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वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

Devanagarihipublished648 पृष्ठ

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उनके न होनेपर महाकष्ट होता है। जो बुद्धिमान पहलेसे ही धन-दौलत खी-पुत्र आदिसे मोह हटा लेते हैं, उन्हें मरते समय कष्ट नहीं होता। जो अपना मन उनमें लगाये रहते हैं, वे मरते समय रोते हैं, पर ज़बान बन्द हो जानेसे अपने मनकी बात जता नहीं सकते। इसलिये जो सुखसे मरना चाहें, उन्हें पहले सेही विषयोंसे मुँह मोड़ लेना चाहिये। इसी तरह जो आज नाना प्रकारके सुख भोग रहा है, यदि कल उसे वे सुख न मिलें, तो वह बड़ा दुःखी होता है; किन्तु जो विषयोंको भोगते तो हैं, किन्तु उनमें आसक्ति नहीं रखते, उन्हें विषय-सुखोंके न मिलने वा उनसे बिछुड़ने पर ज़रा भी कष्ट नहीं होता।

शिक्षा—जो विषय एक दिन तुम्हें निश्चय हो छोड़ देंगे, उन्हें तुम स्वयं ही क्यों न छोड़ दो? तुम्हारे छोड़नेसे तुम्हें अनन्त ख़ुब मिलेगा और उनके छोड़नेसे तुम्हें बोर मनस्ताप वा मनोवेदना होगी।

16. The objects of the sensual pleasure are sure to part from us, even if we enjoy them for a considerable length of time. A man can part with them of his own accord. What is the difference in parting if he does not follow the latter course? They generate great agony and distress in our mind if they themselves leave us; but if we renounce them ourselves, they are sure to give us unbounded peace of mind and happiness.

विवेकन्याकोशे विदधति शमे शाम्यति तृषा- परिषद्ग्रे तुगे प्रसरतितर्षा सा परिणतिः ॥

जराजीर्णैश्चर्यप्रसनाहनात्तेष्वप्यस्तुपापान्

यस्यां भवति मरुतामप्यधिपतिः ॥१७॥

जब ज्ञानका उदय होता है, तब शान्तिकी प्राप्ति होती है। शान्तिकी प्राप्तिसे तृष्णा शान्त हो जाती है, किन्तु वही तृष्णा विषयोंके संसर्गसे बेहद बढ़ती है। मतलब यह है, कि विषयोंसे तृष्णा कभी शान्त नहीं हो सकती। सुन्दरीके कठोर कुवोंपर हाथ लगानेसे काम-मद बढ़ता है, घटता नहीं। जराजीर्ण ऐश्वर्य्य के देवराज इन्द्र भी नहीं त्याग सकते ॥ १७ ॥

ज्ञानसेही तृष्णाका नाश और शान्ति की प्राप्ति होती है। विषयोंके भोगनेसे तृष्णा घटती नहीं, उल्टी बढ़ती है। जो तृष्णाको त्यागते हैं, तृष्णासे नफ़रत करते हैं, उसे पास नहीं आने देते, उनसे तृष्णा भी दूर भागती है। हम जब किसी स्त्रीको प्यार करते हैं, उसका आदर-मान करते हैं, तब वह हमारे बैठती है; किन्तु जब हम उससे मुँह फेर लेते हैं, उसे मुँह नहीं लगाते, उसे प्यार नहीं करते, उसे नफ़रत की नज़र से देखते हैं; तब वह भी हमसे अलग रहती है,—हमारे पास आनेको उसे हिम्मत नहीं होती। इसलिये जो तृष्णा से पीड़ा छुड़ाना चाहें, उन्हें विषयोंसे मुँह मोड़ लेना चाहिये। देखिये, यद्यपि स्वर्गके राज्यको भोगते लाखों-करोड़ों वर्ष बीत गये, तोभी इन्द्र उस स्वर्ग-राज्यको छोड़ नहीं सकता। जब इन्द्रकी भी तृष्णा लाखों-करोड़ों वर्ष राज्य भोगनेसे शान्त

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नहीं होती, तब मनुष्य बेचारे किस खेतकी मूली हैं? तृष्णा पुरानी होनेसे बढ़ती है, घटती नहीं। हम ज्यों-ज्यों विषय भोगते हैं, त्यों-त्यों वे पुराने होते हैं और हमारी तृष्णा बढ़ती है। पुराने होने पर, उन्हें छोड़नेमें हमें बड़ा कष्ट होता है।

शिक्षा-तृष्णाको शीघ्र छोड़ो। पुरानी होनेसे वह पापीयसी औरसी बलवती हो जायगी; फिर उसे त्यागना आपकी शक्तिके बाहर हो जायगा। उसके नाशके लिये “ज्ञान” का पैदा होना जरूरी है; क्योंकि उसका सच्चा मार “ज्ञान” ही है।

छ्पय ।

तृष्णा-मूल नसाय, होय जब ज्ञान उदय मन ।

भये विषयमें लीन, बढ़ै दिन-पर-दिन चौगुन ।

जैसे सुग्धा नार-कठिन कुच, हाथ लगावत ।

बढ़त कामसद अधिक, अधिक तनमें सरसावत ।

जराजीर्ण ऐश्वर्यको, त्यागत लागत दुःख अति ।

तोहि तजिवेको असमर्थ यह, वासव जो है वायुपति॥१७॥

17 Desire cools down when peace of mind is attained through the advent of knowledge. The same expands to an unlimited extent when its connection is established with its highest objects. Hence Desire can never be satisfied by enjoyment or Desire is only insatiable in its fulfilment. The proof of this lies in the person of Indra, the great king of the gods, who is totally unable to give up his king-

एकान्त वन में योगी का ध्यान

(चित्र: एकान्त वन में योगी का ध्यान)

the wh Des

dom of Swarga, although it is worn out by long, long ages having passed over it.

कृशः काणः स्वज्जः श्रवणरहितः पुच्छविकलो

वर्णी प्रयुक्लिः कृमिकुलशतैरावृतततः ॥

चुथात्तामो जीर्णः पिठरजकपालार्पितभलः

शुनीमन्वेति श्वा हतमपि च हन्त्येव मदनः ॥१८॥

दुबला काना और लँगड़ा कुत्ता, जिसके कान और पूँछ नहीं हैं, जिसके ज़ख्मोंसे राध बह रही है, जिसके शरीरमें कीड़े किल-बिला रहे हैं, जो भूखा और बुढ़ा है, जिसके गलेमें हँडीका घेरा पड़ा है—कुतियाके पीछे-पीछे दौड़ता है। कामदेव मेरे हुस्के भी मारता है ॥१८॥

जिस कुत्तेकी ऐसी बुरी हालत है, वह कुत्ता भी मेशुन करनेके लिये कुतियाके पीछे-पीछे दौड़ता है; तब मोटे-ताज़े मावा-मलाई और मिष्ठान्न खाने वाले अपनी कामवासनाको कैसे रोक सकते हैं? इसीसे बचनेके लिये, ज्ञानी लोग अपनी देहको एकदम गला देते हैं, तरह-तरहके व्रत और उपवास करते हैं, धुनी तपते हैं और शीत-घास सहते हैं। कामदेव बड़ा बलवान् है। जो उसके क़ाबूमें नहीं आते, वे सबसे बलवान् और सच्चे योद्धा हैं। वे भीष्म और अर्जुन हैं।

18. The lean, blind and lame dog, without either ears or tail, with blood oozing out of its wounds, hundreds and thousands of

worms sticking to his body, hungry and old, with the upper portion of a broken earthen vessel hanging round his neck, is pursuing the bitch. How cruel is Cupid to shoot his arrows at those who are already dead.

भिन्नाशनं तदपि नीरसमेकवारं शय्या च सः परिजो निजदेहमात्रम् ॥ कर्त्तुं च जीर्णशतखण्डमलीनकन्या हा हा तथाऽपि विषया नपरित्यजन्ति ॥१६॥

वह मनुष्य जो भीख माँगकर दिनमें एक समय ही नीरस अलौना अन्न खाता है, धरती पर सो रहता है, जिसका शरीर ही उसका कुटुम्बी है, जो सौ थेगलियोंकी गुदड़ी आदता है, आश्चर्य्य है कि, ऐसे मनुष्यको भी विषय नहीं छोड़ते ! ॥१६॥

जो दिन-भरमें एक बार अलौना—फीका अन्न खाते हैं और वह भी माँग-ताँग कर ; जिनके पास सोनेके लिये पलँग और गह-तकिये नहीं, बेचारे पेड़ोंके नीचे या खुले मैदानमें घास-पात पर सो रहते हैं ; जिनके नाते-रिश्तेदार कोई नहीं, उनका अपना शरीर ही उनका नातेदार है ; जिनके पास पहनने को कपड़े नहीं, बेचारे ऐसी गुदड़ी ओढ़ते हैं, जिसमें सैकड़ों वीथड़े लटकते हैं—ऐसे लोगोंका भी विषय पीछा नहीं छोड़ते, तब धनियोंका पीछा तो वे कैसे छोड़ने लगे, जहाँ उन्हें सब तरहके पेशो-आराम मिलते हैं ? कहा है :—

वैराग्यशतक

स्त्रीका दर्शन ही ऐसा है कि जिससे देवता भी धैर्य्य त्याग देते हैं । ब्रह्माजी शान्तनु ऋषि की स्त्री अमोघा का रूप देखकर मुग्ध हो गये । पृष्ठ ५४

Popular Press, Calcutta.

वैराग्यशतक

महासुनि विश्वामित्र जैसे तपस्वीको भेदकाने गृहस्थी के जंगल में जकड़ दिया, तब मोहिनीयों से और कौन बच सकता है ? देखिये, आप कन्या को गोद में लिये खड़े हैं ।

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विश्वामित्रपराशरप्रभृतयो वाताम्बुपर्णाशना- स्तेऽपि स्त्रीमुखपंकजे सुललितं दृष्ट्वैव मोहगताः । शाल्यज्ञं सघृतं पयोदधिष्ठुतं ये भुञ्जते मानवा- स्तेषामिन्द्रियनिग्रहो यदि भवेद्विन्द्यस्तेरत् सगरे ॥

विश्वामित्र और पराशर प्रभृति ऋषि भी,—जो हवा, जल और पत्ते खाते थे—स्त्रीका कमल-मुख देखकर मोहित हो गये ; फिर शालिर्चावल, दही और घी मिला भोजन जो खाते हैं, उनकी इन्द्रियाँ यदि उनके वशमें हो जायँ, तो विन्द्याचल पर्वत भी समुद्रमें तैरने लगे। मतलब यह है कि, पत्तों और जल पर गुजर करनेवाले ऋषि भी जब स्त्रियों पर मोहित हो गये, तब घी दूध खानेवालोंकी क्या बात है ? कामदेवका वश करना बड़ा कठिन है। पराशर ऋषिने दिनकी रात कर दी और नदीको रेतमें परिणत कर दिया, पर वे भी कामको वश में न कर सके। इतना ही नहीं ; बड़े-बड़े देवता भी कामको वशमें न कर सके। स्वयं ब्रह्मा, विष्णु और महेश तकको कामने जीत लिया। “आत्मपुराण”में लिखा है :—

कामेन विजिता ब्रह्मा, कामेन विजिता हरिः

कामेन विजितः शम्भुः, शक्रः कामेन निर्जितः ॥

कामदेवने ब्रह्मा, विष्णु, शिव और इन्द्रको जीत लिया ।

“पद्मपुराण”में लिखा है,—शान्तनु नामक ऋषिकी स्त्रीका नाम अमोघा था। वह परमा सुन्दरी और पतिव्रता थी। एक

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दिन ब्रह्माजी ऋषिसे मिलने गये। ऋषि उस समय कहीं बाहर गये हुए थे। उस पतिव्रताने ब्रह्माजीको आसन बिछा कर बिठाया। ब्रह्माजी उसका रूप देखकर सुख हो गये। उनका वीर्य निकल गया; अतः वे लज्जित हो उठ गये। इतनेमें ऋषि आ गये। उन्होंने वीर्य पड़ा देख खीसे पूछा—“यह क्या!” उसने कहा—“स्वामिन्! ब्रह्माजी आये थे।” सुनकर ऋषिने कहा—“स्त्रीका दर्शन ही ऐसा है कि, जिससे देवता भी घैर्य त्याग देते हैं।”

एक बार महादेवजी समाधिस्थ थे। वहीं वनमें मनुष्योंकी सुन्दरी और युवती खियाँ कूड़ा कर रही थीं। शिवजीका मन चल गया। उन्होंने अपने तपोबलसे उन्हें आकाशमें ले जाकर उनसे भोग किया। अन्तमें पावतीजीने खियोंको नीचे गिरा दिया और शिवजीको समाधिमें लगाया।

विष्णु भगवान्ने जलन्धर नामक राक्षसकी वृन्दा नामक पतिव्रता खीसे छलकर भोग किया। उसने उन्हें श्राप दिया।

इन्द्रने गौतम ऋषिको खी अहिंसासे छलसे भोग किया और इतनेमें ऋषि आ गये। उन्होंने इन्द्रको देखते ही श्राप दिया। ऋषिके श्रापसे इन्द्रके शरीरमें भग-ही-भग हो गयीं।

एक बूढ़ा तपस्वी किसी मन्दिरमें अकेला रहता था। वह पूरा जितेन्द्रिय था। देवात् एक युवती उस मन्दिरके सामनेसे निकली। तपस्वी सुख हो गया और उसके पीछे हो लिया। जब वह अपने घर पहुँची, तब ऋषि भी द्वार पर जाकर उससे

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देशभक्ति

दुःख के पतों और अल पर गुजर करनेवाले, दिन को रात में और लम्बी को घनेम पक्षिणम कर लकनेवाले एवम् आदि नाविक की कनका को आदिमम कर दे । ( पृष्ठ ६ )

प्रार्थना करने लगा। उसने द्वार बन्द करना चाहा और ऋषिने सिर अड़ा कर घुसना चाहा। उसने जोरसे द्वार बन्द करने की चेष्टा की। इससे ऋषिका सिर कट गया और वह वहीं मर गया। ऐसे-ऐसे बूढ़े और अम्यासी जितेन्द्रिय पुरुष जब स्त्रियों-को देखते ही पागल हो जाते हैं, तब औरोंका क्या कहना?

यद्यपि कामको काव्यमें करना भ्राकठिन है ;

तथापि कामदेव को वशमें करो ; क्योंकि स्त्री

संसार-वन्धनकी मूल या जन्म-मरणकी कारण है।

स्त्री भक्ति-भुक्ति और सुख-शान्तिकी नाशक है। जिनके स्त्री हैं, वे परमेश्वरकी भक्ति कर नहीं सकते, क्योंकि उन्हें जड़ालोंसे ही पुरसत नहीं मिल सकती। यों तो सभी विषय विषके समान घातक हैं, पर स्त्री सबसे ऊपर है। जहाँ स्त्री है, वहाँ सभी विषय हैं। विषय दुःख और तापके कारण हैं, अतः बुद्धिमानोंको विषयोंसे बचना चाहिये। मोक्ष चाहने वालोंको तो स्त्री के दर्शन भी न करने चाहियें। कहा है :—

संभावयेत् स्त्रियं नौव पूर्वदृष्टां च न स्मेत् ।

कथां च वज्रेयतासां तां पश्येद्विखितामपि ॥

न तो स्त्रीके साथ बात करनी चाहिये, न पहलेकी देखी स्त्रीकी याद करनी चाहिये और न उसकी चर्चा करनी चाहिये। यहाँ तक कि, उसका चित्र भी न देखना चाहिये।

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जो स्त्री-जातिसे इस तरह अलग रहेंगे, वे ही कदाचित् इस बलासे बच सकेंगे। इसे देखकर मनको वशमें रखना बड़ा कठिन काम है। सभी भीष्म और अर्जुन नहीं हो सकते। संसारी लोग कितने ही दुःख, ताप और कष्ट क्यों न पावें ; किन्तु उनका मन उस ऊर्टकी तरह है, जो काँटेदार वृक्षोंको खाना पसन्द करता है ; काँटेदार वृक्षोंके खानेसे उसके मुँह से खून बहने लगता है, पर वह उनका खाना नहीं छोड़ता ; इसी तरह जिन्हें विषयोंका स्वाद आ गया है, वे अनेक तरह के कष्ट भोगने पर भी उन्हें नहीं त्यागते ; किन्तु जब उनमें विवेक आ जाता है, उनमें सत-असतके विचारकी शक्ति हो जाती है, तब उन्हें उनसे विरक्ति हो जाती है। उस अवस्थामें स्त्री जातिसे नफ़रत हो जाती है।

शिक्षा-विषय विष है। इनका त्याग हो सुखकी जड़ है। जो विषयी हैं, उन्हें कहीं सुख नहीं है। अतः कामको जीतो। जिसने कामको जीत लिया, उसने सबको जीत लिया।

छण्पय ।

भीख-अन्न इकवार, लौन दिन खाय रहत हूँ । फटी गुदरी ओढ़, वृक्ष की छाँह गहत हूँ । घास पात कहु डारि, धूमि पर नित प्रति सोवत । राख्यौ तन परिवार, भार यह ताको ढोवत ।

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इहि भौति रहत चाहत न कहु, तज, विषय बाधा करत । हरि ! हाय २ तेरी शरणा, आय पर्यो इनसे डरत ॥१६॥

19. A man may go a-begging for his food and get a tasteless meal once a day, he may have earth only for his bed and his own body for his servant. His clothes may only consist of an old and dirty sheet with hundreds of rags hanging from it, But what a pity that the objects of pleasure do not desert even such a man.

स्तनौ मांसग्रन्थी कनककलशाविस्तुपमितौ

मुखं श्लेष्मागारं तदपि च शशकेन तुलितम् ॥

सबन्मूलकिन्नं करिवरकरस्पर्द्धिं जयन-

महो निन्यं रूपं कविजनविशेषैर्गुरु कृतम् ॥१०॥

स्त्रियोंके स्तन मांसके लौदे हैं, पर कवियोंने उन्हें सोनेके कलशोंकी उपमा दी है। स्त्रियोंका मुँह कफका घर है, पर कवि उसे चन्द्रमाके समान बताते हैं और उनकी आँखोंको, जिनमें पेशाव प्रभृति बहते रहते हैं, श्रेष्ठ हाथीकी सूँडके समान कहते हैं। स्त्रियोंका रूप घृणायोग्य है, पर कवियोंने उसकी कैसी तारीफ़ की है ! ॥१०॥

स्त्री नरककुण्ड है ।

स्त्रियोंकी छातियाँ—जिनपर विषयी मरे मिटते हैं, जिनकी कवियोंने बड़ी-बड़ी प्रशंसायें की हैं, जिन्हें वे सोनेके कलसों अथवा अनार और नारङ्गियोंके समान बताते हैं—वास्तवमें

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जो स् इस बला बड़ा कठि संसारी ; किन्तु उ खाना प से खून इसी तर के कष्ट विवेक अ जाती है, खी जा शिक्षा है, उन्हें लिया, उ

मांसकी पोटली हैं । उनके मुखको वे चन्द्रमाके समान बताते हैं, पर वास्तवमें वे कफके आगार हैं । जिन जाँघों को वे गजवरकी सूँडके समान बताते हैं, वास्तवमें वे मृत और सफेदेके टपकनेसे सगली रहती हैं । स्त्रियोंका शरीर सर्वथा निन्दायोग्य है, उसमें प्रशंसा की कोई बात नहीं ; पर अज्ञानो और सूखे विषयी उन पर मरे मिटते हैं !! यह उनकी भारी भूल है । महात्मा सुन्दर दासजी कहते हैं—

( १ )

कामिनीको तन, मानु कहिये सघन बन । वहाँ काउ जाय, सेा तौ भूले ही परत है ॥ कुञ्जर है गात, कटि-केहरीका भय जामें । वेनी काली नागिनीज, फनिऊँ धरत है ॥ कुच है पहार जहाँ, काम-चोर बसे तहाँ । सन्धिके कटाक्ष बाण, प्राण ऊँ हरत हैं ॥ सुन्दर कहत, एक और डर जामें अति । राक्षसी-बदन, खाउँ-खाउँ ही करतु है ॥ १ ॥

( २ )

कामिनीको अंग, अति मलिन महा अशुद्ध । राम-राम मलिन, मलिन सब द्वार हैं ॥

वराभ्यशतक

तपस्वी स्त्रीपर मुग्ध होकर जबरदस्ती उसके घरमें घुसने लगा। स्त्रीने द्वार बन्द करना चाहा और ऋषिने सिर अड़ा कर घुसना चाहा। स्त्री ने जोर से द्वार बन्द करने की चेष्टा की; इससे ऋषिका सिर कट गया।

पृष्ठ ५५

Popular Press, Calcutta.

इस

बड़ा

संसा

किन्तु

खाना

से ।

इसी

के व

निवे

जार

खी

वैराग्यशतक

महापुरुष ज्ञान-दृष्टिसे कामिनी की असलियत को देख रहे हैं। कामी लोग भी स्त्रियों की असलियत को बगौर देखें और इनसे घृणा करें। वास्तवमें, स्त्री में कुछ भी नहीं है। सांस्वर्भ-हीन स्त्री कंकाल है।

(पृ० ५८)

Popular Press, Calcutta.