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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

DevanagariHindipublished711 पृष्ठ

३ जुलाई, १८८४ | परिच्छेद ८६ | ५६७

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श्रीरामकृष्ण – बड़ा बुद्धिमान है न?

मास्टर – जी हाँ, उसमें खूब पाण्डित्य है।

श्रीरामकृष्ण – गीता का मत है, जिसे बहुत से लोग मानते, जानते हैं, उसके भीतर ईश्वर की शक्ति है। परन्तु शशधर के कुछ काम बाकी हैं।

“सूखे पाण्डित्य से क्या होगा? कुछ तपस्या चाहिए – कुछ साधना चाहिए।

“गौरी पण्डित ने साधना की थी। जब वह स्तुतियाँ पढ़ता था – ॐ निरालम्बो लम्बोदर – तब अन्य पण्डित केंचुए हो जाते थे।

“नारायण शास्त्री भी केवल पण्डित नहीं, उसने भी साधना की है।

“नारायण शास्त्री पचीस साल तक एक ही बहाव में पड़ा था। सात साल तक सिर्फ न्याय पढ़ा था। फिर भी 'हर हर' कहते ही भावमग्न हो जाता था। जयपुर के महाराजा ने उसे अपना सभापण्डित बनाना चाहा था। उसने वह काम मंजूर नहीं किया। दक्षिणेश्वर में प्रायः आकर रहता था। वशिष्ठाश्रम जाने की उसकी बड़ी इच्छा थी। तपस्या करने के लिए जाने की बात प्रायः मुझसे कहा करता था। मैंने उसे वहाँ जाने के लिए मना किया, तब उसने कहा, किसी दिन दम खतम हो जायेगा, फिर साधना कब करूँगा? जब उसने हठ पकड़ा, तब मैंने कह दिया – अच्छा जाओ।

“सुनता हूँ, कोई कोई कहते हैं, नारायण शास्त्री का देहान्त हो गया है। तपस्या करते समय किसी भैरव ने चपत मारी थी। कोई कोई कहते हैं, वे बचे हुए हैं, अभी उनको रेल पर सवार कराके हम आ रहे हैं।

“केशव सेन को देखने से पहले नारायण शास्त्री से मैंने कहा, तुम एक बार जाकर उन्हें देख आओ और मुझे बताओ कि वे कैसे आदमी हैं। वह देखकर जब आया, तब कहा, वह जप करके सिद्ध हो गया है। नारायण ज्योतिष जानता था। उसने कहा, 'केशव सेन भाग्य का बड़ा जबरदस्त है। मैंने उससे संस्कृत में बातचीत की थी। वह भाषा (बंगाली) बोलता था।

“तब मैं हृदय को साथ लेकर बेलघर के बगीचे में केशव से मिला। उसे देखते ही मैंने कहा था, 'इन्हीं की पूँछ गिर गयी है – ये पानी में भी रह सकते हैं और जमीन पर भी।'”

श्रीरामकृष्ण पूँछ गिरने की लोकोक्ति के द्वारा कह रहे हैं कि यही केशव हैं जो संसार में भी रहते हैं और ईश्वर में भी।

“मेरी परीक्षा लेने के लिए तीन ब्राह्मसमाजियों को केशव ने काली-मन्दिर भेजा। उनमें प्रसन्न भी था। बात यह थी कि वे रात-दिन मुझे देखेंगे और केशव के पास खबर भेजते रहेंगे। मेरे घर में रात को सोये। बस 'दयामय' 'दयामय' करते थे और मुझसे कहते थे, 'तुम केशव बाबू की पैरवी करो तो तुम्हारे लिए अच्छा होगा।' मैंने कहा, 'मैं साकार

५६८श्रीरामकृष्णवचनामृत३ जुलाई, १८८४

जो मानता हूँ।' उन्होंने 'दयामय, दयामय' कहना न छोड़ा; तब मेरी एक दूसरी अवस्था हो गयी। उस अवस्था में मैंने कहा – 'हटो यहाँ से।' घर के भीतर मैंने उन्हें किसी तरह न रहने दिया। वे सब बरामदे में पड़े रहे।

“कप्तान ने भी जिस दिन मुझे पहले-पहल देखा, उस दिन रात को यहीं रह गया।

“नारायण जब था तब एक दिन माइकेल आया था। मथुर बाबू का बड़ा लड़का द्वारका बाबू उसे अपने साथ ले आया था। मैगजीन के साहबों के साथ मुकदमा होनेवाला था। इस पर सलाह लेने के लिए बाबुओं ने माइकेल को बुलाया था।

“दफ्तर के साथ ही बड़ा कमरा है। वहीं माइकेल से मुलाकात हुई थी। मैंने नारायणशास्त्री को बातचीत करने के लिए कहा। संस्कृत में माइकेल अच्छी तरह बातचीत न कर सका। तब भाषा (बँगला) में बातचीत हुई।

“नारायण शास्त्री ने पूछा, तुमने अपना धर्म क्यों छोड़ा? माइकेल ने पेट दिखाकर कहा, पेट के लिए छोड़ना पड़ा।

“नारायण शास्त्री ने कहा, 'जो पेट के लिए धर्म छोड़ता है, उससे क्या बातचीत करूँ।' तब माइकेल ने मुझसे कहा, आप कुछ कहिये।

“मैंने कहा, न जाने क्यों मेरी कुछ बोलने की इच्छा नहीं होती। किसी ने मेरा मुँह जैसे दबा रखा हो।”

श्रीरामकृष्ण के दर्शनों के लिए चौधरी बाबू के आने की बात थी।

मनोमोहन – चौधरी नहीं आयेंगे; उन्होंने कहा है, फरीदपुर का वह शशधर जायेगा, अतएव मैं न जाऊँगा।

श्रीरामकृष्ण – कैसा नीचप्रकृती है! – विद्या का अहंकार दिखलाता है! उधर दूसरा विवाह किया है – संसार को तिनके बराबर समझने लगा है।

चौधरी ने एम. ए. पास किया है। पहली स्त्री की मृत्यु होने पर बड़ा वैराग्य था। श्रीरामकृष्ण के पास दक्षिणेश्वर प्रायः जाता था। उसने दूसरा विवाह किया है। तीन-चार सौ रुपया महीना पाता है।

श्रीरामकृष्ण – (भक्तों से) – इस कामिनी-कांचन की आसक्ति ने आदमी को नीच बना डाला है। हरमोहन जब पहले आया था तब उसके लक्षण बड़े अच्छे थे। उसे देखने के लिए मेरा जी व्याकुल हो जाता था। तब उसकी उम्र १७-१८ की रही होगी। मैं अक्सर उसे बुला भेजता था, पर वह न आता था। अब बीबी को लेकर अलग मकान में रहता है! जब अपने मामा के यहाँ रहता था, तब बड़ा अच्छा था। संसार की कोई झंझट न थी। अब अलग मकान लेकर रोज बीबी के लिए बाजार करता है। (सब हँसते हैं।) उस रोज वहाँ गया था। मैंने कहा, जा, यहाँ से चला जा; तुझे छूते मेरी देह किस तरह की हो जाती है।

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कर्ताभजा चन्द्र चैटर्जी आये है। उम्र साठ-पैंसठ की होगी। मुख पर कर्ताभजावालों के श्लोक रहते हैं। श्रीरामकृष्ण के पैर दबाने के लिए जा रहे थे, उन्होंने पैर छूने ही न दिये, हँसकर कहा, इस समय तो खूब हिसाबी बातें कर रहा है। भक्तगण हँसने लगे।

अब श्रीरामकृष्ण बलराम के अन्तःपुर में श्रीजगन्नाथ-दर्शन करने के लिए जा रहे हैं। वहाँ की स्त्रियाँ उनके दर्शनों के लिए व्याकुल हो रही हैं।

श्रीरामकृष्ण फिर बैठकखाने में आये। हँस रहे हैं, कहा, “मैं शौच को गया था, कपड़े बदलकर श्रीजगन्नाथ के दर्शन किये और कुछ फूल-दल चढ़ाये।

“विषयी लोगों की पूजा, जप, तप, सब सामयिक हैं। जो लोग ईश्वर के सिवा और कुछ नहीं जानते, वे साँस के साथ साथ उनका नाम लेते हैं। कोई मन ही मन सदा ‘राम ॐ राम’ जपता रहता है। ज्ञानमार्गी ‘सोऽहम् सोऽहम्’ जपते हैं। किसी-किसी की जीभ सदा हिलती रहती है।

“सदा ही स्मरण-मनन रहना चाहिए।”

(४)

शशधर आदि भक्तगण। समाधि में श्रीरामकृष्ण

पण्डित शशधर दो-एक मित्रों के साथ कमरे में आये और श्रीरामकृष्ण को प्रणाम करके आसन ग्रहण किया।

श्रीरामकृष्ण – (सहास्य) – हम लोग वधू-सखियों के समान शय्या के पास बैठे हुए जाग रहे हैं कि कब वर आयें।

पण्डित शशधर हँस रहे हैं। अनेक भक्त उपस्थित हैं। बलराम के पिता भी उपस्थित हैं। डाक्टर प्रताप भी आये हुए हैं। श्रीरामकृष्ण फिर बातचीत कर रहे हैं।

श्रीरामकृष्ण – (शशधर से) – ज्ञान का पहला लक्षण है, स्वभाव शान्त हो; दूसरा, अभिमान न रहे। तुममें दोनों लक्षण हैं।

“ज्ञानी के और भी कुछ लक्षण हैं। साधु के पास वह त्यागी है, कार्य करते समय – जैसे लेक्चर देते हुए – वह सिंह के समान है, स्त्री के पास रसराज है, रसशास्त्र का पण्डित। (पण्डितजी और दूसरे लोग हँसते हैं।)

“विज्ञानी का और स्वभाव है। जैसे चैतन्यदेव की अवस्था। बालकवत्, उन्मत्तवत्, जड़वत्, पिशाचवत्।

“बालक की अवस्था में कई अवस्थाएँ हैं – बाल्य, कैशोर्य, यौवन। किशोरावस्था में दिल्लगी सूझती है। उपदेश देते समय यौवनावस्था होती है।”

पण्डितजी – किस तरह की भक्ति से वे मिलते हैं?

५७० श्रीरामकृष्णवचनामृत ३ जुलाई, १८८४

श्रीरामकृष्ण – प्रकृति के अनुसार भक्ति तीन तरह की है। भक्ति का सत्त्व, भक्ति का रज और भक्ति का तम।

"भक्ति का सत्त्व ईश्वर ही समझ सकते हैं। उस तरह का भक्त भाव छिपाना पसन्द करता है। कभी वह मसहरी के भीतर बैठकर ध्यान करता है। कोई समझ नहीं सकता। सत्त्व का सत्त्व अर्थात् शुद्ध सत्त्व के बन जाने पर फिर ईश्वर-दर्शन में देर नहीं रहती; जैसे पूरब की ओर ललाई छा जाने पर यह समझने में देर नहीं होती कि अब शीघ्र ही सूरज निकलेंगे।

"जिसे भक्ति का रजोभाव होता है, उसकी इच्छा होती है कि लोग देखें, जानें कि मैं भक्त हूँ। वह षोडशोपचार से उनकी पूजा करता है। रेशम की धोती पहनकर श्रीठाकुर-मन्दिर में जाता है, गले में रुद्राक्ष की माला धारण करता है जिसमें मुक्ता और कहीं कहीं सोने के दाने पड़े रहते हैं!

"भक्ति का तमोभाव वह है जिसमें डाके का मतलब दीख पड़े। डाकू बड़े बड़े हथियार लेकर डाका डालते हैं, आठ थानेदारों को भी नहीं डरते – मुख पर 'मारो – लूट लो' लगा रहता है; पागल की तरह 'बम शंकर' कहते जाते हैं; मन में पूरा भरोसा, पक्का बल और जीता-जागता विश्वास!

"शाक्तों का भी विश्वास ऐसा ही है। – क्या, एक बार मैं काली का नाम ले चुका, दुर्गा को पुकारा, राम-नाम जपा, इतने पर भी मुझे पाप छू ले?

"वैष्णवों के भाव में बड़ी दीनता है। वे लोग बस माला फेरते रहते हैं, रोते-कलपते हुए कहते हैं, हे कृष्ण! दया करो, मैं अधम हूँ, मैं पापी हूँ!

"ज्वलन्त विश्वास चाहिए। ऐसा विश्वास कि मैंने उनका नाम लिया है, मुझे फिर कैसा पाप? – पर कुछ लोग रात-दिन ईश्वर का नाम लेते हैं और कहते हैं – मैं पापी हूँ!"

यह कहते ही श्रीरामकृष्ण का प्रेम-पारावार उमड़ चला। वे गाने लगे। गाना सुनकर शशधर की आँखों में आँसू आ गये। गीतों का भाव यह है –

(१) यदि दुर्गा-दुर्गा कहते हुए मेरे प्राण निकलेंगे तो अन्त में इस दीन को तुम कैसे नहीं तारती हो, मैं देखूँगा। ब्राह्मणों का नाश करके, गर्भपात करके, मदिरा पीकर और स्त्री-हत्या करके भी मैं नहीं डरता। मुझे विश्वास है कि इतने पर भी मुझे ब्रह्मपद की प्राप्ति होगी।

(२) शिव के साथ सदा ही रंग करती हुई तू आनन्द में मग्न है। सुधापान करके, तेरे पैर तो लड़खड़ा रहे हैं, पर, माँ, तू गिर नहीं जाती।

अब अधर के गवैये वैष्णवचरण गा रहे हैं – भाव इस प्रकार है।

(१) ऐ मेरी रसने, सदा दुर्गा-नाम का जप कर। बिना दुर्गा के इस दुर्गम मार्ग में और

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३ जुलाई, १८८४ परिच्छेद ८६ ५७१

कौन निस्तार करनेवाला है? तुम स्वर्ग हो, मर्त्य और पाताल हो। हरि, ब्रह्मा और द्वादश गोपाल भी तुम्हीं से हुए हैं; ऐ माँ, तुम दसों महाविद्याएँ हो, दस बार तुमने अवतार लिया है। अबकी बार किसी तरह मुझे पार करना ही होगा। माँ, तुम चल हो, अचल हो, तुम सूक्ष्म हो, तुम स्थूल हो, सृष्टि-स्थिति और प्रलय तुम हो, तुम इस विश्व की मूल हो। तुम तीनों लोक की जननी हो, तीनों लोक की त्राणकारिणी हो। तुम सब की शक्ति हो, तुम स्वयं अपनी शक्ति हो।

इस गाने को सुनकर श्रीरामकृष्ण को भावावेश हो गया। गाना समाप्त होने पर खुद गाने लगे। उनके बाद वैष्णवचरण ने फिर गाया। इस बार उन्होंने कीर्तन गाया। कीर्तन सुनते ही श्रीरामकृष्ण निर्बीज समाधि में लीन हो गये। शशधर की आँखों से आँसुओं की धारा बहने लगी।

श्रीरामकृष्ण समाधि से उतरे। गाना भी समाप्त हो गया। शशधर, प्रताप, रामदयाल, राम, मनमोहन आदि बालक भक्त तथा और भी बहुत से आदमी बैठे हैं। श्रीरामकृष्ण मास्टर से कह रहे हैं, तुम लोग कुछ छेड़ते क्यों नहीं? (शशधर से कुछ पूछते क्यों नहीं?)

रामदयाल – (शशधर से) – ब्रह्म की रूप-कल्पना शास्त्रों में है, परन्तु वह कल्पना करते कौन हैं?

शशधर – ब्रह्म स्वयं। वह मनुष्य की कल्पना नहीं।

प्रताप – क्यों, वे रूप की कल्पना क्यों करते हैं?

श्रीरामकृष्ण – उनकी इच्छा, वे इच्छामय जो हैं। वे किसी से सलाह करके कुछ थोड़े ही करते हैं? क्यों वे करते हैं, इस बात से हमें क्या मतलब? बगीचे में आम खाने के लिए आये हो, आम खाओ – कितने पेड़ हैं, कितनी हजार डालियाँ हैं, कितने लाख पत्ते हैं, इस हिसाब से क्या काम? वृथा तर्क और विचार करने से वस्तुलाभ नहीं होता।

प्रताप – तो अब विचार न करें?

श्रीरामकृष्ण – वृथा तर्क और विचार न करो। हाँ, सदसत् का विचार करो कि क्या नित्य है और क्या अनित्य – काम, क्रोध और शोक आदि के समय में।

पण्डितजी – वह और चीज है, उसे विवेकात्मक विचार कहते हैं।

श्रीरामकृष्ण – हाँ, सदसत् विचार। (सब चुप हैं।)

श्रीरामकृष्ण – (पण्डितजी से) – पहले बड़े बड़े आदमी आते थे।

पण्डितजी – क्या धनी आदमी?

श्रीरामकृष्ण – नहीं, बड़े बड़े पण्डित।

इतने में छोटा रथ बाहर के दुमंजले वाले बरामदे में लाया गया। श्रीजगन्नाथ, बलराम और सुभद्रादेवी पर अनेक प्रकार की फूल-मालाएँ पड़ी हुई उनकी शोभा बढ़ा रही

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५७२ श्रीरामकृष्णवचनामृत ३ जुलाई, १८८४

हैं। सब नये नये अलंकार और नये नये वस्त्र धारण किये हुए हैं। बलराम की सात्त्विक पूजा होती है। उसमें कोई आडम्बर नहीं किया जाता। बाहर के आदमियों को जरा भी खबर नहीं कि भीतर रथ चल रहा है।

श्रीरामकृष्ण भक्तों के साथ रथ के सामने आये। उसी बरामदे में रथ खींचा जायगा। श्रीरामकृष्ण ने रथ की रस्सी पकड़ी और कुछ देर खींचा। फिर गाने लगे।

(भावार्थ) – “श्रीगौरांग के प्रेम की हिलोरों में नदिया डावाडोल हो रहा है।”

श्रीरामकृष्ण नृत्य कर रहे हैं। भक्तगण भी उनके साथ नाचते हुए गा रहे हैं। कीर्तनिया वैष्णवचरण भी सब में मिल गये।

देखते ही देखते सारा बरामदा भर गया। स्त्रियाँ भी पासवाले कमरे से यह सब आनन्द देख रही हैं। मालूम हो रहा था कि श्रीवास के घर में भगवत्प्रेम से विह्वल होकर श्रीगौरांग भक्तों के साथ नृत्य कर रहे हैं। मित्रों के साथ पण्डितजी भी रथ के सामने खड़े हुए इस नृत्य-गीत का दर्शन कर रहे हैं।

अभी शाम नहीं हुई है। श्रीरामकृष्ण बैठकखाने में चले आये। भक्तों के साथ आसन ग्रहण किया।

श्रीरामकृष्ण – (पण्डितजी से) – इसे भजनानन्द कहते हैं। संसारी लोग विषयानन्द में मग्न रहते हैं – वह कामिनी-कांचन का आनन्द है। भजन करते ही करते जब उनकी कृपा होती है, तब वे दर्शन देते हैं – तब उसे ब्रह्मानन्द कहते हैं।

शशधर और भक्तमण्डली चुपचाप सुन रही है।

पण्डितजी – (विनयपूर्वक) – अच्छा जी, किस तरह व्याकुल होने पर मन की यह सरस अवस्था होती है?

श्रीरामकृष्ण – ईश्वर के दर्शन के लिए जब प्राण डूबते उतराते रहते हैं, तब वह व्याकुलता होती है। गुरु ने शिष्य से कहा, आओ, तुम्हें दिखा दें, किस तरह व्याकुल होने पर वे मिलते हैं। इतना कहकर वे शिष्य को एक तालाब के किनारे ले गये। वहाँ उसे पानी में डुबाकर ऊपर से दबा रखा। थोड़ी देर बाद शिष्य को निकालकर उन्होंने पूछा, कहो, तुम्हारा जी कैसा हो रहा था? उसने कहा, ‘मुझे तो ऐसा मालूम हो रहा था कि मानो मेरे प्राण निकल रहे हों। एक बार सांस लेने के लिए मैं छटपटा रहा था।’

पण्डितजी – हाँ हाँ, ठीक है, अब मैं समझा।

श्रीरामकृष्ण – ईश्वर को प्यार करना, यही सार वस्तु है। भक्ति एकमात्र सार वस्तु है। नारद ने राम से कहा, ‘ऐसा करो कि तुम्हारे पादपद्मों में मेरी सदा शुद्धा भक्ति रहे। अभी के समान संसार को मुग्ध कर लेनेवाली तुम्हारी माया में न पहूँ।’ श्रीरामचन्द्र ने कहा, कोई दूसरा वर लो। नारद ने कहा, ‘मुझे और कुछ न चाहिए। तुम्हारे पादपद्मों में भक्ति रहे – इतना ही बहुत है।’

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पण्डितजी जानेवाले हैं। श्रीरामकृष्ण ने कहा, इनके लिए गाड़ी मँगवा दो।

पण्डितजी – जी नहीं, हम लोग ऐसे ही चले जायेंगे।

श्रीरामकृष्ण – (सहास्य) – कभी ऐसा भी हो सकता है? – 'ब्रह्मा भी तुम्हें ध्यान में नहीं पाते'।

पण्डितजी – अभी जाने की कोई जरूरत न थी, परन्तु सन्ध्या अभी करनी है।

श्रीरामकृष्ण – “माँ की इच्छा से मेरे सन्ध्यादि कर्म छूट गये हैं। सन्ध्यादि के द्वारा देह और मन की शुद्धि की जाती है। वह अवस्था अब नहीं।” यह कहकर श्रीरामकृष्ण ने गाने के एक चरण की आवृत्ति की।

(भावार्थ) “शुचिता और अशुचिता के साथ दिव्यभवन में तू कब सोयेगा? उन दोनों सौतों में जब प्रीति होगी तभी तू श्यामा माँ को पा सकेगा।”

पण्डित शशधर प्रणाम करके बिदा हुए।

राम – कल मैं शशधर के पास गया था, आपने कहा था।

श्रीरामकृष्ण – कहाँ, मैंने तो नहीं कहा; परन्तु तुम गये तो अच्छा किया।

राम – एक संवाद-पत्र (Indian Empire) का संपादक आपकी निन्दा कर रहा था।

श्रीरामकृष्ण – तो इससे क्या हुआ, की होगी।

राम – और भी तो सुनिये। मुझसे आपकी बात सुनकर मुझे छोड़ता ही न था, आपकी बात और सुनना चाहता था।

प्रताप अब भी बैठे हुए हैं। श्रीरामकृष्ण ने उनसे कहा, वहाँ एक बार जाना, भुवन ने कहा है, भाड़ा दूँगा।

शाम हो गयी है। श्रीरामकृष्ण जगज्जननी का नाम ले रहे हैं। कभी राम नाम करते हैं, कभी कृष्णनाम, कभी हरिनाम। भक्तगण चुपचाप सुन रहे हैं। इतने मधुर कण्ठ से नाम ले रहे हैं, जैसे मधु की वर्षा हो रही हो। आज बलराम का मकान नवद्वीप हो रहा है। बाहर नवद्वीप और भीतर वृन्दावन।

आज रात को ही श्रीरामकृष्ण दक्षिणेश्वर जायेंगे। बलराम उन्हें अन्तःपुर में लिये जा रहे हैं, जलपान कराने के लिए। इस सुयोग में स्त्रियाँ भी उनके दर्शन कर लेंगी।

इधर बाहर के बैठकखाने में भक्तगण उनकी प्रतीक्षा करते हुए एक साथ कीर्तन करने लगे। श्रीरामकृष्ण भी बाहर आकर उनके साथ मिल गये। खूब कीर्तन होने लगा।

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परिच्छेद ८७

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परिच्छेद ८७

श्रीरामकृष्ण तथा समन्वय

(१)

कुण्डलिनी और षट्चक्र-भेद

श्रीरामकृष्ण दक्षिणेश्वर मन्दिर में दोपहर के भोजन के बाद भक्तों के साथ बैठे हैं। दिन के दो बजे होंगे।

शिवपुर से बाउलों (एक तरह के गानेवालों) का दल और भवानीपुर से भक्तगण आये हुए हैं। श्रीयुत राखाल, लाटू और हरीश आजकल हमेशा यहीं रहते हैं। कमरे में बलराम और मास्टर हैं।

आज श्रावण की शुक्ला द्वादशी है, ३ अगस्त, १८८४। झूलनयात्रा का दूसरा दिन है। कल श्रीरामकृष्ण सुरेन्द्र के घर गये थे। वहाँ शशधर आदि भक्त भी आपके दर्शन करने के लिए आये थे।

श्रीरामकृष्ण शिवपुर के भक्तों से बातचीत कर रहे हैं।

श्रीरामकृष्ण – कामिनी और कांचन में मन पड़ा रहा तो योग नहीं होता। साधारण जीवों का मन लिंग, गुदा और नाभि में रहता है। बड़ी साधना करने के बाद कहीं कुण्डलिनी शक्ति जाग्रत होती है। नाड़ियाँ तीन हैं, इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना। सुषुम्ना के भीतर छः पद्म हैं। सब से नीचे वाले पद्म को मूलाधार कहते हैं। उसके ऊपर हैं स्वाधिष्ठान, मणिपुर, अनाहत, विशुद्ध और आज्ञा। इन्हें षट्चक्र कहते हैं।

"कुण्डलिनी-शक्ति जब जागती है तब वह मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपुर, इन सब पद्मों को क्रमशः पार करती हुई हृदय के अनाहत पद्म में आकर विश्राम करती है। जब लिंग, गुह्य और नाभि से मन हट जाता है, तब ज्योति के दर्शन होते हैं। साधक आश्चर्यचकित होकर ज्योति देखता है और कहता है, 'यह क्या, यह क्या!'

"छहों चक्रों का भेद हो जाने पर कुण्डलिनी सहस्रार पद्म में पहुँच जाती है; तब समाधि होती है।

"वेदों के मत से ये सब चक्र एक एक भूमि हैं। इस तरह सात भूमियाँ हैं। हृदय चौथी भूमि है। हृदयवाले अनाहत-पद्म के बारह दल हैं।

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३ अगस्त, १८८४ | परिच्छेद ८७ | ५७५

३ अगस्त, १८८४ | परिच्छेद ८७ | ५७५

“विशुद्ध-चक्र पाँचवीं भूमि है। जब मन यहाँ आता है तब केवल ईश्वरी प्रसंग कहने और सुनने के लिए प्राण व्याकुल होते हैं। इस चक्र का स्थान कण्ठ है। वह पद्म सोलह दलों का है। जिसका मन इस चक्र पर आया है, उसके सामने अगर विषय की बातें - कामिनी और कांचन की बातें होती हैं, तो उसे बड़ा कष्ट होता है। उस तरह की बातें सुनकर वह वहाँ से उठ जाता है।

“इसके बाद छठी भूमि है आज्ञाचक्र। यह दो दलों का है। कुण्डलिनी जब यहाँ पहुँचती है, तब ईश्वरी रूप के दर्शन होते हैं। परन्तु फिर भी कुछ ओट रह जाती है, जैसे लालटेन के भीतर की बत्ती, जान तो पड़ता है कि हम बत्ती पकड़ सकते हैं, परन्तु शीशे के भीतर है - एक पर्दा है, इसलिए छुई नहीं जाती।

“इससे आगे चलकर सातवीं भूमि है सहस्रार पद्म। कुण्डलिनी के वहाँ जाने पर समाधि होती है। सहस्रार में सच्चिदानन्द शिव हैं, वे शक्ति के साथ मिलित हो जाते हैं। शिव और शक्ति का मेल।

“सहस्रार में मन के आने पर निर्बीज समाधि होती है। तब बाह्यज्ञान कुछ भी नहीं रह जाता। मुख में दूध डालने से दूध गिर जाता है। इस अवस्था में रहने पर इक्कीस दिन में मृत्यु हो जाती है। काले पानी में जाने पर जहाज फिर नहीं लौटता।

“ईश्वरकोटि और अवतारी पुरुष ही इस अवस्था से उतर सकते हैं। वे भक्ति और भक्त लेकर रहते हैं, इसीलिए उतर सकते हैं। ईश्वर उनके भीतर ‘विद्या का मैं’ - ‘भक्त का मैं’ केवल लोकशिक्षा के लिए रख देते हैं। उनकी अवस्था फिर ऐसी होती है कि छठी और सातवीं भूमि के भीतर ही वे चक्कर लगाया करते हैं।

“समाधि के बाद कोई कोई इच्छापूर्वक ‘विद्या का मैं’ रख छोड़ते हैं। उस ‘मैं’ में कोई मजबूत पकड़ नहीं है, वह ‘मैं’ की एक रेखा मात्र है।

“हनुमान ने साकार और निराकार के दर्शनों के बाद ‘दास मैं’ रखा था। नारद, सनक, सनन्द, सनातन, सनत्कुमार आदि लोगों ने भी ब्रह्म-साक्षात्कार के बाद ‘दास मैं’, ‘भक्त मैं’ रख छोड़ा था। ये सब जहाज की तरह हैं। स्वयं भी पार जाते हैं और साथ बहुत से आदमियों को भी पार ले जाते हैं।

“परमहंस निराकारवादी भी हैं और साकारवादी भी। निराकारवादी जैसे त्रैलंगस्वामी। इनके जैसे परमहंस केवल अपने ही हित के लिए चिन्ता करते हैं। यदि उन्हें स्वयं को इष्ट-प्राप्ति हो जाती है तो वे उसी से सन्तुष्ट हो जाते हैं।

“ब्रह्मज्ञान के बाद भी जो लोग साकारवादी होते हैं, वे लोकशिक्षा के लिए भक्ति लेकर रहते हैं। वे उस घड़े के सदृश हैं जो मुँह तक लबालब भरा है। उसमें से थोड़ा पानी किसी दूसरे बर्तन में भी डाला जा सकता है।

“इन लोगों ने जिन साधनाओं के द्वारा ईश्वर को प्राप्त किया है, उनकी बातें लोक-

५७६श्रीरामकृष्णवचनामृत३ अगस्त, १८८४

शिक्षा के लिए कही जाती हैं। इस तरह लोगों का कल्याण होता है। पानी पीने के लिए बड़ी मेहनत करके कुआँ खोदा गया, फावड़ा और कुदार लेकर। कुआँ खुद जाने पर कोई कोई कुदार आदि उसी में छोड़ देते हैं, क्योंकि फिर खोदने की कोई जरूरत नहीं रही। परन्तु कोई कोई कन्धे में डाले फिरते हैं, दूसरे के उपकार के लिए।

“कोई आम छिपाकर खाता है, फिर मुँह पोंछकर लोगों से मिलता है, और कोई कोई दूसरे को देकर खाते हैं, लोक-शिक्षा के लिए भी और लोगों को स्वाद चखाने के लिए भी। मैं चीनी खाना अधिक पसन्द करता हूँ, चीनी बन जाना नहीं।

“गोपियों को भी ब्रह्मज्ञान हुआ था, परन्तु वे ब्रह्मज्ञान नहीं चाहती थीं। वे ईश्वर का संभोग करना चाहती थीं, कोई वात्सल्यभाव से, कोई सख्यभाव से, कोई मधुरभाव से और कोई दासीभाव से।”

शिवपुर के भक्त गोपीयन्त्र बजाकर गा रहे हैं। पहले गाने में कह रहे हैं, “हम लोग पापी हैं, हमारा उद्धार करो।”

श्रीरामकृष्ण – (भक्तों से) – भय दिखाकर या भय खाकर ईश्वर की भक्ति करना प्रवर्तकों का भाव है। उन्हें पा जाने के गीत गाओ। आनन्द के गाने। (राखाल से) नवीन नियोगी के यहाँ उस दिन कैसा गाना हो रहा था? – ‘नाम की मदिरा पीकर मस्त हो जाओ।’

“केवल अशान्ति की बात भी नहीं सुहाती। ईश्वर को लेकर आनन्द करना, उन्हें लेकर मस्त हो रहना।”

शिवपुर के भक्त – क्या आपका एक-आध गाना न होगा?

श्रीरामकृष्ण – मैं क्या गाऊँगा? अच्छा, जब भाव आ जायगा तब मैं गाऊँगा।

कुछ देर बाद श्रीरामकृष्ण गाने लगे। गाते हुए आप ऊर्ध्वदृष्टि हैं। आपने कई गाने गाये। एक का भाव नीचे दिया जाता है।

“श्यामा माँ ने कैसी कल बनायी है। वह साढ़े तीन हाथ की कल के भीतर कितने ही रंग दिखा रही है। वह स्वयं कल के भीतर रहती है और डोर पकड़कर अपनी इच्छा के अनुसार उसे घुमाती रहती है – परन्तु कल कहती है, मैं खुद घूम रही हूँ। वह नहीं जानती कि घुमानेवाली कोई दूसरी ही है। जिसने कल का हाल मालूम कर लिया है, उसे फिर कल नहीं बनना पड़ता। किसी किसी कल की भक्ति की डोर से तो श्यामा माँ स्वयं आकर बँध जाती है।”

(२)

समाधि में श्रीरामकृष्ण। प्रेमतत्त्व

यह गाना गाते हुए श्रीरामकृष्ण समाधिमग्न हो गये। भक्तगण स्तब्ध भाव से

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३ अगस्त, १८८४ | परिच्छेद ८७ | ५७७

निरीक्षण कर रहे हैं। कुछ देर बाद कुछ प्राकृत दशा के आने पर श्रीरामकृष्ण माता के साथ वार्तालाप करने लगे।

“माँ, ऊपर से (सहस्रार से) यहाँ उतर आओ! — क्यों जलाती हो! — चुपचाप बैठो।

“माँ, जिसके जो संस्कार हैं, वे तो होकर ही रहेंगे। — मैं और इससे क्या कहूँ? विवेक-वैराग्य के हुए बिना कुछ होता नहीं।

“वैराग्य कितने ही तरह के हैं। एक ऐसा है जिसे मर्कटवैराग्य कहते हैं, वह वैराग्य संसार की ज्वाला से जलकर होता है, वह अधिक दिन नहीं टिकता। और सच्चा वैराग्य भी है। एक व्यक्ति के पास सब कुछ है, किसी वस्तु का अभाव नहीं, फिर भी उसे सब कुछ मिथ्या जान पड़ता है।

“वैराग्य एकाएक नहीं होता। समय के आये बिना नहीं होता। परन्तु एक बात है, वैराग्य के सम्बन्ध में सुन लेना चाहिए। जब समय आयेगा, तब इसकी याद होगी कि हाँ, कभी सुना था।

“एक बात और है। इन सब बातों को सुनते सुनते विषय की इच्छा थोड़ी थोड़ी करके घटती जाती है। शराब के नशे को घटाने के लिए थोड़ा थोड़ा चावल का पानी पिया जाता है। इस तरह धीरे-धीरे नशा घटता रहता है।

“ज्ञानलाभ करने के अधिकारी बहुत ही कम हैं। गीता में कहा है — हजारों आदमियों में कहीं एक उनके जानने की इच्छा करता है। और ऐसी इच्छा करनेवाले हजारो में से कहीं एक ही उन्हें जान पाता है।”

तान्त्रिक भक्त — 'मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चित् यतति सिद्धये' आदि।

श्रीरामकृष्ण — संसार की आसक्ति जितनी ही घटती जायगी, ज्ञान भी उतना ही बढ़ता जायगा। आसक्ति अर्थात कामिनी और कांचन की आसक्ति।

“प्रेम सभी को नहीं होता। गौरांग को हुआ था। जीवों को भाव हो सकता है। बस ईश्वरकोटि को — जैसे अवतारों को — प्रेम होता है। प्रेम के होने पर संसार तो मिथ्या जान पड़ेगा ही, किन्तु इतने प्यार की वस्तु जो यह शरीर है, यह भी भूल जायगा।

“पारसियों के ग्रन्थ में लिखा है, चमड़े के भीतर मांस है, मांस के भीतर हड्डियाँ, हड्डियों के भीतर मज्जा, इसके बाद और भी न जाने क्या क्या; और सब के भीतर प्रेम!

“प्रेम से मनुष्य कोमल हो जाता है। प्रेम से कृष्ण त्रिभंग हो गये हैं।

“प्रेम के होने पर सच्चिदानन्द को बाँधनेवाली रस्सी मिल जाती है। उसे पकड़कर खींचने ही से हुआ। जब बुलाओगे तभी पाओगे।

“भक्ति के पकने पर भाव होता है। भाव के पकने पर सच्चिदानन्द को सोचकर वह निर्वाक् रह जाता है। जीवों के लिए बस यहीं तक है। और फिर भाव के पकने पर महाभाव या प्रेम होता है। जैसे कच्चा आम और पका हुआ आम।

५७८श्रीरामकृष्णवचनामृत३ अगस्त, १८८४

“शुद्धा भक्ति ही एकमात्र सार वस्तु है और सब मिथ्या है।

“नारद के स्तुति करने पर श्रीरामचन्द्र ने कहा, तुम वरदान लो। नारद ने शुद्धा भक्ति माँगी और कहा, हे राम, अब ऐसा करो जिससे तुम्हारी भुवनमोहिनी माया से मुग्ध न हो जाऊँ। राम ने कहा, यह तो जैसे हुआ, दूसरा वर माँगो।

“नारद ने कहा, और कुछ न चाहिए, केवल भक्ति की प्रार्थना है।

“यह भक्ति भी कैसे हो? पहले साधुओं का संग करना चाहिए। सत्संग करने पर ईश्वरी बातों पर श्रद्धा होती है। श्रद्धा के बाद निष्ठा है, तब ईश्वर की बातों को छोड़ और कुछ सुनने की इच्छा नहीं होती। उन्हीं के काम करने को जी चाहता है।

“निष्ठा के बाद भक्ति है, इसके बाद भाव, फिर महाभाव और वस्तुलाभ।

“महाभाव और प्रेम अवतारों को होता है। संसारी जीवों का ज्ञान, भक्तों का ज्ञान और अवतार-पुरुषों का ज्ञान बराबर नहीं। संसारी जीवों का ज्ञान जैसे दीपक का उजाला है। उससे घर के भीतर ही प्रकाश होता है और वहीं की चीजें देखी जा सकती हैं। उस ज्ञान से खाना-पीना, घर-गृहस्थी का काम सम्हालना, शरीर की रक्षा, सन्तान-पालन, बस, यही सब होता है।

“भक्त का ज्ञान जैसे चाँदनी; भीतर भी दिखायी पड़ता है और बाहर भी; परन्तु बहुत दूर की चीज या बहुत छोटी चीज नहीं दिखायी देती। अवतार आदि का ज्ञान मानो सूर्य का प्रकाश है। भीतर-बाहर छोटी-बड़ी वस्तु, सभी दिखायी देती हैं।

“यह सच है कि संसारी जीवों का मन गंदले पानी की तरह बना हुआ है। परन्तु फिटकरी छोड़ने पर वह साफ हो सकता है। विवेक और वैराग्य उनके लिए फिटकरी है।”

अब श्रीरामकृष्ण शिवपुर के भक्तों से बातचीत कर रहे हैं।

श्रीरामकृष्ण – आप लोगों को कुछ पूछना हो तो पूछिये।

भक्त – जी! सब तो सुन रहे हैं।

श्रीरामकृष्ण – सुन रखना अच्छा है, परन्तु समय के बिना हुए होता नहीं।

“जब ज्वर बहुत रहता है, तब कुनैन देने से क्या होगा? फीवर-मिक्सचर देकर दस्त कराने पर जब बुखार कुछ उतर जाता है, तब कुनैन दी जा सकती है।

“और किसी किसी का बुखार ऐसे भी अच्छा हो जाता है। कुनैन नहीं देनी पड़ती।

“लड़के ने सोते समय अपनी माँ से कहा था, माँ, जब मुझे टट्टी की हाजत हो तब जगा देना। उसकी माँ ने कहा, बेटा, टट्टी की हाजत तुम्हें स्वयं उठा देगी।

“कोई कोई यहाँ आता है, देखता हूँ, वह किसी भक्त के साथ नाव पर चढ़कर आता है, परन्तु ईश्वर की बातें उसे नहीं सुहातीं। वह सदा अपने मित्र को कोंचता रहता है, कि कब उठे। जब उसका मित्र किसी तरह न उठा तब उसने कहा, अच्छा तो तुम यहाँ बैठो, मैं तब तक चलकर नाव पर बैठता हूँ।

३ अगस्त, १८८४ | परिच्छेद ८७ | ५७९

३ अगस्त, १८८४परिच्छेद ८७५७९

“जिन्हें पहली ही बार आदमी का चोला मिला है, उन्हें भोग की आवश्यकता है। कुछ काम जब तक किये हुए नहीं होते तब तक चेतना नहीं आती।”

श्रीरामकृष्ण झाऊतल्ले की ओर जायेंगे। गोल बरामदे में मास्टर से कह रहे हैं –

श्रीरामकृष्ण – (सहास्य) – अच्छा, यह मेरी कैसी अवस्था है?

मास्टर – (सहास्य) – जी, बाहर से देखने में तो आपकी सहज अवस्था है, परन्तु भीतर बड़ी गम्भीर है – आपकी अवस्था समझना बड़ा कठिन है।

श्रीरामकृष्ण – (सहास्य) – हाँ, जैसे पक्की फर्श; लोग ऊपर तो देखते हैं, परन्तु भीतर क्या है, यह नहीं जानते।

चाँदनीवाले घाट में बलराम आदि कुछ भक्त कलकत्ता जाने के लिए नाव पर चढ़ रहे हैं। दिन का तीसरा प्रहर है, चार बजे होंगे। गंगा में भाटा है, उस पर दक्षिणवाली हवा बह रही है। गंगा का वक्षस्थल तरंगों से शोभित हो रहा है।

बलराम की नौका बागबाजार की ओर जा रही है। मास्टर बड़ी देर से खड़े हुए देख रहे हैं।

नाव जब दृष्टि से ओझल हो गयी, तब वे श्रीरामकृष्ण के पास लौट आये।

श्रीरामकृष्ण पश्चिमवाले बरामदे से उतर रहे हैं। झाऊतल्ला जायेंगे। उत्तर-पश्चिम के कोने में बड़े ही सुहावने मेघ उमड़े हुए हैं। श्रीरामकृष्ण कह रहे हैं – क्या वर्षा होगी? जरा छाता तो ले आओ। मास्टर छाता ले आये। लाटू भी साथ हैं।

श्रीरामकृष्ण पंचवटी में आये। लाटू से कह रहे हैं – तू दुबला क्यों हुआ जा रहा है?

लाटू – कुछ खाया नहीं जाता।

श्रीरामकृष्ण – क्या बस यही कारण है? मौसम बड़ा खराब है – और शायद तू अधिक ध्यान करता है –

(मास्टर से) “यह भार तुम पर है – बाबूराम से कहना राखाल के चले जाने पर दो-एक दिन के लिए आकर रह जाया करे, नहीं तो मेरे मन में बड़ी अशान्ति रहेगी।”

मास्टर – जी हाँ, मैं कह दूँगा।

सरल होने पर ही ईश्वर मिलते हैं। श्रीरामकृष्ण पूछ रहे हैं, बाबूराम सरल है न?

श्रीरामकृष्ण झाऊतल्ले से दक्षिण ओर आ रहे हैं। मास्टर और लाटू पंचवटी के नीचे उत्तर दिशा की ओर मुँह किये खड़े हैं।

श्रीरामकृष्ण के पीछे नये नये बादलों की छाया गंगा के विशाल वक्ष पर पड़ रही है, अपूर्व शोभा है! गंगाजल काला सा दिख रहा है।

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५८० श्रीरामकृष्णवचनामृत ३ अगस्त, १८८४

(३)

श्रीरामकृष्ण तथा विरोधी शास्त्रों का समन्वय

श्रीरामकृष्ण अपने कमरे में आकर बैठे। बलराम आम ले आये थे। श्रीरामकृष्ण श्रीयुत राम चैटर्जी से कह रहे हैं, अपने लड़के के लिए कुछ आम लेते जाओ। कमरे में श्रीयुत नवाई चैतन्य बैठे हैं। ये लाल रंग की धोती पहनकर आये हैं।

उत्तरवाले लम्बे बरामदे में श्रीरामकृष्ण हाजरा से वार्तालाप कर रहे हैं। ब्रह्मचारी ने श्रीरामकृष्ण को हरताल भस्म दिया है। वही बात हो रही है।

श्रीरामकृष्ण – ब्रह्मचारी की दवा मुझ पर खूब असर करती है। आदमी सच्चा है।

हाजरा – परन्तु बेचारा संसार में पड़ गया – क्या करे! कोन्नगर से नवाई चैतन्य आये हुए हैं। परन्तु संसारी होकर लाल धोती पहनना!

श्रीरामकृष्ण – क्या कहूँ! मैं देखता हूँ, ये सब मनुष्य-रूप ईश्वर ने स्वयं धारण किये हैं, इसी कारण किसी को कुछ कह नहीं सकता।

श्रीरामकृष्ण फिर कमरे के भीतर आये। हाजरा से नरेन्द्र की बात कह रहे हैं।

हाजरा – नरेन्द्र फिर मुकदमे में पड़ गया है।

श्रीरामकृष्ण – शक्ति नहीं मानता। देह धारण करके शक्ति को मानना चाहिए।

हाजरा – नरेन्द्र कहता है, मैं मानूँगा तो फिर सभी लोग मानने लगेंगे, इसीलिए मैं नहीं मान सकता।

श्रीरामकृष्ण – इतना बढ़ना अच्छा नहीं। अब तो शक्ति के ही इलाके में आया है। जज साहब भी जब गवाही देते हैं, तब उन्हें गवाहियों के कटघरे पर उठकर खड़ा होना पड़ता है।

श्रीरामकृष्ण मास्टर से कह रहे हैं – “क्या तुमसे नरेन्द्र की भेंट नहीं हुई?”

मास्टर – जी नहीं, इधर नहीं हुई।

श्रीरामकृष्ण – एक बार मिलना और गाड़ी पर बिठाकर ले आना। (हाजरा से) अच्छा यहाँ उसका क्या सम्बन्ध है?

हाजरा – आपसे उसे सहायता मिलेगी।

श्रीरामकृष्ण – और भवनाथ? शुभ संस्कार के हुए बिना यहाँ कभी इतना आ सकता है?

“अच्छा, हरीश और लाटू सदा ही ध्यान किया करते हैं, यह कैसा?”

हाजरा – हाँ, ठीक तो है, सदा ध्यान करना कैसा? यहाँ रहकर आपकी सेवा करे, तो बात दूसरी है।

श्रीरामकृष्ण – शायद तुम ठीक कहते हो। लेकिन कोई बात नहीं। कोई उनकी

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३ अगस्त, १८८४ | परिच्छेद ८७ | ५८१

३ अगस्त, १८८४परिच्छेद ८७५८१

जगह दूसरा आ जायगा।

हाजरा कमरे से चले गये। अभी सन्ध्या होने में देर है। श्रीरामकृष्ण कमरे में बैठे हुए माता के साथ एकान्त में बातचीत कर रहे हैं।

श्रीरामकृष्ण – (मणि से) – अच्छा, भाव की अवस्था में मैं जो कुछ कहता हूँ, क्या इससे लोग आकर्षित होते हैं?

मणि – जी हाँ, खूब होते हैं।

श्रीरामकृष्ण – आदमी क्या सोचते हैं? भाववाली अवस्था देखने पर क्या कुछ समझ में आता है?

मणि – जान पड़ता है, एक ही आधार में ज्ञान, प्रेम, वैराग्य और सहज अवस्था विराजमान हैं। भीतर कितनी उथलपुथल मच गयी है, फिर भी बाहर से सहज भाव दीख पड़ता है। यह अवस्था बहुतेरे नहीं समझ सकते। परन्तु कुछ लोग उसी पर आकृष्ट होते हैं।

श्रीरामकृष्ण – घोषपाड़ा के मत में ईश्वर को सहज कहते हैं। और कहते हैं, सहज हुए बिना सहज को कोई पहचान नहीं सकता।

(मणि से) “अच्छा मुझमें अभिमान है?”

मणि – जी हाँ, कुछ है शरीर की रक्षा और भक्ति तथा भक्तों के लिए – ज्ञानोपदेश के लिए। यह भी तो आपने प्रार्थना करके रखा है।

श्रीरामकृष्ण – मैंने नहीं रखा, उन्हीने रख छोड़ा है। अच्छा भावावेश के समय क्या होता है?

मणि – आपने उस समय कहा, मन के छठी भूमि पर जाने से ईश्वरी रूप के दर्शन होते हैं। फिर जब आप बातचीत करते हैं, तब मन पाँचवी भूमि पर उतर आता है।

श्रीरामकृष्ण – वे ही सब कर रहे हैं। मैं कुछ नहीं जानता।

मणि – जी हाँ, इसीलिए तो इतना आकर्षण है।

“देखिये, शास्त्रों में दो तरह से कहा है। एक पुराण के मत में श्रीकृष्ण चिदात्मा हैं और श्रीराधा चित्शक्ति। एक दूसरे पुराण में श्रीकृष्ण को ही काली और आद्याशक्ति कहा है।”

श्रीरामकृष्ण – देवी पुराण के मत से काली ने ही कृष्ण का स्वरूप धारण किया है।

“तो इससे क्या हुआ? वे अनन्त हैं और उनके मार्ग भी अनन्त हैं।”

मणि – अब मैं समझा, आप जैसा कहते हैं, छत पर चढ़ना ही इष्ट है, चाहे जिस तरह चढ़ सको – जीने से या बाँस लगाकर अथवा रस्सी पकड़कर।

श्रीरामकृष्ण – यह जिसने समझा है, उस पर ईश्वर की दया है। ईश्वर की कृपा हुए

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५८२ श्रीरामकृष्णवचनामृत ३ अगस्त, १८८४

बिना कभी संशय दूर नहीं होता।

“बात यह है कि किसी तरह उन पर भक्ति होनी चाहिए, प्यार होना चाहिए। अनेक खबरों से काम क्या है? एक रास्ते से चलते चलते अगर उन पर प्यार हो जाय तो काम बन गया। प्यार के होने से ही उन्हें आदमी पाता है। इसके बाद अगर जरूरत होगी तो वे समझा देंगे – सब रास्तों की खबर बतला देंगे। ईश्वर पर प्यार होने ही से काम हुआ – तरह तरह के विचारों की क्या आवश्यकता है? आम खाने के लिए आये हो आम खाओ, कितनी डालियाँ हैं, कितने पत्ते हैं, इन सब के हिसाब से क्या मतलब? हनुमान का भाव चाहिए – ‘मैं वार, तिथि, नक्षत्र, यह सब कुछ नहीं जानता, मैं तो बस श्रीरामचन्द्रजी का स्मरण किया करता हूँ।’ ”

मणि – इस समय ऐसी इच्छा होती है कि कर्म बिलकुल घट जायँ और ईश्वर की तरफ मन लगाऊँ।

श्रीरामकृष्ण – अहा! यह होगा क्यों नहीं?

“परन्तु ज्ञानी निर्लिप्त होकर संसार में रह सकता है।”

मणि – जी हाँ, परन्तु निर्लिप्त होकर रहने के लिए विशेष शक्ति चाहिए।

श्रीरामकृष्ण – हाँ, यह ठीक है। परन्तु तुमने संसार चाहा होगा।

“श्रीकृष्ण राधिका के हृदय में ही थे, परन्तु राधा की इच्छा उनके साथ मनुष्य-रूप में लीला करने की हुई। इसीलिए वृन्दावन में इतनी लीलाएँ हुई। अब प्रार्थना करो जिससे तुम्हारे सांसारिक कर्म सब घट जायँ।

“और मन से त्याग होने से तुम्हें अन्तिम ध्येय की प्राप्ति हो जायगी।”

मणि – यह तो उनके लिए है जो बाहर का त्याग नहीं कर सकते। ऊँचे दर्जेवालों के लिए तो एक साथ ही सब त्याग होना चाहिए – बाहर का भी और भीतर का भी।

श्रीरामकृष्ण चुप हैं। फिर बातचीत करने लगे।

श्रीरामकृष्ण – तुमने वैराग्य की बातें उस समय कैसी सुनीं?

मणि – जी हाँ, खूब।

श्रीरामकृष्ण – वैराग्य का अर्थ क्या है, जरा कहो तो – सुनूँ।

मणि – वैराग्य का अर्थ सिर्फ संसार से विराग नहीं, ईश्वर पर अनुराग और संसार से विराग है।

श्रीरामकृष्ण – हाँ, ठीक कहा।

“संसार में धन की जरूरत है अवश्य, परन्तु उसके लिए अधिक चिन्ता न करना। यदृच्छालाभ – यही अच्छा है। संचय के लिए इतना न सोचा करो। जो लोग उन्हें मन और अपने प्राण सौंप देते हैं, जो उनके भक्त हैं – शरणागत हैं, वे लोग यह सब इतना नहीं सोचते। जहाँ आय है वहाँ व्यय भी है। एक ओर से रुपया आता है, दूसरी ओर से

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३ अगस्त, १८८४ | परिच्छेद ८७ | ५८३

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३ अगस्त, १८८४ | परिच्छेद ८७ | ५८३

खर्च हो जाता है। इसका नाम है यदृच्छालाभ।”

श्रीरामकृष्ण हरिपद की बातें कहने लगे – “उस दिन हरिपद आया था।”

मणि – (सहास्य) – हरिपद कथक है। प्रह्लाद-चरित्र, श्रीकृष्ण की जन्मकथा, यह सब सस्वर बहुत अच्छा कहता है।

श्रीरामकृष्ण – अच्छा, उस दिन मैंने उसकी आँखें देखीं, जान पड़ता था, गुस्से में है। मैंने पूछा, क्या तू ध्यान ज्यादा करता है? वह सिर झुकाये बैठा रहा। तब मैंने कहा, अरे! इतना अच्छा नहीं।

शाम हो गयी है। श्रीरामकृष्ण माता का नाम ले रहे हैं – उनका स्मरण कर रहे हैं।

कुछ देर बाद श्रीठाकुर-मन्दिर में आरती होने लगी। आज सावन की शुक्ला द्वादशी है। झूलनोत्सव का दूसरा दिन है। आकाश में चन्द्रोदय हो गया। मन्दिर, मन्दिर का आँगन, बगीचा, सारे स्थान हँस रहे हैं। धीरे धीरे रात के आठ बजे। कमरे में श्रीरामकृष्ण बैठे हैं। राखाल और मास्टर भी हैं।

श्रीरामकृष्ण – (मास्टर से) – बाबूराम कहता है – ‘संसार! अरे बापरे!’

मास्टर – यह सुनी बात है। बाबूराम अभी संसार का हाल क्या जाने!

श्रीरामकृष्ण – हाँ यह ठीक है। निरंजन को देखा है तुमने? – बड़ा सरल है।

मास्टर – जी हाँ। उसके चेहरे में ही आकर्षण है – खींच लेता है। आँखों का भाव कैसा है!

श्रीरामकृष्ण – आँखों का ही भाव नहीं, सब कुछ। उसके विवाह की बात घरवालों ने की थी, उसने कहा, क्यों मुझे डुबाते हो? (हँसते हुए) क्यों जी, लोग कहते हैं, दिन भर मेहनत करके शाम को बीबी के पास जाकर बैठने से बड़ा आनन्द आता है – यह कैसा है?

मास्टर – जी हाँ, जो लोग उसी भाव में हैं, उन्हें आनन्द आता क्यों नहीं? (राखाल से) परीक्षा हो रही है – Leading Question.

श्रीरामकृष्ण – (सहास्य) – माँ कहती है, मैं अपने बच्चे का विवाह कर दूँ, तो जी ठिकाने हो। धूप में झुलसकर छाँह में थोड़ी देर बैठेगा, तो कुछ ठण्डा तो हो ही लेगा!

मास्टर – जी हाँ। माँ-बाप भी तरह-तरह के होते हैं। ज्ञानी पिता कभी अपने बच्चों को विवाह के बन्धन में नहीं डालता और अगर वह ऐसा करता है तब तो क्या कहना चाहिए उसके ज्ञान को! (श्रीरामकृष्ण हँसते हैं।)

श्रीयुत अधर सेन कलकत्ते से आये हैं। श्रीरामकृष्ण को भूमिष्ठ होकर प्रणाम किया, जरा देर बैठकर काली के दर्शन करने चले गये।

मास्टर ने भी काली के दर्शन किये। फिर चाँदनी-घाट पर आकर गंगा के तट पर बैठे। गंगा का पानी ज्योत्स्ना में चमक रहा है। ज्वार का आना अभी शुरू हुआ है। मास्टर


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५८४ श्रीरामकृष्णवचनामृत ३ अगस्त, १८८४

एकान्त में बैठे हुए श्रीरामकृष्ण के अद्भुत चरित्र की चिन्ता कर रहे हैं। उनकी अद्भुत समाधि, क्षण क्षण में भाव, प्रेम और आनन्द, विश्रामविहीन ईश्वरी कथाप्रसंग, भक्तों पर अकृत्रिम स्नेह, बालक का-सा स्वभाव, यही सब सोच रहे हैं।

अधर और मास्टर श्रीरामकृष्ण के कमरे में गये। अधर चिटगाँव में दफ्तर के काम से गये थे। वे चन्द्रनाथ तीर्थ और सीताकुण्ड की बातें कह रहे हैं।

अधर – सीताकुण्ड के पानी में अग्नि की शिखाएँ उठती रहती हैं, जीभ के आकार की।

श्रीरामकृष्ण – यह किस तरह होता है?

अधर – पानी में फास्फोरस (Phosphorus) है।

श्रीयुत राम चैटर्जी भी कमरे में आये। श्रीरामकृष्ण अधर से उनकी तारीफ कर रहे हैं। और कह रहे हैं – “राम है, इसीलिए हम लोगों को अधिक चिन्ता नहीं करनी पड़ती। हरीश, लाटू इन्हें वह बुला बुलाकर खिलाया करता है। वे सब कहीं एकान्त में ध्यान करते रहते हैं और राम उन्हें बुला लाता है।”


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परिच्छेद ८८

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परिच्छेद ८८

कीर्तनानन्द में श्रीरामकृष्ण

(१)

अधर के घर में नरेन्द्रादि भक्तों के संग में

श्रीरामकृष्ण अधर के घर के बैठकखाने में भक्तों के साथ बैठे हुए हैं। बैठकखाना दुमंजले पर है। श्रीयुत नरेन्द्र, दोनों भाई मुखर्जी, भवनाथ, मास्टर, चुनीलाल, हाजरा आदि भक्त श्रीरामकृष्ण के पास बैठे हैं। दिन के तीन बजे होंगे। आज शनिवार है, ६ सितम्बर १८८४।

भक्तगण प्रणाम कर रहे हैं। मास्टर के प्रणाम करने के बाद श्रीरामकृष्ण अधर से पूछते हैं, क्या निताई डाक्टर न आयेगा?

श्रीयुत नरेन्द्र गायेंगे, इसके लिए बन्दोबस्त हो रहा है। तानपूरा बाँधते समय तार टूट गया। श्रीरामकृष्ण ने कहा, अरे यह क्या किया! तब नरेन्द्र अपना तबला ठीक करने लगे। श्रीरामकृष्ण कहते हैं - अरे तुम तबला ठोंक रहे हो पर मुझे तो ऐसा मालूम होता है मानो कोई मेरे गाल पर चपत मार रहा हो।

कीर्तन के गीत के सम्बन्ध में बातचीत हो रही है। नरेन्द्र कह रहे हैं - कीर्तन में ताल-सम आदि कुछ नहीं हैं, इसीलिए इतना Popular (जनप्रिय) है और लोग उसे पसन्द करते हैं।

श्रीरामकृष्ण – यह तू क्या कह रहा है? गाना करुणापूर्ण होता है, इसीलिए लोग इतना चाहते हैं।

नरेन्द्र गा रहे हैं -
(१) हे दीनशरण! तुम्हारा नाम बड़ा ही मधुर है।
(२) क्या मेरे दिन व्यर्थ ही चले जायेंगे? हे नाथ! सदा ही आशा-पथ पर मेरी दृष्टि लगी हुई है।

श्रीरामकृष्ण – (हाजरा से, सहास्य) – इसने पहली भेंट के समय यही गाना गाया था।

नरेन्द्र ने और भी दो-एक गाने गाये। फिर वैष्णवचरण ने एक गाना गाया।

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५८६श्रीरामकृष्णवचनामृत६ सितम्बर, १८८४

श्रीरामकृष्ण – 'ऐ वीणा! तू ईश्वर का नाम ले,' यह गाना एक बार गाओ।

वैष्णवचरण गा रहे हैं –

“ऐ वीणा, तू ईश्वर का नाम ले। उनके श्रीचरणों को छोड़ तुझे परम-तत्त्व की प्राप्ति न होगी। उनके नाम से पाप और ताप दूर हो जाते हैं। तू 'हरे कृष्ण' 'हरे कृष्ण' कहती जा। उनकी कृपा होगी तो मैं भवसागर में फिर न रह जाऊँगा, न उसके लिए मुझे कोई चिन्ता होगी। वीणा, एक ही बार उनका नाम ले; नाम के सिवा और दूसरा अवलम्ब नहीं है। गोविन्ददास कहते हैं, दिन चले जा रहे हैं, सावधान रहना जिससे कि मैं अपार समुद्र में कहीं बह न जाऊँ।”

गाना सुनते ही श्रीरामकृष्ण को भावावेश हो गया है। वे उसी आवेश में कहते हैं – 'अहा! हरे कृष्ण कहो – हरे कृष्ण कहो।'

यह कहते हुए श्रीरामकृष्ण समाधिमग्न हो गये। भक्तगण चारों ओर बैठे हुए श्रीरामकृष्ण को देख रहे हैं। कमरा आदमियों से भर गया है।

कीर्तनिया उस गाने को समाप्त कर एक दूसरा गाना गाने लगा – 'श्रीगौरांग सुन्दर नव नटवर तप्तकांचनकाय' वह गा रहा था, श्रीरामकृष्ण उठकर खड़े हो गये और नृत्य करने लगे। फिर बैठकर बाँहें फैलाकर स्वयं उसके पद गा रहे हैं।

गाते ही गाते श्रीरामकृष्ण को फिर भावावेश हो गया। सिर झुकाये हुए समाधिलीन हो गये। सामने तकिया पड़ा हुआ है, उस पर सिर झुककर ढुलक गया है। कीर्तनिया फिर गा रहे हैं –

“हरिनाम के सिवा संसार में और कौनसा धन है? मधाई, मधुर स्वर से तू उनके नाम का कीर्तन कर। हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे, हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे।”

कीर्तनिया ने एक गाना और गाया। श्रीरामकृष्ण प्रेमोन्मत्त हो गये, नृत्य कर रहे हैं। वह अपूर्व नृत्य देखकर नरेन्द्र आदि भक्तगण स्थिर न रह सके। सब श्रीरामकृष्ण के साथ नृत्य करने लगे।

नृत्य करते हुए श्रीरामकृष्ण को समाधि हो रही है। उस समय उनकी अन्तर्दशा हो गयी। जबान बन्द हो गयी। सर्वांग स्थिर हो गया। भक्तगण उन्हें घेरकर नाच रहे हैं। प्रेमोन्मत्त की तरह।

कुछ प्राकृत दशा में आते ही श्रीरामकृष्ण ने गाना शुरू किया।

आज अंधर का बैठकखाना श्रीवास का आँगन हो रहा है। हरिनाम की ध्वनि सुनकर आम सड़क पर कितने ही आदमी एकत्र हो गये हैं।

भक्तों के साथ बड़ी देर तक नृत्य करके श्रीरामकृष्ण ने आसन ग्रहण किया। भावावेश अब भी है। उसी अवस्था में नरेन्द्र से कह रहे हैं, “वही गाना गा, 'माँ, मुझे

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