सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
६९६ सूर्य-सिद्धान्त
भूमि या पट्टी है जिस पर परिलेख बनाना है और बिन्दु रवि का स्थान है (देखो
चित्र ११७) । यदि ६-८ श्लोकों के अनुसार जाने हुए भुज का मान र भ के समान
चित्र ११७
हो और इसकी दिशा दक्षिण हो तो र बिन्दु से दक्षिण ओर, और उत्तर हो तो
उत्तर की ओर र भ के समान एक रेखा खींचो जिसका भ सिरा भुज-अग्र कहा
जा सकता है । इस भुज-अग्र से पच्छि की ओर कोटि के समान अर्थात् १२ अंगुल
के समान एक रेखा च तक खींचो । इस च बिन्दु को कोटि-अग्र कहते हैं और इसी
को तात्कालिक चन्द्रबिम्ब का केन्द्र समझना चाहिए । र च रेखा को कर्ण कहते हैं
जिसकी चर्चा आठवें श्लोक में की गयी है । च को केन्द्र मानकर तात्कालिक चन्द्रबिम्ब
के व्यासार्ध च पर एक वृत्त खींचो जो परिलेख में चन्द्रबिम्ब सूचित करता है ।
कर्ण-रेखा को इतना बढ़ाओ कि वह चन्द्रबिम्ब के दूसरी ओर प तक पहुँच जाय ।
च बिन्दु से जाती हुई एक लम्ब रेखा प पू पर खींचो जो चन्द्रबिम्ब के उ, द
बिन्दुओं पर पहुँचे । इन उ, पू, द, प बिन्दुओं को चन्द्रबिम्ब की क्रमानुसार उत्तर,
दक्षिण और पच्छिम दिशाएँ समझो । नौवें श्लोक के अनुसार आये हुए
चन्द्रमा के शुक्ल भाग का जो परिमाण हो पू से उतनी ही दूरी पर च की ओर
एक बिन्दु छ रखो । उ छ द बिन्दुओं से होता हुआ जो धनु खींचा जायगा वही
चन्द्रमा के शुक्ल भाग का भीतरी किनारा है और उस दिन चन्द्रमा के शुक्ल भाग
की वही आकृति होगी जो उ छ द और उ पू द धनुओं के बीच में है। उ छ द
धनु खींचने के लिए यह रीति बतलायी गयी है कि उ को केन्द्र मानकर छ पर
धनु खींचो और छ को केन्द्र मानकर उ पर धनु खींचो; इन दोनों धनुओं के योग-
विन्दुओं को मिलाने वाली रेखा खींचो। इसी प्रकार द और छ विन्दुओं पर भी धनु
खींच कर उनके योग-विन्दुओं को मिलाने वाली रेखा खींचो। यह दोनों रेखाएँ
जहाँ चन्द्रबिम्ब के भीतर काटें उसको केन्द्र मान कर छ विन्दु पर जो धनु खींचा
जायगा वह उ छ द विन्दुओं को स्पर्श करेगा और वही चन्द्रमा के शुक्ल भाग का
भीतरी किनारा होगा।
उ, छ, द, विन्दुओं पर जानेवाले वृत्त का केन्द्र जानने की रीति रेखा-
गणित की रीति से मिलती जुलती है क्योंकि धनुओं के योग विन्दुओं को मिलाने-
वाली रेखाएँ उ छ और द छ रेखाओं की समविभाजक लम्ब रेखाएँ हैं जिनका
सम्पात् विन्दु उ छ द वृत्त का केन्द्र है। चित्र में क विन्दु इसी रीति से स्थिर किया
गया है। अब क को केन्द्र मानकर क छ त्रिज्या से उ छ द धनु खींचा गया और
उ छ द पू क्षेत्र की आकृति जानी गयी जो चन्द्रमा के शुक्ल भाग की आकृति है
जिसमें उ द चन्द्रमा के शृङ्ग हैं।
यह जानने के लिए कि कौन शृङ्ग उन्नत अर्थात् उठा हुआ है चन्द्र-विम्ब
की दिशाओं में दूसरी कल्पना करने को १४वें श्लोक में कहा गया है परन्तु मेरी
समझ में इसकी आवश्यकता नहीं है। कोटि-अग्र च से भुजा भ र के समानान्तर
एक रेखा खींचो। जो शृङ्ग इस रेखा के ऊपर होता है वही उन्नत कहा जाता है।
दिये हुए चित्र में उत्तर शृङ्ग उन्नत है।
चित्र से स्पष्ट है कि यदि भुज की दिशा दक्षिण हो तो चन्द्रमा का उत्तर
शृङ्ग उन्नत होगा और भुज की दिशा उत्तर हो तो दक्षिण शृङ्ग उन्नत होगा।
परन्तु यदि भुजा शून्य हो अर्थात् न उत्तर हो, न दक्षिण, तो चन्द्रमा का कोई शृङ्ग
उन्नत न होगा वरन् सम होगा।
यह बतलाया जा चुका है कि शुक्ल भाग की वृद्धि जानने की जो रीति दी
गयी है वह स्थूल है और उ छ द धनु भी वृत्त की परिधि का अंश नहीं है वरन्
दीर्घवृत्त की परिधि का अंश है। इसलिए परिलेख की यह रीति स्थूल है परन्तु काम
चलाने के लिए पर्याप्त है।
कृष्ण पक्ष के लिए नियम में जो संशोधन किया गया है उससे चन्द्रमा के
असित भाग का ज्ञान होता है। परन्तु मेरी समझ में यदि सूर्योदयकालिक सूर्य की
१७
६६८ सूर्य-सिद्धान्त
राशि से चन्द्रमा की राशि घटाकर शुक्ल भाग की गणना की जाय और परिक्षेख
बनाया जाय तो अधिक अच्छा है ।
अब संक्षेप में यह बतला देना उचित होगा कि शुद्ध गणित की रीति से
शृङ्गोन्नति की गणना कैसे की जाती है ।
शृङ्गोन्नति की गणना की नवीन रीति—
सूर्य और चन्द्र बिम्बों के केन्द्रों से जानेवाले महावृत्त से चन्द्रशृङ्गों को
मिलानेवाली रेखा समकोण बनाती है । खमध्य और चन्द्र बिम्ब के केन्द्र से जाने
वाला महावृत्त अर्थात् दृङ्मण्डल पहले महावृत्त से जो कोण बनाता है वही
शृङ्गोन्नति के कोण के समान होता है इसलिए शृङ्गोन्नति जानने के लिए इसी
कोण के जानने की आवश्यकता होती है जो गोलीय त्रिकोणमिति के एक सूत्र के
अनुसार जिसकी चर्चा त्रिप्रश्नाधिकार में कई स्थानों पर की गयी है सहज ही
चित्र ११८
उ ख द == यामोत्तर वृत्त
ख = खमध्य
ज = देखने वाले का स्थान
उ ज द = उत्तर-दक्षिण रेखा
उ प द = पच्छिम क्षितिज
च = पच्छिम गोल में चन्द्रमा का स्थान
र = अस्त हुए सूर्य का स्थान
ख च = चन्द्रमा का नतांश
ख र = सूर्य का नतांश
च र = सूर्य और चन्द्रमा के बीच का अन्तर
∠ र ख च = सूर्य और चन्द्रमा के दिगंशों का अन्तर
शृङ्गोन्नत्यधिकार ६६६
मालूम हो सकता है। यदि सूर्य और चन्द्रमा के विषुवांश और क्रान्ति मालूम हों तो
विषुवांश से विषुव काल और नतकाल जाने जा सकते हैं और नतकाल, क्रान्ति तथा
अक्षांश से पृष्ठ २६१ के सूत्र (१) के नतांश और इससे पृष्ठ २७३ में दिये हुए सूत्र
से दिगंश जाने जा सकते हैं। चित्र ११८ से विदित होता है कि इनके आधार पर
शृङ्गोन्नति कैसे जानी-जा सकती है।
चित्र ११८
च = चन्द्र बिम्ब का केन्द्र
उ च = चन्द्र केन्द्र का ऊर्ध्व वृत्त (दृङ्मण्डल)
र च = सूर्य की दिशा
क ख ग घ = चन्द्रमा का शुक्ल भाग
∠ उ च र = शृङ्गोन्नति का कोण = ∠ क च प
७०० सूर्य-सिद्धान्त
गोलीय त्रिकोणमिति के सूत्र के अनुसार,
कोज्या च र = कोज्या ख र × कोज्या ख च + ज्या ख र × ज्या ख च
× कोज्या ∠ र ख च
इस सूत्र से जब च र आ जाय तब,
कोज्या ∠ ख च र = कोज्या ख र - कोज्या ख च × कोज्या च र / ज्या ख च × ज्या च र
कोण ख च र को १८० अंश से घटाने पर जो कोण आवेगा वही शृङ्गोन्नति
वा कोण होगा क्योंकि यह ∠ छ च र के समान है। यदि चन्द्रमा से सूर्य उत्तर
होगा तो उत्तर शृङ्ग उन्नत होगा और दक्षिण होगा तो दक्षिण शृङ्ग उन्नत रहेगा।
यदि सूर्य और चन्द्रमा दोनों के दिगंश एक होंगे तो शृङ्ग सम होगा। इतना जान
लेने पर चन्द्रमा के शृङ्गोन्नति का परिलेख इस प्रकार खींचना चाहिए जैसा चित्र
११६ से प्रकट होता है।
यह स्पष्ट है कि सूर्य-सिद्धान्त के अनुसार सूर्य और चन्द्रमा को स्पष्ट करने
से शृङ्गोन्नति की गणना ठीक नहीं हो सकती क्योंकि सूर्य-सिद्धान्त के ध्रुवाङ्कों में
कुछ स्थूलता आ गयी है। इसलिए उचित है कि ग्रहों के ध्रुवाङ्क शुद्ध वेध द्वारा
फिर से स्थिर किये जायँ।
इस प्रकार शृङ्गोन्नत्यधिकार नामक दसवें अध्याय का विज्ञान-भाष्य समाप्त हुआ।
एकादश अध्याय
पाताधिकार
(संक्षिप्त वर्णन)
[श्लोक १-२—वैधृति और व्यतीपात पातों की परिभाषा। श्लोक ३-५—
दोनों पातों का स्वरूप और प्रभाव । श्लोक ६—सूर्य और चन्द्रमा की क्रान्ति कब
निश्चय करे । श्लोक ७-८—यह जानना कि पातकाल बीत चुका है अथवा होने-
वाला है। श्लोक ६-११—सूर्य और चन्द्रमा की क्रान्तियाँ कब समान होती हैं ।
श्लोक १२-१३—स्पष्ट क्रान्ति से शुद्ध पातकाल जानना । श्लोक १४-१५—पातकाल
का आरम्भ, मध्य और अंत कब होता है। श्लोक १६-१८—पातकाल में. क्या
करना चाहिये । श्लोक १६—पात दो बार कब होते हैं, और अभाव कब होता
है । श्लोक २०—पंचांग संबंधी व्यतीपात योग जानना । श्लोक २१—भसंधि और
गंडांत काल की परिभाषा । श्लोक २२—पात और गंडांतकाल किस लिए निषिद्ध
हैं श्लोक २३—उपसंहार ।]
इस अधिकार में गणितज्योतिष के साथ साथ फलितज्योतिष का भी
समावेश है। यही इसकी विशेषता है। दूसरी विशेषता यह है कि इसके बाद जो
तीन अध्याय आवेंगे उनका नाम 'अधिकार' नहीं है वरन् 'अध्याय' है। इस अधिकार
में जिन पातों की चर्चा है उनको महापात भी कहते हैं।
वैधृति और व्यतीपात की परिभाषा—
एकायनगतौ स्यातां सूर्याचन्द्रमसौ यदा ।
तद्यु तौ मण्डशे क्रान्त्योः तुल्यत्वे वैधृताभिधः ॥
विपरीतायनगतौ चन्द्रार्कौ क्रान्तिलिप्तिकाः ।
समस्तदा व्यतीपातो भगणार्धे तयोर्युतौः ।।
अनुवाद—(१) जब सूर्य और चन्द्रमा एक अयन में होते हैं और जब इनके
भोगांशों का योग १२ राशि के समान होता है तब दोनों की क्रान्तियाँ समान होने
से वैधृति नामक पात होता है। (२) जब सूर्य और चन्द्रमा भिन्न अयनों में होते हैं
और जब इनके भोगांशों का योग ६ राशि के समान होता है तब इनकी क्रान्तियाँ
समान होने से व्यतीपात नामक पात होता है।
७०२ सूर्य-सिद्धान्त
विज्ञान-भाष्य — जब सूर्य और चन्द्रमा की क्रान्तियां समान होती हैं तभी
वैधृति और व्यतीपात नामक पात होते हैं अर्थात् जब विषुवद्वृत्त से सूर्य और चन्द्रमा
की दूरियाँ समान होती हैं तभी वैधृत और व्यतीपात होते हैं। परन्तु सूर्य और
चन्द्रमा की क्रान्तियां समान होते हुए भी दोनों उत्तर हो सकती हैं या दोनों दक्षिण;
अथवा एक उत्तर और दूसरी दक्षिण । अब यह देखना है कि यह दशा कब होती
है। जब सूर्य विषुवद्वृत्त पर होता है तब इसकी क्रान्ति शून्य होती है। यह घटना
वर्ष में दो बार होती है—सायन मेष और सायन तुला संक्रान्ति के दिन । सायन
मेष से सायन कर्क तक सूर्य की उत्तर क्रान्ति शून्य से बढ़ते-बढ़ते आजकल २३ अंश
२७ कला तक हो जाती है। सायन कर्क से घटने लगती है और सायन तुला तक घट
कर शून्य फिर हो जाती है। सायन तुला से क्रान्ति दक्षिण हो कर सायन मकर
तक बढ़कर २३ अंश २७ कला हो जाती है। सायन मकर से सायन मेष तक घटते-
घटते शून्य हो जाती है। जब सूर्य सायन मकर से आगे बढ़ता है तब यह उदय या
अस्त होने के समय क्षितिज पर उत्तर की ओर खसकता हुआ देख पड़ता
और यह गति सायन कर्क तक देखी जाती है इसीलिए सायन मकर संक्रान्ति से
सायन कर्क संक्रान्ति तक के समय को उत्तरायण कहते हैं। परन्तु सायन कर्क संक्रान्ति
के उपरान्त सूर्य क्षितिज पर दक्षिण की ओर खसकता हुआ देख पड़ता है इसीलिए
सायन कर्क संक्रान्ति से सायन मकर संक्रान्ति तक के समय को दक्षिणायन कहते हैं।
चन्द्रमा भी सूर्य की तरह अपने लगभग एक मास के चक्कर में आधे मास तक
उत्तरायण और आधे मास तक दक्षिणायन रहता है परन्तु इसकी कक्षा क्रान्ति-
वृत्त से कुछ भिन्न होने के कारण तथा इसकी कक्षा और क्रान्तिवृत्त के सम्पात स्थानों
राहु और केतु से स्वयम् वक्री होने के कारण इसके उत्तरायण और दक्षिणायन का
समय स्थिर करना कुछ कठिन है। परन्तु मोटे हिसाब से यह कहने में कोई हर्ज
नहीं है कि जब चन्द्रमा सायन मकर राशि के निकट आता है तब यह उत्तरायण
होता है और जब सायन कर्क राशि के निकट आता है तब दक्षिणायन होता है क्योंकि
चन्द्र-कक्षा और क्रान्तिवृत्त के बीच का कोण अर्थात् चन्द्रमा का परमशर केवल ५° ६′
के लगभग है। दिये हुए चित्र १२० से यह बात स्पष्ट हो जाती है ।
मान लो दिया हुआ दीर्घवृत्त क्रान्तिवृत्त है और इसके व और श बिन्दु क्रम से
वसन्तऔर शरद सम्पात हैं जहाँ विषुवद्वृत्त क्रान्तिवृत्त से मिलता है। सरलता के
लिए विषुवद् वृत्त नहीं दिखलाया गया है। यदि मान लिया जाय कि चन्द्रमा की कक्षा
क्रान्तिवृत्त ही है तो यह स्पष्ट है कि जब सूर्य और चन्द्रमा व और श बिन्दुओं से
समान दूरी पर होंगे तभी दोनों की क्रान्तियां समान होंगी। अब देखना है कि
पाताधिकार ७०३
[चित्र १२०]
चन्द्रमा के एक फेरे के यह घटना कितनी बार हो सकती है। मान लो र सूर्य का
स्थान वसंत-सम्पात व और दक्षिणायन बिन्दु द के बीच में किसी जगह है। जब
चन्द्रमा भी र पर रहेगा अर्थात् अमावस्या के दिन, तब दोनों की क्रान्तियाँ एक
ही रहेंगी। जब चन्द्रमा च, चा और चि पर रहेगा तब भी दोनों की क्रान्ति समान
रहेंगी यदि वर = चश = शचा = चिव । परन्तु जब चन्द्रमा चा बिन्दु पर रहेगा
तब पूर्णिमा होगी। सूर्य-सिद्धान्त के अनुसार पातकालिक क्रान्तिसाम्य के लिए
अमावस्या और पूर्णिमा के दिन का विचार नहीं किया जाता इसलिए जब चन्द्रमा
च और चि पर रहेगा तभी क्रान्ति साम्य का योग आवेगा ।
पहले श्लोक में बतलाया गया है कि जब सूर्य और चन्द्रमा के भोगांशों का
योग ३६० अंश हो तब वैधृति नामक पात होता है। यह दशा तभी हो सकती है
जब सूर्य र, च, चा या चि पर हो तो चन्द्रमा क्रम से चि, चा, च या र पर हो
क्योंकि तभी वसंत सम्पात व से सूर्य और चन्द्रमा के भोगांशों का योग ३६० अंश हो
सकता है। चित्र से स्पष्ट है कि र और चि स्थान उत्तरायण बिन्दु उ, वसंत सम्पात
व और दक्षिणायन बिन्दु द के बीच में है इसलिए र और चि दोनों उत्तरायण हैं।
इसी प्रकार च, चा दोनों दक्षिणायन हैं। इसीलिए पहले श्लोक में बतलाया गया है
कि जब सूर्य और चन्द्रमा एक अयन में हों और दोनों के (सायन) भोगांशों का योग
३६० अंश हो तभी वैधृति पात होता है। इसके प्रतिकूल जब दोनों भिन्न अयन में
हों और भोगांशों का योग १८० अंश हो तब व्यतीपात होता है। चित्र में यदि सूर्य
और चन्द्रमा र, च पर हों तो दोनों के भोगांशों का योग १८०° होगा और चा,
चि पर हों तो भी दोनों के भोगांशों का योग ३६० + १८० अंश अथवा १८० अंश
होगा । परन्तु र और च अथवा च और चि स्थान भिन्न अयनों में हैं, इसलिए
व्यतीतपात नामक क्रान्तिसाम्य योग तभी होता है जब सूर्य और चन्द्रमा भिन्न अयनों
७०४ सूर्य-सिद्धान्त
में हों और सूर्य वसंत-सम्पात से जितना आगे या पीछे हो उतना ही चन्द्रमा शरद
सम्पात से पीछे या आगे हो ।
दोनों पातों का स्वरूप और स्वभाव—
तुल्यांशुजालसंपर्कातयोस्तु प्रवाहातात् १ ।
तद्दृक्क्रोधभवो वह्निः लोकाभावाय जायते ॥३॥
विनाशयति पातोऽस्य लोकानामसकृद्यतः ।
व्यतीपातः प्रसिद्धोऽत्र संज्ञाभेदेन वैधृतः ॥४॥
स कृष्णो दारुणवपुः लोहिताक्षो महोदरः ।
सर्वानिष्टकरो रौद्रः भूयोभूयः प्रजायते ॥५॥
अनुवाद—(३) क्रान्ति-साम्य-कालिक सूर्य और चन्द्रमा की समान किरणों
के मिलने से और उनकी दृष्टि रूपी क्रोध से उत्पन्न अग्नि प्रवह वायु से प्रज्वलित
होकर संसार के लिए अशुभ फल उत्पन्न करती है। (४) जब सूर्य और चन्द्रमा की
क्रान्तियाँ समान होती हैं तब यह पात संसार को बारंबार नाश करता है। इसे
व्यतीपात और वैधृति कहते हैं । (५) यह पात रंग में काला, कठिन शरीरवाला, लाल
नेत्रोंवाला, बड़ा पेटवाला, सबका अशुभ करने वाला और भयंकर है और बार-बार
उत्पन्न होता है ।
विज्ञान भाष्य—इन तीन श्लोकों में दोनों पातों का बड़ा भयंकर चित्र
खींचा गया है परन्तु तो भी काशी के अच्छे-अच्छे पंचांगों में भी इनकी चर्चा बहुत कम
रहती है। बम्बई प्रान्त के भी पंचांगों में इनकी चर्चा नहीं देख पड़ती । हाँ, गुजराती
के 'प्रत्यक्ष पंचांग' में इसका विचार अवश्य रहता है । इससे जान पड़ता है कि सूर्य-
सिद्धान्त के इन महापातों का विचार फलित ज्योतिषी लोग बहुत कम करते हैं।
व्यतीपात और वैधृति नाम के योग भी होते हैं । पहले की क्रम संख्या १७
और दूसरे की २७ है । व्यतीपात नामक योग का सम्बन्ध व्यतीपात नामक पात से
कुछ भी नहीं है परन्तु वैधृत योग का सम्बन्ध इस नाम के पात से उस समय अवश्य
रहा होगा जब वसंत-संपात अश्विनी नक्षत्र के आदि स्थान में था ।
सूर्य और चन्द्रमा की क्रान्ति कब निश्चय करनी चाहिए—
भास्करेन्द्वोर्भवक्रान्तश्चक्रार्धावधिसंस्थयोः ।
दृक्तुल्यसाधितांशादि युक्तयोः स्त्रावपक्रमौ ।।६।।
१. वेंकटेश्वर प्रेस वाले और बंगला संस्करण में प्रवाहतः पाठ है ।
पाताधिकार ७०५
अनुवाद—(६) त्रिप्रश्नाधिकार में बतलायी हुई रीति से छाया सूर्य का
भोगांश जानकर इससे स्पष्टाधिकार की रीति से जाने हुए स्पष्ट सूर्य को घटाकर
अयनांश निकाले और यह अयनांश स्पष्ट सूर्य और चन्द्रमा के भोगांशों में जोड़े ।
अयनांश-संस्कृत सूर्य और चन्द्रमा अर्थात् सायन सूर्य और सायन चन्द्रमा के भोगांशों
का जोड़ जब १२ राशि या ६ राशि हो तब इन दोनों की स्पष्ट क्रान्ति निश्चय
करनी चाहिए ।
विज्ञान-भाष्य—यह जानने के लिए कि सूर्य और चन्द्रमा की क्रान्ति कब
समान होती है, सायन सूर्य और सायन चन्द्रमा के भोगांश जानने की आवश्यकता है
इसीलिए स्पष्ट सूर्य और चन्द्रमा में अयनांश जोड़ने की विधि बतलायी गयी है ।
इस रीति से क्रान्ति-साम्य का जो समय आवेगा वह स्थूल होगा क्योंकि चन्द्रमा की
कक्षा क्रान्तिवृत्त से भिन्न है । इस विषय की और बातें चित्र १२० के साथ ही बतला
दी गयी हैं ।
यह जानना कि पात-काल बीत गया है या आनेवाला है—
अथौजपदगस्येन्दोः क्रान्तिविक्षेपसंस्कृता ।
यदि स्यादधिका भानोः क्रान्तेः पातो गतस्तदा ॥७॥
ऊना चेत्स्यात्तदा भावी वामं युग्मपदस्य च ।
पदान्यत्वं विधोः क्रान्तिर्विक्षेपाच्चेद्विशुध्यति ॥८॥
अनुवाद—(७) सूर्य और चन्द्रमा की स्पष्ट क्रान्ति जानने के बाद यह
देखना चाहिये कि चन्द्रमा वसंत-संपात से विषम पद में है या सम पद में । यदि
चन्द्रमा विषम पद में हो और इसकी विक्षेप-संस्कृत क्रान्ति अर्थात् स्पष्ट क्रान्ति सूर्य
की स्पष्ट क्रान्ति से अधिक हो तो समझना चाहिये कि पातकाल बीत गया है, (८)
और यदि कम हो तो समझना चाहिये कि पातकाल आनेवाला है । परन्तु यदि चन्द्रमा
समपद में हो तो इसका उलटा समझना चाहिये अर्थात् समपद में चन्द्रमा की स्पष्ट
क्रान्ति सूर्य की क्रान्ति से अधिक हो तो समझना चाहिए कि पातकाल आनेवाला है
और कम हो तो समझना चाहिए कि पातकाल बीत गया है । यदि चन्द्रमा के विक्षेप
या शर से इसकी क्रान्ति कम हो और घटाना पड़े तो ऊपर के नियम में विषमपद के
बारे में जो कुछ कहा गया है वह समपद के बारे में समझना चाहिये और समपद के
बारे में जो कहा गया है वह विषमपद के बारे में समझना चाहिए ।
विज्ञान-भाष्य—ओज और युग्मपद अथवा विषम और समपद की चर्चा
स्पष्टाधिकार पृष्ठ १२६-२७ में अच्छी तरह हुई है । यहाँ वसंत-संपात बिन्दु से
सायन कर्क बिन्दु या दक्षिणायन बिन्दु तक प्रथम पद, दक्षिणायन बिन्दु से शरद सम्पात
७०६ सूर्य-सिद्धान्त
बिन्दु तक द्वितीय पद, शरद सम्पात से सायन मकर या उत्तरायण बिन्दु तक तृतीय
पद और उत्तरायण बिन्दु से बसंत सम्पात तक चतुर्थ पद है । प्रथम और तृतीय पदों
को विषम या ओज पद और द्वितीय तथा चतुर्थ पद को सम पद या युग्म पद कहा
गया है ।
चित्र १२० से स्पष्ट होता है कि जब चन्द्रमा विषमपद अर्थात् व द या श उ
में कहीं रहेगा तब व्यतीपात या वैधृति के लिए सूर्य को क्रमानुसार द श या उ व में
होना चाहिए । यह भी स्पष्ट है कि सूर्य या चन्द्रमा की क्रान्ति विषम पद में बढ़ती
रहती है और समपद में घटती रहती है । इसलिए जब चन्द्रमा विषम पद में और सूर्य
सम पद में होता है तब चन्द्रमा की क्रान्ति बढ़ती रहती है और सूर्य की घटती रहती
है । इसलिए छठें श्लोक से पातकाल का जो स्थूल समय निकाला जाता है उस समय
यदि चन्द्रमा की क्रान्ति सूर्य की क्रान्ति से अधिक है तो चन्द्रमा की क्रान्ति और
बढ़ती जायगी और सूर्य की क्रान्ति घटती जायगी । इसलिए दोनों की क्रान्ति इस
समय से पहले ही समान हो चुकी है और पातकाल बीत गया है। इसके विरुद्ध यदि
चन्द्रमा की क्रान्ति सूर्य की क्रान्ति से कम हो तो चन्द्रमा की क्रान्ति बढ़ती रहने के
कारण वह समय आने वाला है जब दोनों की क्रान्ति समान होगी और तभी ातकाल
होगा । इसी तरह जब चन्द्रमा समपदों में होगा तब सूर्य विषम पदों में होगा । ऐसी
दशा में चन्द्रमा की क्रान्ति घटती और सूर्य की बढ़ती रहेगी । इसलिए यदि चन्द्र-
क्रान्ति अधिक है तो घटते-घटते सूर्य की क्रान्ति के बराबर हो जायगी और पातकाल
श्लोक ६ से निकाले हुए समय के बाद आवेगा । परन्तु यदि चन्द्रक्रान्ति कम हो तो
पातकाल बीता हुआ समझना चाहिए ।
आठवें श्लोक के उत्तरार्ध में यह बतलाया गया है कि यदि विक्षेप से मध्यक्रान्ति
घटाकर स्पष्ट क्रान्ति आती हो तो ऊपर बतलाए हुए नियम से भिन्न नियम काम में
लाना होगा क्योंकि यदि मध्य क्रान्ति और शर की दिशा भिन्न है तो सीधे ही यह नहीं
बतलाया जा सकता कि चन्द्रक्रान्ति बढ़ रही है या घट रही है। ऐसी दशा में १
दिन आगे और पीछे की क्रान्ति जानने से ही काम चलेगा ।
असकृत्कर्म से तुल्य क्रान्तियों का स्थान निश्चय करना—
क्रान्तिज्ये त्रिज्ययाऽभ्यस्ते परक्रान्तिज्ययोद्धृते ।
तच्चापान्तरमधं वा योज्यं भाविनि शीतगौ ॥६॥
शोध्यं चन्द्राद् गते पाते सूर्यस्य गन्तिताडितम् ।
चन्द्रभुक्त्या हृतं भानो लिप्तादि शशिवत्फलम् ॥१०॥
तद्वच्छशाङ्क पातस्य फलं देयं विपर्ययात् ।
कर्मेतदसकृत्कुर्यात् यावत्क्रान्ती समे तयोः ॥११॥
पाताधिकार ७०७
अनुवाद—(६) सूर्य और चन्द्रमा की क्रान्तिज्या को त्रिज्या से गुणा करके
परम क्रान्तिज्या से भाग देना चाहिये । लब्धियों के धनु बनाकर उनका अन्तर
निकाले । इस अन्तर को या इसके आधे को चन्द्रमा के भोगांश में जोड़ दे यदि पात-
काल आने वाला हो और (१०) यदि पातकाल बीत चुका हो तो उस अन्तर या
इसके उसके आधे को चन्द्रमा के भोगांश से घटा दे । इस अन्तर या आधे
को जिसको जोड़ा या घटाया जाय उस दिन की सूर्य की गति से गुणा करके
उस दिन की चन्द्रगति से भाग देना चाहिए । जो लब्धि आवे उसे सूर्य के भोगांश में
उसी तरह जोड़ना या घटाना चाहिए जैसे चन्द्रमा में जोड़ा या घटाया है। (११)
इसी प्रकार उस अन्तर या उसके आधे को चन्द्रपात अर्थात् राहु की गति से गुणा
करके चन्द्र गति से भाग देकर जो लब्धि आवे उसे राहु के भोगांश में उलटे क्रम से
संस्कार दे अर्थात् यदि चन्द्रमा में अन्तर जोड़ा हो तो राहु में घटाना चाहिए और
घटाया है तो जोड़ना चाहिए। इन संस्कारों के बाद सूर्य और चन्द्रमा की स्पष्ट
क्रान्ति फिर जाननी चाहिए। यदि दोनों समान न हों तो फिर ६-१० श्लोकों में
बतलायी गयी क्रिया करनी चाहिए। यह असकृत्कर्म (Method of approxim-
ation) तब तक करना चाहिए जब तक सूर्य और चन्द्रमा की क्रान्ति समान न हो
जायें ।
विज्ञान-भाष्य—नौवें श्लोक के पूर्वार्ध में जो नियम बतलाया गया है वह
स्पष्टाधिकार के २८वें श्लोक में बतलाये गये नियम का विलोम है (पृष्ठ १२२-
२३) । यहाँ क्रान्तिज्या, त्रिज्या और परम क्रान्तिज्या से भोगांश जानने की रीति
है। इस रीति से जो भोगांश आवेगा वह ६० अंश से कम होगा । इससे अधिक
जानने की आवश्यकता भी नहीं है क्योंकि हमको तो यही देखना है कि वसंत या
शरद सम्पात से सूर्य और चन्द्रमा कितनी दूर हैं। स्पष्ट क्रान्ति भिन्न होने से यह
भोगांश भी भिन्न होंगे परन्तु एक दूसरे के निकट अवश्य होंगे। इन भोगांशों का जो
अन्तर होगा उतना ही चन्द्रमा पातकाल से आगे या पीछे होगा। यदि पातकाल
आनेवाला है तो यह अन्तर चन्द्रमा के भोगांश में जोड़ना चाहिए क्योंकि उस समय
तक चन्द्रमा इतना ही आगे बढ़ जायगा और यदि पातकाल बीत चुका है तो यह
अन्तर चन्द्रमा के भोगांश से घटाना चाहिए क्योंकि बीते हुए पातकाल के समय
चन्द्रमा इतना ही पीछे रहेगा। परन्तु सूर्य भी इतने समय में कुछ न कुछ स्थान
छोड़ेगा । इसलिए पातकाल का सूर्य का स्थान भी स्पष्ट करना आवश्यक
है। इसके लिए अनुपात से काम लेना चाहिए कि जब चन्द्रमा की दैनिक
गति इतनी है तो सूर्य की दैनिक इतनी है इसलिए जब चन्द्रमा की
गति उस अन्तर के समान होगी तब सूर्य की गति क्या होगी अर्थात् चन्द्र
७०८ सूर्य-सिद्धान्त
दैनिक गति : चन्द्र अन्तर :: सूर्य की दैनिक : सूर्य अन्तर । इस प्रकार जो अन्तर आवे
उसे सूर्य के भोगांश में जोड़ना चाहिए यदि चन्द्रमा का अन्तर जोड़ा गया हो, नहीं
तो घटाना चाहिए। इस प्रकार पातकाल में सूर्य और चन्द्रमा के स्पष्ट भोगांश
मालूम हो जायेंगे । इससे फिर सूर्य और चंद्रमा की स्पष्ट क्रान्ति जाननी चाहिये ।
परन्तु चन्द्रमा की स्पष्ट क्रांति जानने के लिए चंद्रमा का शर जानना आवश्यक है
जो चंद्रमा के पात राहु या केतु पर अवलम्बित है और इतनी देर में चंद्रपात भी
वक्रीगति से अपना स्थान बदल देगा इसलिए उसी प्रकार अनुपात से राहु का भी
परिवर्तन जान लेना चाहिये । परन्तु इस परिवर्तन का संस्कार राहु में विलोम रीति
से करना चाहिए अर्थात् जब चंद्रमा और सूर्य में जोड़ना हो तो इसमें घटाना चाहिये
और घटाना हो तो जोड़ना चाहिये क्योंकि राहु की गति उलटी होती है । जब चंद्र-
क्रांति में चंद्र-शर का संस्कार करके स्पष्ट क्रान्ति आ जाय तब देख पड़ेगा कि सूर्य
की क्रान्ति अब भी कुछ भिन्न है । इन क्रान्तियों से ६-११ श्लोकों में बतलायी गयी
रीति को फिर दुहरावे और तब तक दुहरावे जब तक दोनों की क्रान्ति समान न हो
जाय । इसी को असकृत्कर्म कहते हैं जिसकी चर्चा पीछे कई जगह हो चुकी है ।
६-११ श्लोकों में बतलाये गये नियम की इतनी व्याख्या पर्याप्त है । यहाँ मुझे
केवल इतना ही कहना है कि यह सब झंझट करने पर भी पातकाल का ठीक-ठीक
ज्ञान होना असंभव है क्योंकि चंद्रमा की गति इतनी सरल नहीं है जैसी सूर्य-सिद्धान्त
में बतलायी गयी है । इसका शुद्ध स्थान जानने के लिए कई संस्कार करने पड़ते हैं
जिनकी चर्चा स्पष्टाधिकार में अच्छी तरह की गयी है । इसलिए यदि पातकाल का
ठीक-ठीक निर्णय करना हो तो आधुनिक वेधों से ही काम लेना चाहिए जिसके लिए
आधुनिक सिद्धान्त के आधार पर सारणी आदि तैयार करनी चाहिये ।
नौवें श्लोक के उत्तरार्ध में बतलाया गया है कि सूर्य और चंद्रमा के भोगांशों
के अंतर या इस अन्तर के आधे को जोड़ना या घटाना चाहिए । टीकाकारों ने लिखा
है कि आधा तब लेना चाहिए जब अन्तर अधिक हो । इससे गणना में तो कोई भेद
नहीं पड़ता, केवल कुछ सरलता आ जाती है क्योंकि उद्देश्य तो यह है कि असकृत्कर्म
से वह समय जाना जाय जिस समय दोनों की क्रान्ति समान होती है ।
पातकाल अर्धरात्रि से पहले या पीछे-
क्रान्त्योस्समत्वे पातोऽथ प्रक्षिप्तांशोनिते विधौ ।
हीनेऽर्धरात्रिकाद्यातो भावि तात्कालिकेऽधिके ॥१२॥
अनुवाद-सूर्य और चन्द्रमा की स्पष्ट क्रान्तियाँ जब समान होती हैं तभी
पातकाल होता है। नौवें श्लोक के अनुसार जाना हुआ पातकालिक स्पष्ट चन्द्रमा का
पाताधिकार ७०६
भोगांश स्पष्टाधिकार के अनुसार जाने हुए उस दिन के अर्धरात्रिकालिक स्पष्ट
चन्द्रमा के भोगांश से कम हो तो समझना चाहिए कि पातकाल अर्धरात्रि से पहले हो
चुका है और अधिक हो तो समझना चाहिए कि पातकाल अर्धरात्रि के बाद होगा ।
विज्ञान-भाष्य-चन्द्रमा का भोगांश सदैव बढ़ता रहता है इसलिए यदि
पातकालिक स्पष्ट चन्द्रमा का भोगांश अर्धरात्रिकालिक स्पष्ट चन्द्रमा के भोगांश से
कम हो तो निश्चय है कि पातकाल अर्धरात्रि से पहले हो चुका है और अधिक है तो
अर्धरात्रि के बाद होगा ।
पातकाल अर्धरात्रि से कितना पहले या पीछे है-
स्थिरीकृतार्धरात्रेन्द्वोर्द्वयोर्विवरलिप्तिकाः ।
षष्टिघ्नाश्चन्द्रभुक्त्याप्ताः पातकालस्य नाडिकाः ॥१३॥
अनुवाद-उपर्युक्त नियम से निश्चित किया हुआ पातकालिक चन्द्र-भोगांश
और उस दिन के अर्धरात्रिकालिक चन्द्रभोगांश के अंतर को कलाओं में लिखकर
साठ से गुणा करने और गुणनफल को अर्धरात्रिकालिक चन्द्रगति से भाग देने से जो
लब्धि आवेगी उतनी ही घड़ी पहले या पीछे पातकाल हुआ है या होगा ।
विज्ञान-भाष्य-पातकालिक चन्द्रमा और अर्धरात्रिकालिक चंद्रमा के
भोगांशों के अंतर से यह मालूम होगा कि पातकालिक चन्द्रमा अर्धरात्रिकालिक
चन्द्रमा से कितना पहले या पीछे था । फिर यह गणना करनी चाहिए कि अर्धरात्रि-
कालिक चन्द्रमा की दैनिक गति ६० घड़ी में होती है तो वह अंतर कितनी घड़ी में
हुआ होगा । इतना ही आगे या पीछे पातकाल होना चाहिए ।
यदि सूर्य और चन्द्र की गणना आधुनिक सिद्धान्त द्वारा बहुत सूक्ष्म की जाय
तो भी इस नियम से जो पातकाल आवेगा वह स्थूल होगा क्योंकि पातकालिक गणना
बहुत सूक्ष्म होती है और चन्द्रमा की दैनिक गति इतनी अधिक होती है कि यदि
अर्द्धरात्रिकालिक गति को पातकालिक समझ लिया जाय जैसा कि इस नियम में
समझा गया है तो सूक्ष्मता नहीं आ सकती क्योंकि यदि पातकाल और अर्द्धरात्रि
काल में बहुत अंतर है तो दोनों समय की चन्द्रगतियाँ समान नहीं होंगी इसलिए
मेरी समझ में यह अच्छा होगा कि इस नियम से जो पातकाल आवे उस समय से
दो घड़ी आगे और पीछे की चन्द्रगतियों से काम लिया जाय ।
पातकाल के आरम्भ और समाप्त होने का समय जानना-
रवीन्दोर्मानयोगार्धं षष्ट्या संगुण्य भाजयेत् ।
तयोर्भुक्त्यन्यरेणाप्तं स्थित्यर्धं नाडिकादिकम् ॥१४॥
७१० सूर्य-सिद्धान्त
पातकालस्फुटो मध्यः सोऽपि स्थित्यर्धर्वाजितः ।
तस्य संभवकालस्स्यात् संयुक्तस्तद्वान्तसंज्ञितः ॥१५॥
अनुवाद—(१४) सूर्य और चन्द्रबिम्बों के मानों को जोड़कर आधा करे
और इसको ६० से गुणा करके दोनों की गतियों के अन्तर से भाग दे दे तो लब्धि
स्थित्यर्ध घड़ी होती है । (१५) इसको स्पष्ट पातकाल से जो पात का मध्यकाल होता
है घटा देने से जो समय आता है उसी समय पातकाल का आरम्भ होता है और जोड़ने
से जो समय आता है उसी समय पातकाल का अन्त होता है ।
विज्ञान-भाष्य — स्थित्यर्ध की जो परिभाषा चन्द्रग्रहणाधिकार पृष्ठ ४६८-
७० में दी गयी है वही यहाँ भी समझनी चाहिए । पृष्ठ ४६६ में
६० × च फ / चा - रा सूत्र दिया गया है । यदि इसमें च फ की जगह सूर्य और चन्द्र-बिम्बों
के योग का आधा रख दिया जाय तो पातकाल का स्थित्यर्ध हो जायगा जिसे जानने
का नियम १४वें श्लोक में बतलाया गया है । १५वें श्लोक में स्थित्यर्ध से आरम्भ
और अन्तकाल उसी तरह जाना जाता है जिस तरह ग्रहण का स्पर्श और मोक्षकाल
जाना जाता है ।
इसका सार यह है कि जिस समय चन्द्रमा और सूर्य के बिम्बों के किनारों
की क्रान्ति समान होती है उस समय से पातकाल का आरम्भ होता है और
जिस समय दोनों बिम्बों के केन्द्रों की क्रान्ति समान होती है उस समय पात का मध्य-
काल होता है जिसके जानने की रीति १३ श्लोकों तक बतलायी गयी है और जिस
समय दोनों बिम्बों के दूसरे किनारों की क्रान्तियाँ भी समान हो जाती हैं उस समय
पातकाल का अन्त होता है ।
पातकाल का प्रभाव और उसके योग्य कर्म—
आद्यन्तकालयोर्मध्ये कालो ज्ञेयोऽतिदारुणः ।
प्रज्वलज्जलनाकारः सर्वकर्मसु गर्हितः ॥१६॥
एककाष्ठां गतं यावदर्कैन्दोर्मण्डलान्तरम् ।
संभवस्तावदेवास्य सर्वकर्मविनाशकृत् ॥१७॥
स्नानदानजपश्राद्धव्रतहोमादिकर्मसु ।
प्राप्यते सुमहच्छ्रेयः तत्कालज्ञानतस्तदा ॥१८॥
अनुवाद—(१६) पातकाल के आरंभ से अंत तक का समय बड़ा दारुण,
प्रज्वलित, और अग्नि स्वरूप होता है। यह सब शुभ कार्यों के लिए निन्दित है ।
(१७) जब तक सूर्य बिम्ब के किसी विन्दु की क्रान्ति चन्द्रबिम्ब के किसी विन्दु की
पाताधिकार ७११
क्रान्ति के समान होती है तब तक सब कर्मों का नाश करनेवाले इस पात की स्थिति
रहती है। (१८) इस काल में स्नान, दान, जप, श्राद्ध, व्रत, होम आदि कर्मों से
अत्यन्त पुण्य प्राप्त होता है और इस काल के ज्ञान से भी पुण्य होता है ।
विज्ञान-भाष्य -- जैसे पूर्णिमा, अमावस्या आदि कालों में स्नान, दान,
जप अदि काम अच्छे समझे जाते हैं वैसे ही पातकाल में भी यह कर्म अच्छे बतलाये
गये हैं और जिस प्रकार मुहूर्त-चिंतामणि में बतलाये गये बहुत से योगों में शुभ
कर्म करना वर्जित है उसी प्रकार यहाँ भी । परन्तु ज्योतिषी लोग यथार्थ में इन
महापातों का विचार कम करते हैं, वह शायद इसलिए कि इसकी गणना पुराने
सिद्धान्तों के आधार पर तो असम्भव ही है । इसीलिए पंचांगों में इनकी चर्चा नहीं
के बराबर रहती है। हिन्दू विश्वविद्यालय के विश्व-पंचांग में भी दो एक जगह
चर्चा करके छोड़ दिया जाता है यद्यपि इसके लेखकों को नाविक-पंचांग की सहायता
से पातकाल का जानना बड़ा सुगम होता है क्योंकि और बातों में तो ये नाविक
पंचांग से सहायता लेते ही हैं। १८वें श्लोक की अंतिम बात निस्संदेह बहुत सुन्दर
है। उसमें यह बतलाया गया है कि पातकाल के जानने से भी पुण्य होता है अर्थात्
पातकाल का शुद्ध-शुद्ध ज्ञान प्राप्त करना भी पुण्य कार्य है जो तभी संभव है जब
सूर्य, चन्द्रमा इत्यादि की गणना ठीक-ठीक दृक्तुल्यता से की जाय और ज्योतिष
सिद्धान्त का पठन-पाठन नवीन वैज्ञानिक रीति से किया जाय। केवल प्राचीन
सिद्धान्तों को ही सब कुछ समझना और उनमें देशकाल के अनुसार संशोधन न
करना तथा शुद्ध वैज्ञानिक रीति को निंदित समझना बुद्धिमानी नहीं है और न
प्राचीन ज्योतिषाचार्यों की पद्धति के ही अनुकूल है।
रवीन्द्वोः तुल्यता क्रान्त्योर्विषुवत्सन्निधौ यदा ।
द्विर्भवत्येव तदा पात: स्यादभावो विपर्ययात् ।।१६।।
अनुवाद - जब विषुवद् वृत्त के निकट अर्थात् वसंत संपात या शरद संपात
के पास सूर्य चन्द्रमा की क्रान्तियाँ समान होती हैं तब पात दो बार होते हैं। इसके
विपरीत दशा में अर्थात् सायन कर्क या सायन मकर बिन्दु के समीप पात का अभाव
होता है।
विज्ञान-भाष्य - जब सूर्य और चन्द्रमा वसंत या शरद सम्पात के पास
होते हैं तब इनकी क्रान्तियों की गति बहुत तीव्र होती है। इसलिए जब चन्द्रमा
विषुवत् वृत्त के दक्षिण होता है और सूर्य उत्तर तब दोनों की क्रान्तियाँ समान
होती हैं। इसके बाद जब चन्द्रमा शीघ्र गति से कारण उत्तर हो जाता है तब भी
इसकी क्रान्ति सूर्य की क्रान्ति के समान हो जाती है। इस प्रकार क्रान्ति-साम्य दो बार
एक ही दो दिन के बीच में हो सकता है। परन्तु जब सूर्य और चन्द्रमा दोनों
७१२ सूर्य-सिद्धान्त
विषुवद्वृत्त से उत्तर रहेंगे तब अमावस्या का समय होगा और ऐसी दशा में पात-
काल नहीं माना जाता जैसा कि पहले और दूसरे श्लोकों से सिद्ध होता है। इसलिए
जान पड़ता है कि केवल यह विशेषता बतलाने के लिए श्लोक १६ दिया गया है
कि क्रान्ति-साम्य दो बार हो सकता है, दो ही एक दिन के अन्तर पर ।
परन्तु यदि सूर्य सायन कर्क या सायन मकर विन्दुओं के समीप हो तो इसकी
क्रान्ति परम क्रान्ति के निकट रहती है। यदि इस समय चन्द्रमा की क्रान्ति शर की
दिशा भिन्न होने के कारण कम हो तो क्रान्ति साम्य नहीं हो सकता और न वैधृति
या व्यतीपात का ही संयोग घट सकता है।
तीसरे प्रकार का व्यतीपात जानने की रीति--
शशाङ्कार्कयुतेलिप्ता भभोगेन विभाजिताः ।
लब्धं सप्तदशान्तोऽन्यो व्यतीपातः तृतीयकः ॥२०॥
अनुवाद—सूर्य और चन्द्रमा के भोगांशों को जोड़कर कला बनावे और
इसको ८०० से भाग दे दे। यदि लब्धि १७ के अन्त में हो अर्थात् १७ के निकट हो
तो तीसरा व्यतीपात होता है।
विज्ञान भाष्य—स्पष्टाधिकार के श्लोक ६५ में विष्कम्भादि २७ योगों के
जानने की रीति दी हुई है। इनमें १७ वां योग व्यतीपात बतलाया गया है (देखो
पृष्ठ २१६ ) । इसी के जानने की रीति यहाँ भी दुहरायी गयी है। वह इसलिए,
जिससे मालूम हो जाय कि इस अधिकार में क्रान्ति-साम्य से उत्पन्न जिन महापातों
की चर्चा है उन्हीं के समकक्ष व्यतीपात नामक योग भी होता है। इसी तर्क से कहा
जा सकता है कि २७वें योग वैधृति को भी वैधृति नामक महापात के समान समझना
चाहिए ।
यहां एक बात ध्यान देने की है। व्यतीपात और वैधृति योगों की गणना
सूर्य और चन्द्रमा के निरयण भोगांशों से की जाती है परन्तु महापातों की गणना
सायन भोगांशों से की जाती है। इसलिए यहां यह प्रश्न उपस्थित होता है कि २०वें
श्लोक में जो नियम दिया गया है उसमें सायन भोगांशों का प्रयोग करना चाहिए या
निरयण । गूढ़ार्थ प्रकाशिका संस्कृत टीका में तो अयनांश संस्कृत भोगांश अर्थात् सायन
भोगांश से ही गणना करने को बतलाया गया है और इसी का अनुसरण पं० माधव
पुरोहित ओर पं० इन्द्रनारायण द्विवेदी ने किया है। परन्तु स्वामी विज्ञानानन्द ने
अपनी बंगला टीका में कोई चर्चा नहीं की है। मुझे जान पड़ता है कि यह व्यतीपात
विष्कम्भादि योगों का ही व्यतीपात है, उससे भिन्न नहीं है। इसलिए जिस प्रकार
इन योगों की गणना होती है उसी प्रकार इस श्लोक में बतलाये हुए व्यतीपात की
पाताधिकार ७१३
गणना करनी चाहिए अर्थात् निरयण भोगांशों से ही इसकी गणना होनी चाहिए तथा
गूढ़ार्थ प्रकाशिका के अयनांश-संस्कृत भोगांशों को न लेना चाहिए । सायन भोगांश लेने
में एक अड़चन और है । वह यह कि इससे जो व्यतीपात या वैधृति काल आवेगा
वह विष्कम्भादि योगों के व्यतीपात और वैधृति से भी भिन्न होगा । इस प्रकार एक
मास में चार-चार व्यतीपात और वैधृति कालों की कल्पना करनी पड़ेगी जो ग्रन्थकार
की तर्क-शैली से भी अनुचित जान पड़ती है ।
भसंधि और गंडान्त योग कब होता है—
सार्पेन्द्रपौष्णधिष्ण्यानामन्त्याः पादा भसन्धयः ।
तदग्रभेष्वद्यपदो गण्डान्तं नाम कीर्त्यते ॥२१॥
अनुवाद—आश्लेषा, ज्येष्ठा और रेवती नक्षत्रों के चौथे चरण नक्षत्र-सन्धि
हैं और इनके आगेवाले नक्षत्रों मघा, मूल, और अश्विनी के प्रथम चरण गंडांत
कहलाते हैं ।
विज्ञान-भाष्य—मुहूर्त-चिन्तामणि तथा अन्य मुहूर्त ग्रन्थों में इनकी चर्चा
विशेष प्रकार से है । नक्षत्र-संधि या गंडांत में जो संतान होती है उसके लिए साधा-
रणतः कहा जाता है कि मूल में हुई है । इसे अशुभ मानते हैं । बच्चा पैदा होने के
२७वें दिन जब वही गंडांत या भसंधि काल फिर आता है तब मूलशान्ति के लिए
विशेष प्रकार की पूजा की जाती है । यहाँ गंडांत की चर्चा करने का अर्थ यही जान
पड़ता है कि जो अशुभ फल महापातों का होता है यही गंडांत का भी होता है जैसा
कि अगले श्लोक से प्रकट है । यह भसंधियां चौथी, आठवीं, और बारहवीं राशियों
के अंतिम भाग हैं और गंडांत पांचवीं, नवीं और पहली राशियों के आरंभिक भाग हैं ।
व्यतीपातत्रयं घोरं गण्डान्तं त्रितयं तथा ।
एवं भसन्धित्रितयं सर्व कर्मसु वर्जयेत् ॥२२॥
अनुवाद—तीनों व्यतीपात, तीनों गंडांत और नक्षत्रसंधियां बहुत भयंकर
होती हैं इसलिए ये सब शुभकामों में वर्जित हैं अर्थात् जब ये हों तब कोई शुभ कर्म
नहीं करना चाहिये ।
विज्ञान-भाष्य—इस श्लोक में वैधृत व्यतीपात की चर्चा नहीं है परन्तु
तर्क शैली से और पहले के श्लोकों से जान पड़ता है कि वैधृति भी इसमें सम्मिलित
है । टीकाकारों ने ऐसा ही किया भी है ।
उपसंहार—
इत्येवं परमं पुण्यं ज्योतिषां चरितं हितं ।
रहस्यमिदमाख्यातं किमन्यच्छ्रोतुमिच्छसि ॥२३॥
१८
७१४ सूर्य-सिद्धान्त
अनुवाद—मैंने यह परम पवित्र अत्यन्त रहस्ययुक्त और हितकर ज्योति-
विज्ञान की कथा कही, अब और क्या सुनना चाहता है ?
विज्ञान-भाष्य — सूर्यांश पुरुष ने मयासुर से जिस ज्योतिर्विज्ञान की कथा
पहले अधिकार में आरंभ की थी उसका अंत यहाँ हुआ । इस पर मयासुर ने जो
प्रश्न किये उसकी चर्चा आगे तीन अध्यायों में होगी । इसलिए यहाँ तक जो कुछ
कहा गया है उसे सूर्य-सिद्धान्त का पूर्वार्ध कहते हैं । इसके आगे जो तीन अध्याय हैं
उन्हें उत्तरार्ध कहते हैं । अब हम यहाँ संक्षेप में यह बतला कर कि महापातों की
गणना कैसे की जाती है इस पूर्वार्ध को समाप्त करेंगे ।
पंचांगों से महापातों का स्थूलकाल निश्चय करना—विष्कम्भादि
२७ योगों की गणना पंचांगों में अवश्य रहती है । इनको जानने की रीति स्पष्टा-
धिकार के ६५ वें श्लोक में बतलायी गयी है जो यह है—सूर्य और चन्द्रमा के
भोगांशों को जोड़ कर कला बनाओ और इसको ८०० से भाग दे दो। जो लब्धि
आवे उससे बीते हुए योगों की संख्या मालूम होती है और जो शेष बचता है उससे
वर्तमान योग का ज्ञान होता है ।
इस नियम में सूर्य और चन्द्रमा के भोगांश अश्विनी नक्षत्र के आदि बिन्दु से
नापे जाते हैं और महापातों की गणना के लिए भोगांशों की नाप वसंत-संपात
विन्दु से की जाती है । यदि दोनों के लिए भोगांशों की नाप वसंत-संपात से होती तो
महापातों का समय जानना बड़ा सुगम होता क्योंकि जिस समय १४वें योग हर्षण का
आधा समय बीतता उस समय सूर्य और चन्द्रमा के भोगांशों का जोड़ १८० अंश
होता और व्यतीपात नामक पातकाल का मध्य होता है और जिस समय वैधृति
योग का अंत होता उसी समय वैधृति नामक पात का मध्यकाल होता । परन्तु बात
ऐसी नहीं है । इसलिए इसमें थोड़ा सा संस्कार करना पड़ेगा । सूर्य-सिद्धान्त के
अनुसार अश्विनी का आदि-विन्दु आजकल जहाँ है वहाँ से वेध-द्वारा-सिद्ध वसंत
संपात बिन्दु २२ अंश ४५ कला के लगभग पच्छिम है । इसी अन्तर को अयनांश
कहते हैं । यदि यहाँ से सूर्य और चन्द्रमा के भोगांश लिये जायँ तो दोनों का जोड़
४५ अंश ३० कला अधिक होता है । व्यतीपात के लिए सूर्य और चन्द्रमा के सायन
भोगांशों का जोड़ १८० अंश होता है, इसलिए १८० अंश - ४५ अंश ३० कला =
१३४ अंश ३० कला = ८०७० कला । यह अश्विनी नक्षत्र के आदि-विन्दु से व्यती-
पातकालिक सूर्य और चन्द्रमा के भोगांशों का जोड़ है । इसको ८०० कला से भाग
देने पर १० लब्धि और ७० कला शेष होते हैं । १० से सिद्ध होता है कि व्यतीपात
काल में गंड योग बीता रहता है और वृद्धि योग का आरम्भ हुआ रहता है । इस-
पाताधिकार ७१५
लिए स्थूल रूप से व्यतीपात काल को निश्चय करने के लिए जिस समय वृद्धि
योग का आरम्भ होता है उसी समय के सूर्य चन्द्रमा की स्पष्ट क्रान्ति जानकर
व्यतीपात काल की सूक्ष्म गणना करनी चाहिए ।
वैधृति नामक पातकाल का निश्चय करने के लिए ४५ अंश ३० कला को ३६०
अंश से घटाना चाहिए। ऐसा करने से शेष आया ३१४ अंश ३० कला = १८८७०
कला । इसको ८०० से भाग देने पर २३ लब्धि और ४७० कला शेष हुए, जिससे
प्रकट होता है कि वैधृति नामक पातकाल में २३ वां योग शुभ बीता रहता है और
२४वें योग शुक्ल का भी आधा बीत चुका रहता है। इसलिए स्थूल रूप से वैधृति
नामक पात शुक्ल योग के आधे भाग पर होता है। इसलिए सूक्ष्म गणना करने के
लिए इसी समय के सूर्य, और चन्द्रमा और स्पष्टक्रान्ति जाननी चाहिए। इसके लिए
सूर्य, चन्द्रमा और राहु के स्पष्ट भोगांश, सूर्य की क्रान्ति, चन्द्रमा की मध्यमक्रान्ति
और शर जानकर इसका संस्कार करके चन्द्रमा की स्पष्ट क्रान्ति जाननी चाहिए
जिसकी रीति स्पष्टाधिकार पृ० १६६-२०० में बतलायी गयी है। इसलिए उदाहरण
में इन सब बातों के बतलाने की आवश्यकता नहीं जाना पड़ती। यहाँ केवल यह
दिखलाना पर्याप्त होगा कि सूर्य-सिद्धान्त के ध्रुवाङ्कों से महापातों के समय की गणना
करना न तो सुगम ही है और न शुद्ध जब कि आधुनिक रीति से जाने हुए ध्रुवाङ्कों
से यह बात शुद्धतापूर्वक जानी जा सकती है। मेरे पास इस समय १६२६ ई० का
नाविक पंचांग मौजूद है इसलिए इसी की सहायता से वैशाख शुक्ल १८८६ विक्रमीय
के व्यतीपात नामक महापात की गणना की जाती है ।
१८८६ के वैशाख शुक्ल पक्ष में गंड योग का अंत १४ मई को ४२ घड़ी
४० पल पर होता है और इसके बाद वृद्धि योग का आरम्भ होता है इसलिए १४
या १५ मई को व्यतीपात नामक महापात होगा : अब नाविक पंचांग से यह देखना
चाहिए कि इन तारीखों में किस समय सूर्य और चन्द्रमा की स्पष्ट क्रान्तियां समान
होंगी । नाविक पंचांग के पृष्ठ ५१ से जान पड़ता है कि १४ मई को सूर्य का उत्तर
क्रान्ति १८ अंश ३४ कला और ४२ विकला है तथा १५ मई को १८ अंश ४६
कला और ६ विकला है। परन्तु चन्द्रमा की क्रान्ति १४ मई को २२ अंश से अधिक
है इसलिए १४ मई को व्यतीपात काल नहीं आवेगा परन्तु १५ मई की शाम को
यह घटना हो सकती है क्योंकि,
अंश कला वि०
१५ मई के मध्याह्न काल में सूर्य की क्रान्ति १८ ४६ ६.१
१६ " " " १६ ३ १०'६