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उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा

स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished364 पृष्ठ

१०२ उपदेशसाहस्री "यं यं वापि स्मरन् भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम् । तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः१ ।। अतः पूर्व में अशुद्ध रहा हुआ भी पुरुष, ब्रह्मभावना करने से शुद्ध होगा, पश्चात् ब्रह्मभाव को ही पायेगा । इस कारण आत्मा को सर्वदा ही शुद्ध कहना उचित नहीं है । किन्तु इस प्रकार समझ बैठना समुचित नहीं है, क्योंकि ध्याता और ध्येय का भेद रहने पर तो ध्याता (ध्यान करने वाला) जिस प्रकार के देवादि ध्येय में मन लगाता है, तो वह ध्येय देवादिमय (तन्मय) हो जाता है, ध्यान की क्रिया वहीं पर सार्थक हो पाती है । किन्तु आत्मप्राप्ति के लिये (आत्मस्वरूप में अवस्थिति प्राप्त करने के लिये) आत्मा में किसी ध्यानादि क्रिया की अपेक्षा नहीं होती। क्योंकि मोक्षरूप ब्रह्म ही तो आत्मा है, उस कारण वहाँ किसी क्रिया की अपेक्षा नहीं रहती। क्योंकि वह चतुर्विध क्रियाफल से विलक्षण है। यदि कैवल्य (मोक्ष) को क्रियासापेक्ष माना जाय तो वह स्वयं आत्मरूप नहीं हो सकता । क्योंकि जो क्रिया से साध्य होता है, वह अनात्मरूप और अनित्य होता है । एवञ्च आत्मा सर्वदा ही शुद्ध है, उसमें जो अशुद्धि का आभास होता है, वह मिथ्या, अध्यास है ।। १४ ।। खमिवैकरसा ज्ञप्तिरविभक्ताऽजरामला । चक्षुराद्युपधाना सा विपरीता विभाव्यते ।। १५ ।। खमिवेति—स्व (आत्मा) के समान ज्ञप्ति (ज्ञान) भी एकरस, निर्विभाग (अखण्ड), जरारहित और निर्मल (अमल) है, तथापि चक्षु (नेत्र) आदि उपाधियों के कारण ही वह विपरीत प्रतीत होता रहता है। जैसे निर्मल स्फटिक मणि जपापुष्प की सन्निधि से लाल रंग का दिखाई पड़ता है। अथवा जैसे व्यापक आकाश घट-मठादि उपाधियों के कारण विभक्त हुआ-सा प्रतीत होता है। उसी प्रकार एक ही शुद्ध ज्ञान, जो साक्षात् आत्मस्वरूप ही है, तथापि नेत्र आदि उपाधियों के कारण रूप-रसादि विभिन्न भेदों से युक्त हुआ-सा प्रतीत होता है ।। १५ ।। हृदयस्पर्शिनी विभागादि मलों के न रहने से और चिदेकरस होने से आत्मा को सर्वदा ही शुद्ध समझना चाहिये । उसी तरह अर्थात् आत्मा के समान ज्ञान भी एकरस, विभागरहित (निर्विभाग), जरारहित और निर्मल है। यदि कोई कहे कि ज्ञान (ज्ञप्ति) का स्वरूप इस प्रकार का है, तो जन्म-विनाश आदि भेद अर्थात् जायते, नश्यति (पैदा होता है, नष्ट होता है) इत्यादि प्रतीति क्यों कर होती है? उसका उत्तर तो यह है कि नेत्रादि उपाधियों के कारण ही वैसी प्रतीति होती है । जिस प्रकार निर्मल स्फटिक, जपाकुसुम आदि की सन्निधि से रक्त वर्ण का भासित होता है अथवा एक ही व्यापक आकाश घट-मठादि उपाधियों के कारण विभक्त हुआ-सा ज्ञात होता है, उसी प्रकार एक ही शुद्ध ज्ञान, जो साक्षात् आत्मस्वरूप ही है, नेत्रादि उपाधियों के संसर्गदोष के कारण उसके जन्म, विनाश तथा रूप, रस आदि भेदों की प्रतीति होती है ।। १५ ।। दृश्यत्वादहमित्येष नात्मधर्मो घटादिवत् । तथाऽन्ये प्रत्यया ज्ञेया दोषाश्चात्माऽमलो ह्यतः ।।१६।। दृश्यत्वादिति—'मैं' यह प्रतीति भी घट-पटादि के समान दृश्य रहने से उसे 'आत्मा' का धर्म नहीं कह सकते । उसी तरह अन्यान्य दूसरी प्रतीतियाँ और राग-द्वेष आदि दोषों को भी समझना चाहिये । अतः 'आत्मा' निर्मल ही है ।। १६ ।। हृदयस्पर्शिनी पूर्व श्लोक में प्रतिपादित आत्मा के अमलत्व को अधिक स्पष्ट करने के लिये कह रहे हैं—'अहम्' = मैं, यह प्रतीति भी दृश्य होने के कारण घट-पट आदि दृश्य पदार्थों के तुल्य आत्मा का धर्म नहीं है—अर्थात् आत्म- निष्ठ नहीं है, इसका बोध हमें 'अहमिति प्रत्ययः नात्मधर्मः दृश्यत्वात् घटादिवत्'—इस अनुमान से होता है । उसी १. ( भ. गी. ८।६ )

नान्यदन्यत्प्रकरणम् १०३ प्रकार अन्यान्य राग-द्वेषादि दोषरूप परिणाम (प्रत्यय, प्रतीतियाँ) भी आत्मधर्म (आत्मनिष्ठ) नहीं हैं, क्योंकि आत्मा तो निर्मल (अमल, मलरहित) है ॥ १६ ॥ सर्वप्रत्ययसाक्षित्वादविकारी च सर्वगः । विक्रियेत यदि द्रष्टा बुद्ध्यादीवाल्पविद्भवेत् ॥१७॥ सर्वेति—सभी प्रतीतियों का साक्षी होने से 'आत्मा' अविकारी और सर्वगत है। साक्षी आत्मा में भी यदि विकार माना जाय तो वह बुद्धि आदि के समान अल्पज्ञ हो होगा ॥ १७ ॥ हृदयस्पर्शिनी प्रश्न—अहंकार आदिकों में आत्मधर्मता के न होने पर भी आत्मा को शुद्ध (मलरहित) नहीं कह सकते, क्योंकि वह विकारी और परिच्छिन्न ज्ञात होता है, ऐसी स्थिति में उसे शुद्ध कैसे कहा जाय ? उत्तर—प्रश्नकर्त्ता के कथनानुसार आत्मा को यदि विकारी या परिच्छिन्न कहा जाय तो उसमें सर्व- साक्षिता नहीं बन पायेगी। वह बुद्धि, चित्त, मन की तरह अल्पज्ञ कहलायेगा। यहाँ पर मूलगत 'बुद्ध्यादि' शब्द से बुद्धिगत आभास को लक्षित किया गया है। अन्यथा बुद्ध्यादि तो स्वरूपतः अचेतन हैं, तथापि ज्ञान (वेदन) सम्बन्ध के कारण उनमें अल्पवित्त्व जो कहा गया है, वह उपपन्न नहीं हो सकेगा। विषय का अवभास कराने मात्र में उपक्षीण परिणाम वाली साभास बुद्धि जैसे पूर्व-पर अनुभूति, तदवस्था, तत्प्रचार का अनुसंधान नहीं कर पाती, क्योंकि वह विकारी है, उसी तरह द्रष्टा (आत्मा) को भी विकारी मानने पर वह भी पूर्वापर अनुभूति आदि का अनुसन्धान नहीं कर पायेगा, जिससे कोई व्यवहार ही नहीं चल पायेगा, अर्थात् समस्त व्यवहार ही लुप्त होने का प्रसंग प्राप्त होगा। अतः आत्मा यच्चयावत् समस्त प्रतीतियों का साक्षी होने से विकाररहित (अविकारी) और सर्वव्यापक (सर्वत्र व्याप्त, सर्वगत) है ॥ १७ ॥ न दृष्टिलुप्यते द्रष्टुश्चक्षुरादेर्यथैव तत् । नहि द्रष्टुरिति ह्युक्तं तस्माद्द्रष्टा *सदैकदृक् ॥१८॥ नेति—चक्षुरादि की दृष्टि के समान द्रष्टा (आत्मा) की दृष्टि का कभी लोप नहीं होता। अतएव भगवती श्रुति ने भी कहा है—"न हि द्रष्टुर्दृष्टेर्विपरिलोपो विद्यतेऽविनाशित्वात्"—अविनाशी होने से द्रष्टा की दृष्टि का लोप नहीं होता—इसलिये द्रष्टा (आत्मा) सर्वदा एकरूप दृष्टृस्वभाव ही है ॥ १८ ॥ हृदयस्पर्शिनी शङ्का—बुद्धि के समान द्रष्टा आत्मा को भी अल्पवित् (अल्पज्ञ) ही कहा जाय, क्योंकि जो साधन के अधीन होता है, वह उत्पत्ति-विनाशवान् होता है। समा०—किन्तु यह कथन इसलिये उचित नहीं है कि जैसे परिणामिता (विकार) के कारण चक्षुरादि- द्वारक दृष्टि का लोप होता है, वैसे आत्मारूप द्रष्टा की दृष्टि का लोप नहीं होता, क्योंकि वह (दृष्टि) अपरिणामी आत्मस्वरूप ही है। आत्मा की दृष्टि को श्रुति ने नित्य कहा है१। इस कारण द्रष्टा की दृष्टि का लोप न होना प्रमाणसिद्ध है। 'सदैकदृक्' का अर्थ है—एकरूप दृष्टि स्वभाव वाला। 'सदैकभुक्' पाठ यदि हो तो 'भुङ्क्ते पश्यति' इति भुक्=साक्षी अर्थ होगा। एवं च द्रष्टा, सदा साक्षी है ॥ १८ ॥ सङ्घातो वाऽस्मि भूतानां करणानां तथैव च । व्यस्तं वाऽन्यत्तमो वाऽस्मि को वाऽस्मीति विचारयेत् ॥१९॥ संघात इति—अतः मुमुक्षु पुरुष को यह विचारना चाहिये कि क्या मैं भूतों का संघातरूप स्थूल शरीर हूँ? अथवा इन्द्रियों (करणों) का संघात (समूह) हूँ? यदि मैं इन्द्रियों का संघातस्वरूप हूँ तो क्या मैं भिन्न-भिन्न प्रत्येक इन्द्रियरूप हूँ? अथवा उनमें से कोई एक हूँ? या उनसे पृथक् कोई अन्य हूँ? और यदि कोई अन्य हूँ, तो कौन हूँ? ॥१९॥ १. 'न हि द्रष्टुदृष्टेर्विपरिलोपो विद्यतेऽविनाशित्वात् ।'—(बृ. उ. ४।३।२३)

  • सदैव दृक्०—पाठान्तरम् ।

१०४ उपदेशसाहस्री हृदयस्पर्शिनी इस प्रकार आत्मा शुद्धस्वरूप सिद्ध होने पर भी उपाधि सम्बन्ध से वह अन्यथा प्रतीत होता है। अतः मुमुक्षु को चाहिए कि वह आत्मा को ब्रह्मरूप में समझने के लिए पदार्थ-विवेक (पदार्थों के यथार्थ स्वरूप का विचार) करे। आत्मा की प्रतीति 'अहम्'—(मैं) के आकार में होती है। इस प्रतीति में मैं कृश हूँ, स्थूल हूँ इस प्रकार भूतों के संघात रूप स्थूल शरीर का स्फुरण होता रहता है। उसी तरह 'मैं' द्रष्टा, श्रोता, रसयिता, काण, बधिर हूँ—इस प्रकार 'मैं' कहने से इन्द्रियों (करणों) का भी उल्लेख होता रहता है। अतः मुमुक्षु को चिन्तन करना होगा कि क्या 'मैं' भूतों का संघात (समूह-समुदाय) रूप स्थूल शरीर हूँ? या 'मैं' इन्द्रिय (करण) संघात रूप हूँ? यदि 'मैं' इन्द्रियों का संघात रूप हूँ, तो पृथक्-पृथक् इन्द्रियों के प्रति पृथक्-पृथक् अहंकार (प्रत्येक इन्द्रिय के प्रति अहंकार) होने से क्या 'मैं' पृथक्-पृथक् प्रत्येक इन्द्रियस्वरूप हूँ? अथवा एक ही शरीर में अनेक रूपों में रहने पर कदाचित् वैमत्य (विरोध) होने की भी संभावना रहने से भोगव्यवस्था नहीं बन पायेगी, इस कारण उन इन्द्रियों में से कोई एक हूँ? या इन्द्रिय संघात से भिन्न कोई अन्य हूँ, उन सबका अधिष्ठाता हूँ? यदि उनमें से ही कोई अन्यतम हूँ, तो क्या अन्तःकरण, प्राण आदि में से ही कोई एक हूँ? किंवा उनका साक्षी होकर उनसे विलक्षण स्वरूप का हूँ? इस रीति से विचार करना चाहिए ॥ १९ ॥ व्यस्तं नाहं समस्तं वा भूतमिन्द्रियमेव वा । ज्ञेयत्वात्करणत्वाच्च ज्ञाताऽन्योऽस्माद्घटादिवत् ॥२०॥ व्यस्तमिति—विचारने पर यह निश्चय अवश्य होगा कि मैं भूत नहीं हूँ, तथा इन्द्रिय नहीं हूँ, तथा व्यस्त अथवा समस्त भी नहीं हूँ, क्योंकि ये सब घट आदि के समान ज्ञेय और करण रूप हैं। मैं तो इनका ज्ञाता हूँ। अतः मैं इनसे भिन्न हूँ ॥ २० ॥ हृदयस्पर्शिनी इस प्रकार विचार करने पर पदार्थविवेकरूप फल की प्राप्ति होती है। उपर्युक्त रीति से विचारने पर मुमुक्षु को यह निश्चय हो जाता है कि 'मैं' न भूत हूँ, न इन्द्रिय हूँ तथा न व्यस्त (पृथक्-पृथक्) हूँ, न समस्त हूँ, क्योंकि ये सभी घटादि के समान अचेतन (जड़) हैं, और कुठार आदि के समान कारणरूप (साधनरूप) हैं। तस्मात् 'मैं' तो इन सबका ज्ञाता हूँ, चेतन हूँ, इन सभी अन्तःकरण, प्राण आदि जड़ पदार्थों से भिन्न हूँ, इस प्रकार द्रष्टा और दृश्य का अन्वय-व्यतिरेक के द्वारा आलोचन करते हुए विवेक करना चाहिए ॥ २० ॥ आत्मागनेरिन्धनं बुद्धिरविद्याकामकर्मभिः । दीपिता प्रज्वलत्येषा द्वारैः श्रोत्रादिभिः सदा ॥२१॥ आत्मागनेरिति—आत्मा रूप अग्नि का ईंधन—'बुद्धि' है। यह बुद्धिरूप ईंधन अविद्या, काम और कर्मों से दीपित होकर श्रोत्रादि के द्वारा सर्वदा प्रज्वलित होता रहता है ॥ २१ ॥ हृदयस्पर्शिनी पूर्व श्लोक से पदार्थविवेक करने की रीति बताई गई। अब २१ से २६ तक के श्लोकों से साक्षी और साक्ष्य का अन्वय-व्यतिरेक के द्वारा आलोचन करते हुए अवस्थात्रय (तीन अवस्थाओं) का विवेक और उसके द्वारा तत्साक्षी तुरीय का अधिगम करने का (ज्ञान का) प्रकार बता रहे हैं—अग्नि को किसी विशेष आकार में अभिव्यक्त करने में कारण ईंधन होता है। उसी तरह आत्मचैतन्य को विशेष आकार में अभिव्यक्त करनेवाली यह 'बुद्धि' है। अग्नि- स्थानापन्न आत्मचैतन्य को और ईंधनस्थानापन्न बुद्धि को समझना चाहिए। बुद्धि को ईंधनस्थानापन्न इसलिए कहते हैं कि जैसे काष्ठादि ईंधन के द्वारा अग्नि को प्रकाशित किया जाता है, वैसे ही यह बुद्धि, आत्मचैतन्य को व्यवहार- योग्य बनाती है। 'इध्यते प्रकाश्यते व्यवहारयोग्यः क्रियते अनया इति इन्धना बुद्धिः'। जैसे वायु के कारण अग्निस्थित ईंधन प्रज्वलित हो उठता है, उसी तरह अविद्या काम कर्म के कारण उत्तेजित (दीपित) हुई वह बुद्धि, चैतन्यग्रस्त होने

नान्यदन्यत्प्रकरणम् १०५ से प्रकाशित हो जाती है, जैसे अभिव्यक्त हुए अग्नि से जलता हुआ ईंधन प्रकाशित होता है। और गवाक्षों से निर्गत दीर्घ प्रभा जैसे सर्वदा प्रकाशित होती रहती है, वैसे ही श्रोत्रादि के माध्यम से निकलनेवाली यह बुद्धि सर्वदा प्रज्वलित (प्रकाशित) होती रहती है। इस प्रसंग में अग्नि-ईंधन के रूपक से निर्देश करने का प्रयोजन यह है कि व्यवहार-काल में विषयग्रहण के होम करने की भावना की जा सके, इस प्रकार की भावना करने से फल यह होगा कि विषयों के प्रति होनेवाली आसक्ति की निवृत्ति होगी। एवंच अविद्या आदि के द्वारा प्रेरित होनेवाली बुद्धि का परिणत होते रहना ही जागरित अवस्था है ।। २१ ।। दक्षिणाक्षिप्रधानेषु यदा बुद्धिविचेष्टते । विषयैर्हविषा दीप्ता* ह्यात्माग्निः स्थूलभुक्त्तदा ॥२२॥ दक्षिणाक्षीति—जिस समय विषय रूपी हवि से दीपित हुई बुद्धि, दक्षिण नेत्रादि इन्द्रियों में चेष्टा करती है, उस समय आत्मस्वरूप अग्नि स्थूल विषयों का भोग करता है अर्थात् भोक्ता होता है ।। २२ ।। हृदयस्पर्शिनी जिस समय विषयरूपी हवि से दीप्त हुई बुद्धि, दक्षिण नेत्रादि इन्द्रियों में चेष्टा (व्यापार) करती है, अर्थात् हविःस्थानापन्न विषयों से दीप्त होती है, यानी विषय को व्याप्त करके उस विषय के आकार में प्रकाशित होती है, उस समय आत्मारूप अग्नि, स्थूल विषयों का भोक्ता होता है, तब उसे 'जागता है' कहते हैं अर्थात् यही बुद्धि की अवस्था, जाग्रत् अवस्था (जागरण) शब्द से कही जाती है। पुरुष के दक्षिण अंग की श्रेष्ठता प्रसिद्ध है, इस कारण अक्षि में 'दक्षिण' विशेषण दिया गया है ।। २२ ।। हूयन्ते तु हवींषीति रूपादिग्रहणे स्मरन् । अरागद्वेष आत्माग्नौ जाग्रद्दोषैर्न लिप्यते ॥२३॥ हूयन्तेत्विति—जो पुरुष रूपादि विषयों के ग्रहण करते समय राग-द्वेष रहित ( वीतराग ) होकर यह स्मरण रखता है कि आत्मारूप अग्नि में हवियों का होम (हवन) किया जा रहा है, तब वह पुरुष जाग्रत् अवस्था के दोषों से लिप्त नहीं होता है ।। २३ ।। हृदयस्पर्शिनी रूपक के द्वारा निरूपण करने का फल बता रहे हैं—विषयों का ग्रहण करते समय शोभन-अशोभन के अध्यास (मिथ्या ज्ञान) से होनेवाले राग-द्वेषों से शून्य रहकर जो व्यक्ति यह स्मरण रखता है कि इन विषयरूप हवियों का आत्मारूप अग्नि में हवन (होम) किया जा रहा है, उसे जाग्रत् अवस्था के दोषों का लेप नहीं हो पाता । अर्थात् वह व्यक्ति विषयोपलब्धिनिबन्धन पुण्य-अपुण्यलक्षण जाग्रत् दोषों से लिप्त (संश्लिष्ट = सम्बद्ध) नहीं होता ।। २३ ।। मानसे तु गृहे व्यक्तः† सोऽविद्याकर्मवासनाम् । पश्यंस्तैजस आत्मोक्तः स्वयंज्योतिः प्रकाशिता‡ ॥२४॥ मानसेत्विति—अब स्वप्नावस्था को बता रहे हैं। तदनन्तर मनोरूप घर में अभिव्यक्त होकर अविद्या से उत्पन्न कर्मवासना को देखने के कारण 'आत्मा' को तैजस कहते हैं। उस समय यह स्वयंज्योति आत्मा ही विषयों का प्रकाशक होता है। क्योंकि उस समय सूर्यादि बाह्य ज्योतियों का अभाव रहता है ।। २४ ।। हृदयस्पर्शिनी जागरित अवस्था को बताने के बाद अब स्वप्नावस्था को बता रहे हैं—मनोरूप गृह (मनः परिणामाेपाधि- रूप मानसगृह) में अभिव्यक्त हुआ वह आत्मा, अविद्या से उत्पन्न हुए कर्म से उद्बुद्ध हुई वासना (अविद्याजनित कर्म- वासना) को विषय के आकार में देखनेवाला आत्मा 'तैजस' शब्द से कहा जाता है। क्योंकि वह तेज में (तेजोरूप वासनामय विषय में) अभिव्यक्त होता है। उस समय भासमान कर्म, सुख-दुःख आदि सभी मनोमात्र ही होते हैं। उस

  • दीप्त आत्मा। † व्यक्ता अविद्याकर्मवासनाः । ‡ प्रकाशिताः—पाठान्तरम् । १४

१०६ उपदेशसाहस्री समय वे सब दृश्यरूप में ही स्थित रहते हैं। उस समय आत्मा की कोई अन्य उपाधि भी नहीं होती। उस समय सूर्यादि बाह्य ज्योतियों का भी अभाव रहता है। उस समय स्वयंज्योति आत्मा ही विषयों का प्रकाशक (साक्षी) होता है। इसी अभिप्राय को श्रुति भी बता रही है—"दृष्ट्वैव पुण्यं च पापं च१", "अत्रायं पुरुषः स्वयंज्योतिर्भवति२" इति ॥ २४ ॥ विषया वासना वापि चोद्यन्ते नैव कर्मभिः । यदा बुद्धौ तदा ज्ञेयः प्राज्ञ आत्मा ह्यनन्यदृक् ॥२५॥ विषया इति—जिस समय कर्मों के द्वारा विषय (स्थूल) तथा वासनाओं (सूक्ष्म) की भी अन्तःकरण में उद्भूति न हो, उस समय आत्मा (अपने) व्यतिरिक्त विषय अथवा वासना को न देखने के कारण उसे (आत्मा को) प्राज्ञ समझना चाहिये ॥ २५ ॥ हृदयस्पर्शिनी स्वप्नावस्था बताने के बाद अब सुषुप्ति अवस्था को बताते हैं—जिस समय बुद्धि (अन्तःकरण) में कर्मों के द्वारा स्थूल विषय तथा सूक्ष्म वासनाएँ, जो स्वप्न में दृश्य रहती हैं, उनका भी उद्बोध; न हो, उस समय वह अपने से भिन्न किसी भी विषय को या वासना को नहीं देखता है, इस कारण उसे अनन्यदृक् (अपरिच्छिन्नदर्शी) अर्थात् 'प्राज्ञ' शब्द से कहा जाता है। 'प्रज्ञातिशयात् तदा प्राज्ञः' इस व्युत्पत्ति से उसे 'प्राज्ञ' कहा गया है। उपर्युक्त तीनों अवस्थाओं को तथा तत्कालीन चैतन्य एवं उनके कोष और शरीर को समझने के लिए निम्नलिखित सरल प्रकार यह है— १. जाग्रत् अवस्था के समय स्थित चैतन्य—समष्टि को 'वैश्वानर' और चैतन्य—व्यष्टि को 'विश्व' कहते हैं, और उनका कोष 'अन्नमय' कोष और शरीर 'स्थूल शरीर' होता है। २. स्वप्न अवस्था के समय स्थित चैतन्य—समष्टि को 'सूत्रात्मा', और चैतन्य—व्यष्टि को 'तैजस' कहते हैं, और उनके तीन कोष 'मनोमय', 'प्राणमय', 'विज्ञानमय' होते हैं, और शरीर 'सूक्ष्म शरीर' होता है। ३. सुषुप्ति अवस्था के समय स्थित चैतन्य—समष्टि को 'ईश्वर' और चैतन्य—व्यष्टि को 'प्राज्ञ' कहते हैं, और उनका कोष 'आनन्दमय कोष' और शरीर 'कारणशरीर' होता है ॥ २५ ॥ मनोबुद्धीन्द्रियाणां च* ह्यवस्थाः कर्मचोदिताः । चैतन्येनैव भास्यन्ते रविणेव घटादयः ॥२६॥ मनोबुद्धीन्द्रियाणामिति—जिस प्रकार घटादि पदार्थ सूर्य से प्रकाशित होते हैं, उसी प्रकार कर्म के द्वारा उद्बुद्ध हुईं ये मन, बुद्धि और इन्द्रियों की अवस्थाएँ 'चैतन्य=आत्मा' से ही प्रकाशित की जाती हैं। मन की अवस्था 'स्वप्न', बुद्धि की अवस्था 'सुषुप्ति', और इन्द्रियों की अवस्था 'जाग्रत्' कहलाती है ॥ २६ ॥ हृदयस्पर्शिनी इस प्रकार तीन अवस्थाओं तथा तदवस्थ आत्मा का द्रष्टा-दृश्यभाव से विवेचन करने के बाद अब अभिमानी सहित अवस्थात्रय के साक्षीरूप में विश्वावित्रय की अपेक्षा तुरीय (चतुर्थ) नित्यविज्ञप्ति (नित्यविज्ञान) स्वभाववाले प्रत्यक् आत्मा को बता रहे हैं— जिस प्रकार घट-पटादि पदार्थ, सूर्य (रवि) से प्रकाशित होते हैं, उसी प्रकार कर्म के द्वारा उद्बुद्ध होने- वाली ये मन, बुद्धि और इन्द्रियों की अवस्थाएँ आत्मचैतन्य से ही प्रकाशित होती हैं। इन्द्रियों की अवस्था जागरण (जाग्रत्), मन की अवस्था स्वप्न, और बुद्धि की अवस्था यानी कारणावस्था सुषुप्ति कही जाती है ॥ २६ ॥ १. (बृ. उ. ४।३।१५, १६, २४, २७) २. (बृ. उ. ४।३।९,१४)

  • या अव०—पाठान्तरम् ।

नान्यदन्यत्प्रकरणम् १०७ तत्रैवं सति बुद्धीज्ञं आत्मभासाऽवभासयन्। कर्ता तासां यदर्थास्ता मूढैरेवाभिधीयते ॥२७॥ तत्रेति—ये उक्त अवस्थाएँ 'आत्मा' में अध्यस्त हैं। अतः अपने सुख-दुःख का अवभास कराने वाली बुद्धियों को अपने प्रकाश (अपने चैतन्य के आभास) से प्रकाशित करनेवाला आत्मा, मूढ़ लोगों के द्वारा उनका कर्ता कहा जाता है ॥ २७ ॥ हृदयस्पर्शिनी इस पर कोई कह सकता है कि यदि आत्मा निर्विकार ही साक्षी कहलाता है तो उसे बुद्धि आदि का कर्ता क्यों कहते हैं ? इस प्रश्न के उत्तर में कहते हैं कि उपरिनिर्दिष्ट तीनों अवस्थाएँ निर्विकार आत्मा में मोह से अध्यस्त हैं। अतः अपने सुख-दुःखावभास की कारणीभूत अवस्था सहित बुद्धियों को अपने प्रकाश (आत्मभास, स्वचैतन्याभास) से प्रकाशित करनेवाला आत्मा (ज्ञ), शास्त्राचार्योपदेश से रहित मूढ़ पुरुषों के द्वारा उनका कर्ता कहा जाता है। अर्थात् जिस आत्मा के सुख-दुःख का ज्ञान कराने के लिये बुद्धियों का स्वीकार किया गया है, उन बुद्धियों को यह आत्मा अपने प्रकाश से प्रकाशित करता रहता है, जिस कारण मूर्ख लोग उसे कर्ता कहा करते हैं। अर्थात् कर्म के कारण उद्भासित बुद्धयवस्थाओं का अनुगमन करनेवाले चिदाभास और आत्मा दोनों में विवेक न हो पाने से मूर्ख लोग उस आत्मा को ही 'दर्शनकर्ता' कहते हैं ॥ २७ ॥ सर्वज्ञोऽप्यत एव स्यात्स्वेन भासाऽवभासयन् । सर्वं सर्वक्रियाहेतोः सर्वकृत्त्वं तथाऽऽत्मनः ॥२८॥ सर्वज्ञ इति—अतएव अपने प्रकाश से सबको प्रकाशित करने के कारण वह सर्वज्ञ भी कहा जाता है और उसके सन्निधिमात्र से समस्त क्रियाओं की प्रवृत्ति होने के कारण उसमें सर्वकर्तृत्व माना जाता है ॥ २८ ॥ हृदयस्पर्शिनी इस प्रकार अज्ञान और उसके कार्य में प्रतिबिम्बित हुए चिदात्मा का ज्ञातृत्व उपाधिनिबन्धन होता है, यह बताकर अब मायारूप उपाधि में प्रतिबिम्बवशात् उसी की सर्वज्ञता, और सर्वकर्तृता को बता रहे हैं—स्वात्माश्रयविषयक सम्पूर्ण माया (विवर्त) को आदित्य (प्रकाश) के समान अविकृत स्वचैतन्य से भासित करने के कारण उसे सर्वज्ञ कहा जाता है। सर्व विषयों के ज्ञानकर्ता के रूप में उसे सर्वज्ञ नहीं कहा जाता। उसी तरह आत्मा का सर्वकर्तृत्व भी माया- निबन्धन ही है। अर्थात् सन्निधिमात्र से भ्रामक के समान सर्व कारकों की प्रवृत्ति कराने में कारण होने से उसका सर्वकर्तृत्व माना जाता है ॥ २८ ॥ सोपाधिश्चैवमात्मोक्तो निरुपाख्योऽनुपाधिकः । निष्कलो निर्गुणः शुद्धस्तं मनो वाक्च नाप्नुतः ॥२९॥ सोपाधिरिति—इस प्रकार से सोपाधिक आत्मा का निरूपण किया गया। किन्तु निरुपाधिक आत्मा तो अकथनीय, निष्कल, निर्गुण और शुद्ध है। उसे मन और वाणी भी प्राप्त नहीं कर पाते ॥ २९ ॥ हृदयस्पर्शिनी इस प्रकार तीनों अवस्थाओं के साक्षी होने से विविक्त, शुद्ध, चिद्रूप आत्मा में ज्ञातृत्व, कर्तृत्व, सर्व- ज्ञत्वादि व्यवहारास्पदत्व मायोपाधिवशात् है, स्वाभाविक नहीं है, इसी उक्त अर्थ का अनुवाद करके 'वह स्वाभाविक बिम्बतुल्य आत्मस्वरूप क्या है ? इसके उत्तर में कह रहे हैं कि सोपाधिक आत्मा का वर्णन तो किया गया, और निरुपाधिक (निरुपाख्य), जो विषयतया उल्लेख के योग्य नहीं होता, उसे अनुपाधिक अर्थात् सर्वव्यवहारातीत कहते हैं। अर्थात् वह गुण, अवयव से रहित होने के कारण शुद्ध (कूटस्थ) है। उसकी निरुपाख्यता यही है कि उसे मन और वाणी प्राप्त नहीं कर सकते ॥ २९ ॥

१०८ उपदेशसाहस्री चेतनोऽचेतनो वापि कर्ताऽकर्ता गतोऽगतः । बद्धो मुक्तस्तथा चैकोऽनेकः शुद्धोऽन्यथेति वा ॥३०॥ चेतन इति—भिन्न-भिन्न मतवादी विद्वान् आत्मा को चेतन या अचेतन, कर्ता या अकर्ता, व्यापक या अव्यापक, बद्ध या मुक्त, एक या अनेक तथा शुद्ध या शबल इस प्रकार भिन्न-भिन्न रीति से बताते हैं ।। ३० ।। हृदयस्पर्शिनी मन और वाणी से उसकी अगम्यता को बताते हैं—'अहम्' यहाँ पर शब्द और प्रत्यय दोनों पराग्व्यावृत्त हुए प्रत्यक् आत्मा को बताते हैं, इसमें किसी का विवाद नहीं है। ये दोनों (शब्द और प्रत्यय) शुद्ध आत्मा को ही यदि विषय करते हों तो प्रत्यक्षतः उपलब्ध घटादि के समान किसी भी वादी को विप्रतिपत्ति ही नहीं होगी। किन्तु आत्मा के संबन्ध में वादियों की अनेक विप्रतिपत्तियाँ हैं। वेदबाह्य लोगों का कहना है कि देह, इन्द्रिय, मन, बुद्धि में से अन्यतम अचेतन (जड़) या चेतन कोई भी 'आत्मा' है। वेदवादियों का कहना है कि उपर्युक्त समस्त अचेतनों (जड़ों) से भिन्न (अन्य) कोई चेतन आत्मा है। उनमें भी नैयायिक लोग आत्मा को कर्ता के रूप में बताते हैं और सांख्य वाले उसे अकर्ता कहते हैं। जैन दार्शनिक आत्मा को शरीरपरिमाण का मानते हैं। किन्तु रामानुज आदि वैष्णवाचार्य उसे अणु-परिमाण कहते हैं। कुछ लोग जीव को बद्ध और ईश्वर को मुक्त कहते हैं। तथा वेदान्ती केवल 'एक आत्मा' स्वीकार करते हैं। किन्तु सांख्य-नैयायिकादि अनेक आत्माओं को मानते हैं। वेदान्ती और सांख्यवादी आत्मा को शुद्ध (रागादिगुण रहित) कहते हैं, किन्तु नैयायिकादि लोग उसके विपरीत अर्थात् आत्मा को रागादि गुण सहित (शबल) बताते हैं। इस प्रकार एक आत्मा को लेकर भिन्न-भिन्न वादियों के भिन्न-भिन्न मत उपलब्ध होते हैं ।। ३० ।। अप्राप्यैव निवर्तन्ते *वाचो धीभिः सहैव तु । निर्गुणत्वात् क्रियाभावाद्विशेषणामभावतः ॥३१॥ अप्राप्यैवेति—आत्मा, निर्गुण होने के कारण निष्क्रिय है, यानी उसमें क्रिया का अभाव है तथा जाति आदि स्वगत और गो-सुवर्ण आदि बाह्य विशेषणों (विशेषों) का भी उसमें अभाव है। अतएव बुद्धि के सहित वाणी (शब्द) उसे (आत्मा को) प्राप्त किये बिना ही लौट आती है ॥ ३१ ॥ हृदयस्पर्शिनी वाणी और बुद्धि, आत्मतत्त्व तक बिना पहुँचे ही क्यों परावृत्त होती (लौटती) हैं ? वास्तविक प्रवृत्तिद्वार (प्रवृत्तिबीज) के प्राप्त न होने से उन्हें वापस आना पड़ता है। क्योंकि आत्मा निर्गुण है, उसमें क्रिया का अभाव है, तथा जाति आदि स्वगत एवं गो-सुवर्णादि बाह्य विशेषणों का भी अभाव है। अभिप्राय यह है कि आत्मा रूपादि- गुणों से शून्य होने के कारण बाह्येन्द्रियद्वारक बुद्धि के द्वारा उसकी प्राप्ति नहीं हो पाती, और मन भी बाह्येन्द्रियों से उपलब्ध कराये गये विषयों के अतिरिक्त विषयों को स्वतन्त्रतया प्राप्त करने (देखने) में असमर्थ है। अतः गोचर न हो पाने वाले आत्मा को वह (मन) नहीं प्राप्त कर पाता। अथवा आत्मा, निष्क्रिय होने से मन का विषय नहीं हो पाता। जैसे घट आदि वस्तुओं के द्वारा अनुगत रहने पर भी क्रियाहीन अनवच्छिन्न (अपरिमित) आकाश में किसी अपूर्व (नवीन) धर्म की उत्पत्ति नहीं होती, वैसे ही क्रियाहीन अनवच्छिन्न आत्मवस्तु में किसी क्रियावान् की अनुगति होने मात्र से अपूर्व धर्म की उत्पत्ति का होना संभव नहीं है। व्यावहारिक ज्ञान तो मनःसंयोगजन्य होता है। आत्मा तक मन की पहुँच ही न हो पाने से उसकी मन से भी अवगति नहीं हो पाती। तथा बाह्य गोधनादि विशेष अथवा स्वगत जात्यादिरूप प्रवृत्तिनिमित्तों के न होने से शब्द भी आत्मा तक नहीं पहुँच पाता। क्योंकि शब्द की प्रवृत्ति में हेतुभूत षष्ठी आदि विभक्तियों और बुद्धि की प्रवृत्ति में हेतुभूत रूपादि के वस्तुतः न होने पर भी आरोपित रूप तथा षष्ठी आदि विभक्तिसम्बन्ध के कारण समस्त व्यवहार होता रहता है। आत्मा के विषय में वादियों के जितने भी मत हैं, वे सब अयथाभूत आत्मा तक ही सीमित हैं, अतः 'अहम्' यह शब्द-प्रत्यय भी शुद्ध आत्मा को बताने

  • वचो०—पाठान्तरम् ।

नान्यदन्यत्प्रकरणम् १०९ में समर्थ नहीं हैं। श्रुति भी यही कह रही है—"न चक्षुषा गृह्यते नापि वाचा नान्यैर्देवैस्तपसा कर्मणा वा१" इति । तथा "यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह२" इति ॥ ३१ ॥ व्यापकं सर्वतो व्योम मूर्तेः सर्वैर्वियोजितम् । यथा तद्विद्विहात्मानं *विद्याच्छुद्धं परं पदम् ॥ ३२ ॥ व्यापकमिति—जैसे व्यापक आकाश, सम्पूर्ण मूर्त पदार्थों से सर्वथा सम्बन्धशून्य है, वैसे ही वेदान्त के सिद्धान्त में आत्मा को शुद्ध परब्रह्मस्वरूप समझो ॥ ३२ ॥ हृदयस्पर्शिनी जब कि आत्मा, किसी शब्द का, प्रत्यय का, वाणी का—किसी प्रमाण का विषय ही नहीं है, तो उसे वेदान्त-वेदनीय (वेद्य) कैसे कहा जाय ? उत्तर में कहा जाता है कि लक्षणा का ही एक मार्ग है, जिससे वह जाना जाता है। जिस प्रकार व्यापक आकाश, सम्पूर्ण मूर्त पदार्थों से सर्वथा सम्बन्धशून्य है, उसी प्रकार यहाँ वेदान्त सिद्धान्त में शुद्ध अर्थात् अवस्थात्रयोपाधि से रहित और अवस्थात्रय के साक्षीरूप से लक्षित परब्रह्मस्वरूप आत्मा को समझना चाहिये ॥ ३२ ॥ दृष्टं हित्वा स्मृतिं तस्मिन्सर्वग्रश्च तमस्त्यजेत् । सर्वदृग्ज्योतिषा युक्तो दिनकृच्छार्वरं यथा ॥ ३३ ॥ दृष्टमिति—जिस प्रकार भगवान् सूर्य, रात्रि के अन्धकार को नष्ट कर देते हैं, उसी प्रकार मुमुक्षु पुरुष जाग्रत् अवस्था में दृष्ट (देखे हुए) पदार्थों का त्याग करे, और उनकी स्मृति (स्मरण = यानी स्वप्न में देखे हुए पदार्थों) का भी त्याग करे, और आत्मा के सर्वप्रकाशक तेज से युक्त होकर सबको अपने में लीन करने वाले (सुषुप्ति अवस्था के) अज्ञान का भी परित्याग कर दे ॥ ३३ ॥ हृदयस्पर्शिनी इस प्रकार आत्मतत्त्व का निश्चय रहने पर पुनः अवस्थात्रय (तीन अवस्थाओं) का अभिमान वह नहीं कर सकेगा। द्रष्टा, श्रोता, मन्ता इस प्रकार एक-एक क्रिया से उसे सम्बद्ध समझने का अभिमान न करे। अर्थात् दर्शनादि की अवस्था में भी आत्मा को निर्विशेष ही समझे। उस दृष्ट (देखे हुए) पदार्थ की स्मृति (स्वप्न) का भी त्याग करे। अर्थात् मैं स्वप्न में देव हुआ, व्याघ्र बना, इस प्रकार के अभिमान का त्याग करे। स्वप्न भी संस्कारद्वारक (संस्कार के कारण) होने से उन्हें भी 'स्मृति' शब्द से कहा गया है। यह स्वप्न (स्मृति) की वासना से विशिष्ट दृश्य, मन का ही विकार है, आत्मा का नहीं, इस प्रकार से असंगत (असम्बद्ध) आत्मा का अनुसन्धान करते रहना चाहिये। उसी तरह सुषुप्ति (तम) का भी त्याग करे। यह तम सब को ग्रस लेता है, अतः उसे 'सर्वग्रस्' कहते हैं। 'सर्वं ग्रसतीति सर्वग्रः' । यह आत्मा, सुषुप्ति का भी अवभासक है, अतः उसका प्रकाशस्वभाव कभी भी लुप्त नहीं होता। उसे मूढ या ज्ञानवान् नहीं समझना चाहिये। अतः जिस प्रकार रात्रि के अन्धकार को सूर्य नष्ट कर देता है, उसी प्रकार आत्मजिज्ञासु व्यक्ति जाग्रत् अवस्था में देखे हुए पदार्थ को त्यागकर उनकी स्मृति अर्थात् स्वप्नदृष्ट पदार्थों का त्याग करे, पश्चात् आत्मा के सर्वप्रकाशक तेज से युक्त होकर सबको अपने में लीन करने वाले सुषुप्ति अवस्था के अज्ञान का भी त्याग कर दे। इन तीनों अवस्थाओं का त्यक्ता कौन है ? उत्तर यह है कि सर्वसाक्षी प्रत्यगात्मा जो ज्योति (ब्रह्म) के साथ एकीभूत है। क्योंकि 'ज्योतिषां ज्योतिः३' के द्वारा ब्रह्म को बताया गया है। इस रीति से अद्वयानन्दस्वभाव ही आत्मा सिद्ध होता है ॥ ३३ ॥ ─────────────────────── १. ( मुं० उ० ३।१।८ ) २. ( तै० उ० २।९ ) ३. ( मुं० उ० २।२।९ )

  • विन्द्यात्० पाठान्तरम् ।

११० उपदेशसाहस्री रूपस्मृत्यन्धकारार्थाः प्रत्यया यस्य गोचराः। स एवात्मा समो द्रष्टा सर्वभूतेषु सर्वगः ॥३४॥ रूपेति—जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति के पदार्थ जिसके विषय हैं, वही समस्त भूतों में व्याप्त, सर्वगत, निर्विशेष, साक्षी 'आत्मा' है ॥ ३४ ॥ हृदयस्पशिनी रूप, स्मृति, अन्धकार, जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति, आदि पदार्थ जिन प्रत्ययों के विषय हैं, वे प्रत्यय भी जिस साक्षी के प्रतिभास्य (गोचर) होते हैं, वही आत्मा है, वही समस्त भूतों में व्याप्त रहने वाला द्रष्टा है, तथापि वह निर्विशेष (सम) है, क्योंकि वह परिच्छेदरहित (सर्वग) है ॥ ३४ ॥ आत्मबुद्धिमनेाक्षार्थविषयालोकसङ्गमात् । विचित्रो जायते बुद्धेः प्रत्ययोऽज्ञानलक्षणः ॥३५॥ आत्मेति—'आत्मा' को निर्विशेष बताया गया है तो विचित्र प्रकार के ज्ञान क्यों होते हैं ? इसका उत्तर यह है कि आत्मा, बुद्धि, मन, इन्द्रिय, विषय और प्रकाश का संयोग होने से अज्ञानरूप उपाधि के कारण बुद्धि से विविध प्रकार के ज्ञान हुआ करते हैं ॥ ३५ ॥ हृदयस्पशिनी यदि आत्मा निर्विशेष (समस्त विशेषताओं से रहित) है, तो विविध प्रकार के ज्ञान (विचित्र संसारप्रत्ययो- दय) किस प्रकार होते हैं ? इस प्रश्न के उत्तर में कहा गया है कि आत्मा, बुद्धि, मन, इन्द्रिय, विषय और प्रकाश का संयोग होने पर अज्ञानरूप उपाधि के कारण बुद्धि से नाना प्रकार के ज्ञान होते हैं। यहाँ ज्ञातव्य यह है—आत्मा को असंग बताया जाता है। जब कि वह असंग है, तब उससे किसी का भी सम्बन्ध होना कभी संभव ही नहीं हो सकता। तथापि यहाँ पर बुद्धि आदि के साथ उसका संबंध बताया जा रहा है, वह कैसे संगत हो सकता है ? उसका उत्तर यही होगा कि वास्तव में आत्मा के साथ उनका सम्बन्ध नहीं है, तथापि अज्ञानरूप उपाधि के कारण कल्पित संबंध माना जाता है, उस कारण यह भेदज्ञान होता है। कोई भी ज्ञान, आत्मा के बिना तो होता ही नहीं, अतः उसका संबंध तो मानना ही पड़ेगा। बुद्धि, ज्ञान का आश्रय है। मन, साधारण कारण है। इन्द्रियाँ, विशेष कारण हैं। विषय, निमित्त कारण है। प्रकाश के बिना वस्तु की प्रतीति होती नहीं, इसलिये वह भी उसके ज्ञान में कारण है। एवं च अविद्यापरिकल्पित उपाधियों का और आत्मा का विवेक उपलब्ध न होने से अनर्थात्मक विचित्र संसार की प्रतीति होती रहती है ॥ ३५ ॥ विविच्यास्मात्स्वमात्मानं *विद्याच्छुद्धं परं पदम् । द्रष्टारं सर्वभूतस्थं समं सर्वभयातिगम् ॥३६॥ विविच्येति—मुमुक्षु पुरुष को चाहिये कि वह बुद्धि आदि के संघात से आत्मा का विवेक करे यानी आत्मा को पृथक् समझे। उसे शुद्ध, साक्षी, सर्वभूतान्तर्यामी, निर्विशेष (सम) और सर्वभयातीत प्राप्तव्य स्थान समझे ॥ ३६ ॥ हृदयस्पशिनी अविद्या और उसकी कार्यरूप उपाधियों के साथ आत्मा का विवेक (भेद) उपलब्ध न हो सकने से ही संसार का प्रतिभास हुआ करता है, यह निश्चित हो जाने पर मुमुक्षु का कर्तव्य बताते हैं—इस बुद्धि आदि के संघात से विवेक करके मुमुक्षु पुरुष को अपने परमप्राप्तव्य, शुद्ध, साक्षी, सर्वभूतान्तर्यामी, निर्विशेष, सर्वभयातीत (आत्मा का ज्ञान प्राप्त करना चाहिये) ॥ ३६ ॥

  • विन्द्यात्०—पाठान्तरम् ।

नान्यदन्यत्प्रकरणम् १११ समस्तं सर्वगं शान्तं विमलं व्योमवत्स्थितम् । निष्कलं निष्क्रियं सर्वं नित्यं द्वन्द्वैर्विर्वाजितम् ॥३७॥ समस्तमिति—सर्वस्वरूप, सर्वगत, शान्त, निर्मल, आकाश की तरह सर्वत्र व्याप्त, निरवयव (निष्कलं), निष्क्रिय, सर्वमय, नित्य एवं सुख-दुःखादि द्वन्द्वों से रहित इस प्रकार से आत्मा को समझना चाहिये ॥ ३७ ॥ हृदयस्पर्शिनी उसी वेद्य आत्मस्वरूप को पुनः अन्य विशेषणों से युक्त करके बता रहे हैं—सर्वस्वरूप, सर्वगत, शान्त, निर्मल, आकाश के समान सर्वत्र स्थित, निरवयव, निष्क्रिय, सर्वमय, नित्य, एवं सुख-दुःखादि द्वन्द्वों से रहित आत्मा का ज्ञान प्राप्त करना चाहिए। मूल में ‘समस्त’ और ‘सर्व’ शब्द प्रयुक्त हुए देखकर पुनरुक्ति की शंका नहीं करनी चाहिये। क्योंकि 'समस्त' शब्द 'आत्मा' को और 'सर्व' शब्द 'ब्रह्म' को बता रहे हैं अतः पुनरुक्ति नहीं है। यहाँ पर विधि-मुखेन और निषेधमुखेन जिन विशेषों का निर्देश किया गया है, उन सबका ‘त्वम्’ पदार्थ ‘साक्षी’ में, और ‘तत्’ पदार्थ-‘ब्रह्म’ में अनुसन्धान करके इन दोनों की तुल्यलक्षणता का निश्चय करके ‘तत्त्वमसि’ वाक्य से ‘अहं ब्रह्म’ इस प्रकार निश्चय कर ले ॥ ३७ ॥ सर्वप्रत्ययसाक्षी ज्ञः कथं ज्ञेयो मयेत्युत । विमृश्यैवं विजानीयाज्ज्ञानकर्म न वेति वा ॥३८॥ सर्वेति—सर्वविध प्रतीतियों का साक्षी जो ज्ञानस्वरूप आत्मा है, वह कैसा है ? वह मेरा ज्ञेय है या नहीं ? वह किसी प्रकार के ज्ञान का कर्म है या नहीं ? यह सब विचार करते हुए आत्मतत्त्व को जानना चाहिये ॥ ३८ ॥ हृदयस्पर्शिनी अपनी आत्मा के रूप में ही ब्रह्म को जाने, इस प्रकार जो बताया, उसी के सम्बन्ध में मुमुक्षु को पुनः कुछ और भी शिक्षा देते हैं—समस्त प्रतीतियों का साक्षी जो ज्ञानस्वरूप आत्मा है, वह कैसा है ? उसका विचार करना चाहिए। ‘कथं’ शब्द से सूचित ‘विमर्श’ को बता रहे हैं—वह आत्मा क्या घट आदि की तरह ज्ञेय है, अथवा नहीं ? यदि ज्ञेय हो तो क्या वह किसी प्रकार के ज्ञान का कर्म है, या नहीं ? इस प्रकार विचार कर ‘प्रत्यग्भूत अविषयत्वेन ज्ञात होनेवाला ब्रह्म है, वह किसी का विषय नहीं है’—इस रीति से आत्मतत्त्व को भी जानना चाहिए ॥ ३८ ॥ अदृष्टं द्रष्टृविज्ञातं दभ्रमित्यादिशासनात् । नैव ज्ञेयं मयाऽन्यैर्वा परं ब्रह्म कथंचन ॥३९॥ अदृष्टमिति—आत्मा दृश्य (दिखाई देने वाला) नहीं है, वह तो सबको देखने वाला (द्रष्टा) है, ‘जो ज्ञान का विषय (ज्ञेय) होता है, वह तो अल्प होता है’—ऐसा श्रुतिवचन है। अतः परब्रह्म मेरे अथवा किसी अन्य के द्वारा किसी प्रकार से भी ज्ञेय नहीं है ॥ ३९ ॥ हृदयस्पर्शिनी उक्त रीति से विमर्श करने पर ब्रह्म और आत्मा के सम्बन्ध में जो ज्ञेयत्व पक्ष है, वह संभव नहीं हो सकता। ‘आत्मा दृश्य न होकर सबको देखनेवाला (द्रष्टा) है,’ ‘जो ज्ञान का विषय होता है, वह अल्प होता है’१ इत्यादि श्रुतिवाक्य होने के कारण परब्रह्म मेरे अथवा किसी अन्य के द्वारा किञ्चित् भी ज्ञेय नहीं है२। यदि उसे ज्ञेय कहेंगे तो उसमें अल्पत्व होगा और अल्पत्व होने पर अब्रह्मत्वापत्ति होगी ॥ ३९ ॥ स्वरूपाव्यवधानाभ्यां ज्ञानालोकस्वभावतः । अन्यज्ञानानपेक्षत्वाज्ज्ञातं *चैव सदा मया ॥४०॥ १. ‘‘यदि मन्यसे सुवेदेति दभ्रमेवापि नूनं त्वं वेत्थ ब्रह्मणोरूपम्’’—(के० उ० ९) २. ‘‘अदृष्टमविज्ञातम्’’—( बृ० उ० ३।८।११ )

  • ब्रह्म०—पाठान्तरम् ।

११२ उपदेशसाहस्री स्वरूपेति-आत्मा तो मेरा स्वरूप है और मुझसे सर्वथा व्यवधानरहित है, तथा वह चैतन्यप्रकाशस्वरूप है, इसलिये उसे किसी अन्य ज्ञान की अपेक्षा नहीं रहती। अतः वह सर्वदा मुझे ज्ञात ही है। क्योंकि वह स्वयंप्रकाश और निरावरण है। अतः वह नित्य ज्ञानस्वरूप है, किसी भी अवस्था में वह अज्ञात नहीं है ॥ ४० ॥ हृदयस्पशिनी उपर्युक्त श्लोक के अनुसार ज्ञेयत्व का उसमें संभव नहीं है, तो 'आत्मन्येवात्मानं पश्येत्' - आत्मा में ही आत्मा को देखे इत्यादि उपदेश कैसे किया है ? यह शंका होती है, उसके समाधान में कहते हैं कि अविषयत्वेन आत्म- तत्त्वविज्ञान का आविर्भाव मात्र होता है। आत्मतत्त्व को विषय बनाकर उसका ज्ञान नहीं होता । क्योंकि 'यस्यामतं- तस्य मतं यस्य न वेद सः' यह श्रुति है। ज्ञाता से भिन्न जो पदार्थ, वे अन्य देश आदि से व्यवहित और जड़ होते हैं, उनके लिये ज्ञान आदि का व्यवहार होता है। नित्य चैतन्यस्वरूप में ज्ञान होने का व्यवहार संभव नहीं, क्योंकि उसका तो स्वतः स्फुरण होता ही रहता है ॥ ४० ॥ नान्येन ज्योतिषा कार्यं रवेरात्मप्रकाशने । स्वबोधान्नान्यबोधेच्छा बोधस्यात्मप्रकाशने ॥४१॥ नान्येनेति-जिस प्रकार सूर्य को अपना स्वरूप प्रकाशित करने के लिये किसी अन्य ज्योतिर्मय पदार्थ (प्रकाश) की आवश्यकता नहीं होती, उसी प्रकार बोध (ज्ञान) स्वरूप आत्मा को अपना बोध कराने के लिये आत्म- चैतन्य के अतिरिक्त किसी अन्य चैतन्य की आवश्यकता नहीं रहती ॥ ४१ ॥ हृदयस्पशिनी जैसे सूर्य को अपना स्वरूप प्रकाशित करने के लिए किसी अन्य ज्योतिर्मय पदार्थ की आवश्यकता नहीं होती, वैसे ही ज्ञानस्वरूप आत्मा को अपना ज्ञान (बोध) कराने के लिये आत्मचैतन्य के अतिरिक्त किसी अन्य चैतन्य की आवश्यकता नहीं रहती ॥ ४१ ॥ न तस्यैवान्यतोऽपेक्षा स्वरूपं यस्य यद्‌भवेत् । प्रकाशान्तरदृश्यो न प्रकाशो ह्यस्ति कश्चन ॥४२॥ न तस्येति-जिस पदार्थ का जो स्वरूप होता है, उसे अपने स्वरूप को प्रकाशित करने के लिये किसी अन्य की अपेक्षा नहीं होती। ऐसा कोई भी प्रकाश नहीं है, जो किसी अन्य प्रकाश से प्रकाशित होता हो ॥ ४२ ॥ हृदयस्पशिनी जो जिसका स्वरूप होता है, उसकी सिद्धि के लिए उसे किसी दूसरे की आवश्यकता नहीं रहती। ऐसा कोई भी प्रकाश नहीं है, जो किसी अन्य प्रकाश से प्रकाशित होता हो। अनुमान प्रयोग इस प्रकार होगा-'आत्मा न अन्यतो ज्ञानमपेक्षते तत्स्वरूपत्वात्, यद् यस्य स्वरूपं तत् न अन्यतस्तदपेक्षते, यथा प्रकाशरूपः सविता, न प्रकाशमन्यतोऽ- पेक्षते, तथा चायं, तस्मात्तथा। किंच- 'नात्मा प्रकाशान्तरदृश्यः, प्रकाशरूपत्वात्, आदित्यवत्' ॥ ४२ ॥ व्यक्तिः स्यादप्रकाशस्य प्रकाशात्मसमागमात् । प्रकाशस्त्वर्ककार्यः स्यादिति मिथ्यावचो ह्यतः ॥४३॥ व्यक्तिरिति-यदि यह कहें कि आत्मा, परप्रकाशय भले ही न हो किन्तु उसे स्वप्रकाशय तो कहना ही होगा, अर्थात् अपने प्रकाश का विषय तो वह होगा ही । किन्तु यह कहना भी उचित नहीं है, क्योंकि जो वस्तु, प्रकाशशून्य (प्रकाशरहित ) होती है, उसी की अभिव्यक्ति, प्रकाशरूप वस्तु की सन्निधि होने पर हुआ करती है। इसलिये प्रकाश को सूर्य का कार्य समझना अर्थात् 'प्रकाश सूर्य का कार्य है' - यह वाक्य मिथ्या है ॥ ४३ ॥

नान्यदन्यत्प्रकरणम् ११३ हृदयस्पर्शिनी यदि कहें कि परप्रकाश्य न होने पर भी (प्रकाशान्तर से दृश्य न रहने पर भी) आत्मा स्वप्रकाश्य (अपने प्रकाश का विषय-स्वरूपप्रकाशदृश्य) ही क्यों न होगा ? जैसे सूर्य, घट-पट आदि वस्तुओं को प्रकाशित करता हुआ अपने को भी प्रकाशित करता ही है, उसी प्रकार आत्मा भी दृश्य को प्रकाशित (अवभासित) करता हुआ स्वयं अपने को भी प्रकाशित करेगा। किन्तु यह कहना ठीक नहीं है, क्योंकि जो वस्तु प्रकाशशून्य होती है, उसी की, प्रकाशस्वरूप वस्तु की सन्निधि में रहने पर अभिव्यक्ति हुआ करती है। अतः प्रकाश को सूर्य का कार्य कहना मिथ्या है ॥ ४३ ॥ यतोऽभूत्वा भवेद्यच्च तस्य तत्कार्यमिष्यते । स्वरूपत्वादभूत्वा न प्रकाशो जायते रखेः ॥४४॥ यत इति—जो वस्तु पहले नहीं है, किन्तु उत्तर क्षण में जिससे होती है, उसे उसका कार्य कहा जाता है। सूर्य का प्रकाश तो उसका अपना स्वरूप ही है। वह पहले नहीं था, बाद में उत्पन्न हुआ हो—यह बात नहीं है ॥ ४४ ॥ हृदयस्पर्शिनी जो वस्तु पहले न होकर बाद में जिससे होती है, वह उसका कार्य कही जाती है। किन्तु सूर्य का प्रकाश तो उसका अपना स्वरूप है। 'वह पहले नहीं था, बाद में उत्पन्न हुआ' यह नहीं कह सकते ॥ ४४ ॥ सत्तामात्रे प्रकाशस्य कर्त्ताऽऽदित्यादिरिष्यते । घटादिव्यक्तितो यद्वत्तद्वद्बोधात्मनोष्यताम् ॥४५॥ सत्तेति—जिस प्रकार प्रकाश के रहने से घट-पटादि पदार्थों की अभिव्यक्ति होती है। अतः सूर्य आदि को प्रकाश का कर्त्ता माना जाता है। उसी प्रकार भिन्न-भिन्न पदार्थों का ज्ञान होने के कारण आत्मा को बोध का कर्ता कह दिया करते हैं। किन्तु वास्तव में उसमें (आत्मा में) किसी प्रकार का कोई कर्तृत्व नहीं है ॥ ४५ ॥ हृदयस्पर्शिनी यदि कहें कि प्रकाशस्वरूप आदित्य (सूर्य) को प्रकाशक (प्रकाश करनेवाला), और बोध (ज्ञान) स्वरूप आत्मा को बोद्धा (ज्ञाता) कैसे कहा जाता है ? जिस प्रकार प्रकाश की सत्तामात्र से घट-पटादि वस्तुओं की अभिव्यक्ति होने के कारण सूर्य को प्रकाशक कहा जाता है, उसी प्रकार बोधस्वरूप आत्मा में स्वाध्यस्त वस्तु की सन्निधिमात्र रहने पर वह सबका ज्ञाता (बोधक) कहा जाता है, वास्तव में वह कर्ता नहीं है ॥ ४५ ॥ बिलात्सर्पस्य निर्याणे सूर्यो यद्वत्प्रकाशकः । प्रयत्नेन विना तद्वज्ज्ञाताऽऽत्मा बोधरूपतः ॥४६॥ बिलादिति—जिस प्रकार सर्प, बिल से बाहर जब निकलता है तब बिना किसी प्रयत्न के ही सूर्य, उसका प्रकाशक हो जाता है। उसी प्रकार बोधस्वरूप होने के कारण आत्मा भी किसी विकार को प्राप्त हुए बिना ही सभी का ज्ञाता होता है ॥ ४६ ॥ हृदयस्पर्शिनी अपने में (स्वगत) विकार हुए बिना ही आत्मा, अर्थप्रकाशक होता है, इसे सूर्य के दृष्टान्त से बताते हैं— जैसे सर्प अपने बिले से बाहर निकलता है, तब उसे प्रकाशित करने के लिए सूर्य को कोई प्रयत्न नहीं करना पड़ता, बिना प्रयत्न के ही वह सर्प को प्रकाशित करता है, उसी प्रकार आत्मा बोधस्वरूप होने के कारण बिना प्रयत्न के ही (विकार को प्राप्त हुए बिना ही) ज्ञाता कहा जाता है ॥ ४६ ॥ १५

११४ उपदेशसाहस्री दग्धैवमुष्णः सत्तायां तद्वद्*बोधात्मनीष्यताम् । सत्येव यदुपार्थौ तु ज्ञाते सर्प इवोत्थिते ॥४७॥ दग्धैवमिति—जिस प्रकार उष्ण स्वभाववाला अग्नि, किसी बाह्य वस्तु के समीप रहने पर अपनी सत्ता- मात्र से उसका दाहक हो जाता है। उसी प्रकार बोध्य वस्तु के समीप रहने मात्र से आत्मा उसका बोद्धा कहलाता है। जैसे बिल के बाहर निकले हुए उपाधिभूत सर्प के ज्ञात होने पर ही सूर्य को उसका प्रकाशक कहा करते हैं। वैसे ही आत्मा का बोद्धृत्व भी औपाधिक ही है ॥ ४७ ॥ हृदयस्पर्शिनी अब अन्वय-व्यतिरेक के द्वारा अर्थात् उपाधि के रहने पर ही ज्ञातृत्व व्यवहार, और उपाधि के न रहने पर उसका (ज्ञातृत्व व्यवहार का) न होना—इस अन्वय-व्यतिरेक के द्वारा (‘तत्सत्त्वे तत्सत्त्वम्, तदभावे तदभावः’ यही अन्वय-व्यतिरेक का स्वरूप है) इस प्रकार ज्ञातृत्व औपाधिक है, यह बताने के लिये एक अन्य उदाहरण दे रहे हैं— जिस प्रकार उष्ण स्वभाववाला अग्नि दाह्य वस्तु के सन्निध रहने पर अपनी सत्तामात्र से उसका ( दाह्य वस्तु का ) दाहक होता है। अतः अग्नि में दाहकत्व औपाधिक कहा जाता है, उसी प्रकार बोध्य वस्तु की सन्निधि रहने पर अपनी सत्तामात्र से आत्मा में बोद्धृत्व (ज्ञातृत्व) समझना चाहिए। जिस तरह बिल से निकले हुए उपाधिभूत सर्प के ज्ञात होनेपर ही सूर्य उसका प्रकाशक कहा जाता है, सर्प के ज्ञात न रहने पर नहीं, उसी प्रकार उपाधि के (ज्ञेय पदार्थ के) ज्ञात होनेपर ही आत्मा को ज्ञाता कहा जाता है, अन्यथा नहीं । अतः आत्मा में ज्ञातृत्व ( बोद्धृत्व ) व्यवहार औपचारिक ही है ॥ ४७ ॥ ज्ञाताऽयत्नोऽपि तद्वज्ज्ञः कर्ता भ्रामकवद्‌भवेत् । स्वरूपेण स्वयं नात्मा ज्ञेयोऽज्ञेयोऽथवा ततः ॥४८॥ ज्ञातेति—जिस प्रकार प्रयत्न के बिना ही ज्ञानस्वरूप आत्मा सभी का ज्ञाता कहलाता है, उसी तरह भ्रामक (सूर्य और चुम्बक) के समान वह आत्मा कर्ता भी कहा जाता है। अतः स्वयं स्वरूप से तो आत्मा न ज्ञेय है और न अज्ञेय है ॥ ४८ ॥ हृदयस्पर्शिनी पूर्व श्लोक से आत्मा के औपाधिक ज्ञातृत्व को सूर्य के दृष्टान्त से बताकर, उसी दृष्टान्त से उसका (आत्मा का) कर्तृत्व भी औपाधिक है—उसे बता रहे हैं। जिस प्रकार यह ‘ज्ञ’ अर्थात् ज्ञानस्वरूप आत्मा, बिना प्रयत्न के ही सबका ज्ञाता है, उसी प्रकार स्वगत किसी विशेष के न रहने पर भी (स्वगतविशेषशून्य होने पर भी) भ्रामक के समान केवल अपनी सत्तामात्र से सन्निहित कारकों को प्रेरित करता हुआ क्रिया का कर्ता कहा जाता है। ‘भ्रामक’ शब्द से सूर्य या चुम्बक (अयस्कान्त) दोनों समझे जाते हैं। क्योंकि सोये हुए पुरुषों को अपनी सत्तामात्र से जगाकर कार्य में प्रवृत्त करने के कारण सूर्य को ‘भ्रामक’ कहते हैं। उसी तरह अपनी सत्तामात्र से सन्निहित लोहखण्ड को अपनी ओर आकर्षित कर लेने के कारण ‘चुम्बक’ को भी ‘भ्रामक’ कहते है। इस प्रकार ‘व्यक्तिः स्यादप्रकाशस्य’—(१५/४३) से आरंभ कर प्रसंगप्राप्त आत्मा के ज्ञानकर्मत्व-अकर्मत्व के द्वारा समर्थित उसके (आत्मा के) अज्ञेयत्व पक्ष और ज्ञेयत्व पक्ष का अब उपसंहार कर रहे हैं। पूर्व श्लोक में बता चुके हैं कि जैसे भ्रामक स्वगतचलनशून्य होकर भी सन्निहित लौह का प्रेरक होता है, उसी तरह आत्मा निश्चल रहता हुआ भी चिदाभासोपेत मोहादि परिणाम की दृष्टि से उसमें कर्तृत्व व्यवहार किया जाता है। किन्तु वास्तव में वह तो निर्विशेष है, स्वभाव से ही वह अलुप्तप्रकाशस्वरूप वाला है। उस कारण वह स्वयं स्वरूपतः ही (असाधारण स्वभाव वाला होने से ही) ज्ञानक्रिया से व्याप्त अर्थात् ज्ञेय नहीं होता, तथा अज्ञेय भी नहीं रहता अर्थात् व्यवहित वस्तु के समान ज्ञानप्रकाशरहित भी नहीं है। ‘अथवा’ शब्द से बता रहे हैं कि वस्तुतः वह आत्मा निर्विकार होने से न किसी का ज्ञाता है, और चैतन्यस्वरूप होने से न किसी का अज्ञाता है। तथा अध्यस्त कारकों का अधिष्ठान होने से उसे कर्ता भी कह देते हैं, और निर्व्यापार रहने से उसे कर्ता नहीं भी मानते । एवंच यह आत्मा, ज्ञाता भी नहीं, कर्ता भी नहीं, न वह ज्ञेय है, और न अज्ञेय है, न कार्य है, न प्राप्य है, न हेय है, इस प्रकार उसकी सर्वविशेषशून्यता सिद्ध हो जाती है ॥ ४८ ॥

  • बोद्धात्म०—पाठान्तरम्

नान्यदन्यत्प्रकरणम् ११५ विदिताविदिताभ्यां तदन्यदेवेति शासनात् । बन्धमोक्षादयो भावास्तद्वदात्मनि कल्पिताः ॥४९॥ विदितेति—"आत्मा विदित और अविदित से अन्य ही है" इस प्रकार श्रुति का शासन रहने से ज्ञातृत्व और कर्तृत्व के समान ही बन्ध-मोक्षादि भाव भी आत्मा में कल्पित ही समझने चाहिये ॥ ४९ ॥ हृदयस्पर्शिनी 'अन्यदेव तद्विदितादथो अविदितादधि'¹—आत्मा, विदित और अविदित से अन्य ही है—अर्थात् कार्य- कारण से अतिरिक्त ही यह आत्मतत्त्व 'ब्रह्म है'—इस प्रकार श्रुति का उपदेश होने से कार्य-कारण-धर्मविलक्षण- स्वभाववाला ही यह आत्मा है। एवंच जैसे आत्मा में ज्ञातृत्व, कर्तृत्व, कारणत्व आदि सब कुछ अविद्यावशात् ही कल्पित है, तथा बन्ध-मोक्ष, छिन्न-भिन्न, सुखी-दुःखी इत्यादि भाव आत्मा में कल्पित ही हैं, वास्तविक नहीं हैं ॥ ४९ ॥ नाहोरात्रे यथा सूर्ये प्रभारूपाविशेषतः । बोधरूपाविशेषात्तु बोधाबोधौ तथाऽऽत्मनि ॥५०॥ नाहोरात्र इति—जिस प्रकार समान भाव से प्रकाशस्वरूप होने के कारण सूर्य में दिन और रात्रि नहीं है, उसी प्रकार आत्मा के ज्ञानस्वरूप में कोई विशेषता न होने के कारण उसमें (आत्मा में) ज्ञान और अज्ञान भी नहीं हैं ॥ ५० ॥ हृदयस्पर्शिनी आत्मा में बन्धादिकों को कल्पित बताने में दृष्टान्त के साथ हेतु भी बता रहे हैं—जिस प्रकार समान भाव से प्रकाशस्वरूप होने के कारण सूर्य में दिन और रात्रि नहीं हैं, उसी प्रकार आत्मा के ज्ञानस्वरूप में कोई विशेषता न होने के कारण उसमें ज्ञान और अज्ञान भी नहीं है। अबोधनिबन्धन बन्ध है, और बोधनिबन्धन मोक्ष है। एवंच आत्मा के स्वरूप में बोध और अबोध उन दोनों के अभाव में बन्ध और मोक्ष इन दोनों का भी अभाव है ॥ ५० ॥ यथोक्तं ब्रह्म यो वेद हानोपादानवर्जितम् । यथोक्तेन विधानेन स सत्यं नैव जायते ॥५१॥ यथोक्तमिति—जो मुमुक्षु उपर्युक्त प्रकार से ग्रहण-त्याग से रहित ब्रह्म को जान लेता है, उसे पुनः जन्म नहीं प्राप्त होता—यह सत्य है ॥ ५१ ॥ हृदयस्पर्शिनी उपर्युक्त उपायों के द्वारा अभिहित स्वरूप के ब्रह्म को जो जान लेता है, उसकी फलप्राप्ति को बता रहे हैं— जो व्यक्ति ऊपर निर्दिष्ट की हुई रीति से ग्रहण-त्यागशून्य ब्रह्म को जानता है, वह पुनः जन्म नहीं लेता, इसमें (इसकी सत्यता में) किसी प्रकार का भी सन्देह नहीं है। 'न स भूयोऽभिजायते'²—यह उक्त कथन में प्रमाण है। 'हानोपादानवर्जितम्' कहने से हानोपादानकर्तृत्व और कर्मत्व की व्यावृत्ति हो जाती है। इस कारण समस्त विशेषों का प्रतिषेध हो जाता है, क्योंकि सभी विशेष, परिग्रह-परित्यागरूप हुआ करते हैं ॥ ५१ ॥ जन्ममृत्युप्रवाहेषु पतितो नैव शक्नुयात् । इत उद्धर्तुमात्मानं ज्ञानादन्येन केनचित् ॥५२॥ जन्मेति—जन्म मृत्यु के प्रवाह में पडा हुआ मनुष्य, ज्ञान के अतिरिक्त किसी अन्य साधन (उपाय) के द्वारा इस प्रवाह से अपने को उबार नहीं सकता ॥ ५२ ॥ १. (के. उ. १।३) २. (भ. गी. १३।२३)

११६ उपदेशसाहस्री हृदयस्पर्शिनी यदि कोई कहे कि यथोक्त ब्रह्मज्ञान के बिना भी यथोक्त फल प्राप्त हो सकता है, अतः ब्रह्मज्ञान प्राप्त करने की क्या आवश्यकता ? इस शंका के समाधान में कह रहे हैं कि जन्म-मृत्यु के प्रवाह में पतित मनुष्य ज्ञान के अतिरिक्त किसी अन्य साधन के द्वारा इस जन्म-मरण के प्रवाह से अपना उद्धार नहीं कर सकता। श्रुति भी कहती है—‘नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय’१—इससे उद्धार चाहनेवाला व्यक्ति, ब्रह्मज्ञान को ही प्राप्त करे। और कोई दूसरा उपाय नहीं है ।। ५२ ।। “भिद्यते हृदयग्रन्थिश्छिद्यन्ते सर्वसंशयाः । क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन्दृष्टे” इति श्रुतेः ॥५३॥ भिद्यत इति—“मोक्ष प्राप्ति का एकमात्र उपाय ज्ञान ही है”—इस कथन में यह श्रुतिवचन प्रमाण है— ‘आत्मा का साक्षात्कार हो जाने पर प्रवाहपतित इस पुरुष के हृदय की कामादिरूप ग्रन्थि टूट जाती है, उसके समस्त संशय ( सन्देह ) निवृत्त हो जाते हैं, तथा सम्पूर्ण कर्म क्षीण हो जाते हैं’ ॥ ५३ ॥ हृदयस्पर्शिनी इस विषय में अथर्वोपनिषद् वाक्य को प्रमाणरूप से उद्धृत कर रहे हैं। “उस आत्मतत्त्व का साक्षात्कार (ज्ञान) हो जानेपर इस मुमुक्षु व्यक्ति के हृदय की काम-क्रोधादि ग्रन्थि टूट जाती है, उसके समस्त सन्देहों की निवृत्ति हो जाती है, तथा समस्त कर्म क्षीण हो जाते हैं,’ ॥ ५३ ॥ ममाहमित्येतदपोह्य सर्वतो विमुक्तदेहं पदमम्बरोपमम् । सुदृष्टशास्त्रानुमितिभ्य ईरितं विमुच्यतेऽस्मिन्यदि निश्चितो नरः ॥५४॥ ममेति—सम्यक् अनुशीलन किये हुए शास्त्र और अनुमान के द्वारा, स्थूल-सूक्ष्म उभयविध देहों से रहित, आकाश के सदृश ब्रह्म का निरूपण किया गया। यदि मुमुक्षु पुरुष सर्वथा ममता और अहंता को त्याग कर उसमें अपनी बुद्धि को स्थिरता से निश्चित कर ले तो अवश्य ही वह मुक्त होगा, यह नितान्त सत्य है ॥ ५४ ॥ हृदयस्पर्शिनी इस ‘नान्यदन्यत्प्रकरण’ का संक्षेप में उपसंहार कर रहे हैं—यथार्थ रूप में विचार किये हुए शास्त्र और अनुमान के द्वारा स्थूल-सूक्ष्म द्विविध शरीरों से रहित यह प्रत्यक्तत्त्व आकाश के समान वर्णित ब्रह्म ही है, ऐसा निश्चय सर्वथैव अहंकार-ममता आदि विकारों का त्याग कर मुमुक्षु यदि कर ले, तो वह अवश्य ही मुक्त हो जाता है। क्योंकि यह ब्रह्मात्मैक्यभाव श्रुति-स्मृति से निर्धारित है, कल्पित नहीं है। अतः उसमें असंभावना नहीं करनी चाहिए ॥ ५४ ॥ ॥ इति पञ्चदशं नान्यदन्यत्प्रकरणं समाप्तम् ॥ १. ( श्वे. उ. ३।८ तथा ६।१५ )

पार्थिवप्रकरणम् पार्थिवः कठिनो धातुर्द्रवो देहे स्मृतोऽम्भयः । पक्तिश्चेष्टावकाशाः स्युर्वह्नवाय्वम्बरोद्भूवाः ॥१॥ पार्थिव इति—देह [ शरीर ] में माँस आदि कठिन धातु पृथिवी के विकार हैं, तरल ( द्रव ) रुधिरादि धातु जल के विकार हैं, और पाक, चेष्टा तथा अवकाश क्रमशः अग्नि, वायु, और आकाश के कार्य हैं। इसलिये पञ्चभूतों का परिणामरूप यह शरीर 'आत्मा' नहीं है ॥ १ ॥ हृदयस्पर्शिनी पूर्व प्रकरण में एकदेशिमत (भेदाभेदवाद) का खण्डन करते हुए यह सिद्ध कर चुके हैं कि ब्रह्मैकत्व (ब्रह्मात्मैक्य) ज्ञान ही स्वरूपावस्थानरूप मोक्ष का साधन है, भेदाऽभेदज्ञान नहीं। अब सम्पूर्ण तार्किकों के मत का खण्डन करके मुमुक्षु को स्वाराज्य पर अभिषिक्त करने के लिये यह 'पार्थिवप्रकरण' आरम्भ किया जा रहा है। इसमें सर्वप्रथम स्थूल शरीर को आत्मा मानने वालों के मत का निराकरण कर रहे हैं। स्थूल शरीर में मांसादिरूप जो कठिन धातु है, वह पार्थिव (पृथिवी का अंश, परिणाम, विकार) है, और रुधिरादि जो तरल धातु है, वह अम्मय (जल का परिणाम, विकार) है, और पाक (पक्ति), स्पन्दन (चेष्टा) और अवकाश (अन्न-पान-मन के सञ्चार मार्ग अर्थात् शरीरगत सुषिर=छिद्र) क्रमशः अग्नि, वायु और आकाश के कार्य हैं अर्थात् शरीरानुगत अग्नि आदि अंशों के कार्यरूप हैं। इस कारण पञ्चभूतों का परिणामभूत देह (शरीर) आत्मा नहीं है। वल्मीक जैसे बाह्यभूत के समान इस भौतिक शरीर को अनात्मा ही समझना चाहिये ॥ १ ॥ घ्राणादीनि तदर्थाश्च पृथिव्यादिगुणाः क्रमात् । रूपालोकवदिष्टं हि सजातीयार्थमिन्द्रियम् ॥२॥ घ्राणेति—घ्राणादि इन्द्रियाँ और उनके विषय गन्धादि क्रमशः पृथिवी आदि भूतों के गुण हैं, क्योंकि रूप और प्रकाश के समान इन्द्रिय और उनके विषय, दोनों को सजातीय माना गया है ॥ २ ॥ हृदयस्पर्शिनी इन्द्रियों को आत्मा माननेवालों के मत का निराकरण कर रहे हैं— घ्राणादि इन्द्रियाँ और उनके गन्धादि विषय, क्रमशः पृथिवी आदि भूतों के गुण हैं, अर्थात् कार्य हैं। पृथिवी, जल, तेज, वायु और आकाश के क्रमशः गन्ध, रस, रूप, स्पर्श और शब्द ये प्रसिद्ध धर्म हैं। ये सब घ्राणादि एक- एक इन्द्रिय से ग्राह्य हैं—यह अन्वय-व्यतिरेक से सिद्ध है। रूप और प्रकाश के समान इन्द्रिय और उनके विषय दोनों सजातीय माने गये हैं। जो इन्द्रिय, जिसके धर्म का ग्रहण करती है, अर्थात् यज्जातीय के अर्थ को प्रकाशित करती है, वह इन्द्रिय उसकी सजातीय हुआ करती है—जैसे तैजस रूप का प्रकाशक दीपादि, तैजस देखा गया है। उसी तरह इन्द्रियाँ भी भौतिक पदार्थों की प्रकाशक होने से भौतिक ही हैं। नेत्र तेज का कार्य है, उसका विषय रूप भी तेज का ही कार्य है। इसी प्रकार घ्राण और गन्ध, रसना और रस, त्वक् और स्पर्श, श्रोत्र और शब्द भी क्रमशः पृथवी, जल, वायु एवं आकाश के ही कार्य हैं। इससे गृहीता और ग्राह्य का साजात्य सिद्ध होता है। सम्पूर्ण प्रपञ्च का चरम गृहीता आत्मा है। अतः उसका ग्राह्य सम्पूर्ण प्रपञ्च भी वस्तुतः आत्ममय ही होना चाहिये। इसी कारण प्रमातृ चैतन्य और विषयचैतन्य के संयोग से ही प्रत्यक्षादि प्रमा की उत्पत्ति कही गई है। अतः प्रमाता, प्रमेय और प्रमा सभी चिन्मय हैं। इसीलिये श्रुति कह रही है कि 'सर्वं ब्रह्ममयं जगत्'—सब कुछ ब्रह्म ही है—यही सिद्धान्त है। अनुमान प्रयोग इस प्रकार होंगे—'घ्राणं पार्थिवं, रूपादिषु गन्धस्यैव व्यञ्जकत्वात् हिङ्गुवत् ।', 'रसनम् आप्यं रसादिषु रसस्यैव व्यञ्जकत्वात्

११८ उपदेशसाहस्री आस्योदकवत्।' 'चक्षुः तैजसं रूपादिषु रूपस्यैव व्यञ्जकत्वात् दीपवत्।' 'त्वग् वायवीया स्पर्शादिषु स्पर्शस्यैव अभिव्यञ्जकत्वात् व्यजनवायुवत्।' 'श्रोत्रम् आकाशीयम् शब्दादिषु शब्दस्यैव व्यञ्जकत्वात् वेणुदिवरवत्।' इन अनुमानों से इन्द्रियों का भौतिकत्व सिद्ध है, अतः घट-पटादि के समान इन्द्रियों का अनात्मत्व स्पष्ट है ॥ २ ॥ बुद्धयर्थान्याहुरेतानि वाक्पाण्यादीनि कर्मणे । तद्विकल्पार्थमन्तःस्थं मन एकादशं भवेत् ॥३॥ बुद्धयर्थानीति—घ्राण, रसना, चक्षु, त्वक् और श्रोत्र इन पाँच इन्द्रियों को ज्ञान का साधन कहते हैं, और वाक्, पाणि, पाद, पायु और उपस्थ—इन पाँच इन्द्रियों को कर्म का साधन कहते हैं। तथा इनके विकल्प के लिये आभ्यन्तर मन को ग्यारहवाँ इन्द्रिय कहा गया है ॥ ३ ॥ हृदयस्पर्शिनी इन्द्रियों का करणत्व (साधनत्व) अनुमान से भी सिद्ध है, अतः उन्हें 'आत्मा' नहीं कहा जा सकता । अनुमान प्रयोग इस प्रकार होगा—'इन्द्रियाणि, न आत्मानः, करणत्वात्, कुठारवत्' इति । अब उनके कार्यों को देखने से उनकी एकादश संख्या का निर्धारण किया जा रहा है। ये घ्राणादि इन्द्रियाँ ज्ञान (बुद्धि) के लिये होने से ज्ञान की साधना (करण) कही गयी हैं। तथा वाक्, पाणि (हाथ), पाद (पैर), पायु (मलेन्द्रिय), उपस्थ (मूत्रेन्द्रिय) ये पाँचों इन्द्रियाँ क्रमशः वचन, आदान (ग्रहण), गमन, विसर्ग (त्याग), और आनन्दरूप कर्मों के लिये होने से वे कर्म की साधन (करण) कही गयी हैं। उन दसों इन्द्रियों का युगपत् (एकसाथ) विषयसन्निधान होने पर क्रम से तत्तद् विषयों के ज्ञान का नियमन करने के लिये (विकल्पार्थ) जो एक अन्य इन्द्रिय माना जाता है, अर्थात् पूर्वोक्त दशसंख्याक इन्द्रियों की अपेक्षा जो एक अतिरिक्त एकादशवां (ग्यारहवां) अन्तःस्थ इन्द्रिय माना जाता है, उसे ही 'मन' कहते हैं। उसे अवश्य ही मानना होगा, क्योंकि आत्मा तो व्यापक है, उसका सभी इन्द्रियों के साथ निरन्तर समानरूप से सम्बन्ध है । यदि आत्मा और इन्द्रियों के सम्बन्ध (संयोग) से ही ज्ञान की उत्पत्ति कही जाय, तो प्रतिक्षण एक साथ ही (युगपत् ही) समस्त इन्द्रियजनित ज्ञान उत्पन्न होता रहता, परन्तु ऐसा होता नहीं। ऐसा न हो सकने में कारण 'मन' ही है। जिस इन्द्रिय के साथ मन का संयोग होता है, उसी इन्द्रिय के विषय का ज्ञान आत्मचैतन्य के द्वारा प्रकाशित होता है। मन का परिमाण 'अणु' माना गया है। उस कारण उसका (मन का) एक साथ (युगपत्) समस्त इन्द्रियों के साथ सम्बन्ध नहीं होता, अतएव उसे इन्द्रियजन्य ज्ञान के विकल्प का कारण (हेतु, निमित्त) कहा गया है। सर्वविध ज्ञानों के प्रति साधारण कारण के रूप में 'मन' को अवश्य ही मानना होगा। इस रीति से वह एकादशवाँ 'मन' भी साधन होने से इन्द्रियों के समान उसे भी अनात्मा ही समझना चाहिये ॥ ३ ॥ निश्चयार्था भवेद्बुद्धिस्तां सर्वार्थानुभाविनीम् । ज्ञाताऽऽत्मोक्तः स्वरूपेण ज्योतिषा व्यञ्जयन्सदा ॥४॥ निश्चयार्थेति—अन्तःकरण की निश्चयार्था वृत्ति को बुद्धि कहते हैं। तथा समस्त पदार्थों के अनुभव को कराने वाली उस बुद्धि को अपने स्वरूपभूत प्रकाश से सर्वदा अभिव्यक्त करनेवाले आत्मा को उस बुद्धि का ज्ञाता कहते हैं ॥ ४ ॥ हृदयस्पर्शिनी अब बौद्धों के मत का खण्डन करने के लिये बुद्धि का भी अनात्मत्व सिद्ध कर रहे हैं—'बुद्धिरपि न आत्मा, करणविशेषत्वात्, मनोवत्'—इस अनुमान से उसका अनात्मत्व स्पष्ट है। अब उसके स्वभाव को बताते हैं—जिस अन्तःकरणवृत्ति का प्रयोजन (फल) निश्चय (अर्थपरिच्छेद) करना है, उसे 'बुद्धि' कहते हैं। अर्थात् अन्तःकरण की निश्चयार्था वृत्ति को बुद्धि कहते हैं। वह निश्चय करने का साधन (करण) है। एवं च निश्चय का कारण (साधन) होने से उसे 'आत्मा' नहीं कह सकते। किञ्च अन्य (आत्मा) के द्वारा दृश्य (ज्ञेय) रहने से भी उसे आत्मा नहीं कह सकते । समस्त पदार्थों का अनुभव कराने वाली उस बुद्धि को अपने स्वरूपभूत प्रकाश से सर्वदा अभिव्यक्त करने वाला 'आत्मा' उसका ज्ञाता कहा जाता है। अतः आत्मा की ज्ञेय होने से बुद्धि भी 'आत्मा' नहीं है। यदि कोई कहे कि बुद्धि जैसी

पद्यभाग १६: पार्थिवप्रकरणम्

पार्थिवप्रकरणम् ११९ आत्मा के द्वारा ज्ञेय है, वैसे आत्मा भी किसी के द्वारा ज्ञेय होगा । उसका समाधान यह है कि प्रकाश, ज्ञान तो आत्मा का स्वरूप ही है। अतः वह किसी के द्वारा ज्ञेय नहीं है, वह तो स्वयंप्रकाश है। रूप और आलोक (प्रकाश) के समान भास्य और भासक का भेद रहने से भास्यरूप बुद्धि का भासक, उससे अन्य ही है, और वही आत्मा है ।। ४ ।। व्यञ्जकस्तु यथाऽऽलोको व्यङ्ग्यस्याकारतां गतः । व्यतिकीर्णोऽप्यसंकीर्णस्तद्वज्ज्ञः प्रत्ययैः सदा ॥५॥ व्यञ्जकस्त्विति-जैसे वस्तु (पदार्थ = विषय) के अभिव्यञ्जक (दीपक से होने वाला) प्रकाश, अपने व्यङ्ग्य विषय (वस्तु) के समान आकार वाला हो जाता है, किन्तु उसके साथ मिला हुआ प्रतीत होने पर भी वस्तुतः उससे मिलता नहीं है। उसी प्रकार चेतन आत्मा भी अपने प्रकाश्य प्रत्ययों से सर्वदा अलिप्त रहता है ॥ ५ ॥ हृदयस्पर्शिनो आत्मा को बुद्धि का प्रकाशक (भासक) मानने पर उस बुद्धि के संसर्ग से उसमें (आत्मा में) अशुद्धि आयेगी, किन्तु यह शंका ठीक नहीं है। जिस प्रकार विषय को प्रकाशित (अभिव्यक्त) करने वाला दीप का प्रकाश (दीपालोक) अपने घटादि व्यङ्ग्य विषय के समान आकार वाला हो जाता है, इस रीति से उसके साथ मिला हुआ (व्यतिकीर्ण, व्यामिश्र हुआ) प्रतीत होने पर भी वस्तुतः वह उससे मिला हुआ नहीं (असंकीर्ण, विविक्त-स्वभाव ही) रहता है, उसी तरह 'ज्ञ' (आत्मा, चेतन) भी अपने प्रकाश्य बुद्धिवृत्तियों (प्रत्ययों) से सर्वदा अलिप्त ही रहता है। अतः उसमें बुद्धिगत अशुद्धि के आने की कोई संभावना नहीं है। वह आत्मा नित्य शुद्ध ही है ॥ ५ ॥ स्थितो दीपो यथाऽयत्नतः प्राप्तं सर्वं प्रकाशयेत् । शब्दाद्याकारबुद्धीर्ज्ञः प्राप्तास्तद्वत्प्रपश्यति ॥६॥ स्थित इति - जिस प्रकार एक स्थान पर रखा हुआ दीपक अपने समीप स्थित सभी पदार्थों को बिना किसी प्रयत्न के ही प्रकाशित कर देता है, उसी प्रकार शब्द-स्पर्शादि के आकार में परिणत होकर प्राप्त हुई बुद्धिवृत्तियों को यह आत्मा साक्षी बना हुआ देखता रहता है ॥ ६ ॥ हृदयस्पर्शिनो यह आत्मा, बुद्धि आदि सभी पदार्थों से अत्यन्त विलक्षण और निर्व्यापार है, तो वह बुद्धि आदि का अवभासक कैसे होता है ? इस शंका का समाधान यह होगा कि जिस प्रकार एक स्थान पर स्थित हुआ दीपक, अपने समीप आये हुए सभी पदार्थों को बिना किसी प्रयत्न के प्रकाशित कर देता है, उसी प्रकार शब्दादि के आकार में परिणत होकर अपने समीप आयी हुई बुद्धिवृत्तियों का साक्षी मात्र रहने से उस आत्मा को उनका अवभासक कहा जाता है ॥ ६ ॥ शरीरेन्द्रियसंगात आत्मत्वेन गतां धियम् । नित्यात्मज्योतिषा दीप्तां विशिषन्ति सुखादयः ॥७॥ शरीरेन्द्रियेति - सुख-दुःखादि भी शरीर तथा इन्द्रियसंधात में आत्मत्व को प्राप्त हुई और नित्य आत्मज्योति से प्रकाशित होने वाली बुद्धि को ही विशेषित करते हैं, 'आत्मा' को नहीं। देहादि में आत्मत्व का अभिमान करने वाली बुद्धि है, उसी के ये सुख-दुःखादि धर्म हैं। अतः 'अहं सुखी' इत्यादि अनुभव के समय अहं-पदवाच्य बुद्धि ही सुख-दुःखादि से विशिष्ट होती है। आत्मा तो केवल उसका साक्षी मात्र है ॥ ७ ॥ हृदयस्पर्शिनो तथापि जिज्ञासा अभी शान्त नहीं हो पा रही है, क्योंकि 'अहं सुखी, अहं दुःखी' इस प्रकार से सुखित्वादि का स्फुरण होते रहने से उस आत्मा में शुद्धि कैसे रह सकती है? एवञ्च आत्मा की शुद्धता अभी सिद्ध नहीं हो पा रही

१२० उपदेशसाहस्री है। यह जिज्ञासा इस प्रकार समझने से शान्त हो जायेगी। सुख-दुःखादि भी आत्मा के धर्म नहीं हैं, वे भी देहादि में आत्मत्व का अभिमान करनेवाली बुद्धि के ही धर्म हैं। अतः जिस समय यह अनुभव होता है कि 'मैं सुखी या दुःखी हूँ', उस समय अहंपदवाच्य बुद्धि ही दुःखविशिष्ट होती है, आत्मा तो उसका केवल साक्षीमात्र है। वे सुखादि, आत्मा को विशेषित नहीं करते हैं। तथाच भास्य बुद्धि और भासक आत्मा इन दोनों का विवेक न हो पाने से 'आत्मा सुखादि- मान्' ऐसी भ्रान्ति होती है ॥ ७ ॥ शिरोदुःखादिनाऽऽत्मानं दुःख्यस्मीति हि पश्यति । द्रष्टान्यो दुःखिनो दृश्याद्द्रष्टृत्वाच्च न दुःख्यसौ ॥८॥ शिरोदुःखादिनेति—यह आत्मा शिर की वेदना से अपने को 'मैं दुःखी हूँ'—ऐसा देखता है (समझता है)। किन्तु वह अपने दृश्यभूत 'दुःखी' से वस्तुतः भिन्न है, क्योंकि वह तो उस दृश्य का द्रष्टा है। द्रष्टा होने के कारण वह दुःखी भी नहीं है ॥ ८ ॥ हृदयस्पर्शिनी ये सुखादिक, शरीरादि से सम्बन्धित बुद्धि को ही विशेषित करते हैं, आत्मा को नहीं—यह निश्चय कैसे किया गया ? इस प्रकार किया गया कि जिस समय यह अनुभव होता है कि 'मैं सुखी हूँ, या दुःखी हूँ', उस समय उस सुख या दुःख का कारण स्थूल देहगत कोई विकार या हर्ष, शोक, मोहादि लिङ्ग (सूक्ष्म) देहगत कोई विकार ही होता है। उस विकार का जो आधार है, वही उससे होनेवाले सुख-दुःख का भी आधार है। और आत्मा उसका साक्षी होने के कारण उससे सर्वथा असंग है। निष्कर्ष यह है कि आत्मा को जो विशेष ज्ञान होता है, वह बुद्धि के अध्यास के कारण होता है (बुद्धद्यध्यासनिबन्धन है)। तथाच शिरोदुःख से या उदरदुःख से मैं दुःखी हूँ, इस प्रकार अभिमान करनेवाले बुद्धद्यवस्थापन्न विशेष को ही वह ज्ञान होता है, क्योंकि वही दुःखी होता है। अतः बुद्धि ही सुख-दुःखादिकों से विशिष्ट होती है, यही कहना उचित है। दुःखी होनेवाले दृश्य से उसका द्रष्टा तो भिन्न ही है। अर्थात् देहादिकों में आत्मा के रूप में (आत्मत्वेन) समझी जानेवाली (अभिमन्यमान), देह के किसी अवयवादि के आहत हो जाने पर उत्पन्न होने वाले दुःख के आकार वाली, दृश्यसाभास बुद्धि का जो साक्षी है, वह उससे अन्य ही है। अतः वह केवल द्रष्टामात्र होने से उसे कोई दुःख-सुखादि नहीं होते। ये सुख-दुःखादि तो अहंपदवाच्य साभास बुद्धि को ही हुआ करते हैं, आत्मा को नहीं ॥ ८ ॥ दुःखी स्याद्दुःख्यहंमानाद्दुःखिनो दर्शनान्न वा । संहतेऽङ्गादिभिर्द्रष्टा दुःखी दुःखस्य नैव सः ॥९॥ दुःखीति—यह जीवात्मा जो अपने को दुःखी समझता है, उसका इस प्रकार समझना दुःखी अन्तःकरण (बुद्धि) में अभिमान करने के कारण ही है, दुःखविशिष्ट अन्तःकरण (बुद्धि) का साक्षी होने के कारण नहीं है ॥ ९ ॥ हृदयस्पर्शिनी 'आत्मा (में केवल द्रष्टृत्व) द्रष्टामात्र रहने से वह दुःखी नहीं होता'—इसी को स्पष्ट कर रहे हैं—यह आत्मा (जीव) जो दुःखी प्रतीत होता है, वह दुःखविशिष्ट अन्तःकरण (बुद्धि) में अर्थात् दुःखाकार से परिणत होनेवाले अन्तःकरण में 'अहम्'=मैं—ऐसा अभिमान करने के कारण वैसा प्रतीत होता है। दुःखविशिष्ट अन्तःकरण का साक्षी होने के कारण आत्मा दुःखी प्रतीत नहीं हो रहा है। यदि दुःखाकार से परिणत होनेवाले के देखनेमात्र से (साक्षी होने मात्र से) उसे दुःखी कहा जाय तो अन्य दुःखी जीवों को देखकर भी उसे दुःखी कहना होगा। अतः हस्त-पादादि अवयवों से संहत शरीर में जो दुःख है, उससे दुःखी बुद्धि ही है, उसका साक्षी आत्मा उसके दुःख से दुःखी नहीं है ॥९॥ चक्षुर्वत्कर्मकर्तृत्वं स्याच्चेज्ज्ञानेकमेव तत् । संहतं च ततो नात्मा द्रष्टृत्वात्कर्मतां व्रजेत् ॥१०॥

पार्थिवप्रकरणम् १२१ चक्षुर्वदिति - जीवात्मा का कर्मत्व और कर्तृत्व भी नेत्र के समान माना जा सकता है, किन्तु यह कहना उचित नहीं होगा। क्योंकि नेत्र तो अनेकरूप और संहत है। इसलिये उसमें तो उस प्रकार का भेद हो सकता है, किन्तु जीवात्मा तो साक्षीस्वरूप होने से उसे साक्ष्यस्वरूप नहीं कह सकते ॥ १०॥ हृदयस्पर्शिनो दुःखी होने वाले अन्तःकरण का द्रष्टा रहने पर भी आत्मा का दुःखी होना संभव क्यों नहीं है ? जैसे दर्पणस्थ चक्षु, गोलकस्थ चक्षु का दृश्य (कर्म) होता है। अर्थात् दर्पणस्थ होता हुआ चक्षु दृश्य होता है और मुख- देश में स्थित होता हुआ वह द्रष्टा भी होता है, उसी तरह जब वह आत्मा, दुःखसंभिन्न (दुःखसम्पृक्त) होता है, तब वह दृश्य रहता है, और जब वही आत्मा अपने स्वरूपभूत चैतन्य में अवस्थित रहता है, तब उसे द्रष्टा समझा जाता है। एवं च एक ही में अवस्थाभेद से कर्म-कर्तृभाव घट सकता है - इस प्रकार यदि कोई कहे तो उसका समाधान यह होगा-नेत्र तो अनेकरूप (अनेकाकार) और संहत है, अतः उसमें कर्म-कर्तृभाव (अंश भेद) उपपन्न हो सकता है। अर्थात् दर्पणस्थ गोलकांश में दृश्यत्व और उसी का मुखनिविष्ट शक्तिमत्त्वांश में द्रष्टृत्व, इस रीति से एक ही चक्षु (नेत्र) में उभयरूपत्व उपपन्न हो सकता है। किन्तु इस प्रकार का अंशभेद आत्मा में नहीं पाया जाता, क्योंकि वह (आत्मा) एकरूप है, असंहत है (संघातरूप, समूहरूप नहीं है)। अतः चित्प्रकाशैकस्वभाव आत्मा द्रष्टा ही है, वह दृश्यांश से युक्त नहीं है। क्योंकि दृश्यांश तो अनामरूप होता है। अतः द्रष्टा होने से वह कभी कर्म नहीं बन सकता। एवं च आत्मा साक्षीस्वरूप होने से वह कभी भी साक्ष्य रूप नहीं हो सकता ॥ १० ॥ ज्ञानयत्नाद्यनेकत्वमात्मनोऽपि मतं यदि । नैकज्ञानगुणत्वात्तु ज्योतिर्वत्तस्य कर्मता ॥११॥ ज्ञानेति-आत्मा को इच्छादिगुणविशिष्ट और अनेक मानने वाले नैयायिकों के मतानुसार आत्मा का भी अनेकत्व (अंश-भेद से ग्राह्यत्व और ग्राहकत्व) कहना भी ठीक नहीं है। क्योंकि जीवात्मा, एकमात्र ज्ञानस्वभाव के कारण प्रकाश के समान वह अपना कर्म (दृश्य) नहीं बन सकता ॥ ११ ॥ हृदयस्पर्शिनो नैयायिक आत्मा को इच्छादिगुणविशिष्ट और अनेक मानते हैं, तदनुसार आत्मा में अनेकत्व अर्थात् अंशभेद से ग्राह्यत्व (भास्यत्व) और ग्राहकत्व (भासकत्व) क्यों न माना जाय ? निष्कर्ष यह है कि ज्ञान, प्रयत्न, इच्छा, द्वेषादि अनेक गुणों के कारण अनेकात्मकता होने से किसी अंश से विशिष्ट हुए आत्मा में ग्राह्यत्व और अन्य किसी अंश से विशिष्ट हुए उसी आत्मा में ग्राहकत्व भी हो सकता है। किन्तु इस तरह से उभयरूपता आत्मा में नहीं कह सकते, क्योंकि श्रुति ने आत्मा को ज्ञानैकस्वभाव, विज्ञानघन¹ कह कर उसे एकरूप ही बताया है, अनेकरूप नहीं। इस कारण प्रकाश के समान (ज्योतिर्वत्) वह (आत्मा) अपना कर्म (दृश्य) नहीं हो सकता । अतः आत्मा केवल ग्राहक ही है, वह कभी ग्राह्य नहीं है ॥ ११ ॥ ज्योतिषो द्योतकत्वेऽपि यद्वन्नात्मप्रकाशनम् । भेदेऽप्येवं समत्त्वाज्ज नात्मानं नैव पश्यति ॥१२॥ ज्योतिष इति--जिस प्रकार सूर्यादि ज्योतिर्मय पदार्थ प्रकाशक होने पर भी अपने को कर्मरूप में प्रकाशित नहीं करते, उसी प्रकार आत्मा में यदि अंशभेद भी मान लिया जाय तो भी चिन्मात्र रूप से उसमें समानता रहने से वह अपने को नहीं देख सकता। क्योंकि आत्मा में अंशभेद से ग्राह्य-ग्राहक भाव मानने पर ग्राह्य अंश को यदि चेतन कहें तो वह किसी का विषय नहीं हो सकता, क्योंकि चेतन तो सर्वदा प्रकाशक ही होता है, वह कभी भी प्रकाश्य नहीं होता। यदि ग्राह्य जड़ माने तो प्रकाश और अन्धकार के समान चेतन और जड़ दोनों परस्परविरुद्ध धर्म होने से एक जगह (एक आत्मा में) कभी नहीं रह सकते। दोनों का एक जगह रहना युक्तिविरुद्ध होगा ॥ १२ ॥ १. (मुं. उ. २।२।९) १६