वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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42. When is the time to come when, sitting peacefully on a lonely spot by the side of the holy Ganges where the surface of the ground has been made luminous by the spreading, shining moon-light and the nights are free from all sorts of disquieting sounds, we shall shed tears of joy from eyes filled with them spontaneously, our minds tired of the pleasures of life and our speech deep in humble prayer to the Almighty Shiva,
महादेवो देवः सरिदपि च सैषा सुरसरि-
दुग्धा एवागारं वसनमपि ता एव हरितः ॥
सुद्धा कालोज्यं व्रतमिदमैन्यव्रतमिदं
कियद्वा कस्यामो वटविष्ट एवासु दधिता ॥४३॥
महादेव ही हमारा एक देव हो, जाहन्वी ही हमारी नदी हो, एक गुफा ही हमारा घर हो, दिशा ही हमारे वस्त्र हों, समय ही हमारा मित्र हो, किसीके सामने दीन न होना ही हमारा मित्र हो, अधिक क्या कहें वटवृक्ष ही हमारी अर्द्धांगिनी हो ॥ ४३ ॥
जो हज़ारों-लाखों देवताओं को छोड़कर एक परमात्मा को ही अपना देव समझता है, रात-दिन उसीके ध्यानमें मग्न रहता है; जो गङ्गा तट पर बसता है, गङ्गामें स्नान करता है, गङ्गाजल ही पीता है; जो कपड़ोंकी भी ज़रूरत नहीं रखता, दिशाओंको ही अपने वस्त्र समझता है; कालको ही अपना
स्थान। तर्ह=वहाँ। सुदित=प्रसन्न। आँखयुत=आँखओसे भरे हुए। वन=नेत्र। तट=किनारा। श्वारत=गद्गद। वन=वाणी।
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मित्र मानता है ; किसीके साधने दीनता नहीं करता, किसी से कुछ नहीं माँगता ; वटवृक्षके आश्रयमें रहकर भगवान् का भजन करता और वटवृक्षको ही अपने दुःख-सुखको संगिनी प्राणवल्लभा समझता है, वही पुरुष धन्य है ! उसका ही जगत् में आना सफल है । परमात्माकी दया या पूर्वजन्मके पुण्योंसे ही ऐसी बुद्धि होती है । ऐसी बुद्धिके प्रभावसे ही वह दुःखोंसे छूटकर नित्यानन्दमें मग्न रहता है ।
दोहा ।
देव ईश सुरसरि सरित, दिशा वसन गिरि गेह ।
सुहत्काल वट कामिनी, वत अदैन्य सुख एह ॥४३॥
43. Let the Great God be the only god for us, the heavenly angels the only river, a cave the only house, the direction of the open space the only clothing, time the only friend and the vow of non-supplication the only vow. What more should he say than that a banyan tree in the forest may be our only better half ?
शिरः शार्दे स्वर्गीत्यशुपतिशिरस्तः चित्तिधरं
महीभ्रादुत्तुंगादवनिमवनेश्चापि जलधिम् ॥
देव=देवता । ईश=महादेव । सुरसरि=देवनदी=गंगा । दिशा=दशों दिशाएँ । वसन=कपड़ा । गिरि=पहाड़ । गेह=घर । दिशा वसन=दिशाओंको ही कपड़े मान कर नङ्गा रहना । सहद=मित्र । काल=सूर्य । वट=बड़का पेड़ । कामिनी=स्त्री । अदैन्य=न माँगना ; हाथ न पसारना ।
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अथो गंगा सेयं पदमुपगता स्तोत्रमथवा विवेकअष्टांशं भवति विनिपातः शतमुखः ॥४४
देखिये, गंगा स्वर्गसे शिवजीके मस्तक पर गिरी ; उनके सिर से हिमालय पर्वत पर ; हिमालय पर्वतसे पृथ्वीपर ; और पृथ्वीसे समुद्रमें गिरी । इससे मालूम होता है, कि विवेक-हीनोंका पद-पद पर सैकड़ों प्रकारसे पतन होता है ॥४४॥
जो विचारपूर्वक काम नहीं करते, जो अकलसे काम नहीं लेते, उनको तरह-तरहसे नीचा देखना पड़ता है । कविने यहाँ गङ्गाका दृष्टान्त दिया है और खूब दिया है ।
शिक्षा—जो विवेक-हीन हैं, जो अहङ्कारी हैं, वे सदा नीचा देखते और बार-बार नीचे गिरते हैं ; अतः मनुष्यको भूलकर भी घमण्ड न करना चाहिये और खूब विचार कर काम करना चाहिये । गंगाको बड़ा घमण्ड हुआ, तब उसका गर्व खर्च करनेके लिए ब्रह्माने उसे अपने कमण्डलमें भर लिया । गंगाका मस्तक नीचा हो गया । फिर भी ; उसने घमण्ड न छोड़ा, तब शिव जीने उसे अपनी जटाओंमें रोक लिया । फिर महाराजा अगीरथने बार तप किया, तो शिवजीने उसे छोड़ा । शिवके सिरसे वह हिमालय पर गिरी और वहाँ से बहती-बहती समन्दरमें जा गिरी । जो गर्व करते हैं, जगदीश उनके दुर्गमव हो जाते हैं । जगदीश उन्हीं को मिलते हैं, जो गवसे दूर भागते और विवेकभुष्ट नहीं होते ।
श्लेष सादी ने कहा है—
हकैं बेहूदा गर्दन अफ़राज़द । लेखतन रा बगर्दन श्रन्दाज़द ॥
वैराग्य शनक
A black and white illustration of a multi-armed deity, likely Shiva, standing on a rocky cliff overlooking a river and a winding path. The deity has several arms, some holding objects, and is surrounded by a misty landscape.
देखिये, गंगा स्वर्ग से शिवजी के मस्तक पर गिरती, उनके सिर से हिमालय पर्वत पर, हिमालय से पृथिवी पर, पृथिवी से समुद्र में गिरती। इससे मालूम होता है, कि विवेक-भ्रष्टों का पद-पद पर सैकड़ों प्रकार से पतन होता है।
नेत्रभयशतक ३-६-६
शुद्धविषय योगभक्तिर ही एतः मन्त्रकर आकाशतन्त्री के शार त्या सकलै र् ।
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जो कोई अपनी गर्दन ऊँची करता है, वह मुँह के बल गिरता है।
44. Look how the great Ganges has fallen lower and lower from her abode of stupendous elevation ! from the Swarga down on to the head of the God Shiva, from thence to the summit of the mountain, from the mountain to the plain earth and from thence down to the sea. Similar is the fate of men devoid of discriminating reason who undergo a downfall in hundreds of ways.
आशा नाम नदी मनोरथजला तुष्यातरंगाकुला
रागध्राहवती वितर्कविहगा वैर्यदुमध्यसिनी ॥
मोहावर्त्तसुदुस्तराजतिगहना प्रोत्तुंगचिन्तातटी
तस्याः पारगता विशुद्धमनसोर्नदन्ति योगीश्वराः ॥४५॥
आशा एक नदी है, उसमें इच्छा रूपी जल है ; तुष्या उस नदीकी तरंगें हैं, प्रीति उसके मगर हैं, तर्कवितर्क या दलीलें उसके पत्ती हैं, मोह उसके भँवर हैं; चिन्ता ही उसके किनारे हैं; वह आशा-नदी वैर्यरूपी वृक्षको गिरानेवाली है ; इस कारण उसके पार होना बड़ा कठिन है। जो शुद्धचित्त योगीश्वर उसके पार चले जाते हैं; वे बड़ा आनन्द उपभोग करते हैं ॥४५॥
नदीका नाम क्या है ? आशा-नदी। उसमें जल काहेका है ? इच्छाका। उसमें मगर कैसे हैं ? प्रीतिरूपी मगर हैं। उसमें जलचर पक्षी कैसे हैं ? नाना प्रकारके तर्कवितर्क उसके पक्षी हैं। वह किनारेके किन दूरवृक्षोंको गिराती है ? 'वैर्यरूपी
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दृश्योंको गिराती है। उसमें भँवर कैसे हैं? मोहरूपी भवर हैं। उसके किनारे काहेके हैं? चिन्ताके। उसको कौन पार कर सकते हैं? उसको वही पार कर सकते हैं, जिनका चित्त शुद्ध है, जिनके चित्तसे ये सब बलायें हट गयी हैं और जिनका चित्त केवल ब्रह्ममें लीन है।
सारोश,—यदि आनन्द चाहो ; तो आशा, इच्छा, प्रीति, तर्क-वितर्क, मोह और चिन्ता प्रभृतिको एकदम छोड़कर शुद्धचित्त हो जाओ और अपने आत्मा या ब्रह्मके ध्यानमें तन्मय हो जाओ।
वृष्यय ।
नदीरूपं यह आश, मनोरथ पूर रहौ जल । तृष्णा तरल तरंग, राग है ग्राह महाबल । नामा तर्क विहंग, संग धीरज-तरु तोस्त । अमर भयानक मोह, सबद को गहि-गहि बोरत । निरा बहत रहत चित-भूमिमें, चिन्तातट अतिही विकट ।
कदि गये पार योगी पुरुष, उन पायौ सुख तेहि निकट ॥४५॥
45 Hope is just like a river with water in the shape of desires, agitated by currents in the shape of avarice, with alligators in the
पूर रहौ = भर रहा। तृष्णा = इच्छा। तरल = चंचल। तरंग = लहर। राग = प्रेम। ग्राह = मगर, धड़ियाल। महाबल = अत्यन्त बलवान। नामा = तरह तरहके। तर्क = दलील। विहंग = पक्षी। अमर = भोरा।
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shape of attachments, with watery birds in the shape of motely designs, with the power of destroying one's perseverance in place of uprooting trees, difficult to cross owing to the presence of whirl-pools in the shape of worldly love, exceedingly deep and possessing banks in the shape of very great cares. Happy are the great yogis, who pure in mind, have succeeded in stepping over it.
आसंसारं त्रिभुवनमिदं चिन्वतां तात तादृक्
नैवासमाकं नयनपद्वीं श्रोत्रवत्सांगतो वा ॥
योऽयं धत्ते विषयकरिणीगादृगृह्यमान-
चीवस्यान्तःकरणकरिणःसंयमालानलीलाम ॥४६॥
ओ भाई ! मैं सारे संसारमें कूमा और तीनों भुवनोंमें मैंने खोज की ; पर ऐसा मनुष्य न मैंने देखा न सुना, जो अपनी कामेच्छा पूर्ण करनेके लिये हथिलीके पीछे दौड़ते हुए मदेन्द्रिय हाथीके समान मनको वशमें रख सकता हो ॥४६॥
भाई ! मैंने त्रिलोक की खोज डाली, पर मुझे एक भी आदमी ऐसा न दीखा, जो विषयरूपी हथिलीके पीछे लगे हुए मनरूपी गजको रोक सकता हो। इसका झुलासा यह है,—विषयोंमें फँसे हुए मनको क़ाबूमें रखना अथवा उसे विषयोंसे हटाना असम्भव है।
मन बड़ा ज्वलंत है। इसके पट्ट नहीं, पर पक्षीकी तरह उड़ने वाला है ; कभी यह आकाशमें जाता है और कभी पाताल में जाता है। मन शरीरको जिधर घुमाता है, शरीर उधर ही
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घूमता है। मन ही मनुष्यको परमात्मासे अलग रखता और मनही उसे उससे मिला देता है। मनकी चंचलता अच्छी नहीं। उसकी चंचलता ही साधनामें बाधक है। महात्मा कबीर कहते हैं—
मन-पक्षी तब लगि उड़े, विषय-वासना माँहि । ज्ञान-बाज़की भूपटमें, जब लगि आया नाँहि ॥ मनके बहुते रंग हैं, छिन-छिन मध्ये होय । एक रंगमें जो रहे, ऐसा बिरला कोय ॥ जेती लहर समुद्रकी, तेती मनकी दौर । सहजै हीरा ऊपजे, जो मन आवे ठौर ॥ मनके मते न चालिये, मनके मते अनेक । जो मन पर असवार हैं, ते साधु कोई एक ॥
उस्ताद जौक कहते हैं—
दुनियाँसे मैं अगर, दिले मुजतरको तोड़ दूँ । सारे तिलिस्म, बहम मुकहर को तोड़ दूँ ॥
संसारमें लगे हुए मनको यदि मैं तोड़ दूँ, तो धोके और बुराईमें डालनेवाले इस प्रपंचको ही तोड़ डालूँ। संसार-पाशमें बँधे हुए मनको तोड़ना मुश्किल है।
मन-पक्षी विषय-वासनाओंमें उस वक्त तक उड़ता है, जब तक वह ज्ञान-बाज़की भूपटमें नहीं आता। मतलब यह है
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कि, मन विषयोंमें उसी समय तक फँसा रहता है, जब तब कि उसे ज्ञान नहीं होता। ज्ञान होते ही मन विषयोंके फन्देसे निकल जाता है।
मनके अनेक रंग हैं, जो छिन-छिनमें बदलते रहते हैं। जो एक ही रंगमें रँगा रहता है, वह कोई विरला ही होता है।
समुद्रकी जितनी लहर है, मनकी उतनी ही दौड़ है। अगर मन एक ही ठिकाने ठहर जावे, तो सहजमें हीरा पैदा हो जावे। मतलब यह है कि, मनके एक जगह ठहरने या स्थिर हो जानेसे सिद्धि मिल जा सकती है, जगदीशके दर्शन हो सकते हैं। चञ्चल मनसे सिद्धि दूर भागती है। जगदीश-मिलनके लिए स्थिर चित्तकी दरकार है।
मनके मते पर न चलना चाहिये, क्योंकि मनके अनेक मते हैं। मन पर सवार रहनेवाले, मनको अपने वशमें रखने वाले महात्मा कोई विरले हो होते हैं। सारांश यह कि, मनकी चाल पर न चलना चाहिये, उसकी सलाहके माफ़िक काम न करने चाहिये। मनको अपने क़ाबूमें रखना चाहिये और उसे अपनी इच्छानुसार चलाना चाहिये। जो मनकी राह पर नहीं चलते, मनके अधीन नहीं होते, मनको स्थिर रखते हैं, उसे चञ्चल नहीं होने देते, उसकी लगाम अपने हाथोंमें रखते और उसे अपनी मरज़ी माफ़िक चलाते हैं—स्वयं उसकी मरज़ी पर नहीं चलते, वे जगत्को विजय कर सकते हैं। वे नाना प्रकारकी सिद्धियोंको प्राप्त कर सकते हैं और जगदीशसे मिल कर अक्षय सुखके अधि-
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कारी हो सकते हैं। जिन्हें संसारी जज्जालोंसे छूटना हो, जन्म-मरणके कष्ट न भोगने हों, नित्य और अविनाशी सुख भोगना हो, परमपद लाभ करना हो ; वे मनको अपने वशमें करें, उसे इधर-उधर जाननेसे रोकें और उसे करतारके ध्यानमें लगावें।
उस्ताद जौक एक जगह फिर कहते हैं—
बड़े मूजीका मारा, नफ़्ले अम्मारे का गर मारा।
नहंगो अजदहाश्रा, शेर नर मारा तो क्या मारा।
अपने दिलको मार, अभिमानको मार ; इसमें तेरी बड़ाई है। बड़े-बड़े खूबसूरत जानवरोंके मारनेमें वीरता नहीं है।
पर अभिमान-शून्य होना, है बड़ा कठिन। जिस वासनमें लहसल का प्याज़ रखे जाते हैं, उसमेंसे उनकी मध्य बड़ी कठिनाईसे जाती है ; इसी तरह अभिमान भी बड़ी कठिनाई से जाता है।
इसके नाशका उपाय विवेक या ज्ञान है। जब ज्ञानका उदय हो जाता है, तब जिस तरह पका हुआ आम आप-से-आप गिर पड़ता है ; उसी तरह अभिमान भी आप-से-आप दूर हो जाता है। अभिमानके नाश होते ही चित्त शुद्ध हो जाता है। चित्त के शुद्ध होनेसे परमात्माके दर्शन होनेकी राह साफ हो जाती है।
मनुष्यों ! अभ्यास करो, अभ्याससे सब कठिनाईयाँ हल हो जाती हैं। जैसे भी हो, मनको वासना-हीन बनाओ। वासना-
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हीन, निर्मल विनष्ट वाले व्यक्ति पर उपदेश जल्दी असर करता है और उसमें ईश्वरानुराग शीघ्र ही उत्पन्न हो जाता है ।
दोहा ।
ऐसौ मैं संसार में, सुन्यो न देख्यो धीर ।
विषया-हथिनी संग लग्यो, मनगज चाँचे वीर ॥४६॥
46, O brother, wandering all the world over and seeking throughout the three Regions, we have neither seen nor heard of a man who has been successful in curbing the wild restlessness of his mind which is like a male-elephant turned mad through cupidity and pursuing his female for the gratification of his sensual desires
ये बद्धन्ते धनर्षतिपुरः प्रार्थनादुःखभाजो
ये चाल्यन्तं दधति विषयात्तेपर्यस्तबुद्धेः ।
तेषामन्तः स्फुरितहसितं वासरणान् स्मरेयं
ध्यानच्छेदे शिखरिकुहरावशव्यानिषण्णः ॥४७॥
वे दिन जो धनके लिये धनवानोंकी खुशामद करनेके दुःखले बड़े मालूम होते थे और वे दिन जो विषयासक्तिमें छोटे लगते थे ; उन दोनों प्रकारके दिनोंको हम पर्वत की एकान्त गुहामें, पत्थरकी
धोर = धीरजवान । विषय-हथिनी = विषयरूपी हथिनी । मनगज = मन-रूपी हाथी । संग लग्यो = पीछे पड़ा हुआ । वीर = बहादुर ।
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शिलापर बैठे हुए, आत्मध्यानमें मग्न होकर, अन्तःकरणमें हँसते हुए याद करेंगे ॥४१॥
जिन लोगोंको अनेक प्रकारके पेशोइश्वरत और भोग-विलासके सामान मयस्सर है, जिनके यहाँ किसी भी संसारी भोग-विलासकी सामग्रीका अभाव नहीं है, जिनके सुन्दरी मृगनयनी कामिनी सेवा करनेको हैं, जिनके दास-दासी हैं, जिनके बाग-बगीचे हैं, जिनके गाड़ी-घोड़े और मोटर हैं, जिनके पीछे अनेक तरहके खुशामद लगे रहते हैं, जिनके हाथमें द्रव्य है अथवा जिनपर राजकृपा है—ऐसे लोगोंके दिन बड़ी जल्दी कटते हैं। उन्हें दिन-रात बीतते हुए मालूम ही नहीं होते, लम्बे-लम्बे दिन भी छोटे प्रतीत होते हैं; किन्तु जिन लोगोंको सब तरहका अभाव है, जो हर बातके लिये तड़्क हैं, जो अपनी इच्छा पूरी करनेके लिये धनियोंसे धन माँगते हैं, उनकी खुशामद करते हैं, उनकी दुत्कार-फटकार सहते हैं, अपमानित होते हैं, उनके लिये वे ही दिन बड़े भारी मालूम होते हैं—काटे भी नहीं कटते। किन्तु जो लोग विषयोंका सामान होते हुए भी विषय-सुख नहीं भोगते, और अभाव होने पर भी इच्छा नहीं रखते, इसलिये धनियोंके देहरे नहीं ढोकते, उनकी खुशामद नहीं करते, अपने आत्माराममें ही मस्त रहते हैं,—वे सुखी हैं; उन्हें दिन बड़े और छोटे नहीं लगते।
जिसने दोनों प्रकारके दिन देखे हैं, पर शेषमें उसे ऐसे भगड़ोंसे विरक्ति हो गयी है, वह कहता है,—मैं एकान्त गुफा-
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में पवित्र शिलापर बैठ डूआ, आत्माका ध्यान करूँगा और उन दिनोंको याद करके उनपर घुणासे हर्षूँगा ।
कुण्डलिया ।
छोटे दिन लागत तिन्हें, जिनके बहुविधि भोग ।
बीत जात विलसत हँसत, करत सुरत संयोग ।
करत सुरत संयोग, तनकसे लागत तिनको ।
जे हैं सेवक दीन, निपट दीरघ हैं विनको ।
हम बैठे गिरि-शृंग, श्रंग याही ते मोटे ।
सदा एक रस द्योष, लगत हैं बड़े न छोटे ॥४७॥
47. We shall now, seated in self-contemplation on a stone in some lonely cave of a mountain, remember with a smile the past days which appeared to us to have become intolerably long when we suffered from the hardship of appealing to rich men for help and which became quite short when our mind was lost in the enjoyment of worldly pleasures.
विद्या नाधिगता कर्लकरहिता वित्तं च नोपाजितं
शुश्रूषापि समाहितेन मनसा पिचोर्न सम्पादिता ।
तिन्हें = उन्हे । बहुविधि = तरह-तरहके । ६ त = भोग-विलास । तनकसे = छोटे । निपट = बहुत ही । दीरघ = बड़े । विनको = उनको । गिरिशृंग = पर्वतकी चोटी ।
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शालोलार्पतलोचना युवतयः स्वस्वेऽपि नालिगिताः
कालोऽयं परिण्डलोलुपतथा काकैरित प्रेरितः ॥४८॥
न तो हमने निष्कलंक विद्या पढ़ी और न धन कमाया ; न हमने शान्त चित्तसे माता-पिताकी सेवा ही की और न स्वप्नमें भी दीर्घनयनी कामिनियोंको गलेसे ही लगाया । हमने इस जगत्में आकर, कन्वेकी तरह पराये टुकड़ोंकी ओर ताक लगानेके सिवा, क्या किया ? ॥४८॥
जिस मनुष्यने औरोंकी खुशामद-बरामद या लहलहो-पत्तो करके अपना पेट भरा, टुकड़ोंके लिये सदा पराये मुँहकी ओर देखता रहा, वही शरूख शेषमें दुःखित होकर कहता है,—हाय मैंने बे-पैघ इक्षु भी न पढ़ा, धन भी उपार्जन न किया, मुगनयनी कामिनियोंका आलिङ्गन भी न किया और माता-पिताकी सेवा भी न की—मैंने वृथा जन्म लिया और अपना जीवन वृथा गुंवाया ।
जो संसारमें आकर न हवि-भजन करते हैं, न विद्या अध्ययन करते हैं, न धनोपार्जन करके सुख भोगते हैं और न संसार के दुःखियोंके दुःख ही दूर करते हैं, उनका इस दुनियामें आना वृथा है । किसीने कहा है—
न उधरके रहे, न उधरके रहे ।
न खुदा ही मिला, न विसाले सनम ॥
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और भी किसीने कहा है—
कहा कियो हम आयेके, कहा करेंगे जाय ?
इतके भयेन उतके, चाले मूल गँवाय ॥
मतलब यह है, कि विद्या पढ़ना, विद्या-बुद्धिसे धन-उपाज्जन करना, सुख भोगना और माँ-बापकी सेवा करना अच्छा ; पर खाली पेट भरनेके लिये, कब्बेकी तरह पराया मुँह ताकना अच्छा नहीं। मुँह ही ताकना है, तो उस परमात्माका ताको, जो अभावशून्य है और सबका दाता है। उससे ही आपकी इच्छा पूरी होगी। अगर आप उसीका भरोसा करेंगे, तो वह आपके सब अभाव दूर करेगा, आपके दुःखोंमें दुःखी और आपके सुखोंमें सुखी होगा। उसके बिना आपकी भूख न मिटेगी। रहीम कहते हैं और सब कहते हैं—
रामचरण-पहिचान विन, मिटी न मनकी दौर ।
जनम गँवाये बादिही, रटत पराये पौर ॥
भगवान्के चरण-कमलोंसे परिचय हुए बिना, उनके पदपङ्क्तोंसे प्रेम हुए बिना, मनुष्यके मनकी दौड़ नहीं मिटती—मनकी चञ्चलता नहीं जाती और स्थिरता नहीं होती। मनके स्थिर हुए बिना भगवान्के भजनमें मन लग नहीं सकता। जो लोग गेहना बाना धारण करके साधु हो जाते हैं और भगवान्में मन नहीं लगाते—वे लोग पेटके लिए दर-दर चीख-चिल्लाकर अपना दुर्लभ मनुष्य-जन्म बुथा ही
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गँवाते हैं। वे मूर्ख इस बातको नहीं समझते, कि यह मनुष्य-जन्म बड़ी कठिनसे मिला है। ऐसा मौका फिर जल्दा नहीं मिलनेका। अगर यह जन्म पेटकी चिन्तामें गँवाया जायगा ; तो फिर चौरासी-लाख योनियोंमें जन्म लेनेके बाद कहीं मनुष्यजन्म मिलेगा। इससे तो यही अच्छा होता, कि वे संसारत्यागी बननेका दौग्न न रचकर, संसारी या गृहस्थ ही बने रहते। संसारी बने रहनेसे वे इस दुनियाके मिथ्या सुख-भोग तो भोग लेते। ऐसे दौग्नो दोनों तरफसे जाते हैं।
गोस्वामी तुलसीदासजी कहते हैं—
काम क्रोध मद लोभकी, जब लागि मनमें खान का पण्डित का मूरखै, दोनों एक समान । इत कुलकी करती तजे, उत न भजे भगवान । “तुलसी” अध्ववरके भये, ज्यों बधूरके पान ॥ “तुलसी” पति दरबारमें, कर्मै वस्तु कछु नाहिं । कर्महीन कलपत फिरत, चूक चाकरी माहिं ॥ राम गरीबनिवाज हैं, राम देत जन जानि । “तुलसी” मन परिहरत नहिं, घुरबिनिधाकी बानि ॥
काम, क्रोध, मद और लोभ—जब तक मनमें रहते हैं तब तक पण्डित और मूर्खमें कोई फ़र्क नहीं—दोनों ही समान हैं।
जो लोग केवल पुजनके लिए घर गृहस्थीको त्यागकर साधु बन-
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जाते हैं, वे अगर अपने रहें तो माता-पिताकी स्नेहा, आतिथ्य-सत्कार, पिण्डदान, ब्राह्मण-भोजन, सन्तानोत्पत्ति और कन्या-दान आदि गृहस्थके कर्म कर सकते हैं ; पर साधुवेष धारण करने से इन कामोंको नहीं कर सकते । दूसरी ओर, साधु होकर ईश्वर-भजन करना चाहिये, परपूर्विकि वे सच्चे साधु नहीं—काम, क्रोध, मद, मोह और लोभ उनसे अलग नहीं—इसलिये उनका चित्त स्थिर नहीं होता । चित्तके स्थिर न होनेसे, ईश्वरमें भी उनका मन नहीं लगता । पेट भरनेके लिए वे घर-घर मारे-मारे फिरते हैं । इस तरह वे न तो घरके रहते हैं न घाटके । तुलसीदासजी कहते हैं, उनकी गति बवण्डर या बगुलेके पत्तेकीसी होती है, जो न तो आकाशमें ही जाता है और न जमीन पर ही रहता है—अधपरमें उड़ता फिरता है । इस तरह जन्म गँवाना—मूर्खता नहीं तो क्या है ? जो लोग मिहन्त-भजदूरी करके कामा नहीं सकते और बैठे-बैठे मिलता नहीं, वे कुटुम्बका पालन न कर सकनेकी वजहसे साधु बन जाते हैं । फिर वे दरदर टुकड़े माँगते और टोकरे खाते हैं । ईश्वरपर भी उनका भरोसा नहीं । अगर परमात्मा पर भरोसा होता, तो वे ध्यानस्थ होकर उसीका जप करते और वह भी उनकी फिक्र करता । जो उसके भरोसे निर्जन और बयाबाँ जंगलोंमें भी जाकर बैठ जाते हैं, उनको वह वहीँ पहुँचाता है, इसमें सन्देह नहीं । वह उसका नाम न जपनेवालोंको ही पहुँचाता है ; तब उसके ही भरोसे रहनेवालों और उसीकी माला जपने वालोंको वह कैसे भूल सकता है ?
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वह सवेरेसे श्रमम तक विश्वके प्राणियोंको खाना पहुँचाता है, विश्वका पालन करता है, इसीसे उसे विश्वभर कहते हैं। वह हाथीको मन और कीड़ीको कल पहुँचाता है, इसमें सन्देह नहीं। एक बार शाहन्शाह अकबर आज़मको उसके विश्वभर होनेमें सन्देह हुआ। उन्होंने एक कौँके बक्समें एक चींटी बन्द करवा दी। चींटीके उसमें बन्द किये जानेसे पहले, उन्होंने स्वयं अपने हाथोंसे बक्सका कोना-कोना देख लिया। फिर उसमें चींटी बन्द कराकर ताला लगा दिया और चाभी अपने पास रखली। बक्स भी दिन-रात अपने सामने ही रखा। २४ घण्टे बाद जब बक्स खोला गया, तो चींटीके मुँहमें एक चाँवलका दाना पाया गया। बादशाहका शक रफ़ा हो गया। उन्होंने भी उसे विश्वभर मान लिया।
तुलसीदासजी कहते हैं, स्वामीके दरबारमें किसी बीज़का अभाव नहीं है। उनके दरबारमें धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष चारों पदार्थ मौजूद हैं। उनके भक्त जो चाहते हैं, उन्हें वही मिल जाता है। उनके भक्तोंकी इच्छा होते ही स्रष्टि सिद्धि उनके कदमोंमें हाज़िर हो जाती है, पर शर्त यह है कि उनके भक्तोंका मन चलायमान न हो, उनका मन किसी दूसरी ओर न जाय। जो लोग ईश्वरकी चाकरीमें बूकते हैं, फिर चित्त होकर उसकी पूजा-उपासना नहीं करते, मनको अरह-जगह भटकाते हैं, वे कर्महीन दुःख पाते हैं, उनको मनवर्णित पदार्थ नहीं मिलते। सुखदाताको भूलनेसे सुख कैसे हो सकता है?
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भगवान् दीनबन्धु, दीनदयाल और गरीब-परवर हैं। वे दीनोंके दुःख दूर करने वाले और गरीबोंकी गरीबी या मुहताजी मिटाने वाले हैं। वे अपनोंको अपना समझ कर, इस लोक और परलोकके पूर्ण सुखेश्वर्य देते हैं। इस दुनियामें धर्म, धर्म और काम देते हैं और मरने पर, उस दुनियामें, स्वर्ग या मोक्ष देते हैं। मतलब यह है, जो ईश्वरकी शरणमें चले जाते हैं, ईश्वर अपने उन शरणगताओंकी इच्छाओंको उनके मनमें इच्छा होते ही पूरी कर देता है। पर अफसोस तो यही है कि, मन अपनी घुड़बिनियाकी आवृत नहीं छोड़ता अर्थात् मन संसारी पदार्थोंमें जाये बिना नहीं रहता। अगर मन संसारी पदार्थोंमें जाना छोड़ दे, तो दरिद्रता रहे हो क्यों? सारे अभाव दूर हो जायँ।
कृपय ।
विद्या रहित-कलंक, ताहि चितमें नहि धारी ।
धन उपजायो नाहि, सदा-संगी सुखकारी ।
मात-पिताकी सेव-सुश्रूषा, नेक न कीन्ही ।
मृगनयनी नवनारि, अंक भर कयहुँ न लीन्ही ।
रहित-कलंक-कलंकरहित-निर्दोष । ताहि-उसे, निर्दोष विद्याको। बारी-आरक्षकी । उपजायो-पैदा किया। सदा-संगी-सदा-सर्वदा साथ रहनेवाला। सेव-सुश्रूषा-सेवादृष्टल, क्षिप्रमत। नेक-जरा भी। मृग- नयनी-हिरनकेसे नेत्रोंवाली। नवनारि-नवोना स्त्री, सोलह सासकी