण (हँसते हुए) – यह क्या है! तुम तो ‘कुम्हड़ा काटनेवाले जेठजी’ बने! तुम न संसारी हुए, न हरिभक्त। यह अच्छा नहीं। किसी किसी परिवार में एक पुरुष होता है, जो रातदिन लड़के-बच्चों से घिरा रहता है। वह बाहरवाले कमरे में बैठकर खाली तम्बाकू पिया करता है। निकम्मा ही बैठा रहता है। हाँ, कभी कभी अन्दर जाकर कुम्हड़ा काट देता है! स्त्रियों के लिए कुम्हड़ा काटना मना है। इसीलिए वे लड़कों से कहती हैं, ‘जेठजी को यहाँ बुला लाओ, वे कुम्हड़ा काट देंगे।’ तब वह कुम्हड़े के दो टुकड़े कर देता है! बस, यहीं तक मर्द का व्यवहार है। इसलिए उसका नाम ‘कुम्हड़ा काटनेवाले जेठजी’ पड़ा है।
“तुम यह भी करो, वह भी करो। ईश्वर के चरणकमलों में मन रखकर संसार का कामकाज करो। और जब अकेले रहो तब भक्तिशास्त्र पढ़ा करो – जैसे श्रीमद्भागवत या चैतन्यचरितामृत आदि।”
रात के लगभग दस बजे हैं। अभी कालीमन्दिर बन्द नहीं हुआ है। मास्टर ने राम चटर्जी के साथ जाकर पहले राधाकान्त के मन्दिर में और फिर कालीमाता के मन्दिर में प्रणाम किया। चाँद निकला था। श्रावण की कृष्णा द्वितीया थी। आँगन और मन्दिरों के शीर्ष बड़े सुन्दर दिखते थे।
२९० श्रीरामकृष्णवचनामृत २० अगस्त, १८८३
श्रीरामकृष्ण के कमरे में लौटकर मास्टर ने देखा कि वे भोजन करने बैठ रहे हैं। वे दक्षिण की ओर मुँह करके बैठे। थोड़ा सूजी का पायस और एक-दो पतली पूड़ियाँ – बस यही भोजन था। थोड़ी देर बाद मास्टर और उनके मित्र ने श्रीरामकृष्ण को प्रणाम करके बिदा ली। वे उसी दिन कलकत्ते लौट जाएँगे।
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परिच्छेद ५१
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परिच्छेद ५१
गुरुशिष्य-संवाद – गुह्य कथा
(१)
ब्रह्मज्ञान और अभेदबुद्धि। अवतार क्यों होते हैं
श्रीरामकृष्ण अपने कमरे में उस छोटे तख्त पर बैठे मणि से गुह्य बातें कर रहे हैं। मणि जमीन पर बैठे हैं। आज शुक्रवार, ७ सितम्बर १८८३ ई. है। भाद्र की शुक्ला षष्ठी तिथि है। रात के लगभग साढ़े सात बजे हैं।
श्रीरामकृष्ण – उस दिन कलकत्ते गया। गाड़ी पर जाते जाते देखा, सभी निम्नदृष्टि हैं। सभी को अपने पेट की चिन्ता लगी हुई थी। सभी अपना पेट पालने के लिए दौड़ रहे थे। सभी का मन कामिनी-कांचन पर था। हाँ, दो-एक को देखा कि वे ऊर्ध्वदृष्टि हैं - ईश्वर की ओर उनका मन है।
मणि – आजकल पेट की चिन्ता और भी बढ़ गयी है। अंग्रेजों का अनुकरण करने में लगे हुए लोगों का मन विलास की ओर अधिक मुड़ गया है। इसीलिए अभावों की वृद्धि हुई है।
श्रीरामकृष्ण – ईश्वर के विषय में उनका कैसा मत है?
मणि – वे निराकारवादी हैं।
सब भूतों में एक चैतन्य दर्शन
श्रीरामकृष्ण – हमारे यहाँ भी वह मत है।
थोड़ी देर तक दोनों चुप रहे। अब श्रीरामकृष्ण अपनी ब्रह्मज्ञानदशा का वर्णन कर रहे हैं।
श्रीरामकृष्ण – मैंने एक दिन देखा कि एक ही चैतन्य सर्वत्र है - कहीं भेद नहीं है। पहले (ईश्वर ने) दिखाया कि बहुतसे मनुष्य और जीव-जन्तु हैं - उनमें बाबू लोग हैं, अंग्रेज और मुसलमान हैं, मैं स्वयं हूँ, मेहतर है, कुत्ता है, फिर एक दाढ़ीवाला मुसलमान है – उसके हाथ में एक छोटी थाली है, जिसमें भात है। उस छोटी थाली का भात वह सब के मुँह में थोड़ा थोड़ा दे गया। मैंने भी थोड़ासा चखा।
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| २९२ | श्रीरामकृष्णवचनामृत | ७ सितम्बर, १८८३ |
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“एक दूसरे दिन दिखाया कि विष्ठा-मूत्र, अन्न-व्यंजन, तरह तरह की खाने की चीजें पड़ी हुई हैं। एकाएक भीतर से जीवात्मा ने निकलकर आग की लौ की तरह सब चीजों को चखा, – मानो जीभ हिलाते हुए सभी चीजों का एक बार स्वाद ले लिया, विष्ठा, मूत्र, सब कुछ चखा। इससे (ईश्वर ने) दिखा दिया कि सब एक है– अभेद हैं।
“फिर एक बार दिखाया कि यहाँ के* अनेक भक्त हैं – पार्षद – अपने जन। ज्योंही आरती का शंख और घण्टा बज उठता, मैं कोठी की छत पर चढ़कर व्याकुल हो चिल्लाकर कहता, ‘अरे, तुम लोग कौन कहाँ हो? आओ, तुम्हें देखने के लिए मेरे प्राण छटपटा रहे हैं।’
“अच्छा, मेरे इन दर्शनों के बारे में तुम्हें क्या मालूम होता है?”
मणि – आप ईश्वर के विलास का स्थान हैं। मैंने यही समझा है कि आप यन्त्र हैं और वे यन्त्री (चलानेवाले) हैं। दूसरों को उन्होंने मानो साँचे में डालकर तैयार किया है, परन्तु आपको स्वयं के हाथों से गढ़ा है।
श्रीरामकृष्ण – अच्छा, हाजरा कहता है कि ईश्वर के दर्शन के बाद षडैश्वर्य मिलते हैं।
मणि – जो शुद्धा भक्ति चाहते हैं वे ईश्वर के ऐश्वर्य की इच्छा नहीं करते।
श्रीरामकृष्ण – शायद हाजरा पूर्वजन्म में गरीब था, इसीलिए उसे ऐश्वर्य देखने की उतनी तीव्र इच्छा है। हाल में हाजरा ने कहा है – ‘क्या मैं रसोइया ब्राह्मणों से बातचीत करता हूँ!’ फिर कहता है – ‘मै खजांची से कहकर तुम्हें वे सब चीजें दिला दूँगा!’
(मणि का उच्च हास्य)
श्रीरामकृष्ण (सहास्य) – वह ये सब बातें कहता रहता है और मैं चुप रह जाता हूँ।
मणि – आप तो बहुत बार कह चुके हैं कि शुद्ध भक्त ऐश्वर्य देखना नहीं चाहता। वह ईश्वर को गोपाल रूप में देखना चाहता है। पहले ईश्वर चुम्बक-पत्थर और ईश्वर भक्त सुई होते हैं; फिर तो भक्त ही चुम्बक-पत्थर और ईश्वर सुई बन जाते हैं – अर्थात् भक्त के पास ईश्वर छोटे हो जाते हैं।
श्रीरामकृष्ण – जैसे ठीक उदय के समय का सूर्य। अनायास ही देखा जा सकता है, वह आँखों को झुलसाता नहीं, बल्कि उनको तृप्त कर देता है। भक्त के लिए भगवान् का भाव कोमल हो जाता है – वे अपना ऐश्वर्य छोड़ भक्तों के पास आ जाते हैं।
* गुरुभाव से श्रीरामकृष्ण अपने लिए ‘मैं’ या ‘हम’ शब्द का प्रयोग साधारण दशा में कदाचित् करते थे। किसी और ढंग से वह भाव वे सूचित करते थे। जैसे – ‘मेरे पास’ न कहकर ‘यहाँ’ कहते थे। ‘मेरा’ न कहकर ‘यहाँ का’ अथवा अपना शरीर दिखाकर ‘इसका’ कहते थे। हाँ, जगन्माता के सन्तान-भाव से वे ‘मैं’ या ‘हम’ शब्द का व्यवहार करते थे। भावावस्था में गुरुभाव के अर्थ में भी इन शब्दों का प्रयोग वे करते थे।
७ सितम्बर, १८८३ परिच्छेद ५१ २९३
७ सितम्बर, १८८३ परिच्छेद ५१ २९३
फिर दोनों चुप रहे।
मणि – मैं सोचता हूँ, क्यों ये दर्शन सत्य नहीं होंगे? यदि ये मिथ्या हुए तो यह संसार और भी मिथ्या ठहरा, क्योंकि देखने का साधन, मन तो एक ही है। फिर वे दर्शन शुद्ध मन से होते हैं और सांसारिक पदार्थ इसी अशुद्ध मन से देखे जाते हैं।
श्रीरामकृष्ण – इस बार देखता हूँ कि तुम्हें खूब अनित्य का बोध हुआ है। अच्छा, कहो, हाजरा कैसा है?
मणि – वह है एक तरह का आदमी। (श्रीरामकृष्ण हँसे।)
श्रीरामकृष्ण – अच्छा, मुझसे तथा किसी और से कुछ मिलता जुलता है?
मणि – जी नहीं।
श्रीरामकृष्ण – किसी परमहंस से?
मणि – जी नहीं। आपकी तुलना नहीं है।
श्रीरामकृष्ण (सहास्य) – तुमने 'अनचीन्हा पेड़' सुना है?
मणि – जी नहीं।
श्रीरामकृष्ण – वह है एक प्रकार का पेड़ जिसे कोई देखकर पहचान नहीं सकता।
मणि – जी, आपको भी पहचानना कठिन है। आपको जो जितना समझेगा वह उतना ही उन्नत होगा।
मणि शान्त होकर विचार कर रहे हैं, – श्रीरामकृष्ण ने जो 'उदय के समय का सूर्य', 'अनचीन्हा पेड़' आदि बातें कहीं, क्या यही अवतार के लक्षण हैं? क्या इसी का नाम नरलीला है? क्या श्रीरामकृष्ण अवतार हैं? क्या इसीलिए वे पार्षदों को देखने के लिए व्याकुल होकर कोठी की छत पर चढ़कर पुकारते थे कि अरे, तुम लोग कौन कहाँ हो, आओ!
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परिच्छेद ५२
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परिच्छेद ५२
दक्षिणेश्वर मन्दिर में भक्तों के साथ
(१)
सच्ची चालाकी कौनसी है?
श्रीरामकृष्ण कालीमन्दिरवाले अपने कमरे में प्रसन्नतापूर्वक बैठे हुए भक्तों के साथ वार्तालाप कर रहे हैं। आपका भोजन हो चुका है, दिन के एक या दो बजे होंगे।
आज रविवार है, ९ सितम्बर १८८३, भादों की शुक्ला सप्तमी। कमरे में राखाल, मास्टर और रतन बैठे हुए हैं। रामलाल, राम चटर्जी और हाजरा भी एक-एक करके आते और आसन ग्रहण करते हैं। रतन यदु मल्लिक के बगीचे की देखभाल करते हैं। वे श्रीरामकृष्ण की भक्ति करते हैं, तथा कभी कभी उनके दर्शन कर जाया करते हैं। श्रीरामकृष्ण उन्हीं से बातचीत कर रहे हैं। रतन कह रहे हैं, यदु मल्लिक के कलकत्तेवाले मकान में नीलकण्ठ का नाटक होगा।
रतन – आपको जाना होगा। उन लोगों ने कहला भेजा है अमुक दिन नाटक होगा।
श्रीरामकृष्ण – अच्छा है, मेरी भी जाने की इच्छा है। अहा नीलकण्ठ कैसे भक्तिपूर्वक गाता है!
एक भक्त – जी हाँ।
श्रीरामकृष्ण – गाना गाते हुए वह आँसुओ से तर हो जाता है। (रतन से) सोचता हूँ रात को वहीं रह जाऊँगा।
रतन – अच्छा तो है।
राम चटर्जी आदि ने खड़ाऊँ की चोरीवाली बात पूछी।
रतन – यदुबाबू के गृहदेवता की सोने की खड़ाऊँ चोरी गयी है। इसके कारण घर में बड़ा हो-हल्ला मचा हुआ है। थाली चलायी जाएगी।* सब बैठे रहेंगे, जिसने लिया है, उसकी ओर थाली चली जाएगी!
श्रीरामकृष्ण (हँसते हुए) – किस तरह थाली चलती है? अपने आप चलती है?
* यह एक तरह का टोना है।
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९ सितम्बर, १८८३ | परिच्छेद ५२ | २९५
| ९ सितम्बर, १८८३ | परिच्छेद ५२ | २९५ |
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रतन – नहीं, हाथ से दबायी हुई रहती है।
भक्त – हाथ ही की कोई कारीगरी होगी – हाथ की चालाकी।
श्रीरामकृष्ण (हँसते हुए) – जिस चालाकी से लोग ईश्वर को पाते हैं, वही चालाकी चालाकी है। 'सा चातुरी चातुरी!'
(२)
तान्त्रिक साधना और श्रीरामकृष्ण का सन्तान-भाव
बातचीत हो रही है, इसी समय कुछ बंगाली सज्जन कमरे में आए और श्रीरामकृष्ण को प्रणाम करके उन्होंने आसन ग्रहण किया। उनमें एक व्यक्ति श्रीरामकृष्ण के पहले के परिचित हैं। ये लोग तन्त्र के मत से साधना करते हैं – पंच-मकार साधना। श्रीरामकृष्ण अन्तर्यामी हैं, उनका सम्पूर्ण भाव समझ गए। उनमें एक आदमी धर्म के नाम से पापाचरण भी करता है, यह बात श्रीरामकृष्ण सुन चुके हैं। उसने किसी बड़े आदमी के भाई की विधवा के साथ अवैध प्रेम कर लिया है और धर्म का नाम लेकर उसके साथ पंच-मकार की साधना करता है, यह भी श्रीरामकृष्ण सुन चुके हैं।
श्रीरामकृष्ण का सन्तान-भाव है। वे हरएक नारी को माता समझते हैं – वेश्या को भी; और स्त्रियों को भगवती का एक-एक रूप समझते हैं।
श्रीरामकृष्ण (सहास्य) – अचलानन्द कहाँ है? उस दिन कालीकिंकर आया था – और एक जन था। (मास्टर आदि से) अचलानन्द और उसके शिष्यों का और ही भाव है। मेरा सन्तान-भाव है।
आए हुए बाबू लोग चुपचाप बैठे हुए हैं, कुछ बोलते नहीं।
श्रीरामकृष्ण – मेरा सन्तान-भाव है। अचलानन्द यहाँ आकर कभी कभी रहता था। खूब शराब पीता था। मेरा सन्तान-भाव है, यह सुनकर अन्त में उसने हठ पकड़ा। कहने लगा – 'स्त्री को लेकर वीरभाव की साधना तुम क्यों नही मानोगे? शिव की रेख भी नहीं मानोगे? स्वयं शिवजी ने तन्त्र लिखा है। उसमें सब भावों की साधना है, वीरभाव की भी है।'
मैंने कहा, 'मैं क्या जानूँ जी! मुझे वह सब अच्छा नहीं लगता – मेरा सन्तान-भाव है।'
आगन्तुक सज्जन चुप हैं, कुछ बात नहीं निकल ही है।
“अचलानन्द अपने बच्चों की खबर नहीं लेता था। मुझसे कहता था, 'बच्चों को ईश्वर देखेंगे – यह सब ईश्वर की इच्छा है।' मैं सुनकर चुप हो जाता था। बात यह है कि लड़कों की देखरेख कौन करे? लड़के-बाले, घर-द्वार सब छोड़ दिया यह कहीं रुपये
| २९६ | श्रीरामकृष्णवचनामृत | ९ सितम्बर, १८८३ |
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कमाने का साधन न बन बैठे, क्योंकि, लोग सोचेंगे, इसने तो सब कुछ त्याग कर दिया है, और इस तरह बहुतसा धन देने लगेंगे।
“मुकदमा जीतूँगा, खूब धन होगा, मुकदमा जिता दूँगा, जायदाद दिला दूँगा, क्या इसीलिए साधना है? ये सब बड़ी ही नीच प्रकृति की बातें हैं।”
“रुपये से भोजन-पान होता है, रहने की जगह होती है, देवताओं की सेवा होती है, साधुओं का सत्कार होता है, सामने कोई गरीब आ गया तो उसका उपकार हो जाता है, ये सब रुपये के सदुपयोग हैं। रुपये ऐश्वर्य का भोग करने के लिए नहीं हैं, न देहसुख के लिए हैं, न लोकसम्मान के लिए।”
“विभूतियों के लिए लोग तन्त्र के मत से पंच-मकार की साधना करते हैं। परन्तु उनकी बुद्धि कितनी हीन है! कृष्ण ने अर्जुन से कहा है – भाई! अष्टसिद्धियों में किसी एक के रहने पर तुम्हारी शक्ति तो थोड़ी बढ़ सकती है, परन्तु तुम मुझे न पाओगे। विभूति के रहते माया दूर नहीं होती। माया से फिर अहंकार होता है। कैसी हीन बुद्धि है, घृणास्पद स्थान से तीन घूँट कारणवारि (शराब) पीकर लाभ क्या हुआ? – मुकदमा जीतना।”
श्रीरामकृष्ण तथा हठयोग
“शरीर, रुपया, यह सब अनित्य है। इसके लिए इतना हठ क्यों? हठयोगियों की दशा देखो न! शरीर किसी तरह दीर्घायु हो, बस इसी ओर ध्यान लगा रहता है। ईश्वर की ओर लक्ष नहीं है। नेति-धौति बस पेट साफ कर रहे हैं! नल लगाकर दूध ग्रहण कर रहे हैं।
“एक सुनार था। उसकी जीभ उलटकर तालू पर चढ़ गयी थी। तब जड़-समाधि की तरह उसकी अवस्था हो गयी। फिर वह हिलता-डुलता न था। बहुत दिनों तक उसी अवस्था में रहा। लोग आकर उसकी पूजा करते थे। कुछ साल बाद एकाएक उसकी जीभ सीधी हो गयी। तब उसे पहले की तरह चेतना हो गयी। फिर वही सुनार का काम करने लगा! (सब हँसते हैं।)
“वे सब शरीर के कर्म हैं। उससे प्रायः ईश्वर के साथ कोई सम्बन्ध नहीं रहता। शालग्राम का भाई – (उसका लड़का वंशलोचन का व्यवसाय करता था)– बयासी तरह के आसन जानता था। वह योग-समाधि की भी बहुतसी बातें कहता था। परन्तु भीतर ही भीतर उसका कामिनी-कांचन में मन था। दीवान मदन भट्ट की कुछ हजार रुपयों की एक नोट पड़ी थी, रुपयों की लालच से वह उसे झट निगल गया। बाद में फिर किसी तरह निकाल लेता। परन्तु नोट उससे वसूल हो गयी। अन्त में तीन साल के लिए वह जेल भेजा गया। मैं सरल भाव से सोचता था, शायद उसकी आध्यात्मिक उन्नति बहुत हो चुकी है, सच कहता हूँ – रामदुहाई!”
९ सितम्बर, १८८३ परिच्छेद ५२ २९७
९ सितम्बर, १८८३ परिच्छेद ५२ २९७
श्रीरामकृष्ण तथा कामिनी-कांचन
“यहाँ सींती का महेन्द्र पाल पाँच रुपये दे गया था, रामलाल के पास। उसके चले जाने के बाद रामलाल ने मुझसे कहा। मैंने पूछा, क्यों दिया? रामलाल ने कहा, यहाँ के खर्च के लिए दिया है। तब याद आया, दूधवाले को कुछ देना है; हो न हो, इन्हीं रुपयों से कुछ दे दिया जाय। परन्तु यह क्या आश्चर्य! मैं रात को सोया हुआ था, एकाएक उठ पड़ा। छाती के भीतर मानो कोई बिल्ली की तरह खरोंचने लगा। तब रामलाल के पास जाकर मैंने कहा, किसे दिया है? – तेरी चाची को? रामलाल ने कहा, नहीं, आपके लिए। तब मैंने कहा, नहीं, रुपये जाकर अभी वापस दे आ, नहीं तो मुझे शान्ति न होगी।
“रामलाल सुबह को उठकर जब रुपये वापस दे आया, तब तबीयत ठीक हुई!”
“उस देश की भगवतिया तेलिन कर्ताभजा दल की है। वे सब औरत लेकर साधना किया करते हैं। एक पुरुष के हुए बिना स्त्री की साधना होगी ही नहीं। उस पुरुष को ‘रागकृष्ण’ कहते हैं। तीन बार स्त्री से पूछा जाता है, तूने कृष्ण को पाया? वह स्त्री तीनों बार कहती है, पाया।
“भगवतिया शूद्र है, तेलिन है, परन्तु सब उसके पास जाकर उसके पैरों की धूल लेते थे, उसे नमस्कार करते थे। तब जमींदार को इस पर बड़ा क्रोध आ गया। मैंने उसे देखा है। जमींदार ने उसके पास एक बदमाश भेज दिया। उससे वह फँस गयी और उसके गर्भ रहा।”
“एक दिन एक बड़ा आदमी आया था। मुझसे कहा, ‘महाराज, इस मुकदमे में ऐसा कर दीजिये कि मैं जीत जाऊँ। आपका नाम सुनकर आया हूँ।’ मैंने कहा, ‘भाई, वह मैं नहीं हूँ। तुम्हारी भूल हुई। वह अचलानन्द है।’
“ईश्वर पर जिसकी सच्ची भक्ति है, वह शरीर, रुपया आदि की थोड़ी भी परवाह नहीं करता। वह सोचता है, देहसुख के लिए, लोकसम्मान के लिए, रुपयों के लिए, क्या जप और तप करूँ? ये सब अनित्य हैं, चार दिन के लिए हैं।”
आये हुए सब बाबू लोग उठे। उन्होंने नमस्कार करके कहा, ‘तो हम चलें।’ वे चले गए। श्रीरामकृष्ण मुस्करा रहे हैं और मास्टर से कह रहे हैं – “चोर धर्म की बात नहीं सुनते।” (सब हँसते हैं।
(४)
विश्वास चाहिए
श्रीरामकृष्ण (मणि से सहास्य) – अच्छा, नरेन्द्र कैसा है?
मणि – जी, बहुत अच्छा है।