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वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshana with Hindi Bhashya

महर्षि कणाद द्वारा

स्रोत: स्वामीमेशिन यन्त्रालय · स्वामीमेशिन यन्त्रालय (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished160 पृष्ठ

ऽव्यतिकरः ” इत्यादि वेदान्तदर्शनसूत्रेषु । प्रशस्तपादभाष्ये

६६ वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद

रणत्वात्” इति योगदर्शने; “तदन्तरप्रतिपत्तौ रंहति संपरि- ष्वक्तः”, “ उत्क्रान्तिगत्यागतीनाम् ”, “ नाणुरतच्छ्रुतेरिति- चेन्नेतराधिकारात्”, “अंशो नानाव्यपदेशात्”, “असंततेश्चा- ऽव्यतिकरः ” इत्यादि वेदान्तदर्शनसूत्रेषु । प्रशस्तपादभाष्ये ऽपि च “आत्मत्वाभिसंबन्धादात्मा, तस्य सौक्ष्म्यादप्रत्यक्षत्वे सति करणैः शब्दाद्युपलब्ध्यनुमितैः श्रोत्रादिभिः समधिगमः क्रियते... तस्य गुणा बुद्धिसुखदुःखेच्छाद्वेषप्रयत्नधर्माऽधर्म- संस्कारसंख्यापरिमाणपृथक्त्वसंयोगविभागाः ... व्यवस्था- वचनात्संख्यापृथक्त्वमप्यत एव । पृथिव्युदकज्वलनपव- नात्ममनसामनेकत्वाऽपरजातिमत्त्वे, बुद्धिसुखदुःखेच्छाद्वेष- प्रयत्नानां द्वयोरात्ममनसोः संयोगादुपलब्धिः” इति । एवं श्रुतिस्मृतिशास्त्रप्रतिपादितमिदमाऽऽत्मबहुत्वं लोकव्यवहारे ऽपि प्रसिद्धम्” ॥ जीव अणु हैं और अनेक तथा असंख्येय हैं। इस विषय में “नमोभस्त एमसि० ” इत्यादि वेदवचन ऊपर संस्कृत में देखिये, जिन से जीवों का अणुत्व परिच्छिन्नत्व और एकदेशीयपना तथा बहुत होना पाया जाता है जो वस्तु संख्या में अनेक हों वे सर्वव्यापक नहीं हो सकते और जो जीव गमनशील हों अर्थात् एक देह से दूसरे देह में जावें, वे विभु नहीं हो सकते यह बात “एषोणुरात्मा०” इत्यादि सैकड़ों उपनिषद् वचनों में भी वर्णित है जिन में से कुछ एक ऊपर संस्कृत में लिखे हैं । अन्य दर्शनों में भी जीवात्मा का बहुत्व माना गया है जैसा कि सांख्यदर्शन में-“ पुरुषबहुत्वं व्यवस्थातः ६। ४५ । और-“ नाद्वैतश्रुतिविरोधो जातिपरत्वात् ” १ । १५४ इन सूत्रों में जीवों का बहुत्व और अद्वैत कहने वाली श्रुतियों का जातिपरक होना मानकर विरोधपरिहार किया गया है । इसी प्रकार योगदर्शन में भी जीवात्मा का अनेक होना और एकदेशीय होना कहा गया है । यथा - “कृता प्रति नष्टमप्यनष्टं तदन्यसाधारणत्वात् ” २ । २२ इत्यादि । इसी प्रकार

तृतीयाऽध्यायः १ आह्निकं ६३

तृतीयाऽध्यायः १ आह्निकं ६३ वेदान्तदर्शन में भी- "तदन्तरप्रतिपत्तौ रंहति संपरिष्वक्तः ३ । १ । १ और- “उत्क्रान्तिगत्यागतीनाम्” २ । ३ । १९ तथा-“नाणुरतच्छ्रुतेरिति चेन्नेतराधि- कारात् ” २ । ३ । २१ और भी-“ अंशोनानाव्यपदेशात् ” २ । ३ । ४३ तथा च-“ असन्ततेश्चाव्यतिकरः ” २ । ३ । ४९ इत्यादि सूत्रों में जीवों का भागना, दौड़ना जाना आना अणु होना और अणुत्वविरोधाभासप्रतिपादक वाक्यों- का दोषपरिहार और नानात्व तथा एकदेशीयत्व और अव्यापकत्व स्पष्ट प्रति- पादन किया है ॥ प्रशस्तपाद भाष्य में भी जो ऊपर संस्कृत में उद्धृत है, जीव का संख्या- युक्त होना, अलग २ होना, संयोग और विभाग करना कहा गया है । इस प्रकार वेद, उपनिषद्, सांख्य योग वेदान्त इत्यादि दर्शन, प्रशस्तपाद भाष्य और अनेक उपनिषद् जीवों को बहुत्व मानते हैं । इस पर कई लोग शङ्का करेंगे कि आप ने जीवों के बहुत्वप्रतिपादक वचन तौ इकट्ठे कर दिये परन्तु सैंकड़ों वचन जो वेद, उपनिषद् और शास्त्रों में आत्मा के एकत्व को प्रति- पादन करते हैं उन की क्या गति होगी ? यथा-यस्तु सर्वाणि० यस्मिन् सर्वाणि० योसावादित्ये पुरुषः० ईशोपनिषद् और-यदेवेह तदमुत्र० मनसैवेदमाप्तव्यम्० कठोपनिषद् इत्यादि अनेक उपनिषदों, वेदों और दर्शनसूत्रों में कहे गये हैं ? उत्तर-प्रत्येक वचन के यहां संग्रह करने और दोषपरिहार करने में तौ ग्रन्थ बहुत बढ़ जावेगा किन्तु यदि वाचकवृन्द विचार करेंगे तो सर्वत्र ही नीचे लिखे कारणों से संगति मिल जायगी और दोषपरिहार हो जायगा ॥ १-कहीं २ अपने समान सुख दुःख का अनुभव जानकर किसी पर भी अन्याय न करने के लिये आत्मा आत्मा की एकता कहते हुवे एकत्व का भ्रम होता है। कहीं २ जीवात्मा को परमात्मा से अनन्य भक्ति के समय तन्मयता का वर्णन करने को वचन हैं, जिन में जीव ब्रह्म की एकता भ्रान्ति से प्रतीत होती है । कहीं २ परमात्मा का एकत्व प्रतिपादित है जिसको भ्रम से कोई लोग जीवों का एकत्व समझ लेते हैं परन्तु वास्तव में भेदप्रतिपादक वाक्य स्पष्ट और यथार्थ हैं और समस्त व्यवहार उन्हीं से चलता है, इस के विरुद्ध एकत्वप्रति- पादक वाक्य लक्षण से व्याख्या करने योग्य हैं ॥ १९ ॥ १३६-प्रवृत्तिनिवृत्ती च प्रत्यगात्मनि दृष्टे परत्र लिङ्गम् ॥ २० ॥ ( प्रवृत्तिनिवृत्ती च ) प्रवृत्ति और निवृत्ति ( प्रत्यगात्मनि ) अपने अपने आत्मा में ( दृष्टे ) देखी जाती हैं (परत्र ) पराये में (लिङ्गम् ) वही लिङ्ग हैं ॥

६८ वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद जिस प्रकार रागोत्पन्न प्रयत्न=प्रवृत्ति और द्वेषोत्पन्न प्रयत्न=निवृत्ति अपने आत्मा में देखी जाती हैं इसी प्रकार हितकारक कामों में प्रवृत्ति और अहित कामों में निवृत्ति देखकर दूसरों के आत्मा का लिङ्ग से अनुमान करना चाहिये कि मेरे समान इन की भी प्रवृत्ति निवृत्ति आदि चेष्टायें हैं इसलिये अवश्य मेरे समान इन में भी एक पृथक् २ आत्मा है ॥ २० ॥ इस प्रकार आत्मा की सिद्धि के प्रकरण से आत्मा के लिङ्ग और अनात्मा के लिङ्ग तथा अपने आत्मा के समान पराये आत्माओं का होना इस आन्हिक में वर्णन किया गया ॥ इति तृतीयाध्याये प्रथममाह्निकम् अथ द्वितीयमाह्निकम् आत्मा की पहचान में जिस प्रकार प्रथमान्हिक में इन्द्रियार्थप्रसिद्धि को लिङ्ग कहा गया, इसी प्रकार इस द्वितीय आन्हिक में मन की गति को आत्मा का लिङ्ग बतायेंगे, इस लिये प्रथम मन की परीक्षा आरम्भ करते हैं और उद्देश के क्रम को छोड़कर भी आवश्यकतावश मन की परीक्षा करते हैं:- १३७-आत्मेन्द्रियार्थसन्निकर्षे ज्ञानस्य भावोऽभावश्च मनसो लिङ्गम् ॥ १ ॥ (आत्मेन्द्रियार्थसन्निकर्षे) आत्मा, इन्द्रियों और विषयों के सामीप्य में भी ( ज्ञानस्य ) ज्ञान का ( भावः ) होना ( च ) और ( अभावः ) न होना ( मनसः ) मन का ( लिङ्गम् ) लिङ्ग है ॥ देखा जाता है कि इन्द्रियों के समीप विषय हों तब भी उन का ज्ञान नहीं होता और होता भी है अर्थात् हमारी आंख के सामने से हाथी निकल जाता है और हमें ज्ञान नहीं होता । हमारे कानों को सुनाने के लिये कोई पुकार जाता है और हम नहीं सुनते, इसी प्रकार अन्य इन्द्रियों के विषयों को भी हम ग्रहण नहीं करते, जब तक कि इन्द्रियों के अतिरिक्त मन भी उस विषय में न लगे । यों तो एक ही काल में हमारी त्वचा स्पर्श करती रहती है, नासिका के सामने गन्ध उपस्थित रहता है, आंखों के आगे कोई न कोई रूप रहता है परन्तु क्या हम पाञ्चों इन्द्रियों से पाञ्चों विषयों का ग्रहण एक

तृतीयाऽध्याय २ आह्निक ६९

तृतीयाऽध्याय २ आह्निक ६९ साथ कर सकते हैं ? कभी नहीं, किन्तु जिस विषय में इन्द्रिय और मन दोनों लगें, उसी विषय का ग्रहण होता है और जिस विषय में इन्द्रिय लगे, परन्तु मन न लगे, उस का ग्रहण नहीं होता । इस लिये मन का होना सिद्ध है जो एक साथ अनेक विषयों का ग्रहण नहीं होने देता । ऐसा ही न्यायदर्शन में लिखा है किः- युगपज्ज्ञानानुत्पत्तिर्मनसो लिङ्गम् १ । १ । १६ ॥ अर्थात् एक साथ अनेक ज्ञानों का उत्पन्न न होना मन का लिङ्ग है । इस प्रकार न्याय और वैशेषिक का मत समान है ॥ १ ॥ यदि कहो कि मन सिद्ध हुवा परन्तु मन का द्रव्य होना और नित्य होना कैसे सिद्ध होंगे ? तो उत्तर- १३८-तस्य द्रव्यत्वनित्यत्वे वायुना व्याख्याते ॥ २ ॥ (तस्य) उस मन के (द्रव्यत्वनित्यत्वे) द्रव्यपना और नित्यपना (वायुना) वायु से (व्याख्याते) व्याख्यान किये ॥ जिस प्रकार वायु द्रव्य और नित्य है उसी प्रकार मन भी द्रव्य और नित्य है । द्रव्य के लक्षण में कह चुके हैं कि जो क्रियावाला और गुणवाला तथा समवायी कारण हो उस को द्रव्य कहते हैं, जैसे वायु गति क्रिया वाला है वैसे मन भी गति क्रिया वाला है, जैसे वायु स्पर्श गुण वाला है वैसे मन भी बोध गुण वाला है और जैसे वायु अपने कार्यों का समवायी कारण है वैसे मन भी अपने कार्यों का समवायी कारण है और जैसे वायु मोक्ष पर्यन्त स्थायी है वैसे मन भी मोक्ष पर्यन्त ठहरने वाला है । इस लिये वायु के द्रव्यत्व और नित्यत्व के समान मन का भी द्रव्यत्व और नित्यत्व कहा गया सम- झना चाहिये ॥ २ ॥ क्यों जी ? यह मन प्रत्येक शरीर में अनेक हैं वा एक ? उत्तरः- १३९-प्रयत्नायौगपद्याज्ज्ञानायौगपद्याच्चैकम् ॥ ३ ॥ (प्रयत्नायौगपद्यात्) प्रयत्न के एक साथ न होने से (च) और (ज्ञाना- यौगपद्यात्) ज्ञान के एक साथ न होने से (एकम्) एक है ॥ यदि मन अनेक होते तो एक साथ अनेक प्रयत्न हो सकते क्योंकि एक मन से एक प्रयत्न और दूसरे मन से दूसरा प्रयत्न हो सकता । इसी प्रकार एक

९७ वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद मन से एक ज्ञान और दूसरे मन से दूसरा ज्ञान हो सकता, और होता है नहीं, इस लिये मन एक है ॥ ३ ॥ उद्देश क्रम को छोड़ कर आवश्यकता से मन की परीक्षा कही गई अब फिर उद्देश क्रमानुसार आत्मा की परीक्षा करते हुये उस के साधक लिङ्गों का वर्णन करते हैं:- १४०-प्राणापाननिमेषोन्मेषजीवनमनोगतीन्द्रियान्तरविकाराः सुखदुःखेच्छाद्वेषप्रयत्नाश्चात्मनो लिङ्गानि ॥ ४ ॥ ( प्राणापा-विकाराः ) प्राण, अपान, निमेष, उन्मेष, जीवन, मनो- गति और इन्द्रियान्तरविकार, तथा ( सुखदुः-प्रयत्नाः ) सुख, दुःख, इच्छा, द्वेष और प्रयत्न ( आत्मनः ) आत्मा के ( लिङ्गानि ) लिङ्ग हैं ॥ मुख और नासिका से बाहर निकलने वाला, ऊपर को चलने वाला, शरीरस्थ वायु प्राण कहाता है; मूत्र और विष्ठा को नीचे निकालने वाला शरीरस्थ वायु अपान कहाता है; आंख की पलकों को मिलाना निमेष कहाता है, और आंख की पलकों को पृथक् करना उन्मेष कहाता है; शरीर की वृद्धि और घाव का भर आना आदिक जीवन कहाता है; अपने चाहे विषयों के ग्राहक इन्द्रियों से सम्बन्ध जोड़ने को उस २ विषय पर मन का लेजाना मनोगति कहाता है; एक इन्द्रिय से ग्रहण किये हुये विषय का दूसरे इन्द्रिय में विकार उत्पन्न होजाना-जैसे आंख से खटाई को देखकर जीभ में पानी भर आना इन्द्रियान्तरविकार कहाता है; किसी विषय का अनुकूल प्रतीत होना सुख कहाता है; किसी विषय का प्रतिकूल प्रतीत होना दुःख कहाता है; अपने लिये वा पराये लिये अप्राप्त वस्तु की प्रार्थना करना इच्छा कहाता है और जिस से अपने आत्मा में जलन सी प्रतीत हो उस अप्रियता के ज्ञान से उत्पन्न हुवा गुण द्वेष कहाता है; और कुछ करना प्रयत्न कहाता है । यह सब आत्मा के होने में लिङ्ग हैं अर्थात् जहां आत्मा होता है वहीं प्राणादि प्रयत्न पर्यन्त लिङ्ग पाये जाते हैं और जब आत्मा देह से निकल जाता है तब यह लिङ्ग नहीं पाये जाते । इस लिये यह आत्मा के लिङ्ग हैं । शरीर में प्राण और अपान दोनों रहते हैं जिन में से एक नीचे और दूसरा ऊपर जाने वाला है, इन दोनों परस्परविरोधियों को प्रयत्न से अपने अधिकार में रखना अर्थात् जब चाहे तब अपान को नीचे निकाले और

तृतीयाऽध्याय २ आन्हिक ९१ जब चाहे तब प्राण को ऊपर फेंके। यह सब चेष्टा बिना शरीराधिष्ठाता आत्मा के नहीं हो सक्तीं। इस लिये प्राण और अपान आत्मा के लिङ्ग हैं। इसी प्रकार आंख मीचना और खोलना एक दूसरे के विरोधी दो कर्म बिना किसी स्वतन्त्र प्रयत्न करने वाले के हो नहीं सक्ते, इसलिये निमेष और उन्मेष भी आत्मा के लिङ्ग हैं। तथा प्रतिक्षण शरीर का बढ़ना और चोट लगने पर घाव का फिर से भरना भी, जो जीवन है, बिना किसी अधिष्ठाता आत्मा के हो नहीं सक्ता, इसलिये जीवन आत्मा का लिङ्ग है। इसी प्रकार भिन्न २ विषयों की ग्रहण करने वाली इन्द्रियों को मन की सहायता से किसी एक विषय में लगाना और दूसरे विषय से हटाना भी आत्मा के बिना नहीं हो सक्ता, इसलिये मनोगति आत्मा का लिङ्ग है और नारङ्गी को आंख से देख कर उस के स्वाद को याद करना और फिर दूसरी इन्द्रिय रसना से विकार उत्पन्न करना आत्मा के बिना कैसे हो सकता है, इस लिये इन्द्रियान्तर विकार आत्मा का लिङ्ग हैं। जो गुण है वह किसी द्रव्य के आश्रय रहता है जैसा कि रूप तेज के आश्रय रहता है। इसी प्रकार सुख दुःख इच्छा द्वेष और प्रयत्न भी गुण हैं जो किसी द्रव्य के आश्रय रहने चाहियें और वह द्रव्य आत्मा ही हो सकता है, इस लिये सुख, दुःख, इच्छा, द्वेष और प्रयत्न भी आत्मा के लिङ्ग हैं ॥ ४ ॥ क्यों जी ! प्राणापानादि लिङ्गों से आत्मा तो सिद्ध हुवा, परन्तु आत्मा का द्रव्यत्व और नित्यत्व कैसे सिद्ध हो ? उत्तर- १४१-तस्य द्रव्यत्वनित्यत्वे वायुना व्याख्याते ॥ ५ ॥ (तस्य) उस आत्मा के (द्रव्यत्वनित्यत्वे) द्रव्यत्व और नित्यत्व (वायुना) वायु से (व्याख्याते) कहे गये ॥ वायु के द्रव्यत्व और नित्यत्व के समान हेतु से आत्मा का भी द्रव्यत्व और नित्यत्व कहा गया समझना चाहिये अर्थात् जैसे वायु नित्य और द्रव्य है, वैसे ही आत्मा भी नित्य और द्रव्य है। इतना विशेष समझना चाहिये कि वायु के समान आत्मा व्यावहारिक नित्य नहीं किन्तु वास्तविक नित्य है और वायु व्यावहारिक नित्य है क्योंकि वायु सृष्टि के आरम्भ से प्रलय की अवधिपर्य्यन्त नित्य है, परन्तु आत्मा प्रलय में भी नष्ट नहीं होता, इस लिये वास्तविक नित्य है, यहां उस को वायु के समान नित्य कहना केवल नित्य शब्द की समानता को लेकर है ॥ ५ ॥

७२ वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद


प्रश्न- ज्ञानादि गुण तो अदृष्ट हैं ? किसी दृष्ट लिङ्ग से आत्मा सिद्ध कीजिये ? उत्तर- सुनियेः-

१४२-यज्ञदत्त इति सन्निकर्षे प्रत्यक्षाभावाद् दृष्टं लिङ्गं न विद्यते ॥ ६ ॥

( सन्निकर्षे ) समीप होने पर भी ( यज्ञदत्तः इति ) यज्ञदत्त है, ऐसा ( प्रत्यक्षाभावात् ) प्रत्यक्ष न होने से ( दृष्टम् ) दृष्ट ( लिङ्गम् ) लिङ्ग ( न ) नहीं ( विद्यते ) होता है ॥

भाव यह है कि संसार में सामने खड़े हुये देवदत्त यज्ञदत्तादि को देख कर भी केवल शरीर का प्रत्यक्ष होता है, न कि इस बात का कि यह देवदत्त है वा यज्ञदत्त है। तब फिर आत्मा के सिद्ध करने में यदि दृष्ट लिङ्ग न हो तो क्या हानि वा आश्चर्य है ? ॥ ३ ॥

तब फिर आत्मा कैसा है ? उस को कैसे जानें ? सुनियेः-

१४३-सामान्यतोदृष्टाच्चाविशेषः ॥ ७ ॥

( सामान्यतोदृष्टात् ) सामान्यतोदृष्ट से ( च ) और [ ज्ञानादि गुणों से ] ( अविशेषः ) विशेष नहीं कह सकते ॥

अर्थात् जो ज्ञानादि गुण चतुर्थ सूत्र में कहे गये हैं उन्हीं से समझलो कि इन गुणों का आश्रय कोई द्रव्य है, विशेष कुछ नहीं कह सकते ॥ ७ ॥

तो फिर उस का नाम आत्मा है, यह कैसे जानें ? उत्तरः-

१४४-तस्मादागमिकः ॥ ८ ॥

( तस्मात् ) इस कारण ( आगमिकः ) शास्त्रसिद्ध है ॥

अर्थात् जब सामान्यतोदृष्ट ज्ञानादि गुणों का आश्रय द्रव्य विशेष कोई न कोई है और वह क्या है अर्थात् उसका नाम क्या है यह बात शास्त्र में देखकर इतनी ही निश्चित होती है कि उस का नाम आत्मा है। जैसा कि “आत्मैवाभूद्विजानतः” यजुः ४०।७। “आत्मानं चेद्विजानीयात्” बृहदारण्यक ४।४।१२ इत्यादि शास्त्र में उस का नाम आत्मा पाया जाता है ॥ ८ ॥

प्रश्न- पृथिव्यादि आठ द्रव्यों में से ही किसी को आत्मा क्यों न मान लिया जाय ? उत्तर-

१४५-अहमिति शब्दस्य व्यतिरेकान्नागमिकम् ॥ ९ ॥

तृतीयाऽध्याय २ आन्हिक ३३ ( अह्मिति शब्दस्य ) " अहम्=मैं" इस शब्द के ( व्यतिरेकात् ) भिन्न होने से ( आगमिकम् ) शास्त्रानुकूल ( न ) नहीं होगा ॥ अर्थात् मैं और मेरा का व्यवहार पृथिवी आदि अन्य द्रव्यों में नहीं पाया जाता इस कारण पृथिवी आदि अन्य आठ द्रव्यों में से किसी को आत्मा मानना शास्त्रानुकूल नहीं ॥ ९ ॥ प्रश्न-हम तो प्रत्यक्षात्मवादी हैं, तब- १४६-यदि दृष्टमन्वक्षमऽहं देवदत्तोऽहं यज्ञदत्त इति ॥ १० ॥ (यदि) यदि (अन्वक्षम्) आंखों सामने (दृष्टं) देखे हुवे को ( अहम् देवदत्तः ) मैं देवदत्त हूं ( अहम् यज्ञदत्तः ) मैं यज्ञदत्त हूं ( इति ) इस प्रकार [ आत्मा मानलेवें तो क्या हानि है ? ] ॥ १० ॥ उत्तरः- १४७-दृष्ट आत्मनि लिङ्गे एकएव दृढत्वात् प्रत्यक्षवत् प्रत्ययः ॥ ११ ॥ (आत्मनि) [ षष्ठ्यर्थे सप्तमी ] आत्मा के (लिङ्गे) लिङ्ग के (दृष्टे) दृष्ट होने पर तौ ( दृढत्वात् ) दृढ़ होने से (एकः) एक (एव) ही (प्रत्ययः) प्रतीति होती (प्रत्यक्षवत्) जैसा कि प्रत्यक्ष में होती है ॥ यदि मैं देवदत्त हूं, मैं यज्ञदत्त हूं, ऐसा कहने वाले देवदत्त वा यज्ञदत्त को ही आत्मा मानलें तब तौ शरीरसमुदाय में ही दृढ़ प्रतीति होजावेगी कि यही आत्मा है तब फिर ज्ञानादि गुणों की और उन के आश्रय द्रव्य आत्मा की जिज्ञासा ही व्यर्थ है परन्तु शरीर को देख कर भी आत्मा को प्रत्यक्ष नहीं देखा जाता जैसा कि इसी शास्त्र में आगे अध्याय ८ आह्निक १ सूत्र २ में कहेंगे कि " तत्रात्मा मनश्चाप्रत्यक्षे " आत्मा और मन प्रत्यक्ष नहीं। तब देवदत्त और यज्ञदत्त संज्ञा वाले देहादि संघात को प्रत्यक्ष आत्मा कैसे मान लिया जावे ? ॥ ११ ॥ यदि कहो कि हम तौ ज्ञानादि लिङ्गों से लिङ्गी आत्मा का प्रत्यक्ष नहीं कहते किन्तु हम तौ यह कहते हैं कि मैं देवदत्त हूं, मैं यज्ञदत्त हूं, ऐसा जो मन में निश्चय होता है, इस मानसिक प्रत्ययगोचर होने से आत्मा को प्रत्यक्ष कहते हैं ? तो उत्तर- १०

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri ७४ वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद १४८-देवदत्तो गच्छति यज्ञदत्तो गच्छती- त्युपचाराच्छरीरे प्रत्ययः ॥ १२ ॥ (देवदत्तो गच्छति) देवदत्त जाता है (यज्ञदत्तो गच्छति) यज्ञदत्त जाता है (इति) ऐसी (उपचारात्) बोलचाल होने से (शरीरे) देह में (प्रत्ययः) निश्चय होता है ॥ देवदत्त और यज्ञदत्त को जाता हुआ देख कर जब कहते हैं कि देवदत्त वा यज्ञदत्त जाता है, तब तौ शरीर में ही गति क्रिया देखकर यही निश्चय होगा कि जाने वाला शरीर ही देवदत्त वा यज्ञदत्त है, न कि ज्ञानादि गुणों वाला कोई पदार्थ आत्मा है। परन्तु बिना ज्ञानादि गुणों के भित्ति के समान देवदत्त वा यज्ञदत्त के शरीर को कोई आत्मा नहीं मान सकता ॥१२॥ शङ्का- १४६-संदिग्धस्तूपचारः ॥ १३ ॥ (उपचारः) बोलचाल (तु) तौ (संदिग्धः) संदेहयुक्त है ॥ अर्थात् देवदत्त जाता है, यज्ञदत्त जाता है, इस उपचार=बोलचाल से यह पूरा निश्चय नहीं होता कि बोलने वाला देवदत्त वा यज्ञदत्त के शरीर को जाता समझता है अथवा ज्ञानादि गुणों वाले आत्मा को जाता समझता है ॥१३॥ तथा च-यदि हमारा कहा उपचार संदिग्ध है तब मैं देवदत्त हूं, मैं यज्ञ- दत्त हूं, इत्यादि प्रत्यक्ष प्रतीति शरीर में नहीं तौ किस में है ? उत्तर- १५०-अहमिति प्रत्यगात्मनि भावात्परत्रा- ऽभावादर्थान्तरप्रत्यक्षः ॥ १४ ॥ (अहम् इति) मैं हूं, ऐसा व्यवहार (प्रत्यगात्मनि) छिपे हुये आत्मा में (भावात्) होने से और (परत्र) शरीर में (अभावात्) न होने से (अर्था- न्तरप्रत्यक्षः) अन्य अर्थ का प्रत्यक्ष है ॥ अर्थात् जब 'मैं हूं' इत्यादि प्रत्यक्ष अदृष्ट आत्मा में होता है और शरीर में नहीं होता तब मैं देवदत्त हूं, मैं यज्ञदत्त हूं, ऐसा जो प्रत्यक्ष होता है उस को अर्थान्तर (आत्मा) का ही प्रत्यक्ष कह सकते हैं ॥ १४ ॥ आगे पूर्वपक्षी अपने पक्ष का समाधान करता है किः- CC-0.Panini Kanya Maha Vidyalaya Collection.

तृतीयाऽध्याय २ आह्निक ९५

तृतीयाऽध्याय २ आह्निक ९५ १५१-देवदत्तो गच्छतीत्युपचारादभिमा- नात्तावच्छरीरप्रत्यक्षोऽहङ्कारः ॥१५॥ (देवदत्तः) देवदत्त (गच्छति) जाता है (इति) ऐसी (उपचारात्) बोलचाल से (अभिमानात्) और अभिमान से (तावत्) प्रथम तो (अह- ङ्कारः) “मैं” ऐसा कथन (शरीरप्रत्यक्षः) शरीरविषयक प्रत्यक्ष है ॥ अर्थात् देवदत्त जाता है, यज्ञदत्त आता है, विष्णुमित्र चलता है, चैत्रः पढ़ता है, मैत्र पढ़ाता है, इत्यादिक बोलचाल से, और मैं गोरा हूं, तू काला- है, वह मोटा है, मैं पतला हूं, इत्यादिक अभिमान से अहङ्कार का प्रत्यक्ष शरीरविषयक ही जान पड़ता है, इस लिये हमारे पक्ष में संदिग्ध नहीं किन्तु शरीरविषयक उपचार निश्चित है ॥१५॥ फिर शङ्का करते हैं कि- १५२-संदिग्धस्तूपचारः ॥ १६ ॥ (उपचारः) बोलचाल वा लक्षणा का उपचार (तु) तो (संदिग्धः) सन्देह- युक्त ही रहा ॥ अर्थात् देवदत्त जाता है, यज्ञदत्त आता है, इत्यादि प्रत्यक्ष में यह सन्देहः तो ज्यों का त्यों ही रहा कि वक्ता को शरीर का जाना आना विवक्षित है अथवा आत्मा का वा दोनों का ? ॥ १६ ॥ आगे उक्त शङ्का का परिहार करते हैं कि- १५३-न तु, शरीरविशेषाद् यज्ञदत्तविष्णुमित्रयोर्ज्ञानं विषयः ॥ १७ ॥ (शरीरविशेषाद्) शरीर के विशेष से (यज्ञदत्तविष्णुमित्रयोः) यज्ञदत्त और विष्णुमित्र का पृथक् २ (ज्ञानम्) ज्ञान (विषयः) वक्ता का विषय है (न तु) तब सन्देह नहीं रहता ॥ जब यज्ञदत्त को आता और विष्णुमित्र को जाता देखते हैं, तब यज्ञदत्त से विष्णुमित्र का पृथक् जो ज्ञान होता है वह तो शरीरविशेष से ही होता है, आत्मा तो दोनों का एक सा होगा, शरीर ही भिन्न २ प्रकार के देखकर एक का दूसरे से विशेष ज्ञान होता है तब आत्मा जाता है वा आता है, यह तो सन्देह नहीं हो सकता किन्तु शरीरविषयक ही अहङ्कार का विषय होजाता है, फिर उपचार (बोलचाल) सन्देहयुक्त कहां रहा ? ॥ १७ ॥

१६ वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद जब कि शरीर का ही प्रत्यक्ष अभिमान और अहङ्कार है, आत्मा का प्रत्यक्ष नहीं, तब सामान्यतोदृष्ट से विशेष सिद्ध न होने पर आत्मा केवल शास्त्रसिद्ध है, और उस के अनुमान से सिद्ध करने का परिश्रम वृथा है ? तो उत्तरः- १५४-अहमिति मुख्ययोग्याभ्यां शब्दवद् व्यतिरेकाऽव्यभि- चाराद्विशेषसिद्धेर्नागमिकः ॥ १८ ॥ ( अहमिति ) 'मैं' ऐसे ( मुख्ययोग्याभ्याम् ) उपचाररहित और योग्य प्रत्ययों से ( शब्दवत् ) शब्द के समान ( व्यतिरेकाऽव्यभिचारात् ) पृथक्ता के अव्यभिचार से ( विशेषसिद्धेः ) विशेष सिद्ध होने से ( आगमिकः ) केवल शास्त्रसिद्ध ( न ) नहीं है ॥ अर्थात् आत्मा केवल शास्त्रसिद्ध ही नहीं है किन्तु अनुमानसिद्ध भी है क्योंकि 'मैं हूं' ऐसी प्रतीति न तो औपचारिक है किन्तु उपचाररहित है और योग्य भी है क्योंकि केवल शरीर को कोई 'मैं' नहीं कहता, प्रत्युत 'मेरा शरीर' कहता है, तब आत्मा शरीर से नित्य भिन्न हुवा अर्थात् शरीर कभी भी आत्मा नहीं हुवा, तब जैसे शब्द गुण, पृथिवी आदि आठ द्रव्यों में से किसी द्रव्य का गुण न होने से किन्तु आठों से व्यतिरिक्त आकाश का गुण होने से भिन्न है । ऐसे ही आत्मा भी पृथिवी आदि आठ द्रव्यों से व्यतिरिक्त विशेष सिद्ध होने से केवल शास्त्रसिद्ध ही नहीं, किन्तु अनुमान- सिद्ध भी है । इस प्रकार आत्मा-शास्त्र और अनुमान दोनों से सिद्ध है ॥१८॥ आत्मा की परीक्षा हो चुकी । अब आत्मा के नाना अर्थात् अनेक होने की परीक्षा करेंगे, इस लिये पहले पूर्व पक्ष करते हैं:- १५५-सुखदुःखज्ञाननिष्पत्त्यविशेषादैकात्म्यम् ॥ १९ ॥ ( सुखदुःख-ऽविशेषात् ) सुख दुःख और ज्ञान की सिद्धि में विशेष न होने से ( ऐकात्म्यम् ) आत्मा एक ही जान पड़ता है ॥ जैसा सुख दुःख और ज्ञान एक शरीर में है, वैसा ही सब शरीरों में है, कुछ विशेष नहीं । इस कारण देवदत्त, यज्ञदत्त, विष्णुमित्र, चैत्र, मैत्र इत्यादि के अनेक शरीरों में एक ही आत्मा प्रतीत होता है क्योंकि जैसे शब्दलिङ्ग की विशेषता न होने से आकाश एक है और जैसे शीघ्र विलम्ब एकसाथ इत्यादि सामान्य से काल एक है और जैसे पूर्व, पश्चिम आदि प्रत्ययलिङ्ग के अविशेष

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से दिशा एक है, ऐसे ही सुख, दुःख, ज्ञानादि लिङ्गों के अविशेष (सामान्य) से आत्मा भी अनेक शरीरों में एक ही है ॥ १९ ॥ आगे सिद्धान्त सूत्र से उत्तर देते हैंः- १५६-व्यवस्थातोनाना ॥ २० ॥ ( व्यवस्थातः ) व्यवस्था के भेद से ( नाना ) आत्मा अनेक हैं ॥ अर्थात् सुख दुःख ज्ञानादि लिङ्ग यद्यपि सब शरीरों में पाये जाते हैं तथापि एक काल में एक ही प्रकार का सुख वा दुःख वा ज्ञान सब के शरीरों में नहीं पाया जाता । जिस समय में देवदत्त सुख का अनुभव करता है उसी समय में यज्ञदत्त दुःख का अनुभव करता है, और विष्णुमित्र दोनों के सुख और दुःख को जानता है, इसलिये सुख दुःख और ज्ञान सब में समान होने पर भी एक काल में एक को सुख होने से सब को सुख नहीं होता और एक को दुःख होने से सब को दुःख भी नहीं होता तथा एक को ज्ञान होने से सब को ज्ञान भी नहीं होता, यदि होता तो एक पाठशाला के अनेक विद्यार्थियों में से एक के पढ़कर ज्ञानी होने से सब विद्यार्थी ज्ञानी होजाते, परन्तु ऐसा नहीं होता । इस लिये सुख दुःख और ज्ञान की व्यवस्था होने से सब शरीरों में एक आत्मा नहीं है किन्तु अनेक हैं ॥ २० ॥ अब दूसरा हेतु देते हैं-यदि कोई कहे कि केवल युक्ति से आत्मा का अनेक होना सिद्ध किया, शास्त्र से नहीं, तो उत्तरः- १५७-शास्त्रसामर्थ्याच्च ॥ २१ ॥ ( शास्त्रसामर्थ्यात् ) शास्त्र के सामर्थ्य से ( च ) भी ॥ शास्त्र के सामर्थ्य से भी आत्मा अनेक सिद्ध होते हैं । जैसा कि यजुर्वेद अध्याय १६ मन्त्र ४६ में “जीवा जीवेषु सस्रकाः” और कठोपनिषद् वल्ली ५ कण्डिका १३ में “नित्यो नित्यानाम्, चेतनश्चेतनानाम्, एको बहूनाम्” इत्यादि वेद और उपनिषदादि शास्त्रों के सहस्त्रों प्रमाणों से जीवात्मा का अनेक होना पाया जाता है । वेदादि शास्त्रों के बहुत से प्रमाण इसी वैशेषिकदर्शन भाषानुवाद अध्याय ३ आह्निक १ सूत्र १९ के भाष्य में पृष्ठ ६३ से ६६ तक जीवों के अनेकत्व, अणुत्व और भिन्न भिन्नत्व में हम लिख आये हैं, वहां देख लीजिये ॥ २१ ॥

तृतीयाध्याय के इस द्वितीय आह्निक में मन की परीक्षा करके फिर

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri ७८ वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद तृतीयाध्याय के इस द्वितीय आह्निक में मन की परीक्षा करके फिर आत्मपरीक्षा भी पूर्ण रीति से की गई ॥ इति श्री तुलसीराम स्वामि कृते वैशेषिकदर्शन भाषानुवादे तृतीयाऽध्यायस्य द्वितीयमाह्निकम् ॥ २ ॥ इति तृतीयोध्यायः ॥ ३ ॥

ओ३म् अथ चतुर्थोऽध्यायः तत्र प्रथममाह्निकम् पृथिवी आदि ९ द्रव्यों की चतुर्थ सूत्रोक्त उद्देशक्रमानुसार उद्देश लक्षण और परीक्षायें गत तीन अध्यायों में कर चुके। अब जीवात्मा और परमात्मा= आत्मा द्रव्य को छोड़कर शेष पृथिवी आदि आठ द्रव्यों के मूल कारण प्रकृति की परीक्षा करना चाहते हुये आचार्य कणाद मुनि चतुर्थाध्याय का आरम्भ करते हुये मूल कारण प्रकृति का स्वरूप वर्णन करते हैं:— १५५—सदकारणवन्नित्यम् ॥ १ ॥ ( सत् ) जो हो ( अकारणवत् ) जिस का अन्य कारण न हो ( नित्यम् ) यह नित्य है ॥ जो पदार्थ सत्स्वरूप है, जिस का अन्य कोई कारण भी नहीं, वह नित्य पदार्थ एक मूल प्रकृति है ॥ १ ॥ और— १५६–तस्य कार्यं लिङ्गम् ॥ २ ॥ ( तस्य ) उस का ( लिङ्गम् ) लिङ्ग ( कार्यम् ) कार्य है ॥ अर्थात् उस प्रथम सूत्रोक्त कारणरहित सत्स्वरूप प्रकृति का लिङ्ग उस के अनेक कार्य हैं जो पृथिवी आदि कार्यस्वरूप से प्रत्यक्ष हैं ॥ २ ॥ क्यों जी ! कार्य को कारण का लिङ्ग क्यों माना जावे ? उत्तर:— १५७–कारणभावात् कार्यभावः ॥ ३ ॥ ( कारणभावात् ) कारण के भाव से ( कार्यभावः ) कार्य का भी भाव होता है ॥ अर्थात् कारण हो तब उस से कोई कार्य उत्पन्न होता है, न हो तो नहीं। इस लिये कार्य को देखकर अनुमान से कारण की सिद्धि होती है तब कार्य को कारण का लिङ्ग ( अनुमापक ) क्यों न माना जावे ॥ यह निश्चित नियम है कि जिस के होने से जो हो और न होने से न हो, वह उस का लिङ्ग ( अनुमान कराने वाला ) होता है । अर्थात् कार्य

८७ वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद

का भाव बिना कारणभाव के नहीं होता, यह अटूट नियम है। संसार में हम स्थूल पदार्थों को देखते हैं और फिर उन स्थूलों की बनावट में सूक्ष्म अवयवों के जोड़ देखते हैं और फिर उन सूक्ष्मोँ में भी सूक्ष्मतर अवयवों के जोड़ देखते हैं तथा फिर सूक्ष्मतर पदार्थों में भी अन्य सूक्ष्मतम अवयवों का जोड़ देखते हैं, इस प्रकार सूक्ष्म से सूक्ष्म, जिस से परे अन्य सूक्ष्म न हो उस पदार्थ का नाम परमाणु है और वे परमाणु ऐसे अनन्त हैं कि मनुष्य उन को किसी प्रकार गिन नहीं सकता इस लिये वे किसी प्रकार संख्या में नहीं आसकते। यद्यपि वे परमाणु अनन्त हैं तथापि उन को सांख्य योग और वेदान्त में सत्त्व रजस् तमस् भेद से तीन प्रकार का गुण बताया गया है और न्याय, वैशेषिक और मीमांसा में परमाणु नाम से पुकारा गया है, इन्हीं परमाणुओं को श्वेताश्वतर शाखा वाले श्वेत, रक्त और कृष्ण नाम से पुका- रते हैं, इन्हीं को कहीं प्रकाश, क्रिया और आवरण शक्ति बताया गया है। इन्हीं परमाणुओं की कोई दिव्य शक्ति है जिस को प्रमाणकुशल लोग भी पहुंच नहीं सकते, जिस का योगी भी लक्षण नहीं कर सकते और मुमुक्षु भी जिस का उल्लङ्घन नहीं कर सकते, वैज्ञानिक जिस का लक्षण नहीं कर सकते वह अप्रज्ञात, अलक्षण, अतर्क्य, अविज्ञेय, अव्यक्त कोई पदार्थ है जो इन सत्त्वादि गुणों की वा परमाणुओं की साम्यावस्था है, उसी का नाम प्रकृति है। अनेक ग्रन्थों में देवी, शक्ति, पराशक्ति, माया, महामाया, प्रकृति, अव्यक्त, अव्याकृत, प्रधान इत्यादि इसी के अनेक नाम हैं। इसी मूल प्रकृति में ब्राह्म मान से सौ वर्ष के अन्त में प्रलय अवस्था में सम्पूर्ण जगत् सोया हुवा सा अन्धकार से छिपा हुवा सा लीन हुवा रहता है, उस समय में इस प्रकृति का नाम 'स्वधा' होता है। जैसा कि वेद में लिखा हैः- न मृत्युरासीदमृतं न तर्हि न रात्र्या अह्न आसीत्प्रकेतः। आनीदवातं स्वधया तदेकं तस्माद्धान्यन्न परः किञ्चनास॥ ॠ० १०। १२९। २ अर्थात् (प्रलय काल में) न मृत्यु था, न जीवन था, न रात्रि और दिन का चिह्न था (किन्तु) स्वधा=प्रकृति के सहित वह एक (ब्रह्म) चेतन था जो निष्कम्प था और उस से परे कुछ न था ॥ २ ॥

इस में स्वधा का अर्थ यह है कि अपने धारण किये हुवे जीवग्रामसहित ॥ तथा इस से अगले मन्त्र ये हैं किः- तम आसीत्तमसा गूढमग्रेऽप्रकेतं सलिलं सर्वमा इदम् । तुच्छ्येनाभ्वपिहितं यदासीत्तपसस्तन्महिनाऽजायतैकम् ॥३॥ कामस्तदग्रे समवर्त्तताधि मनसो रेतः प्रथमं यदासीत् । सतो बन्धुमसति निरविन्दन्हृदि प्रतीष्या कवयो मनीषा ॥४॥ अर्थ-(अग्रे तमः आसीत्) प्रलयकाल में अन्धियारा रहता है और (इदं सर्वमप्रकेतं सलिलम् आ तमसा गूढम्) यह सब चिह्नहित अदृश्य जल सा अन्धियारे से आच्छादित रहता है। जैसे जल बाष्परूप होकर फिर आकाश में अदृश्य अप्रकेत हो जाता है, वैसे जगत् भी अव्यक्तभाव में होता है। (यत् आभू तुच्छये न अपिहितमासीत्) जो जगत् तुच्छ अर्थात् सूक्ष्म अव्यक्तभावा- पन्न तम से आच्छादित होता है (तत् एकं तपसः महिना अजायत) वह एक अन्धकारावृत अवस्था के पश्चात् महत्तत्त्वरूप से उत्पन्न होता है अर्थात् प्रकृति से महत्तत्त्व की उत्पत्ति सब से प्रथम हुवा करती है। इस मन्त्र में यह कहा है कि प्रथम प्रकृति रहती है, उससे महत्तत्त्व उत्पन्न होता है। अब इस से अगले मन्त्र में यह कहा जाता है कि महत्तत्त्व से काम अर्थात् अहङ्कार की उत्पत्ति होती है ॥ ३ ॥ इस से पूर्वमन्त्र ३ (महिनाऽजायतैकम्०) में महत्तत्त्व की उत्पत्ति कह चुके हैं। (तदग्रे कामः समविवर्त्तत) उस महत्तत्त्व के पश्चात् काम= अहङ्कार उत्पन्न होता है, उसी को मन कहते हैं (मनसः रेतः प्रथमं यत् आसीत्) उस मन का बीज जो पूर्व था (कवयः मनीषा हृदि प्रतीष्य) विद्वान् लोग बुद्धि से हृदय में विचार करके (असति सतो बन्धुं निरविन्दन्) असत्-अप्रतीयमान अवस्था में सत्-प्रतीयमान जगत् के बन्धु=बान्धने वाले कर्म को जानते हैं अर्थात् प्रकृति से जगदुत्पत्ति में पूर्वकल्पकृत कर्म हेतु होते हैं । निष्प्रयोजन जगद्रचना नहीं होती। इस सब से जीव ब्रह्म प्रकृति और जीवों के कर्म प्रवाह से अनादि सिद्ध होते हैं ॥ ४ ॥ इस प्रकार महत्तत्त्व और अहङ्कार इन दोनों को सांख्य और योग शास्त्र में प्रकृति के परिणाम माना गया है तथा न्याय, वैशेषिक, मीमांसा और ११

८२ वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद वेदान्त में शुद्ध प्रकृति के भाग विशेष माना गया है । इस प्रकार शास्त्रों में कोई विरोध नहीं किन्तु संज्ञाभेद और प्रक्रियाभेद मात्र है । अहङ्कार के सत्त्वगुणप्रधान भाग विशेष से ईश्वराज्ञानुकूल प्रत्येक जीव को एक आ- भ्यन्तर इन्द्रिय मन दिया गया है । अहङ्कार के तमोगुणप्रधान भाग विशेष से व्यापक दिशा और काल, व्यापक शब्द तन्मात्र, अणुस्पर्श तन्मात्र, रूप, तन्मात्र, रसतन्मात्र और गन्धतन्मात्र; यह चारों भी उत्पन्न होते हैं। इन चारों को न्याय, वैशेषिक और मीमांसा में द्वयणुक कहते हैं । शब्दतन्मात्र से आकाश, स्पर्शतन्मात्र से वायु, रूपतन्मात्र से तेज, रसतन्मात्र से जल और गन्धतन्मात्र से पृथिवी; यह पांच महाभूत उत्पन्न होते हैं ॥ ३ ॥ शङ्का-कार्यलिङ्ग से किसी कारण की सिद्धि तौ अवश्य होती है पर उस कारण के नित्य होने में क्या लिङ्ग है ? समाधान- १६१-अनित्य इति विशेषतः प्रतिषेधभावः ॥ ४ ॥ (अनित्यः इति) " अनित्य " इस शब्द में (विशेषतः) विशेष का (प्रतिषेधभावः) निषेध होना पाया जाता है ॥ यदि नित्य कोई पदार्थ नहीं होता तौ " अनित्य " शब्द में नञ् का अकार किस का निषेध करता ? बस अनित्य कहना भी किसी के नित्य होने का लिङ्ग है ॥ ४ ॥ यदि कहो कि हम तौ नित्य की अपेक्षा से नित्य नहीं कहते, तौ उत्तर- १६२-अविद्या ॥ ५ ॥ (अविद्या) तो आप की भ्रान्ति है । अर्थात् नित्य की अपेक्षा के विना अनित्य मानना अविद्या वा भ्रान्ति है क्योंकि अनित्य शब्द में जो निषेधार्थक अकार है वह नित्य का ही तौ निषेध कर सकता है ॥ ५ ॥ क्यों जी ! यदि पृथिवी आदि तत्त्वों का मूल कारण प्रकृति है, तौ फिर वह आंख से क्यों नहीं दीखती ? उत्तर- १६३-महत्यनेकद्रव्यवत्त्वाद्रूपाच्चोपलब्धिः ॥ ६ ॥ (महति) स्थूल वस्तु में अथवा महत्तत्त्व में (अनेकद्रव्यवत्त्वात्) अनेक द्रव्यवाला होने से (च) और (रूपात्) रूप से (उपलब्धिः) उपलब्धि होती है ॥

चतुर्थोऽध्याय १ आह्निक [८३]

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चतुर्थोऽध्याय १ आह्निक [८३]

जो पदार्थ महान् होते हैं वा स्थूल होते हैं, वे अनेक द्रव्यों के संयोग के बने होते हैं और रूप वाले होते हैं इस लिये उन की आंख से उपलब्धि होती है, परन्तु प्रकृति ऐसी नहीं । अर्थात् प्रकृति में न तो अनेक द्रव्यों का संयोग है और न रूप है, इस लिये इस की उपलब्धि आंख से नहीं होती ॥ ६ ॥ प्रश्न-अच्छा तो प्रकृति की उपलब्धि तो आंख से इस लिये नहीं होती कि वह अनेक द्रव्य वाली नहीं, परन्तु वायु तो अनेक द्रव्यों वाला है, फिर वह आंख से क्यों नहीं दीखता, वह तो महान् है ? उत्तर- १६४-सत्यपि द्रव्यत्वे महत्त्वे रूपसंस्काराभावाद् वायोरनुपलब्धिः ॥ ७ ॥ (वायोः) वायु की (अनुपलब्धिः) उपलब्धि न होना (द्रव्यत्वे) द्रव्य होने (महत्त्वे) महान् होने (सति) पर (अपि) भी (रूपसंस्कारा- ऽभावात्) रूपसम्बन्ध के न होने से है ॥ यद्यपि वायु द्रव्य है और महान् है परन्तु उस में रूप का सम्बन्ध नहीं है, इस कारण उस की उपलब्धि आंख से नहीं होती ॥ ७ ॥ प्रश्न-जिस रूप के सम्बन्ध से प्रत्येक द्रव्य आंख से उपलब्ध होने लगता है, स्वयं उस रूप की उपलब्धि किस से होती है ? उत्तर- १६५-अनेकद्रव्यसमवायाद् रूपविशेषाच्च रूपोपलब्धिः ॥८॥ (अनेकद्रव्यसमवायात्) अनेक द्रव्यों के साथ सम्बन्ध होने से (च) और (रूपविशेषात्) रूप के विशेष से (रूपोपलब्धिः) रूप की उपलब्धि होती है ॥ जो पदार्थ अनेक द्रव्यों के संयोग से बनता है और उन द्रव्यों के साथ समवाय सम्बन्ध रखता है तथा अन्य रस गन्ध आदि से विशेष (भिन्नता) रखता है वही रूप आंख से उपलब्ध होता है ॥ ८ ॥ इसी प्रकार- १६६-तेन रसगन्धरूपर्शेषु ज्ञानं व्याख्यातम् ॥ ६ ॥ (तेन) उसी प्रकार से (रसगन्धरूपर्शेषु) रस, गन्ध और स्पर्श, इन तीनों में भी (ज्ञानम्) ज्ञान को (व्याख्यातम्) कहा गया समझना चाहिये ॥ जिस प्रकार अनेक द्रव्यों के संयोग से और रूप विशेष से रूप उपलब्ध होता है इसी प्रकार समझना चाहिये कि अनेक द्रव्यों के संयोग और रस

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तब नवम सूत्र का व्याख्यान कैसे ठीक माना जाय ? उत्तर-

८४ वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद विशेष से रस उपलब्ध होता है, अनेक द्रव्यों के संयोग और गन्ध विशेष से गन्ध उपलब्ध होता है और अनेक द्रव्यों के संयोग और गन्ध विशेष से गन्ध उपलब्ध होता है ॥ ९ ॥ शङ्का-पाषाणादि में जो गन्ध है वह तो नासिका से उपलब्ध नहीं होता, तब नवम सूत्र का व्याख्यान कैसे ठीक माना जाय ? उत्तर- १६७-तस्याऽभावादव्यभिचारः ॥ १० ॥ ( तस्य ) उस गन्ध विशेष के ( अभावात् ) उद्भूत न होने से ( अव्य- भिचारः ) नियम का भङ्ग नहीं होता ॥ पाषाणादि में गन्ध है तो सही परन्तु छिपा हुवा है इस लिये उपलब्ध नहीं होता, तब नवम सूत्र का व्याख्यान शङ्का के योग्य नहीं रहता । यदि पाषाण में सर्वथा गन्ध न होता तो पाषाण के भस्म में गन्ध क्यों उपलब्ध होता । भेद केवल इतना है कि वही गन्ध जो पाषाण में छिपा हुवा है, पाषाण के भस्म में प्रकट वा उद्भूत होने से उपलब्ध होने लगता है ॥१०॥ क्यों जी ! जैसे रूप, रस, गन्ध और स्पर्श; इन सब गुणों की उपलब्धि में एक एक इन्द्रिय से उपलब्ध होना कारण बताया गया, क्या इसी प्रकार संख्या परिमाण आदि गुणों की उपलब्धि में भी कोई कारण कहा जा सक्ता है ? उत्तर, हां- १६८-संख्याः परिमाणानि पृथक्त्वं संयोगविभागौ परत्वापरत्वे कर्म च रूपिद्रव्यसमवायाच्चाक्षु- षाणि ॥ ११ ॥ ( संख्याः ) संख्यायें, ( परिमाणानि ) परिमाण, ( पृथक्त्वं ) पृथक् होना, ( संयोगविभागौ ) संयोग और विभाग, (परत्वापरत्वे) परला होना और वरला होना, ( कर्म ) कर्म, ( च ) और स्नेह, द्रवता और वेग; ये सब भी (रूपिद्रव्यसमवायात्) रूपवाले द्रव्यों के साथ समवाय सम्बन्ध होने से (चाक्षुषाणि) आंख से उपलब्ध होने वाले हैं ॥ जिस प्रकार रूप गुण आंख से उपलब्ध होता है इसी प्रकार संख्यायें भी आंख से उपलब्ध होती हैं क्योंकि संख्यायें भी रूपवाले द्रव्यों के साथ समवाय सम्बन्ध रखती हैं, तथा जैसे रूप का आंख से ग्रहण होता है

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri चतुर्थाध्याय १ आन्हिक ८५ वैसे ही परिमाणों ( लम्बाई, चौड़ाई, ऊंचाई, नीचाई, मोटाई ) का भी आंख से ग्रहण होता है क्योंकि लम्बाई चौड़ाई आदि परिमाण भी रूपवाले द्रव्यों के साथ समवाय सम्बन्ध रखते हैं । तथा पृथक् होना गुण भी आंख से ग्रहण किया जाता है और संयोग और विभाग भी आंख से ग्रहण होते हैं क्योंकि पृथक्ता, संयोग और विभाग भी रूपवाले द्रव्यों के साथ समवाय सम्बन्ध रखते हैं । ऐसे ही परे होना वा वरे होना भी रूप वाले द्रव्यों के साथ समवाय सम्बन्ध रखने से चक्षु द्वारा ही उप- लब्ध होता है। ऐसे ही कर्म भी चक्षु द्वारा उपलब्ध होता है क्योंकि कर्म भी रूपवाले द्रव्य के साथ समवाय सम्बन्ध रखता है। इस सूत्र में चकार से ( स्नेह ) चिकनाई, ( द्रवत्व ) गीलापन, और ( वेग ) धक्का; इन का ग्रहण है क्योंकि चिकनाई, तरी और धक्का; ये सब भी रूपवाले द्रव्यों के साथ समवाय सम्बन्ध रखते हैं ॥ ११ ॥ १६६-अरूपिष्वचाक्षुषाणि ॥ १२ ॥ ( अरूपिषु ) रूपरहित द्रव्यों में ( अचाक्षुषाणि ) [ संख्या आदि गुण ] आंख से ग्रहण नहीं किये जाते ॥ जो पदार्थ रूपरहित हैं अर्थात् चक्षु का विषय नहीं हैं उन में संख्या, परिमाण, पृथक्त्व, संयोग, वियोग, परत्व, अपरत्व, कर्म, स्नेह, द्रवत्व और वेग; ये सब गुण भी चक्षु का विषय नहीं होते ॥ १२ ॥ १७०-एतेन गुणत्वे भावे च सर्वेन्द्रियं ज्ञानं व्याख्यातम् ॥ १३ ॥ ( एतेन ) इसी से ( गुणत्वे ) गुणत्व जाति में ( च ) और ( भावे ) सत्ता में ( सर्वेन्द्रियम् ) सब इन्द्रियों से होने वाला ( ज्ञानम् ) ज्ञान ( व्याख्या- तम् ) कहा गया समझना चाहिये ॥ जिस प्रकार चक्षुर्ग्राह्य द्रव्यों में संख्या आदि गुण आंख का विषय होते हैं तथा रूपरहित द्रव्यों में आंख का विषय नहीं होते, इसी प्रकार गुणत्व जाति और सत्ता में भी सर्वेन्द्रिय ज्ञान की व्याख्या होगई समझनी चाहिये ॥१३॥ इस आह्निक में पृथिवी आदि सब भावों का मूल कारण तथा उन की परोक्षता और अपरोक्षता शङ्का समाधानपूर्वक परीक्षित की गई ॥ इति चतुर्थाध्याये प्रथममाह्निकम् CC-0.Panini Kanya Maha Vidyalaya Collection.